मंगलवार, 24 जुलाई 2012

15 संसद सदस्यों 49 विधायको के अयोग्य मत लोकतंत्र पर कलंक!



                         अभी हाल ही में सम्पन्न हुए 13 वे राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी आशा के अनुरूप ही नहीं बल्कि उससे भी अधिक वोट प्राप्त कर जीतने में सफल हुए। उनके प्रतिद्वद्वी पी.ए. संगमा जो अपनी जीत हेतु किसी चमत्कार की उम्मीद रख रहे थे, वह नहीं हो पाया। लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण चमत्कार अवश्य इस चुनाव में देखने को मिला वह यह कि ‘इलेक्ट्राल कॉलेज’ के पंद्रह आदरणीय, माननीय, सम्माननीय सांसद सदस्य एवं 49 विधायकों के वोट अवैध घोषित किये गये। देश में गणतंत्र स्थापित हुए 62 वर्ष हो गये और प्रथम आम चुनाव 1952 में हुआ था। प्रथम राष्ट्रपति का चुनाव 2 मई 1952 को हुआ तब से लेकर आज तक दोनों सदनों संसद व विधानसभा के सदस्यगण (सांसद व विधायकगण) राष्ट्रपति के ‘इलेक्ट्राल कॉलेज’ के सदस्य होकर मतदान करते चले आये है। 
                         60 वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो चुका है यदि इसके बावजूद इस देश के लाखों नागरिकों के ‘वैध’ वोट पाकर चुने हुए जनप्रतिनिधि अभी तक अपना ‘एक’ ‘वैध’ ‘मत’ देने की तमीज नहीं सीख पाए है तो क्या उन्हे अपने गरिमामय पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? उपरोक्त स्थिति को देखते हुए निश्चित ही उनका यह कानूनी अधिकार भी संविधान में आवश्यक संशोधन कर समाप्त किया जाना चाहिए। यह उन असंख्य मतदाताओं का भी अपमान है जिन्होने चुनकर इन संसद सदस्यों को भेजा। इसमें तो कुछ संसद सदस्य तो ऐसे भी है जिन्होने पहली बार राष्ट्रपति चुनाव में अपने मत का प्रयोग किया हो ऐसा नहीं है। लाखो ’वैध’ मत प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अपना स्वयं का मत सही प्रदत्त करने की अक्ल नहीं है तो यह लोकतंत्र का उपहास ही कहा जाएगा। संसद जब ऐसे लोगो से युक्त होती है तभी अन्ना टीम और बाबा रामदेव को यह कहने का साहस एवं नैतिक अधिकार मिलता है कि ‘यह कैसी संसद’? जहां एक सौ पैसठ से भी अधिक अपराधी प्रवृत्ति के लोग है जिनके खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में मुकदमें चल रहे है। जिन पंद्रह सदस्यों के मत सही रूप में उपयोग नहीं किये जाने के कारण अवैध घोषित हुए उनके कारण टीम अन्ना को वर्तमान संसद पर पुनः उंगली उठाने का अवसर मिलेगा। अतः पूर्व में संसद के बाबद उन्होने जो बात कही थी वह वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए गलत नहीं कही जा सकती है। 
                         अतः एक बार जनप्रतिनिधि को चुनकर हमें आंख मूंदकर नहीं बैठ जाना चाहिए और न ही जनप्रतिनिधियों को निर्बाध रूप से निरंतर अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए। उन पर निश्चत ही कुछ प्रतिबंध आवश्यक रूप से होने चाहिए कि यदि वे अपने अधिकार का प्रयोग जनता के हितो के विपरीत करे, या अपने अधिकारो का उपयोग करने में अक्षम हो तो उनके विशेषाधिकार समाप्त हो जाने चाहिए। अन्ना टीम की मंशा भी शायद यही है। 15 सांसदों की उपरोक्त विफलता केवल देश के लोकतंत्र के लिए ही शर्मनाक घटना नहीं है, बल्कि इससे विदेशों में भी राष्ट्र का सिर नीचा हो जाता है।
                         यह विडम्बना ही है कि 60 वर्ष के परिपक्व होते लोकतंत्र में हम ऐसे प्रतिनिधि नहीं चुन पाए जिन्हे खुद के मताधिकार का सही प्रयोग नहीं आता है। यह तो देश का सौभाग्य है कि इस तरह के मताधिकार प्रयोग करने के अवसर सांसदो को राष्ट्रपति चुनाव के अलावा शायद ही है। अन्यथा ऐसे सांसदो के बल पर तो देश के लोकतंत्र का गुड़-गोबर होना निश्चित है। संसद के अधिवेशन में विधेयक को पारित करते समय इलेक्ट्रानिक बटन से ‘हां’ या ‘ना’ दबाकर मत देना होता है, जहां सांसदों को अपने ‘दिमाग’ का प्रयोग शायद ही करना होता है। संसद सदस्य, विधायको के मत अवैध घोषित होने का कारण उनका अनपढ़ होना नहीं है! क्योंकि वे बाकी की अन्य सारी ‘कलाओं’, भ्रष्टाचार से लेकर.........! में काफी निपुण होने के कारण पढ़े लिखे नजर आते है। यह स्थिति निश्चय ही इन अयोग्य राजनीतिज्ञो को ‘वैध’ मत देकर जनप्रतिनिधि बनाने वाली जनता के लिए चिंतनीय है।

क्या भारतीय क्रिकेट बोर्ड को भंग करने का समय नहीं आ गया है?


                  भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट दौरे की स्वीकृति देकर क्रिकेट बोर्ड ने पुनः अपनी निरंकुश स्वेच्छा चारिता का परिचय दिया है। भारतीय क्रिकेट बोर्ड न केवल देश के समस्त खेल संगठनों में आर्थिक रूप में मजबूत संगठन है बल्कि विश्व के भी गिने चुने अमीर खेल संगठनों में उसकी गिनती होती है। किसी भी खेल के सुविरचित विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसका खेल संगठन स्वायत्ताती हो और उस खेल के विशेषज्ञ लोगों से वह परिपूर्ण हो। दुर्भाग्यवश भारत का क्रिकेट बोर्ड स्वायत्त होने के बावजदू क्रिकेट विशेषज्ञो से परिपूर्ण नहीं है जिसके अध्यक्ष और शक्तिशाली पदाधिकारी अधिकांश रूप से राजनेता या उद्योगपति रहे है। 
क्रिकेट भारत का एक लोकप्रिय खेल है। यद्यपि विदेशी खेल है लेकिन इसी खेल पर बनी फिल्म ‘लगान’ में जब आमीर खान की टीम ब्रिटिस टीम को हराती है तो हमें एक आत्मिक संतोष मिला था। लेकिन वही क्रिकेट के माध्यम से जब हम पास्तिान से संबंध सामान्य, शांती से करना चाहते है जो हमारा एक स्थाई पड़ोसी शत्रु देश (पड़ोसी होना हमारे हाथ में नहीं है।) से हमारा न केवल दो बार युद्ध हो चुका है बल्कि लगातार वह हमारा देश में हो रही आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त भी रहा है मुम्बई बम आतंकवादी कार्यवाही जैसे कर उसने जन मानस के दिल को झकझोर दिया थे। इस कारण से हमारी सरकार और बोर्ड ने तत्समय क्रिकेट टीम के दौरे पर दोनो देशो के बीच प्रतिबंध लगा दिया था। जिन कारणों से इस देश की सरकार और क्रिकेट बोर्ड ने प्रतिबंध लगाया था और आज जब प्रतिबंध खोला है तो दोनों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे जनता के बीच एक स्वेत पत्र जारी करें कि क्या वे कारण दूर हो गये है या उनको यह भरोसा दिलाया गया है कि वे कारण दूर हो जाएंगे या प्रतिबंध के समय जो तत्कालीन आरोप थे वे गलत थे ऐसा उन्हे आज एहसास हुआ है। तभी उनकी यह कार्यवाही सही कहीं जाएगी अन्यथा बालासाहेब ठाकरे ने ‘सामना‘ में जो विचार यद्यपि असंयमित शब्दों में कहा है वही भावना जो पूरे देश की है को ही व्यक्त किया है। 
                  एक आम भारतीय के जेहान में यह प्रश्न कौंधता है कि क्या क्रिकेट बोर्ड देशभावना से ऊपर हो गया है? क्या मार्केटिंग के दौर में क्रिकेट का व्यापार ही क्रिकेट बोर्ड की प्राथमिकता हो गई है? क्या करोड़ो रूपये कमाकर, अमीर बोर्ड कहलाना ही बोर्ड का एकमात्र उद्वेश्य रह गया है? यदि ऐसी स्थिति वास्तव में बन रही है तो क्या यह समय नहीं आ गया है कि ऐसे क्रिकेट बोर्ड को तुरंत भंग कर दिया जाए। लेकिन प्रश्न फिर यही उठता है कि इस क्रिकेट बोर्ड को भंग कौन करेगा? क्योंकि जिस    आधार पर क्रिकेट बोर्ड को भंग करने के विचार हमारे मन में आते है वही आधार और वही विचार केंद्रीय सरकार के प्रति भी आते है जो ही इस क्रिकेट बोर्ड को भंग कर सकती हैं। तो क्या हमारी यह भावना केंद्रीय सरकार को भंग करने की मानसिकता की ओर जा सकती है? यह बात समय के गर्भ में है। 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

भारत-पाक विदेश मंत्रियों की बातचीत! टेबल पर? युद्धभूमिं पर?



राजीव खण्डेलवाल:
                   भारत और पाकिस्तान के बीच आज विदेश मंत्री के स्तर पर आज अंतिम दौर की बातचीत हो रही है। दोनो देशो के बीच बातचीत कोई नई बात नहीं है, न ही बातचीत में कोई नई बात है और न ही कोई नया परिणाम निकलने वाला है। हाल ही में 26/11 का मास्टर माईंड अबु जिन्दाल उर्फ अबु हमजा उर्फ जबीउद्दीन अंसारी को सउदी अरब से प्रत्यार्पण कर भारत लाया गया है। उसने जो जानकारी दी है उसके बाद राजनैतिक स्तर पर विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत होना भारत का बड़प्पन ही कहा जाएगा जबकि पूर्व में ही भारत ‘डोजियर’ के रूप में समस्त दस्तावेज पाकिस्तान को दे चुका है जिसमें न केवल दाउद इब्राहिम के विरूद्ध मुम्बई बम कांड में लिप्त होने के दस्तावेजी साक्ष्य है बल्कि इस बात के भी पुख्ता सबूत दिये गये है कि वह कराची में ही विद्यमान है। अबु जिन्दाल के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि 26/11 के मुम्बई बम कांड जो स्वतंत्रता के बाद शायद भारत पर सबसे बड़ा आतंकवादी हमला था, में न केवल आईएसआई की मुख्य भूंमिका थी बल्कि पाकिस्तान सरकार की भी सहायता उक्त बम कांड योजना में थी। अमेरिका ने 09/11 के हुए हमले के लिए जिम्मेदार ओसामा बिन लादेन को पकड़ने में अपनी सारी शक्ति झोंक दी और बिना अंतर्राष्टीय कानून का पालन किए बिना संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की स्वीकृति लिए बिना, पाकिस्तान सरकार की बगैर किसी स्वीकृति या जानकारी के पाकिस्तानी क्षेत्रों में लगातार ड्रोन हमले किये और अघोषित आक्रमण के रूप में आब्टाबाद शहर पर अपने स्पेशल शील कमाण्डों भेजकर लादेन को जिन्दा पकड़ने के बजाय उसको न केवल मृत्यू के घाट उतार दिया बल्कि उसका अंतिम क्रियाकर्म भी कर उसके नामो निशान को समाप्त करने का सफल प्रयास किया। 
                   भारत को शहीदे आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद का देश कहा जाता है। ऐसे देश का वर्तमान नेतृत्व अपने आन बान की सुरक्षा के लिए अमेरिका समान हिम्मत क्यों नहीं बटोर पा रहा है यह समझ से परे है? यह प्रश्न न केवल कौंध रहा है बल्कि देश के नवयुवकों का सर यह सोचकर शर्म से नीचे झुक जाता है। क्या हमारे देश में वह मारक क्षमता नहीं है कि हम पाकिस्तान को इस मुद्दे पर अमेरिका के समान नेस्तनाबुत कर सके या हमारे देश के नेतृत्व में वह विचार शक्ति ही नहीं है। देश की सैनिक क्षमता में यदि कोई कमी है तो हमारा नेतृत्व उक्त कमी की पूर्ति क्यों नहीं कर रहा है? उसमें क्या कठिनाई आ रही है उसे देश के नागरिको को बताया जाना चाहिए व इस संबंध में स्वेतपत्र (जानकारी) लाया जाना चाहिए। यदि वास्तव में देश की सुरक्षा व्यवस्था, मारक व्यवस्था सुदृढ़ है और सिर्फ राजनैतिक नेतृत्व में ही कमी है तो यह नेतृत्व देश की आन-बान और शान को बचाये रखने के लिए क्यों नहीं तुरंत हट जाता है? जनता स्वयं उसे क्यूं नहीं हटा देती? यह प्रश्न हर भारतीय के दिलो-दिमाग में कौंध रहा हैं। खासकर दिमाग की नसे तब फटने लगती है जब-जब भारत पाकिस्तान से युद्ध के मैदान में बातचीत न कर टेबल पर बातचीत करता है और दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार आतंकवादियों व आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देता है। कम से कम इस देश का जोशीला जवान खून तो दुर्बल भारत का अंश नहीं बनना चाहता है। यदि भारत सरकार दाउद इब्राहिम जो मुम्बई बम कांड का मुख्य आरोपी है एवं कराची में रहता है, उस पर हमला कर उसे भारत नहीं लाना चाहती है, तो क्यों नहीं मानव बम के रूप में मैं और मेरे जैसे विचारों वाले कई लोग राष्ट्र में है जिन्हे सरकार राष्ट्रहित में कराची में दाउद के घर पर क्यों नहीं उतार देती? ताकि दाउद का नामोंनिशान इस दुनिया से मिट सके और मुझे भी असीम शांति की चिर स्थायी नींद मिल सके। 
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)
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