रविवार, 30 जुलाई 2023

‘‘रोम जल रहा था....’’। ‘‘मणिपुर जल रहा है.........!’’

राजनीतिक दलों द्वारा ‘मलहम’ के नाम पर सिर्फ ‘‘वाणी’’ रूपी ‘‘पेट्रोल का छिडकाव’’

76 साल के हमारे स्वतंत्र देश के इतिहास में अनेक राज्यों में हिंसक, अलगाववादी, आतंकवादी, नक्सलवादी, जातीय संघर्ष की घटनाएं होती रही हैं। इन्हे कानून, सेना के डंडे के बल पर या बातचीत के टेबल पर लाकर अधिकतर मामलों व मुद्दों को निपटा कर, शांत कर, सामान्य स्थिति बहाल की गई है। चाहे सरकार किसी भी दल की रही हो। फिर चाहे पंजाब में भिंडरावाले का खालिस्तान का आंदोलन रहा हो, जिस कारण से हुए ‘‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’’ के कारण देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अपनी जान तक का बलिदान करना पड़ा । अथवा नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा, असम की बोडो समस्या हो, पश्चिम बंगाल की गोरखालैंड की समस्या हो या विभिन्न राज्यों में राज्य विभाजन (अलग राज्य) की मांग रही हो, लगभग सभी समस्याओं से कमोबेश निपटा गया है। शेष रह गई कुछ समस्याओं को भी सुलझाने के प्रयास लगातार चलते रहे हैं।

याद कीजिए! इंदिरा गांधी ने पंजाब केसरी अखबार के मालिक लाला जगत नारायण, डीआईजी ए एस अटवाल की हत्या होने पर बिना देर किये अनुच्छेद 356 का उपयोग कर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू किया था। इसी प्रकार पी वी नरसिम्हा राव ने वर्ष दिसम्बर 1993 में मणिपुर प्रदेश में अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री राजकुमार दोरेंद्र सिंह को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू किया था। जून 2001 में जब मणिपुर में हिंसा का पुनः दौर शुरू हुआ, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 6 दिन के भीतर ही विपक्षी दलों से मुलाकात कर मणिपुर के लोगों से ‘‘शांति की अपील’’ की थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक 121 बार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है। जिसमें अधिकतम 10 बार जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश के साथ पूर्वोत्तर का सबसे छोटा राज्य मणिपुर, जिसकी जनसंख्या मात्र लगभग 30 लाख है, में भी 10 बार राष्ट्रपति शासन लागू किया जा चुका है। तब आज विकल्प हीन आवश्यकता होने पर भी फिर क्यों नहीं? 54 ईस्वी में ‘रोम जल रहा था’, तो एक कहावत प्रसिद्ध हो गई थी। आज मणिपुर जल रहा है तब...?

तथापि भारत का ‘‘गहना’’ (जवाहर लाल नेहरू ने नाम दिया था) कहे जाने वाले राज्य मणिपुर (पुराना नाम कंलैपाक्) में पिछले लगभग 3 महीनों से पुलिस शस्त्रागार से हजारों स्वचालित हथियार लूटे गये या सुरक्षा बलों द्वारा लुटाए गए हथियारों के कारण फैली हिंसा ने दो राज्य के बीच बफर जोन बनने की स्थिति जैसी बफर जोन की स्थिति दो जातियों मैतेई व कुकी-जोमी के बीच जातीय संघर्ष के कारण पैदा हो गई। 40000 से अधिक सैनिकों, अर्द्धसैनिकों व पुलिस बल की तैनाती होने के बावजूद हिंसक घटनाओं व क्रूरता का अभूतपूर्व ‘‘तांडव’’ चल रहा है, जिसमें अभी तक 160 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और लगभग 300 से अधिक घायल है। 17 सौ से अधिक मकान जलाए जा चुके हैं। लगभग 50,000 से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। अनेक चर्च व मंदिर जलाएं व तोड़े जा चुके हैं। इस हिंसा के चलते ही दो महिलाओं जिनमें से एक महिला के पहले पिता और बाद में बचाव में आने पर भाई की हत्या कर दी गई, के यौन उत्पीड़न, अत्याचार व सार्वजनिक परेड का शर्मसार करने वाला वीडियो वायरल हुआ है। मानो ‘‘इक नागिन अरू पंख लगायी’’, वह निसंदेह देश की अभी तक की हुई समस्त समस्याओं व घटनाओं से मणिपुर की इस अभूतपूर्व समस्या को अलग-थलग करता है। इस वीडियो का सबसे दुखद व सिर झुका देने वाला पहलू यह भी है कि परेड में शामिल एक नग्न की गई महिला के पति, जो कारगिल में लडाई लड़ चुके हैं, का बड़ा ही अफसोस जनक व मार्मिक बयान आया कि मैंने कारगिल युद्ध में लड़ाई की व देश की रक्षा की, पर अपने घर अपनी पत्नी और साथ ही ग्रामीणों की रक्षा नहीं कर सका। इसलिए इस समस्या से वास्तविक रूप से निपटने के लिए भी बिल्कुल ही अलग रूख अपनाना होेगा। परन्तु क्या राजनैतिक दलों, यहां तक की स्वयं सरकार में यह इच्छाशक्ति है? इंदिरा गांधी के बाद से अभी तक के सबसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले 56 इंच सीना फुलाए ‘‘विश्व गुरू’’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इंदिरा गांधी एवं नरसिम्हा राव समान अनुच्छेद 356 का उपयोग अभी तक मणिपुर में क्यों नहीं किया? इसका जवाब व हल खोजना दोनो मुश्किल है।

मणिपुर भारत के उत्तर-पूर्वी भाग का प्रदेश है, जिसकी राजधानी इंफाल है। मणिपुर प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 10 प्रतिशत भाग इंफाल है, जबकि वहां 57 प्रतिशत आबादी रहती है। बाकी आबादी 43 प्रतिशत 90 प्रतिशत पहाड़ी इलाके में रहती है। इंफाल घाटी में मैतेई समुदाय के लोग रहते है, जो ज्यादातर हिंदू है, जिनकी कुल भागीदारी 53 प्रतिशत है। 60 में से 40 विधायक मैतेई समुदाय के है और शेष नगा-कुकी जाति के है, जिनमें 33 मान्यता प्राप्त जनजाति है जो मुख्य रूप से ईसाई धर्म को मानती हैं। लगभग 8-8 प्रतिशत मुस्लिम व सनमही समुदाय है। संविधान के अनुच्छेद 371 सी के अनुसार मणिपुर पहाड़ी जनजातियों को विशेष दर्जा व सुविधाएं मिली है, जो बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को नहीं मिलती हैं। 

केन्द्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय की सिफारिश के आधार पर 19 अप्रैल को उच्च न्यायालय का ‘‘मैतेई समुदाय’’ को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के निर्णय आने के बाद से ही तनाव बढ़ गया। इंसानी तासीर है कि वह ‘‘अपने दुःख से ज्यादा दूसरे के सुख से दुखी होता है’’। इसके विरोध में 3 मई को ऑल इंडिया ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर ने आदिवासी एकता मार्च निकाला। यही से स्थिति बिगड़नी चालू हो गई। ‘‘एक आंख फूटे तो दूसरी पर हाथ रखते हैं’’ लेकिन इसी बीच मणिपुर सरकार की आदिवासी समुदायों के बीच मणिपुर फॉरेस्ट एक्ट 2021 के तहत फारेस्ट लैड से अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने ‘‘आग में घी’’ डालने का काम किया। इसके पूर्व 2008 में केंद्र सरकार व कुकी विद्रोहियों के बीच सरकार की सैन्य कार्यवाही में दखल देने तथा राजनीतिक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए हुए एक समझौता ‘‘एसओएस’’ हुआ था जिसका कार्यकाल समय-समय पर बढ़ाया गया। लेकिन 10 मार्च को कुकी समुदाय के दो हथियार बंद संगठन ऑर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर्स एक्ट यानी व कुकी नेशनल आर्मी समझौते से पीछे हट गये। ये लोग ही बाद में मणिपुर की हिंसा में शामिल हो गये है, ऐसा बताया जाता है।

यह मणिपुर का संक्षिप्त भौगोलिक, जातिगत व राजनीतिक समीकरण है। जैसा कि मैं पिछले लेख में लिख चुका कि इस घटना पर किसी भी तरह की ‘‘राजनीति’’ किसी भी पक्ष द्वारा नहीं की जानी चाहिए। परन्तु यह बात सिर्फ शब्दों व पेपर पर ही सिमट कर रह गई है। लेकिन विपरीत इसके जैसा कि कहा जाता है ‘‘अंग लगी मक्खियां पीछा नहीं छोड़तीं’’, इस पर ‘‘राजनीति’’ ही की जा रही है। ऐसी निम्नतम स्तर की घृणित घटना के साथ राजनीति करने का ‘‘साहस’’ आ कैसे जाता है? इसलिए घटना से ज्यादा ऐसी राजनीति निंदनीय व शर्मनाक है। मेरा मणिपुर तेरा राजस्थान, मेरा छत्तीसगढ़, तेरा मणिपुर मेघालय कर देने से क्या हम पीड़ितों व उनके परिवार को व समाज को सांत्वना दे सकते हैं? ‘‘ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती’’। यद्यपि ‘‘इल्ली को मसलने से आटा वापस नहीं मिलता‘‘। क्या इससे घटना की तह पर पहुंचा जा सकता है? और क्या इससे भविष्य में ऐसी घटना पर रोक लगाई जा सकती है? जनता से लेकर राजनैतिक दल, मीडिया तक इस संबंध में गंभीर लगते नहीं हैं। आखिर ‘‘कौन’’ ‘कब’ व ‘‘कितने’’ गंभीर होंगे यह भी बड़ा यक्ष प्रश्न है? जिसका उत्तर दूर-दूर तक फिलहाल कहीं दिखता नहीं है, जब जनता स्वयं जाग्रत होकर, उठकर ऐसी घटना पर राजनीति करने वाले दलों को ‘‘उघरे अंत न होहिं निबाहू’’ की उक्ति अनुसार उनके घर बैठाल न दे। क्या यह संभव भी होगा, यह भी यक्ष प्रश्न है?

बात मणिपुर घटना की क्रोनोलॉजी और इस पर आ रही क्रिया-प्रतिक्रिया की कर ले। 4 तारीख की घटना का वीडियो 19 तारीख को वायरल होने बाद ही विश्व जगत को घटना के संबंध में जानकारी हुई, जिसमें मणिपुर के मुख्यमंत्री जो गृहमंत्री भी है, शामिल है। भारत सरकार के गृह मंत्री, प्रधानमंत्री, और ‘‘आंख न दीदा काढ़े कसीदा’’ की उक्ति को चरितार्थ करती हुई विभिन्न खुफिया एजेंसी आईबी, सीबीआई, ईडी, एनआईवी इत्यादि क्या किसी को इस संबंध में कोई जानकारी नहीं थी? और यदि जानकारी किसी को भी थी, तो तुरन्त आवश्यक कार्रवाई करने के लिए व संस्थाएं या व्यक्ति सामने क्यों नहीं आये। और यदि नहीं थी, तो अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे राज्य होने के कारण केन्द्र व राज्य की खुफिया एजेंसी की असफलता से क्या देश की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न नहीं लगता है? और इस पर यह कह देना कि घटना के वीडियो के वायरल होने के समय की क्रोनोलॉजी (टाइमिंग) देखिये! सदन प्रारंभ होने के तुरंत पहले ही क्यों हुआ पहले या बाद में क्यों नहीं? मतलब ‘‘वीडियो महत्वपूर्ण नहीं’’ है, वीडियो के ‘‘वायरल होने का समय महत्वपूर्ण’’ है। यदि राजनीतिक उद्देश्यों व षड़यंत्र के तहत ही किन्ही विपक्षियों द्वारा वीडियो को संसद प्रारंभ होने के समय वायरल कराया गया, तब भी घटना का गंभीर, वीभत्स व माथे पर कलंक लगाने वाला स्वरूप तो नहीं बदल जाता? क्या ‘‘अंधेरे में भी हाथ का कौर मुंह की जगह कान में चला जाता है’’? यदि वास्तव में षड़यंत्र के तहत वीडियो की तय ‘‘टाइमिंग’’ के तहत वायरल हुई है, तो समस्त जांच एजेंसी जो राज्य व केन्द्र सरकार के पास है, के द्वारा सत्य जनता के सामने वह क्यों नहीं लाया जा रहा है? वीडियो वायरल होने के 8 दिन बाद जांच हेतु सीबीआई को उक्त मामला सौंपने से सरकार की इस समस्या के प्रति ‘‘गंभीरता’’ व ‘‘संवेदनशीलता’’ को समझा जा सकता है?

बुधवार, 26 जुलाई 2023

‘हंगामा हो गया’’! ‘‘हा हा हा’’! हं गा मा!

 

संसद के हंगामे पर फिल्म ‘‘अनहोनी’’ का गाना याद आ रहा है! ‘‘हंगामा हो गया’’! जिस पर मैंने पूर्व में भी एक लेख लिखा था।

संसदीय परंपराएं एवं नियम

संसद जिसे ‘‘लोकतंत्र का मंदिर’’ भी इसलिए कहा जाता है कि, वह सिर्फ नियमों से नहीं बल्कि संसदीय परंपराओं के साथ भी चलता है। भारत देश ‘‘संस्कृति प्रधान’’ देश है। देश की संस्कृति सिर्फ कानून, नियमों से ही नहीं परंपराओं से भी बनती हैं। इन्हीं परंपराओं का अनुसरण कई बार संसद को चलाने में होता है। 

बहस पर बहस, किंतु मुद्दे पर नहीं

संसद में का वर्षा कालीन सत्र जब से प्रारंभ हुआ है, वह गतिरोध पैदा होने के कारण ‘‘प्रथम ग्रासे मक्षिका पात’’ (पहले ही निवाले में मक्खी गिरना) की उक्ति को चरितार्थ करता हुआ आसन्दी द्वारा प्रतिदिन स्थगित किया जाता किया जा रहा है। गतिरोध का एकमात्र कारण मणिपुर पर बहस को लेकर है। आश्चर्य और ‘‘समझ’’ कर न ‘‘समझने’’ वाली बात यह भी है कि सत्ता और विरोधी दोनों इस मुद्दे पर ‘‘आभासी’’ बहस चाहते हैं, बहस के लिए तैयार ‘‘भी’’ हैं, परन्तु फिर भी बहस नहीं हो पा रही है। यह क्रिकेट के खेल के समान हो गई है, जहां मैदान में दोनों टीमें उतर कर आती हैं। लेकिन बिना गेंद फेंके ही एंपायर बेटिंग टीम को नहीं, बल्कि फील्डिंग करने वाली टीम के बॉलर को रिटायर्ड हर्ट कर देता है और तब टीम मैदान छोड़कर चली जाती है। चूंकि खेल टी20 या वनडे न होकर टेस्ट मैच है, अतः दूसरे दिन दोनों टीमें फिर खेलने आती है। यह सिलसिला चलता चला आ रहा है। इस प्रकार फिल्म ‘‘अनहोनी’’ का आशा (भोसले) की आवाज में उक्त गाना ‘‘हंगामा हो गया’’ संसद में सांसदों द्वारा दिन प्रतिदिन हंगामा किया जाकर ‘‘आशा’’ नहीं निराशा की ‘‘अनहोनी का रिकॉर्ड’’ तो नहीं बनने जा रहा?

वस्तुतः मुद्दा क्या है? मणिपुर में हो रही हिंसा और यौन दुराचार की वीभत्स घटनाओं को रोकने के लिए संसद में सार्थक बहस होकर आम सहमति से समस्या का निदान किया जाए या बहस का मुद्दा यह हो जाए कि किस नियम के तहत बहस करनी है? इस विषय को लेकर देश की मीडिया से लेकर आम लोग के बीच लगभग सीधा विभाजन (वर्टिकल डिविजन) होता हुआ दिख रहा है। मुद्दा यह बिल्कुल नहीं है कि आप मणिपुर की बहस की यात्रा की ट्रेन(संसद) में आप प्रथम श्रेणी क्लास के डिब्बे में बैठे या द्वितीय क्लास के डिब्बे में? इसलिए यह गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में दोनों पक्ष मणिपुर के मुद्दे पर सार्थक बहस चाहते हैं? अथवा बहस (आभासी) बहस का हंगामा कर ‘‘मुंह में राम बगल में छुरी’’ रखे हुए हैं? अथवा सत्ता पक्ष मणिपुर गुजरात के बाद दूसरी प्रयोगशाला बनाने के कारण बहस से कतरा रहा है जैसा कि तथाकथित रूप से कुछ क्षेत्रों में यह कहते हुए कि ‘‘रोम जब जल रहा था, तब नीरो बंशी बजा रहा था’’, आरोप लगाए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विदेशी ताकतों का हाथ होने का आरोप भी लगाया जा रहा है। तब फिर होने वाली बहस का मुद्दा सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे को ‘‘कटघरे में खड़ा कर’’ नीचा दिखाने का होगा अथवा समस्या के निदान का होगा? तीन प्रमुख बातें सुचारू रूप से संसद चलने के लिए विपक्ष जरूरी मानता है। एक तो बहस नियम 267 के तहत काम रोको प्रस्ताव के सामान अन्य समस्त संसदीय कार्यवाही रोककर दीर्घकालीन चर्चा हो, जिसमें मतदान का प्रावधान है। दूसरे प्रधानमंत्री संसद में उपस्थित रहे और तीसरा मणिपुर के मुद्दे पर ‘‘विभूषणम् मौनं पंडिताणाम्’’ की उक्ति से मुक्ति पाकर प्रधानमंत्री का बहस के पहले संसद पटल पर बयान हो। जबकि ट्रेजरी बेंच (सत्ता पक्ष) नियम 176 के तहत बहस चाहती हैं, जिसमें बहस का समय अधिकतम ढाई घंटे का होता है, जिसमें वोटिंग नहीं होती है। बहस का जवाब गृहमंत्री देंगे, क्योंकि जिस विभाग का मुद्दा होता है, जवाब भी उसी विभाग का मंत्री अर्थात यहां पर गृहमंत्री ही देंगे।

पक्ष-विपक्ष का सकारात्मक रुख नहीं !

यानी ‘‘पंचों का कहा सर माथे, लेकिन परनाला तो यहीं गिरेगा’’। यदि दोनों पक्ष अर्थात सत्ता व विपक्ष अपने अपने ‘‘स्टैंड’’ से कुछ हटकर एक कदम आगे बढ़े तो, निश्चित रूप से सार्थक बहस हो सकती है। मैंने पहले भी कहा कि दोनों पक्ष जनता के समक्ष सिर्फ बहस का मुखौटा पहनकर जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। नियम 267 के तहत अभी तक की 11वीं बार बहस आखरी बार नोटबंदी को लेकर हुई थी? क्या मणिपुर का मुद्दा नोटबंदी से कम महत्वपूर्ण है? जहां सरकार ढाई दिन की बहस की बजाए ढाई घंटे की बहस ही कराना चाहती है? सरकार वास्तव में सदन के महत्वपूर्ण समय को बहस में अनावश्यक रूप से जाया न करने के उद्देश्य से ढाई घंटे की समय सीमा जो नियम 176 में निर्धारित की गई है, में ही कराना चाहती है, तो वह गलत है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?, जब सरकार अच्छी तरह से जानती है, और देख भी रही है कि विपक्ष सदन चलने नहीं दे रहा है। तब यदि पहले दिन ही विपक्ष की मांग मान ली जाती तो, अभी तक 3 दिन के भीतर ही बहस पूरी हो जाती, जो समय बिना किसी बहस और संसदीय कार्य के सदन का बेकार हो गया। अतः यह स्पष्ट है, यहां पर दोनों पक्षों पर ‘‘मुंह में राम बगल में छुरी’’ वाली कहावत मणिपुर के मुद्दे पर चर्चा को लेकर लागू होती है। वास्तव में चर्चा कोई नहीं करना चाहता है। हां चर्चा का नरेशन और परसेप्शन जरूर बनाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें देश का मीडिया बहस में घी की आहुति दे रहा है। 

समस्त राजनेताओं को हमारे मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध गजल लेखक स्व. दुष्यंत कुमार की इस गजल को संसद में प्रवेश करने के पूर्व जरूर याद कर लेना चाहिए। ‘‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं! मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!’’

शनिवार, 22 जुलाई 2023

‘‘न्यूनतम सर्वानुमति’’? देश की वर्तमान आवश्यकता।

‘‘भूमिका’:-

हमारे देश की राजनीति में कुछ समान, विभिन्न व विपरीत विचारधाराओं के राजनैतिक दल हैं। अतः उनकी कार्य पद्धति और कार्यों (एक्शन) में अंतर होना स्वाभाविक ही है। सिवाय देश हित के मूल महत्वपूर्ण मुद्दों पर जहां समस्त दलों का यह संवैधानिक नैतिक दायित्व बन जाता है कि वे ‘‘एक स्वर’’ ‘‘एक धारा’’ और ‘‘एक आवाज’’ में ‘‘देश हित’’ के मुद्दों पर अपनी बात बुलंदी के साथ जनता के सामने न केवल रखें; बल्कि उनके अनुरूप धरातल पर वास्तविक कार्य करते हुए दिखें भी। ताकि विश्व पटल पर यह दर्शित प्रदर्शित होकर सुनिश्चित हो सके कि ‘‘अनेकता में एकता’’ लिए हुए ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी’’ तक भारत देश ‘‘एक’’ है।
‘‘मणिपुर घटना’’
देश की राजनीति में पहले से ही चिंताजनक रूप से मौजूद उक्त ज्वलंत प्रश्न पर मणिपुर की उक्त घटना ने गंभीर रूप से सिर झुकाए तुरत-फुरत सोचने, विचारने व विवेचना के लिए विवश किया है। मणिपुर की घटना ने देश ही नहीं, विश्व को अचंभित, क्षुब्ध व आक्रोशित कर दिया है, जहां हमारा सिर पहली बार विश्व पटल पर महिलाओं के मान-सम्मान को लेकर इस तरह से नीचा हुआ है। मणिपुर में 3 मई को हिंसा प्रारंभ होने के तुरंत बाद उक्त घटना 4 मई की बतलाई जा रही है। जबकि वीडियो अभी दो दिन पूर्व अर्थात 18 जुलाई को ‘वायरल’ होने के कारण देश शर्मसार हो गया है। लगभग इसी समय छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी शर्मसार करने वाली घटनाएं अवश्य हुई है। परन्तु किसी भी घटना को मणिपुर की दो महिलाओं के मान-सम्मान, सार्वजनिक रूप से यौन उत्पीड़न, परेड, पीडिता के भाई के सामने उसका बलात्कार, फिर भाई व पहले पिता की हत्या जो महिलाओं की अस्मिता को तार-तार कर देने वाली घटनाओं के साथ जोड़ना, दुर्भाग्यपूर्ण होकर निश्चित रूप से मणिपुर घटना की वीभत्सता को अनदेखा कर अथवा कम कर राजनैतिक सहूलियत की दृष्टि से उठाया गया कदम ही कहा जा सकता है।
‘‘प्रतिक्रिया की सर्वानुमति क्यों नहीं?’’
क्या इस देश में सहमति, सर्वानुमति के लिए कोई मुद्दा शेष रह ही नहीं गया हैं? यह बात क्या अंतिम रूप से मान ली जाए? निश्चित रूप से देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न पार्टियों की परस्पर विरोधी विचार धाराओं की सरकारें हैं। जब भी किसी राज्य में कोई हिंसा, दंगा, हत्या, बलात्कार, लूटमार, आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों की घटनाएं घटती रहती है, तब राज्य का शासन, प्रशासन, मुख्यमंत्री, गृह मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के नेता, प्रवक्ता घटनाओं पर प्रतिक्रिया में रटारटाया जवाब दे देते हैं कि घटना बहुत ही, दुर्भाग्यपूर्ण है, निंदनीय है और कानून अपना काम करेगा। दोषियों को छोड़ा नहीं जायेगा। अपराधियों को तुरंत गिरफ्तार कर अधिकतम सजा दिलाए जाने का प्रयास किया जाएगा। ज्यादा चिल्लाहट होने पर जांच आयोग बैठालने की घोषणा कर दी जाती है। साथ ही मलहम लगाने की दृष्टि से कम, राजनैतिक विरोध को कम करने की दृष्टि से नगद, नौकरी इत्यादि मुआवजे की घोषणा भी हो जाती है। विपरीत इसके विपक्ष को सरकार को कटघरे में खड़ा कर उनकी आलोचना करने में शब्द ही कम पड़ जाते हैं। कानून व्यवस्था चरमरा गई, ध्वस्त हो गई, से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग के अलावा कभी-कभी तो राज्यपाल शासन की भी तक मांग कर दी जाती है। साथ ही लाव-लश्कर के साथ मीडिया के कैमरों के साथ घटना-स्थल पहुंचने का अपना नैतिक, संवैधानिक व राजनैतिक दायित्व विपक्ष मानता है, तो वहीं दूसरी ओर सरकार विपक्ष के इस कदम को फौरी गंदी राजनीति करने का आरोप लगाते हुए उनके उक्त कदम को घटना के बाद की परिस्थितियों के सामान्य करने की दृष्टि में उठाए गए अथवा उठाये जाने वाले कदमों में बड़ी रुकावट मानती है।
‘प्रतिक्रिया का रेसिप्रोकल आदान-प्रदान’’
बेशर्मी की हद तो तब होती है, जब जिस राज्य में ऐसे आपराधिक घटनाएं घटित होती है, तो ऐसे राज्य के ‘‘विपक्षी दल की सत्ता वाले राज्यों’’ में भी इसी प्रकार की ऐसी ही (सेम) घटनाएं जब होती है, तब ‘‘रेसिप्रोकल’’ होकर दोनों दल (पक्ष-विपक्ष) परस्पर प्रतिक्रियाओं को बंद लिफाफों के द्वारा सुविधाजनक रूप से अदला-बदली कर अपने दायित्व से मुक्त होने का अहसास कर लेते हैं। जिस प्रकार लान टेनिस या बैडमिंटन के खेल के मध्यांतर के बाद ग्राउंड के छोर पर परस्पर बदल लिये जाते हैं। पक्ष-विपक्ष ‘‘इतिहास के झरोखे में’’ अपने-अपने विरोधियों को बिना किसी झिझक व हिचक के अपनी-अपनी बारी आने पर ले जाते हैं। तब लाचार जनता अपने को ‘‘ठगा हुआ सा’’ महसूस करती है। आज की भारतीय राजनीति का यह एक ‘कटु’ परंतु बेवकूफी व शर्मिंदा युक्त सत्य है, जिससे छुटकारा पाने की बेहद आवश्यकता है।
‘‘सर्वानुमति की आवश्यकता‘‘
क्या राजनेताओं को इस बात की समझ नहीं रह गई है कि पुलिसिया तंत्र दिन प्रतिदिन नए कानून बनने के बावजूद इतना लाचार और कमजोर हो चुका है, जहां अपराधियों को तो शायद रोका नहीं जा सकता है, तथापि अपराधियों के विरुद्ध तंत्र में कुछ जरूरी सुधार कर कार्रवाई अवश्य की जा सकती है। तब फिर एक राज्य में हुई घटना पर एक दल वैसी प्रतिक्रिया देता क्यों है, जब दूसरा दल उसे उसके राज्य में उसी तरह की घटित अपराधों का पुलिंदा दिखाकर उसे ‘‘आइना’’ दिखाता है। तब तो घिग्घी बंद होकर आप निरुत्तर हो जाते हैं। लेकिन बेशर्मी की राजनीति में किसी भी दल को ‘‘शर्म’’ महसूस नहीं होती है। ऐसी स्थिति में पक्ष-विपक्ष दोनों के लिये घटना पर दुख प्रकट करते हुए घटना से सबक लेकर भविष्य में ऐसी घटना न घटे का सबक लेते हुए भविष्य में उपरोक्त तरह की एक दूसरे की कड़ी आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएँ न देकर रचनात्मक सुझाव देने का संकल्प क्यों नहीं लेते हैं? तभी शासन शांत चित्त होकर घटना के बाद की स्थितियों से निपटने के लिए सभी उचित प्रबंध व कार्रवाई कर सकेगें। ‘‘शर्म’’ और ‘‘राजनीति’’ का कोई संबंध अब रह गया है क्या? जो आप हम पर थोप रहे हैं? अवश्य कुछ लोग यह भी कह सकते है।
मणिपुर समस्या है क्या-
संक्षिप्त में मणिपुर की वर्तमान की मुख्य समस्या मणिपुर के तीन प्रमुख समुदाय मैतेई, नगा व कुकी दो समुदाय कुकी व मैतेई के बीच जातीय संघर्ष को बतलाया जाता है। जो अब दोनों समुदायों के बीच खाई इतनी बढ़ गई है या कहे कि बढ़ा दी गई है कि स्थिति पर फिलहाल काबू करना किसी के बस की बात नहीं रह गई हैं। सिर्फ जैसा कि कहा जाता है ‘‘समय ही घावों को भरता’’ है। आप एक लाइन से समझिये कि देश के कुछ स्थान जहां मुस्लिम बहुसंख्यक है, वहां लड़ाई हिंदू-मुस्लिम के बीच कुछ उग्रवादी तत्व दंगा भड़का देते है। इससे भी ज्यादा बदतर कुकी-मैतेई जनजाति समाज के बीच की हो गई है। जहां लूटे गए या ये कहें कि लुटाए गए वैपन्स (हथियारों) के साथ महिलाओं को भी इस जातीय संघर्ष में एक ‘‘हथियार’’ बना लिया गया है। 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतेई व 20 विधायक नगा-कुकी जनजाति के है और मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ‘‘मैतेई’’ जाति के है, स्वयं जिन पर मुख्य रूप से समस्या पैदा करने का आरोप लगाया जा रहा है। मणिपुर की जटिल समस्या का विस्तृत विवरण अलग से किसी दूसरे लेख में किया जायेगा।
बर्बरतापूर्ण घटना का घटनाक्रमः-
मणिपुर के उच्च न्यायालय का दिनांक 19 अप्रैल को यह निर्णय आया कि ‘‘मैतेई’’ समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाये। 60 में से 40 विधायक मैतेई जाति के होने के कारण व शेष 20 नगा-कुकी जो ईसाई धर्म को मानते है, के दिलों-दिमाग में उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय से यह आशंका पैदा हुई कि ‘‘मैतेई’’ को आरक्षण मिलने से उनके अधिकारों का और बंटवारा होगा। परिणाम स्वरूप 3 मई को हिंसा की जो वारदात प्रारंभ हुई, वह आज तक रूक नहीं पायी है और उक्त जातिवादी हिंसा में अभी तक 142 व्यक्ति मारे गये है व 300 से ज्यादा घायल हुए हैं।
3 मई से हिंसा का तांडव प्रारंभ होने के बाद अगले दिन 4 तारीख को ‘थोबल’ में दरिंदगी व दिल दहला देने वाली मानवता व महिला सम्मान की समस्त सीमाओं को भेद कर उक्त अकल्पनीय घटना घटित हो जाती है, जिसकी जानकारी विश्व सहित पूरे देश को 19 जुलाई को उक्त घटना का ‘‘वीडियो वायरल’’ होने से ही मिली। 18 तारीख को ‘‘जीरो’’ पर थाने में गांव के मुखिया द्वारा शिकायत की जाती है। 1 महीने बाद 21 जून को उक्त शिकायत को क्षेत्राधिकार वाले थाने में हस्तांतरित किया जाता है। तब जाकर 49 दिन बाद प्राथमिकी दर्ज होती है। राष्ट्रीय महिला आयोग को दिनांक 12 जून को शिकायत दर्ज होती है, परन्तु कोई कार्रवाई नहीं होती हैं। घटना के बाद वीडियो वायरल होने के बीच कई बार पीडिता की चर्चा सोशल मीडिया में आयी। लेकिन ज्यादा वायरल न होने के कारण शायद इस पर किसी का ध्यान नहीं गया।
केन्द्रीय सरकार ने मणिपुर में उत्पन्न उक्त आंतरिक अशांति या रक्षा करने के लिए अनुच्छेद 355 लागू किया है। वैसे शायद यह पहली बार हुआ है, जब केन्द्र की सरकार ने अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार के विरुद्ध अनुच्छेद 356 का उपयोग किया है जो केंद्र सरकार की मनसा का घोतक है। अनुच्छेद 355 का उपयोग कर स्थिति सुधारने की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। तब ही अनुच्छेद 356 का उपयोग किया जाना उचित होग। वैसे यहां पर उल्लेख करना सामयिक होगा कि पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में 8 लोगों को घर में जिंदा जलाया गया था, तब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने पश्चिम बंगाल में अनुच्छेद 355 की मांग की थी। इस पर ममता बनर्जी की विरोधी पार्टी बीजेपी के केंद्र में सरकार होने के बावजूद उक्त मांग नहीं मानी गई थी।
अंत में देश में पिछले कुछ समय से यौन उत्पीड़न व महिला अपराधों के सजायाफ्ता अपराधियों के साथ जिस तरह का ट्रीटमेंट किया जा रहा है, उसकी क्रोनोलॉजी की एक बानगी देख लीजिए। गुजरात के बिलकिस बानो सामूहिक बलात्कार के अपराधियों को को समय पूर्व छोड़ना व उनका मालाएं पहना कर महिमामडित का स्वागत करना, हत्या व सजायाफ्ता प्राप्त राम रहीम को सातवीं बार पैरोल देना, रेप कांड के आरोपी गोपाल कांडा कि जनहित पार्टी को एनडीए में शामिल करना, देश के लिए मेडल लाकर मान सम्मान को बढ़ाने वाली 7 महिला पहलवानों द्वारा उनके साथ हुए यौन शोषण के बाहुबली सांसद अपराधी के विरुद्ध न्याय मांगने का संघर्ष आदि की पराकाष्ठा और दुष्परिणाम की परिणिति शायद मणिपुर का उक्त बेहद शर्मनाक कांड है।

बुधवार, 19 जुलाई 2023

पहले ‘‘इंडिया’’ बनने का ‘‘आचरण’’ तो दिखाइए! फिर ‘‘इंडिया’’ नाम रखिए।

देश के राजनीतिक इतिहास में 18 जुलाई जैसा दिन शायद ही कभी आया होगा। इसलिए कि 18 जुलाई को एक ही दिन सत्ता पक्ष-विपक्ष दोनों अलग-अलग स्थानों पर गठबंधन का विस्तार करने के लिए एकत्रित हुए। दोपहर में विपक्ष जो पूर्व में यूपीए गठबंधन के नाम से कार्य कर रहा था, कुछ नए दलों को जोड़कर कुल 28 दलों का नया गठबंधन इंडिया नाम से अस्तित्व में आया। तो वहीं दूसरी ओर रात्रि के समय एनडीए का विस्तार होकर पुराने सहयोगियों सहित कुल 39 राजनीतिक दल अंततः शामिल हुए। यद्यपि आपातकाल के समय 1977 में जनता पार्टी बनाते समय समस्त विपक्षी लोग एक साथ जरूर इकट्ठे हुए थे। तब एक नई राजनीतिक पार्टी ‘‘जनता पार्टी’’ के निर्माण के साथ मात्र विपक्ष ही एकत्रित हुआ था। सत्ता पक्ष नहीं। तथापि यदि हम इतिहास देखें तो ‘‘गठबंधन की राजनीति’’ देश की राजनीति का आवश्यक अंग रही है, जिसकी अनिवार्यता वर्तमान में जरूरत हो गई है।

देश में गठबंधन की सरकार सर्वप्रथम दिसंबर 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा के नाम से गठित होकर विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी। तथापि पहली शुद्ध गैर कांग्रेसी सरकार मई 1998 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) गठित किया जाकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी। वैसे स्वतंत्रता के पूर्व भी 1946 में ‘‘गठबंधन की राजनीति’’ से ही अंतरिम सरकार जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी थी। तथापि राज्यों के स्तर पर तो ‘‘गठबंधन’’ स्वतंत्र भारत में वर्ष 1953 में ही प्रारंभ हो गया था, जब प्रदेश में संयुक्त मंत्रिमंडल बनाया गया। 1989 से 1999 के बीच 8 गठबंधनों की सरकारें बनी। इन गठबंधन की सरकारों में कभी भी किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, जैसा कि 2014 और 2019 में भाजपा को अकेले मिल गया था।

अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से बनाई गई एनडीए को वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अकेली भाजपा को ही बहुमत (282 सीटें) प्राप्त हो गया था। जबकि तत्समय एनडीए में मात्र 14 दल ही शामिल थे। तत्पश्चात वर्ष 2019 में एनडीए को मिले बहुमत में भाजपा की संख्या में भी वृद्धि होकर 303 सीटों पर विजय प्राप्त की थी। बावजूद उक्त सीटों की वृद्धि के यदि आज एनडीए को अपना कुनबा बढ़ाकर 39 करने की आवश्यकता पड़ रही है, तो इसका राजनीतिक अर्थ तो यही निकलेगा कि ‘‘आवाजे ख़लक को नक्कारा ए ख़ुदा समझ कर चलिये’’। ‘‘एक अकेला सब को भारी’’ बजट सत्र में राज्यसभा में बयान देने वाले 56 इंच का सीना फुलाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना कुनबा बढ़ाने के विचार की सुनिश्चित आवश्यकता शायद तब पड़ी, जब कुछ समय पूर्व ही पटना में विपक्ष एकजुट होने के लिए 15 दल कुछ समय पूर्व एकत्रित हुए थे। 

हिमाचल प्रदेश और तत्पश्चात कर्नाटक चुनाव में तगड़ी हार के बाद अभी वर्ष के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनावों में कम से कम दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार विपरीत सर्वेक्षण रिपोर्ट मिलने से चिंतित भाजपा की ‘‘आंतों में बल पड़े हुए हैं’’। इसलिये हाईकमान 2024 के लोकसभा के आम चुनावों में पुनः सत्ता पर आने के लिए किसी भी आशंका व शक की सुई को आशा और विश्वास में बदलना चाहता है। इसी ‘‘परसेप्शन’’ व ‘‘नरेशन’’ को बनाए रखने के लिए शायद 39 दलों का कुनबा बनाया गया, यद्यपि इसे वर्तमान संसद सदस्यों की संख्या में वृद्धि मात्र 3 सदस्यों की ही हुई है। यद्यपि सत्ता की दृष्टि से एनडीए 16 राज्यों में शासित है, तो ‘‘इडिया’’ 11 राज्यों में। जबकि असलग्न दलों की तीन राज्यों में सरकारे है।

सवाल ‘‘इंडिया’’ नाम रखने से क्या वास्तव में ‘‘इंडिया’’ हो जाएंगे। वर्ष 1884 में ‘‘ए. ओ ह्यूम’’ (एलेन ओक्टेवियन ह्यूम,) एक अंग्रेज द्वारा स्थापित कांग्रेस का क्या भारतीयकरण हो जायेगा? नामकरण और नाम बदलने की प्रक्रिया राजनीति में पिछले कुछ समय से राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर लगातार की जाती रही है। वास्तव में क्या यह सही है कि नाम के अनुरूप ही कार्य होता है? जवाब है बिल्कुल नहीं। अंकल शेक्सपीयर पहले ही फरमा गए हैं कि ‘‘नाम में क्या रक्खा है’’। उनकी इस उक्ति को चरितार्थ करती हुई ‘‘आंख के अंधे नाम नयनसुख’’ जैसी कई कहावतें हिंदी में भी चलन में हैं। तब फिर नामकरण या नाम परिवर्तन पर इतनी बहस क्यों की जाए? जालम सिंह, नरसिंहपुर विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक दूसरी बार लगातार चुनकर इसलिए आए हैं कि वे ‘‘जालम’’ न होकर मृदुभाषी और सरल स्वभाव वाले ‘‘मुन्ना भैया’’ के नाम से लोकप्रिय हैं। भोपाल के शैतान सिंह पाल को दो-दो बार शिवराज सिंह की सरकार ने निगम का अध्यक्ष इसलिए नहीं बनाया कि, वह ‘‘शैतान’’ है। हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम गिन्नौरगढ़ रियासत जिसमें तत्समय भोपाल शामिल था, के गोंड राजा निजाम साहब की रानी कमलापति के नाम पर रख देने से आदिवासियों के वोट मिल जाएंगे, यह मात्र एक गलतफहमी ही होगी। ‘‘नाम’’ भर बदल देने से ‘‘कि़ला फतह’’ नहीं होता।

यदि 26 दलों का गठबंधन ‘‘इंडिया’’ नाम रखकर अपने को ‘‘संपूर्ण इंडिया’’ समझ रहे हैं, जैसा कि गठबंधन के कुछ नेता ऐसा ही कुछ व्यक्त कर रहे हैं, तो यह गलत है। यदि उक्त गठबंधन के आव-भाव वास्तव में उक्त समान है, जैसा कि ममता बनर्जी ने कहा कि अब मुकाबला ‘‘एनडीए का इंडिया से होगा’’, ‘‘इंडिया जीतेगी एनडीए हारेगी’’। तब उसके पीछे छुपे आशय को समझने का प्रयास अवश्य कीजिए। खासकर उस संदर्भ में जब कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरूआ नें ‘‘इंदिरा इज इंडिया’’ का नारा दिया था। अतः ‘इंडिया’ के नेता गणों का पहला कदम, बयान ही इंडिया शब्द की भावना के विपरीत होकर ‘‘इंडिया’’ को शर्मसार कर रहा है। ‘‘इंडिया’’ मतलब ‘‘होल ऑफ इंडिया’’ अर्थात ‘‘संपूर्ण देश’’ है। आप सिर्फ 26 दलों के गठबंधन हैं, जबकि आपके सामने एनडीए 39 दलों का गठबंधन बन रहा है। इसके अतिरिक्त कुछ और प्रमुख राज्य उड़ीसा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश व पंजाब हैं, जहां के राज्य स्तरीय दल किसी भी गठबंधन में फिलहाल शामिल नहीं हैं। 26 दलों के नेता, उनके समर्थक, उनके सदस्य ही इंडिया है, बाकी क्या इंडिया नहीं है? यह विचारणीय है। 

दूसरा ‘झूठ’ ‘इंडिया’ शब्द को लेकर यह है कि यह शब्द न होकर ‘‘लघु रूप’’ (एबरीविएशन) है, जिसका फुल फॉर्म इंडिया ‘‘नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव एलाइंस’’ है। यद्यपि विकास संबंधी शब्द शायद किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन ने पहली बार नाम में जोड़ा है जो उनके एजेंडे की प्राथमिकता को दिखाता है। जैसा कि अधिकतर नेताओं ने यह कहा भी है कि यह व्यक्ति के विरूद्ध न होकर भाजपा के सिद्धांतों के विरूद्ध हमारी लड़ाई है। ‘‘इंडिया व (भारत) आई’’ जोड़ने की कवायद को भी भाजपा के राष्ट्रवाद को  चुनौती देने के रूप में देखा जा रहा है। 

कांग्रेस के प्रवक्ता उनके विपक्षियों द्वारा यह पूछे जाने पर कि ‘इंडिया’ का हिन्दी अर्थ क्या भारत है, जिसका जवाब तो नहीं है। इस प्रकार आप शॉर्ट फॉर्म ‘‘इंडिया’’ का उपयोग कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। और ‘‘उघरे अंत न होहिं निबाहू’’ की गति को प्राप्त हो रहे हैं। इसलिए आकर्षित शब्दों का नामकरण के लिए उपयोग जरूर कीजिए। परंतु नामकरण शब्दों के फेस वैल्यू के ‘‘अर्थ’’ पर मत जाइए अन्यथा ‘‘अनर्थ’’ होकर आपको शर्मसार ही होना पड़ेगा। जिस प्रकार ‘‘जालम’’ नाम होने के बावजूद वे दो बार लगातार विधायक बन सकते हैं। तब ठीक उसी प्रकार ‘‘इंडिया’’ नाम रख देने से गठबंधन की जन विरोधी, देश विरोधी या लोकतंत्र विरोधी होने वाली कोई भी हरकतों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता है। ‘‘अच्छी जीन बांध देने पर कोई घोड़ा अच्छा नहीं हो जाता’’। इस बात को वे लोग जरूर ध्यान में रखें, जो नाम को लेकर ‘‘अतिरेक’’ खुशी व संतोष व्यक्त कर रहे हैं। इंडिया के घटक दलों को इस बात से जरूर संतोष हो सकता है कि काफी अध्ययन व मशक्कत के बाद सर्वसम्मति से ‘इंडिया’ नाम चुना गया।

इन गठबंधनों की राजनीति ने देश में एक नई प्रथा चला दी है। विपक्ष के गठबंधन को सत्ता के लिए लालायित ‘‘ठग-बंधन’’ बताने वाले भाजपा के प्रवक्ता अपने गठबंधन को उक्त श्रेणी से कैसे अलग कर सकते हैं? अभी तक तो पक्ष और विपक्ष द्वारा किन्ही मुद्दे को लेकर परस्पर आरोप लगाए जाने पर पीछे मुड़कर इतिहास दिखा कर यह कहा जाता रहा है कि आरोप लगाने के पहले आप अपने गिरेबान में झांक तो लीजिये। परंतु गठबंधन की इस राजनीति ने जहां दोनों पक्ष गठबंधन के विचार लिए एक ही प्लेटफार्म पर खड़े हुए हैं, परन्तु बेशर्मी के साथ एक दूसरे पर ‘‘ऐसे’ आरोप लगाने में संकोच नहीं कर रहे हैं जिनसे (आरोपो से) वे स्वयं को भी अलग नहीं कर सकते हैं। मतलब सिद्धांतों की दृष्टि से कोई भी गठबंधन पाक साफ नहीं है। इसलिए देश की राजनीति के लिये हमेशा यह कहा जाता है कि ‘‘इस हमाम में हम सब नंगे है’’। वैसे आज की राजनीति की कहावत को गलत सिद्ध कर दिया है कि ‘‘चोर-चोर मौसेरे भाई’’। शायद उसका एक कारण यह भी हो सकता है कोई एक चोर है, तो कोई एक डाकू। 

गठबंधन मतलब राजनीतिक मजबूरी। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘‘इंडिया’’ गठबंधन के संबंध में नकारात्मक ठहराते हुए उसे सत्ता, भ्रष्टाचार, परिवारवाद भ्रष्टाचार, और जातिवाद क्षेत्रवाद मजबूरी बतलाई। परन्तु 26 दलों के गठबंधन को ‘‘मजबूरी’’ ठहराने वाले प्रधानमंत्री उसी सांस में 39 दलों के एनडीए गठबंधन को ‘‘मजबूत’’ कह देने मात्र से ही वे कैसे व किस प्रकार उक्त मजबूरी से स्वयं को दूर रख सकते हैं? जबकि प्रधानमंत्री द्वारा उल्लेखित किए गए उक्त तथ्य (या आरोप?) कमोबेश एनडीए में भी मौजूद हैं? मतलब सिद्धांतों के साथ समझौता कर वैचारिक रूप से अलग धरातल लिए हुए दूसरे दलों के साथ गठजोड़ मजबूती नहीं मजबूरी ही है। 

संख्या में 28 की तुलना में 39 दलों के इकट्ठा हो जाने से संख्या बल में बढ़त लेने के बावजूद जो नए दल एनडीए में जुड़े हैं, तुलनात्मक रूप से, गुणात्मक रूप से उनकी राजनीतिक पहचान लगभग नहीं के बराबर है। तथापि एनडीए के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की साख पिछले कुछ समय से हल्की से ढलान पर होने के बावजूद वे ‘‘इंडिया गठबंधन’’ की तुलना में ही नहीं, बल्कि देश के अभी भी निसंदेह सर्वाधिक लोकप्रिय नेता है। विपरीत इसके भाजपा का कुनबा ‘‘इंडिया’’ के नेताओं की साख के अस्तित्वहीन हो जाने की आशंका में ही ‘‘इंडिया’’ अस्तित्व में आया है। अभी तक कोई चेहरा ही नहीं है, तो ‘साख’ का प्रश्न ही कहां उत्पन्न होता है। यद्यपि प्रधानमंत्री ने एनडीए के 25 वर्ष पूर्ण हो जाने पर एनडीए का अर्थ (एन) न्यू इंडिया, (डी) विकसित राष्ट्र, व (ए) लोगों की आकांक्षा बतलाया। आप, ‘‘तुलमुल कॉन्ग्रेस’’ और समाजवादी पार्टी अपने-अपने राज्यों में हितों की टकराहट के बावजूद ‘‘इंडिया’’ का भाग बनना महत्वपूर्ण होते हुए भी इस बात का तो इंतजार करना ही होगा कि ये तीनों ‘‘कब तक’’ साथ में रहेंगे। वस्तुतः आज कोई भी दल या राजनेता दीवार पर अपने विरुद्ध लिखें सत्य से परिपूर्ण शब्दों को देखना पढ़ना ही नहीं चाहता है? मतलब कटु वास्तविकता से मुंह मोड़ लेता है। राजनीति के गिरावट का सबसे बड़ा कारण भी यही है।

हां यदि विपक्षी गठबंधन ने यह तय कर लिया है कि वे नाम के अनुरूप कार्य भी करेंगे। तब तो उनका स्वागत कुछ समय के लिए अवश्य किया ही जाना चाहिए, जब तक उनका आचरण धरातल पर नाम ‘‘इंडिया’’ के विपरीत प्रदर्शित न हो जाए।


शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

दादा स्वामी प्रसाद लोधी की पुण्यतिथि पर ‘‘भावपूर्ण’’ श्रद्धांजलि कार्यक्रम!

             ‘बुंदेलखंड के गौरव’’

बुंदेलखंड के गौरव, पूर्व विधायक, पूर्व अध्यक्ष नागरिक आपूर्ति निगम और देश की तेजतर्रार साध्वी नेत्री मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुश्री उमा भारती अब ‘‘दीदी माँ’’ (जैन मुनि आचार्य विधानसभा की आज्ञानुसार) के बड़े भाई दादा स्वामी प्रसाद लोधी की ‘‘पांचवीं पुण्यतिथि’’ भोपाल में खचाखच भरे रविंद्र भवन में अत्यंत शालीनता के साथ मनाई गई। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, अनेक मंत्रीगण, विधायकगण कुछ अन्य प्रदेश से आये नेतागण, सहित बुंदेलखंड की माटी से अनेक प्रशंसक उक्त कार्यक्रम में उपस्थित होकर शब्दांजलि (श्रद्धांजलि) देकर भागीदारी की। उक्त कार्यक्रम में मुझे भी मंचासीन होने का सौभाग्य मिला। इस सफल गंभीर, गरिमामय आयोजन के लिए आयोजकों से लेकर भागीदारों तक समस्त बधाई के पात्र हैं।

मध्यप्रदेश की खासकर बुंदेलखंड की धरती पर ‘‘दादा’’ एक राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुचर्चित नाम ‘‘स्वामी प्रसाद लोधी’’ है, जिन्हें लोग ‘‘दादा’’ के नाम से सम्मान पूर्वक बुलाते थे। उक्ति है कि ‘‘परोपकाराय सतां विभूतयः’’ अर्थात सज्जनों की विभूति परोपकार के लिये होती है। दादा ने अपने नाम को जीवन में पूर्णतः कर्मों द्वारा धरातल पर उतार कर सत्य सिद्ध किया। कैसे! 

‘‘स्वामी प्रसाद लोधी’’ का प्रथम शब्द ‘‘स्वामी’’ मतलब निश्चित रूप से आत्मसम्मानी होने के कारण दादा स्वयं के ही स्वामी नहीं थे, बल्कि उससे भी ज्यादा वे उस जनता के भी स्वामी बन गये थे, जिनके बीच में कर्तव्य परायणता व जनता के बीच जमीन पर उतर कर वास्तविक कार्य करने के कारण उस जनता का जो उन्हे बेहद भरपूर प्यार व आशीर्वाद मिला, जिसका आनंद ‘‘गूंगे के गुड़ समान’’ वर्णनातीत है। जिसके कारण वे मध्यप्रदेश की विधानसभा में भी पहुंचे। इस प्रकार वे लोकतंत्र में जनतांत्रिक मूल्यों द्वारा जनता के द्वारा दिये गये प्यार, मान, सम्मान के कारण व जनता ने उन्हें अपना ‘‘स्वामी’’ बना लिया। वह जनता का दिया गया अधिकार ही था, जिसके फलस्वरूप ‘‘परमहंस’’ कोटि के ‘‘स्वामी’’ होकर भी उनमें कभी भी ‘अहम’ भाव वाले ‘‘स्वामी’’ की भावना नहीं आयी। उन्होंने तो आध्यात्म का बुनियादी सूत्र ‘‘असतो मा सद्गमय’’ थामा हुआ था कि असत्य से सत्य की ओर चलो, ‘‘सत्य को जानो, वह तुम्हें मुक्त करेगा’’। इसीलिए वे ‘‘आत्मसम्मान’’ की भावना लिये हुए ‘‘स्वामी’’ बने। 

इसका प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभव मुझे तब हुआ, जब दादा बैतूल में श्री रुक्मणी बालाजी मंदिर के एक कार्यक्रम में बुलाये गये थे। तब कुछ अप्रिय विवाद की स्थिति के हो जाने के कारण उन्होंने मुझसे कहा ‘‘राजू तुरंत यहां से चलना है’’ तेरी गाड़ी में ही चलूंगा ‘‘मैं यहां भोजन भी नहीं करूंगा’’। यह सदाचार रूपी वह स्वाभिमान ही था, जिसे उन्होंने ‘‘अनुल्लंघनीयः सदाचारः’’ के नियम का पालन करते हुए जीवन पर्यंत तक बनाए रखा। यह एक साधना थी, ‘‘हथेली पर सरसों जमाने जैसा कारनामा’’ नहीं, शायद इसी कारण वे कई बार विवादास्पद भी बने। इस स्वाभीमान स्वाभिमानी प्रवृत्ति के कारण ही वे ‘‘बेबाक’’ व्यक्ति कहलाते थे। जहां एक ओर उन्होंने अपनी पार्टी के राजनीतिक विरोधी दिग्विजय सिंह की ‘‘भागवत कथा’’ भी की और दूसरी ओर उन्होंने राजनीतिक रूप से कांग्रेस का विरोध भी किया।

 जब वे जनता के प्यार के अधिकारों के ‘‘स्वामी’’ हो गये, तब उन्होंने ‘‘स्वामी प्रसाद’’ का दूसरा शब्द ‘प्रसाद’ को भी जीवन में सत्य सिद्ध किया। यहां ‘‘प्रसाद’’ क्या है? जनसंघ व भाजपा से जुड़े रहे चार भाई व दो बहनों के भाई, स्वामी प्रसाद लोधी का सबसे बड़ा ‘‘प्रसाद’’ उम्र में उनसे 15 वर्ष छोटी उनकी प्रिय बहना का लालन पालन किया, जिनके माता-पिता बचपन में ही छोड़कर चले गये थे। पिताजी उमाजी की डेढ़ वर्ष की अल्पायु के समय ही छोड़ गये थे। तब दादा ने ही ‘‘उमा’’ के प्रति माता-पिता का कर्तव्य निभाया। इस तरह से ईश्वर प्रदत उमा जी के ‘‘प्राकृतिक व्यक्तित्व’’ को ‘‘उजला कर’’, चमका कर समाज, प्रदेश व राष्ट्र के लिए प्रस्तुत किया। दादा के व्यक्तित्व गढ़ने के इसी आशीर्वाद के कारण ही राजमाता विजयाराजे सिंधिया के अनुरोध पर सन्यासी (साध्वी) बनी उमाजी श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के साथ हिन्दुत्व की धारा की सबसे बड़ी वाहक व ‘‘आकाश पर दिया जलाने वाली’’ एक पहचान बन गई। ‘‘रामलला घर आएंगे मंदिर वहीं बनाये जाने’’ का नारा सुश्री उमा भारती ने ही दिया था। इस बात को दीदी सुश्री उमाश्री भारती भी मानती है कि उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में ईश्वर के साथ यदि किसी एक व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान है, तो वे उनके भाई स्वामी प्रसाद लोधी ही हैं। इस प्रकार उनके कर्मों का प्रसाद देश को साध्वी उमाश्री भारती के रूप में मिला। 

अब ‘‘दादा’’ शब्द की व्याख्या कर ले! दादा शब्द के बहुआयामी अर्थ/रूप हमारे समाज में है। जहां एक ओर बडे भाई को दादा कहा जाता है, ‘‘पिताजी’’ के साथ ही ‘‘पिताजी के पिता’’ को भी ‘‘दादा’’ कहा जाता है, वृद्ध व्यक्ति को भी ‘‘दादा’’ कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर कहीं बच्चों को भी दादा कहा जाता है। तथा अपनी बात को दृढ़ता के साथ रखने वाले व्यक्ति को भी ‘‘दादा’’ कहते हैं। यह हमारी संस्कृति की विशेषता व विविधता है। इस प्रकार स्वामी प्रसाद लोधी में दादा के समस्त अर्थो, गुणों का सम्मिश्रण था। इसलिए यदि यह कहा जाए कि स्व. दादा स्वामी प्रसाद लोधी का नाम जमीनी धरातल पर भी उतनी ही वास्तविक अर्थ लिये हुए है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।  

अब ‘‘लोधी’’ शब्द का अर्थ भी समझ लेते है। ‘दादा’ चंद्रवंशी क्षत्रिय राजपूत जाति के वंशज ‘‘लोधी’’ होने के कारण ‘‘लोधी’’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘लोध’’,लोधा  हैं, जिसका अर्थ साहसी व दृढ़ रचना व रक्षा करने में सामर्थ्यवान होता है। दादा ने ‘लोधी’ शब्द के उक्त अर्थ को भी कमोबेश अपनाया। 

व्यक्ति के आने-जाने का क्रम सृष्टि का अडिग, अटल नियम है। लेकिन कुछ व्यक्ति ऐसे होते है, जो इस पृथ्वी से जाने के बाद भी नहीं जाते हैं। मतलब! शरीर चला जाता है, लेकिन अपने कर्मों, कर्तव्य-निष्ठा और अपने जीवन में किये गये कार्यों के कारण वे कार्य इस सृष्टि से उन्हें ओझल होने नहीं देते है, बल्कि कार्यों के कारण उनकी याद हमेशा तरोताजा बनी रहती है और हमें प्रेरणा देती रहती है। एक व्यक्ति की जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि व सफलता यही होती है। कुछ लोग अपने जीवन काल में पद, सम्मान, स्वार्थ और अन्य कारणों से याद किया किए जाते हैं। लेकिन जीवन से मुक्ति हो जाने के बाद स्वार्थ व पद की समाप्ति हो जाने के कारण वे भुला दिये जाते हैं। परन्तु बिरले ही कुछ लोग ऐसे होते है, जो लोगों के बीच लम्बे समय तक यादों की स्मरण शक्ति में छाए रहते हैं। यह उनके जीवन की, जीवन लीला समाप्त हो जाने के बाद की उपलब्धि व सफलता है। कई बार विवादों में रहने के बावजूद दादा का जीवन आज उक्त बात को सिद्ध कर रहा है। राजनीति में आने के पहले वे कथा करते थे और राजनीति में आने बाद भी वह क्रम चलता रहा। क्योंकि वे मानते थे कि ‘‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’’, और जानते थे कि ‘‘धर्महीन व्यक्ति बिना नकेल के घोड़े जैसा होता है’’। शायद इसी कारण अध्यात्म के साथ राजनीति को दादा ने जिया तो उसमें राज कम नीति ज्यादा रही, जिसका आज की राजनीति में नितांत अभाव है, बल्कि विपरीत स्थिति है। मतलब ‘‘नीति’’ नहीं सिर्फ ‘‘राज’’ ही है। दादा ने इसे अपने तरीके से जिया महसूस किया व व्यक्त किया। यही दादा की वास्तविक पहचान है। उनकी पांचवीं पुण्यतिथि पर कोटिशः नमन श्रद्धांजलि।

बुधवार, 12 जुलाई 2023

‘राज’’-‘‘नीति’’ का ‘‘दलबदल’’ ‘‘दलदल’’ ‘‘दलबल’’ ‘‘राज दंड’’

आखिर राजनीति का यह ‘‘कीचड़’’ किस निम्नतर सीमा पर जाकर रूकेगा? 

अभी तक राजनीति में किसी राजनेता को सफलता प्राप्त करने के लिए मैं अंग्रेजी के ‘एम’ अक्षर से शुरू होने वाले चार शब्दों अर्थात चार एम जरूरी मानता रहा हूं। ये चार एम है-‘‘मनी’’ पावर, ‘‘मसल’’ पावर, ‘‘माब’’ पावर एवं ‘‘मीडिया’’ पावर ‘‘विद परिक्रमा, विदाउट पराक्रम’’। मेरे राजनीतिक जीवन के अनुभव के आधार पर मेरी उक्त धारणा/व्याख्या बनी है, जो वर्तमान की वास्तविक धरातल पर समस्त/विभिन्न पृष्ठभूमि के नेताओं पर आज भी उतनी ही लागू होती है, जो ‘‘चक्की में से भी साबुत निकल आवे’’। परंतु महाराष्ट्र में अभी जिस तेजी से राजनीतिक घटनाक्रम बदले हैं, और चल रहे है, उक्त घटना ने व इसके पूर्व शिवसेना में हुई टूट की घटना से मुझे उक्त चार एम के साथ एक और ‘एम’ किसी भी राजनीतिक पार्टी को वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के मुद्दे नजर लोकतंत्र की राजनीति में सत्ता प्राप्ति की सफलता के लिए जोड़ना आवश्यक हो गया है, और वह एम है ‘‘मशीनरी’’ पावर! (सीबीआई, ईडी इत्यादि केंद्रीय एजेंसीज्)
उक्त गुण जो अवगुण नहीं, राजनीति में आने की इच्छा रखने वाले जिस व्यक्ति में होंगे, वही व्यक्ति के राजनीति में सफल होने की संभावना की सूची में आ पाएंगे और ‘‘वीर भोग्या वसुंधरा’’ की उक्ति को साकार करने में समर्थ होंगे। अन्यथा उसे राजनीति में आने की अपनी इच्छाएं को उत्पन्न होते ही मार देनी चाहिए, बल्कि उत्पन्न होने ही नहीं देना चाहिए, जैसे कि यदि मुस्कान आपके स्वभाव में नहीं तो व्यवसाय के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। हां राजनीति में अपवाद हर जगह होते हैं। समस्त राजनीतिक पार्टियों के करोड़ों सदस्यों के बीच मात्र उंगलियों में गिनने वाले लोग ही आपको मिल पाएंगे, जो ‘‘उक्त गुणों’’ के बिना राजनीति में अपने सब कर्मों, कर्तव्यों के पालन करने के कारण सफल हो पाए हैं। या हो पाएंगे? लेकिन यहां भी दुर्भाग्यवश देश की राजनीति का हाल यही रहा है कि ऐसे उंगलियों पर गिरने वाले व्यक्तियों के नाम को जनता को तो छोड़िए, ‘‘चंदन धोई माछली, पर ना छूटे गंध’’ वाली राजनीति में सक्रिय लोगों को भी मालूम नहीं हो होंगे। हां उनका नाम ढूंढने के लिए शायद आपको गूगल सर्च करना पड़ सकता है।
कहां जाता है, राजनीति में साम-दाम-दंड-भेद सब जायज होता है। तब फिर आप उपरोक्त पांच एम को इसका आवश्यक अनिवार्य भाग मान ही कर अपना लीजिये। आपकी राजनीतिक जीवन की (बिना विचारधारा) के यही सफलता की कुंजी है। कुंजी इसलिए कि जिस प्रकार स्कूलों में बच्चे पाठ्यक्रम से ज्यादा कुंजियों पर सफलता प्राप्ति करने के लिए  विश्वास करते है। उसी प्रकार राजनीति में भी लिखित पाठ्य (संविधान) से ज्यादा अलिखित परिपाटी सफलता के रास्ते की कुंजी है।
याद कीजिए हरियाणा की भजनलाल की पूरी की पूरी सरकार ही लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया के तप से गुजरे बिना ही सत्ता के पारस पत्थर के स्पर्श से तप की चमक लिए उत्पन्न होकर तत्समय ‘‘आयाराम-गयाराम’’ की चल रही प्रक्रिया से नव गठित मुहावरे को बड़ी मजबूती प्रदान की। इसके बाद तो शर्म-हया की झिझक खत्म ही हो गई, क्योंकि ‘‘तकल्लुफ में ही तकलीफ सरासर’’। मूछों पर ताव देकर, व जिनकी मूछे नहीं है, वे भाव भंगिमाओं को आकृति देकर, ताल ठोकर, जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने से लेकर गोवा, कर्नाटक, मध्य-प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि प्रदेशों में और हाल में ही मेघालय में मात्र दो सीट जीतने के बावजूद जेल भिजवाने की चेतावनी देने वालों के साथ सरकार बनाने का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा है। शायद ऐसी ही ‘‘चक्की को चलते देख कबीरा रो पड़ा होगा’’। 1967 में संविद सरकारों के दौर की तुलना में वर्तमान कांग्रेस मूकदर्शक या भुगतयमान की स्थिति में ही है। अन्यथा अवसर मिलने पर वह दो कदम आगे जाने में नहीं चूकेगी।
राजनीति की इस पनपती चलती नई गाथा प्रथा को संविधान में शामिल कर उसे संवैधानिक कृत्य क्यों नहीं बनाया दिया जाता है? वैसे भी राजनैतिक दल या व्यक्ति इन कृत्यों को उचित ठहराते समय संविधान का ही तो सहारा लेते हैं। क्योंकि संविधान की उक्त कमी ही उन्हें यह सिम्बल ही (आधार) प्रदान करती है।
वैसे चूंकि ‘‘कमल’’ ‘‘कीचड़’’ में ही खिलता है। इसीलिए शायद भाजपा को लगता होगा कि राजनीति का उक्त वर्णित कीचड़ उसके विकास के लिए फायदेमंद है। व्यवहारिक रूप में कुछ हद तक बात सही भी हो सकती है। लेकिन ‘‘पार्टी विद डिफरेंस’’ ‘‘सबको परखा हमको परखों’’ का नारा देने वाली यह पार्टी की यह एक गलत परिपाटी अपनाने की स्थिति होगी, जिसे बिना अपनाये भी भाजपा स्तरहीन विपक्ष के रहते हुए अपने को मजबूत कर सकती है। 

शुक्रवार, 7 जुलाई 2023

‘‘समान नागरिक संहिता’’(यूसीसी)! कितना सही! धरातल पर वास्तविकता में कितना उतर जाएगी?

 ‘‘मसौदा’’ (प्रारूप) सार्वजनिक कर सुझाव मांगे जाये!

पहल व कानून बनाए जाने का समर्थन!

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, ‘‘जड़ता’’ नहीं। ठीक इसी प्रकार कानून भी जड़ता लिए न होकर परिवर्तनशील होकर आवश्यकता के अनुसार इनमें समय-समय पर संशोधन व नये कानून बनाये जाते रहे हैं। जैसी कि एक फारसी कहावत है कि ‘‘हरचे आमद इमारतों नो साख्त’’। इस दृष्टि से, और संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 के अन्तर्गत दिये गये नीति निर्देश सिद्धांत के अपेक्षित अनुपालन में तथा वर्ष 1985 में शाहबानो प्रकरण व उसके बाद कई बार वर्ष 1995, 1997, 2014 में उच्चतम न्यायालय द्वारा यूसीसी की संहिता बनाये जाने के निर्देश दिये गये। तदनुसार यूनिफॉर्म सिविल संहिता बनाये जाने की गंभीर, दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जहमत उठा रही है। इसके परिपालन में 22वें भारतीय विधि आयोग (लॉ कमीशन) जो संवैधानिक या वैधानिक निकाय न होकर भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है, ने 14 मई को सार्वजनिक पत्र जारी कर संपूर्ण देश के लिए एक ‘‘समान सिविल संहिता’’ (यूसीसी) कानून बनाए जाने के लिए एक महीने के अंदर आम नागरिकों से सुझाव मांगे हैं। निश्चित रूप से इस पहल का व अंततः इसे कानूनी रूप दिये जाने की दिशा में बढ़ाने के कदम का समर्थन किया ही जाना चाहिए, क्योंकि ‘‘सबके लिए समान कानून’’ ही ‘‘देश की एकता’’ समरसता व मानवोचित कानून का आधार है। एकता में ही शक्ति है, जैसी कि उक्ति है कि ‘‘संघे शक्तिः कलौयुगे’’! वर्ष 2022 में भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने राज्य सभा में इस संबंध में निजी विधेयक भी प्रस्तुत किया था। 

कॉमन व यूनिफॉर्म सिविल कोड में ‘‘अंतर’’। 

परंतु समर्थन के पहले यह जानना आवश्यक है कि आम जन मानस के बीच पूर्व में समान (कॉमन) नागरिक संहिता की बात चर्चा में रही थी, जो अब ‘‘यूनिफॉर्म नागरिक संहिता’’ में बदल गई है। ‘कॉमन’ व ‘यूनिफॉर्म’ शब्द सतही तौर पर एक समान से ही लगते है। तथापि दोनों में अंतर बहुत है। इसलिए समर्थन/विरोध के पूर्व इसको समझना भी आवश्यक है। कॉमन (समान) शब्द का अर्थ है ‘‘सभी परिस्थितियों में एक समान’’। जबकि यूनिफार्म (एक समान) का अर्थ है ‘‘समान परिस्थितियों में समान’’। मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कानून हो सकते है। लेकिन किसी विशेष समूह के भीतर कानून एक समान होना चाहिए। कॉमन सिविल कोड का मतलब यह है कि यह बिना किसी वर्गीकरण किये संपूर्ण भारत क्षेत्र के समस्त नागरिकों पर कानून लागू होगा, जैसे सामान्यतया क्रिमिनल लॉ होते हैं, जिन्हें हम ‘‘लॉ-इन-रेम’’ कहते हैं। ‘यूसीसी’ जहां विभिन्न वर्गों को वर्गीकृत करके भी विभिन्न वर्गो के लिए अलग-अलग परन्तु समस्त देश के लिए एक कानून बनाए जा सकते है, जो सिविल या पर्सनल लॉ कहलाये जाते हैं। ये प्रभाव में ‘‘लॉ-इन-परसोनम’’ होते है। जैसे अनुबंध कानून, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, भागीदारी अधिनियम आदि सिविल कानून है, जो यूसीसी का एक ही भाग है। भारतीय जनता पार्टी की मूल विचारधारा (जनसंघ से लेकर) एक राष्ट्र एक संविधान, एक नागरिकता, एक प्रधानमंत्री, एक झंडा, एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति, एक टैक्स (कर), एक राशन की दिशा का यह एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसे पार्टी हर चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करती रही है। ‘‘कर ले सो काज भज ले सो राम’’ की तर्ज पर निपटाना चाह रही है। 

अब यह  संहिता (कोड) ‘‘व्यापकता’’ से हटकर ‘‘सीमित’’ होकर यूसीसी के रूप में लाई जा रही है। जो एक राष्ट्र-एक नागरिकता के समान, समस्त नागरिकों पर समान रूप से लागू नहीं होने जा रही है, ऐसा प्रतीत होता है। इस बात को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि हमारा देश कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विविधता में एकता व एकता में अनेकता लिये हुए बहुधार्मिक आस्थाओं का देश है, जहां यूसीसी से कहीं देश की इस पहचान व स्वरूप पर कोई आंच तो नहीं पहुंचेगी? अतः सरकार यूसीसी के अंतर्गत ‘‘क्या’’ करने जा रही है, उसे स्पष्ट किया जाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। क्योंकि ‘‘कुलिया में गुड़ नहीं फोड़ा जा सकता’’। 

आखिर ‘‘यूसीसी है क्या?’’

प्रथम प्रश्न तो यही है, क्या यूसीसी कोई ‘‘कानून संहिता है’’ जिस पर भारतीय विधि आयोग ने 14 जून को एक सार्वजनिक पत्र (पब्लिक नोटिस) जारी कर ‘‘समान नागरिक संहिता’’ पर मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों सहित आम नागरिकों से सुझाव मांगे हैं? उत्तर ‘‘नहीं’’। हां! अवश्य इस बात का उल्लेख संविधान के ‘‘भाग 4 के अनुच्छेद 44’’ में मिलता है, जिसके अनुसार ‘‘राज्य संपूर्ण भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा’’। चूंकि यह तथ्य संविधान में ‘‘नीति निदेशक’’ सिद्धांत के रूप में शामिल है, मूल अधिकार के रूप में नहीं, अतः ‘‘बंधनकारी नहीं है’’। 

समान नागरिक संहिता का अर्थ है देश के सभी वर्गों के साथ धर्म, पंथ, लिंग पर आधारित व्यक्ति कानूनों की जगह राष्ट्रीय नागरिक संहिता के अनुसार समान व्यवहार किया जायेगा और यह सभी पर समान रूप से लागू होगा। 

तब फिर ‘‘यूसीसी अभी तक संविधान द्वारा समर्थित एक विचार मात्र है, कानून नहीं’’। इस विचार में देश के समस्त पंथों, धर्मों को मानने वाले नागरिकों पर विवाह, तलाक, भरण पोषण, संपत्ति, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण (एडॉप्शन), गार्जियनशिप (अभिभावकता) विषयों पर एक ही कानून लागू होगा। इसे कानूनी अमला पहनाए जाने के लिए ही अभी जो मशक्कत की जा रही है, उसका ही यह परिणाम है, भारतीय विधि आयोग की ‘‘दूसरी बार इस संबंध में पहल’’ व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भोपाल में सार्वजनिक रूप से मंच से एक परिवार दो कानून से क्या घर चल पाएगा? कहकर समान नागरिक संहिता को लागू करने स्पष्ट रूप से संकेत देना है। आगामी शायद 17 जुलाई से प्रारंभ होने जा रहे मानसून संसद सत्र में समान नागरिक संहिता बिल प्रस्तुत किए जाने की संभावना आशा/आशंका है।

जनता से सुझाव मांगने के पूर्व प्रस्तावित कानून का प्रारूप (मसौदा) जरूरी!

विधि आयोग द्वारा जो कानून बनाया जा रहा है, जब तक उसका प्रारूप सार्वजनिक नहीं किया जायेगा। तब तक आम नागरिक ही नहीं विशेषज्ञ लोग भी यूसीसी पर अपने विचार सुझाव ‘‘किस सीमा’’ तक ‘‘कैसे’’ दे सकते है? पता तो चले कि ‘‘ऊंट किस करवट बैठेगा’’। क्योंकि यह विषय इतना विहंगम व विस्तृत है कि इस पर एक मोटी किताब लिखी जा सकती है। जब तक आयोग यह नहीं बतलायेगा कि प्रस्तावित कानून द्वारा हम किन पंथो, धर्मों और वर्गो के संबंध में किन विषयों विवाह, तलाक, संपत्ति इत्यादि के संबंध में यह सब प्रावधान लाये जा रहे है तब तक किसी व्यक्ति के लिए तो कैसे संभव है कि वह कैसे सुझाव दे तो किस बात के लिए। जबकि न्यायमूर्ति चौहान की अध्यक्षता में 21वां विधि आयोग ने (वर्ष 2018) में अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट मत दिया था कि तत्समय यूसीसी की न तो जरूरत है और न ही वांछनीय है। रिपोर्ट में चार वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो जाने के कारण विषय की महत्ता प्रासंगिकता तथा अदालती आदेशों के कारण उत्पन्न 22वें विधि आयोग का कार्यकाल 20 अगस्त 2024 तक बढ़ा दिया न्यायमूर्ति अवस्थी की अध्यक्षता में अब नये सिरे से पुनः सुझाव मांगे गए हैं। उदाहरणार्थ आज ही आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह कहा कि जब आदिवासियों को यूसीसी के अंतर्गत नहीं लाया जा रहा है, तब फिर मुस्लिमों को क्यों? जबकि विधि आयोग ने ऐसी कभी नहीं कभी नहीं कहा। यद्यपि अनुच्छेद 371 के कारण सुशील मोदी ने 13 करोड़ आदिवासियों को बाहर रखने की बात जरूर कही है। इस तरह बनाये जा रहे ‘‘परसेप्शन’’ को दूर रखने के लिए व नियत मुद्दों पर राय मांगने पर ही प्रयास सार्थक सिद्ध होगा। विधि आयोग ने जब यूसीसी पर सुझाव मांगे थे, तब 16 प्रश्न के द्वारा हा/न (पांचो को छोड़कर) मत मांगे गये थे। इससे कुछ तो यह ज्ञात हो रहा था कि विधि आयोग किस दिशा की ओर जायेगा। जनता से यूसीसी पर सुझाव मांगे गये है। परन्तु उसका मसौदा नहीं दिया गया है। चूंकि गुणवत्ता के आधार पर यूसीसी को देखने, पढ़ने का अवसर ही उत्पन्न नहीं किया गया है, तब इसमें सुझाव किस बात का? अब जनता खुद अपने दिमाग, मन में एक प्रस्तावित कानून का प्रारूप बना ले और फिर तदनुसार उनके सुझाव के रूप में दे। यह तो वही बात हुई कि ‘‘कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय’’। आयोग शायद जनता की यूसीसी बनाने में वास्तविक भागीदारी नहीं चाह रही है। 

अतः सरकार तुरंत पहले प्रारूप तैयार कर जारी करे और तब उस प्रारूप पर सुझाव लिये जाते तो इससे सरकार को सबसे बड़ा फायदा यह होता कि इसके आधार पर जब बिल संसद में कानून बनाने के लिए पेश किया जायेगा तो विरोध पक्ष को बोथल करने में सरकार ज्यादा सक्षम होगी। तब उसके पास बिल की प्रत्येक धारा के संबंध में समर्थन के जनता के आंकड़े होंगे। तभी जनता को भी यह ज्ञात होगा कि सरकार जो कानून बनाने जा रही है, उसमें कौन से हित छोड़ दिये है और उसमें कौन सा हित जोड़ना आवश्यक है और कौन से हित गलत जोड़ दिये है उसे हटाना आवश्यक है। यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि ‘‘कानून ऐसे हैं जिन पर सुचारू रूप से अमल किया जा सके’’।

अंत में हां जब भी यूसीसी की बात उठती है, तब देश में बहुसंख्यकों व अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के बीच एक दरार की लकीर खींचने का प्रयास किया जाता है, जो वास्तविकता में सही नहीं है। यह तथ्यों से आंख मूंदने वाली बात है। इसका विस्तृत अध्ययन हम अगले लेख में करेगें।

हां विधि आयोग द्वारा पूर्व में इस तरह के दो प्रयास किए जा चुके हैं। विधि आयोग या सरकार ने यह तो तय कर लिया है कि राष्ट्रीय खेल हॉकी जहां कोई विकल्प नहीं है, इसलिए वह "सीसीसी" है, की जगह अंग्रेजी खेल क्रिकेट खेलना है जहां कई विकल्प है, यह वह "यूसीसी" है। परंतु वह अभी तक यह तय ही नहीं कर पाई है कि क्रिकेट का कौन सा प्रारूप खेलना है? टेस्ट मैच, वनडे टी20 या फिर कोई नया प्रारूप टी10. तब यह कहना क्या उचित नहीं होगा "अभी तो सूत न कपास,जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा है"!

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