शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

‘‘उच्चतम् न्यायालय का ‘‘निर्णय’’ कितना प्रभावी ‘‘कितना औचित्यपूर्ण’’?

संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ‘‘उच्चतम् न्यायालय’’ के समस्त निर्णय न्यायिक और बंधनकारी होते है। लेकिन इसके बावजूद हमेशा ही उच्चतम् न्यायालय के निर्णयांे के औचित्य पर बहस होती रही है और यह स्वस्थ्य व मजबूत लोकतंात्रिक न्याय व्यवस्था का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। आरोपित नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से संबंधित प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने आज जो निर्णय दिया हैं वह वर्तमान जन आंकाक्षाओं को निराश करता हैं। उच्चतम् न्यायालय ने आरोपित प्रत्याशी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि अयोग्यता का प्रावधान अदालत नहीं जोड़ सकती हैं, क्योंकि यह कार्य संसद का हैं। फिलहाल दागी नेताओं को मात्र आरोपित होने पर चुनाव लड़ने से छूट दी है, जो नीति पूर्व से ही चली आ रही है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहा है कि राजनीति का अपराधीकरण बढ़ा हैं, तथा व्यवस्था में भ्रष्टाचार भी बढा हैं, जो खतरनाक है। 
उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी पार्टियाँ अपने उम्मीदवारो के आपराधिक रिपोर्ट कार्ड नागरिकों के सामने उजागर करें, उसका प्रचार प्रसार करे, एवं उम्मीदवार स्वयं भी ‘‘उस पर लम्बित समस्त आपराधिक प्रकरणों की जानकारी जनता को बतावें। सबसे विचित्र बात प्रथमतः यह है कि देश के उच्चतम न्यायालय ने इस प्रकरण में ‘‘कानून बनाने का कार्य संसद का है’’, इस आधार पर हस्तक्षेप करने से इंकार किया जबकि इसी न्यायालय ने पूर्व में अन्य कई मामलों में ऐसे निर्णय/निर्देश दिये है जो कानून बनाने के समान ही हैं। तब ऐसे संवेदनशील मामले में जहां एक ओर स्वयं उच्चतम न्यायालय मामले की गंभीरता को देखते हुये अपराध का प्रचार प्रसार कर आरोपी को तदानुसार आचरण करने का अवसर दे रहा है तो दूसरी ओर वही देश न्यायालय राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिये यह कहकर कि इस पर कानून बनाने का अब वक्त आ गया है, (ताकि आपराधिक रिकार्ड वालों को सदन में जाने से रोका जा सके) क्या यह दोहरा मापदण्ड़ कहलायेगा हैं? परन्तु ऐसा करते-करते दागी नेताओं को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने से रोकने के लिए कानून बनाने की जिम्मेदारी उस संसद पर छोड़ दी हैं जिसमें पहिले से ही 180 से ज्यादा (लगभग 34 प्रतिशत) दागी संासद शामिल है। अर्थात जब संसद ही दागी नेताओं से भरी पड़ी है, तब ऐसी संसद की स्वयं पर किसी भी प्रकार की रोक लगाने के लिए कानून बनाने की इच्छा शक्ति की कल्पना भी एक आम नागरिक कैसे कर सकता है? न्यायिक प्रक्रिया, दंड प्रक्रिया सहिंता, कानून, इत्यादि के दुरूपयोग के आधार पर हम कोई कार्यवाही ही न करें, यह उचित नहीं होगा। अपितु प्रत्येक कानून व व्यवस्था में दुरूपयोग किए जानेे की संभावनाएं हमेशा बनी रहती है। प्रश्न उन संभावनाओं को कम करना है, न कि वैसे दुरूपयोग से ड़र कर नियम कानून में हम कोई सुधार लाने के प्रयास ही न करेें।  
उच्चतम् न्यायालय ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि एक आरोपित नागरिक को तो सदचरित्र प्रमाण पत्र न मिलने के आधार पर नौकरी ही नहीं मिल पाती हैं तब उसी समानता पर लोकतंत्र में जनसेवा की सर्वोच्च नौकरी (कोई भी चुना हुआ नेता यही जुमला कहते-कहते नहीं थकता कि वह जनता का सेवक या नौकर हैं।) क्यों कर मिलना चाहिए, यही विरोधाभास इस निर्णय में भी परिलक्षित हो रहा है।
वैसे यह निर्णय ‘आप’ पार्टी के लिये राहत देने वाला है। चूँकि इसी मुद्दे को केजरीवाल ने  अन्ना आंदोलन के समय यह कहकर उठाया था कि असली संसद तो यहाँ है जो सामने रामलीला मैदान में बैठी जनशक्ति है। जिसमें एक तिहाई से ज्यादा संासद आरोपित हैंं‘ वह देश की संसद’’ तो दागी है। उन दागी संासदो को इस्तीफा देकर आरोप मुक्त हो जाने के बाद पुनः चुनाव लड़कर आना चाहिए। परन्तु जब दिल्ली में सरकार बनाई तब यही सिद्धान्त स्वयं उन्होने नहीं अपनाया। उनमें उनकी पार्टी के 20 से भी ज्यादा विधायक/मंत्री दागी है। 
‘दागी’ का सरल मतलब होता है दाग का लग जाना। जब हमारे कपड़े पर दाग गिर जाता है तो हम कपडे़ को अच्छी तरह से तब तक साफ करते है जब तक उसका दाग छूटकर वह साफ नहीं हो जाता है। अतः जिस प्रकार हम कपड़ो को सावधानी पूर्वक इस तरह उपयोग करते है ताकि किसी भी स्थिति में दाग न लगे। ठीक उसी प्रकार नेताओं को भी अपना सार्वजनिक जीवन इतनी सावधानी के साथ शुचिता पूर्वक जीना चाहिए ताकि किसी भी व्यक्ति को उस पर दाग लगाने का अवसर ही न मिले। अन्यथा दागी व्यक्तित्व को उस पर लगे दाग के एवज मंे कुछ न कुछ अवश्य भुगतना पड़ेगा। इसीलिए आम जनता की यह अपेक्षा कि आरोपित प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए सर्वथा उचित व न्याय संगत हैं तथा उसे शीघ्रताशीघ्र मान्य किया जाना चाहिए। इस धारणा को मजबूत करने में न्यायालय से संसद तक सभी को एकदम एकसाथ मजबूत कदम उठाने होगे। तभी बेदाग भारतीय लोकतंत्र का सच्चा उदय हो पायेगा। 

सोमवार, 17 सितंबर 2018

‘‘सरकारें ’’ देशहित में ‘‘जुमलों’’ से कब बाहर आयेगीं?

यद्यपि हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते हैं, और हैं भी। तथापि जनता लोकशाही से, लोकतांत्रिक तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यो के आधार पर देश चलाने की अपेक्षा करती है। लेकिन पिछले कई  दशकों से हमारे देश में लोकतंत्र के नाम पर ‘‘जुमले बाजी’’ ही चल रही है। एक ‘जुमले’ मात्र से कई बार सरकार बनने या बिगड़ने लगती है। 
वर्ष 1965 में ‘‘जय जवान जय किसान’’ के चुनावी नारे की बोट पर चढ़कर कांग्रेस ने चुनाव तो जीता, लेकिन आज तक न तो जवानों की वन रेंक वन पेंशन को अंतिम रूप से संतोषप्रद निदान हो पाया है (जबकि सेना के मामलो में असंतोष किंचित सा भी नहीं रहना चाहिये) और न ही किसानो की जय-जय कार लगने के बावजूद उनको फसल के लागत मूल्य का दुगना मूल्य मिला हैं। अर्थात यह भी अभी तक जुमला ही रह गया है। 
निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं देशी रियासतों के राजाओं के प्रिविपर्स व विशेषाधिकार की समाप्ति के बाद इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 में ‘‘गरीबी हटाओं’’ का नारा दिया था, जिस नारेे के द्वारा उन्होने गैर कांग्रेस-वाद के नारे के विरूद्ध भारी भरकम जीत दर्ज की थी। लेकिन बाद में वह एक जुमला सिद्ध हो गया। ‘‘गरीब’’ की गरीबी कितने प्रतिशत कम हुई, यह तो भगवान ही जाने (क्योकि आम जनता ने आज तक ऐसा महसूस नहीं किया)। वास्तव में, यदि गरीबी कम हुई होती तो कांग्रेस को (60 साल की सत्ता के बाद भी) आज भाजपा पर देश की आर्थिक स्थिति को खराब कर गरीब विरोधी सरकार होने का आरोप नहीं लगाना पड़ता। अर्थात् आर्थिक स्थिति के कारण गरीबी बढ़ती गई ‘‘यह स्वयं कांग्रेस भी मान रही है। परन्तु तत्समय तो यह जुमला बहुत उछला कि’’ भले ही गरीबी कम न हो पाई हो अपितु गरीब जरूर खत्म होते जा रहे है; और यही आज  भी देश का सबसे बड़ा जुमला सिद्ध हो रहा है। 
वर्ष 1977 को ही ले; जब आपातकाल के कारण ‘‘जे.पी’’ (जय प्रकाश नारायण) ने ‘‘इंदिरा हटाओं देश बचाओं’’ के नारे (जो शायद देवकांत बरूआ, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ‘‘इंदिरा ही भारत हैं, भारत ही इंदिरा है’’ के कथन के संबंध में दिया था) के साथ-साथ जनता पार्टी द्वारा ‘‘मानवाधिकार’’, व ‘‘स्वतंत्र मीडिया’’ एवं ‘‘लोकतंत्र बचाने’’ का नारा दिया था। इस जुमले पर घमंडी कांग्रेस सरकार बुरी तरह से घराशाही हो गई थी। लेकिन जनता पार्टी ने ‘‘शासक’’ हो जाने मात्र को ही लोकतंत्र बहाली मानकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। ढ़ाई वर्ष के अल्प काल में ही लोकतंत्र स्वच्छंदता व अराजकता में बदल गया और जनता पार्टी को आरएसएस की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अपनी सत्ता बीच में ही खोना पड़ी। इस तरह लोकतंत्र बचाओं का नारा भी अंततः एक जुमला ही सिद्ध होकर रह गया और वास्तविक लोकतंत्र अर्थात ‘‘जनता’’ का ‘‘जनता के लिए’’ एवं ‘‘जनता द्वारा’’ के संबंध में जन नागरिक आज भी प्रतीक्षारत है।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 में ‘‘जब तक सूरज चाँद  रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा’’ के नारे के साथ सहानुभूति लहर पर चढ़कर तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत (314सीट) प्राप्त करने के बावजूद उक्त बहुमत कांग्रेस ने मात्र 5 साल में ही खो दिया और इस प्रकार इंदिराजी का नाम चांद के अस्तित्व तक रहने की बात मात्र एक कल्पना होकर रह गई।  
इसके पश्चात् वर्ष 1989 में मंडल व कमंडल का जुमला आया। इस पर भी सरकार बनती बिगडती गई। मंडल का डंक आज तक भी भुक्त भोगी भोग/भुगतने को मजबूर है और ‘‘कमंडल’’ आज भी भगवान श्रीराम जन्म स्थल (अपनी अधिकृत जगह पर) मंदिर बनने का रास्ता ताक रहा है। ‘‘सौगंध राम की खाते है, मंदिर वही बनायेगे’’; ‘‘विपक्ष’’ से ‘‘सत्ताधारी दल’’ होकर, देश के 23 राज्यो में शासन करने वालों के नारे को अभी भी न्यायालय के निर्णय का इंतजार है। इस प्रकार राम मंदिर के निर्माण का नारा भी लगातार आज तक जुमला मात्र ही बना हुआ है। ऐसा कब तक बना रहेगा यह भी भविष्य के गर्भ में है। धारा 370 हटाने का बहुत पुराना संकल्प को आज भी लोग मात्र एक जुमला ही मानते है। महिलाओं को बराबर का अधिकार एवं विधायिका में 33 प्रतिशत का आरक्षण देने का प्रस्ताव भी कई वर्षो से संसद में अटका हुआ रहकर जुमले का पहनाव ओढ़कर निरीह बनकर प्रतिभूत होने की बाँट जोह रहा है और वास्तविकता नहीं बन पाया है। 
प्याज की महगाँई के आसूँ एक सरकार को बदल देते है तो सत्तारूढ़ होने वाले दल को कुछ ही समय में रूला भी देते है और इस तरह ‘‘प्याज’’ भी एक जुमला ही बनकर रह जाता है। इस प्रकार समस्या जस की तस बनी रहती है। वर्ष 2010 में तृणमूल कांग्रेस द्वारा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान दिया गया नारा ‘माँ’ ‘माटी’ व ‘मानुष’ के तीनो तत्वों का आज कही अता-पता न होकर वह एक जुमला मात्र बच गया है। विदेशों से कालाधन लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख जमा होगंे, इस सर्वाधिक आकर्षक जुमले को कौन भूल सकता है? क्योकि वर्तमान सरकार ने स्वतः ही बाद में इसे जुमला मान लिया। ‘‘गर्दन जमीन पर कट रही है व टेबिल पर बिरयानी खा रहे है’’ यह भी मात्र एक आरोप न रहकर जुमला ही सिद्ध हुआ। आज तक सीमा पर आंतकी गतिविधियों व शहीदो की संख्या में कितनी तुलनात्मक कमी हुई है? यह आपके सामने ही हैं। ‘‘एक राष्ट्र एक दर’’ का समस्त पक्षो द्वारा दिये गया नारे का जी.एस.टी. में आज क्या हर्स हुआ है यह आपके सामने ही हैं। रूपया गिर रहा है, देश की साख गिर रही है, यह कथन भी रूपये के 73 डॉलर तक पहुचने के कारण बुरी तरह से एक जुमला ही सिद्ध हो रहा है। आज की सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का वह बयान है जो पेट्रोल व डीजल के मूल्यो की वृद्धि पर  आया है कि ‘‘हम इसके लिये कुछ नहीं कर सकते’’ यह स्वीकारिता आज का सबसे बड़ा जुमला बना हुआ है। कारण स्वयं रविशंकर प्रसाद सहित एनडीए के अधिकांश सदस्योे ने कुछ वर्षो पूर्व ही तत्कालीन यूपीए सरकार को पेट्रोल व डीजल की मूल्य वृद्धि पर बुरी तरह से घेरा था। उस समय उन्होंने बैलगाड़ी व साईकल के प्रदर्शन द्वारा अपना सांकेतिक विरोध भी दर्ज कराया था। आज इस जुमले पर वर्तमान सरकार स्वयं ही असहाय हैं। ‘‘विदेशी घरती पर मोदी का डंका’’ भी एक जुमला इसलिए हो गया है क्योकि सीमा से लगे समस्त पडोसी देशों में (भूटान को छोड़कर) मोदी का डंका नहीं बज पा रहा हैं (इस संबंध में अटलजी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘हम लोग अपने दोस्त तो बदल सकते हैं पर पडोसी नहीं बदले सकते’’) वर्तमान में पड़ोसियों से संबंध किस स्तर तक गिर गये है, यह सर्वविदित ही है। वर्तमान के ‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ एवं ‘‘अच्छे दिन-आने वाले है’’ बहुप्रचलित जुमलों  के परिणाम आपके सामने है। क्या वास्तविकता को देखते हुये हम इन्हे जुमला कहने से परहेज कर सकते है?
कभी-कभी सोचकर हास्यास्पद लगता है कि राजनीतिक जुमलेबाजी से ग्रस्त नेतागण घरेलू जीवन में कैसा बर्ताव करते होंगे? घर में मनपसंद सब्जी ना बनने पर; देखिये मैं इस प्रकार की सब्जी की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस प्रकार की सब्जी को कोई जगह नहीं हैं। बच्चों द्वारा किसी चीज के लिए जिद करने पर देखिये ये आपके निजी विचार है। पार्टी आपकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं। पत्नी के साथ घरेलू झगड़े को लेकर रिश्तेदारों के बीच देखिये मेरे शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। मुझे बदनाम करने के लिए ये विपक्ष की एक चाल है और अंत में पत्नी के द्वारा सुलह न करने पर देखिये मेरे शब्दों का गलत मतलब निकाला गया है। मेरे कहने का कदापि यह मतलब नहीं था इत्यादि-इत्यादि।
इस प्रकार यह स्पष्ट है इस देश की राजनीति चाहे पक्ष द्वारा हो अथवा विपक्ष के द्वारा हो, जुमलो पर ही आधारित व केन्द्रित होती है; वास्तविकता पर नहीं। जनता असहाय मूक दर्शक मात्र बन कर रह गई है। समस्त नेतागण देश को सोने की चिड़िया कहते नहीं अघाते। यदि वास्तव में देश को सोने की चिड़िया बनाना है तो सरकारों को अपनी कार्यशैली को जुमलों से हटकर एक कदम आगे बढ़कर वास्तविकता व हकीकत में उतारने की आवश्यकता है। तभी हमारा यह देश विकास की ओर तेजी से आगे बढ़ पायेगा। अन्यथा विश्व के अन्य देशों की तुलना में हम हमेशा पिछड़ते ही जायेगे व पिछड़ते-पिछड़ते एक समय अंतिम निचले स्तर पर खड़े हो जायेगे। क्योकि विश्व तो ‘‘वास्तविकता’’ का अनुशरण करते हुये तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है, जहाँ शायद इस तरह के जुमलों का कोई स्थान नहीं है। 
अतं में वर्ष 1989 के चुनाव में वी.पी. सिंह को लेकर बना एक जुमला ‘‘राजा नहीं फकीर हैं, देश की तकदीर हैं’’ जो शायद देश की यर्थाथ स्थिति को ही व्यक्त करता है, इसलिये वह (एक मात्र) जुमला नहीं रह गया है। लेकिन इसके विपरीत भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश के नागरिको से स्वच्छता का आव्हान निश्चित रूप से जुमला सिद्ध न होकर एक सफल अभियान बनते जा रहा है। इसी प्रकार से समस्त जुमलों को मूर्त रूप देने की समय की आवश्यकता है। लेख खत्म करते-करते एक बात और ध्यान में आयी केजरीवाल की अभूतपूर्व नायाब घोषणा ‘‘आपकी सरकार आपके द्वार‘‘ की तर्ज पर जो 70 से अधिक सेवाओं को घर पहुंच सेवा के रूप में मूर्तरूप देने का ऐतहासिक संकल्प लिया गया हैं। उम्मीद है वह संकल्प जुमला न रहकर तेजी से वास्तविकता का असली जामा पहन सकेगा, ताकि दूसरे नेताओं व दल के लिये भी यह प्रेरणा स्रोत बनकर वे सही व सार्थक दिशा को अपनाने में अग्रसर होगें।    

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

क्या देश के नागरिको के रहवासी भवन के प्रति सुरक्षा की गांरटी हेतु कानूनी प्रावधान बनाने का समय नहीं आ गया है?

विगत एक हफ्ते के भीतर देश की राजधानी दिल्ली के पास एनसीआर में नवनिर्मित या निर्माणाधीन या पुरानी बिंल्डिग अचानक ढ़ह जाने की लगातार चार घटनाएँ हो गई जिस कारणं सम्पत्ति के अलावा जानमाल का भी बड़ा नुकसान हो गया। ये घटनाएं 17, 21, 22 जुलाई 2018 के बीच गाजियाबाद, शाहबेरी, मसूरी, साहिबाबाद में हुई हैं। शाहबेरी नोएडा में छह-छह मंजिला दो निर्माणाधीन इमारत गिरने से 10 लोगो की मौत हो गईं। मसूरी में पांच मंजिला निर्माणाधीन इमारत के ढहने से 2 लोगो की मृत्यु हो गई। नोएडा के सेक्टर 63 में भी एक निर्माणाधीन बिंल्डिग की दीवार गिरने से लोगो की जान चली गई। ग्रेटर नोएडा सूरजपुर के पास मुबारकपुर गांव में तीन मंजिला इमारत गिर गई जिसमें से तीन लोगो को मलबे में से निकाल कर किसी तरह बचाया गया। गाजियाबाद के अशोक वाटिका इलाके में एक मकान के ढहने से 1 व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इस के अलावा एक इमारत के पिलर के झुकने के कारण 16 परिवार को दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा। आज ही भिंवडी में सात साल पुरानी इमारत ढ़ह गई। ये समस्त निर्माण कोई बाढ़ या भूंकप की प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं ढ़हे, बल्कि निर्माण में गुणवत्ता की कमी या भवन के जर-जर हो जाने के कारण ढहे। आखिर इन घटनाओं के लिए दोषी कौन? आज के प्रदूषित वातावरण से अलग लिये हुया यह एक ज्वलंत प्रश्न है।
सामान्य नागरिक जिदंगी भर की अपनी मेहनत पसीने की कमाई से बचत करके स्वयं के रहने के लिए या तो स्वयं भवन बनवाता है या बिल्ड़रों से खरीदता है। इस प्रकार लगातार हो रही भवन दुर्घटनाओं के कारण उसके मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि उसकी सामाजिक सुरक्षा का कोई दायित्व किसी संस्था या सरकार का है अथवा नहीं? घटना घटित हो जाने के बाद सरकारें बिल्ड़रांे के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कर एक नही कई-कई जाँच एजेंसियां एक साथ बैठा देती हैं और घटना में जानमाल की हानि होने पर पीड़ित परिवार को 2-4 लाख रूपये का मुआवजा देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेती है। परन्तु साधारण गरीब परिवार की जिदंगी भर की कमाई से एक मात्र निर्मित भवन के नुकसान की भरपाई के लिये कुछ नहीं देती हैं।
जरा सोचिये! एक आम नागरिक की जिंदगी में रोटी और कपड़े के बाद उसका एकमात्र  जीवनदायी सपना होता है कि उसका स्वयं का मकान हो जिसमें वह शांति व सुख का अहसास महसूस कर जीवन आराम से व्यतीत कर सके। वह अपनी कडी मेहनत पसीने की कमाई से विभिन्न अत्यावश्यक खर्चो में भी जीवन भर थोड़ी-थोड़ी कटौती करके बचत कर या तो किश्तों में बिल्ड़र्स को पैसे देता है या मकान-ऋण लेकर उसे किश्तों में जमा करता है। 99 प्रतिशत मामलों में मकान के निर्माण की दृष्टि से मकान मालिक को कतई तकनीकि जानकारी नहीं होती है। इसलिए निर्माण के लिए वह सम्पूर्ण रूप से ठेकेदार इंजीनियर्स व बिल्डर पर ही निर्भर रहता है। बिल्डरों के मामले में भी अधिकांशतः तकनीकि रूप से सर्वथा अनभिज्ञ सा अर्धभिज्ञ होते है। जब कोई बिल्डर्स से मकान खरीदता है और वही मकान किसी तकनीकि दोष या भवन निर्माण सामग्री घटिया होने के कारण अचानक एक दिन भर-भराकर गिर जा़ता है, तब उस नागरिक के सामने (बेघर हो जाने के कारण) एक बड़ा संकट सामने आ खड़ा होता है कि अब उसे आंधी बरसात एवं गर्मी से सुरक्षित रखने वाली उसकी छत सदा के लिए उससे छिन गई है। साथ ही यह संकट उसके व्यवसाय प्रोफेशन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल कर संकट को और बढाता है। इस प्रकार उसको दोहरा नुकसान झेलना पड़ता है। 
जब कोई व्यक्ति किसी निजी एंजेसी से या राजमिस्त्री से मकान का निर्माण कराता है और उसमें कोई तकनीकि दोष होने के कारण या निर्माण सामग्री सहित कार्य की गुणवत्ता न होने से जब वह मकान ढ़ह जाता है तब भी उसके पास कोई चारा नहीं बचता है। उसमे कानूनी कार्यवाही के लिए आर्थिक और मानसिक हिम्मत भी नहीं बचती है। वह मात्र निर्दोष मूक दर्शक बना रहता है। उक्त समस्त त्रासदी से निपटने के लिए आज तक न तो जनता ने ही जीवन के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया और न किसी सरकार ने ही इस संबंध में ऐसे भुक्तभोगी नागरिको के नुकसान की भरपाई के लिए कभी कुछ सोचा हैं। 
आज इस विषय पर गंभीरता से सोचने का समय क्या नहीं आ गया है? और यदि आज भी हम इस दिशा में नहीं सोचते है, तो ऐसी घटनाओं में निरंतर वृद्धि होने की बात के बाद तो हमें सोचने के लिये मजबूर होना ही पड़ेगा। लेकिन तब तक सैकड़ो निर्दोष जीवन व बेहताशा सम्पत्ति का नुकसान अवश्य हो चुका होगा। अतः केन्द्रीय व राज्य सरकारंे अविलम्ब ऐसे भुक्तभोगी नागरिकों के हितो की रक्षा लिए कुछ न कुछ कानून अवश्य बनायें जिसमें सर्वप्रथम यह प्रावधान किया जाय कि जब भी कोई बिल्डर मकान बेचता है, तब उस पर अनिवार्य कानूनी दायित्व एवं बाध्यता हो कि वह भवन का आवश्यक इश्ंयोरंेस करा कर ही बेचे। भले ही ऐसे इश्ंयोरंेस का शुल्क वह अपनीे मूल रकम में शामिल कर उपभोक्ता से वसूले। दूसरा या तो यह इश्ंयोरंेस कम से कम 25 वर्षो के लिए हो अथवा वार्षिक प्रीमियम का प्रावधान रखने पर सोसायटी के वार्षिक शुल्क में ही प्रीमियम की राशि को जोड़ दिया जाय। नगर पालिका, नगर पंचायत या ग्राम पंचायतों में इंजीनियर्स की टीम बनाई जाय जो प्रत्येक प्राइवेट निर्माण की अनवार्य रूप से जांच कर गुणवत्ता में कोई कमी पाई  जाने पर वैसे घटिया निर्माण कार्य को रोक सके। ताकि ऐसी आपदाओं पर रोक लगे।
जिस प्रकार से आज कल केन्द्रीय व राज्य सरकारे करोड़ो-अरबों रूपये की सब्सिड़ी व जीवन दायनी सुविधाएं मुफ्त देकर लोगो को अक्रमण्य बना रही है, तब उसकी तुलना में जिसने अपनी जिदंगी भर की कमाई भवन लेने में लगाई और उसका वह भवन घटिया निर्माण होने के कारण ढह जाए तब उस स्थिति में क्या सरकार का कोई दायित्व नहीं बनता है कि वह पीड़ित को आर्थिक   सहायता देकर नुकसान की भरपाई करे। अभी हाल में मोटर वीहकल एक्ट में संशोधन प्रस्तावित कर यह प्रावधान किया गया है कि दुर्घटना में मृत्यु होने पर 2 लाख का मुआवजा दिया जाय। जब पीड़ित किसान को फसल खराब होने पर सरकार मुआवजा देती है, प्राकृतिक आपदा आने पर थोडा़ -बहुत आंशिक ही मुआवजा देती है। तब इस प्रकार की मानव निर्मित आपदा जिनको रोकने का दायित्व प्रजातंत्र में चुनी हुई सरकार का ही होता हैं, ऐसी (लापरवाही व दुराशय के कारण हुई) दुर्घटना पर पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का प्रावधान कानून में क्यों नहीं होना चाहिए? इस लेख का मुख्य विचारणीय विषय यही हैं। पीड़ित नागरिकों का इसमें दोष नहीं है। अविलम्ब इस विषय में सोचकर संबंधित क्षेत्रों से चर्चा करके कोई न कोई सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता आज के समय की मांग है। ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं के बढ़ने से रोका जा सके। अन्यथा बेकसूर निर्दोष, नागरिक अनवरत इस तरह की आर्थिक एवं मानसिक पीड़ा सहने को मजबूर होते रहेंगे। 

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

सर्वोच्च निर्णय! कोई सर्वोच्च नहीं!

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध दिल्ली सरकार की अपील पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देकर जो व्यवस्था की, उसका घोषित प्रभाव यह हुआ कि संवैधानिक रूप से दिल्ली में न तो मुख्यमंत्री ही और न ही उपराज्यपाल सर्वोच्च है। उच्चतम न्यायालय ने चुनी हुई सरकार के महत्व को स्थापित करते हुये दिल्ली प्रदेश के संबंध में यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि लोकतंत्र में सत्ता का अधिकार चुनी हुई सरकार के पक्ष में ही होना चाहिये तथा मत्रिमंडल के निर्णय को उपराज्यपाल को मानना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि दिल्ली प्रदेश अन्य प्रदेशो के समान एक पूर्ण राज्य नहीं है,बल्कि कुछ विशिष्ट शक्यिाँ लिये हुये केन्द्र प्रशाषित राज्य ही है। इसलिए तीन विषयों जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था को छोड़ शेष विषयों में दिल्ली सरकार (मंत्रिमंडल) द्वारा लिये गये निर्णयों को उपराज्यपाल को मानना चाहिए, बल्कि उच्चतम न्यायालय ने एक कदम आगे जाते हुये यह भी कहा कि दिल्ली के एलजी राज्यपाल नहीं बल्कि प्रशासक है। उच्चतम न्यायालय ने दोनो पक्षों को समझाते/लताड़ते हुये कहा कि न किसी की ‘तानाशाही’ होनी चाहिये और न अराजकता वाला रवैया होना चाहिये। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय नेे एक ऐसा निर्णय दिया है जिसे सभी पक्ष अपनी विजय मानकर हृदय की गहराई से स्वयं की जीत मान कर पीठ थप थपा रहे है और जश्न मना रहे हैै। लेकिन वास्तव में यह जीत उच्चतम न्यायालय की है। जिसने सभी पक्ष के मन में अपने निर्णय के प्रति गहन विश्वास पैदा किया है। यद्यपि यह भी सत्य है कि कोई भी पक्ष अपने को हारा हुआ स्वीकार नहीं करना चाहता है, क्योकि राजनीति में अनुभूति (पर्सेप्शन) एक महत्वपूर्ण कारक होता है। इसलिये समस्त जनता पक्ष के बीच अपने को जीता हुआ बताकर पिछले तीन साल की संवैधानिक असफलता में अपने पक्ष को मजबूत बताने के लिये उच्चतम के निर्णय का ही सहारा ले रहे है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली राज्य के उपराज्यपाल को राज्यपाल नहीं प्रशासक है कह कर उपराज्यपाल के प्रति कड़क भाव को ही व्यक्त किया है। 
फिर भी ‘अराजकता’ व ‘राज’ के बीच सीमा रेखा खींचने के बावजूद उच्चतम न्यायालय स्पष्ट रूप से उपराज्यपाल व मुख्यमंत्री के अधिकार एवं अधिकार क्षेत्र के विभाजन करने से बचती रही। इसलिये उच्चतम न्यायालय ने यह अंत में यही कहा कि विवाद की स्थिति में दोनो पक्षों को अपना मामला मिल बैठकर आपस में सुलझाना चाहिए। साथ ही मंत्रिमंडल का कोई निर्णय संविधानोंत्तर होने की स्थिति में मतभेद की स्थिति में ही विवाद को राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए। 

सोमवार, 4 जून 2018

आरएसएस के आमंत्रण की ‘‘प्रणब दा’’ द्वारा स्वीकारिता पर इतना हंगामा क्यों?

‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ मुख्यालय नागपुर में प्रत्येक वर्ष संघ तृतीय वर्ष शिक्षा वर्ग के समापन (दीक्षांत समारोह) का आयोजन करता है। इसके अतिरिक्त संघ प्रत्येक वर्ष विजया-दशमी (दशहरा) के शुभ अवसर पर मुख्यालय नागपुर में ही वार्षिकोत्सव का आयोजन भी करता है। इन अवसरो पर संघ देश की विभिन्न प्रमुख हस्तियों को अतिथियों (मुख्य वक्ता) के रूप में बुलाता रहा है। इसी कड़ी में इस वर्ष भारत के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम प्रणब मुखर्जी को संघ द्वारा संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समापन पर प्रमुख अतिथि (वक्ता) के स्वरूप आमंत्रण भेजा गया जिसे प्रणब दा द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। जब मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी! ऐसे मामलों  में निमंत्रण देने व उसे स्वीकार करनेे का अधिकारिक क्षेत्र दोनो पक्षों के अलावा अन्य तीसरे किसी भी पक्ष को टोका टोकी, करने या उनपर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने का अधिकार नहीं है। फिर भी हमेशा की तरह बयानवीरो के इस विषय पर बयान क्यों? यही प्रश्न है।  
राष्ट्रपति बनने के पूर्व प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं में से एक संकटमोचक नेता के रूप में जाने जाते रहे है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम प्रमुखता से लिया गया था। कांग्रेस के वे उन कुछ बिरले नेताओं में से रहे है, जो कट्टर कांग्रेसी होने के बावजूद निष्पक्ष व्यक्ति माने जाते रहे है। वर्ष 1997 में वे उत्कृष्ट सांसद भी चुने गये थे। कांग्रेसी संसदीय दल एवं लोकसभा सदन के नेता के साथ-साथ लम्बे समय तक वरिष्ठ केबिनेट मंत्री होने के कारण भी विरोधी दलो के नेताओं से उनके काफी अच्छे व्यक्तिगत संबंध रहे है। राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार होने के बावजूद उन्हे इसका फायदा भी मिला था। यद्यपि  उन्होने कांग्रेस छोड़कर कुछ समय के लिए एक नई प्रादेशिक पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के नाम से बनाई थी, जिसका बाद में वर्ष 1989 में पुनः कांग्रेस में विलीनीकरण हो गया था। अर्थात् एक सुदृढ़ कांग्रेसी नेता होने के नाते कांग्रेस की सत्ता की नाव को ‘‘दादा’’ ने अपने मजबूत कंधों पर नाविक के रूप में अपने ‘‘नेता’’ को काफी लम्बे समय तक हवा की विपरीत दिशा में भी अपने कौशल व अनुभव से पूर्ण निष्ठा पूर्वक निभाया और सफलता दिलाई थी।
ऐसे दृढ़ निष्ठा वाले समर्पित पूर्व कांग्रेसी नेता प्रणब दा के द्वारा आरएसएस के निमंत्रण को स्वीकार कर लिए जाने पर कुछ कांग्रेसी नेताओं की ओर से जैसे अवमानना पूर्ण और अशोभनीय बयान आ रहे है, वे अत्यन्त खेद जनक है। यद्यपि कांग्रेस पार्टी की अधिकारिक प्रतिक्रिया ‘‘कोई टिप्पणी नहीं’’ ‘‘(नो कमेंटस’’) थी, जो स्वागत योग्य है। आलोचक कांग्रेसी सदस्य आलोचना करते समय इस बात को भी भूल गये कि प्रणब दा ने मुखर्जी फाउडेशन के शुरू होने के अवसर पर संघ के शीर्ष नेताओं को बुलाने के अलावा अपने राष्ट्रपति पद के कार्यकाल के अंतिम समय में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में दोपहर भोज के लिये भी आमंत्रित किया था। प्रथम दृष्ट्या तो किसी भी कांग्रेसी को यह समझना आवश्यक है कि जब पार्टी का कोई सदस्य राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहंुच जाता है तो उसके बाद न केवल पद पर विराजमान रहने तक वह पार्टी का सदस्य नहीं रहता है बल्कि संवैधानिक पद से विमुक्त होने के बाद भी उसकी स्थिति वैसी ही बनी रहती है। यह एक स्थापित मापदंड है कि नैतिक रूप से सर्वोच्च संवैधानिक पदों जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल के पदो से पदमुक्त होने के बाद भी वह (पदविमुक्त) व्यक्ति पार्टी का मूल सदस्य न रहकर (संवैधानिक पद की गरिमा को बनाये रखने के उद्देश्य से) वह राष्ट्र का गैर राजनैतिक नागरिक हो जाता है। नैतिक रूप से राजनैतिक पार्टी का सदस्य न होने के बावजूद उसकी स्वयं की राजनैतिक विचार धारा हो सकती है। लेकिन वह सक्र्रिय राजनीति में भाग नहीं ले सकता। इस दृष्टि से पूर्व राष्ट्रपति, कांग्रेस पार्टी की नहीं राष्ट्र की एक धरोहर है। 
राजनैतिक दृष्टि से किसी विशिष्ट विचार धारा को मानने के बावजूद, अन्य किसी विपरीत विचार धारा द्वारा दिये ऐसे आमंत्रण को स्वीकार कर लिए जाने पर कोई आलोचना नहीं होनी चाहिये। इसके विपरीत बयानों द्वारा विवेचना हो रही है जिसका एक ही अर्थ निकलता है, कि अब कांग्रेस को अपने नेता प्रणब दा पर शायद यह विश्वास नहीं रह गया है कि वे कांग्रेस विरोधी विचार धारा आरएसएस के कार्यक्रम में जाकर अपनी कांग्रेसी विचार धारा को बनाये रख पायेगें। अर्थात ‘‘दा’’ कहीं अपनी पहचान तो नहीं खोने जा रहे हैं? लेकिन प्रणव दा इतने हल्के है नहीं।  विचार धाराओं की टकराहट के बावजूद यदि संघ ने दा को अपने मंच पर बुलाकर विचार प्रकट करने का मौका दिया है, तो यह संघ की व्यापक सोच व बड़प्पन का ही परिचायक है। साथ ही प्रणब दा भी बधाई के पात्र है जिन्होने उक्त सम्मानीय निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। लेकिन कुछ कांग्रेसियों की मनोदशा का निम्नस्तर उनके बयानो से समझा जा सकता है।
कांग्रेसियों को एक बात को और समझना होगा। संघ द्वारा एक ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठित कांग्रेसी व्यक्तित्व को बुलाने में कोई परहेज न करने के बावजूद संघ में अंदर खाने यदि कोई संकट खंडा नहीं हुआ है, तो कांग्रेस महात्मा गांधी की 150 जयंती के अवसर पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित करके संघ प्रमुख को मुख्य वक्ता के रूप में बुलाने (दुः) साहस का परिचय देकर माकूल जवाब क्यों नहीं देती? संघ की विचार धारा से उनका विरोध तो हो सकता है। वे उससे सहमत भी नहीं हो सकते है, और यह उनका पूर्ण अधिकार है। लेकिन उन्हे इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आज भाजपा का 21 राज्यों पर पूर्ण या गठबंधन के माध्यम से शासन है। अर्थात् अपरोक्ष रूप से संघ का ही शासन है, क्योकि कांग्रेसियो ने ही खूब पानी पी पीकर लम्बे समय से यही कथन किया है कि संघ सांस्कृतिक संगठन नहीं है बल्कि उसका एक राजनैतिक संगठन है व संघ ‘‘रेशमबाग’’नागपुर से ही भाजपा को निर्देशित करते हुए देश में भाजपा का शासन संचालित करता है। ये जुमले सुनते-सुनते हमारे कान पक गये थे। अब देश के दो तिहाई से अधिक भाग पर शासन करने वाली भाजपा को निर्देशित करने वाले संघ के निमंत्रण को स्वीकार करके प्रणब दा ने देश के बहुमत को ही मान दिया है, जिसके लिये निश्चित रूप से वे साधुवाद के पात्र है। 
कांग्रेसियो को एक सलाह और है कि वे अपने नेता प्रणव दा की योग्यता, ज्ञान, वाकपटुता, विचार मंथन, राजनैतिक व सार्वजनिक जीवन के दीर्घ अनुभवों व तीव्र बुद्धि पर पूर्ण विश्वास रखे कि ‘‘रेशमबाग’’ में उद्बोधन के बाद वे संघी होकर नहीं निकेलेगें। हाँ शायद दोनो विचारधाराओं में जो फरक 36 के आकड़े का है, उसमें देश हित में कुछ अंतर, व दूरी अवश्य कम होगे, क्योकि ऐसे आयोजन का अंततः उद्ेश्य भी यही होता है।
मुझे याद आता है जब डॉ. सुनीलम समाजवादी विचार धारा वाले पूर्व विधायक के मंच पर जाने का मुझे निमत्रंण मिला था। तब कई साथी मेरे वहां जाने को पचा नहीं पा रहे थे। तत्समय  मैने अपने साथियों से यही कहा था कि वहां जाकर मैं दृढ़ता से अपनी बात को रखकर उन्हे संदेश देने का प्रयास करूगाँ। विश्वास रखिये, सुनीलम का रंग मेरे ऊपर नहीं चढेगा, और शायद मेरे उद्बोधन को सुनने के बाद सुनीलम दुबारा मुझे नहीं बुलाएगें। आज यही विश्वास प्रत्येक कांग्रेसी को डॉ. प्रणब मुखर्जी के प्रति रखना चाहिए। 

बुधवार, 30 मई 2018

कर्नाटक के नाटक (घटनाक्रम) में न्यायपालिका की भूमिका क्या पूर्णतः न्यायोचित रही?

अन्ततः कर्नाटक में सियासी दाव पंेच आजमाने के बाद मात्र ढ़ाई दिन की बी.एस. येदियुरप्पा की सरकार का अंत हो गया, जो होना ही था और अन्ततः नई सरकार चुनने का रास्ता साफ हो गया। अधिकांश राजनैतिक विश्लेषक भी उच्चतम न्यायालय (न्यायपालिका) की भूमिका को लेकर काफी संतुष्ट से दिखें। खासकर उच्चतम न्यायालय ने जब राज्यपाल द्वारा बहुमत के परीक्षण के लिये निधारित की गई समय सीमा 15 दिन से घटाकर 48 धंटे से भी कम कर दी, जो खरीद फरोख्त को रोकने में सहायक रही। 
आम चुनाव होने के बाद सरकार बनाने के लिये आमंत्रण दिये जाने के संबंध में संवैधानिक प्रावधान, कानून और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा इस विषय मंे समय-समय पर प्रतिपादित सिंद्धान्तों की न्यूनतम जानकारी का होना अत्यंत आवश्यक हैं। तभी कर्नाटक के मामले में राज्यपाल व उच्चतम न्यायालय की भूमिका की विवेक पूर्ण व न्याय सम्मत सही विवेचना हो पायेगी। यह तो स्पष्ट है कि प्रथम दृष्टया कहीं न कहीं न केवल कर्नाटक के राज्यपाल के द्वारा स्थापित कानून और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, बल्कि उच्चतम न्यायालय भी राज्यपाल की उक्त गैर संवैधानिक प्रक्रिया को रोकने में असफल रहा। संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार राज्यपाल मुख्यमंत्री व (मुख्यमंत्री की सलाह पर) मंत्रियों की नियुक्ति करता है। विधानसभा के आम चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद राज्यपाल का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह बहुमत प्राप्त नेता को ही सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करे। संविधान में यह भी व्यवस्था है कि बहुमत प्राप्त नेता के निर्णय पर पहुंचने का राज्यपाल का विवेक अंतिम हैं। इसके बावजूद समय-समय पर राज्यपाल के सरकार बनाने के निमत्रंण के निर्णय के विवेक को न्यायालयों में चुनौती दी जाती रही है। राज्यपाल के निर्णयों को कुछ अवसरों पर उचित ठहराया गया है, तो कुछ अवसरों पर गलत भी ठहराया गया हैं। राज्यपाल का बहुमत के प्रति निर्णय उसके विवेकाधीन है। परन्तु यह राज्यपाल का विवेक स्वेच्छाचारी व निरंकुश कदापि नहीं हो सकता, अपितु वह कानून व तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। 
एक बात और वर्तमान कर्नाटक संकट के सुलझाने के संबंध में कही जा रही थी कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने एस. आर. बोम्बई के प्रकरण में जो निर्णय प्रतिपादित किया था कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के धरातल पर ही होना चाहिए, उसे भी वर्तमान प्रकरण में गलत तरीके से लागू करने का प्रयास किया गया। एस. आर. बोम्बई प्रकरण के अनुसार बहुमत के परीक्षण विधानसभा के धरातल पर ही होने चाहिये। परन्तु यह सिंद्धान्त ऐसी स्थिति हेतु प्रतिपादित किया गया था, जब कोई चुनी हुई स्थापित सरकार से विधायकगण या विधायको का कोई समूह या कोई पार्टी या दल समर्थन वापिस ले लेता है, तदनुसार उस सरकार के तथाकथित रूप से अल्पमत मे आ जाने की स्थिति में बहुमत सिद्ध करने का परीक्षण राज भवन में न होकर विधानसभा में होगा। 
लेकिन जहां तक आम चुनाव के पश्चात प्रथम बार सरकार बनाने के लिये आमंत्रण देने का प्रश्न है, संवैधानिक प्रारूप स्पष्ट है कि बहुमत प्राप्त दल के नेता को ही सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाना चाहिए। यह भी चर्चा में हैं, कि किसी भी एक दल को बहुमत प्राप्त न होने की स्थिति में सबसे बडे़ दल को सरकार बनाने के लिए राज्यपाल नेे आमंत्रित करना चाहिये। संविधान में यह भी स्पष्ट है कि राज्यपाल के विवेकानुसार जिस व्यक्ति कोे पूर्ण बहुमत प्राप्त होना समझा जाय, उसे ही सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया जाना चाहिए, फिर चाहे वह व्यक्ति एक दल का नेता हो या अनके समूहों के गठबंधन का नेता हो। ऐसा गठबंधन चुनाव पूर्व का या चुनाव परिणाम आने के बाद का भी हो सकता है। ऐसा कोई अनुच्छेद या नियम संविधान में नहीं है, जो चुनाव बाद के गठबंधन को बहुमत की स्थिति में सरकार बनाने से प्रतिबंधित करता हो। कर्नाटक के वर्तमान नाटक में यह स्पष्ट था, कि किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। तीनो दल एक दूसरे के विरोध में ही लड़े थे। लेकिन चुनाव परिणाम आने के पश्चात, तुंरत कांग्रेस व जेडीएस गठबन्धित होकर एचड़ी कुमारस्वामी को गठबंधन दल का नेता चुन लिया गया। इस प्रकार विधानसभा में उनके गठबंधन की संख्या 115 अंक हो गई थी, जो बहुमत के आकड़े को पार कर गई थी। बहुमत न के होने बावजूद भाजपा को जब राज्यपाल नेे सरकार बनाने के लिये निमंत्रित किया था, तब उसके पास मात्र 104 सदस्य ही थे, जो बहुमत के आकड़े से 7 अंक कम थे। ये 7 अंक (सदस्य) कहां से और कैसे आयेंगें, इसका उल्लेख भाजपा द्वारा उसके सरकार बनाने के दावे वाले पत्र में नहीं किया गया था। संवैधानिक रूप से विधानसभा में दल बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी पार्टी के जब तक दो तिहाई संख्या से अधिक विधायक नहीं टूटते  है, तब तक विभाजन मान्य नहीं होता है, और तब व्हिप जारी होने की स्थिति में, व्हिप के विरूद्ध वोट ड़ालने वाले अथवा अनुपस्थित रहने वाले विधायकों की सदस्यता, समाप्त हो जायेगी। इस प्रकार तत्समय कोई भी टूट का दावा, किसी भी पार्टी के द्वारा दूसरी पार्टी के संबंध में या अन्य दल के विधायको द्वारा भाजपा को समर्थन देने हेतु अस्तित्व में ही नही था। अतः स्पष्ट रूप से सरकार बनाने का दावा करते समय भाजपा अल्पमत में थी, और जेडीएस-कांग्रेस का गठबंधन बहुमत में था। तब संवैधानिक कानूनी व स्थापित परम्परा के अनुसार राज्यपाल का यही दायित्व था कि वे गठबंधन के नेता चुने गए एच.ड़ी. कुमारस्वामी को ही सरकार बनाने के लिए निमत्रिंत करते व उन्हे निश्चित समयावधि में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश देते। 
जब किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला हो या और कोई भी अन्य दल सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहा हो, तभी सबसे बड़े दल के नेता को बुलाकर (चाहे वह दावा करे अथवा नहीं) निमंत्रण देने के पूर्व राज्यपाल को उससे सरकार बनाने के संबंध में चर्चा करनी चाहिये, कि क्या वह नेता सरकार बनाने में सक्षम है, और यदि हाँ, तो कैसे? तब बहुमत की स्थिति यदि राज्यपाल के विवेक की सतुंष्टि करके स्थायी सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त करती हो, तभी राज्यपाल ऐसे नेता को सरकार बनाने का आमंत्रण दे सकते है। अन्यथा विपरीत स्थिति में, राज्यपाल के पास ‘‘राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश’’ के अलावा ‘‘अन्य कोई विकल्प’’ शेष नहीं रह जाता है।
प्रस्तुत कर्नाटक प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय ने उक्त तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया कि आमंत्रण देने के क्षण तक भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं था, इसलिए वह निमत्रंण प्रारंभ से ही अवैध होकर शून्य है और इस कारण से सरकार को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिये था। इसीलिये जब उच्चतम न्यायालय के समक्ष राज्यपाल द्वारा बी.एस. येदियुरप्पा को सरकार गठित करने के लिये दिये गये आमंत्रण पत्र को चुनौती दी गई थी, तब उच्चतम न्यायालय ने उस पर रोक न लगाते हुए यदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था। यदि तभी माननीय उच्चतम न्यायालय शपथ ग्रहण पर रोक लगाकर, राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाकर नेता चुनने का निर्देश देती, तो सर्वथा झूठे बहुमत का दावा करने वालों की शेखी की हवा निकल जाती व दूध का दूध व पानी का पानी (के समान) निर्णय हो जाता और सत्ता के प्रभाव के, दुरूपयोग के बिना बहुमत का वास्तविक निर्णय हो जाता जो एक ऐतहासिक निर्णय होता। यद्यपि यह भी एक सत्य तथ्य हैं कि न्यायालय का यह कार्य नहीं है कि वह विधायको की गिनती करता रहे। शायद इसी हिचकिचाहट के कारण माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बहुमत सिद्ध करने के लिये राज्यपाल द्वारा दी गई समय सीमा को 15 दिन से घटाकर 48 धंटे से भी कम कर दी गई थी। फिर भी कभी न कभी उच्चतम न्यायालय को इस विवाद को अंतिम रूप से जरूर निर्णित करना ही होगा, ताकि भविष्य में चुनाव परिणाम आने के बाद त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में सबसे बडे़ दल की तुलना में यदि चुनाव पश्चात गठित कोई गठबंधन ‘‘बहुमत का स्वीकार योग्य साक्ष्य आधारित दावा’’ पेश करता है तो उनमे से आमंत्रित करने की प्राथमिकता का क्रम किस प्रकार रहेगा? शायद सरकार बनाने का प्रथम आमंत्रण सबसे बड़े दल (जिसे बहुमत प्राप्त नहीं है,) की तुलना में बहुमत वाले गठबंधन को दिया जाना ही उचित क्रम होगा। साथ-साथ बहुमत की सरकार स्थिर सरकार हो सकेंगी अथवा नहीं यह महत्वपूर्ण बिन्दू भी सरकार गठित करने के निमंत्रण देने में एक महत्वपूर्ण कारक रहेगा।
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा जब इस प्रकरण का अंतिम रूप से निराकरण हो जायेगा तभी ऐसे विवाद की स्थिति, टलेगी और भविष्य में राज्यपाल के विवेक का इस तरह राजनीति से प्रेरित निरकंुश स्वेच्छाचारी उपयोग संभव नहीं हो पायेगा। 
                  !जय हिंद!  

मंगलवार, 22 मई 2018

‘‘बयान वीरो’’ के ‘‘बिगड़े बोल’’ पर ‘‘प्रतिबंध’’ के लिए ‘‘कानून’’ कब तक?

 आज कल ‘‘मीडिया’’ में ‘‘शर्मनाक’’ ‘‘विवादित’’ ‘‘बिगड़े बोल’’ की बहार आई हुई है। यह लगभग एक फैशन सा बन गया है और जो भी इस ‘‘फैशन’’ में भागीदार नहीं हो पाते है, उन्हे अपने ‘‘पिछड़े हुए’’ या ‘जड़ या रूढिवादी’ होने की ‘‘पदवी’’ मिलने की आशंका बनी रहती है।
यूँ तो पिछले काफी समय से यह देखा जा सकता है कि नेतागण ‘‘बिगड़े बोल’’ बोलकर और मीडिया को अपने ऊपर केन्द्रित करके उसे हथिया लेने में सफल हो जाते है। मीडिया भी जाने अनजाने में उनकी ऐसी धूर्ततापूर्ण करतूतों का शिकार बनते जा रहा है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में बयान वीरों द्वारा मीडिया को अगवा किये जाने की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। या यूँ कहा जाय की यह मर्यादा की सीमा का उल्लघंन होते जा रहा हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
स्वतंत्रता को न केवल स्वच्छन्दता की सीमा तक वरण संवैधानिक सीमा से परे तो कतई हीं नहीं पहुँचाया जाना चाहिए। हर चीज की सीमा के समान ही व्यक्ति की स्वतंत्रता की अधिकतम सीमा भी बिगड़े बोल की प्रारंभिक सीमा तक ही सीमित है। आज जब साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले, शांति भंग करने वाले, देशद्रोह की सीमा में आने वाले समस्त कथन ‘अपराध’ की श्रेणी में आते है तब ऐसे वक्तव्य जिन्हे समस्त जन मानस अनावश्यक व अनर्गल मानकर उसकी आलोचना कर रहा होता हैं, तभी ऐसे बयान वीर उक्त वक्तव्यों से या तो मुकर जाते है या यह दर्शाने लगता है कि उनके कथनो को मीडिया द्वारा गलत ढंग से पेश किया जा रहा है या उनकेे कहने का यह मतलब नहीं था, या उनके कथन का गलत अर्थ निकाला जा रहा है, या उसने ऐसा नहीं कहा, या प्रस्तुत कथन उस व्यक्ति का व्यक्तिगत वक्तव्य है, तथा वह कथन पार्टी या संगठन का मत नहीं है। असहनीय हो जाने की स्थिति में या अंत में ज्यादातर मुददों में प्रायः वह वक्ता माफी का रास्ता अपना लेता है तब ऐसे विवादित, गैर-जिम्मेदाराना बयानों के लिये व्यक्तिगत अथवा संस्थागत (यदि वह प्रतिनिधी रूप में देता है) कानून में कड़क सजा का प्रावधान क्या आज के समय की सभ्य समाज की आवश्यकता नहीं है। सजा भी ऐसी कड़क हो, ताकि बयानवीर लोगों को ऐसे बयान देने में पसीना छूटने लगे ताकि कि वेे हृदयघात के ड़र से भयभीत होकर ऐसे बयान देने से पीछे हटने लगें। कठोर सजा का प्रावधान कई कानूनों में आज कल किया जा रहा है। जैसे ‘‘पास्को कानून’’ में अभी हाल में ही दंड का प्रावधान किया गया हैं व अन्य क्षेत्रो में भी ऐसी ही कड़क सजा के प्रावधान किए जाने की मांग उठती जा रही है। 
ऐसे बयान जो देश को गुमराह करते हो, ऐसे बयान जो युवा पीढ़ी का अंधेरे में डाल देते हो, ऐसे बयान जो सामाजिक सौहार्द को खत्म कर देते हो, ऐसे बयान जिनसे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती हो, ऐसे बयान जो धार्मिक भाईचारे की कब्र खोद देते हो, ऐसे बयान जो देश में अविश्वास की खाई पैदा कर देते हो, ऐसे बयान जो जीवन की सहज, सरल, स्वाभाविक व्यवस्था को समाप्त कर देते है, तब ऐसे अनर्गल बयानों को भी दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड प्रक्रिया के अधीन लाकर दंडनीय अपराध बनाना समयाचीन व सर्वथा उपयुक्त होगा। 
क्या आज उपयुक्त समय नहीं है, जब ऐसे शर्मनाक बिगड़े बोल का संज्ञान योग्य अपराध की श्रेणी में लाकर उपयुक्त कानून बनाया जाये? विशेषकर ऐसी स्थिति में जब विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हमारे भारत में विश्व के अन्य देशों की तुलना में एक नागरिक के जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन को सुव्यवस्थित, मर्यादित, सामाजिक, व संवैधानिक बनाने के साथ-साथ स्वतंत्रता के मूल सिंद्धान्त के लिए भी कानून बने हुए है। हमारे जीवन का हर पल व प्रत्येक संास (विभिन्न कानूनों द्वारा) निर्धारित सीमा से बंधी हुई है, जैसे की ‘‘दाये चलिये’’, ‘‘थूकना मना है’’, ‘‘धूम्रपान वर्जित है’’, ‘‘निधारित शांति क्षेत्र है’’, ‘‘हेलमेट पहनना आवश्यक है’’, ‘‘कार बेल्ट बाधना आवश्यक है’’, रात्रि 11 बजे के बाद डीजे बजाना वर्जित है’’ इत्यादि- इत्यादि। अतः इक्कीसवीं सदी में उत्पन्न ऐसे नये अपराध के लिए भी एक विशेष कानून बनाने की अत्यन्त आवश्यकता है, यह एक गंभीर सोच का विषय है। कुछ क्षेत्र के तथाकथित नगण्य मानवाधिकारियों के द्वारा यह कहा जा सकता है कि ‘‘यह तो स्वतंत्रता पर चोट होगी’’ या यह मूलभूत अधिकारो का हनन होगा। यहां पर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता व स्वच्छन्दता में भारी अंतर है।
प्रत्येक नागरिक को संवैधानिक सीमा में रहकर बोलने व अपने विचारो को व्यक्त करने की स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है। लेकिन किसी भी मूल अधिकार के समान बोलने की स्वतंत्रता का मूल अधिकार भी संवैधानिक कर्तव्यों व नीति निर्देशक सिद्धान्तों के साथ-साथ उन समस्त सीमाओं में बधा हुआ है, जो देश के सामाजिक ताना बाना व देश की गरिमा को बनाये रखती है। इसलिए इन सबकी गरीमा को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए एक विशेष कानून की अत्यावश्यकता है, जो बयानों की सीमा तय करे और उसके लांघने वालो के लिए उसे संज्ञेय अपराध बनाएगा।  यद्यपि हमारा यह भी अनुभव है कि सर्वसम्मति होने के बावजूद महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में अभी तक लम्बित है व आज तक संसद से पारित होकर कानून नहीं बन पाया है। इसी तरह इस मुद्दे पर भी समस्त राजनैतिक दल शायद ही एक मत हो पाएँ। क्योकि यहाँ हमाम में सब नंगे हैं। इसलिये वे स्वयं के ऊपर प्रतिबंध लगाना-क्यों कर पसंद करेेंगे। इसके लिये तो जनता जर्नादन को ही आगे आना होगा। 

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

सलमान खान को क्या ‘‘भारत रत्न’’/‘‘नोबेल पुरस्कार’’ मिल गया है?

पिछले तीन दिनो से खासकर दो दिन लगातार इलेक्ट्रानिक मीडिया व कुछ हद तक प्रिंट मीडिया सेलीब्रिेटी सलमान खान को ही दिखाये-छापे जा रहा है, जिसे देखने-पढ़ने के लिए आम दर्शक-पाठक मजबूर है। बेशक सलमान खान देश के बड़े फिल्मी सेलीब्रिटी है। ‘‘वालीवुड’’ में अमिताभ बच्चन के बाद वे शायद देश के दूसरे सबसे बड़े सफल अभिनेता है। सौ करोड़ से अधिक की कमाई करने वाली फिल्म क्लब में सबसे ज्यादा सफल फिल्मे (ग्यारह) सलमान की ही हिट हुई है। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो अब प्रधानमंत्री है, के साथ वे अहमदाबाद में पंतग भी उड़ा चुके हैं। इन सब सफलताओं के बावजूद वे अपने व्यक्तिगत जीवन में एक निहायत सौम्य व भद्र पुरूष तथा उदार व दरियादिल वाले व्यक्ति माने जाते है। वेे स्वयं तथा अपने एनजीओ बिइिंग हुय्मन के माध्यम से जरूरत मंद आम जनो की सेवा के लिए हमेशा तत्पर अग्रसर रहते है। वैसे तो वे हर त्यौहार मनाते हैं, लेकिन मुस्लिम (यद्यपि उनकी माँ हिन्दू है) होने के बावजूद वे गणेश उत्सव सार्वजनिक रूप से उत्साह पूर्वक मनाते है। 
पिछले दिनो सलमान खान ने ऐसा कौन सा राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय सफलता का झंडा गाड़़ दिया हैं, जिसके कारण लगभग पूरा का पूरा मीडिया लगभग लगातार, बिना रूके, उनको महिमा मंडित कर रहा है। आखिरकार अभियुक्त सलमान को 20 साल की मुकदमे बाजी के लम्बे अंतराल के बाद दो काले हिरण मारने की पांच साल की सजा (अधिकतम नहीं) ही तो मिली थी। एक सेलीब्रिटी को सजा मिलने की घटना को अधिकतम ब्रेकिंग न्यूज दिखाने के बजाय लगातार बिना ब्रेकिग के लाईव कवरेज करके क्या मीडिया अपने दायित्व युक्त होने का बोध कर रहा है? क्या मीडिया की नजर में यह एक सेलीब्रिटी के लिए प्राईज (इनाम) था जो कि हिन्दी फिल्मो में अक्सर देखने को मिलता है। क्या मीडिया भी ‘‘रील ;तममसद्ध लाईफ’’ को ‘‘रियल ;तमंसद्ध लाईफ’’ में उतारने का प्रयास टीआरपी के चक्कर में तो नहीं कर रहा था। सलमान खान ने क्या खाया पिया, उसने नाश्ता नहीं किया, रात्रि खाना नहीं खाया, दूसरे दिन लंच में पत्ते गोभी की सब्जी थी, उसका बॉडीगार्ड शेरा भी था, इत्यादि-इत्यादि अनेक ऐसे लम्हे पिछले तीन दिनो से मीडिया अपने लगभग बंधनकारी हुये दर्शको जो स्वयं के द्वारा ही इस बंधन को ओढे़ हुये है, के कारण परस्पर दिखाने व देखने के लिये मजबूर है, यह कहना अतिशयोक्ती नहीं होगा। क्या स्वयं को राष्ट्रीय व सबसे आगे कहने वाले चेनलों का यही विश्वास है कि यही देश का राष्ट्रीय चरित्र है जिसे लगातार दिखाया जाकर वे राष्ट्रीय चैनलो की होड़ में अगुआ बनने का प्रयास कर रहे हैं। 
मीडिया व टीआरपी के इस नैक्सस पर देश हित में कोई औचित्य पूर्ण प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता क्या समय की मांग होनी नहीं चाहिये ? एक सैलीब्रिटी होने के कारण समाज के ही बीच स्थित उनके प्रशंसक वर्ग पर निश्चित रूप से प्रभाव पडता है। लेकिन उसका मूल्यांकन समाज व देश हित में करना मीडिया का कार्य व दायित्व है। इस दायित्व के अधीन ही मीडिया को घटना दिखाकर घटना या घटना करने वाले कारक से उत्पन्न होने वाली त्रणात्मक उर्जा को फैलाने कि बजाय उसे कम करने का प्रयास नहीं करना चाहिये था। पिछले तीन दिनो से जो कुछ भी मीडिया परोस रहा हैं, इससे देश का विकास कितने आगे बढा हैं? मीडिया का कार्य चौथे स्तंभ के रूप में देश के विकास में रचनात्मक सहयोग प्रदान करना है। लेकिन मीडिया की हालत तो देखिये! सलमान खान जोधपुर जेल में जब अंदर थे, तब एक कैदी महेश सोनी दो दिन तक सलमान के साथ रहा था, को डिबेट में एक सेलीब्रिटी के रूप में बुलाकर उसके साथ हुई बातचीत को परोस रहा है; क्या इसीलिये ये राष्ट्रीय चेनल कहलाते है? वास्तव में मीडिया को दूसरो को आइना दिखाने की बजाय पहिले स्वयं ही आईना में झँाकना होगा, तभी उसे समझ में आयेगा कि भविष्य में इस तरह से अमूल्य समय की बर्बादी न हो जैसी अभी तीन दिनो से हो रही है। 
‘‘आज-तक’’ की एंकर स्वेता सिंह जो सलमान खान को जमानत मिलने पर प्रशंसक दर्शको की खुशिया को प्रदर्शित कर रही थी, ब्रेक पर जाने से पूर्व उनके मुख से प्राकृतिक रूप से यह कथन निकल गया कि प्रशंसक शायद यह नहीं समझ पा रहे है कि वे जेल से बाहर आये है? इस लेख का पूरा निचोड़ इसी कथन में निहित है। यदि अभियुक्त के जमानत पर छूटने पर सैकडों प्रशसंको द्वारा पटाके फोड़ने के साथ दिवाली मनाने पर एंकर की जमानत पर निरंतरता में सहजता से यह प्रश्नवाचक भाव आ जाता है? तो यही प्रश्न उस एंकर के मीडिया घराने सहित सभी मीडिया से क्यो नहीं पूछा जाना चाहिये। आखिर वे सब भी तो एक सेलीब्रिटी के गलत कार्य के लिये वही सब कर रहे है, जो प्रशंसक कर रहे है; जहां विवेक का पूर्णतः अभाव है। 
इलेक्ट्रानिक मीडिया को किसी घटना का कितना प्रसारण किस तरीके से करना चाहिए; यह निर्णय उस घटना के गुण-दोष को देखते हुये करना चाहिए, क्योकि उसके प्रसारण का सीधा प्रभाव आम नागरिको दर्शको पर होता है, जो उनको देखते है। तुलना कीजिये! एक सलमान खान जो दो काले हिरण जो एक लुप्त होती हिरण की जाति है, की हत्या के दोषी न्यायालय द्वारा ठहराये गये हैं, जबकि सेना के वीर जवान सीमा पर सुरक्षा करते हुये शहीद हो जाते है। कितने शहीदो की लाईव शवयात्रा सीमा से लेकर उनके गृह स्थल तक तथा वहां से उनकी अंतिम यात्रा से लेकर पंचतत्व तक की यात्रा व पश्चात उनकी तेरह दिन की श्रृंद्धाजली तक की अलौकिक यात्रा का कितना प्रसारण लाईव बिना ब्रेकिंग के किया है? इस दृष्टि से मीडिया यदि अपना आत्मवलोकन कर ले तो इस लेख लिखने का उद्देश्य सफल हो जायेगा। मेरा लिखने का कदापि यह आशय नहीं है कि किसी बुरी घटना को कवरेज न किया जाए, बल्कि ऐसी घटनाओं का कवरेज इस तरह से होना चाहिए ताकि समाज में न केवल उस बुरी घटना के प्रति घृणा पैदा हो बल्कि उसके दुष्परिणाम से समाज में चेतना भी उत्पन्न हो, ताकि आगे भविष्य में इस तरह की बुरी घटनाओं को घटने से रोकने में उनका सक्रिय योगदान हो सके। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले व्यक्ति (गण) का सामाजिक बहिष्कार भी हो, ताकि भविष्य में इस तरह की बुरी गलत घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके। सलमान खान का प्रकरण इसी श्रेणी में आता है। 
यह उसका पहला अपराध नहीं था, इसके पूर्व उस पर चार अन्य आपराधिक मामलों में अभियोजन चला जिसमें एक अवैध हथियार के मामले में वह निर्दोष छूट गया था। लेकिन अन्य तीन मामलो में जिसमें दो वन्य जीव के शिकार से संबंधित थे में उन्हे सजा हुई थी, जो बाद में अपीलीय न्यायालय द्वारा संदेह का लाभ देकर उसे बरी कर दिया गया था। वर्ष 2002 में हिट एड रन प्रकरण में असावधानी पूर्वक गाड़ी चलाने के कारण एक मासूम की मौत हो गई थी। हमारे देश की आपराधिक न्याय प्रणाली ऐसी है, जिसमें अपराधी को सजा देना काफी बमुश्किल होता है। सौ अपराधी छूट जाये, परन्तु एक भी निरापराधी को सजा न मिले इस सिंद्धान्त पर आधारित अपराधिक न्यायिक दंड प्रक्रिया संहिता के कारण समस्त शंका से परे होने पर ही सजा दी जाती है, जिसका फायदा सलमान खान को भी मिला। यदि पूर्व में ही घटित वन्य जीव से संबंधित अपराधो के समय समस्त मीडिया सहित प्रशंसकों व नागरिको ने सलमान के आपराधिक कृत्य की आलोचना र्भत्सना व बहिष्कार किया होता तो शायद एक अच्छे इंसान सलमान को आज का यह बुरा दिन नहीं देखना पड़ता। (प्रत्येक अच्छे इंसान में ये कुछ न कुछ बुराईयाँ अवश्य होती हैं, कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता है)
कुछ फिल्मी सेलेब्रिटीस द्वारा यह कहा जा रहा है कि न्याय मिलने में काफी समय व्यतीत हो चुका है व लगभग घटना के 20 साल बाद सजा मिलना क्या उचित है? वास्तव में उनका यह कथन ‘‘घाव पर नमक छिड़कने’’ के समान है। निश्चित रूप से न्याय में देरी न्याय न मिलने के समान है जो आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया का एक सर्वमान्य सिंद्धान्त हैं। इस सिंद्धान्त को यदि यहाँ लागू किया जाए तो वास्तव में उन मृतक हिरणो को व विश्नोई समाज (जो हिरण की भगवान की तरह पूजा करते है) जो लम्बे समय से यह लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हे न्याय नहीं मिला क्योकि देरी से न्याय अन्याय ही है। लेकिन फिल्मी उद्योग में तो उलटा चोर कोतवाल को डाटे की स्थिति है। वैसे भी हमने किसी भारत रत्न या नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले विशिष्ट जनो की किसी भी घटना बाबत कभी भी ऐसी बिना ब्रेक की लगातार मीडिया कवरेज नहीं देखी। शायद उन्होने सलमान खान जैसा कार्य नहीं किया होगा? 
खैर सलमान खान अब जमानत पर रिहा हो गये है जो उनका नागरिक संवैधानिक अधिकार है। दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत व उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयो के द्वारा प्रतिपादित सिंद्धान्त के अनुसार ऐसी परिस्थितियों में अभियुक्त को जमानत देना एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया हैं। लेकिन इस प्रश्न पर भी मीडिया की दीवानगी व डिबेट न केवल ‘‘दर्शनीय’’ है, बल्कि यह उनकी अज्ञानता व बहुत कुछ उसके उतावले पन को ही दर्शित करती है। धन्य हो सलमान फैंस, मीडिया, राष्ट्रीय इलोक्ट्रानिक्स चेनल सब तथा वे सब महत्वपूर्ण व्यक्तिगण जो चेनलों पर अपना आकर्षक चेहरा दिखाने के लिये डिबेट पर आते है। ये सब भी बधाई के पात्र है क्योकि वे अपने महत्वपूर्ण समय का ऐसी डिबेटो में आकर पूरा सदुपयोग करते है?

शनिवार, 17 मार्च 2018

लाल निशान! शांतिपूर्ण मार्च?

‘‘ऑल इण्ड़िया किसान सभा’’ के बैनर तले लगभग 45 से 50 हजार निर्धन किसानो, खेतिहर मजदूरो व आदिवासी भूमिहीन श्रमिको का लगभग 200 किलो मीटर तक का पैदल मार्च 7 मार्च को ‘नासिक’ से लगातार पांच दिन रात चलकर सोमवार दिनंाक 12 मार्च को देश की आर्थिक राजधानी, व महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई के ‘‘आजाद मैदान’’ में पूर्णतः शांतिपूर्व तरीके से पहँुचा। आज के राजनैतिक नैतिकता व व्यवस्था के लगातार गिरते स्तर की मौजूदगी में इतने बड़े हुजूम के एक अहिंसात्मक शांतिपूर्ण आंदोलन का इतना अनुशासित अकल्पनीय मार्च वह भी पैदल चलते हुये शायद ही कभी देखा या सुना गया हो। मानो अनुशासन को ऊंचाई की पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया गया हो। सामान्य रूप से मुम्बई शहर में ऑफिस के समय पर टैªफिक जाम हो जाता है। 12 मार्च सोमवार को छात्र छात्राओं की परीक्षा थी। उन्हे परीक्षा केन्द्रो में पहंुचने तक किसी तरह की समस्या न हो इस स्थिति को दृष्टिगत रखते हुये व सम्पूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए खुद को कष्ट में डालकर भी, रात्रि भर पैदल चलकर, समस्त आंदोलनकारी मुम्बई पहुंचे, व शासन द्वारा गाड़ियो से पहँुचानेे हेतु की गई पेशकश को भी उन्होने नकार दिया। मुम्बई के नागरिकों की अतिथी देवो भाव की भी प्रंशसा की जानी चाहिए जिन्होने आंदोलनकारियों के लिये सुविधा पूर्ण व्यवस्था बनाई। 
‘‘लाल निशान’’ कम्युनिस्ट पार्टी का निशान है। इसकी सामान्य पहचान एक हल्की उग्र सी व अहिंसा से कुछ दूर भावना के सम्यक मानी जाती है। लेकिन इस पूरे पैदल मार्च में ऐसी पहचान से हटकर जो कभी भी गांधी जी को नहीं मानते थे, उन्होने इस आंदोलन में किसान व खेतिहर मजदूरो के साथ ताल में ताल मिलाकर तथा रास्ते भर परम्परागत संगीतमय नाच के साथ पैदल चलकर गांधी जी के मूल सिद्धांत अहिसा परमो धर्म को पूर्णतः अपनाया। इस सबके लिए वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। ‘यद्यपि अन्ना आंदोलन में भी लाखो लोग शामिल हुये थे। लेकिन वह आंदोलन एक ही जगह दिल्ली में रामलीला मैदान तक ही सीमित रहा था।’’ 
किसी ‘‘नामचीन’’ व्यक्तित्व के नेतृत्व के बिना किसान मजदूरों और श्रमिको का उपरोक्त सफल मार्च इस बात को सिद्ध करता है कि आंदोलनकारी मूल रूप से अहिंसक होते है। ज्यादातर केस में आंदोलनो का नेतृत्व करने वाले प्रसिद्ध नामचीन नेतागण अपनी नेतागिरी को चमकाने के चक्रव्यूह में अहिंसक आंदोलन को अपने फायदे के लिये हिंसा की ओर मोड़़ देते है। आश्चर्य की बात तो यह है कि लाल निशान अभी अभी हाल में ही त्रिपुरा में बुरी तरह हारा है। लेकिन महाराष्ट्र जहाँ लगभग लाल निशान का नामो निशान भी नहीं है, वहाँ पर किसान सभा के बैनर तले लाल निशान की यह सफलता एक अध्ययन् का विषय अवश्य है।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीश ने आंदोलनकारियों के डेलीगेशन के साथ, आमने सामने बैठकर तीन धंटे से ज्यादा बात चीत करके और उनकी लगभग 80 प्रतिशत से अधिक मांगो को स्वीकार करके लिखित में आश्वासन देकर आंदोलन का सफलतापूर्वक समापन कराया। इसके लिए मुख्यमंत्री भी उतने ही प्रशंसा व बधाई के पात्र है, जितने आंदोलनकारी शांतिपूर्ण आंदोलन के लिये! आंदोलनकारियो की आंदोलन समाप्ति के पश्चात घर वापसी भी वैसे ही शानदार ढ़ग से उतनी ही शांतिपूर्ण रही। सरकार ने भी विभिन्न स्थानो से आये आंदालनकारियों को परिवहन सुविधा वाहन, स्पेशल ट्रेन इत्यादि उपलब्ध कराकर उनके गंत्वय स्थान तक पहंुचाने में सहयोग प्रदान किया। यह शायद पहला आंदोलन है जहाँ तंत्र की भीड़ के गरीब मजदूर किसान, बेरोजगार शामिल हुये तथा जिसमें आंदोलनकारियो की मांगो पर तुरंत कोई लाभ न मिलने के बावजूद जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के लिखित आश्वासन पर भरोसा करके आंदोलनकारियो ने शांतिपूर्ण आंदोलन शांतिपूर्ण सोहाद्र पूर्ण वातावरण में समाप्त किया। नेता गिरी नहीं हुई। इसके लिये आंदोलन से सम्बन्धित समस्त आंदोलनकारी, शासन, प्रशासन तथा मुम्बई निवासी बधाई के पात्र है। यद्यपि यह आंदोलन कम्युनिस्ट पार्टी के झंडे तले प्रांरभ हुआ था फिर भी इस आंदोलन में शामिल भीड़ को देखते हुये वोट बैंक की खातिर समस्त प्रमुख राजनैतिक पाटियो ने अपनी अपनी उपस्थिति दर्ज कराना आवश्यक समझा। लेकिन आंदोलनकारियो ने समस्त पार्टियो के किसी भी नामी गिरामी नेतृत्व को प्रश्रय नहीं दिया। 
एक बात जरूर गंभीर है, जिस पर यहँा विचार किया जाना अत्यावश्यक है। जब मुख्यमंत्री को यह ज्ञात था कि किसानो का मार्च नासिक से 180 किलोमीटर पैदल चल कर मुम्बई आने वाला है तब उन्होने तत्काल ‘‘आपकी सरकार आपके द्वार’’ की नीति को अपनाते हुए अपने डेलीगेशन के साथ जाकर नासिक में ही किसानो के डेलीगेशन से मार्च प्रारंभ होने के पूर्व बातचीत क्यो नहीं की? यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है, परन्तु अन्तिम परिणाम सुखद आने से गाैंण हो गया है। महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि वैसा करने की स्थिति में निर्धन किसानो व भूमिहीनों को 200 किलोमीटर पैदल चलने में जो कष्ट उठाने पड़े, पैरो में छाले आये, धूप में कई बार भूखे प्यासे रहना पड़ा, इन सब तकलीफो से उनको बचाया जा सकता था। 
इस आंदोलन में आंदोलनकारियो की मांगें यद्यपि भारी अर्थ व्यवस्था का बड़ा प्रश्न लिये हुये थी। तथापि आंदोलन की शांतिपूर्ण परिणिति ये यह सिद्ध हो गया कि आंदोलन चाहे कितना ही बड़ा हो, यदि आंदोलन शांतिपूर्ण अहिंसक तरीके से समझौता वादी रूख लिये हो व साथ-साथ सरकार का रूख भी टकराहट के बजाए सकारात्मक हो तो आंदोलन में नेता लोग कितना ही प्रयास कर ले आंदोलनकारियो को शांति के रास्ते से नहीं डिगा पायंेगे। इस आंदोलन की सफलता का यही मूल संदेश है। ऐसे आंदोलनकारियो को शत्-शत् नमन् व प्रणाम। महाराष्ट्र सरकार को धन्यवाद इस आशा के साथ कि बातचीत के मध्य दिये गये आश्वासनों को निश्चित रूप से तय की गई समयावधि में सफलतापूर्वक धरातल पर लाकर समझौते की भावनाओं के अनुरूप लागू करे, ताकि इस तरह के औचित्य पूर्ण आंदोलन के स्वरूप पर जनता का विश्वास बढ़ सके।

सोमवार, 5 मार्च 2018

‘विदेशों में मोदी का डंका’’!‘‘देश में अमित शाह का डंका’’!

‘पूर्वोत्तर’’ में आये चुनाव परिणाम निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कांग्रेस मुक्त देश की सोच के अनुरूप ही हैं, जिन्होने सफलतापूर्वक विदेशों में विश्व के शक्तिशाली देश अमेरिका, रूस, चीन के रहते हुये उन्हे पछाड़कर या उनके समकक्ष विश्व नेता बनकर भारत देश का डंका बजाया है। विश्व के राष्ट्राध्यक्षों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दोस्ती व व्यक्तिगत संबंध बनाने की ओढ़ सी हो रही है। अमित शाह के नेतृत्व में पूर्वोत्तर प्रदेशांे के चुनावो में चार प्रदेशांे में से तीन प्रदेशों में भारी जीत दर्ज कर भाजपा सरकार बनाने की ओर अग्रसर हो रही है। त्रिपुरा जहाँ भाजपा को पिछले चुनाव में मात्र 2 प्रतिशत से भी कम वोट प्राप्त हुये थे, वहाँ खाता भी नहीं खुला था। पिछले पाँच सालों में अमित शाह की रणनीति व लगातार कड़ी मेहनत नरेन्द्र मोदी के साथ मिलकर रंग लाई और त्रिपुरा में भाजपा दो तिहाई बहुमत से अधिक के साथ सरकार बनाने जा रही है, जो एक स्वतंत्र भारत का ऐतहासिक रिकार्ड़ हैं। त्रिपुरा की यह जीत इसलिये भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जहाँ मुख्यमंत्री श्री माणिक सरकार हैं, जो देश के बेहद ही ईमानदार मुख्यमंत्री है। स्वच्छ छवि, ईमानदारी व साद़गी को लेकर शायद ही अन्य कोई राजनैतिक/सार्वजनिक व्यक्ति माणिक सरकार के सामने ठहरता हो। उन पर व्यक्तिगत या उनके नेतृत्व पर किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। फिर भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का 25 सालो से मजबूत अंतिम किला भी त्रिपुरा में ढह गया है। वे देश के सबसे ‘‘गरीब’’ मुख्यमंत्री रहे हैं जिसकी कल्पना वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थितियां में नहीं की जा सकती हैं। वे बेहद ही संजीदगी सादगी पंसद सामान्य व्यक्ति हैं। इसके बावजूद उनके नेतृत्व की बुरी हार इस बात को भी रेखांकित करती है कि ईमानदार छवि भी लोकतंत्र में काम नहीं आती और जन अपेक्षाओं के अनुरूप सरकार द्वारा कार्य न कर पाने के कारण ही वह जनता का विश्वास पुनः जीतने में असफल रही, यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा। 
इस जीत के लिए उत्त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के योगदान को कदापि कम करके नहीं आँका जा सकता है। आज वे भाजपा के हिन्दु कार्ड का प्रमुख चेहरा हैं, जिसे ईसाईयों व आदिवासियों के बीच रखने व परखने में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कोई हिचक नहीं दिखाई और पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय पहचान जो अभी तक देश के पूर्वोत्तर प्रदेशो से दूर थी, वहाँ पर भी सफलतापूर्वक पहचान का झंडा गाड़ा। राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने ‘‘पन्ना प्रमुख’’ को धरातल पर लाकर माइक्रो मेनेजमेंट सफलतापूर्वक लागू करके जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई, जिसके लिये वे भी उतने ही बधाई के पात्र है। राजनैतिक विश्लेषक कह सकते है कि त्रिपुरा में सत्ता विरोधी लहर (एन्टी इनकम्बेंसी) फैक्टर था, जहाँ मार्क्सवादी पिछले 25 सालांे से सरकार में थी। सत्ता विरोधी लहर फैक्टर से लड़ना दूसरे दलो को भाजपा से सीखना चाहिए। क्योकि हाल में ही गुजरात में 22 सालो की सत्ता विरोधी लहर (एन्टी इनकम्बेंसी) फैक्टर पर विजय प्राप्त कर भाजपा ने पुनः सरकार बनाई।
माणिक सरकार के नेतृत्व में हार ने माथे पर चिंता की एक नई लकीर खीच दी हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वच्छ छवि, सादगी व ईमानदारी की तुलना में जनता जन कल्याणकारी सरकार जो उनके हितो के लिए कार्य करे, उसको चुनना पंसद करती है। यदि कोई सरकार अपने चुनावी वादो को पूरा नहीं कर पाती है तो जनता बिना किसी स्केम, घोटाला, भ्रष्ट्राचार (न होने) के बावजूद उसे हटाने में भी हिचक नहीं करती है। लोकतंत्र के वर्त्तमान स्वरूप में स्वच्छ छवि ईमानदारी, सादगी सिद्धान्त आधारित कार्यकर्ता का हुजूम जो किसी भी लोकतंात्रिक प्रणाली में रीढ़ की हड्डी होती हैं मात्र, लोकतंात्रिक विजय का पैमाना सुनिश्चित नहीं करती हैं। जनता के अपेक्षाओं के अनुरूप जनहित व जनता के व्यक्तिगत हितो के लिये कार्य करना ही जीत की गाँरटी का एक मजबूत आधार हो गया हैं, भले ही उसमे नैतिकता, ईमानदारी व सादगी की कमी हो। 
अमित शाह नरेन्द्र मोदी की जोड़ी ने यह जीत प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उनके रूप में की गई पसंद व चयन एकदम सही थी जो समय-समय पर खरी उतरी। राष्ट्र को नेतृत्व व पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के लिये अपने चयन को इन दोनो नेताओं ने भी परिणाम से सही सिद्ध किया। जिस समय इन दोनो व्यक्ति का चयन किया गया था, तब इन दोनो व्यक्तियों की राजनैतिक उँचाई शायद तत्समय उक्त उच्चतम् पदो के समकक्ष नहीं थी। वे तत्समय स्थापित नेतृत्व से काफी कनिष्ठ व कम अनुभव वाले थे और उनकी सहमति के बिना ही तथा उन्हे हटाकर ही संघ ने उनका चयन किया था। अन्तोगतवा 1984 में 2 सीटो से प्रारंभ हुआ भाजपा का यह राजनैतिक सफर को इस ऐतहासिक विजय ने भाजपा को एक तथ्यपरक वास्तविक रूप से सही अर्थो में राष्ट्रीय पार्टी बना दिया हैं, जिसके लिये पूर्वोत्तर की जनता को साधूवाद!

रविवार, 4 मार्च 2018

क्या ‘‘मीडिया हाऊस’’ को राष्ट्रीय शोक घोषित करने का अधिकार नहीं दे देना चाहिए?

फिल्मी कलाकार, एक्टेªस, ‘‘डबल रोल की रानी’’ ‘‘प्रथम महिला सुपरस्टार, ‘‘पद्मश्री’’ श्रीदेवी’’ की मौत अचानक परिस्थिजन्य शंकास्पद स्थिति में दुबई में हो गई। तत्पश्चात् दुबई पुलिस द्वारा गहन जांच के बाद समस्त शंकाओ का निराकरण करते हुये श्रीदेवी की मौत डुबने की दुर्घटना से मौत का मृत्यु प्रमाण पत्र दिया गया। निश्चित रूप से आज तक की वर्त्तमान स्थिति में श्रीदेवी का 50 वर्षो का फिल्मी जीवन एक सफल और प्रथम महिला सुपरस्टार के रूप में रहा जहाँ उनके द्वारा विभिन्न चरित्रों को परदे पर सफलतापूर्वक निभाया गया। उत्तर से लेकर दक्षिण तक और हिन्दी, मलयालम, कन्नंड, तेलगु, तमिल आदि विभिन्न दक्षिणी भाषाओं में फिल्मो में कार्य करने वाली वह एक मात्र सफल अभिनेत्री रही। उनके असामयिक निधन के कुछ समय पूर्व तक वे अपने रिश्तेदार (भांजे मरवाह) की शादी में डान्स करती रही। फिर अचानक निधन की खबर मिलने से लाखो करोडो प्रशंसको को एक गहरा सदमा लगा जिसकी भावनात्मक प्रतिक्र्रिया होना स्वाभाविक ही है। क्योकि चाँद के रहने के बावजूद उनकी ‘‘चांदनी’’ हमेशा के लिये चली गई थी। इस स्वाभाविक प्रतिक्र्रिया पर मीडिया द्वारा पिछले 72 घंटो से अधिक समय तक लगा तार केवल उन्ही के बारे में प्रसारण किया जाता रहा। ऐसा करके क्या उन्होने उनके प्रशंसको, आम जनता, समाज व देश के साथ-साथ देश के चौथे स्तम्भ सहित समस्त जनमानस के साथ न्याय किया? यही एक यक्ष प्रश्न है। उपरोक्त तथ्यों के बावजूद क्या श्रीदेवी कोई राष्ट्रीय व्यक्तित्व थी या देश के प्रति उनका इतना महत्वपूर्ण योगदान था कि तीन दिनो से लगातार मीडिया में सिर्फ और सिर्फ श्रीदेवी ही छायी हुई रही। टीआरपी की होड़ में वे चेनल भी इस दौड़ में शामिल होकर 72 घंटो से ज्यादा समय से अपने चेनलो में श्रीदेवी को ही लगातार दिखाते रहे जो सामान्यतः अपने निर्धारित कार्यक्रम में कोई कटौती/परिर्वतन नहीं करते है। जैसे एन.डी.टीवी जो कई बार प्रधानमंत्री के सीधा प्रसारण को निर्धारित कार्यक्रम में परिर्वतन किये बिना ही दिखाता रहा यदि वाास्तव में मीडिया वालों की नजर में श्रीदेवी एक राष्ट्रीय नेत्री रही और इस तरह का लगातार प्रसारण पाये जाने की अधिकारी थी तो इस तरह के अनेकानेक अन्यान्य व्यक्तित्व जो पूर्व में हमारे बीच से चले गये तत्समय उनके लिए भी मीडिया इसी तरह से सक्रिय क्यो नहीं हुआ। यदि मीडिया का यह मानना हैं कि वही ऐसी एकमात्र गैरसरकारी व्यक्तित्व थी जो ऐसे टीआरपी पाने की हकदार थी तब मुझे कुछ भी नहीं कहना हैं। 
मैने भी इससे पूर्व देश हित के लिए योगदान करने वाले ऐसे ही अन्य व्यक्तित्व या इससे भी ज्यादा विशिष्ठ व्यक्तियों के स्वर्गवासी हो जाने पर मीडिया का ऐसा जमावड़ा कभी नहीं देखा। फिल्मी कला क्षेत्र से आने के कारण यहाँ श्रीदेवी के योगदान को कम करके नहीं आका जा रहा है और न ही यह किसी राजनैतिक व्यक्तित्व का विशेषाधिकार हैं कि सिर्फ उन्हे ही इस तरह से मीडिया का सम्मान मिले। लेकिन मीडिया को शायद यह भी सोचना चाहिए कि यदि समय चलता रहेगा और समय के साथ-साथ देश भी चलता रहेगा तभी देश आगे बढ़ता रह सकेगा। परन्तु पिछले तीन दिनो से मीडिया रिपोर्ट में एक रूकी हुई धड़कन को लगातार दिखाकर देश की धड़कने को रोकने का अनचाहा प्रयास अनजाने में ही मीडिया द्वारा होता रहा। उचित होगा यदि देश के प्रत्येक नागरिक द्वारा देश व समाज के प्रति उनके (श्रीदेवी) बलिदान को इस तरह से याद किया जाय जिससे उनके व्यक्तित्व तथा उनकी फिल्मो के माध्यम से समाज को दी गई शिक्षा द्वारा देश की जनता को प्रेरणा मिल सके। भारत रत्न प्राप्त व्यक्तित्वों की तुलना में पद्मश्री प्राप्त व्यक्तित्व को मीडिया का इतना ज्यादा सम्मान मिलने के कारण उत्पन्न अंतर स्पष्ट रूप से रेखंाकित हो रहा हैं। इसीलिए यह लेख के शीर्षक अनुसार मीडिया को यह अधिकार दे दिया जाना चाहिये क्योकि किसी राष्ट्रीय व्यक्ति के निधन पर सरकार द्वारा ही राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाता है। 
कुछ व्यक्ति मेरे इस लेख पर आलोचना कर सकते है जिसका उनका पूरा अधिकार है। मैं उनसे क्षमा मांगते हुये यही निवेदन करता हँू कि श्रीदेवी का व्यक्तित्व बडा था जो वास्तव में उनके अंतिम शवयात्रा में आये हुजूम से सिद्ध भी हो गया। वह पहली व शायद आखिरी अभिनेत्री रही जिसने इस पुरूष प्रधान युग वाले फिल्मी जगत में अमिताभ बच्चन जैसे व्यक्तित्व द्वारा स्थापित पुरूष प्रधानता की सर्वोच्चता को तोड़ने का साहसिक प्रयास करके महिला को पुरूष के बराबर सफलतापूर्वक स्थापित किया। शायद इसीलिए श्रीदेवी को लेडी अमिताभ बच्चन भी कहा गया। फिर भी देश आगे है, व्यक्ति पीछे। इस शोक की घड़ी में हजारो लाखों समर्थक नागरिकगण प्रार्थना करते है कि ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे व उनके परिवार को यह दुख सहने की क्षमता प्रदान करे। 

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

उच्चतम न्यायालय के निर्णय की भावना का उल्लघंन क्या ‘‘अवमानना’’ की सीमा में नहीं आता हैं?

इस समय पूरे देश में पद्मावती-पद्मावत, राजपूत समाज व करणी सेना की ही चर्चा हैं। फिर चाहे वह पिं्रट मीडिया हो, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सोशल मीडिया हो। फिल्म ‘‘पद्मावती’’ को कई संशोधन व कट के पश्चात ‘पद्मावत’ के नाम से संेसर बोर्ड द्वारा फिल्म प्रदर्शन हेतु यू.ए. प्रमाण पत्र मिल जाने के बावजूद उक्त फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने के लिए मामला उच्चतम न्यायालय तक गया।मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा एवं राजस्थान की सरकारो ने अधिसूचना जारी कर इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया। उच्चतम न्यायालय ने मध्यप्रदेश एवं राजस्थान  सरकारे द्वारा दायर पुर्नविचार याचिका सहित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के बाद नागरिको की ‘‘रचनात्मक अभिव्यक्ति’’ की आजादी के मूलभूत अधिकार के सरक्षण के आधार पर अंतिम रूप से बंधनकारी आदेश पारित कर इन सरकारो द्वारा फिल्म प्रदर्शन पर लगे इस प्रतिबंध की ‘‘अधिसूचनाओं’’ को निरस्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उक्त फिल्म का प्रदर्शन पूरे देश में बिना रूकावट के किया जाय एवं इस हेतु आवश्यक समस्त सुरक्षा प्रदान करना राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य हैं। वास्तविक धरातल पर नहीं केवल तकनीकि रूप से ‘‘पेपर’’ पर प्रत्येक नागरिक चाहे वह फिल्म का विरोध करने वाला ही क्यो न हो व राजपूत समाज तथा करणी सेना से जुड़े लोग उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को (अंतिम व बंधनकारी होने के कारण) मजबूरी में ही सही, पालन करने के लिए सत्य कथन ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं, जिस प्रकार कोई व्यक्ति, विधायक अथवा मंत्री विभिन्न संवैधानिक पदो पर चुने जाने/नियुक्ति के समय शपथ लेते समय करते हैं। साथ-साथ वह यह भी कह रहे हैं कि फिल्म का विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार हैं, जो वास्तव में सही भी हैं। 
फिल्म प्रदर्शन पर ‘‘राज्य सरकारो के रोक लगाने के आदेश’’ को उच्चतम न्यायालय द्वारा हटा देने तथा फिल्म सेंसर बोर्ड़ द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर दिये जाने के बावजूद फिल्म की स्टोरी, फिल्माकंन, दृश्य-घटना इत्यादि विषय को लेकर आलोचकों का यह मानना कि आलोचना का सर्वाधिकार सुरक्षित हैं, ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि न्यायालयो के आदेशो की विवेचना सभं्रात नागरिकगण एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति मीडिया से लेकर विभिन्न फोरम पर क्रिया-प्रतिक्रिया देते समय समझते हैं। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की राज्य सरकार तो और एक कदम आगे निकल गई। उन्होने उच्चतम न्यायालय में पुर्नविचार याचिका भी दायर की। जबकि उनके गृहमंत्री ने कहा कि हम उच्चतम न्यायालय के आदेश का पूर्णतः पालन करेगंे व मांगने पर पीड़ितो को सुरक्षा भी प्रदान की जावेगी। लेकिन साथ-साथ ही वे लोगो से यह अपील भी करते हैं कि वे फिल्म देखने ही न जायंे। 
निश्चित रूप से कानून व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकारो का संवैधानिक दायित्व हैं, जैसा कि माननीय न्यायालयो ने बार-बार रेखांकित किया हैं। फिर भी, उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद करणी सेना व राजपूत समाज ने इस फिल्म को लेकर कानून व्यवस्था बनाये रखने के ‘‘हितार्थ’’ जनता कर्फ्यू लगाकर जनता से फिल्म न देखने की अपील की हैं। इस तरह कानून  व्यवस्था बनाये रखने में अपने सहयोग देने के कानूनी दायित्व का भले ही वे शब्दशः पालन कर रहे हो। परन्तु कानून का पालन करने का यर्थाथ मतलब न केवल उसमें लिखे गये प्रत्येक शब्द का अक्षरसः पालन करना हैं, बल्कि उसमें अन्तर्निहित ‘‘भावना’’ का भी उतनी ही दृढ़ता एवं सिद्धत से पालन करना होता हैं। तभी कानून का राज सही अर्थो में लागू हैं, ऐसा माना जा सकता हैं। उच्चतम न्यायालय ने समस्त पक्षो को सुनने के बाद यह आदेश पारित किया कि पूरे देश में बे रोक टोक फिल्म पद्मावत प्रदर्शित की जावे। इसका मतलब साफ यह हैं कि राज्य सरकारो को सिनेमाग्रहो व फिल्म वितरको को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करना और साथ ही प्रतिबंधात्मक कदम सहित कानून व शांति की हर हालत में व्यवस्था बनाये रखने के लिये जरूरी सभी उपाय करना आवश्यक है।ं लेकिन राज्य सरकारो ने न तो ऐसा कोई सार्थक कदम ही उठाया और न ही कोई ऐसी कार्यवाही ही की जिससे तात्कालिक पैदा होने वाले डर व तनाव के वातावरण से उन्मुक्त हुआ जा सके। 
फिल्म प्रदर्शन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान शांति व्यवस्था को भंग करना, तोड़फोड़ कर  हिंसा करना, अनर्गल, भड़कीले, उत्तेजित शब्दो का उद्घोष इत्यादि किया जाता रहा हैं। गुरूग्राम में स्कूल बस पर पथराव एक उदाहरण मात्र हैं। इस पर करणी सेना, राजपूत समाज का यह कथन कि उनकी आड़ में असामाजिक तत्वों के द्वारा हिंसा व शांति भंग की जा रही हैं। करणी सेना वास्तव में कानून में निहित उक्त मूल भावना को ही चूना लगा कर आंशिक रूप से अपने उद्श्यो में सफल सिद्ध होते दिख रही हैं। वह भी आंशिक नैतिकता के साथ, क्योकि संविधान द्वारा प्रदत्त उनके उस मौलिक अधिकार (जो उनकी भावना व आस्था की रक्षा करता हैं) पर चोट पहुंच रही हैं, जिसकी सुरक्षा की आड़/ऐवज में वे अपने उक्त कृत्यों को सही ठहराने का अर्धसफल प्रयास कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर देश के कुछ भागो में गणांे के बीच करणी सेना तंत्र के द्वारा जो ड़र का माहोल पैदा किया गया हैं, वह संवैधानिक भारत के 69 वे वर्ष में निश्चित रूप से तंत्र से सुशोभित गण के लिये अच्छा संकेत नहीं हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस फिल्म के प्रति क्रिया-प्रतिक्रिया भी राजनीति की भेट चढ़ गई हैं। इस फिल्म के बहाने समस्त पक्ष राजनीति करना चाहते हैं। 69 वे गणतंत्र की बेला में इस देश के नागरिको (चूँकि चुप रहना भी शांत भागीदारी मानी जाती हैं) राजपूतो व न्यायालय के एक के बाद एक उठाये गये कदमो को नमन? न्यायालयो से यह उम्मीद की जाती हैं कि वे न केवल आदेश पारित करे, बल्कि पूर्णरूप से आदेश को पूर्ण भावनाओं के साथ ही शीघ्र उन्हे उसी प्रकार लागू भी करवाये, जिस प्रकार टीएन शेसन ने पूर्व से ही लागू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधान को कठोर रूप से अंर्तनिहित मूल भावनाओं के साथ लागू करके लोगो को प्रथम बार यह एहसास करवाया कि चुनाव कम खर्चीले व निष्पक्ष हो सकते हैं। अन्यथा ‘‘पारित आदेश ‘‘न्यायालय की अवमानना’’ के समान ही होगा।   
अब बात फिल्म निर्माता व फिल्म की भी कर ले। जब फिल्म पद्मावती बनी तो निर्माता ने फिल्म प्रदर्शन के लिये प्रमाण पत्र हेतु सेंसर बोर्ड़ के पास भेजी। नियमानुसार फिल्म प्रदर्शन तारीख के निश्चित समयापूर्व सेंसर बोर्ड को नहीं दी गई। फिर फिल्म निर्माता द्वारा वह कालम को रिक्त छोड़ दिया था जिसमें यह स्पष्टीकरण होता कि फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर आधारित हैं अथवा काल्पनिक हैं। तत्पश्चात निर्माता द्वारा यह कहा गया कि यह फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर नहीं हैं, बल्कि यह फिल्म मोहम्मद जायशी कृत पद्मावत नाम के महाकाव्य पर आधारित हैं। इसके बावजूद अधिकांश इतिहास कार इसे सिर्फ कोरी कल्पना मानने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार स्थिति को और भी जटिल बनाने में फिल्म निर्माता के महायोगदान को नहीं नकारा जा सकता हैं। इसी कारण निर्माता द्वारा ऐतहासिक तथ्यों के साथ उक्त विवाद को तूल व बल देने में परिस्थिति जन्य अवसर मिल गया। फिल्म निर्माण के दौरान ही निर्माता द्वारा गंभीरता न बरतने के फलस्वरूप आपत्ति करने वाले व्यक्तियों व संगठनो के साथ चर्चा भी नहीं की गई। उसी समय फिल्म का प्रोमो उन्हे क्यों नहीं दिखाया गया? ये सब परिस्थितियाँ कहीं न कहीं फिल्म निर्माता को भी शक के घेरे में लाती हैं। 
फिल्म में चित्तौड़ के राजा राणा रतन सिंह की पत्नी व मेवाड़ की रानी पद्मावती (पद्मिनी) के जौहर व घूमर नृत्य पर राजपूत समाज को कड़ा ऐतराज हैं। निश्चित रूप से तत्समय 1600 से अधिक स्त्रियों के साथ रानी पद्मावती के जौहर व्रत ने राजपूतो के बीच आन-बान व गौरव रक्षा के लिये हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने के कारण उन्हे पूज्यमाता का दर्जा प्राप्त हुआ। लेकिन आज की परिस्थिति में क्या जौहर व्रत (सती प्रथा) को उचित ठहराया जा सकता हैं? सोशल मीडिया में कुछ लोगो का यह भी कथन हैं कि रानी पद्मावती को ‘‘जौहर व्रत’’करने के बजाय वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के समान रणक्षेत्र में जौहर करते हुये अपने प्राणो का त्याग कर वीरागना बनना चाहिये था।  
इन समस्त परिस्थितियो के बावजूद राजपूतो का इस सीमा तक के विरोध का तरीका उचित हैं क्या? ऐतहासिक तथ्यों के साथ फिल्मों द्वारा किये जा रहे खिलवाड़ की उक्त घटना पहली नहीं हैं। इसलिए अपना विरोध शांतिपूर्ण रूप से व्यक्त कर राजपूत समाज के कर्णधारो को अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेनी चाहिए थी। खासकर उस स्थिति में जब दो तीन राजपूतो को छोड़कर अन्य किसी ने भी फिल्म के प्रदर्शित होने के पूर्व फिल्म नहीं देखी थी। इस प्रकार का अंधा विरोध ‘‘अंधा’’ ही कहलायेगा। 69 वें गणतंत्र की पूर्व बेला पर पद्मावती-पद्मावत तक देश को सीमित कर देना क्या उचित हैं? इसका जवाब समस्त पक्ष को देश हित में देना जरूरी होगा।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

’’वैधानिकता’’ व ’’नैतिकता’’ के बीच उलझे ‘‘आप’’ के अयोग्य 20 विधायक!

अंततः महामहिम राष्ट्रपति ने आप के 20 विधायको को लाभ के पद पर होने के कारण उत्पन्न हुई कानूनी अयोग्यता की चुनाव आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर लिया। अतः उच्च न्यायालय में सोमवार को सुनवाई होने वाली आप के विधायको की याचिका भी शून्य हो गई। इसीलिये उनके द्वारा उक्त याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस ले ली गई। युवा वकील प्रशांत पटेल द्वारा वर्ष 2015 में राष्ट्रपति के समक्ष 21 विधायको के विरूद्ध संसदीय सचिव के पद पर नियुक्ति के कारण लाभ के पद पर होने के कारण उन्हे अयोग्य घोषित करने के लिए याचिका लगाई गई थी, जिसे उन्होने चुनाव आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दिया था। मामला लगभग दो वर्षो से लम्बित था। लेकिन अचानक रिटायरमेंट के पांच दिन पूर्व आयोग ने उक्त याचिका पर निर्णय कर, अयोग्य घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी जो केजरीवाल की नैतिकता एवं वैधानिकता के बीच झूल गई। 
‘आप’ के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा इन विधायको को संसदीय सचिव के लाभ के पद पर नियुक्त किया गया था तब उनके इस कृत्य को गैर कानूनी माना जाकर इसकी उपरोक्तानुसार शिकायत की गई थी। तभी अरविंद केजरीवाल को यह लगा था कि संभवतः संसदीय सचिव लाभ का पद होने के कारण ये नियुक्तियाँ अवैधानिक हो सकती हैं। अतः उनके द्वारा संसदीय सचिव के पद को लाभ की श्रेणी से हटाकर छूट की सीमा में लाने हेतु विधेयक विधानसभा में पारित किया गया (जैसे कि मध्यप्रदेश सहित अन्य कई विधानसभाओं में प्रस्ताव लाकर कानून बनाया गया था।) लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उस विधेयक को वापिस कर दिये जाने के कारण वह कानून का रूप नहीं ले सका। यद्यपि कानूनन् केजरीवाल को एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का अधिकार हैं। लेकिन यह अपने में एक तथ्य हैं कि कई राज्यो की विधानसभा में संसदीय सचिव के लाभ के पद की अयोग्यता को कानून बना कर हटा दिया गया हैं। 
केन्द्रीय सरकार ने भी इस तरह के कई लाभ के पदो को अयोग्यता की सीमा से बाहर लाकर संसद सदस्यों की सदस्यता को अछ्ण बनाये रखा। इसी कारण से सोनिया गांधी संसद सदस्य के साथ लाभ के पद भी धारण किये हुई थी, निर्णय के पूर्व ही संसद सदस्ता से इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़कर जीती। जया बच्चन को भी इसी कारण से इस्तीफा देना पड़ा था। यहां पर जो लोग अरविंद की नैतिकता की बात कर रहे हैं व उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रहे हैं वे लोग यह भूल जा रहे हैं कि वे स्वयं गैर नैतिक रहते हुये विधायिका के बहुमत का दुरूपयोग कर कानूनी अयोग्यता को छूट की सीमा में कानून बनाकर लाकर उन्होने उसे वैधानिक बनाया। अतः क्या राजनैतिक लाभ व सत्ता बनाये रखने के लिये अयोग्यता को वैधानिक बनाने के तौर तरीको को नैतिक कहा जा सकता हैं, एक बड़ा प्रश्न यह भी हैं? लेकिन इससे भी बड़़ा प्रश्न केजरीवाल की नैतिकता की वह लक्ष्मण रेखा हैं जो उन्होनेे स्वयं उस अन्ना आंदोलन के दौरान आगे बढ़ कर खींची थी, और वह बड़ी नैतिकता किसी मजबूरी में स्वीकारी हुई नहीं थी, बल्कि वैकल्पिक राजनीति की तलाश में सही जन-जन-नेता बनने के प्रयास में, अन्ना के पेड़ की छाया तले अरविंद केजरीवाल ने खुले दिल से उक्त महती नैतिकता स्वीकार कर नई राजनैतिक पार्टी को जन्म देकर, नई वैकल्पिक व्यवस्था को आगे बढाने का प्रयास पूर्ण नैतिकता के साथ किया था। तभी तो उन्होने दो वर्षो के भीतर ही दिल्ली में 70 सीट में से 67 सीट जीत कर अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त कर ऐेतहासिक रूप से सत्ता प्राप्त की थी। आज वही केजरीवाल नैतिकता से परे कानून की दुहाई देकर चुनाव आयोग के सिफारिश पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं? कानून एवं प्राकृतिक न्याय के आधार पर उनकीे आपत्ति व आरोप सही हो सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा नैतिकता की गड़ी गई परिभाषा के आगे वह दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरती हैं।
ठीक इसी प्रकार जब उच्च न्यायालय में मामला सोमवार को सुनवाई हेतु लगा हुआ था, तब चुनाव आयोग की सिफारिश पर महामहिम द्वारा सुनवाई के पूर्व ही हस्ताक्षर करना कितना ‘‘नैतिक’’ हैं, यह प्रश्न भी स्वभाविक रूप से उठेगा ही। जब आप के विधायको ने महामहिम राष्ट्रपति से इस संबंध में मुलाकात का समय माँगा था, तब वे यह जानते हुये भी कि वे लोग चुनाव आयोग की इस अयोग्यता की सिफारिश के संबंध में ही मिलना चाहते हैं, उनसे मिलने के पूर्व ही महामहिम द्वारा सिफारिश को स्वीकार कर लेना भी कितना नैतिक कहा जा सकता हैं? चुनाव आयोग के वकील का उच्च न्यायालय के समझ यह कथन कि आयोग ने राष्ट्रपति को सिफारिश भेज दी हैं अथवा नहीं, यह जानकारी वे आयोग से नहीं ले सके हैं, क्योंकि कार्यालय बंद हो गया था, यह भी कितना नैतिक हैं, जबकि सार्वजनिक रूप से (पब्लिक डोमेन में) यह बात आ चुकी थी की चुनाव आयोग द्वारा अयोग्यता की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी जा चुकी हैं। मगर मुख्य चुनाव आयुक्त जो कि 5 दिन बाद रिटायर्ड होने वाले हैं के द्वारा लम्बित याचिका पर अचानक निर्णय दे देना भी कितना नैतिक हैं, प्रश्न यह भी हैं?
कांग्रेस व भाजपा का इस मुद्दे पर केजरीवाल से इस्तीफा मांगना कितना नैतिक हैं? जबकि कई प्रदेशों में उनकी स्वयं की सरकारो ने इन पदो को लाभ के पद से मुक्त करने के लिये कानून बना दिया था। इसलिये यह बात नैतिकता की नहीं, बल्कि कानूनी मुद्दा हैं। कम से कम भाजपा व कांग्रेस के लिये भी यह कानूनी मुद्दा होना चाहिये। निश्चित रूप से केजरीवाल के लिये भी  अपनी नैतिक गलती को नैतिकता पूर्व स्वीकार करके आत्मावलोकन करने का एक बड़ा अवसर हैं, क्योकि नैतिकता की यह सीमा उन्होने स्वयं ही आगे आकर लिखी थी, ओढी थी। कानूनी रूप से वे उक्त पद को कानूनी लाभ दिलाने में असफल हो गये थे। लेकिन यह हमारा ही देश हैं जहां नैतिकता लिये हुये कानून का राज सिर्फ दूसरो पर ही लागू किया जाता हैं स्वयं पर नहीं लेकिन ‘‘लाभ’’ स्वयं पर लागू किया जाता हैं दूसरो पर नहीं किया जाता हैं।  

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

‘‘माननीयों’’ से ये उम्मीद तो ना थी?

‘‘शुक्रवार’’ को जब सुबह उच्चतम न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठतम् न्यायाधिपतियों (जिनमें एक वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के इस वर्ष के मध्यांतर में रिटायर्ड होने के पश्चात वरिष्ठता के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के क्रम में रंजन गगोई भी शामिल हैं) ने प्रेस कान्फ्रेस करके न केवल इस देश के न्यायिक इतिहास में न केवल एक अनचाहा इतिहास रच दिया, बल्कि यह विश्व की शायद एकलौती व अनोखी घटना भी साबित हुई हैं। इस घटना की किसी भी क्षेत्र ने अपेक्षा नहीं की थी। न ही ऐसी आशंका या शंका किसी भी नागरिक या न्याय क्षेत्र से जुडे़ व्यक्तियों, न्यायाधीशगण, वकीलगण, सायल (मुवक्किल) किसी के भी मन में नहीं रही थी। अमेरिका में जहां स्थानीय जज जनता द्वारा चुने जाते हैं, वहां पर भी ऐसे जजो की ऐसी सार्वजनिक उपस्थित शायद ही हुई हो।
उक्त प्रेस कान्फ्रेस में चारो वरिष्ठ न्यायाधीशो ने दो मुद्दो का जिक्र किया था। एक रोस्टर निर्माण संबंधित प्रचलित दो नियमों का न मानना जिसे बेंच हंटिंग कहा जा सकता हैं (जिसे इशारो ही इशारो में कुछ मामले की ओर इंगित किया था) दूसरा मेमोंरेडम ऑफ प्रोसीजर। इन दो विषयांे को उठाते हुये उन्होने कहा था कि उच्चतम न्यायालय का न्यायिक प्रशासन ठीक तरह से कार्य नहीं कर रहा हैं और यदि इसे फौरन सही नहीं किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। उच्चतम न्यायालय के उक्त (आंतरिक) मामले को प्रेस कान्फ्रेस के जरिये सामने लाने के उक्त कदम के बाबत चारो वरिष्ठतम जजो की ओर से बोलते हुये जस्टिस जे चेलमेश्वर ने इस आधार पर इसे उचित बतलाया था कि मुख्य न्यायाधीश को सहमत न करा पाने के बाद उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था कि हम देश को बताएँ कि न्यायपालिका की देखभाल करें। वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने आगे कहा था कि हम नहीं चाहते कि 20 साल बाद देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति यह कहे कि हम चारो ने अपनी आत्मा बेच दी।
24 घंटे भी नहीं बीते होगें जब उक्त चारो न्यायाधिपति में से एक जस्टिस रंजन गगोई ने यह कहा कि कोई संकट नहीं हैं। वही दूसरे न्यायामूर्ति जोसेफ कुरियन ने कहा कि समस्या का समाधान के लिये बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं हैैं। उन्होने जो मुद्दे उठाये हैं, उसका समाधान होगा। उक्त मुद्दे उच्चतम न्यायालय का आंतरिक मामला हैं, जैसा कि लगभग सभी लोग इस मामले में एक मत हैं। मुद्दे की मैरिटस (योग्यता) पर भी कोई प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं हैं, इससे अधिकॉंश लोग सहमत हैं। लेकिन अंततः उच्चतम न्यायालय का यह जब आंतरिक मामला हैं, तब इसे प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से इन जजो ने बाहर क्यो लाया सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) क्यो किया जिससे अनावश्यक रूप से उच्चतम न्यायालय की गरिमा और विश्वसनीयता पर एक दरार क्यों पड़ने दी गई। हो सकता हैं, उच्चतम न्यायालय के इन दो जजो के प्रेस कान्फ्रेस के बाद के कथन से पड़़़ी हुई दरार भर गई हो। लेकिन उस दरार के (अमिट) निशान के लिए अतंतः कौन जिम्मेदार होगा? 24 घंटे में ऐसा क्या हो गया जिसे पब्लिक डोमेन में तो नहीं रखा गया, लेकिन लोकतंत्र खतरे में हैं वह ‘‘भ्रांति’’ दूर हो गई तथा आत्मा बेचने का आरोप का खतरा भी समाप्त हो गया, यह समझ से परे हैं। 
प्रेस कान्फ्रेस के बाद आये दो न्यायमूर्ति के उक्त कथन को क्या उस श्रेणी में लिया जा सकता हैं कि जिस प्रकार आज कोई भी सार्वजनिक व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कोई भी (अ)विवादित बयान देकर बाद में इंकार कर देेता हैं? लेकिन माननीयों से इस आचरण व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती हैं। अंततः जो कुछ हुआ था, वह बिलकुल अप्रत्याशित था, जो अभी हुआ हैं यह भी अप्रत्याशित ही हैं, और भविष्य में इसी आशा के साथ ऐसा अप्रत्याशित न हो। तभी हमारी न्याय व्यवस्था जो लोकतंत्र की रीढ की हड्डी हैं, देश के नागरिको को संविधान द्वारा प्रदत्त संवैधानिक अधिकारो की रक्षा करने वाली हैं, कार्यपालिका विधायिका पर संविधान के बाहर जाने पर रोक लगाने की यह एक मात्र प्रभावी संस्था हैं, जो संविधान की रक्षक हैं। इस न्याय व्यवस्था को चलाने वाली सर्वोच्च संस्था उच्चतम न्यायालय ही हैं जिसका स्वरूप अक्षुण रहेगा तभी वह उक्त समस्त उत्तरदायित्वो को निभाने में सफल होगा। 

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मंगलवार, 16 जनवरी 2018

‘‘न्यायिक सक्रियता’’ ‘‘न्यायिक संकट’’ (क्राइसेस) में तो नहीं ?

बहुत पहले आपातकाल के समय स्वर्गीय जस्टिस पी.एन. भगवती ने एक नारा दिया था ‘‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’’ (कमिटेड़ ज्यूडिशियरी)। उसके बाद पिछले कुछ समय से जनहित याचिकाओं (पी.आई.एल.) के माध्यम व स्व-प्रेरणा से उच्च न्यायालयांे एवं उच्चतम् न्यायालय ने ऐेसे कई ऐतहासिक निर्णय जन हित में दिये हैं जिन्हे कुछ क्षेत्रों में कार्यपालिका एवं विधायिका के अधिकारो का उल्लघंन माना गया हैं। इन्हे न्यायिक सक्रियता कहा गया। आज निष्पक्ष न्याय के साथ-साथ न्यायिक सक्रियता भी स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास के (अब तक के सबसे बड़े) गहरे न्यायिक संकट में फंस गई हैं, जिसका (दुश्ः) परिणाम फिलहाल गर्भ में हैं। 
हमारा देश चार स्वतंत्र स्तम्भों (पैरो) पर खड़ा हैं। संविधान द्वारा प्रदत्त न्यायपालिका,  कार्यपालिका व विधायिका के तीन स्वतंत्र खम्भों के साथ चौथे स्वंतत्र स्तम्भ प्रेस के मजबूत कंधो पर हमारे देश की सम्पूर्ण व्यवस्था टिकी हुई हैं। तीनो संवैधानिक स्तम्भ स्वतंत्र होने के बावजूद परस्पर सहयोग के द्वारा ही देश को चलाने व आगे बढ़ाने का कार्य कमोवेश सफलतापूर्वक करते चले आ रहे हैं। इन चारो स्तम्भों में सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संविधान ने न्यायपालिका को दी  हैं, जिसे यह अधिकार दिया गया हैं कि संविधान के किसी भी एक अंग का दूसरे अंगो (संस्थाओं) के साथ विवाद की स्थिति निर्मित होने पर उच्चतम् न्यायालय का निर्णय अंतिम व बंधनकारी (अन्य किसी भी मामलो की तरह) होता हैं। इसके साथ ही संविधान ने विधायिका को भी यह अधिकार दिया हैं कि यदि उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय से कार्यपालिका सहमत नहीं हैं, वह संसद में बिल लाकर उस निर्णय को पलट सकती हैं (जैसा कि राजीव गांधी के कार्यकाल में शाहबानो प्रकरण में हुआ था) बशर्ते वह संविधान की सीमा के भीतर हो व संविधान की भावना के विरूद्ध न हो। जैसा कि केशवानंद भारतीय के प्रकरण में भी माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं कि संविधान के बुनियादी ढ़ाँचा (बेसिक स्ट्रक्चर) से छेड़ छाड़ नहीं की जा सकती हैं। इस प्रकार अंततः वास्तविकता में अभी तक उच्चतम न्यायालय को ही सर्वोच्च मानने की व्यवस्था ही कार्यरत रही हैं। संविधान का सरक्ष्ंाक एवं लोकतंत्र का प्रहरी भी न्यायपालिका को ही माना गया हैं।
आज उसी उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम में व्यवस्था परस्पर आपसी (मुख्य न्यायाधीश विरूद्ध चार वरिष्ठ न्यायाधीश) विवाद उत्पन्न होकर प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से प्रकट हुआ हैं जो अत्यंत खेद जनक और एक ऐतहासिक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हैैं। आखिर यह कोलेजियम व्यवस्था क्या हैं। कोलेजियम उच्चतम न्यायालय की एक प्रशासनिक व्यवस्था हैं, जो मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 5 वरिष्ठ जजो का एक समूह हैं, जिसका प्रमुख न्यायाधिपति (प्रथम होने के नाते) मुख्य न्यायाधीश होता हैं। कोलेजियम की एक जिम्मेदारी जजो की नियुक्ति के मामले में सरकार को सिफारिश भेजना भी होता हैं जो सामान्यतः सरकार स्वीकार कर लेती हैं। तबादलों के फैसले भी कोलेजियम करता हैं। यद्यपि विषयानुसार रॉस्टर अर्थात कार्यतालिका बनाने का विशेषाधिकार मुख्य न्यायाधीश के पास होता हैं, परन्तु चली आ रही परम्परा नुसार सामान्यतः मुख्य न्यायाधीश कोलेजियम के अन्य वरिष्ठ जजो की सहमति से ही कार्यो का बँटवारा करते रहे हैं। उक्त परम्परा का पालन नहीं हो पाने के कारण ही दो माह पूर्व चारो वरिष्ठ जजों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर वेदना पूर्वक अपनी बात व्यक्त की थी। इसीलिए यह विवाद उत्पन्न हुआ हैं। चारो वरिष्ठ जजो ने इसी रॉस्टर प्रणाली को संाकेतिक रूप से कुछ विशिष्ट केसो के साथ जोड़कर विवाद को और गहरा कर दिया हैं। यद्यपि इस व्यवस्था के एक भाग ‘‘जिसके अंतर्गत जजो की नियुक्ति की सिफारिश की जाती हैं’’ को संसद में कानून पारित कर न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाकर समाप्त कर दिया गया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त कानून को असंवैधानिक घोषित करके कोलेजियम व्यवस्था को पुनः बहाल किया। इसके बावजूद भी उच्चतम न्यायालय इस कोलेजियम व्यवस्था में सुधार चाहता हैं जिसके लिये सुझाव मागें गये हैं। 
किस न्यायाधीश को या न्यायाधीशों की किस बंेच को कौन सा प्रकरण दिया जाए (‘‘बेंच हंटिंग’’), इससे देश का लोकतंत्र कैसे खतरे में पड़ सकता हैं, जैसा कि चार वरिष्ठ जजों ने आरोप लगाया हैं, यह एक बडा प्रश्न हैं। जब तक यह तथ्य सामने नहीं आता हैं कि निर्णय देने वाली बेंच ‘‘न्यायपूर्वक निर्णय न देकर किसी प्रभाव मेें आकर निर्णय दे रही हैं’’ तब तक उनकी मंशा पर सांकेतिक रूप से निशाना लगाना/उठाना उचित नहीं होगा। वरिष्ठ न्यायाधीशो के उक्त कथन का (बिना कहे) साथ में यह अर्थ भी निकलता हैं कि वे मुख्य न्यायाधीश के साथ उन बेंचो के न्यायाधीशों के विवेक पूर्ण निर्णयों (न्याय) पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं जिन्हे मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई हेतु रॉस्टर से हटकर केस दिये हैं।  
सुप्रीम कोर्ट के चारो न्यायाधिपतियांे द्वारा विवाद के मुद्दो को प्रेस कांफ्रेस का सहारा लेकर सामने लाने की बात पर मत तीव्र विभाजित हो सकते हैं। इस प्रेस वार्ता से एक तरफ उच्चतम न्यायालय की गरिमा, प्रतिष्ठा, निष्ठा व निष्पक्षता की लगभग 70 सालो से खीची गई मजबूत दीवार पर ही एक दरार उत्पन्न हो गई हैं, जो कैसे दूर होगी, कैसे भरेगी, यह एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह उत्पन्न करती हैं? इन्ही वरिष्ठ न्यायाधीशों की नजर में उच्चतम न्यायालय में ‘‘सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है’’ं जिसको ध्यान में लाने के लिये उन्होने मुख्य न्यायाधीश को चिठ्ठी लिखी, व्यक्तिगत मुलाकात की, लेकिन उसके बावजूद न तो कोई सुधार हुआ और न ही इन न्यायाधीशो के मन में कोई सुधार की आशा की किरण ही जगी। शायद तभी मजबूरी में उन्होंने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा हैं, की बात को सार्वजनिक किया हैं। लेकिन यह चरम कदम उठाने के पूर्व उनके पास तीन रास्ते और थे। एक महामहिम राष्ट्रपति से मिलकर अपनी व्यथा व्यक्त करते। दूसरा उच्चतम न्यायालय के अन्य समस्त (24) जजो के साथ बैठकर चर्चा कर अपनी बात समझाते और फिर  उनकी बात यदि सही मानी जाती तो उन समस्त न्यायाधीशो के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश से मिलते। तीसरा अपने पद से इस्तीफा देकर प्रेस कान्फ्रेस करते व उसमें यह घोषणा करते कि वे स्वयं उच्चतम न्यायालय में उक्त मुद्दो (रॉस्टर व विशिष्ट केसो को) लेकर याचिका दायर करेगें। तब शायद उन पर न्यायपालिका को सेन्सेशन  (सनसनी) बनाने का आरोप नहीं लग पाता। बल्कि लाचारी में बेबश होकर सुधार लाने के लिये ‘‘अंतिम’’ हथियार को उठाकर न्यायालय के प्रति ‘‘धारणा’’ की रक्षा करने के लिये उक्त अप्रिय लेकिन साहसिक कदम उठाने के लिये वे सही ठहराये जाते। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों और आम नागरिक के बीच उक्त मुद्दे को लाने का क्या यही एकमात्र सही तरीका था? प्रश्न ये भी है?ं जिस तरीके को अपनाया गया हैं, निश्चित रूप से उसने उच्चतम न्यायालय की न्याय व्यवस्था पर नागरिको की आस्था को डिगाने का ही प्रयास किया हैं। इससे भी बड़ा प्रश्न यह हैं कि क्या उक्त मुद्दे जो कि उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम का आंतरिक मामला था, को इस तरह से सार्वजनिक रूप से लाना निहायत जरूरी व उचित था? विशिष्ट रूप से, क्या न्यायपालिका पर देश के नागरिको के भरोसे पर भी कहीं न कहीं दरार पैदा कर देना देश की न्याय व्यवस्था के लिये एक खतरनाक बात नहीं होगी? सब कुछ ठीक न होने की बात को लेकर न्यायपालिका के कोलेजियम को सुधारने के लिये चार वरिष्ठ जजों ने पद पर रहते हुये जो जज्बा दिखाया हैं उससे भी खतरनाक स्थिति (उनकी न्याय व्यवस्था के ठीक न होने की कल्पना से परे) संविधान के इस महत्वपूर्ण खंभे को ही कहीं चौथा खम्बा (मीडिया) हिला न दे, प्रश्न यह हैं?
अभी तक इस मामले में केन्द्रीय सरकार ने यह कहकर अपने को फिलहाल अलग थलग कर लिया हैं कि यह उच्चतम न्यायालय का अन्दरूनी मामला हैं। जब उच्चतम न्यायालय न्याय हित में देश हित में, नागरिको के हित में, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार एवं कर्त्यव्यो के तहत शासन की अंदरूनी स्थिति (कमियों) पर स्वयं या विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा जांच करवाता रहता हैं, निर्देश देता रहता हैं, तब ठीक वैसी ही स्थिति सर्वोच्य न्यायालय के भीतर उत्पन्न होने पर, सरकार भी मुख्य न्यायाधीश की सहमति से एक स्पेशल सीबाीआई जांच टीम का गठन करने के लिये एक कदम आगे क्यों नहीं बढाती हैं। ताकि वस्तु स्थिति दोनो पक्षों के सामने स्पष्ट हो जाए। चार वरिष्ठ  जजों के द्वारा गंभीर रूप से भ्रष्ट्राचार की स्थिति की ओर इंगित करने का प्रयास किया गया हैं जैसा कि मीडिया के कुछ क्षेत्रो में रिपोर्टिग हो रही हैं। चूकि यह एक अभूतपूर्व स्थिति हैं और ऐसी  स्थिति का हल भी एक अभूतपूर्व कदम उठा कर ही किया जा सकता हैं। शायद इसके लिये कुछ समय का इंतजार करना होगा? साथ ही प्रंधानमत्री को स्वयं आगे आकर कानून मंत्री को साथ में लेकर मुख्य न्यायाधीश के साथ कोलेजियम की मींटिग बुलाकर समस्त निहित मुद्दो पर चर्चा करने पर कुछ न कुछ हल अवश्य निकलेगा, और उच्चतम न्यायालय की छबि भी अक्षुण्ण रह पायेगी। न्यायालय की स्थिति न केवल न्यायपूर्वक होनी चाहिए बल्कि न्यायपूर्ण होते हुये दिखना भी चाहिए। वैसे ही, जैसे कि न्याय के लिए कहा गया हैं कि न्याय न केवल मिलना चाहिये बल्कि मिलते हुये दिखना भी चाहिए। अंत में इस मामले में किसी भी एक पक्ष को पूर्णतः स्वीकार करना व दूसरे पक्ष को अस्वीकार कर किसी भी पक्ष को बयान बाजी से आगे बचना चाहिए ताकि स्थिति और खराब न हो। 
कुछ मीडिया चैनलों ने जहां चार ‘‘न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेस करने को’’ सनसनी फैलाकर जजों को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया हैं, वहीं वे स्वयं इस मुद्दे पर लम्बी चौड़ी बहस कराकर मामले में स्थिति को और खराब कर रहे हैं। न्यायपालिका की गरिमा को बचाये रखने के लिये फिलहाल मीडिया को भी इससे बचना चाहिए।

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