बुधवार, 27 अगस्त 2014

जनता के सेवक “बयानवीर” राजनेता आखिर कब! ‘संजीदगी’ से बोलंेगे ?0

     जनता के सेवक "बयानवीर" राजनेता आखिर कब! 'संजीदगी' से बोलंेगे ?                                                                            
बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यो में हुये उप चुनाव परिणामो ने एक बार पुनः नेताआंे की बयानबाजी की कलाई खोल दी है। विगत लम्बे समय से यह अनुभव किया जाता रहा है कि देश मंे जब भी कोई राजनीतिक या अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ घटती हैं, तो उसके संबंध में प्रत्येक राजनैतिक दल व उनके नेता कभी भी स्वयं की गलती स्वीकार न करते हुए तथा अपने को सर्वोच्च मानते हुए हमेशा अपने विपक्षी लोगो पर घटना  के संबंध में तुरंत आरोप जड़ देते हैं। फिर चाहे उन घटनाओ के घटने में स्वयं उनका ही गाहे -बगाहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष  रूप से हाथ क्यो न रहा हो। राजनीति के इस दुष्चक्र के कारण ही राजनीति स्वस्थ न होकर विषैली हो गयी है। 
उप चुनावों के निर्णयांे पर विभिन्न राजनेताआंे के बयान की बानगी देखिए। बिहार में जनता दल (यू), आर.जे.डी., व कांग्रेस के महागठबंधन की जीत पर जनता दल (यू) के महासचिव के.सी. त्यागी का बयान कि ''लोकसभा चुनाव के बाद जनता ने अपनी गलती सुधार ली है,'' क्या यह हास्यास्पद कथन नही है? वे यह भूल गये कि वे स्वयं को तो जनता का सेवक कहलाते हैं और गलतियो को जनता पर थोपते हैं। लेकिन जनता का निर्णय कभी भी गलत नहीं होता है। वास्तव में उक्त नेता व दलांे ने अपनी कुछ गलतियाँ सुधारी हैं, तभी जनता ने उन्हे पहले से बेहतर परिणाम दिये हैं। इसी प्रकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कश्मीर में यह बयानय कि यदि कश्मीर की जनता को देश के अन्य प्रांतो के समान विकास चाहिएय  तो वे भाजपा की सरकार  बनावंे।अमित शाह बयान देते समय शायद यह भूल गये कि विभिन्न प्रंातो मे यदि विकास हुआ होता तोे फिर हाल के लोकसभा चुनाव में देश में भाजपा की सरकार की आवश्यकता ही क्यांे होती। या तीन महिनों में ही भाजपा ने देश के अन्य राज्यांे का समूचा विकास कर दिया है ? इसलिये उन्हे कश्मीर मे भी सत्ता सौंपी जानी चाहिए। यदि उनका कथन माना जाय तो एक स्वर से कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाजपा को सत्ता सौंप देना चाहिए। शायद वे कहना कुछ चाहते थे, लेकिन कह कुछ गये। इस तरह के अनेकों अनगिनत उदारहण हमारे देश के राजनैतिक सामाजिक ढांचे मे पडे़ हैं। लेकिन फ्रिक किसको है? "बयानवीर" अपने बयान इस तरह के देते चले आ रहे हैं, जिन्हे प्रिन्ट,इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया जनता के बीच परोसता हैय जनता उनको सुनती है,देखती है।यदि वास्तव में जनता उनको अनसुना कर दे या अपनी गहरी प्रतिक्रिया दे, तो इस तरह के ऊल-जलूल बयानो की संख्या में कमी हो सकती है। क्या वास्तव मे ऐसा होगा, प्रश्न यही है ? 

 (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)





शनिवार, 16 अगस्त 2014

आखिर “दिल्ली” की जनता के बीच कौन है ‘‘भगोडा’’?


                       
 आखिर "दिल्ली" की जनता के बीच कौन है ''भगोडा''?   
   
इस समय दिल्ली प्रदेश में सरकार बनने की संभावनाएं से लेकर राष्ट्रपति शासन बढाने/ ंविधानसभा भंग करने की चर्चाए चल रही है। लेकिन इन सबके बीच जो महत्वपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा रहे है वह ''भगोडा'' को लेकर है। आखिर, इस दिल्ली की जनता का ''भगोड़ा'' कौन ? इसके लिए यह जानना होगा कि ''भगोड़ा'' किसे कहा जाता है।
''भगोडा'' का सामान्य अर्थ है, व्यक्ति का अपनी जिम्मेदारी से भागना। ''जिम्मेदारी'' भी कई प्रकार की हो सकती है। स्वस्फुरित थोपी गई, जबरदस्ती या ओढी हुई जिम्मेदारी अथवा किसी के द्वारा दी गई जिम्मेदारी को स्वीकार करना, या संवैधानिक जिम्मेदारी। उपरोक्त परिपेक्ष में क्या केजरीवाल ''भगोड़ा'' जैसा उन्हे लगातार विभिन्न राजनैतिक पार्टीयो से लेकर मीडिया द्वारा न केवल आरोपित किया जा रहा है, बल्कि उनके लगातार आरोपो के दबाव से शायद दब कर 'आप' केजरीवाल का इस संबंध में दिया गया स्पष्टीकरण भी अप्रत्यक्ष रूप से इसे गल्ती मान रहा है।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 32 सीट पाकर भाजपा सबसे बडे दल बना। दूसरे नम्बर का दल प्रथम बार चुनाव में उतरी 'आप' पार्टी को 28 सीट मिली। देश की सबसे पुरानी पार्टी 'कॅाग्रेस' को मात्र 8 सीटे प्राप्त हुई। लोकतंत्र में जब लोकसभा/विधान सभा के आम चुनावों में किसी पार्टी या गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तब सबसे बड़ी पार्टी को ही सामान्यतया सरकार बनाने का अधिकार होता है व ऐसी परिपाटी भी है। राष्ट्रपति/ राज्यपाल भी सामान्यतः इसी आधार पर सरकार बनाने के लिये निमंत्रित करते हैं। यह पहला मौका नहीं है जब विधान सभा या लोक सभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहींे मिला। इसके पूर्व भी लोंकसभा व विधानसभाओं के आम चुनावो में पूर्ण बहुमत प्राप्त न होने पर सबसे बडे दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमत्रित किया गया था। यद्यपि पूर्व में लोकसभा में सबसे बडे दल के नेता के रूप में आमंत्रित नेता ने विनम्रता पूर्वक निमंत्रण अस्वीकार कर दिया था। लेकिन विधानसभा मे ऐसे ''निमंत्रण'' कोे कई बार स्वीकार किया जाकर सरकार बनाई गई। कुछ मामलो में वह बहुमत सिघ्द कर पायी लेकिन कुछ मामलो मे नही कर पाई और अंततः इस्तीफे देने पड़े।
जब सबसे बडी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने राज्यपाल के निमत्रण को ठुकराया और सरकार नहीं बनाई तो वह 'भगोडा' नही कहलाई। दूसरी बडी पार्टी 'आप' जिसने यह कहकर कि न समर्थन देगे न समर्थन मांगेगे के आधार पर, एक तरफा, बिना मंागे, बिना शर्त, कांग्रेस का समर्थन प्राप्त हुआ व भाजपा ने भी मुददो के आधार पर, सशर्त समर्थन देने के वायदे के बाद, तीन दिन तक ना नुकर के बाद 18 मुददा्े पर आधारित सरकार का गठन कर, उन मुददो के लिये अन्य पार्टियो से समर्थन मांगा गया। 'आप' पार्टी को जनता द्वारा बहुमत न देने के बावजूद सबसे बडी पार्टी न होने के बाद भी मुददो पर बनाई गई सरकार का मुददे पर समर्थन न मिलने पर "आप''का सरकार का इस्तीफा देना कैसे भगोड़ा कहलायेगा, प्रश्न यह है। इस देश मे सरकार की कालावधि पूर्ण करने के पूर्व सरकार का यह प्रथम इस्तीफा नहीं है। इसके पूर्व भी कई प्रदेशो में इस तरह की घटनाये घटित होकर बीच अवधि मे ही कई सरकारो ने इस्तीफे दिये है। लेकिन किसी भी इस्तीफा देने वाली सरकार को इसके पूर्व भगोड़ा नहीं कहा गया। तब फिर 'आप' के केजरीवाल को ही क्यो भगोडा कहा जाये? यदि जिम्मेदारी सेे भागना भगोडा है, तो 'आप' को जनता ने बहुमत न देकर जिम्मेदारी नही सौपी थी। उन्हेाने मुददे के संमर्थन के आधार पर जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार की थी। सिद्धांत के खातिर मुददे पर अडे़ रहने के कारण, समर्थन वापसी के कारण उन्हे इस्तीफा देना पडा। भाजपा को किसी ने 'भगोडा' नही कहा और न ही काग्रेस को जिसनें लोकपाल बिल के मुददे पर समर्थन वापसी की धमकी देकर खिलाफ वोट डालकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उसे भी भगोड़ा नहींे कहा गया।
अतः में मैं एक कहानी का उदाहरण देकर 'भगोड़ा' तय करने का कार्य जनता के विवेक पर छोडता हूॅ।दिल्ली की यमुना नदी के तट के दूसरे ओर कुछ नागरिक जो कई दिनो से बाढ़ के कारण भूखे, बीमार होकर असहाय थे। दिल्ली के नागरिको ने आव्हान किया कि नदी के उस पार जाकर उन असहाय व्यक्ति की सेवा सुश्रुसा की जावे। विभिन्न राजनैतिंक पार्टिया 'भाजपा' 'आप' 'कांग्रेस' व अन्य पार्टिया व उनके नेतागण सिर्फ जनता की सेवा के नाम पर राजनीति चमकाते रहते है ऐसा दावा हमेशा उनका रहता है। जनता के आहवान पर ये सेवा करने वाले राजनेता लोग जो नदी के इस छोर पर खडे हुए थे, दूसरे छोर के असहाय व्यक्तियो को देख रहे थे, को तट की दूसरी उस ओर जाकर उन्हेे निकालने का निर्णय राजनेताओ द्वारा लिया गया। लेकिन तभी तेजी से बाढ़ आ गई जिसका ''विकराल रूप'' देखकर सर्वप्रथम भाजपा' के लोग जो संख्या में बहुसंख्यक थे द्वारा आगे न बढने की मजबूरी दर्शित करते हुए वे सब वापिस लौट गये। इसी बीच 'कंाग्रेस' व 'आप' ने एक दूसरे की ओर देखा। काग्रेस ने यह मेसेज दिया कि उसे 'नाव' बनाकर नदी की बाढ़ को पार कर किया जावे। क्योकि वह लोकतंत्र की सबसे बडी सेवाभावी पार्टी अपने को मानती है। चंूकि 'आप' पर सबसे ज्यादा नागरिक सेवा का नया भूत सवार था अतः उन्होने कांग्रेस की नाव बनाकर नदी पार करने का प्रयास किया। लेकिन जेैसे ही नाव आगे बडी कंाग्रेस ने अपनी आदत के मुताबिक आरोपो की झडी लगा दी, जिसके थपेडो से नाव को नुकसान पहुंचकर उसमे छेद होने लगे। तब नाव को डूबने की आशंका से 'आप' को लगा कि वह काग्रेस के साथ वे स्वयं भी डूब जायेगे। तब उन्होने वापिस तट पर आने का निर्णय लिया और इस प्रकार सरकार का इस्तीफा हो गया।
आगे आपका निर्णय है!

                  (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)


 



आखिर महँगाई कब तक? थमेगी?कम होगी?खत्म होगी?

आखिर महँगाई कब तक? थमेगी?कम होगी?खत्म होगी?
       हाल मे हुये देश में आम चुनाव में ''यूपीए'' सरकार के विरूद्ध अन्य मुददो के साथ प्रमुख मुद्दा 'महँगाई' का ही था। इससे परेशान होकर ही नरेन्द्र मोदी के उक्त मुद्दे पर आकर्षित करने वाले आश्वासन देने वाली भाजपा की मोह माया मे फंसकर जनता ने विराट रूप से बढती हुई महँगाई की विराट समस्या से निजात पाने हेतू विराट बहुमत की प्रथम बार गैर कांग्रेसी सरकार को सत्तारूढ कर ठोस कदम उठाया। लेकिन जनता क्या अपने को ठगा हुआ तो महसूस नही कर रही है़ ? क्योकि देश की जनता तत्काल परिणाम चाहती है। 'महँगाई'के मुददे पर 'यूपीए' सरकार ने भी 100 दिन के अन्दर महँगाई को नियंत्रित करने की बात कही थी। इसके पूर्व इंदिरा गांधी भी 'गरीबी हटाओ' के नारे से सत्ता पर आरुढ़ हो चूकी थी। लेकिन क्या हुआ ?
आखिर यह महंगाई 'कब' और 'कैसे' थमेगी, कम होगी। इसके लिए आम जनता की नजर में यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आखिर 'महँगाई' कहते किसे है? महँगाई का शाब्दिक अर्थ सामान्य बोलचाल की भाषा मे महँगा बिकने वाला माल या महंगी मिलने वाली सर्विस हो सकती है। यदि एक लाख की कोई चीज बाजार में बिकती है और उसको खरीदने की हमारी क्षमता एक लाख बीस हजार रूपये की है, तो क्या यह 'महँगाई' कहलायेगी। लेकिन इसके विपरीत यदि कोई चीज बाजार में 100रूपये की है जिसके लिये हमारे पास मात्र 50 रूपये है तो क्या वह महँगाई कहलायेगी, विवेचना का प्रश्न यही है। आर्थिक दृष्टिकोण से महँगाई का संबंध आपके क्रय करने की क्षमता से है न कि माल के महंगे होने से है। क्येाकि यदि आपकी क्रय क्षमता महंगे माल को खरीदने के लिये पर्याप्त है तो उसे 'महँगाई का वह डंक नही महसूस होगा व ''महंगाई डायन खाय जात है'' (फिल्म पीपली लाइव) का गीत नही गुनगुनाना पडेगा। लेकिन हमारे देश मे क्या वास्तव मे यही स्थिति है? शायद नही। वास्तव मे महँगाई का असर कम करने के लिये देा तरफा रास्ते अपनाये जाना चाहिए। एक व्यक्ति की क्रय क्षमता बढाकर अर्थात उसकी आय बढाकर व दूसरा माल की लागत व बाजार मूल्यं कम करके। लेकिन आय बढाने की भी एक सीमा होती, इसलिए लागत को कम करके ही महँगाई का स्थायी निदान किया जा सकता है। अंग्रेजी की एक कहावत का हिन्दी अर्थ यह है ''प्रश्न यह नही है कि आपकी आय क्या है, प्रश्न यह है कि आप बचाते क्या है, क्योकि अधिक बचत ही अधिक 'आय' है।''
महँगाई की वास्तविकता को कानूनी चोला भी पहनाया जा चुका है, जहंा सरकारी कर्मचारियो को महँगाई भत्ता दिया जाता हैं व समय समय पर उसे बढाया भी जाता है। अर्थात महँगाई निरन्तर बढने वाली वास्तविकता है जिसे प्रत्येक सरकार ने स्वीकार कर उससे निपटने के लिए नौकरी पेशा लोगों को महँगाई भत्ता देकर दूसरी ओर कुछ विशेष आर्थिक रूप से पिछडे वर्गो को सब्सीडी देकर महंगाई से निपटने का प्रयास करती आ रही है। लेकिन महँगाई की यह वास्तविकता यही पर समाप्त नही हो जाती है। यदि हमे इसका स्थायी, दूरगामी निराकरण करना है, तो हमे महँगाई के उन अनसुलझे पहलू पर जाना होगा जहां से वह पैदा होती है। महँगाई के बहुत से अनेक कारण हो सकते है जो शोध का विषय हो सकते है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारक है, जो हमारी नजरो के सामने से प्रत्येक समय गुजरता है जिसकी चकाचौंद मे हमारा दिमाग शायद कुछ सोच ही नही पाता है, वह माल को बाजार मे बेचने के लिए ''बाजारू'' बनाने के लिये उसके विज्ञापन पर होने वाला असीमित खर्च है। जो अंततः उपभोक्ता से ही वसूल किया जाता है। आज कोई भी उत्पाद जिसका देश मे उत्पादन हो रहा है, उसकी उत्पादक लागत से लेकर बाजार मूल्य तक, जब वह माल बाजार मे, काश्मीर से कन्याकुमारी तक उपभोक्ता के हाथ में पहुंचता है तब उसका बाजार मूल्य, लागत मूल्य से सामान्यता कई गुना ज्यादा हो जाता है। इस बात को समझने के लिये हमे इस बात का ध्यान देना होगा कि इस कई गुना बढ़े बाजार मूल्य में कई प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर के साथ व्यापारियो के अनेकानेक कई स्तर की कई कडियो से गुजरने के कारण उस पर होने वाले खर्च के साथ सबसे बडा खर्च जो विज्ञापन पर होने वाला खर्च है। क्या आपने कभी नमक को मार्केटेबल (बाजारयोग्य) बनाने के लिए विज्ञापन के लिए करोडो रूपये खर्च की कल्पना की थी। क्या इस देश में पानी भी बिकेगा, इसकी कल्पना थी। मुझे नही मालूम कि भविष्य में पानी, नमक के साथ साथ 'हवा' भी ''बाजार'' मे बिकेगी ? क्योकि इस प्रकृति का इतना शोषण हो चुका कि 'शुद्ध' हवा लेने के लिए बचा ही क्या है ?
क्या सरकार का यह दायित्व नही है कि विज्ञापन मे जो अनाप-शनाप अनुत्पादिक खर्च हो रहा है, उस पर रोक लगाई जाय। इससे माल की बाजार कीमत को कम कर भी ''मार्केटेबल'' (जिसके लिये विज्ञापन खर्च का औचित्य बताया जाता है) बनाकर उपभोक्ता तक पहुचाने का प्रयास किया जा सकता है महत्वपूर्ण बात महँगाई के इस मुददे में यह भी है कि बाजार मूल्य से उत्पादक को बढेे हुए मूल्यो का फायदा नही मिलता है जिसके कुछ हिस्से का वह हकदार अवश्य है, क्येाकि वह 'निर्माता' है। उत्पाद का बढ़ा हुआ मूल्य, उत्पादन और उपभोक्ता के बीच की बिचोलियो की कई स्तर की कडियों के मुनाफे से गुजरता हुआ विज्ञापन के महंगे खर्चे से मार खाता हुआ उपभोक्ता तक पहुंचता है। इसमें कानूनी ,नैतिक और आत्म संयम तीनो बंधन तत्वो की आवश्यकता हैं। मुनाफाखेारी के कारण बदनाम बिचोलियो की कडियो को कम करके इन पर अंकुश लगाकर न केवल उत्पाद का बाजार मूल्य कम किया जा सकता है बल्कि शेष बची अतिरिक्त व्यवसाइयो की कडियांे को उत्पादन में लगाकर देश के उत्पादन में वृद्धि भी की जा सकती हैं। सरकार एक और आवश्यक वस्तु पर जैसे रेत को ''नीलामी'' प्रक्रिया से विक्रय कर खजाना भरती है, जिससे कि इसकी वास्तविक मूल्य के कई-कई गुना बढ़ जाता है। इसके विपरीत शराब जिसका उपभोग अभिजात्य वर्ग द्वारा किया जाता है को ''लाटरी'' प्रणाली से विक्रय करती है जबकि वास्तव में उसे सरकारी आय बढ़ाने एवं सामाजिक बुराई को कम करने हेतु उसकी ''नीलामी'' करनी चाहिए व रेत को लाटरी प्रक्र्रिया से विक्र्रय कर उसका मूल्य कम करना चाहिए।
इस देश मे, व्यक्ति जब अपनी दिनचर्या शुरू करता है तो उसे ''विधायिका ''द्वारा बनाये गये सैकडो कानूनो से होकर गुजरना पडता है। घर से बाहर निकलते हीे ''सार्वजनिक स्थल पर थूकना मना है,'' यह हमारे देश का कानून है। जब आप चौपाया गाडी मे बैठते है तो उसमे प्राथमिक उपचार बाक्स व 'सीट बेल्ट' लगा होना कानूनन् जरूरी है । जब आप कोई गैर कानूनी या अनैतिक कार्य करते है तो उसे भी हमारे देश में मात्र वैधानिक चेतावनी लिखकर किया जा सकता है, और यह भी एक कानून है। जैसे सिगरेट पीनंे के लिये। जब हमारे देश में इस सीमा तक कानून बने है (कितना पालन होता है यह प्रश्न अलग है) तब विज्ञापन खर्च कोे कम करने के लिए कोई कानून क्यो नही, बन सकता है? क्यो नही बनना चाहिए? इसका जवाब नवनिर्वाचित सरकार को आम नागरिको को देना होगा। आप जानते है सहकारी बैंको में ऋण के भुगतान के मामलो मे सामान्यता ब्याज मूल धन से ज्यादा नही वसूल किया जाता है। तब इस तरह का प्रतिबन्ध विज्ञापन खर्च पर क्यो नही लगाया जाता जो कि एक अनुत्पादिक खर्च है, प्रश्न यह है। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से लेकर अन्य मूलभूत संवैधानिक अधिकार भी निर्बाध नही है तब विज्ञापन खर्च पर संवैधानिक प्रतिबंध क्यो नही लगाया जा सकता है। मै यह आशा करता हंू आम लोगो सहित बुद्धिजीवीयो व अर्थशास्त्रीयो की इस दिशा मे सोचने की अत्यंत आवश्यकता है वे इस संबंध में मुहिम बनाकार यदि कोई सुझाव पेश करते है तो वह सबके हित मे,देश हित में होगा।
  राजीव खण्डेलवाल (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)




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