शुक्रवार, 26 जून 2020

माननीय ‘‘न्यायाधिपति’’ ‘‘ईश्वर के प्रकोप’’ से कैसे बच पाएंगे?

उड़ीसा की ‘‘भगवान जगन्नाथ’’ पूरी की ‘‘रथ यात्रा’’ के मामलें में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायाधिपति एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एनजीओं ‘‘उड़ीसा विकास परिषद’’ द्वारा दायर याचिका में 4 दिन पूर्व दिए गये स्वयं के पारित आदेश को; (दायर) पुनर्विलोकन याचिका में उक्त पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया। तदनुसार ‘‘भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा’’ को बहुत से कड़े प्रतिबंधों जैसे कफ्यू इत्यादि के साथ अनुमति दे दी गई। और यह यात्रा भी उन प्रतिबंधों के पालन साथ सफलतापूर्वक निकल गई, जिसके लिए उच्चतम न्यायालय, उड़ीसा की सरकार और श्रद्धालु नागरिक गण बधाई के पात्र हैं।
आप जानते ही हैं, भारतीय संविधान लोहे की रॉड़ के समान कड़क न होकर उस बांस के समान है, जो जरूरत के लिए आवश्यकतानुसार मुड़ जाता है। ठीक इसी प्रकार संविधान में भी जन आकांक्षाओं और आवश्यकता के अनुरूप जो भी जनोपयोगी संशोधन की आवश्यकता सरकार समझती है, उन संशोधन को संविधान के मूलभूत ढांचा (केशवानंद भारती के मामले में दिये गये प्रतिपादित सिद्धांत को अपनाते हुये) को बदले बिना, संविधान में संशोधन करते चली आ रही है। परिणाम स्वरूप ही हमारे देश में अभी तक 126 से भी ज्यादा संविधान संशोधन हो चुके हैं, जो उसके लचीलेपन को ही सिद्ध करते हैं। लेकिन जहां तक कानून निर्माण व उसकी व्याख्या करने वाली सुप्रीम संस्था उच्चतम न्यायालय का प्रश्न है, वह संविधान के समान ही (उपरोक्तानुसार) लचीली नहीं है। उच्चतम न्यायालय को उसके समक्ष प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों के आधार पर ही अपने आसपास की परिस्थितियों से या अन्य किसी प्रकार से प्रभावित हुए बिना, समग्र रूप से गहराई से विचार कर एक विकल्प हीन सुनिश्चित निर्णय देना होता है। 
इसीलिए माना जाता है, ‘‘कानून अंधा होता है‘‘? उसका मतलब यही है कि कानून देख तो सकता नहीं, मतलब न्यायाधीश के सामने या आसपास घटित हो रहे दृश्यों को देखने या संज्ञान लेने के बजाए, उसके समक्ष प्रस्तुत समस्त साक्ष्यों को पढ़ देख कर समग्र विचार कर निर्णय देना ही न्यायालय का कार्य होता है। चँूकि उच्चतम न्यायालय की स्थापना व कानून का निर्माण भी उसी कुछ हद तक लचीले संविधान के अनुसार ही किया जाता है; इसीलिए उस लचीलापन का प्रभाव कभी-कभी न्यायालय पर भी पड़ जाता है। उच्चतम न्यायालय स्वयं कानून का निर्माता नहीं। बल्कि यह काम विधायिका का है। लेकिन उसके निर्णय का प्रभाव संवैधानिक रूप से पूरे देश पर बंधनकारी होने के कारण उसके निर्णय देश के कानून (लॉ ऑफ लैंड) का रूप ले लेते है। चूंकि उच्चतम न्यायालय का निर्णय अंतिम होता है। निर्णय के अंतिम होने (फाईनलिटी) के कारण शायद मानवीय गलतियों के और संविधान के लचीलापन के कारण हुई गलतियों को दुरूस्त करने के लिये ही उच्चतम न्यायालय को अपने निर्णय को पुनर्विचार करने के लिये यह प्रावधान इसी संविधान द्वारा किया गया है। इसका उपयोग करके ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने भगवान जगन्नाथ की यात्रा को अनुमति दी है, जिस पर पहले इसी बंेंच द्वारा प्रतिबंध लगा दिया गया था। 
आपराधिक मामलों में अंतिम रूप से दोष सिद्ध किये अपराधी के पास पुनर्विचार याचिका के खारिज होने के बाद भी उपचारात्मक (क्यूरेटिव)  याचिका की अवधारणा उच्चतम न्यायालय ने ‘‘रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा’’ के प्रकरण में वर्ष 2002 में निर्धारित की थी। इससे स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय की अंतिमता (फाइनलिटी) स्थिति होने के बावजूद अपराधिक मामलों में गलतियों की न्यून संभावनाओं को भी न्यूनतम करने व सुधारने के लिये उक्त उपचारात्मक याचिका की व्यवस्था बनाई है। अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय में हुई गलतियों को सुधारने के लिये तो द्विस्तरीय अपीलीय प्रावधान हैं ही।  
अब जरा कल्पना कीजिए! यदि यह ‘‘पुनर्विचार’’ या पुनरावलोकन का प्रावधान संविधान में नहीं होता तो, आज सैकड़ों वर्षो से चली आ रही परंपरा गत भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा इस वर्ष नहीं निकल पाती। इसी यात्रा पर मुगलों के दौर में 285 वर्ष पूर्व प्रथम बार रोक लगी थी। यद्यपि वर्ष 285 वर्ष पूर्व, अर्थात वर्ष 1735 के पूर्व 1568, 1601, 1607, 1611, 1617, 1621, 1692, 1731 एवं 1733 में विभिन्न कारणों से भगवान जगन्नाथ जी की यह यात्रा संभव नहीं हो पायी। मानव से गलती होना स्वाभाविक है। इसी आधार पर यदि पुनर्विचार का प्रावधान किया गया है तो, इस बात की क्या ग्यारंटी है कि इस पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते समय भी माननीय न्यायाधीश मानवीय गलती नहीं करेंगे? चूँकि मानव से गलती होना अंतिम सांस तक उसका स्वभाव है, तब उससे उत्पन्न न्यायिक निर्णयों को इस स्वभाविक दोष के प्रभाव को लगभग शून्य कैसे किया जा सकता है, ताकि निर्णय सही हों। यह प्रश्न है? 
एक तरीका इसका यह हो सकता है कि जब पुनर्विचार याचिका पर विचार किया जावंे तो उस सुनवाई में एक पक्षकार उन न्यायाधीशों (बेंच) को भी बनाया जावें, जिन्होंने मूल आदेश पारित किये हांे। ताकि उन न्यायाधीशों को पूर्व में पारित अपने आदेश की रक्षा (डिफेंड) करने का अवसर मिल सकेगा, यदि वे चाहेगें तो। दूसरा एक तरीका यह भी हो सकता है, कि पुनर्विचार याचिका में यदि निर्णय पूर्व आदेश के विपरीत आता है, तब फिर उक्त मामला तीसरी बेंच को सुनवाई के लिए भेजा जाए और तब इन तीनों निर्णयों में जो दो निर्णय समान हो, उनको लागू किया जावे। हांलाकि इस स्थिति में निर्णय आने में कुछ देरी और हो सकती है। इस प्रकार स्वाभाविक मानवीय त्रुटि को एक बेहतर वैज्ञानिक तरीके से और ज्यादा संतोष जनक ढंग से स्थिति से निपटा जा सकता है। इस मानवीय त्रुटि पर विचार करना आज इसलिए आवश्यक हो गया है, क्योंकि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के उपरोक्त मामले में न्यायाधिपति मुख्य न्यायाधीश एस. ए. बोबड़े ने पहले अनुमति देने से इंकार कर दिया था। इस आधार पर कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व सुरक्षा के हित को ध्यान में रखते हुये, आज कोरोना के बीच हमने इस साल यदि रथ यात्रा होने दी तो ‘‘भगवान जगन्नाथ’’ ‘‘हमें माफ नहीं करेंगे।’’ महामारी के दौरान इतना बड़ा समागम नहीं हो सकता। और अब उसी बैंच द्वारा अनुमति दे दी गई। शायद इसी लिए कहा गया है कि ‘‘कानून अंधा होता हैं‘‘। अतः अब बड़ा प्रश्न माननीय न्यायाधिपति को ‘‘भगवान जगन्नाथ से माफी दिलवाने का है, जिन्होंने इस पुर्नर्विचार याचिका में ‘‘भगवान जगन्नाथ जी’’ की यात्रा की अनुमति दी है। 

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