सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

क्या वास्तव में देश की ‘‘पुलिस व्यवस्था’’ राजनीति के हत्थे चढ़ी हुई नहीं है?

राजीव खण्डेलवाल:
 ‘‘जेएनयू ’’दिल्ली में हुई घटना में दिन प्रतिदिन कोई न कोई इतिहास लिखा जा रहा हैं। ऐसा लग रहा है कि एक ‘‘पूरी किताब’’ के ‘‘प्रकाशन’’ की तैयारी की जा चुकी है। इस ‘‘किताब’’ की भूमिका किसने लिखी, यह प्रश्न अब गाैंण होते जा रहा है। चंूकि एक पूरी किताब लिखी जा रही है जिसमंे कई अघ्याय भी होगंे। इसलिये समस्त पक्ष इस किताब को पूर्ण करने में अपनी आहूती देने में ही अपना कर्तव्य मान रहे है। ‘‘कर्तव्य निष्ठा’’ के इस  कृत्य में किसी भी पक्ष को यह होश नहीं हैं कि राष्ट्रवाद व संवैधानिक व्यवस्था उनसे क्या अपेक्षा रखती हैं। भारतीय नागरिक होने के बावजूद जन मानस में उनके प्रति देशद्रोह की छवि अंकित होती जा रही है, इस बात का  भी उन्हें अहसास नहीं हैं। एक भारतीय नागरिक होने के नाते ऐसे अवसरो पर उनकी भूमिका किस तरह की निर्माणात्मक, सहयोगात्मक होनी चाहिये, इसका भी किसी भी पक्ष को होश हवास नहीं है। यदि होश है, तो मात्र एक दूसरे के ऊपर, चरित्र के उपर कीचड़ उछालने का। इन सबमें हास्यापद बात यह भी है कि यह कार्य बखूबी राष्ट्र प्रेम, राष्ट्र हित के नाम पर प्रत्येक पक्ष द्वारा किया जा रहा हैं। शायद हिन्दुस्तान की यही विशेषता है।
      दिल्ली के कमिश्नर बी.एस. बस्सी अगले दस दिनो में रिटायर होने वाले हैं। उनका यह बयान कि गिरफ्तार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के द्वारा न्यायालय में जमानत आवेदन दिये जाने पर पुलिस उसकी जमानत का विरोध नहीं करेगी, किस बात की ओर इंगित करता है? यह बयान क्या पुलिस के प्रति जनता की इस समझ (परसेप्शन) को ही सिद्ध नहीं करती है कि पुलिस प्रशासनिक व राजनीतिक हस्तक्षेप के अधीन ही कार्य करती है? क्या आपने अभी तक कभी ऐसा देखा है, सुना है कि ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ के अपराध में गिरफ्तार जेल के सलाखों के पीछे बंद एक अभियुक्त व्यक्ति के संबंध में कभी कोई बयान पुलिस आयुक्त द्वारा सार्वजनिक रूप से दिया गया हो? अभी तक यही कानूनी समझ व मान्यता थी कि यदि पुलिस ने किसी व्यक्ति को किसी ‘‘गैर जमानती’’ अपराध खासकर ‘‘देशद्रोह’’ के आरोप में गिरफ्तार किया गया हो, तो पुलिस प्रशासन (अभियोजन) उसकी जमानत का विरोध अंतिम क्षण तक, देश की उच्चतम् न्यायालय तक करती है। यह ध्यान देने की बात है कि ‘‘बस्सी’’ का यह बयान भी कन्हैया कुमार के जमानत आवेदन देने के पूर्व आया हैं। मानो पुलिस आयुक्त को कन्हैया कुमार को गलत धारा में गिरफ्तार करने का अपराध बोध हो रहा हो व वे आरोपी से यह कह रहे है, कि गलती हो गई हैं आप जमानत का आवेदन दीजिये। हम इसका विरोध नहीं करेगे। अपनी गलती सुधार लेगें? क्या हमारे प्रदेश की        जनता इस तथ्य को भूल गई है कि व्यापमं कांड में सैकडों की संख्या में युवा छात्र गण विगत एक -दो वर्षो से जेल में सड़ रहे है? जांच पूरी हो चुकी है उनके खिलाफ यह आरोप नहीं हेै कि वे गवाहो को डराने धमकाने से लेकर प्रभावित करेगे। उनके विरूद्ध हत्या बलात्कार या देशद्रोह जैसे गंभीर आरेाप भी नहीं हैं। फिर भी एसटीएफ, सीबीआई द्वारा जमानत का लगातार विरोध किया जाता रहा हैं। क्या यह पुलिस का दोहरा मापदण्ड़ नहीं हैं? पुलिस आयुक्त के इस बयान से क्या इस बात का अहसास नहीं होता है कि अपराधियों की जमानत के मामले के निर्णय ‘‘न्यायालय’’ के विवेक से ज्यादा अभियोजन के रूख पर निर्भर करते है? 
     इस बात में कोई शक नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन की पहचान एक सबसे अग्रणी राष्ट्रवादी संगठन के रूप में रही हैं। उसी प्रकार जिस प्रकार कश्मीर में जे.के.एल.                          एफ. से लेकर अन्य कई संगठनों की पहचान अलगाव वादी संगठनो के रूप में है। यद्यपि इन संगठनों में कई भारतीय नागरिक भी है। लेकिन वर्तमान भारतीय राजनीति आज एक ऐसे दोराहे पर आकर खड़ी हो गई है जहॉं एक तरफ संघ का राष्ट्रवाद है तो दूसरी ओर एक ओढी हुई गैर साम्प्रदायिकतवाद के नाम पर ‘‘लेफ्ट-राईट’’ व तथाकथित अपने को श्रेष्ठतर मानने वाले बुद्विजीवी वर्ग इत्यादि खड़े हैं। दोनो धु्रव के बीच इतनी दूरी है या यह कहिये कि अपने को गैर साम्प्रदायिकता के सबसे बड़े हितेषी पोषक कहलाने वाले तत्व संघ से इतनी घृणा करते है कि वे ‘संघ’ का विरोध करते समय यह तथ्य भूल जाते है कि वे अनजाने में ही राष्ट्रवाद का विरोध करतेे हुये दिखते है। संघ के आनुषंगिक संगठन विद्यार्थी परिषद (ए.बी.वी.पी) ने राष्ट्रवाद का झंडा उठाते हुये अफ़ज़ल गुरू की बरसी पर जेएनयू में होने वाले कार्यक्रम के लिए दी गई अनुमति के विरोध में ज्ञापन दिया, जिसके फलस्वरूप उक्त अनुमति निरस्त कर दी गई। चंूकि उक्त कदम ‘संघ’ के एक आनुषंगिक संगठन द्वारा उठाया गया था इसलिये उसका विरोध करना लेफ्ट वाले अपना धर्म मानते हैं। विरोधियों की ऐसी मानसिकता के रहते ‘संघ’ को भी युद्ध के समान कभी एक कदम आगे बढाने के साथ दो कदम पीछे हटना की नीति को अपनाना चाहिए। यह भी राष्ट्रधर्म ही होगा, जो वर्तमान परिस्थिति की मांग है। तब ऐसे तत्वो को संघ विरोध के नाम पर राष्ट्र विरोध करने का अवसर नहीं मिल पायेगा। जेएनयू में हुई घटना के नाम पर बगैर राष्ट्रहित का ख्याल किये देश में पक्ष व विपक्ष में जो कुछ क्रिया-प्रतिक्रिया हो रही हैं, वह इसी का परिणाम है। देश के विभिन्न जगहों परं जेएनयू की पुलिस कार्यवाही व पटियाला कोर्ट में हुई पुलिस असफलता की प्रतिक्रिया में जो प्रदर्शन ही रहे है, वे समस्त देशद्रोही नहीं हैं। लेकिन चूंकि ‘‘मामला’’ राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह का बना लिया गया है इसके कारण राष्ट्रवाद की भावना को अनावश्यक ही (इन विरोधो के कारण) नुकसान पहुंचा रहा हैं। इसलिये वक्त की सबसे प्रथम आवश्यकता है कि राष्ट्रवाद को उक्त घटना से हटाया जाय। परन्तु फिर पुनःस्वतः प्रश्न पैदा हो जायेगा कि बिना ‘‘राष्ट्रवाद’’ के ‘‘राष्ट्रद्रोह’’ कैसे होे सकता हैं? तब इसके आगे तो स्वयं को (औरो के समान) बुद्धिजीवी क्लेम न करने वाली 
बुद्धिजीवी जनता को ही सोचना होगा.....। 
      माननीय स्वभाव का एक महत्वपूर्ण चारित्रिक विशिष्टता यहॉ पर एकदम फिट बैठती हैं। यदि आप किसी व्यक्ति, संस्था या विचार धारा इत्यादि को घृणा से देखते है और वे यदि कोई अच्छा कार्य भी कर रहे है जो समाज को समाज हितैषी एक अच्छा संदेश देता हो तब भी आप ‘घृणा’ की भावना के तहत  विरोध के कारण उसके उस अच्छे कार्य का भी विरोध ही करेगें। उसके लिये तर्क-वितर्क-कुतर्क देगें। फिर चाहे फिर उस विरोध का परिणाम आप स्वयं के हितो के विपरीत ही क्यों न जा रहा हो। देश में आज यही धारणा व्याप्त हैं। 
                

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