बुधवार, 11 जनवरी 2012

मुख्य चुनाव आयोग का आदेश! कितना वैधानिक, कितना व्यवहारिक, कितना प्रभावी!


राजीव खण्डेलवाल:
                        मुख्य चुनाव आयुक्त श्री वाय.एस. कुरैशी का हाल ही में उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनाव के सम्बंध में हाथियों और मायावती की मुर्तियों को ढांकने का जो आदेश है उसकी विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूप सें विवेचना की जा रही है। उक्त आदेश के गुण:दोष पर जाये बिना, विभिन्न पार्टिया राजनैतिक दृष्टिकोण से अपने-अपने लाभ-हानि के हिसाब से उक्त आदेश की विवेचना कर उसे सही या गलत ठहरा रही है जिसके कारण मुख्य चुनाव आयुक्त के उक्त ओदश से उत्पन्न यक्ष प्रश्र गौण हो गया है।
                        मुख्य चुनाव आयुक्त ने मुर्तियों को ढॉकने के आदेश का जो मुख्य आधार बताया है वह यह कि सार्वजनिक जगहों पर शासकीय धन इन मूर्तियों की स्थापना में लगा है जिस पर कुछ राजनैतिक पार्टियों ने आपत्तियां उठायी है। इस कारण उसे आदर्श चुनाव आचार संहिता का उलंघन मानते हुए उस पर प्रतिबंध लगाया गया है। समानता के सिद्धांत के आधार पर हाथी चुनाव चिन्ह ढॉकने के निर्णय पर विचार करें तो यह स्पष्ट है कि चुनाव आयोग जिस बहुजन पार्टी को मिलने वाले तथाकथित फायदे के आधार पर मूर्ति ढॅकने का निर्णय लिया वास्तव में उससे तो बीएसपी को और ज्यादा फायदा हो गया क्योंकि लोग अब ज्यादा ध्यान से उक्त हाथियों की ढॅकी हुई मूर्तियों को देखने जायेंगे। (मानवीय स्वभाव है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी बात के लिये रोका जाता है तो वह उसे ज्यादा करने का प्रयास करता है) दूसरी बात यदि सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी पैसा के (दुरू) उपयोग का प्रश्र है तो दूसरे अन्य राष्ट्रीय नेता और चुनाव चिन्ह के बारे में भी क्या ऐसी ही स्थिति है? पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर माननीय अटल जी तक कई सरकारी योजनाएं उनके नाम से चल रही है। क्या चुनाव आयोग उनपर भी प्रतिबंध लगायेगा? सरकारी योजनाओं से 'नल' घर-घर में लगे है जो की 'राष्ट्रीय लोकदल' का 'चुनाव चिन्ह' है। मध्यप्रदेश शासन ने स्कूली छात्र छात्राओं को उनकी सुविधा के लिए मुफ्त में सायकल प्रदान की है जो कि समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह है। यदि चुनाव आयोग ऊपर की हुई सूण्ड की हाथी मूर्ति और नीचे की ओर सूण्ड वाली हाथी (जो बीएसपी का चुनाव चिन्ह है) के बीच के अंतर को नहीं समझ पा रहा है तो वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय झण्डे को एक क्यों नहीं समझ लेता? इसमें तीनों रंग तो मेल खाते है लेकिन अशोक चक्र को छोड़कर वे लगभग एक समान है। दूर से भी एक समान ही दिखते है बल्कि आज भी गांव में दोनो झण्डों में अंतर कर पाना ग्रामींण आदिवासियों के लिये सम्भव नहीं होता है। क्या इस आधार पर चुनाव आयोग भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस के चुनाव चिन्ह झण्डे पर प्रतिबंध लगायेगा? इससे यह सिद्ध है कि चुनाव आयोग ने उक्त आदेश पारित करने के पूर्व उसके दूरगामीं परिणामों पर जाये बिना आदेश पारित कर दिया जिस पर उपरोक्त परिपेक्ष में पुर्नविचार किया जाना आवश्यक है।
                        एक बात और कुछ पूर्व चुनाव आयुक्त और पर्यवेक्षकों ने कहा है कि यह चुनाव आयोग का पहला आदेश नहीं है पूर्व में भी ऐसे आदेश निकले है। जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के प्रधानमंत्री काल में राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगे दूरी बताने वालें खम्बों पर लगी अटल जी की फोटो को ढक दिया गया था।  सवाल पूर्व में दिये गये आदेशों का नहीं है बल्कि आदेशों की वैद्यता, सामयिकता और उद्देश्यों की प्राप्ती का है। मायावती की मूर्ति के मामले में भी इसी तरह के आरोप लगाये गये और यह कहा गया कि सरकारी धन से, सरकारी जगह पर जिंदा व्यक्ति ने स्वयं अपनी मूर्ति का निर्माण किया। जहां तक सरकारी धन के उपयोग का प्रश्र है चाहे वह मायावती की मूर्ति का हो या हाथी की मूर्तियों का विभिन्न फोरमों द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक उक्त मामला द्वारा जा चुका है और अंतत: विभिन्न रूकावटों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने न तो उक्त मूर्तियों को तोडऩे के आदेश दिये न ही उसपर किसी तरह की कोई कार्यवाही के निर्देश दिये गये। वैसे भी जीवित व्यक्ति की मूर्ति का सवाल कोई नया नहीं है। दक्षिण में तो यह प्रचलित ही है। 'एमजी रामचंद्रन' 'के कामराज' इसके उदाहरण है। मुझे हाल ही में लोकसभा के विशेष सत्र में लोकपाल बिल पर हुई की बहस के समय शरद यादव का यह कथन बार-बार याद आता है जो काफी प्रासंगिक है। उन्होने कहा था कि ''इस देश में यह दुर्भाग्य है कि व्यक्ति के मरने के बाद ही उसके गुणों का गुणगान किया जाता है, उसका सम्मान करते है। जीवित व्यक्ति भी अपने जीवन काल में अच्छा काम करता है तब भी उसकी बढ़ाई प्रशंसा होनी चाहिए।'' यदि उस दृष्टि से यदि कोई व्यक्तित्व इस राष्ट्र में ऐसा है जो ऐसा कृत्य करता है जिससे जनता प्रभावित होकर उसकी मूर्ति बनाती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि मायावती की मूर्ति जनता ने उनके कार्यो से प्रभावित होकर नहीं बनाई बल्कि स्वयं मायावती ने सरकारी खर्च पर सरकारी जमीन पर बनाई जो घोर आपत्तिजनक व अनैतिक है। 
                        अब उस यक्ष प्रश्र पर विचार किया जावे जो मुख्य चुनाव आयुक्त के आदेश से उत्पन्न हुआ है जिसका उल्लेख मैने प्रथम पेरा में किया था। इस बात में कोई शक नहीं है कि चुनाव आचार संहिता लागू हो जाने के बाद चुनाव आयोग अपने आप को अधिकारों से पूर्ण होकर निरंकुश मान लेता है। स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए वह शासन-प्रशासन और व्यक्ति के दैनांदिक कार्यो पर प्रतिबंध लगाने में ही अपने अहम की तुष्टी समझता है। चुनाव आयोग चुनाव को प्रभावित करने वाले नीतिगत विषयों पर, निर्णय पर प्रतिबंध लगाते समय वे उक्त तथ्य को भूल जाते है कि वास्तव में वे निर्णय एक सामान्य प्रशासनिक शासन की दैनांदिक प्रक्रिया का ही एक भाग है। एक पांच साल के लिये चुनी हुई सरकार जब तक वह सत्ता पर आरूढ़ है कोई भी राजनैतिक निर्णय लेने में वह संवैधानिक रूप से सक्षम है। यदि वह निर्णय गलत, असंवैधानिक या अनैतिक है, तो दूसरे पक्ष को चुनाव में उक्त तथ्य (अनैतिक पक्ष) को जनता के समक्ष लाकर जनता के वोट द्वारा ही उसे हराकर गलत सिद्ध करना चाहिए। न कि आचार संहिता की आड़ में चुनाव आयोग का उपरोक्तानुसार दुरूपयोग होना चाहिए। वास्तव में राजनैतिक दल ''घोषणा पत्र'' के आधार पर जनता के बीच वोट मांगने जाते है जो प्रत्येक राजनैतिक दल को समान रूप से प्राप्त है। तब सत्ताधारी राजनैतिक दल का मुख्यमंत्री या मंत्री कोई नीतिगत घोषणा क्यों नहीं कर सकता यह समझ से परे है। यदि सत्ता में होने के कारण वह कोई ऐसी नीति की घोषणा करके मतदाताओं को तत्कालिक प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है जिसके आधार पर चुनाव आयोग उक्त घोषणा को प्रतिबंधित करने का आवश्यकता महसूस करता है। तब शेष दल इस मुद्दे को लेकर इस आधार पर जनता के पास क्यों नही जाते है कि जिस दल ने लगभग पौने पांच साल (आचारसंहिता लागू होने के पूर्व तक)उक्त नीतिगत निर्णय लेने के लिए कोई सार्थक कदम नहंी उठाये है वह मात्र एक छलावा है। अत: उसे इस आधार पर ही कि इससे उनकी विश्वसनीयता और कम होती है उसे अस्वीकार क्यों नहीं कर देना चाहिए? लेकिन मुझे खयाल आता है कि चुनाव आयोग के इस प्रतिबंध के डर के कारण मध्यप्रदेश में पिछली विधानसभा में सात उपचुनाव, नगर पालिका, नगर पंचायतो व मंडी के चुनाव होने के कारण ज्यादातर समय नीतिगत निर्णय लिये बगैर ही बीत गया और वह सरकार जिसे जनता ने पांच साल के लिए चुना था वह जनहित में पूरे समय निर्णय नहीं ले सकी। 
                        वैसे भी एक चुनी हुई सरकार को अपने विवेक से सरकारी संशाधनों को उपयोग करने का अधिकार है। यदि वे उक्त संशाधनों के उपयोग जनहित में नहीं है तो उक्त मुद्दे पर उनका विरोध करने वाले लोग जनता के बीच उक्त मुद्दो के साथ क्यों नहीं जाना चाहते है। क्या उन्हे जनता की बुद्धी व विवेक पर विश्वास नहीं है? या उन्हे स्वयं की बुद्धि पर विश्वास नहीं है कि वह जनता को इस मुद्दे पर संतुष्ट कर सके। उनके पास तीसरा विकल्प भी है यदि सरकार कोई असंवैधानिक या गैरकानूनी निर्णय ले रही है तो न्यायालय के द्वार खुले है। लेकिन सरकारी पैसे का दूरूपयोग का आरोप जो लोग लगा रहे है वे सब भी उससे उन्मुक्त कहा है? इसलिए ज्यादा अच्छा यह होगा कि जनता के बीच उक्त मुद्दे को ले जाकर जनता के मत से निर्णय रूकवाया जाये ताकि भविष्य में इस तरह के बेहुदा और खजाना लुटाने वाला निर्णय देश में कोई भी लोकतांत्रिक सरकार जनतंत्र के नाम पर नहीं कर सके। इतना माद्दा व विश्वास उस शख्स में होना चाहिए जो उक्त बात का विरोध कर रहा है।
                        अंत में निर्णय जनतंत्र में जनता को ही करना है। वही अंतिम रूप से शिरोधार्य है। हम सब जनता को इस दिशा में जाग्रत करने का प्रयास अनवरत रूप से करते रहे यही कहा जा सकता है। 
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(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

'प्रभावशाली कानून' 'दृढ़ निश्चय' 'कठोर आचरण'-वर्ष २०१२ की आशा/आवश्यकता!



राजीव खण्डेलवाल:

             ''वर्ष २०११" व्यतीत हो चुका है। पूरे वर्ष चली रालेगण केसंत अन्ना की लोकपाल की मुहिम ही राष्ट्र के राजनैतिक एवं सार्वजनिक क्षेत्र में छाई रही। 'अन्ना' लगातार इस बात पर अड़े रहे कि एक प्रभावशाली, सार्थक किन्तु कड़क लोकपाल बिल (जैसा उनके द्वारा परिभाषित किया गया था) वैसा ही संसद में पारित होकर कानून बने। ताकि उनके अनुमानानुसार ६० प्रतिशत तक भ्रष्टाचार कम हो सके। परन्तु वैसा कड़क कानून संसद में उस रूप में प्रस्तुत नहीं हो सका। लेकिन ४४ वर्ष के लम्बे जद्दोजहद के बाद एक लोकपाल एवं लोकायुक्त बिल अवश्य लोकसभा में पारित हुआ। परन्तु यही बिल राज्यसभा में पारित नहीं हो सका तथा बिल अनिश्चित कालीन (साईन-डाई) लम्बित हो गया। वर्ष २०११ की संसद की यही ''उपलब्धि" कही जा सकती है?
             वास्तव में क्या आज हमें नये वर्ष में खुले वातावरण में बिना किसी पूर्वाग्रह के इस बात पर विचार नहीं करना चाहिये कि भ्रष्टाचार न्यूनतम कैसे होगा? क्या मात्र कड़े कानून बना देने से यह कम हो जायेगा? जिस भी किसी मुद्दे के लिये कानून (चाहे वह कितना ही कठोर क्यों न हो) बनाया जाता हैं, वह मुद्दा सुलझ जायेगा, यह सोच बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं होगी, यदि कानून बनाने के साथ-साथ उसको लागू करने की मजबूत इच्छाशक्ति हम विकसित (डेवलप) नहीं कर सके। इस मुद्दे पर न तो अन्ना एवं उनकी टीम ने और न ही उन सब लोगो ने जो लोकपाल बिल का समर्थन कर रहे है कोई विचार किया और न ही कोई प्रभावकारी सुझाव दिया। क्या अन्ना टीम जनता के सामने एक स्वेत पत्र प्रस्तुत कर सकती है? जिसमें जितने भी अपराधिक कानून स्वतंत्र भारत में आज तक लागू किये गये, उनको बनाने के पूर्व और लागू करने के पश्चात अपराधों की संख्या में कितनी गुणात्मक कमी आई है? फांसी की सजा होने के बावजूद इस सजा के डर से कितने लोगो ने हत्या नही की? 'अत्याचार निवारण अधिनियम १९८९' आने के बाद हरिजन तथा आदिवासियों के विरूद्ध अपराधों में कितनी कमी आई? इसी तरह कुछ वर्ष पूर्व ही लागू 'महिला घरेलू हिंसा से बचाव अधिनियम २००५' के लागू होने के बाद हिंसा में कितनी कमी आई या इसके विपरीत परिवार और अधिक टूटने लगे? इन सबके आकड़े जनता के सामने लाये जाना चाहिये। इसी प्रकार के अनेक उदाहरण दिये जा सकते है। वास्तव में यह एक शोध का विषय है। इन सबके विपरीत आज यह महसूस किया जा रहा है कि जितने अधिक कानून बनेंगे, जितने अधिक प्रतिबंध लागू किये जावेंगे, लोग निरन्तर उससे ज्यादा कानून का उलंघन करने वाले गैर-उत्तरदायी व्यक्ति बनते जायेंगे क्योंकि जनता स्वयं के ऊपर कानून लागू करने के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं है। हम देखते है सार्वजनिक स्थान पर थूकना, बीड़ी पीना कानूनन एक अपराध है लेकिन उसको स्वयं पर लागू करने की इच्छाशक्ति न होने के कारण सामान्य नागरिक जाने-अनजाने में उक्त कानूनों का उलंघन करता रहता है। अत: मुख्य चिन्ता का विषय कानून बनाना नहीं बल्कि ईमानदारी से कानून के प्रतिपालन की दृढ़ इच्छाशक्ति को उत्पन्न करना है ताकि लचीला कानून भी असरदार तरीके से लागू होकर अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके। एक तरफ कानून बनाना और उसको लागू करवाना तथा दूसरी तरफ एक नागरिक होने के नाते देश के समस्त कानूनो को स्वयं पर लागू होने का एहसास कराना दोनो स्थिति एक बौद्धिक स्तर (माइंड स्टेटस) से संबंधित है जिसे विकसित करना ही सुधार का एक मात्र उपाय है। लोगो को नैतिकता का उच्च से उच्चतर स्तर का पाठ पढ़ाया जाकर उनको अपने कर्तव्यो के प्रति जागरूक बनाकर उनकी बुद्धि का नैतिक स्तर ऊंचा उठाया जावे तभी हम भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाकर सफलता पूर्वक परिवर्तन करवा सकते है। इस दिशा में जितने भी सुधारवादी लोग झण्डाबरदार बने हुए है वे वास्तव में इस दिशा में कितने जागृत है यह प्रश्र बार-बार मन में कौंधता है। बगैर लोगो की मानसिकता बदले उनकी नैतिकता का स्तर ऊंचा उठाये बिना सिर्फ कानून बनाकर हम सफल नहीं हो सकते है। श्री टीएन शेषन से यह बात सिद्ध होती है।  'लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम १९५१' तब चर्चा में आया जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त वर्ष १९९० में बने और उन्होने उसी १९५१' के कानून को ही प्रभावी रूप से लागू कर स्वच्छ सस्ता व निष्पक्ष चुनाव कराने की सफल साहसिक पहल की। उसके पहले और उसके बाद उक्त कानून को दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में उक्त प्रभावशाली रूप से लागू न करने के कारण उसकी महत्ता लोगो के बीच उपरोक्तानुसार स्थापित नहीं हो पाई। इसी प्रकार यदि 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट १९८८' के अंतर्गत कार्य करने वाला पूरा तंत्र यदि अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति व कानून की मंशा के अनुरूप कार्य कर सके व उसे पूर्ण स्वतंत्रता से कार्य करने दिया जाय तो शायद किसी लोकपाल बिल की आवश्यकता ही न पड़े। पूर्व रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (जिन्होने नैतिकता के आधार पर रेल दुर्घटना होने पर नैतिकता के आधार पर रेलमंत्री पद से स्तीफा दे दिया था), पूर्व आईएएस एमएन बुच, मुम्बई महानगरपालिका के पूर्व आयुक्त श्री खैरनार, मेट्रोमेन श्रीधरन, नागपुर के पूर्व नागपुर सुधार प्रन्याश के अध्यक्ष श्री चन्द्रशेखर आइऐएस जैसे व्यक्तित्व अनेक उदाहरण विभिन्न क्षेत्रों में है जो इस बात को सिद्ध करते है कि नैतिकता ली हुई दृढ़ इच्छा शक्ति व पूरी मारकशक्ति (कानून) के साथ यदि कठोरता से वर्तमान कानून को पूर्ण ईमानदारी से लागू किया जावे तो देश के वर्तमान कानूनो से ही समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। तब अन्य किसी नये कानून की कतई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
             मैं भी 'अन्ना' तू भी 'अन्ना' कहने या टोपी लगाने से न तो काम चलेगा और न ही लोग 'अन्ना' बन पाएंगे। वास्तव में किसी समस्या का स्थायी इलाज रोगी को ठीक करना नहीं बल्कि रोग का जड़ से उन्मूलन करना है। तभी हम समस्या से मुक्त हो पायेंगे। जनलोकपाल के द्वारा आप भ्रष्टाचारी को सजा तो अवश्य दिला पायेंगे जैसा कि अन्ना टीम लगातार कह रही है लेकिन इससे भ्रष्टाचार कम होगा? क्योंकि अन्ना टीम का लोकपाल का मूलमंत्र कड़क 'सजा' के 'डर' के 'प्रभाव' से भ्रष्टाचार के अपराध को कम करना वर्तमान आपराधिक सजा व्यवस्था के संदर्भ में बैमानी होगी। हम देख रहे है वर्तमान में सजा के खौफ से अपराधो की संख्या पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है क्योंकि वास्तव में सजा का वह 'खौफ' डर नहीं है जैसा कि आतंकवादी, तालिबानी अपने लोगो के बीच सार्वजनिक रूप से सजा के पुराने वीभत्व रूप का प्रदर्शन कर आतंक फैलाते है। क्या अन्ना की 'खौफ' पैदा करने वाली 'सजा' की यह कल्पना हो सकती है? कदापी नहीं। निष्कर्ष में लोकपाल तभी अस्तित्व में आयेगा जब व्यक्ति भ्रष्टाचार करे और उसे लोकपाल के सामने प्रस्तुत किया जावे। इसके बजाय यदि भ्रष्टाचार खत्म या कम होने की ही स्थिति पैदा की जाये तो ही इस समस्या से निपटा जा सकता है। इसके लिए भ्रष्टाचार के मूल में जहां से भ्रष्टाचार पैदा हो रहा है उस मूल तत्व पर आक्रमण करना होगा। मतलब भ्रष्टाचार में रिश्वत लेने वाला ही नहीं बल्कि देने वाले व्यक्ति को भी न केवल हतोत्साहित करना होगा बल्कि उसको भी इस बात का पाठ पढ़ाना आवश्यक होगा की वह भ्रष्टाचार के द्वारा सहज रास्ता अपनाने के बजाये ईमानदारी का कठिन रास्ता अपनाने का प्रयास कर भ्रष्टाचार विरोधी मूहिम में स्वयं का सहयोग प्रदान करें। 
             अत: वर्ष २०१२ में अन्ना टीम को सबसे पहले इस बात का प्रयास करना चाहिए कि वे जनता में नैतिकता के विचारों को आगे बढ़ाने का प्रयास करें। यह कार्य सिर्फ अन्ना टीम का ही नही है बल्कि देश के वे समस्त लीडर जिनमें प्लीड करने की क्षमता है, जिनके विचारों एवं कार्यों के हजारों लोग प्रशंसक है, अनुयायी है (चाहे फिर वे आध्यात्मिक, सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्र के हो या विभिन्न संस्थाएं हो) वे सब निरन्तर सामुहिक रूप से इस मुद्दे की महत्ता को समझकर इसको आगे बढ़ाने के लिए कार्य करेंगे (जो कि आसान कार्य नहीं है)। निश्चित मानिये वेन केवल देश के लिए ही बल्कि पूरी मानव जाति के कल्याण के लिये इस भ्रष्टाचार उन्मूलन यज्ञ में बहुत बड़ी आहुति डालकर मानव जाति की बौद्धिक व नैतिक स्तर को ऊंचा उठाने वाली चेतना-ज्योंति को हमेशा ज्योर्तिमय करने में सहायक सिद्ध होंगे। 
२०१२ का आगाज इन विचारों से किया जाये, जो सभी लोगो के मन में समाये ऐसी ईश्वर से प्रार्थना करते है।
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(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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