रविवार, 20 दिसंबर 2015

त्वरित न्यायिक सक्रियता! क्या न्यायपालिका कार्यपालिका बनते जा रही है?

भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भ है। विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका। संविधान में तीनों के कार्य क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं तथा उन्हें सीमंाकित भी किया गया है। संविधान लागू होने के 65 साल व्यतीत हो जाने के बावजूद तीनों संस्थाएॅं समय-समय पर एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के आरोपो के साथ साथ सर्वोच्चता के मुद्दे पर भी बहस व विवाद करते रहती है, तथा प्रथक-प्रथक रूप से दूसरी संस्थाओं के साथ सांमजस्य के साथ परस्पर मान सम्मान का ध्यान रखते हुए कार्य करते चली आ रही है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद न्यायिक सक्रियता (यह शब्द सर्व प्रथम उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती के द्वारा प्रकाश में लाया गया) के कारण न्यायपालिका ने कई बार ऐसे निर्णय दिये है जो प्रथम दृष्टया कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण प्रतीत होते हैं। लेकिन जनता के हित में होने के कारण अन्ततोगत्वा जनता ने उन निर्णयों को सर अंाखो पर रखकर स्वीकार किया है। तथापि न्यायिक क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग ने इस तरह कानून से परे जाने के आधार पर उक्त निर्णयों की आलोचना भी की हैं।
विगत तीन दिवस आये माननीय उच्चतम् न्यायालय के निर्णयों व आज उच्च न्यायालय दिल्ली के निर्भया मामले में आये निर्णय ने पुनः इस विवाद को न केवल सतह पर ला दिया बल्कि एक नया विवाद भी पैदा कर दिया। माननीय उच्चतम् न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुये उत्तरप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति स्वयं कर उत्तर प्रदेश सरकार को उसे कार्याविन्त करने के आदेश दिये है जो स्पष्टतः कार्यपालिका का कार्य होने के कारण उच्चतम न्यायलय द्वारा प्राथमिक दृष्टि में कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कहा जा सकता है। लेकिन यह निर्णय तब आया जब पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति कंे संबंध में दिये गये निर्देश का उसने पालन नहीं किया तब उच्चतम् न्यायालय ने मजबूरी में उक्त नियुक्ति का आदेश पारित किया। इसके विपरीत लोक हित के विरूद्ध निर्भया कांड में उच्च न्यायालय द्वारा (‘‘आदेश की तारीख पर बालिग हो जाने के बावजूद चूॅकि यौन अपराध करने वाला आरोपी अपराध करते समय नाबालिग था’’) नाबालिक अभियुक्त की रिहाई को रोकने से इनकार कर दिया, चूॅंकि वैसा आदेश पारित करना कानूनन् सम्भव नहीं था। इस प्रकार यहॉं उच्च न्यायलय ने जनता की भावना के अनूरूप निर्णय नहीं दिया, जबकि पूर्व में कानूनन् सम्भव न होने के बावजूद कई ऐसे निर्णय दिये गये जो जन हित में थे। फिर चाहे वह सी.एन.जी का मामला हो, या ड़ीजल गाडी का मामला हो, या अन्य अनेक ऐसे मामले हुये हैं, जहॉ उच्चतम् न्यायालय द्वारा कानून के स्पष्ट प्रावधान न होने के बावजूद जनता की भावना के अनुसार जनहित में निर्णय दिये गये हैं। इस प्रकार न्यायालय द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में बार बार हस्तक्षेप हो रहा है, क्योकि कार्यपालिका अपने कार्य क्षेत्र में अपने दायित्वो को पूरा करने में बारम्बार असफल हो रही है। इसीलिए इस कमी की पूर्ति न्यायिक सक्रियता के मद्ेदनजर न्यायालय जन हित में दिये गये अपने निर्णयो के द्वारा करने का प्रयास कर रही है। अब समय आ गया है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे हेतु उच्चतम संवैधानिक स्तर पर एक समिति बनाई जाय जो इस पर गंभीरता से विचार करे, ताकि भविष्य में इस तरह के निर्णय जन हित में आड़ में न आवे अन्यथा न्यायिक-सक्रियता न्यायिक आराजकता में बदल भी सकती है जिसकी कल्पना आज के शासन व न्यायिक वर्ग शायद नहीं कर पा रहे है।
अंत में लेख की समाप्ति करते करते एक संभ्रात और स्वच्छ छवि व उच्च सोच के नागरिक के समक्ष यह लेख लिख रहा था, के मुख से निकली गई बात को रेखांिकत करना आवश्यक मानता हूं, जो वास्तव में एक प्रश्न पैदा करती है ‘‘न्यायपालिका द्वारा इस तरह के आदेश जो प्राथमिक रूप से अधिनियम के दायरे के बाहर है, जनहित में होने के कारण जिन पर निर्णय वास्तव में मूल रूप से कार्यपालिका व विधायिका को लेना चाहिए था, इस कारण नहीं ले पा रहे है क्योंकि जनहित के बावजूद राजनीति का दंश उतर जाने के कारण उनके द्वारा राजनैतिक रूप से (शायद सम्भावित जन आक्रोश के कारण) निर्णय लेना संभव नहीं हो पा रहा था तो ‘‘क्या कहीं कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच इस हेतु कोई अलिखित गुप्त संधि तो नहीं है?’’

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

‘‘असहिष्णुता‘‘> - <‘‘सहिष्णुता‘‘,आमिर खान + मीडिया’’

  आज जिस तरह पूरे देश में चारो तरफ सहिष्णुता व असहिष्णुता पर बहस चल रही है, उसकी ‘‘गर्म हवा’’ देश की संसद के दोनो सदन तक वृहस्त चर्चा के माध्यम से पहुॅच चुकी है। ऐसा लग रहा है कि देश की समस्त समस्याओं का एक मात्र कारण व इलाज ‘असहिष्णुता’ - ‘सहिष्णुता’ है। यद्यपि बहस ‘‘असहिष्णुता’’ के नाम पर हो रही है लेकिन सहिष्णुता बताये बगैर असहिष्णुता पर बहस पूरी नहीं हो सकती है। यद्यपि असहिष्णुता पर बहस पिछले कुछ समय से खासकर बिहार चुनाव के समय से चल रही है परन्तु फिल्म उद्योग के एक बडे ‘‘आईकॉन’’ आमिर खान की अनजाने में लेकिन सोच समझकर की गई टिप्पणी जिसके द्वारा मूल रूप से उन्होने उनकी पत्नी की भावना को प्रकट किया था, पर पूरे देश में एक बवाल व भूचाल सा मच गया। आमिर द्वारा टिप्पणी बहुत सोच समझकर की गई थी यह इसलिए कह रहा हूॅ कि आमिर ने उस टिप्पणी के बाद एक एक शब्द की दुबारा पुष्टि की थी।
बवाल व भूचाल मचने के मूलतः तीन-चार कारण हो सकते है। एक तो टिप्पणी चूॅंकि आमिर खान ने की है जो देश के तीन सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले (जो संयोग वश सभी मुस्लिम) हीरो में से एक है। सत्यमेव जयते, अतुल्य भारत जैसे कार्यक्रम को चलाये जाने के कारण वे फिल्मी आईकॉन से ज्यादा देश के आईकॉन हो गये हैं, दूसरे आमिर खान का मुस्लिम होना, तीसरा आमिर खान की पत्नी का हिन्दू होना, और चौथा बयान के समय का चुनाव। जब समाचार पत्र व इलेक्ट्रानिक मीडिया की डिबेट (बहस) के कारण देश का वातावरण सहिष्णुता व असहिष्णुता के भॅंवर में पहले से ही फंसा हुआ है, तब आम लोगो का ध्यान आमिर के बयान पर ज्यादा गया।
असहिष्णुता (या सहिष्णुता) पर चर्चा कर जो भी लोग उसका जोरदार तरीके से विरोध कर रहे है उन्हें भी इस बात की समझ ही नहीं है कि ‘‘असहिष्णुता भी कभी सार्थक हो जाती है या सहिष्णुता भी कभी घातक हो सकती है’’। वास्तव में 130 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाला देश का प्रत्येक वयस्क नागरिक जिस दिन असहिष्णु हो जायेगा, उस दिन अखंड भारत की कल्पना पूरी हो जायेगी। लेकिन हमारा देश महान भारत सहिष्णुता के मामले में किसी भी देश से श्रेष्ठ सहिष्णु है। इसके लिए हमें किसी व्यक्ति ,संस्था या अन्य देश के प्रमाण पत्र की आवश्यकता बिलकुल नहीं हैं। चौक चौराहों एवं अखबारो सहित समस्त प्रकार के मीडिया में इस संबंध में चल रही बहस क्या यह देश की जनता की सहिष्णुता नहीं दिखाता है? या मीडिया की असहिष्णुता को नहीं दर्शाता है? यह कौन तय करेगा? क्या यह तय करने की आवश्यकता नहीं है? किसी भी बात को लेकर मीडिया जिस तरह लगातार बेवजह बे-बहस चलवाती है, क्या यह मीडिया की असहिष्णुता नहीं है? देश की यथार्थ सहिष्णुता का फायदा लेकर असहिष्णुता का पाठ वास्तव में वे लोग पढाना चाह रहे है जो लोग स्वयं इससे ग्रसित है। उनको स्वयं के सहिष्णु होने की आवश्यकता है।
यह सहिष्णुता का ही परिचायक है जहॉं 130 करोड से अधिक की जनसंख्या के बीच मात्र सैकडो, हजारो लोगो की असहिष्णुता की प्रतिक्रिया आमिर खान के उक्त पुष्टि किये गये बयान के संबंध में आई, जो वास्तव में मूलतः निंदनीय है। निंदनीय इसलिए नहीं कि आमिर खान ने जो कुछ कहा वह व्यक्तिगत रूप से सही नहीं हो सकता है। लेकिन निदंनीय इसलिए कि उसको सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर मीडिया के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व के क्षेत्र में प्लेग की महामारी के समान फैला दिया, जिससे देश की बदनामी हुई है, जो कि वास्तविकता के विपरीत कोसो दूर व परे है। देश की सीमा के कुछ भाग पर हमला करने वाले तुलनात्मक रूप से आंतकवादी संगठन कम अपराधी है जिसका सटीक जवाब देकर गौरव पूर्ण रूप से हम सुरक्षित रह सकते है। लेकिन देश की सहिष्णुता के कारण ही अनजाने में ही आमिर खान का देश पर असहिष्णुता का आक्रमण वाइरल के समान विश्व में फैल गया जिसको हमें सुधारने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी व लम्बा समय भी लगेगा। वास्तव में आमिर खान को अपनी पत्नी से ही प्रेरणा लेना चाहिए जो सहिष्णु है वे इसलिये कि वे स्वयं की नजर में असहिष्णुता की भुक्त - भोगी होने के बावजूद उन्होंने अपने विचार को वाइरल नहीं किया, बल्कि पति को बताकर उनके साथ शेयर करने का प्रयास किया। यदि वे चाहती तो स्वयं ही मीडिया के माध्यम से बात कर सकती थी।
जब हम देखते है कि आम लोगो के सामने किसी व्यक्ति को मारा जाता है गोलियों से भूना जाता है, महिलाओं के साथ अश्लीलता की जाती है तथा सभी मूक दर्शक बने रहते है तब हमारी सहिष्णुता सहनशीलता ,क्या प्रशन्सनीय होती है? तब वक्त की मांग असहिष्णु होने की होती है। इसलिए आलोचक, समालोचक, लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी, और डिबेट करने-कराने वाले देश को सहिष्णु व असहिष्णु अलग अलग खानो में या मत में न बंाटे, बल्कि नागरिको को सिर्फ इस बात की प्रेरणा दे कि वक्त पर वक्त की मांग के अनुसार सही रूप से सहिष्णु - असहिष्णु रहे, तभी हमारा उद्धार होगा। देश का उद्धार होगा।
फिल्मी कलाकार आमिर को इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए कि सेक्स परदेे के अंदर ही मान्य है। उसी प्रकार उनके या उनके परिवार के आहत विचार जिसके आहत होने का कोई सीधा या परोक्ष कारण देश की सरकार से नहीं है तब उन्होंने देश के आन बान सम्मान पर किसी दूसरे व्यक्ति को प्रश्न् चिन्ह लगाने का अवसर (अनजाने में ही सही) क्यों प्रदान किया? अन्ततः आमिर की पत्नी को कब महसूस हुआ कि ‘असहिष्णुता’ के कारण उनके जीवन पर संकट आया है? पूर्व में आमिर ने स्वतः देश व मोदी के नेतृत्व की तारीफ की थी तो फिर अचानक क्या घट गया कि पत्नी किरण राव के बहाने उन्हे देश का वातावरण इतना असहिष्णु महसूस होने लगा कि वे विदेश में स्थानांतरण की बात करने लगे। ऐसी कौन सी घटना उनकी पत्नी व उनके परिवार के साथ घटित हुई जिस कारण उनमें उक्त भावना उत्पन्न हुई? क्या आमिर खान यह बताने का कष्ट करेगे की उनकी फिल्म से रूष्ट होकर जनता ने कभी उनके परिवार को घमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलायेगे कि उनके किस पड़ोसी ने धमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलाने का प्रयास करेगे कि उनसे किस डॉन ने पैसे वसूली की मांग की जिस कारण उक्त भावना उत्पन्न हुई? इस संबंध में क्या उन्होने कोई प्रथम सूचना पत्र जान के खतरे के रूप में दर्ज कराई? यदि यह सब नहीं हुआ है तो ऐसेे में आमिर खान व पत्नी को बताना ही होगा कि पिछले आठ महीनों में ऐसी कौन सी घटना हुई है जिसके कारण 130 करोड के देश में अन्य नागरिको के मन में आमिर की पत्नी किरण राव के मन में वह विचार आया व दहशत की भावना उत्पन्न हो गई जो 130 करोड़ नागरिको के दिल में उत्पन्न न हो सकी जबकि आमिर की तुलना में आम नागरिको को वैसा सुरक्षा तंत्र तथा आईकॉन के पावर के दम पर उपलब्ध सुरक्षा शक्ति प्राप्त नहीं थी जिस कारण आम नागरिको को तो आमिर खान से ज्यादा डरना चाहिए था।
अन्त में आमिर को देशद्रोही कहना ज्यादती होगा लेकिन उनके द्वारा की गई हरकतों से देश को जो नुकसान हुआ है व देश की छवि का जो ह्रास हुआ है वह किसी देशद्रोही द्वारा की गई कार्यवाही से कम नहीं है।  
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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