सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

क्या वास्तव में देश की ‘‘पुलिस व्यवस्था’’ राजनीति के हत्थे चढ़ी हुई नहीं है?

राजीव खण्डेलवाल:
 ‘‘जेएनयू ’’दिल्ली में हुई घटना में दिन प्रतिदिन कोई न कोई इतिहास लिखा जा रहा हैं। ऐसा लग रहा है कि एक ‘‘पूरी किताब’’ के ‘‘प्रकाशन’’ की तैयारी की जा चुकी है। इस ‘‘किताब’’ की भूमिका किसने लिखी, यह प्रश्न अब गाैंण होते जा रहा है। चंूकि एक पूरी किताब लिखी जा रही है जिसमंे कई अघ्याय भी होगंे। इसलिये समस्त पक्ष इस किताब को पूर्ण करने में अपनी आहूती देने में ही अपना कर्तव्य मान रहे है। ‘‘कर्तव्य निष्ठा’’ के इस  कृत्य में किसी भी पक्ष को यह होश नहीं हैं कि राष्ट्रवाद व संवैधानिक व्यवस्था उनसे क्या अपेक्षा रखती हैं। भारतीय नागरिक होने के बावजूद जन मानस में उनके प्रति देशद्रोह की छवि अंकित होती जा रही है, इस बात का  भी उन्हें अहसास नहीं हैं। एक भारतीय नागरिक होने के नाते ऐसे अवसरो पर उनकी भूमिका किस तरह की निर्माणात्मक, सहयोगात्मक होनी चाहिये, इसका भी किसी भी पक्ष को होश हवास नहीं है। यदि होश है, तो मात्र एक दूसरे के ऊपर, चरित्र के उपर कीचड़ उछालने का। इन सबमें हास्यापद बात यह भी है कि यह कार्य बखूबी राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र हित के नाम पर प्रत्येक पक्ष द्वारा किया जा रहा हैं। शायद हिन्दुस्तान की यही विशेषता है।
      दिल्ली के कमिश्नर बी.एस. बस्सी अगले दस दिनो में रिटायर होने वाले हैं। उनका यह बयान कि गिरफ्तार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के द्वारा न्यायालय में जमानत आवेदन दिये जाने पर पुलिस उसकी जमानत का विरोध नहीं करेगी, किस बात की ओर इंगित करता है? यह बयान क्या पुलिस के प्रति जनता की इस समझ (परसेप्शन) को ही सिद्ध नहीं करती है कि पुलिस प्रशासनिक व राजनीतिक हस्तक्षेप के अधीन ही कार्य करती है? क्या आपने अभी तक कभी ऐसा देखा है, सुना है कि ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ के अपराध में गिरफ्तार जेल के सलाखों के पीछे बंद एक अभियुक्त व्यक्ति के संबंध में कभी कोई बयान पुलिस आयुक्त द्वारा सार्वजनिक रूप से दिया गया हो? अभी तक यही कानूनी समझ व मान्यता थी कि यदि पुलिस ने किसी व्यक्ति को किसी ‘‘गैर जमानती’’ अपराध खासकर ‘‘देशद्रोह’’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया हो, तो पुलिस प्रशासन (अभियोजन) उसकी जमानत का विरोध अंतिम क्षण तक, देश की उच्चतम् न्यायालय तक करती है। यह ध्यान देने की बात है कि ‘‘बस्सी’’ का यह बयान भी कन्हैया कुमार के जमानत आवेदन देने के पूर्व आया हैं। मानो पुलिस आयुक्त को कन्हैया कुमार को गलत धारा में गिरफ्तार करने का अपराध बोध हो रहा हो व वे आरोपी से यह कह रहे है, कि गलती हो गई हैं आप जमानत का आवेदन दीजिये। हम इसका विरोध नहीं करेगे। अपनी गलती सुधार लेगें? क्या हमारे प्रदेश की        जनता इस तथ्य को भूल गई है कि व्यापमं कांड में सैकडों की संख्या में युवा छात्र गण विगत एक -दो वर्षो से जेल में सड़ रहे है? जांच पूरी हो चुकी है उनके खिलाफ यह आरोप नहीं हेै कि वे गवाहो को डराने धमकाने से लेकर प्रभावित करेगे। उनके विरूद्ध हत्या बलात्कार या देशद्रोह जैसे गंभीर आरेाप भी नहीं हैं। फिर भी एसटीएफ, सीबीआई द्वारा जमानत का लगातार विरोध किया जाता रहा हैं। क्या यह पुलिस का दोहरा मापदण्ड़ नहीं हैं? पुलिस आयुक्त के इस बयान से क्या इस बात का अहसास नहीं होता है कि अपराधियों की जमानत के मामले के निर्णय ‘‘न्यायालय’’ के विवेक से ज्यादा अभियोजन के रूख पर निर्भर करते है? 
     इस बात में कोई शक नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन की पहचान एक सबसे अग्रणी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में रही हैं। उसी प्रकार जिस प्रकार कश्मीर में जे.के.एल.                          एफ. से लेकर अन्य कई संगठनों की पहचान अलगाव वादी संगठनो के रूप में है। यद्यपि इन संगठनों में कई भारतीय नागरिक भी है। लेकिन वर्तमान भारतीय राजनीति आज एक ऐसे दोराहे पर आकर खड़ी हो गई है जहॉं एक तरफ संघ का राष्ट्रवाद है तो दूसरी ओर एक ओढी हुई गैर साम्प्रदायिकतवाद के नाम पर ‘‘लेफ्ट-राईट’’ व तथाकथित अपने को श्रेष्ठतर मानने वाले बुद्विजीवी वर्ग इत्यादि खड़े हैं। दोनो धु्रव के बीच इतनी दूरी है या यह कहिये कि अपने को गैर साम्प्रदायिकता के सबसे बड़े हितेषी पोषक कहलाने वाले तत्व संघ से इतनी घृणा करते है कि वे ‘संघ’ का विरोध करते समय यह तथ्य भूल जाते है कि वे अनजाने में ही राष्ट्रवाद का विरोध करतेे हुये दिखते है। संघ के आनुषंगिक संगठन विद्यार्थी परिषद (ए.बी.वी.पी) ने राष्ट्रवाद का झंडा उठाते हुये अफ़ज़ल गुरू की बरसी पर जेएनयू में होने वाले कार्यक्रम के लिए दी गई अनुमति के विरोध में ज्ञापन दिया, जिसके फलस्वरूप उक्त अनुमति निरस्त कर दी गई। चंूकि उक्त कदम ‘संघ’ के एक आनुषंगिक संगठन द्वारा उठाया गया था इसलिये उसका विरोध करना लेफ्ट वाले अपना धर्म मानते हैं। विरोधियों की ऐसी मानसिकता के रहते ‘संघ’ को भी युद्ध के समान कभी एक कदम आगे बढाने के साथ दो कदम पीछे हटना की नीति को अपनाना चाहिए। यह भी राष्ट्रधर्म ही होगा, जो वर्तमान परिस्थिति की मांग है। तब ऐसे तत्वो को संघ विरोध के नाम पर राष्ट्र विरोध करने का अवसर नहीं मिल पायेगा। जेएनयू में हुई घटना के नाम पर बगैर राष्ट्रहित का ख्याल किये देश में पक्ष व विपक्ष में जो कुछ क्रिया-प्रतिक्रिया हो रही हैं, वह इसी का परिणाम है। देश के विभिन्न जगहों परं जेएनयू की पुलिस कार्यवाही व पटियाला कोर्ट में हुई पुलिस असफलता की प्रतिक्रिया में जो प्रदर्शन ही रहे है, वे समस्त देशद्रोही नहीं हैं। लेकिन चूंकि ‘‘मामला’’ राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का बना लिया गया है इसके कारण राष्ट्रवाद की भावना को अनावश्यक ही (इन विरोधो के कारण) नुकसान पहुंचा रहा हैं। इसलिये वक्त की सबसे प्रथम आवश्यकता है कि राष्ट्रवाद को उक्त घटना से हटाया जाय। परन्तु फिर पुनःस्वतः प्रश्न पैदा हो जायेगा कि बिना ‘‘राष्ट्रवाद’’ के ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ कैसे होे सकता हैं? तब इसके आगे तो स्वयं को (औरो के समान) बुद्धिजीवी क्लेम न करने वाली 
बुद्धिजीवी जनता को ही सोचना होगा.....। 
      माननीय स्वभाव का एक महत्वपूर्ण चारित्रिक विशिष्टता यहॉ पर एकदम फिट बैठती हैं। यदि आप किसी व्यक्ति, संस्था या विचार धारा इत्यादि को घृणा से देखते है और वे यदि कोई अच्छा कार्य भी कर रहे है जो समाज को समाज हितैषी एक अच्छा संदेश देता हो तब भी आप ‘घृणा’ की भावना के तहत  विरोध के कारण उसके उस अच्छे कार्य का भी विरोध ही करेगें। उसके लिये तर्क-वितर्क-कुतर्क देगें। फिर चाहे फिर उस विरोध का परिणाम आप स्वयं के हितो के विपरीत ही क्यों न जा रहा हो। देश में आज यही धारणा व्याप्त हैं। 
                

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

क्या ‘‘भारतीय राजनीति’’ को ‘‘देशद्रोह’’ के ‘‘अपराध’ में ‘‘फांसी’’ पर लटकाने का समय नहीं आ गया है?

राजीव खण्डेलवाल:
  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में जो कुछ घटित हो रहा हैं व जिस तरह की राजनीति व राजनैतिक प्रतिक्रिया उक्त घटना पर देश में हो रही है, वह सब आपके समक्ष आ चुकी है। क्या विश्व के अन्य किसी भी देश में वहॉ के नागरिको द्वारा इस तरह का व्यवहार व प्रतिक्रिया  पहले कभी आपने सुनी है?
       भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हैं। यहॉं बोलने की पूरी स्वंतत्रता है। यद्यपि बोलने की स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह के रूप में एक काला धब्बा आपात्तकाल के रूप में इस देश के इतिहास पर लग चुका हैं। हमारे देश में ‘‘विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था है’’ यह कहते कहते हम आत्मविभोर हो जाते है। उच्चतम् न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से निर्णय दिये जाने के बाद अफ़जल गुरू को देशद्रोह के अपराध में  फांसी दी गई जिसके संबंध में किसी भी तरह का कार्यक्रम आयोजित करना अपने आप में देशद्रोह है। फिर भी बगैर स्वीकृति प्राप्त किए देश की राजधानी स्थित जेएनयू विश्वविद्यालय में अफ़जल गुरू की फांसी की बरसी के बहाने देश की सार्वभौमिकता, अखंडता, एकता व सम्मान पर आघात पहंुचाने वाली जो घटनाएं हुई, वह देश के बाहरी दुश्मनांे द्वारा की जा रही आंतकवादी घटनाओं से कम-तर घातक नहीं है। उक्त घटना के विरूद्ध पुलिस ने पूर्व दिल्ली के सासंद द्वारा कार्यवाही की मांग किये जाने के उपरान्त ही विश्वविद्यालय प्रागंण में छोटी मोटी कार्यवाही ही की। यद्यपि यह भी बहुत देर से की गई है। इसकी प्रतिक्रिया में राजनैतिक दलों व नेताओं ने जिस तरह की भाषा का उपयोग स्वतंत्रता व स्वायत्तता के नाम पर किया, वह भी विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा देश के विरूद्ध की जा रही अर्नगल नारे बाजी व भाषा से कम बदतर नहीं हैं। लेकिन इन नेताओं व राजनैतिक दलो द्वारा भी भारत विरोधी देशद्राही भाषा-बोली की न तो भर्त्सना ही की गई और न हीं उन आराजक तत्वों के विरूद्ध कोई कार्यवाही की मंाग ही की गई। जएनयू टीचर एसोसिएशन व अन्य राजनैतिक नेताओं को क्या विभिन्न टीवी चैनलों में चल रहे वीडियों क्लिप नहीं दिख रहे है? क्या देशद्रोह की परिभाषा को इन नेताओं के अनुसार पुनः परिभाषित करने के लिए भारतीय दंड संहिता में संशोधन करना होगा? जो इन वीडियों में दिखाए जा रहे बयान या नारों को देशद्रोही बयान मानने से इनकार कर रहे है।
      अभिव्यक्ति व स्वायत्तता के नाम पर तथाकथित छोटी सी कार्यवाही (मात्र एक व्यक्ति जेएनयू के अध्यक्ष कीे गिरफ्तारी) का विरोध करने वाले समस्त तत्व यह भूल गए कि पूर्व में भी इसी तरह धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर विख्यात स्वर्ण मंदिर अमृतसर में आंतकवादियों ने आश्रय स्थल बनाकर पनाह गार पनपा ली व उसका दुरूपयोग कर पूरे पंजाब में अशांति का वातावरण पैदा किया गया। अंततः उसकी समाप्ति के लिये इंदिरा गांधी को (दुर्गा बनकर) आपरेशन ब्लूस्टार करवाना पड़ा, तब जाकर पंजाब में शांति बहाल हुई। जिस तरह अमृतसर का प्रख्यात स्वर्ण मंदिर उपासना   व पूजा का एक धार्मिक मंदिर है, उसी तरह जेएनयू विश्वविद्यालय भी शिक्षा का विख्यात मंदिर है। जेएनयू में इस प्रकार की यह पहली घटना नहीं है, वरण् पहले भी ऐसी घटनाएॅं होती रही हैं। यदि ऐसी गतिविधियॉं जेएनयू विश्वविद्यालय प्रॉंगण में चलने दी गई तथा घटनाएॅं दुहराती रहीं तो वह कदापि देश हित में नहीं होगा। अतः समय रहते यदि इन्हे रोका नहीं जाता है तो फिर देश की अंखडता व सुरक्षा बनाये रखने के लिये भविष्य में एक बार फिर ‘‘आपरेशन ब्लूस्टार’’ करने की आवश्यकता नहीं होगी? क्या देश की परिस्थितिया एक और आपरेशन ब्लूस्टार सहने के लिए तैयार है?
      देश के राजनितिज्ञांे व राजनैतिक पार्टीयों को यह तो सोचना ही चाहिए कि देश रहेगा तो ही वे राजनीति कर पायेगे। लेकिन उनकी इस घिनोनी राजनीति से देश का अस्तित्व ही जब खतरे में पड़ जायेगा तो उसे रोकने के लिये कई कडे़ कदम उठाने पडे़ंगे तब वे राजनीति की इच्छा की सांस भी नहीं ले पायेगे (क्योंकि तब लोकतंत्र बच पायेगा?)।  क्या वे ‘भस्मासुर’ का इतिहास पुनः दोहराना चाहते है। जिस राजनीति के चलते वे राजनीति कर रहे है वही राजनीति  उनकी राजनीति को समाप्त करने का माध्यम बन जायेगी।
जिस गांधी परिवार के दो-दो सदस्यों ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश की सेवा करते हुए बलिदान दिया हो ऐसे गांधी परिवार के युवराज (महाराज होते होते रह गये) का जेएनयू की घटना पर प्रथम प्रतिक्रिया आई कि छात्रों की आवाज को दबाने वाले व्यक्ति ही देशद्रोही है। तब उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि राष्ट्र के खिलाफ नारा लगाने वाले छात्र क्यो देश प्रेमी है? क्या उन्हें भारत रत्न या परम वीर चक्र दिया जाना चाहिए? स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसे कई अवसर आये है जिनकी गिनती करना शायद संभव भी नहीं हैं, जब कांग्रेस की सरकार ने नेहरू से लेकर यूपीए चेयर पर्सन सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह तक की सरकारो ने छात्रों की ही नहीं बल्कि आम नागरिको की आवाज को दबायॉं। क्या राहुल गांधी भूल गये कि जयप्रकाश नारायण का आंदोलन नव निर्माण समिति के नवयुवकों द्वारा गुजरात में भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रांरभ किया जाकर देशव्यापी हो गया था। इंदिरा गंाधी की सरकार ने उसके राष्ट्रव्यापी होने पर उक्त आवाज को कुचलने दबोचने के लिये आपातकाल लगाया था। क्या वे सब युवक देशद्रोही थे? या उनकी आवाज को दबाने वाले देशद्रोही थे? (राहुल गांधी की परिभाषा व बोल अनुसार) क्या राहुल गांधी इस बात का जवाब देगे कि यदि कोई उन कांग्रेसी नेताओं पर आंदोलनकारी छात्रो की आवाज को कुचलने के (राहुल गांधी की नई परिभाषा अनुसार) देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराता है, तो क्या राहुल गांधी अपनी बात पर कायम रहते हुये गवाही देने आयेगे। ‘‘राहुल जी‘‘ येचुरी जी‘‘  ‘‘राजा’’ नीतीश कुमार इत्यादि जैसे नेता देश के साथ राज-नीति मत कीजिये। देश के लिये नीति अपना कर स्वयं का भला करे, समाज का भला करे जिससे देश का भला हो सके। जिस देश ने आपको यह पहचान दी हो उसे कम से कम गाली तो मत बकियेे? बकने मत दीजिए?

     सीताराम येचुरी द्वारा एक तरफ ‘यदि’ देशद्रोही बयान के संबंध में कोई साक्ष्य हो तो अवश्य कार्यवाही की जावे में यदि जोड़ते है, लेकिन दूसरी ओर ‘‘बिना यदि जोड़े’’ कालेज के छात्रों के विरूद्ध की जा रही तथाकथित कार्यवाही को बिना साक्ष्य केा अवैध बता रहे है। यहां पर येचुरी यदि कोई साक्ष्य हो शब्द का प्रयोग न करते हुये स्वतः ही पुलिस कार्यवाही को गलत ठहरा रहे हैं। देश  में यही दोहरापन की राजनीति है जो देश को गर्त की ओर ले जा रही है।
    कैलाश विजयवर्गीय का बयान ऐसे देशद्रोही तत्वों के लिये सामयिक है। गृहमंत्री का यह कथन कि राष्ट्र विरोधी नारो में हाफिज सईद का हाथ हैं, निराशाजनक है। यह भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत यह एक सामान्य या जघन्य अपराध का मामला नहीं है। बल्कि देश के विरूद्ध राष्ट्रद्रोह का मामला है। ‘किसने व कैसे’’ घटना को अंजाम दिया, यह देश गृहमंत्री से नहीं जानना चाहता हैं। बल्कि वास्तव में देश के गृहमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी घटनाओं के लिये जिम्मेदार तत्वों पर तुरंत कार्यवाही कर उन्हें समाप्त करे ताकि भविष्य में इस तरह की ऐसी घटनाएॅं न हो जिसकी किरण अभी तक नहीं दिखाई दी है।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

क्या ‘‘इंडिया न्यूज़’’ के ‘‘दीपक चौरसिया’’ पर ‘‘देशद्रोह’’ का मुकदमा नहीं चलना चाहिए?

राजीव खण्डेलवाल:
 जेएनयू एसयू के अफ़जल गुरू (संसद पर हमला करने वाला अपराधी) को फांसी देने की बरसी का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, यही अपने आप में एक आश्चर्य की बात है। यह हमारे देश में ही संभव है जहॉ देश की सम्प्रभुता, एकता व देश की आत्मा संसद पर हमला करने वाला हमलावर (जिसे देश के सर्वोच्च-उच्चतम् न्यायालय द्वारा समस्त न्यायिक प्रक्रिया को पूरी करने के बाद फंासी दी गई थी) के समर्थन में फांसी की बरसी के कार्यक्रम हो सकतें है। इस कार्यक्रम में देश विरोधी और कश्मीर की स्वायत्तता व देशद्रोही अपराधी अफ़जल के समर्थन में जिस तरह से देशद्रोही नारे लगाये गये वे निश्चित रूप से न केवल असहनीय कृत्य हैं, बल्कि पूर्ण रूप से किसी भी रूप में अक्षम्य देशद्रोही कृत्य हैं। यह देश की सहिष्णुता, उदारता, या स्वतंत्रता का लक्षण नहीं बल्कि हमारी कमजोरी की निशानी है। इस कृत्य के लिये भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत देशद्रोह व विभिन्न धाराओं के अंतर्गत समस्त जिम्मेदार आरोपी व्यक्तियों के विरूद्ध तुरंत कड़ी से कडी़ कार्यवाही की जानी चाहिये थी, जो अभी तक प्रारंभ नहीं हो पाई है। (मात्र जेएनयू के अध्यक्ष को छोड़कर)
        पिछले कई वर्षो से ‘‘जेएनयू’’ में ‘‘आइसा’’ द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में इस तरह के राष्ट्र विरोधी नारे सुनने व देखने को मिलते रहे हैं। लेकिन ‘‘स्वायत्तता’’ स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें बोलने की आजादी दी गई व कभी भी उनके खिलाफ कोई सार्थक कड़ी कार्यवाही अभी तक नहीं की गई। इसी का यह परिणाम हुआ कि देश विरोधी ताकतों के हौसले बढ़ते बढ़ते इतने उग्र हो गये है कि हमारे ही देश में देश की राजधानी में व संस्कति की शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में ‘‘भारत वापस जाओ’’ं ‘‘पाकिस्तान जिंदाबाद’’ ‘‘अफ़जल गुरू की फांसी की सजा न्यायिक हत्या है’’ हर घर में एक अफ़जल होगा, लड ़के लेगे कश्मीर, हिन्दुस्तान की बरबादी तक लड़ते रहेेेंगे, हिन्दुस्तान के टुकड़े हांेगे हजार आदि के नारे व बैनर सरे आम मीड़िया के समाने लगाये गये। लेकिन इन सबसे भी ज्यादा तकलीफ की बात यह हुई कि 10.02.16 को इंडिया न्यूज़ के डिबेट कार्यक्रम में टी.वी.एंकरिग कर रहे दीपक चौरसिया जिन्होंने इस कार्यक्रम का यह शीर्ष (हैडिंग) दिया था ‘‘यहॉं बोलने की आजादी है, तो क्या देश विरोधी बयान बाजी होगी’’ लिया हुआ शीर्ष प्रश्न बहुत अच्छा था। लेकिन वेे कार्यक्रम में जिस तरह से डिबेट में भाग लेनें वाले अनिर्वाण भट्टाचार्य, कार्यक्रम आयोजक, कन्हैया कुमार, अध्यक्ष जेएनयू एसयू , प्रो.दिनेश वार्ष्णेय सी.पी.आई नेता व पूर्व छात्र ने अत्यधिक भारत विरोधी जहर उगला, खासकर अनिर्वाण भट्टाचार्य द्वारा जो सहनशीलता की हर सीमा को पार कर गया। यह सब केवल हमारे देश में ही संभव हो सकता हैं। मैं दीपक चौरसिया से मात्र यह पूछना चाहता हूंॅं कि आजादी-स्वतत्रंता के नाम पर अनाप-शनाप बोलने वाले अनिवार्ण भट्टाचार्य जैसे भारत विरोधी देशद्रोही को टी.वी. चेनल पर आपने भारत विरोधी बयान देने से क्यों नहीं रोका? उनसे बयान वापस लेने तथा माफी मांगने के लिये क्यों नहीं कहॉं गया? जबकि इसके विपरीत संवित पात्रा, भाजपा प्रवक्ता को दीपक चौरसिया के द्वारा देशद्रोही के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही की मांग उठायेे जाने के अनुरोध के बावजूद अपेक्षानुसार   उनके द्वारा ऐसी मांग न किये जाने पर दीपक चौरसिया द्वारा संवित पात्रा की न केवल आलोचना की गई बल्कि दीपक ने उन्हें लताड़ा भी। क्या मीड़िया के दीपक का कार्य सिर्फ प्रत्येक घटना की रिकाडिंग कर उसे प्रसारित करना मात्र है? क्या वे भारतीय नागरिक नहीं हैं? क्या देश की अखंडता के प्रति उनका कोई दायित्व नहीं है? दीपक चौरसिया ने भारत विरोधी भाषा, देश की अंखंडता पर आघात करने व देशद्रोही कृत्य करने पर अनिर्वाण भट्टाचार्य को क्यों नहीं रोका व उससे माफी मांगने को क्यों नहीं कहॉं ? क्या प्रेस की स्वतंत्रता दीपक चौरसिया को इस सीमा तक डिबेट को ले जाने की इजाजत देती हैं? यदि नहीं ! तो दीपक चौरसिया के विरूद्ध देशद्रोह की भावना को प्रश्रय देने, प्रसारित करने में सहयोग देने के आरोप का मुकदमा क्यों नहीं दर्ज होना चाहिये? वे (भट्टाचार्य को) बार बार मात्र यह कहते रहे कि ‘‘मैं आपको झूठ बोलने का अधिकार नहीं देे सकता हॅंू’’ उनका यह ढीला ढाला कथन बेमतलब था। 
       संवित पात्रा ने जिस जोरदार तरीके से अनिर्वाण भट्टाचार्य का विरोध किया, वह प्रशंसनीय हैं, उन्हें उनके इस तरह के डिबेट हेतु साधुवाद देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर खेद भी व्यक्त किया कि उन्हें एक राष्ट्रद्रोही के साथ बैठकर डिबेट करना पड़ रहा है, यह उनके लिए एक धिक्कार का विषय है।
         यह भी एक दुखद विषय है कि अभी तक इस मामले को लेकर पूरे देश में न ही केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा और न ही स्वदेशी संगठनों या नागरिको द्वारा भट्टाचार्य के विरूद्ध देशद्रोह के अपराध की प्रथम सूचना पत्र देश के विभिन्न स्थानों पर क्यों दर्ज नहीं की गई हैं? जबकि पूर्व में इस तरह के मामलों में अविलम्ब कड़क शिकायते दर्ज होती रही हैं व कार्यवाही न होने पर प्राइवेट इस्तगासा तक न्यायालय में पेश होते रहे है।    
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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