सोमवार, 19 सितंबर 2016

‘‘ वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था’’ की ‘‘ध्वस्त’’ होती अवस्था के लिये क्या केजरीवाल दोषी नहीं ?

इतिहास अपने को दोहराता हैं, अक्सर ऐसा कहा जाता हैं। स्वतंत्रता के बाद से ही कांग्रेस की सिन्द्धात-हीन राजनीति पर आधारित लम्बे समय से चले आ रहे लगभग एक ही परिवार के बेरोक-टोक शासन पर प्रथम बार 1967 में संविद शासन के (असफल) प्रयोग द्वारा रोक लगी। लेकिन ‘‘आया राम’’ ‘‘गया राम’’ की राजनीति के चलतेेे 3-4 सालो में ही कांग्रेस के विकल्प में बनी यह प्रथम वैकल्पिक राजनैतिक व्यवस्था असफल हो गई। असफल होनी ही थी क्यांेकि उसका मूल आधार ही ‘‘आया-राम’’ ‘‘गया-राम’’ था। वर्ष 1971 में गरीबी हटाओं के नारे से इंदिरा गांधी को (कांग्रेस का सीधा विभाजन सिंडीकेट-इंडीकेट के बीच करने के पश्चात्) जबरदस्त बहुमत प्रात हुआ था। तत्पश्चात ऐन-केन-प्रकारेण सत्ता पर कब्जा बनाये रखने के दबाव वश व उसी दृष्टि से इंदिरा गंाधी ने ऐतहासिक भूल करके आपात्तकाल लगाया था जिसे लोकत्रंत का सबसे काला अध्याय कहा जाता रहा हैं। फिर गहन मंथन व विचार के पश्चात् वैकल्पिक राजनैतिक व्यवस्था के रूप में जनता पार्टी का उदय हुआ जिससे 1977 के आम चुनाव में ़(अपराजित) इंदिरा गंाधी को न केवल स्वयं पराजित हेाना पड़ा बल्कि उनकी पार्टी केा भी ऐतहासिक व कड़ी हार का सामना करना पड़ा और उन्हंे सत्ता च्युत भी होना पडा। लेकिन यह वैकल्पिक राजनैतिक व्यवस्था भी 1980 में जनता पार्टीे में जनसंघ के रूप में शामिल हुए घटक के के द्वारा नई पार्टी भाजपा बना कर जनता पार्टी से बाहर निकल जाने के कारण चरमरा गई। तत्पश्चात वी पी सिंह के आंदोलन, आसू अंादोलन सहिंत व्यवस्था व भ्रष्टाचार के विरूद्ध राष्ट्रव्यापी व कई राज्यव्यापी आंदोलन हुये। लेकिन कोई भी आंदोलन न तो भ्रष्ट व्यवस्था की अपेक्षित वैकल्पिक गुणात्मक व्यवस्था व जनलोक हितकारी राजनीति बन पाई, न ही लम्बे समय तक वह सफल रही।
लम्बे अंतराल के पश्चात् वर्ष 2013 में जनलोकपाल के मुद्दे पर अन्ना आंदोलन आया जो तेजी से राष्ट्रव्यापी प्रभाव छोड़कर बढ़ता चला गया। अन्ना आंदोलन में चेहरा अन्ना का था परन्तु दिमाग अरविंद केजरीवाल का था। उक्त ‘‘चेहरे’’ व ‘‘दिमाग’’ ने मिलकर उक्त आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता प्रदान कर दी। उक्त आंदोलन से उत्पन्न वस्तुस्थिति का फायदा उठाकर अरविंद केजरीवाल ने गैर राजनैतिक आंदोलन की मूल भावना व सिद्धात के विपरीत एक नई पार्टी नई दिशा व अलभ्य सिद्धांतो के नारो के साथ राजनैतिक पार्टियों के भीड़तंत्र (भीड़ नहीं) के बीच अपने अलग पहचान वाले तंत्र के रूप में असंख्य जनप्रिय वायदों के साथ साथ उतरी, जिसे जनता ने स्वीकार कर दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी के ‘‘झाड़ू छाप’’ उम्मीदवारो को विजयी बनाकर दिल्ली के राजनैतिक मैदान में भी ‘‘झाडू’’ फेरकर न केवल कांग्रेस का वर्ष 1977 में हुये आम चुनाव के समान ही जब उसका पूरे उत्तर भारत में पूर्णतः सफाया हो गया (मात्र एक सीट छिंदवाड़ा को छोड़कर) बल्कि अन्य समस्त दलो को भी लगभग सफाचट कर दिया। यह ऐतहासिक विजय इस बात का संकेत थी कि अन्य पार्टी की तुलना में ‘आप’ पार्टी एक नई वैकल्पिक राजनीति की नई पारी प्रांरभ कर रही हैं। लेकिन इतिहास फिर आड़े आ गया। इतिहास अपने को दोहराता हैं। आम आदमी पार्टी का भी वही हस्र हो रहा हैं जैसा पूर्व में भी वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाली अन्य राजनैतिक पार्टियों का होता आया हैं।
आम आदमी पार्टी भी अन्य राजनैतिक पार्टियांॅ कंाग्रेस, समाजवादी, बसपा इत्यादि के समान ही सिद्ध हो रही हैं। यहां भी आंतरिक लोकतंत्र की कोई सम्भावना नहीं हैं, बल्कि वास्तव में आंतरिक लोकतंत्र के बगैर अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व थोपकर स्थापित किया गया है। ये वही अरविंद केजरीवाल हैैं जो अन्ना आंदोलन के समय पूरी की पूरी व्यवस्था को असफल व भ्रष्ट कहते नही थकते थे। वह आरोप लगाते थे कि ‘‘यह जो संसद हैं वह वास्तविक संसद नहीं हैं। (वास्तविक संसद तो वह लाखो जनता हैं जो हमारे सामने मैदान में खड़ी हैं) क्योंकि इसमें 224 से ज्यादा सांसद आरोपित हैं जिन पर भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार विरोधी अधिनियम व अन्य अधिनियमो के तहत विभिन प्रकार के संगीन आरोप लगे हुए हैं। जिनके विरूद्ध अभियोजन भी चल रहा हैं। उन सब आरोपित सांसदों को संसद से इस्तीफा देकर तथा दोष मुक्त हो जाने के पश्चात् संासद का चुनाव लड़कर ही संसद में आना चाहिए।’’ जब विभिन्न पार्टी के लोगो ने केजरीवाल की उक्त बात का जवाब यह कह कर दिया कि ‘‘बहुत से आरोप तो राजनीति के चलते सत्ता पक्ष द्वारा राजनीतिक कारणो से लगाये गये हैं’’ बेबुनियाद हैं तब भी केजरीवाल का स्टैंड वही था। (केजरीवाल जी कृपया अपने पुराने भाषणों को सुन ले)।
विपक्ष की चुनौती को स्वीकार कर नई पार्टी बनाकर केजरीवाल ने स्वयं सिंद्धातों की जो रेखा खीचकर अभी तक अन्य दलों व राजनीतिज्ञों को जो आयना दिखाया जो अब स्वयं उनकी पार्टी के विधायकों नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा दिन प्रतिदिन की जा रही हरकतो से स्वयं अपनी बनाई गई लक्ष्मण रेखा में फंसते जाकर उन्हे शर्मिदा होकर उक्त आयने में स्वयं का चेहरा देखने के लिये मजबुर होना पड़ रहा हैं। इस कारण से हताशा व गुस्से में ‘आप’ अपनी रक्षा में तू तड़ाक पर उतर कर वही प्रति-आरोपो की राजनीति कर रही हैं जिसका विरोध करके केजरीवाल स्थापित हुये थे। वास्तव में शुरू-शुरू में इस देश के नागरिको को अरविंद केजरीवल के वादो, बातो व कार्य करने की शैली से बहुत सी उम्मीदें जगी थी। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य व सत्य यही हैं कि सत्ता अपना असर व प्रभाव अवश्य डालती हैं और सत्ता के दुष्प्रभाव ने केजरीवाल को अपनी गिरेबान में पूर्णतः जकड़ लिया हैं जो अन्य घिसी पिटी राजनीतिज्ञों की ही भाषा बोल रहे हैं जिन्हें जनता खूब समझ रही है।
आज अब केजरीवाल को क्या हो गया हैं? उनकी पार्टी के अधिकांश विधायक आरोपों के चलते पार्टी की किस तरह की छिछल्लेदारी करा रहे हैं। 17-18 विधायको के खिलाफ ‘‘चारित्रिक आरोप’’ सहित संगीन आरोप लगे हैं। बल्कि कुछ विधायको पर तो संपर्क में आने वाली महिलाआंे के शील भंग व चरित्र हनन तक के आरोप लगे है। 21 विधायको पर तो ‘‘लाभ के दोहरे पद पर बने रहने’’ की तलवार लटक रही हैं जिससे उनकी विधान सभा की सदस्यता ही खतरे में पड़ी हुई हैं। विधायको पर समस्त आरोप विधायक बनने के बाद की घटित घटनाओं के संबंध में ही लगे हैं। हर ‘महिने 15 दिन’ में किसी न किसी विधायक को विभिन्न आरोपो में चार्जशीट किया जा रहा हैैं। कुछ तो अभी भी जेल में बंद हैं। यदि यही गति वृद्धि चलती रही तो विधानसभा अवधि के पूरे होने तक शायद सभी विधायक आरोपित न हो जायंे। स्वयं केजरीवाल पर भी उनकी ही पार्टी के सदस्य ने गंभीर आरोप लगा दिये हैं। यहॉं यह भी उल्लेखनीय हैं कि इनमें से अधिकांश आरोप आप पार्टी व उसके कार्यकताओं के द्वारा ही लगायंे गए हैं। इतना सब होने के बावजूद केजरीवाल ने मात्र तीन मंत्रियों को पद मुक्त करने के अलावा दो चार के खिलाफ ही पार्टी से निकालने की कार्यवाही की, बाकी शेष बहुसंख्य विधायको एवं मातहतो के संबंध में उनका स्टैंड वहीं है जो पूर्व में केजरीवाल के आरोपो के संबंध में अन्य पार्टीयों का रहता आया है।
केजरीवाल का असफल होना मात्र केजरीवाल की असफलता नहीं हैं बल्कि यह उन लाखों करोड़ो लोगो की आकांक्षाओं व उत्साह को झटका, उनका खंडन व भावनाओं की हत्या हैं जिन्हांेने केजरीवाल से बड़ी उम्मीदे की थी। भविष्य में इसी तरह के वैकल्पिक व्यवस्था हेतु परिस्थतियों में सुधार लाने के लिये थोथे दावे करने वाले अन्य व्यक्तिों पर जनता का विश्वास जमना मुश्किल होगा। इसलिए अरविंद केजरीवाल को जनता के न्यायालय में वैकल्पिक व्यवस्था की हत्या केे लिये कड़ी से कड़ी सजा दिया जाना अत्यावश्यक हैं ताकि भविष्य में कोई अन्य नेता जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर सके और लम्बे समय तक वैकल्पिक राजनैतिक व्यवस्था बनाए रखनें के लिये ऐसे कारणों से निराशा के कारण अपेक्षित/वांछित नेतृत्व की कमी न हो।
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