रविवार, 31 मार्च 2019

बिगड़े नेताओं के ‘‘बिगडे़ बोल’’-‘‘विवादित बोल’’! फायदा-नुकसान कितना!

भारतीय राजनीति में हमेशा से ही ‘‘बयानवीर’’ मीडिया में सुर्खिया पाते रहे है। विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के कुछ नेतागण अपने बेवाक बयानों के माध्यम से सुर्खियाँ बटोरनें के उदे्श्य से ऐसे बयान देते रहते है, जिसके परिणाम स्वरूप उनकी छाप एक चर्चित चेहरे की होकर वे माने जाने बयानवीर लगते है। ऐसे बयानों को मीडिया विवादित बयानों की संज्ञा देकर महिमा-मड़ित करना अपना संवैधानिक, वैधानिक व नैतिक कर्तव्य बोध महसूस करते है। चुनावी मौसम में ही इस तरह के ‘‘विवादित’’ बयानों की बाढ़ सी आ जाती है।   
सर्वप्रथम मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि नेताओं के ऐसे चर्चित बयानों को मीडिया विवादित बयान क्यों कहता है। बयान या तो सत्य होता है या असत्य। या आज की हमारीे राजनैतिक परिवेश को देखते हुये इन दोनों के बीच  इसकी एक और श्रेणी हो सकती है, अर्धसत्य! ठीक उसी प्रकार जैसे लाल व हरे सिंग्लन के बीच पीला सिंग्नल। अधिकांश स्थितियों मंे बयानवीर बयानों का खंडन नहीं करते है। अत्यालोचना व फजीहत होने पर ही अपनी सुरक्षा में स्पष्टीकरण अधिकतम-‘‘मेरे कहने का यह मतलब नहीं था’’ या ‘‘मेरे कथन का गलत अर्थ निकाला गया है, कथन कर देते है। इन बयानों को सत्य, सत्य से दूर, सत्य से परे, झूठे, तथ्यहीन, तथ्यों के बिलकुल विपरीत, अश्लील, अमर्यादित, तीच्छण, चुभने वाले, अंधविश्वासी, अंधभक्त इत्यादि-इत्यादि से श्रंगारित किया जा सकता है। वे सब श्रंग्रार, संज्ञाएँ या उपमाएँ बयान की प्रकृति को देखते हुये दी जा सकती है। लेकिन ये बयान ‘विवादित’ कैसे प्रश्न यह है? 
विवादित शब्द का शाब्दिक अर्थ तथ्य के सत्य या झूठ होने पर प्रश्न वाचक चिन्ह लगाना या उँगली उठाना या संदेह करना है। लेकिन आप जानते है, इस समय जितने भी चर्चित विवादित बयानों की आंधी आई हुई है, परस्पर विरोधी पक्ष के लोग उक्त बयानों के तथ्यों को विवादित न मानकर उसे। सही ठहराते है, जैसा कि बयानवीर भी उसे सही मानते है। प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षी, बयानवीर व्यक्ति व उस की राजनैतिक पार्टी पर पलटवार कर जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का प्रयास लगातार करते रहते है, जो मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज बनती है।ं मतलब स्पष्ट है! राजनैतिक दलांे के नेतागण परस्पर एक दूसरो के विवादित बयानांे को स्वयं विवादित न मानकर उससे राजनीति में कितना फायदा मिल सकता है, उसे उठाने का प्रयास प्रत्यारोपित बयानांे की झड़ी लगाकर की जाती है। 
बयान से संबंधित एक ओर बात जो मेरे समझ से परे है कि बयानवीरांे के विवादित बयान की प्रतिक्रिया में जब उनकी विरोधी पार्टियो द्वारा बयानवीरों पर हमला किया जाता है तब उनका मुख्य तर्क हमेशा यही होता है की वोट बैंक की राजनीति के चलते इस तरह के उक्त बयान आये हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि है जब प्रतिक्रिया में आप उन बयानों के बाबत स्वयं ही कहते है कि वे देेश हित में नहीं है, देश के विरूद्ध है, समाज के हित में नहीं, देश को तोड़ने वाले है, सांप्रदायिकता एकता को नुकसान पहंुचाने वाले है, शांति भंग करने वाले है, धार्मिक उन्माद पैदा करने वाले है। तब उक्त विवादित बयानवीरों की पार्टियों को राजनैतिक फायदा कैसे मिल सकता है, जैसा प्रत्यारोप सामान्यतया लगाया जाता है, प्रश्न यह है? यदि वास्तव में ऐसा होता है, तो इसका यही मतलब  निकता है, बयान देने वालों से खतरनाक वे वोटर है, जो इन बयानों के आधार पर बयानवीरों को वोट देते है जैसा की विपक्षी आरोप लगा रहे हैं।   
एक उदाहरण के द्वारा मैं अपनी बात को समाप्त करना चाहूगाँ। इडिया ओवर सीज कांग्रेस प्रमुख सैम पित्रोदा जो काग्रेस के गांधी परिवार के पारिवारिक सदस्य समान है, ने अपने हाल के ही बयान में न केवल एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाएँ बल्कि मुम्बई बम कांड के हमले में पाकिस्तान को एक देश के रूप में दोष मुक्त तक बता दिया। ऐसे आत्मघाती बयान पर अमित शाह के द्वारा प्रेस वार्ता बुलाकर यह कथन करना कि कांग्रेस हर बार चुनाव आते ही वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति करती है कितनी तथ्यात्मक रूप से सही है, बड़ा प्रश्न यह है? उनका यह कहना तो बिलकुल समायोचित है कि सेना के शहीदो का अपमान हुआ है व आंतकियों का मनोबल बड़ा है। कांग्रेस शहीदांे के खून पर राजनीति करती है, क्या वोट बैंक की राजनीति शहीदों के उपर हो सकती है। पित्रोदा को इस बयान पर देश से माँफी मागना चाहिए। मतलब साफ है। पित्रोदा व कांग्रेस के बयान किसी भी आम सोच वाले नागरिक के गले नहीं उतर सकते है। बयानों के द्वारा राजनीतिकरण के चक्कर में जाने अनजाने में वे देश व सेना पर ही प्रश्न वाचक चिन्ह लगा देते है। इससे कांग्रेस का निश्चित रूप से नुकसान ही होगा। जब बयान से फायदा नहीं होता है तो तब फिर यह प्रत्यारोप कैसे लगाया जा सकता है कि ये विवादित बयान वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति के तहत है। देश में पूर्व में भी जितने विवादित बयान आये, उनमें से अधिकांश बयान आत्मधाती ही सिद्ध हुये हैं। उससे बयानकर्ता या उसकी पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला। यदि यह मान भी लिया जाये कि उक्त बयान से गैर समझदार व अंधभक्त लोग कांग्रेस केा वोट दे दंेगे, तो इसके विपरीत उससे ज्यादा समझदार व कई संभ्रात कांग्रेसी भी (उक्त बयान से अपने को अलग कर) कांग्रेस से दूर अवश्य भागेगें।
इन विवादित बयानों की एक ओर बड़ी विशिष्टता व खासियत यह भी है कि जब ये वास्तव में विवाद का रूप लेकर हानि पहँुचाने की स्थिति में आ जाते है, तब समस्त राजनैतिक पार्टियाँं खासकर (भाजपा व कांग्रेस) ऐसे बयानों से अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेती है कि वे बयान बयानवीर के व्यक्तिगत विचार है, पार्टी का उससे कोई लेना देना नहीं है (भले ही बयान कर्ता पार्टी की नीति निर्धारण कार्यसमिति के सदस्य क्यों न रहे हों)। पार्टी सामान्यतः ऐसे बयानवीरों के खिलाफ न तो कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही करती है और न ही भविष्य में ऐसा कदम न उठाने हेतु उसे कोई चेतावनी देती है। उन्हे बयान वापिस लेने या खेद व्यक्त करने के लिए भी नहीं कहती है। पार्टियों का यह स्टैंण्ड़ पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने/दिखाने के लिये किया जाता है, भले ही इससे देश के लोकतंत्र का स्तर गिर रहा है क्षरण हो रहा है। यही तो हमारे देश की लोकतंत्र की खूबी है?
कुछ चुनिंदा बयान व उनके प्रभाव व असर को मैं अवश्य यहाँ रेखांकित करना चाहूँगा। गुजरात चुनाव 2007 में सोनिया गांधी ने कहा था ‘मौत का सौदागर’। लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 में सत्ता के लिए ‘जहर की खेती’ करती है, भाजपा-सोनिया गांधी। यकीन मानिए 'चायवाला' पीएम नहीं बनेगा-मणिशंकर अय्यर। गुजरात चुनाव 2017 'नीच किस्म' का आदमी-मणिशंक्कर अय्यर। 'खून की दलाली'-राहुल गांधी। सेनाप्रमुख को ‘सड़क का गुड़ा’ कहना-संदीप दीक्षित। म.प्र. चुनाव 2018 'माई का लाल'-शिवराज सिंह चौहान। 'हनुमान दलित थे'-योगी आदित्यनाथ, राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2018।  2019 पुलवामा हमले पर 'वोट के लिए जवान मार दिये' गये-राम गोपाल यादव, पुलवामा हमला 'मैंच फिक्सिंग'-बी.के. हरिप्रसाद इत्यादि-इत्यादि। 

बुधवार, 27 मार्च 2019

‘‘पर्रिकर’’ ‘‘वाद’’ को ढूँढता मेरा देश। ‘व’’ ‘‘गांधीवाद’’ से चलकर ‘‘पर्रिकरवाद’’ तक पहुंचने का सुखद अहसास!

देश के प्रथम आई.आईटी शिक्षा प्राप्त (गोवा के) मुख्यमंत्री एवं पूर्व रक्षामंत्री डॉ. मनोहर गोपाल कृष्ण प्रभु पर्रिकर लम्बी बीमारी से अदम्य आत्मबल के साथ लड़ते हुये अब इस दुनिया में नहीं रहे और ‘‘स्वर्गवासी’’ हो गये। याद कीजिये! विधानसभा में बजट प्रस्तुत करते समय उनका वह चेहरा, जो चिकित्सकीय उपकरणों से ढ़का हुआ था। एक उदघाटन समारोह में उनका जनता से पूछते हुये ऊरी फिल्म का डायलॉग ‘‘हाउ इज द जोश’’ उनके कड़े परिश्रम करने की जीवटता को दर्शा रहा था। जीवन के अंतिम क्षणों में जब व्यक्ति को स्वतः मृत्यु का आभास होने लगता है, तब आज के युग में ऐसे बिरले अदम्य साहसी कम ही दृष्टिगोचर होते हैं। 
‘परि’ ग्राम के रहने के कारण उनका उपनाम ‘‘पर्रिकर’’ पड़ा। वे लगभग एक साल से जीवन को अंत करने वाली एडवांस्ट स्टेज की पैंक्रियाटिक कैंसर की लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होकर जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे, जिसका यह परिणाम होना ही था। लेकिन आज मृत्यु से कहीं अधिक सर्वत्र उनकी चर्चा न केवल स्वयं की ईमानदारी की, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुंलद करने की हिम्मत दिखाने वाला, नैतिकता, निष्ठा, बौद्धिक कौशल और एक वास्तविक गांधीवादी साधारण आम आदमी के रूप में उनकी पहचान को लेकर हो रही है। 
बात जब हम गांधीवाद की करते है, तो निश्चित रूप से सर्वमान्य स्वीकृत तथ्य अंहिसा के संदेश के साथ-साथ सदाचार और एक बेहद सामान्य साधारण जीवन दृष्टि ही गांधीवाद के  अंर्तनिहित मुख्य तत्व हैं। इसके उलट 21वीं सदी के इस भौतिक युग में पर्रिकर जी ने गांधीवाद को एकदम नया आयाम दिया, जिसे मैने ‘‘पर्रिकरवाद’’ इसलिये कहा, क्योंकि तत्समय की परिस्थिति में यद्यपि गांधीवाद को सम्मान देने वाले हजारों लोग थे, परन्तु मेरी सोच का एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण गांधीवाद का तुलनात्मक रूप से ज्यादा उदारवादी होना था। यदि दोनांे वादों के आम व्यक्ति की तुलना की जाएं, तो पाएँगें गांधी जी के आम व्यक्ति का चेहरा ‘‘काव्यात्मक’’ भाव लिये हुये था, जबकि स्वयं पर्रिकर जी का आम चेहरा एक सफाचट निर्विकार भाव के ग्रामीण परिवेश के साधारण इंसान का रहा। यद्यपि पर्रिकर जी शहरवासी हो गये थे, उसके बावजूद ग्रामीण परिवेश की निश्छलता उन्हांेने छोड़ी नहीं थी। उनकी सादगी की तुलना हम पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री इन्द्रजीत गुप्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं या 70 के दशक के आरएसएस प्रचारकों से कर सकते है। 
वर्तमान राजनीति में सत्ता को वैश्या की उपमा (संज्ञा) दी जाती है। इसीलिये सत्ता का भोग करने वाला कोई भी व्यक्ति सत्ता के चारित्रिक दोष व दुःप्रभाव के कारण अपने जीवन के अन्य चरित्रों को अच्छुण्ण नहीं रख पाता है। परन्तु ऐसी स्थिति में भी मनोहर पर्रिकर ने अपने निश्छल चरित्र व आत्मबल के बल पर सम्पूर्ण पूर्ण निष्ठा के साथ राजनैतिक जीवन को जिस प्रकार की पूर्णतः गांधीवादी सामान्य सरलता के बीच जिया, तथा आज की आवश्यक राजनैतिक पहचान की परछाई नहीं पड़ने दी वह सब प्रशंसनीय है। उनके व्यक्तित्व की एक ओर विशेषता विरोधियों को अपना बनाकर साथ में लेकर चलने की क्षमता भी रही है। ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ का ईसाईयों से विरोध का एक आम भाव परसेपशन जगजाहिर है। पर्रिकर के संघ का एक स्वयंसेवक होने के बावजूद उन्होंने बड़ी ईसाई जनसंख्या (केथोलिक) का विश्वास जीत कर चार बार गोवा के मुख्यमंत्री बने, जो उनकी कुशल रणनीति, विरोधियों को भाँपने के साथ-साथ उनकी हृदय की विशालता की गहराई को भी दर्शाता है। वे जाति व धर्म से ऊपर उठकर सोशल इंजीनियरिग के सूत्रधार रहे। ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ नारा भले ही अभी मोदी ने दिया हो, लेकिन इसके असली पुरोधा पर्रिकर ही थे। इसीलिए भौतिक रूप से जीवन समाप्त हो जाने के बाद भी, वे देश की तेजी से प्रदूिषत हो रही राजनीति को शुद्ध करने के कार्यशील साधन के रूप में हमेशा याद किये जायेगें।
गांधीवादी युग में गांधीवाद को अपनाना ज्यादा सहज व सरल था। उसकी तुलना में वर्तमान कलियुग में पर्रिकरवाद के आदर्शो को अपनाना अत्यधिक कठिन जीवन यात्रा है। इसीलिए मैंने गांधीवाद से आगे बढ़कर उसे पर्रिकरवाद कहा है। इसे अतिश्योक्ति न मानंे। मुझे वह क्षण ख्याल आ रहा है, जब नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था, तभी पर्रिकर जी का नाम भी अध्यक्ष पद के लिये उभरा था। लेकिन क्षेत्रफल की दृष्टि से गोवा के देश के सबसे छोटे प्रदेश होने के कारण तथा शायद गडकरी के संघ प्रमुख मोहन भागवत से धनिष्ठ व्यक्तिगत रिश्ते होने के कारण पर्रिकर जी अध्यक्ष नहीं बन पाये। अन्यथा आज भाजपा की संस्कृति व कार्य प्रकृति कुछ और ही होती।
गांधी राष्ट्र के राष्ट्रपिता थे, जबकि पर्रिकर राष्ट्र के सबसे छोटे राज्य गोवा के मुख्यमंत्री थे। तत्समय (गांधी युग) सत्ताधीशों में जन सेवा का भाव ज्यादा हुआ करता था। जबकि आज के राजनैतिज्ञों का ‘‘सेवा’’ व ‘सेवाभाव’ से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है बल्कि आज राजनीति येन केन प्रकारेण सत्ता सुख पाने मात्र का हथियार भर बन कर रह गई है। इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में पर्रिकरवाद का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। 
देश के जिन नेताओं, पार्टियों व सार्वजनिक जीवन में महत्व रखने वाले गणमान्य नागरिकों ने पर्रिकर जी को श्रंृद्धाजंली दी है, यदि वे सब पर्रिकरवाद को 50 प्रतिशत भी अपना सके तो, देश की अधिकांश समस्याओं का समाधान यूँ ही संभव है, क्यांेकि ईमानदारी व नैतिकता का लगातार ह्रास ही हमारे देश की प्रमुख समस्याओं की मूल जड़ है। पर्रिकर जी के प्रति उन सबकी यही सच्ची श्रंृंद्धाजंली होगी। इसीलिए मेरा अनुरोध है, श्रृंद्धाजंली देते समय वे सब लोग इस तथ्य पर अवश्य विचार करें कि वे उस योग्य है अथवा नहीं, और यदि नहीं, तो आज से ही पर्रिकरवाद को अपनाने के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर अपेक्षित चरित्र अपनाना प्रारंभ करंे, ताकि हमारा देश तीव्रतम गति से वास्तविक रामराज्य की ओर अग्रेसित हो सकंे। यानी मैं पर्रिकर जी को शब्दों से नहीं कर्तव्यों से श्रृंदाजंलि देना चाहूगाँ। मैंने स्वतः अब तक उनकी सार्वजनिक राजनैतिक ईमानदारी को अपने जीवन में लागू किया है आज से ही आगे एक साधारण सामान्य सादगी पूर्ण जीवन-चर्या में अपने जीवन को ढ़ालने का प्रयास करूगाँ। 
पुनश्चः आज जब जगह-जगह ‘‘मैं भी चौकीदार हूँ’’ व ‘‘चौकीदार चोर है’’ की मुहिम चलाई जा रही है, तब आज के समय की वास्तविक आवश्यकता हैं ‘‘मैं हूँ पर्रिकर अनुयायी’’। देश के स्वस्थ स्वास्थ्य के लिये ज्यादा से ज्यादा इस मुहिम को चलाया जाना अति आवश्यक हैं। 

बुधवार, 13 मार्च 2019

आखिर देश को क्या हो गया है।

‘‘पुलवामा’’ में हुई बड़ी वीभत्स आंतकी घटना में 40 सैनिकों के शहीद हो जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में घुस कर बालाकोट में किये गये हवाई हमलों के द्वारा ‘‘जैश-ए-मोहम्मद’’के आंतकवादी कैम्प (प्रशिक्षण शिविर) को नष्ट करने के बाद सम्पूर्ण देश ने एक जुट होकर सेना व सरकार को बधाई दी थी। कांग्रेस सहित समस्त राजनैतिक पार्टियों ने सेना के पराक्रम व अदम्य साहस की प्रशंसा कर बधाईयाँ दी थी। एक स्वर से यह कहा गया कि हर हाल में पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के लिये वे सेना, सरकार व देश के साथ खडे़ हुये हैं। कांग्रेस ने बधाई देने में यद्यपि थोड़ी सी कंजूसी अवश्य बरती। उन्होंने सेना को तो खुलकर बधाई दी, नमन किया, लेकिन सरकार के प्रति उतनी उदारता नहीं बरती (शायद चुनाव सिर पर है इसलिये)। यद्यपि संकट की इस घड़ी में कांग्रेस ने सरकार के साथ खड़ा होनें का वायदा अवश्य किया (जो बाद में मात्र ‘नाटक’ ही सिद्ध हुआ)। लेकिन कांग्रेस ने वैसी ही उदारता नहीं दिखाई, जैसी वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के परिणाम स्वरूप बंग्लादेश बनने के समय अटल जी ने इंदिरा जी के प्रति दिखाई थी। तब भी सेना लड़ी थी और आज भी सेना ही ने बहादूरी दिखाई। यद्यपि दोनो वक्त आक्रमण (सेना भेजने) का निर्णय राजनैतिक नेतृत्व ने ही लिया था। इसलिये आज भी राजनैतिक नेतृत्व को वर्ष 1971 के समान बधाई दी जानी चाहिए थी। लेकिन सरकार के नेतृत्व को बधाई देने में कांग्रेस से यह एक चुक छोटी सी हुई। तथापि वह राजनैतिक दृष्टि से उठाया गया कदम कहा जाकर, उसे क्षम्य माना जा सकता है। तत्पश्चात कांग्रेस लगातार बड़ी-बड़ी चूक करती जा रही है, जबसे कांग्रेस के नेताओं में बालाकोट हवाई हमले की साक्ष्य मांगने की होड़ सी मची हुई है। धीरे-धीरे समस्त प्रमुख विपक्षी दल भी इसमें सुर से सुर मिलाते जा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद ने पुलवामा व बालाकोट घटना को नरेन्द्र मोदी व इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग ही करार दे दिया। 
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि घटना के तत्काल बाद कांग्रेस ने किस बात के लिये सेना की प्रशंसा की थी व बधाई दी थी। साफ झलकता है, तत्समय आपने बालाकोट  हवाई हमले में एयर फोर्स के साहसी विंग कमांडर अभिनंदन के द्वारा मिग 21 से पाकिस्तान के एफ 16 को मार गिराये जाने के साथ-साथ बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आंतकी बेस को समाप्त करने पर सेना के अदम्य साहस को सराहा था। यदि ऐसा नहीं था, तो उसे नकारे अथवा बधाई का कारण  देश को बताएँ। दो दिन बाद ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष ने रूख ही बदल दिया और वे उक्त हवाई हमले तथा उसमें हुए संहारण के न केवल साक्ष्य मांगने लगे, बल्कि घटना पर ही शक की उंगली उठाने लगे है। वे अपने बयानों से भारत में न केवल बयानवीर बने अपितु पाकिस्तानी मीडिया के जाने अनजाने हीरो बन गए। क्या यही देशभक्ति है? इसका उल्लेख मैनें पिछले हफ्ते लिखे अपने लेख में किया था, जिसकी कमी आज भी हम महसूस कर रहे हैं। 
अब सत्ताधारी व विपक्ष दोनांे पक्ष ‘‘सेना पर राजनीति करने के आरोप-प्रत्यारोप’’ परस्पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक राजनीति करने की बात है, बेशक दोनों ही पक्ष पूरी क्षमता, ताकत व निर्लजता के साथ राजनीति कर रहे हैं। घटना का राजनीतिकरण करने में सबसे पहला कदम भाजपा की तरफ से ही उठाया गया हैं। जब कर्नाटक के पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने साफ शब्दो में कहा कि हवाई हमले से पार्टी को 25 में से 22 सीटों पर फायदा होगा। तत्पश्चात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 250 से अधिक आतंकवादी मारे गये, (तब तक सेना व सरकार ने ऐसा कोई खुलासा नहीं किया था)। मोदी जी रैलियों में स्वयं कह रहे हैं कि पाताल से आंतकवादियों को खोद निकालेगें। लेकिन कब और कितने शहीद हो जाने के बाद? पता नहीं? न बताऐगें? क्योंकि राजनैतिक पार्टियों के सदस्य तो शहीदों में बिरले ही मिलेगें। अब मोदी जी भारत के बजाय ‘‘विजयी भारत’’ की जय के नारे लगवा रहे हैं। अभी कौन सी विजय मिल गई, जिस कारण विजयी भारत के नारे? यदि बालाकोट विजय है, तो उसके तत्काल बाद से लगातार हो रही सीमापार उल्लघंन एवं आंतकी घटनाएं व उनमें हुये शहीदांे व नागरिकों की मृत्यु को क्या कहना चाहेगें? यही सब घटना का विशुद्ध राजनीतिकरण है।    
सेना के तीनो अंगों के द्वारा संयुक्त प्रेसवार्ता करके एयर स्ट्राइक कार्यवाही की विस्तृत आवश्यक जानकारी दे दी गई। तत्पश्चात एयर चीफ मार्शल ने भी एयर स्ट्राइक की जानकारी दे दी। तब साक्ष्य मांगते रहने का क्या औचित्य रह जाता है, विशेषकर उस स्थिति में, जब कांग्रेस सेना के र्शोर्य-पराक्रम को लगातार स्वीकार करती आ रही है। ये ही तो राजनीति है। साफ है, बयानों के द्वारा सेना पर विश्वास परन्तु कार्यरूप में अविश्वास जता रहे हैं। यदि एयर स्ट्राईक की कार्यवाही की जानकारी पत्रकार वार्ता करके सरकार देती तो, आप शायद उसे स्वीकार ही नहीं करते। प्रश्नवाचक चिन्ह सहित प्रश्नों की बाैंछार लगा देते। यानी यहाँ पर तो सेना पर विश्वास जताने के बावजूद सेना (जिसने पत्रकार वार्ता में समस्त जानकारी आवश्यक साक्ष्य सहित प्रस्तुत की थी) के कथनों को ही नहीं माना जा रहा है।
फिर भी सेना पर राजनीति करने के तरीको में भाजपा व विपक्षी पार्टियों में जमीन-आसमान का अंतर हैं। सेना पर भाजपा ने आसमानी राजनीति अर्थात् ऊंचाई की राजनीति की हैं। क्योंकि  सेना का चुनावी दृष्टि से फायदा लेने के लिये ‘‘मुद्दे’’ का राजनीतिकरण करने के बावजूद, देश, देश हित और राष्ट्रवाद के साथ वह मजबूती से जनता के सामने खड़ी हुई दिख रही है। दूसरी ओर साक्ष्य मांगने हेतु जिस तरह की अमर्यादित भाषा कांग्रेस प्रयोग कर रही है, वह उनके देशभक्त भारतीय नागरिक होने पर ही संदेह पैदा करके स्वयं ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं। क्योंकि उनके बयानों से विश्व में भारत का पक्ष कमजोर होते जाता है, तथा पाकिस्तान उन बयानों को अपने मीडिया में सुखर््िाया बनाकर हमारी सेना व सरकार के दावे की विश्व पटल में हवा निकाल रहा है। जिस प्रकार रक्षा राज्यमंत्री वी.के.सिंह ने बी.एस.येदियुरप्पा के बयान से असहमति दिखाई है। ठीक वैसे ही कांग्रेस पार्टी के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के बयान से अवश्य सीख लेनी चाहिये, जहां उन्होंने कहा,‘‘एक मरे या 100 मरें यह साफ संदेश जोरदार तरीके से गया है कि भारत निर्दोष जवानों और नागरिकों की शहादत बेकार नहीं जाने देगा।’’ 
बी.एस.येदियुरप्पा से 22 सीटों के जीतने के बयान पर अवश्य प्रश्न किया जाना चाहिये। अमित शाह से इस बात पर प्रश्न किया जा सकता है कि सेना व सरकार द्वारा कोई आकड़ा नहीं देने के बावजूद, 250 संख्या की जानकारी उन्हें कहां से मिल गई। चुनावी रैलियों में शहीदों की फोटांे के उपयोग पर भी प्रश्न किया जा सकता है। खुफिया एजेंसी की विफलता पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है। ‘‘उरी’’ के बाद ‘‘पुलवामा’’ क्यों व आगे क्या? इस विफलता पर भी प्रश्न उठाये जाने चाहिये। देशप्रेम व निष्ठा पर आंच आने दिए बिना कांग्रेस, भाजपा को इन सब प्रश्नों के साथ कटघरे में खड़ा करके बेहतर सफल राजनीति कर सकती थी। परन्तु उक्त आंतकी घटना को ‘‘दुर्घटना’’ कहना, हवाई हमलों को ‘‘जंगल में ब्लास्ट कर’’, पेड़ व पहाडों से बदला’’ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के हवाले से घटना के ‘‘वजूद’’ पर ही शक जाहिर करना, यह सब निश्चित रूप से देश हितेषी व परिपक्व राजनीति का घोतक नहीं है। क्योंकि इसमें नीति ही नहीं है। सिर्फ और सिर्फ दिमागी फितूर राजनैतिक दिवालिया पन व खोखले पन की निशानी भर ही हैं। ऐसे व्यवहार का बड़ा खामियाजा आने वाले लोकसभा चुनाव में निश्चित ही कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा व पड़ना भी चाहिये।
क्या हमारे देश में देश की सुरक्षा, मान-सम्मान और देश हित से जुड़े हुये मुद्दे को अच्छुण्ण रखते हुये देश को बल प्रदान करने हेतु समस्त राजनैतिक दल देश के लिए खडे़ नहीं हो सकते हैं? जैसे ऐसी ही विकट विपरीत परिस्थितियों में अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में खड़े हो जाते हैं। बालाकोट हवाई हमले की घटना के विषय में सेना पर विश्वास करने के बाद, सबूत के नाम पर सरकार को कटघरे में दर्शाने के उद्देश्य से सेना पर ही अपरोक्ष रूप से अविश्वास जताने का आभास परिलक्षित कराने से कांग्रेस को कौन सा राजनैतिक फायदा होने वाला है, प्रश्न यह हैं? लेकिन ऐसे अवांछित व्यवहार से विश्व में हमारी किरकिरी अवश्य हो रही है। ऐसा महसूस होता है कि कांग्रेस का बौद्धिक स्तर निम्नतर से निम्नतम पर पहुंचता जा रहा हैं। हम किसी भी घटना का राजनीतिकरण राजनैतिक दृष्टि से फायदा लेने की दृष्टि से ही करते है। तब यह बात बिल्कुल समझ से परे है कि उक्त बयानों से प्रभावित होकर कौन सा वर्ग, समाज, नागरिकगण जो निरपेक्ष मतदाता है, कांग्रेस को वोट देने की सोच की ओर पलटेगा। 
इसीलिये शीर्षक में मैने ‘‘देश में क्या हो रहा है’’ के बदले ‘‘देश को क्या हो गया हैं’, लिखना ज्यादा सामयिक समझा क्योकि दोनों मेें महत्वपूर्ण अंतर है जिसको समझना आवश्यक है जिसके लिये फिर कभी।  

सोमवार, 4 मार्च 2019

देशप्रेम-राष्ट्रभक्ति-राष्ट्रवाद को ढूढ़ता मेरा प्यारा देश!

इस लेख का ‘‘शीर्षक’’ देख कर बहुत से लोगों को हैरानी अवश्य होगी और आश्चर्य होना भी चाहिये। पर बहुत से लोग इस पर आखें भी तरेर सकते है। यदि वास्तव में ऐसा हो सका तो, मेरे लेख लिखने का उद्देश्य भी सफल हो जायेगा। 
एक नागरिक, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा एक भारतीय पैदाईशी ही स्वभावगतः देशप्रेमी होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार उसे जन्मते ही प्राप्त हो जाते है, और संवैधानिक कर्त्तव्य का बोध भी उसे हो जाता है। ऐसी सामान्य कानूनी मान्यता है। परन्तु जब हम इन गुणों की जमीनी वास्तविकता को धरातल पर परखतेे है और उनकी वास्तविक स्थिति को मापने का प्रयास करते है, तो न केवल हम अधिकतर जगह पर विफल होते हैं, वरण उसमे मैं अपने आप को भी असफल पाता हूँ। इसके लिए मैं स्वयं को दूसरो की तुलना में कुछ ज्यादा ही दोषी मानता हँू। एक देश भक्त नागारिक के कर्त्तव्यों का पूर्णतः पालन करने में मैं स्वयं भी असफल रहा हूँं। वास्तव में यह हमारा एक आम परिवेश है, जिसका मैं भी एक भाग भर हूँ। 
‘‘पुलवामा’’ आतंकी घटना के बाद से पूरे राष्ट्र में, समस्त प्रिंट, इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न संगठनों, राजनैतिक पार्टियों एवं स्वयंसिद्ध-वीर नागरिकों के एक से बढ़कर एक बयानों की बयार सी आ गई है। पाकिस्तान से आक्रमक आक्रमण (युद्ध) कर मटिया-मेट, नष्ट-नाबूद करने से लेकर समाप्त कर देने तक के ओजस्वी बयान देकर स्वयं को सबसे बड़ा देश प्रेमी सिद्ध कर स्वयंभू देशभक्त होने का प्रमाण पत्र ले रहे हैं। यदि आप उन बयानों में ‘शब्दो’ का चयन देखें व उन शब्दों को थोड़ा भी ध्यानपूर्वक पढं़े, तो आपको उनमें मात्र खोखला पन सतही पन, व विरोधाभाष ही महसूस होगा। मात्र वे वीर रस की अभिव्यक्ति भर नजर आवेंगे। 
कुछ जुमले आगे उद्वरित हैं जैसे ‘‘पाकिस्तान झुक गया है’’, ‘‘अंतिम सासें गिन रहा है’’, ‘‘धबराया हुआ है, ‘‘घुटने टेक दिये है‘‘, ‘‘झुक गया है’’, ‘‘ड़र के मारे रात भर सोया नहीं है’’ ‘‘पाकिस्तान को समझ में आई उसकी औकात’’, ‘उसका पानी बंद कर दिया है’’, ‘‘भूखा मरेगा’’, ‘‘भीख मांगना पाकिस्तान की फितरत है’’, ‘‘शांति की भीख लिए गिडगिडा रहा है’’, ‘‘बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए’’, ‘‘हर मोर्चो पर पीटा है-ठोका है’’ इत्यादि-इत्यादि। हमारे देश के शांति प्रिय नागरिक भी वीर जवानों से भी ज्यादा, युद्ध करने की अनचाही, अनमांगी, साहसिक सलाह सरकार को दे रहे है। एक उदाहरण ‘‘इमरान खान बार-बार भारत से बातचीत का अनुरोध कर रहा है व शांति की भीख के लिये गिड़गिड़ा रहा है’’, ऐसा अधिकांश मीडिया उल्लेख कर रहे हैं। साथ ही साथ बार-बार वे यह भी दिखा रहे हैं कि ‘‘पाकिस्तान माननें को तैयार नहीं’’,‘‘पाकिस्तान नहीं सुधरा’’, ‘‘पाकिस्तान ने फिर सीमा का उल्लंघन किया है’’ एलओसी स्थित बालाकोट पर हवाई हमले के बाद गांवों में दहशत हैं। एक हमले के अंदर 60 से भी ज्यादा बार सीमा का उल्ल्घंन किया गया है जिसमें 15 से अधिक सैनिक व सिविलियन शहीद हुये हैं। समस्त मीडिया द्वारा दिये गये इतने सब शीर्षकों/अंलकारों से महिमा मंडित करने के बावजूद पाकिस्तान, सीमा का उल्ल्घंन करने का साहस/दूःसाहस लगातार कर रहा है तो, इस तरह की वाणी/कथनांे का तीर चलाकर क्या मीडिया हाऊसेस भी पाकिस्तान की सीमा पार उल्लघंन की कार्यवाहियों को अनजाने में ही सम्मान व ऊंचाई प्रदान नहीं कर रहे है? क्योंकि इन विरोधाभाषी कथनों का यही अर्थ निकलता है कि एक कमजोर घबराया हुआ व घुटने टेकने वाला मजबूर पाकिस्तान बावजूद लगातार आंतकी कार्यवाही कर हमारे सैनिकों व सिविलियनों को मार रहा है, जबकि एक मजबूत भारत बालाकोट पर हवाई हमले करने के बावजूद आंतकी घटनाओं को रोकने में आवश्यक कार्यवाही करने में असफल हो रहा है। शब्दों का खोखला पन भर ये ही है। भीख शब्द के उपयोग करने की यहाँ क्या आवश्यकता एवं औचित्य है?   
आखिर; क्या देश भक्ति, सिर्फ हमारे भाषण, लेखन, कथन, बयान और टीवी डिबेट तक ही सीमित होकर रह जावेगी, प्रश्न यह है? इसका कदापि यह मतलब भी नहीं है कि देश भक्ति सिद्ध करने के लिए हर नागरिक को सीमा पर जाकर बंदूक चलानी पढे़गी, बम फेकना पडे़गा। ‘‘देश भक्ति’’ का यथार्थ मतलब है, वर्तमान युद्ध की आशंका लिये हुई उत्पन्न स्थिति में, प्रत्येक नागरिक जो जहां कहीं जिस भी क्षेत्र में कार्यरत है, वह अपनी सम्पूर्ण ताकत, क्षमता, बुद्धि व भावनाओं के साथ देश हित के लिए वह वे सभी कार्य करे, जो उसका वैधानिक, संवैधानिक, मानवीय व नैतिक, कर्त्तव्य एवं दायित्व है। साथ ही सीमा पर लड़ने वाले हमारे जांबाज वीर सैनिकों के लिए वह कुछ ऐसा कर गुजरें, जिससे बहादुर वीर सैनिकों को यह महसूस हो कि भले ही वे सीमा पर तैनात है, लेकिन वे अकेले नहीं है। सम्पूर्ण समाज, स्थानीय लोगों सहित पूरा देश एकजुट होकर उनके साथ उनकेे परिवार को सहारा देने के लिए खडे़ है। यही वास्तविक देश भक्ति हैं। देश भक्ति को हम स्वयं अपने बैरो मीटर में नापें। इसे हम जितना सोचते जायेगंे, देश भक्ति की तीव्रता की भावना उतनी ही प्रबल होती जायेगीं। 
यहाँ एक उदाहरण देना चाहता हँू। हमारे देश में आज भी कई जगह ‘‘भारत मुर्दाबाद’’ व ’‘पाकिस्तान जिंदाबाद’’ के नारे लगाए जाते हैं। एक देश भक्त राष्ट्र में यह कैसे संभव हैं? कहीं न कहीं, जहां हमारी राष्ट्र भक्ति के प्रति कमजोरी उजागर होती है, वहीं पर देश विरोधी-देशद्रोही ताकतंे सिर उठाकर ऐसी हिमाकत कर जाती हैं। उन्हे रोकनंे के लिए हम न तो उनमें कोई ड़र व खौंफ पैदा कर पाते है, और न ही ऐसी घटना घटित हो जाने के बावजूद भी उनके विरूद्ध कोई कड़ी कार्यवाही करते है। तब हमारा देशप्रेम वैसा नहीं उमड़ता है कि हम उनको पकड़कर कानून के शिकंजे में बंद करवाएँ, उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करे। उनका सामाजिक बहिष्कार करे। शासन व प्रशासन भी ऐसी दशा में कई बार उदासीन ही रहता है, जो उनके देशप्रेम (की मात्रा) को इंगित करने का घोतक हैं। 
कैड़ल मार्च करना, ‘‘जय भारत’’ के नारे लगाना ‘‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’’ के नारे लगाना ये सब सिर्फ बयान बाजी ही कहलायेगी। इतने को हीे देशप्रेम मानना खोखला देश प्रेम होगा। देश प्रेम की दो स्थितियाँ हैं। एक वह, जो दुश्मन देश से पोषित व संचालित से बाहरी आतंकी शक्तियाँ से उत्पन्न देश की सुरक्षा व आत्मसम्मान को धक्का पहुचानंे के प्रयास का विरोध करते हैं। दूसरा, देश के भीतर की आंतरिक स्थिति जहां देश की संरचना को नुकसान पहुचाने वालों के विरूद्ध की जाने वाली कार्यवाही के प्रति हमारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। अभी मैं यहां बाहरी घटनाओं से निपटने के लिए मौजूद आवश्यक देशप्रेम की चर्चा कर रहा हूँ। देशप्रेम का एक उदाहरण और देखिये, अरूण जेटली का यह बयान ‘‘जिस तरह अलकायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर मार गिराया, हम भी ऐसी कार्यवाही कर सकते है’’। यह ऊपरी देशप्रेम है। यह बयान क्या आज ही आना चाहिये था? पिछले पांच सालो में पाकिस्तान द्वारा पोषित पुलवामा जैसी कई घटनाएं आंतकियों  द्वारा घटित की जा चुकी है। इन सबकी विस्तृत जानकारी हम विश्व को कई बार दे चुके है। तब उक्त बयान देने की बजाए, बिन लादेन की तरह हाफिज सईद व मसूद अजहर को पाकिस्तान के भीतर घुसकर मारने से उन्हे किसने रोक रखा था? देशप्रेम की वास्तविक झलक तब ही दिखेगी। एक उदाहरण से इस अंतर को समझिये ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘लाओं’’ और ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘करो’’। यही अंतर हमारी देशभक्ति में भी है।  
अभी अभी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान ने वापिस किया है। पाकिस्तान को समझौते के तहत युद्धबंदी (पीओडब्लू) विंग कमांडर ‘‘अभिनंदन’’ को भारत को वापस करना ही था। पूर्व में भी कारगिल युद्ध के समय युद्धबंदी लेफ्टिनेंट कमबमपति नचिकेता को कारगिल युद्ध जारी रहने के बावजूद वापिस किया गया था। लेकिन यह अंतर्राष्ट्रीय कानून होने के बावजूद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानून को कितना मानता है, जो उसके द्वारा की जा रही आंतकवादी घटनाओं के घटने से स्वयं सिद्ध है। इसीलिए भारत सरकार व भारतीय सेना को इस बात के लिए धन्यवाद अवश्य ही दिया जाना चाहिए, जिन्होने अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर पाकिस्तान को विश्व पटल पर अलग-थलग करने के साथ ही सेना के द्वारा बनाये गये जबरदस्त दबाव के फलस्वरूप, पाकिस्तान को जिनेवा संधि (समझौता) को मानकर (विंग कमांडर अभिनंदन को वापिस भेजने की) कार्यवाही करने के लिए बाध्य होना पड़ा हैं। यह हमारी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक सफलता व सैनिक बलों के जबरदस्त दबाव की जीत है। यहा एक कोतूहल भी पैदा होता है। जब हमारी सरकार व रक्षामंत्री यह मानते है कि जिनेवा समझौते के तहत युद्धबंदी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान द्वारा भारत को हर हालत में सौपना ही था तो, इसका क्या यह मतलब नहीं निकलता है कि भारत पाकिस्तान के विरूद्ध युद्ध छिड़ गया है? तभी तो ‘अभिनंदन’ युद्धबंदी कहलायेगे व जिनेवा संधि लागू होगी। 
युद्ध की वर्तमान आंशका की स्थिति में हममे से कितने नागरिकों ने शहीद परिवारों को किसी भी तरह का सहयोग पहंुचाया है, या व्यक्तिगत सांत्वना दी है, या अभिनेता अक्षय कुमार के सुझाव पर देश में खोले गये शहीदो की सहायता के लिये ‘‘आर्मी वेलफेयर फंड/बैटल केजुअल्टी फंड’’ में अपना अंशदान/सहायता राशी जमाकर अपने देशभक्त होने का परिचय दिया है? जब हम किसी राजनैतिक दल या सामाजिक संगठन के आव्हान पर अपने संसाधन से स्वयं के खर्च पर भोपाल-दिल्ली चले जाते है, तो क्या हम इन शहीद परिवारों के दुख में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर उन्हे सांत्वना देकर उनके परिवार के आत्मबल को बनाये रखने में सहयोग प्रदान कर देश प्रेमी होने का उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सकते है? ऐसे जुनून से भरी देशभक्ति की ही वर्तमान में सख्त आवश्यकता है। इन्ही भावनाओं को उभारने का प्रयास इस लेख का उद्देश्य हैं।
हमारे देश में ही शासन व प्रशासन की देशभक्ति का आलम यह है कि अलगाँवादी व्यक्तियों   जिन्हे स्वयं सरकार अलगाँवादी कहकर संबोधित करती है, उन्हे न केवल शासकीय सुरक्षा कराई जाती है, बल्कि लगातार करोडांे रूपया उनकी सुरक्षा व सुविधा पर खर्च होते है (यद्यपि अभी हाल में सरकार ने कुछ अलगाँवादी व्यक्तियों की सुविधाओं को समाप्त भी किया हैं, जो स्वागत योग्य है)। कश्मीर को स्वतत्रंता दिलाकर भारत को तोड़ने वाले अलगाँवादी व्यक्तियों की भारतीय नागरिकता समाप्त कर उनको जेल के सलाखों के भीतर क्यों नहीं डाला जाता है? ये सब अवांछित सुविधाएँ हमारी देशभक्ति की परिभाषा में ही संभव है, विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं।
आज जब अनवरत हो रही आंतकवादी घटनाओं के साथ पाकिस्तान बातचीत का राग अलाप कर विश्व को अंधेरे में रखने का प्रयास कर सकता है। तब प्रत्येक घटित आंतकवादी घटनाओं के बदले स्वरूप प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही करने की बजाए हम लगातार आगे होकर आक्रमण करते रहने के साथ बातचीत की पेशकश कर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने में क्यों परहेज कर रहे है? (क्योंकि सरकार स्वयं यह कह रही है कि पुलवामा घटना के बाद जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट स्थित आंतकी बेस को समाप्त करने के लिये किया गया हवाई हमला हमारा मिलिट्री ऑपरेशन नहीं हैं) देश के जनमानस के जेहन में आज का यक्ष (सबसे बड़ा) प्रश्न यही हैं, जिसे सरकार को असली जामा पहनाना हैं।       

सोमवार, 18 फ़रवरी 2019

अरविंद केजरीवाल का बयान! संविधान व लोकतंत्र विरोधी कौन?

‘‘दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल’’ के मामले में उपराज्यपाल एवं दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र के विवाद पर उच्चतम न्यायालय का बहुप्रतिक्षित निर्णय आ गया है। उक्त निर्णय पर आई दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की त्वरित प्रतिक्रिया मुख्यमंत्री पद पर बैठे हुये व्यक्ति के लिये न केवल अत्यधिक अमर्यादित है, वरण वह संविधान व लोकतंत्र के विरूद्ध भी हैै। केजरीवाल का यह बयान कि निर्णय ‘‘जनतंत्र विरोधी है’’ सत्य है, लेकिन यह सत्य किसके लिये? वास्तव में संविधान व जनतंत्र विरोधी कौन है? यही यक्ष प्रश्न हैं?
आलेख को आगे बढ़ाने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण सत्य यह भी है कि केजरीवाल पीड़ित पक्ष बनकर उच्चतम न्यायालय के समक्ष उन मुद्दो को लेकर ‘‘न्याय’’ के लिये गये, जिनका कानूनी अस्तित्व चुनाव लड़ने के पूर्व उनके समक्ष था। अर्थात दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली राज्य के अधिकारों में कोई परिवर्तन केन्द्रीय सरकार द्वारा नहीं किया गया था। मतलब साफ है कि चुनाव के पूर्व केजरीवाल जानते थे कि दिल्ली प्रदेश के पास कौन-कौन से अधिकार है, जिनके रहते हुये भी जनता ने उन्हे वोट दिया था। इन्ही अधिकारों को रहते हुये केजरीवाल के पूर्व भाजपा व कांग्रेस के मुख्यमंत्रीयों ने भी विरोधी दल की केन्द्र में सरकार होने के बावजूद शासन चलाया। किसी भी मुख्यमंत्री ने केजरीवाल के समान केन्द्रीय सरकार या उपराज्यपाल पर सरकार न चलाने देने के आरोप इस तरह के नहीं लगाये थे। वास्तव में दिल्ली राज्य के लिये अधिकारो की लड़ाई कानूनी न होकर राजनैतिक होनी चाहिये थी।
सिविल सोसाइटी में एक संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत हमारे लोकतांत्रिक प्रणाली का यह एक सर्वमान्य व अटल सिंद्धान्त है, कि उच्चतम न्यायालय का निर्णय अंतिम व बंधनकारी होता है। जब कभी न्यायालय कोई निर्णय देता है, तो निश्चित रूप से एक पक्ष संतुष्ट होता है, वहीं दूसरा पक्ष, जिसके प्रतिकूल निर्णय आता है, असंतुष्ट हो जाता है। यद्यपि वह उसे पसंद नहीं आता है, फिर भी (उच्च्तम न्यायालय का होने के कारण) बंधनकारी होने से उसे रूखे मन से ही सही, उसे  मान्य व स्वीकार करना पड़ता है। उसकी विवेचना, समालोचना, आलोचना की जा सकती है; निर्णय पर प्रश्नवाचक चिन्ह भी लगाया जा सकता हैं; उसमें कमियाँ निकाली जा सकती है; कमियों पर मीडिया सार्थक बहस भी करवा सकता हैं; परन्तु इन सबके बावजूद उसे जनतंत्र विरोधी नहीं कहा जा सकता। यद्यपि इन्हीं आधारों पर विशेषज्ञ पुर्निविचार याचिका दायर कर सकते है। फिर भी न्यायिक निर्णयों की आलोचना की एक कानूनी, संवैधानिक व स्थापित प्रचलित नैतिक सीमा भी है। लेकिन न्यायिक निर्णय को जनतंत्र या संविधान विरोधी कहना और इसे लोगो की अपेक्षाओं के खिलाफ बताना तो नितांत गैर-जिम्मेदाराना व बेवकूफी भरा कथन है। बल्कि ऐसे बयान देकर अरविंद केजरीवाल स्वयं ही जनतंत्र व संविधान विरोधी सिद्ध होकर व उसी लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं जिसके द्वारा वे स्वयं मुख्यमंत्री चुने गये है। लोकतंत्र जिन चार खम्बों पर मजबूती से खड़ा है, उसमें सबसे प्रमुख न्यायपालिका ही है, जो अन्य तीन खम्बों को (सुरक्षा) कवच प्रदान करती है। यदि पक्षकारों को उच्चतम न्यायालय के निर्णयों की इस सीमा तक आलोचना करने की अनुमति दे दी जायेगी, तब न तो स्वतंत्र न्यायपालिका रह पायेगी, न ही लोकतंत्र रह पायेगा और संविधान भी नहीं बच पायेगा। दृढ़ता (बेसिक स्ट्रकचर-केशवानंद भारती प्रकरण में) के साथ लचीलापन लिए हुए संविधान जिसमें अभी तक 101 संशोधन हो चुके हैं, के कारण ही हमारा लोकतंत्र परिपक्व होता जा रहा है तथा संविधान की सुरक्षा व सम्मान का दायित्व भी इसी न्यायपालिका का है। 
केजरीवाल जो स्वयं एक अर्द्ध न्यायिक प्रक्रिया का भाग रहे है (आयकर आयुक्त के रूप में)। क्या उन्हे इतनी भी समझ नहीं रह गई है कि न्यायालय लोगो की अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर   निर्णय नहीं देता है, बल्कि संवैधानिक व कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय देता हैं। फिर चाहे वह निर्णय लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप हो अथवा नहीं, लोगो को अच्छा लगे या नहीं। यदि सरकार को यह लगता है कि न्यायिक निर्णय सिर्फ लोगो के हित व इच्छाओं के अनुरूप ही तो उन्हे सरकारी कानून बनाते समय इस तथ्य पर सुक्षमता व गंभीरता से ध्यान देकर कानून का निर्माण पूर्णतया जनता के हितेषी बनकर जनता के हित में बनना चाहिये ताकि न्यायिक समीझा करते समय उसका निष्कर्ष भी वहीं निकल सकें।   
केजरीवाल का उक्त बयान अराजकता लिये हुए है, जो उसके पूर्व में दिये गये बयान को ही दोहराता है जब उन्होने कहा था ‘‘वे कहते है मैं अराजक हूँ, हाँ मैं मानता हूँ  कि मैं अराजक हँू।’’ न्यायिक निर्णय, लोकतंत्र (जनतंत्र) का चुनाव परिणाम नहीं है; जहां आप हार जाने के बाद कैसी भी आलोचना कर सकते है। जनतंत्र के निर्णय (चुनाव परिणाम) व न्यायपालिका के निर्णय के बीच के अंतर को समझना आवश्यक हैं। जनतंत्र द्वारा फूलन देवी चुनाव जीतती है लेकिन वही फूलन देवी न्यायपालिका द्वारा सजा पा जाती है। 
अतः केजरीवाल के विरूद्ध केवल मानहानि का प्रकरण दर्ज किया जाना ही पर्याप्त नहीं होगा। चंूकि अपने उपरोक्त कथन से वे लोकतंत्र को ही खतरे में डाल रहे है, जो कृत्य देशद्रोह  किए जाने के समान है। अतः केन्द्रीय शासन द्वारा उन्हे तुंरत बर्खास्त कर उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करके कार्यवाही करना चाहिए। राजनैतिक बयान-बाजी चलती रहेगी। लेकिन प्रशासन व केन्द्रीय सरकार यह कहकर बचने का प्रयास न करे कि अभी तक किसी ने भी केजरीवाल के विरूद्ध प्रथम सूचना पत्र दर्ज नहीं कराया हैं। केजरीवाल के इस बयान के समय को भी ध्यान में रखने की नितांत आवश्यकता है। यह बयान ऐसे समय पर आया है, जिसके एक दिन पूर्व ही उन्होने समस्त विपक्ष को दिल्ली में एक ही मंच पर इक्ठ्ठा किया था। ऐसी स्थिति में समस्त राजनैतिक दलों का भी दायित्व बनता है कि वे देश हित में केजरीवाल के इस बयान की सख्त आलोचना करे। 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

2019 के लोकसभा चुनाव केे बाद ‘‘एनडीए’’ के प्रधानमंत्री क्या नितिन गडकरी होगें?

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आरएसएस के करीबी, कॉर्पोरेट और व्यापार जगत के चहेते और केन्द्र की मोदी सरकार के नियत अवधि में अपेक्षित परिणाम देने वाले सड़क परिवहन, जहाज रानी व गंगा सफाई विभाग के मंत्री नितिन गडकरी केे पिछले कुछ समय से जो बयान आ रहे है वे निश्चित रूप से सामान्य से हट कर रहे हैं। गडकरी के मन की बात की कुछ बानगिया निम्नानुसार हैंः-
पहला 4 अगस्त 2018 के ‘‘आरक्षण देकर क्या होगा नौकरियां ही नहीं है’’। दूसरा अक्टूबर 2018 में ‘‘भरोसा नहीं था जीतेगें, तो बडे़ वादे किए, लेकिन जीत गए’’। तीसरा 23 दिसम्बर 2018 को एक कार्यक्रम में उन्होने कहा, ‘‘यदि मैं पार्टी का अध्यक्ष हंू और मेरे सांसद और विधायक अच्छा नहीं करते है, तो कौन जिम्मेदार होगा’’? मुझे नेहरू के भाषण पसंद हैं, कहते हुये उन्होने कहा कुछ ‘‘सिस्टम को सुधारने के लिए दूसरे की तरफ उंगली क्यों करते हो, अपनी तरफ क्यों नहीं करते हो। जवाहर लाल नेहरू कहते थे ‘‘इंडिया इज़ नॉट ए नेशन. इट इज़ ए पॉपुलेशन, इस देश का हर व्यक्ति देश के लिए प्रश्न है, समस्या हैं, तो मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि मैं स्वयं देश के सामने समस्या नहीं बनूंगा’’। तीन विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा, सफलता के कई दावेदार होते है, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता। ‘‘सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं। नेतृत्व को हार व विफलता की भी जिम्मेदारी स्वीकार करने चाहिए’’। एक टीवी कार्यक्रम को दिये साक्षात्कार में गडकरी ने कहा ‘‘हमारे पास इतने  नेता हैं, और हमंें उनके सामने बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हे कुछ काम देना हैं। उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘‘कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर मुंह बंद करने की जरूरत है’’। अभी हाल ही मंे यह बयान आया है कि सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओं जो पूरे हो सकें गडकरी ने कहा कि मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं मैं जो बोलता हूं वो 100 फीसदी डंके की चोट पर पूरा करता हूं। ये समस्त बयान निश्चित रूप से भाजपा की संस्कृति से न तो मेल खाते है और न ही भाजपा की आंतरिक कार्य पद्धति में सामान्य या असामान्य रूप से ंसंभव होते हैं। मतलब साफ है, संघ प्रमुख को विश्वास में लिये बिना या उनकी मूक सहमति या इशारों के बगैर ऐसे बयान संभव नहीं है। 
याद कीजिए भाजपा की कार्यप्रणाली जनसंघ के जमाने से जहां स्थापित पार्टी लाईन के बाहर जाकर जिसने भी कोई प्रश्न वाचक चिन्ह लगाया है, नेतृत्व पर उंगली उठाई है या नीतियों अथवा नीतिगत फैंसलों पर प्रश्न किया है उन्हे या तो पार्टी के बाहर ही कर दिया गया या उनके पर कतर दिये गये या (मार्गदर्शक मंडल बनाकर) उन्हे एक कोने में बैठा दिया गया। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष पीताम्बरा दास, बलराज मधोक से लेकर लालकृष्ण आडवानी तक, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुश्री उमा भारती आदि ऐसे अनेक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने है। इस वास्तविकता के बावजूद नितिन गडकरी ने जो कुछ भी विभिन्न अवसरो पर कहने की हिम्मत की, वह सत्यता है। लेकिन  भाजपा के आज के राजनैतिक परिवेश में कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितने ही उच्च ओहदे पर क्यों न हो, आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बिना ऐसा (दुः)साहसी कदम नहीं उठा सकता।  इसीलिए ऐसा भासित होता है कि भविष्य की स्थिति का आकलन कर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद उत्पन्न होने वाली आशंका पूर्ण (आशा पूर्ण नहीं) स्थिति का मुकाबला करने के लिए नितिन गडकरी को आगे कर उन्हे एनडीए के प्रधानमंत्री पद की ओर अग्रेसित किया जा रहा है। इसका स्वागत भी किया जाना चाहिये। भविष्य के दुष्परिणाम की आशंकाओं को महसूस /स्वीकार करके राजनीति में जब योजना बद्ध दूर-दृष्टि की नीति अपनाई जाती है, तभी उस विपरीत स्थिति से सफलतापूर्वक निपटा जा सकता हैं। संभवतः संघ की इसी मंशा के अनुरूप नितिन गडकरी के उक्त बयान आये हों।
उक्त सच्चाई को मानते हुये ही शायद कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा गडकरी जी के बयान पर मैं एक हिन्दी की कहावत याद कराना चाहता हूं ‘‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’’ याने उनकी निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहती है, और निशाने पर प्रधानमंत्री हैं।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

‘‘कुंभ’’ ‘‘महाकुंभ’’ और ‘‘अर्धकुंभ’’ में क्या कोई अंतर हैं?


प्रयागराज (इलाहबाद) में मकर संक्र्राति से ‘‘अर्धकुंभ’’ प्रारंभ हुआ है। लेकिन इस अर्धकुंभ को केन्द्रीय सरकार से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार व समस्त मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक  इसे कुंभ या महा!कुंभ कहकर महिमा-मंडित कर रहे हैं। इस ‘‘कुंभ’’ के जबरदस्त प्रचार-प्रसार के कारण ही मुझे भी यह शक हुआ कि यह 6 साल में आने वाला अर्धकुंभ है, या 12 साल में आने वाला पूर्ण कुंभ है। लेख लिखते समय सामने बैठे व्यक्ति राकेश से भी मैने पूछा तो उसने भी यही जवाब दिया कि यह कुंभ है। निश्चित रूप से यह जबरदस्त प्रचार-प्रसार के परिणाम का ही साक्ष्य है।   
    कुंभक्या है? कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभका अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रहे थे तब अमृत की कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में छलक गई थीं। जहां- जहां ये बूंदें गिरी थी उन स्थानों पर तब से ही कुंभ का आयोजन होता आया है। उन तीन नदियों के नाम गंगा, गोदावरी, और क्षिप्रा है। कुछ इतिहास कार इसे 850 साल से ज्यादा पुराना मानते हुये आदि शंकराचार्य द्वारा इसकी शुरूवात किया जाना मानते है। कुछ दस्तावेज इसे 525 बी.सी. में शुरू होना मानते है। वास्तव में कुंभ मेलों का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है। इन मेलों का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री व्हेनसांग के लेख से मिलता है, जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन  के शासन में प्रसंगवश इन कुंभ मेलों के होने का वर्णन किया गया है।        कुंभ मेलों का आयोजन चार जगहों पर होता हैः-हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।  उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है। इसके अलावा प्रति 6 वर्ष के अंतराल पर केवल दो स्थान प्रयाग और हरिद्वार में अर्धकुंभ  होता है। चूँकि प्रयाग में पिछला अर्धकुंभ वर्ष 2007 में हुआ था अतः वर्ष 2013 में हरिद्वार के बाद अब प्रयाग में अर्धकुंभ की बारी है।
    अर्धकुंभ क्या है? अर्ध का अर्थ है आधा! हरिद्ववार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है।  इसमे कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अर्धकुंभ की तैयारी में समस्त साधन-संसाधन झौंक दिये व आवश्यक बजट की उपलब्धता भी कराई है। पवित्र स्नानटैंट हाउस से लेकर ठहरने खाने-पीने, पर्यावरण, शौचालय, स्वच्छता से स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता तथा भारतीय संस्कृति की विरासत को दिखाने की प्रर्दशनी सांस्कृतिक नाटक, इत्यादि समस्त आवश्यक कार्यो की वृहत्तम स्तर पर जो सर्वोत्तम व्यवस्था विराट फैले कुंभ मेला क्षेत्र में की गई है, वह न केवल सर्वश्रेष्ठ व सराहनीय है, बल्कि अभी तक की उच्चतम व्यवस्था है। इस उच्च व्यवस्था ने 4 वर्ष पूर्व हमारे उज्जैन में हुये सिंहस्थ कुंभ की व्यवस्था को भी पीछे कर दिया है। इसलिए यदि इसे महाकुंभ का नाम दिया जा रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती। लेकिन इस अर्धकुंभ को ही (जो एक वास्तविकता है) महाकुंभ कहा जाता तो बेहतर होता। इसे कुंभ प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं थी।
  कही वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुये तो इसे कुंभके रूप में महिमा मंडित तो नहीं किया जा रहा है? वैसे यह भी जानना चाहिए कि ‘‘अर्धकुंभ’’ ‘‘कुंभ’’ का फल (प्रसाद) क्या एक समान ही है? यह भी पूछा जाना चाहिए कि 2013 में इलाहबाद (प्रयागराज) हुये कुंभ के 6 वर्ष बाद होने वाले अर्धकुंभ को क्या समाप्त कर दिया गया है? (यदि यह कुंभ है तो) इस ‘‘कुंभ’’ में उत्तर प्रदेश कैबिनेट की बैठक भी हो रही है, जो इस बात की परिचायक है कि यह ‘‘धार्मिक अर्धकुंभ’’ से ज्यादा यह एक ‘‘राजनैतिक महाकुंभ’’ है। इस महाकुंभ में भाग लेने वाले किसी भी संत, नागा-साधुओं ने अर्धकुंभ की जगह ‘‘कुंभ’’ प्रचारित करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई हैं। वास्तविकता को स्वीकारते हुये उसे अर्धकुंभकहने से क्या उसकी भव्यता में कोई कालाचिन्ह लग जाता? हम इस वास्तविकता की सत्यता को स्वीकार क्यों नहीं कर सकें यह प्रश्न समझ से परे है। मैं उत्तर प्रदेश सरकार को इस ‘‘अर्धकुंभ’’ की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के लिए बधाई देते हुये यह अनुरोध जरूर करना चाहँूगा कि वे वास्तविकता को स्वीकार करते हुये उसके वास्तविक नाम ‘‘अर्धकुंभ’’ से ही उसका समापन कर गरिमा पूर्वक इस तथ्य को शालीनता से स्वीकार करें। 


बुधवार, 23 जनवरी 2019

क्या कानून व्यवस्था ‘कांग्रेस’ व ‘भाजपा’ के लिये अलग-अलग है?

विगत दिवस मंदसौर में भाजपा नेता व प्रथम नागरिक नगर पालिका अध्यक्ष प्रहलाद बंधवार की सरे आम गोली मारकर हत्या कर दी गई। निश्चित रूप से यह एक बेहद दुखद घटना थी और पुलिस ने त्वरित कार्यवाही कर 24 घंटे के भीतर ही एक आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया। लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ का उक्त घटना पर यह बयान कि यह भाजपा का अंदरूनी मामला है, बिलकुल अनावश्यक और घटना की भयवता को कम करने वाला है। कमलनाथ यह कहकर क्या इंगित या दर्शाना चाहते है? आज ही एक और भाजपा नेता बलवाडी भाजपा मंडल मनोज ठाकरे अध्यक्ष की बल़वानी में दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। गृहमंत्री का उक्त घटना पर यह कथन कि इस घटना में भी भाजपा के आंतरिक मामले की आंशका है, कहकर मुख्यमंत्री के कथन को ही आगे बढ़ाया है। 
क्या भाजपा व कांग्रेस के लिये अलग-अलग कानून है? पार्टी या पारिवारिक विवाद में यदि कोई व्यक्ति कानून के बाहर जाकर कानून को तोड़ने पर उतारू हो जाये, तो क्या उसके लिये नियम व जांच की प्रक्रिया दूसरी होगी? हत्या आखिर हत्या है, और यदि मुख्यमंत्री राजनैतिक रूप से कोई लाभ (एडवान्टेंज) लेना चाहते भी है, तो वे यह आरोप तो लगा सकते है कि एक भाजपाई ने भाजपाई की हत्या की, यदि उनके पास इस बात के पर्याप्त साक्ष्य व तथ्य है तो। हत्या का कारण राजनैतिक द्वेष व व्यक्तिगत विवाद भी हो सकता हैं। लेकिन मुख्यमंत्री का यह कथन जिम्मेदार पूर्ण नहीं कहा जा सकता कि उक्त घटना भाजपा का अंदरूनी मामला है। मुख्यमंत्री व गृहमंत्री का यह कथन निश्चित रूप से जांच एजेंसी पर विपरीत प्रभाव डालेगें, जिससे जांच की दिशा भी बदल सकती है। इसलिये मुख्यमंत्री को कम से कम गहन आपराधिक घटनाओं  पर खासकर राजनैतिक व्यक्ति के हत्या होने पर इस तरह के अनावश्यक बयानबाजी से अवश्य बचना चाहिए।
क्या कमलनाथ के उक्त कथन का आशय यह तो नहीं है कि भाजपा की चुनाव में लगभग जीती हुई बाजी हारने के कारण उत्पन्न हताशा इसके लिये जिम्मेदार है? भाजपा का अंदरूनी मामला कहकर क्या मुख्यमंत्री व गृहमंत्री भाजपाईयों की हत्या करने की छूट दे रहे है? आखिर इन कथनों के पीछे उद्देश्य क्या है। यदि भाजपा का यह अंदरूनी मामला है व कानून व्यवस्था का मामला नहीं है तो क्या पुलिस प्रशासन का कानून का उल्लंघन करने वाले  ऐसे जघन्य अपराध को रोकने का प्रयास का दायित्व नहीं है? वास्तव में ये बहुत ही गंभीर मामले है, क्योंकि ये घटनाएं हत्या जैसे जघन्य अपराधों से जुड़ी है। इसलिये इस पर शासन व प्रशासन दोनो को अत्यंत संवेदनशील होने की आवश्यकता है। 
गृहमंत्री का यह कथन भी हास्यास्पद है कि भाजपा कानून अपने हाथ में न ले। वास्तव में जब गृहमंत्री स्वयं यह कहकर कि यह भाजपा का अंातरिक मामला है, पल्ला झाड़ रहे है तब जब गृहमंत्री ने कानून की कमान समालने से इंकार ही कर दिया हो तो निश्चिय ही भाजपा के द्वारा कानून हाथ में लेने के अलावा क्या विकल्प रहेगा?

शनिवार, 12 जनवरी 2019

केन्द्रीय सरकार का ‘‘आर्थिक आधार’’ पर 10 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय! कितना अधूरा! कितना पूर्ण?

वास्तव में हमारे देश में यदि किसी भी ‘‘सरकार’’ से कोई निर्णय अपने पक्ष में करवाना हो तो सरकार के चुने जाने के 4 साल तक तो वह आपकी मांगे व मुद्दो पर गंभीरता से कोई विचार ही नहीं करती है, क्योकि तब तक वह आपके चुनावी दबाव में ही नहीं होती है। परन्तु चुनावी वर्ष में चुनावी मोड में आ जाने के बाद आपका मुद्दा, फिर चाहे वह गलत हो या सही, कोई भी सरकार राजनैतिक दृष्टि से नफा-नुकसान का आकलन करते हुये उस पर विचार कर निर्णय लेती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता हैं, जनता का दबाव सरकार पर बढ़ता जाता है और सरकार निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाती है।
केन्द्र सरकार द्वारा सवर्ण समाज को आर्थिक आधार पर आठ लाख से कम सालाना आमदनी वालो को 10 प्रतिशत सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानो में प्रवेश देने पर आरक्षण देने का निर्णय लिया है, वह कुछ इसी मानसिकता व परिस्थितियों का परिणाम हैं। क्योकि हाल में ही तीन हिन्दी भाषी प्रदेशों में भाजपा के हार का एक कारण सवर्ण वर्ग की नाराजगी होना बतलाया गया है एक और तथ्य का यहाँ उल्लेख किया जाना समयाचिन होगा कि देश की लगभग 31 प्रतिशत सर्वण हिन्दू 125 लोकसभा सीट पर जीतकर आते है। फिर भी सिद्धान्त रूप से इस निर्णय का स्वागत इसीलिए किया जाना चाहिए कि पहली बार आर्थिक आधार पर आरक्षण के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाकर केन्द्रीय शासन स्तर पर निर्णय लिया गया है। यद्यपि इसको अभी असली जामा पहनाना है, जो इतना आसान काम नहीं है। केन्द्रीय सरकार ने जो निर्णय लिया गया है व जो दिख रहा है, वह न केवल निर्णय अपूर्ण है, बल्कि तुरन्त वास्तविक धरातल पर उतरने वाला भी नहीं है।
आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत सवर्ण समाज को आरक्षण देने का प्रस्ताव वर्तमान में लागु 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक अधिकतम सीमा के अलावा होगी। पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा को उच्चतम न्यायालय ने कई अवसरो पर उचित, वैध व संवैधानिक ठहराया हैं व इसकी सीमा को लांघ कर पचास प्रतिशत से अधिक किये किसी भी प्रकार के आरक्षण को उच्चतम न्यायालय ने अवैध घोषित किया है। आरक्षण के संबंध में वर्तमान में कानूनी, संवैधानिक व न्यायिक स्थिति यही है। ×आपको याद ही होगा सपाक्स पार्टी व वृहत्त सवर्ण समाज की माँग 10 प्रतिशत आरक्षण की कमी भी नहीं रही है। बल्कि उनकी मूल माँग जो है, वह जातिगत आधार पर पचास प्रतिशत आरक्षण जो लागू है उसे जातिगत आधार के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने की मांग रही है। क्योकि जातिगत आधार पर आरक्षण देने से समाज में समरस्ता के बदले विघटन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। यदि आर्थिक आधार पर सम्पूर्ण समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया जाता है (जो कि आरक्षण का मूल आधार ही होना चाहिये) तो निश्चित रूप से न केवल आरक्षण देने की उद्देश्य की पूर्ति होगी, बल्कि विभिन्न समाज के बीच वर्ग-भेद-जाति के आधार पर भेद असमानता भी नहीे होगी, बल्कि समरस्ता की खिचड़ी भी बनेगी। वह यह समरस्ता की खिचड़ी नहीं है जो भाजपा ने कल दिल्ली में बनाई थी, क्योकि वह तो वर्ग विशेष की खिचड़ी थी जो समरस्ता की कैसे हो गई, यह समझ के परे है। गरीबी व अमीरी के आधार पर जो समाज में भेद व खाई है वह अंतर भी आर्थिक आधार से कम होगा। केन्द्र सरकार भी भली भाँति जानती है कि उसका यह निर्णय संविधान व उच्चतम न्यायालय के प्रतिपादित सिंद्धान्त के विरूद्ध व प्रतिकूल है, जो वह लागू नहीं करवा सकती हैं। जब तक कि इस संबंध में संविधान में आवश्यक संसोधन नहीं किया जाता हैं। फिलहाल सरकार चुनावी मोड़ में आ जाने के कारण जनता को खुश (अपीज) करने का शार्ट (छोटा) रास्ता है जो कितना प्रभावी होगा, वक्त ही बतायेगा। यदि वास्तव में सरकार और समस्त दल सरकार के इस निर्णय से सहमत है, तो फिर सरकार एक अध्यादेश लाकर लागू इसे तुरंत क्यों नहीं लागू करके अपने इरादे को नेक बताने का प्रयास नहीं करती है? वास्तव में यदि यह चुनावी लालीपाप नहीं है, तो सरकार ने निर्णय लेने के पूर्व पहले संविधान में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं किया? तत्पश्चात ही संविधान संशोधन के अनुसार निर्णय लिया जाना समयोचित होता। तब उन पर चुनावी संकट का आरोप नहीं लगता।

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