मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

क्या यही वास्तविक लोकतंत्र है?



राजीव खण्डेलवाल:
चरखारी उ.प्र. से लौटकर:-
                               विश्व का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश भारत माना जाता है। भारतीय लोकतंत्र की जड़े इतनी गहरी हो चुकी है कि विभिन्न कमियों, राजनैतिक उतार-चढ़ाव, जून 1975 में थोपे गये आपातकाल के संक्रमण काल के बावजूद देश में लोकतंत्र आज भी जीवित है, पोषित है। यदि इसकी तुलना हम हमारे पड़ोसी राष्ट्रों पाकिस्तान या बांग्लादेश के लोकतंत्र से करें जहां भी उसी ब्रिटेन का लोकतंत्र आया है जैसे कि भारत में आया है, वहां पर लेाकतंत्र सुरक्षित न रहकर तार-तार हो गया है। वहां पर लोकतंत्र की ''सौतन" तानाशाही शासन बार बार लागू होता रहा। 
                               अभी देश में  पांच प्रदेशो मे चुनाव हो रहे है जिसमे मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश भी शामिल है। इसके बाबत यह कहा जाता है कि यदि देश में दिल्ली की गद्दी पर शासन करना है तो उसका रास्ता उप्र से ही होकर जाता है। इसलिए सभी राजनैतिक पार्टियों की निगाहें यूपी चुनावों पर ज्यादा है। मुझे अनुभव मिला यूपी चुनाव का जब मैं चुनावों के दौरान चरखारी विधानसभा में रहा जहा से प्रमुख राष्ट्रीय नेत्री साध्वी उमाश्री भारती चुनाव लड़ रही है। वहां की स्थिति देखकर मुझे महसूस हुआ क्या वास्तव में यह भीमराव अम्बेडकर के संविधान द्वारा प्रदत्त वहीं लोकतंत्र है जिसके लिए हम भारतीय होकर गर्व करते है। वास्तव में लोकतंत्र के लिए अपने ''मत" का उपयोग कर बटन दबाकर वोट देना ही एक अंतिम प्रक्रिया होती है। इसके द्वारा ही हम लोकतंत्र को मजबूत करने का दावा करते है। लेकिन हमने जो कुछ देखा कि मताधिकार के प्रयोग के लिए चुनाव आयोग द्वारा जिस तरह की परिस्थिति उत्पन्न की गई उसमें से  एक नागरिक को किस प्रकार गुजरना पड़ा है यह गम्भीर विश्लेषण का विषय है। यह अंतिम प्रक्रिया जो कि लोकतंत्र को मजबूत करने के नाम पर की जाती है, वास्तव में वह लोकतंत्र को कमजोर करने वाली है। 
                               चुनाव आयोग का यह संवैधानिक कार्य व दायित्व है कि वह निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए इस तरह का स्वस्थ्य वातावरण बनाये कि एक नागरिक बिना किसी डर, दबाव, धमकी व धन के प्रलोभन के, उसे संविधान द्वारा प्रदत्त अपने मत का प्रयोग अपने चारो ओर राजनैतिक पार्टीयो व उम्मीदवारों द्वारा उत्पन्न की गई परिस्थियों से प्रभावित हुए बिना अपने मत का स्व विवेक से विवेकशील प्रयोग कर सके। लेकिन जिस तरह की परिस्थितियां चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव की तैयारी के नाम पर उत्पन्न कर एक आम नागरिक को जिस जबरदस्ती व भय के बीच से गुजरना पड़ा है वह वास्तव में बड़ा ही असहनीय अक्षोभनीय व असम्माननीय है। चुनाव आयोग को यह अधिकार कदापि नहीं है कि वह हमें संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार स्वतंत्रता के अधिकार को चुनाव की तैयारी के नाम पर छीन लें। मैने वहां देखा कि चुनाव के ३६ घण्टे पूर्व एक आम नागरिक के सारे संवैधानिक स्वतंत्रता के अधिकार (बिना किसी औपचारिक आदेश के) निष्प्रभावी कर व्यक्तिगत जीवन प्रवाह को ही उक्त अवधि में रोक दिया दिया गया। मैं पूरे ३६ घण्टे चरखारी केंद्र में एक गेस्ट हाउस में बिना किसी सजा के एक कमरे में नजरबंद जैसे माहौल में रहा सिर्फ चुनाव आयोग के (गैर) कानूनी भय के कारण। मुझे यह बताया गया कि यदि आप जरा भी प्रचलन (मूवमेंट) करेंगे तो वह चुनाव आचार संहिता का उलंघन माना जाएगा जिसके कारण न केवल आपकी गाड़ी जब्त कर ली जाएगी बल्कि आपको गिरफ्तार भी किया जा सकता है। आपका प्रचलन चुनाव प्रचार माना जाएगा आपकी कोई बात सुनी नहीं जायेगी। क्या एक आम नागरिक को यह अधिकार नहीं है कि वह एक नागरिक की हैसियत से चुनाव के दिन या उसके ३६ घण्टे पूर्व तक चुनाव कैसे हो रहा है वह देख सके। क्या एक नागरिक जब एक राजनैतिक कार्यकर्ता हो जाता है उसके नागरिक अधिकार समाप्त हो जाते है? एक राजनैतिक कार्यकर्ता क्या हर समय प्रत्येक परिस्थिति में सिर्फ राजनैतिक कार्यकर्ता ही बना रहेगा? क्या एक राजनैतिक कार्यकर्ता जब वह सुबह स्पोर्ट काम्प्लेक्स में जाकर खेलता है तो खिलाड़ी व दिन में न्यायालय जाने पर वह अधिवक्ता नहीं हो जाता? तब उस रूप में वह समस्त कानूनी बंधनों को (प्रचार न करने ) का पालन करते हुए राजैनतिक कार्यकर्ता के अतिरिक्त अपनी दूसरी हैसियत से चुनावी प्रक्रिया का आंखो देखा अवलोकन क्यों नहीं कर सकता प्रश्र यह है। चुनाव आयोग का यह कथन कि चुनाव के ३६ घण्टे पहले किसी प्रकार का चुनाव प्रचार नहीं होना चाहिए क्योङ्क्षक तब राजनैतिक पार्टियां या उम्मीदवार वोटरो को छद्म रूप से प्रभावित कर अपने पक्ष में वोट डलवा सकती है। चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिए कि राजनैतिक पार्टी और उम्मीदवार को जब यह अधिकार अधिसूचना से पोलिंग के ३६ घंटे पूर्व तक है कि वह अपने-अपने द्वारा पूर्व में किये गये कार्यो का उल्लेख कर, अपने घोषणा पत्र का उल्लेख कर अपने मुद्दे को जनता (वोटर) के सामने लाकर उस जनता को जिसे अपने 'मत' का प्रयोग कर अपना प्रतिनिधी चुनना है, को प्रभावित कर सकता है तब फिर ३६ घंटे के प्रतिबंध लगाने का औचित्य क्या है। क्या जनता सिर्फ चुनाव से ३६ घंटे पूर्व कही गई बात को ही याद नहीं रखेगी लगभग २५ दिन तक लगातार चलने वाले चुनाव प्रचार के दौरान राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से जनता के सामने कहीं गई बाते जनता के दिमाग से निकल जाएगी? क्या जनता का दिमाग इतना खोखला है? या जनता का दिमाग इतना कमजोर है या आखरी दिन जनता बल, प्रलोभन, धन आदि के प्रभाव में आकर वोट डालेगी और इसलिए चुनाव आयोग इस तरह का प्रतिबंध लगा रहा है संविधान की किस धारा के अंतर्गत चुनाव आयोग ऐसी धारणा वोटर (जनता) के प्रति कर सकता है? यह तथ्य सोचनीय है। कानून् के स्थापित राज में यह स्पष्ट व्यवस्था है कि हर व्यक्ति निर्दोष है हर व्यक्ति ईमानदार है जब तक की वह कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया द्वारा दोषी सिद्ध न हो जाए। अत: हमें यह मानना होगा कि प्रत्येक नागरिक जब इवीएम मशीन पर जाकर अपने मत का प्रयोग करता है तब तक वह ईमानदार एवं निर्दोष है जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि वह अपने मत का प्रयोग किसी दबाव के अंतर्गत या किसी से पैसे लेकर कर रहा है। लेकिन मात्र इस आशंका के आधार पर एक व्यापक निरोधात्मक कार्यवाही कर नागरिकों के दैनिक सामान्य जीवन जीने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाना मेरे विचार में न तो नैतिक है और न ही संवैधानिक है। 
                               ६६ वर्ष में १५ बार सामान्य आम चुनाव व कई मध्यावधि चुनाव हो जाने के बावजूद चुनाव प्रकिया को सामान्य प्रक्रिया क्यो नहीं माना जा रहा है? क्या देश का राजनैतिक स्वास्थ्य उतना प्रतिरोधात्मक नहीं हो पाया है कि वह चुनाव में होने वाली दुर्घटनाओं का सक्षम प्रतिरोध कर सके । इस पर संविधान विशेषज्ञों को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। ऐसा लगता है कि देश में प्रत्येक चुनाव के  दिन २५ जून १९७५ का दिन आ जाता है जिस दिन आपातकाल लगाकर हमारी स्वतंत्रता को छीना गया था। प्रत्येक पांच वर्ष में चुनाव के दिन संवैधानिक संस्था द्वारा हमारे देश में अघोषित आपातकाल तो लागू नहीं किया जा रहा है? यह विचारणीय प्रश्र है।  इससे जुड़ी हुई जो महत्वूपर्ण बात है कि हमारी जनता धनबल से प्रभावित होकर वोट डालती है और उसको रोकने के लिए यह कदम चुनाव आयोग उठा रहा है यदि इस बात में कुछ सच्चाई है भी तो बजाए यह सब करने के जनता के नैतिक बल को उंचा उठाने के लिए हमें बहुत से प्रशिक्षणात्मक कदम उठाने चाहिए ताकि इसका स्थायी इलाज हो सके। एक बात और जब यूपी का चुनाव का देखा तो यह महसूस हुआ कि मध्यप्रदेश का चुनाव तो इसके आगे बच्चा है। यहां सिर्फ जातिवाद के आधार पर यूपी में चुनाव हो रहे है चरखारी जहां मात्र विकास का मुद्दा हावी है या कुछ अन्य सीटो को छोड़ दिया जाए जहां राष्ट्रीय नेता चुनाव लड़ रहे है। अन्यत्र न तो कोई भ्रष्टाचार का मुद्दा दिखता है और न ही 'अन्ना' या 'बाबा' का कोई प्रभावी असर यहां नजर आता है। इसलिए हम यद्यपि इस बात का दावा जरूर कर सकते है कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र देश है लेकिन हमें इस बात के लिए कि विश्व का सबसे स्वस्थ्य लोकतांत्रिक देश भी भारत हो इसके लिए एक बहुत ही समग्र दृष्टि की आवश्यकता है। इस मामले में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की महती भूमिका इसलिए हो सकती है क्योङ्क्षक  जनता को जाग्रत करने का उन्होने काम किया है। यदि चुनावी प्रणाली में व्याप्त कमियो कुरीतियों को दूर कर एक स्वस्थ प्रणाली हेतु वे जनता का आव्हाहन करे तो मैं मानता हूं कि यह देश के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी, सेवा होगी और उस लोकतंत्र को जो कि हमारे जीवन जीने का मजबूत स्तम्भ है मजबूती प्रदान करेगा। 

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)
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