सोमवार, 27 अप्रैल 2020

क्या राष्ट्रीय लॉक डाउन की विस्तृत समीक्षा किए जाना, ‘समय’ की आवश्यकता नहीं है?

सामयिक सुझाव
देश में राष्ट्रीय लॉक डाउन लागू किए एक महीना व्यतीत हो गया है। लेकिन केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग व देश का मीडिया लाकडाउन के बाद देश में कोरोना की औसत वृद्धि दर में कमी को दर्शाकर जनता को एक तरह से भ्रमित कर रहा है। एनडीटीव्ही ने बाकायदा ग्राफ के माध्यम से औसत वृद्धि दर लाकडाउन की अवधि में कम दर्शाने की कोशिश की है। स्वास्थ्य विभाग ने लॉक डाउन के लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद नियमित प्रेसवार्ता में कहा था कि यदि लॉक डाउन न किया जाता तो देश में 18 लाख से ज्यादा संक्रमित मरीज हो जाते। 
हमारे देश में कोरोना का प्रथम मरीज केरला प्रदेश में 30 जनवरी को पाया गया था। देश में जब 24 मार्च को लॉक डाउन लागू किया गया, तब मात्र लगभग 520 कोरोना संक्रमित रोगी थे। 30 जनवरी से 24 मार्च तक कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बहुत ही धीरे-धीरे एक एक दो-दो करके ही बढ़़ती रही। लॉक डाउन के प्रथम सप्ताह में कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि का औसत प्रतिदिन का लगभग पैंतीस चालीस का था। उसके बाद 2 सप्ताह तक लगभग 100 का औसत रहा। फिर लगभग 500-600 का औसत रहा और अभी पिछले हफ्ते से 1200 से ज्यादा का औसत आ रहा है।  न केवल मरीजों की संख्या 23000 को पार कर गई, बल्कि देश में हॉटस्पॉटों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन संक्रमित मरीजों की गणना को आधार दिन, तारीख, सप्ताह या महीने को अपनी सुविधानुसार लेकर आकड़ो के खेल के जादू से  कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि दर में कमी का दावा सफलतापूण भ्रमित कर किया जा रहा है। लाकडाउन के पूर्व तक 50 दिन में कुल 520 व्यक्ति संक्रमित हुये जबकि लाकडाउन की 30 दिन की अवधि में 22000 संक्रमित रोगी की वृद्धि हुई में वृद्धि की दर से मतलब है (जो वास्तविकता को दर्षित नहीं करती है) या कुल मरीजों की कुल संख्या से मतलब है। आकड़े आपके सामने है। यह ठीक उसी प्रकार है जब भाजपा दिल्ली के चुनाव में बुरी तरह हारने के बावजूद उसका यह दावा कि उसने पिछले चुनावों से ज्यादा वोट पाये है। यदि यह वृद्धि की दर कम है तो फिर लाकडाउन समाप्ति पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जाता। मतलब साफ है, जिस कोरोना की बीमारी का एकमात्र इलाज लाक डाउन कर (ह्यूमन) डिस्टेंस (सोशल डिस्टेंस) के साथ अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरती जा कर ही संभव है, वह उद्देश्य वर्तमान में लॉक डाउन के बावजूद सफल होता नहीं दिख रहा है। फिर सरकार नागरिक और स्वास्थ्य सिपाही (डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मी) कोरोना को रोकने के लिए और क्या करें यह एक चिंता का विषय है।  
यह तो विदित ही है, इस रोग की मारक दवा अंतिम रूप से नहीं बन नहीं पाई है। यद्यपि   भारत सहित पूरे विश्व के वैज्ञानिक इस दिशा में तेजी से प्रयास कर रहे हैं, और हमें शीघ्र ही इसमें सफलता मिलने की आशा हमें करना चाहिए। लेकिन तब तक क्या किया जाए महत्वपूर्ण प्रश्न यह है? कोरोना को संक्रमित होने से रोकने का एकमात्र इलाज अभी तक कुछ सुरक्षा व सावधानिओं के साथ फिलहाल लॉक डाउन को ही माना गया है। इसके अलावा अधिकतम टेस्ट ही इसका फिलहाल उपाय है। क्या यह सही नहीं है कि लॉक डाउन को सही तरीके से पूर्णतः अपेक्षित ढ़ग से सरकार द्वारा लागू नहीं किया जा रहा है तथा सही तरीके से समस्त नागरिकों द्वारा भी उसका पालन नहीं किया जा रहा है? जबकि प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट घोषणा की थी कि पूरे देश में पूर्णरूप रूप से पूर्ण लॉक डाउन लागू किया जा रहा है। 
यह लॉक डाउन जो व्यक्तिगत रूप से शून्य खर्चा लिए हुए है, लेकिन एक राष्ट्र की दृष्टि में यह फिलहाल सबसे महंगा इलाज सिद्ध हो रहा है। इस वैश्विक संक्रमित महामारी की बीमारी के कारण ही विश्व के अधिकांश राष्ट्रांे की आर्थिक गतिविधियां सुन्न सी पड़ गई है और विश्व एक गहरे आर्थिक संकट की और ढकेला जा रहा है, जो उक्त बीमारी के संक्रमण को रोकने के तरीकों के कारण ही है। इसीलिए विश्व के कई देश इस कोरोना के संक्रमित होने से रोकने के प्रयासों को लागू करने के समय ही साथ-साथ उससे पड़ने वाले ऋटणात्मक आर्थिक प्रभाव पर भी गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर हो गए हैं। अब आर्थिक दृष्टिकोण लेकर इस संक्रमित महामारी बीमारी का इलाज करने के तरीके खोजे जा रहे हैं। अमेरिका तो विश्व का पहला देश रहा है जब उसके राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रांरभ में आर्थिक दृष्टि को ध्यान में रखते हुये लॉक डाउन लगाने से इंकार करते हुए पूरे देश में दो लाख से ज्यादा व्यक्ति की मृत्यु की आंशका तक बेहिचक व्यक्त कर दी थी। हम तो अपने देश में एक-एक व्यक्ति की जान बचाने के खातिर पूरी व्यवस्था की आहुति लगाए हुए हैं। ‘‘जान’’ जरूरी है लेकिन सिर्फ जान नहीं बल्कि जान के साथ ‘‘जहान’’ की भी आवश्यकता है जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने स्वयं कहा था। क्या इसकी समीक्षा किए जाने की आवश्यकता का समय नहीं आ गया है? ऐसा लगता है कि इस संक्रमित बीमारी से निपटने के लिये लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी और तब तक हमारा देश लाक डाउन से पड़ने वाले इस आर्थिक चोट को नहीं झेल पाएगा। इसलिए सरकार और नागरिकगण दोनों को इस मुद्दे पर अपने कार्य नीति आचार व व्यवहार के पुनरीक्षण किए जाने की नितांत आवश्यकता है।
यह बात आईने के समान स्पष्ट है कि देश के विभिन्न अंचलों में नागरिकगण लॉक डाउन का 100 प्रतिशत पालन नहीं कर रहे हैं, जो लॉक डाउन की पूर्ण सफलता की एक पहली आवश्यक शर्त है। आश्चर्य है देश ने प्रधानमंत्री के एक दिन के स्वस्फूर्ति जनता कर्फ्यू के आह्वान का लगभग पालन किया था, गले लगाया था। लेकिन तीन दिन बाद घोषित लॉक डाउन पुलिस तंत्र के डंडे की ताकत व ड़र के बावजूद भी पूरी तरीके से लागू नहीं हो पाया। इससे यह स्पष्ट है जनता को एक दिन के लिए तो स्वयं के घर में रखा जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक नहीं। बार-बार देश का मीडिया भी जनता को यह दृश्य दिखा भी रहा है। तो फिर सरकार को क्या करना चाहिए?
मेरी दृष्टि में प्रथम तो सरकार को पूरे देश मे लॉक डाउन शिथिल कर सिर्फ घोषित देश के समस्त हॉटस्पॉटों में ताकत के साथ 100 प्रतिशत कर्फ्यू लागू कर कड़ाई से पालन करवाना चाहिए। शेष जिलों को लाक डाउन से मुक्त कर सामान्य दैनिक जीवन दिन-चर्या चलते देना चाहिए। इन मुक्त जिलों में जिले के भीतर समस्त गतिविधियां को सावधानी व सुरक्षा के साथ प्रारंभ करना चाहिये। कोरोना मुक्त जिले की सीमाओं से लगे जिले भी यदि संक्रमण मुक्त है जो इन सभी जिलों के बीच अंतर जिला मूवमेंट करने की भी अनुमति देना चाहिए। इससे दो संदेश स्पष्ट रूप से नागरिकों के बीच जाएंगे। प्रथम तो वे नागरिक गण जिनके द्वारा लॉक डाउन का पालन करने के इनाम स्वरूप उनके क्षेत्र में लॉक डाउन समाप्त किया जाकर उन्हें सामान्य जीवन जीने की छूट प्राप्त होगी, जिसके की वे अधिकारी हैं। इस कारण से स्वयं के स्वार्थ को देखते हुए व नैतिक व सामाजिक दबाव के कारण उन नागरिकों पर भी दबाव पड़ेगा कि वे 14 या 21 दिन उनके क्षेत्र में लागू कर्फ्यू का पालन कर अपने रहवासी क्षेत्र को भी हॉटस्पॉट से हटाकर सामान्य जिंदगी जीने की ओर आगे बढ़ सकेंगें। इस प्रकार जब लॉक डाउन का क्षेत्र कम हो जाएगा, तब सरकार के पास अतिरिक्त पुलिस फोर्स रहेगी जिसके द्वारा वह कर्फ्यू को सख्ती के साथ लागू करवा पायेगी। सरकार को इस पर गंभीरता से विचार कर इस दिशा में निर्णय लेना चाहिए। सरकार के पास उपलब्ध विशेषज्ञों से विस्तृत और गंभीर चर्चा कर आर्थिक व्यवस्था पर कम दुश दुश्प्रभावित करने वाले प्रयासों के साथ इस बीमारी का इलाज करें अन्यथा आगे 6 महीने से से 1 साल के बाद जब हम जागेंगे तब हमारे पास व्यवस्था सुधारने के लिए कोई प्रभावी सार्थक हथियार नहीं रहेगा और तब हमे यह कहना पड़ेगा ‘‘अब पछताए होत क्या जब चिडि़याँ चुग गई खेत’’। 
अंत में सरकार के समक्ष प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों का मुद्दा सामने लाना आवश्यक है। जनता के बीच एक भावना घर कर रही है कि बड़े सक्षम लोगों को तो सरकार ने अपने खर्चे से विदेशों से भारत बुला दिया। कोटा में पढ़ने वाले सक्षम विद्याथियों को कुछ प्रदेशों सरकारी खर्चे पर वापस अपने-अपने प्रदेश बुला दिया। लेकिन दिहाड़ी प्रवासी मजदूर की हजारों की संख्या में होने के बावजूद उन्हे अपने राज्यों में वापिस नहीं जाने दिया जा रहा है। क्या गरीबो का कोई माइबाप नहीं है? वास्तव में जब केन्द्र व राज्य सरकारों इन मजदूरों के ठहरने व खाने पीने पर करोडांे रूपये खर्चे कर रही है, तब उनकी मांग को स्वीकार कर कोटा के छात्रों के समान ही क्रमशः चरणबद्ध तरीके से उन्हे उनके राज्य में छोड़ने का प्रबंध केन्द्र व राज्य सरकारे क्यों नहीं कर रही है? यह समझ से परे है। उनके वापिस अपने-अपने गांवों में पहुंच जाने पर सरकार की एक बड़ी धन राशि व्यय होने में भी बहुत कमी आ जायेगी। क्या उपरोक्त सिर्फ मजदूरों के लिये है छात्रों व विमान यात्रियों के लिये नहीं? लेख समाप्त करते-करते उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की मजदूरों के वापसी के संबंध में एक कार्य योजना की घोषणा हुई है, जिसका न केवल हार्दिक स्वागत किया जाना चाहिये, बल्कि पूरे देश में इस ‘‘योगी माड़ल’’ को लागू भी किया जाना चाहिये। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

भारतीय जनता पार्टी ‘‘मुस्लिम विरोधी नहीं’’ वरण ‘‘मुस्लिम विरोधी छाप’’ लिए हुये हैं।

भारतीय राजनीति मैं जनसंघ जो आगे चलकर वर्तमान भाजपा के रूप में परिवर्तित हुई है,के सम्बन्ध में एक जमाने से ही यह शाश्वत तथ्य सर्वमान्य रूप से विद्यमान हो गया है कि भाजपा एक मुस्लिम विरोधी राजनीतिक पार्टी है और कॉंग्रेस मुस्लिम परस्त राजनीतिक पार्टी हैं। वास्तव में कांग्रेस पर न केवल आजादी के बाद से बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि आजादी के पूर्व से भी यह आरोप लगता रहा है कि कांग्रेस हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाती रही है और इसी नीति के अन्तर्गत वह सदैव ही राष्ट्रीय सुरक्षा व देश हित को दर किनार करती आ रही हैं। ऐसे कई अवसर हमारे देश में आए जब कांग्रेस पर आरोप लगा कि उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते राष्ट्रीय हित में या तो निर्णय लिए ही नहीं या गलत निर्णय के लिये।
इसके विपरीत भाजपा जनसंघ के जमाने से ही अपने आप को हमेशा एक राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही और ऐसे प्रस्तुतीकरण में उसकी सबसे बड़ा सहायक उसकी मुस्लिम विरोधी छवि ही रही। एक उदाहरण आपके सामने प्रस्तुत हैं। शाहबानांे मामले में उच्चतम न्यायालय के अंतिम बंधनकारी निर्णय को तबकी राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने संसद में बिल लाकर निर्णय को पलट दिया था, तब भाजपा ने ही उसका पुरजोर तरीके से विरोध किया था। भाजपा के सत्ता में आने के बावजूद मोदी के प्रथम कार्यकाल में भी कमोबेश भाजपा की यही छवि बरकरार रही। इसी कार्यावधि में हज यात्रा सब्सिडी की समाप्ति जैसे कुछ कदम उठाये गये। यद्यपि सत्ता में आने व बने रहनें के लिये भाजपा ने मुसलमानों की सामाजिक दुर्दशा को सुधारने के लिए भी कुछ कदम उठाए। ट्रिपल तलाक उन्मूलन ऐसा ही एक बड़ा प्रगतिशील कदम माना गया, जिसका मुस्लिम समुदाय विशेषकर महिला मुस्लिम समाज ने दिल से समर्थन किया।
मोदी के दूसरे कार्यकाल में दो बड़ी घटनाएं ऐसी हुई है, जिनसे भाजपा की स्थापित छवि पर विपरीत असर पड़ा है। जिन आधारो पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी नहीं है। प्रथम शाहीन बाग में 100 दिन से ज्यादा चले लंबे चक्का जाम आंदोलन को समाप्त कर चक्का जाम हटा कर वहॉं के रहवासियों को हो रही असुविधाएं एंव तकलीफों को दूर करने के लिए केंद्रीय सरकार ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाये और न ही कोई कारवाई की। जबकि दिल्ली में पुलिस विभाग जिसकी यह जिम्मदारी है, वह दिल्ली प्रदेश सरकार के अधीन न रहकर केंन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन हैं। राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के चुनाव तक कोई कार्यवाही न करना तो समझ में आता है, लेकिन चुनाव उपरान्त भी कोई कार्यवाही न करना समझ से परे है। बल्कि इसके विपरीत केंद्रीय शासन और भाजपा के नेता गण उक्त जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व का ठीकरा लगातार दिल्ली की प्रदेश सरकार के सिर पर फोड़ते रहें। भला हो ‘‘कोरोना’’ आगमन का जिसके कारण उक्त चक्काजाम समाप्त हुआ। याद कीजिए, उसी दौरान दिल्ली में दंगा भड़कने के बाद जब केन्द्रीय सरकार ने ऐजन्डा तय कर लिया तब 2 दिन के अंदर ही दंगे को पूर्णतः नियंत्रित कर लिया गया था। ठीक इसी प्रकार शाहीन बाग में भी त्वरित व प्रभावी कार्यवाही करके चक्का जाम को समाप्त कर इस मामले को बहुत ही अच्छे ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 
दूसरी घटना वर्तमान तबलीगी जमात के मरकज एवं देश में फैलकर छुपते फिरने और कोरोना फैलाने की दुर्भावना के मामले को लेकर है। 10 मार्च से लेकर 28 मार्च तक केन्द्र सरकार के ठीक नाक के नीचें निजामुद्वीन मस्जिद दिल्ली में तबलीगी जमातियों द्वारा जिस तरह का नंगा नाच नाचा जा रहा था, वह देश के सामने आ चुका है। देश की बाह्य व आंतरिक सुरक्षा में लगे हुए छटवे प्रमुख व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को स्वयं रात के 10-11 बजे जाकर मस्जिद प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद से अनुरोध करके निजामुद्वी्न मस्जिद खाली करानी पड़ी। तिस पर भी मौलाना मोहम्मद साद के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत निरोधक आदेश तुरंत तो छोडिये वरण आज तक भी जारी नहीं किये गये। दूसरे दिन मात्र एक सामान्य प्रथम सूचना पत्र निजामुद्वीन थाने में दर्ज की गई जिसके बाद से मोहम्मद साद फरार है। तब शासन प्रशासन द्वारा यह प्रसारित किया गया कि वह 14 दिन के कोरोनटर््ाईन मे है। हद तो तब हो गई जब पुलिस प्रशासन द्वारा यह स्पष्टीकरण दिया गया कि मौलाना साद के कोरोनटर््ाईन होने के कारण उससे 14 दिन तक पूछताछ नहीं की जा सकती है। देश में लागू दंड पक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपराधी आरोपी से सीधे पूछताछ की है, न कि उसके वकील के माघ्यम से यह विशिष्ट सुविधा भी साद को दी जा रही है। परन्तु क्यों?
एक अपराधी जिस पर राष्ट्रीय लॉंक डाउन के नियमों के उल्लघंन सहिता भारतीय दंड सहिता के कई अपराधो के संगीन आरोप है। इसके अतिरिक्त वीसा नियमों का उल्लघन करने वाले विदेशियों को प्रश्रय देने का आरोप है। साथ ही कुछ क्षेत्रों मे तो यह भी आरोप लगाया जाता है कि एक गहन साजिश व षडयंत्र के तहत मौलाना मोहम्म साद ने तबलीगी जमात के माध्यम से पूरे देश में कोरोना फैलाने का षडयंत्र रच रखा है। वस्तुतः 22 प्रदेशों में कोरोना संक्रमित तबलीगी पाए गए है। ऐसी असहनीय स्थिति में ऐसे जघन्य अपराधी से गहरी छानबीन हेतु तुरन्त पूछताछ न करना, न केवल आश्चर्य जनक है, बल्कि देश की सुरक्षा व हितो के एकदम विपरीत भी है। इन 14 दिनांे में साद ने बैठे संचार के आधुनिक माध्यमों का उपयोग करके क्या-क्या गुल खिलाए होगंे इसकी केवल कल्पना भर की जा सकती हैं। इतना ही नहीं तबलीगी जमात के रोहिंग्या मुसलमानों से भी संबंध है तथा तबलीगीयों ने रोहिंग्याओं के साथ मिलकर कोरोना फैलाया गया है, यह आरोप भी मौलाना साद पर लगभग है। साथ ही विदेशांे से हवाला द्वारा अवैध रूप से बड़ी धन राशि प्राप्त करने का आरोप भी मौलाना साद पर लगाया गया है। ऐसे गहन आरोपांे से सुशजित आरोपी से ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक डॅंाक्टर समस्त सुरक्षा कवच के साथ अपने रोगी की देख भाल एवं इलाज कर रहा है, से समस्त (पीपीडी किट इत्यादि सहित) सुरक्षा कवच पहने पुलिस टीम मौलाना साद से गहन पूछताछ तत्काल क्यों नहीं कर सकती थी, यह एक महत्वपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न हैं। 
तबलीगी जमातीयांे के प्रति लोगों में कितना रोश है, इसे आप भोपाल के एक व्यक्ति (उसका नाम में भूल रहा हॅूं) जिसने फेसबुक पर अपना कुछ मिनटो का एक वीडियों डाला है। उसको देखिए, जिसमें वह कहता है प्रधानमंत्री मोदी को देश की जनता ने इस संकट काल में उनके द्वारा तीन बार किये गये राष्ट्रीय आव्हान को पूरा समर्थन दिया। लेकिन निजामुद्वीन से भागे तबलीगी जमातियों को सरकार अपना मेहमान क्यों मान रहीं है? उनसे बार-बार सामने आने के लिए विनम्र अनुरोध क्यों कर रहीं है, यह सब समझ से परे है। न्याय संगत होगा, इन्हें पकड करके ला कर निजामुद्वीन मस्जिद में बंद कर देना चाहिए और भोजन व इलाज की कोई सुविधा न देकर उन्हें कोरोना से होने वाली मृत्यु का भयावद्ध एहसास होने देना चाहिए। न तो यह मेरे विचार है, और न ही मैं इससे सहमत हूॅं,। लेकिन यह वही जमात है, जिसकी देश के अंदर कोरोना के कुल संक्रमित मरीजों में लगभग 35 प्रतिशत की भागीदारी है। उक्त व्यक्त भावनाओं से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है अथवा नहीं यह निर्णय मैं आप सबके विवेक पर छोड़ता हँू।       
 इस संदर्भ में मध्यप्रदेश के भोपाल की एक कार्य योजना का यहां उल्लेख करना भी सामयिक ही होगा। मिसरोद (भोपाल) से बाहर सीधा भोपाल इंदौर की रोड़ को जोड़ने वाला लम्बा फलाई ओवर व आठलेन रोड़ बनाते समय रास्ते में आये समस्त लगभग 100 मंदिरों मठो को हटाया गया। लेकिन इसके विपरीत कमला पार्क में राजाभोज केवल स्टेआर्क फलाई ओवर का निर्माण करते समय मस्जिद का जरा सा हिस्सा आने के कारण डिजाइन को ही बदलना पड़ा, मस्जिद के पुल के निर्माण के रास्ते में आने वाले भाग को हटाया नहीं गया। यह शिवराज की भाजपा सरकार का उठाया गया कदम था जो मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम भय के परिणाम स्वरूप था, आप स्वयं ही समझियें। ऐसा ही एक मुस्लिम तुष्टिकरण से संबंधित आदेश रायसेन कलेक्टर का है। ‘‘रमजान’’ में मुस्लिम समाज को रोजे के लिये आवश्यक सामग्री पहुंचाने के निर्देश अधीनस्थ प्रशासनिक अधिकारियों को दिये। लेकिन ऐसे ही निर्देश नवरात्री के समय उपवास रखने वाले हिन्दुओं के लिये नहीं दिये गये। 
उपरोक्त दोनों घटनाएं व मध्यप्रदेश की सरकार की उक्त कार्य प्रणाली, क्या इस बात को सिद्व नहीं करती हैं कि भाजपा मुस्लिम विराधी पार्टी नहीं है, बल्कि वास्तव में छदम मुस्लिम विरोधी छाप लिए हुये है? क्या भाजपा में अल्पसंख्यक मोर्चा व संघ में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन भी यही इंगित नहीं करता है ? इन घटनाओं ने भाजपा के उक्त मिथक मुस्लिम विरोधी को चकनाचूर कर दिया है, जिसे देश स्वीकार भी कर लेता यदि यह वास्तव में देश हित में होता। लेकिन वस्तुतः दोनों घटनाओं में समय पर कड़ी व प्रभावी कार्यवाही न करना राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रि हित के बिल्कुल विरूद्ध है। भाजपा की उक्त अकर्मण्यता क्या उसकी नीति में कुछ बदलाव की सूचक है? या यह भी कोई राजनीति का भाग है, यह तो भाजपा ही जाने । लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा के कट्टर समर्थको को छोड़ भी दें तो भी, एक सामान्य नागरिक जो भाजपा की कई नीतियों का समर्थक नहीं है, लेकिन वह यह अवश्य मानता है देशहित के विरूद्व काम करने वाले मुस्लिम कट्टवाद जिसके कारण ही मुसलमानों के मन में देश के प्रति घृणा फैलाई जाती है, इनके खिलाफ समय पर सही व कड़क प्रभावी कार्यवाही कर सकती है तो वह एकमात्र पार्टी भारतीय जनता पार्टी ही है। ऐसी सोच वाले नागरिकों को निश्चित रूप से भाजपा के बदलते रूख से निराशा ही हाथ लगेंगी। भाजपा को इस पर गहराई से गहन आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। अंततः भाजपा की अब मुस्लिम तुष्टीकरण या मुस्लिम भयाक्रात (मुस्लमानों से ड़र) की नीति है, यह समय ही तय करेगा।
 धन्यवाद!

‘प्रधानमंत्री जी का राष्ट्र के नाम संबोधन ! कितनी आशा ! कितनी निराशा!‘‘


कोविड-19 (कोरोना) के भारत में आने के बाद हमारे देश के प्रधानमंत्री का यह चैथा संबोधन हूआ है । यह तो तय ही था की लाॅक डाउन कुछ समय के लिये आगे बढेगा।  कुछ दिन पूर्व ही प्रधान मंत्री की देश के मुख्यमंत्रियों के साथ कुछ विडीयों कान्फ्रेसिंग के दौरान 10 से ज्यादा मुख्यमंत्रियों ने न केवल लाॅक डाउन बढाये जाने की वकालत की थी, बल्कि तीन प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने तो प्रधानमंत्री के संदेश आने के पूर्व ही लाॅक डाउन की अवधि 30 अप्रैल तक बढा दी थी । किसी भी मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से लाकडाउन बढाने का विरोध नहीं किया था । प्रश्न यह है कि जनता अपने मन में जो आकांक्षाये, छूट की मंशा इस संदेश के लिये पाली थी, क्या उसकी पूर्ति या आंशिक पूर्ति हुई है तथा प्रधानमंत्री द्वारा समय पूर्व उठाये गये कदमों का,जैसा उन्होने स्वकथित किया है, का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है ।
आप जानते ही हैं । विगत दिवस प्रधानमंत्री ने यह बात कही थी कि अब ‘‘जान है तो जहान है‘‘ के आगे अब जान है ‘‘और‘‘ जहान भी सूत्र पर कार्य किया जायेगा । लेकिन प्रधान मंत्री के आज के संदेश में कम से कम 07 दिन तो जान है और जहान भी है का सूत्र नजर नहीं आयेगा । अभी 20 तारीख तक तो ‘‘जाॅन है तो जहान है‘‘ पर ही सरकार आगे कार्यशील रहेगी। प्रधानमंत्री ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि अगले 20 दिन 02 मई तक देश में लाॅक डाउन की स्थिति रहेगी। 07 दिनों बाद नागरिकों द्वारा लाॅक डाउन का कडाई से पालन करने की स्थिति में कोरोना मरीजों की संख्या न बढने पर सामान्य दैनिक जीवन दिनचर्या के लिए आंशिक छूट पर विचार किया जायेगा और तदानुसार जान है ‘‘और‘‘ जहान है को लागू किया जा सकता है । यधपि सरकार ने दूसरे दि नही लम्बी चैेडी एडवाइजरी जारी कर दी लेकिन उसमें भी कई अपूर्णतायें जैसे कारपेंटर,प्लम्बर,इलेक्ट्रिसियन को छूट दी गई है लेकिन उसको कार्य करने के लिये आवश्यक सामान जिनसे क्रय कर सकें उन दुकानों को छूट नहीं दी है । 
प्रधानमंत्री ने देश के नाम संदेश में प्रारम्भ में ही एक बडी महत्वपूर्ण बात कही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज आने के पूर्व ही सरकार ने विदेशों से विमानों से आने वाले यात्रियों की सक्रिनिंग चेंकिंग प्रारम्भ कर दी थी ।  लेकिन जानकारों का कहना है कि वस्तुतः यहा पर सरकार ने अदूरदर्शिता का परिचय और सावधानी से काम नहीं लिया। जैसा कि आपको मालूम ही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज 30 जनवरी को केरला प्रदेश में आया था । यघपि चीन में हुबई प्रदेश की राजधानी वुहान में अक्टूबर में ही वहां के डाॅक्टर ने कोरोना बीमारी की पुष्टि कर दी थी । लेकिन चीन ने विश्व को प्रथम कोरोना रोगी की जानकारी सर्वप्रथम 30 दिसम्बर को दी थी । 07 जनवरी को वुहान में रहने वाले समस्त विदेशी नागरिकों को यह सूचना जारी कर दी गई थी कि आपका वीजा की अवधि कम की जा रही है, और आप 03 दिन के अन्दर अपने-अपने देश लौट जाएं । तदानुसार 10 जनवरी को भारत में आइटीबीपी के दो जहाजों द्वारा लगभग 560 व्यक्ति भारत वापस आयें । भारत में प्रथम कोरोना रोगी आने के पूर्व तक यह स्पष्ट हो चूका था कि विश्व के लगभग 30 देशों में एक लाख व्यक्ति कोरोना के रोग से संक्रमित हो चुके थे । 30 जनवरी को सरकार के सामने कोरोना की आगे आने वाली कुुछ भयावहता का चित्रण तो सामने आ चुका था । लेकिन शायद सरकार इस कोरोना बीमारी की गंभीरता को तत्समय समझ नही पाई । इस कारण उस समय सरकार ने प्लेन से उतरने वाले यात्रियों की मात्र थर्मल रीडिंग ली गई और साथ में उनसे यह घोषणा पत्र भरवाया गया कि वे स्वयं घर में 14 दिन कोरोनटाईन में रहेगें । यह निश्चित रूप से पर्याप्त सावधानी नही थी । 
हम सब जानते है कि हमारे देश में शपथ पत्र या स्व घोषणा (सेल्फ डिक्लरेषन) का कितना महत्व नागरिक लोग मानते है और उसका पालन करते है । इसके अतिरिक्त हवाई यात्रियों को भी शायद यह जानकारी रही होगी कि उनकी थर्मल चेकिंग होगी । इसलिये शायद पेरासिटामाल दवाई का अधिकांशतः उपयोग करने के कारण एयरपोर्ट पर कोरोना के सम्भावित संक्रमित व्यक्ति अधिकांशतः नहीं पकडे गये । नागरिकों सहित सरकार यह जानती थी कि विदेशों से आने वाले यात्रियों के द्वारा ही देश में कोरोना का आना सम्भव है । तब सरकार को 30 जनवरी के बाद से ही बाहर से आने वाले विमानों को देश में या तो उतरने ही नहीं देना था व उन्हें वापस भेज देना चाहिये था । अथवा यात्रियों को उतार कर  उन्हें अपने नियत्रण में लेकर उनकी जाॅच कर 14 दिन तक एयरपोर्ट व आस पास स्थित होटलों व अन्य स्थानों में रिपोर्ट आने तक उन्हें रोक कर कोरोनटाईन में रखना चाहिये था । तब निश्चित ही भारत में एक भी कोरोना संक्रमित रोगी नहीं होता और न ही सक्रमण फैलता । तब देश को लाॅक डाडन किये बिना ही हम न केवल देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को सरुक्षित रख पाते, बल्कि देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी वैसे ही सामान्य गति से चलता रहता जैसा कि पूर्व में चल रहा था । यहां एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठने ने 30 जनवरी को ही पी एच आई सी सी की एडवाइजरी जारी कर दी थी ।   
एक प्रश्न अवश्य यह पैदा होता है कि जो लगभग 1500000 व्यक्ति (एक अनुमान के अनुसार) जो विदेशों से अन्तर्राष्ट्रीय उडानों द्वारा भारत में आए थे, उनके प्रति भारत सरकार का क्या दायित्व था। एक अनुमान के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत लोग भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के विदेशों में रहने वाले व्यक्ति थें और शेष विदेशी नागरिक थे । भारत से जाने वाले भारतवंशी अपने सुनहरे भविष्य अवसर और समृध्द जीवन के लिये वे विदेशों में जा कर या तो नौकरी कर रहे थे या व्यवसाय कर रहे थे । उनमें से कुछ लोग वहां के नागरिक भी बन गये थे । ऐसे समस्त भारतीयों को भारत सरकार ने जबरदस्ती विदेश नहीं भेजा था। वे स्वयं अपनी इच्छा से भारत से गये थे । इसलिये भारत सरकार का कोई कानूननी दायित्व न हाने के बावजूद, भारतीय होने के कारण भारतीय संस्कृति के आभा मंडल फलस्वरूप भारत सरकार का यह नैतिक दायित्व था कि वे अपने मूल के लोगों की जान माल की रक्षा करें । शायद इसी कारण से उन्हे न केवल भारत आने से रोका नहीं गया बल्कि सरकार ने स्वयं पहल करके विशिष्ट व चार्टर्ड उडानों के द्वारा उन्हें अपने देश में लाया भी।  
लेकिन निश्चित रूप से इस प्रारम्भिक चूक के बाद केन्द्रीय सरकार बल्कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में पूरे राष्ट्र ने समस्त राज्यों की सरकारों सहित कोरोना को सक्र्रंमित होने से रोकने के लिए जिस तेजी से कदम उठाये वह काबिले तारीफ है । इसी कारण विश्व में इस समय सबसे सूझबूूझ और कठोर निर्णय लेने वाले नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी को सराहा गया है । विश्व स्वास्थ संगठन ने भी बारम्बार प्रधान मंत्री मोदी की भूरी भूरी प्रशंससा की है । साथ ही विश्व के ताकतवर देश अमेरिका,इग्लैण्ड,ईजराईल इत्यादि देशों ने भी हमारे देश के प्रधान मंत्री के नेतृत्व को सराहा जो निश्चित रूप से देश के लिये एक गौरव की बात है । मोदी के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सामान्य व्यक्ति (स्वयं सेवक) से होते हुये उन्होने प्रधान मंत्री पद को महान बनाया । वे ‘‘महान‘‘  होकर प्रधान मंत्री पद पर नहीं बैठे जबकि इस देश में महान होने के कारण प्रधानमंत्री पद पर बैठने की परम्पराये रहीं है । 
प्रधानमंत्री ने स्थिति को सामान्य लाने के लिये एक छुपी हुई चेतावनी भी नागरिकों को दी है। यधपि यहां उनका कुछ विरोधाभास दिखता है । एक तरफ वे कहते है मुझे देश के नागरिकों पर पूर्ण विश्वास है ओर उनको धन्यवाद भी देता हूें कि उन्होने लाॅक डाउन का पालन किया है । तब सात दिवस बाद छूट देने के लिये छुपी हुई चेतावनी देने की शायद आवश्यकता नहीं थी । लेकिन जब हम स्वयं देखते है देश के कुछ नागरिकगण अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाहन निश्चित रूप से नहीं कर रहे है जैसा कि मीडिया भी दिखा  रहा है।  इस कारण से सम्पूर्ण जनता को भुगतना पड रहा है और आगे भी पड सकता है । इसलिये प्रधान मंत्री की यह चेतावनी हमारी स्वयं की कार्य पघ्दति को देखते हुये सामान्य स्थिति लाने के लिये समायोचित ही है । 
एक बात इस कोरोना से पुनः सिध्द होती है कि कोई भी व्यक्ति या चीज पूर्ण नहीं होता है । कोरोना एक बुरे भयानक सपने के रूप में हमारे आखों के भीतर समा गया हेै । लेकिन इसके बावजूद इस भयंकर बुरी बीमारी से भी कई फायदे भी हमारे देश को हुये है। जैसे पेट्रोलियम उत्पाद के मूल्यों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में आई भारी गिरावट के कारण व उसके  उपभोग में कमी के कारण उसकी खपत कम हुई है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हुई है । वाहनों के आवागमन की कमी के कारण वायु प्रदुषण में कमी के साथ-साथ सडक दुर्घटनाओं में कमी व उससे मरने वालों की संख्या में भी काफी कमी हुई है । जानवरों, पक्षियों को ज्यादा खूला स्वच्छ वातावरण मिला हैं । कार्बन आक्साईड में कमी, औधेागिक कचरे में कमी पारिवारिक संबंधों में प्रगढता व जीवन का आनन्द, बिजली,पानी की बचत सहित ‘‘ स्वच्छ भारत अभियान‘‘ को भी मजबूती मिली है । 
ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति में भी गुण दोष होते है । व्यक्तित्व पूर्ण रूप से कभी  गुणात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। यही सिध्दांत मोदी जी पर भी लागू होता है जिस कारण प्रारम्भ में समय पर आवश्यक कदम उठाने में महत्वपूर्ण चूक होने से उत्पन्न परिस्थितियों को निपटने के लिसे उन्हें समस्त आवश्यक कदम तेजी से उठाकर उक्त चूक के दुष्परिणाम को नियंत्रित किया है । वैसे हमारे देश में पूर्व में गांधी जी, नेहरू जी जेसे महान व्यक्तियों ने भी एतिहासिक भूले की है ।                 
अंत मे सरकार को कोरोना समाप्त करने के लिये उठाये जाने वाले कदमों के साथ इस बात पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि यदि सरकार ने कोरोना बीमारी के साथ साथ (बाद में नहीं) हो रही आर्थिक बदहवासी की नाकेबंदी नही की तो इसके  दुष्परिणाम जो तुरंत दिखाई न देकर चार छैः महीने बाद दिखेगें तब इस आर्थिक मंदी ब्रेक डाउन से उत्पन्न बेराजगारी, भुखमरी मानसिक तनाव व इन सबके कारण खराब होने वाली कानून  व्यवस्था के कारण ज्यादा जाने (जीवन) समाप्त होने की आशंकायें उत्पन्न हो सकती है । तब भी सरकार का जान है तो जहान है सिध्दात का उदेश्य असफल ही हो जायेगा ।
वैसे सरकार सहित हम सब नागरिकों को दक्षिण कोरिया से सबक लेने की आवश्यकता है जहां पर लाॅक डाउन किये बिना न केवल कोरोना को नियंत्रित किया गया बल्कि देश में कल आम चुनाव सम्पन्न कर पिछले 28 साल के इतिहास से सर्वाधिक वोट 62.96 प्रतिशत डाले गये जो समस्त विश्व के लिये एक दिशा ही नहीं चुनौती भी है ।

‘‘क्या देश धातक स्वास्थ्य बीमारी कोरोना से चल कर ‘‘आर्थिक कोरोना‘‘ की ओर तो नहीं बढ रहा है‘‘?

देश में लाॅक डाउन हुये 19 दिन व्यतीत हो चुके है । अभी भी हम देश में कोरोना मरीजों की संख्या को कम नही कर पाये है,  बल्कि उसमें तेजी से वृध्दि ही हो रही है (लाॅकडाउन के पूर्व की अवधि की तुलना में) । इसके कई कारण हो सकते है । एक तो लाकडाउन जिसे 100 प्रतिशत लागू किये जाना चाहिये था वह कही पर प्रशासन  और कही पर नागरिकों की असावधानी व गैर जिम्मेदार व्यव्हार के कारण लागू होने में कमी हुई है । इस दिशा में 99 प्रतिशत प्रयास भी हमें सफलता नहीं दिला पायेगें। क्योंकि एक सक्रमित व्यक्ति भी लाकडाउन का उल्लघन करता है तो वह चेन के रूप में 600 से उपर आदमियों को सक्रमणित कर सकता है क्योंकि उसका टेस्ट नही हूआ है । अतः स्वयं वह एक सक्रमित व्यक्ति हो सकता है । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि पूर्व में टेस्टिंग बहुत कम हो रही थी । 10 दिवस पूर्व तक टेस्टिंग मात्र 44000 के आसपास हुई थी।  जो अब तक कूल संख्या 20000 से उपर की हो गई  है । इस कारण से भी कोरोना के प्रकरण ज्यादा सामने आ रहे है । अतः ऐसी स्थिति में कोरोना (कोविड19) को रोकने के लिये सम्पूर्ण देष मंे लाॅकडाउन बढाया जाना क्या आर्थिक कोरोना वायरस को जन्म तो नही देगा, यह एक बडा चिंतनीय विचारणीय प्रश्न हेै ?  देश को कोरोना के गडढे से निकालने के लिये किये गये प्रयासों से उतपन्न आर्थिक अर्थव्यवस्था को संकंट में डालकर उसे कमजोर करके क्या हम एक दूसरे सकंट के लिये गडडा तो नहीं खोद रहे हेै,  इसका सबसे बडा कारण प्रारम्भ से ही केन्द्रीय व राज्य सरकार ने ‘‘कोरोना बीमारी‘‘ को ध्यान मंे रखकर बीमारी के रोकथाम के लिये ‘‘सिर्फ‘‘ (एक्लूजीव) के बजाए प्रथम प्राथमिकता दे कर कार्य करतें व साथ में आर्थिक प्रभाव को ध्यान में रखते हुये स्वास्थ्य व आर्थिक दोनों दुष्टि से संयुक्त कदम उठाये गये होते तो आर्थिक अर्थव्यवस्था के बादल की आंशका नहीं आती, जैसा कि आज प्रधान मंत्री जी ने स्वयं स्वीकार किया है । अतः आज सरकार को कोरोना को रोकने के लिए उठाये गये समस्त आवश्यक कदमों के साथ साथ इस बात पर भी विचार करना होगा कि वे कदम इस तरह से उठाये जाये जिससे अर्थव्यवस्था पर कम से कम विपरीत प्रभाव पडें । यह तभी सम्भव है जब हम इस आर्थिक पहलु को ध्यान में रखते हुये स्वास्थ बीमारी के संबंध में आवश्यक कदम उठायेगें । यदि सरकार प्रथम दिन से ही पूरे देश में नाॅका बंदी लागू ना कर सिर्फ उन जिलों मेंु ही लाॅकबंदी लागू करती जहां कोरोना के प्रकरण पाये गये है, तथा वहां करफयू लागू कर उसे कठोरता से पालन करवाया जाता तो वहां पर आवष्यक रूप से निर्माण से लेकर उत्पादन की विभिन्न उत्पादक एक्टिविटीज चलती रहें व देश को आर्थिक स्थिति को गर्त में जाने से रोका जा सकता है ।                     अतः अब सरकार को 14 अप्रैल 2020 के बाद नागरिकों को जीवन व आर्थिक बरबादी दोनों से बचने के लिये पूरे देश में लाॅकबंदी को बढाया जाना उचित कदम नहीं होगा वह एक मात्र सार्थक कदम यह होगा कि जब सरकार पूरे देश में जहां कहीं भी कोरोना के मरीज पाये गये है  उसके आस पास के क्षेत्र को हाॅटस्पाॅट घोषित कर वहां करफयू घोषित कर दिया जावें व शेष भारत कांे लाकडाउन से मुक्त कर देना चाहिये अर्थात प्रत्येक कोरोना मुक्त जिला (728 जिले में से 354 जिले) को घर परिवार मान कर एक इकाई घोषित कर लाकडाउन से मुक्त कर देना चाहिये ताकि निर्माण एवं उत्पादन की गतिविधियां, ट्रासपोर्टेशन इत्यादि पर प्रभावी नियंत्रण के साथ प्रारम्भ हो सकें और देश के नागरिकांे को सरकार के इस नियत्रण को प्र्रभावी बनाने के लिये पूर्ण सक्रिय सहयोग देना चाहिये, तभी हम इस बीमारी से आर्थिक संकट से कम प्रभावित होते हुये सफलता पूर्वक कम समय में मुक्ती पा सकते है। सरकार को लाकडाउन पर विचार करते समय इस बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये कि असंगठित क्षेत्र कंे देश के 40 करोढ में से लगभग आधे 20 करोढ तिहाडी मजदूर,हाथ ठेला चालक,रिक्शा चालक जिनका रारकार की किसी भी योजना में पंजीयन नहंी है वह सरकारी सहायता पाने से वंचित रहेगा साथ ही सरकारी सहायता हितधारियों में कितने प्रतिशत तक पहुचती है, इसके प्रतिशत के आकडे लिखने की आवश्यकता नहीं है । अतः ऐसे लोगों के जीवन यापन पर तो गैर सरकारी सहायता समूहों का भी ध्यान नहीं जाता है । अतः इस प्रकार के लोगों का जीवन बचाने के लिये अनुशासित रूप से लाॅकडाउन का समाप्त किया जानाआवश्यक  है ।

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