रविवार, 2 नवंबर 2014

माननीय उच्चतम न्यायालय की ऐतिहासिक भूल! दिल्ली में अल्पमत सरकार बनाने की सम्भावनाओं की तलाश!

                         माननीय उच्चतम न्यायालय ने ''आम आदमी पार्टी'' की दिल्ली विधानसभा भंग कर तुरंत चुनाव कराने की याचिका पर सुनवाई करते हुए जो निर्देश और विचार व्यक्त किये, वे निश्चित रूप से न तो संवैधानिक उचित व सही प्रतीत होते है और न ही राजनैतिक रूप से परिपक्व दिखाई पड़ते है। बल्कि यह ''दल बदल विरोधी कानून'' का उलंघन करने वाली प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के समान है। 
                         माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो यह कहा कि दिल्ली में किसी राजनैतिक दल के बाहरी समर्थन से सरकार बन सके, ऐसी संभावनाए उपराज्यपाल तलाश रहे है। उपराज्यपाल के इन प्रयासो की न केवल सराहना की जानी चाहिए बल्कि इसके लिए उन्हे कुछ और समय भी दिया जाना चाहिए। मेरे मत में यह सुझाव  उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के परे है। इस बात पर न तो कोई विवाद है, न कोई शंका है और न ही कोई कानूनी अस्ष्पटिता है कि विधानसभा में सरकार बनाने के लिए नेता को बुलाने का एकमात्र अधिकार उस राज्य के राज्यपाल/उपराज्यपाल को है। उपराज्यपाल के सरकार बनाने के निमंत्रण को जरूर बाद में उच्चतम न्यायालय में चुनौती देकर उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है जैसा कि पूर्व में कई मामलो में हो चुका है। लेकिन उसके पूर्व उपराज्यपाल के किसी संभावित निर्णय पर किसी तरह का न्यायिक निर्देश या न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। 
                         दिल्ली विधानसभा के परिणाम घोषित होने के पश्चात् कानूनी व स्थापित परम्पराओं का अनुकरण कर उपराज्यपाल ने प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया था। यह निमंत्रण इस सुदृढ़ विश्वास के साथ निहित था कि भाजपा सरकार बनाने के बाद विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने में सफल होगी तभी वह निमंत्रण स्वीकार करेगी। लेकिन तब भाजपा के विधायक दल के तत्कालीन नेता हर्षवर्धन ने इस आधार पर ही सरकार बनाने से इनकार कर दिया था कि ''सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे जनता ने सरकार बनाने का जनादेश ही नहीं दिया है।'' उन्होने विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का दावा भी ही नहीं किया। फलस्वरूप उपराज्यपाल ने दूसरी बड़ी पार्टी ''आप'' जिसे कांग्रेस ने एकतरफा बिना शर्त बिना मांगे लिखित समर्थन दे दिया था, को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। वैसे यह अलग बात है कि वही भाजपा दिल्ली से चलकर महाराष्ट्र आते-आते सबसे बड़ी पार्टी होने को जनादेश मानकर सरकार बनाने का दावा कर सरकार बनाने जा रही है।
                        अतः यह स्पष्ट है कि उपराज्यपाल ने दिल्ली में कभी भी अल्पमत सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। वास्तव में संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि कोई भी दल अल्पमत में होने के बावजूद सरकार बनावे। वास्तव में जब कोई दल या गठबंधन बहुमत की संख्या बल से दूर रहता है और तब जब उसे सरकार बनाने का निमंत्रण राज्यपाल या उपराज्यपाल द्वारा दिया जाता है तो इसी आशा एवं विश्वास के साथ दिया जाता है कि वह सरकार बनाने के बाद निर्धारित समयावधि में विधानसभा के अंदर अपना बहुमत सिद्ध कर देगे। बहुमत सिद्ध करने में असफल रहने पर उसे इस्तीफा देना होता है। कई बार ऐसा भी हुआ कि सरकार गठन के निमंत्रण के समय तक बहुमत का स्पष्ट आकड़ा होने के बावजूद विश्वास मतदान के दिन तक पहुचते विश्वास मत पाने  में असफल भी रहे है। ऐसे में वह सरकार बहुमत की ही होती है। उसे अल्पमत की सरकार कहना कदापि उचित नहीं होगा।
कई बार ऐसी परिस्थितियां हो सकती है कि विधानसभा की कुल निर्वाचित संख्या का बहुमत किसी दल या गठबंधन के पास न हो। लेकिन इसके बावजूद वे विधानसभा में कुछ परिस्थतियों में अपना बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में होते है। कुछ दल विधानसभा में मतदान के समय अनुपस्थिति रह कर सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत सिद्ध करने में मदद कर सकते है। इस तरह से सदन में उपस्थित विधायक संख्या में से बहुमत प्राप्त कर सरकार अपना विश्वास सिद्ध कर देती है, और सदन की कुल विद्यमान संख्या की तुलना में अल्पमत में होने के बावजूद बहुमत हासिल कर लेती है। 
                             इससे यह सिद्ध है कि जो भी सरकार बनेगी वह बहुमत की ही होगी, अल्पमत की नहीं।  यह भी कहा गया कि देश में पूर्व में भी अल्पमत सरकारे चली। 1991-96 में पी.वी. नरसिम्हराव की सरकार को अल्पमत की सरकार कहा जाता रहा है। परन्तु यह राजनैतिक रूप से ही कहा जाता रहा। राष्ट्रपति के निर्देश पर बहुमत सिद्ध करने के लिये या जब-तब उन्हे वित्त विधेयक पर बहुमत सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ी, तब-तब उन्होने अपना बहुमत सिद्ध किया। इसीलिए सरकार 5 साल चली।
                            माननीय उच्चतम न्यायालय का यह मत कि किसी राजनैतिक दल के बाहरी समर्थन से अल्पमत की सरकार बनने की सम्भावना तलाशी जानी चाहिए। यह न तो नैतिक सुझाव है और न ही संवैधानिक। माननीय उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में भी नहीं है कि वे  ऐसा कथन कहे । कोई राजनैतिक दल 'सरकार में शामिल होकर' समर्थन देता है या 'बाहर से देता है' यह राजनैतिक दल का विवेक व विशेषाधिकार है। वह विधानसभा में अनुपस्थित रहकर भी समर्थन दे सकता है। जब दिल्ली में ''कांग्रेस'' और ''आप'' पार्टी के नेतृत्व ने बार-बार यह घोषित किया और यह स्टेण्ड लिया कि वह भाजपा को सरकार बनाने के किसी भी मुहिम का समर्थन नहीं करेगी औरविधानसभा में उसका विरोध करेगी। तब इस स्थिति को देखते हुए विशेषकर जब भाजपा की सदस्य संख्या पहली बार निमंत्रण प्राप्त करने के बाद आज की स्थिति में तुलनात्मक रूप से घटकर कम हो गई है। इस स्थिति में, जब भाजपा सहित किसी पार्टी ने सरकार बनाने का  अभी तक दावा नहीं किया, तब माननीय उच्चतम न्यायालय का सरकार बनाने की सम्भावनाओं को तलाशने के लिए उपराज्यपाल को 12 दिन का समय दिया जाना, क्या कानूनी रूप से दल-बदल को प्रोत्साहन देने जैसा नहीं होगा? दिल्ली की राजनैतिक परिस्थितियां अगर देखी जाये तो वहां सरकार तभी बन पायेगी जब किसी पार्टी के विधायक गण दल बदलकर सरकार बनाने के लिए समर्थन दे। या वैधानिक रूप से पार्टी में से दो तिहाई से अधिक की संख्या में विधायक टूटकर पार्टी के विभाजन को कानूनी रूप देकर नया गुट बनाकर सरकार बनाने में सहयोग करे, जो अभी तक घटित नहीं हुआ है। इसलिए उच्चतम न्यायालय का विचार पार्टी विभाजन को बढ़ावा देने वाला कदम प्रतीत होता है। 
                        वास्तव में उपराज्यपाल को इस बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि भाजपा ने डॉ हर्षवर्धन के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद अभी तक अपने विधायक दल का नया नेता नहीं चुना है। अर्थात भाजपा तकनीकि रूप से स्वयं आगे आकर सरकार बनाने की इच्छुक नहीं लगती है, जो उसके प्रदेश अध्यक्ष सतीष उपाध्याय के बयान व लगातार इस कथन से है कि गवर्नर को पहले बुलाने तो दीजिए, फिर विचार करेंगे, से स्पष्ट है। इस स्थिति में भाजपा राजनैतिक लाभ-हानि देखकर यदि सरकार बनाने से इनकार कर देती है तब क्या उपराज्यपाल का उपहास नहीं होगा?  तब भाजपा यह कह सकती है कि उसने सरकार बनाने का न तो दावा किया और न ही पूर्व में कभी सरकार बनाने के लिए हामीं भरी व वह सत्ता लोलूप नहीं है व वह नये जनादेश के लिये जनता के बीच जाना चाहती है। ऐसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए उपराज्यपाल को तब तक सरकार बनाने के लिए कोई भी निमंत्रण नहीं देना चाहिए जब तक कि कोई पार्टी या गठबंधन स्वयं सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करे। 

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

माननीय उच्चतम न्यायालय की ऐतिहासिक भूल!

दिल्ली में अल्पमत सरकार बनाने की सम्भावनाओं की तलाश!
   
       माननीय उच्चतम न्यायालय ने ’’आम आदमी पार्टी‘‘ की दिल्ली विधानसभा भंग कर तुरंत चुनाव कराने की याचिका पर सुनवाई करते हुए जो निर्देश और विचार व्यक्त किये, वे निश्चित रूप से न तो संवैधानिक उचित व सही प्रतीत होते है और न ही राजनैतिक रूप से परिपक्व दिखाई पड़ते है। बल्कि यह ‘‘दल बदल विरोधी कानून’’ का उलंघन करने वाली प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के समान है। 
माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो यह कहा कि दिल्ली में किसी राजनैतिक दल के बाहरी समर्थन से सरकार बन सके, ऐसी संभावनाए उपराज्यपाल तलाश रहे है। उपराज्यपाल के इन प्रयासो की न केवल सराहना की जानी चाहिए बल्कि इसके लिए उन्हे कुछ और समय भी दिया जाना चाहिए। मेरे मत में यह सुझाव  उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के परे है। इस बात पर न तो कोई विवाद है, न कोई शंका है और न ही कोई कानूनी अस्ष्पटिता है कि विधानसभा में सरकार बनाने के लिए नेता को बुलाने का एकमात्र अधिकार उस राज्य के राज्यपाल/उपराज्यपाल को है। उपराज्यपाल के सरकार बनाने के निमंत्रण को जरूर बाद में उच्चतम न्यायालय में चुनौती देकर उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है जैसा कि पूर्व में कई मामलो में हो चुका है। लेकिन उसके पूर्व उपराज्यपाल के किसी संभावित निर्णय पर किसी तरह का न्यायिक निर्देश या न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है। 
दिल्ली विधानसभा के परिणाम घोषित होने के पश्चात् कानूनी व स्थापित परम्पराओं का अनुकरण कर उपराज्यपाल ने प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया था। यह निमंत्रण इस सुदृढ़ विश्वास के साथ निहित था कि भाजपा सरकार बनाने के बाद विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने में सफल होगी तभी वह निमंत्रण स्वीकार करेगी। लेकिन तब भाजपा के विधायक दल के तत्कालीन नेता हर्षवर्धन ने इस आधार पर ही सरकार बनाने से इनकार कर दिया था कि ’’सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे जनता ने सरकार बनाने का जनादेश ही नहीं दिया है।’’ उन्होने विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का दावा भी ही नहीं किया। इसलिए उपराज्यपाल ने दूसरी बड़ी पार्टी ‘‘आप’’ जिसे कांग्रेस ने एकतरफा बिना शर्त बिना मांगे लिखित समर्थन दे दिया था, को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। वैसे यह अलग बात है कि वही भाजपा दिल्ली से चलकर महाराष्ट्र आते तक सबसे बड़ी पार्टी होने को जनादेश मानकर सरकार बनाने का दावा कर सरकार बनाने जा रही है।   
अतः यह स्पष्ट है कि उपराज्यपाल ने दिल्ली में कभी भी अल्पमत सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। वास्तव में संविधान में कोई ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि कोई भी दल अल्पमत में होने के बावजूद सरकार बनावे। वास्तव में जब कोई दल या गठबंधन बहुमत की संख्या बल से दूर रहता है और तब जब उसे सरकार बनाने का निमंत्रण राज्यपाल या उपराज्यपाल द्वारा दिया जाता है तो इसी आशा एवं विश्वास के साथ दिया जाता है कि वह सरकार बनाने के बाद निर्धारित समयावधि में विधानसभा के अंदर अपना बहुमत सिद्ध कर देगे। ऐसे में वह बहुमत की ही सरकार होती है। उसे अल्पमत की सरकार कहना उचित नहीं होगा। बहुमत सिद्ध करने में असफल रहने पर उसे इस्तीफा देना होता है। कई बार ऐसा भी हुआ कि सरकार गठन के निमंत्रण के समय तक बहुमत का स्पष्ट आकड़ा होने के बावजूद विश्वास मतदान के दिन तक पहुचते विश्वास मत पाने  में असफल भी रहे है।   
कई बार ऐसी परिस्थितियां हो सकती है कि विधानसभा की कुल निर्वाचित संख्या का बहुमत किसी दल या गठबंधन के पास न हो। लेकिन इसके बावजूद वे विधानसभा में कुछ परिस्थतियों में अपना बहुमत सिद्ध करने की स्थिति में होते है। कुछ दल विधानसभा में मतदान के समय अनुपस्थिति रह कर सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत सिद्ध करने में मदद कर सकते है। इस तरह से सदन में उपस्थित विधायक संख्या में से बहुमत प्राप्त कर सरकार अपना विश्वास सिद्ध कर देती है, और सदन की कुल विद्यमान संख्या की तुलना में अल्पमत में होने के बावजूद बहुमत हासिल कर लेती है। 
इससे यह सिद्ध है कि जो भी सरकार बनेगी वह बहुमत की ही होगी, अल्पमत की नहीं।  यह भी कहा गया कि देश में पूर्व में भी अल्पमत सरकारे चली। 1991-96 में पी.वी. नरसिम्हराव की सरकार को अल्पमत की सरकार कहा जाता रहा है। परन्तु यह राजनैतिक रूप से ही कहा जाता रहा। राष्ट्रपति के निर्देश पर बहुमत सिद्ध करने के लिये या जब-तब उन्हे वित्त विधेयक पर बहुमत सिद्ध करने की आवश्यकता पड़ी, तब-तब उन्होने अपना बहुमत सिद्ध किया। इसलिए सरकार 5 साल चली।
माननीय उच्चतम न्यायालय का यह मत कि किसी राजनैतिक दल के बाहरी समर्थन से अल्पमत की सरकार बनने की सम्भावना तलाशी जानी चाहिए। यह न तो नैतिक सुझाव है और न ही संवैधानिक। माननीय उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में भी नहीं है कि वे  ऐसा कथन कहे । कोई राजनैतिक दल ‘सरकार में शामिल होकर’ समर्थन देता है या ‘बाहर से देता है’ यह राजनैतिक दल का विवेक व विशेषाधिकार है। वह विधानसभा में अनुपस्थित रहकर भी समर्थन दे सकता है। जब दिल्ली में ‘‘कांग्रेस’’ और ‘‘आप’’ पार्टी के नेतृत्व ने बार-बार यह घोषित किया और यह स्टेण्ड लिया कि वह भाजपा को सरकार बनाने के किसी भी मूहिम का समर्थन नहीं करेगी और विधानसभा में उसका विरोध करेगी। तब इस स्थिति को देखते हुए विशेषकर जब भाजपा की 
सदस्य संख्या पहली बार निमंत्रण प्राप्त करने के बाद आज की स्थिति में तुलनात्मक रूप से घटकर कम हो गई है। इस स्थिति में, जब भाजपा सहित किसी पार्टी ने सरकार बनाने का  अभी तक दावा नहीं किया, तब माननीय उच्चतम न्यायालय का सरकार बनाने की सम्भावनाओं को तलाशने के लिए उपराज्यपाल को 12 दिन का समय दिया जाना, क्या कानूनी रूप से दल-बदल को प्रोत्साहन देने जैसा नहीं होगा ? दिल्ली की राजनैतिक परिस्थितियां अगर देखी जाये तो वहां सरकार तभी बन पायेगी जब किसी पार्टी के विधायक गण दल बदलकर सरकार बनाने के लिए समर्थन दे। या वैधानिक रूप से पार्टी में से दो तिहाई से अधिक की संख्या में विधायक टूटकर पार्टी के विभाजन को कानूनी रूप देकर नया गुट बनाकर सरकार बनाने में सहयोग करे, जो अभी तक घटित नहीं हुआ है। इसलिए उच्चतम न्यायालय का विचार पार्टी विभाजन को बढ़ावा देने वाला कदम प्रतीत होता है। 
वास्तव में उपराज्यपाल को इस बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि भाजपा ने डॉ हर्षवर्धन के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद अभी तक अपने विधायक दल का नया नेता नहीं चुना है। अर्थात भाजपा तकनीकि रूप से स्वयं आगे आकर सरकार बनाने की इच्छुक नहीं लगती है, जो उसके प्रदेश अध्यक्ष उपाध्याय के बयान व लगातार यह कथन है कि गवर्नर को पहले बुलाने तो दीजिए, फिर विचार करेंगे, से स्पष्ट है। इस स्थिति में भाजपा राजनैतिक लाभ-हानि देखकर यदि सरकार बनाने से इनकार कर देती है तो तब क्या उपराज्यपाल का उपहास नहीं होगा?  तब भाजपा यह कह सकती है कि उसने सरकार बनाने का न तो दावा किया और न ही पूर्व में कभी सरकार बनाने के लिए हामीं भरी व सत्ता लोलूप नहीं है व वह नये जनादेश के लिये जनता के बीच जाना चाहती है। ऐसी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए उपराज्यपाल को तब तक सरकार बनाने के लिए कोई भी निमंत्रण नहीं देना चाहिए जब तक कि कोई पार्टी या गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करे। 

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

देश की राजति मे आर. एस. एस. की बढती स्वीकार्यता! दूसरा प्रचारक मुख्यमंत्री बना!

                          
                  
  •        हरियाणा विधान सभा चुनाव मे भारतीय जनता पार्टी को मिली ''अप्रत्याशित'' सफलता ने देश के राजनैतिक पंडितों को ही आश्चर्य चकित नही किया, बल्कि नरेन्द्र मोदी के बाद दूसरी बार संघ प्रचारक रहे मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाकर राजनैतिक गतिविधियो पर तीक्ष्ण नजर रखने वाले क्षेत्रो को भी आश्चर्य मिश्रित गहरी सुखद मनः स्थिति मे डाल दिया। यदि असम गण परिषद के असम आंदोलन से उत्पन्न नेता प्रफुल्ल महंत को छोड दिया जाय तो शायद देश के राजनैतिक इतिहास मे नरेन्द्र मोदी के बाद यह दूसरी घटना होगी जहॉ कोई व्यक्ति पहली बार विधान सभा का चुनाव लड़कर जीत कर सीधे मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुये है। वैसे यदि पीछे जाया जाय तो अटलबिहारी वाजपेयी जनसंघ  के जमाने में संघ के एक वर्ष के   प्रचारक रहकर प्रचारक की छाप से मुक्त होकर  राष्ट्रीय राजनीति के छितिज पर लम्बें समय तक राष्ट्र नेता  बने रहकर अन्ततः देश के प्रधानमंत्री भी बने। संघ का यह दर्शन-शास्त्र रहा है कि वह केवल व्यक्ति के ही नहीं बनाता है वरन् व्यक्तिव को गढता है जिससे आत्म विश्वास से परिपूर्ण सुदृढ और कर्मठ व्यक्ति का निर्माण होता हैं। एक ''चाय वाला'' संघ के व्यक्तित्व निर्माण के कारण सीघे मुख्यमंत्री से होता हुआ प्रधानमंत्री बन गया तो दूसरा सामान्य कपडा व्यवसायी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुॅच गया। गुजरात दंगो के आरोपो से धिरे होने के कारण राजनीति में अछूत  संघ-स्वयं सेवक नरेन्द्र मोदी आज चुनावी राजनीति में ''पारस'' बन गये है । ये इस बाते को सिद्ध करते है कि 'संघ' की 'कथनी' और 'करनी ' मे 'अंतर' नहीं हैं। अतंर है तो सिर्फ समय के इंतजार का है जो आज के समय भागदौड़ के दौर मे लोग करना ही नही चाहतेे है।
  • राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ मूलतः एक सांस्कृतिक संगठन है जो देश की गौरवशाली संस्कृति के संरक्षण व विकास के लिये जो भी आवश्यक कदम उठाने हों, चाहे फिर वह धामर््िाक, सामाजिक, राजनैतिक या अन्य किसी भी क्षेत्र मे ही क्यों न हो, बेहिचक लगातार उठाते रहा है ।  उसकी इसी पहचान को समाप्त करने के उद्वेश्य से स्वंय को स्वंय द्वारा प्रगतिशील कहे जाने वाले कुछ तत्वों ने दूंिषत मानसिकता से सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर संघ को एक साप्रदायिक संगठन चिन्हित करने का अनवरत् (लेकिन अन्ततः असफल) प्रयास पिछले कई वर्षा से किया हैं जिसके प्रमुख लोगों मे से एक दिग्विजय सिह भी हैं। लेकिन हाल ही के लोकसभा और विधान सभा के चुनावी परिणामों ने संघ पर लगाये जाने वाले इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है। इसे आगे इस तरह से समझा जा सकता है। 
  • राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ न तो कभी चुनाव लडता है और न ही चुनावी राजनीति मे विश्वास रखता है, लेकिन अनवरत -राष्ट्र सेवा के कार्याें मे जुटा रहता है। संघ के इन्ही अधिकतर सिध्दान्तों को भाजपा ने भी अपनाया हैं ऐसा भाजपा या संघ का ही मानना नही है बल्कि खुद विरोधी भी  भाजपा पर यहीं आरोप लगाते है । भाजपा के घोषणा पत्र मे संघ के अधिकतर सिध्दान्त समाहित है जिनके आधार पर उनके द्वारा लोकसभा का चुनाव लडा गया। यदि संघ का कोई स्वंय सेवक भाजपा का प्रत्याशी है तो वह स्वंय को सर्व प्रथम संघ का स्वंय सेवक मानता है और फिर पार्टी का कार्यकर्ता नेता या अन्य कोई वजूद। अर्थात एक प्रचारक भाजपा के कार्यकर्ता/नेता के रूप में चुनावों मे जाता हैं तो उसका स्वंय सेवक के रूप मे वजूद जनता के बीच विद्वमान  रहता हैं फिर चाहे नरेन्द्र मोदी हो या खट्टर जिन्होने अपने प्रचारक व्यक्तित्व को कभी नही छुपाया बल्कि सीधे जनता से वोट मांगे और परिणाम आपके सामने हैं।इन परिणामों से यही साबित होता हैं कि जनता ने राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पर लगे आरोपों को नकार दिया हैं।
  • अतः अब तो कम से कम आलोचकोे को जमीनी सत्यता को स्वीकार कर आरेाप लगाना बंद कर (उन्हे) देश हित में संघ द्वारा किये जाने वाले व्यक्तिव निर्माण कार्य मे जुड जाना चाहिये या  उन्हे संघ नाम से परहेज है तो वे स्वंय स्वतंत्र रूप से देश निर्माण कार्य मे जुड जाये ताकि वे स्वंय अपने आप को भी देश की प्रगति और निर्माण मे एक भागीदार बना सके।

                                              (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं) 
                   




शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

‘शान्ति‘ का नोबेल पुरस्कार मिलने पर‘सत्यार्थी‘ का मान-अभिमान,लेकिन देश का ....?

  •      ''2014'' का नोबेल शान्ति पुरस्कार पाकिस्तान की मलाला युसूफ जई के साथ संयुक्त रूप से  मध्य प्रदेश के विदिशा मे पैदा हुये कैलाश सत्यार्थी को दिया गया, जिससे हर भारतीय का सिर गर्व से उॅचा हो गया। ''विशिष्ट'-'दिशा' (वि-दिशा) लिये हुये''कैलाश'('पर्वत) की उचाईयों तक पहुचने का उद्ेश्य लेकर सत्य का रास्ता अपनाते हुये (सत्यार्थी ) भारतीय कैलाश सत्यार्थी को संयुक्त रूप से पाकिस्तानी मलाला युसूफजई के साथ विश्व शान्ति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने पर भारतीय उपमहाद्वीप के इन दोनो नागरिको को हार्दिक-बधाइयॉ, वन्दन -अभिनन्दन। जहॉ किसी भारतीय को वर्ष 2009 के बाद नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ हैं वहीं मात्र 17 वर्ष की आयु में विश्व की सबसे कम उम्र की नोबेल पुरस्कार विजेता बनी। एक अशांत देश जो अपने पड़ोस में शान्ति भंग करने की लगातार हरकतें कर रहा है के नागरिक को शान्ति के लिये और वह भी महिला को पुरस्कार मिलना निश्चित रूप से बधाई व साहस का ही प्रतीक हैं। कैलाश सत्यार्थी द्वारा बचपन बचाओं आन्दोलन से अभी तक 80 हजार से अधिक बाल मजदूरों को बदहवासी से उबारकर बाल गुलामी व श्रम कानून विरोधी शक्तियों से उन्हे निकालकर, नये जीवन की राह मे ले जाकर साहसिक कार्य किया है। इसके लिये उन्हे नोबेल पुरस्कार मिलना निश्चित रूप से एक व्यक्ति की हैसियत से गौरव की बात है। 
  • सत्यार्थी ने अपना सम्पूर्ण जीवन निःस्वार्थ रहते हुए बाल-मजदूरी को खत्म करने के लिये सफलता पूर्वक लगाया, जिसका मूल्याकंन व अभिनन्दन पुरस्कार द्वारा ही किया जा सकता हैं। लेकिन क्या यह ''नोबेल '' सम्मान भारत देश के मुकुट को भी नोबेल (सुशोभित) करेगा? और क्या यह भारत का सिंर विश्व मे ऊॅचा उठायेगा ? नोबेल पुरस्कार की भव्यता, अतंर्राष्ट्रीय स्वीकारिता, मान्यता व सर्वोच्चता से दूर हटकर,यदि हम गहराई मे जाकर देश की उन परिस्थितियों जिन पर कार्य करने के कारण नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ हैं, की स्थिति का आकंलन करेगें, तो क्या भारत देश भी उतना ही खुश होगा? जितना कैलाश सत्यार्थी हुये हैं। यह गहरे चिन्तन,विवेचना, सोच व शोध का विषय हैं जिसकी मीमांसा करने से मै खुद को रोक नहीं पा रहा हॅू। 
  • इसके लिये सर्वप्रथम हमें यह जानना आवश्यक होगा कि''सत्यार्थी''और''मलाला''को किस विषय पर और कौन से कार्य करने के लिये नोबेल पुरस्कार मिला। महिला अधिकारों से मरहूम अशान्त पाकिस्तान में मलाला ने तालिबानियों जैसों के मध्य महिलाओ की शिक्षा व जागरूकता के लिये जीवन की परवाह किये बिना आवाज बुलन्द की। सत्यार्थी ने बाल मजदूरो व बाल अधिकारों के लिये ऐसे कार्य किये जिनसे उन्होने हमारे देश के (तंत्र) सामाजिक ताने-बाने को सुधारने का प्रयास किया। इस कारण वे बच्चे जो हमारे भविष्य के प्रतीक, भविष्य का देश हैं, जिनके युवा होते बाल कंधे  पर देश का भविष्य टिका हैं, उनकी भ्रूण हत्या न हो जाय उसे रोक कर समाज व अन्ततः देश के लिये उन्होने एक बहुत ही बडा सराहनीय कार्य किया है, जिसके लिये उन्हे प्राप्त प्रतिफल के वे निश्चित हकदार है। लेकिन जब हम एक देश की नजर से देखते है ंतो यही कार्ये मे निमित्त  भाव देश को शर्म से झुका देता हैं। यह नोबेल पुरस्कार हमारे देश के नागरिकों की मानवीय संवेदनाओं पर चोट पहुॅंचाता है।ं यह नोबेल पुरस्कार हमारे देश में बाल-मजदूरी, बाल गुलामी, बाल अधिकार व बच्चों का किस तरह का जीवन स्तर है, इनकी दुर्दशा को दर्शाता है। तदाःनुसार एक तरफ तो यह पुरस्कार इस स्तर को सुधारने वाले को एक ऐसा प्रमाण पत्र देता है जिसमें ''एक व्यक्ति'' का सिर अभिमान से ऊँचा उठ जाता है। लेकिन दूसरी ओर उसी के साथ देश के दिलो की धडकन इस बात को सोचने के लिये क्यों मजबूर नही होती है? प्रत्येक नागरिक की सोेच ऐसी कब होगी, जब सत्यार्थी जैसे व्यक्तियों को ऐसे काम करने की परिस्थितियाँ ही न मिले और हम ऐसे क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने के हकदार कम से कम भविष्य मे तो न बने। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे देश में जो कमियाँ हैं, वह हमारे सामाजिक ताने-बाने (ढाँचे)ं मे अभी भी विद्यमान है। आज का शान्ति का यह नोबेल पुरस्कार इन कमियों पर कम से कम हमें यह सोचने के लिये अवश्य मजबूर करेगा। हम में से प्रत्येक नागरिक उन्हेें दूर करने के लिये अभी से पूरी ताकत के साथ सेवा भाव मे लग जायें ताकि भविष्य में फिर कभी किसी एक व्यक्ति या संस्था हम अधिकाशं नागरिकों के सोते रहने के कारण देश हित मे  बुराई को दूर करने के लिये फिर से किसी परिस्थितिजन अवसर  न मिल  पाये ताकि वह फिर किसी अन्य विषय पर नोबल पुरस्कार प्राप्त कर सके जिससे देश को नीचा देखना पडे।  
  • इस मीमांसा का यह कदापि अर्थ नही है कि सत्यार्थी ने जो कार्य किये हैं वह प्रशंसनीय नहीं हैं और ऐसा भी नही कि यह नोबेल पुरस्कार की प्रतिष्ठा पर कोई प्रश्न चिन्ह लगा दे।लेकिन इस देश के 100 करोड से अधिक वयस्क नागरिकों के लिये यह संदेश अवश्य है कि वे कम से कम अपना नागरिक कर्तव्य निभाकर हमारे अव्यवस्थित ढॉचे की समस्त कमियों को दूर करने हेतु तन-मन-धन से आज ही से जुट जायें।
  • यदि पुरस्कार भौतिक (सुब्रम्हमण्यम चन्द्रशेखर, सर सीवी रमन),रसायन  मेडिसिन जैसे क्षेत्रों मे कार्यं के लिये मिलता तो यह निश्चित रूप से व्यक्ति के साथ-साथ देश का गौरव आगे बढ़ाने जैसा होता। लेकिन यह पुरस्कार एक व्यक्ति के उसकी जीवटता साहस की निरन्तरता, परिपक्वता के साथ निःस्वार्थ भावों के साथ किये गये कार्य उसके निश्छल व्यक्तिव को प्रकट करते हैं। उनके लिये यह पुरस्कार सम्मान का प्रतीक तो हैं किन्तु हमारे देश का सिर इसलिये नीचे झुक जाता है क्योकि ंवह हमारे देश के निर्मल बालकांे की निम्नतर स्थिति को भी दर्शाता हैं। 
  • यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी को देशहित में किये कार्यो के लिए कोई संज्ञान न लेकर पद्मश्री से भारत रत्न सहित अन्य राष्ट्रीय पुरस्कारों हेतु योग्य नहीं समझा अर्थात स्वयं सरकार भी............................।़
  • इसलिये शातिं का नोबेल समुचित नही। यदि वर्तमान नोबेल सूचि में समाज सुधारक के नोबेल  का प्रावधान न हो तो अपेक्षित है कि नोबेल निर्णायक मंडल इस विषय को भी सुची मे शामिल करने के प्रयास  करे ताकि भविष्य मे समाज सुधार का नोबल दिया जेा सके ताकि वास्तविक रूप मे शांितं के लिये किये जाने कार्य के लिये दिये जाने वाले नोबेल की महत्ता बनी रहे।  
  •           अतः ईश्वर से यही प्रार्थना हैं कि भविष्य में व्यक्तिगत उपलब्धियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी सामाजिक स्तर के विषय पर मेरिट पर नोबेल पुरस्कार कमेटी हमें नोबेल देने मे हमारे  देश को असहाय व अनुपयुक्त पाये, यही देश के लिये नोबल होगा। 
  •  
  •                       (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)

मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

कांग्रेस द्वारा पैदा किये गये कीचड मे ही ‘‘कमल‘‘ ‘‘खिला‘‘-नरेन्द्र मोदी..

  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा मे एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुये कहा कि कांग्रेस ने जो कीचड फैलाया है उसके कारण ही कमल खिला हैं। उन्होने  आगे यह भी कहा कि जितना कीचड फैलेगा उतना ही कमल खिलेगा। मोदी अपने भाषणो मे तुकबन्दी और जूगलबन्दी के लिये माहिर माने जाते हैं जो श्रोताओ में एक तत्काल प्रभाव पैदा करती हैं और तालियांे की गडगडाहट से स्वागत भी होता हैं। वैसे भी हमारे राजनेताओ ंमें भाषण देकर पलटने की आदत पुरानी हैं। लेकिन मोदी इसके उलट बयान पलटने के बजाय  तुकबन्दी के चक्कर मे कई बार कुछ ऐसी बाते कह जाते हैं जहॉ उस बात से पलटे बिना ही उस बात का आगे का दूसरा अर्थ अनर्थ पैदा कर देता हें ऐसा है कि जैसा एक सिक्के के दो पहेलू होते है।ं
मोदी का यह कथन तुकबन्दी के हिसाब से सही है कि कमल कीचड मे ही खिलता है व इस तथ्य की कोई आलोचना भी नही कर सकता हैंे।कांग्रेस ने पूरे देश मे इतना कीचड फैलाया कि कई जगह जहांॅ कमल भी नही था वहॉ पर भी कमल खिल गया, यह बात भी सही हैं। मोदी लोक सभा के आम चुनाव मे जीत के बाद एक बात वे बार बार कहते है कि 125 करोड की जनता का उन्हे समर्थन मिला है। इसका मतलब यह है कि उन्हें सम्पूर्ण भारत का चाहे वह मतदाता भी न हो समर्थन प्राप्त न भी ही बाकी निरंक है उन्होने जनता से कांग्रेस मुक्त भारत की अपील भी की थी, और अब वे राज्यों मे भी कांग्रेस मुक्त राज्यो ंकी अपील कर रहे हैं।अब यदि मोदी की बात का आगे अर्थ निकाला जाय तो आगे लगातार कमल खिले रहने के लिये कीचड का होना आवश्यक है लेकिन जब कांग्रेस मुक्त भारत हो जावेगा तब कमल खिलने के लिये कीचड कौन फैलायेगा ? और यदि कीचड नहीं होगा तो ‘‘कमल‘‘का क्या होगा। इसलिये राजनेताओ को अपने चुटकले अंदाज और भाषणो मे तुकबन्दी करते समय इस बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिये कि उनकी स्वंय की बाते उन पर कही स्वंय पर उलटी न हो जावें।वैसे मोदी जी इस समय कुछ ज्यादा ही उत्साह मे है और उनके रफतार की गति अधिक होने के बावजूद असामान्य है जो तात्कालिक रूप से प्रसिघ्दयां तो प्राप्त कर सकते है और तालिया भी पीट सकती हैें लेकिन स्थायी प्रभाव क्या होगा, यह वक्त ही बतलावेगा।

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

निर्मल भारत !स्वतंत्र भारत! स्वच्छ भारत!‘‘नरेन्द्र‘‘ का आव्हान....

   प्रधानमंत्री ने 2 अक्टूबर को गांधी जयन्ती व शास्त्री जयन्ती के अवसर पर‘‘झाडू‘‘लगाकर स्वच्छता महाअभियान की शुरूआत कर और 3 अक्टूबर को आकाशवाणी के द्वारा देश की 95 प्रतिशत से अधिक जनता को अपने मन की बात कहकर ‘‘नरेन्द्र‘‘ (विवेकानन्द) बनने की ओर एक और सकारात्मक दृढ कदम उठाया हैं। देश का दुर्भाग्य ही यह है कि ‘‘मन‘‘‘मोहने‘‘ वाले कभी भी अपने नाम को सार्थक नहीं कर पाये व 10 वर्षं के लम्बे कार्यकाल मे ‘‘ंमन‘‘की बात ‘‘मन-मोहन‘‘नही कर सके जबकि‘‘नरेन्द्र‘‘ ने 100 दिनों से थोडा अधिक की   अवधि में ही अपने मन की बात ‘आकाश‘‘-‘वाणी के रूप में जनता के मन में उतार दी।
    स्वाधीनता आन्दोलन के अतिरिक्त गांधी जी की पहचान मुख्य रूप से दो कार्यो से होती रही है। एक‘‘अहिंसा‘‘ और दूसरा ‘‘स्वच्छता के प्रति दृढ कार्य विश्वास‘‘ व उसे सर्वप्रथम स्वंय पर लागू करना। इसी प्रकार लालबहादुर शास्त्री की पहचान भी मुख्यतः दो रूपों मे होती है।एक उनका नारा जय जवान जय किसान (जो बहुत प्रसिघ्द भी हुआ )और दूसरा देश में अनाज की बचत के लिये सप्ताह में एक दिवस का उपवास का आव्हान।इस उपवास के पीछे भी शरीर एवं आत्मा की शुध्द़ता व स्वच्छता का भाव स्वयंमेव ही जुडा हुआ है। देश की बहुसंख्यक जनता भी ‘‘जय जवान से जय किसान‘‘ के बीच मे लगमग शामिल हो जाती है। इस प्रकार 2 अक्टूबर को नरेन्द्र मोदी ने देश के नागरिको को देश की स्वच्छता अभियान मे सक्रिय रूप से शामिल होने का आव्हान कर दोनो महापुरूषो को समाहित कर लिया है।मोदी की एक खूबी यह भी रही है कि वे जब भी जनता के बीच किसी भी मुददे को लेकर प्रस्तुत होते है तो वे उसे जनता के मन मे इतना गहरा उतारने का प्रयास करते है कि वे जन-मुददे बनकर व वजनदार होकर उनके(मोदी के) स्वंय के मुददे (एजेन्डा)न रहकर वे सम्भावित राजनैतिक आलोचनाओ से बच जाते हैं। 
स्वच्छता अभियान केे प्रारम्भ मे ही मोदी ने उन आशंकाओ को भी व्यक्त कर दिया कि इस मुददे पर कोई‘‘राजनीति‘‘नहीं की जानी चाहियें। इसे राजनीति से दूर ही रखें। लेकिन यह देश राजनितिज्ञों का है, मोदी खुद राजनैतिक है,और हमारे राजनितिज्ञो के कण-कण, तन मन मे राजनीति समाहित है।ं आलोचना करना हमारा जन्म सिघ्द-राजनैतिक-मूलभूत-अधिकार है।ऐसी मान्यता के रहते राजनीति तो होनी ही है, चाहे वह देश को आगे ले जाने वाले अच्छे कार्य के लिये ही क्यों न होे। आलोचक तो आलोचना करेंगें ही और उस पर राजनीति भी करेंगें, जो दिख भी रही है।इसीलिये शायद किसी ने सत्य ही कहा है कि आलोचको का कभी स्मारक नहीं बनता है। शायद इसी सत्य को भॉपकर मोदी ने पूर्व मंें ही चेतावनी दे दी थी।
         वास्तव मे यदि देश को स्वच्छ करना है और बनाये रखना है तो हमे रोग का इलाज करने के बजाय रोग उत्पन्न ही न हो इस दृष्टि से कार्य करना होगा।अर्थात् स्वच्छता बनाये रखने के बजाय गंदगी ही न हो ,न पैदा करे, इसको प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिये भौतिक साधन सेे ज्यादा आवश्यकता हमे अपने चरित्र,स्वभाव आौर आदतों को सुधारने की होगी । हम मे से प्रत्येक नागरिक यदि यह दृढ संकल्प ले लेता हे कि वह स्वंय न ही अपने घर मे और न सार्वजनिक स्थल पर कोई गंदगी करेगा और न ही फैलायेगा तो निश्चित रूप से स्वच्छता अभियान का 70-80 प्रतिशत कार्य बगैर किसी खर्च के सफल हो सकता है।ं तब फिर स्थानीय स्वायत संस्थाओं को सिर्फ इस बात का प्रबंध करना होगा कि दैेनिक व्यक्तिगत जीवन में व सार्वजनिक जीवन में जो कचरा पैदा होता हैं उसको एकत्रित करने से लेकर वर्गीकृत कर नष्ट करने का प्रबंध किस प्रकार से सुचारू रूप से हो सकता हैं ताकि वे नागरिक जो गंदगी न फैलाने की प्रतिज्ञा ले चुके है, उन्हे दिनचर्या से उत्पन्न प्राकृतिक गंदगी को नष्ट करने मे सहायता मिल सके।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के परिणामों से भौंचक्क देशभक्त नागरिक!

  पिछले दो दिनों से सम्पूर्ण मिडिया में स्वाभाविक रूप से चीन के राष्ट्रपति के दौरे की चर्चा है।नरेन्द्र मोदी हमेशा कुछ न कुछ ऐसा कार्य अवश्य करते ह,ैं जो किसी न किसी अर्थाें एवं संदर्भों मे ऐतिहासिक होते हैं।ं चाहे गोधरा कांड के बाद उनका मुख्यमंत्री के रूप में सफलता पूर्वक पन्द्रह साल का सफर या उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 2014 के आम चुनावों में स्वतंत्रता के बाद मिली ऐतिहासिक अभूतपूर्व सफलता या फिर उनका पडोसी देशो सहित सार्क देशों के राष्ट्र्राध्यक्षों की उपस्थिति में ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह। भारत में चीन के राष्ट्रªपति का यह प्रथम दौरा नही ंथा,बावजूद इसके, यह दौरा इस अर्थ में ऐतिहासिक हो गया कि भारत के प्रधानमंत्री के जन्म दिवस पर शायद पहली बार विश्व की पांच सबसे बडी ताकतों में से एक चीन के राष्ट्र्रपति की उपस्थिति ने उन क्षणो को ऐतिहासिक बना कर मोदी के मुकुट पर चार चॉद लगा दिये। मोदी वैसे भी अपने आतिथ्य और मिजाज पुरसी के लिये अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति लिये हुये है।
अधिकाशंतः राजनैतिक क्षेत्रों व आलोचकों की दृष्टि मे शी जिनपिंग ं(चीन के राष्ट्र्र्रपति) की मुलाकात को ऐतिहासिक बताया जा रहा हैं। और ऐसा क्यों न कहा भी जाय,जब देश के विकास के विभिन्न व्यापक क्षेत्रों मे कुल 15 समझौते (साबरमती में हुये समझौतों को मिलाकर) दोनों राष्टा्रे के बीच सम्पादित हुये है। लेकिन इन ऐंतिहासिक समझौतों की सफलता की छाया मेें हमारा ध्यान राष्ट्र्र के आत्म सम्मान का सबसे अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा सीमा विवाद की ओर नही जा पाया। भारत चीन सीमा पर चीन द्वारा लगातार सीमा का उल्लंघन किया जा रहा है। लेकिन  शायद हमारा नेतृत्व बातचीत के टेबल पर इनके मद्देनजर आत्म सम्मान को लौटाने के लिये कोई ठोस बातचीत न करके अपने ही मंुह का जायका खराब नहीं करना चाहता है।
एक नागरिक की हैसियत से मेरी नजरें भारी भरकम 15 समझौंतों के पुलिंदें में उस समझौते को ढूंढते-ढूंढतें पथरा गई हैं जहां सीमा विवाद के सम्बध में वास्तविक तथ्यों के साथ हमारी सीमा के हितांे ंकी रक्षा के लिये भी कोई लिखित समझौता हुआ हों? किसी भी विदेशी राष्ट्र्राध्यक्ष के साथ 15 समझौतांे मे देश की सुरक्षा और सीमा विवाद से जुडे समझोैते का न होना निश्चित रूप से उस पाटर्ी्र के प्रधानमंत्री के लिये प्रश्न वाचक चिन्ह लगाते हैं जो हमेशा चीन और पाकिस्तान से सीमा के मुददे पर दो टूक निर्णय लेने में विश्वास रखती रही है, और इस बात का आक्षेप लगाती रही हैं कि इस मुद्दे पर देश हित में कांग्रेस की सरकार ने कोई निर्णय नहीं लेकर हमेशा   त्यागा ही है। मोदी जी ने चीन की घुसपैठ पर चिन्ता जताकर व एल0ए0सी0 के सत्यापन की बात कह कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली।शी जिनपिंग ं(चीन के राष्ट्र्रपति) ने यह कहकर भारतीय प्रधान मंत्री का मनोबल बढाया कि सीमा विवाद हमारे सबंधों के आडे नहीं आयेगा।चुनावी भाषणों के दौरान पाकिस्तान और चीन को ललकारने वाले मोदी जी का वह जोश इन दो दिनों मे कहां खो गया ?शायद साबरमति की झील में जाकर ठण्डा हो गया हैं।
एक तरफ तो डायनिंग टेबल पर भोजन के साथ चर्चा हो रही है, और दूसरी ओर उसी समय चीन सीमा पर उधम करने से बाज नहीं आ रहा है। ल़द्धाख चुमार की विडियो को मिडिया बातचीत की टेबल के साथ-साथ दिखा रहा है।देश की जिस युवा मत की बदौलत मूल रूप से मोदी इस गददी पर पहॅंुचे हैं, उसे मोदी ने वास्तव मे निराश ही किया हैं। क्या वार्ता चालू होने के पूर्व भारत सरकार द्वारा चीन को इस बात की वास्तविक रूप से कडी चेतावनी नही ंदी जा सकती थी कि यदि सीमा पर लगातार उलंध्घन करने व भडकाने का कार्य किया जाता रहेगा तो वार्ता रद्द हो सकती हैं। यह साहस यदि हम बातचीत के टेबल में नही ंदिखा सके तो यह भी शंकास्पद हो जाता हैं कि हम आवश्यकता पडने पर दुस्साहस दिखाने का प्रयास कर सकेेगे।
नेहरू जी के समय मे नारा लगाया जाता था कि''हिन्दी चीनी भाई-भाइ'र्' तो क्या अब हम ''हमारी भूमि आई-गई''की दिशा में बढ रहे हैं।चाहे मामला तिब्बत का ही लें या अरूणाचल का मामला लंे,भारत के पक्ष में और सैनिक हितांे पर एक भी आश्वासन/वादा चीन के राष्ट्र्रपति द्वारा नही दिया गया है, ऐसी स्थिति में क्या हम इस बात की गलती नही करते जा रहे हैं कि लगातार चल रहे सीमा उल्लधंन के बावजूद चीन को अपना श्रेष्ठतर मित्र मानते रहें।मुझे यह लगता है जब भी देश की सीमा का मामला आता है तो देश की सरकारे बगले झांकने लगती हैं और जनता कों बरगलाने के लिये सिर्फ बातांें का जमा-खर्च ही परोसा करती हैंं।अगर हमें मातृभूमि की एक एक इंच भूमि की सुरक्षा करनी हो,और उसे अक्क्षुण्ण बनाए रखना हो तो देश के नागरिकों को विशेषकर युवाओं को सामने आना होगा। 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

दिल्ली में ‘‘महामहिम‘‘ द्वारा नई सरकार की संभावनाओं की तलाश!

तथ्यात्मक,नैतिक,संवैधानिक,कानूनन,न्यायिक व प्रचलित परिपाटी के विरू़द्ध? 

   पिछले कुछ दिनो से नई दिल्ली मे भाजपा के नेतृत्व मे नई सरकार के गठन की चर्चा तेजी से पुनः सुखियों मे है। खास कर जब से मिडिया मे यह खबर लगातार छप रही है कि दिल्ली के उपराज्यपाल ने नई सरकार के गठन के संबंध मे हरी झड़ी देकर राष्ट्र्र्र्रपति शासन समाप्त करने की सिफारिश केन्द्रीय सरकार कोे भेजी है। अब तो उपराज्यपाल की राष्ट्रपति को भेजी गई चिट्टी भी मिडिया मे आ गई है।भारत एक मजबूत लोकतंात्रिक देश है। लेकिन राजनैतिक स्वार्थ के पूर्ति हेतु लोकतंांित्रक संस्थाये ,प्रणाली और अंगो को संविधान व कानून का तकनीकि जामा पहनाने का प्रयास किया जाकर, किस तरह से कमजोर किया जा सकता है, यह दिल्ली सरकार बनाने के प्रयासो के आइने मे देखा जाना चाहिये। जिसकीे बानगी को निम्नानुसार देखा-पढा जा सकता है। 
        ''राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद या तो एक वर्ष के अन्दर नई सरकार का गठन हो या पुनः'' एक वर्ष की अवधि के लिये राष्ट्रपति शासन बढाऐ जाने का निर्णय,या विधानसभा भंग कर नये चुनाव का निर्णय उपराज्यपाल कीे सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार संसद के दोनो संदनो द्वारा लिया जाना आवश्यक है। यह अकाट्य संवैधानिक कानूनी व्यवस्था दिल्ली राज्य के मामले में है। लेकिन वास्तव में क्या राज्यपाल अपना उक्त सवैंधानिक दायित्व निष्पक्ष रूप से निर्वहन कर रहे है ? वास्तव मंे क्या भाजपा के नेतृत्व मे अल्पमत की नई सरकार के गठन का प्रयास कर रहे है ? यदि वास्तव में ऐसा होने जा रहा है, तो उपराज्यपाल की यह सिफारिश संविधान पर एक हथौडा जैसी होगी। जिसकी मार से लोकतंत्र के एक भाग मे हल्की सी दरार जो लोकतंत्र के प्रहरी केे दिल मे दर्द पैदा कर देने वाली होेगी। दिल्ली मे जिस तरह की नई सरकार के गठन पर विभिन्न राजनेैतिक दलो ने आधिकारिक स्टैण्ड लिया है, वह न केवल विचित्र है, बल्कि देश के राजनैतिक इतिहास मे शायद यह पहली बार हो रहा है। जहॉ कोई भी राजनैतिक दल औपचारिक रूप से न तो सरकार बनाने के लिये आगे आया है और न ही सरकार बनाने का दावा किया गया है या कर रहा है, बल्कि मिडिया द्वारा सवाल पूछे जाने पर प्रत्येक राजनेैतिक दल ने अधिकृत रूप से सरकार बनाने के संबंध में दावे से प्रत्यक्ष रूप से इन्कार ही किया है। अंर्थात् प्रत्यक्ष रूप से समस्त राजनैतिक दलो का यह एक अधिकृत ऐजेन्डा है। लेकिन छिपा हुआ ऐजेन्डा क्या है यह सभी जानते है। वैसे ही जैसे कोई भी राजनैतिक दल या राजनेता स्वंय को भ्रष्टाचार का घोर विरोधी कहलाना पसन्द करता है लेकिन वास्तव में.....।
जब कोई भी राजनैतिक दल उपराज्यपाल के सामने प्रत्यक्ष रूप से आकर दावा प्रस्तुत नही कर रहा है।न ही किसी भी पार्टी का विभाजन होंकर सरकार बनाने के लिये अन्य दलो का बहुमत का दल नही बन सका है। अब ऐसी कौन सी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि महामहिम उपराज्यपाल को लगने लगा है कि भाजपा दिल्ली मे स्थायी सरकार बना लेगी। वह भी तब जब दिल्ली की तीनो महत्वपूर्ण पार्टियां भाजपा,काग्रेस व आप काआधिकारिक स्टैण्ड देखा जाये तो ये वे परस्पर घोर विरोधी रूख लेते हुये परस्पर समर्थन से लगातार इन्कार करने के साथ एक दूसरे पर खरीद फरोक्त व लालच का आरोप भी लगा रहे हैं। अब जब सबसे बडी पार्टी भाजपा की सदस्यो की सख्या 31 (अकाली दल सहित 32) से घटकर 28 हो गई है,और केन्द्रीय गृहमंत्री व भाजपा के वरिष्ठतम नेता राजनाथ सिह का यह बयान कि भाजपा जोड-तोड की राजनीति से सरकार नही बनाएगी, व भाजपा के प्रवक्ताओ द्वारा भी यह कहा गया है कि हम संविधान के बाहर जाकर कार्य नही करेगें।तब किसी अन्य दल का समर्थन मिले बिना और जब किसी अन्य दलो के विधायक/विधायको का समूह भाजपा मे शामिल नहीं हुआ है व न ही भाजपा को समर्थन की वकालत कर रहे है, तब बिना खरीद फरोक्त व दल-बदल के बहुमत का जादुई आकडा 34 को कैसे पाकर सरकार बना सकती है, यह प्रश्न लोकतंत्र के रक्षको के मन में निरंतर आशंका उत्पन्न कर रहा है। भाजपा इस बात का खुलासा बिलकुल भी नही कर रही कि वह बहुमत कैसे पायेगी/जुटायेगी। ऐसी स्थिति मंे और ,जब पार्टी उपराज्यपाल के निमंत्रण के पूर्व तक बहुमत का दावा नहीं कर रही है। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय यह कथन है कि उपराज्यपाल का निमंत्रण मिलने के आधें घंटे के भीतर पार्टी अपना नेता चुन लेगी ,उक्त संदर्भ में संज्ञान लेने योग्य बयान है। 
यदि हम पिछले पन्नो को पलटे जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुये थे तब उपराज्यपाल ने भाजपा को सबसे बडी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का निमत्रणं दिया था। तब भाजपा द्वारा इस आधार पर सरकार बनाने से साफ इन्कार कर दिया गया था कि भाजपा के पास न तो सरकार बनाने के लिये पूर्ण बहुमत है और न ही जनता ने उन्हे सरकार बनाने का जनादेश दिया है,अतः वे विपक्ष मे बैठना ज्यादा पसन्द करेगें।तब उपराज्यपाल ने काग्रेस केे द्वारा एक तरफा आप पार्टी को दिये गये लिखित समर्थन की चिटठी के बाद ही आप पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को(जिन्होने तब भी सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत नही किया था) सरकार बनाने का निमत्रण दिया था। तब चौतरफा दबाव के आगे 18 सूत्रों के आधार पर अनिच्छा से सरकार बनाई गई थी।लेकिन तब उनके पास बिना मांगे पूर्ण बहुमत था। तब भाजपा ने भी यह कथन किया था कि विधानसभा में मुददो के आधार पर सरकार को समथर््ान देगे। इस प्रकार एक बहुमत की सरकार जिसके बहुमत के बाबत् उपराज्यपाल ने स्वंय के आकंडों की संतुष्टी के बाद ही सरकार का गठन किया था। आप पार्टी द्वारा लोकपाल के मुददो पर विधान सभा मे हार जाने के कारण बहुमत खो देने से केजरीवाल की सरकार को इस्तीफा देना पडा। तब से लेकर आज तक दिल्ली विधान सभा की स्थिति में सरकार बनाने के लिये आकडो की स्थिति मे कोई बुनियादी फर्क नही आया है।यदि कोई बदलाव आया है तो आप व काग्रेस दोनो पार्टीयां जो अब दो विपरीत कोनो मे खडी हो कर बहुमत से एकदम दूर हो गई।तब किस आधार पर उपराज्यपाल किसी भी दल को सरकार बनाने का न्यौता दे सकते है जब उनके पास केन्दीय्र सरकार को रिपोर्ट देने के समय तक किसी भी पार्टी का सरकार बनाने का औपचारिक दावा लंबित नही था,और न ही कोई पार्टी या गठबंधन प्रत्यक्ष रूप से बहुमत के करीब है।
जहॉ तक सबसे बडी पार्टी भाजपा को पुनः निमंत्रण दने का प्रश्न है यह कदम राज्यपाल वर्तमान संदर्भ   में दूसरी बार नहीं उठा सकते है। एक तो अन्य समस्त पार्टियो ने भाजपा के विरोध की ्घोषणा की है। दूसरे यह तो कोई टेस्ट क्रिक्रेट का खेल नही है जहॉ दूसरी पारी का अवसर मिलता है, जब फिर से ओपनर बेटिग  करने आ जाता है। यह सरकार गठन की लगातार प्रक्रिया है जिसमें उपरोक्त तीनो विकल्पो मंे से प्रथम दो विकल्प के उपयोग के बाद सरकार बनाने का कोई दावा लंबित नहीं होने के कारण अंतिम विकल्प विधान सभा भंग का ही रह जाता हैं। यदि राज्यपाल यह मान रहे है कि विधान सभा के फर्श पर ही बहुमत का निर्णय होना चाहिये, व बात परम्परा की है तो फिर वे आप पार्टी के नेता को  पूर्व परम्परा के आधार पर पुनः क्यो नहीं निमंत्रण दे देते है जिसने पहले भी क्राग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाकर विश्वास मत हासिल कर उपराज्यपाल के निमंत्रण के निर्णय को सही सिद्ध  किया था। यदि एक निर्दलीय विधायक या जदयू विधायक उपराज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करते है तो क्या उपराज्यपाल उच्चतम न्यायालय के निर्देश के तहत जिसका हवाला उन्होने अपनी चिट्ठी मे किया है, सरकार बनाने के लिये उनको बुलायेगें ?े क्योकि बहुमत का निर्णय तो विधान सभा के फर्श पर ही होगा ?उपराज्यपाल का यह कृत्य किसी भी गैरकानूनी दल-बदल को बढावा देने वाला ही सिद्ध होगा ? ( कानूनी रूप से भी दल बदल हो सकता है) दो तिहाई सदस्यो के विभाजन के साथ दल बदल को भी कानूनी मान्यता प्राप्त है। लेकिन जो अभी तक हुआ नहीं है। सार यही है कि भाजपा परोक्ष रूप से राज्यपाल के माध्यम से क्रांग्रेस/आप पार्टी के विधायकों को मंत्री पद/लाभ के पद के द्वारा कारण दल-बदल कराने अनैतिक प्रयास करना होगा यदि उसे सरकार बनाने दे व बनाये रखना है तो।
उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों, परिपाटियों व प्रचलित परम्पराओें का उदाहरण उपराज्यपाल के भविष्य के गर्भ मे तकनीकि रूप से छुपे हुये निर्णय के लिये दिये जा रहे है। उन सभी मामलो मे किसी न किसी पक्ष द्वारा या तो बहुमत के दावे के साथ सरकार बनाने का दावा किया गया था या बहुमत के संबंध में सदस्यो की हस्ताक्षरयुक्त सूची प्रस्तुत की गई थी या सदस्यो की परेड़ कराई गई थी। यद्यपि सूची का सत्यापन विधानसभा के फर्श पर ही किया जाना था। यहॉ जब सूची ही प्रस्तुत नहीं की गई है और न ही कोई दावा किसी भी रूप में प्रस्तुत किया गया है, तब उसके विधान सभा के फर्श पर सत्यापन का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। वास्तव में  प्रत्येक पार्टी अपने राजनैतिक चाले अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये चल रही है। शायद भाजपा राजनैतिक चालों के तहत अत्यधिक आलोचना की स्थिति में संभावनाओं के विपरीत उपराज्यपाल के निमंत्रण को अस्वीकार कर जनता के बीच इस संदेश के साथ चुनाव में जा सकती हे कि वह सत्तालोलुप नहीं है व वह जनादेश प्राप्त करना चाहती है। उपराज्यपाल को इन चालो से बचना चाहिऐ व संविधान की रक्षा करने का संवैधानिक दायित्व निभाना चाहिये।इसके लिये उनके पास एक मात्र विकल्प ही शेष है कि वे राज्य विधानसभा को भंग कर पुनःचुुनाव की सिफारिश केन्द्रीय सरकार से करने के लिये पुनःसिफारिश पत्र लिखे।    
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं) 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

राहुल ‘बाबा‘ का उद्बोध! मोदी जापान में ड्रम बजा रहे है! बचकाना कथन!

   राहुल बाबा या तो ‘‘ मननोहन‘‘ हो जाते है अर्थात्  कुछ बोलते ही नहीं है या वे बाबा(बच्चे) बन जाते हैं जब, कुछ बोलने का प्रयास करते है क्योकिं उनके बोल प्रायःबच्चों जैसे ही होते है।देश एवं देश के नागरिक  नित-प्रतिदिन विभिन्न समस्याओं से रूबरू होते है जिस पर राजनेताओ की प्रतिक्रियाये स्वभाविक रूप से अपेक्षित रहती है। लेकिन पिछले काफी समय से यह देखा गया है  कि राहुल बाबा चाहे वे सत्ता मे हो या विपक्ष मे देश मे घटने वाली विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाये चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो अथवा धार्मिक हो या अन्य कोइर्, हमने राहुल को अकसर उनसे मुंह मोडते हुये देखा है। और जब भी भूले बिसरे वे किसी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते है तो उसका स्तर ऐसा होता कि वे स्वंय की हंसी का पात्र बना लेते है।
अमेठी दौरे के दौरान पत्रकारो से चर्चा करते हुये राहुल गांधी का मोदी की जापान यात्रा पर किया गया कटाक्ष पूर्ण बयान कि ‘‘देश बिजली संकट से जूझ रहा हैं और हमारे प्रधान मंत्री जापान में ढोल बजा रहे है यहां पर लोगों के पास बिजली पानी नही है और सब्जियां भी महगी है।‘‘‘‘वास्तव मे यह बयान स्वंय राहुल गांधी पर ही कटाक्ष पूर्ण हो गया।उक्त बयान उन्होने अमेठी दौरे के समय दिया। क्या उन्होने बिजली ,पानी ,रोड महगांई की स्थिति अमेठी की ,उत्तर प्रदेश की लिये या देश की व्यक्त की ? लेकिन किसी भी सूरत में  यह स्थिति पिछले सौ दिनो मे उत्पन्न नहीं हुई हैं बल्कि पिछले सडसठ सालों के शासन/कुशासन/सुशासन ? के कारण पैदा हुई है। जिस पर पिछले दस सालों से व उसके पूर्व के अधिकाशं समय राहुल गांधी की देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पार्टी का ही शासन रहा है।इसके लिए जिम्मेदार कौन ? इस निर्णय पर पहुचने मे शायद ही किसी को कोई शंका होगी चाहिये। बल्कि इस बात के लिये तो राहुल गांधी को उनके  विपक्षी दलों द्वारा धन्यवाद देना चाहिये कि देश और देश के नागरिकों की वास्तिविक स्थिति को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से  उन्होने स्वीकारा है, जिसकी लगातार आलोचना पिछले कई समय से विभिन्न विपक्षी दल करते चले आ रहे थे, किन्तु कांग्रेस ने कभी उसे स्वीकारा नहीं था।
राहुल बाबा शायद इस बात को भूल गये उनके नाना जब भी  देश या विदेश मे दौरे पर जाते थे, तो वे बच्चो के साथ उन्मुक्त भाव से शिरकत ़कर घुल मिल जाते थे तभी वे चाचा नेहरू कहलाये। कुछ इसी प्रकार पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद का बच्चों के प्रति वात्सल्य था ।मोदी जी भी जापान जाकर इसी तरह बच्चों के एक कार्यक्रम कल मे घुल मिल गये। राहुल बाबा उक्त  कटाक्ष करते समय भूल गये कि वास्तव मे वे क्या कहने जा रहे है और क्या कह गये? वास्तव मे देश का यह दुर्भाग्य है कि जहां पहली बार  स्वस्थ परिपक्व  विपक्ष  का पूर्णता अभाव है जो लोकतंत्र की सफलता ेके लिये घातक है। लोकतंत्र मे बेलगांम सत्ता.धारी दल पर अकुंश जागरूक और समझदार विपक्ष ही कर सकता हैं।पिछले सौ दिनो मे मोदी  की सत्ता और  उनके व्यक्तिव का ऐहसास तो हर जगह हुआ है। लेकिन विपक्ष कहीं भी मैाजूद नही पाया गया। उसका सबसे बडा कारण देश की सबसे पुरानी काग्रेस पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी के पास है।इसलिये देश व कांग्रेस के हित में है कि एक अनुभवी और परिपक्त व्यक्तिव के हार्थो मे काग्रेस अपना नेतृत्व सौपेैं।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

जनता के सेवक “बयानवीर” राजनेता आखिर कब! ‘संजीदगी’ से बोलंेगे ?0

     जनता के सेवक "बयानवीर" राजनेता आखिर कब! 'संजीदगी' से बोलंेगे ?                                                                            
बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यो में हुये उप चुनाव परिणामो ने एक बार पुनः नेताआंे की बयानबाजी की कलाई खोल दी है। विगत लम्बे समय से यह अनुभव किया जाता रहा है कि देश मंे जब भी कोई राजनीतिक या अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ घटती हैं, तो उसके संबंध में प्रत्येक राजनैतिक दल व उनके नेता कभी भी स्वयं की गलती स्वीकार न करते हुए तथा अपने को सर्वोच्च मानते हुए हमेशा अपने विपक्षी लोगो पर घटना  के संबंध में तुरंत आरोप जड़ देते हैं। फिर चाहे उन घटनाओ के घटने में स्वयं उनका ही गाहे -बगाहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष  रूप से हाथ क्यो न रहा हो। राजनीति के इस दुष्चक्र के कारण ही राजनीति स्वस्थ न होकर विषैली हो गयी है। 
उप चुनावों के निर्णयांे पर विभिन्न राजनेताआंे के बयान की बानगी देखिए। बिहार में जनता दल (यू), आर.जे.डी., व कांग्रेस के महागठबंधन की जीत पर जनता दल (यू) के महासचिव के.सी. त्यागी का बयान कि ''लोकसभा चुनाव के बाद जनता ने अपनी गलती सुधार ली है,'' क्या यह हास्यास्पद कथन नही है? वे यह भूल गये कि वे स्वयं को तो जनता का सेवक कहलाते हैं और गलतियो को जनता पर थोपते हैं। लेकिन जनता का निर्णय कभी भी गलत नहीं होता है। वास्तव में उक्त नेता व दलांे ने अपनी कुछ गलतियाँ सुधारी हैं, तभी जनता ने उन्हे पहले से बेहतर परिणाम दिये हैं। इसी प्रकार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कश्मीर में यह बयानय कि यदि कश्मीर की जनता को देश के अन्य प्रांतो के समान विकास चाहिएय  तो वे भाजपा की सरकार  बनावंे।अमित शाह बयान देते समय शायद यह भूल गये कि विभिन्न प्रंातो मे यदि विकास हुआ होता तोे फिर हाल के लोकसभा चुनाव में देश में भाजपा की सरकार की आवश्यकता ही क्यांे होती। या तीन महिनों में ही भाजपा ने देश के अन्य राज्यांे का समूचा विकास कर दिया है ? इसलिये उन्हे कश्मीर मे भी सत्ता सौंपी जानी चाहिए। यदि उनका कथन माना जाय तो एक स्वर से कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाजपा को सत्ता सौंप देना चाहिए। शायद वे कहना कुछ चाहते थे, लेकिन कह कुछ गये। इस तरह के अनेकों अनगिनत उदारहण हमारे देश के राजनैतिक सामाजिक ढांचे मे पडे़ हैं। लेकिन फ्रिक किसको है? "बयानवीर" अपने बयान इस तरह के देते चले आ रहे हैं, जिन्हे प्रिन्ट,इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया जनता के बीच परोसता हैय जनता उनको सुनती है,देखती है।यदि वास्तव में जनता उनको अनसुना कर दे या अपनी गहरी प्रतिक्रिया दे, तो इस तरह के ऊल-जलूल बयानो की संख्या में कमी हो सकती है। क्या वास्तव मे ऐसा होगा, प्रश्न यही है ? 

 (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)





शनिवार, 16 अगस्त 2014

आखिर “दिल्ली” की जनता के बीच कौन है ‘‘भगोडा’’?


                       
 आखिर "दिल्ली" की जनता के बीच कौन है ''भगोडा''?   
   
इस समय दिल्ली प्रदेश में सरकार बनने की संभावनाएं से लेकर राष्ट्रपति शासन बढाने/ ंविधानसभा भंग करने की चर्चाए चल रही है। लेकिन इन सबके बीच जो महत्वपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा रहे है वह ''भगोडा'' को लेकर है। आखिर, इस दिल्ली की जनता का ''भगोड़ा'' कौन ? इसके लिए यह जानना होगा कि ''भगोड़ा'' किसे कहा जाता है।
''भगोडा'' का सामान्य अर्थ है, व्यक्ति का अपनी जिम्मेदारी से भागना। ''जिम्मेदारी'' भी कई प्रकार की हो सकती है। स्वस्फुरित थोपी गई, जबरदस्ती या ओढी हुई जिम्मेदारी अथवा किसी के द्वारा दी गई जिम्मेदारी को स्वीकार करना, या संवैधानिक जिम्मेदारी। उपरोक्त परिपेक्ष में क्या केजरीवाल ''भगोड़ा'' जैसा उन्हे लगातार विभिन्न राजनैतिक पार्टीयो से लेकर मीडिया द्वारा न केवल आरोपित किया जा रहा है, बल्कि उनके लगातार आरोपो के दबाव से शायद दब कर 'आप' केजरीवाल का इस संबंध में दिया गया स्पष्टीकरण भी अप्रत्यक्ष रूप से इसे गल्ती मान रहा है।
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 32 सीट पाकर भाजपा सबसे बडे दल बना। दूसरे नम्बर का दल प्रथम बार चुनाव में उतरी 'आप' पार्टी को 28 सीट मिली। देश की सबसे पुरानी पार्टी 'कॅाग्रेस' को मात्र 8 सीटे प्राप्त हुई। लोकतंत्र में जब लोकसभा/विधान सभा के आम चुनावों में किसी पार्टी या गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है, तब सबसे बड़ी पार्टी को ही सामान्यतया सरकार बनाने का अधिकार होता है व ऐसी परिपाटी भी है। राष्ट्रपति/ राज्यपाल भी सामान्यतः इसी आधार पर सरकार बनाने के लिये निमंत्रित करते हैं। यह पहला मौका नहीं है जब विधान सभा या लोक सभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहींे मिला। इसके पूर्व भी लोंकसभा व विधानसभाओं के आम चुनावो में पूर्ण बहुमत प्राप्त न होने पर सबसे बडे दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमत्रित किया गया था। यद्यपि पूर्व में लोकसभा में सबसे बडे दल के नेता के रूप में आमंत्रित नेता ने विनम्रता पूर्वक निमंत्रण अस्वीकार कर दिया था। लेकिन विधानसभा मे ऐसे ''निमंत्रण'' कोे कई बार स्वीकार किया जाकर सरकार बनाई गई। कुछ मामलो में वह बहुमत सिघ्द कर पायी लेकिन कुछ मामलो मे नही कर पाई और अंततः इस्तीफे देने पड़े।
जब सबसे बडी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने राज्यपाल के निमत्रण को ठुकराया और सरकार नहीं बनाई तो वह 'भगोडा' नही कहलाई। दूसरी बडी पार्टी 'आप' जिसने यह कहकर कि न समर्थन देगे न समर्थन मांगेगे के आधार पर, एक तरफा, बिना मंागे, बिना शर्त, कांग्रेस का समर्थन प्राप्त हुआ व भाजपा ने भी मुददो के आधार पर, सशर्त समर्थन देने के वायदे के बाद, तीन दिन तक ना नुकर के बाद 18 मुददा्े पर आधारित सरकार का गठन कर, उन मुददो के लिये अन्य पार्टियो से समर्थन मांगा गया। 'आप' पार्टी को जनता द्वारा बहुमत न देने के बावजूद सबसे बडी पार्टी न होने के बाद भी मुददो पर बनाई गई सरकार का मुददे पर समर्थन न मिलने पर "आप''का सरकार का इस्तीफा देना कैसे भगोड़ा कहलायेगा, प्रश्न यह है। इस देश मे सरकार की कालावधि पूर्ण करने के पूर्व सरकार का यह प्रथम इस्तीफा नहीं है। इसके पूर्व भी कई प्रदेशो में इस तरह की घटनाये घटित होकर बीच अवधि मे ही कई सरकारो ने इस्तीफे दिये है। लेकिन किसी भी इस्तीफा देने वाली सरकार को इसके पूर्व भगोड़ा नहीं कहा गया। तब फिर 'आप' के केजरीवाल को ही क्यो भगोडा कहा जाये? यदि जिम्मेदारी सेे भागना भगोडा है, तो 'आप' को जनता ने बहुमत न देकर जिम्मेदारी नही सौपी थी। उन्हेाने मुददे के संमर्थन के आधार पर जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार की थी। सिद्धांत के खातिर मुददे पर अडे़ रहने के कारण, समर्थन वापसी के कारण उन्हे इस्तीफा देना पडा। भाजपा को किसी ने 'भगोडा' नही कहा और न ही काग्रेस को जिसनें लोकपाल बिल के मुददे पर समर्थन वापसी की धमकी देकर खिलाफ वोट डालकर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उसे भी भगोड़ा नहींे कहा गया।
अतः में मैं एक कहानी का उदाहरण देकर 'भगोड़ा' तय करने का कार्य जनता के विवेक पर छोडता हूॅ।दिल्ली की यमुना नदी के तट के दूसरे ओर कुछ नागरिक जो कई दिनो से बाढ़ के कारण भूखे, बीमार होकर असहाय थे। दिल्ली के नागरिको ने आव्हान किया कि नदी के उस पार जाकर उन असहाय व्यक्ति की सेवा सुश्रुसा की जावे। विभिन्न राजनैतिंक पार्टिया 'भाजपा' 'आप' 'कांग्रेस' व अन्य पार्टिया व उनके नेतागण सिर्फ जनता की सेवा के नाम पर राजनीति चमकाते रहते है ऐसा दावा हमेशा उनका रहता है। जनता के आहवान पर ये सेवा करने वाले राजनेता लोग जो नदी के इस छोर पर खडे हुए थे, दूसरे छोर के असहाय व्यक्तियो को देख रहे थे, को तट की दूसरी उस ओर जाकर उन्हेे निकालने का निर्णय राजनेताओ द्वारा लिया गया। लेकिन तभी तेजी से बाढ़ आ गई जिसका ''विकराल रूप'' देखकर सर्वप्रथम भाजपा' के लोग जो संख्या में बहुसंख्यक थे द्वारा आगे न बढने की मजबूरी दर्शित करते हुए वे सब वापिस लौट गये। इसी बीच 'कंाग्रेस' व 'आप' ने एक दूसरे की ओर देखा। काग्रेस ने यह मेसेज दिया कि उसे 'नाव' बनाकर नदी की बाढ़ को पार कर किया जावे। क्योकि वह लोकतंत्र की सबसे बडी सेवाभावी पार्टी अपने को मानती है। चंूकि 'आप' पर सबसे ज्यादा नागरिक सेवा का नया भूत सवार था अतः उन्होने कांग्रेस की नाव बनाकर नदी पार करने का प्रयास किया। लेकिन जेैसे ही नाव आगे बडी कंाग्रेस ने अपनी आदत के मुताबिक आरोपो की झडी लगा दी, जिसके थपेडो से नाव को नुकसान पहुंचकर उसमे छेद होने लगे। तब नाव को डूबने की आशंका से 'आप' को लगा कि वह काग्रेस के साथ वे स्वयं भी डूब जायेगे। तब उन्होने वापिस तट पर आने का निर्णय लिया और इस प्रकार सरकार का इस्तीफा हो गया।
आगे आपका निर्णय है!

                  (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)


 



आखिर महँगाई कब तक? थमेगी?कम होगी?खत्म होगी?

आखिर महँगाई कब तक? थमेगी?कम होगी?खत्म होगी?
       हाल मे हुये देश में आम चुनाव में ''यूपीए'' सरकार के विरूद्ध अन्य मुददो के साथ प्रमुख मुद्दा 'महँगाई' का ही था। इससे परेशान होकर ही नरेन्द्र मोदी के उक्त मुद्दे पर आकर्षित करने वाले आश्वासन देने वाली भाजपा की मोह माया मे फंसकर जनता ने विराट रूप से बढती हुई महँगाई की विराट समस्या से निजात पाने हेतू विराट बहुमत की प्रथम बार गैर कांग्रेसी सरकार को सत्तारूढ कर ठोस कदम उठाया। लेकिन जनता क्या अपने को ठगा हुआ तो महसूस नही कर रही है़ ? क्योकि देश की जनता तत्काल परिणाम चाहती है। 'महँगाई'के मुददे पर 'यूपीए' सरकार ने भी 100 दिन के अन्दर महँगाई को नियंत्रित करने की बात कही थी। इसके पूर्व इंदिरा गांधी भी 'गरीबी हटाओ' के नारे से सत्ता पर आरुढ़ हो चूकी थी। लेकिन क्या हुआ ?
आखिर यह महंगाई 'कब' और 'कैसे' थमेगी, कम होगी। इसके लिए आम जनता की नजर में यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि आखिर 'महँगाई' कहते किसे है? महँगाई का शाब्दिक अर्थ सामान्य बोलचाल की भाषा मे महँगा बिकने वाला माल या महंगी मिलने वाली सर्विस हो सकती है। यदि एक लाख की कोई चीज बाजार में बिकती है और उसको खरीदने की हमारी क्षमता एक लाख बीस हजार रूपये की है, तो क्या यह 'महँगाई' कहलायेगी। लेकिन इसके विपरीत यदि कोई चीज बाजार में 100रूपये की है जिसके लिये हमारे पास मात्र 50 रूपये है तो क्या वह महँगाई कहलायेगी, विवेचना का प्रश्न यही है। आर्थिक दृष्टिकोण से महँगाई का संबंध आपके क्रय करने की क्षमता से है न कि माल के महंगे होने से है। क्येाकि यदि आपकी क्रय क्षमता महंगे माल को खरीदने के लिये पर्याप्त है तो उसे 'महँगाई का वह डंक नही महसूस होगा व ''महंगाई डायन खाय जात है'' (फिल्म पीपली लाइव) का गीत नही गुनगुनाना पडेगा। लेकिन हमारे देश मे क्या वास्तव मे यही स्थिति है? शायद नही। वास्तव मे महँगाई का असर कम करने के लिये देा तरफा रास्ते अपनाये जाना चाहिए। एक व्यक्ति की क्रय क्षमता बढाकर अर्थात उसकी आय बढाकर व दूसरा माल की लागत व बाजार मूल्यं कम करके। लेकिन आय बढाने की भी एक सीमा होती, इसलिए लागत को कम करके ही महँगाई का स्थायी निदान किया जा सकता है। अंग्रेजी की एक कहावत का हिन्दी अर्थ यह है ''प्रश्न यह नही है कि आपकी आय क्या है, प्रश्न यह है कि आप बचाते क्या है, क्योकि अधिक बचत ही अधिक 'आय' है।''
महँगाई की वास्तविकता को कानूनी चोला भी पहनाया जा चुका है, जहंा सरकारी कर्मचारियो को महँगाई भत्ता दिया जाता हैं व समय समय पर उसे बढाया भी जाता है। अर्थात महँगाई निरन्तर बढने वाली वास्तविकता है जिसे प्रत्येक सरकार ने स्वीकार कर उससे निपटने के लिए नौकरी पेशा लोगों को महँगाई भत्ता देकर दूसरी ओर कुछ विशेष आर्थिक रूप से पिछडे वर्गो को सब्सीडी देकर महंगाई से निपटने का प्रयास करती आ रही है। लेकिन महँगाई की यह वास्तविकता यही पर समाप्त नही हो जाती है। यदि हमे इसका स्थायी, दूरगामी निराकरण करना है, तो हमे महँगाई के उन अनसुलझे पहलू पर जाना होगा जहां से वह पैदा होती है। महँगाई के बहुत से अनेक कारण हो सकते है जो शोध का विषय हो सकते है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारक है, जो हमारी नजरो के सामने से प्रत्येक समय गुजरता है जिसकी चकाचौंद मे हमारा दिमाग शायद कुछ सोच ही नही पाता है, वह माल को बाजार मे बेचने के लिए ''बाजारू'' बनाने के लिये उसके विज्ञापन पर होने वाला असीमित खर्च है। जो अंततः उपभोक्ता से ही वसूल किया जाता है। आज कोई भी उत्पाद जिसका देश मे उत्पादन हो रहा है, उसकी उत्पादक लागत से लेकर बाजार मूल्य तक, जब वह माल बाजार मे, काश्मीर से कन्याकुमारी तक उपभोक्ता के हाथ में पहुंचता है तब उसका बाजार मूल्य, लागत मूल्य से सामान्यता कई गुना ज्यादा हो जाता है। इस बात को समझने के लिये हमे इस बात का ध्यान देना होगा कि इस कई गुना बढ़े बाजार मूल्य में कई प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर के साथ व्यापारियो के अनेकानेक कई स्तर की कई कडियो से गुजरने के कारण उस पर होने वाले खर्च के साथ सबसे बडा खर्च जो विज्ञापन पर होने वाला खर्च है। क्या आपने कभी नमक को मार्केटेबल (बाजारयोग्य) बनाने के लिए विज्ञापन के लिए करोडो रूपये खर्च की कल्पना की थी। क्या इस देश में पानी भी बिकेगा, इसकी कल्पना थी। मुझे नही मालूम कि भविष्य में पानी, नमक के साथ साथ 'हवा' भी ''बाजार'' मे बिकेगी ? क्योकि इस प्रकृति का इतना शोषण हो चुका कि 'शुद्ध' हवा लेने के लिए बचा ही क्या है ?
क्या सरकार का यह दायित्व नही है कि विज्ञापन मे जो अनाप-शनाप अनुत्पादिक खर्च हो रहा है, उस पर रोक लगाई जाय। इससे माल की बाजार कीमत को कम कर भी ''मार्केटेबल'' (जिसके लिये विज्ञापन खर्च का औचित्य बताया जाता है) बनाकर उपभोक्ता तक पहुचाने का प्रयास किया जा सकता है महत्वपूर्ण बात महँगाई के इस मुददे में यह भी है कि बाजार मूल्य से उत्पादक को बढेे हुए मूल्यो का फायदा नही मिलता है जिसके कुछ हिस्से का वह हकदार अवश्य है, क्येाकि वह 'निर्माता' है। उत्पाद का बढ़ा हुआ मूल्य, उत्पादन और उपभोक्ता के बीच की बिचोलियो की कई स्तर की कडियों के मुनाफे से गुजरता हुआ विज्ञापन के महंगे खर्चे से मार खाता हुआ उपभोक्ता तक पहुंचता है। इसमें कानूनी ,नैतिक और आत्म संयम तीनो बंधन तत्वो की आवश्यकता हैं। मुनाफाखेारी के कारण बदनाम बिचोलियो की कडियो को कम करके इन पर अंकुश लगाकर न केवल उत्पाद का बाजार मूल्य कम किया जा सकता है बल्कि शेष बची अतिरिक्त व्यवसाइयो की कडियांे को उत्पादन में लगाकर देश के उत्पादन में वृद्धि भी की जा सकती हैं। सरकार एक और आवश्यक वस्तु पर जैसे रेत को ''नीलामी'' प्रक्रिया से विक्रय कर खजाना भरती है, जिससे कि इसकी वास्तविक मूल्य के कई-कई गुना बढ़ जाता है। इसके विपरीत शराब जिसका उपभोग अभिजात्य वर्ग द्वारा किया जाता है को ''लाटरी'' प्रणाली से विक्रय करती है जबकि वास्तव में उसे सरकारी आय बढ़ाने एवं सामाजिक बुराई को कम करने हेतु उसकी ''नीलामी'' करनी चाहिए व रेत को लाटरी प्रक्र्रिया से विक्र्रय कर उसका मूल्य कम करना चाहिए।
इस देश मे, व्यक्ति जब अपनी दिनचर्या शुरू करता है तो उसे ''विधायिका ''द्वारा बनाये गये सैकडो कानूनो से होकर गुजरना पडता है। घर से बाहर निकलते हीे ''सार्वजनिक स्थल पर थूकना मना है,'' यह हमारे देश का कानून है। जब आप चौपाया गाडी मे बैठते है तो उसमे प्राथमिक उपचार बाक्स व 'सीट बेल्ट' लगा होना कानूनन् जरूरी है । जब आप कोई गैर कानूनी या अनैतिक कार्य करते है तो उसे भी हमारे देश में मात्र वैधानिक चेतावनी लिखकर किया जा सकता है, और यह भी एक कानून है। जैसे सिगरेट पीनंे के लिये। जब हमारे देश में इस सीमा तक कानून बने है (कितना पालन होता है यह प्रश्न अलग है) तब विज्ञापन खर्च कोे कम करने के लिए कोई कानून क्यो नही, बन सकता है? क्यो नही बनना चाहिए? इसका जवाब नवनिर्वाचित सरकार को आम नागरिको को देना होगा। आप जानते है सहकारी बैंको में ऋण के भुगतान के मामलो मे सामान्यता ब्याज मूल धन से ज्यादा नही वसूल किया जाता है। तब इस तरह का प्रतिबन्ध विज्ञापन खर्च पर क्यो नही लगाया जाता जो कि एक अनुत्पादिक खर्च है, प्रश्न यह है। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से लेकर अन्य मूलभूत संवैधानिक अधिकार भी निर्बाध नही है तब विज्ञापन खर्च पर संवैधानिक प्रतिबंध क्यो नही लगाया जा सकता है। मै यह आशा करता हंू आम लोगो सहित बुद्धिजीवीयो व अर्थशास्त्रीयो की इस दिशा मे सोचने की अत्यंत आवश्यकता है वे इस संबंध में मुहिम बनाकार यदि कोई सुझाव पेश करते है तो वह सबके हित मे,देश हित में होगा।
  राजीव खण्डेलवाल (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)




शनिवार, 26 जुलाई 2014

जस्टिज मारकंडेय काटजू के खुलासे से उठते यक्ष प्रश्न?

​जस्टिज मारकंडेय काटजू के खुलासे से उठते यक्ष प्रश्न?

         
प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमेन व उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मारकंडेय काटजू ने हाल ही मे मद्रास हाइकेार्ट मे एक जज को पदेान्नत कर अतिरिक्त न्यायाधीश बनाने मे व उनके सेवा कार्यकाल को प्रथम एक वर्ष व बाद में पुनः दो वर्ष बढाने व अन्ततः स्थायी करने के मामले मे जो खुलासा किया है, उससे देश की न्यायपालिका एवं कार्यपालिका के उच्चतम स्तर पर उंगली उठने लगी है।
भारत विश्व का सबसे बडा सफल लोकतांत्रिक देश है। यह लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका, कार्यपलिका, विधायिका, एवं प्रेस के चार पहियों पर टिका है। देश के इतिहास मे यह शायद पहली बार हुआ है जब न्यायपालिका में पदस्थ रहे एक उच्च व्यक्ति ने लोकतंत्र के एक मजबूत स्तम्भ ''मीडिया'' के माध्यम से लोकतंत्र के अन्य तीनो महत्वपूर्ण स्तम्भ विधायिका, कार्यपालिका, एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर उपरोक्त खुलासा कर एक प्रश्न चिन्ह लगा दिया है, जो लोकतंत्र के लिये कहीं घातक सिद्ध न हो जाये ? चिन्ता का विषय यही है।
एक भ्रष्ट आचरण से आरोपित जज अशोक कुमार जिनके खिलाफ केन्द्रीय जॉंच ऐजेन्सी आई.बी. ने भ्रष्टाचार के सबूत दिये हो, उनको पदोन्नति देकर, न केवल मद्रास हाइकोर्ट का अतिरिक्त जज बनाया, बल्कि उन्हे एक्स्टेन्शन देकर स्थायी जज भी बना दिया गया। इसमें तत्कालीन अवधि से संबंधित देश के उच्चतम न्यायालय के तीन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीशो सहित प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को जस्टिस काटजू ने आरोपित किया है। पी. एम. ओ. द्वारा कुछ दलित सांसदो द्वारा लिखे गये पत्र के आधार पर उक्त जज के बारे मे कार्यवाही करने बाबत कानून मंत्री को लिखा गया पत्र, शायद जस्टिस काटजू के आरोप की पुष्टि ही करता है।
अब यहां सबसे बडा प्रश्न जो उत्पन्न होता है वह यह कि क्या इस खुलासे से उच्चतम न्यायालय के सर्वोच्च व्यक्ति की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर आंच नही आ गई है ? साथ ही विधायिका के सर्वोच्च प्रभावशाली व्यक्ति तत्कालीन प्रधानमंत्री की प्रसिद्ध ईमानदारी भी शक के घेरे मे नही आ गई है ?
उच्चतम न्यायालय का ंपांच सदस्यीय कॉलेजियम जिसके प्रमुख मुखिया मुख्य न्यायाधीश होते है तथा उच्च एवं उच्चतम न्यायलय में न्यायाधीशो की नियुक्ति इस कॉलेजियम द्वारा ही की जाती है। ऐसी स्थिति मे एक आरोपित भ्रष्ट जज जिसके खिलाफ केन्द्रीय खुफिया एजेन्सी आई.बी. ने सबूत प्रस्तुत किये हों, को इस आधार पर कि वह दलित वर्ग से है व तमिलनाडू की तत्कालीन सत्तारूढ पार्टी की ''इच्छा'' का प्रतीक है, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करने के बजाय प्रधानमंत्री के दबाव मे आकर उन्हे पहले एक वर्ष तथा पुनः देा वर्ष एक्स्टेंशन देने के दोषी क्या अन्ततः उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश नही माने जावेगे? जैसा कि जस्टिस काटजू ने आरोपित किया है।
यदि जस्टिस काटजू की बात सही है तो उनके खुलासे से देश के आम नागरिक के बीच क्या यह संदेश नहीं जायेगा कि कार्यपालिका व विधायिका, उच्चतम न्यायालय पर अपने प्रभाव का दबाव डालकर, न्यायालय के किसी भी क्षेत्र को किसी भी सीमा तक प्रभावित कर सकती है ? इस आशंका के बादल का छटनॉ न्यायपालिका की निष्पक्षता बने रहने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
बात तत्कालीन प्रधानमंत्री डां. मनमोहन सिंह की ईमानदारी की भी कर ली जावे। ईमानदारी का यह मतलब कदापि नही है कि आर्थिक लेनदेन को ही भ्रष्टाचार कहा जाय। जो व्यक्ति कानून,अपने सिद्धांतो, नैतिक मूल्यो, नियम व प्रचलित नियमो (कस्टमरी कानून) के विरूद्ध कार्य करता है, वह भी भ्रष्ट आचरण का अपराधी है। उक्त मामले मे डां. मनमोहन सिंह, ने अपने राजनैतिक हित साधने हेतु (शायद सरकार बचाने के लिए डी. एम. क.े के दबाव में आकर) एक आरोपित भ्रष्ट जज, जिसके खिलाफ आई. बी. के द्वारा भष्ट्राचार के सबूत प्रस्तुत किये जाने के बावजूद कानून मंत्री को उस व्यक्ति के हितार्थ कार्यवाही करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यलय द्वारा पत्र लिखने से निश्चित रूप से मनमोहन सिंह भी व्यक्तिगत दबाव द्वारा गलत फायदा देने के आरोप से मुक्त नही हो सकते है।
देश की न्यायपालिका व कार्यपालिका के सर्वोच्च स्तर पर यदि उनकी स्वतंत्रता व निष्पक्षता, संदिग्ध है? तो देश की सम्पूर्ण व्यवस्था का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना मात्र ही की जा सकती है।

   (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

         

बुधवार, 16 जुलाई 2014

‘‘वेद प्रताप वैदिक’’ की ‘‘हाफिज सईद’’ से हुई मुलाकात से उत्पन्न यक्ष प्रश्न ?

  ''वेद प्रताप वैदिक'' की ''हाफिज सईद'' से हुई मुलाकात से उत्पन्न यक्ष प्रश्न?
                                                                                                                                     राजीव खण्डेलवाल               

​                               
             देश के राष्ट्रीय चैनलो और राजनैतिक हलको में उक्त मुलाकात न केवल तीव्र चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि उसके औचित्य पर लगातार प्रश्न उठाए जा रहे है। कुछ क्षेत्रो में तो उक्त मुलाकात पर व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वंतत्रता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता व खोज पत्रकारिता के      अधिकार के आधार पर मौन धारण कर लिया है। क्या यह मुलाकात उनके पत्रकार/खोजी पत्रकार की हैसियत से है, क्या भारत सरकार के अघोषित दूत के रूप में है, या सामान्य नागरिक की हैसियत से है? यह सत्यता जानना जरूरी है।
            इस बात से वेद प्रताप वैदिक और भारत सरकार दोनो ने साफ इंकार किया है कि   ''उन्हे'' ''सरकार'' ने  भेजा था। प्रश्न यह है कि मीडिया और विपक्षी दलो खासकर कांग्रेस, द्वारा इस मुलाकात पर क्यो इतना हाय तौबा मचायी जा रही है ? मुम्बई बम कांड व अन्य आतंकवादी घटनाओ का घोषित फरार अपराधी भारत का  दुश्मन नं. एक, दुनिया के चार सबसे बडे आतंकवादियो में से एक  हाफिज सईद से भारत के किसी पत्रकार की मुलाकात  इस तरह की यह पहली घटना नही है। इसके पूर्व भी संसद पर हमला करने वाले कुख्यात आंतकवादी अफजल गुरू, अर्न्तराष्ट्रीय आंतकवादी दाउद इब्राहिम, मुंबई बम कांड का अपराधी आतंकवादी कसाब व मास्टर माइंड अबू सलेम, लिट्टे के प्रभाकरण, तमिलनाडू के कुख्यात  चंदन तस्कर वीरप्पन,नक्सलवादी समेत अनेक कुख्यात राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय अपराधी हुए है जिनसे फोन पर हुई बातचीत मुलाकातों व साक्षात्कार  सीधे रिकार्डेड एवं लाईव प्रसारण पहले भी आज के अनेक राष्ट्रीय चेनलों के सम्मानित पत्रकारगणों द्वारा किये जा चुके है। वे ही आज वैदिक की उक्त मुलाकात को पानी पी पी कर आलोचना करने से गुरेज नही कर रहे है। मुझे याद आता है मुबंई बंमकांड के समय की आतंकवादी घटना का न केवल सीधा प्रसारण किया गया था। बल्कि एक चैनल द्वारा आतंकवादियो से बातचीत का भी सीधा प्रसारण करके घटना स्थल और विभिन्न घटनाओ की स्थिति की जानकारी का सीधा प्रसारण आतंकवादिओ को मिलने से आतंकवादी घटना केा अंजाम देने में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग मिला था। (मुंबई बम कंाड के  सीधे प्रसारण ने ही मुझे पहली बार लेख लिखने के लिए मजबूर किया था।) कांग्रेस ने तब इनमे से किसी भी मुलाकात या प्रसारण पर कोई आपत्ति नही की थी,  न ही तत्कालीन विपक्ष (भाजपा) ने की। शायद इसीलिए कि तत्समय उन पत्रकारो पर किसी प्रकार की राजनीतिज्ञ छाप  या प्रश्न चिन्ह नही लगा था, जैसे कि आज वेद प्रताप वैदिक के साथ है। वह भी इसलिये क्योकि वे अन्ना आंदोलन से लेकर बाबा रामदेव के आंदोलन में सक्रिय भूमिका अदा करके बाबा रामदेव के मोदी के प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम मे प्रमुख सहयोगी रहे है। अतः उनके राजनैतिक स्टेटस से इंकार नही किया जा सकता है।
             तथाकथित पत्रकारिता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दुहाई देकर उक्त मुलाकात को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करना भी क्या उचित होगा, यह भी एक प्रश्न है? निःसंदेह वेद प्रकाश वैदिक देश के  वरिष्ठतम अत्यंत सम्मानीय अनुभवी व बुजुर्ग पत्रकार है। वे ''न केवल संविधान के ज्ञाता है बल्कि अपने लम्बे अनुभव के कारण संविधान में निहित भावना के मर्मज्ञ भी है। क्या एक पत्रकार के अधिकार, एक नागरिक के नागरिक व संवैधानिक अधिकार से भी ज्यादा है ? जो निर्बाध न होकर संविधान के अंर्तगत कुछ सीमाओ में बाधित है। मुझे अभी हाल के म.प्र. के व्यापम की घटना याद आती है, जब एक दलाल अपराधी के मोबाईल में रिकार्ड किये गये नम्बरो के आधार पर, उन समस्त रिकार्ड मोबाईल नम्बर धारको को ही अपराधी बना दिया गया। जबकि ये तथ्य स्थािपत हो चुके थे कि उनमें से कुछ अभ्यार्थी  व्यापमं परीक्षा में शामिल ही नही हुये, कुछ अभ्यार्थी फेल हो गये अर्थात उन्हे किसी प्रकार का फायदा नही मिला । कुछ उनमें से इंजीनियर भी बन चुके थे। लेकिन मात्र एक फोन के नेक्सस (दमगने) के आधार पर अपराधी बना दिये गये। क्या यही सिद्धांत एक फरार अपराधी आतंकवादी के साथ एक पत्रकार भारतीय नागरिक द्वारा मुलाकात करने पर लागू नही होता है प्रश्न यह है ?
            क्या एक पत्रकार जो कि भारत के नागरिक है को यह अधिकार है कि वह बिना किसी पूर्व सूचना के देश के घोषित मोस्ट वंान्टेड आतंकवादी से अवैध रूप से मुलाकात कर सकते है? क्या इस मुलाकात के बाद वैदिक जी देश की विभिन्न खुफिया जांच ऐजेन्सीयो के जांच के अधिकार क्षेत्र में नही आ गयेे है ? यहां यह उल्लेखनीय है कि वे किसी अपराधी से अनुमति लेकर जेल मे मिलने नही गये थे। इन सब से हटकर क्या एक पत्रकार सेे स्वतंत्रता के नाम पर उक्त मुलाकात के औचित्य पर प्रश्न नही उठाया जा सकता है। यदि हां, तो क्या पत्रकार की हैसियत से हुई यह मुलाकात  किस समाचार पत्र मे प्रकाशित हुई? इंडिया टीवी को भी वैदिक ने स्वयं जानकारी न देकर रजत शर्मा द्वारा बात करने पर  ही जानकारी दी। जहां तक लोगो केा ज्ञात है कि वैदिक जी  किसी भी समाचार पत्र या मीडिया चैनल के पत्रकार  न होकर स्वतंत्र रूप से लिखते रहते है जिसके लिये सामान्यतया किसी मुलाकात या साक्षात्कार की आवश्यकता  नही होती है, और न ही  हाल मे  उनके द्वारा कोई साक्षात्कार किसी का लिया गया है।  क्या वैदिक इस बात के दोषी नही है कि 2 जुलाई की  हुई उनकी मुलाकात को 10 दिन े बाद  फेसबुक के माध्यम से उक्त मुलाकात के फोटोसंेशन जारी किये गये। उन्होने आज तक भी उक्त परस्पर संवाद से केन्द्रीय सरकार को अवगत नही कराया। यदि वे देश हित के लिये मिले थे या हाफिज सईद के हृदय परिवर्तन के लिए उन्होनेे यह वार्ता की, तो क्या यह भारतीय दूतावास की जानकारी में थी? क्या तथाकथित मन परिवर्तन करवाकर वेद प्रताप वैदिक विनोबा भावे या जयप्रकाश नारायण (जिन्होने डाकूओ का आत्मसमर्पण  कराया था) के समतुल्य माने जा सकते हैं?क्या मात्र यह हृदय परिवर्तन काफी होगा या क्या इससे देश की सुरक्षा  व अर्तराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक 60 करोड का  घोषित ईनामी अपराधी पर से प्रश्न चिन्ह हट जायेगा? आश्चर्य इस बात का नही है कि सरकार ने आपसे संपर्क नही किया जैसा कि वैदिक ने कहा, बल्कि आश्चर्य इस बात का है कि ज्ञानी एवं अनुभवी पत्रकार होते हुए भी इस मुलाकात के परिणाम की जानकारी पत्र के माध्यम से या व्यक्तिगत मुलाकात के द्वारा वैदिक ने सरकार व देश की जनता को क्यो नही दी, जब कि वह देश की सुरक्षा आत्म सम्मान अखंडता व राष्ट्रीय भावना से जुडा हुआ मामला है। देश की जनता इसका कारण जानना चाहती है।                    
            क्या एक पत्रकार के अधिकार एक नागरिक अधिकारो से भी ऊपर है? क्या भारतीय संविधान मे दिये गये मूल अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित निर्बाध है? क्या एक पत्रकार जो कि एक भारतीय नागरिक है का दायित्व नही है कि भारत सरकार द्वारा घोषित फरार आतंकवादी अपराधी की लोकेशन के बाबत जानकारी भारत सरकार व खुफिया सुरक्षा ऐजेन्सी के साथ शेयर करते व उसको पकडवाने मे सहयोग करके अपने नागरिक दायित्व का निर्वाह करते। बजाय यह कहते कि भारत सरकार ने उनसे कुछ पूछा ही नही। क्या भारत सरकार यह कह कर अपने दायित्व से मुक्त हो सकती कि उक्त मुलाकात की हवा की बदबू मे उनके किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रिर्मोट योगदान न होने के कारण  उक्त घटना  से कोई लेना देना नही है। क्या यदि एक सामान्य नागरिक  देश के घोषित आंतकवादी से संपर्क करने का प्रयास करते तो अन्य कई पत्रकारो के समान वह भी कानून की जकड मे नही होता,  यक्ष प्रश्न यही है।
            यदि एक पत्रकार की हैसियत से उनकी मुलाकात हुई होती तो निश्चित रूप से वह पूर्व नियोजित होती, समाचार पत्र की टीआरपी बढाने हेतु अभी तक प्रकाशित हो जाती। लेकिन उक्त मुलाकात को सर्वप्रथम फेसबुक के जरिए फोटेा लांच कर  सार्वजनिक किया गया। वैदिक जी ने यह कहा  है कि उनकी यह मुलाकात पूर्व नियोजित न होकर अचानक हुई। क्या यह मुलाकात  मात्र अकस्मात घटना है, जिससे उत्पन्न प्रभाव क्या भारत की राष्ट्रीय भावनाओ के साथ दुर्घटना नही है?
            क्या आपकेा याद नही है कि आडवाणी  का पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर कहे गये बोल मात्र से इतना बडा बवाल बना जिसने उनके राजनैतिक भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था। लेकिन आज इस मुददे पर राष्ट्रवाद को सबसे उपर रखने वाली भाजपा की चुप्पी उन करोडो नागरिको के लिए जो भाजपा को चाहते है, अकल्पनीय व असहनीय है?
            वैदिक जी को इस बात की बधाई दी जानी चाहिए कि भारत एवं अमेरिका सहित दुनिया जिस आतंकवादी को पकडना चाहती है उसकी लोकेशन जब वैदिक जी  को मालूम हो गई। तब उन्होने भारत सरकार से इसे शेयर क्यो नही किया? ताकि भारत सरकार ड्रोन हमले कर उस आतंकवादी का अंत कर सकती है, जिस प्रकार ओसामा बिन लादेन का अमेरिका ने किया था।
            माननीय वेद प्रकाश वैदिक जी देश  की जनता के सामने आकर देश की जनता को उन प्रत्येक क्षणो से अवगत कराइये जो अपने हाफिज के साथ व्यतीत किये थे। यह आपका दायित्व भी है।देश आपकी बात को सच मानकर विश्वास करेगा। इस तरह आपसे जाने अनजाने में यदि कोई तकनीकि अथवा नैतिक ़त्रूटि हो गई हो तो उससे आप मुक्त हो सकेंगे।
            अतः में इस मुलाकात की कोई उपलब्धि भारत या भारत सरकार या स्वयं वैदिक जी को भले ही न  हुई हो लेकिन हाफिज को इस बात की उपलब्धि अवश्य मिली  कि न केवल पाकिस्तानी  मीडिया बल्कि  भारत में वह वैदिक के माध्यम से यह संदेश देने में सफल रहा कि उसका मुंबई बम कांड मे कोई हाथ नही है, जैसा वैदिक ने अपने टीवी साक्षात्कार मे कहा। वैदिक ने हाफिस से मुलाकात कर उक्त संदेश देने के लिए मुलाकात का जो प्लेटफार्म दिया उसके लियेे वे निश्चित रूप से दोषी है।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)


मंगलवार, 1 जुलाई 2014

21 वी सदी के वर्तमान समय मे क्या सिफारिश करना संविधान,कानून, या नैतिकता के विरूद्ध है। राजीव खण्डेलवाल (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है) म्उंपस रू. तंरममअंाींदकमसूंस/लंीववण्बवण्पद ठसवह रू. ूूूण्ंदकवसंदण्बवउ म.प्र. के “व्यापम” कांड की चर्चा प्रदेश में ही नही बल्कि देश में राष्ट्रीय चैनलो के माध्यम से हो रही है।इसमे कोई शक नही है कि लगभग एक लाख नब्बे हजार युवा विद्यार्थियो-अभ्यार्थियो के साथ खिलवाड किया गया है, जहां हम यह कहते है कि इन युवा कंधो पर राष्ट्र की प्रगति के पहिये टिके हुये है। इतने लम्बे समय से व्यापम में चली आ रही धांधलियां जल्दी उजागर नही हो पाई यह भी इस बात का द्योतक है कि इनको करने वाले व्यक्ति न केवल पूरे तंत्र मे व्याप्त है बल्कि उनके बीच परस्पर गहरा छमगने भी है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि देश र्में इस व्यापम कांड की चर्चा इस बात पर नही हो रही है कि इस कांड को करने वाले अधिकारीगण किस गहराई से और आयरन कवर के अंदर अपने इस कृत्य को अंजाम देकर हजारो विद्यार्थियो के जीवन के साथ खिलवाड किया गया, बल्कि “अयोग्य” व्यक्तियो को चुनकर प्रदेश की पू

         म.प्र. के "व्यापम" कांड की चर्चा प्रदेश में ही नही बल्कि देश में राष्ट्रीय चैनलो के माध्यम से हो रही है।इसमे कोई शक नही है कि लगभग एक लाख नब्बे हजार युवा विद्यार्थियो-अभ्यार्थियो के साथ खिलवाड किया गया है, जहां हम यह कहते है कि इन युवा कंधो पर राष्ट्र की प्रगति के पहिये टिके हुये है। इतने लम्बे समय से व्यापम में चली आ रही धांधलियां जल्दी उजागर नही हो पाई यह भी इस बात का द्योतक है कि इनको करने वाले व्यक्ति न केवल पूरे तंत्र मे व्याप्त है बल्कि उनके बीच परस्पर गहरा छमगने भी है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि देश र्में  इस व्यापम कांड की चर्चा इस बात पर नही हो रही है कि इस कांड को करने वाले अधिकारीगण किस गहराई से और आयरन कवर के अंदर अपने इस कृत्य को अंजाम देकर हजारो विद्यार्थियो के जीवन के साथ खिलवाड किया गया, बल्कि "अयोग्य" व्यक्तियो को चुनकर प्रदेश की पूरी जनता के साथ खिलवाड किया गया है। जनता केा इतने इस संशय मे डाल दिया गया कि उसका इलाज करने वाला डाक्टर, उसको पढाने वाला शिक्षक, जमीन नापने वाला पटवारी, प्रशासन कानून व्यवस्था को बनाने वाला कांस्टेबल चलाने वाले डिप्टी कलेक्टर इत्यादि इन सब का सामना आम नागरिक को अपने दैनिक जीवन मे करना होता है वे कितने सही है ?क्या वे गलत व्यक्तियों के पास तो नही पहुंच गये, जो उनके जीवन और जीवन-दिनचर्या से खिलवाड कर सकता है। यह संशय व  परिणाम का कारक उक्त कांड है जिस पर न गंभीरता से कोई आवश्यक कदम उठाये गये है और न ही  इस बात पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि लम्बे समय से एक के बाद एक वर्ष दर वर्ष विभिन्न विषयो में इस तरह का घोटाला बडे आराम से चलता रहा।
            मूल विषय यह है कि इन घोटालेबाजो के क्रियाकलाप पर गहनता से विचार कर रोक लगाने के बजाय, चर्चा इस विषय पर हो रही  है कि किस व्यक्ति ने किस व्यक्ति के लिए सिफारिश की। आरोप लगाने वाले व्यक्तियो से यह पूछा जाना चाहिए की आज के युग मे सार्वजनिक जीवन जी रहे या प्रशासनिक व्यवस्था मे लगे हुए व्यक्तियो से कभी न कभी जब सामान्य लोग या अभ्यार्थी    लोग संपर्क करते है तो वे सामान्यतः संबंधित व्यक्ति की ओर उनके नाम को अग्रेसित करते है जिसे सिफारिश कहा जाता है।सिफारिश करना क्या कानूनन अपराध है व नैतिक रूप से गलत है,प्रश्न यह है। वास्तव में सिफारिश करने वाला व्यक्ति यह नही कह रहा है कि कानून के खिलाफ जाकर संबंधित व्यक्ति को दूसरो के अधिकार छीनकर उसे फायदा दिलाया जाये। वास्तव में उक्त तथाकथित सिफारिशो को मानकर उसकेा करने वाला नौकरशाह या राजनैतिक जब कानून के विरूद्ध उस सिफारिश को लागू करता है तो वह अपराध है व उसको कार्यान्वित करने वाला ही अपराधी है न कि सिफारिश करने वाला।
भष्ट्राचार विरोधी अधिनियम मे जहां रिश्वत लेने व देने वाले दोनो कानूनन अपराधी माने जाते है यह नियम यहां लागू नही होता है।
            मुझे एक उदाहरण याद आता है  80- 90 के युग में बैतूल में एक कलेक्टर थे, किसी व्यक्ति के कार्य  के संबंध मे जब मैं उनसे मिला तो चर्चा के दौरान  उन्होने अपना  बडा स्पष्ट मत रखा था कि चाहे काम भाजपा के व्यक्ति का हो या कांग्रेस के व्यक्ति का जो काम कानूनन सही है उसकेा मै करता हंू। लेकिन जहां विवेक के उपयोग का प्रश्न  की परिस्थितियो आती है, तब मै सत्ताधारी दल के पक्ष मे विवेक का उपयोग करता हंू।यह सिद्धांत इन सिफारिशो पर भी लागू होता है। जंहा सिफारिशे कानून के आडे आती है उसे नही माना जाना चाहिए। लेकिन परिस्थति वश जहां सिफारिशो में विवेक को उपयोग की स्थिति बनती है, तब विवेक उपयोग सिफारिश का पक्ष मे किया जा सकता है, और इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी उस सिफारिश को लागू करने वाले नेता या नौकरशाह की होती है न कि सिफारिश करने वाले व्यक्ति की।   
            इसलिए उन समस्त आरोप लगाने वाले व्यक्तियो से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्होने अपने जीवन में कभी सिफारिश नही की, तो वे बगले झांकने लग जायेगे। इसलिए इस पूरे कांड मे उचित यही होगा कि समस्त अपराधियो केा कानून के दायरे मंे शीध््रा्र लाया जाये ।
            बात जब नैतिकता की जाती है, नैतिक मूल्यो की जाती है तब घटना के असितत्व केा स्वीकार करने वाले जिम्मेदार पद पर बैठे हुए लोग "शास्त्री जी " के समान नैतिक जिम्मेदारी का निर्वहन कर  इस्तीफा देकर नैतिक युग को वापस क्यो नही लाते ?

शनिवार, 21 जून 2014

क्या केम्पाकोला कम्पाउंड के रहवासियो के मानवाधिकार नही है ?


         क्या केम्पाकोला कम्पाउंड के रहवासियो के मानवाधिकार नही है ?
                                                                         
            आज "उच्चतम न्यायालय" के आदेश के पालनार्थ  मुम्बई महानगर पालिका द्वारा केम्पाकोला कम्पाउंड में  "एकता अपार्टमेन्ट सहकारी हाउसिंग सोयाईटी लिमिटेड" द्वारा नियम विरूद्ध निर्मित 102 अवैध फ्लेटों कोे तोडे जाने की कार्यवाही प्रारंभ किये जाने के रूप में प्रारंभिक कदम बिजली पानी व गैस कनेक्शन काटे जाने की कार्यवाही प्रारंभ की जा रही है। पिछले कुछ समय से यह मुद्दा मीडिया की सुर्खिया भी बना। लेकिन मात्र "सुर्खिया" ही रह गई।  मीडिया ट्रायल में परिणीत नही हो पाया।उक्त कम्पाउंड के रहवासियों द्वारा पिछले कई सालो से लडी जा रही न्यायिक लड़ाई अन्ततः वे देश के सर्वोच्च न्यायालय मंे हार गए। यह हार मात्र उनकी सम्पत्ति की हार नही थी बल्कि उन लोगो के दिलो पर एक ऐसा झटका था कि उन्होने अपने मन ही मन व दिल में यह महसूस किया  कि वे वह शायद जिन्दगी की यह आखरी लडाई भी हार गए है। प्रश्न यह है इस स्थिति के लिए वे कितने दोषी है ? क्या यह आत्महत्या का मामला नही है ? या हत्या के प्रयास का मामला है ? या आकस्मिक दुर्घटना मे हुई मृत्यु का मामला है ? या हत्या को प्रेरित करने का प्रयास है ? या "गैर इरादतन मानव हत्या" की बात है ? ये सारे प्रश्न सोसाईटी द्वारा निर्मित अवैध फ्लैट एवं बी एम सी की कार्यवाही व तत्समय पर हुई अकर्मणयता व अनदेखी से उत्पन्न होते है। यदि जानबूझकर 102  अवैघ निर्मित फ्लैटो की खरीदी की गई है तो वे सब निश्चित रूप से  आत्महत्या के दोषी है। लेकिन यदि उन्होने बिना बदनियति के  एवं निष्कपट  बिना किसी अवैध निर्माण की जानकारी के क्रय किया गया है तो निश्चित रूप से उपरोक्त  शेष चारों परिस्थितियां मे से एक अवश्य निर्मित होती  है। जिसके लिए संबंधित व्यक्तियो एव संस्थानो  के विरूद्ध सिविल व अपराधिक प्रकरण दर्ज क्यो नही किया गया है, प्रश्न यह है।
            इस देश में बुद्धिजीवीयो  की बडी भारी संख्या है जो अपने आपको प्रगतिशील मानते है। वे मानवाधिकार के संरक्षण के बडे समर्थक माने जाते है। फिर चाहे देश में आतंकवादी घटनाए हुई हो, या देश के दो दो प्रधानमंत्री की पद पर रहते हुए हत्या हुई हो। मामला चाहे संसद पर हमले का हो या मुंबई बम कांड का या नक्सलवादियो का मामला हो। देश की सुरक्षा व  सम्मान को तहस नहस करने वाले लोग आरोपित  सिद्ध पाये गये इसके बावजूद  कही न कही प्रगतिशीलता के नाम पर तथाकथित मानवाधिकार के उल्लंघन के विरूद्ध  आवाज समय समय पर  उठाई गई है जिसे मीडिया हाउस ने प्रमुखता देकर उस आवाज को मजबूती प्रदान की है। यह देश का बडा दुर्भाग्य है कि उन 102 फ्लेटों मे रहने वाले मानव के अधिकार के संरक्षण के लिए कोई नेता ,संस्था, राजनैतिक पार्टिया वास्तविक रूप में सामने नही आई। क्या ये रहवासी मानव नही है ? क्या उनका कोई अधिकार नही है ? इनका दोष क्या है? इनमे से अधिकांश लोग ऐसे है जिन्हे  फ्लेट के अवैध निर्माण की  कोई जानकारी ही नही थी। उन्होने  अपने जीवनकाल की समस्त अर्जित पूंजी को लगाकर उक्त फ्लैट, सुख शांती व अच्छे दिन के लिए खरीदे थे । क्या उनका यह कदम वे लोग जो  गोलबंद होकर जानबूझकर देश की स्वाभिमान को हथियारो की गोली चलाकर तार तार करते है, उनसे भी खराब है ? इसके बावजूद मानवाधिकार के नाम पर राजनीति के चलते उन्हे संरक्षण प्राप्त हो जाता है। यदि वास्तव में वे मानव होकर उनके मानवाधिकार  नही है, तो उन्हे सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? क्या यह उच्चतम न्यायालय का कर्त्तव्य नही था कि अवैध रूप से निर्मित फ्लैटो को कानूनी रूप से गिराये जाने के निर्णय को सही ठहराने के बावजूद,  इन सोसाईटी के रहवासियो के मानव अधिकारो को सुरक्षा प्रदान करती ? क्या सोसाईटी का निर्माण करने वाले मालिक का कोई दोष नही है। बी एम सी के वे अधिकारी जिनके कार्यकाल के दौरान में उक्त फ्लैटो का अवैध निर्माण हुआ, क्या वे दोषी नही है? माननीय उच्चतम न्यायालय ने इन समस्त दोषी लोगो के विरूद्ध कोई कार्यवाही क्यो नही की ? क्यो नही इनके विरूद्ध सिविल और फौजदारी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गये ? वे निष्कपट खरीददार जिन्हे अवैध निर्माण की जानकारी नही थी, उन्हे उनके पैसे  ब्याज सहित से लौटाने के आदेश उच्चतम न्यायालय ने क्यो नही दिये ? अधिकारियो के विरूद्ध और सोसाईटी के विरूद्ध अवैधानिक कार्य करने व उन्हे सहयोग करने के लिये आर्थिक दंड क्येा नही  आरोपित किया गया।पूर्व मे सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को एक प्रकरण में उनके  द्वारा जारी  गलत आदेश के कारण जुर्माना जमा करने के आदेश दिए थे। अन्य कई प्रकरणो मे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकार  क्षेत्र के बाहर जाकर भी (ऐसा तत्समय महसूस किया गया) पीडित पक्ष को राहत प्रदान की गई। कम से कम इस प्रकरण में मानवाधिकार के नाम पर ही सही, उच्चतम न्यायालय ने इन रहवासियो को सुरक्षा प्रदान करना चाहिए था ताकि ये लोग अपना शेष जीवन शांति पूर्वक व्यतीत कर सकते।
          जहां तक राजनीतिज्ञो का प्रश्न है, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मात्र शब्दो का कथन किया। कोई कार्यवाही अभी तक नही की।  हम जानते है चुनावो के समय कई सरकारो ने कई अवैध कालोनीयो को वैध करने के आदेश  पूर्व मे भी जारी किये  थे। चाहे वह दिल्ली सरकार का मामला हो या अर्जुनसिंह के मामले में म.प्र. का मामला हो। जब कई अवैध कालोनिया एक साथ वैध की जा सकती है तो तब कुछ फ्लैट क्यो नही वैद्य किये जा सकते है, प्रश्न यह है ? यहां यह उल्लेखनीय है कि उक्त सोसाईटी  द्वारा निर्मित पूरा  निर्माण अवैध नही था, बल्कि बिल्डिंग  की उपर की कुछ स्टोरी की निर्माण की अनुमति नही थी। इसे नियमित करने मे कोई बहुत बडे नियमेां का उल्लंघन नही होता। इसे नियमित करने मे  कुछ शर्त व आर्थिक दंड लगाया जा सकता था । महाराष्ट्र सरकार चाहे तो एक अध्यादेश भी इसे नियमित करने के लिये ला सकती है।लेकिन बात जब एक सामान्य आम मानव अधिकार की है। चंूकि उससे राजनीति नही होती है। अतः वह संबंधितो का ध्यान आकर्षित नही करती है।लेकिन जहां राजनीति की गुंजाईश रहती है, वहां ही मानवाधिकार की बात होती हैैैैै। ये ही इस देश की दुर्भाग्य की बात है। 

 





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