मंगलवार, 30 अगस्त 2022

‘‘भ्रष्टाचार की उच्चतम निशानी’’ ‘‘ट्विन टाॅवर्स’’ को जमींदोज करना क्या ‘‘अपरिहार्य’’ था?

-ःप्रथम भागः-

हमारा देश कानून का पालन करने व करवाने के मामले में ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’’ ‘‘अनेकता में एकता लिये हुए’’ एक ‘लचीला’ देश रहा है। यहां ‘‘तंत्र’’ जो शासन-प्रशासन को चलाता है, बुरी तरह से भ्रष्टाचार की गिरफ्त में (बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी कानून) होने के कारण भ्रष्टाचार ‘‘शिष्टाचार’’ में बदल कर चलते-फिरते जीवन का एक अपरिहार्य अंग बन गया है। इस पर चोट करने के लिए व सबक सिखाने के लिए एक ‘‘नजीर’’ बनाने की भावना के मद्देनजर निर्माण संबंधी विभिन्न कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए 9 वर्ष पूर्व बने इन ट्विन टावरों को 28 अगस्त 2022 को मात्र 9 सेकंड में ‘‘भूमिसात’’ कर भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘‘जेहाद’’ कर एक कठोर सांकेतिक संदेश दिया है। प्रश्न यह है कि दिल्ली के कुतुब मीनार से भी ऊंची 101 मीटर दोनों टावरों को जमींदोज करने के अतिरिक्त क्या अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया था? या कि ‘‘आयी मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक’’। इस पर आगे मंथन करने के पूर्व पहले ट्विन टावर का संक्षिप्त इतिहास जान लीजिये। 

नवंबर 2004 में सुपर टेक कंपनी को नोएडा के सेक्टर 93 ए में 84247 वर्ग मीटर जमीन आवंटित हुई थी। सुपरटेक ग्रुप कंपनी ने एमराल्ड कोर्ट सोसाइटी बनाकर वहां फ्लैट निर्माण की परियोजना प्रारंभ की, जिसमें प्रारंभ में 11 मंजिलों के 14 टावर शामिल थे। तत्पश्चात वर्ष 2006 से 2012 के बीच इस योजना में तीन बार संशोधन होकर दो और टावर निर्माण करने की मंजूरी उसी जगह दी गई, जो कि पूर्व में नोएडा अथाॅरिटी एवं कंपनी ने ग्रीन एरिया दर्शाया गया था। वर्ष 2009 में उत्तर प्रदेश सरकार की भवन निर्माण संबंधी ‘‘एफएआर’’ बढ़ाने के निर्णय के बाद सुपरटेक कंपनी को अपनी परियोजना में संशोधन करने में सहायता मिली व प्लान को रिवाइज कर ‘‘उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ते हुए’’ 121 मीटर की ऊंचाई की 40 मंजिला निर्माण की स्वीकृति प्राप्त की। तत्पश्चात 32 मंजिला एपेक्स (टी.16) एवं 29 मंजिला सियोन (टी.17) नामक दो टावरों का निर्माण प्रारंभ किया गया (जिसे अभी जमींदोज किया गया) जिसकी कुल निर्माण लागत लगभग 300 करोड रुपए थी। एमराल्ड कोर्ट सोसाइटी के स्थानीय रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन जिनकी सोसाइटी के ठीक सामने ट्विन टावर का निर्माण हो रहा था, ने इसके निर्माण पर आपत्ति की और वर्ष मार्च 2012 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। 

वर्ष 2014 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा अर्थोरिटिज पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए फटकार लगाते हुए उक्त दोनों टॉवर को तोड़ने का आदेश दिया। न्यायालय ने एनबीआर 2006 एवं एनबीआर 2010 का उल्लघंन पाया। अर्थात दो टावरों के बीच 16 मीटर की दूरी के नियमों का पालन न करके मात्र 8 मीटर की दूरी पर एनओसी जारी कर दी गई। ‘‘एनबीसी 2005’’ (राष्ट्रीय भवन कोड) को भी ताक पर रखकर निर्माण किया गया। जिस जमीन पर उक्त दोनों टॉवर बने, वह पूर्व में बिल्डर द्वारा ग्रीन बेल्ट दिखाया गया था। उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान, कंपनी ने एक टावर तोड़ने की पेशकश की थी, जिसे अस्वीकार कर उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2021 में दोनों टावर तोड़ने के आदेश दिये। उक्त दोनों टॉवरों में 952 फ्लैट बने है, जिसकी लागत मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपये और तोड़ते समय उसका बाजार मूल्य लगभग 600 करोड़ रुपये से अधिक ही है। कंपनी के चेयरमैन आर के अरोड़ा का यह स्पष्टीकरण आया कि कंपनी ने सब नियमों का पालन किया है व नोएडा अर्थोरिटिज की समय-समय पर ली गई आवश्यक स्वीकृति व इजाजत से ही निर्माण कार्य हुआ है। उन्होंने दावा किया है कंपनी ने 70 हजार से ज्यादा फ्लैट बनाये है, जिसमें कि कुल फ्लैट का मात्र 3 प्रतिशत ही विवादित रहा है।

उक्त डिमोलेशन से कई प्रश्न पैदा होते है कि भ्रष्टाचार का उच्चतम स्तर का प्रतीक बनाया जा चुका यह टावर क्या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए और आगे बिल्डर्स के लिए कड़क नजीर बनाने के लिए इसका जमींदोज किया जाकर 600 करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति जो अंततः राष्ट्र की संपत्ति हैं (क्योंकि उसमें लगने वाला समस्त माल हमारे देश का उत्पाद ही तो है।) धूल के धुंए में परिवर्तित करना अर्थात ‘‘अशर्फियाँ लुटें, कोयलों पर मुहर लगाना’’ जरूरी था? रेसीडेंट सोसायटीओं की शिकायत का निराकरण का अन्य कोई विकल्प नहीं था।

भ्रष्टाचार निश्चित रूप से एक बुराई की जड़ है और हम कहते भी है कि इसमें भ्रष्टाचार की बू आ रही हैं। जबकि वास्तव में भ्रष्टाचार में ही ‘बू’ है और वह स्वयं तकनीकि रूप से (व्यवहार में नहीं?) सुगंधित न होकर दुर्गंधित होता है। अर्थात भ्रष्टाचार एक घोर नकारात्मक भाव लिया हुआ कार्य है, जिसका कोई नैतिक बल न होने के बावजूद, सहूलियत अनुसार व्यक्ति उसका ‘उपयोग’ कर ही लेता है। उक्त टावर भ्रष्टाचार की नींव का वह नमूना हैं, जो विनाश के बदले निर्माण लिये हुए है। दो गगनचुंबी आवासीय इमारत जो जरूरतमंद नागरिकों के रहने के लिए बनाई गई, जहां अथाॅरिटीस को ‘‘उंगलियों पर नचाते हुए’’ स्वीकृति ली गई भले ही वह स्वीकृति मिली-भगत व भ्रष्टाचार के द्वारा हुई हो। हमने देखा है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार इतना धुल मिल गया है कि वह पूरी तरह से शिष्टाचार हो गया है, जैसे दोनों में ‘‘चोली दामन का साथ’’ हो। परन्तु उसे हम जमींदोज करने का प्रयास नहीं करते हैं। पुल, पुलिया, सड़क, बांध, सरकारी इमारतें, कारखानें आदि के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार के कारण वे ‘‘बालू की भीत के समान’’ टूट जाए, बह जाए, धंस जाए, गिर जाए तो हमें भूमिसात करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसीलिए यहां पर न्यायालय के डिमोलेशन के आदेश की जरूरत अवश्य ही नहीं है। वहां तो ‘‘तबेले की बला बंदर के सिर मढ़कर’’ ही काम हो जाता है। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के कारम डेम का उदाहरण आपके सामने है, जो पूरा होने के पहले ही भ्रष्टाचार की बली चढ़कर कई गांवों में संकट में डाल दिया।  

यदि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़क नजीर बनाना ही हैं, जहां लेन-देन, करने-कराने अर्थात दोनों पक्षों पर निरोधक कानून रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) जैसे लगाकर गिरफ्तार कर जेल के अंदर बंद करने की कार्रवाई कर ‘‘छठी का दूध क्यों नहीं याद कराया जाता’’? ऐसे करने से बिल्डिंग तोड़ने से ज्यादा कड़क नजीर उन भ्रष्टाचारियों द्वारा तंत्रों का दुरुपयोग कर ‘सांठगाठ’ से भविष्य में ऐसे निर्माण करने के लिए बिल्ड़र निरूत्साहित होते? यद्यपि 300 करोड़ रुपये बड़ी रकम होती हैं लेकिन इस देश में जहां हजारों, लाखों व करोड़ों रूपये के कांड (जैसे 2-जी) हो जाते है व भ्रष्टाचारी व अपराधी जेल के बाहर व देश के बाहर धूमते-फिरते रहते है। वहां ऐसी कंपनीयां के प्रोमोटर्स इन रकमों के आघात को सह सकती हैं। परन्तु जेल जाने के आघात को नहीं सह पायेगी। इसलिए ‘‘अंधे की लकड़ी’’ बने सुप्रीम कोर्ट का यह दायित्व था, कि बिल्डर और एथोरटी पर अनियमित टावर को अनियमित व गैरकानूनी तरीके से कानून व नियम की आड में नियमित कर बनाने पर आर्थिक लाभ के उद्देश्य को बोठल करने के लिए लागत के बराबर व उतनी ही राशि शास्ती के रूप में कंपनी से वसूल कर हितधारकों को बांट देती। साथ ही समस्त लोगों के खिलाफ जहां जांच के लिए गठित एसआईटी ने 26 अफसरों की संलिप्तता बतलाई थी, पर आपराधिक कार्रवाई करने का निर्देश देती और शासन-प्रशासन को निरोधक कानून का उपयोग करने का निर्देश देती तो, जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टावर जमींदोज किया गया वह तो प्राप्त हो जाता है और देश की 600 करोड़ की संपत्ति भी ‘‘धूल के गुबार’’ में परिवर्तित होने से बच जाती और जरूरतमंद नागरिकों को रहने के लिए मकान भी मिल जाते। सार यह कि ‘‘गेहूं के साथ घुन पिसने से’’ बच जाते।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

केजरीवाल मुफ्त की ‘‘रेवड़ियां’’ (चारित्रिक प्रमाण पत्र) देना बंद करें।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री तथा शिक्षा और आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ सीबीआई का छापा व ईडी की जांच पर तिलमिलाए दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं ’आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपनी ‘‘अधजल गगरी से छलका’’ हुआ पानी पी पी कर, बत्तीसी दबाकर, बारम्बार, जोरदार रूप से यह कहते कहते थक नहीं रहे हैं कि मनीष सिसोदिया 24 कैरेट के 100 प्रतिशत ‘‘कट्टर ईमानदार’’ व्यक्ति है, और उन्हें जबरन फंसाया जा रहा है। (अब ‘‘ईमानदारी‘‘ को भी ‘‘कट्टर’’ का आभूषण पहना दिया गया है।) वैसे आज की राजनीति में तो कट्टरता का बोलबाला ही है, शायद इसीलिए सामान्य रूप से इस शब्द का उपयोग हुआ हैं। विपरीत इसके शिक्षा के क्षेत्र में मनीष सिसोदिया जो कि अरविंद केजरीवाल की ‘‘अंगूठी के नगीना’’ हैं, ने ’’अदभुत’’ काम किया है, इसके लिए उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ से विभूषित किया जाना चाहिये, बजाए जेल भेजने के ऐसी मांग काउंटर में सिसोदिया के बचाव में केजरीवाल ने कर डाली।kनिश्चित रूप से मनीष सिसोदिया ने यदि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर उसे एक श्रेष्ठ पद्धति में परिवर्तित कर दिया है, जैसा कि ‘‘अपनी खिचड़ी अलग पकाने वाले’’ अरविंद केजरीवाल व आप पार्टी लगातार न केवल दावा करते आ रहे है, बल्कि वह अपनी सरकार की उक्त सफलता (तथाकथित) शिक्षा नीति और मोहल्ला क्लीनिक और मुफ्त सुविधाएं के आधार पर अन्य प्रदेशों में सफलता पूर्वक वोट भी मांग रहे हैं। उनके कथनानुसार अमेरिका की प्रसिद्ध मैगजीन ’न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री की इस नीति की प्रशंसा करते हुए उनकी प्रशस्ति में मुख्यपृष्ठ पर एक लेख भी छापा है। (या छपवाया गया?) ऐसी स्थिति में ’भारत रत्न’ मांगना उनका ’अधिकार’ तो है? लेकिन यदि इस तरह से ’भारत रत्न’ की ‘‘मॉग व आपूर्ति’’ होने लग जाए तो ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्ति यदि वे जीवित होते तो, निश्चित रूप से इन परिस्थितियों में देश का सर्वोच्य नागरिक पुरस्कार के बनाए रखने के लिए ‘‘भारत रत्न‘‘ वापस कर देते। 

निश्चित रूप से सही और सफल शिक्षा नीति लागू किये जाने के कारण मनीष सिसोदिया को भारत रत्न तो नहीं परन्तु पद्म् विभूषण पाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में भाग लेते हुए उन्हें आवेदन जरूर देना चाहिए। क्योंकि भारत रत्न तो प्रधानमंत्री की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति देते है। (आवेदन देने की कोई प्रक्रिया अन्य सम्मानों के समान नहीं है) वर्तमान स्थिति में यह संभव भी नहीं है। परंतु बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि एक नई अच्छी व सफल शिक्षा नीति होने का दावा किया जा रहा है, को क्या देश के अन्य राज्य लागू करने के लिए उतने ही लालायित है? हो सकता है, तुच्छ राजनीति के चलते अच्छी नीति होने के बावजूद भी दूसरे राज्य या केंद्र इसको अपनाने में हिचक रहे हों। अरविंद केजरीवाल के इस कथन से एक बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि देश के सेलिब्रिटीज् जिन्हें समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च, उच्च ईनाम, पदक व सम्मान मिले हैं, क्या उन्हे आईपीसी, दंड प्रक्रिया संहिता या अन्य आपराधिक कानूनों से उन्मुक्त कर दिया है? 

देश के इतिहास में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च अवार्ड सम्मान पाने के बावजूद अपराधों में लिप्त होने के कारण उन्हें न्यायालीन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ा व कई मामलों में उन्हें सजा भी हुई है। वे सब गणमान्य व्यक्ति राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत होने के कारण क्या उन्हें सीबीआई/ईडी के क्षेत्राधिकार से मुक्त होने का पुरस्कार भी मिल जाता है? इसलिए सिसोदिया को भारत रत्न की पात्रता होने के कारण उनकी अपराध में संलग्नता न होना मानना, बहुत ही बचकाना व बच्चों वाला तर्क एक बड़े पढ़े लिखे व्यक्ति का है। इसी कारण ‘‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते बनते’’ कभी कभी वे हंसी का पात्र भी बन जाते हैं। भाजपा का इस संबंध में किया गया तंज सटीक हैं। ‘‘सत्येन्द्र जैन के लिए पद्म विभूषण, मनीष सिसोदिया को भारत रत्न व अरविंद केजरीवाल को अगला नोबेल पुरस्कार‘‘! यानी सब ‘‘छछूंदरों के सर पर चमेली का तेल’’।

दूसरा उनका कहना कि मैं जानता हूं, मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार हैं। इस देश में ईमानदारी का प्रमाण पत्र देने का अधिकार कब व कैसे मुख्यमंत्री को या आरोपी स्वयं अथवा उनके शुभचिंतकों को दे दिया गया है, यह बात समझ, ज्ञान व जानकारी से परे है। आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टी के चरित्र का प्रमाण पत्र देने की लत क्यों लग गई है। जब उनके पार्टी के प्रवक्ता यह कहते है कि हमारे जितने भी मंत्रियों के खिलाफ केस चलाया गया है चाहे सत्येन्द्र जैन, मनीष सिसोदिया या पूर्व में अन्य कोई, वे सब कट्टर ईमानदार है। 

आप पार्टी के संयोजक केजरीवाल को क्या यह याद दिलाना होगा कि अन्ना आंदोलन जिनकी वे अवैध उत्पत्ति हैं, इसलिये की माइक पर गले फाड़कर चिल्ला-चिल्ला कर अन्ना के सामने वे यह कहते थकते नहीं थे, जो वर्तमान संसद है इसमें लगभग 150 से अधिक सांसद दागी हैं। असली ’’संसद तो सामने खड़े हुए लोग’’ है। इसलिए सही लोकतंत्र वही होगा, जब ये समस्त दागी (आरोपी) सांसद जिन पर विभिन्न गंभीर अपराधों सहित कई प्रकरण चल रहे हैं, संसद से इस्तीफा देकर चल रहे मुकदमे को लड़े और निर्दोष सिद्ध होकर फिर चुनाव लड़कर संसद में आयंे। सोभित उल्लेखनीय बात यह है कि महीनों से जेल में बंद मंत्री सत्येंद्र जैन से अभी तक न तो इस्तीफा लिया गया है और न ही उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया गया है। अब केजरीवाल इस सिद्धांत को ‘‘अंगद के पांव की तरह’’ जमे अपने ही विधायकों पर क्यों नहीं लागू कर पा रहे है? या लागू करना नहीं चाहते हैं? क्या उनका विधान/संविधान व लोकतंत्र अलग है? क्या वे पुराने जमाने के राजा समान हैं, जहां यह कहा जाता था कि ‘‘राजा कभी कोई गलती नहीं करता है’’? लोकपाल जो अन्ना आंदोलन की ‘‘रीढ़ की हड्डी’’ थी, अब राजनीतिक पटल से पारदर्शी तरीके से अदृश्य हो गई है? अपराधिक छवि लिए या अपराधिक मामले चलने वाले अपनी ही ‘‘नाक के बाल’’ नेताओं पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की वकालत केजरीवाल अब क्यों नहीं कर रहे हैं? 

 केजरीवाल जी को उनकी एक बात और याद दिलाना चाहता हूं, जब अन्ना आंदोलन के समय उन्होंने कुर्सी की एक बड़ी समस्या बतलाते हुए कहा था कि इस कुर्सी पर जो भी बैठता है, वह गड़बड़ हो जाता है। अन्ना आंदोलन से निकले विकल्प के इस कुर्सी पर बैठने पर कहीं वह भी गड़बड़ या भ्रष्टाचारी न हो जाए। यह आशंका उन्होंने तब व्यक्त की थी, जो अभी सही साबित हो रही है। तब आज उन्हें उसी कुर्सी से इतना प्यार मोहब्बत क्यों हो गई कि, कुर्सी पा कर उनकी ‘‘आंखों में सरसों फूलने लगी’’? या उनका नए-नए अन्वेषण करने के दावे के साथ यह दावा तो नहीं है कि उन्होंने कुर्सी के मूल चरित्र को ही बदल डाला है। इसलिए अब कुर्सी व्यक्ति पर हावी नहीं होगी, बल्कि व्यक्ति कुर्सी पर हावी होगी?   

80 प्रतिशत विधायकों पर चल रहे आपराधिक मुकदमों के संबंध में वही कथन है कि राजनीतिक द्वेष व स्वार्थ की दृष्टि से झूठे बनावटी मुकदमे दर्ज किए गए हैं। और वे सजायाफ्ता विधायक नहीं है। या तो वे बरी हो गए हैं अथवा कोर्ट में कार्रवाई चल रही है। यही तर्क तो अरविंद केजरीवाल के दागी सांसदों के संबंध में लगाए गए आरोपों के जवाब में अन्य राजनैतिक दल देते थे, तब तो वे सिरे से उक्त तर्क को नकार देते थे। राजनीति का यह दोहरापन या दोगलापन किसी को सीखना है, तो सबसे बड़ा शिक्षक इस देश में अभी यदि कोई है, तो वह केजरीवाल ही है। कांग्रेस हो या भाजपा (कमोबेश/कमोत्तर) वे उस भ्रष्ट राजनीति कीचड़ में कार्य करती चली आ रही है। इसलिए उनसे स्वच्छ राजनीति की अपेक्षा करना ज्यादती होगी। परन्तु स्वच्छ राजनीति की बात कर रहे अरविंद केजरीवाल जो अन्ना की पवित्रता के आशीर्वाद के साथ स्वच्छता की घुट्टी पीकर राजनीति न करने की कसम खाकर, यदि देश को सुधारने के लिये राजनीति में कसम तोड़कर उतरे है, तब केजरीवाल राजनीति के उसी कीचड़ का सहारा लेकर दाग-दार राजनीति करने लगे, तो सबसे ज्यादा दोषी व अपराधी कौन? ‘‘हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दिवान’’।  

अरविंद केजरीवाल देश की राजनीति में नये नवेले खिलाडी है। वे आज देश में नरेन्द मोदी के बराबर हर क्षेत्र में न केवल अपने को देखना चाहते हैं, बल्कि इस प्रयास में वे कई बार असहज होकर असमान्य बातें भी कर जाते हैं। ‘‘करघा छोड़ तमाशा जाय, नाहक चोट जुलाहा खाय’’। आपको याद होगा देश की राजनीति में वर्ष 2014 में एक बड़ा परिवर्तन आया, जब पर्दे के पीछे प्रशांत किशोर के बने प्लान से मीडिया की ब्रांडिंग कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में आशा से कहीं ज्यादा सफलता प्राप्त की थी। तब केजरीवाल ने मीडिया के दुरुपयोग की आलोचना यह कहकर की थी कि करोडों रुपये मीडिया मैनेजमेंट में खर्च किये गये। दिल्ली में आप की सरकार बनने के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली जो की पूर्ण राज्य भी नहीं है, के मीडिया खर्च के तुलनात्मक आंकड़े निकाले जाये तो कही दूर-दूर तक दिल्ली का मीडिया खर्चे अन्य प्रदेशों से ज्यादा है। शायद यह केजरीवाल की इस थ्योरी से मेल खाता है कि नरेन्द्र मोदी से वे आगे हंै। इसी क्रम में उन्होंने गुजरात में जा कर अगले पांच वर्षो में देश को विश्व का सर्वाधिक विकसित राष्ट्र बनाने की घोषणा की, जो नरेन्द्र मोदी अगले 25 वर्षों में करने की योजना बना रहे हैं (जिसकी घोषणा लाल किले से की गई थी)। सिर्फ इसलिए कि मैं (केजरीवाल) नरेन्द्र मोदी से आगे हूं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आगे होने के इसी क्रम में अब आप ने भाजपा पर मनीष सिसोदिया सहित अपने विधायकों की खरीद-फरोख्त व सीबीआई रेड, ईडी जांच की धमकी के आरोप जड़ दिए। आप के विधायकों का आत्मबल, मनोबल अरविंद केजरीवाल के मजबूत व चमत्कारिक नेतृत्व के बावजूद इतना कमजोर कैसे  हो गया है की ‘आप’ को आपके विपक्षी करोड़ों रुपए का लालच देकर खरीदने का ऑफर व धमकी देने की हिम्मत कर लेते हैं? विपरीत इसके भाजपा विधायकों की ईमानदारी और आत्मबल इतना मजबूत होता है कि कोई इस तरह की हरकत करने की सोच भी नहीं पाता है। इस प्रकार अरविंद केजरीवाल यहां भी नरेन्द्र मोदी से आगे निकल गए। 

मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के मामले में भी अरविंद केजरीवाल उन्नीस नहीं बीस सिद्ध हो रहे हैं। मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज हमारी संवैधानिक व्यवस्था में दी गई है। देश में स्कूली शिक्षा और शासकीय अस्पतालों में इलाज (अन्य विशिष्ट स्वास्थ्य योजनाओं के अतिरिक्त) मुफ्त में दी जा रही है। जिसे सरकार अपना कर्तव्य मानकर व जनता सामान्य सुविधा मानकर स्वीकार करती चली आ रही है। परंतु  केजरीवाल ने पहली बार इन सुविधाओं की इस तरह से ब्रांडिंग कर जनता को एहसान में डाला है कि सरकार उक्त सुविधाएं मुफ्त में रेवड़ियां के समान बांट कर एहसान कर रही है। इस मुफ्त की रेवड़ियां की अच्छी ब्रांडिंग के कारण ही पंजाब में जीत के बाद गुजरात में कुछ समय बाद होने वाले चुनाव में केजरीवाल को इसका फायदा न मिले इसके जवाब में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुफ्त की रेवड़ियां और जरूरतमंदों को मुफ्त सेवा देने में अंतर को समझाने का प्रयास करना पड़ा। इस प्रकार केजरीवाल वर्तमान राजनीति जहां ‘‘परसेप्शन’’ (वास्तविक कार्य नहीं) ही महत्वपूर्ण रह गया है, उसमें भी केजरीवाल नरेन्द्र मोदी को पछाड़ते हुए आगे दिख रहे है। ऐसा लगता है भविष्य में इसी तरह से अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी से आगे होते रहेंगे?

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

’’परिवारवाद’’,’’वंशवाद’’,’’भाई-भतीजावाद-चाचा-भतीजावाद’’ ’’अधिनायकवाद’’ एवं ’’जातिवाद’’!

लोकतंत्र के लिए खतरनाक? कैसे! कब! और क्यों? निदान!

लेख लम्बा होने के कारण इसे दो भागों में लिखा जा रहा है-   प्रथम भाग                                                            

देश की स्वाधीनता के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में मनाया जा रहे अमृत महोत्सव के समापन पर 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस पर ऐतिहासिक लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमेशा की तरह कई नई दिशा देने वाली महत्वपूर्ण सार्थक बातें कहीं, जो अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों से हट कर उनकी एक विशिष्ट पहचान व ‘‘शैली’’ बन चुकी हैं। अगले 25 वर्षों के लिए ’’पंच प्राण’’ (प्रतिज्ञा) का संदेश दिया, तो ‘‘परिवारवाद’’ को ‘‘लोकतंत्र’’ के लिए खतरा और भ्रष्टाचार की जननी बतलाकर चिंता व्यक्त की। प्रधानमंत्री के ‘‘सांकेतिक’’ संदेश द्वारा ’परिवारवाद’ पर चिंता को मीडिया चैनलों ने तुरंत ‘‘लपक’’ लिया और बहसों में विपक्षी दलों पर लगभग एक तरफा प्रहार करते हुए परिवारवाद की ‘‘लकीर पीटना’’ शुरू कर दिया। ’’परिवारवाद’’ एक समस्या है, इस चिंतन पर कार्य करने की बजाय ‘‘तू डाल डाल मैं पात पात’’, ‘मेरा परिवारवाद और तेरा परिवारवाद’ के बीच परिवारवाद की समस्या (यदि कोई हैं भी तो? जिस पर आगे चर्चा की जा रही है) ‘‘जस से तस’’ मात्र उलझ कर रह गई हैं।

वास्तव में प्रधानमंत्री ने किस परिवारवाद? की और संकेत किया, स्पष्ट रूप से तो नहीं कहा। यह बात उनके मन में ही है, जिसे हम शायद आगे मन की बात में जान सकते हों। फिलहाल मीडिया से लेकर राजनीतिक दल प्रधानमंत्री की परिवारवाद की बात विस्तृत रूप से ’’मन की बात’’ में आने के पूर्व ही अपनी-अपनी (कु)-दृष्टि से अर्थ और अनर्थ निकाल रहे हैं? आइए पहले परिवारवाद है क्या? इसे समझ लिया जाए। तब फिर परिवारवाद’’ भ्रष्टाचार, चाचा-भाई-भतीजावाद को कितना प्रोत्साहित करता है और लोकतंत्र के लिए यह कितनी खतरे की घंटी है? इन सब मुद्दो पर पृथक-पृथक और समेकित रूप से विचार करने की गहन आवश्यकता है। तभी हम किसी निश्चित परिणाम पर पहुंच कर समस्या का समाधान निकाल पाने की स्थिति में हो सकते हैं?
मोटे रूप से ’’राजनीति’’ में ’’परिवारवाद’’ का मतलब होता है, एक ही परिवार के कई व्यक्तियों अर्थात मां, बाप, भाई, भतीजा, (इसी से ‘भाई-भतीजावाद’ भी पनपता है?) बहन इत्यादि सदस्य गणों का राजनीति में एक साथ, आगे-पीछे या एक के बाद एक सत्ता के मलाईदार पदों पर बैठकर सत्ता को परिवार के इर्द-गिर्द केन्द्रीकृत कर राजनीति करें। यही परिवारवाद आगे जाकर ’’वंशवाद’’ में तब बदल जाता है, जब बाप का बेटा-बेटी, बेटे का बेटा-बेटी अर्थात पोता-पोती और आगे इसी तरह से श्रृंखलाबद्ध अर्थात पीढ़ी दर पीढ़ी सदस्यों के राजनैतिक नेतृत्व संभालने पर वंशवाद हो जाता है। उदाहरणार्थ गांधी परिवार जहां नेहरू, इंदिरा, राजीव और राहुल गांधी के पीढ़ी दर पीढ़ी शीर्षस्थ नेतृत्व संभालने के कारण यह विशुद्ध वंशवाद ही तो है। और यह ‘‘हाथी के पांव में सबका पांव’’ वाले परिवारवाद की अंतिम उच्चतम सीमा हैं।
वैसे ‘‘वंशवाद’’ भारतीय राजनीति में नया नही हैं। इस देश में जमाने से हिन्दू-मुस्लिम शासक राजाओं का राज रहा है, जो ‘राजतंत्र’ होकर ‘वंशवाद’ का ही तो रूप है। प्रधानमंत्री के ‘पंच प्राण’ में तीसरी प्रतिज्ञा विरासत पर गर्व होने बाबत है। प्रधानमंत्री की इस ‘प्रतिज्ञा’ का जब कांग्रेस अक्षरसः पालन कर ऊपर उल्लेखित राजतंत्र की वंशवाद की ‘‘गौरवशाली विरासत’’ को अपना रही है, तब कांग्रेस नेतृत्व पर उंगली उठाना क्यों? भारतीय राजनीति का वर्तमान स्वरूप स्थायी रूप से इस तरह का हो गया है कि जहां विपक्ष द्वारा देश हित में सत्ता पक्ष की बात को स्वीकार करने के बावजूद भी उसकी आलोचना करना सत्ता पक्ष अपना राजनैतिक कर्तव्य मानता है, क्योंकि वह स्वीकारिता विपक्ष ने की है। इस ढ़र्रे व ढांचे को बदलना ही होगा और देश हित के मुद्दों पर सर्वानुमति बनानी ही होगी। परन्तु वर्तमान में लोकतंत्र होने के बावजूद भी यह ’’लोकतंत्र’’ द्वारा उत्पन्न लोकतांत्रिक वंशवाद हैं। इस वंशवाद के आगे की स्थिति में जब एक ही व्यक्ति लम्बे समय तक निर्वाचित पदों पर बना रहता है, जैसे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, बिहार के नीतीश कुमार, उडीसा के नवीन पटनायक आदि-आदि, तब अधिनायकवाद की बू आने लगती है। और अंतिम मुद्दा/रोग परिवारवाद से आगे बढ़कर जातिवाद क्या है, यह बतलाने की आवश्यकता तो बिलकुल भी नहीं हैं।
आगे परिवारवाद के प्रमुख उदाहरणों में चैधरी चरण सिंह, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह, जितेंद्र प्रसाद, हेमवती नंदन बहुगुणा (उत्तर प्रदेश), शीला दीक्षित (दिल्ली), कृष्ण वंश के 122 वे राजा वीरभद्र सिंह, प्रेम कुमार धूमल (हिमाचल प्रदेश), ललित नारायण मिश्र, भागवत झा आजाद, रामविलास पासवान, लालू यादव, (बिहार), शिंबू सोरेन, (झारखंड), यशवंतराव चव्हाण, जवाहर लाल दर्डा, वेदप्रकाश गोयल, शरद पवार, नारायण राणे, बाला साहेब ठाकरे, एकनाथ शिंदे (महाराष्ट्र), बीजू पटनायक (उड़ीसा), चैधरी देवी लाल, भजन लाल, बंसीलाल (हरियाणा), सिंधिया परिवार, (मध्यप्रदेश एवं राजस्थान) पंडित रविशंकर शुक्ल, गोविंद नारायण सिंह, गुलशेर अहमद, सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह (मध्य प्रदेश), अजीत जोगी (छत्तीसगढ़), एच डी देवेगोडा, एसआर बोम्मई (कर्नाटक), प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू (पंजाब), शेख अब्दुल्ला, मुफ्ती सईद अहमद (काश्मीर), के चन्द्र शेखर राव, असदुद्दीन औवेशी (तेलंगाना), एम करुणानिधि (तमिलनाडु), एनटी रामा राव, वाई एस रेड्डी, (आंध्र प्रदेश), तरूण गोगई (असम), ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), रिन चिन खारु (अरुणाचल प्रदेश) आदि आदि। सूची काफी लंबी है और मेरे अपने प्रदेश ‘‘मध्यप्रदेश’’ जो कई राजाओं महाराजाओं की रियासतें (स्टेट) रही है, वहां परिवारवाद-वंशवाद तो एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसे जनता ने समय-समय पर अधिकाशंतः स्वीकार भी किया है।
बड़ा प्रश्न यह है कि ऊपर उल्लेखित या अलिखित अनेक ऐसे परिवार, परिवारवाद की उस परिभाषा में आते हैं, जिनकी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले के भाषण में इशारा कर रहे थे? चूँकि भाजपा में भी अनेक अनेक ऐसे उदाहरण ‘‘परिवारवाद’’ के हैं, जहां एक ही परिवार के एक से अधिक सदस्य एक साथ अथवा आगे-पीछे विभिन्न चुने हुए पदों पर राजनीति में हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भाजपा में लगभग 11 प्रतिशत चुने हुए प्रतिनिधि वंशवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री ने न्यूज एजेंसी एनएनआई को कुछ समय पूर्व दिए गए एक इंटरव्यू में परिवारवाद से किनारा करते हुए वंशवाद को जम कर कोसा था। परिवारवाद के संबंध में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि परिवार का कोई सदस्य यदि योग्यता के आधार पर जनता के आशीर्वाद से राजनीति में आगे आता है, तो वह परिवारवाद नहीं कहलाएगा। सही है ‘‘लाल गुदड़ी में नहीं छुप सकते’’, परन्तु यह बात कौन तय करेगा, इस समस्या का यही एक बड़ा पेच है। क्या उपरोक्त उल्लेखित समस्त परिवारों को एक ही लाठी से हकेला जाकर लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह परिवारवाद के आरोपों की परिधि में लाया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। यह गहरा विचारणीय विषय है। एक ही परिवार के दो सदस्य पति-पत्नी जैसे आचार्य जेपी कृपलानी और सुचेता कृपलानी श्रेष्ठ संसद सदस्यों में रहें हैं। वैसे स्वतंत्र भारत की विधायिकी के इतिहास में पति-पत्नी के एक साथ, आगे-पीछे जनप्रतिनिधि बनने के कई उदाहरण सामने हैं। इसलिए राजनीति में कौन सा परिवारवाद सही है, और कौन सा गलत, पहले इसकी एक लक्ष्मण रेखा खींचना आवश्यक होगी? परिवारवाद के संबंध में एक विचारणीय व उल्लेखनीय उदाहरण समाजवाद का झंडा लेकर चलने वाले मुलायम सिंह व लालू यादव का है जहां समाजवाद परिवारवाद का घोर विरोधी है। ‘‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’’।
बीजू पटनायक, यशवंतराव चव्हाण, वेद प्रकाश गोयल, एसआर बोम्मई, ठाकुर गोविंद नारायण सिंह, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, सुंदरलाल पटवा के परिवारवाद को हम उपरोक्त उल्लेखित परिवार वालों के साथ नहीं रख सकते हैं क्योंकि इन सब परिवारों में परिवारों के मुखिया की मृत्यु होने के बाद तुरंत या अधिकतर मामलों में कुछ या काफी समय बाद परिवार के सदस्य सत्ता की राजनीति में उभर कर आए। अर्थात राजनीति में इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उनकी योग्यता भी एक प्रमुख कारक रही है।
बड़ा प्रश्न यह भी है कि वर्तमान लोकतंत्र के लिए किसी भी प्रकार का मौजूद परिवारवाद हानिकारक कैसे हैं? विपरीत इसके जिस लोकतंत्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हम थकते नहीं है, जैसे कि स्वयं प्रधानमंत्री ने अपने लाल किले के भाषण में भारत को लोकतंत्र की जननी बतलाया। उसी लोकतंत्र में वर्तमान परिवारवाद पनपा है और लोकतंत्र की जनक, रीढ़ की हड्डी जनता ने मतदाता (वोटर) बन कर अपने मतों का प्रयोग कर इन पारिवारिक सदस्यों को सत्ता पर आसीन कर परिवारवाद की राजनैतिक विरासत (डायनेस्टिक पॉलिटिक्स) को वैधानिक व लोकतांत्रिक मान्यता दी है। ये कोई ‘‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’’ वाला मामला नहीं है, और न ही ‘‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने’’ वाली बात है। तब परिवारवाद को लोकतंत्र विरोधी कहना क्या विरोधाभासी नहीं होगा? जब हम यह कहते हैं कि हमारा देश लोकतंत्र की मजबूत नींव पर खड़ा है।
शेष अगले अंक में क्रमशः ...............।
’’परिवारवाद’’,’’वंशवाद’’, ’’भाई-भतीजावाद-चाचा-भतीजावाद’’ ’’अधिनायकवाद’’एवं ’’जातिवाद’’ !
लोकतंत्र के लिए खतरनाक? कैसे! कब! और क्यों? निदान!
क्रमशः गतांग से आगे- द्वितीय भाग
वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि लोकतंत्र में चुनावी जीत का मतलब कदापि यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि जो व्यक्ति जीता है, वह सब अवगुणों से ऊपर उठकर गुणवान व्यक्ति हो गया है। अर्थात उसके जीवन के समस्त दाग (जिसमें परिवारवाद भी शामिल है) धुल गए। दस्यु फूलन देवी, दबंग रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, बाहुबली अतीक अहमद, राबिन हुड आनंद मोहन, राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव जैसे कई ‘‘स्वनामधन्य’’ उदाहरण सामने हैं। यह तो ‘‘तबेले की बला बंदर के सिर’’ मढ़ने वाली बात हो गयी। बावजूद इसके लोकतंत्र की इस कमी को आपको स्वीकार करना ही होगा। क्योंकि यह जनता जनार्दन का निर्णय है, जो लोकतंत्र में अंतिम रूप से मान्य होकर स्वीकारना ही पड़ता है।
इसलिए परिवारवाद के लिए सिर्फ परिवार या उसके मुखिया को पूर्ण रूप से दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं होगा। वह जनता (मतदाता) भी उतनी ही बराबरी की, बल्कि उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदार और दोषी है, क्योंकि लोकतंत्र में ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ नहीं बल्कि ‘‘यथा प्रजा तथा राजा’’ होता है। यद्यपि जनता परिवार के सदस्य को परिवारवाद के नाम पर (गुणवत्ता के आधार पर नहीं) चुनती है। लेकिन गुणवत्ता की यह लक्ष्मण रेखा खींचना बहुत मुश्किल कार्य है। क्योंकि ‘‘एक पत्थर तो तबियत से उछालने वाला चाहिये’’। इसलिए यदि हमें लोकतंत्र बनाए रखना है, तो इसी कमी के साथ स्वीकार करते रहना होगा तब तक, जब तक की हम साक्षरता का स्तर इतना ऊंचा नहीं उठा लेते कि जहां जनता अच्छे-बुरे की पहचान कर अपने मत का उपयोग लोभ-लालच, स्वार्थ, डर, बल, जातिवाद और परिवारवाद के आभामंडल से प्रभावित हुए बिना, गुण दोष के आधार पर देश हित में अपने प्रतिनिधि का निष्पक्ष होकर चुनाव कर सके। यह आसान नहीं, बल्कि लंबा और कठिन रास्ता है। लेकिन यदि आपको बेदाग लोकतंत्र बनाना है, तो यह कठिन व दुष्कर चुनौती समस्त व्यक्तियों को मिल स्वीकार करनी ही होगी। ऐसा होगा भी कि नहीं, यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।
दूसरे, परिवारवाद की बुराई को संवैधानिक व कानूनी प्रावधान लाकर दूर किया जा सकता है। जब इस देश में जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए दो बच्चों से अधिक संतान होने पर कई सरकारी सुविधाएं से वंचित करने का प्रावधान किये जा सकते है। देश की सुरक्षा और अखंडता के लिए बिना मुकदमा चलाये छः महीने से ऊपर निरोध में रखने के लिए कानून बनाया जा सकता है। स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव के लिए जन प्रतिनिधित्व कानून में आवश्यकतानुसार कई संशोधन किए जा सकते हैं। 3 साल से अधिक सजा होने पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। आज के कंप्यूटर युग में भी चुनाव लड़ने की न्यूनतम सीमा जो काफी समय पूर्व निर्धारित की गई थी, को बनाए रखा जाता है। लोकतंत्र की आत्मा संसदीय प्रणाली को कमजोर करने वाली दलबदल के विरुद्ध कानून लाया जाकर अंतरात्मा की पैनी आवाज को बोठल किया जा सकता है। जब देश हित में स्वेच्छारिता व स्वच्छंदता को रोकने हेतु स्वतंत्रता के पूर्ण व मूल अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध लगा कर सीमित किया जा सकता है। तब लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाली परिपाटी परिवारवाद पर कानून प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता जा सकता है?
अतः जिस लोकतंत्र में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से देश की कई बुराइयों पर रोक लगाने के लिए कानून लाये जा सकते है, तब उसी लोकतंत्र को स्वच्छ रखने के लिए परिवारवाद, वंशवाद और अधिनायकवाद पर कानूनी रोक क्यों नहीं लगाई जानी चाहिए। जन प्रतिनिधियों के पुनः चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध या दो अवधि की अधिकतम सीमा तय कर देनी चाहिए जैसे अमेरिका जैसे विश्व के अनेक देशों में है। परिवार के दो सदस्यों को एक साथ एक ही समय में चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं होनी चाहिए। जिस प्रकार अनुकंपा नियुक्ति में परिवार के एक ही सदस्य की पात्रता होती है, समस्त सदस्यों को नियुक्ति नहीं दी जाती है। उम्र का बंधन सेवा से लेकर सार्वजनिक जीवन के कई क्षेत्रों में है, तब उम्र का यह प्रतिबंध जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लागू करना चाहिए? कुछ जनप्रतिनिधियों की मृत्यु होने पर होने वाले उपचुनाव में परिवार के सदस्य के लड़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए क्योंकि यह स्थिति भावनात्मक वातावरण के कारण परिवारवाद को तेजी से जन्म देती है। इन उपायों से निश्चित रूप से परिवारवाद का रोग फैलने में रुकावट होगी, जिससे अंततः लोकतंत्र मजबूत होगा।
 वैसे यह तथ्य है कि परिवारवाद की जब-जब बात की जाती है, तो यह परसेप्शन सीधा-सीधा कांग्रेस की ओर जाता है। जबकि परिवारवाद का विरोध करने के बावजूद भाजपा सहुलियत की राजनीति के चलते ही सत्ता में भागीदारी के लिए कई बार परिवारवादी युक्त पार्टियों (शिवसेना, पीडीपी, आर.एन.एल.डी, लोजपा, अकाली दल, तेलगु देशम (टीडीपी) इत्यादि) का समर्थन लेने में कोई हिचक नहीं करती है। इसी प्रकार सत्ता प्राप्ति के लिए परिवारवादी व्यक्तियों को सत्ता का समीकरण बनाने के लिए पार्टी में शामिल करने में कोई भी परहेज नहीं किया जाता हैं। नारायण राणे, एकनाथ शिंदे, महबूबा मुफ्ती, शेख अब्दुल्ला जैसे उदाहरणों की लम्बी फेयर लिस्ट है, तब भाजपा अपने परिवारवाद व विपक्ष के परिवारवाद का अंतर करते हुए इस बात को लेकर हमलावर हो जाती है कि समस्त विपक्षी परिवारवादी दलों में सर्वोच्च स्तर पर अर्थात अध्यक्ष, परिवार का सदस्य ही होता हैं। विकल्प की कोई भी जरा सी गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं रहती है। जबकि भाजपा में परिवारवादी साधारण कार्यकर्ता कई स्तरों से कड़े परिश्रम के बाद लोकतांत्रिक रूप से अध्यक्ष बन पाता हैं।
अध्यक्षीय पद पर परिवारवाद को लागू करने का यह (कु)-तर्क की सुविधा की राजनीति से ही यह प्रेरित हैं। क्योकिं लोकतंत्र में और जन प्रतिनिधित्व कानून के पश्चात प्रत्येक राजनैतिक पार्टियों का अपना एक संविधान होता हैं, जिसमें अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारी गण, संसदीय बोर्ड, प्रबंध समिति, चुनाव समिति आदि आदि पार्टी पदों की व्यवस्था  अच्छी तरह से पार्टी चलाने के लिए की जाती हैं। वैसे तकनीकी रूप से तो अध्यक्ष को तो मात्र संसदीय बोर्ड/प्रबंध समिति/कार्यसमिति जो पार्टी को चलाने की सर्वोच्च निकाय होती है, की मात्र अध्यक्षता करने का एक विशेषाधिकार प्राप्त होता है। अन्यथा समस्त सदस्यों को समान अधिकार होते हैं। अध्यक्ष के पास कुछ विशेष परिस्थितियों में कुछ विशेषाधिकारों को छोडकर संसदीय बोर्ड ही सर्वशक्तिमान होकर निर्णय लेने वाली संस्था होती है। तथापि भाजपा में अध्यक्ष से ज्यादा शक्तिशाली संगठन महामंत्री होता हैं। अतः विपक्ष पर परिवारवाद के आरोप को पैना करने के लिए परिवारवाद को सिर्फ अध्यक्ष पद/‘‘शीर्षस्थ’’ नेतृत्व पर लागू करके राजनैतिक रूप से परिवारवाद का फायदा लेकर स्वयं को क्लीन चिट नहीं दे सकते हैं, अन्यथा नतीजा वही ‘‘ढाक के तीन पात’’ वाला होगा। परिवारवाद के संबंध में यह सुधार की नहीं, बल्कि सुविधा की राजनीतिक बेईमानी ही कहलाएगी।
निश्चित रूप से परिवारवाद के होते परिवार के उत्तराधिकारी एवं सदस्यों को लायक/ नालायक की योग्यता/अयोग्यता देखे बिना विरासत के कारण एक अवसर जरूर मिल जाता है। परंतु इसके आगे फिर सदस्य को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होती है, तभी वह आगे बढ़ पाता है। अन्यथा तब परिवारवाद की साख काम नहीं आती है। इसे मैं मेरे उदाहरण से समझा सकता हूं। मेरे स्वर्गीय पिता जी गोवर्धन दास जी खंडेलवाल संविद सरकार में मंत्री रहे। जबकि मेरे दादाजी का राजनीति से कोई संबंध नहीं था। मेरी 23 उम्र की पड़ाव में ही पिताजी की अचानक मृत्यु हो जाने के पश्चात उनकी राजनीतिक विरासत के कारण ही में युवा राजनीति में आया और 24 वर्ष की उम्र में नागरिक बैंक का अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन पिताजी जैसी योग्यता न होने के कारण राजनीति में वह अवस्था नहीं प्राप्त कर सका जो ऊंचाईयाँ पिताजी को मिली थी। लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों के योग्य होने के कारण जनता ने उनकी योग्यता को स्वीकार कर बार-बार मोहर लगाकर जन प्रतिनिधि बनाया। इसलिए परिवारवाद पूर्णतः गलत है, इस गलत परसेप्शन को दूर करना होगा। परिवारवाद उस आरक्षण व्यवस्था से तो अच्छा ही है, जहां अस्थायी प्रावधान की योजना के तहत लागू किया गया आरक्षण की व्यवस्था को राजनीति के चलते कार्य रूप में स्थायी ही बना दिया गया। परिवारवाद अस्थाई रूप से तो आप को बूस्ट (प्रोत्साहित) करता है। परन्तु योग्यता के अभाव में बार-बार नहीं। प्रधानमंत्री ने परिवारवाद के कारण टैलेंट को खतरा होने की बात कही है। उसी प्रकार आरक्षण में भी तो टैलेंट को नजर अंदाज कर दिया जाता है। आरक्षण का उद्देश्य अस्थाई रूप से सहारा लेकर अपने टैलेंट को विकसित करना होता है। परंतु वह व्यक्ति सफल हो या असफल, आरक्षण का लाभ लगातार लेते जाता है। जबकि परिवारवाद में सदस्य को अवसर मिलने के बाद अपनी योग्यता सिद्ध न करने पर आगे उसको परिवारवाद का फायदा नहीं मिल पाता है।
प्रधानमंत्री ने परिवारवाद की बुराई को एक नया आयाम देते हुए संस्थाओं से जोड़ दिया, जहां इस कारण से टैलेंट को खतरा पैदा हो गया है। लेकिन प्रधानमंत्री के ध्यान में यह बात नहीं आई कि, हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक और जो वैदिक व्यवस्था है, उसमें जिस प्रकार डाॅक्टर का लडका डाॅक्टर समान वकील, इंजीनियर, शिक्षक, पत्रकार, नौकरी पेशा नौकरी, व्यवसाय वाला व्यवसाय आदि अपने परिवार के लोगों के उसी कतार में ले जाना चाहता है, जहां मुखिया कार्य कर रहा होता है, ताकि एक सुरक्षा और निश्चिंतता की ग्यारटीं बनी रहीे। तब फिर इस आधार पर राजनीति में परिवारवाद नेता का बेटा नेता को कैसे गलत ठहराया जा सकता है। वह भी जब जनता उस पर अपनी मुहर लगाती हो। टैलेंट को खतरा तो परिवारवाद से ज्यादा आरक्षण से है, जिस पर कोई राजनीतिज्ञ या राजनीतिक दल के जेहन में वोटो की राजनीति के चलते पुनर्विचार करने की बात नहीं आती है।  

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

‘‘पलटूराम’’ बनने या बनाने में क्या सिर्फ एक ही पक्ष जिम्मेदार होता है?

‘‘सुशासन बाबू’’ होने के कारण ‘पलटूराम’ बनाये गये?


नीतीश कुमार ने विभिन्न अंतरालों में कुल 22 साल के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में 8वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया रिकॉर्ड बनाया है। (यद्यपि सबसे ज्यादा समय 24 सालों के लिए मुख्यमंत्री पद पर पवन कुमार चामलिंग रहे, लेकिन शपथ सिर्फ पांच बार ही ली)। वैसे भारतीय राजनीति के इतिहास का नीतीश कुमार का एक और अनोखा रिकॉर्ड यह भी है कि वे देश के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जहां उनकी पार्टी कभी भी बहुमत में नहीं रही। अर्थात गठबंधन में अल्पमत में भी रहकर वे मुख्यमंत्री बनने में हमेशा सफल (8 बार) रहे हैं। इस प्रकार विश्व के सात अजूबों के समान  भारतीय राजनीति के आठवें अजूबे से कम नीतीश कुमार नहीं हैं।
वर्ष 1967 में जब दल बदल के कारण देश की राजनीति में अस्थिरता का एक दौर आया था, खासकर मुख्यमंत्री भजनलाल द्वारा पूरी सरकार का ही दल बदलने के बाद से उस दलबदल को आया राम-गया राम का नाम दिया गया था। उक्त ‘‘दलबदल विकसित/विकासशील’’ होकर आज नीतीश कुमार के संदर्भ में दलबल के साथ पाला बदलना हो गया। वर्ष 2017 में नीतीश कुमार के महागठबंधन को छोड़कर पाला बदलकर एनडीए के साथ सरकार बनाने पर लालू यादव ने उन्हें पलटू राम की ‘‘पदवी से नवाजा’’ था।
22 सालों के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में नीतीश बाबू हमेशा ‘‘सुशासन बाबू’’ ही कहलाये। फिर चाहे वे कहीं भी रहे हों और कितने ही घाटों का पानी पिया हो। जिस प्रकार ‘कमल’ कीचड़ से निकलकर भी विश्व में आज वह सबसे ज्यादा ‘चहेता’ है, ठीक उसी प्रकार नीतीश कुमार हर (राजनीतिक) गंदे तालाब में रहकर भी अपनी बेदाग सुशासन बाबू की छवि को बनाये रखने में आश्चर्यजनक रूप से सफल रहे हैं। सुशासन बाबू की ऐसी छवि आज की राजनीति में प्रायः देखने को नहीं मिलती है। शायद इसी कारण से प्रत्येक दल/गठबंधन का प्रयास उन्हे अपने पाले में ले जाने का होता है, जिस कारण से ही नीतीश कुमार ‘पलटूराम’ बनें।  
नीतीश कुमार के आठवीं बार और महागठबंधन के तीसरी बार पुनः मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अधिकांश मीडिया सहित भाजपा-एनडीए ने लालू प्रसाद यादव द्वारा नीतीश कुमार को प्रदत उक्त पदवी ‘पलटूराम’ की पहचान को एक राजनैतिक हथियार बनाकर नीतीश कुमार को खुब पानी पी पीकर बुरी तरह से कोसा। आज विपक्ष को छोड़कर, अधिकांश मीडिया से लेकर भाजपा-एनडीए नीतीश कुमार को ‘पलटूराम’ कहकर आलोचनात्मक मजा के साथ गुस्से का इजहार कर रही है, यानी ‘‘चित भी मेरी पट भी मेरी’’। परंतु मीडिया सहित भाजपा यह भूल रही है कि जब नीतीश कुमार ने पहली बार महागठबंधन छोड़कर पलटूराम बनकर एनडीए का नेतृत्व किया था, तब इन्ही मीडिया व भाजपा ने गले लगाकर नीतीश कुमार का स्वागत किया था। तब भाजपा व मीडिया को जनादेश के अपमान के साथ विश्वासघात की बात ध्यान व दिमाग में नहीं आई? मात्र सुविधा की राजनीति के मद्देनजर भाजपा और मीडिया का ‘‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’’?
आखिर ‘‘पलटूराम’’ बनने के लिए कौन से दो मूल तत्वों-तथ्यों की आवश्यकता होती है, इसको जरा समझिए! राजनीति में पलटूराम का मतलब होता है, एक पक्ष का साथ देकर/लेकर, फिर स्वार्थ वश या अन्य किसी भी कारण से उसका साथ छोड़कर विपक्ष (विरोधी पक्ष) के साथ जाकर मिल जाना। मतलब साफ है, पलटूराम होने के लिए दो पक्षों का होना न केवल नितांत आवश्यक है, बल्कि दोनों की सहमति के साथ भागीदारी भी आवश्यक है। एक पक्ष वह है, जहां वह था, जिसे अब वह छोड़ रहा है और दूसरा पक्ष वह है, जहां वह नहीं था, परन्तु अब वह जुड़कर उसे गले लगा रहा है। जिस प्रकार प्रकार रिश्वत के लिए दो पक्षों की आवश्यकता होती है और दोनों पक्षों की भागीदारी होकर वे बराबर के जिम्मेदार (अपराधी) माने जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है, पलटूराम बनने/बनाने में भी दोनों पक्ष बराबर के जिम्मेदार होते हैं। अर्थात एनडीए व महागठबंधन नीतीश कुमार को ‘पलटूराम’ बनाने में सफल होने के लिए अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते हैं और न ही अपने योगदान को नकार सकते हैं, तब पलटूराम की बनाई गई नकारात्मक छवि से व स्वयं दूर कैसे भाग सकते है?
इसलिए जिस प्रकार एक सिक्के के दो पहलू होते है, या कहावत है, ‘कांच के घर में रहकर दूसरों के घर में पत्थर नहीं फेंका जाता है’, कम से कम वर्तमान राजनीति में आरोप और प्रत्यारोप लगाने के पूर्व दलों को अपने अपने गिरेबान में अवश्य झाँक लेना चाहिए। यदि राजनीतिक दल व राजनेता ऐसा करने में सफल हो जाये तो निम्न स्तर की राजनीतिक कटुता जो उच्च से उच्चतर की ओर बढ़ती जा रही है, निश्चित रूप से वह कटुता तेजी से गिर जायेगी। बजाय ‘मन मन भावे मुंड हिलाने के’, ‘‘पलटूराम’’ को समस्त पक्ष खासकर मीडिया को इसी दृष्टि से देखना चाहिए।
मीडिया व भाजपा बार-बार वर्ष जुलाई 2017 में नीतीश कुमार की अंतरात्मा की आवाज पर महागठबन को छोड़ते समय (जिसे वह अब ‘भूल’ कह चुके है) के बयान व उसके प्रत्युत्तर में लालू यादव द्वारा दी गई पलटूराम की संज्ञा को दिखा रही है। परंतु मीडिया वर्ष 2015 में एनडीए छोड़ते समय नीतीश कुमार के बयान और प्रति उत्तर में भाजपा की प्रतिक्रियाओं को उस तरीके से नहीं दिखा रहा है। राजनेतागण तो सुविधा की राजनीति के सिद्धहस्त हैं, जो आज की राजनीति की कटु हकीकत है। उनके लिये तो ‘‘घी का लड्डू टेढ़ा ही भला’’। परंतु देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला मीडिया भी सुविधा व सहूलियत का क्यों शिकार हो रहा है? इसलिए जब कुछ मीडिया कुछ अन्य मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ कहते है, तो चुप रह जाना पड़ता है।
दूसरी महत्वपूर्ण बात ‘‘पलटूराम’’ द्वारा जनादेश के अपमान के साथ विश्वासघात की जोर-शोर से की जा रही है। नीतीश कुमार का यह कदम 2020 के जनादेश का अपमान है तथा जनता और भाजपा के साथ विश्वासघात है, यदि उच्च स्तर की राजनीतिक नैतिकता और शुचिता का मापदंड लागू किया जाए तो। क्योंकि प्राप्त जनादेश के विपरीत जनता द्वारा नकारे गए दलों के साथ सरकार बनाई गई हैं। परन्तु तब क्या यही आरोप, सिद्धांत व परसेप्शन तब क्यों नहीं लागू किया गया? जब वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबन के साथ भारी बहुमत प्राप्त कर मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार के द्वारा वर्ष 2017 में उन्हें छोड़कर एनडीए के साथ सरकार बनाई गई। ‘अपना ढेंढर देखे नहीं, दूसरे की फुल्ली निहारे’। तब क्या जनादेश का अपमान व महागठबंधन के साथ विश्वासघात नहीं हुआ था? तब तो मीडिया ने उन्हें ऐसा दुलराया था, जैसे ‘सुबह का भूला शाम को घर वापस आ गया हो’। भाजपा से यह प्रश्न पूछने पर वे दाये-बाये होकर नीतीश कुमार के उस बयान को सामने ला देते है, जब नीतीश कुमार उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव द्वारा माल निर्माण में की गई गड़बड़ी के कारण पड़ा सीबीआई छापे से उजागर हुए तथाकथित भ्रष्टाचार का जवाब न देने पर असहज स्थिति महसूस कर रहे होते हो।  
वैसे जनता ने जिस गठबंधन को 5 साल के लिए चुना है, किसी भी कारण से उसे छोड़कर उस विरोधी गठबंधन के साथ सरकार बना लेना, जिसे जनता ने चुनाव में अस्वीकार कर दिया हो, यानी ‘अंडे सेवे कोई लेवे कोई’, जनादेश का अपमान ही कहलाएगा। लेकिन अपमान की समान परिस्थिति होने के बावजूद ‘‘तेरे द्वारा अपमान परंतु मेरा मान’’ ‘‘अर्थात मान न मान मैं तेरा मेहमान’’ की तरह एक तरफा तर्क नहीं चलेगा? किसी मुद्दे पर असहजता महसूस की जा रही है, तो जो लोग वास्तव में जनादेश को सर्वोपरि मानते हैं तो सही व सच्चे लोकतंत्र का रास्ता वही होगा जहां सत्ता की कुर्सी से इस्तीफा देकर उस मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर चुनाव लड़कर जनता से मत मांग कर विश्वास पाकर पुनः सत्ता प्राप्त करे। परन्तु यह तो ‘‘आकाश कुसुम तोड़ कर लाने जैसा है’’।
आज की ‘दुधारू गाय की लात खुशी खुशी सहने वाली’ राजनीति में कोई माई का लाल या नेता व पार्टी पागलपन की इस सोच तक जाने के लिए एक क्षण भी नहीं सोचेगा, तो फिर इस मुद्दे पर आरोप प्रत्यारोप क्यों? इसलिए जनादेश की अपमान की बात करना सिर्फ जनता को मूर्ख बनाना है। पूर्व में कांग्रेस ने कितनी बार चुनी हुई सरकारों को भंग कर (56 बार) या दल बदल कर गिरा कर जनादेश का अनादर किया है। अब ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होंय’। आज देश में भाजपा को सत्ता का मौका मिला है, तब उसने भी कांग्रेस की पूर्व परिपाटी को आगे बढ़ाते हुए महाराष्ट्र सहित आठ राज्यों में शासन करने का स्पष्ट जनादेश न मिलने के बावजूद तोड़फोड़ कर जुगाड़ कर, दलों को तोड़कर अपनी प्रभुसत्ता की सत्ता स्थापित की। इस प्रकार आभासी जनादेश के परसेप्शन का वातावरण बनाया गया। देश में दिन प्रतिदिन घट रही इस तरह की राजनीतिक घटनाओं से देश का बौद्धिक वर्ग अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है और वह इस कारण विकल्पहीन राजनीति के भंवर में फंसते जा रहा है। कही ऐसा न हो कि भविष्य में वोट नहीं नोटा महत्वपूर्ण होकर शासन करें?
पलटूराम के कारण हुए इस सत्ता परिवर्तन का तुरंत सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि विक्षप्त व सुप्त विपक्ष जागृत हो गया, जैसे संजीवनी ही मिल गई हो। बिहार में एनडीए भाजपा तक सीमित हो गया। भाजपा के लिए सबसे बड़ा प्रश्न सोचने का व चिंता का विषय यह है कि भाजपा के सत्ता के तेजी से फैलाव के बावजूद अन्य दलों के उसके साथ आने के बजाय विपरीत उसके सहयोगी दलों के छिटकने के कारण एनडीए का आकार सिकुड़ते जा रहा है। जबकि अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए में लगभग 26 सहयोगी दल शामिल थे।
अंत में बिहारी बाबू के नाम से प्रसिद्ध बिहारी नेता प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा बिहार छोड़कर पश्चिम बंगाल से सांसद बने। अब परिवर्तित स्थिति में शायद उसे बिहार में विहार करने की परिस्थितियां बन गई है। और पाले बदलने की राजनीति का प्रमुख केन्द्र बन गये बिहार में शत्रुघन सिन्हा राज्य (पश्चिम बंगाल) छोड़ कर ‘‘पुनर्मूषकोभव’’ की उक्ति चरितार्थ करते हुए वापस अपने राज्य में आ सकते हैं। उक्त पाले बदलने का एक संदेश कम से कम यह भी जा सकता है।

बुधवार, 10 अगस्त 2022

क्या ‘‘मीडिया’’ स्वयं में ‘‘कानून का पर्यायवाची’’ तो नहीं बन रहा है?



नोएडा के दो में थाना क्षेत्र की सेक्टर 43-बी फेज में ग्रैंड ओमेक्स सोसायटी के टॉवर एलेक्जेंड्रा के फ्लैट डी-003 में रहने वाले तथाकथित भाजपा नेता श्रीकांत त्यागी के द्वारा उक्त सोसायटी की ही निवासी, एक संभ्रांत महिला के साथ अभद्रता की शुक्रवार पांच अगस्त की घटना का वीडियो वायरल होने के बाद उत्तर प्रदेश की नोएडा पुलिस तुरंत एक्शन (हरकत) में आई। ’’तथाकथित भाजपा नेता’’ इसलिए कह रहा हूं कि भाजपा के तमाम नेताओं द्वारा उसे भाजपाई मानने से या उससे कोई संबंध होने से इंकार कर उसके पार्टी का प्राथमिक सदस्य तक न होने का दावा किया गया। भारतीय जनता पार्टी के किसान मोर्चा की 2018 की राष्ट्रीय कार्यसमिति के (1 वर्ष के लिए) सदस्य या उसकी युवा विभाग की राष्ट्रीय संयोजक होने का पत्र वायरल होने पर किसान मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खंडन किया। युवा विभाग जैसा खंड/पद भाजपा के किसान मोर्चे में हैं ही नहीं हैं। बावजूद इन सबके मीडिया भाजपाई नेताओं के साथ श्रीकांत त्यागी की अनेक फोटो होने के कारण समस्त मीडिया उसे भाजपाई गालीबाज नेता ही बता रही है। ’’अब तुम्हीं मुद्दई, तुम्हीं शाहिद, तुम्हीं मुंसिफ ठहरे, तो फिर अदालत की जरूरत किसे है’’। भाजपा के इंकार के पश्चात भी इस तकनीकी व तथ्यात्मक रूप से गलत बात को मीडिया द्वारा लगातार प्रसारित करने के बावजूद भाजपा के मीडिया सेल ने न तो मीडिया की आलोचना की और न ही इस गलत बयानी के लिए कानूनी कार्रवाई करने का संकेत दिया। क्या एक ‘‘संभ्रात रसूखदार नागरिक’’ भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के साथ फोटो नहीं खिंचवा सकता है? सिर्फ भाजपा कार्यकर्ता ही फोटो खिचवा सकते हैं? क्या यह एक नागरिक के अधिकार पर कुठाराघात नहीं हैं?
घटना के तुरंत बाद घटना का वीडियो वायरल होने के पश्चात पुलिस को मजबूरन कार्रवाई करनी पड़ी। इससे यह सिद्ध होता है कि मीडिया भी कई बार कानून के समान डर पैदा कर (क्योंकि बिना ड़र के कानून का पालन संभव होता दिखता नहीं है) कानून का पालन करवा लेता है, जो सामान्यतः नहीं होता है, क्योंकि ’’ड़र के आगे जीत है’’। इसलिए मीडिया भी कई बार कानून की शक्ल ले लेता है, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। उपरोक्त घटना की बारीकियों से विस्तृत विवेचना कीजिए, उक्त तथ्य अपने आप सिद्ध हो जायेगें।
सर्वप्रथम घटना के तुरंत बाद की गई रिपोर्ट पर ’’तेल देखो तेल की धार देखने’’ वाली पुलिस द्वारा गाली-गलौज के मारपीट का प्रकरण दर्ज किया गया, परंतु तुरंत-फुरंत कोई कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि तब तक ’’हथेली पर सरसों जमाने वाला’’ मीडिया सामने नहीं आया था। ‘मीडिया’ के कानून के पर्यायवाची होने का यह पहला संदेश है। घटना का वीडियो तेजी से वायरल होने के बाद ही पुलिस सामने आई और प्रेसवार्ता कर यह कहा कि घटना में जो कुछ दिख रहा है, उसमें आरोपी साफ तौर पर महिला के साथ अभद्रता करता हुआ दिख रहा है। आवश्यक तुरंत कार्रवाई की जा रही है। भला हो उत्तर प्रदेश पुलिस का, जो पूर्व में कई अन्य इसी तरह की या इससे भी गंभीर घटनाओं के अवसर पर यह कहते थकती नहीं थी कि, हम वीडियो की सत्यता की जाँच करेंगे, तदोपरांत वीडियो में छेड़छाड़ न पाये जाने पर कानूनन् कार्रवाई की जायेगी। कम से कम यहां पुलिस ने वीडियो की जांच करने का कथन या संकेत तो नहीं दिया। यह यूपी पुलिस का त्वरित निर्णय की कार्रवाई को दर्शाता है?
उत्तर प्रदेश सरकार के त्वरित निर्णय के इसी क्रम में नोएडा सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा के 48 घंटों में आरोपी को गिरफ्तार के कथन के साथ ही ’’नौ दिन में अढ़ाई कोस चलने वाले’’ प्रशासन ने 24 घंटे के भीतर ही आरोपी के भवन के अतिक्रमित भाग व निर्माण को बुलडोजर से तुड़वाकर त्वरित कार्रवाई कर दी गई, जो उनके हाथ में थी। यह त्वरित निर्णय हमें आज की न्याय व्यवस्था में प्रायः नहीं मिलता है। न्याय में देरी होने के कारण ही न्यायपालिका बदनाम है। इसलिए न कोई जांच, न नोटिस, न कोई सुनवाई का अवसर ’’न दलील न वकील’’ और जेट की गति से बुलडोजर (क्योंकि बुलडोजर की स्वयं की गति तो बहुत कम होती है) चलने की कार्रवाई कर दी गई। यह उत्तर प्रदेश सरकार व पुलिस की न्याय के प्रति तीव्रता का जीता जागता उदाहरण है। तथापि तथ्य व सच्चाई यह भी है कि वर्ष सितंबर 2019 में ही अतिक्रमण को लेकर नोएडा अधिकारियों के समक्ष सोसायटी के निवासियों ने श्रीकांत त्यागी के विरूद्ध शिकायत की थी, परन्तु वह ’’नक्कारखाने में तूती की आवाज’’ साबित हुई और उपरोक्त घटना के होने तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। मजबूरन सोसाइटी के निवासियों ने इस स्थिति को ही अपनी नियति व भाग्य मान लिया। तत्पश्चात आरोपी के विरूद्ध 48 घंटे के भीतर ही धारा 354 के साथ गैंगस्टर एक्ट लगाकर, भगोड़ा घोषित कर, 25 हजार रू. का इनाम घोषित कर दिया गया। त्यागी की 5 लग्जरी गाड़ियों को जब्त कर लिया गया। संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई करने की भी घोषणा की गई। भंगेल स्थित अचल संपत्ति की अतिक्रमित दुकानें जो किराए पर दी गई हैं, के विरुद्ध भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाने की बात भी कही गई। जीएसटी का छापा भी पड़ा। तत्पश्चात ’’कालस्य कुटिला गतिरू’’ जनता का गुस्सा शांत करने के लिए थाना प्रभारी व चार अन्य कांस्टेबल को सस्पेंड किया गया। (जो अमूमन मीडिया द्वारा ट्रायल की जाने वाली हर घटना के ’’साख’’ बचाने के लिए प्रायः होता है।) मतलब सांसद द्वारा दी गई समय सीमा के अंदर मीडिया के कानून के हंटर के ड़र से जो भी कार्रवाई उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकार क्षेत्र में थी, आनन-फानन में कर दी गई।
झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले निर्धन व्यक्ति की झुग्गी पर किसी गुंडे द्वारा अनाधिकृत कब्जा करने की स्थिति में भी क्या पुलिस की तत्परता ऐसी ही दिखाई देती? इसका जवाब पुलिस वालों के पास भले ही न हो, परंतु सार्वजनिक ’’सामान्य ज्ञान’’ में तो है ही। त्यागी के विरुद्ध पुलिस द्वारा उपरोक्त त्वरित कार्रवाई के बावजूद उसके रसूख के कई तत्व, साक्ष्य मिलते हैं। प्रथम उसके पास वर्ष 2013 से चार सरकारी गनर (सुरक्षा) किसने उपलब्ध कराई थी, जो वर्ष फरवरी 2020 में पत्नी के साथ विवाद की सुर्खियों के आने के बाद वापिस ले ली गई थी। नंबर दो, गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने न्यायालय से पुलिस रिमांड नहीं मांगा और नंबर तीन, त्यागी द्वारा महिला के साथ किए गए दुर्व्यवहार के लिए उसके द्वारा पुलिस को दिए गए बयान में मांगी गई माफी की पुलिस द्वारा सार्वजनिक जानकारी।
निश्चित रूप से आरोपी का व्यवहार घोर आपत्ति जनक एवं महिला विरोधी था। अतः सांसद महेश शर्मा के 48 घंटे में गिरफ्तारी होने के कथन के बाद भी गिरफ्तारी नहीं हो पाई तब भी आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की इतनी दबाव दबिश होने लगी कि ड़र कर आरोपी को ’’मरता क्या न करता’’, न्यायालय में आत्म समर्पण करने लिए आवेदन देना पड़ गया। अतः पुलिस का यह दबाव लगभग गिरफ्तारी जैसा ही है। और अंततः परिणाम स्वरूप घटना के पांचवे दिन आरोपी को गिरफ्तार कर ही लिया गया। इससे पुलिस का यह दावा तो मजबूत होता है कि जो उसके हाथ में है, अतिक्रमण तोड़ना, वह आनन-आफन में त्वरित कर दिया गया। परन्तु सजा देना उसके हाथ में नहीं होता है। ’’राजहंस बिनु को करे नीर क्षीर बिलगाव’’। अतः यदि तुरंत या समय सीमा में गिरफ्तारी नहीं भी हो पाई हो, तब भी वर्तमान न्याय व्यवस्था के चलते गिरफ्तारी होने पर भी उसे तुरंत सजा तो नहीं हो जाती? अतः गिरफ्तारी में कुछ देरी होने पर राजनीतिक हंगामा तो मत कीजिए। पुलिस पर राजनीति के तहत तो आरोप मत लगाइये। कम से कम पुलिस की इस त्वरित कार्रवाई के लिए तो उसकी पीठ तो थपथपा दीजिये? राजनीति तो हमारे देश की नीति रहित जिंदगी में इतनी घुलमिल गई है कि अच्छे और बुरे का अंतर समस्त राजनीतिक दल भूल चुके है। सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लगाने की शैली ही देश की राजनीति नीति को हटाकर विकसित होती जा रही है।  देश का यह दुर्भाग्य है।
यह घटना व इसके बाद हुई समस्त कार्रवाई से एक प्रश्न अवश्य पैदा होता है। सामान्य अपराध करने वाले सफेदपोश रसूखदार आरोपी के विरूद्ध समस्त मीडिया द्वारा मामले को लगभग दिन-रात लाईव चलाने के कारण मीडिया ट्रायल से सरकार की साख पर लग रहे बट्टे के कारण, सरकार व पुलिस ने उपरोक्तानुसार आवश्यक कार्रवाई की, जो सामान्यतः हर ऐसे अपराध के केस में मीडिया ट्रायल न होने के बावजूद की जानी चाहिए? परन्तु वस्तुतः धरातल पर क्या हमेशा ऐसा होता आया हैं? उत्तर निश्चित रूप से नहीं में ही मिलेगा? अतः यद्यपि ऐसी प्रत्येक घटना के समय दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड संहिता के साथ अन्य आपराधिक कानून विद्यमान रहते हैं। परंतु यदि मीडिया के कानून का डंडा नहीं चलता है, तो उक्त समस्त कानून सुप्त रहते हैं। ’’गालीबाज’’ ‘गुड़ा’ त्यागी के साथ संबोधन के पूर्व मीडिया ने कितनी बार बलात्कारी व हत्यारा डिग्री का उपयोग ऐसे सफेदपोश अपराधियों के लिए किया? देश के कानून की यह एक बड़ी समस्या है।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न इस घटना से गंभीर रूप से यह भी उत्पन्न होता है कि श्रीकांत त्यागी जैसे व्यक्ति इतने रसूखदार कैसे बन जाते है? पुलिस से गनर कैसे प्राप्त हो जाता है? क्या ’’स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती’’ का सिद्धांत यहां भी लागू होता है? जब  उपरोक्त तरह की ऐसी कोई घटना घटित हो जाती है, तो तब शासन प्रशासन की साख बचाने के लिए मजबूरन ऐसे व्यक्तियों को ’’बलि का बकरा’’ बनाकर बलि ले ली जाती है। परन्तु वह समस्त ‘तंत्र’ जो रसूखदारो को बनाता है, उनका ’’हुक्का भरता है’’, स्वयं बचा रहता है, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है। या नहीं! जनता भी इस मूल प्रश्न/मुद्दे पर जाना नहीं चाहती है, तभी तो ’’बुलडोजर चलने’’ पर सोसाइटी के लोग मिठाई बांटकर, गाजे बाजे बजाकर, ’’योगी जी जिंदाबाद’’ के नारे लगाकर खुशी का इजहार करते है। परन्तु वर्ष 2019 से 2022 तक इस रसूखदार के विरुद्ध की गई कई शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई न होने के लिये सरकार व पुलिस का संरक्षण या अकर्मण्यता को सोसायटी के रहवासी भूलकर भोले हो जाते हैं। जनता की हो गई ऐसी नियति के लिए आखिर जिम्मेदार कौन?

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

देश को ‘‘56 इंच के सीने’’ के साथ ‘‘एकलव्य’’ जैसी ‘‘निशाने’’(दृष्टि) की आवश्यकता है!

क्रमशः गतांग से आगे  द्वितीय भाग :-                                                                                             -

स्वतंत्रता मिलने के बावजूद भारत भी लगातार आतंकवादी घटनाओं से जूझ रहा है। आईएस, आईएसआईएस से लेकर आईएसआई (पाकिस्तान की सैन्य खुफिया एजेंसी) और लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद, इंडियन मुजाहिदीन जैसे विभिन्न नामों से आतंकी संगठन काम कर रहे है। इन सबके तार सूत्र और सरगना पाकिस्तान जो कि शुरू से ‘‘चोर उचक्का चौधरी, कुटना भयो प्रधान’’ जैसे शासकों से संचालित देश रहा है, से ही जुडे़ हुए है। पाकिस्तान उनको भारत के खिलाफ न केवल शरण दे रहा है, बल्कि आर्थिक व अन्य सहायता देकर मजबूत कर भारत के खिलाफ उकसाता भी रहता है। कहते हैं ना कि ‘‘चूहे के बच्चे बिल ही खोदते हैं’’। जब भी हमारे देश में कोई आतंकवादी घटना पाकिस्तानी उत्पत्ति व सरपरस्त आतंकवादी संगठनों द्वारा की जाती है और जब हमारे देश के सैनिक व नागरिक शहीद हो जाते है, तब देश के शीर्षस्थ नेताओं का यह रटा रटाया ‘‘स्टीरियोफोनिक’’ बयान श्रद्धांजलि के रूप में आ जाता है कि ‘‘एक सिर के बदले 10 सिर लायेगें’’। लेकिन यह श्रद्धांजली कभी पूरी होती नहीं है। आज तक हम ‘‘न पिद्दी न पिद्दी का शोरबा’’ जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर का बाल बांका भी नहीं कर पाए, जो सरे आम पाकिस्तान में घूमता पाया जाता रहा है। 

पाकिस्तान से जब भी कोई बातचीत का अवसर हमारे पास आता है, प्रायः हम सीमा पार से उत्पन्न आतंकवाद का मुद्दा उठाते अवश्य हैं। परन्तु ‘‘कुत्ते की पूछ’’ के समान पाकिस्तान का रवैया हमेशा एक सा ही रहता है। जाहिर है, ‘‘कुत्तों को घी हजम नहीं होता’’। बावजूद इसके हमें अमेरिका, इजराइल, जर्मनी इत्यादि देशों से प्रेरणा क्यों नहीं मिलती है लेते, हैं, जिन्होंने अपने-अपने देशों में हुई आतंकवादी कार्रवाई का बदला बिना शोर शराबे के, बिना अंतरर्राष्ट्रीय संस्था से अधिकार प्राप्त किये, बिना ‘‘अरण्य-रोदन’’ के, सफलतापूर्वक बदला लेकर अपने-अपने देश के नागरिकों के घावों पर मरहम लगाने का कार्य ही नहीं, बल्कि इन आतंकवादी घटनाओं में हुए शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि देने की कार्य बखूबी किया है। 

अमृत महोत्सव के इस पावन अवसर पर भारत यह प्रण क्यों नहीं करता है और इन देशों से क्यों सीख नहीं लेता है कि ‘‘याचना नहीं अब रण होगा’’, बल्कि ‘‘रण’’ नहीं ‘‘रणनीति’’ होगी। इन आतंकवादी संगठनों के सरगनाओं को हमारी संस्कृति का भाग ऐतिहासिक ‘महा-भारत’ जिसमें ‘भारत’ स्वयंमेव शामिल है, से सीख व प्रेरणा लेकर ‘‘एकलव्य समान अचूक निशाने’’ पर लेकर, अथवा अर्जुन समान स्वयंवर के समय घूमती हुई मछली की परछाईं तेल में देखकर उसकी आंख के निशाने पर तीर भेद कर (‘‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’’) आतंकवादियों का काम तमाम करे, और आतंकवाद को समाप्त कर लक्ष्य की प्राप्ति करें। समृद्ध विकास कर, विश्व में ‘विकासशील’ से ‘विकसित देश’ की ओर अग्रसर होने के लिए और कोई रास्ता नहीं है। ‘‘भारत को अमेरिका, इजराइल बनना ही पड़ेगा’’। क्योंकि आतंकवाद निसंदेह विकास के रास्ते में एक बड़ा रोड़़ा है। 

आज भी देश की राजनीति में चाहे पक्ष हो या विपक्ष, राजनैतिक दल जनता के सामने गाहे-बगाहे अपने तर्क के समर्थन में अपनी बात व मुद्दों को मजबूती देने के प्रयास में अमेरिका व अन्य देशों का उदाहरण अपनी सुविधानुसार जब-तब देते रहते हैं। तब आतंकवाद के मामले व मुद्दे पर हम क्यों नहीं अमेरिका से सीख लेना चाहते है? ‘‘सीधी उंगली से घी नहीं निकलता’’, आज जब हमारे देश का मीडिया भारत को विश्व गुरू की एवरेस्ट की ऊंचाई पर चढ़ाने पर तुला हुआ है, तब हम इन सीमा पार संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरर्राष्ट्रीय आतंकियों को मार कर सही रूप से यह पदवी वास्तविक अर्थों में क्यों नहीं पाना चाहते है?

प्रधानमंत्री मोदी आज बेशक ग्लोबल लीडर है और उनकी लोकप्रियता स्वतंत्र भारत के किसी भी प्रधानमंत्री की तुलना में बेहतर होकर आज सर्वोच्च स्तर पर है। महाशक्तियों से सिवाएं चीन को छोड़कर भारत के कमोवेश अच्छे व प्रभावी रिश्ते हैं, जैसा कि ‘‘ताल ठोक कर’’ का दावा भी किया जाता है। तब इस अमृत महोत्सव पर भारत के लिए एक स्वर्णिम अवसर आया है कि इस देश का नेतृत्व समुद्र मंथन करे, उससे निकले अमृत जनता को पिलाये और जहर आतंकवादियों को। क्योंकि ‘‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते’’। तभी सही अर्थों में हम अमृत महोत्सव को सफल कह पायेगें। देश के नेतृत्व को और खासकर 56 इंच के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘‘एकलव्य’’ की एकाग्र दृष्टि रखकर आतंकवादियों को मार गिराना होगा। तभी हम इस 75वें अमृत महोत्सव पर जनता को दिवाली मनाने का अवसर प्रदान कर सकेगें। और ‘‘असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय’’ की राह पर चल सकेंगे। इन्हीं भावनाओं व आशाओं के साथ सुखद व मन को शांति देने वाली परिणाम की उम्मीद में।  

सोमवार, 8 अगस्त 2022

देश को ‘‘56 इंच के सीने’’ के साथ ‘‘एकलव्य’’ जैसी ‘‘निशाने’’(दृष्टि) की आवश्यकता है!

विषय लेख लम्बा होने से इसे दो भागों में लिया जा रहा है प्रथम भाग:-

अमेरिका ने काबुल शहर के शेरपुर इलाके में रह रहे ‘अल कायदा’ के (ओसामा बिन लादेन के बाद बने) सरगना अयमान अल जवाहिरी को अपनी ही जमीन से ‘‘सीआईए ड्रोन’’ हमले द्वारा अचूक निशाने से मारकर 9/11 आतंकवादी हमले का बदला अंततः पूरा कर यह दिखा दिया कि ‘‘बाज के बच्चे मुंडेरों पर नहीं उड़ते’’। अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन व उसका ‘‘दिमाग’’ (सहयोगी) अल जवाहरी के नेतृत्व में 9/11/2001 को अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। तब न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड़ सेंटर व पेंटागन के टावरों पर दो अपहृत विमानों से 17 आत्मधाती आतंकवादियों द्वारा किये हमलों में लगभग 3 हजार (2977) नागरिक मारे गये थे। यह हमला 9/11 के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुआ। 

11 साल बाद वर्ष 2011 में अमेरिका ने ‘‘ऑपरेशन नेप्ट्यून स्पीयर’’ के तहत नेवी ‘‘सील कमांडो’’ पाकिस्तान के शहर एबटाबाद भेजकर वहां रह रहे अलकायदा के प्रमुख, सरगना ओसामा बिन लादेन को  मृत्यु के घाट उतार दिया। इसके 11 साल बाद और बेहतर तरीके से बिना कमांडो भेजे ड्रोन से अचूक निशाना लगाकर परिवार व रहवासी भवन को सुरक्षित रखते हुए अल जवाहिरी का खात्मा कर ठीक ही किया, ‘‘तत्र दोषम् न पश्यामि, शठे शाठ्यम् समाचरेत’’। अल जवाहिरी के मारे जाने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘न्याय कर दिया गया हैं, चाहे कितना भी समय लगे, चाहे आप कहीं भी छिप जाएं, अगर आप हमारे लोगों के लिए खतरा हैं तो अमेरिका आपको ढूंढेगा और आपको बाहर निकालेगा’’। इसे कहते हैं संप्रभुता और प्रभुसत्ता। भारत के लिए यह सबक है, जब गाहे-बगाहे, मीडिया अवसर ढूढ़कर अमेरिका से भारत की तुलना करने का कोई अवसर जाने नहीं देती है। 

स्पष्ट है उक्त दोनों खूंखार आतंकी सरगनाओं को मारने की कार्रवाई में अमेरिका ने कोई अंतरराष्ट्रीय कानून का न तो पालन किया और संयुक्त राष्ट्र संघ अथवा सुरक्षा परिषद से दूसरे देश में घुसकर हमला करने की न तो गुहार की और न ही अनुमति ली और न ही एक क्षण के लिए शायद सोचा भी होगा। भारत में भी 26/11/2008 को ‘‘लश्कर ए तोयबा’’ के सरगना जकीउर रहमान लखवी, संस्थापक हाफिज सईद, साजिद मीर व जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर ने मिलकर जैश-ए-मोहम्मद के अजमल कसाब सहित 10 आतंकवादियों द्वारा मुंबई के 7 विभिन्न जगहों में बम्ब ब्लास्ट करवाया, जिसमें लगभग 160 से ज्यादा निर्दोष नागरिक मारे गये व 300 से ज्यादा घायल हुए। यह आतंकवादी घटना 26/11 के रूप में प्रसिद्ध हुई। यद्यपि इसके पूर्व इसी मुंबई में जब उसे बम्बई (बाम्बे) कहा जाता था, 12 मार्च 1993 (11 के अगले दिन) 11 जगह बम ब्लास्ट हुए, जिसमें 257 लोग मारे गए और 713 घायल हुए, जिसका मास्टमांइड़ दाऊद इब्राहिम था।

अमेरिका व भारत सहित विश्व में ‘‘आतंकवाद’’ को लेकर शायद 11 अंक का बड़ा महत्व लगता है। अमेरिका ने तो 11 वे महीने में हुई आतंकी घटना का 11-11 साल के अंतराल में इस ‘11’ अंक का पूर्ण बदला ले लिया। परन्तु भारत लगभग 14 साल गुजर जाने के बाद भी मसूद अजहर व हाफिज सईद का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। उल्लेखनीय बात यह है कि उक्त आतंकी घटना में शामिल मसूद अजहर वही है, जिसे भारत सरकार ने कंधार विमान अपहरण घटना (वर्ष 1999) में 176 यात्रियों व 11 क्रू सदस्यों की जान के बदले तीन खूंखार आतंकी जिसमें मसूद अजहर भी शामिल था, को अपहरणकर्ताओं से हुई सौदेबाजी के तहत भारतीय जेल से छोड़ा गया था। भारतीय संसद, पठानकोट एयर बेस व पुलवामा आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड मसूर अहमद ही माना जाता है। दाऊद इब्राहिम कासकर, हाफिज सईद, मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किया है व तब देर किस बात की?      

एक क्रूरतम अपराधी को सबक सिखाने के लिए, अमेरिकन कानून या अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा चलाये बिना और उसे कानूनी अपराधी घोषित कराये बिना, सिर्फ और सिर्फ देश की अस्मिता की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का बेखौफ मजाक उड़ाकर उल्लंघन कर, अमेरिकन राष्ट्रपति ने पहले अल कायदा के सरगना नंबर एक लादेन व बाद में नंबर दो जवाहिरी को समाप्त कर दिया।

उक्त घटनाओं में हुई खूंखार आतंकवादियों की मृत्यु के कारण आतंकवादी गतिविधियों में कमी होने की आशा में शायद विश्व ने राहत महसूस की होगी। तभी शायद अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होने के बावजूद संबंधित देशों ने न तो कोई विरोध प्रकट किया और न ही सुरक्षा परिषद में अमेरिका की इस कार्रवाई के विरुद्ध कोई दुस्साहस दिखाया गया। तालिबान के प्रवक्ता ने सख्त लहजे में नहीं, बल्कि ट्वीट कर हमले की निंदा करते हुए यह कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांत व दोहा समझौता का स्पष्ट उल्लंघन है। जिस पर अमेरिका ने पलटवार कर ‘‘मियां की जूती मियां के सर’’ पर मारते हुए यह जवाब दिया कि आतंकवाद को समर्थन देने के कारण तालिबान ने ही दोहा संधि का उल्लंघन किया है।

मतलब साफ है। देश की आन-बान और शान पर कोई आतंकवादी संगठन प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दे, देश के निर्दोष नागरिकों को आतंकवादी घटनाओं में मृत्यु के घाट उतार दिया जाए, तब उस देश के शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह बजाय ‘‘अंधे के आगे रो कर अपने दीदे खोने के’’, ऐसी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने वाले को इस तरह का भुगतयमान परिणाम दे, ताकि भविष्य में इस तरह की आतंकवादी घटनाओं की पुनरावृति करने का दुस्साहस फिर न हो सके। क्योंकि ‘‘अपनी करनी ही पार उतरनी’’ साबित होती है। 

शेष क्रमशः अगले अंक में ------------------

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