रविवार, 27 अगस्त 2023

‘‘क्या पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा? मध्यप्रदेश का चुनाव।’

आज तक का सर्वे-‘‘एनडीए-306’’

हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित भारी हार ने भाजपा नेतृत्व के माथे पर चिंतन की भारी लकीरें खीच दी हैं। चिंतन की लकीरे सिर्फ आगामी होने वाले 4 राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर ही नहीं हैं। इनमें से दो राज्यों में तो कांग्रेस सत्ता में है तथा एक में भाजपा ने जनादेश का मानमर्दन कर सत्ता प्राप्त की, तथा एक अन्य प्रदेश तेलंगाना में भाजपा लगभग नगण्य स्थिति में है। भाजपा हाईकमान को चारों प्रदेशों से मिल रही लगातार चिंतनीय खबरों को देखते हुए चिंता का मुख्य कारण विधानसभा चुनाव न होकर वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव हैं, जहां अभी तक भाजपा 300 के पार का दावा करती थकती नहीं थी। परन्तु अब बहुमत पाने के ही लाले पड़े रहे है। ‘‘आज तक’’ (इंडिया टुडे-सी-वोटर) के नवीनतम सर्वे में आज चुनाव होने पर एनडीए को 306 (भाजपा को नहीं, जो आंकडा पिछले चुनाव में था) सीटे मिलती हुई दिख रही हैं। वोटों के हिसाब से 43 प्रतिशत एनडीए एवं 41 प्रतिशत इंडिया को मिलने की संभावना बताई गई है। हम सब जानते है कि मुख्य धारा के न्यूज चैनलस् की मजबूरी  आर्थिक व राजनीतिक दबाव के कारण कहीं न कहीं भाजपा को वस्तु स्थिति को बढ़ाकर बढ़त दिखाने की होती है। इसलिए इस सर्वे से यह तो स्पष्ट है कि एनडीए को ही बहुमत के लाले पड़ रहे हैं। क्योंकि सर्वो में सामान्यतया भाजपा को कहीं न कही  20-25 प्रतिशत तक वास्तविकता से ज्यादा बढ़त दिखाने का प्रयास सर्वे एजेंसियां अपने हितों को सुरक्षित करने के कारण करती ही है। "अंतर अंगुली चार का, झूठ सांच में होय"। वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को देखते हुए ऐसा होना स्वाभाविक भी है। 

भाजपा की चिंता

अतः यदि आगामी होने वाले विधानसभा चुनाव में विपरीत परिणाम मिलते हैं, जैसे कि लगभग आसार/आशंका लगातार व्यक्त की जा रही है, तो इसका निश्चित ‘‘दुष्प्रभाव’’ लोकसभा चुनाव पर पड़ना स्वभाविक है। तब शायद एनडीए को भी बहुमत पाने के ‘‘लाले’’ पड़ जाये। "आवाज़े ख़ल्क़ को नक्कारा ए ख़ुदा समझना चाहिए"। यही कारण है कि संघ व भाजपा का नेतृत्व इन राज्यों में खासकर मध्यप्रदेश में जहां लगातार चिंतन, मंथन भी अभी तक निश्चयात्मक परिणाम दशा, दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं। देश का हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश वह प्रदेश रहा है, जो भाजपा की मूल जनसंघ की कर्मभूमि रही है, जिसे वर्तमान भाजपा की प्रयोगशाला कहा जाए जो गलत नहीं होगा। यद्यपि पिछली विधानसभा के चुनाव परिणामों ने यह भी सिद्ध किया है कि विधानसभा चुनावों में हुई हार के बावजूद, तत्काल बाद में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हीं प्रदेशों में अच्छी खासी ही नहीं, बल्कि अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की थी। उक्त सफलता की दोहराए जाने की संभावनाओं से पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता है। क्योंकि तब सिंगल वोट मोदी की सरकार को  देना होता है। इसके सफल होने पर ही राज्यों की ट्रेन में डबल इंजन होगा।

 प्रधानमंत्री के लगातार दौरे

 प्रधानमंत्री के पिछले तीन महीनों में हुए  मध्यप्रदेश के लगातार दौरे जिसमें भोपाल का वह चर्चित चेतावनी संदेश देने वाला दौरा भी रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप ही महाराष्ट्र के बन गये नये वर्तमान हालात माने जा रहे हैं। अतः यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि मध्यप्रदेश में भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने जा रही है। वैसे भी राज्यों के संबंध में यह कोई नई बात नहीं है। आप किसी भी राज्य के चुनाव को देख लीजिए, भाजपा ने वे सब चुनाव प्रायः प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही लड़े हैं। हिमाचल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल का या उनके गृह राज्य गुजरात का हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही विधानसभा चुनाव लड़े गये। परन्तु अब मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री के चेहरे के संबंध में नीति थोडी बदली गई लगती है। पहली बार शिवराज सिंह सरकार के विज्ञापनों में अब मोदी-शिवराज ( मोदी पहले शिवराज बाद में) सरकार का उल्लेख किया जा रहा है, जो पिछले आम चुनाव में नहीं था। अर्थात प्रधानमंत्री के चेहरों को शिवराज सिंह के चेहरे के साथ नहीं बल्कि उनके ऊपर रखकर शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न किया जाकर सिर्फ मोदी के नाम पर केन्द्रित करने की चुनावी रणनीति बनाई जा रही है। 

‘‘मामा’’ के साथ अब ‘‘भाई’’ शिवराज

    यदि हम मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बात करे तो भाजपा शासित किसी भी प्रदेश की तुलना में शिवराज सिंह चौहान पिछले लगभग 17 सालों से लगातार लोकप्रिय चेहरे के रूप में रहे है। पहले ‘‘मामा’’ और अब साथ में ‘‘भाई’’ (लाडली बहना योजना के कारण) के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं। 

सत्ता विरोधी कारक-शिवराज सिंह का चेहरा

याद कीजिए वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के समय जब नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के पद के लिए नाम आया था, तब लालकृष्ण आडवानी ने शिवराज सिंह का नाम आगे किया था। इससे उनकी महत्ता स्थापित होने के बावजूद और पंचायत स्तर तक उनकी लोकप्रियता व अपनी पहचान बनाये रखने के बावजूद यदि भाजपा को मध्यप्रदेश में अलग तरीके से मोदी का चेहरा बनाना पड़ रहा है या बनाया जायेगा, तो इसका कारण एकमात्र यही है कि शिवराज सिंह चौहान ने इस समय अपने व्यक्तित्व केे स्वरूप को बड़ा कर दूधारू तलवार के रूप में बना लिया है। शिवराज सिंह ने प्रदेश में नया नेतृत्व पैदा न होने के साथ दूसरे विद्यमान नेतृत्व की धार को बोठल कर दिया है। दूरस्थ अंचल तक पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनाई और अपना प्रभाव बनाया। इस कारण भाजपा नेतृत्व को शिवराज सिंह को छेड़ने में कहीं न कहीं भय बना रहता है। शायद इसीलिए केंद्रीय नेतृत्व शिवराज सिंह को छेड़ने से परहेज भी कर रही है। क्योंकि कर्नाटक में अपने प्रादेशिक मजबूत नेता येदुरप्पा को अपेक्षा के अनुरूप उतना महत्व न दिये जाने का परिणाम भुगत चुकी है। विपरीत इसके नेतृत्व का एक मत यह भी है कि 17 सालों की लम्बी सत्ता की कुर्सी पर विराजमान होने के कारण स्वभावत: उत्पन्न एंटी इनकंबेंसी फैक्टर (सत्ता विरोधी कारक) के पैदा होने के कारण उससे निपटने के लिए शिवराज सिंह की रवानगी ही सबसे सफल अस्त्र होगा। सबसे प्रमुख लक्षण जो चिंताजनक है, वह सत्ता विरोधी कारक संगठन अथवा सत्ता के प्रति उतना नहीं है, जितना शिवराज सिंह के व्यक्तिगत चेहरे को लेकर है। यह तो वही बात हो गयी कि "बूढ़ा हाथी फ़ौज पर भारी"। 

शायद इसीलिए इसके पूर्व ‘‘अबकी बार शिवराज सरकार’’ का नारा देने वाले कार्यकर्ताओं से जब बात करते है तो वे अब यह कहते हैं कि ‘‘अबकी बार भाजपा सरकार’’ लेकिन चेहरा शिवराज सिंह चौहान का नहीं। पार्टी के समर्थक लोग भी जो सामान्यतया कोई कमियां या बुराइयां नहीं गिनाते है, वे भी यही कहते है कि अब तो बख्सो शिवराज! अतः शिवराज के चेहरे व नाम से ऊब सी गई है, जो सिर्फ कार्यकर्ताओं में नहीं बल्कि उस आम जनता के बीच में भी है, जिनके लिए शिवराज सिंह ने पैदा होने से लेकर जीवन की अंतिम यात्रा तक में निर्धन वर्गो के लिए विभिन्न योजनाएं लागू की है। राजनीति का यह नया और विरोधाभास विरोधाभासी चेहरा, व्यक्तित्व शिवराज सिंह का बन गया है, जिसका सफलता पूर्वक सामना करने की समझ भाजपा अभी तक बना नहीं पा रही है। इसीलिए विभिन्न एजेंसीस् के लगातार आ रहे आंतरिक सर्वो में, जहां कांग्रेस को अच्छी खासी बढ़त दिखाई जा रही है और विरोधी मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में भी कमलनाथ को बढत दिखाई जा रही है, बावजूद इसके भाजपा जीत को सुनिश्चित करने के लिए चुनाव शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री या बिना मुख्यमंत्री के रूप में लडाया जाये अथवा नहीं को अंतिम रूप से शायद कुछ समय के भीतर तय कर ही लेगी । मेरा मानना है कि यदि आगे शिवराज सिंह के जनता को लुभावने के समस्त प्रयासों के बावजूद मौजूदा परिस्थितियों में सकारात्मक झुकाव नहीं आता है, तो फिर पार्टी के पास विकल्प क्या है?

भाजपा हाईकमान को एक संशय प्रधानमंत्री की छवि को लेकर भी है। पिछले आम चुनाव के परिणाम के समान  इस आम चुनाव में भी मध्यप्रदेश में भी यदि वहीं पिछले परिणाम दोहराये गये तो, दो चुनाव लगातार हारने की स्थिति में 2024 के चुनाव में प्रधानमंत्री की  जिताऊ छवि को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता हैं। इसलिए मध्यप्रदेश में लगातार पार्टी संगठन के स्तर पर कसावट लाकर धरातल पर कार्यकर्ताओं को चुनाव की भट्टी में धोक रही है। पहली बार काफी समय बाद यह देखने को मिला कि भाजपा के पहले कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की जबलपुर में सभा कराकर चुनावी एलान की घोषणा कर दीथी। याद कीजिए मध्यप्रदेश के चुनावों में प्रधानमंत्री की इसके पूर्व इतनी भागीदारी नहीं रही। 18 साल के भाजपा के शासन और प्रयोगशाला होने के बाद भी यदि आज प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में या नाम पर चुनाव लड़ने की नीति बनाई जा रही है, तो निश्चित रूप से भाजपा कहीं न कहीं कमजोर होती दिख रही है। पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम से भी यही सिद्ध होता है। प्रधानमंत्री के चेहरे का प्रभाव लड़ाई को कांटे में और कांटे की लड़ाई को जीत में बदल सकता है। "अलख राजी तो ख़लक़ राजी"।

बुधवार, 16 अगस्त 2023

‘‘राक्षस प्रवृत्ति’’ की ‘‘स्व-स्वीकृति’’


‘श्राप’’ कहीं ‘‘भस्मासुर’’ न बन जाये।

भूमिका

‘‘लोकतंत्र’’ में जनता जनार्दन ही सब कुछ ही होती है। जनता को ‘‘भगवान’’ मानते है, खासकर राजनेता गण। यह बात कहते-कहते हमारे जन नेता थक जाते हैं, फिर भी लगातार कहते है। लोकतंत्र में चुनाव परिणामों में जनता के निर्णय अर्थात ‘‘जनादेश’’ को सिर-आंखों पर रखकर ‘‘शिरोधार्य’’ किया जाता है, चाहे परिणाम आपके पक्ष में हो अथवा विपक्ष में हो। परन्तु राजनीति के इतिहास में आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ, न देखा, न पढ़ा, न कोई सोच सकता है, जैसा कि रणदीप सिंह सुरजेवाला ने उस जनता के प्रति जिसने साठ सालों से अधिक समय तक कांग्रेस को शासनारूढ़ किया, के प्रति कहा। अभी तक तो सिर्फ यह कल्पना की बात थी, लेकिन श्राप देने वाले स्वयं को ‘‘भगवान’’ की श्रेणी में रखकर अपने मुखारविंद से उक्त शब्दों को जमीन पर भी उतार दिया है। आखिर सुरजेवाला ने कह क्या दिया, जिससे इतना बड़ा बवंडर मच गया। 

सुरजेवाला के ‘‘सत्य वचन’’? ‘‘आत्मघाती गोल’’!

कांग्रेस महासचिव जो खुद जनता के सीधे चुनाव में कई बार हार चुके हैं, पीछे के दरवाजे से संसद (राज्यसभा) में जरूर प्रवेश करने वाले रणदीप सिंह सुरजेवाला ने हरियाणा के कैथल के उदयसिंह किले में आयोजित जन आक्रोश रैली में बयान दिया ‘‘भाजपा का जो समर्थन करता है या जो भी उन्हें वोट देता है, वह ‘‘राक्षस प्रवृत्ति’’ का हैं। मैं उन्हें महाभारत की धरती से श्राप देता हूं’’। ‘‘अंधा कहे ये जग अंधा’’। यह कथन जनता के लिए अथवा दूसरों के लिए जरूर शर्मसार करने वाला हो सकता है। परन्तु कांग्रेस के लिए यह वास्तव में ‘‘गर्व’’ करने वाली बात है, शायद इसलिए ही उक्त बयान दिया गया है। वास्तव में इस बयान के द्वारा रणदीप सुरजेवाला ने अपनी ‘‘असलियत’’ ही स्वीकार की है। इसलिए आप काहे उनकी आलोचना कर कर उन्हें सुधरने का मौका दे रहे है? देश की लगभग जिन 37 प्रतिशत मतदाताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को चुना, उन्हें सुरजेवाला ने राक्षस प्रवृत्ति करार ठहराया दिया। वह शायद इसलिए कि यदि कांग्रेस की ‘‘राक्षसी प्रवृत्ति’’ से निपटना है, तो जनता को भी उसी राक्षस प्रवृत्ति को ही अपनाना होगा। ठीक उसी प्रकार जैसे कि लोहा, लोहा को काटता है। यह बात जनता के दिमाग में भी है और कांग्रेस के दिमाग में तो है ही। इसलिए जब-जब आवश्यकता होती है, जनता राक्षसी स्वरूप अपनाकर रावण रूपी राक्षस को ‘‘राम’’ के सिंहासन पर आने से रोकती है। इसलिए कभी 404 सांसदों वाली पार्टी आज 52 पर ही सिमट गई। क्योंकि कांग्रेस के ‘‘अंधे हाथी अपनी ही फौज को रौंदते हैं’’। कांग्रेस की राक्षस प्रवृत्ति का स्वाभाविक परिणाम जनता की ‘‘अस्वाभाविक स्थिति’’ ‘‘राक्षस प्रवृत्ति बनकर’’आयी। 

सुरजेवाला! ‘‘ऋषि’’?

सुरजेवाला का अगला कथन तो और भी खतरनाक है, जब वे यह कहते हैं कि मैं उन्हें महाभारत की धरती से श्राप देता हूं। यह कहकर उन्होंने प्रधानमंत्री के उक्त कथन की पुष्टि ही की है, जब नरेन्द्र मोदी ने ‘‘इंडिया’’ गठबंधन को ‘‘घमंडिया गठबंधन’’ कहा। क्योंकि ‘‘अक्ल और हेकड़ी दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते’’। और ‘‘अक्ल का तो आवा का आवा ही कच्चा रह गया’’। 21वीं सदी के कलयुग में ‘‘श्राप’’ देने का अधिकार यदि कोई मानव अपने पास मानता है, तो निश्चित रूप से वह भगवान के अधिकार को छीनकर घमंडी होकर ही ऐसा कर सकता है। ‘‘र्दुःविचार’’ रखने वाले सुरजेवाला शायद स्वयं को आज के ‘‘महर्षि दुर्वासा ऋषि’’ मान बैठे हैं? चूंकि हरियाणा की जनता ने उन्हें दो-बार चुनावों में हराया है। शायद कही इस कारण से तो ही नहीं उन्होंने क्रोधित होकर हरियाणा की जनता को श्राप देकर अपनी ‘‘औकात’’ दिखाई या जनता की अप्रत्यक्ष रूप से औकात में रहने को कहां? यह तो वक्त ही बतलायेगा।

‘‘अमर्यादित बिगड़ते बोलों पर रोक आखिर कब?’

संसद, विधानसभा के अंदर कहे जाने वाले असंसदीय शब्दों को तो स्पीकर के द्वारा परिभाषित किया जा चुका है। इसकी किताब/शब्दावली भी लिखी जा चुकी है। परन्तु चुनाव आयोग ने संसद के बाहर राजनीतिक पार्टियों द्वारा बोले जाने वाले ‘‘असंसदीय’’ ही नहीं, बल्कि ‘‘अमर्यादित’’, अराजक शब्दों की कोई सूची अभी तक नहीं बनाई है। यदि टीएन शेषन समान कोई चुनाव आयुक्त आज होते तो इस बात पर वे जरूर सोचते। टीएन शेषन के जमाने में इस तरह का निम्न स्तर की इतनी गाली गलौज अपशब्द या अशोभनीय भाषा का उपयोग नहीं हुआ करता था अन्यथा वे तभी इस ‘रोग’ को भी ठीक कर देते। परन्तु आज की राजनीति के बिगड़ते हालात को देखते हुए शायद टीएन शेषन जैसा चुनाव आयुक्त आ भी जाये, तब भी वह ऐसी सूची, शब्दावली बनाने से इंकार कर देता। क्योंकि ‘‘तू डाल डाल मैं पात पात’’ की तर्ज पर जितने शब्दों को चुनाव आयोग असंसदीय घोषित करता, तत्पश्चात हमारे प्रिय नेतागण चाहे वह किसी भी झंडे के तले हो, प्रत्येक दिन नये-नये अमर्यादित, शब्दावली ले आयेगें। आखिरकार चुनाव आयोग को थककर हारकर इस मुहिम को बंद करना ही पड़ेगा। क्योंकि यह अंतहीन किताब लिखी जाने वाली हो जायेगी। वर्तमान में हमारे देश में जो लोकतंत्र है, वह ‘‘राजनीति’’ से चलता है, ‘‘नीति’’ से नहीं! आज की राजनीति की ‘‘भूमि’’ इतनी उपजाऊ हो गई है कि नये-नये गाली गलोच से भरे शब्दों की उत्पत्ति होते ही रहेगी। इसलिए कृपया सुरजेवाला को बख्श दीजिए। जनता पहले तो ‘‘इहां कुम्हड़बतिया कोऊ नाहीं’’ वाले रूख पर रहती हैं, फिर अपना रूप बदलकर सक्षम होकर सबक सिखाना भी जानती है, इसमें और किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है।

न तो बयान से इंकार! न क्षमा!

अभी तक सुरजेवाला ने न तो इस बयान से इंकार किया और न ही कोई स्पष्टीकरण दिया है। ‘‘कहते नाहिं लाजे तो सुनते क्यों लाजे’’ कांग्रेस पार्टी ने भी न तो इस बयान की आलोचना की है और न ही इससे अपने को अलग किया है। साथ ही कांग्रेस ने इसे सुरजेवाला का निजी बयान भी अभी तक नहीं बतलाया है। हो यह जरूर कहा गया कि उनके भावार्थ को समझिए, शाब्दिक अर्थों को नहीं। तो फिर कथन के आपत्तिजनक शब्दों को अभी तक ठीक क्यों नहीं किया? अतः यहां अर्थ का अनर्थ कोई नहीं निकाल रहा है?

शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

‘‘फ्लाइंग किस’’! फ्लाइंग (‘‘हवा हवाई’’) आरोप? या शिष्टाचार!

 राहुल गांधी! क्या ‘‘पुनः निष्कासन की तैयारी’’?

धारा 354ः-

कृपया भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (यौन उत्पीड़न) का अवलोकन करें। संसद में अविश्वास प्रस्ताव के बहस के दौरान राहुल गांधी द्वारा स्मृति ईरानी के प्रति अभद्र तरीके से ‘‘अनुचित इशारा’’ (तथाकथित फ्लाइंग किस) के संबंध में केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने एनडीए की 20 सांसदों के हस्ताक्षर युक्त एक लिखित शिकायत स्पीकर को दी। (सदन के बाहर, कोतवाली में नहीं?) जबकि प्रेस से बातचीत करते हुए उन्होंने यह कहा कि राहुल गांधी; स्मृति ईरानी एवं सभी महिला सदस्यों को फ्लाइंग किस देकर चले गये। तथापि स्मृति ईरानी ने स्वयं के प्रति उक्त अभद्र व्यवहार का आरोप न लगाते हुए महिला सांसदों के प्रति अभद्र तरीके से अनुचित इशारे के हाव भाव के साथ स्त्री द्वेष का आरोप राहुल गांधी की तथाकथित हरकत के लगभग 35 मिनट बाद (12.47 दोप.-1.22 दोप.) (जानकारी प्राप्त होने पर?) राहुल गांधी पर लगाया। तथापि उल्लेखनीय बात यह भी है कि यौन शोषण (‘‘फ्लाइंग’’ नहीं ‘‘टच’’) के आरोपी ब्रज भूषण शरण सिंह जो आसपास दो ही लाइन पीछे बैठे थे, पर इन शिकायतकर्ता महिला सांसदों को कोई आपत्ति नहीं होती है। मणिपुर में 2 महिलाओं को वस्त्र हीन कर सार्वजनिक रूप से जुलूस में घुमाने पर कोई लिखित या मौखिक आपत्ति या बयान दर्ज नहीं कराती है? अजीब बात है ‘‘औरों को नसीहत खुद मियां फजीहत’’। 

अध्यक्ष द्वारा कार्रवाई की जाने की स्थिति में राहुल गांधी के विरूद्ध उक्त तथाकथित अपराध के लिए अधिकतम धारा 354 भादस के अंतर्गत प्रकरण दर्ज हो सकता है। वैसे अध्यक्ष की अनुमति के बिना संसद के भीतर कहे गए किसी भी कथन का आपराधिक संज्ञान न्यायालय में नहीं लिया जा सकता है। धारा 354 में न्यूनतम 1 वर्ष से अधिकतम 5 वर्ष की सजा का प्रावधान है। अर्थात 2 वर्ष से अधिक की सजा का प्रावधान होने के कारण यदि राहुल गांधी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होकर मुकदमा चलता है और यदि राहुल गांधी को पुनः सजा 2 साल से अधिक की हो जाती है, तो राहुल गांधी फिर से संसद से निष्कासित हो जाएंगे। इसे कहते हैं ‘‘ओखली में हाथ डाले, मूसली को दोष देवें’’। अप्रैल 2021 में चुम्बन फेंकने के एक मामले में मुम्बई की एक अदालत में 20 वर्ष के एक व्यक्ति को सजा हुई थी।

मणिपुर मुद्दा! साइड लाइनः

दुर्भाग्यवश देश का सुलगता हुआ ज्वलंत मुद्दा ‘‘मणिपुर की हिंसा’’ पर नियमों के चक्रव्यूह में फंसने के कारण सीधे बहस न होने के कारण विपक्ष को मजबूरी में अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा। परंतु यहां भी ‘‘अवसर चूकी डोमनी गावे ताल बेताल वाली बात हो गई’’, जबकि जहां बहस में सदन के माननीय सदस्य गण बजाय इस बात के कि वे मणिपुर के वर्तमान और भविष्य का स्वर्णिम इतिहास बनाने की योजना को बताते? वे मणिपुर पर कम, परन्तु एक दूसरे का इतिहास खंगालने में ज्यादा लग गए। बहस के दौरान राहुल गांधी के चुभते बाणों (कितने सही या गलत? यह अलग विषय है) से विचलित होकर ‘‘विषयांतर’’ करने के उद्देश्य से फ्लाइंग किस का मुद्दा बनाकर, उछाल कर एनडीए सफल होता हुआ दिख रहा है, जब मीडिया में राहुल गांधी के भाषण पर फ्लाइंग किस कदर हावी हो गया। दरअसल ‘‘एब को भी हुनर की दरकार होती है’’ अन्यथा ‘‘गुनाहे बेलज्जत’’ वाली स्थिति बन जाती है, यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है। 

फ्लाइंग (ब्लोइंग) किस! (उड़न चुम्बन)ः-

अतः सर्वप्रथम इस बात को समझना अत्यंत जरूरी है कि ‘‘फ्लाइंग किस’’ होता क्या है? क्या यह एक अभिवादन है? सही या गलत गेस्चर (हाव भाव, इशारा) है? अथवा अनैतिक संकेत है? या ‘‘यौन अपराध’’ के अंतर्गत आता है? फ्लाइंग किस किसे ब्लोइंग (फेका हुआ) किस भी कहा जाता है, एक हाव भाव है, जो ‘‘स्नेह’’ (अफेक्शनेट) भाव, आभार का प्रतीक है। यह सामान्य रूप से कुछ दूरी से सुनने वाले समर्थकों को सामान्यतः एकनॉलेज (स्वीकार) के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग प्रेम, आदर व आशीर्वाद व शुभकामनाएं के रूप में किया जा सकता है। इसका मूल सामाजिक अर्थय इसके माध्यम से दूसरों को अपनी खुशी और प्रेम की भावना का अनुभव कराना हैं। यह एक सामाजिक और नैतिक मापदंड का प्रतीक है। वैसे किस 20 से ज्यादा प्रकार के (लगभग 23) होते है और वे आपत्तिजनक होकर अपराध की श्रेणी में आते है या नहीं है यह आशय व परिस्थितियों पर निर्भर करता है। राहुल गांधी के संसद के पिछले सत्रों में ‘‘गले मिलने’’ ‘‘झपकी’’ से लेकर ’’आंख मारने‘‘ तक की ‘‘ऐसी करी की धोए न छूटे’’ वाली हरकतें होने के साथ ‘‘मोहब्बत की दुकान’’ कथन का बार-बार रट लगाने वाले से ‘‘फ्लाइंग किस’’ की हरकत को एकदम से नकारा भी नहीं जा सकता है। बावजूद इसके इस बात को देखना आवश्यक होगा कि राहुल गांधी के भाषण समाप्त होने के बाद और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के भाषण प्रारंभ होने के पूर्व वास्तव में राहुल गांधी ने क्या किया था? स्वयं राहुल गांधी का अभी तक इस संबंध में कोई खंडन या बयान नहीं आया है। बावजूद इसके वे इस आरोप को कम से कम में स्वीकार करने से तो रहे? तथापि प्रसिद्ध अभिनेत्री व भाजपा महिला सांसद हेमा मालिनी ने उक्त घटना को देखने से इनकार किया है। ‘अपराध’ का भी सत्ता पक्ष-विपक्ष के बीच विभाजन

बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि राहुल गांधी जैसा कि बताया जा रहा है कि वे स्पीकर की ओर मुखबिर होकर कुछ इशारा कर रहे थे, जिनको 20 महिला सांसदों ने ‘‘फ्लाइंग किस’’ माना है। क्या वह इशारा सिर्फ भाजपा के महिला सांसदों के प्रति कैसे हो गया? जब राहुल गांधी और स्पीकर की आंसदी के बीच क्या सिर्फ वही 20 भाजपा महिला सांसद थी, जो एक साथ एक जगह नहीं, बल्कि विभिन्न जगह बैठी हुई थी? क्या हवा की दिशा (डायरेक्शन) इतनी सधी हुई थी की, "फ्लाइंग किस" किसी विपक्षी महिला सांसदों की ओर नहीं गई? अन्य बैठे पुरुष सांसदों की ओर भी नहीं गई? 20 महिला सांसदों ने अन्य महिला सांसदों को उनके साथ किए गए यौन शोषण के अपराध के विरुद्ध उनके साथ खड़े न होने के लिए संसद या संसद के बाहर लताड़ा क्यों नहीं? क्या ‘‘अपराध’’ भी भाजपा कांग्रेस को देखकर अपनी दिशा व दशा तय करेगा? 

तिल का ताड़?

घटना का दूसरा विवरण यह भी है कि कुछ कागज के जमीन पर गिर जाने से राहुल गांधी कागज उठाने के लिए नीचे झुके। तब बीजेपी सांसदों के हसने पर राहुल गांधी ने ट्रेजरी बेंच की तरफ फ्लाइंग किस देते हुए मुस्कुराते हुए निकल गये। राजनीति में ‘‘तिल का ताड़’’, अथवा ‘‘राई का पहाड़’’ बनाना कोई नई बात नहीं है। परन्तु यहाँ ‘तिल’और ‘राई’ है कहां ? कम से कम यह तो बतलाइये। अभी तक जिसे तथाकथित ‘तिल’ बतलाया जा रहा है, वह ‘तिल’ का अर्थ अभी तक स्नेह पूर्वक इशारा या भाव ही लगता है। आखिर देश की संसद, संसद सदस्यों, मीडिया को हो क्या गया है? देश की गति की उड़ान पर गहन चर्चा व विचार विमर्श करने की बजाय ‘‘उड़न चुम्बन’’ पर चर्चा करके महत्वपूर्ण समय की बर्बादी क्यों की जा रही है?

सोमवार, 7 अगस्त 2023

न्यायालय के निर्णय को ‘‘समझने की समझ’’ बनाइए/बढाइये।

भूमिका। 

हम कई बार महत्वाकांक्षी होने के कारण राजनीतिक महत्व के कुछ एक न्यायिक निर्णयों पर ‘‘ऑन द फेस’’ (मुख पर) निर्णय की गहराई तक विस्तृत रूप से विषय के अंदर तक जाए बिना इतनी तत्परता से अपनी भावनाएं, प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर देते हैं, जो निर्णय में लिखी गई बातों से पूर्णतः मेल खाती नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसे किसी समाचार की हेडलाइंस या ब्रेकिंग न्यूज के अंदर लिखी/पढ़ी गई पूर्ण समाचारों के तथ्यों से सामान्यतया उस तरह से मेल नहीं खाती हैं, जैसी हेडलाइंस में बताई या दिखाई जाती है। यदि ऐसा ही तत्परता, तीव्रता के साथ जीवन कर्तव्य के दूसरे क्षेत्रों में भी हम अपना लें, तो हम स्वयं को, समाज को व अंततः देश को सुधार ही लेंगे। अतः पारखी बनाएं, गुड़ियों की कमी नहीं, पारखियों की कमी है।

प्रकरण के तथ्य
13 अप्रैल 2019 को कर्नाटक के कोलार में एक चुनावी सभा में ‘‘मोदी उपनाम’’ के संबंध में की गई कथित विवादित टिप्पणी को लेकर गुजरात के पूर्व मंत्री एवं सूरत पश्चिम क्षेत्र के विधायक पूर्णेश मोदी (जो स्वयं मोदी उपनाम का प्रयोग करते नहीं रहे है, भूटाला उपनाम है व मोध वनिका समाज के हैं) ने राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा सूरत के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी हरीश हसमुख भाई वर्मा के न्यायालय में दायर किया था। इस पर निम्न न्यायालय ने राहुल को दोष सिद्धि (कनविक्शन) पाकर अधिकतम प्रावधित दो वर्ष की सजा सुनाई।
वो जब्र भी देखा है तारीख़ की नजरों ने,
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सजा पाई!
इस दोषसिद्धि एवं अधिकतम दो साल की सजा आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायाधीश में अपील की गई, जहां मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा 30 दिनों के लिए रोकी गई सजा को तो अपील की सुनवाई तक ‘‘रोक’’ दिया गया, परन्तु दोषसिद्धि पर स्टे नहीं दिया गया। इस कारण से राहुल की लोकसभा की सदस्यता लोकसभा स्पीकर द्वारा कानूनी प्रावधानों के अनुसार परंतु 26 घंटे के भीतर तुरंत-फुरंत आनन-फानन में समाप्त कर जल्दबाजी का एक ‘‘नया इतिहास’’ बना दिया गया। सत्र न्यायाधीश के आदेश के विरूद्ध उच्च न्यायालय में अपील की गई, जहां भी 125 पेज के लंबे चौड़े आदेश द्वारा अस्वीकार कर दी गई। इस आदेश के विरूद्ध प्रस्तुत अपील में उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी द्वारा चाही गई सहायता देते हुए निम्न परीक्षण न्यायालय के ‘‘दोषी’’ पाये जाने के निर्णय पर स्थगन आदेश जारी कर दिया।
राजनैतिक प्रतिक्रियाएं एवं न्यायालीन टिप्पणी
उच्चतम न्यायालय के उक्त स्थगन आदेश पर जिस तरह की मीडिया रिपोर्टिंग, तथा दोनो राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस व उसकी विरोधी पार्टी भाजपा की जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही है, वह राजनीतिक अर्थों से ज्यादा प्रभावित होकर तथ्यों से कम मेल खाती है। इसके साथ ही यह भी लगता है कि उच्चतम न्यायालय ने निर्णय देने में सुनवाई के दौरान जो रिमार्क  (टिप्पणियां) किए है, उसमें कहीं न कहीं अनजाने में कुछ ऐसी गलती हुई है, जिनका प्रभाव अंततः राहुल गांधी की सजा व दोषसिद्धि के विरुद्ध की गई अपील की सुनवाई पर सुनवाई करने वाले न्यायाधीश पर पड़ सकता है। कैसे! आइए, इन सब की चर्चा आगे करते हैं।
उच्चतम न्यायालय की निम्न अदालत को प्रभावित कर सकने वाली ‘‘परिहार्य’’ टिप्पणियां
सर्वप्रथम, उच्चतम न्यायालय ने बहस के दौरान विपरीत दिशाओं में जाने वाली दो प्रमुख बातें कही। प्रथम राहुल गांधी को दिये गये अधिकतम सजा पर यह महत्वपूर्ण प्रश्न चिन्ह लगाया कि इस अधीनस्थ न्यायालयों और उच्च न्यायालय का लम्बा आदेश होने के बावजूद भी अधिकतम सजा का कोई कारण नहीं बतलाया, सिवाय अवमानना के एक मामले (राफेल) में शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी है, का संदर्भ दिया है। यही प्रश्नचिन्ह शीर्ष न्यायालय के स्थगन आदेश देने का आधार भी बना। दूसरी तरफ राहुल गांधी के अवमानना वाले बयान को लेकर यह गंभीर टिप्पणी भी की कि, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि बयान ठीक नहीं था’’ और नसीहत देते हुए कहा, ‘‘ऐसे मामलों में सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति से सार्वजनिक भाषण देते समय सावधानी बरतने की उम्मीद जताई जाती है’’। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने कहीं न कहीं परोक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के बयान को एक तरह से गलत माना है। वास्तव में यह राहुल गांधी की मूल लड़ाई के उसी बयान के बाबत है, जिसके बारे में उन्होंने शपथ पत्र पर बार-बार यह कहा कि ‘‘मैं माफी नहीं मांगूंगा’’।
‘‘अधिकतम सजा’’ पर प्रश्नचिन्ह?
इसी प्रकार जब उच्चतम न्यायालय यह कहता है कि दो साल की अधिकतम सजा क्यों दी? इसका कारण नहीं दिया; यह कहते हुए न्यायालय ने कहा कि, यदि दो साल में एक महीने कम की सजा दी जाती तो, सदस्यता नहीं जाती। यह कहकर उच्चतम न्यायालय ने कहीं गलती तो नहीं की? क्योंकि इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि निम्न न्यायालय ने दो साल की सजा दी है इसलिए, ताकि राहुल गांधी की सदस्यता समाप्त हो जावे। तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए, ‘‘उच्चतम न्यायालय के अनुसार यदि जज 1 साल 11 महीने की सजा दे देते या 1 दिन कम की’’, तब दूसरे पक्ष द्वारा क्या यह प्रश्न नहीं उठेगा कि न्यायाधीश ने आशय पूर्वक अभियुक्त को बचाने के लिए 1 महीने अथवा 1 दिन की सजा कम कर के दी? उच्चतम न्यायालय के  अधीनस्थ न्यायालयों से उम्मीद करता है कि वे संदर्भ (कांटेक्टस) के बाहर जाकर अपनी बात न रखें। तब कहीं न कहीं (यही बात) उच्चतम न्यायालय पर भी लागू होती है कि वे संदर्भ के अंदर रहते हुए इस तरह के रिमार्क न करे जो कहीं न कहीं निम्न अदालतों पर भार स्वरूप उनके दिल-दिमाग पर भारी न हो जाये, जो अंततः निष्पक्ष न्याय को कहीं न कहीं प्रभावित कर सकते हैं। क्योंकि उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का अधीनस्थ न्यायालय पर असर होता है, जो अस्वाभाविक नहीं है।
‘‘ओबिटर डिक्टा’’ (प्रासंगिक उक्ति)! अनावश्यक!
      एक न्यायाधीश जो ट्रायल मजिस्ट्रेट है, के आदेश को उच्चतम न्यायालय स्थगन आदेश देकर रोक देता है और उस प्रक्रिया में बहस के दौरान कुछ ऐसे कथन कह देता है, जो कहीं न कहीं केस की कमजोरी अथवा मजबूती को इंगित, प्रकाशित करती है, तब उस निम्न न्यायाधीश से एक पद बड़े ‘‘सत्र न्यायाधीश’’ के लिए उन कमेंट्स को नजरअंदाज कर उससे प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष होकर प्रकरण पर विचार करना अधीनस्थ जजों के लिए इतना आसान नहीं होता है। ‘‘तलवार के साये में भला कौन चैन से रह सकता है’’। न्यायालय की भाषा में उच्चतम न्यायालय की इस प्रकार की टिप्पणी को ‘‘ओबिटर डिक्टा’’ कहा जाता है, जो एक लैटिन शब्द होकर उसका अर्थ ‘‘अनुषांगिक’’, ‘‘प्रासंगिक उक्ति’’ होता है। इसका व्यवहारिक प्रभाव उच्चतम न्यायालय के निर्णय देने के समान होता है। तथापि रेशों-डिसेंडी (निर्णय का औचित्य) समान कानूनन बंधनकारी नहीं होता है। तथापि यह तकनीकी कानूनी स्थिति है। इसलिए उच्चतम न्यायालय को इस तरह की टिप्पणियों से बचना चाहिए। अतः इस दृष्टि से उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी के मोदी सरनेम के संबंध में दिए गए बयान के प्रति जो रिमार्क किया है, वह कहीं न कहीं सत्र न्यायाधीश पर बोझ होकर कही वे उस आधार पर उन्हें अवमानना का दोषी न मान कर सिद्ध दोषी करार न कर दे, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि ‘‘चतुर के चार कान नहीं होते’’, वह दो ही कानों से सुन कर ‘‘जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी’’ कर लेता है। यद्यपि अपीलीय न्यायालय स्थगन आदेश जारी करते समय यह जरूर निर्देश देते है कि अधीनस्थ न्यायालय गुण-दोष के आधार पर मामले पर विचार करेगी।
‘‘कांग्रेस/भाजपा की प्रतिक्रियाएं।’’
राहुल गांधी प्रतिक्रिया स्वरूप यह कहते है ‘‘सत्य की जीत होती ही है। मुझे क्या कहना है, इसको लेकर मेरे मन में स्पष्टता है’’। लेकिन इस जीत के अवसर पर वे वह ‘‘स्पष्टता’’, ‘‘स्पष्ट’’ (व्यक्त) नहीं करते हैं। कांग्रेसी भी मिठाई बांट कर जीत का जश्न मना रहे है, क्यों न मनाएं मनाए? ‘‘घर का देव, घर के पुजारी’’। परंतु उन्हे इस बात पर विचार करना चाहिए कि राहुल गांधी दोषमुक्त या सजा से बरी नहीं किए गए हैं, जैसा कि मीडिया के कुछ क्षेत्रों में भी कहा अथवा ‘‘कहलवाया’’ जा रहा है। विपरीत इसके उच्चतम न्यायालय ने दोषसिद्धी (कन्विक्शन) को स्थगित करते समय जो उक्त टिप्पणी की है, कहीं वह राहुल के लिए चिंता की लकीर तो नहीं बन जायेगी? फिलहाल यह भविष्य के गर्भ में छुपी है। कांग्रेस व अखिलेश यादव की यह प्रतिक्रिया कि भारतीय जनता पार्टी की ‘‘साजिश बेनकाब’’ हो गई है, बहुत ही हास्यास्पद है। क्या तीनों अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय भाजपा की साजिश और षड्यंत्र अनुसार हुए हैं? जो सरासर न्यायपालिका की कानूनी मानहानि ही नहीं, बल्कि अपमान भी है। इसी प्रकार भाजपा के सांसद मनोज तिवारी का संसद परिसर में राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हुए दिये गए बयान से स्वयं उनकी ही बेइज्जती हुई है, जब वे यह कहते हैं कि राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में माफी मांग ली होगी, (जो सत्य से परे है) तभी तो सजा पर रोक लगी है। यदि पहले ही माफी मांग लेते तो इतनी बेइज्जती नहीं होती?
सुनवाई सिर्फ स्थगन आवेदन तक सीमित! प्रकरण के गुण दोष पर नहीं
 वस्तुतः उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रकरण गुण-दोष के आधार पर दोष सिद्धि व सजा  को लेकर सुनवाई के लिए नहीं था, बल्कि मात्र सिर्फ दोष सिद्धि के स्थगन को लेकर था। निम्न परीक्षण न्यायालय द्वारा दोष सिद्धी और दो साल की सजा में से दो साल की सजा को तो अपीलीय सेशन कोर्ट ने ही स्थगित कर दिया था। परंतु दोषसिद्धि को स्टे न करने के कारण द्वितीय अपील उच्च न्यायालय में की गई, जहां भी सफलता न मिलने पर उच्चतम न्यायालय में हुई उक्त अपील में दोषसिद्धि को भी स्टे कर दिया गया। केस की मेरिटस या डी मेरिटस (गुण-अवगुण) का कोई मुद्दा था ही नहीं। यह मुद्दा तो सत्र न्यायालय के समक्ष लंबित अपील में लडा जायेगा व वहां तय होगा। उच्चतम न्यायालय या कोई भी अपीलीय न्यायालय अपील के साथ प्रस्तुत स्थगन आवेदन पर स्टे आदेश देते समय सिर्फ इस बात पर ही विचार करता है कि सुविधा का संतुलन (बैलेंस ऑफ कन्वीनियंस) अपीलार्थी के पक्ष में है अथवा नहीं? ताकि स्टे न होने की स्थिति में उसे अप्राय्प नुकसान (अपूरणीय क्षति) न हो जाये, अन्यथा उसका अपील पेश करने का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। कानूनी और तकनीकी स्थिति यही है। प्रस्तुत प्रकरण में भी यही स्थिति विद्यमान थी, जहां स्टे न होने पर 6 महीने के भीतर संवैधानिक बाध्यता होने के कारण वयनाड लोकसभा क्षेत्र से उपचुनाव हो जाते, तब राहुल गांधी के अपील जीतने के बाद भी उनकी लोकसभा सदस्य बहाल नहीं की जा सकती थी।
‘‘आपराधिक न्यायशास्त्र’’ में परिवर्तन की आवश्यकता !
अवमानना का यह प्रकरण कहीं न कहीं इस बात पर ध्यान आकर्षित करता है कि  ‘‘आपराधिक न्यायशास्त्र’’ में यह परिवर्तन अवश्यसंभावी होना चाहिए कि जब न्यायालय एक तरफ आरोपी को दोषसिद्ध घोषित करके ही सजा दी जाती है, तब दोषसिद्धि (अर्थात मूल आधार) को स्टे किये बिना, सजा को स्टे कैसे कर सकते है? यह तो वही बात हुई कि ‘‘घर आये नाग पूजे नहीं, बाँबी पूजन जाय’’। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (3) में स्पष्ट लिखा है कि दोषसिद्धि होने पर ‘‘और’’ (एंड) दो साल से ऊपर की सजा होने पर सदस्यता स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। ‘‘एंड’’ का अर्थ है, दोनों शर्तें की पूर्ति होने पर ही सदस्यता जाएगी। जब दो साल की सजा स्वयं निचली अदालत ने 30 दिन के लिए स्थगित कर दी थी, तब फिर प्रभाव में सजा का लागू न होना शून्य प्रभावी हो जाने से धारा 8 (3) की दूसरी शर्त का पालन न होने से सदस्यता समाप्त नहीं की जानी चाहिए थी? अतः यदि सजा के स्टे किया गया है, तो दोषसिद्धि भी स्वयमेव स्थगित हो जानी चाहिए, यह कानून बनाया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय का यह अवलोकन (ऑब्जरवेशन) कि, अयोग्य करार दिए जाने से न केवल सार्वजनिक जीवन में बने रहने का उनका अधिकार प्रभावित हुआ, बल्कि मतदाताओं के अधिकार को भी प्रभावित किया है, जिन्होंने उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना था। एक बड़ा प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या धारा 8 (3) की अयोग्यता का प्रावधान जिसे उच्चतम न्यायालय ने स्वयं लिली थॉमस मामले में धारा 8 (4) को असंवैधानिक घोषित करते हुए संवैधानिक माना था, क्या वह कानून गलत है?

गुरुवार, 3 अगस्त 2023

‘समाधान’’ नहीं ‘‘समस्या’’ की वजह है ‘‘राज्य सरकार ’’

आखिर हिंसा की आग कब बुझेगी?

यौनाचार के अपराधियों के बढ़ते महिमामंडित करने का परिणाम: मणिपुर कांड! 

कठुआ, बिलकिन बानो, मुजफ्फरनगर, राम-रहीम, ब्रज भूषण शरण सिंह आदि दुष्कर्म काडों को महिमामंडित किए जाने के कारण तथा शिक्षण संस्थानों (शिक्षा मंदिर) जैसे हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज, दून तथा पंतनगर विश्वविद्यालय में हो रही यौन उत्पीड़न की घटनाओं पर कोई कार्यवाही न होने के कारण भी बढ़ रही यौन हिंसा व दुराचार के दुष्परिणाम का विस्तार ही मणिपुर का वह गंदा व वीभत्स वायरल वीडियो है, जिसके कारण मणिपुर पर चुप रहे प्रधानमंत्री को बोलना पड़ा है। 4 मई को मणिपुर की राजधानी इंफाल से 35 कि.मी. दूर कांगपोकपी जिले के मैतई बहुल थोबल में हुई घटना की 16 तारीख को पीडित की मां की ‘सेकुल’ थाने में शून्य प्राथमिकी दर्ज हो जाने के लगभग एक महीने बाद 13 जून को ‘जीरो’ एफआईआर क्षेत्राधिकार वाले थाने ‘पारेपैट’ में हस्तांतरित की जाती है। तब भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। जब तक कि वीडियो वायरल नहीं हो जाता है। प्राथमिकी भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए, 397,398, 392, 326 302, 427, 456, 448, 354, 364 एवं धारा 34 तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1सी) 376 के तहत दर्ज की गई। धारा 302 जो पूर्व में दर्ज नहीं थी, सीबीआई के द्वारा प्रकरण हाथ में लेने के बाद दर्ज की गई।

 खुफिया तंत्र की असफलता! 

19 जूलाई को दो महिलाओं के उत्पीड़न का वीडियो जहां घटना में वास्तव में तीन महिलाओं (जिनमें से एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था) के साथ अमानवीय पाशविक व्यवहार किया गया था, के सामने आते ही मुख्यमंत्री ने अमानवीय कृत्य पर संवेदना व्यक्त करते हुए यह कथन किया कि घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस हरकत में आयी और एक अपराधी को तुरंत 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार कर लिया गया। मुख्यमंत्री आगे यह भी कहते हैं कि ऐसी ‘‘सैकड़ो शिकायते’’ है। उच्चतम न्यायालय ने भी वीडियो आने के बाद इसका स्वतः संज्ञान लेकर आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिये। न्यायालय ने सख्त लहजे में कहा कि अगर सरकार कार्रवाई नहीं करेगी, तो हम करेंगे। उच्चतम न्यायालय ने लगातार तीन दिन की सुनवाई के दौरान यह भी कह दिया है कि यह सिर्फ एक वीडियो तक सीमित नहीं है। लगभग 5500 से अधिक प्राथमिकी दर्ज हुई है, जिनमें से की जांच सीबीआई ने मात्र 7 प्राथमिकी दर्ज कर जांच प्रारंभ की है। उच्चतम न्यायालय द्वारा इन दर्ज 5500 प्राथमिकी का वर्गीकृत विवरण मांगने पर उस केंद्र सरकार ने जवाब देने के लिए एक महीने का समय मांगा, जिसने स्वयं अनुच्छेद 355 लागू कर बढ़ी हुई जिम्मेदारी को ओढ़ा। अभी तक कुल 10 अपराधियों (जिसमें एक नाबालिग शामिल है) को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसका मतलब साफ है कि या तो राज्य में खुफिया तंत्र असफल हो गया। इसे ही कहते हैं ‘‘अंधे अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत’’। अथवा यदि ‘तंत्र’ की जानकारी में थी, मतलब तंत्र के असफल होने का आरोप गलत है, तब फिर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जब तक कि मामला वीडियो के माध्यम से ‘‘सार्वजनिक’’ नहीं हो गया। 

 सरकार की असफलता एवं अकर्मण्यता

दूसरा! जब यह तथ्य सामने आ चुका है कि शिकायत किए जाने के लगभग एक महीने बाद भले ही देरी से एफआईआर दर्ज हुई, तब वहां से लेकर गिरफ्तारी तक संबंधित थाने के थानेदार से लेकर आईजी तक द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने के कारण मुख्यमंत्री ने उनको नौकरी से बर्खास्त क्यों नहीं किया? न ही अभी तक भी कोई कार्रवाई करने का संकेत दिये हैं। इसका अर्थ यह क्यों यह नहीं निकाला जाए कि पुलिस तंत्र ने मुख्यमंत्री के पास जानकारी भेजी होगी, इसलिए अधिकारियों के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं गई? क्या इस कारण से एक अतिवादी विवादित तथाकथित आरोप कि यह राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा है, को कुछ बल नहीं मिलता है? आखिर ‘‘उंट की चोरी झुके-झुके तो नहीं हो सकती’’। मुख्यमंत्री ने इस्तीफे की नौटंकी क्यों की? राष्ट्रीय महिला आयोग के पास शिकायत को 12 जून को शिकायत भेजने (अध्यक्ष रेखा शर्मा ने 12 तारीख को शिकायत प्राप्त होने से इंकार किया हैं) के बाद यदि राज्य सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया तो, क्या महिला आयोग कार्रवाई नहीं करेगा? "कदली और कांटों में कैसी प्रीत"। और क्या दूसरे प्रदेशों में शोषण व उत्पीड़न की शिकायत आने पर क्या महिला आयोग ने अपने अधिकारी नहीं भेजे है? 

 प्रधानमंत्री की समझ में न आने वाली चुप्पी? 

याद कीजिए! मणिपुर विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री का यह कथन मणिपुर मेरा है, अपना है, मैं यहां इतने बार आया हूं जिनकी गिनती करना संभव नहीं है। जितने भी प्रधानमंत्री अभी तक आये है, उनसे कहीं ज्यादा बार मैं आया हूं। फरवरी 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह ट्वीट ‘‘जो लोग राज्य में शांति सुनिश्चित नहीं कर सकते है, उन्हें मणिपुर पर शासन करने का अधिकार नहीं है’’। मणिपुर प्रेमी, घुमक्कड़ प्रधानमंत्री की जरूरत के वक्त सुलगते मणिपुर में जाकर आग को अपने प्रयासों से ठंडा करने के लिए न पहुंचना, आज तक भी न पहुंचना तथा हिंसा के संबंध में एक शब्द भी न बोलने का क्या अर्थ निकला जाय? यही कि मूक बधिर बन जाना बचाव का श्रेष्ठ उपाय है? गोया कि ‘‘आंख फूटी पीर गई, कान गयो सुख आयो’’। 

हिंसा प्रारंभ होने के 79 दिन बाद मणिपुर (तब भी हिंसा पर एक शब्द नहीं) पर आया माननीय प्रधानमंत्री का बयान पूरे मीडिया और राजनीतिक दलों की हवा, रूख व नरेशन को ही बदल देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि इस देश में क्या ‘‘बुद्धि का अकाल’’ हो गया है? विपक्ष व मीडिया के एक भाग द्वारा मणिपुर पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग अनुरूप ही क्या प्रधानमंत्री का उक्त बयान आया है? जहां मणिपुर की हिंसा का के बाबत एक शब्द भी न कहा हो। प्रधानमंत्री के 36 सेकेंड के मणिपुर पर बयान को ध्यान पूर्वक सुनिये! संसद में नहीं, संसद परिसर में दिये गये बयान में उन्होंने महिलाओं के साथ हुई घटना का जिक्र करते हुए गहरा छोभ व्यक्त करते हुए कहा घटना ने पूरे देश को शर्मसार किया है। मोदी ने कहा कि ‘‘मणिपुर की बेटियों के साथ जो हुआ, उस पर मेरा हृदय पीड़ा और क्रोध से भरा है, जिन्होंने ये कृत्य किया उन्हे माफ नहीं करेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री ने उक्त बयान में क्रमानुसार राजस्थान, छत्तीसगढ़ (परंतु भाजपा शासित राज्यों उत्तर प्रदेश आदि का उल्लेख नहीं) फिर मणिपुर का ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’ के रूप में उल्लेख किया। जो मणिपुर की घटना की वीभत्सा को कहीं न कहीं ‘कमतर’ करता है। क्योंकि इस तरह की महिला के साथ यौन अत्याचार तथा वस्त्रहीन कर सार्वजनिक परेड कर और उसके बचाव में पिता व भाई के आने पर उनकी हत्या करने जैसे घटना नहीं हुई है।  

 राजनैतिक दलों द्वारा "धर्म नीति" के बजाय "राजनीति"

प्रधानमंत्री के इस बयान को किसी भी तरह मणिपुर की हिंसा पर बयान नहीं कहा जा सकता है, (जैसा कि राज्यपाल ने हिंसा के बाबत कहा है), जिसकी मांग लगातार 78 दिनों से की जा रही थी। यह तो वीडियो वायरल होने के संबंध में देने (दूसरे दिन) वाला ही बयान ही कहलायेगा। प्रधानमंत्री द्वारा हिंसा की घटना पर एक शब्द न बोलने व शांति की अपील न करने के साथ ही घटना स्थल पर और पीड़ित परिवार वालो से मिलने व ढांढस पहुंचाने कितने राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पहुंचे? क्या इसलिए कि थोबल ग्राम जहां यह दरिदगी घटी; देश के दूरस्थ उत्तर पश्चिम प्रदेश का भाग था? इसलिए वहां जाना उचित नहीं समझा? उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या अन्य किसी क्षेत्र मध्य भारत में घटित हो जाती, तो नेतागण पहुंच जाते? क्या इसलिए भी पीड़ित दबे, कुचले जनजाति समुदाय के लोग थे? विपरीत इसके 32 लाख की जनसंख्या वाले मणिपुर ने जहां 50 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं, के खेल रत्न, अर्जुन, द्रोणाचार्य व अन्य पुरस्कार प्राप्त विभिन्न खिलाड़ियों,  मीराबाई चानू, अनीता चानू, एन कुंजारानी देवी, एल सरिता देवी, संध्या रानी देवी, विमोल जीत सिंह, इबोला सिंह आदि द्वारा पत्रकार वार्ता या  संदेश भेज कर शांति की अपील की है। 16 वर्षो तक मानवाधिकारी की लडाई लड़ने वाली महिला विश्व प्रसिद्ध इरोम शर्मिला मणिपुर की ही थी, जिस के बारे में कहा जाता है कि "कर्ता से कर्तार हारे। "कश्मीर फाइल", "द केरला स्टोरी" बनाने वाले फिल्म निर्माता की क्या अगली कड़ी ‘‘मणिपुर हैवानियत’’ होगी?

तत्काल राष्ट्रपति शासन लागू हो

प्रश्न यह है कि आज भी इस समस्या की जड़ की तह तक कोई नहीं जाना चाहता है। क्योंकि तब राजनीति चमकाने का अवसर कहां मिलेगा? महामहिम राज्यपाल ने वीडियो वायरल होने के बाद गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए यह कहा कि ऐसी हिंसा उन्होंने कभी नहीं देखी। यह भी कहा कि मैंने ‘‘ऊपर तक’’ अपनी बात पहुंचा दी है। अप्रैल के अंत तक पुलिस व कुकी समुदाय के बीच चल रहा संघर्ष आगे कुकी व मैतोई समुदाय के बीच संघर्ष में बदल गया जो न तो एक तरफा है, और न ही पूर्णत: धार्मिक। बल्कि मादक पदार्थ (अफीम) के व्यापार को मणिपुर सरकार द्वारा कुचलने की की गई कार्रवाई की प्रतिक्रिया भी इस हिंसा में शामिल है। क्या राज्यपाल ने लगभग 3 महीने से चल रही इन सब हिंसक घटनाओं और महिलाओं के साथ हुए अत्याचार के कारण संवैधानिक तंत्र के ध्वस्त हो जाने से राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की है? इसका खुलासा तो महामहिम ही कर सकती हैं। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी इस मामले में बेहद सावधानी से रिपोर्टिंग करने की अपील की है, इससे भी मामले की गंभीरता को समझा जा सकता है। बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या राष्ट्रपति शासन का उपयोग सिर्फ राज्य को अस्थिर करने व अपनी सरकार को स्थिर करने में राजनीतिक आधार पर ही किया जाएगा? जैसा कि शुरू से होता चला आ रहा है। ‘‘पार्टी विथ डिफरेश’’ का नारा देने वाली भाजपा ने इस ‘‘परिपाटी’’ को आमूल चूल रूप से खत्म करने की बजाय पार्टी ‘‘भाई गति सांप छछूंदति केरी’’ की अवस्था को क्यों प्राप्त हो गयी? राजनीति जरूर कीजिए, क्योंकि आप राजनेता है। परन्तु राजनीतिक दल राजनीतिक करते-करते इस निम्न स्तर तक गिरते जा रहे हैं कि एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब ‘‘स्तरहीन राजनीति’’ के कारण ‘‘राजनीति’’ करने की परिस्थितियां व अवसर ही समाप्त हो जायेगी। तब ‘‘स्तरहीन राजनीति’’ करने का भी अवसर कहां मिलेगा? इस बात को यदि समझ ले तो, कुछ ज्यादा समय तक राजनीति कर पायेगें।

 स्तरहीन राजनीति

स्तर हीन राजनीति का ही परिणाम है कि पक्ष-विपक्ष दोनों संसद में मणिपुर के मुद्दे पर बहस के लिए तैयार हैं, ऐसा गला फाड़ फाड़ कर जनता को सुना व दिखा रहे हैं। बावजूद इसके मणिपुर के मुद्दे पर विशिष्ट बहस हो ही नहीं पा रही है। मतलब "मुंह में राम बगल में छुरी"। मतलब दोनों पक्ष चर्चा से भाग रहे हैं। तथापि विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर अवश्यंभावी बहस होने का लाने का तरीका निकाला। जिसका सत्तापक्ष ने इसलिए स्वागत किया कि वह विपक्ष को मणिपुर के अतिरिक्त अन्य मुद्दों को लेकर प्रधानमंत्री के धारदार भाषण से घेर सकेगा । परंतु सबसे आश्चर्य जनक बात यह है कि सरकार के संसदीय कार्य चल रहे हैं, बिल प्रस्तुत होकर पारित हो रहे हैं जबकि परिपाटी के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव अध्यक्ष द्वारा स्वीकार करते ही अन्य संसदीय कार्य तुरंत सस्पेंड (स्थगित) कर अविश्वास प्रस्ताव पर बहस कराई जाती है। वही दूसरी ओर विपक्ष भी सरकार के दिल्ली सरकार के अधिकार के संबंध में जारी किए गए अध्यादेश पर कानून बनाने के लिए सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक पर चर्चा के लिए तैयार है, हंगामा बहिष्कार नहीं कर रहा है। इससे राजनेताओं की दोगली नीति स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।

Popular Posts