सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

अरविंद केजरीवाल का बयान! संविधान व लोकतंत्र विरोधी कौन?

‘‘दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल’’ के मामले में उपराज्यपाल एवं दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र के विवाद पर उच्चतम न्यायालय का बहुप्रतिक्षित निर्णय आ गया है। उक्त निर्णय पर आई दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की त्वरित प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री पद पर बैठे हुये व्यक्ति के लिये न केवल अत्यधिक अमर्यादित है, वरण वह संविधान व लोकतंत्र के विरूद्ध भी हैै। केजरीवाल का यह बयान कि निर्णय ‘‘जनतंत्र विरोधी है’’ सत्य है, लेकिन यह सत्य किसके लिये? वास्तव में संविधान व जनतंत्र विरोधी कौन है? यही यक्ष प्रश्न हैं?
आलेख को आगे बढ़ाने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण सत्य यह भी है कि केजरीवाल पीड़ित पक्ष बनकर उच्चतम न्यायालय के समक्ष उन मुद्दो को लेकर ‘‘न्याय’’ के लिये गये, जिनका कानूनी अस्तित्व चुनाव लड़ने के पूर्व उनके समक्ष था। अर्थात दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली राज्य के अधिकारों में कोई परिवर्तन केन्द्रीय सरकार द्वारा नहीं किया गया था। मतलब साफ है कि चुनाव के पूर्व केजरीवाल जानते थे कि दिल्ली प्रदेश के पास कौन-कौन से अधिकार है, जिनके रहते हुये भी जनता ने उन्हे वोट दिया था। इन्ही अधिकारों को रहते हुये केजरीवाल के पूर्व भाजपा व कांग्रेस के मुख्यमंत्रीयों ने भी विरोधी दल की केन्द्र में सरकार होने के बावजूद शासन चलाया। किसी भी मुख्यमंत्री ने केजरीवाल के समान केन्द्रीय सरकार या उपराज्यपाल पर सरकार न चलाने देने के आरोप इस तरह के नहीं लगाये थे। वास्तव में दिल्ली राज्य के लिये अधिकारो की लड़ाई कानूनी न होकर राजनैतिक होनी चाहिये थी।
सिविल सोसाइटी में एक संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत हमारे लोकतांत्रिक प्रणाली का यह एक सर्वमान्य व अटल सिंद्धान्त है, कि उच्चतम न्यायालय का निर्णय अंतिम व बंधनकारी होता है। जब कभी न्यायालय कोई निर्णय देता है, तो निश्चित रूप से एक पक्ष संतुष्ट होता है, वहीं दूसरा पक्ष, जिसके प्रतिकूल निर्णय आता है, असंतुष्ट हो जाता है। यद्यपि वह उसे पसंद नहीं आता है, फिर भी (उच्च्तम न्यायालय का होने के कारण) बंधनकारी होने से उसे रूखे मन से ही सही, उसे  मान्य व स्वीकार करना पड़ता है। उसकी विवेचना, समालोचना, आलोचना की जा सकती है; निर्णय पर प्रश्नवाचक चिन्ह भी लगाया जा सकता हैं; उसमें कमियाँ निकाली जा सकती है; कमियों पर मीडिया सार्थक बहस भी करवा सकता हैं; परन्तु इन सबके बावजूद उसे जनतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता। यद्यपि इन्हीं आधारों पर विशेषज्ञ पुर्निविचार याचिका दायर कर सकते है। फिर भी न्यायिक निर्णयों की आलोचना की एक कानूनी, संवैधानिक व स्थापित प्रचलित नैतिक सीमा भी है। लेकिन न्यायिक निर्णय को जनतंत्र या संविधान विरोधी कहना और इसे लोगो की अपेक्षाओं के खिलाफ बताना तो नितांत गैर-जिम्मेदाराना व बेवकूफी भरा कथन है। बल्कि ऐसे बयान देकर अरविंद केजरीवाल स्वयं ही जनतंत्र व संविधान विरोधी सिद्ध होकर व उसी लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं जिसके द्वारा वे स्वयं मुख्यमंत्री चुने गये है। लोकतंत्र जिन चार खम्बों पर मजबूती से खड़ा है, उसमें सबसे प्रमुख न्यायपालिका ही है, जो अन्य तीन खम्बों को (सुरक्षा) कवच प्रदान करती है। यदि पक्षकारों को उच्चतम न्यायालय के निर्णयों की इस सीमा तक आलोचना करने की अनुमति दे दी जायेगी, तब न तो स्वतंत्र न्यायपालिका रह पायेगी, न ही लोकतंत्र रह पायेगा और संविधान भी नहीं बच पायेगा। दृढ़ता (बेसिक स्ट्रकचर-केशवानंद भारती प्रकरण में) के साथ लचीलापन लिए हुए संविधान जिसमें अभी तक 101 संशोधन हो चुके हैं, के कारण ही हमारा लोकतंत्र परिपक्व होता जा रहा है तथा संविधान की सुरक्षा व सम्मान का दायित्व भी इसी न्यायपालिका का है। 
केजरीवाल जो स्वयं एक अर्द्ध न्यायिक प्रक्रिया का भाग रहे है (आयकर आयुक्त के रूप में)। क्या उन्हे इतनी भी समझ नहीं रह गई है कि न्यायालय लोगो की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर   निर्णय नहीं देता है, बल्कि संवैधानिक व कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय देता हैं। फिर चाहे वह निर्णय लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप हो अथवा नहीं, लोगो को अच्छा लगे या नहीं। यदि सरकार को यह लगता है कि न्यायिक निर्णय सिर्फ लोगो के हित व इच्छाओं के अनुरूप ही तो उन्हे सरकारी कानून बनाते समय इस तथ्य पर सुक्षमता व गंभीरता से ध्यान देकर कानून का निर्माण पूर्णतया जनता के हितेषी बनकर जनता के हित में बनना चाहिये ताकि न्यायिक समीझा करते समय उसका निष्कर्ष भी वहीं निकल सकें।   
केजरीवाल का उक्त बयान अराजकता लिये हुए है, जो उसके पूर्व में दिये गये बयान को ही दोहराता है जब उन्होने कहा था ‘‘वे कहते है मैं अराजक हूँ, हाँ मैं मानता हूँ  कि मैं अराजक हँू।’’ न्यायिक निर्णय, लोकतंत्र (जनतंत्र) का चुनाव परिणाम नहीं है; जहां आप हार जाने के बाद कैसी भी आलोचना कर सकते है। जनतंत्र के निर्णय (चुनाव परिणाम) व न्यायपालिका के निर्णय के बीच के अंतर को समझना आवश्यक हैं। जनतंत्र द्वारा फूलन देवी चुनाव जीतती है लेकिन वही फूलन देवी न्यायपालिका द्वारा सजा पा जाती है। 
अतः केजरीवाल के विरूद्ध केवल मानहानि का प्रकरण दर्ज किया जाना ही पर्याप्त नहीं होगा। चंूकि अपने उपरोक्त कथन से वे लोकतंत्र को ही खतरे में डाल रहे है, जो कृत्य देशद्रोह  किए जाने के समान है। अतः केन्द्रीय शासन द्वारा उन्हे तुंरत बर्खास्त कर उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करके कार्यवाही करना चाहिए। राजनैतिक बयान-बाजी चलती रहेगी। लेकिन प्रशासन व केन्द्रीय सरकार यह कहकर बचने का प्रयास न करे कि अभी तक किसी ने भी केजरीवाल के विरूद्ध प्रथम सूचना पत्र दर्ज नहीं कराया हैं। केजरीवाल के इस बयान के समय को भी ध्यान में रखने की नितांत आवश्यकता है। यह बयान ऐसे समय पर आया है, जिसके एक दिन पूर्व ही उन्होने समस्त विपक्ष को दिल्ली में एक ही मंच पर इक्ठ्ठा किया था। ऐसी स्थिति में समस्त राजनैतिक दलों का भी दायित्व बनता है कि वे देश हित में केजरीवाल के इस बयान की सख्त आलोचना करे। 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

2019 के लोकसभा चुनाव केे बाद ‘‘एनडीए’’ के प्रधानमंत्री क्या नितिन गडकरी होगें?

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आरएसएस के करीबी, कॉर्पोरेट और व्यापार जगत के चहेते और केन्द्र की मोदी सरकार के नियत अवधि में अपेक्षित परिणाम देने वाले सड़क परिवहन, जहाज रानी व गंगा सफाई विभाग के मंत्री नितिन गडकरी केे पिछले कुछ समय से जो बयान आ रहे है वे निश्चित रूप से सामान्य से हट कर रहे हैं। गडकरी के मन की बात की कुछ बानगिया निम्नानुसार हैंः-
पहला 4 अगस्त 2018 के ‘‘आरक्षण देकर क्या होगा नौकरियां ही नहीं है’’। दूसरा अक्टूबर 2018 में ‘‘भरोसा नहीं था जीतेगें, तो बडे़ वादे किए, लेकिन जीत गए’’। तीसरा 23 दिसम्बर 2018 को एक कार्यक्रम में उन्होने कहा, ‘‘यदि मैं पार्टी का अध्यक्ष हंू और मेरे सांसद और विधायक अच्छा नहीं करते है, तो कौन जिम्मेदार होगा’’? मुझे नेहरू के भाषण पसंद हैं, कहते हुये उन्होने कहा कुछ ‘‘सिस्टम को सुधारने के लिए दूसरे की तरफ उंगली क्यों करते हो, अपनी तरफ क्यों नहीं करते हो। जवाहर लाल नेहरू कहते थे ‘‘इंडिया इज़ नॉट ए नेशन. इट इज़ ए पॉपुलेशन, इस देश का हर व्यक्ति देश के लिए प्रश्न है, समस्या हैं, तो मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि मैं स्वयं देश के सामने समस्या नहीं बनूंगा’’। तीन विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा, सफलता के कई दावेदार होते है, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता। ‘‘सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं। नेतृत्व को हार व विफलता की भी जिम्मेदारी स्वीकार करने चाहिए’’। एक टीवी कार्यक्रम को दिये साक्षात्कार में गडकरी ने कहा ‘‘हमारे पास इतने  नेता हैं, और हमंें उनके सामने बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हे कुछ काम देना हैं। उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘‘कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर मुंह बंद करने की जरूरत है’’। अभी हाल ही मंे यह बयान आया है कि सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओं जो पूरे हो सकें गडकरी ने कहा कि मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं मैं जो बोलता हूं वो 100 फीसदी डंके की चोट पर पूरा करता हूं। ये समस्त बयान निश्चित रूप से भाजपा की संस्कृति से न तो मेल खाते है और न ही भाजपा की आंतरिक कार्य पद्धति में सामान्य या असामान्य रूप से ंसंभव होते हैं। मतलब साफ है, संघ प्रमुख को विश्वास में लिये बिना या उनकी मूक सहमति या इशारों के बगैर ऐसे बयान संभव नहीं है। 
याद कीजिए भाजपा की कार्यप्रणाली जनसंघ के जमाने से जहां स्थापित पार्टी लाईन के बाहर जाकर जिसने भी कोई प्रश्न वाचक चिन्ह लगाया है, नेतृत्व पर उंगली उठाई है या नीतियों अथवा नीतिगत फैंसलों पर प्रश्न किया है उन्हे या तो पार्टी के बाहर ही कर दिया गया या उनके पर कतर दिये गये या (मार्गदर्शक मंडल बनाकर) उन्हे एक कोने में बैठा दिया गया। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष पीताम्बरा दास, बलराज मधोक से लेकर लालकृष्ण आडवानी तक, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुश्री उमा भारती आदि ऐसे अनेक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने है। इस वास्तविकता के बावजूद नितिन गडकरी ने जो कुछ भी विभिन्न अवसरो पर कहने की हिम्मत की, वह सत्यता है। लेकिन  भाजपा के आज के राजनैतिक परिवेश में कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितने ही उच्च ओहदे पर क्यों न हो, आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बिना ऐसा (दुः)साहसी कदम नहीं उठा सकता।  इसीलिए ऐसा भासित होता है कि भविष्य की स्थिति का आकलन कर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद उत्पन्न होने वाली आशंका पूर्ण (आशा पूर्ण नहीं) स्थिति का मुकाबला करने के लिए नितिन गडकरी को आगे कर उन्हे एनडीए के प्रधानमंत्री पद की ओर अग्रेसित किया जा रहा है। इसका स्वागत भी किया जाना चाहिये। भविष्य के दुष्परिणाम की आशंकाओं को महसूस /स्वीकार करके राजनीति में जब योजना बद्ध दूर-दृष्टि की नीति अपनाई जाती है, तभी उस विपरीत स्थिति से सफलतापूर्वक निपटा जा सकता हैं। संभवतः संघ की इसी मंशा के अनुरूप नितिन गडकरी के उक्त बयान आये हों।
उक्त सच्चाई को मानते हुये ही शायद कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा गडकरी जी के बयान पर मैं एक हिन्दी की कहावत याद कराना चाहता हूं ‘‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’’ याने उनकी निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहती है, और निशाने पर प्रधानमंत्री हैं।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

‘‘कुंभ’’ ‘‘महाकुंभ’’ और ‘‘अर्धकुंभ’’ में क्या कोई अंतर हैं?


प्रयागराज (इलाहबाद) में मकर संक्र्राति से ‘‘अर्धकुंभ’’ प्रारंभ हुआ है। लेकिन इस अर्धकुंभ को केन्द्रीय सरकार से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार व समस्त मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक  इसे कुंभ या महा!कुंभ कहकर महिमा-मंडित कर रहे हैं। इस ‘‘कुंभ’’ के जबरदस्त प्रचार-प्रसार के कारण ही मुझे भी यह शक हुआ कि यह 6 साल में आने वाला अर्धकुंभ है, या 12 साल में आने वाला पूर्ण कुंभ है। लेख लिखते समय सामने बैठे व्यक्ति राकेश से भी मैने पूछा तो उसने भी यही जवाब दिया कि यह कुंभ है। निश्चित रूप से यह जबरदस्त प्रचार-प्रसार के परिणाम का ही साक्ष्य है।   
    कुंभक्या है? कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभका अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रहे थे तब अमृत की कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में छलक गई थीं। जहां- जहां ये बूंदें गिरी थी उन स्थानों पर तब से ही कुंभ का आयोजन होता आया है। उन तीन नदियों के नाम गंगा, गोदावरी, और क्षिप्रा है। कुछ इतिहास कार इसे 850 साल से ज्यादा पुराना मानते हुये आदि शंकराचार्य द्वारा इसकी शुरूवात किया जाना मानते है। कुछ दस्तावेज इसे 525 बी.सी. में शुरू होना मानते है। वास्तव में कुंभ मेलों का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है। इन मेलों का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री व्हेनसांग के लेख से मिलता है, जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन  के शासन में प्रसंगवश इन कुंभ मेलों के होने का वर्णन किया गया है।        कुंभ मेलों का आयोजन चार जगहों पर होता हैः-हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।  उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है। इसके अलावा प्रति 6 वर्ष के अंतराल पर केवल दो स्थान प्रयाग और हरिद्वार में अर्धकुंभ  होता है। चूँकि प्रयाग में पिछला अर्धकुंभ वर्ष 2007 में हुआ था अतः वर्ष 2013 में हरिद्वार के बाद अब प्रयाग में अर्धकुंभ की बारी है।
    अर्धकुंभ क्या है? अर्ध का अर्थ है आधा! हरिद्ववार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है।  इसमे कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अर्धकुंभ की तैयारी में समस्त साधन-संसाधन झौंक दिये व आवश्यक बजट की उपलब्धता भी कराई है। पवित्र स्नानटैंट हाउस से लेकर ठहरने खाने-पीने, पर्यावरण, शौचालय, स्वच्छता से स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता तथा भारतीय संस्कृति की विरासत को दिखाने की प्रर्दशनी सांस्कृतिक नाटक, इत्यादि समस्त आवश्यक कार्यो की वृहत्तम स्तर पर जो सर्वोत्तम व्यवस्था विराट फैले कुंभ मेला क्षेत्र में की गई है, वह न केवल सर्वश्रेष्ठ व सराहनीय है, बल्कि अभी तक की उच्चतम व्यवस्था है। इस उच्च व्यवस्था ने 4 वर्ष पूर्व हमारे उज्जैन में हुये सिंहस्थ कुंभ की व्यवस्था को भी पीछे कर दिया है। इसलिए यदि इसे महाकुंभ का नाम दिया जा रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती। लेकिन इस अर्धकुंभ को ही (जो एक वास्तविकता है) महाकुंभ कहा जाता तो बेहतर होता। इसे कुंभ प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं थी।
  कही वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुये तो इसे कुंभके रूप में महिमा मंडित तो नहीं किया जा रहा है? वैसे यह भी जानना चाहिए कि ‘‘अर्धकुंभ’’ ‘‘कुंभ’’ का फल (प्रसाद) क्या एक समान ही है? यह भी पूछा जाना चाहिए कि 2013 में इलाहबाद (प्रयागराज) हुये कुंभ के 6 वर्ष बाद होने वाले अर्धकुंभ को क्या समाप्त कर दिया गया है? (यदि यह कुंभ है तो) इस ‘‘कुंभ’’ में उत्तर प्रदेश कैबिनेट की बैठक भी हो रही है, जो इस बात की परिचायक है कि यह ‘‘धार्मिक अर्धकुंभ’’ से ज्यादा यह एक ‘‘राजनैतिक महाकुंभ’’ है। इस महाकुंभ में भाग लेने वाले किसी भी संत, नागा-साधुओं ने अर्धकुंभ की जगह ‘‘कुंभ’’ प्रचारित करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई हैं। वास्तविकता को स्वीकारते हुये उसे अर्धकुंभकहने से क्या उसकी भव्यता में कोई कालाचिन्ह लग जाता? हम इस वास्तविकता की सत्यता को स्वीकार क्यों नहीं कर सकें यह प्रश्न समझ से परे है। मैं उत्तर प्रदेश सरकार को इस ‘‘अर्धकुंभ’’ की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के लिए बधाई देते हुये यह अनुरोध जरूर करना चाहँूगा कि वे वास्तविकता को स्वीकार करते हुये उसके वास्तविक नाम ‘‘अर्धकुंभ’’ से ही उसका समापन कर गरिमा पूर्वक इस तथ्य को शालीनता से स्वीकार करें। 


बुधवार, 23 जनवरी 2019

क्या कानून व्यवस्था ‘कांग्रेस’ व ‘भाजपा’ के लिये अलग-अलग है?

विगत दिवस मंदसौर में भाजपा नेता व प्रथम नागरिक नगर पालिका अध्यक्ष प्रहलाद बंधवार की सरे आम गोली मारकर हत्या कर दी गई। निश्चित रूप से यह एक बेहद दुखद घटना थी और पुलिस ने त्वरित कार्यवाही कर 24 घंटे के भीतर ही एक आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया। लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ का उक्त घटना पर यह बयान कि यह भाजपा का अंदरूनी मामला है, बिलकुल अनावश्यक और घटना की भयवता को कम करने वाला है। कमलनाथ यह कहकर क्या इंगित या दर्शाना चाहते है? आज ही एक और भाजपा नेता बलवाडी भाजपा मंडल मनोज ठाकरे अध्यक्ष की बल़वानी में दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। गृहमंत्री का उक्त घटना पर यह कथन कि इस घटना में भी भाजपा के आंतरिक मामले की आंशका है, कहकर मुख्यमंत्री के कथन को ही आगे बढ़ाया है। 
क्या भाजपा व कांग्रेस के लिये अलग-अलग कानून है? पार्टी या पारिवारिक विवाद में यदि कोई व्यक्ति कानून के बाहर जाकर कानून को तोड़ने पर उतारू हो जाये, तो क्या उसके लिये नियम व जांच की प्रक्रिया दूसरी होगी? हत्या आखिर हत्या है, और यदि मुख्यमंत्री राजनैतिक रूप से कोई लाभ (एडवान्टेंज) लेना चाहते भी है, तो वे यह आरोप तो लगा सकते है कि एक भाजपाई ने भाजपाई की हत्या की, यदि उनके पास इस बात के पर्याप्त साक्ष्य व तथ्य है तो। हत्या का कारण राजनैतिक द्वेष व व्यक्तिगत विवाद भी हो सकता हैं। लेकिन मुख्यमंत्री का यह कथन जिम्मेदार पूर्ण नहीं कहा जा सकता कि उक्त घटना भाजपा का अंदरूनी मामला है। मुख्यमंत्री व गृहमंत्री का यह कथन निश्चित रूप से जांच एजेंसी पर विपरीत प्रभाव डालेगें, जिससे जांच की दिशा भी बदल सकती है। इसलिये मुख्यमंत्री को कम से कम गहन आपराधिक घटनाओं  पर खासकर राजनैतिक व्यक्ति के हत्या होने पर इस तरह के अनावश्यक बयानबाजी से अवश्य बचना चाहिए।
क्या कमलनाथ के उक्त कथन का आशय यह तो नहीं है कि भाजपा की चुनाव में लगभग जीती हुई बाजी हारने के कारण उत्पन्न हताशा इसके लिये जिम्मेदार है? भाजपा का अंदरूनी मामला कहकर क्या मुख्यमंत्री व गृहमंत्री भाजपाईयों की हत्या करने की छूट दे रहे है? आखिर इन कथनों के पीछे उद्देश्य क्या है। यदि भाजपा का यह अंदरूनी मामला है व कानून व्यवस्था का मामला नहीं है तो क्या पुलिस प्रशासन का कानून का उल्लंघन करने वाले  ऐसे जघन्य अपराध को रोकने का प्रयास का दायित्व नहीं है? वास्तव में ये बहुत ही गंभीर मामले है, क्योंकि ये घटनाएं हत्या जैसे जघन्य अपराधों से जुड़ी है। इसलिये इस पर शासन व प्रशासन दोनो को अत्यंत संवेदनशील होने की आवश्यकता है। 
गृहमंत्री का यह कथन भी हास्यास्पद है कि भाजपा कानून अपने हाथ में न ले। वास्तव में जब गृहमंत्री स्वयं यह कहकर कि यह भाजपा का अंातरिक मामला है, पल्ला झाड़ रहे है तब जब गृहमंत्री ने कानून की कमान समालने से इंकार ही कर दिया हो तो निश्चिय ही भाजपा के द्वारा कानून हाथ में लेने के अलावा क्या विकल्प रहेगा?

शनिवार, 12 जनवरी 2019

केन्द्रीय सरकार का ‘‘आर्थिक आधार’’ पर 10 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय! कितना अधूरा! कितना पूर्ण?

वास्तव में हमारे देश में यदि किसी भी ‘‘सरकार’’ से कोई निर्णय अपने पक्ष में करवाना हो तो सरकार के चुने जाने के 4 साल तक तो वह आपकी मांगे व मुद्दो पर गंभीरता से कोई विचार ही नहीं करती है, क्योकि तब तक वह आपके चुनावी दबाव में ही नहीं होती है। परन्तु चुनावी वर्ष में चुनावी मोड में आ जाने के बाद आपका मुद्दा, फिर चाहे वह गलत हो या सही, कोई भी सरकार राजनैतिक दृष्टि से नफा-नुकसान का आकलन करते हुये उस पर विचार कर निर्णय लेती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता हैं, जनता का दबाव सरकार पर बढ़ता जाता है और सरकार निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाती है।
केन्द्र सरकार द्वारा सवर्ण समाज को आर्थिक आधार पर आठ लाख से कम सालाना आमदनी वालो को 10 प्रतिशत सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानो में प्रवेश देने पर आरक्षण देने का निर्णय लिया है, वह कुछ इसी मानसिकता व परिस्थितियों का परिणाम हैं। क्योकि हाल में ही तीन हिन्दी भाषी प्रदेशों में भाजपा के हार का एक कारण सवर्ण वर्ग की नाराजगी होना बतलाया गया है एक और तथ्य का यहाँ उल्लेख किया जाना समयाचिन होगा कि देश की लगभग 31 प्रतिशत सर्वण हिन्दू 125 लोकसभा सीट पर जीतकर आते है। फिर भी सिद्धान्त रूप से इस निर्णय का स्वागत इसीलिए किया जाना चाहिए कि पहली बार आर्थिक आधार पर आरक्षण के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाकर केन्द्रीय शासन स्तर पर निर्णय लिया गया है। यद्यपि इसको अभी असली जामा पहनाना है, जो इतना आसान काम नहीं है। केन्द्रीय सरकार ने जो निर्णय लिया गया है व जो दिख रहा है, वह न केवल निर्णय अपूर्ण है, बल्कि तुरन्त वास्तविक धरातल पर उतरने वाला भी नहीं है।
आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत सवर्ण समाज को आरक्षण देने का प्रस्ताव वर्तमान में लागु 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक अधिकतम सीमा के अलावा होगी। पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा को उच्चतम न्यायालय ने कई अवसरो पर उचित, वैध व संवैधानिक ठहराया हैं व इसकी सीमा को लांघ कर पचास प्रतिशत से अधिक किये किसी भी प्रकार के आरक्षण को उच्चतम न्यायालय ने अवैध घोषित किया है। आरक्षण के संबंध में वर्तमान में कानूनी, संवैधानिक व न्यायिक स्थिति यही है। ×आपको याद ही होगा सपाक्स पार्टी व वृहत्त सवर्ण समाज की माँग 10 प्रतिशत आरक्षण की कमी भी नहीं रही है। बल्कि उनकी मूल माँग जो है, वह जातिगत आधार पर पचास प्रतिशत आरक्षण जो लागू है उसे जातिगत आधार के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने की मांग रही है। क्योकि जातिगत आधार पर आरक्षण देने से समाज में समरस्ता के बदले विघटन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। यदि आर्थिक आधार पर सम्पूर्ण समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया जाता है (जो कि आरक्षण का मूल आधार ही होना चाहिये) तो निश्चित रूप से न केवल आरक्षण देने की उद्देश्य की पूर्ति होगी, बल्कि विभिन्न समाज के बीच वर्ग-भेद-जाति के आधार पर भेद असमानता भी नहीे होगी, बल्कि समरस्ता की खिचड़ी भी बनेगी। वह यह समरस्ता की खिचड़ी नहीं है जो भाजपा ने कल दिल्ली में बनाई थी, क्योकि वह तो वर्ग विशेष की खिचड़ी थी जो समरस्ता की कैसे हो गई, यह समझ के परे है। गरीबी व अमीरी के आधार पर जो समाज में भेद व खाई है वह अंतर भी आर्थिक आधार से कम होगा। केन्द्र सरकार भी भली भाँति जानती है कि उसका यह निर्णय संविधान व उच्चतम न्यायालय के प्रतिपादित सिंद्धान्त के विरूद्ध व प्रतिकूल है, जो वह लागू नहीं करवा सकती हैं। जब तक कि इस संबंध में संविधान में आवश्यक संसोधन नहीं किया जाता हैं। फिलहाल सरकार चुनावी मोड़ में आ जाने के कारण जनता को खुश (अपीज) करने का शार्ट (छोटा) रास्ता है जो कितना प्रभावी होगा, वक्त ही बतायेगा। यदि वास्तव में सरकार और समस्त दल सरकार के इस निर्णय से सहमत है, तो फिर सरकार एक अध्यादेश लाकर लागू इसे तुरंत क्यों नहीं लागू करके अपने इरादे को नेक बताने का प्रयास नहीं करती है? वास्तव में यदि यह चुनावी लालीपाप नहीं है, तो सरकार ने निर्णय लेने के पूर्व पहले संविधान में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं किया? तत्पश्चात ही संविधान संशोधन के अनुसार निर्णय लिया जाना समयोचित होता। तब उन पर चुनावी संकट का आरोप नहीं लगता।

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