बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

“खेल“-“राजनीति“-“देशप्रेम“

वर्तमान में देश की विभिन्न कार्यक्षेत्रों में स्थिति इतनी गिर चुकी है कि आज खेल-खेल में राजनीति हो रही है या राजनीति का खेल हो रहा है, यह समझना बड़ा मुश्किल सा हो गया है। देश भक्ति और देश प्रेम की भावना का तो दूर-दूर तक (दूर)दर्शन, सुगंध अनुभव और आभास मिलना इतना मुश्किल हो गया है, जैसे ‘‘रेगिस्तान में नख़लिस्तान‘‘। वास्तव में ऐसा लगता हैं कि देश भक्ति की भावना व्यक्ति के शरीर के अंदर मात्र इनबिल्ट होकर रह गई है, जिसके प्रदर्शन की कदापि आवश्यकता अब शायद नहीं रह गई हैैं। बात भारत की पाकिस्तान के विरुद्ध शर्मनाक हार अर्थात पाकिस्तान की भारत पर ऐतिहासिक विजय पर कश्मीर और दिल्ली समेत देश के कुछ स्थानों पर पटाखे फोड़ कर खुशी प्रदर्शन करने की शर्मनाक घटनाओं की है। क्या इसे देख कर ऐसा नहीं लगता कि ‘‘कुत्तों को घी हजम नहीं होता‘‘?

खेल, खेल होता है। “खेल“ में राजनीति का न तो कोई स्थान है और न ही होना चाहिए। इस कटु अटल सत्य से कोई व्यक्ति न तो इनकार करता हैं और न हीं कर सकता है। परन्तु जब जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पीडीपी अध्यक्षा नेत्री महबूबा मुफ्ती कहती है कि विराट कोहली ने पाकिस्तान की जीत पर उनके कप्तान को बधाई दी, तो कश्मीर घाटी में बधाई और खुशी का सिलसिला गलत कैसे? तो लगता है कि ‘‘करेले की बेल नीम पर जा चढ़ी हो‘‘। आगे समझाईश देती हुई वे कहती हैं कि विराट कोहली की तरह इसे सही भावना से लें। वाह! निश्चित रूप से एक सीजन्ड (अनुभवी) राजनीतिज्ञ की इस तुलना व सोच पर हंसी ही नहीं तरस भी आता है। वास्तव में उन्हंे विराट कोहली की सही भावना को सही परिपेक्ष में लेना आना चाहिए? वे वीरेन्द्र सहवाग व गौतम गंभीर की लताड़ को भूल गई, जब उन्होंने यह कहकर कि जश्न मनाने वाले भारतीय नहीं हो सकते है। महबूबा (यदि वे वास्तव में एक भारतीय है तो?) को बधाई व खुशी में कोई अंतर समझ नहीं आ रहा है? तो यह उनके दिमाग की दिवालियापन को ही इंगित करता है। ऐसी दिवालिये हुए दिमाग कश्मीर के राजनीति में वर्षों सत्ता में कैसे रही और भाजपा भी उनके साथ मानो ‘‘ओछे की प्रीत, बालू की भीत‘‘ के समान साझेदारी में सत्ता में रही, यह सोच कर ही दिमाग सुन्न सा हो जाता है। 

निश्चित रूप से खेल का यह सिद्धांत है कि खेल को खेल की तरह ही खेल भावना से लेना चाहिए। जीत और हार खेल का अभिन्न आवश्यक अंग है। अर्थात एक टीम तभी जीतती है, जब दूसरी टीम हारती है। जैसा कि कहा जाता है कि ‘‘कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर‘‘ और आजकल तो टाई की स्थिति में भी परिणाम निकालने की अधिकांशतः व्यवस्था कर दी गई है। खेल भावना यही कहती रहती है कि जो टीम जीतती है, उन्हें हारी हुई टीम बधाई देती है और जीती टीम हारी हुई टीम को नैतिक सांत्वना देती है। यही काम विराट कोहली ने खेल के मैदान में किया, जो बिल्कुल सही व खेल भावना के अनुरूप हैं।

प्रत्येक खिलाड़ी चाहे वह फिर विश्व के किसी भी देश का क्यों न हो, उसे खेल के मैदान में ऐसा ही करना चाहिए और वह करता भी है, फिर चाहे वे परस्पर दुश्मन देश के खिलाड़ी ही क्यों न हो। तथापि जीत की बधाई देने में हारी हुई टीम के मन में कहीं न कहीं एक कसक टीस अवश्य रहती है, कि काश हम जीत जाते। और जब खेल क्रिकेट का हो और वह भी भारत व पाकिस्तान दो पैदाईशी पारंपरिक दुश्मन देशों के बीच हो, तब यह भावना उग्र हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में यह बधाई औपचारिक मात्र ठीक वैसे ही रह जाती हैं, जब हम अपने दुश्मन या नापसंद लोगो के स्वर्गवासी हो जाने पर संवेदना प्रकट करते हैं। बधाई देना मात्र एक औपचारिकता है, ‘‘फेस इज नॉट द इंडेक्स ऑफ द हार्ट‘‘ और खुशी व्यक्त करना या खुशी में शामिल होना एक वास्तविक भावना का प्रदर्शन है। इस महत्वपूर्ण अंतर को महबूबा को समझना होगी, तभी वह पूर्णतः भारतीय हो पायेगी? एक और महत्वपूर्ण बात महबूबा के संतुष्टि के लिये है। यदि पाकिस्तानी टीम भारत के अतिरिक्त विश्व के किसी भी देश की टीम को हराती है तो, भारतीय मुसलमान जश्न मना सकते है। इतना बड़ा दिल भारतीयों का तो हो सकता है, परन्तु पाकिस्तानियों का तो कदापि ही नहीं जो हिन्दुओं को भारतीय जीत पर पाकिस्तान में जश्न मनाने दे। 

हमारा देश जब किसी अन्तर्राष्ट्रीय खेल में हार जाए, तो क्या देश के नागरिको को खुशी होगी या दुख होगा? सवाल पाकिस्तान का भी नहीं हैं? किसी भी खेल के अन्तर्राष्ट्रीय मैचो में हार-जीत देश की होती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मैचों में खिलाड़ी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है और राष्ट्र के लिए खेलता है। इसीलिए जीत पर खुशी का इजहार देश के नागरिकों द्वारा होता है। उसी प्रकार हार पर आंसू पीना व मायूस होना पड़ता, है खुशी नही हैं? आंसू पीने का मतलब पटाखे फोड़ना नहीं होता है? महबूबा मुफ्ती से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि भारत की हार पर कश्मीर में जिन लोगों की ‘‘बोटियां फड़कने लगीं‘‘, जिन्होंने पटाखे फोड़े, खुशियां मनाई, क्या वे ईश्वर-अल्लाह से यह प्रार्थना कर रहे थें कि भारत हार जाए और उन्हें पटाखा फोड़ने का मौका मिले? यह तो वही बात हुई कि ‘‘जिस थाली में खाना उसी में छेद करना‘‘। वे कृपया यह भी बतलाने का कष्ट करे कि, यदि वह मैच भारत जीत जाता तो तब हार में अभी पटाखें फोडने वाले लोग वैसे ही पटाखे फोडते? या आगजनी लूट मार करते? अथवा पाकिस्तान में हिन्दुओं को भी ऐसे ही पटाखे फोड़ने की स्वतंत्रता देती? संभवतः कभी भी किसी हिन्दु पाकिस्तानी नागरिक ने भारत की जीत पर पाकिस्तान में पटाखे नहीं फोडे है। चूंकि ‘‘चूहे का जाया बिल ही खोदता है‘‘, अतः ऐसी स्थिति में ऐसे लोगों को भारत देश की नागरिकता छोड़कर पाकिस्तान की नागरिकता ग्रहण कर लेना चाहिए?

इस स्थिति पर चर्चा होना ही दुर्भाग्यपूर्ण है और न ही यह कोई डिबेट (बहस) का विषय होना चाहिए। देश भक्ति देश प्रेम, हार व जीत से प्रभावित नहीं होता है। जीत में तो दुगना हो जाता है। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात यह है कि जब देश के गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर के 3 दिवसीय “सफल“ दौरे पर हों, तब ऐसी देश विरोधी घटनाओं का होना और उस पर तुरंत कोई कार्यवाही न होना, किस बात व स्थिति को इंगित करता है? जैसा कि सरकार अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से कश्मीर में लगातार सामान्य होती स्थिति की बात कहती आई है। अमित शाह का इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आना और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। हिन्दुवाहनियों द्वारा पूरे देश में इस घटना का विरोध का आव्हान न करना भी, कहीं न कहीं उनकी देशभक्ति की गहराई पर आँच लाता है व उछलेपन को दिखाता है। उक्त घटनाएं किसी भी स्थिति में स्वीकार योग्य नहीं है और ‘‘तत्र दोषं न पश्यामि, शठे शाठ्यम् समाचरेत‘‘, अतः उन सब व्यक्तियों के खिलाफ न केवल देशद्रोह की त्वरित आपराधिक कार्यवाही की जानी चाहिए, बल्कि उनकी भारतीय नागरिकता ’भी समाप्त कर उन्हें सबक सिखाना चाहिए। क्योंकि नागरिकता के अधिकार का दुरूपयोग कदापि नहीं होने देना चाहिए। यह कदापि संभव नहीं होना चाहिये कि आप नागरिकता के फायदे भी ले और राष्ट्र को दुश्मन देश के सामने व विश्व में नीचा गिराए दिखाएं। 

  अभी-अभी उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने उक्त राष्ट्र विरोधी  घटित घटनाओं के लिए कुछ देश द्रोही व्यक्तियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज किया है जिसके लिए न केवल सरकार बधाई की पात्र है बल्कि  देश की अन्य सरकारों को भी योगी सरकार से सीख लेनी चाहिए ।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2021

देश का इलेक्ट्रानिक मीडिया आखिर कब अपने गिरते स्तर को रोककर जिम्मेदार मीडिया का रोल निभायेगा?

मीडिया लोकतंत्र का चौथा प्रहरी (स्तम्भ) कहलाता ही नहीं बल्कि हैं भी। स्वाधीनता आंदोलन और तत्पश्चात स्वाधीन भारत में दूसरा स्वाधीनता आंदोलन जिसे ‘‘लोकतंत्र बहाली आंदोलन‘‘ कहां गया अर्थात आपातकाल में मीडिया का रोल बहुत ही सराहनीय प्रभावी और अपनी सकात्मकता उपस्थिति दर्ज कराने वाला रहा है। मीडिया हॉउस में तत्समय भी सत्ता पक्ष एवं विपक्षी विचारों के लोग रहकर थोडा बहुत प्रसारण के विषयों को प्रभावित करते रहे हैं। तथापि मीडिया हॉउस के अपने कुछ बंधनों के बावजूद वे उससे उपर उठकर जहां समाज-देश हित की बात रही हो या नागरिकों के अधिकारों की बात है, उन सबको जीवंत रख उन्हें उद्देश्यपूर्ण गतिशीलता देते रहे हैं। परन्तु पिछले कुछ समय से खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया के मामलें में यह कहने की आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं रह गई है कि अब मीडिया की हालत ‘‘आगे नाथ न पीछे पगहा‘‘ तरह की हो गई है। अब मीडिया को गोदी मीडिया, मोदी मीडिया में वर्टिकल (सीधे) रूप से विभाजित कर दिया गया है। बावजूद इसके मीडिया के दोनों विभाजित रूप अपने मूल उद्देश्यों व दायित्वों को निभाने में आजकल प्रायः असफल ही पाये जा रहे है। ऐसा लगता है कि ‘‘हंसा थे सो उड़ गये,कागा भये दिवान‘‘। पिछले काफी समय से मीडिया के गिरते स्तर के अनेकोंनेक उदाहरण आपके सामने आये हैं। फेहरिस्त लंबी है जिन्हे यहां उद्हरण करने की आवश्यकता नहीं है। तथापि हाल में ही ऐसे एक उद्हरण कर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जिससे आपके सामने मीडिया के वर्तमान चरित्र का स्पष्ट दृष्टिगोचर हो जाता है। 

100 करोड़ लोगों के टीकाकरण का ऐतिहासिक लक्ष्य को पूर्ण कर देश जिस दिन जश्न मना रहा था और जिनके नेतृत्व में यह लक्ष्य पूर्ण हुआ, ऐसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उदगारों को अपने को देश का सबसे तेज व सबसे आगे और सबसे बड़ी टीआरपी कहने वाला मीडिया हॉउस इंडिया टुडे ग्रुप का न्यूज चैनल आज तक ने दिन के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण के चलते प्रसारण को अचानक बीच में रोकते हुये ब्रेकिंग न्यूज शीर्षक देते हुये फिल्मी कलाकार शाहरूख खान के बेटे आर्यन खान जो कि नारकोटिक्स ड्रग्स के एक आरोपी है, की यह न्यूज कि उसके जमानत आवेदन पर सुनवाई मुम्बई उच्च न्यायालय में मंगलवार को होगी, के लिये प्रधानमंत्री की न्यूज को ब्रेकिंग किया। हद हो गई ‘‘ठकुर सुहाती‘‘ की। प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण 100 करोड़ लोगों की टीकाकरण की विश्व विख्यात उपलब्धि की न्यूज की तुलना में आरोपी आर्यन खान की जमानत आवेदन की सुनवाई की न्यूज का ब्रेकिंग न्यूज बन जाना देश के मीडिया हॉउस के सेटअप, एजेड़ा व मानसिकता को दर्शाता है। 

ऐसा लगता है कि फिल्म उद्योग से जुड़े हुए कलाकारों के बच्चों को उनकी ‘कला’ का सार्वजनिक प्रर्दशन किये बिना देश का सेलिब्रिटी बनाने के लिए मीडिया हाउस अपना रोल बखूबी अदा करने को न केवल तैयार है बल्कि कर रहा है, बशर्ते आप किसी अपराध के आरोपी हो जाएं? आर्यन खान के मामले में यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता हुआ दिख रहा है। कलाकार की प्रतिभा का प्रदर्शन हुए बिना मीडिया ने आर्यन खान को देश का ऐसा सेलिब्रिटी बना दिया है ,जो जेल में क्या खा रहा है, कैसे सो रहा है उससे कौन मिलने आ रहा है इत्यादि मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज का बन गया भाग है।

आखिर आर्यन खान देश का कौन सा ऐसा सेलिब्रिटी और मीडिया की ‘‘नाक का बाल‘‘ है, जो देश के ही नहीं बल्कि विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी बड़ा होकर प्रधानमंत्री की न्यूज को ब्रेक कर उसकी न्यूज को दिखाना न्यूज मीडिया के दिमागी स्तर का खोखलापन को ही बतलाता है। नशीली दवाईयों के आरोपी बनने के पूर्व आर्यन खान का नाम मुम्बई फिल्म उद्योग के बाहर कितने लोगों ने सुना था? आखिर ‘‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली‘‘। निश्चित रूप से देश के कुछ ही ऐसे कलाकार है जो बहुत बड़े सेलिब्रिटी होकर प्रधानमंत्री से उनकी तुलना की जा सकती है, जैसे लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन आदि हो सकते है, लेकिन शाहरूख खान का बेटा ‘‘न तीन में न तेरह में‘‘ कोई सेलिब्रिटी नहीं है। स्वयं शाहरूख खान भी उतने बड़े सेलिब्रिटी नहीं है, जिनके लिए भी इस तरह की ब्रेकिंग न्यूज की जाय। यदि आज तक को आम लोगों व नागरिक की समझ का एहसास नहीं है, परख व समझ नहीं है तो, वह इस मुद्दे पर एक सर्वे क्यों नहीें करा लेते? सड़े सड़े मुद्दों पर मीडिया की सर्वे कराने की (कु)उद्देश्य आदत तो पुरानी है? ताकि उसको समझ में आ जाये और भविष्य में इस तरह ‘‘अशर्फियों को छोड़ कोयलों पर मुहर लगाने‘‘ जैसी बचकाना गलती से बचा जा सके। ‘‘अंधों में काना राजा’’ की स्थिति ‘‘आज तक’’ की हो सकती है। इसका यह मतलब कदापि नहीं है की वह सर्वेश्रेष्ठ चैनल हो गया है। 

जहां तक न्यूज चैनलों के विषय वस्तु और स्तर की बात है, उनके बीच कोई खास अंतर नहीं है। मीडिया हॉउस कह सकते है कि हम तो वही परोसते है, जिसे जनता पसंद करती है या जिसे सुनना व देखना चाहती है, उसे दिखाना हमारी मजबूरी है। हमें अपने स्तर पर विषय व प्रसारण के गुणात्मक चयन करने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। जबकि जनता यह कह सकती है कि उसे जो दिखाया जा रहा है, वह उसे देखने के लिये मजबूर बल्कि अभिशप्त है क्योंकि समस्त मीडिया का लब्बो लुबाब ऐसा ही है जैसे कि न ‘‘तेल देखे न तेल की धार‘‘। सवाल मुर्गी पहले आयी या अंड़ा यह नहीं है? बल्कि मीडिया जिस कारण वह स्वयं को देश के लोकतंत्र को प्रहरी मानता है, वह तभी महत्वपूर्ण स्थिति को तभी साबित (औचित्य) कर सकता है, जब वह अपने इस महत्वपूर्ण दायित्व व जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाएं।

सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या के प्रकरण में अधिकाशतः पूरी तरह से रिपोर्टिंग गलत सिद्ध हो जाने के बावजूद मीडिया ने कोई सबक नहीं लिया हैं। जहां आत्महत्या को मीडिया ट्रायल द्वारा हत्या सिद्ध कर आरोपी तक तय कर दिये गये थे, वहाँ आज तक आत्महत्या को प्रेरित करने वाली धारा तक नहीं लगी है। अतः मीडिया को सनसनीखेज व गलत एजेंडा लेकर चलाने वाली न्यूजों से बचना होगा, यदि उन्हें अपनी बची कुची विश्वनीयता को बनाये व बढाये रखना है, तो।

रविवार, 10 अक्तूबर 2021

“राजनीति“ और “कानून का मिश्रित नंगा स्तरहीन नाच“? ‘‘लखीमपुर खीरी’’।

विगत पाँच दिनों से तीनों प्रकार के मीडिया (प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक व सोशल) से लेकर सार्वजनिक जीवन जीने वाले नागरिकों व उत्तर प्रदेश के निवासियों के बीच जिला मुख्यालय लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के पैतृक गांव तिकुनिया-बनवीरपुर रास्ते में हुई दर्दनाक घटना ही छाई हुई है। जहां पर नौं नागरिक जिसमें चार किसान, तीन भाजपा कार्यकर्ता, एक ड्राइवर और एक पत्रकार शामिल है, अकाल मृत्यु के काल में चले गए। इनके अलावा 12 से 15 लोग घायल भी हुए हैं। इन सबकी जीवन लीला की दर्दनाक समाप्ति "उद्देश्य पूर्ण लिये हुई मानव निर्मित" है या परिस्थितियों जनित है, यह तो जांच का विषय है।  विभिन्न एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच के पूर्ण होने के पश्चात वस्तुस्थिति का पता लग पाएगा? यहां ‘‘प्रश्नवाचक चिन्ह’’ इसलिए लगा रहा हूं कि हमारे देश में किसी घटना, दुर्घटना या आकस्मिक, प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित वीभत्स घटनाओं के सार्वजनिक/राजनीतिक दुष्प्रभाव/दुष्परिणाम को कम करने के लिए स्पेशल सेल, एसटीएफ, जांच कमेटी, आयोग, न्यायिक जॉच आयोग इत्यादि बना दिये जाते हैं। प्रायः जांच आयोग की रिपोर्ट त्वरित न आ पाने के कारण समय बीतने के साथ ही लोग घटना व उसके (दुष्) प्रभाव को सामान्यतया भूल जाते हैं। जांच की रिपोर्ट कब आएगी, कैसी आएगी और उस पर किस तरह की कार्यवाही (एटीआर) होगी, बुद्धिजीवी नागरिकों को यह बताने की कदापि आवश्यकता नहीं है।

सर्वप्रथम लखीमपुर खीरी में हुई 9 डरावनी मौतों पर हो रही राजनैतिक नंगाई, नीचता, निकृष्टता व निम्नस्तर की बात कर लें। यहां पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि ऐसे मुद्दों पर समस्त राजनीतिक पार्टियां चाहे वे पक्ष (सत्ता) की हों या विपक्ष की, सब एक दूसरे के विरुद्ध ‘‘उल्टी माला फेरने लगते हैं‘‘और स्वयं को अपने  विपक्षियों के सामने भुक्तभोगी परिवारों को सांत्वना देने की  होड़ में लगने के आड़ में ज्यादा ‘‘नंगाई‘‘ दिखाने में हमेंशा ही तत्पर सी रही है। क्या करें, ‘‘चूहे के बच्चे बिल ही खोदते हैं‘‘। इस अवांछनीय, निंदनीय घटना को लेकर राजनीतिक नौटंकी दिखाने में फिलहाल कांग्रेस ने शेष विपक्ष की तुलना में बढ़त प्राप्त कर बाजी जरूर  मार ली है। (यद्यपि चुनावी राजनीति में तो कांग्रेस पिछले कुछ समय से फिसड्डी ही सिद्ध हो रही है) लेकिन अपने नेताओं को घटनास्थल पर जाने से रोके जाने पर ‘‘तानाशाही‘‘ और ‘‘लोकतंत्र खतरे में है‘‘, का आरोप लगाते समय कांग्रेस शायद यह भूल गई है कि ‘‘कांच के घर में रहकर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंके जाते हैं‘‘। क्योंकि कांग्रेस के लम्बे समय के शासन के समय भी इस तरह की बर्बरता पूर्ण अनेकोंनेक घटनाएं हुई हैं। तब क्या तत्कालीन कांग्रेस के शासन में तत्कालीन विपक्ष जो आज सत्ता में है, को ‘‘पीले चावल‘‘ देकर घटनास्थल का मुआयना करने और शांति बनाये रखने व पीडि़त मानवता पर मरहम लगाने के लिए बुलाया जाता था? कदाचित् इसका कदापि यह मतलब नहीं है कि भाजपा को ‘‘चित भी मेरी पट भी मेरी‘‘ करने के लिए यह छूट मिल जाती है कि वह भी कांग्रेस के उसी बुरे-गलत कार्य के नक्शे-कदम पर चले, जिसको वह पूर्व में पानी पी-पीकर, कोस कर जनता का आशीर्वाद प्राप्त कर सत्तासीन हुई है।

जिस प्रकार भाजपा घटित दुर्भाग्य पूर्ण घटना को अपने तरीक़े से अपने पक्ष में करने की राजनीति कर रही है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक विपक्षी दल को भी राजनीति करने का समान अवसर भारत के वर्तमान रूप धारण किये हुये लोकतंत्र में प्राप्त है। उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत आनन-फानन में प्रत्येक पीडि़त परिवार को 45 लाख रुपए के मुआवजे की राशि, पीडि़त परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार नौकरी, अपराधियों को क़ानून के अनुसार कड़ी सजा तथा घटना की एक सदस्यीय न्यायिक जांच हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज द्वारा किये जाने की घोषणा कर पीडि़त परिवार के कभी न भरने वाले गहरे घावों पर मरहम लगाने का प्रयास अवश्य किया है। परन्तु वस्तुतः यह वास्तविक मरहम लगाने की बजाए आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए, राजनीति लिये हुई ज्यादा लगती है। क्योंकि इस तरह की घटनाओं में सरकार द्वारा कब इसके पूर्व  मृतकों को 45 लाख राशि के मुआवजे दिये गये हैं,सरकार यह बताये? प्रथम सूचना पत्र (एफ.आई.आर.) में नामजद व्यक्ति जो टेलीविजन पर दिखते है, की अभी तक गिरफ्तारी न होना किस तरह से न भरने वाले घावों पर लेप माना जाए? नियमों व रिवाज से हटकर राजनीतिक दृष्टि से की गई क्षतिपूर्ति की घोषणा के साथ ही मजबूत राजनैतिक संदेश देने के लिए केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का इस्तीफा क्यों नहीं लिया गया? उस स्थिति में जब उनके लड़के आशीष मिश्रा का नाम धारा 302 के अपराध के लिए एफ.आई.आर. में नामजद है। आखि़र ‘‘न्याय मिलता हुआ‘‘ कैसे दिखेगा जो न्याय का सिद्वांत हैं।

 कांग्रेस के द्वारा भी ‘‘मेरे बाप ने घी खाया सूंघो मेरा हाथ‘‘ वाली सिर्फ कोरी ओछी राजनीति ही की जा रही है, जो स्पष्ट झलकती दिखती भी है। जब एक ही घटना में 9 लोग मारे गये हों, तब सिर्फ 4 किसानों व एक पत्रकार के ही प्रति ही संवेदना क्यों? अन्य 4 भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रति सहानुभूति के दो शब्द भी क्यों नहीं? क्या राजनेताओं को इतना संवेदनशील नहीं होना चाहिये कि परस्पर विरोधी राजनैतिक विचार-धारा के होने के बावजूद नागरिकों के स्वर्गवासी हो जाने के बाद क्या हमें उस पीडि़त परिवार के प्रति शोक संवेदना व्यक्त कर सांत्वना नही देनी चाहिये? जैसा कि हमारी संस्कृति कहती भी है। कांग्रेस के दोनों मुख्यमंत्रियों से भी यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनके प्रदेश में इस तरह की मौत के लिए कब कब मुआवजा 50 लाख रूपये का दिया गया? और यदि दूसरे प्रदेशों में हुई असामयिक मौत के लिए मुआवजे की यह नई नीति नहीं है, तो निश्चित रूप से यह राजनीति तो है ही। जनता की गाढ़ी पसीने की कमाई के पैसे के टैक्स का किस तरह से दुरुपयोग हो रहा है, राजनैतिक मुआवजा देना इसका ज्वलंत उदाहरण है।

"किस सावधानी’’ से उक्त खीरी की घटना में ‘‘राजनीति‘‘ व राजनीतिकरण किया जा रहा हैं, इसकी एक बानगी गृहराज्य मंत्री का वह बयान है कि किसानों के प्रदर्शन में शामिल कुछ तत्वों ने भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं व एक ड्रायवर को पीट पीट कर मार डाला। यदि विधानसभा के चुनाव सामने नहीं होते तब उस घटना के लिए उन तथाकथित तत्वों को किसानों सहित खालिस्तानी व आंतकवादी ठहराया जाकर (जैसा कि 26 जनवरी को हुई घटना के लिए) उन्हें उत्तरदायी ठहरा दिया जाता। 

 किसानों को गाड़ी से रौंदने वालों के विरूद्ध धारा 302 (हत्या) का प्रकरण दर्ज होना घटना से उत्पन्न गुस्सा, क्षोभ व क्रोध को शांत करने के लिए क़ानून का दुरूपयोग करना नहीं तो क्या है ? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि किसी भी तरह के दबाव में आकर सिर्फ आरोप के आधार पर गिरफ्तारी  कर जेल नहीं भेजा जाएगा । तब फिर फिर दबाव में आकर धारा 302 के अंतर्गत प्रथम सूचना पत्र क्यों दर्ज की गई ? गाडी के रोंदने से 4 लोगों की दर्दनाक असामयिक मौत होने के तत्पश्चात उत्पन्न उक्त हिंसा में 4 और अन्य व्यक्ति मार ड़ाले गये। क्योंकि ऐसी तीव्रगति (रेश) से लापरवाही पूर्वक वाहन की ड्रायविंग के कारण हुई मौत के लिए अधिकतम धारा 299, (गैर इरादतन हत्या) के लिए धारा 304, 304 ए ही लगनी चाहिये थी। क्योंकि किसी भी पक्ष का या घटना के सम्बन्ध में उपलब्ध साक्ष्य से प्रथम-दृष्टया कहीं भी यह आरोपित नही होता है कि, कार चालक ने भीड़ में मौजूद उन 4 व्यक्तियों को मारने के उद्देश्य से निशाना बनाकर उन पर गाड़ी चढ़ा दी। यह मात्र असावधानी और तीव्र गति के कारण अनियंत्रित हुई गाड़ी के भीड़ में घुस जाने से हुई। मतलब साफ है राजनीतिक जोड़ घटाने के चक्कर में राजनीतिक लाभ हानि को देखते हुए ही खीरी के मामले में कार्रवाई हो रही है, यह स्पष्ट है। लेकिन जब हमारे देश में वर्तमान में राष्ट्र भक्ति का एक मात्र पैरामीटर निम्न स्तर पर जाकर राजनीति करना ही रह गया हो, तब कौन नागरिक यह मुद्दा उठाने का साहस कर सकता है? इसीलिए  मीडिया से लेकर समस्त पक्ष परस्पर एक दूसरे पर आरोप लगाने वाले धारा 302 के अंतर्गत प्रकरण दर्ज करने के महत्वपूर्ण मुद्दे पर न केवल पूर्णतः शांत है बल्कि आश्चर्यजनक  रुप से एक असामान्य सहमति व एकमतता भी दिखती सी लगती है। क्योंकि मामला धारा 302 लगाने से कुछ न कुछ लाभ प्रत्येक पक्ष को मिलता हुआ अवश्य दिखता है, जिस कारण से उत्पन्न तनाव व अशांति को कम करने में सहायता भी मिली हैं। 4 लोगों की मौत गाडी से रोंदने के  तत्पश्चात उत्पन्न उक्त हिंसा में 4 व्यक्ति और मार ड़ाले गये जिसके लिए जिम्मेदार अभियुक्तों की गिरफ्तारी की बात उतनी दमदारी से कोई राजनैतिक पार्टी नही कर रही हैं क्यों? जिस काली लग्जरी हत्यारी कार ने भीड़ को रौंदकर किसानों को मारकर स्वर्ग लोक पहुचा दिया, वह केंन्द्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा की बतलाई जाती है। 

इसके अतिरिक्त गोली चालन की बात भी सामने आयी है और पुलिस ने घटनास्थल से कुछ (दो) कारतूस भी जब्त किये है। तथापि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने से किसी भी मृत्यु को बिलकुल नकारा गया है। तब फिर जब तक जांच में आशीष मिश्रा के विरूद्व अपराध की संलिप्तता  का कोई प्रथम-दृष्टया साक्ष्य मिल जाने तक, उसे गिरफ्तार करना क्या सिर्फ राजनैतिक दबाव के अधीन ही नहीं कहलायेगा? न्याय का मतलब दोनो पक्षों को न्याय मिले ही नही बल्कि न्याय मिलता हुआ दिखे भी, यह सुनिश्चित करना भी न्यायिक प्रशासन का कार्य हैं। न्याय के तराजू का पलड़ा कहीं न कहीं कुछ न कुछ आशीष मिश्रा के पक्ष में  झुका हुआ अवश्य दिखता है। क्योंकि पांच दिन बाद भी उसको सिर्फ पूछताछ के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अंतर्गत सम्मन देकर बुलाया जाता है। क्या इसी प्रकार ऐसे अन्य गहन अपराधों के आम सामान्य आरोपियों को भी बुलाया जाता है? जवाब उ.प्र. पुलिस को देना है। जिन दो लोगों से पूछताछ कर अभी गिरफ्तारी की गई, क्या उनको भी ऐसा ही सम्मन देकर बुलाया गया था? उत्तर प्रदेश पुलिस बेहतर जानती हैं। प्रियंका गांधी को 48 घंटे तक अवैध रूप से डिटेन (हिरासत में) रखकर, फिर 24 घंटे के भीतर गिरफ्तारी बता कर, और फिर मुचलका भरने से इंकार करने पर बिना मुचलका भरे छोड़ देना। यह सब  कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नफा-नुक़सान की दृष्टि से विशुद्ध भारतीय ‘‘राजनीति‘‘ के चलते इस तरह क़ानून के दुरुपयोग अब हमारे राजनीतिक जीवन की एक अंग आवश्यक बुराई (नेसेसरी ईविल्स) बन चुकी हैं, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने अभी तक कोई संज्ञान न लेकर क़ानून के इस राजनैतिक दुरुपयोग पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगा पाया है।

चूंकि लखीमपुर खीरी के मामले को माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्वतः-संज्ञान में ले लिया हैै। शायद इसी कारण तत्पश्चात ही दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई है। और अब ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को उच्चतम न्यायालय का सामना करने के लिए और कड़ी कार्यवाही करते हुये दिखना पड़ेगा, चाहे ऐसा मजबूरी में ही क्यों न करना पड़े।

सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

कपिल सिब्बल राजनीति के चलते वकील के मूल ज्ञान को भी भूल गये हैं क्या ?

पंजाब में विगत कुछ दिवसों से जो कुछ नाटकीय सियासी घटनाक्रम चल रहा है, वह अनपेक्षित और पूर्व में हुये राजनैतिक घटनाक्रम से कुछ हटकर है। इस कारण से सिर्फ कांग्रेस पार्टी की ही नहीं, बल्कि गांधी परिवार की बची कुची साख पर भी बट्टा लग रहा है, और किरकिरी हो रही है। भाजपा विगत कुछ समय से अल्पमत सरकारों को बहुमत में बदलकर कैसे सफल सरकारें चला रही हैं, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गोवा सहित कई राज्यों के उदाहरण आपके सामने है। कहीं भी ‘‘साझे की हंडिया चौराहे पर फूटने की नौबत’’ नहीं आयी। स्वयं कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव के जमाने में अल्पमत सरकार को चलाना और मध्यप्रदेश के दिग्विजय सिंह का अर्जुन सिंह द्वारा अलग होकर नई पार्टी बनाने के बावजूद, अपनी अल्पमत सरकार को पांच साल चलाने के कई उदाहरण रहे है। लेकिन पंजाब में दो तिहायी से ज्यादा बहुमत पाने के कारण विपक्ष के लगभग अस्तित्व मेें न होने के कारण, शायद कांग्रेस स्वयं ही विपक्ष का रोल भी अदा करना चाह रही है, ऐसा लगता है। परन्तु इस तरह की राजनीति की फर्नीचर (अ)"नीति" के चलते कही कांग्रेस सत्ता से हटकर विपक्ष का भाग भी न रह पाये, प्रबल प्रभावी विपक्ष की बात तो दूर कांग्रेस हाईकमान की असफलता (फैलुयर) ने इसकी बड़ी आंशका पैदा कर दी है कि कहीं ‘‘हकीमों की फौज मरीज की मौत का सबब’’ न बन जाये। 

इन परिस्थितियों में जी 23 ग्रुप के महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कानून व संविधान विशेषज्ञ कपिल सिब्बल का पंजाब की उत्पन्न मौजूद स्थिति पर बयान आना आश्चर्यजनक नहीं है, बल्कि यह बयान आना आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि वर्तमान में पाटी में अध्यक्ष ही नहीं है, तो (पंजाब के संदर्भ में) फैसले कौन ले रहा है? यह समझ नहीं आ रहा है। राजनीति में विरोधियों पर तंज कसे जाते है। लेकिन अपनी ही पार्टी नेतृत्व के विरूद्ध वास्तविकता के विपरीत बयान न तो शोभायमान होते है और न ही ऐसे बयानों से नेतृत्व की गलतियों को सुधारा जा सकता है, जिसके लिए तंज कसे गयेे है। ऐसे बयान तो ‘‘कुल्हाड़ी में पैर दे मारने के समान’’ हैं। तथ्य यह है कि 16 दिसम्बर 2017 को कांग्रेस के लोकतांत्रिक रूप से चुने गये अध्यक्ष राहुल गांधी के 3 जुलाई 2019 को इस्तीफा दे देने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी के द्वारा 10 अगस्त 2019 को सोनिया गांधी की अंतरिम कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की गई है। तब सिब्बल साहेब को यह अवश्य मालूम होना चाहिए और वास्तविकता में मालूम भी है (क्योंकि वे एक प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ है) कि कार्यकारी अध्यक्ष के अधिकार अध्यक्ष के समान ही होते है। अधिकारो में कोई कमी इस कारण से नही हो जाती हैं। इसलिए यह कहना कि अध्यक्ष न होने के कारण कौन निर्णय ले रहा है, बेहद ही हास्यादपद और अपरिपक्व बयान है, जो कहीं न कहीं राजनैतिक स्थिति का फायदा उठाकर नेतृत्व को कटघरे में खड़े करने का प्रयास मात्र ही है। जैसा कि कहा गया है ‘‘अविवेक: परम् आपदाम् पद्म:’’। कपिल सिब्बल जैसे संविधान व कानूनी विशेषज्ञ, राजनीतिज्ञ से उक्त गलत बयान बाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। तथापि नेतृत्व के निर्णय की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार उन्हे है, जो निर्णय न केवल गलत था, बल्कि गलत सिद्ध होकर पार्टी वहीं पुनः निर्णय लेने की मजबूरी की स्थिति में पहुंच गई है। 

स्वस्थ्य लोकतंत्र में पार्टी नेतृत्व के द्वारा उठाये गये कदमों को या गलत तरीके से उठाये गये कदमों को सही तरीके से उठाने का लोकतांत्रिक अधिकार पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं को है और होना ही चाहिए। जी 23 ग्रुप के सदस्य कपिल सिब्बल ने कई महत्वपूर्ण वैधानिक, संवैधानिक मुकदमें जीते है। वे जानते हैं कि ‘‘विभूषणम् मौनम् पंडिताणाम्’’, लेकिन इस तरह की तथ्यहीन, तथ्यों के विपरीत अर्नगल बातें कर कपिल सिब्बल; नवजोत सिंह सिद्धू के कारण पंजाब में उठती राजनैतिक ‘‘आग को ठंडा’’ करने के बजाय उसमें ‘‘घी ड़ालने’’ का ही कार्य कर रहे है। जो कार्य पंजाब की विपक्षी पार्टी भाजपा या आप पार्टी भी नहीं कर पाई है। 

नवजोत सिंह सिद्धू क्रिकेट के सफल ओपनर खिलाड़ी होने के बाद टीवी के लाफटर कार्यक्रमों के कारण उन्हे देश भर में प्रसिद्धि मिली। परन्तु उन्होंने हंसी-हंसी में ‘‘अपनी मुर्गी की डेढ़ टांग’’ वाली पृष्ठभूमि के चलते न केवल कांग्रेस के मंच को ही लाफटर कार्यक्रम के मंच में परिणित कर दिया है, बल्कि स्वयं भी इससे अछूते नहीं रह पाये है। यह समझ के बाहर है कि वे कांग्रेस के ‘‘नादां दोस्त हैं या दानां दुश्मन’’। नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री नियुक्ती के बाद सिद्धू स्वःनिर्णय का वह अधिकार, वे स्वयं द्वारा नियुक्त अपने मुख्यमंत्री को नहीं देना चाहते है, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में निर्णय के अधिकार वे स्वयं के लिये कांग्रेस हाईकमान से मांग रहे है, जिन्होंने सिद्धू की पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की है। मुख्यमंत्री चन्नी से सिद्धू की नाराजगी के जो कारण राजनीति क्षेत्र में सूत्रों के माध्यम से बाहर प्रकट होकर आयें हैं, वे यही है कि मुख्यमंत्री ने मंत्रियों के विभागों के बंटवारें व कुछ प्रमुख महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियुक्ति के मामलों में न केवल सिद्धू से कोई चर्चा ही नहीं की, बल्कि उनकी इच्छा के विरूद्ध नियुक्ति कर अपनी स्वतंत्र कार्य करने की शैली का आभास राजनैतिक क्षेत्रों में कराया है। वे शायद सिद्धू को ‘‘सही सिद्ध’’ करने में जी जान से जुट गये है, जिस कारण सेे सिद्धू के बताये गये रास्ते के अनुसार ही वे भी एक कठपुतली मुख्यमंत्री नहीं रहेगें, जैसा कि सिद्धू एक कठपुतली प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहना चाहते हैं। ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’ मुहावरा यहां पर सटीक बैठता है। कपिल सिब्बल जैसे व्यक्तियों के कारण ही यह मुहावरा बना है कि ‘‘घर को आग लगी घर के चिराग से’’।

अंत में बात जहां तक पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के द्वारा स्वयं के अपमान की जो बात कही हैं, वह 100% सही हैं। घड़ी के  कांटे को कुछ दिन पीछे ले जाईये। कांग्रेस हाईकमान से लेकर पंजाब प्रभारी हरीश रावत बारम्बार यह कहते रहे कि कैप्टन के नेतृत्व में ही कांग्रेस  आगामी विधानसभा का आम चुनाव लडेगी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि उक्त बयानों की बियार आने के मात्र एक सप्ताह के भीतर ही कैप्टन साहब को बेवजह अपमानपूर्वक तरीके से विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री की अनुमति व जानकारी के बिना ही विधायक दल की बैठक बुलाई जाकर हाईकमान द्वारा उन्हें अल्पमत में दिखाया जा कर दबाव बनाया गया और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। जबकि एक हफ्ते पूर्व ही वे सोनिया गाॅधी से इस्तीफे की पेशकश कर चुके थें, जो उन्होनें अस्वीकार कर दिया था। हरीश रावत के शब्दों में जो व्यक्ति तीन तीन बार प्रदेश अध्यक्ष रहा हो और दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रहा हूं, ऐसे सीनियर राजनीतिज्ञ व्यक्ति के साथ हाई कमांड का ऐसा व्यवहार अपमान नहीं तो क्या यह "मान" था?

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