मंगलवार, 11 जून 2024

‘‘माता’’ के दास ‘‘दुर्गा दास’’।

सिर्फ इतिहास ‘‘दोहराया’’ ही नहीं, बल्कि ‘‘बनाया’’ भी है।

बैतूल-हरदा-हरसूद लोकसभा क्षेत्र से पहले से अधिक मतों से विजयी सांसद दुर्गा दास उईके को सिर्फ एक मतदाता व नागरिक की हैसियत से ही नहीं, बल्कि गायत्री शक्तिपीठ, बैतूल के ट्रस्टी की दृष्टि से भी हृदय की गहराइयों से खूब आत्मिक बधाइयां व जनता का हार्दिक आभार! ‘‘जब मन में सफलता का संकल्प होता है, तब ईमानदारी से परिश्रम ही विकल्प होता है’’।  माता गायत्री के अनन्य भक्त, सेवक और गायत्री परिवार की टोली के महत्वपूर्ण सदस्य दुर्गादास उईके को परम पूज्य गुरुदेव और वंदनीय माताजी के आशीर्वाद के साथ जनता के आशीर्वाद से इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का फिर से अवसर प्राप्त हुआ है। मुझे नामांकन भरने के पूर्व और मतगणना प्रारंभ होने के पूर्व के वे क्षण याद आते हैं, जब मेरी उनसे बात हुई थी। तब मैंने यही कहा था कि ईश्वर ने आपके लिए बहुत अच्छा मौका लाया है। कमजोर विपक्ष होने से पिछले मतों से ज्यादा जीतने पर आपको केंद्र मे मंत्री पद मिल सकता है और आप इतिहास रच सकते हैं। वे कथन आज अक्षरशः सत्य सिद्ध हुए हैं।

कुछ व्यक्ति इतिहास रचते हैं, तो कुछ इतिहास दोहराते हैं। लेकिन बहुत कम अवसर ऐसे आते हैं, जब एक ही व्यक्ति एक साथ इतिहास दोहराता भी है और रचता भी है। शिक्षक से सांसद बने दुर्गादास उईके बैतूल की माटी के ऐसे ही शख्स है, जिन्होंने न केवल इतिहास दोहराया, बल्कि नया इतिहास भी रचा दिया। वर्ष 1994 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल में बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र के सांसद कांग्रेस के असलम शेर खान के बाद दुर्गादास उईके बैतूल लोकसभा के दूसरे सांसद हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में 30 वर्ष बाद प्रतिनिधित्व मिला। असलम शेर खान भी राज्य मंत्री ही बनाए गए थे, जो प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ किए गए थे। इस प्रकार वर्तमान में उक्त इतिहास दोहराया गया है। दुर्गादास उईके स्वतंत्रता के बाद जनसंघ, जनता पार्टी और भाजपा के वे बैतूल लोकसभा क्षेत्र के पहले सांसद हैं, जिन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया है। इस दृष्टि से उईके भाजपा के बैतूल के पहले सांसद हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली है। इसलिए उन्होंने एक नया इतिहास भी रचा है। 

इसी तरह का नया इतिहास मेरे पिताजी स्वर्गीय गोवर्धन दास जी खंडेलवाल ने भी रचा था, जब वर्ष 1967 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के मंत्रिमंडल में जनसंघ पार्टी जिसका वर्तमान स्वरूप वर्तमान भाजपा है, के कोटे से उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। इस प्रकार तत्समय प्रथम बार बैतूल जिले को (बैतूल विधानसभा) मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में स्थान मिला था, तब एक नया इतिहास रचा गया था, जो अभी भी भाजपा की दृष्टि से अटूट है। आज वे इस दुनिया में नहीं लेकिन किसी शायर के चंद अशआर उन्हें समर्पित हैंः- ‘‘जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता है’’। यद्यपि घोड़ाडोगरी क्षेत्र के विधायक रामजीलाल उईके पटवा सरकार में संसदीय सचिव जरूर बनाए गए थे। कांग्रेस के तो कई विधायक रामजी महाजन, अशोक साबले, प्रताप सिंह उईके मंत्री बनाये गये। इसी के साथ स्वर्गीय जी.डी. खंडेलवाल जी ने एक इतिहास यह भी रचा था कि वे पहले और अभी तक के शायद एक मात्र ऐसे गैर आदिवासी विधायक थे, जिन्हें आदिवासी विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। यह भी संयोग ही है कि दुर्गादास उईके को भी वहीं आदिवासी विभाग जिसे अब जनजातीय विभाग कहा जाता है, का राज्य मंत्री बनाया गया है। 

वैसे दुर्गादास उईके कुशल वक्ता, मृदुभाषी, सहज, सरल व्यक्ति के धनी है, जो सक्रिय सांसद जरूर रहे हैं। परन्तु संसदीय क्षेत्र की जनता की जो तीव्र अपेक्षाएं उनसे रही हैं, शायद उनकी उतनी पूर्ति अभी तक नहीं हो पाई है। वस्तुतः जन आकांक्षाओं पर खरा उतरना ‘‘तलवार की धार पर चलने के समान होता है’’। अब उन्हें यह एक बड़ा अवसर मिला है कि वे जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप पूर्णतः खरा उतरे। ‘‘चुनौती खु़द को साबित करने का मौका़ देती है’’। इसलिए वे इस अवसर को जनहित में भुनाएं और इस जिले की जनता की इस तकिया कलाम पर हमेशा के लिए ताला लगा दें की जब भी  इस जिले के विकास की बात की जाती है, तो यहां की जनता छिंदवाड़ा में कमलनाथ द्वारा किए गए विकास का उदाहरण देने लग जाती है।  इस परसेप्शन और नरेशन को बदलने का एक सुनहरा अवसर दुर्गा दास उइके को मिला है। ‘‘आज की सफलता कल की उपलब्धियों की शुरुआत हो’’। विलक्षण प्रतिभा के धनी-ज्ञानी, विद्वान और अपनी बातों को अच्छी तरह से प्रस्तुत करने की कला का वह सरकार पर दबाव बनाकर अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के हित में उपयोग करें, मेरी उनको जनहित में यही सलाह है, अपेक्षा भी यही है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 14 तारीख को ‘‘मूलतापी’’ पहुंच रहे हैं। मुझे लगता है कि माननीय राज्यमंत्री को इस पहले अवसर पर ही मूलतापी के विधायक चंद्रशेखर देशमुख के विशेष सहयोग से एक नई सौगात दिलाने का अवसर प्राप्त होगा। मूलतापी उद्गम नदी ताप्ती के विकास हेतु ताप्ती विकास प्राधिकरण, परिक्रमा स्थल के विकास की पड़ी लम्बित मांग अविलम्बित पूरी हो सकेगी। साथ ही मूलतापी को जिला बनाने की जनता की मांग पर गहनता से विचार विमर्श होकर अंतिम निर्णय पर पहुंचने का भी प्रयास होगा।

पुनः शत-शत बधाइयां।

शनिवार, 8 जून 2024

विलक्षण मैंडेट! (शासनादेश) जनादेश।

 कहीं खुशी कहीं गम! कभी खुशी कभी गम!

नरेन्द्र मोदी ऐतिहासिक प्रधानमंत्री होने जा रहे हैं।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में वर्ष 1951-52 में जब सबसे लम्बे चुनावी प्रक्रिया 4 महीने चली थी, के बाद अभी तक के दूसरे सबसे लंबे समय तक चले लोकसभा चुनाव के अंतिम परिणाम आ गए हैं। परिणाम में स्पष्ट रूप से अकेले भाजपा को तो नहीं, परन्तु भाजपा के नेतृत्व में बनी एनडीए को स्पष्ट पूर्ण बहुमत प्राप्त हो गया है। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व में बनी इंडिया प्रमुख व सशक्त विपक्षी गठबंधन के रूप में उभरा है। यदि हम पिछले 25 वर्षों के चुनावी परिणाम का अवलोकन करें तो, यह चुनावी परिणाम इस मायने में सबसे अलग होकर विलक्षण है कि जहां दोनों पक्ष सत्ता और विपक्ष, एनडीए और इंडिया एक ही परिणाम में एक साथ अपनी-अपनी जीत के लिए जनता को बधाई दे रहे हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद नरेन्द्र मोदी ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं, जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे है। यद्यपि चुने हुए वे लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले पहले व्यक्ति होगें। यदि वे पिछले वर्ष 2019 के चुनाव में प्राप्त 303 सीटों से ज्यादा सीटें प्राप्त कर लेते तो वे जवाहरलाल नेहरू से भी ज्यादा सफल प्रधानमंत्री कहलाते, क्योंकि नेहरू की जीत प्रत्येक अगले आम चुनाव में क्रमवार कम होती गई थी। 

एग्जिट पोल असफल!

इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि समस्त 12 सर्वे एजेंसियों द्वारा दिए गए एग्जिट परिणाम बिल्कुल ही गलत सिद्ध हुए। तथापि दैनिक भास्कर का जो एग्जिट पोल नहीं था, बल्कि सर्व मात्र ऐसा था, जिसने 281-350 की लम्बी रेंज के आकड़े के प्रारंभ आकड़े 281 से वर्तमान आयी संख्या 292 मिलते हैं। यद्यपि जी न्यूज के एआई एग्जिट पोल ने एनडीए को 305-315 सीटे दी है, जो 12 एग्जिट पोल की तुलना में परिणाम के ज्यादा निकट है। 

जीत-हार नहीं! जीत तो जीत या हार तो हार?

पिछले चुनाव (303 सीटों)की तुलना में बीजेपी की 63 सीटें अर्थात लगभग 20% कम होने के बावजूद यदि वह खुशियां मना रही है, तो इसलिए कि उनके नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की तीसरी बार सरकार बनने जा रही है। लेकिन साथ ही बीजेपी के लिए यह चिंता व मनन का भी विषय है कि 370 का नारा तो दूर पिछले चुनाव में प्राप्त 352 सीटें भी वह बचा नहीं पाई, जिसका आत्म-विश्लेषण, आत्मालोचन पार्टी निश्चित रूप से करेगी। इस प्रकार भाजपा के लिए यह चुनाव परिणाम जीत और हार दोनों लिए हुए है और इसीलिए कभी खुशी-कभी गम (अमिताभ बच्चन की फिल्म) और कहीं खुशी- कहीं गम की स्थिति है। इसी प्रकार इंडिया गठबंधन ने परिणाम के दौरान ही तुरंत पत्रकार वार्ता कर कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जनता को बधाई दी। यद्यपि दावे के अनुसार सरकार बनाने लायक बहुमत न मिलने पर उन्होंने यह नहीं कहा कि यह हमारी हार है और हम जनता के निर्णय को शिरोर्धाय करते है, जैसा कि हर हार के बाद कहा जाता रहा है। कारण स्पष्ट है कि कांग्रेस की 2019 के चुनाव की 52 सीटें बढ़कर लगभग 100 के पास 99 तक पहुंच गई हैं और ‘‘इंडिया’’ लोकसभा में पिछले पिछले 25 सालों में आज सबसे मजबूत विपक्षी गठबंधन बना। परंतु इंडिया को उनके दावे 295 सीटों के विपरीत मात्र 233 सीटे ही मिल पाई और वे बहुमत से काफी दूर रह गई।

परिपक्व संतुलित निर्णय।

भारतीय लोकतंत्र की दृष्टि से देखें तो यह चुनाव परिणाम जनता के एक परिपक्व निर्णय को दर्शाता है। वह ऐसे कि एक तरफ पूर्ण बहुमत (292) की स्थाई सरकार दी गई तो, दूसरी तरफ मजबूत विपक्ष (234) को चुना गया। 400 के नारे से बने तानाशाही के नरेशन व परसेप्सन की प्रवृत्ति की तथाकथित आशंका को भी जनता ने दूर किया तो दूसरी ओर संख्या में कमी के कारण लंच-पुंज विपक्ष के रहते सरकार पर कोई मजबूत नियंत्रण न रख पाने की असमर्थता को पर्याप्त संख्या देकर सत्ता पर एक प्रभावी अंकुश रखने के लिए समर्थ विपक्ष भी बनाया। जनता को प्रायः अधिकाशतः अनपढ़, बेवकूफ, अंगूठा छाप तक कहा जाता रहा है, उसी जनता ने इस चुनावी परिणाम से यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियों के अनुसार देश हित में संतुलित निर्णय लेने की उसमें पर्याप्त क्षमता है, जो वह लेती है। इसलिए वर्तमान परिणाम को स्वीकार कर किसी भी पक्ष को हार या जीत से परे रहना होगा। देश हित में सत्ता की गाड़ी के दोनों पहिया बनकर रचनात्मक विपक्ष बनकर देश को आगे चलाने का महान दायित्व जनता ने राजनैतिक दलों को दिया है। अब यह देखना होगा कि इन बुनियादी दायित्वों को दोनों पक्ष संकीर्ण राजनीतिक हितों से परे रहकर देशहित में किस प्रकार कार्य करते हैं? यह अभी भविष्य के गर्भ में है। निश्चित रूप से जनता की निगाहें उन पर पैनी नजर रखेंगी। इस बात को दोनों पक्षों ने भूलना नहीं चाहिए। अन्यथा इसके दुष्परिणाम दोनों पक्षों को भुगतने पड़ सकते हैं।

शेयर बाजार पर दोहरा विपरीत प्रभाव।

इस चुनाव परिणाम के सबसे दुखद पहलू को भी जानिए; जिस पर अंकुश लगाये जाने की नितांत आवश्यकता भी है। एग्जिट पोल ने 1 तारीख को चुनावी परिणाम के जो अनुमान दिये थे, वे किसी भी तरह से जमीनी स्तर पर व्यवहारिक नहीं लग रहे थे। इस कारण शेयर बाजार में 2621 अंको का उछाल आया। परन्तु चुनाव परिणाम के दिन जैसे-जैसे परिणाम आते गये शेयर सूचकांक में तेजी से गिरावट होकर 6200 से ज्यादा अंको से संेसेक्स लुुढ़क गया। एक अनुमान के अनुसार एक झटके में लगभग 36 लाख करोड़ रूपये का नुकसान निवेशकों को हुआ। भाजपा को बहुमत से 32 सीटे कम आने का मतलब प्रत्येक सीट ने 1 लाख करोड़ का नुकसान कराया। पिछले सवा दो साल में शेयर बाजार में आई यह सबसे बड़ी गिरावट है। क्या इसकी जिम्मेदारी कोई लेगा? 

तुरूप के इक्के! नीतीश कुमार-चंद्रबाबू नायडू।

इस चुनाव ने राजनीति में साइड लाइन किये जाने वाले नीतीश कुमार तथा साइडलाइन हो चुके चंद्रबाबू नायडू दोनों ही ‘‘तुरूप का इक्का’’ सिद्ध होने जा रहे हैं। दोनों ही तेज चालाक व सौदेबाजी में पारंगत मुख्यमंत्री नेता है। उनकी सौदेबाजी क्या 8 तारीख को नरेन्द्र मोदी को आसानी से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने देगी यह भी देखने की बात होगी। वैसे इस चुनाव परिणाम के इंडिया अलायंस के आये परिणाम के शिल्पकार राहुल गांधी हीरो होकर भी इस परिणाम ने उन्हें विलेन बना दिया है। वह इसलिए जब उन्होंने इंडिया की बैठक में नीतीश कुमार के संयोजक बनने की राह में ममता का नाम लेकर रोक लगा दी थी। आज यदि नीतीश इंडिया के साथ होते तो शायद स्थिति दूसरी हो सकती थी। 

परिणाम की दृष्टि से अंत में एक बात और! ''आत्मनिर्भर भारत'' का नारा देने वाली भाजपा स्वयं ''आत्मनिर्भर'' नहीं रह गई और सत्ता के लिए उसे अब दूसरे सहयोगीयों के उपर ''निर्भर'' रहना पड़ रहा है। यह इस परिणाम की एक दुखद स्थिति रही है।

‘‘महां एग्जिट पोल’’! कितने एग्जैक्ट? कितने विश्वसनीय? कितने ‘‘निष्पक्ष’’ अथवा ‘‘प्रायोजित’’?

 कहीं ‘‘संकेत’’ से ज्यादा ‘‘शोर’’ तो नहीं? परिणाम ‘‘अनुकूल न होने’’ पर ही प्रश्न वाचक चिन्ह क्यों?

देश में ‘‘एग्जिट पोल’’ का प्रारंभ कब?

भारत में वर्ष 1957 के दूसरे आम चुनाव में कमोबेश एग्जिट पोल की शुरुआत का श्रेय इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के मुखिया एरिक दी कोस्टा को दिया जाता है। हालांकि पहली बार औपचारिक रूप से वर्ष 1996 में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) द्वारा किए गए वास्तविक वैज्ञानिक रूप से किए गए एग्जिट पोल के नतीजों को दूरदर्शन पर दिखाया गया था। यद्यपि एग्जिट पोल की पहली शुरुआत वर्ष 1980 में चार्टर्ड अकाउंटेंट से पत्रकार बने ‘‘प्रणव राय’’ ने की थी। ‘‘ओपिनियन पोल’’ (जनमत सर्वेक्षण) ‘‘एग्जिट पोल’’ से बिल्कुल अलग है, जो मतदान के पहले मतदाताओं का मत (ओपिनियन) किसी दिशा में बनाने में सहायक हो सकता है, जिसकी तो आलोचना ‘मैनेज’ करने के आधार जरूर की जा सकती है। परंतु ‘‘एग्जिट पोल’’ किसी भी रूप में अथवा तकनीकी रूप से अंतिम परिणाम को प्रभावित करने में सहायक नहीं हो सकता है। इसलिए मात्र आपके अनुकूल परिणाम न बतलाने के कारण इसकी आलोचना करना परिणाम की दृष्टि से बिल्कुल गलत है, जब तक की अंतिम परिणाम इसके विपरीत आ नहीं जाते हैं। 

विपक्ष हतोत्साहित। 

अभी देश में सर्वत्र सिर्फ एग्जिट पोल की ही चर्चा है, जो लगभग पूर्वानुमान अनुसार ही आए हैं। आश्चर्य की बात यह नहीं है कि एग्जिट पोल के एक दिन पूर्व ही विपक्षी पार्टियों ने इस तरह के परिणाम आने को ‘‘भांप’’ लिया था। शायद इसीलिए पहले तो कांग्रेस ने एग्जिट पोल पर टीवी डिबेट में भाग लेने से ही इनकार कर दिया था। परंतु इस कारण आलोचनाओं से घिरने से इंडिया गठबंधन की बैठक होने के बाद कांग्रेस ने अपना निर्णय अंततः बदला। ‘‘स्व घोषित मोदी अंध विरोधी सोशल मीडिया’’ में भी एक दिन पूर्व ही ‘‘आरोपित अघोषित अंध भक्त मोदी मेन स्ट्रीम मीडिया’’ के इस तरह के आने वाले एग्जिट पोल के पूर्वानुमान बताए जा कर चर्चा की जा रही थी। प्रश्न उत्पन्न यह होता है की क्या वास्तव में धरातल पर जाकर सही वैज्ञानिक तरीके से एग्जिट पोल किये गये? अथवा जो एक नरेशन व परसेप्शन शुरू से लगातार  बनाया जा रहा था, उसी की अगली कड़ी के रूप में यह परिणाम तो आना ही था। 

वर्ष 2019 की पुनरावृत्ति? 

एग्जिट पोल के ‘‘पोल ऑफ पोल’’ (12 सर्वे एजेंसियों का औसत) ने एनडीए को 370- 390 सीटें दी है, जबकि वर्ष 2019 में एनडीए के पास 352 सीटें थी। उस हिसाब से मात्र 18 सीटों की वृद्धि (न्यूनतम 370 से) अर्थात 5.11% वृद्धि का अनुमान बतलाया गया है, जिसे पिछले दशक की दो आम चुनावों (2014 एवं 2019) की तुलना में एक तरफा जीत नहीं कहीं जा सकती है, जैसा कि प्रचार/दुष्प्रचार (प्रोपेगेंडा) किया जा रहा है। हां निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए जवाहरलाल नेहरू के बाद यह पहली ’हैट्रिक’ जीत होगी। यदि वर्ष 2014 की बात करें, तब एनडीए के पास कुल 336 सीटें थी। इस प्रकार वर्ष 2014 की तुलना में 2019 में 16 सीटों की बढ़ोतरी होकर कुल 352 सीटें हो गई, जो 4.76% होकर वर्ष 2024 की एग्जिट पोट के परिणाम की तुलना में मात्र 0.34% कम है। स्पष्ट है! यह तथाकथित विहंगम जीत (जिससे मुझे भी प्रारंभ में संतोष हुआ) जीत.न होकर वर्ष 2019 के परिणाम की लगभग पुनरावृति ही है, यदि इसमें से तेलुगु देशम जो 2019 के चुनाव में ‘‘एनडीए’’ की भागीदार नहीं थी, की अनुमानित 16 सीटें हटा दी जाए तो। शिरोमणि अकाली दल जो 2019 में एनडीए के साथ था की तत्समय दो सीटें थी, को इस एग्जिट पोल में 0 से 2 सीटें दी जा रही है। यद्यपि इस चुनाव में एनडीए के साथ में नहीं है इसमें चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के ‘‘प्रायोजित’’ आकलन को भी शामिल कर लिया जाय जो पिछले आकडे़ 303 या उसमें कुछ बढ़ौतरी बतला रहे हैं। यदि 13 वीं सर्वे एजेंसी दैनिक भास्कर के सर्वे को भी जोड़ दिया जाए, तो एनडीए की सीटों का औसत 365 का आता है। विपरीत इसके ‘‘इंडिया’’ 295 सीटों का दावा कर रहा है। अब आप यह आकलन आसानी से कर सकते हैं कि वास्तव में एनडीए की जीत 2019 की तुलना में है भी कि नहीं? आकलन करते समय इस बात को भी ध्यान में रखिए कि वर्ष 2019 की तुलना में ‘‘एनडीए’’ में शामिल दलों की संख्या 21 से बढ़कर 38 हो गई है, जिसमें राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के साथ नेशनल पीपुल्स पार्टी (पी ए संगमा की) मात्र एक राष्ट्रीय पार्टी शामिल है, जबकि ‘‘यूपीए’’ की जगह नवगठित विपक्षी गठबंधन ‘‘इंडिया’’ में 26 पार्टियां हैं, जिसमें तीन राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट और आप सहित 3-6 (एकदम विपरीत) विचार धारा वाले लोग भी शामिल हैं। वोटिंग परसेंटेज में एनडीए को 45% और इंडिया को 40% मत मिलने का अनुमान अभी बतलाया गया है। वर्ष 2019 की चुनाव में भी एनडीए को 45.43% वोट मिले थे।

निष्पक्ष चुनाव! परसेप्शन बिल्कुल टूटा हुआ?

एग्जिट पोल निष्पक्ष है, चुनाव परिणाम भी निष्पक्ष ही होंगे, यदि चुनाव निष्पक्ष हुए हैं तो? परंतु चुनाव की निष्पक्षता पर इफ, बट, लेकिन, परंतु, किंतु लगाना जब तक की कोई पूर्ण प्रूफ तत्व, तथ्य प्रमाण अथवा साक्ष्य सामने न हो, प्रश्न वाचक चिन्ह लगाना उचित नहीं होगा। परंतु एक बड़ा प्रश्न यहां जरूर उठता है कि जिस प्रकार ‘‘न्याय’’ के बाबत यह सिद्धांत सर्वमान्य रूप से स्वीकार है कि न्याय न केवल मिलना चाहिए बल्कि न्याय मिलता हुआ दिखना भी चाहिए। जस्टिस शुड नॉट बी डिलीवर्ड बट सीम्स टू बी डिलीवर्ड। ठीक यही सिद्धांत चुनावी प्रक्रिया पर भी लागू होता है। न केवल निष्पक्ष चुनाव होने चाहिए, जो होते हैं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव होते हुए दिखना भी चाहिए। यहीं पर पेंच है। तथापि जब तक कोई विरोधी साक्ष्य न हो, तब तक निसंदेह यही माना जाना चाहिए कि चुनाव निष्पक्ष रूप से हुए हैं। परंतु क्या यही सिद्धांत चुनाव निष्पक्ष रूप से होते हुए दिखना चाहिए, पर भी वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पूर्ण रूप से लागू किया जा सकता है, कहना बमुश्किल है। बल्कि निर्विवाद रूप से पूर्ण रूप से ऐसा नहीं कहा जा सकता है। कारण! इसको आगे समझने का प्रयास करते हैं।

चुनाव आयोग के सदस्यों के चुनाव पर प्रश्नवाचक चिन्ह?

चुनावी प्रक्रिया से लेकर एग्जिट पोल और अंततः 4 जून को आने वाले चुनाव परिणाम को लेकर बनाए गए नरेटिव, परसेप्शन के कारण एक युक्ति युक्त आशंका आम जनों के दिमाग में बैठती जा रही है। याद कीजिए! लगभग सवा वर्ष पूर्व मार्च 2023 में जब उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यों की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक कदम उठाते हुए चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली की निष्पक्षता व स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए विधायिका की ‘‘निष्क्रियता’’ और उससे उत्पन्न ‘‘शून्यता’’ को देखते हुए हस्तक्षेप करते हुए यह आदेश पारित किया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त व चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए तीन सदस्यों की समिति में एक सदस्य उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हो व दूसरा लोकसभा में विपक्ष का नेता हो। इस प्रकार वर्तमान व्यवस्था जहां उनकी नियुक्तियां राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करते हैं, स्थानापन्न किया गया। यह अंतरिम व्यवस्था तुरंत लागू कर तब तक के लिए की गई, जब तक संसद इस संबंध में कानून पारित करके कार्रवाई करने का फैसला नहीं करती।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय को अप्रभावित करके चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित हुई। 

निष्पक्ष चुनाव के परसेप्शन पर गड़बड़ी उच्चतम न्यायालय के चुनाव आयोग के सदस्य के चयन के संबंध में अंतिम निर्णय के बाद से ही प्रारंभ होती है। केंद्रीय सरकार उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश के पालन में लोकसभा में बिल लेकर भी आई। परंतु उच्चतम न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्देश एक सदस्य मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए को ‘‘धत्ता’’ बता कर, अंगूठा दिखाकर मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को रख दिया गया। इस प्रकार तीन सदस्यीय आयोग में सरकार का ‘‘दो-एक’’ का बहुमत होने के कारण उच्चतम न्यायालय ने जिस निष्पक्षता को स्थापित करने के लिए कदम उठाया था व जिसकी कल्पना आम नागरिक भी कर रहे थे, वह इस एक कदम से ‘‘ध्वंस’’ हो गई। केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए उक्त कानून को उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दी गई, लेकिन दुर्भाग्य-वश उच्चतम न्यायालय ने विधायिका की जिस निष्क्रियता और उससे उत्पन्न शून्यता के आधार पर उक्त शून्य को भरने के लिए अपना निर्णय दिया था, उसी आधार को तुरंत सुनवाई के लिए न अपना कर उसी निष्क्रियता का कहीं परिचय तो उच्चतम न्यायालय नहीं दे रही है? जिस कारण से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जो तलवार सरकार के विधेयक लाने से लटकी थी, वह अभी भी लटकी हुई है। इसलिए लोकसभा के अंदर उठाया गया यह कदम चुनाव आयोग की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न उत्पन्न करने का अवसर न केवल विपक्ष को, बल्कि आम नागरिकों को भी देता है।

अब आगे चलते हैं। जिस तरह से चुनाव आयोग के एक सदस्य ने इस्तीफा दिया था और उसके बाद दो सदस्यों की नियुक्ति जिस जल्दबाजी में विपक्ष के नेता की अनुपस्थिति में की गई उसने भी कहीं ना कहीं आशंका के बादल फैलाएं। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता व उसकी कार्यप्रणाली व चुनावी प्रक्रिया के संबंध में यहां मैं जो भी चर्चा कर रहा हूं, वह कानूनी रूप से कागजातों पर सही होने के बावजूद मैं उस ‘‘परसेप्शन’’ की बात कर रहा हूं कि चुनाव सिर्फ निष्पक्ष होने ही नहीं चाहिए बल्कि निष्पक्ष होते हुए दिखना भी चाहिए। इसलिए मेरे विचारों, भावों को इस नजर से देखेंगे, तो आपको ज्यादा सहूलियत होगी।

400 पार का नारा! कहीं पर तीर कहीं पर निशाना तो नहीं? 

याद कीजिए! प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव की घोषणा की पूर्व ही संसद के पटल पर अबकी बार 400 पार का नारा दे दिया था। उसके बाद से सातवें चरण के अंतिम मतदान के दिन तक इस नारे-नरेटिव के परसेप्शन को नरेंद्र मोदी ने पूरे जोश खरोश के साथ बनाए रखा। सिवाय बीच की कुछ अवधि में जब इस नारे से विपक्ष यह नरेटिव बनाने में सफल रहा था कि 400 पार की बात कहीं संविधान  बदलने के लिए तो नहीं की जा रही है? उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह आदि विपक्ष की नजर में 400 को नरेटिव इसलिए बनाया जा रहा है कि जब माल-मैनिपुलेशन (हेरफेर, गड़बड़ियां) ईवीएम में होने के कारण 4 तारीख को परिणाम एग्जिट पोल को सही ठहराएंगे, तब आम नागरिक उसको सहजता से स्वीकार कर सकेंगे और उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा, क्योंकि उक्त नरेटिव से लंबे समय से माहोल, वातावरण बनाकर उनके दिमाग में यह बात बैठा दी जा चुकी है (माइंड गेम)। 

अनेकोनेक त्रुटियों के कारण विश्वसनीयता में कमी। 

इन समस्त एग्जिट पोल की शुद्धता और यर्थाथ पर आशंका का परसेप्शन फिर इसलिए उत्पन्न होता है कि लगभग समस्त पोल एनडीए को 350 से ऊपर बतला रहे है, व आंकड़ों में काफी कुछ समानताएं हैं। विपरीत इसके; जनता के बीच यह वास्तविक स्थिति भी हो सकती है, इसलिए आंकडों की समानता है। चूंकि अधिकांश सर्वे करने वाली एजेंसीज ने अपना वह आधार नहीं बताया जिनके आधार पर उन्होंने वैज्ञानिक गुणा भाग कर उक्त निष्कर्ष निकाले हैं इसमें भी आशंका उत्पन्न होती है। तथापि आज तक का इंडिया टुडे एक्सेस माय इंडिया की सर्वे एजेंसी जरूर या दावा करती है कि उसके सैंपलिंग की साइज से लेकर समस्त तथ्य व कार्य प्रणाली पारदर्शी है, जो उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। किसी भी एजेंसी ने 5 लाख वोटरों से अधिक से संपर्क करने का दावा नहीं किया है, जो 60 करोड़ वोटरों के व्यू को प्रतिबिंब कर सकते हैं, यह बात भी गले से नीचे उतरती नहीं है। इसके अतिरिक्त विभिन्न एजेंटीयों के सर्वे में हुई कुछ बेहद महत्वपूर्ण चुके हैं चुके भी उन्हें उनकी निष्पक्षता और एक्यूरेसी पर संदेह पैदा करती हैl जैसे रिपब्लिक इंडिया का इंडिया गठबंधन को इंडी गठबंधन कहना बहुत कुछ कह देता है l इसी प्रकार झारखंड में झारखंड में सीपीएम को दो सीट देना जो वहां चुनाव ही नहीं लड़ रही है, तमिलनाडु में कांग्रेस को 15 सीटें देना जो मार्च 9 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उत्तराखंड में कल 5 सिम हैं जबकि भाजपा को 6 सीटें दी जा रही है, हिमाचल प्रदेश में हिमाचल प्रदेश में कुल चार सीटें हैं जबकि 6-8 सीटों का आकलन दिखाया जा रहा है, राजस्थान में कल 25 सिम हैं जबकि 33 सीटों के नतीजे बताई जा रहे हैं और इसी प्रकार बिहार में लोजपा कल 5 सिम लड़ रही है जबकि उसे 6 सीटें दी जा रही है। इसी प्रकार तमिलनाडु वी कुछ राज्यों में जो कुल मतदान कुल मतों का प्रतिशत भाजपा को बताया जा रहा है वह वह भी अचंभित करने वाला है l इन सब कर्मियों से भी एग्जिट पोल की  विश्वसनीयता घटी है।

क्या लोकसभा चुनाव में जीत की गारंटी ‘‘एम’’ 'M' अक्षर हो गया है?

 ‘‘एम’’ किसका ‘‘मंगल-अमंगल’’ करेगा?








वर्ष 2024 के हो रहे लोकसभा चुनाव के अभी तक छह चरणों के मतदान हो चुके हैं। अब एक आखिरी सातवां चरण रह गया है, जहां 1 जून को मतदान होना है। 16 मार्च को केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव की तिथियां की घोषणा करने के बाद लगभग  साढे़ तीन महीनों से चले आ रहे इस चुनाव प्रचार की सबसे महत्वपूर्ण खासियत यह रही कि न केवल नरेटिव के विषय बदलते रहे, बल्कि नरेटिव एवं परसेप्शन बनाने वाली पार्टियां भाजपा-कांग्रेस भी नरेटिव फिक्स करने में एक दूसरे को शह-मात देती रही। सातवें चरण के समय चुनाव प्रचार का पहुंचा ‘‘निम्न स्तर’’ क्या ‘‘सातवें आसमान’’ पर पहुंचेगा, यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। 

पहले चार चरणों में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र के आधार पर नरेटिव फिक्स किया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस नरेटिव को खारिज करने में थकते हुए इस तरह उलझ गए कि कई बार वे कांग्रेस के समान ‘‘आत्मघाती गोल’’ मारते हुए दिखे। बाद के चरणों में जरूर कांग्रेस नरेटिव फिक्स करने में पिछड़ सी गई। बावजूद इसके इस बार पहले चरण के चुनाव प्रचार से लेकर छठवें चरण के चुनाव प्रचार तक यदि मुद्दों व परसेप्शनस् को देखें तो वे लगातार बदलते रहे हैं। परंतु इन बदलते मुद्दों के बावजूद इनमें एक चीज बहुत ही कामन रही, वह ‘‘एम’’ 'M' वर्ण (अक्षर) से प्रारंभ होने वाले शब्दों का ‘‘प्रयोग’’। कुछ शब्द निम्नानुसार है, जिनका उपयोग बहुतायत से बेधड़क बार-बार किया जाता रहा है।

‘‘महिला, मंगलसूत्र, मायावती, ममता, मालीवाल (स्वाति), महामहिम (राज्यपाल एवं न्यायाधीश), एमपी, एमएलए, महिमा-मंडन, मंडल- क-मंडल, मत, मत-मतांतर, मंदिर-मस्जिद, मदरसे, मुस्लिम, मुगल, मुगलिया, मुस्लिम लीग, माफिया, मटन, मछली, मुजरा, मथुरा, महाराष्ट्र, मणिपुर, मुद्दे, महंगाई, महाशक्ति, मानसिक संतुलन, मनी पावर, मसल पावर, माब पावर, मीडिया पावर, ‘‘मोदी’’?’’ 

महत्वपूर्ण प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इनमें से कौन से ‘‘एम’’ एनडीए के लिए ‘‘जीत का आधार’’ हो सकते हैं और कौन से ‘‘एम’’ इंडिया के लिए ‘‘उत्प्रेरक’’ हो सकते हैं। आईये! इसका थोड़ा विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलसूत्र, मुस्लिम, मुगल, मुगलिया, मुस्लिम लीग, मटन, मछली और मुजरा शब्दों का प्रयोग करके एक विशिष्ट वर्ग को लेकर कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति पर लगातार जोरदार हमला बोला है। अब इसका कितना फायदा ‘‘एनडीए’’ अथवा ‘‘इंडिया’’ को मिलेगा, यह तो 4 तारीख को ही पता चल पाएगा। परंतु निश्चित रूप से इन शब्दों के उपयोग से सांप्रदायिक धुव्रीकरण को बढ़ावा अवश्य मिला है, ऐसा प्रतीत होता है। साथ ही यह बात भी समझ से परे है कि भाजपा ने पिछले 5 सालों में जो महत्वपूर्ण कार्य किए, निर्णय लिए, संविधान संशोधन विधेयक पारित किये, उन सब उपलब्धियों के आधार पर नरेन्द्र मोदी ने प्रायः वोट क्यों नहीं मांगे? नोटबंदी, अग्निवीर योजना, धारा 370, ट्रिपल तलाक जैसी उपलब्धियों की चुनावी प्रचार में लगातार चर्चा न करना समझ से परे है। इसका एक दूसरा अर्थ यही निकलता है कि शायद ये मुद्दे जनता की नजर में उपलब्धियां नहीं है, बल्कि जनता शायद इनसे परेशान रही है। इसलिए इन मुद्दों का कहीं विपरीत प्रभाव चुनावी परिणाम पर न भुगतना पड़े, शायद इसलिए इन मुद्दों को ज्यादा उछाला न जाए की नीति भाजपा ने अपनाई।

जहां मोदी विपक्ष पर तंज कसने को लेकर प्रायः एम अक्षर को प्रमुखता देते रहे, वहीं विपक्ष ने तो लगभग सारे वर्णो (52) का उपयोग कर मोदी को अपशब्द बोलने में कोई परहेज नहीं किया, यहां तक कि कब्र खोदने की बात तक कह ड़ाली। 

अंत में एक ‘एम’ को चुनावी राजनीति का मुद्दा न बनाया जाना भी थोड़ा अचभिंत व आश्चर्यचकित करने वाला है। यह ‘एम’ मरकज निजामुद्दीन तबलीगी जमात के मौलवी मोहम्मद साद जो कोरोना के महासंकटकाल में 2 हजार लोगों का जलसा कर ऐसी गलती कर गये, जिससे कोरोना देश के विभिन्न जगहों पर इतना फैल गया कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तक को देश के इतिहास में तबलीगी जमात के कारण पीड़ित कोरोना मरीजों की संख्या को समय-समय पर जारी अपने स्वास्थ्य बुलेटिन में पृथक से देनी पड़ी थी। बीमारी के संबंध में इस तरह के वर्ग के आधार पर विभाजित आकड़े इसके पूर्व अभी देखने को नहीं मिले। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि मामले की गंभीरता का देखते हुए मोहम्मद साद के खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज की गई, जिसका बाद में आज तक कोई अता-पता नहीं जनता की तो छोड़िये; सरकारों की विभिन्न जांच एजेंसियों तक को नहीं मालूम है। देश के ‘तंत्र’, जन-तंत्र के भूलने का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कोई होगा। 50 साल पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ कर मुद्दे उठाए जा सकते हैं, परंतु यह  मुद्दा चुनावी किसी भी पक्ष के लिए नहीं है, यह भी एक दुखद पहलू है।

अरविंद को ‘‘न्याय’’! हेमंत को कब?

न्याय में देरी! न्याय से वंचित। प्रस्तुत प्रकरण पुनः एक उदाहरण।


अरविंद केजरीवाल व हेमंत सोरेन प्रकरण का तुलनात्मक अध्ययन! 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को जिन परिस्थितियों के अंतर्गत कार्यवाही के कारण उच्चतम न्यायालय ने अंतरिम जमानत दी हैं, उसकी विस्तृत चर्चा मैंने पिछले लेख में की हैं। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता हैं कि हेमंत सारेन को अंतरिम जमानत अभी तक नहीं मिली क्यों ? इसके लिए आवश्यक है कि अरविंद केजरीवाल के जमानत प्रकरण की झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जो केजरीवाल की गिरफ्तातारी के पूर्व की जाकर अभी भी जेल में बंद है, की जमानत मामले के साथ तुलनात्मक अध्ययन कर ले! स्पष्टतः उच्चतम न्यायालय के दो अलग-अलग रूख़ सामने आते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। हेमंत सोरेन ने प्रारंभ में ‘‘गुण दोष’’ के आधार पर जमानत आवेदन दिया था, जो जमानत आवेदन पहले निम्न न्यायालय द्वारा एवं बाद में उच्च न्यायालय द्वारा आदेश तब  पारित किया गया जब हेमंत सारेन ने उच्चतम न्यायालय में उच्च न्यायालय द्वारा लंबित आदेश की कार्यवाही के विरूध्द याचिका प्रस्तुत की। वस्तुतः हेमंत सोरेन ने उच्च न्यायालय के निर्णय आने पर विलम्ब होने के कारण उच्च न्यायालय के जमानत आवेदन पर लंबित निर्णय के आने तक केजरीवाल समान ही उच्चतम न्यायालय से अंतरिम जमानत मांगी थी, जो उच्चतम न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय का निर्णय आ जाने के कारण ‘‘अप्रासंगिक’’ बतलाते हुए अस्वीकार कर दी गई, जो तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल सही है। उल्लेखनीय है कि दोनों प्रकरणों केजरीवाल व सोरेन की सुनवाई भी वही एक ही (सेम) बेंच द्वारा की गई थी।

न्याय की प्रतिक्षा रत कब तक? हेमंत सोरेन।

याद कीजिए! हेमंत सोरेन ने शुरू में जब गिरफ्तारी के बाद जमानत याचिका को सीधे उच्चतम न्यायालय में दायर किया था, तो अगले दिन सुनवाई की तिथि निश्चित किये जाने के बावजूद बेंच ने सुनवाई करने से इंकार कर निचली अदालत उच्च न्यायालय में में जाने को कहा था। जबकि जमानतों के इसी तरह के अनेक मामलों की सीधी सुनवाई उच्चतम न्यायालय ने पूर्व में की है। केजरीवाल के अंतरिम जमानत के मामले को ही ले लीजिए, जहां उच्चतम न्यायालय ने अंतरिम जमानत के आवेदन को सीधे स्वीकार किया। इससे उच्चतम न्यायालय के रूख का अंतर स्पष्ट सा दिखता है। कहीं यह ‘‘चेहरा देखकर तिलक निकलना तो नहीं है’’? झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा हेमंत सोरेन को अपने चाचा की अंतिम संस्कार में भाग लेने की तो अनुमति नहीं मिली, लेकिन श्राद्ध में शामिल होने की अनुमति भी पुलिस कस्टडी में रहते हुए दी गई। जबकि हेट स्पीच देने या आदर्श चुनाव संहिता के उल्लंघन करने पर जमानत निरस्त करने जैसी शर्त केजरीवाल के जमानत आदेश में नहीं लगी। परिणाम स्वरूप ऐसी स्थिति के उत्पन्न होने पर उक्त शर्त के न होने से केजरीवाल के विरूद्ध मात्र कानून के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई ही की जा सकती है, अंतरिम जमानत निरस्त नहीं की जा सकती है। 

क्या मुख्यमंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री की स्थिति में अंतर का प्रभाव? जमानत पर।

एक अंतर अरविंद केजरीवाल का मुख्यमंत्री पद पर विराजमान रहना भी है, जबकि हेमंत सोरेन ने नैतिकता का साहस दिखाते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिलने से निश्चित रूप से हेमंत सोरेन के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि यदि वे भीं पद से इस्तीफा नहीं देते, तो शायद उन्हें भी अंतरिम जमानत केजरीवाल के समान मुख्यमंत्री होने के कारण मिल जाती? यह बात और पुख्ता तब होती है, जब महाराष्ट्र के प्रकरण में उद्धव ठाकरे की सरकार ने विधानसभा के तल (फ्लोर ऑफ हाउस) पर बहुमत का सामना किये बिना इस्तीफा दे दिया था। उच्चतम न्यायालय ने शिवसेना के विभाजन पर विचार करते समय मई 2023 को यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया था कि यदि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देते और विश्वासमत प्राप्त करते हुए हार जाते तो, न्यायालय उन्हें मुख्यमंत्री पद पर पुनरर्थापित कर सकता था। उच्चतम न्यायालय की इस ”भावना” को केजरीवाल ने स्वीकार कर गिरफतार हो कर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया।

अनुच्छेद 142 का उपयोग क्यों नहीं?

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने की परिस्थितिया और कारण देश के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में ली गई है। क्या  उक्त सिद्धांत राज्यों के विधानसभा चुनावों या पंचायत राज के अधीन होने वाले पंचायत चुनावों पर भी उस क्षेत्र की जनता के लिए ‘‘एक सरपंच’’ पर भी समान रूप से लागू होगा? इसका उत्तर न तो माननीय न्यायालय देना चाहेगा, और न ही मिलेगा। उच्चतम न्यायालय के अंतरिम जमानत देने के निर्णय पर एक बड़ा प्रश्न अरविंद केजरीवाल की मीडिया में उपस्थिति भी हो सकती है, उस प्रकार की मीडिया में उपस्थिति एक आदिवासी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेने की नहीं हो सकी। इस सवाल का उत्तर आज के नहीं; भविष्य के, इतिहासकार जरूर खोजेंगंे। क्या उच्चतम न्यायालय के पास अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त असाधारण विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए पर प्रकरण के गुण दोष के आधार पर सुनकर जमानत पर विचार कर आदेश पारित करने का अवसर नहीं था, जिससे इस तरह की उत्पन्न हुई एकदम नई परिस्थिती से बचा जा सकता था? और यदि मेरिटस (गुण-दोष के आधार) पर उच्चतम न्यायालय की नजर में केजरीवाल जमानत पाने के अधिकारी नहीं हो पाते, तो फिर वे किसी भी स्थिति में लोकतंत्र में भाग लेने के आधार पर अंतरिम जमानत पाने के अधिकारी नहीं हो पाते। 

अंतरिम जमानत के आधार पर ही क्या नियमित जमानत नहीं दी जा सकती थी? यह भी एक बड़ा कानूनी व तथ्यात्मक प्रश्न है। यह कहा जा सकता है कि केजरीवाल ने नियमित जमानत के लिए आवेदन ही नहीं दिया है, बल्कि गिरफ्तारी को कानूनी रूप से अवैध बताकर चुनौती दी है। फिर भी उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 142 का उपयोग ठीक उसी प्रकार कर सकता था, जिस प्रकार चड़ीगढ़ मेयर चुनाव के मामले में अपीलकर्ता हारे हुए उम्मीदवार ने मेयर का चुनाव अवैध घोषित कर पुर्न चुनाव की मांग की थी, जबकि उच्चतम न्यायालय ने उसे विजेता ही घोषित कर मेयर घोषित कर दिया, जिसकी मांग ही याचिका में नहीं थी। मुझे लगता है, माननीय उच्चतम न्यायालय को केजरीवाल के प्रकरण में हुई उक्त चूक पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

परन्तु यह एक गंभीर प्रश्न जरूर उत्पन्न होता है कि उच्चतम न्यायालय का उक्त सिद्धांत हेमंत सोरेन के लिए जरूरी क्यों नहीं माना जा रहा है? तब ये मुद्दे हेमंत सोरेन को उसी उच्चतम न्यायालय द्वारा अंतरिम जमानत देने में अभी तक क्यों सहायक नहीं हो पा रहे है? 

केजरीवाल को अंतरिम जमानत! ‘‘न्याय’’(?) के लिए ‘‘नैतिकता’’ ‘‘सुचिता’’ की बली चढ़ी?

*गांधीवादी सिद्धांत! ‘‘साध्य’’ के साथ ‘‘साधन’’ भी पवित्र होना चाहिए।                                                     क्या ‘‘न्याय प्रणाली’’में ये ‘‘अप्रासंगिक’’ हो गए हैं? 

 

क्या सिर्फ न्यायिक क्षेत्र में ही ‘‘नैतिकता अंर्तनिहित’’ है?   

क्या ‘‘नैतिकता’’ एवं‘‘ सुचिता’’ की बात सिर्फ राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में ही की जानी चाहिए? ‘‘न्याय’’ क्षेत्र में नहीं? यदि न्याय क्षेत्र में उक्त तत्व ‘‘अंतर्निहित’’ (इन-बिल्ट) है, तो यह बात तो अन्य क्षेत्रों पर भी लागू होती है। उच्चतम न्यायालय द्वारा व्यवहारिक रूप से अर्द्ध-राज्य (पूर्ण राज्य नहीं) ‘दिल्ली प्रदेश’ की तिहाड़ जेल में ‘‘धन शोधन निवारण अधिनियम’’ के अंतर्गत बंद, ऐतिहासिक बने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को वर्ष 2024 में हो रहे लोकसभा के ‘‘आम चुनाव के प्रचार’’ की शेष अवधि (10 मई से 01 जून तक) के लिये दी गई अंतरिम जमानत के मामले ने उक्त मुद्दे को एक नया आयाम व ‘‘तूल’’ दे दिया है। दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले उक्त अंतरिम आदेश की चीर-फाड़ किया जाकर गंभीरता से विस्तृत रूप से विचार किया जाना आवश्यक है। बावजूद इस तथ्य के कि उक्त अंतरिम आदेश को ईडी द्वारा भविष्य में न्याय दृष्टांत (नजीर) माने जाने की बात कहने पर उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि अंतरिम जमानत देना प्रत्येक मामले के ‘‘व्यक्तिगत तथ्यों’’ पर आधारित होता है। हालांकि नजीर तभी मानी/लागू की जाती है, जब ‘‘तथ्य समान हो’’। अतः ‘‘नजीर’’ के मामले में न्यायालय की यहां एक ‘‘चुप्पी’’ सी दिखती है, जो भविष्य में खतरनाक भी सिद्ध हो सकती है 

एक बिल्कुल ही‘‘अलहदा’’ मामला?   

स्वतंत्र भारत के ही नहीं, बल्कि  पूर्व के न्यायिक इतिहास में भी शायद यह एक मात्र ऐसा अलग मामला है, जहां उच्चतम न्यायालय ने बेहद चर्चित दिल्ली शराब कांड (आबकारी नीति धनशोधन घोटाला) के तथाकथित सूत्रधार दिल्ली के मुख्यमंत्री जो ‘‘पीएमएलए’’ के अंतर्गत 51 दिन जेल में बंद रहे, को ईडी के जबरदस्त विरोध के बावजूद अंततः अंतरिम जमानत उम्मीदवार न होने के बावजूद चुनावी प्रचार के लिए  दे दी, तथापि वे ‘आप’ के स्टार प्रचारक जरूर है। ‘‘विधिक क्षेत्रों’’ से जुड़े समस्त व्यक्तियों के लिए भी यह आदेश एक नितांत ‘‘नया’’ आश्चर्य मिश्रित अनुभव हो सकता है। कुछ के लिए, ‘‘सुखद’’,तो कुछ के लिए ‘‘दुखद’’; तो वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा आदेश तो होना ही था, यह भी एक ‘सुविचार’हो सकता है। 

अंतरिम जमानतआदेश। अर्थ/परिस्थितियाँ।  

अंतरिम जमानत देते समय उच्चतम न्यायालय के निम्न कथन पर विशेष रूप से गौर किये जाने की आवश्यकता है। ‘अंतरिम जमानत शब्द को आपराधिक प्रक्रिया संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन उसने अदालतों को बाध्यकारी परिस्थितियों में जेल में बंद व्यक्तियों को यह अस्थायी राहत देने से नहीं रोका है। अस्थायी रिहाई वाली‘‘अंतरिम’’ जमानत अनिवार्य परिस्थितियों और आधारों पर दी जा सकती है, तब भी जब नियमित जमानत उचित नहीं होगी। ‘‘ असहनीय दुःख और पीड़ा ’’ की स्थिति किसी जेल में बंद व्यक्ति की अस्थायी रिहाई को उचित ठहराने के कई कारणों में से एक हो सकती है, भले ही नियमित जमानत की आवश्यकता न हो’’। उच्चतम न्यायालय की उक्त ‘‘दुख और पीड़ा की भावना’’ की स्थिति मात्र मौत, बीमारी के मामले में ही हो सकती है, ‘‘चुनाव प्रचार’’ के लिए नहीं, जिस बात के लिए अंतरिम जमानत दी गई है। इस बात को माननीय न्यायालय शायद समझ नहीं पाये, यह भी ‘‘समझ से परे’’ है। 

जेल के अंदर रहने वाले ‘‘प्रथम मुख्यमंत्री’’।   

अरविंद केजरीवाल देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री बन गये है, जो पद पर रहते हुए जेल गये। ‘‘नैतिकता’’ का आवरण ओढ़कर ‘‘कट्टर ईमानदारी’’ की कसमें खाकर ‘‘अन्ना’ का ‘अन्न’’ खाकर, राजनीति में तेज तर्रार तरीके से तेजी से कदम बढ़ाते,‘‘नौकरशाह से राजनेता’’ बने, मात्र 11 वर्ष में ‘‘राष्ट्रीय पार्टी’’ बनी‘‘आप’’(आम आदमी पार्टी) केराष्ट्रीय संयोजक, अरविंद केजरीवाल ने अपने उन अन्य मुख्यमंत्री साथियों की तरह नैतिकता के उस उच्च स्तर को अपनाया नहीं, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए गिरफ्तारी होने के पूर्व ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री पद की गरिमा के क्षरण होने से बचाया था। चाहे फिर वे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता, बिहार के लालू प्रसाद यादव,कर्नाटक के बी एस येदियुरप्पा और अभी हाल मेें ही झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हेमंत सोरेन हो, जिन्होंने गिरफ्तारी के पूर्व ईडी टीम के साथ राज्यपाल भवन जाकर अपना इस्तीफा सौंपने के बाद गिरफ्तारी दी। आश्चर्य, दुखद व हास्य की बात तो यह है कि मात्र आरोप लग जाने के आधार पर 250 से अधिक ‘‘दागी सांसदों’’ से अन्ना आंदोलन के दौरान इस्तीफे की मांग करने वाले स्वयं इस्तीफा देना तो दूर, अंतरिम जमानत की मांग चुनाव प्रचार के लिए कर रहे हैं।                    

मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने का फायदा? अंतरिम जमानत।            

मुझे लगता है अरविंद केजरीवाल ने शिवसेना के दो फाड़ होने के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की मई 2023 में की गई उक्त टिप्पणियों/अवलोकन (ऑब्जरवेशनस्) को निश्चित रूप से ध्यान में रखा होगा। जब माननीय न्यायालय ने यह कहा था कि यदि उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देते और विश्वास मत प्राप्त करते हुए हार जाते तो न्यायालय उन्हें मुख्यमंत्री पद पर पुर्नस्थापित कर सकता था। शायद इसीलिए केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया, जिसका फायदा शायद उन्हें अंतरिम जमानत के रूप में मिला भी। इसीलिए शायद हेमंत सोरेन को जमानत नहीं मिल पायी।    

जेल में बंद आरोपी/अपराधी का चुनाव लड़ना संवैधानिक अधिकार; तो चुनाव प्रचार क्यों नहीं?    

ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए की जेल में बंद व्यक्ति जब चुनाव लड़ता है, जो उसका संवैधानिक अधिकार है, को मान्य किये जाने पर उसी चुनाव के प्रचार के लिए अनुमति न मिलना क्या यह उसका संवैधानिक या वैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है? विपरीत इसके वह व्यक्ति जो चुनावी मैदान में उतरा ही नहीं है, को चुनाव में प्रचार करने के लिए अंतरिम जमानत देना भले ही वैधानिक हो परंतु ‘‘न्यायोचित’’ कैसे हो सकता है? उच्चतम न्यायालय को गहन विचार कर इस मुद्दे को अंतिम रूप से निर्णीत अवश्य कर देना चाहिए। वैसे उच्चतम न्यायालय का यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता के अधिकार के विपरीत एक आपराधिक अपराधी एवं एक राज नेता आर्थिक अपराधी के बीच ‘‘असामान्य मतभेद अंतर’’ करता है, जो गलत है। शायद इसी कारण पंजाब के खंदूर साहब लोकसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए, अवैध हथियार रखने के आरोप में जेल में बंद ‘‘वारिस पंजाब दे’’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने भी अंतरिम जमानत मांगी है। प्रसंग वश आपके ध्यान में यह बात लाना आवश्यक है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 62(5) के अंतर्गत जेल में बंद व्यक्ति को वोट ड़ालने का अधिकार नहीं हैं, जबकि वह चुनाव लड़ सकता है। क्या उच्चतम न्यायालय को इस ‘‘खामी, कमी’’ की ओर केन्द्र शासन का ध्यान आकर्षित नहीं करना चाहिए? वैसे स्वयं उच्चतम न्यायालय ने ‘‘टाडा’’ में बंद रहे सांसद कल्पनाथ राय को संसद की कार्रवाई में भाग लेने के लिए अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया था। राज्यसभा के चुनाव के बहुमत परीक्षण के मामलों में भी उच्चतम न्यायालय ने सांसद, विधायक को संसद या विधानसभा में आने की अनुमति कम ही दी है। 

प्रथम दृष्टया मामला होने के बावजूद अंतरिम जमानत गलत? आधार गलत?  

माननीय उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय भविष्य की चिंताओं को लेकर चिंतित अवश्य करता है। माननीय न्यायालय का यह कहना कि चुनाव के दौरान सभी पार्टियों को अपना एजेंडा जनता के सामने रखने का अधिकार है। क्या पार्टी का एजेंडा सिर्फ उसका राष्ट्रीय संयोजक ही रख सकता है, अन्य पदाधिकारी नहीं? 40 स्टार प्रचारकों की फिर भूमिका क्या है? क्या यह ‘‘सिद्धांत’’ सैद्धांतिक रूप से सभी राजनीतिक आरोप जिनके विरुद्ध ‘‘आपराधिक अपराध’’ के प्रकरण दर्ज है, जो चुनावी समर में है, पर लागू होते हैं, होंगे? उच्चतम न्यायालय का जमानत देते समय कहा गया निम्न कथन महत्वपूर्ण है ‘‘अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय दलों में से एक के नेता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। लेकिन उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है। इसका कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है। वह समाज के लिए खतरा भी नहीं है। इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए’’। क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त उल्लेख अपने आदेश को ‘बल’ देने के लिए तो नहीं किया गया है? अथवा उच्चतम न्यायालय ने उक्त कथन कहकर दोनों पक्षों को निरुत्तर/संतुष्ट करने का प्रयास किया है। 

केजरीवाल के लिए नरम रुख तो नहीं?  

 न्यायालय का यह कथन कि ‘‘आपराधिक इतिहास न होना’’ ईडी के लिये जवाब और ‘‘बहुत गंभीर आरोप होना’’ केजरीवाल के लिए जवाब है। यद्यपि यह कथन भी गलत है कि केजरीवाल का आपराधिक इतिहास नहीं है। उनके विरूद्ध मार्च 22 तक लगभग 30 प्रकरण विभिन्न 19 धाराओं में दर्ज हैं। केजरीवाल को आदतन अपराधी नहीं माना है, चुने हुए मुख्यमंत्री है, और राष्ट्रीय राजनीतिक दल के नेता (संयोजक) भी है, न्यायालय ने यह भी कहा है। परन्तु माननीय न्यायालय इस बात को भूल रहा है कि अधीनस्थ अदालतों द्वारा केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका को अस्वीकार कर देने पर प्रथम प्रथम दृष्टिया केजरीवाल के विरुद्ध मामला स्थापित होता है, जैसा कि पीएमएलए अधिनियम में भी यही प्रथम दृष्टया अनुमान का प्रावधान एक आरोपी के विरुद्ध होता है, उसे निर्दोष नहीं माना जाता है, जैसा कि भा.द.स. के अंतर्गत विपरीत अनुमान (प्रिज्यूमशन) का प्रावधान है।   

अंत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का सांसद धनंजय सिंह को जमानत देने के बावजूद सजा पर रोक लगाने से इनकार (जिसका प्रभाव यह हुआ कि वे चुनाव नहीं लड़ पाए) करते हुए यह कहना कि राजनीति में ‘‘सुचिता समय की मांग है’’, उच्चतम न्यायालय के लिए, आंख खोलने के लिए काफी है।

गुरुवार, 9 मई 2024

‘‘निर्भया कांड’’ से उत्पन्न ‘‘भय’’, खौफ व मानवीय संवेदनाएं ‘‘तार-तार’’?


निर्भया कांड

याद कीजिए! दिल्ली के एक बस ड्रायवर एवं 5 अन्य अपराधियों के द्वारा दिसम्बर 2012 में एक छात्रा के साथ चलती बस में हैवानियत की समस्त हदें पार कर अमानवीय व वीभत्स तरीके से दुष्कर्म हुआ था। फलस्वरूप पीड़िता की अंततः कुछ समय बाद सम्पूर्ण यथासंभव बेहतरीन इलाज के बावजूद मृत्यु हो गई। पूरे देश में भयंकर आक्रोश व एक सिहरन की लहर सी उठ गई थी। प्रतिक्रिया स्वरूप सोता हुआ एक आम नागरिक ने भी जागृत होकर रोड़ पर आकर विभिन्न तरीेकों से प्रतिक्रियाएं कर एक इंसान होने व इंसानियत तथा मानवीयता का एक परिचय दिया था। परिणाम स्वरूप ही यौन अपराध में दुष्कर्म सहित भारतीय दंड संहिता सहित की कई धाराओं में कई महत्वपूर्ण संशोधन हुए और एक नया अधिनियम ‘पाक्सो’ भी अस्तित्व में आया।

कर्नाटक रेवन्ना सेक्स कांड

विपरीत इसके कर्नाटक में सामने आयी तथाकथित ‘‘अय्याश राज-नेता’’ की सेक्स वीडियों की तुलना कर लीजिए। (अभी तक वीडियो की सत्यता की पुष्टि रासायनिक जांच (फॉरेसिक परीक्षण) से नहीं हुई है।) हासन सीट के वर्तमान सांसद व जेडीएस लोकसभा उम्मीदवार प्रज्वल रेवन्ना पूर्व प्रधानमंत्री एचडी (हरदन हल्ली डोडेगौड़ा) पूर्व मंत्री विधायक एचडी रेवन्ना के पुत्र हैं देवगौड़ा के पोते, तथा पूर्व मुख्यमंत्री कुमार स्वामी के भतीजे इसके विरूद्ध 266 महिलाओं के साथ यौन शोषण की 2976 सेक्स वीडियों क्लिक की पेन डाईव पूरे देश में सोशल मीडिया के माध्यम से हासन लोकसभा क्षेत्र में फैल गई घर-घर व दुकान सीडी फेकी गई। ‘‘निर्भया कांड’’ और इस ‘‘सेक्स कांड’’ में जो मूलभूत व भारी अंतर है, वह है, निर्भया कांड में 6 अपराधियों ने मात्र एक बेटी के साथ गैंगरेप किया था। परन्तु यहां पर तो एक आरोपी ही 266 महिलाएं, जिनमें बच्चियों से लेकर 60 साल तक की महिलाएं शामिल है, के साथ लम्बे समय से लगातार यौन शोषण करता है। इन पीड़िताओं में घर में काम करने वाली नौकरानियाँ (मैड) से लेकर सरकारी अधिकारी, नौकरीपेशा और पार्टी की महिला कार्यकर्ता भी शामिल हैं। ऐसा यौन अपराधी आश्चर्यजनक रूप से मानसिक रूप स्वस्थ है, उसे मानसिक रूप से विक्षिप्त या पागल करार नहीं दिया गया, सहसा विश्वास नहीं होता है। ऐसा भी व्यक्ति समाज में हो सकता है, यह कल्पनातीत है। यौन अपराधी होने के साथ-साथ रेवन्ना के ‘‘भ्रष्ट आचरण’’ के आधार पर उच्च न्यायालय ने उनकी 2019 की लोकसभा चुनाव को भी अवैध घोषित कर दिया। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उक्त आदेश को स्थगित कर दिया है।

पारिवारिक राजनीतिक धरोहर ‘‘चकनाचूर’’।

कुछ व्यक्तियों का दिल तो इस कांड से अवश्य दहल गया होगा। परन्तु देश के दिल की धड़कन कश्मीर से कन्याकुमारी तक वैसे नहीं दहली, जैसी निर्भया कांड में दहली थी। इसका क्या यह अर्थ यह नहीं निकाला जाए कि निर्भया कांड के अपराधीगण समाज के छोटे से वर्ग ड्राइवर, क्लीनर, फल विक्रेता, जिम ट्रेनर थे, इसलिए पूरे देश का गुस्सा अदने से निम्न वर्ग से आने वाले इन अपराधियों पर आ पड़ा। इसके विपरीत यहां पर अपराधी सफेदपोश एक शक्तिशाली राज नेता है, जिसे जनता ने कई बार चुना है, जिसके पिता को सांसद चुना व उसके दादा को प्रधानमंत्री पद पर बैठाया, परिवार के अन्य सदस्य (लगभग 8 सदस्य) भी सांसद, विधायक, मंत्री चुने गये। इसलिए ऐसी राजनीतिक धरोहर वाले परिवार के घृणास्पद आरोपी सदस्य के विरूद्ध आम जनता की प्रतिक्रिया क्या खौफ-ड़र-दहशत के कारण निर्भया कांड के समान वैसी तीव्र व व्यापक नहीं हुई? अथवा आम व्यक्ति की जिंदगी में राजनीति इतनी घुल मिल गई है कि उससे जुड़ी हैवानियत की सीमा तक की बुराई दहशतगर्दी भी जनता को या तो दिखती नहीं है अथवा व उसे अनदेखा कर देती है? जैसा कि बृजभूषण शरण सिंह के मामले में भी देखने को मिला है। क्या जनता ऐसी घटनाओं को भी सिर्फ ‘‘राजनीतिक चश्मे’’ से ही देखना चाहती है? बडा प्रश्न यह है? तथाकथित भद्द् समाज के चेहरे पर यह एक बड़ा तमाचा है।

मीडिया की भूमिका का ‘‘भूमिगत’’ हो जाना।

एक भी तथाकथित राष्ट्रीय (मेन स्ट्रीम) टीवी चैनल ने इस कांड पर बहस तक नहीं की प्रश्नों की बौछार तो छोडिये; एक प्रश्न भी नहीं पूछा। याद कीजिए! निर्भया कांड से लेकर अनेको यौन अपराध देश के विभिन्न अंचलों में जब-जब घटित हुए, जिनमें राजनीतिक जमात के लोग शामिल नहीं होते है, तो टीवी चैनल बहस करते-कराते थक जाते हैं और अपनी ‘‘टीआरपी’’ को बढ़ाते हैं। शायद मीडिया को  इस घटना को लेकर यह विश्वास हो गया होगा कि इस घटना पर चर्चा से टीआरपी तो बढ़ेगी नहीं? तो फिर बहस का फायदा क्या? क्या जनता से लेकर मीडिया किंग कर्तव्यविमुख हो गया? ऐसी शर्मनाक घटना पर अपना दायित्व पूरा करने में मीडिया पूरी तरह से असफल हो गया है। यह एक बडी चिंता का विषय है, और इस पर पूरी गहराई से विचार किया जाना आवश्यक है। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।  

विक्षिप्त मानसिकता?

यह सेक्स कांड देश का ही नहीं, बल्कि विश्व का शायद सबसे बड़ा घृणित सेक्स कांड होकर गिनीज बूकस् ऑफ रिकार्ड में दर्ज होने लायक होगा। उक्त कांड के आरोपी की उम्र मात्र 33 साल है, जिसने अपने से छोटी व बड़ी महिलाओं के साथ बलपूर्वक, प्रलोभन या ड़र, भय व दहशत के वातावरण में शारीरिक संबंध बनाये। आश्चर्य व चिंता की बात यह नहीं है कि यह घटना लगभग 4-5 साल पुरानी बताई जा रही है, जैसा कि आरोपी के विधायक पिता ने खुद सार्वजनिक रूप से कहा। बल्कि इतनी बड़ी संख्याओं में महिलाओं जिनमें महिला पुलिस अधिकारी एवं प्रशासनिक अफसर भी शामिल है के साथ लम्बे समय से चले आ रहे ‘‘दुराचार’’ के बावजूद किसी भी महिला द्वारा लम्बा समय गुजारने के बावजूद कोई रिपोर्ट न लिखाना, घटना की वीभत्सा व आस-पास विद्यमान भयंकर परिस्थितियों को ही इंगित करती है। याद कीजिये! यह वही कर्नाटक प्रदेश है, जहां की विधानसभा में फरवरी 2012 में 3 भाजपा विधायक पॉर्न विडियो देखते हुए पकड़े गये थे, जिन्हें न केवल 2012 के विधानसभा चुनाव में टिकिट दिया गया, बल्कि इन तीनों में से एक लक्ष्मण सावदी को तो चुनाव हारने के बावजूद उप मुख्यमंत्री भी बना दिया गया। तीन साल बाद त्रिपुरा विधानसभा में पुन एक भाजपा विधायक जादव लाल नाथ भी अश्लील विडियो देखते हुए पकड़े गये थे। 2021 में गुजरात विधानसभा में भी भाजपा के दो विधायक पॉर्न विडियो के शिकार हुए ह। इस कुंठित मानसिकता को सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित करना बेहद अनुचित होगा। कांग्रेस के कर्नाटक विधान परिषद के प्रकाश राठौर भी रंगे हाथ पकड़े जा चुके हैं। 

कर्नाटक सरकार की पूर्ण अर्कमणयता।

इस कांड का विलक्षण पहलू यह भी है कि इस सेक्स कांड के आरोपी स्वयं द्वारा जबरदस्ती स्थापित यौन संबंधों का खुद ही वीडियो बनाकर अपनी पेन डाईव में स्टोर करता है। याने यौन अपराध घटित करने के साथ-साथ दूसरे अन्य अपराध ब्लेकमेल करने में भी उसे ड़र नहीं लगा। चुनाव में वोट डालने के पश्चात वह आरोपी भारत छोड़कर जर्मनी चला जाता है। एसआईटी गठित होने के बाद आरोपी के ड्राइवर कार्तिक के भी मलेशिया पहुंचने के समाचार है। राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरी बैठी रहती है। राज्य सरकार का इस संबंध में कार्रवाई न करने के संबंध में बचाव पूरी तरह से ‘‘झूठ का पुलिंदा’’ है व अकर्मणयता के साथ सुविधा की राजनीति का जीता जागता उदाहरण है। लुक आउट नोटिस जो राज्य सरकार की जांच एजेंसियां जारी करती है, के जारी किये बिना आरोपी को किसी भी एयरपोर्ट पर रोकना संभव नहीं था। राज्य सरकार द्वारा आरोपी के भारत छोड़ने तक लुक आउट नोटिस जारी न करने के बावजूद केन्द्र सरकार आरोपी को रोकने में असफल रहने का आरोप लगातार निहायत राजनीति है। सरकार का यह कहना कि आरोपी बेंगलुरु न्यायालय से 1 जून 2023 को उक्त तथाकथित वीडियो को  वायरल न करने के गैग (चुप रहने का) ब्लैंकेट आदेश ले लिये थे, इसलिए सरकार चुनावी प्रक्रिया चालू रहने के कारण मामले में हस्तक्षेप नहीं कर पाई। जैसे ही 28 अप्रैल को एक महिला आरोपी की घरेलू सहायिका (मैड) ने हासन में 26 अप्रैल को चुनाव समाप्त होने के बाद विधायक एच.डी. व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के विरूद्ध रिपोर्ट लिखाई जबकि वीडियो चुनाव के एक दिन पूर्व से ही वायरल हो रहा था। सरकार ने 27 अप्रैल को कार्रवाई के लिए एक एसआईटी गठित कर दी। आश्चर्यजनक रूप से पहले धारा 376 का अपराध दर्ज नहीं किया गया जो, बाद में जोड़ी गई। प्रारंभिक रूप से मात्र 354ए, 354डी 506 एवं 509 की धाराओं के अंतर्गत प्रकरण दर्ज किया गया। 

न्यायालय का स्टे ब्लैंकेट आदेश! कितना न्यायोचित?

न्यायालय का इस तरह का ब्लैंकेट स्टे आदेश भी अपने आप में ही संदेह के घेरे में तो ही है, परन्तु वह ब्लैंकेट आदेश 86 मीडिया आउटलेट्स एवं तीन व्यक्तियों जिसमें रेवन्ना का ड्राइवर भी शामिल है के विरुद्ध था। सरकार जिसमें पार्टी नहीं थी। न ही राज्य शासन के विरूद्ध कोई स्टे आदेश कार्रवाई न करने का पारित किया गया था। वैसे भी कोई भी अपराध घटित होने पर देश का कोई भी न्यायालय ऐसा ब्लैंकेट आदेश पारित नहीं कर सकता है, जो सरकार को कोई अपराध घटित होने पर आपराधिक कार्रवाई करने से रोक दे। यदि सरकार के विरूद्ध स्टे आर्डर था भी, तब फिर सरकार ने उक्त आदेश के विरूद्ध अपील क्यों नहीं की? प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है। विपक्ष पर आरोप लगाने वाली कांग्रेस यह क्यों भूल जाती है कि इसी जेडीएस के साथ वह वर्ष 2019 में चौदह महीने सरकार में रह चुकी है, जब ये अपराध लगातार घटित हो रहे थे। स्वयं पीड़िता ने प्रज्वल रेवन्ना पर 2019 से 2022 तक यौन शोषण का आरोप लगाया है। कर्नाटक महिला आयोग एवं राष्ट्रीय महिला आयोग कहां खड़ा है, पता नहीं? कर्नाटक महिला आयोग भी हरकत में तब आयी जब उसे पेन ड्राइव मिला, तब उसने राज्य सरकार को एसआईटी गठित करने के लिए पत्र लिखा। क्या आपको नहीं लगता है कि ऐसे महिला आयोगों को तुरंत समाप्त कर खर्चा बचाना चाहिए? अथवा आयोग में राजनैतिक नियुक्तियां प्रतिबंधित कर देनी चाहिए?  

प्रधानमंत्री द्वारा खेद व्यक्त किया जाना चाहिए था

इस कांड का दूसरा महत्वपूर्ण व चिंताजनक पहलू यह है कि एक सफेदपोश आरोपी के लिए प्रधानमंत्री ने जनता से सार्वजनिक रूप से मंच से वोट देने की अपील करते हुए यह कहा था कि रेवन्ना को दिया गया मत अंततः मोदी के हाथ को मजबूत करेगा। बड़ा प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से इस घटना की जानकारी थी कि नहीं? व्यक्तिगत जानकारी के संबंध में प्रधानमंत्री का कोई कथन अभी तक सामने नहीं आया है। अतः यह माना ही जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से तथाकथित उक्त कांड की जानकारी नहीं थी। घटना की जानकारी सार्वजनिक होने पर निश्चित रूप से प्रधानमंत्री को सामने आकर सार्वजनिक रूप से यह बयान जनता के सामने देना चाहिए कि मैंने प्रज्वल रेवन्ना के समर्थन में सार्वजनिक सभा में मत देने की जो अपील की थी, तब मुझे उसके तथाकथित यौन अपराध की जानकारी नहीं थी, जो मुझे अभी मिली है, अतः मैं घटना की घोर भर्त्सना करता हूं। उक्त आरोपी को भारत सरकार जर्मनी से वापिस लाने के लिए त्वरित कार्रवाई करेगी, ताकि उसके विरूद्ध कठोर से कठोर कार्रवाई कर सजा दिलायेगें। अनजाने में हुए इस गलती के लिए हासन क्षेत्र की जनता से माफी मांगता हूं, कि ऐसे व्यक्ति के लिए वोट मांगा। परंतु ऐसा कथन प्रधानमंत्री की ओर से अभी तक नहीं आया है।

कर्नाटक प्रदेश भाजपा को जानकारी दी गई थी।

इस घटना की जानकारी कर्नाटक के समस्त राजनीतिक दलों भाजपा से लेकर कांग्रेस तक को होने के बावजूद किसी के भी द्वारा कार्रवाई के लिए आगे न आना, वास्तव में यह 21वीं सदी की आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ इंसान की किस मानसिकता को प्रदर्शित करता है? यह सभ्य समाज की कल्पना से बहुत दूर है। तथापि रेवन्ना के विरुद्ध लोकसभा चुनाव लड़ने वाले कर्नाटक के भाजपा के नेता एडवोकेट देवराज गौडा ने लिखित पत्र द्वारा लगभग 6 महीने पूर्व 8 दिसंबर 23 को  भाजपा के पदाधिकारियों, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव संगठन, बीएल संतोष को सेक्स कांड की पेन ड्राइव के बाबत सूचित किया था। जनवरी 2024 में एक पत्रकार वार्ता में देवराज ने इन वीडियो का उल्लेख किया था। बावजूद इसके प्रधानमंत्री को उनके चुनावी दौरे के समय भी यह सूचना नहीं दी गई तथा प्रधानमंत्री की सुरक्षा एजेंसी व जांच एजेंसी भी इस संबंध में जानकारी प्राप्त कर प्रधानमंत्री को देने में असफल रही। इस देश की राजनीति में सिर्फ और सिर्फ राज-सत्ता के अलावा कुछ शेष रह गया है क्या? आम नागरिक इस बाबत क्यों नहीं सोचते हैं कि जिस राजनीति के सहारे महात्मा गंाधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. भीमराव अम्बेड़कर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, पंडित श्यामप्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे धुरंधर नेता इस देश में हुए, क्या वे अब मात्र अवशेष रह जायेगे? आम जनता की स्थिति क्या होगी, इसकी कल्पना आज के सामान्य नागरिक के दिमाग की सोच के बाहर की बात है।

रविवार, 5 मई 2024

‘‘विश्वासघात, अनैतिकता व अदूरर्दिशता’’ का अनूठा परिणाम जनक संगम! सूरत-इंदौर चुनाव।

 कम मतदान! बुद्धिमत्तापूर्ण, ‘‘चतुर’’ कदम!


कांग्रेस! मैच फिक्सिंग का आरोप। पुनः सेल्फ गोल!

सूरत-इंदौर चुनाव को लेकर आत्मघाती गोल की विशेषज्ञता कांग्रेस का बीजेपी पर ‘‘मैच फिक्सिंग’’ का आरोप तो बहुत ही बेहूदा, हास्यास्पद एवं पुनः ‘‘सेल्फ गोल’’ है। ‘‘मैच फिक्सिंग’’ का मतलब भाजपा व कांग्रेस सहित समस्त अन्य दलीय व निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच एक छिपी हुई सहमति का होना है। इसका शाब्दिक अर्थ मैच की उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें मैच के नियमों का उल्लंघन करते हुए परिणाम पहले से ही निश्चित हो जाते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने ‘‘एक्स’’ पर लिखा यह ‘लोकतंत्र पर खतरा हैं’, और इसे ‘‘मैच फिक्सिंग’’ करार दिया। इसका मतलब तो यही हैं कि यदि यह फिक्सिंग सिर्फ भाजपा व चुनाव आयोग के बीच हुई है, तो निर्विरोध चुनाव दूसरे उम्मीदवारों की उपस्थिति के कारण हो नहीं सकता था। अतः इस आरोप का दूसरा तार्किक अर्थ यही निकलता है कि इस मैच फिक्सिंग में नामांकन भरने वाली अन्य समस्त छोटी पार्टियां, निर्दलीय व कांग्रेस भी भाजपा के साथ शामिल हैं। यह तो सेल्फ गोल है। 

अदूरदर्शी नेतृत्व! बदहवास कांग्रेस। 

इन मामलों को लेकर कांग्रेस नेतृत्व अपने कमजोरी को छुपाने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर के भारतीय संविधान का हवाला देते समय यह भूल जाती है कि डॉ. अंबेडकर ने संविधान में यह प्रावधान नहीं किया था कि सत्ता पक्ष, विपक्ष के सही उम्मीदवारों का चयन कर सही तरीके से फार्म भरवाए और चुनाव कराये, ताकि विश्व में भारतीय लोकतंत्र के ‘‘दिये’’ की ‘‘लौ’’ जलती हुए दिखती रहे। दोनों जगह स्थानापन्न (डमी, वैकल्पिक) उम्मीदवारों का भी नामांकन खारिज हो जाना, कांग्रेस नेतृत्व की तथाकथित रणनीति, गंभीरता व अदूरदर्शिता को ही दिखाता है? कांग्रेस की लगातार हो रही बदहवासी के मात्र उक्त मामले ही नहीं हैं, बल्कि पूर्व में वर्ष 2009 में राजकुमार पटेल (पूर्व सांसद प्रत्याशी) जिन्होंने विदिशा लोकसभा क्षेत्र में चुनाव चिन्ह आवटन का पत्र बी ‘फार्म’ प्रस्तुत नहीं किया था और दूसरे भागीरथ प्रसाद (सेवा निवृत्त आएएस) जिन्हें वर्ष 2014 में कांग्रेस ने भिंड से अपना उम्मीदवार घोषित किया था, परन्तु उन्होंने कुछ सज्जनता बरतते हुए विश्वासघात न करते हुए टिकट वापिस कर भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़कर जीते। ऐसी स्थिति से शायद ही देश की किसी अन्य छोटी अथवा बड़ी राजनैतिक पार्टी को गुजरना पड़ा हो। 

चुनावी राजनीति की ‘‘नई प्रणाली का ईजाद’’! 

लोकसभा के इसी आम चुनाव में मध्यप्रदेश के खजुराहो संसदीय क्षेत्र से इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार मीरा यादव का नामांकन एक जगह ‘‘हस्ताक्षर न होने’’ के कारण निरस्त कर दिया गया, वहां भी षड्यंत्र की ‘‘बू’’ की अपुष्ट खबरें हैं। अभी तीसरे दौर के चुनाव में इंदौर से कांग्रेस उम्मीदवार अक्षय कांति बम से भी नामांकन वापिस करवा कर सूरत का इतिहास दोहराने का आंशिक प्रयास अवश्य हुआ। मतलब कांग्रेस के उम्मीदवार ने फार्म तो वापस ले लिया। परंतु अन्य समस्त उम्मीदवारों के फॉर्म वापस न लेने अथवा न हो पाने के कारण इंदौर ‘सूरत’ (निर्विरोध चुनाव की स्थिति) नहीं बन पाया। अभी तो सूरत बनने व बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है? पश्चिम बंगाल की तेज तर्रार नेत्री मुख्यमंत्री ममता का बंगाल में ‘खेला’ होगा कि नहीं, यह देखना तो अभी शेष है, परन्तु उसी बंगाल के प्रभारी रहे व ममता बनर्जी को सफलता पूर्वक चुनौती (पहली बार लोकसभा की 18 सीटे भाजपा ने जीती थी) देने वाले कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय ने अपने घर मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में बड़ा ‘‘खेला’’ कर चौका दिया। कांग्रेस के अक्षय कांति बम कांग्रेस के लिए फुस्सी बम होकर न केवल भाजपा के लिए ‘बम’ फोड़ा है, बल्कि मोदी की स्वच्छता अभियान के पिछले 7 साल से प्रथम रहने वाला इंदौर व 2023 में इंदौर के साथ संयुक्त रूप से सूरत शहर ने प्रथम रहकर राजनीति में भी वही ‘‘स्वच्छता’’ को बनाए रखने के लिए एक बम फोड़ कर इंदौर व सूरत के कांग्रेस के कचरे को हटाकर ‘‘कचरा से ऊर्जा बनाने’’ वाली अपनी मशीन में डालकर नई ऊर्जा बनाकर/पाकर मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की सोच में भी महत्वपूर्ण योगदान किया है।

जन प्रतिनिधियों को ‘‘बंधक’’ किये जाने की राजनीति को बढ़ावा?

सूरत के बाद इंदौर की घटना ने ‘‘कांग्रेस की सूरत को बदसूरत कर कालिक अवश्य पोत दी’’ है। परंतु अरुणाचल से प्रारंभ होकर खजुराहो, सूरत व इंदौर तक की लगभग एक ही तरह की नई चुनावी पद्धति की घटनाओं की श्रृंखला ने भविष्य की नई तरह की चुनावी राजनीति का संकेत अवश्य दे दिया है। इस नई नीति में पूर्व में चुने गये जन प्रतिनिधियों के साथ आज चुने जाने वाले उम्मीदवार को बंधक बनाने की नीति को बढ़ावा देने के साथ इसे होटल और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की नई नीति भी कह सकते हैं। वह इसलिए की अब राजनीतिक पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के साथ-साथ प्रस्तावकों को भी नामांकन वापसी की तारीख तक ‘‘होटल’’ में रखना या फिर बाहर घूमने फिरने भेजना होगा। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अभी तक की राजनीति में, राजनीतिक दलों के टूटने पर या विधानसभा में बहुमत के प्रश्न पर जब बहुमत के आंकड़े ‘‘छीण’’ होते हैं, विधायकों को होटल में रखना या सैर सपाटे के लिए बाहर घूमने भेज देने की राजनीति पिछले कुछ समय से धड़ल्ले से सफलतापूर्वक चल रही है। देश में कुल 4126 विधानसभा क्षेत्र व 781 सांसद है। निर्दलीय उम्मीदवार को 10 प्रस्तावक लगते है। अब आप गणना कर लीजिए इनका खडे होने वाले उम्मीदवारों व उनके प्रस्तावकों की संख्या मिलाकर उनका कुल खर्चा। इस ‘‘नई नवेली नीति’’ का नई नवेली शादी के जोड़े का स्वागत करने के समान की बजाय, इस नीति के लोकतंत्र पर पड़ने वाले परिणाम पर गंभीरतापूर्वक विचार व आकलन करना आवश्यक हो गया है। 

हो रहे कम मतदान से ‘‘लाभ-हानि’’ के आकलन से इतर ‘‘आकलन’’!

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा संसदीय चुनावी महाकुंभ के अभी दोनों फेसों के मतदान पूर्ण हो चुके हैं, जहां कुल 190 (लगभग एक तिहाई) लोकसभा क्षेत्र का भाग्य सील बंद हो गया है। इन दोनों फेस में मतदान पिछले वर्ष 2019 की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत कम हुआ है। तथापि अभी-अभी चुनाव आयोग द्वारा जारी नवीनतम अधिकृत आंकड़ों के अनुसार यह अंतर कम होकर लगभग 3 प्रतिशत हो गया है। समस्त विश्लेषक इसका आकलन अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं कि इसका परिणाम/दुष्परिणाम किस गठबंधन के पक्ष में होगा? परन्तु इसे मैं एक बिल्कुल अलग नजरिए से देखता हूं। आखिर ‘‘कम मतदान’’ का कारण क्या है? जब आप इस ‘‘कम मतदान’’ को ‘‘नोटा’’ के साथ मिलाकर देखेंगे तो आपके सामने एक नई पिक्चर ही सामने आयेगी। नोटा का उपयोग वे ही लोग करते हैं, जो वर्तमान राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों से परेशान हैं और संतुष्ट नहीं है। अतः वे खीझकर एक ‘‘काल्पनिक’’ उम्मीदवार नोटा जो उनकी ‘‘कल्पना’’ के शायद ज्यादा अनुकूल है, को वोट दे देते है, उस ‘‘नोटा’’ को जो कभी भी शासनारूढ (‘शासन’) नहीं हो सकता है। उच्चतम न्यायालय ने नोटा का अधिकार देते समय लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 79 (घ) का उल्लेख करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया कि जिस प्रकार नागरिकों को ‘‘मत देने’’ का अधिकार है, उसी प्रकार उन्हें किसी भी उम्मीदवार को ‘‘मत न देने’’ का भी अधिकार प्राप्त है। मतलब इस अधिकार की पूर्ति ‘‘नोटा’’ द्वारा अथवा मतदान केन्द न जाकर भी की जा सकती है। मतदान केन्द्र में मत देने न जाने वाले मतदाता का कारण व रूख लगभग वही होता है, जो मतदान केन्द्र में जाकर ‘‘नोटा’’ का बटन दबाते है। अवश्य कुछ लोग अन्य कारणों से शादी-ब्याह, बीमारी या बाहर रहने के कारण वोट ड़ालने जाने से महरूम हो जाते हैं। इसलिए यदि वोटिंग व मत प्रतिशत बढ़ाना है, तो निश्चित रूप से नोटा को हटाना पड़ेगा। अथवा पुर्नगठन कर नोटा को प्रभावी व दंतयुक्त बनाना पड़ेगा, कैसे? जिसका उल्लेख मैंने पिछले लेख में किया है।

शुक्रवार, 3 मई 2024

‘‘नोटा विकल्प के रहते ‘‘निर्विरोध’’ निर्वाचन कितना औचित्यपूर्ण?

 

भूमिका

सूरत लोकसभा के हुए निर्विरोध निर्वाचन के मामले को लेकर जब कांग्रेस द्वारा भारतीय संविधान की दुहाई दी जा रही हो, तब उम्मीदवार का नामांकन निरस्त कर (खजुराहो संसदीय क्षेत्र) एवं तीसरे चरण में हो रहे इंदौर लोकसभा से भी कांग्रेस उम्मीदवार का नामांकन वापिस करवाकर भाजपा में शामिल कर, यथासंभव निर्विरोध चुनाव की नई नीति की अचानक आहट इस लोकसभा चुनाव सुनाई देने लगी है। यह स्थिति तब पैदा हो रही है या की जा रही है, जब दोनों लोकसभा क्षेत्र सूरत व इंदौर से लगातार वर्ष 1989 से व खजुराहो से वर्ष 2004 से भाजपा भारी बहुमत से चुनाव जीतती चली आ रही है। ‘‘नैतिकता’’ का राजनीति में प्रश्न उठाना तो मूर्खता ही कहलायेगी। ऐसी स्थिति में इस पहलू पर जरूर विचार करना आवश्यक हो जाता है कि क्या ‘‘नोटा’’ के रहते हुए एकमात्र बचे उम्मीदवार को ‘‘निर्विरोध’’ निर्वाचित घोषित करने की कानूनी स्थिति पर पुनर्विचार का समय नहीं आ गया है? 

नोटा का अर्थ।

भारतीय संविधान व जन प्रतिनिधित्व कानून में मूल रूप से ‘‘नोटा’’ का प्रावधान नहीं था। परंतु ‘‘पीयूसीएल बनाम भारत सरकार’’ के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देश के पालन में दिसंबर 2013 में पहली बार मध्य प्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने ‘‘नोटा’’ का विकल्प भी मतदाता को दिया, तब भारत नोटा का विकल्प देने वाला विश्व का 14वां राष्ट्र बना। वर्ष 2014 में राज्यसभा के चुनाव में भी नोटा का प्रयोग किया गया। यह एक नकारात्मक प्रक्रिया है, जहां नोटा का कोई चुनावी मूल्य नहीं होता है। यह सिर्फ प्रत्याशी की अयोग्यता को दिखाने में मतदाता को सक्षम बनाता है। लेकिन यह भी सच है कि नोटा एक ‘‘काल्पनिक उम्मीदवार’’ होता है, जिस प्रकार भगवान एक लीगल एनटाइटिटी (वैद्य व्यक्ति) होते हैं। ‘‘नोटा’’ का मतलब ऐसा ‘‘दंतहीन विकल्प’’ है, जो ‘‘समस्त’’ उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार देता है। ‘‘समस्त मतलब सभी’। 

नोटा के रहते निर्विरोध चुनाव! मतदाता के मताधिकार पर कुठाराघात।

जब खुद चुनाव आयोग जोर शोर से यह प्रचारित, प्रसारित करता है कि प्रत्येक नागरिक को अपने ‘मताधिकार’ का उपयोग हर हालत में करना ही चाहिए और 100 परसेंट वोटिंग होना चाहिए, तब ‘‘निर्विरोध’’ परिणाम के कारण सूरत लोकसभा क्षेत्र के लगभग 16 लाख वोटर को तथा उनमें से वे युवा वोटर जिन्हें पहली बार मताधिकार का अधिकार मिला है, वे अपने इस अधिकार से वंचित हो गये और उन्हें वोट देते हुए ‘‘सेल्फी’’ खींचने का मौका भी नहीं मिल पाया। मतदान न करने पर सजा देने का प्रावधान लाने की वकालत करने वालों के लिए तो निर्विरोध चुनाव एक झटके, सदमे से कम नहीं होगा? 

नोटा दंतहीन प्रावधान! धरातल पर परिणाम मूलक नहीं।

‘‘नोटा’’ व वृद्धाश्रम की ‘‘दशा’’ व ‘‘दिशा’’ एक सी ही है। दोनों ही व्यवस्था समाज की स्वास्थ्य व परिपक्व मानसिकता में कमी के कारण उसकी पूर्ति हेतु ही बनी स्थिति के कारण है। वृद्धाश्रम की आवश्यकता परिवार द्वारा दायित्वों को न निभाने के कारण उत्पन्न होती है। अतः जब समाज और परिवार अपना दायित्व पूर्ण रूप से निभाने में सक्षम होकर निभाने लग जाएगा, तब ‘‘वृद्धाश्रम की सोच’’ ही समाप्त हो जाएगी।  

इसी प्रकार परिपक्व लोकतंत्र में जनता के पास दो विकल्प होते है सत्ता पक्ष व विपक्ष। कुछ विदेशों में तो विपक्ष भी छाया मंत्रिमंडल बनाकर जनता के बीच अपनी नीति को प्रभावी रूप से ले जाते हैं। परन्तु जहां लोकतंत्र परिपक्व नहीं होता है, तब पक्ष-विपक्ष दोनों के नाकाम व असफल सिद्ध हो जाने की स्थिति में तभी मजबूरी वश ‘‘नोटा’’ का प्रावधान कर विकल्प दिया जाता है। परन्तु नोटा का प्रयोग होने के बावजूद मतदाता अपने उद्देश्यों में वस्तुतः सफल नहीं हो पाता है। क्योंकि अंततः ‘‘शासक’’ तो दोनों पक्षों में से कोई एक ही बनता है, जिसे न चुनने के लिए नोटा का उपयोग किया गया था। ‘नोटा’ का बहुमत होने की स्थिति में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसे ‘‘शासन का अधिकार’’ नहीं मिल जाता है। अतः नोटा में वास्तविक परिणाम को लागू करने वाली शक्ति निहित न होने के कारण, जिस मुद्दे को लेकर नोटा का प्रयोग किया गया है, उसकी प्राप्ति न होने से नोटा का आह्वान करना, व्यावहारिक रूप से उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कहीं से कहीं उचित नहीं ठहरता है।

जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन आवश्यक।

इस बात पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है कि ‘नोटा’ ‘‘किन’’ उद्देश्यों की पूर्ति करता है? अथवा उच्चतम न्यायालय ने जिन उद्देश्यों के लिए इसका प्रावधान करने के निर्देश चुनाव आयोग को दिये थे, की क्या पूर्ति हो रही है? वास्तव में यदि ‘नोटा’ को ‘प्रभावी’ बनाना है, तो जन प्रतिनिधित्व कानून में यह संशोधन किया जाना आवश्यक है कि यदि नोटा को अधिकतम वोट मिलते है, तो न केवल चुनाव फिर से होना चाहिए, बल्कि जिन भी उम्मीदवारों को नोटा से भी कम मत मिले है, उन्हें पुनः खड़े होना का अधिकार नहीं होना चाहिए। यद्यपि समय के साथ ‘नोटा’ की लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद अभी तक नोटा ‘‘बहुमत’’ हासिल करने में कामयाब नहीं हुआ है। अधिकतम व बहुमत में अंतर है। साथ ही जीत का अंतर नोटा को मिले मत से कम होने पर पुनः चुनाव होना चाहिए। इस तरह की मांग को लेकर एक जनहित याचिका प्रसिद्ध लेखक व मोटिवेशनल (प्रेरक) शिव खेड़ा ने उच्चतम न्यायालय में दायर की है, जिस पर चुनाव आयोग ने नोटिस भी जारी कर दिया है। नवम्बर 2018 में महाराष्ट्र व हरियाणा राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव में संशोधन कर अधिकतम वोट मिलने पर फिर से चुनाव होने का प्रावधान किया गया है। आखिर उपरोक्त प्रस्तावित संशोधन की मांग से नुकसान किस बात का है? किसका है?

वर्तमान ‘नोटा’ संसदीय प्रणाली को अराजकता की स्थिति की ओर अग्रसर करता है। 

हमारे देश में संसदीय प्रणाली है, जहां चुने गये विधायक/सांसद, ही कार्यपालिका के माध्यम से ‘‘शासन’’ चलाते हैं। चंूकि नोटा शासक नहीं हो सकता है, अतः आप एक अराजकतावादी स्थिति की ओर ‘नोटा’ के माध्यम से अग्रसर हो रहे हैं। इसलिए ‘‘नोटा’’ का प्रयोग करने वालो से भी ज्यादा बुद्धिमान वे लोग है, जो नोटा का प्रयोग करने वालों के कारणों को ही अपनाते हुए ही समय व खर्च को बचाते हुए वोट ड़ालने ही नहीं जा रहे है, जिस कारण से मत प्रतिशत गिर रहा है। यदि आप नोटा’ के समर्थक है, तो वही काम तो मत न ड़ालने से भी हो रहा है। अतः जितना कम प्रतिशत मतदान हुआ है, उसको ‘नोटा’ ही माना जाना चाहिए। यदि आप नोटा के मतदान को मतदान के कम प्रतिशत के आकडे में जोड़ दें, तो आप देखेगें कि एक बड़ा वर्ग लगभग 40 प्रतिशत से अधिक लोग वर्तमान चुनावी प्रणाली में भाग न लेकर उससे दूर है। तभी आप चैतन्य होकर चिंता से उस तंत्र को विकसित करेंगे, जिस पर विश्वास होकर, लोग ज्यादा संख्या में मतदान करने आगे आयेगा। 

‘‘नोटा’’ के बजाए! अटल जी का सिद्धान्त ‘‘रोटी पलटने’’ को अपनाईये।

मतदाता को यह समझना चाहिए कि यह भगवान राम का देश होते हुए भी ‘‘कलयुग’’ होने के कारण देश में ‘राम राज्य’ नहीं है, जहां घर पर ‘ताला’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती थी। अतः यदि आपको कुँआ या खाई, चोर या डाकू में एक किसी एक का चुनाव करना ही है, तब आपने यदि डाकू चुना है, तो वह भविष्य में डाकू से चोर बनने की ओर अग्रसर होगा, ताकि पुनः वह पांच वर्ष के लिए चुना जा सके। और यदि चोर चुना गया है, तो वह ‘‘साहूकार’’ बनने का प्रयास अवश्य करेगा। यदि ऐसा नहीं हो पाता है, तब अटल जी के शब्दों में हर पांच सालों में ‘रोटी’ पलट देना चाहिए ताकि रोटी (लोकतंत्र) जल न सके को अपना लेना चाहिए। तभी लोकतंत्र सुरक्षित रह पायेगा। 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा के हुए चुनाव में भाजपा व कांग्रेस के बीच मात्र 0.1 प्रतिशत वोट शेयर का अंतर था, जबकि नोटा का 1.4 प्रतिशत वोट शेयर रहा, जो परिणाम को बदल सकता था।

जय हिंद!

गुरुवार, 2 मई 2024

‘‘सूरत’’ का सच! ‘‘निर्विरोध अथवा ‘‘विरोध’’ पर ‘सत्ता बल’ भारी?

रवीश कुमार की एकतरफा रिपोर्टिंग।

‘‘निर्विरोध’’ चुनाव सूरत!

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की जिस धमाकेदार तरीके से आगाज भाजपा खास कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की है, इसकी
एक बानगी ‘‘हीरा’’ नगरी ‘‘सूरत’’ से भाजपा उम्मीदवार मुकेश दलाल का निर्विरोध चुना जाना है। भाजपा के इतिहास में वे पहले निर्विरोध सांसद होकर एक साथ ‘हीरा’ और ‘‘हीरो’’ बन गए हैं। 400 पार के हुंकार के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘‘पहला कदम’’ पहला ‘कमल’ ‘‘मुकेश’’ के रूप में मिला। हाल के वर्षों में सांसद के निर्विरोध चुनाव के उदाहरण देखने को मिलते नहीं हैं। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव का कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में निर्विरोध सांसद के चुनाव को छोड़ दे तो, अंतिम बार वर्ष 1989 में मोहम्मद शफी भट जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी से श्रीनगर लोकसभा से निर्विरोध चुने गये थे। शायद इसका कारण विद्रोह व आतंकवाद के चलते (जहां राज्य की शेष सीट पर मात्र 5 प्रतिशत से भी कम मतदान हुआ था) दूसरे उम्मीदवार द्वारा नामांकन न भरना रहा था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक कुल 35 सांसद निर्विरोध चुने जा चुके हैं। अभी अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी 10 भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध जीते हैं। 

रवीश कुमार की प्रतिक्रिया एकतरफा। 

इस ‘‘निर्विरोध’’ चुनाव को लेकर कांग्रेस और सोशल मीडिया खासकर प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार की जो प्रतिक्रिया आई है, वह किसी भी रूप में न तो उचित कही जा सकती है और न ही तथ्यों से मिलान खाती है। आम आदमी पार्टी द्वारा इस निर्विरोध चुनाव को ‘‘लोकतंत्र की नींव खोखला कर देने वाला’’ ठहराया। सोशल मीडिया में सूरत लोकसभा के निर्विरोध चुनाव को लेकर लोकतंत्र की हत्या बताने वाले डिंपल यादव के निर्विरोध निर्वाचन पर कहां गायब हो गए थे? पत्रकारिता के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय रेमन मैग्सेसे’ पुरस्कार से नवाजे गये रवीश कुमार एक ऐसे निर्भीक, खोजी पत्रकार हैं, जिनके प्रशंसक, फॉलोअर्स सोशल मीडिया में लाखों की संख्या में है (लगभग 80 लाख से अधिक सब्सक्राइबर (ग्राहक) है), उनमें से एक प्रशंसक मैं भी हूं। वह इसलिए की उनकी पत्रकारिता अन्य पत्रकारों की ‘‘मीडिया ट्रायल’’ पत्रकारिता (जैसे अर्णब गोस्वामी) की तुलना में ज्यादा तथ्योंपरक और आम जनों की समस्याओं से ज्यादा जुड़ी रहती हैं। युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा, नकल, किसान आंदोलन, वन रैंक वन पेशन, ओआसी, अग्निवीर योजना साम्प्रदायिक सदभाव और इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण नागरिक, सामाजिक सक्रियतावादी (एक्टिविस्ट) एवं पत्रकारों की नागरिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करने वाली घटनाओं का विस्तृत विवरण सहित अनेकोंनेक जन समस्याओं पर उन्होंने पत्रकारिता की कई सीरीज की हैं, जिन्हें पत्रकारों की बड़ी जमात उठाने में सामान्यतः परहेज करती रही है। बावजूद इसके उन्हें भी पूर्ण रूप से एक ‘‘निष्पक्ष’’ पत्रकार की श्रेणी में इसलिए ‘‘नहीं’’ रखा जा सकता है, कि अधिकांशतः सरकार की आलोचना के अतिरिक्त रवीश कुमार को कभी भी सरकार के अच्छें कार्यों को लेकर वीडियो बनाते हुए या पीठ थपथपाते हुए समाचार देते हुए शायद ही देखा गया हो? जैसे ‘‘चंचल नार की चाल छिपाये न छिपे’’ वैसे ही रवीश कुमार का वर्तमान सत्ता का अंध विरोध छिपता नहीं है। अपने इस रुख के लिए ऐसे पत्रकार इस आदर्श सिद्धांत के पालन का सहारा लेते है कि पत्रकार का कार्य सिर्फ सत्तापक्ष से ही प्रश्न पूछना है, विपक्ष से बिल्कुल नहीं। 

वीश कुमार! संतुलित नहीं बल्कि अंध भक्त विरोध।

रवीश कुमार की पत्रकारिता की आलोचना-समालोचना में देश के ‘‘तंत्र’’ को बचाए रखने की चिंता अवश्य झलकती रहती है, परंतु यहां पर तो निश्चित रूप से उन्होंने अंधभक्त मीडिया जिसे वे स्वयं गोदी मीडिया कहते थकते नहीं हैं, के समान ही अंध भक्त विरोध का चश्मा लगाते हुए सूरत लोकसभा चुनाव के परिणाम की बेमैल तुलना चंडीगढ़ मेयर चुनाव के साथ कर दी। इसे ‘‘मैच फिक्सिंग’’ तक करार कर दिया, जिसका आगे अर्थ स्पष्ट किया गया है। कुछ अन्य यूटूबरर्स ने सूरत चुनाव को चंडीगढ़ मेयर चुनाव से भी ज्यादा खतरनाक ठहरा दिया। इसे तो बिल्कुल ‘‘जलेबी के समान सीधा’’ विश्लेषण ही कहा जा सकता है, जो किसी भी रूप में न तो तथ्यात्मक है और न ही सही है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में स्वयं चुनाव अधिकारी द्वारा कैमरे के सामने सरेआम वोटों का डाका ड़ाला गया था, जबकि यहां पर तो बिना कैमरे के ही सूरत की राजनीतिक रूप से प्रसिद्ध फाइव स्टार होटल ‘‘ली मेरिडियन’’ ने अपना इतिहास दोहरा दिया। जरा आपको याद दिला दें कि इसी ‘‘स्टार’’ होटल में महाराष्ट्र में जब शिवसेना में दो फाड़ होकर महाराष्ट्र विकास आघाड़ी की सरकार गिराए जाने का ‘‘ऑपरेशन लोटस’’ चल रहा था, तब पाला बदलने वाले विधायकों को यहीं ठहराया गया था। सूरत चुनाव के संबंध में रवीश कुमार द्वारा तीन-तीन वीडियो बनाना, उनके एजेंडे को स्पष्ट रूप से संकेत करता है। यदि आप उनके इन वीडियो को पूरा देखेंगे (जैसा कि वे हमेशा कहते हैं कि वीडियो पूरा देखिए) तो उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि ये वीडियो रवीश कुमार का पूर्णतः अंध भक्त विरोध के एजेंडा का एक भाग ही है, बजाय देश की लोकतंत्र की चिंता का विषय, जैसा कि वह कहते हैं, दावा करते हैं।

रवीश कुमार कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी को नजरअंदाज करना!

रवीश कुमार का उक्त वीडियो में यह कहना कि यदि विपक्ष के उम्मीदवार को इस तरह से ‘‘मैनेज’’ किया जाने लगा और प्रस्तावक गायब होने लगे तो कहीं लोकतंत्र ही गायब न हो जाए? उच्चतम न्यायालय से तुरंत हस्तक्षेप करने की गुजारिश भी रवीश कुमार ने कर डाली। ‘‘ऑपरेशन निर्विरोध’’ या ‘‘ऑपरेशन दलाल’’ की ‘‘दलाली’’ किसने की, यह तो जांच के बाद ही पता चल जायेगा। परंतु ‘‘चलती चक्की में से साबुत निकल आने वाले’’ रवीश कुमार निश्चित रूप से यदि यह कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार भ्रष्टाचार में लेने वाला व देने वाला दोनो बराबरी के अपराधी होते हैं। ठीक उसी प्रकार लोकतंत्र के इस चुनावी खेल में नेताओं, सांसदों, विधायकों और अब ‘‘उम्मीदवारों’’ का बिकना जो एक आम चलन (प्रक्रिया) हो गई है, के लिए दोनों पक्ष आपराधिक रूप से कानूनन् दोषी है। तकनीकी रूप से सही होने के बावजूद रवीश कुमार की निष्पक्षता स्पष्ट रूप से एक पक्ष की ओर 180 डिग्री नहीं तो 90 डिग्री से जरूर झुकती हुई दिखती है, जब वे कांग्रेस की इस बात के लिए बिल्कुल भी आलोचना नहीं करते हैं, नजरअंदाज कर देते है कि कांग्रेस को अपना घर संभालना नहीं आ रहा है। विपरीत इसके वे सीधे उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग कर बैठते हैं। क्या यह कांग्रेस नेतृत्व (प्रादेशिक व केन्द्रीय) की जिम्मेदारी नहीं थी कि जिस व्यक्ति को वह उम्मीदवार बना रहे है, वह इतना कमजोर व दोगला (जो बाद में अंततः भाजपा में शामिल ही हो गया) और ‘‘आप अपने हाथ बिकने वाला चकरया’’ निकल जाएगा? वह पार्टी को धोखा देकर विपक्षी से मिलकर ‘‘ऑपरेशन निर्विरोध’’ सफल कर ‘‘निर्विरोध’’ चुनाव का रास्ता बना कर सूरत के 16 लाख वोटो के मताधिकार को छीन लेगा? आखिर यह घटना कुछ घंटे या 1 दिन की तो थी नहीं? इसकी भूमिका कहीं न कहीं 3-4 दिनों से बन रही थी, जैसा कि स्थानीय मीडिया में छपा भी है। सूरत की यह कहानी अभी इंदौर लोकसभा में दोहराई जा रही है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार ने अपना पर्चा वापिस लेकर भाजपा में शामिल हो गया।

‘‘कांग्रेस’’ या ‘‘संविधान’’ को ‘‘बदसूरत’’ करता ‘‘सूरत’’? 

इस निर्विरोध चुनाव के दूसरे पहलू जिस पर रवीश कुमार ज्यादा जोर देते है, पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या यह निर्विरोध चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया के तहत हुआ है? अर्थात सामान्य प्रक्रिया के तहत पानी का बहाव उतार की ओर हुआ है अथवा मोटर पंप से पानी चढ़ाव की ओर उतारा गया है? क्या इस प्रक्रिया में राज्य पुलिस बल, केंद्रीय एजेंसीस ई.डी. आदि का धन-बल, धमकी ड़र का भी समावेश हुआ है? यह निष्कर्ष तो एक स्वतंत्र जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद ही निकाला जा सकता है। हस्ताक्षर को जाली ठहराकर अस्वीकार करने वाले शपथ पत्र के हस्ताक्षर के सत्यापन की जांच किसने की? जब वे तीनों प्रस्तावक निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं हुए? निर्वाचन अधिकारी अथवा कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों द्वारा झूठे हस्ताक्षर के लिए प्रस्तावकों के विरुद्ध अभी तक एक भी प्रथम प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई? सरदार वल्लभ भाई पटेल, ग्लोबल रिपब्लिकन पार्टी सहित छोटे दलों के 4 प्रत्याशियों सहित शेष समस्त निर्दलीय प्रत्याशी ने भी नामांकन वापस ले लिये। बसपा प्रत्याशी को क्राईम ब्रांच उठाकर ले गई और तदनुसार उनका फार्म वापिस हो गया। तथापि इस तथ्य को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि सूरत में भाजपा 1984 से लगातार जीतते चली आ रही है। जहां पर वर्तमान समस्त विधायक व सभासद (पार्षद) भाजपा के ही हैं, व इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार की पूर्व की ही भांति लाखों मतों से जीतने का एक अनुमान/आकलन है।  

अंत में मैं यह जरूर चाहूंगा कि पाठक गण मेरे इस लेख को रवीश कुमार तक जरूर पहुंचाएं, जिससे वे इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें, ताकि कोई त्रुटियां (यदि) तथ्यात्मक अथवा गुण दोष के आधार पर उनकी नजर में इस लेख में हैं, तो तदनुसार सुधारा जा सके।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष उस्मान गनी का निष्कासन! कहीं ‘‘सेल्फ गोल’’ तो नहीं?

सेल्फ गोल में कांग्रेस विशेषज्ञ  होकर अग्रणी

वैसे जब भी राजनीति में सेल्फ (आत्मघाती) गोल की बात आती है, तो सामान्य व प्राकृतिक रूप से राजनेताओं से लेकर आमजनों का ध्यान कांग्रेस व उनके नेताओं के बयानों की ओर सहज ही आकर्षित हो जाता है। ‘‘राजनीति के खेल के मैदान’’ में कांग्रेस ने यदि किसी क्षेत्र में ‘‘विशेषज्ञता’’ प्राप्त की है, खासकर राहुल गांधी के वर्ष 2014 से लेकर 2024 तक की कांग्रेस में, तो वह खेल का क्षेत्र ‘‘आत्मघाती गोल’’ ही रहा है, (शायद असलम शेर खां जैसे उत्कृष्ट गोल कीपर का न होना जो बैतूल लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रहे) जिस कारण से कांग्रेस पिछले 10 सालों में राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तरों पर बुरी तरह से असफल हो रही है।बड़ा गोल पोस्ट निश्चित कर अपनी ही स्टिक से उसे गिरा देना कॉन्रेस की प्रवृत्ति हो गई है। पिछले 10 सालों में 600 से अधिक विधायक, सांसद वर्तमान एवं पूर्व कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने का एक कारण कांग्रेस का आत्मघाती गोल मारना भी है। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र के सोलापुर में जिस तरह से अपने भाषण में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए जो शब्दों का चयन कर उच्चारण किया है, निश्चित रूप से वह इस बात पर प्रश्न चिन्ह लगाता है कि राहुल गांधी कहां तक पढ़े हैं? किस स्कूल में पढ़े है? प्रधानमंत्री की डिग्री पर उंगली उठ़ाते हुए कांग्रेस पार्टी जिसके नेता राहुल गांधी की डिग्री सही होगी, परन्तु निश्चित रूप से ज्ञान-विज्ञान बहुत ही कमजोर, अनपढ़ अपरिपक्व व अमर्यादित है। ‘‘डिग्रीधारी’’ हो जाने से आदमी शिक्षित व ज्ञानी नहीं हो जाता है। राहुल गांधी के सोलापुर भाषण से तो यही बात सिद्ध होती है। सुश्री उमा श्री टीवी भारती को ही देख लीजिए। वह कहां तक पढ़ी लिखी है? परंतु उनके पास ज्ञान का अपार भंडार, हिंदी, संस्कृत अंग्रेजी भाषा पर समान कमांड व वाणी वचन में जबरदस्त सम्मोहन शक्ति है जिसका कोई मुकाबला नहीं है।  जिस तरह से तू तडाक से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा ‘‘नरेन्द्र मोदी कांपने लगा! उसकी आदत है, जैसे ही ड़र लगता है वो झूठ बोलना शुरू कर देता है। जैसे ही उसको ड़र लगता है वो कभी पाकिस्तान की बात करेगा कभी चीन की बात करेगा तो एक के बाद एक झूठ बोल रहा है , मगर इस बार नहीं निकल पाएगा’’। 

उस्मान गनी का निष्कासन गलत। 

परंतु बात फिलहाल अभी राजस्थान भाजपा प्रदेश अनुशासन समिति के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत द्वारा प्रधानमंत्री की मुसलमान समाज को तथाकथित रूप से घुसपैठियां कहने के बयान की आलोचना करने पर बीकानेर जिले के अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष उस्मान गनी के विरुद्ध की गई निष्कासन की कार्रवाई पर कर ले। न्यूज 24 के प्रसिद्ध बहुप्रचारित ‘‘माहोल है क्या’’ के संवाददाता राजीव रंजन द्वारा प्रधानमंत्री के घुसपैठियां कहने के कथन पर पूछे गये प्रश्न के उत्तर में उस्मान गनी ने कहा कि प्रधानमंत्री का बयान बहुत ही बेहूदा है और वह हमारे समाज की भावनाओं को आहत करता है। उस्मान गनी ने राज्य में चुनावी रैलियों के दौरान मुसलमानों के संबंध में की गई मोदी की टिप्पणियों की निंदा की। गनी ने कहा कि एक मुस्लिम होने के नाते वह प्रधानमंत्री द्वारा कही गई बातों से निराश हैं. ‘‘जब वह बीजेपी के लिए वोट मांगने मुसलमानों के पास जाते हैं, तो समुदाय के लोग पीएम की इस तरह की टिप्पणियों के बारे में बात करते हैं और उनके जवाब मांगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में जाट समुदाय बीजेपी से नाराज है। 

प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं। 

अनुशासन समिति अध्यक्ष ओंकार सिंह ने कारण बताओं नोटिस जारी किए बिना उस्मान गनी से टेलीफोन पर बातचीत कर उसे इस आधार पर पार्टी से निकाल दिया कि उसने पार्टी की नीति की खिलाफत की व छवि खराब की, जो एक सेल्फ गोल हो सकता है। पार्टी की नीतियों के विरोध करने के आधार पर निष्कासन करना राजनीतिक रूप से गलत कदम हो सकता है क्योंकि गनी ने तो प्रधानमंत्री के उस बयान की आलोचना की जहां अधिक बच्चे वालों वह घुसपैठियो को मेहनत की कमाई व कीमती सामान देने की बात कही है। बाद की सभाओं में खुद प्रधानमंत्री ने अपने अगले भाषण में जरूर सुधार कर मुसलमान शब्द का प्रयोग नहीं किया। 

भाजपा का यह अधिकारिक रुख नहीं

भाजपा का यह आधिकारिक रुख कभी भी नहीं रहा है कि समस्त मुसलमान घुसपैठियां हैं। विपरीत इसके प्रधानमंत्री अगली सभा में ‘‘पसमांदा मुसलमान’’ की दयनीय आर्थिक स्थिति व पिछड़ेपन का जिक्र करते हैं। इसका मतलब यही है कि पिछडे, गरीब मुसलमानो को सहायता की आवश्यकता सिद्धान्त रूप से है, अर्थात पिछड़े मुसलमानों को सहायता और सामान्य रूप से उन्हें घुसपैठियां न मानने की नीति भाजपा की है। अतः उस आधार पर अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष को निष्कासित करना आत्मघाती गोल इसलिए हो सकता है कि इस निष्कासन से इसका एक अर्थ उक्त नीति जिसकी आलोचना उस्मान गनी ने की है, को भाजपा की नीति मानी जा सकती है। फलतः इस कार्रवाई से भाजपा नेतृत्व को बचना चाहिए था। खासकर अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति जिसने 20 साल पार्टी के लिए कार्य किया, विशेषकर इस स्थिति को देखते हुए कि वह पार्टी जो आंतरिक लोकतंत्र की बात करती थकती नहीं है और कांग्रेस की ‘‘हाईकमान संस्कृति’’ की कड़ी आलोचना करते हुए वहां लोकतंत्र न होने की बात करती थकती नहीं है। यदि एक मुस्लिम कार्यकर्ता जो अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष पद पर कार्य कर रहा था, की भावनाएं प्रधानमंत्री के तथाकथित बयान पर आहत हुई है, तो नेतृत्व को गनी को यह समझाना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के बयान का वह आशय नहीं है, जो उस्मान गनी समझ रहा है। 

प्रधानमंत्री के बयान का गलत अर्थ, संदर्भ। 

वस्तुत: प्रधानमंत्री ने घुसपैठियां शब्द के साथ मुसलमान शब्द का उपयोग नहीं किया है। वास्तव में प्रधानमंत्री ‘‘सबका साथ सबका विकास व सबका विश्वास’’ नीति पर काम कर रहे है, जैसा कि गनी ने स्वयं भी स्वीकारा है। प्रधानमंत्री का बयान निम्नानुसार है ‘‘पहले जब उनकी सरकार थी, तब उन्होंने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है, इसका मतलब ये संपत्ति इकट्ठा करके किसको बांटेंगे, जिसके ज्यादा बच्चे हैं, उनको बांटने, घुसपैठियों को बांटेंगे, क्या आपकी मेहनत का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा? आपको मंजूर है ये?’’ उक्त बयान में मोदी ने घुसपैठियां के पहले मुसलमान शब्द का उपयोग नहीं किया है जैसा कि गनी व समस्त विपक्षी दल सहित अंतरर्राष्ट्रीय मीडिया में भी उसे जोड़कर अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त कर रहे हैं। जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने मनमोहन सिंह के वर्ष 2006 के भाषण और कांग्रेस के वर्तमान  घोषणा पत्र में निहित भावनाओं का उल्लेख जो शब्द उनमें उल्लेखित नही थे, का प्रयोग कर कांग्रेस पर कड़ा प्रहार किया है,  शायद वही प्रक्रिया को अपनाकर प्विपक्ष प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना कर रहा है। प्रधानमंत्री द्वारा घुसपैठियों के संबंध में मुस्लिम शब्द का प्रयोग न करने के बावजूद विपक्ष यदि एक शब्द  घुसपैठिया को समस्त मुस्लिमो के लिए मानकर कर आलोचना रहा है, शायद इसलिए कि ऐसा  परसेप्शन बना हुआ है या बना दिया गया है, तब इसके लिए दोषी कौन? हांलाकि तीन दिन बाद ही सही चुनाव आयोग ने नरेन्द्र मोदी के उक्त बयान पर पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को नोटिस जारी कर 29 अप्रैल तक जवाब मांगा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता की यह भी एक नई शुरुआत होगी ।

मंगलवार, 16 अप्रैल 2024

क्या न्यायालय के निर्णयों में भी ‘‘न्याय’’ के साथ ‘‘संतुलन’’ का ‘‘भाव’’ दिखता है?

वास्तविक ‘‘न्याय’’ क्या है?

संविधान की तीन स्तंभों में सबसे महत्वपूर्ण न्यायपालिका की ‘‘माननीय न्यायालय’’ का काम ‘‘सिर्फ और सिर्फ’’ ‘‘न्याय’’ देने का ही होता है। ‘‘न्याय’’ देते समय न्यायालय को सिर्फ न्याय देने पर ही ध्यान केन्द्रित करना होता है। न्यायालय के आस-पास विद्यमान ‘‘परिसर’’ से लेकर, बाहर क्या परिस्थितियां, घटनाक्रम चल रहा है, उससे प्रभावित हुए बिना सिर्फ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड (केस डायरी) पर उपलब्ध तथ्यों की न्यायिक समीक्षा कर माननीय न्यायाधीश ‘‘न्यायिक निर्णय’’ देते हैैं। न्याय की यह आदर्श स्थिति हैं। न्यायालय का निर्णय किस पक्षकार के पक्ष में है, हार-जीत में है, और निर्णय का समाज या देश के अन्य तंत्रों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, उससे उन्मुक्त होकर ही, ड़रे बिना ही निष्पक्ष व निरपेक्ष होकर माननीय न्यायाधीश निर्णय देते है। यही वास्तविक न्याय है। यथा ‘‘न्याय न क्यारी ऊपजे, पंच न हाटे बिकायः’’। 

इंसाफ का तराजू?                                                                                           

‘‘न्याय’’ के संबंध में यह कहा जाता है कि न्यायालय में इंसाफ की देवी की मूर्ति लगी होती है, जिनकी दोनों आंखों पर काली पट्टी बंधी होती है और हाथ में तराजू होती है। ग्रीक पौराणिक कथा में न्याय देवता का जिक्र किया गया हैं। ये एक काल्पनिक पात्र हैं। ‘‘न्याय देवता का नाम थेमिस हैं। इनका वर्णन इस प्रकार किया गया हैं-हर परिस्थिति में भावना को दूर रखकर न्याय करने वाली ‘‘दोनों पक्षकारों को समान भाव से देखने वाली’’ किसी के भी रूप, पैसा, अधिकार, धर्म से प्रभावित न होने वाली। आँखों पर की पट्टी - सभी को एक ही भाव से देखने वाली का प्रतीक हैं। हाथ में रहा तराजू, ‘‘निष्पक्ष न्याय का प्रतीक’’ हैं। तराजू में कुछ भी तौल के देखे-वह ‘‘वजन के हिसाब से ही दूसरे को तौलता है, चाहे वो कुछ भी हो’’।

‘‘संतुलन का परसेप्शन’’

माननीय उच्चतम न्यायालय के पिछले कुछ न्यायिक निर्णयों से ऐसा आभास सा हो रहा है कि उन निर्णयों में कहीं न कहीं न्यायालय का ‘‘प्रयास’’ (स्वाभाविक अथवा अतिरिक्त?) ‘न्याय’ के साथ दोनों पक्षों के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास होता हुआ दिखता है। तथापि निर्णय ‘न्यायिक’ ही होते हैं। इस हेतु जरूरत पड़ने पर न्यायालय अनुच्छेद 142 के अंतर्गत प्राप्त असीमित विशेषाधिकार/विवेकाधिकार का भी सहारा लेती है। सामान्यतः न्यायालय के सामने दो ही पक्ष होते है, जो अपना-अपना पक्ष रखते हैं, जिनके बीच ही निर्णय का तराजू का कांटा धूमता है। तीसरा पक्ष वह होता है, जो न्यायिक निर्णय के परिणाम के आकलन, मूल्यांकन का पक्षपात पूर्ण हुए बिना निष्पक्ष होकर करता हैं। इससे न्यायालय को न तो कोई लेना-देना होता है और न ही इससे उसके ‘‘स्वास्थ्य’’ पर कोई प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ समय से कुछ न्यायिक निर्णयों से बनते उक्त परसेप्शन ‘‘संतुलन’’ बनाने को बल सा मिल रहा है।

संजय सिंह का जमानत आदेश!

इसी संदर्भ में अभी ताजा उदाहरण आप पार्टी के सांसद संजय सिंह के विरुद्ध प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई ‘‘पीएमएलए’’ कानून के अंतर्गत शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड़िग में की गई कार्रवाई के तहत की गई गिरफ्तारी पर उच्चतम न्यायालय द्वारा संजय सिंह को दी गई जमानत के निर्णय है। चंूकि आरोपी को जमानत मिली, इसीलिए उसके साथ न्याय हुआ, आरोपी की यह सोच स्वभाविक ही है। कहते है ना कि ‘‘अघाए को ही मल्हार सूझता है’’।  दूसरी ओर अभियोजन पक्ष जिसने आरोपी के विरूद्ध गिरफ्तारी की कार्रवाई की बावजूद जमानत का विरोध ऑन रिकॉर्ड नहीं किया, तब भी यह कहा जा सकता है, अभियोजन पक्ष की भी जीत हुई है। क्योंकि उसने जमानत का विरोध नहीं किया, जो सामान्य रूप से अन्य प्रकरणों में ई.डी. अभी तक करता चला आ रहा है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा उक्त अधिनियम के अंतर्गत मोदी सरकार के कार्यकाल में अभी तक दर्ज 121 मामलों में (जिनके मात्र 6 सत्ता पक्ष के नेताओं के विरूद्ध ही) से अधिकतरों में आरोपी को जमानत ई.डी. के विरोध के कारण नहीं मिली है। भले ही प्रकरणों में चालान प्रस्तुत न हुए हो अथवा गवाही की कार्रवाई चालू न हुई हो। विपरीत इसके पूर्व की यूपीए सरकार के 10 वर्ष के कार्यकाल में मात्र 26 नेताओं के विरूद्ध कार्रवाई की गई, जिनमें से 14 (54 प्रतिशतं) विपक्ष के थे। इस प्रकार सिक्के के दूसरे पहलू का एक अर्थ यह भी निकलता है कि कांग्रेस (स्वतंत्रता के बाद की) भाजपा की तुलना में ज्यादा भ्रष्ट पार्टी है। इसलिए केन्द्रीय एजंेसीसज् को सरकार होने के बावजूद उन्हे सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के विरूद्ध कार्रवाई करनी पड़ी थी।  

ई.डी. द्वारा संजय सिंह का जमानत का विरोध नहीं!

सबसे महत्वपूर्ण गौर करने वाली बात यह है कि प्रस्तुत प्रकरण में न्यायालय ने संतुलन बनाने का प्रयास किया है, ऐसा इसलिए लगता है कि न्यायालय के समक्ष अभियुक्त ने पीएमएलए की धारा 45 के अंतर्गत यह कहकर जमानत की मांग की थी कि, प्रथम दृष्टया यह प्रावधान आरोपी पर लागू नहीं होता है, क्योंकि इसके समस्त आवश्यक तत्वों का पूर्णतः अभाव हैै। सुनवाई के समय न्यायालय इस बात से शायद संतुष्ट भी था। इसलिए माननीय न्यायालय ने ई.डी. से यह कहा कि आरोपी 6 महीनें से जेल में बंद है, उसके पास से कोई रूपये की जप्ती अभी तक नहीं हुई है। आपके पास आरोपी को निरोध में आगे रखने के लिए और कोई तथ्य, साक्ष्य हो, तो रिकार्ड पर लाईये। कृपया यह ध्यान में रखिये कि यदि हमने खामियां पाई तो धारा 45 के अंतर्गत हम यह रिकॉर्ड करेंगे कि अपराध नहीं किया है, जो आपके लिए नुकसानदेह होकर उसका असर ट्रायल की सुनवाई पर होगा। इस प्रकार एक तरह से उच्चतम न्यायालय ने एक विकल्प देकर ई.डी. को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूर किया कि वह जमानत का विरोध न करे। अन्यथा उनके खिलाफ आदेश पारित कर जमानत दे दी जायेगी।

संजय सिंह की जमानत का निर्णय ‘‘मिसाल’’ नहीं।

अंततः ईडी के वकील ने बहुत ही समझदारी से काम लेते हुए संजय सिंह को जमानत देने का विरोध न करते हुए अपनी सहमति दे दी। इस प्रकार संजय सिंह को जमानत देने के साथ ही न्यायालय ने इस निर्णय को एक ‘‘उदाहरण’’ रूल ऑफ लॉ अथवा ‘‘मिसाल’’ अन्य मामलों के लिए नहीं माना जा सकता है, यह भी स्पष्ट कर दिया। इसे न्याय के साथ-साथ संतुलन बनाने की नीति के अलावा क्या कहा जा सकता है? ‘‘अपनी पीठ खुद को नहीं दिखती’’ इस बात को एक अच्छा कानूनविद् ही बेहतर अच्छे तरीके से ज्यादा बतला सकता है। जब न्यायालय इस तार्किक परिणति पर पहुंच चुका था कि संजय सिंह के विरूद्ध प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है, तब उच्च न्यायालय को गुण-दोष के आधार पर ही आदेश पारित करना चाहिए था। इससे वह सबके लिए (ई.डी. सहित) यह एक मिसाल बनकर भविष्य में ई.डी. को इस तरह की आधारहीन कार्रवाई करने से हतोत्साहित करता। 

चंडीगढ़ मेयर का चुनाव!

इसी तरह का चंड़ीगढ मेयर के चुनाव के वोट का डाका सरे आम हुआ। मामला उच्चतम न्यायालय तक पहंुचा। उच्च न्यायालय के अंतरिम सहायता देने के इंकार के अंतरिम आदेश के विरूद्ध अपील दायर की गई थी। तब उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि उच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत रिकॉर्डिंग वीडियो से स्पष्ट रूप से धांधली होते हुए दिख रही थी, तब क्यों नहीं अंतरिम आदेश पारित किये गये? परंतु दुर्भाग्यवश उच्चतम न्यायालय ने भी स्वयं तुरंत उच्च न्यायालय के आदेश को स्थगित नहीं किया, बल्कि सरकार को नोटिस देते हुए 15 दिन बाद की सुनवाई निश्चित की गई। तत्पश्चात सिर्फ स्थगन आवेदन पर आदेश पारित करने की बजाए पूरे मामले को गुण-दोष के आधार पर न केवल चुनाव अवैध घोषित कर दिया, बल्कि हारे हुए उम्मीदवार को जीता हुआ भी घोषित कर दिया, जो याचिकाकर्ता की मांग ही नहीं थी। इससे न्याय के साथ-साथ यदि संतुलन बनाये रखने का परसेप्शन बना, ऐसा कहने वाले को गलत नहीं कहा जा सकता है। 

‘‘श्री राम जन्म भूमि निर्णय’’।

इसी प्रकार रामजन्म भूमि विवाद का निर्णय में भी दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने आदेश पारित किया। जो मुद्दे, विचाराधीन नहीं थे उन्हें भी सेटल किया गया। विवादित भूमि पर मुस्लिम पक्ष के दावे को अस्वीकार करते हुए पूरी तरह से ‘‘रामलला’’ का हक माना गया। बावजूद इसके सुन्नी वक्क बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित जगह मस्जिद निर्माण हेतु भूमि देने तथा मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का दिया गया आदेश भी एक प्रकार से ‘‘संतुलन के न्याय’’ का ही आदेश था।

अनुच्छेद 370 का मामला।

उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने वाले राष्ट्रपति के आदेशों को सद्भावना पूर्व होते हुए वैद्य माना गया। तथापि अनुच्छेद 367 में संशोधन करने वाले आदेशों को असवैधानिक मानने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन की वैद्यता को निर्णित करने के बजाए सालिटर जनरल के आश्वासन के कथन को स्वीकार कर लिया, जो एक संतुलन बनाने की ओर बढ़ने का आदेश ही कहलायेगा। 

महाराष्ट्र की राजनीति का सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव प्रकरण!

उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को तथाकथित शिवसेना में विभाजन के बाद बहुमत साबित करने के निर्णय को अवैध घोषित करने के बावजूद उस अवैध निर्णय से उत्पन्न अवैध सरकार को भंग करने की इच्छा के संकेत देने के बावजूद भंग कर यथा स्थिति बहाल करने का न्यायिक आदेश न देकर, इसे संतुलन बनाने का प्रयास के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है? 


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