शनिवार, 26 जुलाई 2014

जस्टिज मारकंडेय काटजू के खुलासे से उठते यक्ष प्रश्न?

​जस्टिज मारकंडेय काटजू के खुलासे से उठते यक्ष प्रश्न?

         
प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमेन व उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मारकंडेय काटजू ने हाल ही मे मद्रास हाइकेार्ट मे एक जज को पदेान्नत कर अतिरिक्त न्यायाधीश बनाने मे व उनके सेवा कार्यकाल को प्रथम एक वर्ष व बाद में पुनः दो वर्ष बढाने व अन्ततः स्थायी करने के मामले मे जो खुलासा किया है, उससे देश की न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के उच्चतम स्तर पर उंगली उठने लगी है।
भारत विश्व का सबसे बडा सफल लोकतांत्रिक देश है। यह लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, कार्यपलिका, विधायिका, एवं प्रेस के चार पहियों पर टिका है। देश के इतिहास मे यह शायद पहली बार हुआ है जब न्यायपालिका में पदस्थ रहे एक उच्च व्यक्ति ने लोकतंत्र के एक मजबूत स्तम्भ ''मीडिया'' के माध्यम से लोकतंत्र के अन्य तीनो महत्वपूर्ण स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका, एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर उपरोक्त खुलासा कर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया है, जो लोकतंत्र के लिये कहीं घातक सिद्ध न हो जाये ? चिन्ता का विषय यही है।
एक भ्रष्ट आचरण से आरोपित जज अशोक कुमार जिनके खिलाफ केन्द्रीय जॉंच ऐजेन्सी आई.बी. ने भ्रष्टाचार के सबूत दिये हो, उनको पदोन्नति देकर, न केवल मद्रास हाइकोर्ट का अतिरिक्त जज बनाया, बल्कि उन्हे एक्स्टेन्शन देकर स्थायी जज भी बना दिया गया। इसमें तत्कालीन अवधि से संबंधित देश के उच्चतम न्यायालय के तीन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशो सहित प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को जस्टिस काटजू ने आरोपित किया है। पी. एम. ओ. द्वारा कुछ दलित सांसदो द्वारा लिखे गये पत्र के आधार पर उक्त जज के बारे मे कार्यवाही करने बाबत कानून मंत्री को लिखा गया पत्र, शायद जस्टिस काटजू के आरोप की पुष्टि ही करता है।
अब यहां सबसे बडा प्रश्न जो उत्पन्न होता है वह यह कि क्या इस खुलासे से उच्चतम न्यायालय के सर्वोच्च व्यक्ति की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर आंच नही आ गई है ? साथ ही विधायिका के सर्वोच्च प्रभावशाली व्यक्ति तत्कालीन प्रधानमंत्री की प्रसिद्ध ईमानदारी भी शक के घेरे मे नही आ गई है ?
उच्चतम न्यायालय का ंपांच सदस्यीय कॉलेजियम जिसके प्रमुख मुखिया मुख्य न्यायाधीश होते है तथा उच्च एवं उच्चतम न्यायलय में न्यायाधीशो की नियुक्ति इस कॉलेजियम द्वारा ही की जाती है। ऐसी स्थिति मे एक आरोपित भ्रष्ट जज जिसके खिलाफ केन्द्रीय खुफिया एजेन्सी आई.बी. ने सबूत प्रस्तुत किये हों, को इस आधार पर कि वह दलित वर्ग से है व तमिलनाडू की तत्कालीन सत्तारूढ पार्टी की ''इच्छा'' का प्रतीक है, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करने के बजाय प्रधानमंत्री के दबाव मे आकर उन्हे पहले एक वर्ष तथा पुनः देा वर्ष एक्स्टेंशन देने के दोषी क्या अन्ततः उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश नही माने जावेगे? जैसा कि जस्टिस काटजू ने आरोपित किया है।
यदि जस्टिस काटजू की बात सही है तो उनके खुलासे से देश के आम नागरिक के बीच क्या यह संदेश नहीं जायेगा कि कार्यपालिका व विधायिका, उच्चतम न्यायालय पर अपने प्रभाव का दबाव डालकर, न्यायालय के किसी भी क्षेत्र को किसी भी सीमा तक प्रभावित कर सकती है ? इस आशंका के बादल का छटनॉ न्यायपालिका की निष्पक्षता बने रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
बात तत्कालीन प्रधानमंत्री डां. मनमोहन सिंह की ईमानदारी की भी कर ली जावे। ईमानदारी का यह मतलब कदापि नही है कि आर्थिक लेनदेन को ही भ्रष्टाचार कहा जाय। जो व्यक्ति कानून,अपने सिद्धांतो, नैतिक मूल्यो, नियम व प्रचलित नियमो (कस्टमरी कानून) के विरूद्ध कार्य करता है, वह भी भ्रष्ट आचरण का अपराधी है। उक्त मामले मे डां. मनमोहन सिंह, ने अपने राजनैतिक हित साधने हेतु (शायद सरकार बचाने के लिए डी. एम. क.े के दबाव में आकर) एक आरोपित भ्रष्ट जज, जिसके खिलाफ आई. बी. के द्वारा भष्ट्राचार के सबूत प्रस्तुत किये जाने के बावजूद कानून मंत्री को उस व्यक्ति के हितार्थ कार्यवाही करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यलय द्वारा पत्र लिखने से निश्चित रूप से मनमोहन सिंह भी व्यक्तिगत दबाव द्वारा गलत फायदा देने के आरोप से मुक्त नही हो सकते है।
देश की न्यायपालिका व कार्यपालिका के सर्वोच्च स्तर पर यदि उनकी स्वतंत्रता व निष्पक्षता, संदिग्ध है? तो देश की सम्पूर्ण व्यवस्था का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना मात्र ही की जा सकती है।

   (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

         

बुधवार, 16 जुलाई 2014

‘‘वेद प्रताप वैदिक’’ की ‘‘हाफिज सईद’’ से हुई मुलाकात से उत्पन्न यक्ष प्रश्न ?

  ''वेद प्रताप वैदिक'' की ''हाफिज सईद'' से हुई मुलाकात से उत्पन्न यक्ष प्रश्न?
                                                                                                                                     राजीव खण्डेलवाल               

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             देश के राष्ट्रीय चैनलो और राजनैतिक हलको में उक्त मुलाकात न केवल तीव्र चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि उसके औचित्य पर लगातार प्रश्न उठाए जा रहे है। कुछ क्षेत्रो में तो उक्त मुलाकात पर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वंतत्रता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता व खोज पत्रकारिता के      अधिकार के आधार पर मौन धारण कर लिया है। क्या यह मुलाकात उनके पत्रकार/खोजी पत्रकार की हैसियत से है, क्या भारत सरकार के अघोषित दूत के रूप में है, या सामान्य नागरिक की हैसियत से है? यह सत्यता जानना जरूरी है।
            इस बात से वेद प्रताप वैदिक और भारत सरकार दोनो ने साफ इंकार किया है कि   ''उन्हे'' ''सरकार'' ने  भेजा था। प्रश्न यह है कि मीडिया और विपक्षी दलो खासकर कांग्रेस, द्वारा इस मुलाकात पर क्यो इतना हाय तौबा मचायी जा रही है ? मुम्बई बम कांड व अन्य आतंकवादी घटनाओ का घोषित फरार अपराधी भारत का  दुश्मन नं. एक, दुनिया के चार सबसे बडे आतंकवादियो में से एक  हाफिज सईद से भारत के किसी पत्रकार की मुलाकात  इस तरह की यह पहली घटना नही है। इसके पूर्व भी संसद पर हमला करने वाले कुख्यात आंतकवादी अफजल गुरू, अर्न्तराष्ट्रीय आंतकवादी दाउद इब्राहिम, मुंबई बम कांड का अपराधी आतंकवादी कसाब व मास्टर माइंड अबू सलेम, लिट्टे के प्रभाकरण, तमिलनाडू के कुख्यात  चंदन तस्कर वीरप्पन,नक्सलवादी समेत अनेक कुख्यात राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय अपराधी हुए है जिनसे फोन पर हुई बातचीत मुलाकातों व साक्षात्कार  सीधे रिकार्डेड एवं लाईव प्रसारण पहले भी आज के अनेक राष्ट्रीय चेनलों के सम्मानित पत्रकारगणों द्वारा किये जा चुके है। वे ही आज वैदिक की उक्त मुलाकात को पानी पी पी कर आलोचना करने से गुरेज नही कर रहे है। मुझे याद आता है मुबंई बंमकांड के समय की आतंकवादी घटना का न केवल सीधा प्रसारण किया गया था। बल्कि एक चैनल द्वारा आतंकवादियो से बातचीत का भी सीधा प्रसारण करके घटना स्थल और विभिन्न घटनाओ की स्थिति की जानकारी का सीधा प्रसारण आतंकवादिओ को मिलने से आतंकवादी घटना केा अंजाम देने में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग मिला था। (मुंबई बम कंाड के  सीधे प्रसारण ने ही मुझे पहली बार लेख लिखने के लिए मजबूर किया था।) कांग्रेस ने तब इनमे से किसी भी मुलाकात या प्रसारण पर कोई आपत्ति नही की थी,  न ही तत्कालीन विपक्ष (भाजपा) ने की। शायद इसीलिए कि तत्समय उन पत्रकारो पर किसी प्रकार की राजनीतिज्ञ छाप  या प्रश्न चिन्ह नही लगा था, जैसे कि आज वेद प्रताप वैदिक के साथ है। वह भी इसलिये क्योकि वे अन्ना आंदोलन से लेकर बाबा रामदेव के आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करके बाबा रामदेव के मोदी के प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम मे प्रमुख सहयोगी रहे है। अतः उनके राजनैतिक स्टेटस से इंकार नही किया जा सकता है।
             तथाकथित पत्रकारिता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दुहाई देकर उक्त मुलाकात को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करना भी क्या उचित होगा, यह भी एक प्रश्न है? निःसंदेह वेद प्रकाश वैदिक देश के  वरिष्ठतम अत्यंत सम्मानीय अनुभवी व बुजुर्ग पत्रकार है। वे ''न केवल संविधान के ज्ञाता है बल्कि अपने लम्बे अनुभव के कारण संविधान में निहित भावना के मर्मज्ञ भी है। क्या एक पत्रकार के अधिकार, एक नागरिक के नागरिक व संवैधानिक अधिकार से भी ज्यादा है ? जो निर्बाध न होकर संविधान के अंर्तगत कुछ सीमाओ में बाधित है। मुझे अभी हाल के म.प्र. के व्यापम की घटना याद आती है, जब एक दलाल अपराधी के मोबाईल में रिकार्ड किये गये नम्बरो के आधार पर, उन समस्त रिकार्ड मोबाईल नम्बर धारको को ही अपराधी बना दिया गया। जबकि ये तथ्य स्थािपत हो चुके थे कि उनमें से कुछ अभ्यार्थी  व्यापमं परीक्षा में शामिल ही नही हुये, कुछ अभ्यार्थी फेल हो गये अर्थात उन्हे किसी प्रकार का फायदा नही मिला । कुछ उनमें से इंजीनियर भी बन चुके थे। लेकिन मात्र एक फोन के नेक्सस (दमगने) के आधार पर अपराधी बना दिये गये। क्या यही सिद्धांत एक फरार अपराधी आतंकवादी के साथ एक पत्रकार भारतीय नागरिक द्वारा मुलाकात करने पर लागू नही होता है प्रश्न यह है ?
            क्या एक पत्रकार जो कि भारत के नागरिक है को यह अधिकार है कि वह बिना किसी पूर्व सूचना के देश के घोषित मोस्ट वंान्टेड आतंकवादी से अवैध रूप से मुलाकात कर सकते है? क्या इस मुलाकात के बाद वैदिक जी देश की विभिन्न खुफिया जांच ऐजेन्सीयो के जांच के अधिकार क्षेत्र में नही आ गयेे है ? यहां यह उल्लेखनीय है कि वे किसी अपराधी से अनुमति लेकर जेल मे मिलने नही गये थे। इन सब से हटकर क्या एक पत्रकार सेे स्वतंत्रता के नाम पर उक्त मुलाकात के औचित्य पर प्रश्न नही उठाया जा सकता है। यदि हां, तो क्या पत्रकार की हैसियत से हुई यह मुलाकात  किस समाचार पत्र मे प्रकाशित हुई? इंडिया टीवी को भी वैदिक ने स्वयं जानकारी न देकर रजत शर्मा द्वारा बात करने पर  ही जानकारी दी। जहां तक लोगो केा ज्ञात है कि वैदिक जी  किसी भी समाचार पत्र या मीडिया चैनल के पत्रकार  न होकर स्वतंत्र रूप से लिखते रहते है जिसके लिये सामान्यतया किसी मुलाकात या साक्षात्कार की आवश्यकता  नही होती है, और न ही  हाल मे  उनके द्वारा कोई साक्षात्कार किसी का लिया गया है।  क्या वैदिक इस बात के दोषी नही है कि 2 जुलाई की  हुई उनकी मुलाकात को 10 दिन े बाद  फेसबुक के माध्यम से उक्त मुलाकात के फोटोसंेशन जारी किये गये। उन्होने आज तक भी उक्त परस्पर संवाद से केन्द्रीय सरकार को अवगत नही कराया। यदि वे देश हित के लिये मिले थे या हाफिज सईद के हृदय परिवर्तन के लिए उन्होनेे यह वार्ता की, तो क्या यह भारतीय दूतावास की जानकारी में थी? क्या तथाकथित मन परिवर्तन करवाकर वेद प्रताप वैदिक विनोबा भावे या जयप्रकाश नारायण (जिन्होने डाकूओ का आत्मसमर्पण  कराया था) के समतुल्य माने जा सकते हैं?क्या मात्र यह हृदय परिवर्तन काफी होगा या क्या इससे देश की सुरक्षा  व अर्तराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक 60 करोड का  घोषित ईनामी अपराधी पर से प्रश्न चिन्ह हट जायेगा? आश्चर्य इस बात का नही है कि सरकार ने आपसे संपर्क नही किया जैसा कि वैदिक ने कहा, बल्कि आश्चर्य इस बात का है कि ज्ञानी एवं अनुभवी पत्रकार होते हुए भी इस मुलाकात के परिणाम की जानकारी पत्र के माध्यम से या व्यक्तिगत मुलाकात के द्वारा वैदिक ने सरकार व देश की जनता को क्यो नही दी, जब कि वह देश की सुरक्षा आत्म सम्मान अखंडता व राष्ट्रीय भावना से जुडा हुआ मामला है। देश की जनता इसका कारण जानना चाहती है।                    
            क्या एक पत्रकार के अधिकार एक नागरिक अधिकारो से भी ऊपर है? क्या भारतीय संविधान मे दिये गये मूल अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित निर्बाध है? क्या एक पत्रकार जो कि एक भारतीय नागरिक है का दायित्व नही है कि भारत सरकार द्वारा घोषित फरार आतंकवादी अपराधी की लोकेशन के बाबत जानकारी भारत सरकार व खुफिया सुरक्षा ऐजेन्सी के साथ शेयर करते व उसको पकडवाने मे सहयोग करके अपने नागरिक दायित्व का निर्वाह करते। बजाय यह कहते कि भारत सरकार ने उनसे कुछ पूछा ही नही। क्या भारत सरकार यह कह कर अपने दायित्व से मुक्त हो सकती कि उक्त मुलाकात की हवा की बदबू मे उनके किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रिर्मोट योगदान न होने के कारण  उक्त घटना  से कोई लेना देना नही है। क्या यदि एक सामान्य नागरिक  देश के घोषित आंतकवादी से संपर्क करने का प्रयास करते तो अन्य कई पत्रकारो के समान वह भी कानून की जकड मे नही होता,  यक्ष प्रश्न यही है।
            यदि एक पत्रकार की हैसियत से उनकी मुलाकात हुई होती तो निश्चित रूप से वह पूर्व नियोजित होती, समाचार पत्र की टीआरपी बढाने हेतु अभी तक प्रकाशित हो जाती। लेकिन उक्त मुलाकात को सर्वप्रथम फेसबुक के जरिए फोटेा लांच कर  सार्वजनिक किया गया। वैदिक जी ने यह कहा  है कि उनकी यह मुलाकात पूर्व नियोजित न होकर अचानक हुई। क्या यह मुलाकात  मात्र अकस्मात घटना है, जिससे उत्पन्न प्रभाव क्या भारत की राष्ट्रीय भावनाओ के साथ दुर्घटना नही है?
            क्या आपकेा याद नही है कि आडवाणी  का पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर कहे गये बोल मात्र से इतना बडा बवाल बना जिसने उनके राजनैतिक भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। लेकिन आज इस मुददे पर राष्ट्रवाद को सबसे उपर रखने वाली भाजपा की चुप्पी उन करोडो नागरिको के लिए जो भाजपा को चाहते है, अकल्पनीय व असहनीय है?
            वैदिक जी को इस बात की बधाई दी जानी चाहिए कि भारत एवं अमेरिका सहित दुनिया जिस आतंकवादी को पकडना चाहती है उसकी लोकेशन जब वैदिक जी  को मालूम हो गई। तब उन्होने भारत सरकार से इसे शेयर क्यो नही किया? ताकि भारत सरकार ड्रोन हमले कर उस आतंकवादी का अंत कर सकती है, जिस प्रकार ओसामा बिन लादेन का अमेरिका ने किया था।
            माननीय वेद प्रकाश वैदिक जी देश  की जनता के सामने आकर देश की जनता को उन प्रत्येक क्षणो से अवगत कराइये जो अपने हाफिज के साथ व्यतीत किये थे। यह आपका दायित्व भी है।देश आपकी बात को सच मानकर विश्वास करेगा। इस तरह आपसे जाने अनजाने में यदि कोई तकनीकि अथवा नैतिक ़त्रूटि हो गई हो तो उससे आप मुक्त हो सकेंगे।
            अतः में इस मुलाकात की कोई उपलब्धि भारत या भारत सरकार या स्वयं वैदिक जी को भले ही न  हुई हो लेकिन हाफिज को इस बात की उपलब्धि अवश्य मिली  कि न केवल पाकिस्तानी  मीडिया बल्कि  भारत में वह वैदिक के माध्यम से यह संदेश देने में सफल रहा कि उसका मुंबई बम कांड मे कोई हाथ नही है, जैसा वैदिक ने अपने टीवी साक्षात्कार मे कहा। वैदिक ने हाफिस से मुलाकात कर उक्त संदेश देने के लिए मुलाकात का जो प्लेटफार्म दिया उसके लियेे वे निश्चित रूप से दोषी है।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)


मंगलवार, 1 जुलाई 2014

21 वी सदी के वर्तमान समय मे क्या सिफारिश करना संविधान,कानून, या नैतिकता के विरूद्ध है। राजीव खण्डेलवाल (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है) म्उंपस रू. तंरममअंाींदकमसूंस/लंीववण्बवण्पद ठसवह रू. ूूूण्ंदकवसंदण्बवउ म.प्र. के “व्यापम” कांड की चर्चा प्रदेश में ही नही बल्कि देश में राष्ट्रीय चैनलो के माध्यम से हो रही है।इसमे कोई शक नही है कि लगभग एक लाख नब्बे हजार युवा विद्यार्थियो-अभ्यार्थियो के साथ खिलवाड किया गया है, जहां हम यह कहते है कि इन युवा कंधो पर राष्ट्र की प्रगति के पहिये टिके हुये है। इतने लम्बे समय से व्यापम में चली आ रही धांधलियां जल्दी उजागर नही हो पाई यह भी इस बात का द्योतक है कि इनको करने वाले व्यक्ति न केवल पूरे तंत्र मे व्याप्त है बल्कि उनके बीच परस्पर गहरा छमगने भी है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि देश र्में इस व्यापम कांड की चर्चा इस बात पर नही हो रही है कि इस कांड को करने वाले अधिकारीगण किस गहराई से और आयरन कवर के अंदर अपने इस कृत्य को अंजाम देकर हजारो विद्यार्थियो के जीवन के साथ खिलवाड किया गया, बल्कि “अयोग्य” व्यक्तियो को चुनकर प्रदेश की पू

         म.प्र. के "व्यापम" कांड की चर्चा प्रदेश में ही नही बल्कि देश में राष्ट्रीय चैनलो के माध्यम से हो रही है।इसमे कोई शक नही है कि लगभग एक लाख नब्बे हजार युवा विद्यार्थियो-अभ्यार्थियो के साथ खिलवाड किया गया है, जहां हम यह कहते है कि इन युवा कंधो पर राष्ट्र की प्रगति के पहिये टिके हुये है। इतने लम्बे समय से व्यापम में चली आ रही धांधलियां जल्दी उजागर नही हो पाई यह भी इस बात का द्योतक है कि इनको करने वाले व्यक्ति न केवल पूरे तंत्र मे व्याप्त है बल्कि उनके बीच परस्पर गहरा छमगने भी है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि देश र्में  इस व्यापम कांड की चर्चा इस बात पर नही हो रही है कि इस कांड को करने वाले अधिकारीगण किस गहराई से और आयरन कवर के अंदर अपने इस कृत्य को अंजाम देकर हजारो विद्यार्थियो के जीवन के साथ खिलवाड किया गया, बल्कि "अयोग्य" व्यक्तियो को चुनकर प्रदेश की पूरी जनता के साथ खिलवाड किया गया है। जनता केा इतने इस संशय मे डाल दिया गया कि उसका इलाज करने वाला डाक्टर, उसको पढाने वाला शिक्षक, जमीन नापने वाला पटवारी, प्रशासन कानून व्यवस्था को बनाने वाला कांस्टेबल चलाने वाले डिप्टी कलेक्टर इत्यादि इन सब का सामना आम नागरिक को अपने दैनिक जीवन मे करना होता है वे कितने सही है ?क्या वे गलत व्यक्तियों के पास तो नही पहुंच गये, जो उनके जीवन और जीवन-दिनचर्या से खिलवाड कर सकता है। यह संशय व  परिणाम का कारक उक्त कांड है जिस पर न गंभीरता से कोई आवश्यक कदम उठाये गये है और न ही  इस बात पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि लम्बे समय से एक के बाद एक वर्ष दर वर्ष विभिन्न विषयो में इस तरह का घोटाला बडे आराम से चलता रहा।
            मूल विषय यह है कि इन घोटालेबाजो के क्रियाकलाप पर गहनता से विचार कर रोक लगाने के बजाय, चर्चा इस विषय पर हो रही  है कि किस व्यक्ति ने किस व्यक्ति के लिए सिफारिश की। आरोप लगाने वाले व्यक्तियो से यह पूछा जाना चाहिए की आज के युग मे सार्वजनिक जीवन जी रहे या प्रशासनिक व्यवस्था मे लगे हुए व्यक्तियो से कभी न कभी जब सामान्य लोग या अभ्यार्थी    लोग संपर्क करते है तो वे सामान्यतः संबंधित व्यक्ति की ओर उनके नाम को अग्रेसित करते है जिसे सिफारिश कहा जाता है।सिफारिश करना क्या कानूनन अपराध है व नैतिक रूप से गलत है,प्रश्न यह है। वास्तव में सिफारिश करने वाला व्यक्ति यह नही कह रहा है कि कानून के खिलाफ जाकर संबंधित व्यक्ति को दूसरो के अधिकार छीनकर उसे फायदा दिलाया जाये। वास्तव में उक्त तथाकथित सिफारिशो को मानकर उसकेा करने वाला नौकरशाह या राजनैतिक जब कानून के विरूद्ध उस सिफारिश को लागू करता है तो वह अपराध है व उसको कार्यान्वित करने वाला ही अपराधी है न कि सिफारिश करने वाला।
भष्ट्राचार विरोधी अधिनियम मे जहां रिश्वत लेने व देने वाले दोनो कानूनन अपराधी माने जाते है यह नियम यहां लागू नही होता है।
            मुझे एक उदाहरण याद आता है  80- 90 के युग में बैतूल में एक कलेक्टर थे, किसी व्यक्ति के कार्य  के संबंध मे जब मैं उनसे मिला तो चर्चा के दौरान  उन्होने अपना  बडा स्पष्ट मत रखा था कि चाहे काम भाजपा के व्यक्ति का हो या कांग्रेस के व्यक्ति का जो काम कानूनन सही है उसकेा मै करता हंू। लेकिन जहां विवेक के उपयोग का प्रश्न  की परिस्थितियो आती है, तब मै सत्ताधारी दल के पक्ष मे विवेक का उपयोग करता हंू।यह सिद्धांत इन सिफारिशो पर भी लागू होता है। जंहा सिफारिशे कानून के आडे आती है उसे नही माना जाना चाहिए। लेकिन परिस्थति वश जहां सिफारिशो में विवेक को उपयोग की स्थिति बनती है, तब विवेक उपयोग सिफारिश का पक्ष मे किया जा सकता है, और इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी उस सिफारिश को लागू करने वाले नेता या नौकरशाह की होती है न कि सिफारिश करने वाले व्यक्ति की।   
            इसलिए उन समस्त आरोप लगाने वाले व्यक्तियो से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्होने अपने जीवन में कभी सिफारिश नही की, तो वे बगले झांकने लग जायेगे। इसलिए इस पूरे कांड मे उचित यही होगा कि समस्त अपराधियो केा कानून के दायरे मंे शीध््रा्र लाया जाये ।
            बात जब नैतिकता की जाती है, नैतिक मूल्यो की जाती है तब घटना के असितत्व केा स्वीकार करने वाले जिम्मेदार पद पर बैठे हुए लोग "शास्त्री जी " के समान नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर  इस्तीफा देकर नैतिक युग को वापस क्यो नही लाते ?
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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