बुधवार, 19 सितंबर 2012

‘मंजिल एक’ लेकिन रास्ते अलग-अलग!


अन्ना की साहसपूर्ण स्वीकारोक्ति! एक सही कदम!
राजीव खण्डेलवाल:
अंततः अन्ना हजारे ने पिछले लगभग डेढ़ वर्षो से भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनलोकपाल बिल के लिये चले आ रहे आंदोलन के सम्बंध में राजनैतिक पार्टी बनाने के मुद्दे पर आंदोलन के दो धड़ो में सीधे विभाजन की सीमा तक मतभेद को स्वीकार कर लिया है। यह आंदोलन दो धड़ो में बट गया है यह अप्रिय वास्तविकता है। आपको याद होगा जब अन्ना ने अपना आंदोलन समाप्त किया था तब उन्होने मंच से यह घोषणा की थी कि अब राजनैतिक विकल्प के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचा है। इसलिए नई राजनैतिक पार्टी बनाना होगा। वास्तव में यदि आंदोलन के इतिहास पर नजर डाले तो अन्ना शुरू से ही आंदोलन के राजनीतिकरण के खिलाफ में रहे है। जबकि अरंविद केजरीवाल ‘आंदोलन’ को वर्तमान समस्त राजनैतिक पार्टियों से दूर रखते हुए नये राजनैतिक धरातल को ढूंढते रहे। इसलिए हिसार से लेकर उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावो में भाग लेने की जो घोषणा अन्ना टीम द्वारा की गई थी, के मुख्य पोषक वास्तव में अरविंद केजरीवाल ही थे, अन्ना नही। लेकिन टीम की एकता की खातिर अन्ना ने हमेशा निर्णयो पर मुहर ही लगाई। यह बात अन्ना के उद्बोधन में उनके चेहरे पर उत्पन्न पीड़ा भाव से देखी जा सकती थी, समझी जा सकती थी। इसे समय-समय पर मीडिया ने भी इंगित किया था। केजरीवाल ने आंदोलन के द्धितीय चरण की समाप्ति के समय एक टीवी चैनल द्वारा किये गये सर्वे के आधार पर यह घोषणा की थी की लगभग 96 प्रतिशत (लगभग 410000) लोगो ने नई राजनैतिक विकल्प बनाने के लिए समर्थन दिया है। अब नई राजनैतिक पार्टी बनाने के लिये जो सर्वे के आकड़े इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के बेनर तले जारी किये गये है उसमें यह प्रतिशत लगभग 76 प्रतिशत रह गया। इससे यह सिद्ध होता है कि  अन्ना टीम द्वारा स्वयं के द्वारा किये गये आकलन में ही जनता का राजनैतिक पार्टी बनाने के प्रति वह समर्थन नहीं है जैसा कि अन्ना टीम दावा कर रही है। शायद इसी वास्तविकता को भॉपकर अंततः अन्ना ने अपनी आत्मा की आवाज को सुनकर वर्तमान राजनैतिक परिवेश को देखते हुए सीधे राजनीति में न जाने जो एक सही निर्णय लिया है उसकी न केवल प्रशंसा की जानी चाहिए बल्कि वह वंदनीय भी है क्योंकि राजनीति के ‘आकर्षण’ से बाबा रामदेव जैसे व्यक्तित्व भी अपने आपको दूर नहीं रख पाये।
                    अन्ना जैसा व्यक्तित्व जो शुरू से ही पुर्णतः गैर राजनैतिक रहा हो के अन्ना टीम बनने के बाद से अन्ना टीम के निर्णयों पर केजरीवाल के प्रभाव दबाव की छाप साफ लोगो को नजर आ रही थी। वह इसलिए कि जिस तरह के निर्णय लिये जाते रहे वे पूर्ण रूप से अन्ना के व्यक्तित्व, विचारो और कृति से मेल नहीं खाते थे। लेकिन आंदोलन के अस्तित्व की रक्षा और उद्धेश्य की प्राप्ति के लिए उसे वृहद रूप बनाने के लिए शायद अन्ना ने आंशिक रूप से ही सही समय समय पर लिये गये निर्णयों को अंगीकार किया।
                      अन्ना का केजरीवाल के द्वारा राजनैतिक पार्टी बनाने के संबंध में उठाये जा रहे कदम के संबंध में यह कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार व जनलोकपाल के मुद्दे पर मंजिल एक है, रास्ते अलग-अलग है। देश की कोई भी राजनैतिक पार्टी संस्था या व्यक्ति इससे असहमत नहीं हो सकता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति सिद्धांतः भ्रष्टाचार के विरूद्ध होकर उससे लड़ना चाहता है। लेकिन प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि क्या विभिन्न रास्ते अपनाकर ‘मंजिल’ पाई जा सकती है या ‘मंजिल’ पाने के लिये एक ही रास्ता तय करना चाहिए। यदि हॉं तो वह सर्वमान्य सफल एक ही रास्ता कौन सा हो सकता है इसका उत्तर ही भविष्य की देश की राजनैतिक दिशा-दशा को तय करेगा। 
                      अन्ना का यह कथन भी सैद्धांतिक रूप से बिल्कुल सही है कि राजनीति मंे सही अच्छे चरित्र वाले ईमानदार स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति को ही जनता चुने। लेकिन इसे व्यवहारिक रूप कैसे दिया जा सकता है पेंच यही पर है। बगैर राजनैतिक पार्टी बनाये यदि स्वच्छ ईमानदार व्यक्ति बताने वाला कोई फार्मुला अन्ना सुझा पाये जो सबको समझ आकर राजनीति के सफल होने का सूचक बन जाये तो शायद केजरीवाल भी राजनैतिक पार्टी बनाने का इरादा छोड़ सकते है। तब यह अन्ना आंदोलन विभाजन से टूटने के कगार से बच जायेगा। केजरीवाल को इस तथ्य को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि 125 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले देश में जहां लगभग 75 करोड़ से अधिक वोटरों के सामने 6 राष्ट्रीय 23 क्षेत्रीय मान्यता प्राप्त सहित 1308 गैर मान्यताप्राप्त राजनैतिक पंजीयत पार्टिया और हजारो गैर पंजीयत पार्टिया हो वहा मात्र 737041 मतदाताओं की भागीदारी के आधार पर जिसमें से 561701 (76 फीसदी) समर्थन को देश की दिशा कहना व समर्थन मानना एक आत्मघाती भूल होगी। अतः या तो सर्वे और व्यापक हो जिसमें कम से कम 25 प्रतिशत वोटरो की भागीदारी तो हों क्योंकि आम चुनाओं में लगभग 50 से 65 प्रतिशत लोग भागीदारी करते है। इसलिए यदि आधे से अधिक लोगो का अपना मत व्यक्त किसी भी विषय पर निर्णय हेतु व्यक्त करना आवश्यक होगा यदि हम देश की वास्तविक नब्ज को काश्मीर से कन्याकुमारी तक पहचानना चाहते है दिशा जानना चाहते है और तदानुसार कार्य करना चाहते है। अन्यथा आज जनता के बीच वर्तमान राजनैतिक पार्टियों ने जो अपना विश्वास लगभग पूर्णतः खोया है उसका विकल्प सिर्फ दूसरा राजनैतिक दल ही हो सकता है? क्या गैर राजनैतिक नहीं हो सकता? यह ‘यछ’ प्रश्न है जिसका समाधान यदि अन्ना ने कर दिया तो सच मानिये वे एक युग पुरूष सिद्ध होंगे।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

सोमवार, 10 सितंबर 2012

ओंकारेश्वर बांध पर जल समाधी आंदोलन की ऐतिहासिक सफलता

Photo from: http://www.bhaskar.com
राजीव खण्डेलवाल:

               विगत 17 दिनो से चला आ रहा ओंकारेश्वर बांध (इंदिरा सागर बांध) पर घोघल गांव के मात्र 51 ग्राम निवासियों की जल समाधी सत्याग्रह हर तरह से एक ऐतिहासिक छाप छोड़ गया। इंदिरा सागर डेम को 260 मीटर के ऊपर पानी भरने से डूब क्षेत्र में आये 29 गांव हैं जहां के खेत, घर, आबादी और रास्ते पानी से घिर रहे हैं। सम्बंधित गांवो के लोग उनके पुनर्वास की व्यवस्था किये बगैर डेम का जल स्तर बढ़ाने का घोर विरोध कर रहे थे।
वास्तव में आंदोलनो के इतिहास मे जल समाधी का इस तरह का यह शायद पहला आंदोलन हुआ है जहां 17 दिन तक लगातार नदी में आंदोलनकारी लोग लगभग पानी में डूबे रहे जिससे उनके शरीर गलने लग गया थे। ऐसा आंदोलन शायद ही पूर्व में कही देखने को मिला हो। दूसरा इस आंदोलन में कोई भी नामचीन व्यक्ति सीधा नहीं जुड़ा था। यद्यपि इस आंदोलन के मुद्दे पर पूर्व मे नामचीन नेत्री मेघा पाटकर शामिल हुई थी। यह आंदोलन इस मामले में भी ऐतिहासिक रहा कि यह नेतृत्व विहीन था जिसका कोई नेता नही था बल्कि समस्त भागीदारी आंदोलनकर्ता वास्तविक ‘नेता’ बने। हाल के आंदोलनो में चेहरा बने तथाकथित स्वयंसिद्ध बुद्धिजीवियों के चेहरो का भी इस आंदोलन में नितांत अभाव था जो इस आंदोलन को वास्तव में शुद्ध रूप से भारत के ग्रामींण परिवेश को पहचान को स्थापित करता है। वृद्ध ग्रामीण महिलाओं की बराबरी की भूंमिका ने भी इस आंदोलन को ऐतिहासिक बनाया। इस आंदोलन ने प्रथम बार यह सिद्ध किया कि राजनैतिक प्रभाव पैदा किये बिना भी आंदोलन सफल हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह प्रथम सफल पूर्णतः गैरराजनैतिक आंदोलन सिद्ध हुआ।
मात्र 51 ग्रामवासियो के आंदोलन ने इतना दृढ़-नैतिक दबाव सरकार पर बना कि सरकार को आंदोलनकारियों की लगभग सभी मांगे अंततः माननी पड़ी जिसमें सबसे मुख्य मांग बांध की उंचाई 189 मीटर तक सीमित करना भी शामिल है। बांध की उंचाई के लिए मेघा पाटकर काफी समय से लम्बी लड़ाई लड़ रही है। अन्ना और बाबा के बड़े जन-आंदोलन के अंततः परिणाम रहित और दिशा भटकने वाले आंदोलन (गैर राजनैतिक से राजनैतिक) होने के बाद यह महसूस किया जाने लगा था कि इस देश में भविष्य में शायद ही कोई जन-आंदोलन उठ पाये। जनता की मूलभूत आवश्यक समस्याएं हल करने का वैधानिक एवं संवैधानिक दायित्व चुनी हुई सरकार का होता है जिसे सरकार जब अनसुनी कर देती है तब उसका कोई निराकरण शायद ही कोई आंदोलन से हो पाए ऐसी धारणा अन्ना आंदोलन के असफल होने के कारण बलवती होती जा रही थी। इस ‘जल आंदोलन’ ने यह उत्पन्न होते मिथक को गलत सिद्ध कर दिया है कि आंदोलन के लिए बहुत ‘मुंडियों’ की आवश्यकता होती है। वास्तव में कुछ ‘मुंडिया’ ही यदि निस्वार्थ बिना किसी प्रचार के लिए आडम्बरहीन होकर अपने कानूनी और सामाजिक हक के लिए लड़ते है तो अंततः वे अपनी ओर वृहत समाज, मीडिया और सरकार का ध्यान सफलता पूर्वक खीच लेते है जिसके परिणाम भी अंततः सकारात्मक आते है जो उक्त आंदोलन ने सिद्ध किया है। इसलिए ऐसे दृढ़ निश्चयी अपने शरीर को गलाकर कुछ प्राप्ति करने के आशा में लगे निमाड़ की भूमिं के उन जाबाज सत्याग्राहियों को मेरा साष्टांग नमन्। ऐसे सत्याग्राहियों का राष्ट्रीय सम्मान भी किया जाना चाहिए।
देश ही नहीं, समस्त जन आंदोलनकर्ता जल सत्यागाहियो से न केवल प्रेरणा ले बल्कि भविष्य में यदि वे भी देश की, समाज की समस्याओं के लिए आंदोलित होंगे तो उन्हे भी वैसी ही सफलता प्राप्त होगी यह विश्वास करें बशर्ते वही दृढ़, निस्वार्थ, प्रचार रहित, दृढ़ इच्छा शक्ति हो?
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