गुरुवार, 8 अगस्त 2019

अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) समाप्त! लेकिन उपबंध (1) क्या 370 का भाग नहीं?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के इतिहास में राष्ट्रीय सुरक्षा व अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सबसे बड़ा कदम उठाकर पाकिस्तान को युद्ध में बुरी तरह से पटकनी देकर बंग्लादेश का निर्माण किया था। भारतीय सेना ने उक्त युद्ध में दो लाख से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों जिसमें सिविलियन्स, नागरिकगण व कुछ बंगाली लोग भी शामिल थे, का आत्मसमर्पण करवा कर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। उस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिये, तबके विपक्ष के नेता भाजपाई अटल बिहारी बाजपेयी ने इंदिरा गांधी को मां दुर्गा तक की संज्ञा दी थी। 
आज गृहमंत्री अमित शाह ने बड़ा ऐतिहासिक राजनैतिक कदम उठाने के पूर्व उक्त कदम को लागू करने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पड़ने वाले प्रभाव का समुचित प्रबंध करते हुये, संविधान के अनुच्छेद (धारा) 370 (1) को छोड़कर अनुच्छेद 370 की शेष समस्त उपधाराएं (खंड 2 एवं 3) को समाप्त करते हुये, धारा 370 की धार को ही बोठल कर दिया। साथ ही धारा 35ए भी समाप्त कर दी। लद्दाख व जम्मू-कश्मीर दो नये केन्द्र शासित प्रदेश बना कर आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘अगस्त क्रंाति’’ की याद दिला दी। (इसी सावन महीने में ही चंद्रयान 2 का सफल परीक्षण एवं ट्रिपल तलाक बिल भी पारित हुआ। राम जन्मभूमि मामले में उच्चतम न्यायालय में प्रतिदिन सुनवाई भी आज प्रांरभ हो गई हैं) इस प्रकार दोहरी नागरिकता, दो झंडे और दो विधान के प्रावधानों को एक झटके में समाप्त कर दिया। 
इंदिरा गांधी द्वारा बांग्लादेश निर्माण के समय उठाये गये कदम एवं अमित शाह के आज पूरी तैयारी के साथ उठाये गये कदमों में कई समानताएं हैं। प्रथम इंदिरा गांधी ने घोषित रूप से पाकिस्तान पर आक्रमण कर बांग्लादेश का निर्माण नहीं करवाया, बल्कि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में वहां के निवासियों जिन्हे मुक्तिवाहिनी कहा गया द्वारा पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचार के विरूद्ध चला रहे आंदोलन जो बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में परिणित हो गया था, को पूरी तरह से मदद देकर स्वतंत्र होने में पूरी सहायता की थी। ठीक उसी प्रकार गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले एक हफ्ते से जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त फौज इस आधार पर भेजी कि वहां पर आंतकी गतिविधियों एवं उनके द्वारा की जाने वाली आंतकी कार्यवाहियों का इनपुट मिला है, अमरनाथ यात्रियों पर हमले की आंशका है। अतः कानून शांति व्यवस्था व नागरिकों की सुरक्षा बनाये रखने का कारण बताया जाकर, राजनैतिक नेताओं की गिरफ्तारी, कर्फ्यू व धारा 144 लगाई गई। स्पष्ट है, घोषित रूप में अनुच्छेद 370 पर संशोधन करने की घोषणा के उद्देश्य से उक्त कार्यवाही नहीं की गई। अतः आज जब संसद में धारा 370 में संशोधन लाने की घोषणा की गई, तब यह महसूस हुआ कि यह उक्त एजेंड़ा हिडन (छिपा हुआ) हैं, ठीक वैसा ही, जैसा कि इंदिरा गांधी के बंग्लादेश बनाने के समय फौज भेजने के निर्णय के साथ था। 
एक समानता यह भी है कि जहां इंदिरा गांधी ने दुश्मन देश के दो टुकड़े किये, वहीं गृहमंत्री ने ‘‘गृह’’ (घर) जम्मू-कश्मीर (भारत का ताज) के दो टुकड़े कर दिये। बांग्लादेश बनाकर विश्व में एक राष्ट्र की और बढ़ोत्री हुई, तो अमित शाह के संकल्प पत्र से 29 प्रदेश वाला भारत 28 प्रदेश में सिमट गया व केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में दो प्रदेशों की वृद्धि हुई। इंदिरा गंाधी ने जहां पश्चिम पाकिस्तान के अत्याचार से पीडि़त पूर्वी पाकिस्तान की जन भावना के अनुरूप कार्य कर बांग्लादेश बनाया, वही अमित शाह ने सेना व बंदूक के साये में वहां की जनता को (बिल्कुल) विश्वास में लिये बिना जम्मू-कश्मीर का राज्य का स्ट्टेस खत्म कर केन्द्र शासित प्रदेश कर दिया।
उक्त कदम ऐतिहासिक कई कारणों से है। पिछले 70 सालों से जनसंघ से लेकर भाजपा तक सत्ताधारी पार्टी का एजेंडा संविधान की धारा (अनुच्छेद) 370 जो कि स्वयं में एक अस्थायी संक्रमण कालीन प्रावधान है, को पूर्णतः समाप्त कर एक राष्ट्र, एक निशान व एक विधान की लगातार वकालत करते रहने का रहा है। अस्थायी का मतलब ही यह होता है कि उसे किसी न किसी दिन समाप्त होना ही है, जैसा कि स्व. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनुच्छेद 370 के संबंध में कहा था कि यह घिसते-घिसते घिस जायेगा। शिवसेना ही एक मात्र ऐसी राजनैतिक पार्टी है, जो शुरू से इस मुद्दे पर भाजपा के साथ रही है। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार अलग-अलग अवसरांे पर लगभग कुल छः वर्ष की अवधि में रही। नरेन्द्र मोदी भी वर्ष 2014 से 2019 तक पांच साल की अवधि में प्रधानमंत्री रहे। लेकिन नरेन्द्र मोदी की दूसरी पारी में आज यह कदम उठाने के पूर्व किसी भी सरकार ने उक्त साहस नहीं दिखाया। भाजपा को वर्ष 2014 के चुनाव में भी पूर्ण बहुमत मिला था, जैसा की आज प्राप्त है। भाजपा के पास राज्यसभा में पूर्ण बहुमत तब भी नहीं था, और आज भी नहीं है (अपने बलबूते पर)। इन तथ्यों के रहते हुये राजनाथ सिंह के बदले अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जो यह कदम उठाया वह साहसिक व ऐतिहासिक ही कहा जायेगा। क्योंकि पूर्व में अटल जी व नरेन्द्र मोदी राजनाथ सिंह के गृहमंत्री रहते हुये यह कदम नहीं उठा पाये। ऐतिहासिक इस कारण से भी है कि पिछले कुछ दिनों से जम्मू-कश्मीर में सरकार जो कार्यवाही कर रही थी, उसका लबालूब निष्कर्ष यही निकल रहा था कि सरकार जम्मू-कश्मीर में ‘‘कुछ’’ करने जा रही है व अधिकतम धारा 35ए को समाप्त कर सकती है। लेकिन समस्त समीक्षकों, आलोचकों, समालोचकांे को हतबद्ध कर अमित शाह ने न केवल धारा 35ए को समाप्त किया, बल्कि जम्मू-कश्मीर प्रदेश का राज्य का दर्जा समाप्त कर उसके दो टूकडे़ कर दो अलग-अलग केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख बना दिया। यह कदम ऐतिहासिक इसीलिये भी है, क्योंकि भाजपा अपने एजेंडे़ से दो कदम और आगे जाकर (जिसकी कल्पना किसी भी ने नहीं की थी) जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया। लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से काटकर नया केन्द्र शासित प्रदेश बनाना व जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा समाप्त कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाना निश्चित रूप से समस्त राजनैतिक आलोचकों के लिये एक आश्चर्यजनक व कौतूहल पूर्ण कदम रहा है।  
यह निर्णय इसलिये भी ऐतिहासिक है कि वे पार्टियाँ जो प्रायः संसद में व संसद के बाहर कभी भी भाजपा के साथ खड़ी दिखाई नहीं दी है, लेकिन भाजपा के इस ऐतिहासिक कदम के साथ संसद में आज खड़ी हुई दिख रही है। इसमें प्रमुख रूप से बसपा, एआईडीएमके, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, आप, टीआरएस, एवं तेलगु देशम पार्टी शामिल है। अतः यदि आज उक्त ऐतिहासिक कदम से कुछ क्षेत्रों में सरदार पटेल की याद ताजा हो रही है, तो यह अतिश्योक्ति नहीं है। 
एक बात और! कांग्रेस को अनुच्छेद 370 में किये जा रहे संशोधन के विरोध इस आधार पर कि यह महाराजा हरिसिंह के साथ किये गये वायदे का उल्लंघन है और कोई नैतिक बल व अधिकार नहीं है क्योंकि कांग्रेस ने स्वयं वर्ष 1969 में निजी बैंको के राष्ट्रीय करण के साथ पूर्व राजाओं का प्रिविपर्स समाप्त कर 562 रियासतों के साथ भारत में शामिल करते समय किये गये समझौते का उल्लंघन किया था। तब उक्त कदम को बड़ा क्रंातिकारी प्रगतिशील व ऐतिहासिक बतलाया था।    
आइये, अब सिक्के के दूसरे पहलू को भी थोड़ा समझने का प्रयास करें। एक बात जो समझ से बिल्कुल परे है, वह जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाना, जो भाजपा सहित देश की किसी भी पार्टी के एजेंडा में शामिल नहीं था। निश्चित रूप से कश्मीरियों का जम्मू-कश्मीर के प्रति एक प्राकृतिक भावनात्मक लगाव है। कुछ लोगो का अनजाने या ना-समझी मंें ही सही, अनुच्छेद 370 से भावनात्मक लगाव है, यह भी सही है। क्योंकि वे भारत से जुडाव का बंधन इसी को मानते है,  जो यद्यपि सही नहीं हैं। अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) के उपबंधों में प्रतिबंध के प्रावधान रहने के बावजूद अनुच्छेद 370 के उपबंध (1) का प्रयोग करते हुये भारत के अधिकांश कानून कश्मीर पर लागू कराये गये। इस प्रकार व्यवहारिक रूप से इन 70 वर्षो में अनुच्छेद 370 के प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया गया था। धारा 35ए के कारण ही देश के नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार अभी तक नहीं था। अतः अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) को समाप्त करते समय गृहमंत्री ने कश्मीरियों की भावनात्मक भावना को ध्यान में रखे बिना उक्त राज्य जिसे विशेष दर्जा प्राप्त था का न केवल विशेष दर्जा समाप्त किया, बल्कि उसे अन्य प्रदेशों के समान एक राज्य भी नहीं रहने दिया। उसे दिल्ली, गोवा समान केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर जहां एक समय ‘‘महाराजा’’ राज्य करते थे से लेकर गर्वनर जनरल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री फिर मुख्यमंत्री व अंत में राज्यपाल के बाद अब उपराज्यपाल के अधीन कर दिया है, जो निश्चित रूप से कश्मीरियों के सम्मान को भावनात्मक रूप से ठेस पहंुचता है। इस स्थिति को देखते हुये जब गृहमंत्री ने राज्य को केन्द्र शासित राज्य बनाने का कोई उचित, आवश्यक व स्वीकार योग्य कारण नहीं बतलाया हैं, जबकि उनका उद्देश्य तो धारा 370 में संशोधन कर उसका विशेष दर्जा समाप्त करना मात्र था। जम्मू-कश्मीर राज्य के विभाजन की मांग कभी भी, किसी, ने किसी कार्नर से नहीं उठाई थी, तब इस विभाजन की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी यदि राजनैतिक रूप से यह आवश्यक था, तब उसे विभाजित कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के बदले दो राज्य बनाते तो ज्यादा बेहतर होता। 
संसद में जम्मू एवं कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक व अनुच्छेद 370 में संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय व उस पर हुई बहस का जवाब देते हुये अमित शाह द्वारा दिये उस कथन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर को कोई फायदा नहीं मिला (उनके शब्दों में ‘‘कोई मुझे बताएं तों...’’।) आगे उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की अधिकांश समस्यायें चाहे वह विकास, भ्रष्टचार, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, अपराध आदि किसी से भी संबंधित हो या आंतकवादी घटनाएं हो, उन सबके लिये अनुच्छेद 370 ही मुख्यतः जिम्मेदार है। अनुच्छेद 370 के कारण ही देश के लगभग 116 कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो पाये। लेकिन उन्होंने यह नहीं बतलाया कि अनुच्छेद 370 के प्रतिबंध के प्रावधान के बावजूद अधिकतम महत्वपूर्ण कानून जम्मू-कश्मीर में की विधानसभा में पारित करवाकर लागू किये गये। जब पीडीपी व भाजपा की संयुक्त सरकार थी, तब वे 116 कानून विधानसभा में पारित करवाकर क्यों नहीं लागू करवाये गये, यह प्रश्न विपक्ष द्वारा न तो पूछा गया और शायद उसका कोई जवाब भी नहीं था। अमित शाह के अनुसार यदि समस्त समस्याओं की जड़ अनुच्छेद 370 है, जैसा कि उन्हांेने संसद में अपने भाषण में कहां है, तो हमारे उत्तर पूर्वी प्रदेश व अन्य प्रदेश नागालैंड (अनुच्छेद 371ए) असम (371 बी) मणिपुर (371 सी) आंध्र प्रदेश तेलंगाना (371 डी) सिक्किम (371 ई) मिजोरम (371 जी) अरूणचल प्रदेश (371 एच) एवं गोवा (371 आई) एवं महराष्ट्र गुजरात हिमाचल प्रदेश (371), इन सभी राज्यों को विशेष दर्जा उपरोक्त उल्लेखित अनुच्छेदों को संविधान में शामिल करके दिया गया है। क्या  उक्त इन्ही आधारों पर ही उपरोक्त उल्लेखित समस्त अनुच्छेदों को संविधान से हटाकर (जैसा कि 370 (2) एवं (3) के साथ किया गया) कर विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के लिए सरकार क्या संसद के अगले सत्र में बिल लायेगी? ताकि उक्त समस्त विशेष दर्जा प्राप्त प्रदेशों का समुचित विकास हो सके। दुर्भाग्य की स्थिति तो यह है कि कोई भी पार्टी किसी भी समय चाहे देश में कितने ही संकट की स्थिति क्यों न हो बिना राजनीति किये सिर्फ और सिर्फ देश हित में कार्य करना ही नहीं चाहती है। निरपेक्ष रूप से शुद्धता के साथ सिर्फ देश हित में कार्य इस देश में कब संभव होगा? यद्यपि आज संसद में बार-बार यह कहा जा रहा था कि चर्चा राजनीति से ऊपर उठ कर की जानी चाहिये। लेकिन उक्त कथन में ही राजनीति भी परिलक्षित हो रही थी। यह एक बड़ा अवसर अमित शाह के लिये था। देश की जनता इस मुद्दे पर उनके साथ थी। यदि वे थोड़ा सा भी राजनीति से ऊपर उठकर बहस करते, तो शायद वे असरदार से सरदार होकर लौहपुरूष भी कहलाते। उदाहरणार्थ यह कहने की कतई आवश्यकता नहीं थी कि धारा 370 से जम्मू-कश्मीर के मात्र 3 परिवार को ही फायदा मिला जो न तो सच था और न ही समायोचित था। जूनागढ़ व हैदराबाद रियासत का भारत में विलय का मामला सरदार पटेल ने संभाला था, इसलिये समस्या नहीं हुई, जबकि कश्मीर का मुद्दा नेहरू के कारण आज तक विवादित बना रहा। उक्त कथन चीरफाड़ के बाद मरहम लगाने वाले तो कम से कम नहीं थे।  
खैर अब तो यही आशा है कि गृहमंत्री के आशानुरूप स्थिति तेजी से सामान्य होगी, ताकि गृहमंत्री लोकसभा में दिये गये आश्वासन के अनुसार जम्मू-कश्मीर पुनः देश का 29 वां राज्य बन सके, ताकि उसकी मुकुटमणि की स्थिति को पुर्नस्थापित किया सके।  
अंत में एक बात और सरकार द्वारा संसद भवन में रोशनी कर खुशी का अतिरिेक्त प्रर्दशन करने का औचित्य क्या है? ऐसी स्थिति में, जबकि वह जनता जिसके फायदे के लिये उक्त कानून बनाया गया कर्फ्यू में ड़र व खौंफ के माहोल में है, व उसे अपनी खुशी(?) व्यक्त करने का अवसर सरकार नहीं दे रही है। इसीलिए ऐसे अति उत्साह से बचा जाना चाहिए था। खैर अब तो मोदी सरकार का अगला कदम निश्चित रूप से ‘राम जन्म भूमि’’ ही होना चाहिये जो पूरे राष्ट्र की मांग व आवाज है।

बुधवार, 31 जुलाई 2019

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने आखिर गलत क्या कहाँ ?


भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जो पूर्व में भी अपने कई बयानों के कारण मीडिया व देश की राजनीति में न केवल चर्चित रही, बल्कि उनके बयानों के कारण भाजपा को शर्मिदंगी भी उठानी पड़ी है, व पार्टी की किरकिरी भी हुई है। प्रधानमंत्री तक को पार्टी की छवि बचाने के लिये यह कहना पड़ा कि गोड़से को देशभक्त बताने वाले उनके बयान के लिये वे साध्वी को कभी भी दिल से माफ नहीं कर पाएगें। 
वही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का सीहोर में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में यह उद्बोधन/कथन सामने आया है कि ‘‘हम नाली साफ करवाने के लिए नहीं बने है। हम आपका शौचालय साफ करने के लिए बिल्कुल नहीं बनाएं गए हैं। कृपया इसे समझें! हम जिस काम के लिए चुने गए हैं, वह काम हम ईमानदारी से कर रहे हैं’’। आगे उन्होंने ये भी जोड़ा कि ‘‘निर्वाचन क्षेत्र के समग्र विकास के लिए स्थानीय विधायक और नगरपालिका पार्षदों सहित स्थानीय जनप्रतिनिधयों के साथ काम करना संसद के सदस्य का कर्तव्य है।’’ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का यह बिल्कुल सीधा सादा सही अर्थो में संवैधानिक रूप से सत्य बयान होने के बावजूद भी उस पर तुच्छ राजनीति भी हो सकती है, यह शायद सिर्फ हमारे देश में ही संभव है। उक्त बयान पर मीडिया से लेकर राजनैतिक नेताओं तक ने बवाल और बवंडर मचा दिया। इससे यह भी सिद्ध होता है कि देश का राजनैतिक स्तर, नेताओं का बौद्धिक स्तर व मीडिया की गुणवता का स्तर निम्न होकर कितने नीचे गिर सकता है? किसी बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देते समय उस बयान के प्रसंग में जाए बिना राजनेताओं द्वारा अनर्गल व असंदर्भित प्रतिक्रिया देकर मीडिया के सहयोग से किस तरह से वे सुर्खियों में आना चाहते हैं, उसके निम्न स्तर का यह एक ‘‘श्रेष्ठ’’ उदाहरण है। 
बयान पर प्रतिक्रिया देने के पहिले जरा सोचिए तो! साध्वी ने उक्त कथन कहां पर किस संदर्भ में व किनके समक्ष दिया है। किसी भी बयान को उसके संर्दभ से अलग कर उस पर प्रतिक्रिया देना अपरिपक्वता नहीं तो और क्या है? साध्वी के बयान पर दी गई प्रतिक्रिया, बयान के तथ्यों से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है। अतः बिना सोचे समझे, या यह कहां जाए तो ज्यादा बेहतर होगा कि जानबूझकर सोची समझी योजनाबद्ध रूप से उक्त बयान को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम की सीमा तक ले जाकर, उसके विरूद्ध ठहराकर, आलोचना करने का जिस तरह माध्यम उक्त बयान को बनाया गया है, वह नितांत बचकाना कार्य लगता है। सांसद असदुद्ीन ओवैशी ने कहां मुझे कतई हैरानी नहीं हुई, न मैं इस वाहियात बयान से स्तब्ध हूूँ, वह ऐसा इसलिए कहती हैं, क्योंकि उनकी सोच ही ऐसी है। सांसद भारत में हो रहे जाति तथा वर्गभेद में यकीन करती हैं। वह साफ-साफ यह भी कहती है कि जो काम जाति से तय होता है वह जारी रहना चाहिए यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और उन्होंने खुलेआम प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का विरोध किया। 
जरा ओवैसी केे उक्त बयान पर ध्यानपूर्वक गौर कीजिये। जो बात साध्वी ने कही ही नहीं, वह ओवैसी उनके मुख में जबरदस्ती डलवाना चाहते है। यह देखा जाना चाहिऐ कि साध्वी अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठी हुई थी, और जब किसी कार्यकर्ता ने उन्हें सफाई की कोई समस्या बताई तब उन्होंने उक्त कथन किया, कि मुझे आपने इस कार्य के लिए नहीं चुना गया है। उनका यह कथन पूर्णतः सही है। लेकिन देश में आज कल राजनैतिक वातावरण भाजपा के ईर्द गिर्द सीमित मात्र होकर शैनेः शैनेः एक तंत्रीय प्रणाली होता जा रहा है। भाजपा में रहते हुए कड़क सही बात बोलने की जो हिम्मत उन्होंने दिखाई है, वह काबिले तारिफ है। उसके लिये वे साधुवाद की पात्र है।
आखिर उन्होंने गलत क्या कहा है? हमारे देश में लोकतंत्र को पूर्ण सही रूप से सच्चे अर्थो में स्थापित करने की प्रक्रिया स्वरूप ही संविधान और कानून समस्त विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप पंचायत स्तर से लेकर राष्ट्र को चलाने की केन्द्रीय शासन की व्यवस्था तक प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग तंत्र स्थापित किया गया है। पंचायत का कार्य ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामों का विकास करना है, जिसे पंचायती राज कहा गया है। नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगम के माध्यम से स्थानीय स्वशासन स्थापित कर कस्बे-शहर में साफ सफाई करने से लेकर शौचालय व सड़कों की सफाई के कार्य के साथ-साथ सर्वांगींण विकास के कार्य का उत्तरदायित्व स्थानीय स्वशासन अर्थात पार्षदों का ही है। मतलब निश्चित रूप से मूलतः सफाई का कार्य विधायक या सांसद का नहीं है, और न ही जनता उन्हे इस कार्य के लिये चुनती हैं। इसके लिये तो सामान्य पार्षद चुने जाते है। लेकिन जनप्रतिनिधी होने के नाते सफाई कार्य व स्वच्छता पर निगरानी रखना जनप्रतिनिधी होने के नाते जरूर उनका दायित्व बनता है, क्योंकि आजकल क्षेत्र का विकास नापने का एक मापदंड स्वच्छता भी है। 
विधायक को विधानसभा क्षेत्र के विकास व प्रदेश के नागरिकों के हित के लिए आवश्यक कानून बनाने के लिए विधानसभा भेजा जाता है। ठीक उसी प्रकार सांसद को संसदीय क्षेत्र के विकास के साथ-साथ देश हित में देश के नागरिकों के सर्वांगीण शांतिपूर्ण विकास व देश की आंतरिक-बाह्य सुरक्षा के लिए पर्याप्त समुचित कानून बनाने के लिए चुना जाता है। इसीलिये विकास के लिये विधायक निधि व सांसद निधि का प्रावधान भी किया गया है। मतलब साफ है कि विधायिका जिसमें सांसद व विधायक शामिल है, का कार्य मुख्य रूप से मूलतः कानून बनाना है। ट्रांसफर, पोस्टिंग व्यक्तिगत कार्य और साफ सफाई का कार्य सांसद का नहीं है। यद्यपि नागरिकों के चुने हुए प्रतिनिधी होने के नाते सांसद यदि उक्त कार्यों पर प्रभावी निगरानी रखते है, तो अवश्य वे एक सजग विधायक या सांसद कहलाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी के विधायक व प्रदेश के उपाध्यक्ष अरविंद भदोरिया इस बात के लिए बधाई के पात्र है, कि उन्होंने साध्वी की भावनाओं को सही परिपेक्ष में समझा, और उसे सही बतलाया। वास्तव में साध्वी ने जो कहा, उसे इस बात से भी समझा जा सकता है, कि गिलास आधा भरा है, अथवा आधा खाली। साध्वी ने गिलास आधा भरा है, के अनुसार कथन किया। बात कही। बाकी नासमझ लोगों ने उसे आधा खाली जताने की कोशिश की। 
ओवैसी से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा से यह पूछा जाना चाहिये कि वास्तव में सांसद के संविधान में निहित कार्य, दायित्व, जिम्मेदारी व अधिकार क्या है? जिनका वर्णन संविधान में किया गया है। जब साध्वी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अत्यंत महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान कार्यक्रम का कोई संदर्भ या जिक्र तक नहीं किया और न ही इस ओर इग्ंिांत ही किया है अथवा किसी भी तरह से उक्त अभियान की कोई आलोचना की है, तब उनसे उनके उक्त बयान को राष्ट्रीय अभियान से जबरदस्ती संर्दभित कर,स्पष्टीकरण मांगने की आवश्यकता बन गई ? उक्त बयान सेे पार्टी की छवि को कैसे नुकसान पहंुच गया, यह समझना मुश्किल है। इससे तो यही सिद्ध होता है, कि भाजपा में भी सांसदों को सही बात दिल से कहने की स्वतंत्रता नहीं है? उन्हे अपने कार्यकर्ताओं को सही बात (जो प्रायः कड़वी होती है) समझाने का अधिकार नहीं है। उन्हे परिपक्व बनाने व अपने दायित्व के प्रति जाग्रत करने का अधिकार नहीं है? शायद कड़वी बात कहना आज की राजनीति में संभव ही नहीं है।  
निश्चित रूप से ‘‘साध्वी’’ उस तरह की अनुभवी व बड़ी राजनीतिज्ञ नहीं है, जैसे (अन्य) लोग राजनीति में आते हैं। इसीलिए वेे वह राजनैतिक सावधानी नहीं बरत पाई, जो आज की राजनीति में अत्यंत आवश्यक है। यदि वे उस बयान के साथ यह भी जोड़ देती कि मोदी जी के राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम को आप लोग आगे बढ़ाये, तो शायद यह बवंडर नहीं होता। चंूकि वह कोई स्वच्छता अभियान की बैठक तो नहीं ले रही थी? न ही कोई समीक्षा कर रही थी, न ही उक्त कथन साध्वी ने किसी संगोष्ठी में, किसी टीवी डिबेट में या किसी सार्वजनिक मंच पर दिया था। शायद देश में आज की राजनैतिक स्थिति में सीधे सज्जन और साध्वी जैसों की आवश्यकता ही नहीं है। इसलिए आवश्यकता साध्वी के कान उमेठने की नहीं, बल्कि राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता को जागृत करने की है। ऐसे कार्यकर्ताओं को उनका दायित्व बोध कराकर, परिपक्व बनाने की है, जो अपने मोहल्ले के नाली साफ करने के लिए भी सांसद से अपेक्षा रखते हैं। 
लेख को शुरू से अंत तक पढ़ने के लिये धन्यवाद!

क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत ‘‘एकल पार्टी’’ तंत्र बनने जा रहा है?


बेशक, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। नरेंद्र मोदी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद से लगातार पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति में जो घटनाएं घटित हो रही हैं, उनसे लगता है कि अगले कुछ समय में ही भारत विश्व का सबसे बड़ा एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक देश बन जायेगा, जहां सिर्फ एक पार्टी (सत्ताधारी) का ही अस्तित्व होगा। इसके बावजूद भी वह विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता रहेगा। जहाँ दूसरे देशों में इस स्थिति को (राजशाही) मोनोआर्की कहां जाता है। विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश के संविधान में यह नहीं लिखा है कि लोकतंत्र के लिए दो राजनीतिक पार्टियों के होने की आवश्यकता है। लेकिन व्यवहारिक रूप से प्रभावी लोकतंत्र की सफलता के लिए सामान्यतः कम से कम दो राजनीतिक पार्टियां के अस्तित्व की अपेक्षा अवश्य की जाती है। एक सत्ताधारी और दूसरी उस पर अंकुश रखने वाला विपक्ष। यद्यपि कानून में ऐसा कोई सीमा का प्रावधान/प्रतिबंध नहीं है। वर्ष 1947 के पश्चात स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत में भी गुजरते समय के साथ-साथ लोकतंत्र परिपक्व होता गया। वर्ष 1952 के प्रथम आम चुनाव में भारी बहुमत प्राप्त करने वाले सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस की तुलना में बहुत अल्प (नगण्य) संख्या में विपक्ष रहने के बावजूद एक प्रभावी विपक्ष की उपस्थिति और भूमिका हमेशा रहती आयी है। क्योंकि तत्समय कई प्रबुद्ध और स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिए हुए प्रसिद्ध राजनैतिक नेता संसद में मौजूद रहकर विपक्ष से प्रभावी रूप में उपस्थिति दर्ज कराते थे। 
नरेंद्र मोदी द्वारा दोबारा प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद जनादेश द्वारा चुनी हुई कांग्रेसी सरकारों के एक के बाद जाने को संभावनाएं दिन प्रतिदिन बलवती होती जा रही हैं। कर्नाटक का उदाहरण ताजा है, जहां सरकार गिर जाने की पूरी संभावनाएँ है। इसके पूर्व गोवा में भी 10 विधायक दल बदल करके भाजपा में शामिल हो कर विपक्ष के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया। वहाँ आम चुनाव में कांग्रेस (अब विपक्ष) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी व सरकार बनाने का उसका वैधानिक व नैतिक आधार राजनैतिक चाल बाजियों के चलते छीन लिया गया था। पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तर पूर्व प्रदेशों में लगातार दल बदल के द्वारा विपक्ष को अस्तित्वहीन करते हुए भाजपा तेजी से एकाधिकार की ओर बढ़ती जा रही है। तर्क यह किया जा सकता है कि विपक्ष को मजबूत बनाए रखना क्या सत्ताधारी पार्टी का काम है? निश्चित रूप से कदापि नहीं। लेकिन एक लोकतांत्रिक देश, जहां दल बदल विरोधी कानून वर्षो से लागू है, सत्ता लोलुपता के लाभ में उस कानून का पूरा मखौल वास्तविक रूप से नहीं उड़ाया जा रहा है?या कानून की बारिकियों से (नैतिकता से नहीं) तोड़ मरोड़ कर उससे बचने का रास्ता नहीं निकाला जा रहा है? इस तथ्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक होगा कि जनता जनादेश देकर एक पार्टी के लोकतांत्रिक शासन को सौपना नहीं चाह रही है। नरेंद्र मोदी का सिद्ध निस्वार्थ जनसेवक जैसे महान व्यक्तित्व व राहुल गांधी का प्रेरणा हीन एक सामान्य व राजनीति में असफलता का पु्रछल्ला लिये हुये व्यक्तित्व होने के बावजूद, यदि कांग्रेस को गुजरात में सफलता से लेकर कर्नाटक, राजस्थान मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने का मौका जनता ने दिया है, तो  सत्ता और धन बल का उपयोग करके छेड़ छाड़ द्वारा सत्ताधीष भाजपा को उस जनादेश को बदलने का नैतिक व कानूनी अधिकार बिलकुल भी नहीं है। विशेषकर इसीलिये भी क्योंकि भाजपा एक ऐसी पार्टी रही है जिसने उस समय हमेशा सिद्धांतों व नैतिकता के मूल्यों की बात की है, जब कांग्रेस ने उक्त मूल्यों को लगभग समाप्त कर दिया था। विशेष कर अटल बिहारी के जमाने में तो अटल जी ने विपक्ष (भाजपा) को हमेशा सम्मान दिया। मात्र एक वोट कम पड़ने पर भी उन्होंने सरकार को गिर जाने दिया, लेकिन सरकार बचाने के लिये वह एक वोट पाने का प्रयास नहीं किया। जिस तरह अभी पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकारे दल बदल कर अपनी सरकारो को और मजबूत कर रही है। अटल जी की और नरेंद्र मोदी की कार्यशैली का यह अंतर स्पष्ट गोचर होता है।
इसलिए भाजपा को यह सोचना चाहिए कि जनता जब उन्हें लगातार जनादेश दे रही है व आगे भी तैयार दिखती है, तब वह समय का इंतजार कर वह जनता से सीधा जनादेश लेकर अपना एकछत्र राज स्थापित करके नरेंद्र मोदी की उस कल्पना को क्यों नहीं चरितार्थ एवं साकार करती है जिसमें नरेंद्र मोदी यह कहते हुये नहीं थकते रहे कि देश की राजनीति एक दिन कांग्रेस विहीन हो जाएगी। सत्ता के शीघ्र विरोध शिखर पर पहुंच जाने के चक्कर में सिद्धांतों की बली देकर खासकर उस समय जब जनता को आज की परिस्थितियों में किसी अन्य पार्टी से कोई उम्मीद ना बची हो, क्या भाजपा भी उसी रास्ते की ओर नहीं जा रही है जिस रास्ते को कांग्रेस द्वारा लम्बे समय तक अपनाये जाने कारण जनता उसे लगभग पूर्णतया खारिज कर चुकी है?सिंद्धातों व नैतिकता को कमजोर करने जाने का कतई कोई औचित्य/समझ नहीं पड़ता है।

जानिये!‘‘कैलाश मानसरोवर’’ ‘‘यात्रा का अनुभव’’ एवं यात्रा में बरतने वाली सावधानियाँ!


सामान्यतया प्रत्येक हिन्दू धर्मावलंबियों की अन्तिम इच्छा देश के चारों धाम बद्रीनाथ (जिसमें उत्तराखंड के चारो धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री शामिल है) द्वारका, जगन्नाथ पुरी व रामेश्वरम की तीर्थ यात्रा कर लेने के बाद कैलाश मानसरोवर की ‘‘अदभुत यात्रा’’ करने की होती है। केदारनाथ धाम को छोड़कर मेरी बाकी धामों की यात्रा पूरी हो चुकी थी। इसलिये मेरी केदारनाथ धाम यात्रा जाने की सतत उत्कट इच्छा अवश्य रही। लेकिन कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने का मन एवं दिमाग मैने कभी भी नहीं बनाया था। उक्त यात्रा के संबंध में एक बात तो बचपन से ही सुन रखी थी कि यह एक कड़ी कठिन यात्रा है और तत्समय उन दिनों जो लोग उक्त कठिन यात्रा पर जाते थे, उनके परिवार के सदस्य मानसिक रूप से उन्हे अंतिम बिदाई मानकर भेजते थे। उनके सकुशल लौट आने पर घर व समाज में त्यौहार जैसी खुशी मनायी जाती थी। दूसरी बात जो मेरे मन में थी, वह यह कि मेरा स्वास्थ्य कैलाश मानसरोवर यात्रा की परिस्थितियों के बिलकुल भी अनुकूल नहीं था। साथ ही मेरे व्यस्ततम जून महीने में 20 दिनों का समय निकालना संभव प्रतीत नहीं होता था। इन्ही सब मानसिक द्वन्दों के चलते मैंने कभी यह नहीं सोचा कि मुझे कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाना चाहिये। 
कैलाश मानसरोवर यात्रा का अनुभव साझा करने के पूर्व कैलाश मानसरोवर के बाबत संक्षिप्त जानकारी देना आवश्यक है। कैलाश पर्वत 22,068 फीट ऊंचा विशालकाय पिरामिड है, जो 100 छोटे पिरामिडों का केन्द्र है। इसकी बाहरी परिधि 52 कि.मी. है। हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। यह पूरे वर्ष भर बर्फ की सफेद चादर में लिपटा रहता है। इस कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है-ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है। पूर्व में अश्वमुख, पश्चिम में हाथी का मुख, उत्तर में सिंह का मुख व दक्षिण में मोर का मुख है। 
मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। साथ ही यह उतना ही पुराना है जितनी हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश व ध्वनि तरंगों का समागम होता है जो ‘‘ऊं’’ की प्रतिध्वनि निकालता है। कैलाश पर्वत की तलहटी मंे कल्पवृक्ष लगा हुआ है। अदभुत स्वरूप होने के कारण इसके हर भाग को अलग-अलग नामों से संबोधित किया जाता है। पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व को क्रिस्टल, पश्चिम को ‘‘रूबी’’ और उत्तर को ‘‘स्वर्ण’’ के रूप में माना जाता है। पौराणिक कथाओं में भी यह जिक्र मिलता है कि यह स्थान कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है। यहां से बाबा भोलेनाथ उन्हें अपनी जटाओं में भरकर धरती पर निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। कैलाश पर्वत के ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यु लोक है। जहां भगवान शिव साक्षात विराज मान है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि कैलाश पर्वत ब्रम्हाण्ड़ की धुरी, और भगवान शंकर का प्रमुख निवास स्थान है। शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण इत्यादि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है, जहां कैलाश महिमा का गुणगान किया गया है। 
कैलाश से 40 कि.मी. की दूरी पर मानसरोवर झील के दर्शन की विशेष महिमा है। मान्यता है महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की थी, जो पुराणों में क्षीर सागर के नाम से वर्णित है। इसी में शेष शैय्या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित है जो पूरे संसार को संचालित कर रही है। यही विष्णु का आश्रय भी है। यह लगभग 320 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में रक्षातल झील है। मानसरोवर के पास एक संुदर सरोवर रकसताल है। इन दो सरोवर के उत्तर में कैलाश पर्वत है, दक्षिण में गुर्रला पर्वत माला व शिखर है। संस्कृत शब्द ‘‘मानसरोवर’’, मानस तथा सरोवर को मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर। कहते हैं कि मानसरोवर वह झील है, जहां माता पार्वती स्नान करती थीं और मान्यता अनुसार, वह आज भी करती हैं। यह भी मान्यता है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले तो वह रूद्र- लोक पहुंच सकता है। शाक्त ग्रंथ के अनुसार देवी सती के शरीर का दाया हाथ इसी स्थान पर गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। इसलिये इसे 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ माना गया है। 
कैलाश पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्मो हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म का धार्मिक केन्द्र भी  है। बौद्ध धर्मावलंबी यहां भगवान बुद्ध व माणिपद्या का निवास मानते हैं। भगवान बुद्ध का अलौकिक रूप ‘‘डेमचौक’’ (धर्मपाल) बौद्धों के लिये पूज्यनीय हैं। उनका यह भी मानना है कि इसके केन्द्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं। भगवान बुद्ध की माता ने यहां की यात्रा की यह भी माना जाता है। जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल ’अष्टपद’ है। कहते हैं ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहां कुछ दिन रुककर ध्यान किया था। इसलिए सिखों के लिए भी यह पवित्र स्थान है। वैज्ञानिक मान्यता: वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थान धरती का केंद्र है। इसके एक ओर उत्तरी ध्रुव है, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव। दोनों के बीचोबीच स्थित है हिमालय। हिमालय का केंद्र है कैलाश पर्वत और मानसरोवर। वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के चारों ओर पहले समुद्र होता था। इसके रशिया से टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ। यह घटना अनुमानतः 10 करोड़ वर्ष पूर्व घटी थी। यहां एक ऐसा केंद्र जिसे एक्सिस मुंडी कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। कई बार कैलाश पर 7 तरह की  लाइट आसमान में चमकते हुये देखने का दावा भी किया गया है। 
आइये अब कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने की भूमिका की थोड़ी चर्चा कर ले।
एक दिन मेरे पारिवारिक मित्र महेन्द्र दीक्षित आए और उन्होंने बतलाया कि बैतूल के ही लगभग 18 से 20 लोग कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने के लिये तैयार हो रहे है। वे सब आपके परिचित ही है। आप भी इस यात्रा पर चलें। महेन्द्र दीक्षित लगभग पिछले 20 वर्षो से बैतूल के नागरिकों को ‘‘बाबा अमरनाथ’’ की धार्मिक यात्रा पर लेकर जाते रहे हैं। धार्मिक यात्राओं का उन्हें अच्छा खासा लम्बा अनुभव है, यह बात मैं अच्छी तरह से जानता था। महेन्द्र दीक्षित ने तीन चार बार आकर मुझसे यात्रा में चलने का आग्रह किया। मैंने उनसे यही कहा कि मेरा यात्रा में जाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि मैं तीन बार का हृदय घात से पीडि़त मरीज हूँ। कमर में दर्द है, एल-फोर में गेप हैं। अस्थमा का भी मरीज हूँ। कैलाश मानसरोवर की परिस्थितियाँ व पहुुच मार्ग मेरे स्वास्थ्य के बिल्कुल विपरीत होने के कारण मैं निश्चित रूप से बीमार पड़ जाऊगाँ, जिससे परेशान होकर आप सब लोगो की यात्रा का मजा ही खराब हो जायेगा। लेकिन इसके बावजूद उनका यह लगातार अनुरोध रहा कि ‘‘आप तो अपना मन बनाइये, बाकि सब ‘‘बाबा’’ पर छोडिये। कैलाश मानसरोवर वे ही लोग पहंुच सकते है जिन्हे ‘‘बाबा’’ बुलाते है’’। तब मैने अपने आपको मानसिक रूप से यात्रा के लिये तैयार किया। अंततः उनका उक्त कथन तब अक्षरसः सही सिद्ध हुआ, जब मैं 10 जून को बैतूल से निकल कर 30 जून को सम्पूण यात्रा सफलता पूर्वक पूर्ण करके, एकदम स्वस्थ रूप में वापिस घर लौट आया। 
आस्तिक होकर ईश्वर पर मेरा दृढ़ विश्वास शुरू से ही रहा है। प्रारंभ से ही जीवन के अनेक क्षेत्रों के साथ धार्मिक क्षेत्रों में भी जुड़ा रहा हँँू। कई पंडितो, साधु-संत, महात्माओं, आचार्यो शंकराचार्यो के निकट संपर्क में रहने के बावजूद कभी भी मुझे ईश्वर की अनुभूति महसूस नहीं हुई। लेकिन यह एहसास मुझे उस दिन हुआ जब हम लोग कैलाश मानसरोवर की यात्रा में काठमांडू से तिब्बत सीमा तक बस से गये। चट्टानों को काटकर बनाये गये संकरे एकल रास्ते से बस हिचकोले लेकर रेंगते हुये चल रही थी। लगातार हर क्षण/कुछ-कुछ क्षण बाद धक्का लगते रहने के बावजूद जब मेरी कमर में किसी तरह की तकलीफ नहीं हुई, तब मुझे वास्तव में ईश्वर का अनुभव हुआ क्यांेकि मुझे तो डाक्टरों ने स्कूटर पर बैठने से भी मना किया हुआ है। वास्तव में बारम्बार मुझे यह अहसास हो रहा है ‘‘बाबा कैलाश’’ ने ही मेरी यह यात्रा पूरी कराई। ‘‘जय बाबा कैलाश की’’।
बैतूल के 21 नागरिकों के कैलाश मानसरोवर यात्रा से सकुशल बैतूल वापिस लौट आने के बाद निश्चित रूप से यहां के नागरिकों की उक्त यात्रा बाबत उत्सुक्ता बढ़ी है। मेरे पास व अन्य साथियों के पास भी फोन आये व हमसे यात्रा का अनुभव व जानकारी पूछी गई। इस लेख का उद्देश्य भी उन लोगों को यथा संभव पूरी अधिकृत जानकारी देने का प्रयास है, जो (लोग) भविष्य में इस यात्रा पर जाने की सोच रहे है या प्लान बना रहे है। ताकि उन लोगो की यात्रा सुविधा पूर्वक सुगमता व निश्ंिचतता से हो सके व उन्हें उन परेशानियों से बचाया जा सकंे जो हमने यात्रा के दौरान झेली हैं।                            
सर्वप्रथम यात्रा पर जाने का सही समय सामान्यतया जून से लेकर सितंबर तक का होता है। अक्टूबर से अप्रैल तक सरोवर व पर्वत बर्फ (सफेद चादर) से आच्छदित रहते हैं, पानी जमकर ठोस हो जाता है। ठंड में तापमान सामान्य से अत्यंत कम होने के कारण वहां का वातावरण बहुत ही ठंडा हो जाता है। दूसरे, यात्रा पर ले जाने वाली एजेंसी दो तरह की होती है। एक प्रायवेट व दूसरी सरकारी। शासकीय स्तर पर यात्रियों (सिर्फ वे भारतीय नागरिक जिनके पास पासपोर्ट हैं) के आवेदन ऑन लाईन बुलाये जाते है, जिसकी तारीख प्रतिवर्ष अधिसूचित होती है (सामान्यतया जून महीने में)। आवेदकों की आयु सीमा 18 से 70 साल के बीच निर्धारित की हुई है। बॉड़ी मास इंडेक्स (बीएमआई) 25 या उससे कम होना चाहिए। उच्च रक्त चाप, मधुमेह दमा हृदय रोग मिरगी इत्यादि रोगों से पीडि़त व्यक्ति योग्य नहीं होते है। सरकारी एजेंसी में संख्या निश्चित व सीमित होती है। 50 श्रृद्धालुओं के 10 जत्थे से लेकर 60-60 श्रद्धालुओं के 18 जत्थे रूट अनुसार निर्धारित किये जाते है। पूरी यात्रा अवधि 24 दिन होती है। अलग-अलग रूटो की यात्राविधि अलग-अलग होती है। प्रायवेट एजेंसी की यात्रा में संख्या निश्चित नहीं हेाती है। कंप्युटरीकृत ड्रा द्वारा आवेदनों को चुनाव (चयन) के साथ ही बैच व मार्ग भी आंवटित किया जाता है (हेल्पलाईन नं. 011-24300655 हैं)।  कट आफ तिथी के पूर्व पुष्टीकरण राशी जमा कर अपनी भागीदारी की पुष्टि करनी होती है।
चयन के बाद चुने गए एवं संपुष्ट किए गए यात्रियों को यात्रा के लिए दिल्ली आते समय निम्नलिखित दस्तावेजों को अपने साथ अनिवार्य रूप से लाना होगा। (1). भारतीय पासपोर्ट, जो वर्तमान वर्ष के कम से कम 6 महीने के लिए वैध हो। (2). रंगीन पासपोर्ट साइज फोटो की (6 प्रतियाँ)। (3). क्षतिपूर्ति बांड 100 रूपय या स्थानीय स्तर पर लागू राशि के गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर जो प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट या नोटरी पब्लिक द्वारा सत्यापित हो। (4). वचन पत्र आपात स्थिति में हेलिप्कॉटर द्वारा निकासी हेतु। (5). सहमति पत्र, चीनी क्षेत्र में हुई मृत्यु की स्थिति में पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार हेतु। 
सरकारी टूर एजेंसी में तीन जगह डीएचएलआई (दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टीट्यूट) एवं आईटीबीपी बेस अस्पताल द्वारा आयोजित विशिष्ट चिकित्सा जांच करनी होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी स्तर पर मेडि़कल जांच में किसी भी तरह से अनप्युक्त (फिट नहीं) पाया जाता है, तो उसे यात्रा पर आगे जाने से रोक दिया जाता है (पूर्व में भुगतान किया गया शुल्क भी वापिस नहीं किया जाता है) यानी मेरा जैसा रोगी व्यक्ति तो सरकारी यात्रा हेतु शायद ही फिट पाया जाता। प्रायवेट एजेंसीज में न तो कोई मेडि़कल जांच होती है और न ही कोई डॉक्टर यात्रा में साथ होता है। सरकारी एजेंसी में डॉक्टर यात्रा के साथ रहते है। 
हम लोग काठमांडू से बस से सायप्ररूबेंसी मार्ग से तिब्बत सीमा पहंुचे थे। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से एक मार्ग (जिसमें प्रति व्यक्ति सरकारी यात्रा का खर्च 1.8 लाख रूपये आता है) और दूसरा मार्ग गंगटोक से गुजरने वाले नाथुला दर्रे से होकर जाने वाला मार्ग है ,जिसमें हांगू लेक व तिब्बत पड़ता है। लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरने वाले मार्ग में ‘‘ओम पर्वत’’ (चियालेख घाटी) की प्राकृतिक सुंदरता के भी दर्शन हो जाते है जहाँ प्राकृृतिक रूप से बर्फ में ओम की आकृति बनी होती है। नाथूला दर्रे से जाने वाला मार्ग मोटर वाहन और टेªकिंग न कर सकने वाले वरिष्ट नागरिकों के लिए ज्यादा उपयुक्त है। लेकिन फिलहाल डोकलाम विवाद के बाद से यह रास्ता बंद कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त वायु मार्ग से काठमांडू से नेपालगंज, नेपालगंज से सिमिकोट पहुंचकर वहां से हिलसा तक हेलीकॉप्टर द्वारा पहंुचा जा सकता है। वैसे काठमांडू में लैंडक्रूजर गाड़ी की सुविधा भी उपलब्ध रहती है। काठमांडू से ल्हासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेना उपलब्ध है, जहां से तिबब्बत के विभिन्न कस्बों शिंगाटे, ग्यांतसे लहात्से, प्रयाग पहंुचकर मानसरोवर यात्रा पर जा सकते हैं। 
प्रायवेट एजेंसियों के द्वारा यात्रा में जाने पर अधिकांश यात्रियों को एजेंसीज की अनेकानेक मनमानीयों का प्रायः शिकार होना पड़ता है। उनके द्वारा यात्रियों से तय शुुदा राशि तो शुरू में ही पूरी ले ली जाती है। लेकिन अतिरिक्त लाभ के लालच में अतिरिक्त राशि के लिये वे विभिन्न तय शुदा सुविधाओं में कमी करके बार-बार परेशान करते रहते हैं। चंूकि यात्री उस समय दूसरे देश में असहाय स्थिति में होता है, अनजान जगह में रहता है अतः मजबूरी में (टेªवल्स कंपनी के कर्मचारियों के अनावश्यक दबाव में) उसे उनकी अनुचित मांगो को भी स्वीकार करके अतिरिक्त राशि देते जाना पड़ता है। हमारी यात्रा में एक दिन तो स्थिति इतनी बदतर हो गई कि हमारी टूर एण्ड़ टेªवल्स एजेंसी ने हमसे अतिरिक्त पैसे लेने के उद्देश्य से होटल के मैनेजर से कहकर हमारे कमरों की लाईट ही बंद करवा दी। इसलिए यदि आप प्रायवेट एजेंसी के द्वारा जा रहे है तो सही टूर टेªवल्स एजेंसी को चुनना अत्यंत आवश्यक है। 
हमने भोपाल की ‘‘हालिडे पांइट टूर एण्ड टेªवल्स एजेंसी’’ के मालिक (राजेश अग्निहोत्री जिनका बैतूल से संबंध रहा है) से यात्रा की सुविधाएँ शर्ते व रेट महेन्द्र दीक्षित के माध्यम से तय किए थे। रूपये 1 लाख 26 हजार प्रति यात्री तय हुआ था। पैकेज काठमांडू से कांठमांडू तक था।  हालिडे पांइट टूर एण्ड टेªवल्स एजेंसी भोपाल के राजेश अग्निहोत्री ने अपना कमीशन/लाभ लेकर उक्त सम्पूर्ण यात्रा का पैकेज ‘‘ओझा हालिडे टूर एण्ड़ टेªवल्स काठमांडू’’ की एजेंसी को हस्तांतरित कर हमे उनके हाथों में सौप दिया जिनसे हमारी कोई पहचान ही नहीं थी। इसलिए प्रायवेट कंपनी से जब भी हम बात करे तो स्थानीय या भोपाल की ख्याति प्राप्त परिचित टूर एवं टेªवल्स एजेंसी से बात करे जो परिचित रहने से उन पर आवश्यकता पड़ने पर दबाव बनाया जा सके। भोपाल वाली ऐसी टेªवल्स टूर कंपनीयाँ जो स्वयं सीधे यात्रा का प्रबंध न करके काठमांडू की टेªवल्स एवं टूर कंपनी के द्वारा पूरे टूर को आयोजित करवाती है, ऐसी कंपनियों के बजाय सीधे काठमांडू की कंपनी से बातचीत करना ही ज्यादा फायदे मंद साबित होगा। पूरी यात्रा के दौरान मैने राजेश भाई को हमेशा हो रही लगातार असुविधा व तकलीफों व कठनाइयों से मोबाईल के द्वारा सूचित किया वाट्सअप से मैसेज किया लेकिन परिचित होने के बावजूद राजेश अग्निहोत्री नेे हमारी शिकायतो को न तो कोई  तवज्जों दी और न ही उन्हें दूर करने के लिए किसी भी प्रकार का दबाव उक्त ‘‘ओझा हालिड़े टूर एण्ड़ टेªवल्स’’ एजेंसी पर बनाया। जो सुविधाएँ बताकर हमसे पैसे लिये गए उनकी कतई पूर्ति नहीं हुई। साथ ही ओझा हालिडे टूर एण्ड़ टेªवल्स एजेंसी नेे भी हाथ खड़े कर दिये। अतः ‘‘ओझा हालिडे टूर एण्ड़ टेªवल्स’’ एजेंसी काठमांडू व ‘‘हालिडे पांइट टूर एण्ड़ टेªवल्स’’ भोपाल की कंपनी के साथ जाने के पहले दस बार सोच लेना उपयुक्त रहेगा। 
इंटरनेट पर कई प्रायवेट कम्पनियाँ है जिन्हे सर्च करके उचित कंपनी से बातचीत करना चाहिए। सबसे बड़ी सावधानी तो यह बरतनी चाहिए कि टूर कंपनी की पैकेज राशी व उनके द्वारा यात्रा में दी जाने वाली प्रत्येक सुविधा को लिखित में ले लेना आवश्यक है, ताकि पूरी यात्रा के दौरान उक्त कपंनी पर निर्धारित तय सुविधाएँ देने के लिए दबाव बनाया जा सकें। अकेले यात्रा करना कतई सुविधा जनक नहीं होगा। परिचित लोगो केे साथ ग्रुप में यात्रा करेगें तो सुविधा देने के लिए टूर कंपनी पर सामूहिक रूप से दबाव डाल सकेगें। (वैसे कंपनी के पम्पलेट में कई सुविधाओं का उल्लेख होता है) फिर भी लिखित में समस्त सुविधाओं का विस्तृत उल्लेख किया जाना अति आवश्यक है। कौन-कौन सी किस स्तर की जगहों पर ठहराया जायेगा। होेटल सुविधा रहेगी कि नहीं। प्रत्येक स्थान पर होटल किस केटेगरी की होगी। रात्रि विश्राम कितने और कहाँ-कहाँ कब से कब तक रहेंगे। पीने व नहाने के लिये कितना व कैसा पानी मिलेगा। गरम पानी मिलेगा या नहीं। खाने में क्या-क्या और उनकी क्वालिटी कैसी होगी? यात्रा के लिये बस एसी होगी या नॉन एसी। दो सीटर होगी या तीन सीटर। इत्यादि-इत्यादि। सुगम यात्रा के लिये कुछ सावधानियाँ आपको बरतना आवश्यक है। सर्वप्रथम अपने साथ मूल वोटर आइडी/पासपोर्ट का होना आवश्यक है। अन्यथा आपको एयरपोर्ट पर रोक दिया जायेगा। आक्सीजन के लिये कपूर की बट्टी साथ में रखें। आक्सीजन की कमी होने के कारण आक्सीजन सिलेंडर साथ में रखे यद्यपि वहां भी उपलब्ध हो जैसः-गरम कपड़े भी रखे। टार्च रखे। कुछ खराब न होने वाले खाने का समान जैसे जरूर अपने साथ रखे।
सबसे महत्वपूर्ण सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है, (जिस कारण हमें बहुत परेशानी हुई।) कि जब तक टूर एण्ड टेªवल्स कंपनी आपका वीजा न बना दे, तब तक यात्रा की तारीख निश्चित न करे व यात्रा प्रारंभ न करे। सामान्य रूप से टूर कपंनी पासपोर्ट व पैसे लेकर आप से कह देती है कि आपको निकलने के पूर्व या फिर बाद में दिल्ली में तत्पश्चात काठमांडू व अंत में तिब्बत सीमा पर वीजा पासपोर्ट देने का आश्वासन देते रहते है। यात्री ऐसे आश्वासनों पर विश्वास करके बगैर वीजा और पासपोर्ट के यात्रा प्रारंभ कर देते है। हमारा यह अनुभव रहा है कि समय पर वीजा न मिलने के कारण हमारे महत्वपूर्ण 6 दिन बरबाद हो गये। नेपाल पहुंचने पर हमे तुरंत वीजा नहीं मिला। इस कारण तीन दिन काठमांडू में अतिरिक्त रूकने के फलस्वरूप हमारे लौटने का पूर्व निधारित हवाई यात्रा व टेªन का रिजर्वेशन निरस्त कराकर पुनः नया रिजर्वेशन कराना पड़ा, जिसमें हमें बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। पासपोर्ट साथ में न होने के कारण हमारे एक साथी को दिल्ली पर ही रोक दिया गया। क्योंकि मूल वोटर आइड़ी उसके साथ में नहीं था। उसे दूसरे  दिन दूसरी फ्लाइट से काठमांडू पहुंचना पड़ा। इसके एवज में टूर कपंनी ने नुकसान की कोई भरपाई नहीं दी। 
अंतिम पड़ाव डार्चन है जहां तक ही बस जाती है। यहां से लगभग 3 कि.मी. दूर यमद्वार (तारबोचे) है, जहां से ही समस्त लोग कैलाश बाबा के दर्शन करते है। यमद्वार से पैदल या घोडे के द्वारा यात्रा दूरी 12 कि.मी. की दो दिन की (एक रात्रि विश्राम) डिरापुर की होती है। टूर कंपनी के माध्यम से किराए पर घोड़ा-पिट्टू लेने पर ज्यादा पैसे लेते है (लगभग 35 हजार)। इसलिये किराए पर घोड़ा टूर कपंनी से तय न करके यमद्वार (तार बोचे) पहुंचने के बाद स्वयं तय करंे। यहां पर आक्सीजन की कमी तुलनात्मक रूप से ज्यादा होती है। तापमान भी शून्य से नीचे माइनस 2 डिग्री तक होता है। इसके आगे लगभग 38 किलोमीटर की पैदल यात्रा और होती है। सामान्यतः प्रशासन इस पर आगे नहीं जाने देता है। बहुत जबरदस्ती करने पर स्वयं की रिस्क (लिखित घोषणा) पर आप आगे जा सकते है। कैलाश की सम्पूर्ण परिक्रमा 50 कि.मी. की है जिसे सामान्य पैदल यात्री तीन दिन में पूरा कर लेते है। यात्रा के दौरान टूर कंपनी की तरफ से कोई डाक्टर भी नहीं रहते है। बस दो तीन सेवकों के साथ एक गाइड रहता है। वही डॉक्टरी का कार्य करता है और वही सेवा का कार्य भी करता है। अन्त में सबसे महत्वपूर्ण अनुभव यह रहा कि प्रायवेट यात्रा में दिल्ली से लेकर काठमांडू तक काठमांडू (नेपाल) से लेकर तिब्बत बाडऱ्र (चीन) तक व तिब्बत सीमा से लेकर कैलाश मानसरोवर तक की सम्पूर्ण यात्रा पर किसी भी सरकार का कोई प्रभावी नियत्रंण दिखाई नहीं पड़ा। सिवाय तकनीकि रूप से तिब्बत सीमा पर चीन द्वारा माइग्रेशन के कार्य के। जबकि यह यात्रा उत्तराख्ंाड (कमाऊँ मंडल विकासनिगम) दिल्ली, सिक्किम सरकार, भारत व चीन सरकार के विदेश मंत्रालय तथा भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के सहयोग से आयोजित कराई जाती है। 
अंत में इस स्थान से जुड़़े विभिन्न मत और लोककथाएं केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं, जो है ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुन्दर हैं। 

सोमवार, 3 जून 2019

‘‘परिपक्व लोकतंत्र’’ में ‘‘परिपक्व’’ होते मतदाता का ‘‘परिपक्वता पूर्ण’’जनादेश!


विश्व के सबसे बड़े लोकतंात्रिक देश भारत में हुये 17 वंे आम चुनाव का जनादेश आपके सामने है। ऐतिहासिक जीत से लेकर ऐतिहासिक हार के परिणामों की व्याख्या विभिन्न लेखों व प्रतिक्रियाओं के माध्यम से आप मीडिया में अवश्य देखेगंे/पढे़गें। वैसे तो हर आम चुनाव परिणाम पिछले चुनाव परिणाम से कुछ न कुछ भिन्न स्थिति लिये होता है। लेकिन यह चुनाव परिणाम वास्तव मेें पिछले हुयेे आम चुनावों से बिल्कुल ही अलग कुछ मिथकों को तोड़ते हुये अलग है, जिसकी विस्तृत समीक्षा की जानी आवश्यक है। 
पिछले पांच वर्षो में उत्पन्न व बनी परिस्थतियों व लगभग ढाई महीने से हो रहे लगातार घमासान चुनावी प्रचार से उत्पन्न वातावरण को देखते हुये इस चुनाव में जिस तरह की लेन्ड स्लाईड़ विजय नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में मिली है, वह न केवल अधिकतर चुनावी सर्वेक्षणों को (सिवाए आज तक के एग्जिट पोल को छोड़कर) गलत सिद्ध करती हुई कुछ अचभिंत भी करती हैं, बल्कि पूर्व की जीत से हटकर कुछ अलग ही तरह की है। पहले भी आम चुनावों में जब तब ऐसे विशाल जीत के अचभिंत परिणाम आते रहे है। लेकिन उन परिणामों में व आज के परिणाम के बीच मूल अंतर यह है कि वर्तमान में किसी तरह की कोई तात्कालिक प्रभावी घटना घटित न होने के (सिवाए कुछ लोगो की नजर में बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक की घटना को छोड़कर) या कोई देशव्यापी लहर उत्पन्न न होने के बावजूद यह विराट जीत मोदी को मिली है। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मोदी के पक्ष में अंडर करेन्ट की बात अवश्य कही गई थी, लेकिन वह वास्तव में सुनामी में परिवर्तित हो गई। क्योंकि पूर्व के आम चुनावों में वर्ष 1977 में आपात्तकाल के फलस्वरूप और वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न प्रतिक्रिया स्वरूप चली सुनामी के कारण एकतरफा परिणाम आये थे। तो फिर क्या यह जनादेश मोदी के 5 वर्षो के कार्यो के प्रतिफल की प्रतिच्छाया है? परिणाम है? शायद ऐसा कहना पूर्ण रूप से उचित नहीं होगा, बल्कि कुछ हद तक कहीं अतिश्योक्ति पूर्ण कथन न मान लिया जाय। इसके विपरीत दूसरा कारण क्या यह माना जाय कि मतदाता के मन में मोदी के 5 साल के विकास को देखकर ऐसा भाव उत्पन्न हुआ कि 5 साल की अवधि में किये गये वादानुसार कार्य कर वांछित परिणाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है इसीलिए उसे दूसरा 5 साल का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि ज्यादा गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो इन सबसे बढ़कर एक महत्वपूर्ण आंकलन  यह भी हो सकता है कि ऐसे मतदातागण जो मोदी के समर्थन में नहीं थे, मोदी की तथाकथित वादाखिलाफी से नाराज थे, चाहे फिर वह बेरोजगारी का मुद्दा हो, नोटबंदी होे, जीएसटी से परेशानी होे या निम्न स्तर की जुमलेबाजी हो या सीमाओं की सुरक्षा का बार-बार उल्लघंन का मामला हो, इत्यादि अनेक मुद्दों को लेकर मोदी को वोट नहीं देने का विचार करते समय फौरिक विकल्प के तौर पर उनके सामने राहुल गांधी का चेहरा सामने आया और चूंकि उसकी मनस्थिति मोदी की तुलना में राहुल गांधी को स्वीकार न कर सकी, जिस कारण (सक्षम विकल्प के अभाव में, मजबूरी में, अनिच्छापूर्वक) उसे मोदी को वोट देना पड़ा और मोदी समर्थक वोटों के साथ जोड़ने पर भाजपा की यह ऐतिहासिक जीत हो गई। जो भी हो, मतदाताओं का यह एक परिपक्व पूर्ण निर्णय कहा जा सकता है। 
दूसरी परिपक्वता मतदाताओं ने तब दिखाई जब सत्ताधारी पार्टी को पुनः सत्ता में बनाए रखने के लिए उन्होंने 12 प्रमुख प्रदेशों में 50 प्रतिशत मतो से अधिक की जीत दी। मतदाताओं की परिपक्वता की चरम स्थिति तब सामने आई जब उन्हीं मतदाताओं ने जिन्होंने मात्र छः महीने पूर्व हुये मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों में भाजपा की सत्ता के खिलाफ स्थानीय मुद्दे के आधार पर वोट देकर भाजपा को हराया था, वे ही मतदाताओं ने लोकसभा  चुनाव में स्थानीय मुद्दो व उम्मीदवारांे से हटकर राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा को वोट देकर वे कांग्रेस व विपक्ष के खिलाफ हो गये। यह भी उनकी लोकतंत्र के प्रति बढ़ती परिपक्वता को ही दर्शाता है। 
भाजपा का शीर्षस्थ नेतृत्व खासकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पूर्णरूप से वास्तव में आज की राजनीति के चाणक्य सिद्ध हुये है। उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए कि भाजपा के विरोध में उगलते हुये जलते हुये चलने वाले कुछ प्रमुख ज्वलंत मुद्दों को चुनावी मैदानी मुद्दो से हटाकर, महत्वहीन कर, चुनाव को उन्होने मोदी विरूद्ध मोदी पर केन्द्रित कर दिया। क्योंकि राहुल गांधी का व्यक्तित्व तुलनात्मक रूप से मोदी के सामने दूर-दूर तक नहीं टिक पा रहा था। भाजपा  नेतृत्व प्रबंधक मोदी के व्यक्तित्व को जितना बड़ा बनाते गये, राहुल गांधी से लेकर अन्य समस्त विपक्षी नेता उनके सामने उतने ही बौने सिद्ध होते गये। मोदी के व्यक्तित्व की विराटता के सामने लगभग शून्य की स्थिति होने के कारण मोदी की यह विराट जीत संभव हो पायी। कुल 542 सीटों की तुलना में तो 303 सीटों की जीत बहुत ज्यादा नहीं होती है, क्योंकि पूर्व में कांग्रेस एक बार 514 में से (27 सीटों में बाद में हुये थे) 406 सीटे प्राप्त कर चुकी है। पूरे देश के संदर्भ में चुनावी परिणाम का आंकलन के लिये यदि हम एक ही लाठी से हाकेगें तो कहीं न कहीं हम गच्चा खा जायेगंे। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि पूरे देश में भाजपा का एक जैसा पूर्ण प्रसार नहीं हो पाया है, जैसा कि कभी कांग्रेस का था। हिन्दी भाषी राज्य, दक्षिण के राज्य और नार्थ ईस्ट के राज्य तीनों क्षेत्रों की स्थितियां, परिस्थतियां, भूगोल व राजनीति अलग-अलग हैं। यदि राजनीति को इन तीनों भागों में बांटकर भाजपा की उपलब्धि पर विचार करंे तो निश्चित रूप से यह मोदी की सूनामी ही कहलायेगी व 303 का आंकडा ज्यादा प्रभावी दिखेगा। 
अंत में जनता की परिपक्वता को आधार मानकर कहा जा सकता है कि हमारे देश की जनता भी अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के समान सीधे मत देने योग्य व सक्षम हो गई है, यह चुनाव परिणाम से सिद्ध होता हैं। इसीलिए यह परिणाम हमें इस बात पर गहनता से सोचने का विकल्प भी देता है कि (हमारे) देश में राष्ट्रपति प्रणाली अपनायी जाए तो क्या वह बेहतर सिद्ध होगी? सोशल मीडिया में भी यह टिप्पणी हुई है कि पहले एमपी के द्वारा पीएम चुने जाते थे और अब पीएम के द्वारा एमपी चुने गये है जो देश की लोकतंात्रिक प्रणाली के लिये स्वास्थवर्धक नहीं है। देश के सभी सम्माननीय मतदाताओं को मत का सही उपयोग कर स्पष्ट निर्णय लेने के लिए पुनः हार्दिक बधाईयाँ। लोकतंत्र और परिपक्व हो ताकि देश के विकास में रूकावटें कम होती जायें क्योंकि कमजोर लोकतंत्र ही देश के विकास की राह में रूकावट बनती है। इन्ही शुभकामनाओं के साथ, आगामी पांच साल की अग्रिम सफलता के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयां इस विशिष्ट टिप्पणी के साथ दे रहा हूँ कि उन्होने 10 प्रतिशत का आर्थिक आधार पर जो सवर्णो को आऱक्षण दिया है, उसकी तय आर्थिक सीमा को कम कर बीपीएल की तय सीमा के निश्चित  कर समस्त नागरिक को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जावें, जो न केवल आमजनों की लोकप्रिय मांग है, बल्कि देश के सर्वगीण सर्व वर्ग विकास के लिये पोषक तत्व भी सिद्ध होगी।

बुधवार, 15 मई 2019

‘‘ममता बनर्जी’’ का बयान ‘‘मैं मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानती’’ क्या संघ वाद पर कुठाराघात नहीं?

भारत देश कुल 29 राज्य व 7 केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर संघ (यूनियन) बना है। देश का एक प्रमुख पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल की तेजतर्राट मुख्यमंत्री दीदी का यह क्षोभ पैदा करने वाला बयान आया कि नरेन्द्र मोदी को मैं प्रधानमंत्री नहीं मानती हूँ। उनका यह बयान जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक नेताओं महबूबा मुफ्ती, फारूख अब्दुल्ला के तथाकथित अलगावादी कहेे जाने वाले बयानों के साथ अलगाव कार्य नेताओं से भी ज्यादा खतरनाक नहीं है? हम सब जानते है कि भारत में संघीय लोकतंात्रिक संसदीय व्यवस्था है। वर्ष 2014 में हुये पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में देश की जनता ने पहली बार पूर्ण बहुमत से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को विजय श्री दिलाई और संवैधानिक रूप से नरेन्द्र्र मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री चुने गये। 
देश की लोकतंात्रिक व्यवस्था के द्वारा चुने गये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति दूसरी चुनी हुई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उक्त कथन निश्चित रूप से पूर्णतः अराजक व संवैधानिक व्यवस्था की चूल को हिलाने वाला है। आश्चर्य तो इस बात का है उनके इस अमर्यादित व अलोकतांत्रिक कथन पर पूरे देश के मीडिया से लेकर राजनैतिक विश्लेषको, राजनैतिक नेताओं, पार्टियांे व विशाल बुद्धिजीवी वर्ग की जो त्वरित प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वैसी न होना भी एक निराशा लिये हुये आश्चर्य जनक दुखद पहलू है। यही देश की राजनीति का दुर्भाग्य भी है। 
अभी-अभी आया ममता का यह बयान न केवल वास्तव में बहुत ही नग्न है, बल्कि कल्पना से परे राजनीति के निम्नतर स्तर का है कि जहाँ उन्होंने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी बंगाल में आकर झूठ बोलते है और हाथ उठाते हुई वह यह कहती है कि ‘‘मन करता है मैं उन्हे लोकतंत्र का जमकर थप्पड़ मारू’’ मैं समझता हूँ कि अब वे दीदी कहलाने की अधिकारी भी नही रही है। इसके पूर्व वे पीएम के मुह पर सर्जिकल टेप व उनके होठो पर ब्यूकोप्लास चिपकाने की बात कह चुकी है। ताकि  मोदी झूठ न बोल सके। जय श्री राम के नारे पर उनकी घुड़की को भी सारा देश देख चुका है। अमित शाह ने आज जो ममता को लेकर बयान दिया है, वह शायद भविष्य की कार्यवाही की ओर इंगित करता है जब चुनाव के बाद ममता की सरकार को कहीं भंग न कर दिया जाये। ममता के द्वारा इस आम चुनाव में अभी तक जो बहुत ही ‘‘प्रिय ममतामयी वाणी’’ का उद्गार उदघोषित हो रहा है उसके लिये उक्त कार्यवाही ही शायद अंतिम विकल्प व सही जवाब होगा।
ममता का मोदी के चक्रवाद फानी के संबंध पर फोन पर बात न करने के बयान को लेकर जो पलटवार किया है कि मैं मोदी की नौकर नहीं हूँ राजनैतिक अशिष्टता की निम्नतर श्रेणी है। चक्रवाद फानी के संबंध में सहायता देने के संबंध में बुलाई मीटिंग में मुख्यमंत्री के बदले मुख्य सचिव को बुलाये जाने पर ममता ने यह तर्क देकर कि यह एक संघीय ढाचा हैं, आप मुख्यमंत्री के बिना मिटिंग कैसे कर सकते है, बयान देकर जो पलटवार किया, वह उनकी दोगली व दोहरी नीति को ही दर्शाता है। एक तरफ संघीय ढ़ाचे के होते हुये चुने हुये प्रधानमंत्री मोदी को न केवल एक्सपायरी प्रधानमंत्री कह रही है बल्कि उन्हे प्रधानमंत्री मानने से ही इंकार कर दिया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यसचिव को बुलाने पर संघीय ढाचे की दुहाई का तर्क दे रही है।  
वर्तमान राजनीति में खासकर चुनावी दौर में मतभेदों का मनभेदों की सीमा तक ले जाना भी सामान्य प्रक्रिया मानकर उसे सहन किया जा सकता है। लेकिन यदि इसे उस सीमा तक ले जाया जाये कि वह देश व संविधान के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दे, संवैधानिक व्यवस्था को आखंे दिखाने वाला हो, तो यह स्थिति किसी भी रूप में स्वीकार योग्य नहीं हो सकती हैं। एक समय एनडीए के सदस्य रही ‘‘प्रिय’’ भाजपा के नेतृत्व में बनी सरकार में मंत्री रही ममता दीदी का भाजपा व मोदी के विरूद्ध इस तरह की लगातार घृणा-स्पद लिये हुये बयान क्या उनकी निराशा हताशा को नहीं दिखाता है? खासकर उक्त बयान पर तो राजनीति से परे सार्वजनिक जीवन के समस्त पक्षों को उनके विरूद्ध कानूनी व कड़े राजनैतिक कदम उठाये जाने की आवश्यकता नहीं है क्या? वर्ष 2019 के आम चुनाव में सत्ता व विपक्ष के बीच सबसे ज्यादा खटास लिये हुये रण उत्त्तर-प्रदेश, बिहार से भी ज्यादा जो दिखाई दे रहा हैं वह पश्चित बंगाल ही है। इस तूनक मिजाजी मुख्यमंत्री ममता के बयान पर देश के उन तथाकथित लेखक बुद्धिजीवियों व अवाडऱ् वापसी गैंग के बयान नहीं आये जो पूर्व में देश में घटित हुई कई घटनाओं के चलते जैसा सेना शोर्य का चुनाव में उपयोग पर आये हुआ बयान हो या मीटू का मामला हो, या असहिष्णुता के मुद्दे पर राष्ट्रीय पुरस्कार पद्म-श्री लौटाने का मामला हो, इत्यादि-इत्यादि घटनाओं के संबंध में बयान देने में एक मिनट की भी देरी नहीं करते रहे है।  

शुक्रवार, 3 मई 2019

2019 के आम चुनाव के मुद्दे, क्या ‘‘स्थापित चुनावी मुद्दों से’’ हटकर हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् वर्ष 2019 में देश का यह 17 वाँ आम चुनाव हो रहा है। प्रारंभ में स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाली पार्टी (सत्य से परे) एक मात्र कांग्रेस ही मानी जाती रही। वर्ष 1952 के प्रथम आम चुनाव से वर्ष 1962 तक के हुये आम चुनावों में विकल्प की राजनीति के न रहते मुद्दों को विवादित किये बिना कांग्रेस ही चुनाव जीतती रही। वर्ष 1967 में आयाराम-गयाराम की राजनीति के चलते देश की राजनीति में विरोधी दलों के अस्तित्व को पहली बार एक सुदृढ़ विपक्ष के रूप में स्वीकार किया गया। वर्ष 1971 में पहली बार समय से पूर्व कराये गये मध्यावति चुनाव में इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओं का नारा देकर कांग्रेस को बड़ी सफलता दिलाई। वर्ष 1974 में जेपी आंदोलन के चलते (पूरे देश में इंदिरा गांधी के विरोध की लहर होने के कारण उत्पन्न)  परिस्थितियों से निपटने के लिये विरोधी दलों के दमन के उद्देश्य से, निरंकुश सत्ता व तानाशाही प्रवृत्ति के चलते इंदिरा गांधी ने देश में (पहली व आखरी बार) आपातकाल लागू करके लोकतंत्र की हृदय गति को अत्यंत बीमार बना कर लगभग मरणासन्न स्थिति में पहुँचा दिया था। इसलिए वर्ष 1977 का आम चुनाव आपातकाल के कारण स्थगित (सस्पेंड़ेड़) ‘‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूलभूत संवैधानिक अधिकार’’ के मुख्य मुद्दे को लेकर ‘‘लोकतंत्र बचाओं’’ का नारा देकर लड़ा गया। ऐसी विषम स्थिति में वर्ष 1977 के चुनाव में स्वतंत्र भारत के अब तक के इतिहास मंे कांग्रेस की इस बुरी तरह से ऐतिहासिक हार हुई कि जिसमें स्वयं इंदिरा गांधी अपनी परम्परागत रायबरेली सीट से राजनारायण से चुनाव हार गई। तब वर्ष 1977 में मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व में प्रथम बार जनता पार्टी की गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।  
वर्ष 1980 में हुये मध्यावति चुनाव में कम्युनिष्टों को छोड़कर बचे लगभग सभी विपक्षी दलों को मिलाकर बनी जनता पार्टी से तीन सालों में ही जनता का मोह भंग हो गया था जिस कारण वर्ष 1977 में सत्ता से बेदखल की गई इंदिरा गांधी की सत्ता में पुनः वापसी हो गई। फिर वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की दर्दनाक विश्वास-घाती हत्या के कारण उत्पन्न सहानुभूति लहर की सुनामी के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक का अधिकतम ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त हुआ। लेकिन यह बहुमत भी अगले आम चुनाव में धराशाई हो गया व वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता मोर्चा को बहुमत मिला। उसके बाद से लोकसभा के हुये मध्यावधि अथवा आम चुनाव सामान्यतया मुख्य रूप से एंटी इन्कंबेसी (सत्ता विरोधी लहर) के आधार पर होते रहे है। लेकिन इन सभी चुनावों में कभी भी व्यक्तिवाद (चेहरे) (एक मात्र) को मुख्य प्रमुखता नहीं मिली। यद्यपि भाजपा के एक बड़े चेहरा रहे अटल बिहारी बाजपेयी को पार्टी ने आगे कर ‘‘अबकी बारी अटल बिहारी’’ के नारों के साथ अटल जी के नाम पर वोट मांगे थे। बावजूद इसके लालकृष्ण आडवानी के व्यक्तित्व के कारण ‘‘पार्टी गौण नहीं हो पाई’’ और भाजपा ने संयुक्त रूप से ‘‘पार्टी व अटल जी’’ के नाम पर चुनाव लड़ा। 
पहली बार वर्ष 2014 के आम चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में उतारा तो बहुत ही कम समय में उन्होेने अपने आपको पार्टी का एक सर्वमान्य चेहरा बना कर जनता के बीच भी स्वयं को स्वीकृत लोकप्रिय चर्चित चेहरा स्थापित कर लिया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और ‘‘मोदी’’ अटलजी (बीमार) के रहते हुये भारतीय राजनीति में एक सशक्त व सर्वमान्य व्यक्तित्व वाला चेहरा बन कर उभर गये।   
विचारणीय यहाँ यह है कि वर्ष 2019 का चुनाव, पिछले चुनावों के संदर्भ में किस हद तक अलग पहचान लिये हुये है अथवा पिछले चुनावी मुद्दों का सम्मिश्रण मात्र है? अभी तक दो तिहाई से अधिक लोकसभा सीटों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। तब राजनैतिक पंडितो के बीच यह गहन चर्चा का विषय बन रहा है कि इस चुनाव में प्रमुख मुद्दे क्या है? व परिणाम क्या आयेंगे? क्या मोदी की फिर पहले से ज्यादा ऐतिहासिक जीत होगी या विरोधी दलों की सरकार बन जायेगी। विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा किये गये इन चुनावी विश्लेषणों में जो एक बड़ी बात उभर कर सामने आ रही हैं वह यह कि भाजपा इस आम चुनाव को मुद्दांे के बजाए पूर्ण रूप से नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व पर केन्द्रित करके चुनाव लड़ने में सफल होती दिख रही है। जबकि एक ओर कांग्रेस अपने नेता राहुल गांधी को केन्द्रित कर जनता के बीच जनता के व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करने में असफल हो रही है। लेकिन कांग्रेस वहीं दूसरी ओर वह ‘‘न्याय’’ व बेरोजगारी सहित कुछ ज्वलंत मुद्दों को एक हद तक जनता के बीच ले जाने में सफल होती सी लग रही है। 
फिर भी एक बात स्पष्ट है, ऐसे सामान्य जन भी जो मोदी के पिछले किये गये चुनावी वायदों की पूर्ति से संतुष्ट नहीं हो पा रहे है, वे भी मोदी के प्रशंसक न होने के बावजूद, सामान्य चर्चा में  यही कहते हुअे दिख रहे हैं कि वोट तो मोदी को ही देना हैं। जब वे कुछ प्रमुख मुद्दों सहित स्थानीय मुद्दों व उम्मीदवारों के गुण-दोष के आधार पर मोदी को वोट न देने की जैसे ही सोचते है उनके सामने राहुल गांधी की ‘‘योग्यता’’ का (तुलनात्मक रूप में) चेहरा आ जाता है, जिस कारण अनिच्छा से ही सही, योग्य विकल्प के अभाव में, मजबूरी में ‘‘वे’’ मोदी को वोट देने की बात कहने लगते हैं। अतः भाजपा को इस बात के लिये अवश्य बधाई दी जानी चाहिए कि उसने चुनाव को मुद्दों से हटाकर ‘‘मोदी’’ विरूद्ध समस्त विपक्षियों के बीच कर दिया है, जैसा कि एक जमाने में इंदिरा गांधी विरूद्ध समस्त विपक्ष था। मोदी समर्थक निश्चित रूप से राष्ट्रवाद एवं संस्कृतिवाद के मुद्दों पर मोदी को लौहपुरूष के रूप में पसंद कर रहे है। चुनावी राजनीति की दृष्टि से यह चुनाव जातिगत, छद्म धर्म निरपेक्षता, कट्टरवाद व धार्मिक उन्माद में ही जकड़ा हुआ है। लेकिन ऐसी परिस्थिति विशेष में कुछ अपवादों को छोड़कर देश का आम नागरिक सामान्य रूप से यदि मोदी का सशक्त विकल्प न होने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए वोट करते है, तो निश्चित रूप से मोदी की लहर सुनामी परिलक्षित होकर भाजपा 400 (+एनडीए) से अधिक सीटे पार कर जायेगी। तब यह चुनाव इस बात की पहली बार तासीद करेगा कि सत्ता विरोधी स्वर के बदले केन्द्रीय स्तर पर प्रो. इन्कम्बैसी लहर, है जो इस चुनाव को अन्य समस्त आम चुनावों से हटकर अलग स्थान में रखेगी। अन्यथा राष्ट्रीय मुद्दों को महत्व न देते हुये स्थानीय आधार पर जातिवाद, धार्मिक कट्टरवाद, असहिष्णुता, साम्प्रदायिकता आदि मुद्दे के सहित उम्मीदवारों की गुणवक्ता को प्राथमिकता व महत्व देते हुये यदि जनता ने वोट दिया तो संभवतः ऐसे परिणाम भाजपा को 200-225 पर लाकर सीमित कर देगें। वास्तव में यह चुनाव पार्टियों की विचार धाराओं से हटकर बाहर जाकर मोदी और मोदी विरोध पर केन्द्रित हो गया है। भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या यह सही है, यह भी एक बड़ा प्रश्न है? हमारे लोकतंात्रिक प्रणाली में भारतीय संविधान में प्रधानमंत्री का चुनाव चुने गयेे संासद ही करते है। लेकिन वर्तमान चुनाव इस संवैधानिक व्यवस्था को नकारता हुआ अमेरिकन राष्ट्रपति के चुनाव के समान मोदी के नाम पर  पक्ष व विपक्ष के बीच हो रहा है। यदि भारतीय जनता इस रूप में परिपक्व हो चुकी है, तब क्या हमारे देश को भी अमेरिकन राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली नहीं अपना लेनी चाहिए? ठीक उसी प्रकार जैसा कि अमेरिका में जहां राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता है। उस तरह शायद उम्मीदवार की योग्यता से बेहतर न्याय करके हम देश हित में ज्यादा उपयुक्त व्यक्तित्व चुन सकेंगे। 

रविवार, 31 मार्च 2019

बिगड़े नेताओं के ‘‘बिगडे़ बोल’’-‘‘विवादित बोल’’! फायदा-नुकसान कितना!

भारतीय राजनीति में हमेशा से ही ‘‘बयानवीर’’ मीडिया में सुर्खिया पाते रहे है। विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के कुछ नेतागण अपने बेवाक बयानों के माध्यम से सुर्खियाँ बटोरनें के उदे्श्य से ऐसे बयान देते रहते है, जिसके परिणाम स्वरूप उनकी छाप एक चर्चित चेहरे की होकर वे माने जाने बयानवीर लगते है। ऐसे बयानों को मीडिया विवादित बयानों की संज्ञा देकर महिमा-मड़ित करना अपना संवैधानिक, वैधानिक व नैतिक कर्तव्य बोध महसूस करते है। चुनावी मौसम में ही इस तरह के ‘‘विवादित’’ बयानों की बाढ़ सी आ जाती है।   
सर्वप्रथम मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि नेताओं के ऐसे चर्चित बयानों को मीडिया विवादित बयान क्यों कहता है। बयान या तो सत्य होता है या असत्य। या आज की हमारीे राजनैतिक परिवेश को देखते हुये इन दोनों के बीच  इसकी एक और श्रेणी हो सकती है, अर्धसत्य! ठीक उसी प्रकार जैसे लाल व हरे सिंग्लन के बीच पीला सिंग्नल। अधिकांश स्थितियों मंे बयानवीर बयानों का खंडन नहीं करते है। अत्यालोचना व फजीहत होने पर ही अपनी सुरक्षा में स्पष्टीकरण अधिकतम-‘‘मेरे कहने का यह मतलब नहीं था’’ या ‘‘मेरे कथन का गलत अर्थ निकाला गया है, कथन कर देते है। इन बयानों को सत्य, सत्य से दूर, सत्य से परे, झूठे, तथ्यहीन, तथ्यों के बिलकुल विपरीत, अश्लील, अमर्यादित, तीच्छण, चुभने वाले, अंधविश्वासी, अंधभक्त इत्यादि-इत्यादि से श्रंगारित किया जा सकता है। वे सब श्रंग्रार, संज्ञाएँ या उपमाएँ बयान की प्रकृति को देखते हुये दी जा सकती है। लेकिन ये बयान ‘विवादित’ कैसे प्रश्न यह है? 
विवादित शब्द का शाब्दिक अर्थ तथ्य के सत्य या झूठ होने पर प्रश्न वाचक चिन्ह लगाना या उँगली उठाना या संदेह करना है। लेकिन आप जानते है, इस समय जितने भी चर्चित विवादित बयानों की आंधी आई हुई है, परस्पर विरोधी पक्ष के लोग उक्त बयानों के तथ्यों को विवादित न मानकर उसे। सही ठहराते है, जैसा कि बयानवीर भी उसे सही मानते है। प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षी, बयानवीर व्यक्ति व उस की राजनैतिक पार्टी पर पलटवार कर जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का प्रयास लगातार करते रहते है, जो मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज बनती है।ं मतलब स्पष्ट है! राजनैतिक दलांे के नेतागण परस्पर एक दूसरो के विवादित बयानांे को स्वयं विवादित न मानकर उससे राजनीति में कितना फायदा मिल सकता है, उसे उठाने का प्रयास प्रत्यारोपित बयानांे की झड़ी लगाकर की जाती है। 
बयान से संबंधित एक ओर बात जो मेरे समझ से परे है कि बयानवीरांे के विवादित बयान की प्रतिक्रिया में जब उनकी विरोधी पार्टियो द्वारा बयानवीरों पर हमला किया जाता है तब उनका मुख्य तर्क हमेशा यही होता है की वोट बैंक की राजनीति के चलते इस तरह के उक्त बयान आये हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि है जब प्रतिक्रिया में आप उन बयानों के बाबत स्वयं ही कहते है कि वे देेश हित में नहीं है, देश के विरूद्ध है, समाज के हित में नहीं, देश को तोड़ने वाले है, सांप्रदायिकता एकता को नुकसान पहंुचाने वाले है, शांति भंग करने वाले है, धार्मिक उन्माद पैदा करने वाले है। तब उक्त विवादित बयानवीरों की पार्टियों को राजनैतिक फायदा कैसे मिल सकता है, जैसा प्रत्यारोप सामान्यतया लगाया जाता है, प्रश्न यह है? यदि वास्तव में ऐसा होता है, तो इसका यही मतलब  निकता है, बयान देने वालों से खतरनाक वे वोटर है, जो इन बयानों के आधार पर बयानवीरों को वोट देते है जैसा की विपक्षी आरोप लगा रहे हैं।   
एक उदाहरण के द्वारा मैं अपनी बात को समाप्त करना चाहूगाँ। इडिया ओवर सीज कांग्रेस प्रमुख सैम पित्रोदा जो काग्रेस के गांधी परिवार के पारिवारिक सदस्य समान है, ने अपने हाल के ही बयान में न केवल एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाएँ बल्कि मुम्बई बम कांड के हमले में पाकिस्तान को एक देश के रूप में दोष मुक्त तक बता दिया। ऐसे आत्मघाती बयान पर अमित शाह के द्वारा प्रेस वार्ता बुलाकर यह कथन करना कि कांग्रेस हर बार चुनाव आते ही वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति करती है कितनी तथ्यात्मक रूप से सही है, बड़ा प्रश्न यह है? उनका यह कहना तो बिलकुल समायोचित है कि सेना के शहीदो का अपमान हुआ है व आंतकियों का मनोबल बड़ा है। कांग्रेस शहीदांे के खून पर राजनीति करती है, क्या वोट बैंक की राजनीति शहीदों के उपर हो सकती है। पित्रोदा को इस बयान पर देश से माँफी मागना चाहिए। मतलब साफ है। पित्रोदा व कांग्रेस के बयान किसी भी आम सोच वाले नागरिक के गले नहीं उतर सकते है। बयानों के द्वारा राजनीतिकरण के चक्कर में जाने अनजाने में वे देश व सेना पर ही प्रश्न वाचक चिन्ह लगा देते है। इससे कांग्रेस का निश्चित रूप से नुकसान ही होगा। जब बयान से फायदा नहीं होता है तो तब फिर यह प्रत्यारोप कैसे लगाया जा सकता है कि ये विवादित बयान वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति के तहत है। देश में पूर्व में भी जितने विवादित बयान आये, उनमें से अधिकांश बयान आत्मधाती ही सिद्ध हुये हैं। उससे बयानकर्ता या उसकी पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला। यदि यह मान भी लिया जाये कि उक्त बयान से गैर समझदार व अंधभक्त लोग कांग्रेस केा वोट दे दंेगे, तो इसके विपरीत उससे ज्यादा समझदार व कई संभ्रात कांग्रेसी भी (उक्त बयान से अपने को अलग कर) कांग्रेस से दूर अवश्य भागेगें।
इन विवादित बयानों की एक ओर बड़ी विशिष्टता व खासियत यह भी है कि जब ये वास्तव में विवाद का रूप लेकर हानि पहँुचाने की स्थिति में आ जाते है, तब समस्त राजनैतिक पार्टियाँं खासकर (भाजपा व कांग्रेस) ऐसे बयानों से अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेती है कि वे बयान बयानवीर के व्यक्तिगत विचार है, पार्टी का उससे कोई लेना देना नहीं है (भले ही बयान कर्ता पार्टी की नीति निर्धारण कार्यसमिति के सदस्य क्यों न रहे हों)। पार्टी सामान्यतः ऐसे बयानवीरों के खिलाफ न तो कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही करती है और न ही भविष्य में ऐसा कदम न उठाने हेतु उसे कोई चेतावनी देती है। उन्हे बयान वापिस लेने या खेद व्यक्त करने के लिए भी नहीं कहती है। पार्टियों का यह स्टैंण्ड़ पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने/दिखाने के लिये किया जाता है, भले ही इससे देश के लोकतंत्र का स्तर गिर रहा है क्षरण हो रहा है। यही तो हमारे देश की लोकतंत्र की खूबी है?
कुछ चुनिंदा बयान व उनके प्रभाव व असर को मैं अवश्य यहाँ रेखांकित करना चाहूँगा। गुजरात चुनाव 2007 में सोनिया गांधी ने कहा था ‘मौत का सौदागर’। लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 में सत्ता के लिए ‘जहर की खेती’ करती है, भाजपा-सोनिया गांधी। यकीन मानिए 'चायवाला' पीएम नहीं बनेगा-मणिशंकर अय्यर। गुजरात चुनाव 2017 'नीच किस्म' का आदमी-मणिशंक्कर अय्यर। 'खून की दलाली'-राहुल गांधी। सेनाप्रमुख को ‘सड़क का गुड़ा’ कहना-संदीप दीक्षित। म.प्र. चुनाव 2018 'माई का लाल'-शिवराज सिंह चौहान। 'हनुमान दलित थे'-योगी आदित्यनाथ, राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2018।  2019 पुलवामा हमले पर 'वोट के लिए जवान मार दिये' गये-राम गोपाल यादव, पुलवामा हमला 'मैंच फिक्सिंग'-बी.के. हरिप्रसाद इत्यादि-इत्यादि। 

बुधवार, 27 मार्च 2019

‘‘पर्रिकर’’ ‘‘वाद’’ को ढूँढता मेरा देश। ‘व’’ ‘‘गांधीवाद’’ से चलकर ‘‘पर्रिकरवाद’’ तक पहुंचने का सुखद अहसास!

देश के प्रथम आई.आईटी शिक्षा प्राप्त (गोवा के) मुख्यमंत्री एवं पूर्व रक्षामंत्री डॉ. मनोहर गोपाल कृष्ण प्रभु पर्रिकर लम्बी बीमारी से अदम्य आत्मबल के साथ लड़ते हुये अब इस दुनिया में नहीं रहे और ‘‘स्वर्गवासी’’ हो गये। याद कीजिये! विधानसभा में बजट प्रस्तुत करते समय उनका वह चेहरा, जो चिकित्सकीय उपकरणों से ढ़का हुआ था। एक उदघाटन समारोह में उनका जनता से पूछते हुये ऊरी फिल्म का डायलॉग ‘‘हाउ इज द जोश’’ उनके कड़े परिश्रम करने की जीवटता को दर्शा रहा था। जीवन के अंतिम क्षणों में जब व्यक्ति को स्वतः मृत्यु का आभास होने लगता है, तब आज के युग में ऐसे बिरले अदम्य साहसी कम ही दृष्टिगोचर होते हैं। 
‘परि’ ग्राम के रहने के कारण उनका उपनाम ‘‘पर्रिकर’’ पड़ा। वे लगभग एक साल से जीवन को अंत करने वाली एडवांस्ट स्टेज की पैंक्रियाटिक कैंसर की लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होकर जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे, जिसका यह परिणाम होना ही था। लेकिन आज मृत्यु से कहीं अधिक सर्वत्र उनकी चर्चा न केवल स्वयं की ईमानदारी की, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुंलद करने की हिम्मत दिखाने वाला, नैतिकता, निष्ठा, बौद्धिक कौशल और एक वास्तविक गांधीवादी साधारण आम आदमी के रूप में उनकी पहचान को लेकर हो रही है। 
बात जब हम गांधीवाद की करते है, तो निश्चित रूप से सर्वमान्य स्वीकृत तथ्य अंहिसा के संदेश के साथ-साथ सदाचार और एक बेहद सामान्य साधारण जीवन दृष्टि ही गांधीवाद के  अंर्तनिहित मुख्य तत्व हैं। इसके उलट 21वीं सदी के इस भौतिक युग में पर्रिकर जी ने गांधीवाद को एकदम नया आयाम दिया, जिसे मैने ‘‘पर्रिकरवाद’’ इसलिये कहा, क्योंकि तत्समय की परिस्थिति में यद्यपि गांधीवाद को सम्मान देने वाले हजारों लोग थे, परन्तु मेरी सोच का एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण गांधीवाद का तुलनात्मक रूप से ज्यादा उदारवादी होना था। यदि दोनांे वादों के आम व्यक्ति की तुलना की जाएं, तो पाएँगें गांधी जी के आम व्यक्ति का चेहरा ‘‘काव्यात्मक’’ भाव लिये हुये था, जबकि स्वयं पर्रिकर जी का आम चेहरा एक सफाचट निर्विकार भाव के ग्रामीण परिवेश के साधारण इंसान का रहा। यद्यपि पर्रिकर जी शहरवासी हो गये थे, उसके बावजूद ग्रामीण परिवेश की निश्छलता उन्हांेने छोड़ी नहीं थी। उनकी सादगी की तुलना हम पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री इन्द्रजीत गुप्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं या 70 के दशक के आरएसएस प्रचारकों से कर सकते है। 
वर्तमान राजनीति में सत्ता को वैश्या की उपमा (संज्ञा) दी जाती है। इसीलिये सत्ता का भोग करने वाला कोई भी व्यक्ति सत्ता के चारित्रिक दोष व दुःप्रभाव के कारण अपने जीवन के अन्य चरित्रों को अच्छुण्ण नहीं रख पाता है। परन्तु ऐसी स्थिति में भी मनोहर पर्रिकर ने अपने निश्छल चरित्र व आत्मबल के बल पर सम्पूर्ण पूर्ण निष्ठा के साथ राजनैतिक जीवन को जिस प्रकार की पूर्णतः गांधीवादी सामान्य सरलता के बीच जिया, तथा आज की आवश्यक राजनैतिक पहचान की परछाई नहीं पड़ने दी वह सब प्रशंसनीय है। उनके व्यक्तित्व की एक ओर विशेषता विरोधियों को अपना बनाकर साथ में लेकर चलने की क्षमता भी रही है। ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ का ईसाईयों से विरोध का एक आम भाव परसेपशन जगजाहिर है। पर्रिकर के संघ का एक स्वयंसेवक होने के बावजूद उन्होंने बड़ी ईसाई जनसंख्या (केथोलिक) का विश्वास जीत कर चार बार गोवा के मुख्यमंत्री बने, जो उनकी कुशल रणनीति, विरोधियों को भाँपने के साथ-साथ उनकी हृदय की विशालता की गहराई को भी दर्शाता है। वे जाति व धर्म से ऊपर उठकर सोशल इंजीनियरिग के सूत्रधार रहे। ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ नारा भले ही अभी मोदी ने दिया हो, लेकिन इसके असली पुरोधा पर्रिकर ही थे। इसीलिए भौतिक रूप से जीवन समाप्त हो जाने के बाद भी, वे देश की तेजी से प्रदूिषत हो रही राजनीति को शुद्ध करने के कार्यशील साधन के रूप में हमेशा याद किये जायेगें।
गांधीवादी युग में गांधीवाद को अपनाना ज्यादा सहज व सरल था। उसकी तुलना में वर्तमान कलियुग में पर्रिकरवाद के आदर्शो को अपनाना अत्यधिक कठिन जीवन यात्रा है। इसीलिए मैंने गांधीवाद से आगे बढ़कर उसे पर्रिकरवाद कहा है। इसे अतिश्योक्ति न मानंे। मुझे वह क्षण ख्याल आ रहा है, जब नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था, तभी पर्रिकर जी का नाम भी अध्यक्ष पद के लिये उभरा था। लेकिन क्षेत्रफल की दृष्टि से गोवा के देश के सबसे छोटे प्रदेश होने के कारण तथा शायद गडकरी के संघ प्रमुख मोहन भागवत से धनिष्ठ व्यक्तिगत रिश्ते होने के कारण पर्रिकर जी अध्यक्ष नहीं बन पाये। अन्यथा आज भाजपा की संस्कृति व कार्य प्रकृति कुछ और ही होती।
गांधी राष्ट्र के राष्ट्रपिता थे, जबकि पर्रिकर राष्ट्र के सबसे छोटे राज्य गोवा के मुख्यमंत्री थे। तत्समय (गांधी युग) सत्ताधीशों में जन सेवा का भाव ज्यादा हुआ करता था। जबकि आज के राजनैतिज्ञों का ‘‘सेवा’’ व ‘सेवाभाव’ से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है बल्कि आज राजनीति येन केन प्रकारेण सत्ता सुख पाने मात्र का हथियार भर बन कर रह गई है। इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में पर्रिकरवाद का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। 
देश के जिन नेताओं, पार्टियों व सार्वजनिक जीवन में महत्व रखने वाले गणमान्य नागरिकों ने पर्रिकर जी को श्रंृद्धाजंली दी है, यदि वे सब पर्रिकरवाद को 50 प्रतिशत भी अपना सके तो, देश की अधिकांश समस्याओं का समाधान यूँ ही संभव है, क्यांेकि ईमानदारी व नैतिकता का लगातार ह्रास ही हमारे देश की प्रमुख समस्याओं की मूल जड़ है। पर्रिकर जी के प्रति उन सबकी यही सच्ची श्रंृंद्धाजंली होगी। इसीलिए मेरा अनुरोध है, श्रृंद्धाजंली देते समय वे सब लोग इस तथ्य पर अवश्य विचार करें कि वे उस योग्य है अथवा नहीं, और यदि नहीं, तो आज से ही पर्रिकरवाद को अपनाने के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर अपेक्षित चरित्र अपनाना प्रारंभ करंे, ताकि हमारा देश तीव्रतम गति से वास्तविक रामराज्य की ओर अग्रेसित हो सकंे। यानी मैं पर्रिकर जी को शब्दों से नहीं कर्तव्यों से श्रृंदाजंलि देना चाहूगाँ। मैंने स्वतः अब तक उनकी सार्वजनिक राजनैतिक ईमानदारी को अपने जीवन में लागू किया है आज से ही आगे एक साधारण सामान्य सादगी पूर्ण जीवन-चर्या में अपने जीवन को ढ़ालने का प्रयास करूगाँ। 
पुनश्चः आज जब जगह-जगह ‘‘मैं भी चौकीदार हूँ’’ व ‘‘चौकीदार चोर है’’ की मुहिम चलाई जा रही है, तब आज के समय की वास्तविक आवश्यकता हैं ‘‘मैं हूँ पर्रिकर अनुयायी’’। देश के स्वस्थ स्वास्थ्य के लिये ज्यादा से ज्यादा इस मुहिम को चलाया जाना अति आवश्यक हैं। 

बुधवार, 13 मार्च 2019

आखिर देश को क्या हो गया है।

‘‘पुलवामा’’ में हुई बड़ी वीभत्स आंतकी घटना में 40 सैनिकों के शहीद हो जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में घुस कर बालाकोट में किये गये हवाई हमलों के द्वारा ‘‘जैश-ए-मोहम्मद’’के आंतकवादी कैम्प (प्रशिक्षण शिविर) को नष्ट करने के बाद सम्पूर्ण देश ने एक जुट होकर सेना व सरकार को बधाई दी थी। कांग्रेस सहित समस्त राजनैतिक पार्टियों ने सेना के पराक्रम व अदम्य साहस की प्रशंसा कर बधाईयाँ दी थी। एक स्वर से यह कहा गया कि हर हाल में पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के लिये वे सेना, सरकार व देश के साथ खडे़ हुये हैं। कांग्रेस ने बधाई देने में यद्यपि थोड़ी सी कंजूसी अवश्य बरती। उन्होंने सेना को तो खुलकर बधाई दी, नमन किया, लेकिन सरकार के प्रति उतनी उदारता नहीं बरती (शायद चुनाव सिर पर है इसलिये)। यद्यपि संकट की इस घड़ी में कांग्रेस ने सरकार के साथ खड़ा होनें का वायदा अवश्य किया (जो बाद में मात्र ‘नाटक’ ही सिद्ध हुआ)। लेकिन कांग्रेस ने वैसी ही उदारता नहीं दिखाई, जैसी वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के परिणाम स्वरूप बंग्लादेश बनने के समय अटल जी ने इंदिरा जी के प्रति दिखाई थी। तब भी सेना लड़ी थी और आज भी सेना ही ने बहादूरी दिखाई। यद्यपि दोनो वक्त आक्रमण (सेना भेजने) का निर्णय राजनैतिक नेतृत्व ने ही लिया था। इसलिये आज भी राजनैतिक नेतृत्व को वर्ष 1971 के समान बधाई दी जानी चाहिए थी। लेकिन सरकार के नेतृत्व को बधाई देने में कांग्रेस से यह एक चुक छोटी सी हुई। तथापि वह राजनैतिक दृष्टि से उठाया गया कदम कहा जाकर, उसे क्षम्य माना जा सकता है। तत्पश्चात कांग्रेस लगातार बड़ी-बड़ी चूक करती जा रही है, जबसे कांग्रेस के नेताओं में बालाकोट हवाई हमले की साक्ष्य मांगने की होड़ सी मची हुई है। धीरे-धीरे समस्त प्रमुख विपक्षी दल भी इसमें सुर से सुर मिलाते जा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद ने पुलवामा व बालाकोट घटना को नरेन्द्र मोदी व इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग ही करार दे दिया। 
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि घटना के तत्काल बाद कांग्रेस ने किस बात के लिये सेना की प्रशंसा की थी व बधाई दी थी। साफ झलकता है, तत्समय आपने बालाकोट  हवाई हमले में एयर फोर्स के साहसी विंग कमांडर अभिनंदन के द्वारा मिग 21 से पाकिस्तान के एफ 16 को मार गिराये जाने के साथ-साथ बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आंतकी बेस को समाप्त करने पर सेना के अदम्य साहस को सराहा था। यदि ऐसा नहीं था, तो उसे नकारे अथवा बधाई का कारण  देश को बताएँ। दो दिन बाद ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष ने रूख ही बदल दिया और वे उक्त हवाई हमले तथा उसमें हुए संहारण के न केवल साक्ष्य मांगने लगे, बल्कि घटना पर ही शक की उंगली उठाने लगे है। वे अपने बयानों से भारत में न केवल बयानवीर बने अपितु पाकिस्तानी मीडिया के जाने अनजाने हीरो बन गए। क्या यही देशभक्ति है? इसका उल्लेख मैनें पिछले हफ्ते लिखे अपने लेख में किया था, जिसकी कमी आज भी हम महसूस कर रहे हैं। 
अब सत्ताधारी व विपक्ष दोनांे पक्ष ‘‘सेना पर राजनीति करने के आरोप-प्रत्यारोप’’ परस्पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक राजनीति करने की बात है, बेशक दोनों ही पक्ष पूरी क्षमता, ताकत व निर्लजता के साथ राजनीति कर रहे हैं। घटना का राजनीतिकरण करने में सबसे पहला कदम भाजपा की तरफ से ही उठाया गया हैं। जब कर्नाटक के पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने साफ शब्दो में कहा कि हवाई हमले से पार्टी को 25 में से 22 सीटों पर फायदा होगा। तत्पश्चात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 250 से अधिक आतंकवादी मारे गये, (तब तक सेना व सरकार ने ऐसा कोई खुलासा नहीं किया था)। मोदी जी रैलियों में स्वयं कह रहे हैं कि पाताल से आंतकवादियों को खोद निकालेगें। लेकिन कब और कितने शहीद हो जाने के बाद? पता नहीं? न बताऐगें? क्योंकि राजनैतिक पार्टियों के सदस्य तो शहीदों में बिरले ही मिलेगें। अब मोदी जी भारत के बजाय ‘‘विजयी भारत’’ की जय के नारे लगवा रहे हैं। अभी कौन सी विजय मिल गई, जिस कारण विजयी भारत के नारे? यदि बालाकोट विजय है, तो उसके तत्काल बाद से लगातार हो रही सीमापार उल्लघंन एवं आंतकी घटनाएं व उनमें हुये शहीदांे व नागरिकों की मृत्यु को क्या कहना चाहेगें? यही सब घटना का विशुद्ध राजनीतिकरण है।    
सेना के तीनो अंगों के द्वारा संयुक्त प्रेसवार्ता करके एयर स्ट्राइक कार्यवाही की विस्तृत आवश्यक जानकारी दे दी गई। तत्पश्चात एयर चीफ मार्शल ने भी एयर स्ट्राइक की जानकारी दे दी। तब साक्ष्य मांगते रहने का क्या औचित्य रह जाता है, विशेषकर उस स्थिति में, जब कांग्रेस सेना के र्शोर्य-पराक्रम को लगातार स्वीकार करती आ रही है। ये ही तो राजनीति है। साफ है, बयानों के द्वारा सेना पर विश्वास परन्तु कार्यरूप में अविश्वास जता रहे हैं। यदि एयर स्ट्राईक की कार्यवाही की जानकारी पत्रकार वार्ता करके सरकार देती तो, आप शायद उसे स्वीकार ही नहीं करते। प्रश्नवाचक चिन्ह सहित प्रश्नों की बाैंछार लगा देते। यानी यहाँ पर तो सेना पर विश्वास जताने के बावजूद सेना (जिसने पत्रकार वार्ता में समस्त जानकारी आवश्यक साक्ष्य सहित प्रस्तुत की थी) के कथनों को ही नहीं माना जा रहा है।
फिर भी सेना पर राजनीति करने के तरीको में भाजपा व विपक्षी पार्टियों में जमीन-आसमान का अंतर हैं। सेना पर भाजपा ने आसमानी राजनीति अर्थात् ऊंचाई की राजनीति की हैं। क्योंकि  सेना का चुनावी दृष्टि से फायदा लेने के लिये ‘‘मुद्दे’’ का राजनीतिकरण करने के बावजूद, देश, देश हित और राष्ट्रवाद के साथ वह मजबूती से जनता के सामने खड़ी हुई दिख रही है। दूसरी ओर साक्ष्य मांगने हेतु जिस तरह की अमर्यादित भाषा कांग्रेस प्रयोग कर रही है, वह उनके देशभक्त भारतीय नागरिक होने पर ही संदेह पैदा करके स्वयं ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं। क्योंकि उनके बयानों से विश्व में भारत का पक्ष कमजोर होते जाता है, तथा पाकिस्तान उन बयानों को अपने मीडिया में सुखर््िाया बनाकर हमारी सेना व सरकार के दावे की विश्व पटल में हवा निकाल रहा है। जिस प्रकार रक्षा राज्यमंत्री वी.के.सिंह ने बी.एस.येदियुरप्पा के बयान से असहमति दिखाई है। ठीक वैसे ही कांग्रेस पार्टी के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के बयान से अवश्य सीख लेनी चाहिये, जहां उन्होंने कहा,‘‘एक मरे या 100 मरें यह साफ संदेश जोरदार तरीके से गया है कि भारत निर्दोष जवानों और नागरिकों की शहादत बेकार नहीं जाने देगा।’’ 
बी.एस.येदियुरप्पा से 22 सीटों के जीतने के बयान पर अवश्य प्रश्न किया जाना चाहिये। अमित शाह से इस बात पर प्रश्न किया जा सकता है कि सेना व सरकार द्वारा कोई आकड़ा नहीं देने के बावजूद, 250 संख्या की जानकारी उन्हें कहां से मिल गई। चुनावी रैलियों में शहीदों की फोटांे के उपयोग पर भी प्रश्न किया जा सकता है। खुफिया एजेंसी की विफलता पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है। ‘‘उरी’’ के बाद ‘‘पुलवामा’’ क्यों व आगे क्या? इस विफलता पर भी प्रश्न उठाये जाने चाहिये। देशप्रेम व निष्ठा पर आंच आने दिए बिना कांग्रेस, भाजपा को इन सब प्रश्नों के साथ कटघरे में खड़ा करके बेहतर सफल राजनीति कर सकती थी। परन्तु उक्त आंतकी घटना को ‘‘दुर्घटना’’ कहना, हवाई हमलों को ‘‘जंगल में ब्लास्ट कर’’, पेड़ व पहाडों से बदला’’ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के हवाले से घटना के ‘‘वजूद’’ पर ही शक जाहिर करना, यह सब निश्चित रूप से देश हितेषी व परिपक्व राजनीति का घोतक नहीं है। क्योंकि इसमें नीति ही नहीं है। सिर्फ और सिर्फ दिमागी फितूर राजनैतिक दिवालिया पन व खोखले पन की निशानी भर ही हैं। ऐसे व्यवहार का बड़ा खामियाजा आने वाले लोकसभा चुनाव में निश्चित ही कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा व पड़ना भी चाहिये।
क्या हमारे देश में देश की सुरक्षा, मान-सम्मान और देश हित से जुड़े हुये मुद्दे को अच्छुण्ण रखते हुये देश को बल प्रदान करने हेतु समस्त राजनैतिक दल देश के लिए खडे़ नहीं हो सकते हैं? जैसे ऐसी ही विकट विपरीत परिस्थितियों में अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में खड़े हो जाते हैं। बालाकोट हवाई हमले की घटना के विषय में सेना पर विश्वास करने के बाद, सबूत के नाम पर सरकार को कटघरे में दर्शाने के उद्देश्य से सेना पर ही अपरोक्ष रूप से अविश्वास जताने का आभास परिलक्षित कराने से कांग्रेस को कौन सा राजनैतिक फायदा होने वाला है, प्रश्न यह हैं? लेकिन ऐसे अवांछित व्यवहार से विश्व में हमारी किरकिरी अवश्य हो रही है। ऐसा महसूस होता है कि कांग्रेस का बौद्धिक स्तर निम्नतर से निम्नतम पर पहुंचता जा रहा हैं। हम किसी भी घटना का राजनीतिकरण राजनैतिक दृष्टि से फायदा लेने की दृष्टि से ही करते है। तब यह बात बिल्कुल समझ से परे है कि उक्त बयानों से प्रभावित होकर कौन सा वर्ग, समाज, नागरिकगण जो निरपेक्ष मतदाता है, कांग्रेस को वोट देने की सोच की ओर पलटेगा। 
इसीलिये शीर्षक में मैने ‘‘देश में क्या हो रहा है’’ के बदले ‘‘देश को क्या हो गया हैं’, लिखना ज्यादा सामयिक समझा क्योकि दोनों मेें महत्वपूर्ण अंतर है जिसको समझना आवश्यक है जिसके लिये फिर कभी।  

सोमवार, 4 मार्च 2019

देशप्रेम-राष्ट्रभक्ति-राष्ट्रवाद को ढूढ़ता मेरा प्यारा देश!

इस लेख का ‘‘शीर्षक’’ देख कर बहुत से लोगों को हैरानी अवश्य होगी और आश्चर्य होना भी चाहिये। पर बहुत से लोग इस पर आखें भी तरेर सकते है। यदि वास्तव में ऐसा हो सका तो, मेरे लेख लिखने का उद्देश्य भी सफल हो जायेगा। 
एक नागरिक, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा एक भारतीय पैदाईशी ही स्वभावगतः देशप्रेमी होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार उसे जन्मते ही प्राप्त हो जाते है, और संवैधानिक कर्त्तव्य का बोध भी उसे हो जाता है। ऐसी सामान्य कानूनी मान्यता है। परन्तु जब हम इन गुणों की जमीनी वास्तविकता को धरातल पर परखतेे है और उनकी वास्तविक स्थिति को मापने का प्रयास करते है, तो न केवल हम अधिकतर जगह पर विफल होते हैं, वरण उसमे मैं अपने आप को भी असफल पाता हूँ। इसके लिए मैं स्वयं को दूसरो की तुलना में कुछ ज्यादा ही दोषी मानता हँू। एक देश भक्त नागारिक के कर्त्तव्यों का पूर्णतः पालन करने में मैं स्वयं भी असफल रहा हूँं। वास्तव में यह हमारा एक आम परिवेश है, जिसका मैं भी एक भाग भर हूँ। 
‘‘पुलवामा’’ आतंकी घटना के बाद से पूरे राष्ट्र में, समस्त प्रिंट, इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न संगठनों, राजनैतिक पार्टियों एवं स्वयंसिद्ध-वीर नागरिकों के एक से बढ़कर एक बयानों की बयार सी आ गई है। पाकिस्तान से आक्रमक आक्रमण (युद्ध) कर मटिया-मेट, नष्ट-नाबूद करने से लेकर समाप्त कर देने तक के ओजस्वी बयान देकर स्वयं को सबसे बड़ा देश प्रेमी सिद्ध कर स्वयंभू देशभक्त होने का प्रमाण पत्र ले रहे हैं। यदि आप उन बयानों में ‘शब्दो’ का चयन देखें व उन शब्दों को थोड़ा भी ध्यानपूर्वक पढं़े, तो आपको उनमें मात्र खोखला पन सतही पन, व विरोधाभाष ही महसूस होगा। मात्र वे वीर रस की अभिव्यक्ति भर नजर आवेंगे। 
कुछ जुमले आगे उद्वरित हैं जैसे ‘‘पाकिस्तान झुक गया है’’, ‘‘अंतिम सासें गिन रहा है’’, ‘‘धबराया हुआ है, ‘‘घुटने टेक दिये है‘‘, ‘‘झुक गया है’’, ‘‘ड़र के मारे रात भर सोया नहीं है’’ ‘‘पाकिस्तान को समझ में आई उसकी औकात’’, ‘उसका पानी बंद कर दिया है’’, ‘‘भूखा मरेगा’’, ‘‘भीख मांगना पाकिस्तान की फितरत है’’, ‘‘शांति की भीख लिए गिडगिडा रहा है’’, ‘‘बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए’’, ‘‘हर मोर्चो पर पीटा है-ठोका है’’ इत्यादि-इत्यादि। हमारे देश के शांति प्रिय नागरिक भी वीर जवानों से भी ज्यादा, युद्ध करने की अनचाही, अनमांगी, साहसिक सलाह सरकार को दे रहे है। एक उदाहरण ‘‘इमरान खान बार-बार भारत से बातचीत का अनुरोध कर रहा है व शांति की भीख के लिये गिड़गिड़ा रहा है’’, ऐसा अधिकांश मीडिया उल्लेख कर रहे हैं। साथ ही साथ बार-बार वे यह भी दिखा रहे हैं कि ‘‘पाकिस्तान माननें को तैयार नहीं’’,‘‘पाकिस्तान नहीं सुधरा’’, ‘‘पाकिस्तान ने फिर सीमा का उल्लंघन किया है’’ एलओसी स्थित बालाकोट पर हवाई हमले के बाद गांवों में दहशत हैं। एक हमले के अंदर 60 से भी ज्यादा बार सीमा का उल्ल्घंन किया गया है जिसमें 15 से अधिक सैनिक व सिविलियन शहीद हुये हैं। समस्त मीडिया द्वारा दिये गये इतने सब शीर्षकों/अंलकारों से महिमा मंडित करने के बावजूद पाकिस्तान, सीमा का उल्ल्घंन करने का साहस/दूःसाहस लगातार कर रहा है तो, इस तरह की वाणी/कथनांे का तीर चलाकर क्या मीडिया हाऊसेस भी पाकिस्तान की सीमा पार उल्लघंन की कार्यवाहियों को अनजाने में ही सम्मान व ऊंचाई प्रदान नहीं कर रहे है? क्योंकि इन विरोधाभाषी कथनों का यही अर्थ निकलता है कि एक कमजोर घबराया हुआ व घुटने टेकने वाला मजबूर पाकिस्तान बावजूद लगातार आंतकी कार्यवाही कर हमारे सैनिकों व सिविलियनों को मार रहा है, जबकि एक मजबूत भारत बालाकोट पर हवाई हमले करने के बावजूद आंतकी घटनाओं को रोकने में आवश्यक कार्यवाही करने में असफल हो रहा है। शब्दों का खोखला पन भर ये ही है। भीख शब्द के उपयोग करने की यहाँ क्या आवश्यकता एवं औचित्य है?   
आखिर; क्या देश भक्ति, सिर्फ हमारे भाषण, लेखन, कथन, बयान और टीवी डिबेट तक ही सीमित होकर रह जावेगी, प्रश्न यह है? इसका कदापि यह मतलब भी नहीं है कि देश भक्ति सिद्ध करने के लिए हर नागरिक को सीमा पर जाकर बंदूक चलानी पढे़गी, बम फेकना पडे़गा। ‘‘देश भक्ति’’ का यथार्थ मतलब है, वर्तमान युद्ध की आशंका लिये हुई उत्पन्न स्थिति में, प्रत्येक नागरिक जो जहां कहीं जिस भी क्षेत्र में कार्यरत है, वह अपनी सम्पूर्ण ताकत, क्षमता, बुद्धि व भावनाओं के साथ देश हित के लिए वह वे सभी कार्य करे, जो उसका वैधानिक, संवैधानिक, मानवीय व नैतिक, कर्त्तव्य एवं दायित्व है। साथ ही सीमा पर लड़ने वाले हमारे जांबाज वीर सैनिकों के लिए वह कुछ ऐसा कर गुजरें, जिससे बहादुर वीर सैनिकों को यह महसूस हो कि भले ही वे सीमा पर तैनात है, लेकिन वे अकेले नहीं है। सम्पूर्ण समाज, स्थानीय लोगों सहित पूरा देश एकजुट होकर उनके साथ उनकेे परिवार को सहारा देने के लिए खडे़ है। यही वास्तविक देश भक्ति हैं। देश भक्ति को हम स्वयं अपने बैरो मीटर में नापें। इसे हम जितना सोचते जायेगंे, देश भक्ति की तीव्रता की भावना उतनी ही प्रबल होती जायेगीं। 
यहाँ एक उदाहरण देना चाहता हँू। हमारे देश में आज भी कई जगह ‘‘भारत मुर्दाबाद’’ व ’‘पाकिस्तान जिंदाबाद’’ के नारे लगाए जाते हैं। एक देश भक्त राष्ट्र में यह कैसे संभव हैं? कहीं न कहीं, जहां हमारी राष्ट्र भक्ति के प्रति कमजोरी उजागर होती है, वहीं पर देश विरोधी-देशद्रोही ताकतंे सिर उठाकर ऐसी हिमाकत कर जाती हैं। उन्हे रोकनंे के लिए हम न तो उनमें कोई ड़र व खौंफ पैदा कर पाते है, और न ही ऐसी घटना घटित हो जाने के बावजूद भी उनके विरूद्ध कोई कड़ी कार्यवाही करते है। तब हमारा देशप्रेम वैसा नहीं उमड़ता है कि हम उनको पकड़कर कानून के शिकंजे में बंद करवाएँ, उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करे। उनका सामाजिक बहिष्कार करे। शासन व प्रशासन भी ऐसी दशा में कई बार उदासीन ही रहता है, जो उनके देशप्रेम (की मात्रा) को इंगित करने का घोतक हैं। 
कैड़ल मार्च करना, ‘‘जय भारत’’ के नारे लगाना ‘‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’’ के नारे लगाना ये सब सिर्फ बयान बाजी ही कहलायेगी। इतने को हीे देशप्रेम मानना खोखला देश प्रेम होगा। देश प्रेम की दो स्थितियाँ हैं। एक वह, जो दुश्मन देश से पोषित व संचालित से बाहरी आतंकी शक्तियाँ से उत्पन्न देश की सुरक्षा व आत्मसम्मान को धक्का पहुचानंे के प्रयास का विरोध करते हैं। दूसरा, देश के भीतर की आंतरिक स्थिति जहां देश की संरचना को नुकसान पहुचाने वालों के विरूद्ध की जाने वाली कार्यवाही के प्रति हमारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। अभी मैं यहां बाहरी घटनाओं से निपटने के लिए मौजूद आवश्यक देशप्रेम की चर्चा कर रहा हूँ। देशप्रेम का एक उदाहरण और देखिये, अरूण जेटली का यह बयान ‘‘जिस तरह अलकायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर मार गिराया, हम भी ऐसी कार्यवाही कर सकते है’’। यह ऊपरी देशप्रेम है। यह बयान क्या आज ही आना चाहिये था? पिछले पांच सालो में पाकिस्तान द्वारा पोषित पुलवामा जैसी कई घटनाएं आंतकियों  द्वारा घटित की जा चुकी है। इन सबकी विस्तृत जानकारी हम विश्व को कई बार दे चुके है। तब उक्त बयान देने की बजाए, बिन लादेन की तरह हाफिज सईद व मसूद अजहर को पाकिस्तान के भीतर घुसकर मारने से उन्हे किसने रोक रखा था? देशप्रेम की वास्तविक झलक तब ही दिखेगी। एक उदाहरण से इस अंतर को समझिये ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘लाओं’’ और ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘करो’’। यही अंतर हमारी देशभक्ति में भी है।  
अभी अभी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान ने वापिस किया है। पाकिस्तान को समझौते के तहत युद्धबंदी (पीओडब्लू) विंग कमांडर ‘‘अभिनंदन’’ को भारत को वापस करना ही था। पूर्व में भी कारगिल युद्ध के समय युद्धबंदी लेफ्टिनेंट कमबमपति नचिकेता को कारगिल युद्ध जारी रहने के बावजूद वापिस किया गया था। लेकिन यह अंतर्राष्ट्रीय कानून होने के बावजूद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानून को कितना मानता है, जो उसके द्वारा की जा रही आंतकवादी घटनाओं के घटने से स्वयं सिद्ध है। इसीलिए भारत सरकार व भारतीय सेना को इस बात के लिए धन्यवाद अवश्य ही दिया जाना चाहिए, जिन्होने अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर पाकिस्तान को विश्व पटल पर अलग-थलग करने के साथ ही सेना के द्वारा बनाये गये जबरदस्त दबाव के फलस्वरूप, पाकिस्तान को जिनेवा संधि (समझौता) को मानकर (विंग कमांडर अभिनंदन को वापिस भेजने की) कार्यवाही करने के लिए बाध्य होना पड़ा हैं। यह हमारी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक सफलता व सैनिक बलों के जबरदस्त दबाव की जीत है। यहा एक कोतूहल भी पैदा होता है। जब हमारी सरकार व रक्षामंत्री यह मानते है कि जिनेवा समझौते के तहत युद्धबंदी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान द्वारा भारत को हर हालत में सौपना ही था तो, इसका क्या यह मतलब नहीं निकलता है कि भारत पाकिस्तान के विरूद्ध युद्ध छिड़ गया है? तभी तो ‘अभिनंदन’ युद्धबंदी कहलायेगे व जिनेवा संधि लागू होगी। 
युद्ध की वर्तमान आंशका की स्थिति में हममे से कितने नागरिकों ने शहीद परिवारों को किसी भी तरह का सहयोग पहंुचाया है, या व्यक्तिगत सांत्वना दी है, या अभिनेता अक्षय कुमार के सुझाव पर देश में खोले गये शहीदो की सहायता के लिये ‘‘आर्मी वेलफेयर फंड/बैटल केजुअल्टी फंड’’ में अपना अंशदान/सहायता राशी जमाकर अपने देशभक्त होने का परिचय दिया है? जब हम किसी राजनैतिक दल या सामाजिक संगठन के आव्हान पर अपने संसाधन से स्वयं के खर्च पर भोपाल-दिल्ली चले जाते है, तो क्या हम इन शहीद परिवारों के दुख में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर उन्हे सांत्वना देकर उनके परिवार के आत्मबल को बनाये रखने में सहयोग प्रदान कर देश प्रेमी होने का उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सकते है? ऐसे जुनून से भरी देशभक्ति की ही वर्तमान में सख्त आवश्यकता है। इन्ही भावनाओं को उभारने का प्रयास इस लेख का उद्देश्य हैं।
हमारे देश में ही शासन व प्रशासन की देशभक्ति का आलम यह है कि अलगाँवादी व्यक्तियों   जिन्हे स्वयं सरकार अलगाँवादी कहकर संबोधित करती है, उन्हे न केवल शासकीय सुरक्षा कराई जाती है, बल्कि लगातार करोडांे रूपया उनकी सुरक्षा व सुविधा पर खर्च होते है (यद्यपि अभी हाल में सरकार ने कुछ अलगाँवादी व्यक्तियों की सुविधाओं को समाप्त भी किया हैं, जो स्वागत योग्य है)। कश्मीर को स्वतत्रंता दिलाकर भारत को तोड़ने वाले अलगाँवादी व्यक्तियों की भारतीय नागरिकता समाप्त कर उनको जेल के सलाखों के भीतर क्यों नहीं डाला जाता है? ये सब अवांछित सुविधाएँ हमारी देशभक्ति की परिभाषा में ही संभव है, विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं।
आज जब अनवरत हो रही आंतकवादी घटनाओं के साथ पाकिस्तान बातचीत का राग अलाप कर विश्व को अंधेरे में रखने का प्रयास कर सकता है। तब प्रत्येक घटित आंतकवादी घटनाओं के बदले स्वरूप प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही करने की बजाए हम लगातार आगे होकर आक्रमण करते रहने के साथ बातचीत की पेशकश कर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने में क्यों परहेज कर रहे है? (क्योंकि सरकार स्वयं यह कह रही है कि पुलवामा घटना के बाद जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट स्थित आंतकी बेस को समाप्त करने के लिये किया गया हवाई हमला हमारा मिलिट्री ऑपरेशन नहीं हैं) देश के जनमानस के जेहन में आज का यक्ष (सबसे बड़ा) प्रश्न यही हैं, जिसे सरकार को असली जामा पहनाना हैं।       

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