बुधवार, 28 जनवरी 2015

क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव राष्ट्रीय आम चुनाव है ?

दिल्ली विधानसभा के चुनाव 07.02.2015 तारीख को सम्पन्न होने जा रहे है। न तो यह दिल्ली विधानसभा का पहेला चुनाव है, और न ही यह आम राष्ट्रीय चुनाव है। लेकिन जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा इस चुनाव को हाईलाईट किया जा रहा है वह किसी भी आम राष्ट्रीय चुनाव से भी ज्यादा है। विधानसभा बनने के पूर्व दिल्ली मेट्रोपोलियन काउन्सिल थी और उसके सदस्य मेट्रोपोलियन काउन्सिलर कहलाते थे। उनका स्टेटस एक ''पार्षद'' से कुछ ज्यादा लेकिन ''विधायक'' से बहुत कम हुआ करता था। दिल्ली एक पूर्ण राज्य भी नहीं है। अधिकार की दृष्टी से यदि उसकी तुलना एक छोटे से राज्य गोवा, असम इत्यादि राज्यो से भी की जाए तो भी उसके अधिकार तुलनात्मक रूप से काफी कम है।
यद्यपि यह बात सत्य है ''दिल्ली'' देश की राजधानी होने के कारण उसका अलग महत्व है। वैसे ही ''मुम्बई'' जो देश की आर्थिक राजधानी कही जाती है का महत्व है। अधिक से अधिक दिल्ली का महत्व मुम्बई से कुछ ज्यादा ही कहा जा सकता है। लेकिन देश की मीडिया ने जिस तरह से दिल्ली विधानसभा के चुनाव को ''हाईलाईट'' कर ''जगह'' (स्पेस) दिया है। वह निश्चित रूप से आश्चर्यचकित करने वाली है। यह मीडिया की साख पर एक प्रश्न वाचक चिन्ह भी लगाती है। मीडिया का जो प्रथम व प्राथमिक दायित्व है वह जनता की विभिन्न ज्वलन्त होती समस्याओं को जनता और सम्बंधित पक्षो के सामने लाना है। उन पर एक स्वस्थ बहस करवाकर सबंधित पक्षो का ध्यान आकर्षित कर उन समस्याओ को सुलझाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना है। लेकिन जिस तरह से जब से दिल्ली विधानसभा के चुनाव की घोषणा हुई है, तब से लेकर अभी तक व मतदान के होने के दिन तक होने वाली लगातार बहस का क्या औचित्य है ? क्या यह जनता के मूल्यवान समय की बरबादी नहीं है ? क्योकि जनता को तो जो परोसा जाता है उसे देखने के लिये वह मजबूर है। क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव देश की सेहद व स्वास्थय् के लिए इतने महत्वपुर्ण है कि उन्हे 24 घंटे 24 दिन लगातार परोसा जाये ? इसके कुछ समय पूर्व हाल ही मे हुए चार विधानसभाआंे के चुनाव को भी मीडिया ने इतनी ''जगह'' व महत्व नहीं दिया। क्या देश के प्रधानमंत्री का (भारतीय जनता पार्टी के नेता के रूप मे नही) दिल्ली जैसे छोटे से राज्य के चुनाव में चार-पॉच चुनावी सभाओ मे भाषण देने की योजना बनाना उनके देश मे बढ़ते हुये स्टेटस को देखते हुये क्या उचित है ? यद्यपि राजनैतिक रूप से प्रधानमंत्री को पूर्ण रूप से यह अधिकार है कि वह अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए अपनी पार्टी के नेता के रूप मे जितनी चाहे भागीदारी करे।
अतः यह स्पष्ट है कि मीडिया हाऊस मे इलेक्ट्रानिक मीडिया की इतनी ज्यादा संख्या हो गई है कि हुए परस्पर गलाकाटू प्रतिस्पर्धा के कारण वे ''सबसे पहले व सबसे आगे कौन'' की प्रतिस्पर्धा भावना के कारण वे हर उस घटना -दुर्घटना, राजनैतिक परिस्थितिओ का आकलन इत्यादि विभिन्न विषयो को लेकर उनकी सूचनात्मक व गुणात्मक जानकारी देने के बजाऐ वे उसे इतना महिमा मंडित कर रह है जिस कारण वे उस कृत्य मे पूर्णतः असफल रहे है कि किस घटना, किस समाचार को कितना महत्व दिया जाए। मीडिया को अमेरिका के मीडिया से इस बात से सीख लेनी चाहिये कि अमेरिका मीडिया ने बराक ओबामा की भारत यात्रा व नरेन्द्र मोदी की हाल में हुई अमेरिका यात्रा को कितना कवरेज दिया है।
भीड़-तंत्र के इस युग मे भेड़िया़-घसान चलने वालो के समान ही मीडिया भी वही काम कर रहा है जिस पर लोकतंत्र के प्रहारियो को गहनता से विचार कर मीडिया को दिशा दिखाने के लिये सार्थक पहल करनी चाहिये। 

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

66 वॉ गणतंत्र दिवस नया संदेश लेकर आया है।

  •               गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को हर वर्ष आता है। यद्यपि वर्ष-दर-वर्ष समय व्यतीत होने के कारण  राष्ट्र प्रत्येक गणतंत्र दिवस पर पिछले गणतंत्र दिवस की तुलना में कुछ न कुछ विकास की ऊॅंचाई को प्राप्त अवश्य करता है। लेकिन इस वर्ष का गणतंत्र दिवस कुछ नई ऊॅचाईयों को लेकर आया है। आखिरकार कल से पूरे मीडिया में ''बराक ओबामा'' व ''भारतीय गणतंत्र दिवस'' ही छाया हुआ है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री हमारे गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने आया है। लेकिन बात ''बराक ओबामा'' की कुछ अलग ही है। सोवियत संघ के टूटने के बाद विश्व में सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली व मजबूत लोकतंत्र देश के रूप में स्थापित युनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के राष्ट्रपति ''बराक ओबामा'' के भारतीय गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने पर उनका हार्दिक स्वागत है। यह गणतंत्र दिवस इस मायने में इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्व के इस सबसे ताकतवर व्यक्ति ने विश्व का सबसे बडा़ लोकतांत्रिक देश भारत की बढ़ती हुई विश्व शाक्ति की पहचान को गणतंत्र दिवस में शामिल होकर अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दी है। इसके लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साधूवाद के पात्र है जिन्होंने राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपने 8 महिने के कार्यकाल में 6 मुलाकातें कर एक व्यक्तिगत सम्बंध स्थापित कर भारत को अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर एक विकसित देश की ओर अग्रेषित राष्ट्र के रूप मे पेश करने का सफल प्रयास किया है। इस गणतंत्र दिवस पर दोनों देशों के प्रमुखों ने स्थापित परम्पराओ को तोड़ा है। जहॉ बराक ओबामा की भारत आने की और गणतंत्र दिवस पर शामिल होने की तीव्र इच्छा ने उनके स्थापित पूर्व निर्धारित कार्यक्रम स्टेट अॅाफ दा यूनियन को संबोधित करने के कार्यक्रम को 12 दिन पूर्व सम्पादित कर अमेरिका की स्थापित परम्परा को तोड़ा है। इस परम्परा के कारण ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिम्हाराव के निमंत्रण को तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन स्वीकार नहीं कर पाए थे। उसी प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री ने भी अभी तक की स्थापित परम्परा को तोड़कर भारत की धरती पर पहॅुचे ओबामा का हवाई अड्डे पर पहुच कर स्वागत किया। यह न केवल दोनो देश की एक-दूसरे के प्रति निकटता और सम्मान को प्रदर्शित करता है बल्कि दोनांे देशों प्रमुखों की व्यक्तिगत केमेस्ट्री को भी झलकाता है।
  • आईये जिस प्रकार उपरोक्त प्रोटोकाल दोनों देशों के प्रमुखों ने तोड़ा है। क्यों न इस देश के राजनैतिज्ञ आगे बढ़कर उनके ही द्वारा स्थापित इस गलत प्रोटोकाल को क्यों न तोड़ा जाए जहॉ हम एक व्यक्ति की आलोचना सिर्फ इस आधार पर करने लगते है कि वह हमारी विरोधी पार्टी में चला गया। इसके पूर्व वह जब हमारा साथी था तो हम उसके सिर्फ गुणगान करते नहीं थकते थे। किरण बेदी इसका ताजा उदाहरण है। जब तक वह अन्ना आन्दोलन की सदस्य रही कोई पार्टी  में शामिल नहीं हुई तब तक उनके साथ काम कर रहे केजरीवाल के लिये आदरणीय रही, लेकिन जैसे ही वे भाजपा में गई, दोनों का रूख एक-दूसरे के प्रति उलट गया। राजनीति की इस स्थापित परम्परा (लेकिन लिखित नहीं) को हमारे राजनेताओं ने ही विकसित किया है।आज के इस गणतंत्र दिवस पर हम दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा तोड़ी गई परम्पराओं का अनुकरण कर क्यों नहीं यह सीख लेते है कि क्यों नहीं हम एक व्यक्ति की आलोचना, समालोचना, प्रशंसा या निंदा उसके व्यक्तित्व और कार्यो के आधार पर करे। बजाय उसके किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े रहने के वजूद के आधार पर। यदि वास्तव में इस देश में गुण-दोषों के आधार पर राजनैतिक आलोचनाएं और मूल्यंाकन हो जाएगा तो निश्चित मानिये जो देश के विकास में सबसे बड़ा अड़ंगा इस राजनैतिक आलोचनाओं के कारण होता है, जहॉ हमारे पास अपने विरोधियों द्वारा किये गये अच्छे कार्यो के लिये बढ़ाई के लिये दो अच्छे शब्दों का अकाल भी पड़ जाता है, वह अड़ंगा दूर हो जायेगा।
  • यह गणतंत्र दिवस मुझे तो यही प्रेरणा देता है कि हमारे देश का राजनैतिक वातावरण इस स्थापित कु परम्पराओं की जंजीरों को तोडकर एक स्वच्छ विकासशील, एक-दूसरे के पक्षों के गुणों को सुशोभित करते हुए आगे बढ़े। 

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

नेशनल कांफ्रेस को बिना मंागे एकपक्षीय समर्थन को पी.डी.पी का स्पष्ट इनकार! साधुवाद!

                                                                                                                  
                            
                                                       
  • जम्मू-कश्मीर विधान सभा के हाल मे ही हुये चुनाव परिणाम मंे लगभग दिल्ली विधानसभा और कुछ-कुछ महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणामो  जैसी स्थिती उत्पन्न हुई है। किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। अंततः सरकार का गठन न हो पाने के कारण अस्थाई रूप से जम्मू-कश्मीर प्रांत में राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया है। दिल्ली में पिछले वर्ष हुये  विधानसभा के चुनाव मे भी इसी तरह की समान स्थिति थी। लेकिन वहा पर 'आप' पार्टी ने बिना मांगे, बिना औपचारिक रूप से समर्थन स्वीकार किये, कांग्रेस के द्वारा लिखित मे दिये गयेे एकपक्षीय सर्मथन के आधार पर, प्रारम्भिक हिच-किचाहट के बाद सरकार का गठन कर लिया था। कंाग्रेस पार्टी जो उस समय सता में थी के विरूद्व आप पार्टी चुनाव लड़ी थी, के परोक्ष सर्मथन  (''आप'' की नजर मे)ं लेकिन कांग्रेस की नजर में प्रत्यक्ष सर्मथन से सरकार का गठन हुआ था। लगभग सिध्दान्तहीन हो चुके राजनैतिक वातावरण में अभी भी कुछ सिध्दान्तो का झंडा लेकर चलने वाले झंडाबरदार, व उसकी दुहाई देने वाले तत्वो ने उस समय भी उक्त ''सरकार'' के गठन का सैध्दान्तिक विरोध किया था। अब फिर से वही समान स्थिति जम्मू-कश्मीर में हुये विधानसभा चुनाव के परिणाम से उत्पन्न हुई है। पी.डी.पी. ने बिना मांगे नेशनल कांफ्रेस के एक पक्षीय लिखित सर्मथन को एक दम सिरे से खारिज कर सिध्दान्तो की खंडहर् होती राजनीति कोे मजबूत करने के लिये एक बिरला सैध्दान्तिक कदम उठाया है। इसके लिए पी.डी.पी., जिसकी कई ''अन्य कारणो'' से आलोचना की जा सकती है, के बावजूद वह धन्यवाद व साधुवाद की पात्र है। इस अभिनव निर्णय के लिए उनकी पूर्ण रूप से पीठ थपथपायी जानी चाहिए। इसलिये कि पी.डी.पी.के ने़़तृत्व ने सरकार बनाने से स्पष्ट इनकार करते समय यह स्पष्ट रूख लिया कि वे उस कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार नहीं बना सकते है, जिसके विरूध चुनाव लड़कर उन्हे सबसे बड़ी पार्टी होने का जनादेश मिला है। सिद्वान्त का चोला पहनने का आडम्बर करने के बजाए राजनीति में सिध्दान्त को वास्तविक पुट देकर पी.डी.पी. ने अपने को उक्त ''आप'' पार्टी से ऊपर करके एवं अलग दिखने का प्रयास किया है।
  • इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश में वर्तमान मे मीडिया हाऊस जरा -जरा सी घटनाओ को ब्रेकिंग न्यूज मे दिखाकर दिन भर न्यूज चेनलो मे चलाते है। आम जनता को न दिखने वाली घटनाओ को मीडिया हाईलाईट कर ब्रेकिंग न्यूज बना देता है जिनका आम नागरिक ,समाजव देश के ''स्वास्थय्'' से कोई लेना देना नहीं होता है। (ओवेसी के बयानो को मीडिया में दी गई तरहीज से महसूस किया जा सकता है) लेकिन मीडिया ने आज के अंधकार में गुम हो गई राजनैतिक नैतिकता से दूर उक्त निर्णय से उत्पन्न हुई एक नैतिक व सिध्दांतो की हल्की सी बिजली की किरण को उजाला बनाने के बजाए उसे अंधकार मय बना दिया। अर्थात् इतनी बड़ी घटना को मीडिया ने न तो डिवेट बनाकर दिनभर चर्चा में रखा और न ही हाथो हाथ रखा। यह मीडिया की कमी व दोष अखरने वाली है। 
  • पूर्ण रूप से एक नैतिक व सिध्दान्तो के आंदोलन से पैदा हुई निरंतर सिध्दान्तो की दुहाई देने वाली ''आप'' पार्टी भी सत्ता के आकर्षण के आगे झुक गई व सरकार बनाने के लोश् को रोक नहीं पाई, जो पी.डी.पी.ने जम्मू-कश्मीर मे कर दिखाया। समस्त राजनैतिक पार्टीयॉ जो बात तो सिध्दंातो की करती है लेकिन सत्ता के स्वार्थ के आगे कथनी व करनी मे अन्तर पैदा कर सिध्दान्तहीन राजनीति का गठजोड़ करके सत्ता की कुंजी हथियाने का भरसक प्रयास करती है। उन समस्त राजनैतिक पार्टीयो को जम्मू-कश्मीर की उक्त राजनैतिक घटना से सबक सीखकर प्रेरणा लेकर श्विष्य में इसी संकल्प के साथ देश सेवा का संकल्प लेना चाहिए। तश्ी नैतिक राजनीति का पुनरोद्वार होगा। तभी देश में भी विकास की आशा का संचार होगा।
     


बुधवार, 14 जनवरी 2015

‘‘ध्यानचंद’’ पर ‘‘ध्यान’’‘चंद’ लोगो का कब जायेगा ?


  • पिछले कुछ समय से जब भी भारत में ''नोबेल'' पुरस्कार की घोषणा होती है तब- तब मेजर  ध्यानचंद का नाम 'सुर्खियो' मंे आने के बावजूद वास्तविक रूप नहीं ले पाता है। जब ''खेल'' मंे पहली बार सचिन तेंदूलकर को भारत रत्न दिया गया था तभी  यह विवाद का विषय था कि 'खेल' मे भी भारत रत्न दिया जा सकता है अथवा नहीं। इसके पूर्व किसी भी खिलाड़ी को भारत रत्न नहीं दिया गया था। सचिन तेंदुलकर को भी भारत रत्न दिये जाने की मांग खेल मंे उठी थी और तब नियम मंे संशोधन तक किये जाने की बात भी कही गई थी। यद्य्पि ध्यानचंद की परिस्थितियो और योगदान की तुलना किसी भी प्रकार कही भी कभी भी की ही नहीं जा सकती है। चॅूकि क्रिकेट का खेल एक ग्लेमर, भीड भाड़ व पैसे से भरा हुआ है और शायद शासन भी तेंदुलकर की लोकप्रियता का फायदा उठाना चाहता था, तेंदुलकर 'भारत रत्न' पा गये लेकिन ध्यानचंद इससे वंचित रह गये। अभी हाल में ही भारत सरकार द्वारा भारत रत्न माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं पंडित मदन मोहन मालवीय को दिया गया जिन पर कोई उॅगली नंही उठाई जा सकती, अपितु इसके लिए भारत सरकार को बंधाई दी जानी चाएिये। भारत सरकार एक वर्ष मंे अधिकतम् तीन लोगो को 'भारत रत्न' दे सकती है। लेकिन वर्ष 2014 के त्रि रत्नो में भी ध्यानचंद शामिल नहीं हैं। प्रश्न यह नहीं है कि ध्यानचंद को भारत रत्न इस वर्ष भी क्यो नहीं दिया गया ,बल्कि यह एक अनुत्तरित प्रश्न है। इसमें ध्यानचंद का क्या दोष है ? उनका कहीं यह दोष तो नहीं कि वे राजनीतिज्ञ नहीं है या उनकी आज राजनैतिक अपील नहीं है? मरणोप्रांत उनको पुरस्कार क्यों नहीं दिया जा सकता है? इन सब प्रश्नो का जवाब भारत सरकार को ही देना है। इतना तो तय है कि उनकी योग्यता को चार चॉद लगाने के लिए वे भारत रत्न के मोहताज नहीं है। बल्कि  भारत रत्न उन्हे इसलिए दिया जाना आवश्यक है ताकि कि भारत रत्न की महत्ता, प्रभुता व सर्वकालीन स्वीकरिता बनी रहे। अतः बार बार यही प्रश्न नागरिको के दिमाग में आता रहेगा कि आखिर कुछ 'चंद' लोगो का 'ध्यान' कब ''ध्यानचंद'' पर आयेगा क्योकि कुछ 'चंद' लोग ही तो यह निर्णय लेते है। इसी इंतजार में........!
 

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

‘पी’ ’के’ ‘‘आखिर कौन है? पीके’’

     लगभग दो महिने के अंतराल के बाद लेख लिख रहा हॅू । इसी बीच मुझे मोबाईल एवं फेसबुक के माध्यम से कहा गया कि मेरे लेख नहीं आ रहे है। कल एक व्यक्ति के फेसबुक के संदेश ने मुझे तुरंत लेख लिखने को प्रेरित किया। जब टी.वी. चेनलों पर ''पी के'' फिल्म पर विवाद को लेकर बहस की जा रही थी तब ही मेरे मन में एक इच्छा उत्पन्न हुई कि ''पी के'' फिल्म को देखकर ही उस पर प्रतिक्रिया -स्वरूप लेख लिखा जाना चाहिए। यद्यपि मेरा फिल्म देखना भी ''पी के'' फिल्म का बहिष्कार करने के निर्देश देने वालो लोगो के लिये उनका विरोध समान माना जा सकता है। लेकिन कई बार कड़वी सच्चाई जानने के लिए कड़वा घ्ूाट भी (यदि है?) पीना पड़ता है।
   फिल्म देखने के पश्चात् यह कहना मुश्किल हो गया है कि वास्तव मे ''पी के''(पिया...पागल..) कौन है? पूरी फिल्म में निर्माता निर्देशक ने प्रभावशाली रूप से अश्लील हुये बिना संकेतो में धर्म गुरूओं की कमियों की ओर इंगित करने का सार्थक प्रयास किया है। इस बात के लिए निर्देशक कीे प्रशंसा की जानी चाहिए कि 'धर्म' पर प्रश्न  उठ़ाते समय फिल्म के नायक  पर भी उन्होने आम लोगो द्वारा दिया गया नाम ''पी. के.'' देकर उसका भी मजाक उड़वाया क्योकि उनके नायक की हरकते या तर्क/कुर्तक  जो कुछ ऐसे थे कि भले ही वे किसी की नजर में सत्यता लिये हुये हो लेकिन इसके   बावजूद आम नागरिको के द्वारा मजाकिया लहजोै में लेने के कारण भी नायक को ''पी के'' नाम फिल्म मे दिया गया। इससे इस बात को बल मिलता है कि जिस आधार पर विभिन्न हिन्दुवादी संगठन द्वारा फिल्म का विरोध किया जा रहा है, उसे भी फिल्म में फिल्मी भीड़ जनता ने भी  मजाक ही माना है। तभी 'पी के' नाम दिया गया व जिसकी परिणीति ''पी के'' नाम में  हुई ,सिवाय अन्त में निर्देशक ने नायिका के पिता को धर्म का 'ड़र' एवं अन्ध विश्वास की सत्यता को स्वीकार कराकर धर्म की सत्यता पर सील लगाने का प्रयास किया है। 
   यहॉ प्रश्न दो उत्पन्न होते है। एक धर्म क्या डर एवं अन्धविश्वास  के कारण टिका हुआ हेै। यदि है तो दूसरा प्रश्न, क्या यह कथित दोष सिर्फ हिन्दू धर्म में ही है। यद्यपि फिल्म में समस्त धर्माे के प्रतीकों को दिखाया जाकर साम्प्रदयिक सद्भाव को कृत्रिम रूप से अहसास कराने का प्रयास किया गया। लेकिन जब धर्म की कमियों को इंगित करने का प्रश्न उत्पन्न हुआ तब निर्माता निर्देशक द्वारा सिर्फ हिन्दू धर्म के डर व अन्ध-विश्वास को ही  हिन्दू धर्म के पूज्य ईष्टों के माध्यम से फिल्म में दर्शाने का प्रयास किया गया। शायद आपत्ति का यही बिन्दु इसी अवस्था को लेकर है जो प्रत्येक हिन्दु  में होनी भी चाहिए। कोई भी हिन्दू कभी यह दावा नहीं करेगा कि हमारा धर्म  या बल्कि यह कहा जाय कि हिन्दू धर्म को चलाने वाले धार्मिक गुरू 'पूर्ण' है, उनमें कुछ भी धर्म  या बल्कि यह कहा जाय कि हिन्दू धर्म को चलाने वाले धार्मिक गुरू 'पूर्ण' है, उनमें कुछ भी कमियॉ नहीं है। यद्यपि ईश्वर पूर्ण है, जिसकी विभिन्न रूपो में हम हिन्दू पूजा करते है । लेकिन सिर्फ हिन्दू गुरूओं की कमी को ही इंगित करना व अन्य धर्म मुस्लिम ,सिख, जैन, ईसाई, बौध धर्म गुरूओ के पूज्य ईष्टो पर कोई प्रश्न न करना उनका सही मायने में हिन्दू धर्म के विरोध को ही प्रकट करता है। निर्माता-निदेशक ने उक्त फिल्म का निर्माण कर उसकी आलोचना करने का एक अवसर सांप्रदायिकता का रंग भरने का भी दे दिया। कुछ अतिवादी हिन्दू धार्मिक संगठन  इस आधार पर फिल्म का विरोध कर सकते है कि फिल्म के नायक आमिर खान के मुसलमान होने के कारण शायद उसके मुिस्लम धर्म पर टिप्पणी नहीं की गई। क्या मुस्लिम धर्म की कटृरता के कारण उसके विरोध होने की कटृरता के डर से व अन्य धर्म के प्रति उॅगली उठाने पर इसकी कड़ी आलोचना होने का डर के कारण निर्माता निर्देशक ने समान रूप से समस्त धर्मो के प्रति उॅगली उठाने का साहस नहीं दिखाया? क्या निर्माता का यह कहना तो नहीं है कि देश में बहुसंख्यक हिन्दूओं का है इसलिए उनके बहुसंख्यक होने के कारण ही बहुसंख्यक समाज पर टिप्पणी की गई है। यदि यही वास्तविक उद्देश्य है तो उन्हे जनता को इससे अवगत कराया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा दिखता नहीं है। यदि वह ऐसा नहीं करते है तो राष्ट्र में बहुसंख्यक हिन्दूवादी होने के बावजूद हमारा राष्ट्र जो धर्म निरपेक्ष है जहंॉ पर प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म में जीवन जीने का सेैंवेधानिक अधिकार है व प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म की रक्षा करने का भी मौलिक अधिकार है। इसमें धार्मिक ग्रन्थो या धार्मिक गुरूआंे के सम्मान पर यदि अवांछित प्रश्न लगाया जाता है जो इस उद्देश्य के साथ कि हिन्दू धर्म को अन्य धर्मो से नीचे दिखाया जाय तो वह निश्चित् रूप से असहनीय है। वैसे भी हमारा राष्ट्र विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर होने का प्रयास कर रहा है जिसके लिए वह विभिन्न आंतरिक व अन्तराष्ट्रीय समस्याआंे से जूझ रहा है। वहॉ पर इस तरह के एक पक्षीय धार्मिक मीमान्सा से धार्मिक उन्माद ही पैदा होगा, जो अंततः देश के विकास में बाधक होगा। फिल्म निर्माण करने के साथ देश के विकास मेेे फिल्म निर्माता का भी उतना ही योगदान व कर्तव्य राष्ट्र के प्रति है जितना कि अन्य नागरिको का। उक्त फिल्म का कुछ वर्ग। के द्वारा इस आधार पर समर्थन किया जा रहा है कि  प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर को मानने या न मानने का जन्म सिध्द् अधिकार प्राप्त है। वास्तव में उक्त आधार पर फिल्म या आलोचको ने कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया। प्रश्न मात्र इतना है कि सिर्फ यदि हिन्दूओं के भगवान नहीं है। उनके धर्म गुरू में कुछ कमियॉ है। जैसा कि फिल्म में दर्शाने का प्रयास किया गया है दूसरे धर्माे के बाबत् उक्त संबंध में क्या स्थिति है इस मुद्दे पर फिल्मकार चुप ही रहा जो उसके (दु)आशय का घोत्तक हेैै।    
    अन्त में उपरोक्त समस्त स्थिति के बावजूद हमें अपने अर्न्तमन की ओर देखते हुय अपने धर्म गुरूओं को देखना होगा, यह सोचना होगा कि हम जिन आराध्य भगवान की पूजा करते है नतमस्तक होते  है हमे उनके  व हमारे धर्म ग्रंथो द्वारा निर्देशित उद्देश्यों का हम कितना पालन करते है कितना कर्त्तव्य निभा रहे है, आज की यह घटना हमे यह सोचने पर भी मजबूर करेगी ऐसा मैं मानता हूॅ।लिखते लिखते यह समाचार मिला कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 'पी के' फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया है जबकि विभिन्न हिन्दूवादी संगठन एवं समाज के एक वर्ग द्वारा उक्त फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मॉंग की जा रही थी । इससे यह स्पष्ट होते जा रहा हे कि उक्त फिल्म भी राजनीति करते हुए राजनीति का शिकार हो गई है।     

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