बुधवार, 22 सितंबर 2021

शासन-प्रशासन नागरिकगण क्यों कानून का मखौल बनाने में तुले हुए हैं।

 ‘‘गणपति बप्पा मोरिया‘‘ ‘‘अगले बरस तू जल्दी आ’’ के जयकारों के साथ हमेशा की तरह गणेश जी का विसर्जन हो गया। पिछले वर्ष कोविड-19 की विश्व व्यापी महामारी से हमारा देश भी पीडि़त होने के कारण पूरे देश में प्रायः सार्वजनिक रूप से गणेश जी की स्थापना व कार्यक्रम नहीं हुये थे। इस वर्ष महामारी के प्रकोप कम हो जाने पर गणेश उत्सव कार्यक्रम की अनुमति शासन-प्रशासन द्वारा कोविड-19 की महामारी को देखते हुए लागू महामारी अधिनियम के अंतर्गत जारी विभिन्न प्रतिबंधों और सावधानियों का पालन करने की शर्त के साथ दी गई। सामान्यतया प्रायः निचले प्रशासनिक स्तर पर उत्सवों के पूर्व शांति समिति की बैठक बुलाई जाकर नागरिकों के प्रतिनिधियों को समझाइश व आवश्यक निर्देश दिये जाते है। बावजूद बैठक, कानून और नियमों का न तो नागरिकों ने उन प्रतिबंधों और सावधानियों का पालन किया है और न ही ‘‘अंगूठा दिखाते इन उच्छृंखल‘‘ नागरिकों से कानून का पालन करवाने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारियों द्वारा उक्त कानून को लागू करवाने की कोई अपनी इच्छा शक्ति दिखाई हो। हम सब ने ‘‘आंखें नीची‘‘ कर बेशर्म निगाहों से समस्त संबंधित व्यक्तियों को या तो बेशर्मी से अथवा निष्क्रिय रहकर कानून का उल्लंघन होते करते देखा है। इस प्रकार पूरे देश में किस तरह से कोविड-19 के प्रतिबंधों का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि उसे एक मजाक बना दिया गया है। क्या यह ‘‘घर फूंक तमाशा देखने‘‘ जैसा नहीं है? पूरे देश में कोविड-19 के नियमों के उल्लंघन का एक भी प्रकरण कहीं भी दर्ज हुआ हो, ऐसा मीडिया ने कहीं रिपोर्ट नहीं किया है। क्या ‘‘कुएं में ही भांग पड़ी हुई है‘‘?

जब शासन-प्रशासन और नागरिकों तीनों पक्ष अच्छी तरह से यह जानते हैं की ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों के अवसर पर उक्त नियमों का पालन न तो किया जा सकता है और न ही ‘‘शठे शाठ्यम् समाचरेत‘‘ की नीति को चरितार्थ करते हुए उनका पालन करवाया जाना संभव है। तब ऐसी अवस्था में शासन-प्रशासन द्वारा धार्मिक उत्सवों, कार्यक्रमों के अवसर पर उक्त नियम से छूट के लिए आवश्यक अधिसूचना जारी क्यों नहीं की जाती? ताकि हमारी आंखों के सामने नियमों के उल्लंघन का नंगा नाच तो नहीं हो पाता। यदि इसी तरह से नियमों के उल्लंघन होते रहे, तब एक समय ऐसी स्थिति आ सकती है कि जब हम कानून के उल्लंघन के आदतन होकर, गहन अपराधों के लिए भी लोगों के मन दिमाग की स्थिति ऐसी हो जाए कि, वे यह प्रकल्पना करने लगे हैं कि कानून तो सिर्फ किताबों में ‘‘शोभा बढ़ाने‘‘ के लिए बनाए जाते हैं। उनको लागू करने वाली एजेंसी कभी भी कानून की ताकत का उपयोग कानून की ‘‘छाती पर मूंग दलते‘‘ तत्वों पर लागू करने के लिए नहीं करती है। तब ऐसी स्थिति में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अतः सभ्य समाज में सुशासन और सू प्रशासन में हम सबका मिलकर यह सामूहिक प्रयास होना चाहिए कि वे कानून जो हमें और समाज को नियमित स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए बनाए जाते हैं, उनका अक्षरसः पालन करने की आदत ड़ालें।

तीसरी लहर की जो बात कही जा रही है, वह उपरोक्त परिस्थितियों एवं मीडिया के इस संबंध में उदासीनता को देखते हुये वह उक्त आशंका को बल प्रदान कर सकती है। और चूंकि ‘‘गेहूं के साथ घुन भी पिसता है‘‘ अतः इस बात का विशेष ध्यान शासन-प्रशासन को रखने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

‘‘स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में आज तक का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका!’’

 क्या गुजरात में पुनः कोई ‘‘शंकर सिंह बाघेला‘‘ बनेगा?

देश की राजनीतिक दृष्टि से सबसे बड़े प्रदेश उत्तर-प्रदेश के बाद एक महत्वपूर्ण राज्य और प्रधानमंत्री व गृहमंत्री की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य गुजरात जिसे संघ व भाजपा ने अपनी राजनीति की एक 'प्रयोगशाला" बनाकर देश में ‘‘गुजरात मॉडल‘‘ के रूप में पेश किया गया है, आज वहां एक बिल्कुल सर्वथा नया "प्रयोग" कर नवनियुक्त, आरूढ़ मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण हुआ। यद्यपि मंत्रिमंडल का यह शपथ ग्रहण कल ही हो जाना चाहिए था। तथापि आज की सिद्धांतहीन चलताऊ राजनीति के विपरीत, ऐतिहासिक परिवर्तन करने की दृष्टि से पूरे के पूरे नये विधायक (कोई भी पुराने मंत्री नहीं) को ही मंत्रिमंडल में लिए जाने का समाचार ज्ञात होते ही लंबे समय से सत्ता पर बैठ कर सत्ता सुख भोग रहे राजनेताओं में असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। इसलिए उक्त राजनीतिक असंतोष को दूर करने के लिए शपथ गण समारोह को 24 घंटे टाला जाकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास अवश्य किया गया है, जैसा कि नहीं बनाये गये कुछ पूर्व मंत्रियों के (स्वेच्छापूर्वक?) सामने आयें बयानों से लगता हैं।

यदि भारतीय राजनीति को पीछे मुड़कर इतिहास को देखें तो, स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र के राजनैतिक इतिहास में अभी तक किसी भी राज्य या केंद्र में "अंगारों पर पैर रखने का" ऐसा कोई उदाहरण आंखें गढा़ कर दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलता है। जहां मुख्यमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल को ही बदल दिया गया हो। यह "असामान्य कदम" व प्रक्रिया सामान्य प्रक्रिया तब कहलाती, जब एक पार्टी के सत्ताच्यूत जाने के बाद दूसरी पार्टी सत्तासीन होती है। ऐसा तभी संभव होता है। इस अनैपक्षित, अप्रत्याशित कदम ने इस बात को एक बार और सिद्ध कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का "56 इंच का सीना" सिर्फ विदेशों के लिए ही नहीं, (जिस कारण से पड़ोसी दुश्मन देश मोदी से घबराते हैं), बल्कि देश की राजनीति करने वालों के लिए भी है। राजनीति की वर्तमान प्रकृति, चरित्र, दशा, दिशा, लगभग पूर्णतः स्वार्थ युक्त होने के कारण राजनीति के निकृष्ट अवस्था में आ जाने के बावजूद, इस तरह हवा के बिल्कुल विपरीत, एकदम सफेद बिना दाग का चमकीला कदम उठाने का साहस सिर्फ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही हो सकता है कि "आयी मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक"। इस तथ्यात्मक सत्य को भूपेंद्र मंत्रिमंडल के गठन ने पुनः सिद्ध किया है।

दो दो बार मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार रहे, उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल व कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीत कर आए विधायक गण जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर मंत्री बने थे, उन्हें भी मंत्री न बनाना "उड़ता तीर लेने की तरह" एक बड़ा राजनीतिक दुस्साहस का कदम ही ठहराया जाएगा। तथापि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुये नये विधायकों मे से 3 विधायकों को नए मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया गया। इस तरह के राजनैतिक दुस्साहस वर्तमान में देश हित में फिलहाल सिर्फ नरेंद्र मोदी ही उठा सकते हैं। "यत्नम् विना  रत्नम् न लभ्यते"। गुजरात जहां से नरेंद्र मोदी व अमित शाह अपनी राजनीतिक पारी खेलकर क्रमशः देश के शीर्षस्थ पद प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद तक पहुंचे। इसलिए गुजरात के प्रति उक्त जोड़ी का ज्यादा चिंता करना स्वाभाविक ही है। शायद इसी कारण से प्रधानमन्त्री ने नए मंत्रिमण्डल को बधाई दी हैं। ऐसे बधाई के उदाहरण अन्य राज्यों के मंत्रिमण्डल के गठन के समय कम ही देखने को मिलते हैं। इस परिवर्तन का मूल्यांकन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम पर ही निर्भर करेगा। देखना होगा कि "ऊंट किस करवट बैठता है"।

भाजपा हाईकमान के इस निर्णय से दो परस्पर विपरीत संदेश और जाते हैं। एक पूरी टीम को बदलकर विपक्ष के बजाय स्वयं भाजपा ने ही अपनी टीम को "नाकामी" करार कर दिया। दूसरा भाजपा के पास "टेस्ट टीम" के बराबर और उतनी ही मजबूत दूसरी टीम भी है, जो अगले वर्ष 2023 में होने वाले चुनावी (आम चुनाव) टी-20 मैच जीतने के लिए तैयार है । उक्त उठाए गए अकल्पनीय राजनीतिक कदम का राजनीतिक टीकाकारों के लिए एक और कारण से दिलचस्प विषय यह रहेगा कि गुजरात वह प्रदेश रहा है, जहां पूर्व में वर्ष 1995 में भाजपा में विद्रोह होकर सरकार गिर चुकी है। जहां भाजपा में एक ओर सामान्यतया  इस तरह की स्थिति देखने को नहीं मिलती है। वही दूसरी ओर खाटी संघी शंकर सिंह वाघेला दल बदल कर केशुभाई पटेल की सरकार को गिराकर खुद मुख्यमंत्री बन गए थे। कहते हैं "दूध का जला तो छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है"। बावजूद उक्त 'काले इतिहास' के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने उक्त नपा-तुला परिगणित (केल कूलंटड) कदम उठाया है, जो निश्चित रूप से कॉफी सोच समझकर और उपरोक्त घटनाओं पर विचारोंपरांत ही उठाया होगा।

सामान्य सामाजिक-राजनीति जीवन में ओल्ड़ इज़ गोल्ड़ श्रेष्ठतर माना जाता रहा है। हमारे र्दशन में यह प्रचलित है कि जहर के इलाज के दो तरीके होते है। एक जहर-जहर को काटता है। और दूसरा जहर के असर को अमृत द्वारा खत्म करना। गुजरात के मंत्रिमंडल के गठन ने उक्त समस्त परसेप्शन को एकदम से किनारे कर दिया गया है। मंत्री होने के कारण समस्त मंत्री, मुख्यमंत्री सहित निर्दोष न होकर उनमें कुछ न कुछ खामियां (सत्ता का दोष?) उत्पन्न हो गयी है। (संभवतः परिर्वतन का कारण परिदर्शित हो रहा है) इस कारण से और पिछले आम चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति को देखते हुये, आगामी विधानसभा के चुनाव चुनाव में सुनिश्चित जीत की प्राप्ति हेतु ही यह कदम उठाया गया प्रतीत लगता है। चुनाव में विजयी होकर  विजय रुपाणी और उनके मंत्रिमंडल मंत्रिमंडलीय साथियों (विजयी विधायकों) को अगले आम चुनाव में विजय सुनिश्चित करने हेतु आनंदीबाई पटेल को हटाकर नेतृत्व सौंपा जाकर विजय घोष करने का दायित्व दिया गया था। लेकिन उन्हें विजय सफर पूरा किए बिना ही असफल करार कर विजय दिलाने के योग्य न मानकर पराजित घोषित कर कर दिया। अतः इस कदम से पार्टी के भीतर राजनैतिक असंतोष का होना अवश्यंभावी है। क्योंकि राजनीति में सामान्यता कोई साधू-संत तो होता नहीं है। अतः इस उत्पन्न होने वाले अंसतोष की आशंका के दुष्परिणाम चुनाव परिणाम पर न पड़ने के लिए हाईकमान ने क्या-क्या कदम उठाये है, यह देखने-परखने की बात होगी। अन्यथा एक सर्वथा अप्रत्याशित कदम (मुख्यमंत्री चुनने से लेकर) उठाने से होने वाले फायदेे से उसकी प्रतिक्रिया में उत्पन्न नुकसान की संभावनाएं को देखते हुये कहीं यह प्रयास असफल व आत्मघाती तो नहीं होगा? फिलहाल यह  भविष्य के गर्भ में है।

चाल-चलन-चरित्र व चेहरे का शंखघोष करने वाली भाजपा राजनीति में निश्चित रूप से नये-नये योग व प्रयोग के युग के सिंद्धात की शुरूवात कर रही है। जब यह तर्क है कि मंत्री रहने के कारण सत्ता का अपना चारित्रिक दोष होने के कारण उनकी स्वच्छ छवि में कुछ न कुछ आंशका के बादल हो सकते है, तो वहीं सिद्धांत एक बार से अधिक चुने गए पुराने विधायकों पर क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिये? क्योंकि वर्तमान में विधायक भी तो सत्ता के एक प्रतीक ही होते है। क्योंकि "लाल तो गुदड़ी में भी नहीं छुपते"। अंततः संघ व भाजपा हाई कमांड  की "नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन"  की यह नई "शल्य नीति" क्या भाजपा शासित सभी राज्यों में आम चुनाव होने के पूर्व  तथा आगामी वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व केंद्रीय स्तर पर भी लागू होगी ? यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा। 

कुछ समय पूर्व तक भाजपा अनुभव व नये खून के सुमिश्रण की नीति को अपनी सत्ता की राजनीति में अपनाकर बढ़ावा दे रही थी। लेकिन पिछले कुछ समय से  भाजपा की कार्यनीति व कार्यप्रणाली का यदि बारीकि से विश्लेषण किया जाए तो, यह स्पष्ट हो जाता हैं कि वह देश को निम्न राजनैतिक प्रयोग व सिंद्धातों के संकेत व दिशा देने का प्रयास कर रही है। 

1. (नौकरशाही समान) राजनीति में भी उम्र की समय सीमा का अलिखित निर्धारण। 

2. अनुभव को लगभग तिलांजली दे देना। 

3. नये खून को अधिकतम तरजीह देना। 

4. पूर्व प्रधानमन्त्री स्वं. अटल बिहारी बाजपेयी का सत्ता में आने के पूर्व जनता से यह सवाल यह रहता था कि पांच साल में रोटी पलट दो अन्यथा वह जल जायेगी, को दल में अपनाना। 

5. दूसरे दलो से "आयात" किये गये नेताओं को पदस्थापना देकर उनकी मूल विचार धारा को अपनी विचार धारा की मूलभूत पृष्ठभूमि में पूर्णतः विलीनिकरण का प्रयास। 

भाजपा उक्त पहली बार किए गए प्रयोग व  सिंद्धांत को क्या "कार्यकर्त्ताओं के धरातल तक" भी उतारेगी? अथवा यह मान लिया जाये कि "पद की सत्ता" के बिना, कार्यकर्ता ईमानदार व स्वच्छ छवि लिये होता है। ‘सत्ता’ ही "दुर्गण की जननी" है। यदि फिर ऐसा है, तो पूरी राजनैतिक कवायद सिर्फ सत्ता के लिये क्यों? इस प्रश्न का जवाब भी शायद भाजपा के पास ही है ?

अतः में उपरोक्त पूरे घटनाक्रम को एक लाइन में संक्षिप्त (समअप) किया जा सकता है। ‘‘मुख्यमंत्री ने स्वयं के विरूद्ध ही सर्वसम्मति से अविश्वास प्रस्ताव पारित करवाकर, स्पीकर ने भी इस्तीफा देकर, अपनी आवाज को बंद कर नये मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पूरे नये मत्रियों के गठन का रास्ता साफ किया और नये मुख्यमंत्री पर भी सदन के नये चौकीदार (स्पीकर) की व्यवस्था की।‘‘


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर उठाए गए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए मैं प्रधानमंत्री को प्रयोग की सफलता सहित जन्मदिवस की शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।

बुधवार, 15 सितंबर 2021

‘भाजपा ने गुजरात में भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त कर इतिहास रचा‘‘।

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का अचानक इस्तीफा जितना  आश्चर्यचकित लिया हुआ निर्णय रहा, उससे भी कहीं ज्यादा अचंभित करने वाला और बिल्कुल ही नाटकीय, अनेपक्षित,अप्रत्याशित निर्णय उनके उत्तराधिकारी के चुनाव के रूप में केन्द्रीय पर्यवेक्षक कृषि मन्त्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा ‘‘दादा‘‘ (अपने लोगों के बीच में भूपेंद्र पटेल दादा नाम से ही लोकप्रिय है) भूपेंद्र पटेल की मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्ति की घोषणा करने पर हुई। वैसे भाजपा इस तरह के निर्णय के लिए जानी जाती रही है। पूर्व में भी भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्रियों के चुनाव में कुछ इसी तरह के चैकाने वाले निर्णय सफलतापूर्वक लिए हैं। 

वास्तव में भाजपा ने आगे आने वाले विधानसभाओं के चुनावों में सत्ता व्यवस्था विरोधी भावना (एंटी इनकंबेंसी) तथा महामारी कोविड-19 से लड़ने की अव्यवस्था से उत्पन्न असंतोष से लड़ने के लिए चुनाव पूर्व मुख्यमंत्रियों को बदलने की नई नीति को अपनाया है, जिसकी सफलता का आकलन तो आगामी आने वाले विधानसभा चुनावों के परिणाम पर निर्भर करेगा। वैसे तो इस नीति का आंशिक सफलतापूर्वक क्रियान्वयन असम चुनाव मे देखने को मिल चुका हैं। जहां हुये आम चुनाव में पदासीन मुख्यमन्त्री सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमन्त्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित न कर नयें व्यक्ति के मुख्यमन्त्री पद पर आने के अवरोध को रणनीति के तहत हटाया गया। फिर विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद पदासीन मुख्यमन्त्री को जीत का सेहरा बांधने की बजाय एक दूसरे प्रभावशाली व्यक्ति हिमंता बिस्वा सरमा जो कि कुछ समय पूर्व ही कांग्रेस से भाजपा में आये थे, को मुख्यमन्त्री पद पर आरूढ किया। 2012 में उत्तराखण्ड में आम चुनाव के तुरन्त पूर्व, भूतपूर्व मुख्यमन्त्री मेजर जनरल भुवन चन्द्र खण्डूरी को पुनः मुख्यमन्त्री बनाया गया। विधानसभा के आम चुनाव के पूर्व इस तरह की मुख्यमंत्री बदलने की सोच या कवायद सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी में हो सकती है। कांग्रेस पार्टी सहित किसी भी पार्टी में इस तरह के साहसिक निर्णय की कल्पना ही नहीं की जा सकती है, कार्यरूप देना तो दूर की बात हैं। हां, कांग्रेस में ऐसा होना संभव है, तभी जब ऐसा व्यक्तित्व ‘‘गांधी‘‘ जैसी पारिवारिक पृष्ठभूमि लिए हुये हो। 

वैसे कुछ राजनीतिक टीकाकार और विपक्ष भाजपा के इस कदम को 2017 में आनंदीबाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद पाटीदार समुदाय में उत्पन्न असंतोष को दूर करने की कवायद भी ठहरा रहा है। निश्चित रूप से इस कदम के द्वारा पटेल समुदाय के असंतोष को दूर करने का प्रयास अवश्य किया गया है। लेकिन यदि सिर्फ यही एकमात्र कारण होता, तो गुजरात जैसे महत्वपूर्ण प्रधानमन्त्री व गृहमन्त्री के गृह राज्य के मुख्यमन्त्री जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए तब फिर राजनीति के नए-नए नवाचार भूपेंद्र पटेल की बजाए उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल को बनाते, जो आनंदीबाई पटेल के बाद भी एक स्वाभाविक सशक्त दावेदार थे, और आज भी विजय रुपाणी के इस्तीफे के बाद सर्वाधिक सशक्त दावेदार राजनीतिक क्षेत्रों में न केवल माने जा रहे थे, बल्कि स्वयं नितिन पटेल ने भी अप्रत्यक्ष कथित रूप से मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी, जो सामान्यतया भाजपा में नहीं की जाती है। बावजूद इसके नितिन पटेल को मुख्यमन्त्री बनाने से न तो यह चौकाने वाला निर्णय कहलाता या ठहराया जाता और न ही यह भाजपा की राजनीति की नई प्रयोगशाला का ‘‘प्रयोग‘‘ कहलाता, जो वर्तमान में भाजपा कर रही है और आगें करना चाहती है।  ‘नामी‘ व्यक्ति के ‘बदनाम‘ होने की संभावनाए के रहते "गुमनाम" भूपेन्द्र पटेल (जो नेता चुनने के लिये बुलाए गई विधायक दल की बैठक में सबके पीछें की लाईन में बैठे थें), को आगे लाने का एक कारण यह भी हो सकता हैं। वैसे "संघ दृष्टि" से लाइन के सबसे पीछे बैठा व्यक्ति को संख्या की गणना करने के कारण उसकी अहमियत सबसे सामने बैठे "अग्रेसर" के ठीक पीछे बैठें दूसरे नम्बर के व्यक्ति से ज्यादा होती हैं। (ऐसा ही गुजरात में भी घठित हुआ।) भाजपा हाईकमान का उक्त निर्णय इस बात को पुनः सत्यापित करता है कि सरकार और संगठन के किसी भी पद पर बैठा हुआ नेता सिर्फ एक ‘‘कार्यकर्ता‘‘ ही है जिस प्रकार ‘‘संघे शक्तिः कलौ युगे‘‘ के मार्ग पर चलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक ‘‘स्वयंसेवक‘‘ होता है। 

देश के राजनीतिक इतिहास में यह शायद पहला अवसर है, जब एक ऐसे व्यक्ति को सीधे मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया जा रहा है जो न तो पहले कभी मंत्री रहे हैं और जो मात्र 4 वर्ष पूर्व वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के राज्यपाल पद पर नियुक्ति किए जाने के  कारण इस्तीफा देने से उत्पन्न रिक्त स्थान उपचुनाव में ऐतिहासिक (एक लाख सत्रह हजार से भी ज्यादा ) मतों से जीतकर पहली  बार विधायक बने। इससे भी बड़ा एक उदाहरण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का आपके सामने है, जो कभी विधायक  नहीं बने, बल्कि सीधे मुख्यमंत्री बने। परंतु दोनों में मूल-भूत अंतर यह है कि उद्धव ठाकरे हिंदू सम्राट शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के राजनैतिक उत्तराधिकारी होने के नाते  शिवसेना पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के कारण सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि देश में उनका एक स्थापित नाम और उनकी स्थापित पार्टी है। एक उदाहरण अन्ना आंदोलन से उत्पन्न पूर्व नौकरशाह अरविंद केजरीवाल का भी हैं। उन्होनें नवंबर 2012 में एक नई पार्टी ‘आप‘ बनाकर 2 साल के भीतर ही विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस के सहयोग से बनी सरकार के सीधे मुख्यमन्त्री बनें। वर्ष 1982 में प्रसिद्ध तेलुगू फिल्मी कलाकार पद्मश्री एन टी रामाराव ने भी सर्किट हाउस में हुए अपने अपमान से आहत होने पर एक नई पार्टी तेलगु देशम पार्टी का गठन कर 9 महीने के अन्दर ही विधानसभा के आम चुनाव में बहुमत प्राप्त कर सीधे मुख्यमन्त्री बनें। जबकि भूपेंद्र पटेल के साथ इस तरह की कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं रही है और न ही ‘‘काम बोलता है‘‘ अथवा ऐसी अलंकृत राजनैतिक पहचान रही है। वे राजनीति में सिर्फ ‘‘कारपोरेशन‘‘ अहमदाबाद महानगर पालिका की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन तक ही सीमित रहे हैं। यद्यपि पूर्व में ऐसे कुछ उदाहरण अवश्य मिल सकते है, जो विधायक होने के बाद मंत्री बने बिना सीधे मुख्यमंत्री बन गए। जैसे मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा, शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर ,बिहार में राबड़ी देवी, और अभी हाल में ही उत्तराखंड में नियुक्त किए गए पुष्कर सिंह धामी आदि।

एक और बात के लिए भाजपा हाईकमान को बधाई दी जानी चाहिए कि वे इस तरह के लिए गए अप्रत्याशित निर्णयों के फलस्वरुप परिवर्तन, राज्यों के शीर्षस्थ स्तर पर बहुत आसानी से कर लेते हैं। और पार्टी में किसी तरह का मुखर असंतोष, विरोध या विद्रोह नहीं हो पाता है, जैसा कि ऐसी स्थिति में अन्य किसी भी दूसरी पार्टी में हो तो, वहां विद्रोह पैदा हो जाता है। क्यों कि भाजपा का कार्यकर्ता ‘‘हाकिम की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी कभी नहीं चलता‘‘। जिन प्रदेशों में  कांग्रेस सत्ता में हैं, वहां किस तरह सिर फुटव्वल सड़क पर हाई कमांड के बार-बार समझौता करवाने के बावजूद ‘‘मैं भी रानी, तू भी रानी, कौन भरेगा पानी‘‘ की तर्ज पर चलती रहती है, यह सब देश देख रहा हैं। अतः देश की अन्य समस्त पार्टियों को भाजपा की इस ‘‘कला‘‘ को सीखने की आवश्यकता अपनी अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखते हुए जरूरी है। आम चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने की परिवर्तन की इस नीति को भाजपा द्वारा अपना कर  चुनाव के पूर्व अभी तक चार-चार मुख्यमंत्री बदले गए, जिनसे अन्य पार्टियों को उक्त सबक मिलता है और उन्हे यह सीख लेनी  भी चाहिए। 

अब परिवर्तन की बयार का अगला नंबर निश्चित रूप से ‘‘माल कैसा भी हो, हांक ऊंची लगाने वाले‘‘ शिवराज सिंह चौहान पर आकर टिक जाता है। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद मध्यप्रदेश में आम चुनाव के पूर्व नेतृत्व परिवर्तन होना अवश्यंभावी सा दिखता है। एक तो भाजपा अभी तक आम चुनाव में जाने के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने की नई नीति अपना रही है, जिसके परिणाम स्वरूप बदलाव होना लाजिमी ही है। दूसरे शिवराज सिंह को वैसे भी 15 वर्ष से अधिक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए हो चुके हैं। वर्तमान राजनीति के "मूड" को देखते हुए व भाजपा की "राजनीतिक उम्र सीमा" के बंधन की अपनाई गई नीति को देखते हुए, शिवराज सिंह का जाना ब्रेकिंग न्यूज नहीं होगी, बल्कि जब तक वे पद पर बने हुए है वह एक आश्चर्यजनक बात व ब्रेकिंग न्यूज अवश्य बनी रहेगीं। ‘‘आखिर काठ की हांडी को कितनी बार चूल्हे पर चढ़ायेगी‘‘ पार्टी? वैसे, मध्यप्रदेश में भी, ‘असम‘ जैसा सफल प्रयोग दोहराया जा सकता हैं। अंत में राजनीति का एक सर्वमान्य सिद्धांत हमेशा से यह रहा है कि वह हमेशा अनिश्चितताओ से भरी रहती है। भाजपा के इस कदम ने राजनीति को पहचान देने वाले इस चरित्र की पुनः पुष्टि ही की है।

क्या ‘‘अब भी’’ ‘‘पंजशीर‘‘ पर भारत को ‘‘सैन्य अड्डा’’ बनाने की आवश्यकता नहीं है?

भारत की अफगानिस्तान-तालिबान नीति लगभग पिछले 1 महीने से चल रहे घटनाक्रम में भारत ने विदेश नीति के दृष्टि से लगभग अपने को ‘‘असंबद्ध दिखता हुआ रख‘‘ ‘‘गुटनिरपेक्ष नीति‘‘ की बजाएं ‘‘निरपेक्ष विदेश नीति‘‘ बनाई हुयी है। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अफगानिस्तान के संबंध में भारत ने "को नप होउ हमहिं का हानी" की नीति अपनाते हुए "कुछ न देखने व न करने" का दृष्टिकोण बनाया हुआ है, यही विदेश नीति है। अथवा भारत "विभूषणम्  मौनम् पंडिताणाम्" कि उक्ति पर अमल कर रहा है? परंतु "मौन की नीति" हर जगह समय उचित और सफल नहीं होती है। इस संबंध में अपनाई गई विदेश नीति शायद इतनी प्रभावकारी हो गई है कि तालिबान ने अपने सत्ता पर आरूढ़ होने का निमंत्रण जिन 6 देशों को भेजा है, उसमें ‘‘असंबद्ध भारत‘‘ शामिल नहीं है। शायद यह कदम भारत की तालिबान के प्रति अपनाई गई नीति का दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकारोक्ति ही है। क्योंकि आश्चर्यजनक रूप से तालिबान ने उस देश रूस को भी निमंत्रित किया है, जिसने अमेरिका से भी पहले तालिबान के अस्तित्व पर संकट पहुंचाने का प्रयास किया था। 

जिस प्रकार राजनीति में कोई स्थाई शत्रु-मित्र नहीं होता है, वही सिद्धांत विदेश नीति पर भी लागू होता है। और शायद यही कारण है कि आक्रामक देश होने के बावजूद रूस और अमेरिका ने तालिबान से अपने संबंधों पर विचार करने में ‘‘ट्विस्ट’’ किया है। शायद इसी कारण से तालिबान से अमेरिका सुविधाजनक तरीके से बिना और नुकसान हुए पूर्व में हुए शांति समझौते के अनुसार तालिबान द्वारा निश्चित की गई डेडलाइन 31 अगस्त के पूर्व निकल पाया। बल्कि पंजशीर में नियंत्रण को लेकर चल रहा सैनिक संघर्ष में पंजशीर द्वारा पूरे विश्व से सहायता की अपील करने के बावजूद अमेरिका सहित कोई देश अभी तक सामने नहीं आया है।

भारत वह देश है, जिसने वर्ष 1915 में अफगानिस्तान के ‘काबुल’ में ‘‘आजाद’’ भारत की अनंतिम निर्वासित सरकार का गठन राजा (हाथरस उ.प्र.) महेन्द्र प्रताप सिंह ने अब्दुल हाफ़िज़ मोहम्मद बरकतउल्ला के साथ मिलकर किया था। मतलब भारत के अफगानिस्तान के साथ लंबे समय से पड़ोसी देश होने के नाते संबंध रहे हैं। वहां के आर्थिक विकास में भारत के योगदान को कमतर कर नहीं देखा जा सकता है। आज भी भारत सरकार की 23000 हजार करोड़ से अधिक की विकास योजनाएं का कार्य अफगानिस्तान में चल रहा है, जिसको पूरा करने की अपील तालिबानी नेताओं ने की है। बावजूद इसके जहां अफगानिस्तान में सरकार के विस्थापन से लेकर स्थापन तक, सबसे महत्वपूर्ण रोल भारत का होना चाहिए था, वहां भारत अनुपस्थित है या अनुपस्थित कर दिया गया है? अथवा भारत अफगान मामले में अस्तित्वहीन हो गया है। तालिबान द्वारा चीन को महत्वपूर्ण साझीदार बताकर और कट्टर भारत विरोधी देश पाकिस्तान मुख्य सूत्रधार बनकर फिलहाल तालिबान को अपने इशारों पर नचाने में सक्षम दिख रहा है। तालिबान की कथनी व करनी में भारी अंतर को वास्तविक मानकर ही कार्य योजना बनानी होगी क्योंकि "ओछे की प्रीत बालू की भीत" ही साबित होती है। 

ऐसी स्थिति में पाकिस्तान द्वारा तालिबानियों के माध्यम से भविष्य में भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने की आशंका से निपटने के लिए भारत के लिए क्या यह जरूरी नहीं हो गया है कि वह पंजशीर (अफगानिस्तान का एक महत्वपूर्ण प्रदेश) जिसने भारत सहित विश्व के देशों से सहायता की गुहार की है, वहां अपना सैनिक अड्डा स्थापित कर उसे सहायता देकर तालिबानियों पर अपना कुछ शिकंजा और नियंत्रण कर सके? कुछ सूत्रों के अनुसार अमेरिका वहां पर अपना सैनिक अड्डा स्थापित करने की सोच रहा है। भारत पूर्व में पूर्वी पाकिस्तान जो अब बांग्लादेश कहलाता है और श्रीलंका में अपनी सेना भेज चुका है। भौगोलिक दृष्टि से भारत के लिए महत्वपूर्ण एक और पड़ोसी देश ‘‘म्यांमार‘‘ में भी 1फरवरी 2021 को चुनी हुई सरकार का ‘‘तख्ता पलट‘‘ कर सैनिक शासन लागू हुआ था। तब भी वहां के नागरिक गण से लेकर विश्व, भारत से कुछ सक्रिय कदम उठाए जाने की आशा कर रहे थे,जो निराशा में बदल गयी। जैसा कि कहा भी आता है "भरोसे की भैंस पाड़ा ही जनती है"। 

चूँकि अफगानिस्तान में अब पुनः शासक बने तालिबान आतंकवाद के ‘‘पर्याय’’ रह चुके हैं व है। इसलिये आतंकवाद से लड़ने की नीति को भारत को बदलना होगा। "तेल देख तेल की धार देख" वाली नीति को छोड़ना होगा और आतंकवादियों की आतंकी कार्रवाई का रास्ता देखते हुए मात्र जवाबी कार्रवाई करने के बदले, भारत को अमेरिका और जर्मनी, इजराइल इत्यादि देशों से सीख लेते हुए आगे होकर मुख्य आतंकवादी और आतंकवाद के जनक को अमेरिका के समान उनकी मांद में घुसकर मार कर आना होगा, तभी हम देश से आतंकवाद की जड़ को मूल से समाप्त कर पाएंगे। ऐसा करने में भारत को  दिक्कत क्या है? यह बात आम नागरिकों के समझ से परे है। वर्तमान भारत एक शक्तिशाली देश है। देश के प्रधानमंत्री इस समय के विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय हेड ऑफ स्टेट है, यह सर्वे अभी हाल में ही आया है। प्रधानमंत्री मोदी 56 इंच का सीना लिए हुए हैं।" हाथी के पांव में सबका पांव होता है", क्योंकि कोई भी अंतरराष्ट्रीय कानून या प्रथा (कस्टम्स) भारत को घोषित आतंकवादियों को कहीं से भी पकड़कर मारने से नहीं रोकती है। ‘‘एक सिर के बदले दस/ सो गर्दन काट कर लाएंगे’’ ऐसे बयानवीर नेताओं को यह समझाना जरूरी है कि हमारी एक गर्दन भी क्यों कटे? इस संबंध में अमेरिकन सोच सोचने और विचारने की गंभीर आवश्यकता है। "मुंहबंद कुत्ता शिकार नहीं कर सकता", अतः पंचशीर की ‘‘नाॅर्दन अलायंस’’ को सहयोग देकर हम उक्त विषय में एक कदम आगे बढ़ने का संकेत अवश्य दे सकते हैं, जो भारत में तालिबान द्वारा आतंकवाद को बढ़ाने की आशंका को रोक सकता हैं। अंततः भारत को इस "असमंजता" से बाहर निकलना ही होगा कि क्या तालिबान एक संप्रभुता प्राप्त फौजी शासना देश है अथवा आतंकवादी शासित देश है? क्योंकि अफगानिस्तान में सत्तारूढ़ हुए तालिबानी मंत्रिमंडल में 37 में से 20  मंत्री संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकवादी व्यक्ति हैं ।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

31 अगस्त! अमेरिका ‘‘आतंकवाद’’ को ‘‘समाप्त’’ या ‘‘मजबूत’’ करने के लिए ‘‘जिम्मेदार’’ माना जायेगा?

विश्व की 3 प्रमुख शक्तियों में से एक, बल्कि कुछ एक मामलों में तो दोनों प्रभावशाली देशों चीन व रूस से भी ज्यादा बड़ी महाशक्ति अमेरिका है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम से जानी जाती है। यह महाशक्ति अतीत में विभिन्न मामलों में विश्व के विभिन्न देशों को अपनी शर्त्तो को मनवाने के लिये चेतावनी व डेडलाइन देती रही है। परन्तु ‘उल्टी गंगा’ देखिये! एक छोटे से ‘‘तालिबान’’ ने अफगानिस्तान की जमीन से समस्त विदेशी सैनिकों की वापसी की 31 अगस्त की डेडलाइन (समय सीमा) देकर और उसका समयावधि के समाप्त होने के 24 घंटे पूर्व ही सुपर पॉवर अमेरिका, रूस, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नाटो देश सहित समस्त विदेशी फौजों की रवानगी कराकर डेडलाइन का पालन करवाकर अपनी ताकत का लोहा मनवाकर विश्व को चौंका दिया। हमारी संस्कृति में एक बड़ी कहावत है ‘‘अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे’’ लेकिन अमेरिका के अम्यर्पण (लगभग समर्पण) ने इस मुहावरे को ही बदलकर ‘‘ऊट कंकड के नीचे’’ कर दिया है। स्वयं अमेरिका ने इसे विश्व का सबसे बड़ा एयर लिफ्ट बतलाया, जिसमें 123000 से ज्यादा लोगो को लिफ्ट कर अफगानिस्तान से बाहर लाया गया। 2 फरवरी 2020 के ‘‘दोहा’’ में अमेरिका (ट्रम्प प्रशासन) व तालिबान के बीच शांति समझौता होकर अमेरिका सेना की अफगानिस्तान से वापसी पर सहमती बनी थी, जिसके तारतम्य में अतंतः विदेशी सेनाओं की उक्त वापसी की कार्यवाही पूर्ण हुई।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यहाँ पर यह है कि अफगानिस्तान में 20 साल रहकर भी अमेरिका ने ‘‘क्या खोया और क्या पाया’’? एक तो यह निश्चित रूप से अमेरिकन नागरिकों के सोचने का विषय है। लेकिन दूसरा विश्व पर वर्तमान व आगे इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भी एक सोचनीय विषय है। 11 सितम्बर को अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के वर्ल्ड ट्रेंड़ सेंटर में ‘‘अलकायदा’’ द्वारा विश्व के इतिहास में सबसे बड़ा नुकसानदायक आतंकवादी हमला किया गया था, जिसमें 57 देशों के करीब 3000 (2996) लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। 9/11 के हमले के एक महीने बाद से ही अमेरिका ने 2 मई 2011 को (‘‘ऑपरेशन इंड्योरिंग फ्रीडम’’) के तहत तालिबान के खि़लाफ युद्ध छेड़कर अफगानिस्तान में चल रही तालिबानियों की सरकार को न केवल सत्ता से अपदस्थ कर नई सरकार का गठन किया, बल्कि 9/11 के लिए जिम्मेदार आंतकवादी नेता अलकायदा सरगना (प्रमुख) ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के भीतर घुसकर एबटाबाद शहर में निस्तनाबूद किया। 

इस लड़ाई में अमेरिका ने न केवल अपनी सेनाएं बल्कि करोड़ों की संख्या व अरबों डॉलर के अत्याधुनिक हथियार, साजो समान जैसे एम 16 असाल्ट रायफलें, माइन गाडी़ बख्तरबंद गाडियां, ब्लैक हॉक, हेलीकॉपटर, फाइटर बांबर आदि अमेरिकन व अफगानिस्तान के सैनिकों को उपलब्ध कराता रहा। एक अनुमान के अनुसार तालिबान से लड़ाई में अमेरिका अभी तक 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च कर चुका है। अमेरिका पर हुये इस आतंकवादी हमले के 20 वर्ष पूरे हो रहे है। तब यह प्रश्न बेहद प्रांसगिक हो जाता है कि 31 अगस्त को अमेरिका ने अफगानिस्तान को छोड़ते समय ‘‘कसाई के खूंटे’’ से बांधकर जाते-जाते विश्व को क्या दिया? 

सबसे दुभार्गयपूर्ण व चिंताजनक स्थिति विश्व के लिए 31 अगस्त को जो बन रही है, उसने चिंता में ड़ाल दिया है। वह यह कि अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान छोड़ते समय इन घातक हथियारों को न तो पूर्णतः नष्ट ही किया गया और न ही अमेरिकन सैनिक इन्हे अपने साथ ले गये। बल्कि ऐसा लगता है कि वे हथियार उन तालिबानियों को अमेरिकन सौनिकों को सुरक्षित जाने देने के रास्ते के बदले में चौथ वसूली के रूप में सौंप दिये गये है। कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने फायटर हेलीकॉप्टर व प्लेन को निष्क्रिय किया है। लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि ये निष्क्रिय किये गये हथियार सुधारे जाने योग्य होकर उपयोग लायक है कि नहीं? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका अपने लड़ाकू एयरक्राप्ट को उड़ाकर वापिस अमेरिका क्यों नहीं ले आये? अफगानिस्तान से अमेरिका के निकलने की इससे बेहतर नज़ीर और कुछ हो नहीं सकती है कि‘‘निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन, बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’’। 

तालिबानी मूलतः आंतकवादी रहे हैं जो एक कट्टर सुन्नी इस्लामिक संगठन है। जिसे वर्ष 1994 में पाकिस्तानी आएसआई की छत्र छाया में ही आतंकवादी मुजाहिद कमांडर मोहम्मद उमर ने स्थापना की थी। तालिबानियों की पहचान पूरे विश्व में एक आंतकवादी संगठन के रूप में रही है। जब पहली बार तालिबानी अफगानिस्तान में सत्ता में आये, तब मात्र तीन इस्लामिक देशों पाकिस्तान, सउदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात ने ही मान्यता दी थी। जबकि आज जब लगभग 90 देशों ने सुरक्षित निकलने के लिए तालिबानियों ने समझौता किया है। यद्यपि ‘‘सज्जनों और दुर्जनों’’की मैत्रीछाया रूपी होती है किंतु विश्व में तालिबान की स्थिति और उसके प्रति विश्व दृष्टिकोण में यह अंतर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इससे भारत का सबसे ज्यादा चिंतित होना स्वाभाविक हैं। क्योंकि वह पहले से ही पाकिस्तानी आंतकवादियों से जूझ रहा है, उनका सामना कर रहा है। तालिबानियों को भी पाकिस्तान की जमीन से लेकर हथियारों व पैसों तक का संरक्षण प्राप्त रहा है। क्योंकि ‘‘चूहे का जाया बिल ही खोदता हैं’’। चूंकि पाकिस्तानी मूल की तुलना में पंख्तून ज्यादा बहाद्दुर व उग्रवादी होते है। अंतः उनके आतंकवादी होने पर भारत के लिए समस्या का बढ़ना स्वाभाविक है। प्रेसीडेंट जो बाइडेन ने तालिबान की तुलना में अलकायदा व आएसआइएस को ज्यादा खतरनाक आतंकवादी संगठन बतलाया है। जिससे अमेरिका का पूर्णतः स्वार्थ प्रकृट होते दिखता है। 

प्रश्न यह उठता है कि क्या अमेरिका को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में इस बेहद गैर जिम्मेदाराना व्यवहार व पूर्ण स्वार्थ से भरी कार्यवाही के कारण आतंकवाद को मजबूत करने के लिये मजबूत खुराक देने के लिये जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा? यह अधिकार किसी भी देश को नहीं है कि अपने वतन के लोगों की जान बचाने के लिए दूसरे वतन के लोगों की जान की सुरक्षा को खतरे में ड़ाले। भारत सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद पर विराजमान है। देश का नेतृत्व एक मजबूत और विश्व में अपनी मजबूती के लिए जाने जाने वाले नरेंद्र मोदी के ह़ाथों में है। दोहा में तालिबान प्रतिनिधि व भारतीय राजदूत के बीच हुई औपचारिक मुलाकात-बातचीत का स्वागत किया जाना चाहिये। चूंकि उक्त बातचीत तालिबान के पहल पर की गई, मतलब ‘निंद्रा’ से भारत को उसी तालिबान ने उठाया जिन्हे ही निंद्रा के लिये जिम्मेदार माना था, जैसा कि मैने पूर्व में लिखा था। भारत की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा परिषद की बैठक में अफगानिस्तान की धरती का आतंकवाद के लिये उपयोग न होने का प्रस्ताव उपस्थित 13 सदस्यों की सर्वसम्मति से पारित हुआ है। तथापि चीन व रूस इसमे अनुपस्थित रहे। विश्व के देशों के नागरिक व सरकारें यह उम्मीद करती है कि भारत अपना रोल इस समय बखूबी निभाएं। 

धन्यवाद।

बुधवार, 1 सितंबर 2021

भारत की अफगानिस्तान-तालिबान ’’नीति’’? भारत कब ’’कुंभकरणीय नींद’’ से जागेगा?

 

अमेरिका सेना की वापसी के प्रेसीडेंट ‘‘जो बाइडन’’ के निर्णय के परिणाम स्वरूप अफगानिस्तान में नई तालिबानी हुकुमत का शासन होकर वह जब से स्वतंत्र हुआ है और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में तालिबान ने अपना झंडा फहराकर एक प्रदेश पंजशीर घाटी को छोडकर शेष प्रदेशों पर रा प्रायः अपनी हुकुमत स्थापित की हैं। तब से ही मेरे कई सहयोगी और मीडिया मित्रों ने मुझ से बार-बार यह अनुरोध किया कि ’’तालिबान’’ पर आपका अभी तक कोई लेख नहीं आया है, जबकि ज्वलंत विषयों पर प्रायः आपके लेख आते हैं। अतः आप इस विषय पर एक लेख जरूर लिखिए। 
वास्तव में अफगानिस्तान में लगभग 2300 अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने के बाद अमेंरिका सेना की वापसी के साथ ही तालिबानी-अफगानिस्तान संबंधी “इतनी अधिक बहुआयामी सामग्री“ भारत सहित विश्व पटल पर मीडिया के विभिन्न माध्यमों से आ चुकी हैं कि लेख लिखने की हिम्मत ही नही कर पाया। वैसे भी वरिष्ठ सम्मानीय पत्रकार स्तंभ लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष डॉ वेद प्रताप वैदिक (जिन्होनें मेरे लेखों के संकलन की किताब ‘‘कुछ सवाल जो देश पूछ रहा है आज?’’ का विमोचन किया था), विदेश नीति मामलों के विशेषज्ञ, खासकर भारत-अफगान नीति के मर्मज्ञ माने जाते हैं। वे अभी तक इस विषय पर 5 लेख लिख चुके हैं, जहां पर डॉ वैदिक ने भारत-अफगान-तालिबान नीति की सारगर्मित विवेचना की है। इस कारण से भी लेख लिखने की जरूरत महसूस नहीं हुई। फिर भी डॉ. वैदिक द्वारा विस्तार से लिखे गए मुद्दों को स्वीकारते हुए इस लेख में मैं कुछ अनछुए भावों को लेकर यह लेख डॉ. वैदिक को समर्पित करता हूं। लेख इसलिए भी लिख रहा हूॅ कि मेरे शुभ चिंतकों द्वारा स्वयं मुझ पर भी कुंभकरण की नींद के आरोप न लग जायें, जैसा कि इस लेख में सरकार पर लग रहे हैं।
एक कहावत है ’’दीवाल पर जो इबारत लिखी हो, उसे व्यक्ति ने हमेशा पढ़ना चाहिए’’ चाहे वह उसके कितनी ही खिलाफ क्यों न लिखी गयी हो। तभी भविष्य में उस मुद्दे व समस्या से निपटा जा सकता है। ’’तालिबान’’ के मामले में उक्त मुहावरा वर्तमान में भारत सरकार पर “सटीक“ सा बैठता है। विश्व में खासकर पडोसी देशो में हो रही राजनैतिक अस्थिरता, आंतरिक युद्ध व सत्ता पलट की स्थिति में देश के नेतृत्व का सबसे बड़ा कर्त्तव्य व सर्वोपरि जिम्मेदारी अपने राष्ट्रीय हितों की अनिवार्य रूप से रक्षा करना होती हैं। दुर्भाग्यवश भारत पडोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा (रूस-अमेरिका को घुटने टिकवाकर) रचे गये इतिहास को सिर्फ इसलिए पढ़ने का प्रयास नहीं कर रहा हैं, कि तालिबान को वह दुश्मन देश मानकर (जो वास्तव में है भी), उसके वर्तमान अस्तित्व को स्वीकार करने की मनोदशा फिलहाल भारत की लगती नहीं है। तथापि तालिबान समस्या से विश्व में सबसे ज्यादा लंबे समय तक प्रभावित यदि कोई देश रहेगा तो वह सिर्फ ‘‘भारतीय महाद्वीप’’ का देश भारत ही है। क्योंकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओकेे) की 106 किलोमीटर की सीमा अफगानिस्तान से लगती हैं। जैसा कि जी-7 समिट (शिखर सम्मेलन) के अध्यक्ष ब्रिटिश सांसद टोम टंगनधात सहित कई सांसदों ने अफगान समस्या पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक में भी भारत को बुलाए जाने की जोरदार वकालत की। भारत-अफगान के संबंध बहुत पुराने रहे हैं और इन में उतार-चढ़ाव भी आते रहे है। 
अफगानिस्तान में 5 साल तक तालिबानियों के सत्ता में रहने के बाद वर्ष 2001 में अमेरिकी नेतृत्व की सेना ने तालिबान को अफगानी सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था। पूर्व में भी 10 साल तक रूस भी अफगानिस्तान में रहा लेकिन तालिबान लड़ाकों के आगे झुक कर वहां से रूस को भी हटना पड़ा। लेकिन जब से तालिबानियों का अफगानिस्तान में 20 साल बाद पुनः कब्जा हुआ है, तब से ही भारत “भई गति सांप छछूंदर केरी“ की अवस्था में है। क्योंकि पाकिस्तान द्वारा भारत में खासकर कश्मीर में संचालित आतंकवादियों की गतिविधियों के साथ और एक गैंग पाकिस्तान की ‘‘अंगूठी की नगीना“ तालिबानियों की, वह भी पाकिस्तान द्वारा पोषित होेने के कारण भारत के लिए निश्चित रूप से चिंता का यह एक बड़ा विषय है। लेकिन इस कटु सत्य को तो हमें स्वीकार करना ही पडे़गा कि तालिबानियों का अफगानिस्तान पर लगभग पूर्ण कब्जा व नियन्त्रण होकर वे अब उसके “शासक“ हो गये है। अतः हम जब तक उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते है, तब तक हम उससे निपटने के लिए सही कारगर नीति नहीं अपना पायेंगें। “ए ब्लाइंड मैन इज़ नो जज ऑफ कलर्स“। तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने पर इसे तालिबानियों ने स्वतंत्रता की जीत बताया है। इसलिए भारत की ओर से एक “त्वरित कूटनीतिक प्रतिक्रिया व पहल“ की आवश्यकता थी, जिसके अभाव में देश की विदेश नीति पिछड़ गई है, ऐसा लगता है।
 मीडिया द्वारा भाजपा प्रवक्ताओं से इस संबंध मेे बार बार प्रतिक्रिया पूछे जाने पर जवाब में अधिकृत राजनयिक प्रतिक्रिया देने से बचते हुये यही कहा कि भारत की प्रथम प्राथमिकता अपने देश के नागरिकों को सुरक्षित वापस देश लाने की है। (जो “आपरेशन देवी शक्ति“ द्वारा नागरिको को वापस लाया भी जा रहा हैं।) दूसरी अफगानिस्तान में अभी सरकार का गठन ही नहीं हुआ है। यह एक प्रकार से विदेश नीति को विभाजित करने का प्रयास मात्र ही है, क्योंकि यह दोनों ही मुद्दे अंततः विदेश नीति का ही तो भाग है। अतः ये दोनों ही तर्क बेहद लचीले और भारत जैसे सार्वभौंमिक राष्ट्र की विश्व में वर्तमान मजबूत स्थिति को देखते हुए व अफगानिस्तान में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका के रहने के कारण उचित प्रतीत नहीं लगती है। “ये पर्दा छुपाता कम और दिखाता ज्यादा हैं’’। खासकर जब भारत सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष हो, जिसका कार्य ही विश्व के राट्रों को आतंकवादियों व विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करना है। स्वयं सुरक्षा परिषद ने अफगानिस्तान की राजधानी काबूल पर तालिबान के कब्जें के तुरंत बाद 16 अगस्त को जारी बयान की तुलना में दो हफ्ते में ही 27 अगस्त को अफगानिस्तान के संबंध में जारी विज्ञप्ति, में ‘तालिबान’ शब्द का उपयोग आश्चर्यजनक रूप से नहीं किया। ऐसी स्थिति में हम भारतीय नागरिक हमारे विदेश नीति निर्धारको से कुछ ज्यादा ही उम्मीद रखते हैं।
              हमारे देश के प्रधानमंत्री को विश्व की प्रमुख महाशक्तियों के राष्ट्राध्यक्षों से भी कई मामले में आगे बताया जाता है। और वास्तव में हमारे प्रधानमंत्री की क्रियाशीलता व बौद्धिक क्रियाकुशलता के कारण विश्व पटल पर उन्होनें अपनी व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण छाप अवश्य छोड़ी है। ऐसे मजबूत प्रधानमंत्री के रहते हुए ऐसी लचर अफगान नीति क्यों? पूरे विश्व को ज्ञात हैं कि 3-4 प्रमुख तालिबान नेताओं के बीच ही सत्ता की भागीदारी होना है, जिन्होने अमेरिकी सेना से टक्कर लेकर अपना लोहा बनवाया। मोहम्मद उमर के साथ मिलकर मुल्ला बरादर ने वर्ष 1994 में एक सुन्नी इस्लामिक कट्टरपंथी राजनीतिक आंदोलन पाकिस्तानी ‘‘आएसआई’’ (इंटर सर्विसेस इंटिलिजेंस) की सहायता से तालिबान (तालेबान) स्थापना करने के बाद, बर्तमान में मुल्ला बरादर ही तालिबान के प्रमुख नेता हैं।
 जब रूस और अमेरिका जिसने पहले तालिबान को जन्म देकर पुष्ट किया, फिर नष्ट करने का प्रयास किया। बावजूद इसके दोनो देश अफगानिस्तान में भी तालिबानियों के पुर्नस्थापित होने से तालिबानी नेताओं से न केवल प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष संपर्क रख रहे हैं, बल्कि तालिबानी अफगानिस्तान को मान्यता देने की भी सोच रहे हैं। तब हमारा देश राजनैतिक संवाद स्थापित करने में लगभग अक्रमणय की स्थिति में क्यों हैं? देश के विपक्षी दलों की स्थिति भी कमोवेश यही है। प्रधानमन्त्री द्वारा अफगान समस्या पर चर्चा के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों ने कोई ठोस सकारात्मक सुझाव सरकार को इस अक्रमणयता व असमंजस की स्थिति से निकलने के लिए नहीं दिये। इससे लगता है कि इस तालिबानी-अफगान समस्या ने देश के सभी नेताओं की राजनयिक सोच को लकवा मार दिया हैं। यह स्थिति कब तक बनी रहेगी, यह एक भारी प्रश्न है? जो न केवल हमारे देश की साख को विश्व में प्रभावित कर रही हैं। बल्कि अंततः लंबे समय में भारत-अफगान रिश्तों के संबंध में हमारे देश के राष्ट्रीय हितों को भी प्रभावित करेगी। 
विदेशी मंत्री, रक्षा मंत्री या सरकार के प्रवक्ता की बजाय हमारे प्रथम रक्षा प्र्रमुख (चीफ ऑफ डिफेंस) (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत का बयान आया, जहां उन्होंने तालिबान को "20 साल पुराना वाला ही तालिबान" ठहराते हुये अप्रत्यक्ष रूप से तालिबानियों के खिलाफ लगभग धमकी भरा अंदाज में यह कहा कि अफगानिस्तान से भारत की ओर होने वाली गतिविधियों से देश में आंतकवाद जैसे ही निपटा जायेगा। यह अनावश्यक कथन होकर वर्तमान स्थिति को देखते हुये बुद्विमद्ता पूर्ण या औचित्य पूर्ण नहीं कहा जा सकता हैं। तथापि भारत की यह पहली अधिकृत प्रतिक्रिया मानी जा सकती हैं। वैसे भारत सरकार ने शाब्दिक प्रतिक्रिया न देते हुए अफगानिस्तान से अपने राजदूत वापस बुलाकर व दूतावास बन्द कर कार्य रूप में जो प्रतिक्रिया दी है, वह मौजूद विधमान परिस्थितियों को देखते हुए व भविष्य में हमारी अफगानिस्तान के साथ के रिश्तो को दृष्टिगत करते हुए उसमें एक रूकावट जरूर बन सकती हैं। 
जहां तक भारत का सवाल है, तालिबानियों ने अभी तक भारत के प्रति कोई धमकी या भारतीय नागरिकों पर कोई अत्याचार नहीं किए हैं, न ही ऐसी कोई मीडिया रिपोर्ट अभी तक की हैं। विपरित इसके  उन्होंने  अफगानिस्तान में चल रही विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने के लिए न केवल भारत से कहा हैं, बल्कि कश्मीर को भारत-पाक का आन्तरिक मामला भी बतलाया हैं। तालिबान के कमांडर शैख मोहम्मद अब्बास ने भारत के साथ आर्थिक व व्यापारिक संबंधो के साथ बेहतर संबंध बनायें रखने की इच्छा जाहिर की हैं। भारम अभी तक 23000 हजार करोड़ रू. से अधिक निवेश अफगानिस्तान में कर चुकी है। तथापि इन बयानों की “बिटवीन द लाइन्स“ पढ़ने पर मिले निष्कर्षाे के आधार पर तालिबानियों व उनके इरादांे (आशय) पर एकदम से विश्वास करना भी घातक हो सकता है। फिर भी हमारे अफगानिस्तान के साथ पूर्व अनुभव को लेते हुए, ख़ासकर तालिबान का हमारे प्रति घोषित/अघोषित और पूर्व कार्य प्रणाली को ध्यान में रखकर सरकार को आगे आकर कुछ सकारात्मक सक्रिय कदम अवश्य उठाने होंगे। संयमता जरूर बरतियें, जैसा कि सर्वदलीय बैठक में सरकार ने अपना पक्ष रखा हैैं। परन्तु असमंजता को दूर करना भी जरूरी हैं। चूंकि भारत के लिए तालिबान एक कैंसर जैसा हैं। अतः उसका इलाज भी वैसा ही करना पड़ेगा।
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मंगलवार, 31 अगस्त 2021

‘‘निजीकरण’’ की ओर बढ़ती सरकार! ‘‘स्वयं’’ का ‘‘निजीकरण’’ कब करेगी?


वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2021-22 के बजट में ‘‘एसेट्स मोनेटाइजेशन इनिशिएटिव’’ पर काफी जोर दिया था, जिसे कार्य रूप में परिणित करने के लिये 23 अगस्त को ‘‘नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन". (एनएमपी) (राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन) योजना लांच की। वित्तमंत्री ने ‘‘देश की पूंजी’’ "सरकारी सम्पत्ति" को विदेशी क्षेत्रों सहित "निजी क्षेत्रों" को  "लीज" पर देकर आगामी 4 वर्षो में लगभग 6 लाख करोड़ आय की योजना की परिकल्पना की घोषणा की। इनमें बिजली से लेकर राष्ट्रीय राज मार्ग, रेलवे, पेट्रोलियम पाइप लाइन, टेलीकॉम, खनन (माइन्स), एयरपोर्ट, पोर्ट, वेयरहाउस, स्टेडियम जैसे बुनियादी ढ़ाचे (कुल 8 मंत्रालय) शामिल है। किसी भी स्थिति में सम्पत्ति का “स्वामित्व“ सरकार के पास ही रहेगा। सिर्फ "अन या अडंर-यूटिलाइज्ड़ एसेट्स" (बेकार पड़ी अथवा कम उपयोग की गई सम्पत्ति) को ही निजी क्षेत्रों को देगी। तय निश्चित समय सीमा के पश्चात ’अनिवार्य’ रूप से दिया गया सम्पत्ति का प्रबंधन (कंट्रोल) निजी क्षेत्र को वापस सरकार को करना होगा। 

 सहसा ही यह विश्वास नहीं होता है कि क्या यह उस भाजपा का निर्णय है, जो "जनसंघ से लेकर भाजपा' तक के सफर में, सत्ता में आने के पूर्व तक, वर्ष 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेसी सरकार से प्रारंभ की गई निजीकरण व आर्थिक उदारीकरण की नीति केे सख्त खिलाफ थी। वर्ष 1991 में स्थापित “स्वदेशी जागरण मंच“ जिसे “संघ“(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का "आर्थिक विभाग" भी कहा जाता है, के माध्यम से “पर उपदेश कुशल बहुतेरे“ की तर्ज पर भाजपा ने  स्वदेशी आंदोलन कर इस नीति का पुरज़ोर विरोध किया था। "डंकन प्रस्ताव" के भाजपा के राष्ट्रव्यापी विरोध को लोग अभी तक भूले नहीं है। यद्यपि भाजपा जब पहली बार केंद्र की सत्ता में आयी थी, अर्थात अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रीत्व काल में भी निजी व विदेशी विनिवेश की नीति का समर्थन किया गया था। तथापि भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक व स्वदेशी जागरण मंच के जनक दत्तोपंत ठेंगड़ी का बाजपेयी जी की सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण की नीति को लेकर उनसे गहरे मतभेद थे।  

 देश की सम्पत्ति सार्वजनिक संस्थानों और प्राकृतिक संशाधनों को निजी हाथों में लम्बे समय के लिए चलाने के लिये ‘लाभ हानि’ सहित सौंपने की नीति को ’निजीकरण’ जो अब एक “राजनैतिक गाली“ व असुविधाजनक शब्द का रूप ले कर “मुन्नी से भी ज़्यादा बदनाम“ हो चुकी है, के बदले “लीज व मुद्रीकरण“ का ’नामकरण’ देकर सरकार उसे “जायज, उचित व आवश्यक’“ ठहरा रही है। तथापि वित्तमंत्री ने इस संपूर्ण मुद्रीकरण को "निजीकरण" मानने से स्पष्ट रूप से इंकार किया है। परन्तु बुनियादी ढ़ाचे के निर्माण के लिए इसे एक महत्वपूर्ण “वित्त पोषक“ जरूर बतलाया है। 51 प्रतिशत एफडीआई से लेकर एयरपोर्ट, रेलवे का निजीकरण का भाजपा पूर्व में विरोध कर चुकी है। कल्पना कीजिए कि “अंधे पीसें कुत्ते खांय“ की तर्ज पर आज लाल किला और रेलवे का आंशिक रूप से निजीकरण की ओर बढ़ाया गया कदम, यदि कांग्रेस सरकार के द्वारा उठाया गया होता तो, भाजपा देश में कितना बड़ा हंगामा खड़ा कर देती? 

‘‘परिर्वतन’’ का नारा देकर सत्ता में आने के बाद सिर्फ कुर्सी पर बैठे "चेहरों" का ही परिर्वतन हुआ है। सरकार की ‘नीति-रीति’ तो वही रहती है। चूंकि "कुर्सी" पर ‘‘सत्ता’’ की मजबूत पकड़ होती है, इसलिए वर्तमान में कुर्सी पर बैठा शासक कुर्सी को नहीं, बल्कि कुर्सी (सत्ता) अपने ऊपर बैठे ’शासक’ को अपने अनुकूल करती है।‘‘सत्ता’’ (कुर्सी) का यही सबसे बड़ा चरित्र होता है। अंततः लोकतंत्र में कुर्सी ही महत्वपूर्ण होती है। इस प्रकार लोकतंत्र के नाम पर जनतंत्र द्वारा जनता के साथ इसी तरह से मजाक होता रहेगा। इसलिये यदि आप ‘‘एनडीए’’ सरकार की तुलना ‘‘यूपीए’’ से करे तो, यूपीए सरकार की जो प्रमुख महत्वपूर्ण नीतियां थी, जिनका “एनडीए“ ने (विपक्ष में रहते हुये) विरोध किया था, वही नीतियां अब एनडीए के लिये “पवित्र गाय“ बन चुकी हैं, और कमोवेश वे सब नीतियों के ऊपर का "लेबल, रंग" बदलकर नया "रेपर" लगाकर लगभग वे ही नीतियां एनडीए सरकार ने लागू की है। इसीलिए कई लोगो को यह भ्रांति (कनफ्यूजन) भी है कि कहीं एनडीए यूपीए पार्ट-3-4 तो नहीं है? 

मुद्दा यहाँ फिलहाल मुद्रीकरण का है। वित्तमंत्री सीतारमण सहित सरकार के नुमाइंदे बार-बार स्पष्ट रूप से यह कहते-कहते थक चुके हैं कि सम्पत्तियों का स्वामित्व सरकार के पास ही रहेगा। कुछ समय के लिए निजी संस्थानों को सिर्फ "लीज" पर दिया जायेगा। और  लीज की निश्चित  समयावधि के समाप्त होने के पश्चात  प्रबंधन वापिस सरकार के पास आ जायेगा। " विक्रय व लीज" मैं निश्चित रूप से तकनीकि रूप से भारी अंतर है। परन्तु व्यवहार में 30-40-50 साल की लम्बी अवधि की लीज देकर "सम्पत्ति का हस्तातंरण" ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि सरकार नजूल जमीन को लीज पर 30 से 90 वर्ष के लिये देती है, जिस पर पट्टेदार स्थायी निर्माण कर लेता है व कभी भी सरकार पुनः प्रवेश (री एंट्री) नहीं करती है। लम्बे समय तक अचल-चल सम्पत्ति के उपयोग उपभोग कर पट्टेदार द्वारा मुनाफा कमाने के बाद उस सम्पत्ति की क्या कंडीशन (स्टेटस) रह जायेगी, इसकी कल्पना करना बमुश्किल नहीं है। वैसे भाजपा प्रवक्ता उक्त कदम उठाने के पक्ष में न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन (मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस) के सिंद्धान्त को उद्धत कर रहे हैं। परंतु सरकार यह बतलाने को तैयार नहीं है कि जिन संपत्तियों से "निजी क्षेत्र" मुनाफा कमाएंगे सरकार उनसे "मुनाफा कमाने" में क्यों असफल रही है? रोग का सही इलाज "तंत्र" बदलने में नहीं बल्कि तंत्र को सुधारने में है।

एक प्रश्न यहां उत्पन्न होता है कि वित्तमंत्री ने सरकारी-सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में “हमेशा“ समस्त निजी क्षेत्रों की कार्यकुशलता (एफिशिएंसी) को कैसे “बेहतर“ मान लिया? क्या अनिल अंबानी का उदाहरण सामने नहीं है? यदि वित्तमंत्री कार्यकुशलता पर यूएनडीपी द्वारा जारी पेपर्स का अध्ययन करती तो उन्हें यह ज्ञात हो जाता कि वोडाफोन-आइडिया जैसी टेलीफोन कंपनियां सहित अनेक प्रसिद्ध नामी निजि क्षेत्रों के संस्थान और उद्योगपति “एनपीए“ होकर दिवालियापन की स्थिति में आ गए हैं। अर्थात कार्यकुशलता, अक्षमता व कुप्रबंध की भागिता सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में है। लेकिन सरकार की प्राथमिकता गरीब जनता के आर्थिक हितों को संरक्षण देने के कारण होने से दोनों क्षेत्र की उक्त तुलना करना सही संदर्भित नहीं होगा। 

इससे भी बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि सरकार ने जो आगामी चार वर्षो में आय का आंकलन सार्वजनिक किया है, (स्वामित्व बिना बेचे) क्या वह वास्तविकता के नजदीक है या उसका धरातल पर उतरना संभव है? इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि आर्थिक तंत्र की बदहाली होने के कारण ही सरकार ‘तंत्र’ को चलाने से अपने हाथ खींच रही हैं। अर्थात “फटे कपड़े ग़रीबी आयी“। अतः सरकार यह निश्चित निष्कर्ष पर निश्चित रूप से पहुंच चुकी है कि इन संस्थानों द्वारा न तो लाभ कमाया जा सकता है और न ही लम्बे समय तक इन्हे लाभ में चलाया जा सकता है। इनके बेहतर आपरेशन व उपयोग के लिये व सरकार की अव्यवस्था के कारण हुई खस्ता आर्थिक हालात से निपटने का रास्ता उक्त मुद्रीकरण (निजीकरण) ही है। ताकि हम “पेपर पर मालिक बने रह कर मन के मोदक रूपी आत्म सुख“ पाते रहें।

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि निजिकरण की ओर बढ़ते इस रास्ते में “सामाजिक सुरक्षा“ का क्या होगा? सरकार हमेशा की तरह यह दावा अवश्य करेगी कि वह यह मुद्रीकरण की नीति लागू करते समय इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के  हितों की सुरक्षा के लिए निजी क्षेत्रों पर व्यापक प्रभावी प्रतिबंध लगायेगी ताकि “शोषण व एकाधिकार“ न हो सके। इसकी विस्तृत जानकारी वित्त मंत्रालय ने जारी 196 पेजों की 2 पुस्तिकाओं में दी है, जिसमें उक्त पाइपलाइन में आने वाले क्षेत्रों और उनसे होने वाली संभावित आय की गणना भी की गई है। प्रश्न कड़क प्रभावी नियम-कानून बनाने का नहीं है, बल्कि हमेशा की तरह उसे कड़कता से प्रभावी रूप से लागू करने की समस्या का है। 

मुद्रीकरण की नीति की घोषणा करते समय एक ओर पहलु पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया है कि उसके भी कुछ दायित्व व कर्तव्य ऐसे होते है, जहां आर्थिक लाभ-हानि की चिंता किए बिना जनता के प्रति अपने सामाजिक सरोकार को पूरा करने के लिए सरकार को आर्थिक (“अर्थ“के) अंकगणित को छोड़ते हुये कुछ आवश्यक कदम उठाने पडते हैं, जिसका आर्थिक बोझ आम जनों के हित में सरकार को वहन करना होता है। जो प्रायः निजी क्षेत्र लगभग बिल्कुल नहीं करते हैं। साफ है कि यह नीति इन संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों को तो “कसाई के खूंटे से बांधने के समान“ है। अतः इस योजना में सरकार कितनी सफल हो पायेगी फिलहाल इसका जवाब भविष्य के गर्भ में ही है। अच्छा सोचना, कल्पना करना और ऊंची उड़ान भरना गलत नहीं होता है। लेकिन यही सही भी तभी होता है, जब यह वास्तविकता के निकट हो, ताकि उसे धरातल पर उतारा जा सकें। अन्यथा मुंगेरीलाल के हसीन सपने के समान उसका भी यही हश्र होना लाजमी है।

 खराब तंत्र व्यवस्था के चलते सरकारी तंत्र और उस पर अप्रभावी, अदूरदर्शी व परिणाम विमुख सरकारी नीति व नियत्रंण के कारण यदि सरकार निजीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है, जैसे कि “भेड़ अपने ही मूंड़े हुए ऊन का कंबल ओढ़े“ और वैसे ही मुद्रीकरण का आवरण ओढ़कर कदम उठाने का ही विकल्प मात्र यदि सरकार के पास "शेष" रह गया है। तब सरकार के स्वयं के शासन तंत्र (शासक) में तो उससे भी ज्यादा खराबियां हैं। अतः तब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जो सरकार स्वयं के शासन तंत्र की खराबी को दुरस्त करने में असफल रही है, जिस कारण उक्त मुद्रीकरण का निर्णय लेना पड़ रहा है। तब क्या सरकार में भी सुधार के लिये इसी नीति का अनुसरण करते हुये ‘‘सरकार’’ को निजी हाथों में सौंप नहीं देना चाहिये? थोडा इंतजार कीजिए! जब सरकार को इन संस्थानों को निजी क्षेत्रों में प्रबंधन में सौंपने का निर्णय लेने में काफी समय लगा है। तब “सरकार का मूल्यांकन“ करने में तो कई गुना समय ज्यादा लगेगा ही। शायद यह कार्य इस कार्यकाल में न हो पाये तो अगले कार्यकाल में तो जरूर हो जायेगा? क्योंकि यह बात तो तय है सरकार का स्वयं के तंत्र को भी मजबूत, सुदृण और पूर्णतः निरोगी होना सुदृढ़ शासन/प्रशासन के लिये आवश्यक है।

अंत में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने पत्रकार वार्त्ता में राहुल गांधी की बार-बार देश बेचने की कही गई बात की आलोचना करते हुए उल्टे ही कांग्रेस सरकार के तीन निजिकरण के निर्णयों का  उद्धरण कर देश बेचने का प्रश्नवाचक चिन्ह उनकी दादी इंदिरा गांधी पर ही लाद दिया? यानी “हेड्स आई विन, टेल्स यू लूज़“!! तथ्यात्मक रूप से दागे गए प्रश्न “सही“ होने के बावजूद स्मृति ईरानी चतुराई से या यह कहें बेशर्मी से यह तथ्य छुपा गई कि तब कांग्रेस के उठाए गए उदारीकरण के उन कदमों पर तत्समय क्या भाजपा ने उसे देश हित में मान कर, ताली बजाकर पूरे देश में स्वागत किया था? संसद में प्रशंसा का प्रस्ताव लाया था? या तत्समय यूपीए नेत्री इंदिरा गांधी या कांग्रेसी प्रधानमंत्री की पीठ थपथपाई थी? तब क्या उक्त कदम के स्वागत के लिये स्वदेशी जागरण मंच का गठन हुआ था? स्मृति ईरानी भूल गयीं कि “कांच के घर में रह कर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंके जाते“। यद्यपि कांग्रेस प्रवक्ता द्वारा “प्रति प्रश्न“ न किए जाने से स्मृति ईरानी को आगे स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी और वे शर्मनाक (आकवर्ड) स्थिति का सामना करने से बच गई। राजनीति में सुचिता और  ईमानदारी का यह तकाजा है कि स्मृति ईरानी को यह जरूर बतलाना चाहिए था कि ततसमय भाजपा का विरोध "गलत" था और वैश्वीकरण की नीति सही थी, जिससे आज भाजपा समय की आवश्यकता अनुसार एक और अच्छे रूप में जनहित में जनता के सामने लायी है। इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि नीति चाहे कितनी ही देश हित में हो, विपक्ष में रहने पर उसका विरोध करना भी शायद “देश हित“ ही कहलाता है। वर्तमान विनिवेश, विदेशी सीधा निवेश (एफडीआई), मुद्रीकरण, निजीकरण, आर्थिक उदारीकरण या आप उससे अन्य कोई भी नाम दे दें, राजनीति के चलते भाजपा कांग्रेस दोनों आमने सामने खड़े न हो कर “बर्ड्स ऑफ द सेम फ़ीदर फ़्लॉक टुगेदर“ के समान एक दूसरे के पूरक होकर, परंतु देश के हितों के विरुद्ध जरूर खड़े दिखते हैं।

गुरुवार, 19 अगस्त 2021

ध्यानचंद "वि.(+)/(-)/(=)"? सचिन तेंदुलकर!


प्रधानमंत्री ने ओलंपिक खेलों में अर्जित उल्लेखनीय उपलब्धियों को ‘‘ध्यान’’ में रखते हुये ख़ासकर पुरूष व महिला हॉकी टीमों की असाधारण प्रर्दशन के साथ उल्लेखनीय सफलताएँ (ओलंपिक इतिहास में पहली बार महिला हॉकी टीम गत विजेता को हराकर सेमीफाइनल में पहुंची) मिलने पर‘‘ खेल का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘‘राजीव गांधी खेल रत्न’’ का नाम बदलकर ‘‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न‘‘ नाम करने की घोषणा की। परंतु यहां पर ‘‘किसी‘‘ को पुरस्कृत करने के बजाए ‘‘दूसरे‘‘ को तिरस्कृत करने की भावना ज्यादा दिखती है। अन्यथा नाम बदलने के बजाय एक नए राष्ट्रीय खेल पुरस्कार की घोषणा की जाती? आमतौर पर जब किसी को पदक देकर या उनके नाम के पुरस्कार की घोषणा कर सम्मानित किया जाता है, तब उनके लाखों करोड़ों प्रशंसकों में प्रसन्नता की लहर सी दौड़ जाती है। परन्तु यहां पर तो सर्वोच्च खेल पुरस्कार का नाम ध्यानचंद के नाम पर "स्थानापन्न" करने के निर्णय की जानकारी मिलने पर उनके प्रशंसको के सालों पुराने खुदरे घाव ‘‘भरे‘‘ न होकर ‘‘हरे भरे‘‘ हो कर "तरोताजा" हो गये। देश कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सूत्र, एक आवाज में सिर्फ और सिर्फ ध्यानचंद को ‘‘भारत रत्न’’ देने की माँग लंबे समय से करते चला आ रहा है। यह माँग तब और तेज हुई जब, देश में पहली बार ‘‘खेल‘‘ (स्पोर्ट्स) में वर्ष 2014 में क्रिकेट के ‘‘मसीहा‘‘ कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिया गया। ‘‘एक नजीर सौ दलीलों से बेहतर होती है‘‘। यद्यपि इसके पूर्व खेल में ‘‘भारत रत्न’’ देने की कोई प्रथा या नियम नहीं था।

मेरे कई साथियों ने कहा कि आज सचिन व ध्यानचंद की तुलना करने का समय नहीं आ गया है क्या? उनकी श्रेष्ठता की तुलना में आप लेख लिखिये। दोनों में से सर्वश्रेष्ठ कौन है? यह बतलाइये। वाल्मीकि रामायण में कहा गया हैः-‘‘अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः‘‘ अर्थात ‘‘अप्रिय किंतु सत्य बात कहने वाले वक्ता और श्रोता दोनों ही दुर्लभ होते हैं‘‘। मैंने कहा दोनों देश के सर्वकालीन अपने अपने क्षेत्र के बेजोड़ "हीरो (लीजेंड़)" है और उनकी तुलना करना उचित, सामयिक व संभव नहीं है। परंतु बारम्बार अनुरोध पर मैंने आगे तुलना करने का दुःष्साहसिक प्रयास किया है। आखि़र ‘‘ख़लक का हलक़ कौन बंद कर सकता है‘‘। किसी भी व्यक्ति की भावना को ठेस न तो मैं पहुंचाना चाहता हूं न ही यह उद्देश्य है। लेकिन जब लगातार यह कहां जाये कि सर्वश्रेष्ठ में सर्वश्रेष्ठ (बेस्ट ऑफ द बेस्ट) कौन है, तब यह कार्य भी करना पड़ता है।

ध्यानचंद अपनी करिश्माई खेल के कारण पूरे विश्व में हॉंकी के ‘‘जादूगर‘‘ कहलाये। वर्ष 1928 के अपने प्रथम ओलंपिक में ही ध्यानचंद द्वारा 14 गोल करने पर नीदरलैंड (हालैंड) के अधिकारियों ने शंका व्यक्त करते हुये कहा कि कहीं उनकी हॉकी में चुम्बक तो नहीं लगी हुई है? और वह आशंका निराधार पाए जाने पर उन्हे ‘‘हॉकी का जादूगर’’ कहा गया। विश्व के वे एक मात्र सर्व कालीन हॉकी के जादूगर कहलाए, क्योंकि उनके पहले और बाद में आज तक विश्व में कोई भी हाॅकी खिलाड़ी निसंदेह उन ऊंचाईयों, क्षमता और प्रतिभा को छू नहीं पाया है, जिसके लिये ध्यानचंद जाने जाते हैं। और उनकी अविच्छिन्न (अनवरत), पहचान, परसेप्शन, उन्हे विश्व का अभी तक का सबसे बड़ा हॉकी का खिलाडी के रूप में ‘‘पर्याय’’ व मिथक बनाती है। (भूतो न भविष्यति)

सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के ‘‘भगवान‘‘ कहे जाते हैं। विश्व क्रिकेट के इतिहास में सबसे ज्यादा रिकार्ड शायद उनके ही नाम से हैं। यद्यपि 20वीं सदी में सुनील गावस्कर ने कई विश्व रिकार्ड बनाकर क्रिकेट में भारत का झंडा गाड़ा था। तब यह कहा जाता था ‘‘सन्नी‘‘ जैसा कोई नहीं? लेकिन क्रिकेट खेल ही ऐसा है, जहां ‘‘रिकार्ड बनते ही तोड़ने‘‘ के लिए। इस कारण ‘‘लिटिल मास्टर‘‘ सुनील गावस्कर के रिकार्ड को सचिन तेंदुलकर ने तोड़कर विश्व क्रिकेट में अपना एक अलग स्थान बनाकर ‘‘मास्टर ब्लास्टर‘‘ कहलाए। परन्तु ऐसा लगता है विराट कोहली से लेकर वर्तमान में खेल रहे क्रिकेटरस, सचिन के समस्त नहीं तो कुछ  रिकार्डो को तो भंग कर (तोड़) सकते है। क्रिकेट व हॉकी के खेल में यह एक मौलिक अंतर है। एक तरफ जहां सामान्य कल्पना के बाहर कठिन रिकार्ड (हॉकी) बनाना मुश्किल होता है, वही दूसरी ओर (क्रिकेट) रिकार्ड तोड़ने के लिए ही बनाया जाते हैं और टूटते है। 

सचिन द्वारा बनाएं प्रत्येक रिकार्ड को यदि एक जगह समाहित किया जाए तो एक किताब लिखी जा सकती है। इन रिकार्ड दर रिकार्ड बनाने के कारण ही वे क्रिकेट के ‘‘भगवान‘‘ कहलाये। ‘‘भगवान‘‘ का अर्थ ‘‘आस्था‘‘ से जुड़ा है, जो एक ‘‘जीवन‘‘ आसमान की ओर टकटकी निगाहों से ‘‘भगवान‘‘ को महसूस कर अपनी आस्था को मजबूत कर अच्छे जीवन निर्वाह की ओर चल पड़ता है। वहीं दूसरी ओर जादूगर की ‘‘जादूगरी की कला से‘‘, कला प्रेमी जनता मोहित, मंत्रमुग्ध होकर उसको अपनाने का प्रयास करती है। इस प्रकार जादूगरी ‘‘उत्प्रेरणा‘‘ (उत्प्रेरक) का कार्य करती है। जबकि ‘‘भगवान प्रेरणा‘‘ का कार्य करते है। इन दोनों में आश्चर्य करने वाली विरोधाभासी दिखनी वाली स्थिति यह हैै कि ‘‘लौकिक’’ रूप से हम ‘‘भगवान’’ को ‘‘अलौकिक‘‘ रूप में देखते है। जबकि वास्तविकता में ‘‘भगवान‘‘ (सचिन तेंदुलकर) आज भी हमारे आँखों के सामने हैं। ईश्वर उनको खू़ब लम्बी आयु दे, ताकि लंबे समय तक वे क्रिकेटर्स के प्रेरणास्रोत बने रहें। विपरीत इसके ‘‘जादूगर‘‘ (हाॅकी के) जो ‘‘लौकिक‘‘ रूप में से ही जादूगरी दिखा सकता है, वह ‘‘अलौकिक‘‘ हो गए। अब उनकी यादों और वीडियो के माध्यम से ही हम उन्हे महसूस व देख सकते है। वास्तविक दर्शन नहीं कर सकते हैं। ‘‘जिंदगी भले ही एक ही पीढ़ी की होती है लेकिन शोहरत पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है‘‘। 

एक और कारण दोनों ध्यानचंद और सचिन तेंदुलकर के व्यक्तित्व को अलग ठहराती है। जर्मन शासक, तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने वर्ष 1936 ओलंपिक में ध्यानचंद के करिश्माई खेल के कारण जर्मनी को बुरी तरह से (8-1) से हराने पर ध्यानचंद को जर्मन नागरिकता, जर्मनी की तरफ से खेलने एवं मुहमांगी भारी धनराशी देने का प्रस्ताव किया था, जिसे उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए यह कहा था कि ‘‘मुझे भारतीय ही बने रहने दीजिये‘‘। चूंकि बात ब्रिटिश इंडिया के समय की थी, इसलिए बात ‘‘नागरिकता‘‘ तक जा पहुंची थी। परंतु सचिन स्वतंत्र भारत के जन्मे भारतीय नागरिक हैं। इसलिए उन्हें ध्यानचंद जैसी परिस्थितियों से गुजरना नहीं पड़ा। दोनों के बीच समय परिस्थितियों में जमीन आसमान का अंतर होने के कारण ही सचिन "लोकप्रिय ब्रांड" बन कर अरबों के मालिक हुए, तो ध्यानचंद ‘‘ठन ठन गोपाल‘‘। तथापि हाॅकी के कारण ही उन्हे सेना में पदोन्नती मिलती गई। सचिन को जब वर्ष 2014 में ‘‘भारत रत्न’’ दिया गया तब इलेक्ट्रानिक मीडिया का तुलनात्मक रूप से अत्यधिक विस्तार और प्रभावी होने के कारण तेंदुलकर सिर्फ क्रिकेट के ही नहीं बल्कि देश के एक बहुत प्रसिद्ध व लोकप्रिय व्यक्ति बन गये।

हाॅकी देश का राष्ट्रीय खेल है, (अधिकृत रूप से नहीं) तो क्रिकेट सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है। ‘प्रसिद्धि‘ का यह अंतर ही दोनों के व्यक्तित्व में भी अंतर ड़ालता है। 16 नवंबर 2013 में राजनैतिक दृष्टि व कारणों से वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए तत्कालीन शासक पार्टी ने ध्यानचंद के ज्यादा मजबूत दावे को तथा पीएमओं द्वारा दी गई लगभग स्वीकृति को दरकिनार करते हुए सचिन की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिये न केवल सचिन को भारत रत्न देने की घोषणा की गई। बल्कि इसके पूर्व उन्हे राज्यसभा में भी (वर्ष 2012में) नामांकित किया गया था। उन्हे "पद्मविभूषण व राजीव गांधी खेल रत्न" से भी नवाजा गया। इस प्रकार सचिन तेंदुलकर का अप्रत्यक्ष रूप से राजनैतिक उपयोग किया गया। सचिन ‘‘ढाई दिन की बादशाहत‘‘ को इंकार कर नहीं सके, जैसा कि ‘‘गायत्री परिवार‘‘ के प्रमुख डा. प्रणव पंड्या ने राज्यसभा से मनोनीत किए जाने का प्रस्ताव मिलने पर विनम्रता पूर्वकअस्वीकार कर दिया था। और यहीं पर सचिन का व्यक्तिगत व्यक्तित्व (खेल का नहीं) कहीं न कहीं तुलनात्मक रूप से ध्यानचंद की तुलना में कमोत्तर प्रतीत होता सा दिखता है।  

एक और अंतर दोनों के ‘‘नामकरण‘‘ को लेकर दिखता है। ध्यानचंद ‘द्ददा’ का मूल नाम ‘‘ध्यान सिंह‘‘ था। ध्यान सिंह को सेना के प्रशिक्षण से दिन में समय न मिल पानी से वे रात्रि में प्रकाश के अभाव के कारण चंद्रमा की रोशनी में अभ्यास करते थे, जिस कारण से उनका नाम ‘‘ध्यान चंद‘‘ हो गया। अर्थात ‘‘कर्म‘‘ के कारण उनका नाम "ध्यानचंद" हुआ। इसके विपरीत सचिन का नाम उनके पिता ने अपने चहेते तत्कालीन प्रसिद्ध संगीतज्ञ "सचिन देव बर्मन" के नाम पर किया था। 

अंत में विश्व क्रिकेट के "अजूबा", "मसीहा" कहे जाने वाले भीष्म पितामह "सर डॉन ब्रेडमैन" ने ध्यानचंद और सचिन के बाबत् जो कहा था उससे आपको दोनों व्यक्तित्व का मूल्यांकन समझ में आ जायेगा। ऑस्ट्रेलिया में एक मैच के दौरान ताबड़तोड़ गोल करने देख मैच समाप्ति के बाद डॉन ब्रैडमैन ने ध्यानचंद से कहा ‘‘आप तो ऐसे गोल कर रहे थे मानो रन बना रहे है’’। इसी प्रकार सचिन के बाबत् कहा था ‘‘वह सचिन में अपना ‘‘अक्श‘‘ देख रहे है’’। 

इस देश की "माटी के दोनों लालों" के द्वारा देश का नाम "विश्व पटल" पर पहुंचाने के लिए मैं उन्हे प्रणाम करता हूं। और साधुवाद।

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

‘‘खेल‘‘ में भी खेल-खेल में ‘‘खेला‘‘ होवे?


टोक्यो में चल रहे ओलंपिक में भारत को मिले पदकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सीधे संवाद (‘‘इंटरैक्ट‘‘) करके अथवा ट्वीट्स के माध्यम से खिलाड़ियों का उत्साह लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। आमतौर पर मीडिया से सीधा संवाद ‘‘स्थापित‘‘ करने से ‘‘परहेज‘‘ रखने वाले हमारे प्रधानमंत्री अन्य मामलों में ख़ासकर देश को उपलब्धि दिलाने वाली स्पर्धाओं व आयोजनों (इवेंट्स) में भाग लेने वाले व्यक्तियों से जितना सीधा संपर्क रखते हैं, उतना पूर्व में हमने कभी भी किसी प्रधानमंत्री को रखते हुए नहीं देखा है। ‘‘शासक‘‘ और ‘‘शासित‘‘ के बीच जीवंत, जीवट संपर्क को बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से प्रधानमंत्री साधुवाद के पात्र हैं। 

इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने लोगों के आयेे ‘‘आग्रह‘‘ की ‘‘भावनाओं‘‘ को देखते हुए ‘‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार‘‘ के नाम से राजीव गांधी के नाम को ‘‘स्थानापन्न‘‘ कर ‘‘हॉकी के पर्याय‘‘ बने ‘‘मेजर ध्यानचंद‘‘ के नाम पर रखने के निर्णय की जानकारी ट्वीट करके दी है। जबकि देश प्रधानमंत्री से मेजर ध्यानचंद को और सम्मानित व गौरवान्वित करने के लिए उनके नाम को ‘‘प्रतिस्थापित‘‘ द्वारा नहीं बल्कि ‘‘भारत रत्न‘‘ के लिय ‘‘स्थापित‘‘ करने की उम्मीद लगाए हुए था? यह तो ‘‘भूखे को ‘‘बासी’’/‘‘जूठी’’ रोटी‘‘ खिलाकर जिम्मेदारी पूर्ण करने का दावा जैसी बात हुई। जैसा कि इस देश में हमेशा से होता आया है, स्वागत और आलोचनाओं के फूल और कांटे बिछाने (बयान आने) शुरू हो गए हैं। अर्थात गिलास आधा खाली है या भरा है, इसका आकलन होना प्रारंभ हो गया है। उक्त निर्णय ऊपर से जितना आकर्षित करता है, गहराई में जाने पर वैसा न होकर आप यह महसूस करेगें कि उक्त निर्णय कितना ‘‘अधूरा‘‘ है और ‘उत्साहित‘ व ‘‘सम्मान‘‘ करने के बजाय ‘‘उपहास‘‘ व ‘‘अपमानित‘‘ करने वाला है। कैसे? आगे देखते हैं।

आप जानते हैं कि खेल का देश का सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार ‘‘राजीव गांधी खेल रत्न‘‘ पुरस्कार है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार देश का सर्वोच्य बड़ा ‘‘नागरिक‘‘ पुरस्कार ‘‘भारत रत्न‘‘ है, सेना की सर्वोच्च रैंक ‘‘फील्ड मार्शल‘‘ (जो एक सम्मान है), युद्ध के मैदान में ‘‘परमवीर चक्र’’, शांति के दौरान सैन्य सेवा में धैर्य व साहस के लिए ‘‘अशोक चक्र’’, सिनेमा जगत (फिल्मी कलाकार) का ‘‘दादा साहेब फाल्के’’, साहित्य क्षेत्र का ‘‘ज्ञानपीठ’’ एवं साहित्य अकादमी इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों के सर्वोच्च पुरस्कार है। ‘‘हॉकी के जादूगर‘‘ कहे जाने वाले हॉकी का पर्याय बने मेजर ध्यानचंद का वास्तविक नाम ध्यान सिंह था। दिन में सेना के प्रशिक्षण में लगे रहने के कारण समय कम होने व रात्रि में ही प्रकाश के अभाव में चंद्रमा की रोशनी में अभ्यास करने के कारण उनका नाम ध्यान चंद पड़ गया। जहां तक देश द्वारा ‘‘ओलंपियन ध्यानचंद’’ को सम्मान देने की बात है, ऐसा नहीं है कि इस दिशा में पहले कोई भी कदम नहीं उठाया गया। पहला सार्थक कदम 1956 में देश का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म भूषण‘ देकर किया गया। तत्पश्चात तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 2012 में ध्यानचंद की ‘‘जयंती‘‘ 29 अगस्त को प्रत्येक वर्ष ‘‘राष्ट्रीय खेल दिवस’’ के रूप में मनाने की घोषणा करके की। क्या मेजर ध्यानचंद मात्र एक हॉकी खिलाड़ी ही थे? हिटलर की जर्मन नागरिकता व सम्मान देने के प्रस्ताव को ठुकराने वाले ध्यानचंद क्या देश को अभूतपूर्व, अपूरणीय योगदान देने के कारण एक सम्मानित नागरिक की हैसियत से सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘‘भारत रत्न‘‘ पाने के हकदार नहीं है? ‘‘लाल गुदड़ियों में नहीं छुपते‘‘। यहां ध्यान चंद के ‘‘हक़‘‘ से ज्यादा देश के करोड़ों नागरिकों की सर्वसम्मत इच्छा, प्रसन्नता व आत्म संतुष्टि का भी सवाल है? 

देश में हॉकी, जो कि वर्ष 1926 के पूर्व से खेली जा रही है, की पहचान विश्व में भारतीय खेल के रूप में क्या क्रिकेट की तुलना में ज्यादा नहीं है? जिसका पूरा श्रेय ध्यानचंद को ही जाता है। क्रिकेट जो कि अंग्रेजों का खेल कहा जाता है, शायद अंग्रेजों की गुलामी में रहने के कारण उस मानसिकता के कुछ अंश अभी भी शेष रहने से हमने ‘‘अंग्रेजियत खेल क्रिकेट‘‘ में तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 2013 में (खेल दृष्टि से नहीं बल्कि 2014 में होने वाले आम चुनाव की दृष्टि से) नियम में परिर्वतन कर भारत रत्न दिया। जबकि तत्समय पीएमओ की स्वीकृति पहले ध्यानचंद के नाम पर मिल चुकी थी (एक आरटीआई एक्टिविसट हेमंत चंद दुबे की रिपोर्ट के अनुसार)। इसी को कहते हैं ‘‘अशर्फियों की क़ीमत नहीं और कोयलों पर मुहर‘‘। इसके पूर्व खेल में भारत रत्न दिए जाने का कोई नियम या प्रथा नहीं थी। आज भी विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘‘नोबेल पुरस्कार‘‘ ‘‘खेल‘‘ को छोड़कर अन्य कई क्षेत्रों में है। पत्रकारिता, लेखनी, साहित्य, संगीत, कला, फिल्म, विज्ञान इत्यादि अनेकानेक क्षेत्रों में अपने-अपने स्वतंत्र सर्वोच्य पुरस्कार होने के बावजूद इन क्षेत्रों में कार्य करने वालो मे से कई सम्मानीय नागरिकों को भारत रत्न पुरस्कार से समय-समय पर नवाजा गया। परंतु विश्व में भारतीयता की पहचान का डंका बजाने वाली हॉकी के लिए विश्व ने दिये ‘‘अलंकरण‘‘ ‘‘हॉकी के जादूगर’’ को नजर अंदाज कर सरकारों का मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने पर ‘‘ध्यान पूर्वक ध्यान‘‘ अभी तक क्यों नहीं गया, यह समझ से परे है। जबकि ‘‘ख़ुशबू को अत्तार की सिफारिश की जरूरत नहीं होती‘‘।

प्रधानमंत्री द्वारा लिया गया उक्त निर्णय ‘‘सम्मान‘‘ के बजाय मेजर ध्यानचंद के साथ-साथ खिलाड़ियों का ‘‘उपहास‘‘ और ‘‘अपमान‘‘ ज्यादा दिखता है। जिस व्यक्ति (लीजेंड) को आप स्वयं देश के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न के योग्य नहीं मान रहे हैं, जिसकी न्यायोचित मांग पूरे देश में काफी समय से की जा रही है। तब उस (सरकार द्वारा) ‘‘असम्मानित‘‘ (भारत रत्न के लिए) व्यक्ति के नाम से आप दूसरों को ‘‘सम्मानित‘‘ कैसे महसूस कर व करा सकते हैं, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है? यानी ‘‘हेड्स आई विन, टेल्स यू लूज‘‘। प्रधानमंत्री जब यह कहते हैं कि लोगों की आग्रह की ‘‘भावनाओं‘‘ के अनुरूप यह निर्णय लिया गया है, तो उनको यह भी बतलाना चाहिये कि उक्त खेल सम्मान का नाम राजीव गांधी हटाकर मेजर ध्यानचंद रखने के लिये कितने लोगों ने कब और कैसे उक्त आग्रह किया? और उससे ‘‘कम‘‘ संख्या में लोगों ने ध्यानचंद को भारत रत्न देने की वक़ालत की क्या? 

आखि़र भारत सरकार ध्यानचंद को भारत रत्न क्यों नहीं देना चाहती है, इसका ‘‘व्हाइट पेपर‘‘ जनता के बीच जारी होना चाहिए (क्योंकि इसके पूर्व सरकार में बैठे कई नुमाइंदे महत्वपूर्ण विषयों पर व्हाइट पेपर जारी करने की मांग करते रहे हैं)। ताकि जनता उनके द्वारा चुनी गयी लोकप्रिय सरकार की उस भावना, तर्क व युक्तियुक्त कारण को समझ सके? इससे जनता को यह भी ज्ञात हो सकेगा कि प्रधानमंत्री से भारत रत्न की मांग करने वाले नागरिकों की तुलना खेल रत्न का नाम बदलने वालो की संख्या ज्यादा है? तभी तो लोकप्रिय प्रधानमंत्री ने ज्यादा लोकप्रिय मांग को स्वीकार कर ‘लोकतंत्र’ को सम्मान दिया। तदनुसार देश की जनता का ‘‘ध्यान‘‘ ध्यानचंद को ‘‘भारत रत्न‘‘ दिलाने से भंग होकर हट जाएगा? ताकि ‘‘चंद‘‘ (‘ध्यान’ तो रहा/रहे नहीं?) ताली पीटने वाले  अपने को सही ठहरा सके।

देश और ध्यानचंद का शायद यह दुर्भाग्य ही कहलायेगा कि ब्रिटिश भारत को तीन ओलंपिक में एकमात्र पदक तीन-तीन बार ‘‘स्वर्ण‘‘ दिलाने वाले जादूगर ध्यानचंद ‘‘स्वाधीन देश‘‘ से स्वर्ण  प्राप्त करने में तीन-तीन बार चूक कर ‘‘चांदी/कांस्य‘‘ का मेडल ही प्राप्त कर ‘‘मुट्ठी भर आसमान से ही संतोष‘‘ कर देश के कर्णधारों की ‘‘चांदी‘‘ कर दी। प्रथम 1956 में पदम विभूषण मिलने पर, फिर वर्ष 2012-13 में राष्ट्रीय खेल दिवस उनके नाम पर घोषित होने पर और तत्पश्चात सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने पर और आज राजीव गांधी खेल पुरस्कार का नामकरण उनके नाम पर होने पर। जिस प्रकार पुरूष व महिला हाॅकी टीमें गत विजेताओं को हराकर सेमीफाइनल में पहुंच कर स्वर्ण से चूक गईं, उसी प्रकार आज फिर ध्यानचंद स्वर्ण (भारत रत्न मरणोपरांत) से चूक गये। ‘‘कहते हैं कि गलती ख़ुद अंधी होती है लेकिन वह ऐसी संतान पैदा करती है जो देख सकती है‘‘। 

ऐसा लगता है ‘राजनीति’ का ‘‘खेला होवे’’ का कीड़ा, क्रीडा, (खेल) में ‘‘खेल खेल’’ में भी लगा दिया गया है। जहां तक खेल पुरस्कारों का नामकरण राजनेताओं के नाम पर होने का प्रश्न है, वहाँ समस्त राजनैतिक पार्टियों की सरकारों की भागीदारी रही है व वे सब एक ही प्लेटफार्म पर खड़ी हैं। इस प्लेटफॉर्म पर, एक फारसी मुहावरे के अनुसार ‘‘हरचे आमद इमारते नो साख़त‘‘ अर्थात जो आया उसने अपनी एक नयी इमारत तामीर की। जब भी जिसको मौका मिला है, मौक़ा कभी छोड़ते नहीं है। यह अलहदा एक अलग विषय है, जिस पर पृथक लेख में कभी चर्चा करेंगे। इस देश में खेल नीति, स्वास्थ नीति, कृषि नीति, शिक्षा नीति, सांस्कृतिक नीति आदि अनेक नीति स्वतंत्र रूप से होकर विभिन्न मंत्रालय के मंत्रियों और सचिवालय द्वारा संचालित होती है! परंतु इन सब नीतियों को बनाने व धरातल पर उतारने में ‘गुणवत्ता (मेरिट्स) की बजाए ‘‘राजनीति‘‘ हावी हो जाती है! इसलिए अभी भी आज राजनीति ‘‘खेल नीति‘‘ पर भी भारी पड़ रही है! जय हो राजनीति! 1,000 से अधिक ‘‘गोल‘‘ दागने वाले ध्यान चंद का ‘सोना‘ (स्वर्ण पदक) शायद दाग (ने) के कारण सरकार ने ही ‘‘गोल‘‘ (गायब) कर दिया, आखि़र कब तक? भारत रत्न की महत्ता प्रभुता सर्व कालीन स्वीकारिता व निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ध्यानचंद को भारत रत्न देना ही होगा। यह बात ‘‘चंद‘‘ लोगों के ‘‘ध्यान‘‘ में आनी ही चाहिए जो निर्णय लेते हैं।


सोमवार, 9 अगस्त 2021

आज की ‘‘राजनीति’’ में ‘‘एफआईआर‘‘ क्या एक ‘‘राजनीतिक टूल‘‘ या ‘‘टूलकिट‘‘ बन गया है?

 बिना ‘‘जांच के ‘‘एफआईआर‘‘ की ‘‘वापसी‘‘  या ‘‘नस्ती‘‘ कानूनी रूप से कितनी ‘‘उचित‘‘ है?

        

लोकतंत्र में चुना हुआ लोकप्रिय शासन (सरकार) प्रशासन के माध्यम से जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करने का प्रयास कर ‘‘जन सेवा’’ करने में प्रयासरत रहता है। लोकतंत्र की सही यही पहचान है। ‘शासन’ के संबंध में प्रशासन का मतलब मुख्य रूप से ‘सामान्य प्रशासन’, ‘न्याय प्रशासन’ और ‘पुलिस प्रशासन’ से होता है। पृथक-पृथक स्वतंत्र अस्तित्व लिए परस्पर बेहतर सामंजस के साथ उक्त तीनों भागों (अंगों) द्वारा कार्य करने पर ही शासन; शासन करने में सफल हो सकता है। पुलिस प्रशासन; शासन का एक महत्वपूर्ण अंग होता है, जिसकी कार्यप्रणाली पर ही जनता के बीच शासन की छवि निर्भर करती है। पुलिस कार्यप्रणाली पर चर्चा करने पर स्वाभाविक रूप से ‘‘एफआईआर‘‘ शब्द सामने आ जाता है।उक्त भूमिका लिखने का तात्पर्य मात्र यह है कि वर्तमान में असम व मिजोरम के बीच दुर्भाग्यवश चल रही पुलिसिया झड़पे व तनातनी के दुष्परिणाम व दुष्प्रभाव व उससे उत्पन्न बिन्दु का एक गंभीर आकलन हो सके। 

स्वतंत्र भारत के इतिहास में किन्ही राज्यों जिनकी सीमाएँ परस्पर मिलती है, के बीच खूनी झड़प पुलिस बलों के बीच नहीं हुई, जैसी की दुर्भाग्यवश असम और मिजोरम की पुलिस के बीच कछार जिले में अंतर-राज्यीय सीमा पर हाल (26 जुलाई) में ही हुई झड़प में असम पुलिस के 5 जवान सहित सात लोग मारे गए। ‘‘स्ट्रेटिजिक ऑफेसिव प्रिसिपल ऑफ वार’’ राष्ट्र के दो प्रदेशों के बीच लागू नहीं होता है। यद्यपि सीमा विवाद को लेकर दोनो राज्यों के बीच नागरिकों का परस्पर संघर्ष व नागरिकों व पुलिस के बीच संघर्ष का विवाद तो पुराना है। एक राज्य के लिए वे जवान ‘‘शहीद‘‘ हुए तो दूसरे राज्य के लिए क्या...? ‘‘अपने बेरों को कोई खट्टा नहीं बताया’’। देश के गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 25 जुलाई को शिलांग में ली गई समस्त पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्री की बैठक के तुरंत बाद हुई यह घटना ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक है‘‘ पर एक ‘‘कलंक‘‘ है। 

लेख के मुख्य विषय ‘‘एफआईआर‘‘ पर आ जाएं। दोनों राज्यों के बीच हुए उक्त खूनी संघर्ष के बाद मिजोरम सरकार ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा नौकरशाहों सहित 6 पुलिस के अधिकारियों व अन्य 200 अज्ञात पुलिस कर्मियों के विरुद्ध हत्या के प्रयास और आपराधिक षड़यंत्र के अपराध की एफआईआर अर्थात् प्रथम सूचना पत्र दर्ज कर ली। यद्यपि मिजोरम के मुख्य सचिव ने यह कथन जरूर किया है कि मुख्यमंत्री ने सरमा को शामिल करने की मंजूरी नहीं दी है। मुख्यमंत्री के विरूद्ध ऐसी शायद प्रथम एफआईआर है। यद्यपि कुछ समय पूर्व ही विभिन्न शहर का नाम बदलने को लेकर अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के विरूद्ध स्टुडेंट यूनियन ने एफआईआर दर्ज की थी। इसी प्रकार असम पुलिस ने भी मिजोरम के राज्य सभा सदस्य के. वनलावेना व अनेक पुलिस अधिकारियों के विरूद्ध हत्या के प्रयास सहित विभिन्न धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज किए गये हैं। तदनुसार दो राज्यों की पुलिस ने प्रकरण दर्ज व्यक्तियों के उपस्थित होने हेतु समनस् भेजे। केंद्रीय गृह मंत्री के हस्तक्षेप के बाद मिजोरम के मुख्यमंत्री ने असम के मुख्यमंत्री के विरूद्ध एफआईआर वापस लेने का निर्णय लिया, तदनुसार असम के मुख्यमंत्री ने भी राज्यसभा सांसद के विरूद्ध वापस लेने का निर्देश दिया, ताकि परस्पर बातचीत का वातावरण बन सके। 

सबसे बड़ा प्रश्न यहां यही उत्पन्न होता है की एक दर्ज एफआईआर क्या बिना जांच के राजनीतिक अथवा क़ानून व्यवस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु वापस ली जा सकती है? प्रथम सूचना पत्र दर्ज होने के बाद ही जांच प्रारंभ की जाकर तथ्य पाए जाने पर सक्षम न्यायालय में अपराध/अपराधों के विरुद्ध चालान प्रस्तुत किया जाता है। अथवा एफआईआर के तथ्य; तथ्यहीन पाये जाने पर प्रथम सूचना पत्र नस्ती (फाईल) भी की जा सकती है। न्यायालय में चालान प्रस्तुत होने के बाद भी शासन के अनुरोध पर न्यायालय की अनुमति से अपराधिक प्रकरण वापिस लिया जा सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 154 में यही व्यवस्था है।

अतः एफआईआर संज्ञेय अपराध का पहला लिखित महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, जिसका दुरूपयोग राजनैतिक हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिये। परन्तु वर्तमान में हमारी शासन व्यवस्था इस तरह की हो गई है कि पुलिस प्रशासन स्वतंत्र रूप से कार्य करने में स्वयं को लगभग अक्षम पाते हैं। राजनैतिक दबाव के चलते एफआईआर दर्ज होने से लेकर जांच प्रक्रिया व निष्कर्ष तक प्रभावित होती है। अर्थात् राजनैतिक सत्ता का भरपुर (दुरू)/(उ)पयोग पुलिस प्रशासन के माध्यम से अपराधिक मामलों में हस्तक्षेप करने में होता है। यह कटु सत्य पुनः असम व मिजोरम सरकारों द्वारा परस्पर एक दूसरे के विरूद्ध एफआईआर दर्ज करने से लेकर फिर वापिस लेना से स्थापित होती हैं। क्योंकि दोनों मामलों में एफआईआर तथाकथित घटित हुये अपराध के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले जांच अधिकारी (थाना/चौकी) द्वारा स्वयं न की जाकर घटना की जांच किये बिना मुख्यमंत्री के निर्देशों पर की गई। फिर वापिस लेने की कार्यवाही भी मुख्यमंत्री के निर्देशों पर की गई। गोया शासन का कार्य एफआईआर दर्ज करना या वापिस लेना ही रह गया है? इस प्रकार यहाँ पर भी दोनों सरकारों द्वारा एफआईआर का (उ)/(दुरू)पयोग एक राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति हेतु राजनैतिक टूल के रूप में किया गया है व जा रहा है जो संवैधानिक, का़नूनी व नैतिक रूप से सिद्धांतः गलत है। क्योंकि  इस प्रकार शासनाधिकार का दुरूपयोग होने से यह दुरूपयोग प्रायः अपने राजनैतिक विरोधियों के विरूद्ध व उपयोग हितेषियों के लिये होता रहा है व रहेगा, जिस पर रोक लगाये जाने की अत्यंत आवश्यकता है। तभी आम जनता का पुलिस तंत्र की क्षमता, कार्यकुशलता व निष्पक्षता पर विश्वास जम पायेगा।


बुधवार, 4 अगस्त 2021

आखिर! ‘‘राजनीति‘‘ में (कु) ‘‘नीति‘‘ के गिरने का ‘‘क्रम’’ ‘‘कब’’ व ‘‘कहां’’ जाकर रुकेगा?


पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा क्षेत्र के भाजपा सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री और 90 के दशक से 12 भाषाओं में फिल्मी गीत-संगीत की दुनिया के प्रसिद्ध और लोकप्रिय गीतकार बाबुल सुप्रियो की सोशल मीडिया ‘‘फेसबुक‘‘ पोस्ट के माध्यम से ‘‘राजनीति‘‘ से ‘‘सन्यास’’ लेने और लोकसभा से एक महीने के भीतर इस्तीफ़ा देने के निर्णय की अचानक जानकारी मिली। हाल में ही हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के चिरप्रतीक्षित पुनर्गठन में अप्रत्याशित उनसे लिये गये इस्तीफे (शायद केंद्रीय मंत्री रहते हुये टाॅलीगंज विधानसभा से हुई हार) के कारण अपमानित व आहत होने, और पश्चिम बंगाल भाजपा के नेतृत्व से मतभेदों के चलते, भाजपा की पश्चिम बंगाल में हुई बड़ी जीत के दावों के विपरीत हुई हार के परिणाम आने से व्यथित होकर (क्योंकि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानते थे) बाबुल सुप्रियो ने उक्त कदम ‘‘निराशा‘‘ में उठाया है, राजनीतिक दृष्टि से प्रथम दृष्टया ऐसा माना जा सकता है।‘‘अशांतस्य कुतः सुखम्‘‘।

सोशल मीडिया में पोस्ट ड़ालते हुए बाबुल सुप्रियो ने कहा कि वह सामाजिक कार्यों (समाज सेवा) के लिए ही राजनीति में आये थे। लेकिन कहते हैं न कि ‘‘असफलता में ही सफलता की कुंजी छुपी होती है‘‘। अतः अब वे यह महसूस करते हैं कि बगैर राजनीति के या राजनैतिक दल के सदस्य रहे बिना भी, सामाजिक कार्य व लोगों की सेवा की जा सकती है। इसीलिये वे राजनीति को ‘‘अलविदा‘‘ कह रहे हैं। संसद सदस्यता से एक महीने के भीतर इस्तीफा दे देंगे वे न तो कोई दल बना रहे हैं और न ही किसी अन्य पार्टी में जा रहे हैं। (वे जानते हैं कि ‘‘भेड़ जहां जायेगी वहीं मुंडेगी‘‘। अचानक अनपेक्षित रूप से घटित पूरे घटनाक्रम को विरोधी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने तो इसे ‘ड्रामा’ क़रार कर दिया है। वस्तुतः बाबुल सुप्रियो का उक्त कथन अर्धसत्य है, क्योंकि ‘राजनीति‘ से ‘‘नीति‘‘ अलविदा तो बहुत पहले हो चुकी है, इसलिये उसे छोड़ने का प्रश्न कहां पैदा उत्पन्न होता है। जहां तक राजनीति की मुख्य ताकत व पहचान ‘‘राज‘‘ (सत्ता) की बात है, राजसत्ता का प्रतीक वह मंत्री पद भी छीना जा चुका है। अब मात्र सांसद रह जाने के बावजूद पार्टी में भी उनकी ‘सत्ता‘ का प्रभाव न्यूनतम रह गया है। अतः वे सिर्फ सांसद पद ही छोड़ सकते हैं, जिसको कार्यरूप देना अभी बाक़ी है।

उपरोक्त संपूर्ण कथन (या कथा?) अपने आप में एक प्रकार की कूटनीतिज्ञ राजनीति लिये हुए है और शायद आज की ‘‘राजनीति‘‘ इसी को कहते हैं। व्यक्ति जीवन से तो अलविदा जरूर होता है, लेकिन अधिकांशतः व्यक्ति राजनीति को पूर्ण रूप से अलविदा नहीं कह पाते हैं। राजनीति का मतलब सिर्फ पार्टी राजनीति ही नहीं होती है, बल्कि राजनीति, सामाजिक, धार्मिक क्षेत्र में व यहाँ तक कि फिल्मी गीत-संगीत के क्षेत्र में भी होती है, जहाँ से बाबुल सुप्रीयो राजनीति में आ कर वहीं वापिस जा रहे हैं। ‘‘साझे की हंडिया को चैराहे पर फूटने से बचाने के लिये‘‘ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के द्वारा सार्वजनिक रूप से बाबुल सुप्रीयो से उक्त निर्णय पर पुनर्विचार हेतु की गयी अपील के प्रत्युत्तर में दो दिन बाद बाबुल सुप्रियो की जे.पी. नड्डा से हुई मुलाक़ात के बाद आया उनका यह बयान गौरतलब है कि वे ‘‘अब लोकसभा से इस्तीफा तो नहीं दे रहे हैं, लेकिन राजनीति से दूर रहेंगे‘‘। मूल पोस्ट में लिखी बात कि ‘‘वे हमेशा बीजेपी का हिस्सा रहेगें‘‘ को बाद में हटा दिया। बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष दिलीप घोष का कथन कि क्या उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया? तथा यह उनका निजी फैसला है, जो कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के स्टैंड के प्रतिकूल है। वर्तमान भारतीय राजनीति की यही ‘‘विशिष्टता‘‘ तो ‘‘शेष‘‘ रह गयी है।

बाबुल सुप्रियो ने अपने सन्यास व इस्तीफ़े के लिये दिये गये कारणों से राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सामान्यतया सामाजिक और राजनीतिक कार्य व कार्यकर्ता  अलग-अलग होते हैं, परिभाषित होते हैं व अपनी पृथक-पृथक पहचान लिये होते हैं। परंतु यहां पर तो फिल्मी ‘‘गीत-संगीत‘‘ का क्षेत्र छोड़कर ‘‘सामाजिक‘‘ कार्य करने के लिये ही तो बाबुल सुप्रीयो ‘‘राजनीति‘‘ में आये। जबकि अधिकांशतः अन्य नेतागण तो प्रायः देश सेवा के लिये राजनीति में आने का ‘दावा‘ करते है। गोया, सामाजिक कार्य करने के लिए राजनीति की सीढ़ी चढ़ना जरूरी है? इस ‘‘गलत‘‘ बात को ‘‘सही‘‘ समझने में बाबुल सुप्रियो को 7 साल लग गये। (उन्होंने वर्ष 2014 में भाजपा के प्लेटफाॅर्म से राजनीति में पदार्पण किया था)। यह तो वही बात हुई कि-                  

‘‘शब को मय ख़ूब सी पी, सुब्ह को तौबा कर ली,   

  रिंद के रिंद रहे, हाथ से जन्नत न गयी‘‘।

राजनीति को ‘‘टा टा‘‘ करके सांसद बने रहने का उनका पुनर्निर्णय शायद देश की राजनीति को क्या एक ‘‘नई दिशा‘‘ नहीं देगा? उन्होंने एक और नया शिगूफा दिया कि बिना राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे वे अपनी संसदीय जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहेंगे। जबकि सालों राजनीति के रंग में डूबे व समाहित हो जाने के बावजूद अनेक नेता गण अपनी संसदीय जिम्मेदारी पूर्ण व अच्छी तरह से निभा नहीं पाते है। अभी तक तो देश की लोकतंत्रीय प्रणाली की राजनीति में दलीय और (बहुत कम) निर्दलीय राजनीति का ही बोलबाला व वर्चस्व रहा है। राजनीति को ‘‘बाय बाय‘‘ कह, सन्यास ले कर संसदीय राजनीति की पारी को पूर्ण करना कहीं, राजनीति की एक ‘‘नयी थ्योरी‘‘ को तो ईजाद नहीं कर रही है? ‘‘संसद सदस्य‘‘ के ‘‘सन्यासी‘‘ हो जाने पर वह दलगत राजनीति के पचड़े से दूर हो जायेगा। क्योंकि ‘‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं‘‘। व्यक्तिगत स्वार्थ या स्वार्थ भावना से परे रहकर वह सिर्फ और सिर्फ देश के लिये ही सोचेगा व तदनुसार कार्य करेगा, जिससे देश मजबूत होगा, और समाज सेवा का कार्य चलता रहेगा। (जैसा कि बाबुल सुप्रीयो ने कहा है)। निस्संदेह व्यक्ति से परिवार व उससे आगे बढ़ते हुए परिवार से समाज और अंततः समाज से ही देश का निर्माण होता है। 

यदि देश में अपनायी गयी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत लोकसभा व राज्यसभा के समस्त 795 संसद सदस्य तथा विधानसभाओं और विधान परिषदों के सभी सदस्यगण भी ‘‘सन्यास की इस नयी राजनीति‘‘ व संसदीय राजनीति को अपना लें तो, संसद में जो ‘‘गतिरोध‘‘ अभी चल रहा है, वह न केवल समाप्त हो जायेगा बल्कि भविष्य में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी और ‘‘चोर उचक्का चैधरी, कुटनी भई प्रधान‘‘ वाली दलगत राजनीति के चलते देश के स्वास्थ्य व विकास पर जो विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, उसकी भी समाप्ति हो जायेगी और देश तेजी से विकास, समृद्धि उन्नति और खुशहाली की ओर बढ़ेगा। ‘‘अंधेरों को कोसने से बेहतर है चि़राग़ रौशन करना‘‘। इसलिये ‘‘चैरिटी बिगिन्स एट होम‘‘ की तर्ज पर इस नयी सन्यास की राजनीति के सिद्धांत को अपनाकर अन्य सम्मानीयों को भी रास्ता दिखाने के लिए न केवल बाबुल सुप्रियो धन्यवाद के पात्र हैं, बल्कि जे.पी. नड्डा को भी धन्यवाद अवश्य दिया जाना चाहिये, क्योंकि उनसे मुलाकात के बाद ही बाबुल सुप्रियो ने लोकसभा से अपने इस्तीफे के निर्णय को बदला तो जरूर, परंतु राजनीति से दूरी बनाये रखने के अपने पूर्व निर्णय को बरक़रार रखते हुए।

परिणामस्वरूप अंत में, मोहम्मद रफ़ी (फिल्म नीलकमल वर्ष 1968) व बाद में सोनू निगम का गाया यह ‘गीत’ ‘‘बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’’, दिल से बाहर आकर गुनगुनाने की इच्छा जागृत होने लगी। परन्तु जिनकी जुबान पर शायद यह गीत था, परिस्थितियों के घटनाक्रम को देखते हुए इसे शायद अपने दिल में ही उतार लिया?। घर से निकलने के बाद भी दुनिया की किसी भी महिला से उसका बाबुल कभी नहीं छूटता। सुप्रियो से उनका ‘राजनैतिक बाबुल’ छूटना सामान्यतः हमारी समग्र राजनीति और विशेषकर भाजपा की कार्यप्रणाली का ज्वलंत उदाहरण है। संभव है कि उनके हटने के असली राज (अगर कोई हैं तो) कुछ समय के बाद सामने आयें।


शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

राजद्रोह कानू़न (भा.द.स. की धारा 124ए) की ‘‘आवश्यकता‘‘ ‘‘आज’’ भी है व ‘‘आगे‘‘ भी रहेगी!


अभी हाल में ही माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरकार के हरिद्वार जिले में बूचड़खानों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की संवैधानिकता पर प्रश्न उठाते हुये टिप्पणी की ‘‘क्या ‘‘नागरिकों को अपने भोजन चुनने का अधिकार है या राज्य ही फैसला करेगां‘‘? न्यायालय ने एक तरह से राज्य सरकार के जनहितकारी निर्णय लेने के ‘‘अधिकार’’ पर ही प्रश्न चिन्ह उठा दिया। इसके एक कदम और आगे जाकर नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत तो यहां तक  कहते हैं कि पर्यटक क्या खाना पीना चाहते हैं? यह उनका ‘‘निजी‘‘ मामला है, राज्य यह तय नही कर सकते हैं। जब माननीय न्यायालय, कार्यपालिका/शासन से उक्त प्रश्न कर सकती है, तब एक साथ (साइमलटेनियसली) यह प्रश्न भी उत्पन्न होता है कि सरकार के जनहित के किसी मुद्दे पर तथाकथित रूप से असफल होने या बताने पर चुनी हुई सरकार का कोई निर्णय जनहितकारी है अथवा नहीं, यह तय करने का अधिकार वास्तव में उन्हे चुनने वाले लोगो अर्थात मतदाताओं पर ही छोड़ देना उचित होगा ? उच्च/उच्चतम न्यायालय को सिर्फ कार्यपालिका के आदेश व विधायिका द्वारा पारित कानून की संवैधानिकता, वैधानिकता व न्यायिक समीक्षा ही करनी चाहिए। अंतर्निहित असाधारण शक्तियों का प्रयोग असाधारण स्थितियों में ही करना चाहिए। हमारे संविधान में कार्यपालिका, न्यायपालिका व विधायिका तीनों के कार्यक्षेत्र का यह विभाजन स्पष्ट रूप से दर्शित होता है। अन्यथा क्या यह संदेश नहीं जायेगा कि न्यायपालिका शासन मौके-बेमोके चलायेगी? 

यह विषय इसलिये उत्पन्न होता है कि स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में हमने अनेकों/सैकडों बार यह देखा है कि माननीय न्यायालयों द्वारा राज्यों व केन्द्रीय शासन के विरूद्ध लगातार ऐसी टिप्पणियां या आदेशध्निर्देश पारित किये जाते रहें है, जो कि न्यायिक क्षेत्राधिकार से जुड़ी कम वरण कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप लिये हुई ज्यादा दिखती हैं, ऐसा परसेप्शन विगत कुछ समय से ज्यादा बन रहा हैं। जैसे कावड यात्रा पर रोक, बकरीद पर छूट, किसान आंदोलन के चलते स्वप्रेरणा से चार सदस्यीय समिति का गठन, कोविड़-19 की पहले दौर में अप्रवासीय श्रमिकों को वापसी का आदेश, दीपावली पर सीमित डेसीबल व कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की रात्रि मात्र 8 से 10 बजे के बीच फोड़े जाने की समय सीमा बाधंना, सार्वजनिक स्थानों में रात्रि 10ः00 बजे के बाद ‘डीजे‘ बजाने पर प्रतिबंध, 10 किलो हट्ज से ज्यादा के साउंड सिस्टम पर प्रतिबंध, डीजल/पेट्रोल के बदले सी.एन.जी. का उपयोग आदि अनेकोंनेक ऐसे विषय हैं, जिनका संबंध नागरिकों की खुशहाली, समृद्धि, स्वस्थ जीवन, तथा अच्छे व उज्जवल भविष्य से है। इन पर जनोंमुखी निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ चुनी हुई सरकार को ही है। 

इन शासनादेशों की गुणवत्ता पर न्यायिक हस्तक्षेप या कोई आदेश न होने पर सरकार को आदेश/निर्देश देना उचित नही कहा जा सकता हैं। वैधानिक न्यायिक समीक्षा का यह विषय नही हैं। शासन के जन विरोधी, गलत, अलोकप्रिय निर्णय या ‘‘अनिर्णय‘‘ की स्थिति में जनता अगले चुनाव में ‘‘सबक‘‘ सिखा देगीं। तब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि आखिर कार्यपालिका के अधिकारों की रक्षा के लिये माननीय न्यायालयों से ‘‘कौंन‘‘, ‘‘कैसे‘‘ व ‘‘किस प्रकार‘‘ प्रश्न कर सकेगा? जिस प्रकार न्यायपालिका अधिकार पूर्वक अबाध व निर्बाध रूप से आसानी से अन्य तंत्रों से प्रश्न पूछ लेती है? 

विगत समय सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस.जी. बोम्बतकरे की याचिका पर विचार करते माननीय उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह के अपराध व संबंधित धारा 124ए पर कुछ बिन्दु उठाते हुये गंभीर टिप्पणियां की।बिंदुवार इसकी विस्तृत विवेचना  आगे की जा रही है। ब्रिटिश जमाने से वर्ष 1860 से चली आ रही भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह कहकर कि अब इसकी जरूरत ही क्या है? उसके अस्तित्व पर ही एक ‘‘प्रश्न चिन्ह‘‘ लगा दिया? माननीय उच्चतम न्यायालय को निश्चित रूप से उसकी संवैधानिक वैधता पर पुर्नविचार (‘‘विचार‘‘ तो न्यायालय पूर्व में ही केदारनाथ सिंह मामले में कर, वैध ठहरा चुकी है) करने का अधिकार तो है। परन्तु जहां तक राजद्रोह की धारा 124ए की आवश्यकता व उपयोगिता का प्रश्न है, यह बात, (मुद्दा-कार्य विषय) जनता द्वारा चुने गये व्यक्तियों अर्थात विधायिका ही तय करेगी, न्यायपालिका नहीं ? 

अभी तक कमोवेश लोकतंत्र के तीनों स्तम्भ का प्रत्येक खम्बा क्षेत्राधिकार को लेकर परस्पर एक दूसरे का सम्मान करता चला आता रहा है। यही देश के लोकतंत्र व संविधान की ‘‘खूबी व खूबसुरती‘‘ भी है। उच्चतम न्यायालय ने सरकार से यह पूछा कि अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन को दबाने के लिए इस औपनिवेशिक राजद्रोह कानून का प्रथम (दुरू)उपयोग वर्ष 1870 में बाल गंगाधर तिलक व तत्पश्चात महात्मा गांधी इत्यादि जैसे अन्य कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, नेताओं के खिलाफ किया था। आजादी के लगभग 75 साल बाद भी इस कानून की क्या जरूरत है? अनेक गैरजरूरी कानूनों को खत्म करते हुये सरकार की नजर इस कानून के खातमें पर क्यों नहीं गई? ऐसे कानूनों को जारी रखना दुर्भाग्यपूर्ण है।

उच्चतम न्यायालय का खत्म किये गये अन्य अनुपयोगी कानूनों की समाप्ति की बात का यहां पर उल्लेख करना महत्वपूर्ण होकर स्वयं न्यायालय को ही संवैधानिक सीमा में बांधता है। वह ऐसे कि, जहाँ केन्द्र द्वारा पूर्व में जो भी कानून अनुपयोगी मानकर समाप्त किये गयेे थे, वे न्यायालीन निर्देशों/आदेशों के तहत नहीं, बल्कि इस संबंध में आयी रिपोर्ट के बाद अनुपयोगी व व्यर्थ होने के कारण ही समाप्त किये गये थे। मोदी सरकार के पूर्व लगभग 1300 पुराने व व्यर्थ कानून को समाप्त किया गया तो मोदी सरकार ने इन 6 सालों में लगभग 1500 निरर्थक कानूनों को खत्म किया। माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह उल्लेख कर वस्तुतः धारा 124ए की वर्तमान में औचित्य, आवश्यकता व उपयोगिता पर ही प्रश्न चिन्ह लगाकर उसे समाप्त करने की ओर साफ इंगित किया है। यह ठीक उसी प्रकार से है या इसे उस तरह से समझिये कि जब वर्ष 1971 में लागू ‘‘मुन्नी से भी ज्यादा बदनाम‘‘, कुख्यात,‘‘मीसा’’ कानून (आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियिम) को आपातकाल के हटने के बाद वर्ष 1978 में उस मीसा कानून के दुरूपयोग से भुगतती जनमानस व उनके चुने गये नुमाइंदों (जिन्हे बाद में लोकतंत्र के प्रहरी मानकर पेशन देना भी चालू किया गया) की जनता सरकार ने समाप्त कर दिया था। उसे जारी रखना जरूरी नहीं समझा गया। परन्तु वास्तव में यह प्रश्न तो राजनैतिक प्लेटफार्म पर होना चाहिए था। दुर्भाग्यवश न्यायालय ने इस पर ‘‘लीड़‘‘ ले लिया। यद्यपि देश के गृहमंत्री भी पूर्व में ब्रिटिश जमाने के दुर्भाग्यपूर्ण कानूनों को समाप्त करने की बात कह चुके है। तथापि विश्व के कई देशों में आज भी राजद्रोह का कानून लागू है। यद्यपि ब्रिटेन में जहां यह कानून बना था, वर्ष 2009 में समाप्त कर दिया गया।

राजनैतिक कारणों से बडे पैमाने पर इस धारा के दुरूपयोग के और सरकार की जवाबदेही तक तय नहीं है, तथा इसके अनुपयोगी होने के कारण उच्चतम न्यायालय की धारा 124ए के भारतीय दंड संहिता 1860 में बने रहने के अस्तित्व पर विचार करने की धारणा ही, संविधान द्वारा कार्यपालिका, न्यायपालिक व विधायिका के बीच खींची गई लक्ष्मण रेखा की सीमा का उल्लघंन व संविधान की भावना के प्रतिकूल प्रतीत होती दिखती है। 

एक बात स्पष्ट है! जब भी कोई कानून किसी विशेष उद्देश्य या अपराधों को रोकने के लिये बनाया जाता है या बना हुआ है, तो न केवल उस कानून के दुरूपयोग की आशंका सिर्फ उसके निर्माण के समय ही नहीं, बल्कि हमेशा बनी रहती है और कमोवेश थोड़ा बहुत दुरूपयोग होता भी रहता है। जैसा कि कहा जाता है-‘‘देयर इज नो रोज विदाउट ए थ्रोन‘‘। परन्तु उसके दुरूपयोग को रोकने व चाबूक लगाने का कार्य कार्यपालिका के साथ-साथ न्यायपालिका का भी होता है, जो वह अवश्य करती चली आ रही है। जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ व एम.आर.शकर की खण्ड़ पीठ ने एक प्रकरण में कानून की प्रक्रिया का दुरूपयोग कर दर्ज की गई एफ.आई.आर. रद्द कर दी। परन्तु संबंधित कानून जिनके तहत उक्त दुरूपयोग हुआ था को रद्द नहीं किया। सोलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने भी स्वयं सरकार द्वारा इस धारा के दुरूपयोग को रोकने की बात कही है। 

ऐसा कभी भी नहीं हुआ है कि सिर्फ दुरूपयोग के आधार पर कानून ही न बनाया जाये और न ही ऐसा संभव है। ‘‘जूं के ड़र से गुदड़ी नहीं फेंकी जाती‘‘। बने हुये कानून के औचित्य पर दुरूपयोग के आधार पर प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। माननीय मुख्य न्यायाधीश का उक्त धारा की संवैधानिकता परखने के पूर्व ही, इस तरह की विस्तृत असहमति वाली टिप्पणियों से अंतिम रूप से आने वाले निर्णय की निष्पक्षता पर आंशका के बादल स्वयंमेव उभर जाते है, ऐसा ‘‘संशयात्मा विनश्यति‘‘ रूपी परसेप्शन बनना ठीक नहीं है। जिस प्रकार माननीय न्यायालय कानून के दुरूपयोग पर चिंता व्यक्त कर रहा है, उसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों के दुरूपयोग को भी लेकर क्या चिंता उत्पन्न नहीं होती या नहीं होना चाहिए?

उक्त कानून के औचित्य पर उच्चतम न्यायालय ने एक और आधार पर प्रश्न उठाया है कि इस कानून (वास्तव में धारा 124ए) के इतिहास में जाने पर तथ्यात्मक रूप से न्यूनतम मामलों में ही सजा हुई है। मतलब तो फिर इस आधार पर आज के कई अपराधिक कानून व उनकी विभिन्न धाराएं कहीं नहीं ठहरती है, जैसा बलात्कार के मामलों में सजा का प्रतिशत मात्र 30 प्रतिशत के आसपास है। ‘‘एनसीआरबी’’ के अनुसार हमारे देश में अपराध की सजा की दर आधे  से भी कम है। तब क्या उन सबका भी ‘‘विलोपन’’ हो (समाप्ति) जाना चाहिये? फिर ‘‘मुंहबंद कुत्ता क्या शिकार करेगा‘‘? सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66ए के दुरूपयोग का उदाहरण देते समय माननीय उच्चतम न्यायालय शायद यह भूल गयी कि उक्त अधिनियम की धारा 66ए को स्वयं न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के मामले में असंवैधानिक घोषित किया था। जब कि इसके विपरीत स्वयं उच्चतम न्यायालय धारा 124ए को संवैधानिक रूप से वैध घोषित कर चुका है। 

उच्चतम न्यायालय ने पूर्व में सरकार से भिन्नता रखने व असहमति के विचार को राजद्रोह नहीं है, यह स्पष्ट रूप से निर्धारित कर, निर्णित कर उसके दुरूपयोग की आशंका को स्वयंमेव दूर (निर्मूल) कर दिया था। तब उसे समाप्त करने की सोच ही क्यों उत्पन्न होनी चाहिये? जैसे कि तुर्की की एक कहावत है कि ‘‘कड़े गोश्त के लिये पैने दांत होना जरूरी है‘‘, अतः क्या देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा, संप्रभुता व समरसता के लिये आज भी द्रेशद्रोह की धारा 124ए की आवश्यकता नहीं है? खासकर आज भी हमारे ‘‘तंत्र‘‘ में जासूसी से लेकर दुश्मन देशों के प्रति प्रेम लिए देशद्रोह की भावना फलफूल कर दीमक की तरह तंत्र को ख़ोखला करने का प्रयास करते रहते है, तब उन्हे रोकने के लिये देशद्रोह कानून की मौजूदगी जरूरी है। (एक फारसी कहावत के अनुसार ‘‘तुख्मे मुर्ग दुज्द, शुतुर दुज्द मीशे‘‘ अर्थात यदि मुर्गी का अंडा चुराने के लिये कानून नहीं है तो उसे चुराने वाला अंततः एक दिन ऊंट की चोरी जरूर करेगा)। हाँ ब्रिटिश जमाने की देशद्रोह की धारा में स्वाधीन भारत के सम्मान को चोट पहुुचाने वाली यदि कोई बात है, तो उसे अवश्य हटा देना चाहिये। 

देश से बड़ा कोई नहीं और देशद्रोह (राजद्रोह) से बड़ा कोई अपराध नहीं। क्या देश आंतकवाद से मुक्त हो गया है? क्या आंतकवादी का देशद्रोही से कुछ भी संबंध नहीं? आंतकवादी को आश्रय देना, आर्थिक सहायता देना देशद्रोह नहीं है? तब क्या सबसे बड़े अपराध के अपराधी को कानून समाप्त कर निरपराधी बना दिया जाए? वह भी उस स्थिति में जब विद्यमान अन्य किसी कानून में देशद्रोह को अपराध मानने की कोई व्यवस्था/धारा नहीं है। 

माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्वयं 1962 में केदारनाथ सिंह विरूद्ध बिहार राज्य के मामलें में धारा 124ए को वैध ठहराया था। अर्थात स्वतंत्रता के पूर्व की दमनकारी धारा (जिसे न्यायालय अभी ठहरा रही हैं) को स्वतंत्रता के पश्चात भी उच्चतम न्यायालय ने न केवल वैध ठहराया, बल्कि उसकी अनुपयोगिता पर तत्समय भी कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया गया। यद्यपि असाधारण अवस्था में ही ‘‘विषस्य विषमौषधर्म‘‘ के समान उसके सीमित उपयोग के बाबत जरूर कहा गया। तब आज उच्चतम न्यायालय की राजद्रोह की धारा की समाप्ति पर उक्त टिप्पणी समयानुकूल नहीं है।

माननीय उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह को औपनिवेशिक बतलाते हुये उसके अस्तित्व के औचित्य पर टिप्पणी करते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी कर दी की दंड प्रक्रिया संहिता जिसे वर्ष 1861 में पारित और 1862 में लागू किया गया था के बिना भारतीय दंड संहिता (जिसके अंतर्गत ही राजद्रोह की धारा 124ए शामिल है) को कार्यरूप में परिणित नहीं किया जा सकता है, तो भारतीय गणराज्य की संसद ने 1973 में समाप्त कर दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (स्वाधीन देश की आवश्यकता के अनुरूप) पारित कर नया कानून बनाया। लेकिन इसी (1861) के आसपास वर्ष 1860 में पारित भारतीय दंड संहिता को सरकार ने नया दंडात्मक कानून लाने की आवश्यकता महसूस नहीं की। भारतीय दंड संहिता 1860 विश्व की सबसे बड़ी दंडात्मक कानून है, यह जानकर शायद आपको भी आश्चर्य होगा।

अंत में फिल्म ‘‘जब प्यार किसी से होता है’’ में मोहम्मद रफ़ी-लता मंगेशकर का गाया लोकप्रिय गीत ‘‘सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा‘‘ लेख की विषय वस्तु पर बिल्कुल सटीक बैठता है।

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

*असंसदीय शब्दों के प्रयोग पर प्रतिबंध। ‘‘माननीयों’’ को पढ़ाया जायेगा ‘‘सभ्यता का पाठ’’।


मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष गिरीश गौतम ने ‘‘माननीय’’ विधायकों की “बोली संतुलित रहे“, इसके लिये विधानसभा में माननीयों द्वारा अमाननीय, “असंसदीय“ शब्दों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। जैसे पप्पू, फेंकू, चोर, झूठा, मूर्ख, नालायक़, बेवक़ूफ़, मामू, मंदबुद्धि, बंटाधार इत्यादि शब्द जैसी कि मीडिया की रिपोर्टिंग है, प्रतिबंधित किये जा रहे हैं। जिस प्रकार देश की सर्वोच्च नियामक संस्था ‘‘लोकसभा’’ में अमर्यादित शब्दों के इस्तेमाल पर पूर्ण रोक लगाई गयी है, उसी तर्ज़ पर मध्यप्रदेश विधानसभा में भी असंसदीय शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगायी जा रही है। विधानसभा सचिवालय द्वारा इन असंसदीय शब्दों को सूचीबद्ध कर एक ‘‘मार्गदर्शिका’’ बनायी जाकर “माननीयों“ को मुहैया करायी जायेगी। यह भी कहा जा रहा है कि 300 शब्दों की डिक्शनरी 3 महीनों के भीतर बनाई जायेगी। साथ ही “माननीयों“ का इस संबंध में प्रशिक्षण वर्ग भी होगा। पर सबसे बड़ा प्रश्न! स्वयं को मार्गदर्शक मानने वाले ‘‘माननीय’’ उनके लिये बनायी गयी मार्गदर्शिका का पालन करेगें? 

सूची में आने वाले शब्दों को “असंसदीय“ कहने की व्याख्या करने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि क्या इन शब्दों को “असंसदीय“ कह कर विधायिका के बाहर इन अशिष्ट शब्दों को “संरक्षण“ तो नहीं दिया जा रहा है? वह इसलिये क्योंकि इन्हें संसद या विधानसभा के भीतर “असंसदीय“ वर्गीकृत कर संसद या विधानसभा के बाहर ‘‘गुड़ खाकर गुलगुलों से परहेज़’’ करते हुए इन शब्दों के इस्तेमाल करने की खुली छूट रहेगी? सूचीबद्ध होने वाले शब्द जब “अमर्यादित“ हैं और आपको “तमीज़“ सिखाना ही है, तो अमर्यादा, बदतमीज़ी पर प्रतिबंध की अधिकारिक सीमा सिर्फ विधानसभा के अंदर (वेल) तक ही क्यों? इसके उत्तर में ही आपकी (भाजपा की) इन निंदनीय शब्दों पर प्रतिबंध लगाने की वास्तविक ‘नियत’ की ‘नियति’ के दर्शन हो पायेगें?

आश्चर्यजनक बात यह भी है कि इन असंसदीय, अशोभनीय, अपशब्द, अशिष्ट, अमर्यादित, असंवेदनशील, असहनशील, आपत्तिजनक ज़ुमलेबाज़ी जैसे शब्दों का उपयोग ‘‘माननीयों’’ द्वारा न हो सके, वास्तविक रूप से पूर्णतः इन शब्दों को बोलने से रोका जा सके, इसकी कोई प्रभावी, प्रणाली, तंत्र या उपाय, जिसके द्वारा इसे हक़ीक़त में ज़मीनी धरातल पर यथार्थत: उतारा जा सके, की कोई संरचना, प्रारूप, दृष्टि, विज़न स्पीकर ने उक्त कथन के साथ प्रस्तुत नहीं की है। इससे एक अच्छे उद्देश्य का ‘‘दूरस्थाः पर्वताः रम्याः’’ के समान सिर्फ काग़ज़ात पर ही रह जाने का अंदेशा बढ़ जाता है। और यह स्थिति ही अपने आप में एक “ज़ुमलेबाज़ी“ सिध्द हो सकती है, जैसा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ज़ुमलेबाजी के ‘‘मास्टर’’ माने जाते हैं। जिनका मानना है कि ‘‘माल चाहे जैसा भी हो, हांक हमेशा ऊंची लगानी चाहिये’’। वास्तव में इसके लिए कौन से क़ानून व नियम हैं अथवा बनाये जायेगें, जिनका कड़ाई से पालन कर माननीयों को इन शब्दों के प्रयोग से रोका जा सकेगा? स्पीकर द्वारा यह स्पष्ट करना निहायत ज़रूरी है। अन्यथा इन सारी ‘‘उठा-पटक के बाद वही ‘‘बह्वारंभे लघुक्रिया’’ अर्थात ‘‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’’ जैसा अंजाम होगा।

अभी तक की जो परंपरा रही है, उसमें अध्यक्ष को यह विशिष्ट (एक्सक्लूसिव) विवेकाधिकार/विशेषाधिकार होता है कि उनकी नज़र में जो शब्द असंसदीय हैं, उन्हें वह विधानसभा कार्यवाही से निकाल दे। इस प्रकार कार्यवाही में शामिल होकर भी वे शब्द "तकनीकी" रूप से कार्यवाही के भाग नहीं होते है । लेकिन बात वहीं पर आकर सिमट जाती है कि जिस प्रकार एक चमचमाती, सफ़ेद शर्ट में दाग़ लग जाये तब धुलने के बाद दाग़ निकलने के बाद भी हल्के से चिन्ह रह जाते हैं, जो दाग़ लगने की याद हमेशा दिलाते हैं। ठीक उसी प्रकार विधानसभा की कार्यवाहियों में से असंसदीय शब्दों के विलोपन के बावज़ूद उन शब्दों की गूंज बनी रहती है। जिस प्रकार दाग़ के चिन्ह को पूर्णतः समाप्त करने के लिये एक शक्तिशाली डिटर्जेन्ट की ज़रूरत होती है, उसी प्रकार "माननीयों" पर उक्त व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू करने के लिए एक स्ट्रांग कड़क व भारी दंड विधान लिये हुए क़ानून की आवश्यकता होगी। साथ ही यदि माननीयों की दी जाने वाली विभिन्न सुविधाएं, अनुलाभ पर अस्थाई रोक लगाकर आर्थिक चोट  पहुंचाने से भी उक्त व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू हो सकती है।

प्रश्न यह नहीं है कि "माननीय" कौन से शब्द सदन में बोल पायेंगे अथवा नहीं? बड़ा प्रश्न यह है कि कौन से शब्द "अपशब्द" होकर "असंसदीय" माने जायेगें? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह कि ‘‘थूक कर चाटने" जैसी स्थिति के बजाय, अर्थात शब्दबाणों के द्वारा किसी की "पगड़ी उछालकर" और फिर सदन की कार्यवाही के रिकाॅर्ड  से हटाने के बजाय, उनके बोलने पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही अर्थात सदस्यता निलंबन या सदस्यता समाप्ति जैसी कड़ी कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिये। तभी क़ानून के डर के माध्यम से प्रभावी रूप से असंसदीय शब्दों को बोलने से रोकने में स्पीकर सफल हो पायेगें। क़ानून बनाते समय सज़ा की व्यवस्था करते हुए उसके पीछे मूल भावना भी यही होती है कि दंड ऐसा हो कि सिर्फ उसके डर से व्यक्ति क़ानून का उल्लघंन करने से डरे और बचे। 

फिर एक और प्रश्न! विधानसभा जो "लोकतंत्र का मंदिर" कहलाता है, वहां तो इन शब्दों के प्रयोग पर रोक लगायी जाती है। परन्तु इन माननीय सदस्यों द्वारा किसी भी अन्य प्लेटफाॅर्म्स, सार्वजनिक स्थलों, टीवी डिबेट्स इत्यादि जगहों पर इनके इस्तेमाल को उचित और सही कैसे ठहराया जा सकता है? सभी जगह पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया जाना चाहिये? जैसा कि एक फ़ारसी कहावत है ‘‘हर सुख़न मौक़ा व हर नुक़्ता मुक़ामे दारद’’ अर्थात हर वह बात जो किसी एक मौक़े पर ग़लत है, हर मौक़ा व मुक़ाम पर ग़लत होगी। जिस प्रकार कोई अपराध घर में किया जाये, सार्वजनिक या धार्मिक स्थल पर किया जाये, वह प्रत्येक दशा में अपराध ही होता है। साथ ही एक महत्वपूर्ण बात- ग़लत, असंसदीय व अपमानजनक शब्दों के प्रयोग पर यह प्रतिबंध सिर्फ ‘माननीयों‘ के लिए ही क्यों? बल्कि समस्त नागरिकों (जो इन माननीयों को चुनते हैं), के लिये भी क्यों नहीं होना चाहिये? जब वे शब्द ‘‘गाली’’ समान ही हैं।

एक बात और- चोर, मूर्ख नालायक़, बेवक़ूफ़, फेंकू, ये शब्द असंसदीय कैसे हो जाते हैं या हो सकते हैं? वस्तुतः ये समस्त शब्द तो किसी व्यक्ति के गुण-अवगुण या चरित्र को "मापने" का एक "बैरोमीटर" हैं। हाँ, यदि सामने वाले व्यक्ति को यह लगता है कि उसके प्रति तथ्यात्मक रूप से इन ग़लत शब्दों का ग़लत प्रयोग किया गया है, जिससे उसकी मानहानि हो रही हैं, तब वह उस व्यक्ति के विरूद्ध मानहानि के लिये सक्षम न्यायालय में जा सकता है। और हाँ; बंटाधार शब्द असंसदीय कैसे? आपको याद होगा वर्ष 2003 में म.प्र. विधानसभा के चुनाव में सुश्री उमाश्री भारती जी ने प्रथम बार बंटाधार शब्द का उपयोग किया था और वह जनता के बीच इतना चला व लोकप्रिय हुआ कि जनता ने उस एक शब्द के अर्थ को समझकर दिग्विजय सिंह की सरकार का बंटाधार कर उसे चलता कर दिया। और जब शब्द अनर्थ नहीं हुआ, तो असंसदीय कैसे? इस शब्द की उत्पत्ति ‘‘जावली‘‘ (74 बंगले स्थित कार्यालय) में स्व. ‘‘अनिल दवे’’ के नेतृत्व में बनी चुनाव प्रचार की नीति के तहत ही गढ़ी गई थी, ऐसा  कहा और माना जाता था।

         ‘फेंकू’ शब्द को भी इसी प्रकार असंसदीय सीमा में लाना उचित नहीं होगा। क्योंकि जो उंची फेंकता है, अर्थात वास्तविक धरातल के विपरीत हवाई बात करता है, उसी को तो फेंकू कहा जाता है। यह एक  वास्तविकता हैं। नालायक़, बेवक़ूफ़, भी रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाले सामान्य प्रचलित शब्द हैं। परन्तु ‘‘पप्पू’’ निश्चित रूप से व्यक्ति विशेष के लिए चिन्हित मीडिया द्वारा गढ़ा हुआ शब्द है। ऐसा परसेप्शन बना दिया है। अन्यथा ‘‘पप्पू’’ शब्द अंससदीय शब्द कैसे हो सकता है। "पप्पू" मंदबुद्धि वाले व्यक्ति के लिये तीन शब्दों को एक शब्द में समाहित कर बनाया हुआ शब्द है। चोर शब्द के लिए जरूर साक्ष्य की आवश्यकता है। लेकिन वह भी असंसदीय शब्द नहीं है। बल्कि वह ग़लत-बयानी हो सकती है और ग़लत-बयानी असंसदीय नहीं कही जा सकती है। इसके लिये दूसरी, आपराधिक कार्यवाही विद्यमान क़ानूनों के तहत की जा सकती है। 

इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बात जो छूट गयी है, और जिस पर किसी का ध्यान आकर्षित नहीं हुआ है, वह यह कि माननीयों पर तो असंसदीय शब्द के प्रयोग पर रोक लगा दी गयी है, परन्तु माननीय स्पीकर ही यदि इन शब्दों का प्रयोग करने लगें तब उन पर रोक कौन लगायेगा? इसका सीधा उत्तर फिलहाल यहां पर नहीं है। लोकतंत्र के मन्दिर "विधानसभा" के समस्त सदस्यों (विधायकों) के अधिकार समान  होते है। स्पीकर भी एक विधायक ही होता है। अतः उसके अधिकार, दायित्व व कर्त्तव्य भी एक समान ही हैं। परन्तु स्पीकर को यह विशेषाधिकर अवश्य होता है कि वह सदन की कार्यवाही को किस तरह से चलाये। अतः लोकतन्त्र में यह कल्पना करना कि स्पीकर की आसंदी पर बैठने वाला विधायक अध्यक्ष के रूप में ऐसी ग़लती नहीं करेगा या नहीं कर सकता है, न्यायोचित नहीं होगा। ‘‘किंग्स मेक्स नो मिस्टेक‘‘ अर्थात राजा कोई ग़लती नहीं करता है के  सिंद्धान्त को लोकतंत्र में स्पीकर पर लागू करना एक ख़तरनाक स्थिति होगी। अतः इस उल्लघंन को रोकने की प्रक्रिया भी स्वयं स्पीकर को ही तय करनी चाहिये, जिसे माननीयों की ली जाने वाली क्लास में बताया जाना चाहिये। 

अंत में यह बहुत ही दुर्भाग्य ही नहीं वरन अत्यंत एक शोचनीय स्थित है कि देश के संसदीय/विधायिकी इतिहास के लगभग 75 साल पूर्ण होने वाले हैं, और जिसका ध्येय वाक्य आचार: परमो धर्मः होना चाहिये, बावज़ूद इसके, “माननीयों“ को क्या संसदीय है, और क्या असंसदीय है, यह सिखाने की आवश्यकता अभी भी पड़ रही है। अर्थात “तमीज़“ सिखाने की आवश्यकता पड़ रही है। मतलब बदतमीज़ को तमीज़ सिखाना असंसदीय नहीं कहलायेगा? देश का यह कैसा “परिपक्व“ होता लोकतंत्र है, जो कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता हैै? वैसे असंसदीय शब्दों के उपयोग पर रोक ‘‘भारतीय संस्कृति’’ की रक्षा में उठाया गया यह क़दम ही माना जायेगा, जिसके संरक्षण एवं संवृद्धि का दावा भाजपा करती आयी है। इस दृष्टि से ‘‘व्यवहारिक’’ रूप में भाजपा को साधुवाद! क्योंकि तकनीकी रूप से तो यह क़दम यद्यपि स्पीकर (जो कि निष्पक्ष एवं दल विहीन होता है) ने उठाया है। परन्तु एक झंडा, एक राष्ट्रभाषा, कर की एक दर इत्यादि का झंडाबरदार होने के कारण भाजपा को भाषा, संस्कृति की सुरक्षा में  उठाये जाने वाले क़दम को विधानसभा के ‘वेल’ से बढ़ाकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश में लागू करने का प्रयास करना होगा। क्योंकि संसद व अधिकतर विधानसभाओं में भाजपा का शासन होने के कारण वास्तविकता में पार्टी द्वारा चयनित व्यक्ति ही स्पीकर होते हैं।

यह “लेख“ डीएनएन चैनल पर हुई डिबेट के विषय को लेकर विस्तारित किया गया है, जिसमें मैं भी शामिल हुआ था।

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