शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के परिणामों से भौंचक्क देशभक्त नागरिक!

  पिछले दो दिनों से सम्पूर्ण मिडिया में स्वाभाविक रूप से चीन के राष्ट्रपति के दौरे की चर्चा है।नरेन्द्र मोदी हमेशा कुछ न कुछ ऐसा कार्य अवश्य करते ह,ैं जो किसी न किसी अर्थाें एवं संदर्भों मे ऐतिहासिक होते हैं।ं चाहे गोधरा कांड के बाद उनका मुख्यमंत्री के रूप में सफलता पूर्वक पन्द्रह साल का सफर या उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 2014 के आम चुनावों में स्वतंत्रता के बाद मिली ऐतिहासिक अभूतपूर्व सफलता या फिर उनका पडोसी देशो सहित सार्क देशों के राष्ट्र्राध्यक्षों की उपस्थिति में ऐतिहासिक शपथ ग्रहण समारोह। भारत में चीन के राष्ट्रªपति का यह प्रथम दौरा नही ंथा,बावजूद इसके, यह दौरा इस अर्थ में ऐतिहासिक हो गया कि भारत के प्रधानमंत्री के जन्म दिवस पर शायद पहली बार विश्व की पांच सबसे बडी ताकतों में से एक चीन के राष्ट्र्रपति की उपस्थिति ने उन क्षणो को ऐतिहासिक बना कर मोदी के मुकुट पर चार चॉद लगा दिये। मोदी वैसे भी अपने आतिथ्य और मिजाज पुरसी के लिये अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति लिये हुये है।
अधिकाशंतः राजनैतिक क्षेत्रों व आलोचकों की दृष्टि मे शी जिनपिंग ं(चीन के राष्ट्र्र्रपति) की मुलाकात को ऐतिहासिक बताया जा रहा हैं। और ऐसा क्यों न कहा भी जाय,जब देश के विकास के विभिन्न व्यापक क्षेत्रों मे कुल 15 समझौते (साबरमती में हुये समझौतों को मिलाकर) दोनों राष्टा्रे के बीच सम्पादित हुये है। लेकिन इन ऐंतिहासिक समझौतों की सफलता की छाया मेें हमारा ध्यान राष्ट्र्र के आत्म सम्मान का सबसे अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा सीमा विवाद की ओर नही जा पाया। भारत चीन सीमा पर चीन द्वारा लगातार सीमा का उल्लंघन किया जा रहा है। लेकिन  शायद हमारा नेतृत्व बातचीत के टेबल पर इनके मद्देनजर आत्म सम्मान को लौटाने के लिये कोई ठोस बातचीत न करके अपने ही मंुह का जायका खराब नहीं करना चाहता है।
एक नागरिक की हैसियत से मेरी नजरें भारी भरकम 15 समझौंतों के पुलिंदें में उस समझौते को ढूंढते-ढूंढतें पथरा गई हैं जहां सीमा विवाद के सम्बध में वास्तविक तथ्यों के साथ हमारी सीमा के हितांे ंकी रक्षा के लिये भी कोई लिखित समझौता हुआ हों? किसी भी विदेशी राष्ट्र्राध्यक्ष के साथ 15 समझौतांे मे देश की सुरक्षा और सीमा विवाद से जुडे समझोैते का न होना निश्चित रूप से उस पाटर्ी्र के प्रधानमंत्री के लिये प्रश्न वाचक चिन्ह लगाते हैं जो हमेशा चीन और पाकिस्तान से सीमा के मुददे पर दो टूक निर्णय लेने में विश्वास रखती रही है, और इस बात का आक्षेप लगाती रही हैं कि इस मुद्दे पर देश हित में कांग्रेस की सरकार ने कोई निर्णय नहीं लेकर हमेशा   त्यागा ही है। मोदी जी ने चीन की घुसपैठ पर चिन्ता जताकर व एल0ए0सी0 के सत्यापन की बात कह कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली।शी जिनपिंग ं(चीन के राष्ट्र्रपति) ने यह कहकर भारतीय प्रधान मंत्री का मनोबल बढाया कि सीमा विवाद हमारे सबंधों के आडे नहीं आयेगा।चुनावी भाषणों के दौरान पाकिस्तान और चीन को ललकारने वाले मोदी जी का वह जोश इन दो दिनों मे कहां खो गया ?शायद साबरमति की झील में जाकर ठण्डा हो गया हैं।
एक तरफ तो डायनिंग टेबल पर भोजन के साथ चर्चा हो रही है, और दूसरी ओर उसी समय चीन सीमा पर उधम करने से बाज नहीं आ रहा है। ल़द्धाख चुमार की विडियो को मिडिया बातचीत की टेबल के साथ-साथ दिखा रहा है।देश की जिस युवा मत की बदौलत मूल रूप से मोदी इस गददी पर पहॅंुचे हैं, उसे मोदी ने वास्तव मे निराश ही किया हैं। क्या वार्ता चालू होने के पूर्व भारत सरकार द्वारा चीन को इस बात की वास्तविक रूप से कडी चेतावनी नही ंदी जा सकती थी कि यदि सीमा पर लगातार उलंध्घन करने व भडकाने का कार्य किया जाता रहेगा तो वार्ता रद्द हो सकती हैं। यह साहस यदि हम बातचीत के टेबल में नही ंदिखा सके तो यह भी शंकास्पद हो जाता हैं कि हम आवश्यकता पडने पर दुस्साहस दिखाने का प्रयास कर सकेेगे।
नेहरू जी के समय मे नारा लगाया जाता था कि''हिन्दी चीनी भाई-भाइ'र्' तो क्या अब हम ''हमारी भूमि आई-गई''की दिशा में बढ रहे हैं।चाहे मामला तिब्बत का ही लें या अरूणाचल का मामला लंे,भारत के पक्ष में और सैनिक हितांे पर एक भी आश्वासन/वादा चीन के राष्ट्र्रपति द्वारा नही दिया गया है, ऐसी स्थिति में क्या हम इस बात की गलती नही करते जा रहे हैं कि लगातार चल रहे सीमा उल्लधंन के बावजूद चीन को अपना श्रेष्ठतर मित्र मानते रहें।मुझे यह लगता है जब भी देश की सीमा का मामला आता है तो देश की सरकारे बगले झांकने लगती हैं और जनता कों बरगलाने के लिये सिर्फ बातांें का जमा-खर्च ही परोसा करती हैंं।अगर हमें मातृभूमि की एक एक इंच भूमि की सुरक्षा करनी हो,और उसे अक्क्षुण्ण बनाए रखना हो तो देश के नागरिकों को विशेषकर युवाओं को सामने आना होगा। 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

दिल्ली में ‘‘महामहिम‘‘ द्वारा नई सरकार की संभावनाओं की तलाश!

तथ्यात्मक,नैतिक,संवैधानिक,कानूनन,न्यायिक व प्रचलित परिपाटी के विरू़द्ध? 

   पिछले कुछ दिनो से नई दिल्ली मे भाजपा के नेतृत्व मे नई सरकार के गठन की चर्चा तेजी से पुनः सुखियों मे है। खास कर जब से मिडिया मे यह खबर लगातार छप रही है कि दिल्ली के उपराज्यपाल ने नई सरकार के गठन के संबंध मे हरी झड़ी देकर राष्ट्र्र्र्रपति शासन समाप्त करने की सिफारिश केन्द्रीय सरकार कोे भेजी है। अब तो उपराज्यपाल की राष्ट्रपति को भेजी गई चिट्टी भी मिडिया मे आ गई है।भारत एक मजबूत लोकतंात्रिक देश है। लेकिन राजनैतिक स्वार्थ के पूर्ति हेतु लोकतंांित्रक संस्थाये ,प्रणाली और अंगो को संविधान व कानून का तकनीकि जामा पहनाने का प्रयास किया जाकर, किस तरह से कमजोर किया जा सकता है, यह दिल्ली सरकार बनाने के प्रयासो के आइने मे देखा जाना चाहिये। जिसकीे बानगी को निम्नानुसार देखा-पढा जा सकता है। 
        ''राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद या तो एक वर्ष के अन्दर नई सरकार का गठन हो या पुनः'' एक वर्ष की अवधि के लिये राष्ट्रपति शासन बढाऐ जाने का निर्णय,या विधानसभा भंग कर नये चुनाव का निर्णय उपराज्यपाल कीे सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार संसद के दोनो संदनो द्वारा लिया जाना आवश्यक है। यह अकाट्य संवैधानिक कानूनी व्यवस्था दिल्ली राज्य के मामले में है। लेकिन वास्तव में क्या राज्यपाल अपना उक्त सवैंधानिक दायित्व निष्पक्ष रूप से निर्वहन कर रहे है ? वास्तव मंे क्या भाजपा के नेतृत्व मे अल्पमत की नई सरकार के गठन का प्रयास कर रहे है ? यदि वास्तव में ऐसा होने जा रहा है, तो उपराज्यपाल की यह सिफारिश संविधान पर एक हथौडा जैसी होगी। जिसकी मार से लोकतंत्र के एक भाग मे हल्की सी दरार जो लोकतंत्र के प्रहरी केे दिल मे दर्द पैदा कर देने वाली होेगी। दिल्ली मे जिस तरह की नई सरकार के गठन पर विभिन्न राजनेैतिक दलो ने आधिकारिक स्टैण्ड लिया है, वह न केवल विचित्र है, बल्कि देश के राजनैतिक इतिहास मे शायद यह पहली बार हो रहा है। जहॉ कोई भी राजनैतिक दल औपचारिक रूप से न तो सरकार बनाने के लिये आगे आया है और न ही सरकार बनाने का दावा किया गया है या कर रहा है, बल्कि मिडिया द्वारा सवाल पूछे जाने पर प्रत्येक राजनेैतिक दल ने अधिकृत रूप से सरकार बनाने के संबंध में दावे से प्रत्यक्ष रूप से इन्कार ही किया है। अंर्थात् प्रत्यक्ष रूप से समस्त राजनैतिक दलो का यह एक अधिकृत ऐजेन्डा है। लेकिन छिपा हुआ ऐजेन्डा क्या है यह सभी जानते है। वैसे ही जैसे कोई भी राजनैतिक दल या राजनेता स्वंय को भ्रष्टाचार का घोर विरोधी कहलाना पसन्द करता है लेकिन वास्तव में.....।
जब कोई भी राजनैतिक दल उपराज्यपाल के सामने प्रत्यक्ष रूप से आकर दावा प्रस्तुत नही कर रहा है।न ही किसी भी पार्टी का विभाजन होंकर सरकार बनाने के लिये अन्य दलो का बहुमत का दल नही बन सका है। अब ऐसी कौन सी स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि महामहिम उपराज्यपाल को लगने लगा है कि भाजपा दिल्ली मे स्थायी सरकार बना लेगी। वह भी तब जब दिल्ली की तीनो महत्वपूर्ण पार्टियां भाजपा,काग्रेस व आप काआधिकारिक स्टैण्ड देखा जाये तो ये वे परस्पर घोर विरोधी रूख लेते हुये परस्पर समर्थन से लगातार इन्कार करने के साथ एक दूसरे पर खरीद फरोक्त व लालच का आरोप भी लगा रहे हैं। अब जब सबसे बडी पार्टी भाजपा की सदस्यो की सख्या 31 (अकाली दल सहित 32) से घटकर 28 हो गई है,और केन्द्रीय गृहमंत्री व भाजपा के वरिष्ठतम नेता राजनाथ सिह का यह बयान कि भाजपा जोड-तोड की राजनीति से सरकार नही बनाएगी, व भाजपा के प्रवक्ताओ द्वारा भी यह कहा गया है कि हम संविधान के बाहर जाकर कार्य नही करेगें।तब किसी अन्य दल का समर्थन मिले बिना और जब किसी अन्य दलो के विधायक/विधायको का समूह भाजपा मे शामिल नहीं हुआ है व न ही भाजपा को समर्थन की वकालत कर रहे है, तब बिना खरीद फरोक्त व दल-बदल के बहुमत का जादुई आकडा 34 को कैसे पाकर सरकार बना सकती है, यह प्रश्न लोकतंत्र के रक्षको के मन में निरंतर आशंका उत्पन्न कर रहा है। भाजपा इस बात का खुलासा बिलकुल भी नही कर रही कि वह बहुमत कैसे पायेगी/जुटायेगी। ऐसी स्थिति मंे और ,जब पार्टी उपराज्यपाल के निमंत्रण के पूर्व तक बहुमत का दावा नहीं कर रही है। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय यह कथन है कि उपराज्यपाल का निमंत्रण मिलने के आधें घंटे के भीतर पार्टी अपना नेता चुन लेगी ,उक्त संदर्भ में संज्ञान लेने योग्य बयान है। 
यदि हम पिछले पन्नो को पलटे जब दिल्ली विधानसभा के चुनाव हुये थे तब उपराज्यपाल ने भाजपा को सबसे बडी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का निमत्रणं दिया था। तब भाजपा द्वारा इस आधार पर सरकार बनाने से साफ इन्कार कर दिया गया था कि भाजपा के पास न तो सरकार बनाने के लिये पूर्ण बहुमत है और न ही जनता ने उन्हे सरकार बनाने का जनादेश दिया है,अतः वे विपक्ष मे बैठना ज्यादा पसन्द करेगें।तब उपराज्यपाल ने काग्रेस केे द्वारा एक तरफा आप पार्टी को दिये गये लिखित समर्थन की चिटठी के बाद ही आप पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को(जिन्होने तब भी सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत नही किया था) सरकार बनाने का निमत्रण दिया था। तब चौतरफा दबाव के आगे 18 सूत्रों के आधार पर अनिच्छा से सरकार बनाई गई थी।लेकिन तब उनके पास बिना मांगे पूर्ण बहुमत था। तब भाजपा ने भी यह कथन किया था कि विधानसभा में मुददो के आधार पर सरकार को समथर््ान देगे। इस प्रकार एक बहुमत की सरकार जिसके बहुमत के बाबत् उपराज्यपाल ने स्वंय के आकंडों की संतुष्टी के बाद ही सरकार का गठन किया था। आप पार्टी द्वारा लोकपाल के मुददो पर विधान सभा मे हार जाने के कारण बहुमत खो देने से केजरीवाल की सरकार को इस्तीफा देना पडा। तब से लेकर आज तक दिल्ली विधान सभा की स्थिति में सरकार बनाने के लिये आकडो की स्थिति मे कोई बुनियादी फर्क नही आया है।यदि कोई बदलाव आया है तो आप व काग्रेस दोनो पार्टीयां जो अब दो विपरीत कोनो मे खडी हो कर बहुमत से एकदम दूर हो गई।तब किस आधार पर उपराज्यपाल किसी भी दल को सरकार बनाने का न्यौता दे सकते है जब उनके पास केन्दीय्र सरकार को रिपोर्ट देने के समय तक किसी भी पार्टी का सरकार बनाने का औपचारिक दावा लंबित नही था,और न ही कोई पार्टी या गठबंधन प्रत्यक्ष रूप से बहुमत के करीब है।
जहॉ तक सबसे बडी पार्टी भाजपा को पुनः निमंत्रण दने का प्रश्न है यह कदम राज्यपाल वर्तमान संदर्भ   में दूसरी बार नहीं उठा सकते है। एक तो अन्य समस्त पार्टियो ने भाजपा के विरोध की ्घोषणा की है। दूसरे यह तो कोई टेस्ट क्रिक्रेट का खेल नही है जहॉ दूसरी पारी का अवसर मिलता है, जब फिर से ओपनर बेटिग  करने आ जाता है। यह सरकार गठन की लगातार प्रक्रिया है जिसमें उपरोक्त तीनो विकल्पो मंे से प्रथम दो विकल्प के उपयोग के बाद सरकार बनाने का कोई दावा लंबित नहीं होने के कारण अंतिम विकल्प विधान सभा भंग का ही रह जाता हैं। यदि राज्यपाल यह मान रहे है कि विधान सभा के फर्श पर ही बहुमत का निर्णय होना चाहिये, व बात परम्परा की है तो फिर वे आप पार्टी के नेता को  पूर्व परम्परा के आधार पर पुनः क्यो नहीं निमंत्रण दे देते है जिसने पहले भी क्राग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाकर विश्वास मत हासिल कर उपराज्यपाल के निमंत्रण के निर्णय को सही सिद्ध  किया था। यदि एक निर्दलीय विधायक या जदयू विधायक उपराज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करते है तो क्या उपराज्यपाल उच्चतम न्यायालय के निर्देश के तहत जिसका हवाला उन्होने अपनी चिट्ठी मे किया है, सरकार बनाने के लिये उनको बुलायेगें ?े क्योकि बहुमत का निर्णय तो विधान सभा के फर्श पर ही होगा ?उपराज्यपाल का यह कृत्य किसी भी गैरकानूनी दल-बदल को बढावा देने वाला ही सिद्ध होगा ? ( कानूनी रूप से भी दल बदल हो सकता है) दो तिहाई सदस्यो के विभाजन के साथ दल बदल को भी कानूनी मान्यता प्राप्त है। लेकिन जो अभी तक हुआ नहीं है। सार यही है कि भाजपा परोक्ष रूप से राज्यपाल के माध्यम से क्रांग्रेस/आप पार्टी के विधायकों को मंत्री पद/लाभ के पद के द्वारा कारण दल-बदल कराने अनैतिक प्रयास करना होगा यदि उसे सरकार बनाने दे व बनाये रखना है तो।
उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों, परिपाटियों व प्रचलित परम्पराओें का उदाहरण उपराज्यपाल के भविष्य के गर्भ मे तकनीकि रूप से छुपे हुये निर्णय के लिये दिये जा रहे है। उन सभी मामलो मे किसी न किसी पक्ष द्वारा या तो बहुमत के दावे के साथ सरकार बनाने का दावा किया गया था या बहुमत के संबंध में सदस्यो की हस्ताक्षरयुक्त सूची प्रस्तुत की गई थी या सदस्यो की परेड़ कराई गई थी। यद्यपि सूची का सत्यापन विधानसभा के फर्श पर ही किया जाना था। यहॉ जब सूची ही प्रस्तुत नहीं की गई है और न ही कोई दावा किसी भी रूप में प्रस्तुत किया गया है, तब उसके विधान सभा के फर्श पर सत्यापन का प्रश्न ही पैदा नहीं होता है। वास्तव में  प्रत्येक पार्टी अपने राजनैतिक चाले अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये चल रही है। शायद भाजपा राजनैतिक चालों के तहत अत्यधिक आलोचना की स्थिति में संभावनाओं के विपरीत उपराज्यपाल के निमंत्रण को अस्वीकार कर जनता के बीच इस संदेश के साथ चुनाव में जा सकती हे कि वह सत्तालोलुप नहीं है व वह जनादेश प्राप्त करना चाहती है। उपराज्यपाल को इन चालो से बचना चाहिऐ व संविधान की रक्षा करने का संवैधानिक दायित्व निभाना चाहिये।इसके लिये उनके पास एक मात्र विकल्प ही शेष है कि वे राज्य विधानसभा को भंग कर पुनःचुुनाव की सिफारिश केन्द्रीय सरकार से करने के लिये पुनःसिफारिश पत्र लिखे।    
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं) 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

राहुल ‘बाबा‘ का उद्बोध! मोदी जापान में ड्रम बजा रहे है! बचकाना कथन!

   राहुल बाबा या तो ‘‘ मननोहन‘‘ हो जाते है अर्थात्  कुछ बोलते ही नहीं है या वे बाबा(बच्चे) बन जाते हैं जब, कुछ बोलने का प्रयास करते है क्योकिं उनके बोल प्रायःबच्चों जैसे ही होते है।देश एवं देश के नागरिक  नित-प्रतिदिन विभिन्न समस्याओं से रूबरू होते है जिस पर राजनेताओ की प्रतिक्रियाये स्वभाविक रूप से अपेक्षित रहती है। लेकिन पिछले काफी समय से यह देखा गया है  कि राहुल बाबा चाहे वे सत्ता मे हो या विपक्ष मे देश मे घटने वाली विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाये चाहे वह राजनैतिक हो, सामाजिक हो अथवा धार्मिक हो या अन्य कोइर्, हमने राहुल को अकसर उनसे मुंह मोडते हुये देखा है। और जब भी भूले बिसरे वे किसी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते है तो उसका स्तर ऐसा होता कि वे स्वंय की हंसी का पात्र बना लेते है।
अमेठी दौरे के दौरान पत्रकारो से चर्चा करते हुये राहुल गांधी का मोदी की जापान यात्रा पर किया गया कटाक्ष पूर्ण बयान कि ‘‘देश बिजली संकट से जूझ रहा हैं और हमारे प्रधान मंत्री जापान में ढोल बजा रहे है यहां पर लोगों के पास बिजली पानी नही है और सब्जियां भी महगी है।‘‘‘‘वास्तव मे यह बयान स्वंय राहुल गांधी पर ही कटाक्ष पूर्ण हो गया।उक्त बयान उन्होने अमेठी दौरे के समय दिया। क्या उन्होने बिजली ,पानी ,रोड महगांई की स्थिति अमेठी की ,उत्तर प्रदेश की लिये या देश की व्यक्त की ? लेकिन किसी भी सूरत में  यह स्थिति पिछले सौ दिनो मे उत्पन्न नहीं हुई हैं बल्कि पिछले सडसठ सालों के शासन/कुशासन/सुशासन ? के कारण पैदा हुई है। जिस पर पिछले दस सालों से व उसके पूर्व के अधिकाशं समय राहुल गांधी की देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पार्टी का ही शासन रहा है।इसके लिए जिम्मेदार कौन ? इस निर्णय पर पहुचने मे शायद ही किसी को कोई शंका होगी चाहिये। बल्कि इस बात के लिये तो राहुल गांधी को उनके  विपक्षी दलों द्वारा धन्यवाद देना चाहिये कि देश और देश के नागरिकों की वास्तिविक स्थिति को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से  उन्होने स्वीकारा है, जिसकी लगातार आलोचना पिछले कई समय से विभिन्न विपक्षी दल करते चले आ रहे थे, किन्तु कांग्रेस ने कभी उसे स्वीकारा नहीं था।
राहुल बाबा शायद इस बात को भूल गये उनके नाना जब भी  देश या विदेश मे दौरे पर जाते थे, तो वे बच्चो के साथ उन्मुक्त भाव से शिरकत ़कर घुल मिल जाते थे तभी वे चाचा नेहरू कहलाये। कुछ इसी प्रकार पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद का बच्चों के प्रति वात्सल्य था ।मोदी जी भी जापान जाकर इसी तरह बच्चों के एक कार्यक्रम कल मे घुल मिल गये। राहुल बाबा उक्त  कटाक्ष करते समय भूल गये कि वास्तव मे वे क्या कहने जा रहे है और क्या कह गये? वास्तव मे देश का यह दुर्भाग्य है कि जहां पहली बार  स्वस्थ परिपक्व  विपक्ष  का पूर्णता अभाव है जो लोकतंत्र की सफलता ेके लिये घातक है। लोकतंत्र मे बेलगांम सत्ता.धारी दल पर अकुंश जागरूक और समझदार विपक्ष ही कर सकता हैं।पिछले सौ दिनो मे मोदी  की सत्ता और  उनके व्यक्तिव का ऐहसास तो हर जगह हुआ है। लेकिन विपक्ष कहीं भी मैाजूद नही पाया गया। उसका सबसे बडा कारण देश की सबसे पुरानी काग्रेस पार्टी का नेतृत्व राहुल गांधी के पास है।इसलिये देश व कांग्रेस के हित में है कि एक अनुभवी और परिपक्त व्यक्तिव के हार्थो मे काग्रेस अपना नेतृत्व सौपेैं।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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