बुधवार, 28 दिसंबर 2011

यह कैसी संसद?


राजीव खण्डेलवाल:

कल देर रात तक चली संसद में अंतत: एक तरफ तो लोकपाल एवं लोकायुक्त बिल पारित कर दिया गया लेकिन दूसरी तरफ लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाला संवैधानिक संशोधन विधेयक अस्वीकार कर दिया गया। अभी कुछ दिन पूर्व ही मैने 'अन्नाÓ द्वारा उठाये गये मुद्दे ''असली संसद कौनसी है?ÓÓ मे संसद की सार्वभौमिकता का विवेचन किया था। लेकिन कल संसद में जो कुछ हुआ उससे लगता है, मुझे अपने विचारों में परिवर्तन करना पड़ रहा है। अन्ना ने जो कल पुन: कहा कि यह जनसंसद दिल्ली की संसद से बड़ी है ऐसा लगता है कि शाब्दिक अर्थो में न जाकर यदि उक्त कथन का व्यावहारिक अर्थ निकाला जाये तो अन्ना की बात में दम लगता है।
सरकार द्वारा प्रस्तुत लोकपाल बिल के विभिन्न मुद्दो पर संसद बूरी तरह से बॅटी हुई है यह बात कोई छुपी हुई नहीं है। बिल के अधिकतर प्रावधानों पर न केवल विपक्ष बल्कि सरकार के विभिन्न सहयोगी दल भी अपनी असहमति जता चुके है। लेकिन लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के प्रस्ताव जो कांग्रेस पार्टी के रोल मॉडल राहुल गांधी ने पिछले अगस्त में लोकसभा में हुई बहस के दौरान प्रस्तुत किया था पर लगभग समस्त दल अन्ना सहित सहमत थे उस तरह विरोध में कोई भी पक्ष नहीं था जिस तरह लोकपाल बिल पर थे। वह इसलिए भी क्योंकि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने से लोकपाल को मजबूती ही मिलती है जो कि मजबूत लोकपाल बनाने के लिए समस्त राजनैतिक पार्टियां (उनके अन्दर की राजनीति को वे लोग ही जाने) व अन्ना की सिविल सोसायटी भी सार्वजनिक रूप से चाहती है। लेकिन सबसे आश्चर्य की बात यह है जिस मुद्दे पर समस्त राजनैतिक दलों में लगभग सहमति थी वह संविधान संशोधन विधेयक तो पारित नहीं हो पाया लेकिन जिस लोकपाल बिल पर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों में विभिन्न मुद्दो पर गलाफाड़ विरोध था वह लोकपाल विधेयक सरकार के अल्पमत में होने के बावजूद भारी बहुमत से पारित हो गया। इसलिए अन्ना की उक्त उक्ति कि जनसंसद दिल्ली की संसद से बड़ी है मायने रखती है। यह कहा जा सकता है कि लोकपाल को सवैधानिक दर्जा देने के लिए संविधान संशोधन विधेयक के लिए २/३ बहुमत की आवश्यकता होती है जो सरकार के पास नहीं थी जैसा कि कांग्रेस पार्टी के समस्त वक्ता, महावक्ता कह रहे है। लेकिन सरकार और उनके मैनेजर्स को यह बात जनता को अवश्य बतलानी होगी कि उनके श्रेष्ठतम उच्चतम नेता राहुल गांधी के सपने के उस प्रस्ताव पर उनको लोकपाल बिल पारित होने में मिले वोटो से भी कम वोट क्यों मिले जबकि उक्त मुद्दे पर उससे ज्यादा व्यापक सहमति समस्त दलों की थी। राजनीति का यही पेंच है। कांग्रेस के १६ सांसद अनुपस्थित रहे और ९ सांसदो ने वोट नहीं डाला। जब कांग्रेस के सांसद ही अपने नेता के प्रति न तो गंभीर रहे, न तो उत्तरदायी है और न हीं वफादार हैं तब कांग्रेस का भाजपा पर आरोप लगाना एक बचकानी हरकत ही है।
संसद में कल बहस के दौरान समस्त पार्टी के सांसदों ने संसद की सार्वभौमिकता को बनाये रखने की वकालत एक मत से की। लेकिन उन्ही सांसदों ने उक्त संविधान संशोधन विधेयक पर जिनपर उन्हे कोई आपत्ति नहीं रही अपने कथनानुसार मत डाल नहीं सके। यह दोहरा आचरण ही अन्ना को बार-बार यह कहने की शक्ति प्रदान करता है कि जन संसद दिल्ली की संसद से बड़ी है। इसलिए इस मुद्दे पर अन्ना पर उंगली उठाने से पहले सांसदो को अपने गिरेबारन में झांकना होगा और अपनी कथनी और करनी के बीच व्याप्त दूरी को कम करना होगा तभी वो अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे।

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

देश की असली संसद कौन सी?


राजीव खण्डेलवाल: 
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            विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के लोकतंत्र की संवैधानिक सर्वोच्च संस्था  हमारी संवैधानिक रूप से चुनी गई 'संसद' है। संसद के दोनों सदन में लोकसभा, राज्यसभा के कुल मिलाकर ७८८ (५४५+२४३) सदस्य है जो न केवल देश के लिये कानून बनाते है बल्कि समवर्ती सूची में उल्लेखित विषयों पर राज्यों के लिए भी कानून बनाते है। यही संसद वहसंविधान जिसके अंतर्गत उसका गठन हुआ है, में भी देश के हितों को ध्यान में रखकर संविधान के मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) को नुकसान पहुंचाये बिना उसमें उक्त सीमा तक संशोधन करने का अधिकार रखती है जैसा कि ''केशवानंद भारती" (२४ अपे्रल १९७३) के प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय ने निर्णित किया था। आज न केवल देश बल्कि  विश्व के सबसे चर्चित आंदोलनकारी सत्यागृही अन्ना हजारे हैं जिनके जनलोकपाल बिल के लिए किये गये आंदोलन को अमेरिकन पत्रिका 'टाईम्स' ने 'विश्व के १० सबसे प्रभावशाली जनआंदोलनो' में शामिल किया है। जब ऐसा व्यक्तित्व 'अन्ना' एक ही सांस में एक साथ एक तरफ उक्त चुनी हुई संसद के सामने लोकपाल कानून बनाने के लिए बार-बार जाते है और दूसरी तरफ उसकी वैधता को ही निशाना बनाते हुये यह कहते है कि असली संसद 'वह' नही बल्कि 'यह' है, जो मेरे सामने बैठी है (रामलीला ग्राउण्ड पर अनशन पर बैठे विशाल जनमानस की ओर इशारा करते हुए) उनका यह कथन कि सांसदो को अपनी बात संसद में कहने के पूर्व ग्राम सभा जो कि असली लोकतांत्रिक संसद है, के सामने रखनी चाहिये (जमीन अधिकरण के संबंध में) व अभी हाल में ही अनका यह कथन कि यह संसद चोर डाकुओं से भरी है जिसमें १५० से अधिक अपराधी चुनकर गये है। तब इन परिस्थितियों के सामने एक नागरिक यह सोचने पर मजबूर होता है कि असली संसद कौन सी है? इसका विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।
            इसमें कोई शक व शुबा नहीं कि देश ने जब 26 जनवरी 1950 को अपना संविधान अपनाया तब ही वह स्वतंत्र भारत से गणतंत्र भारत कहलाया जिसके अंतर्गत ही लोकसभा और राज्यसभा का गठन होकर संसद का निर्माण हुआ और प्रधानमंत्री वाली संसदीय पद्धति अपनाई गई। इस बात में भी न कोई शक वो शिकवा है कि जिस भावना, उद्देश्य को लेकर देश की जनता ने स्वशासन करने के लिए एक लोकतांत्रिक संसद की जो आशा और उन्नत व बढ़ते हुये भारत की कल्पना की थी उसे हम पाने में असफल रहे है। यद्यपि संसदीय लोकतंत्र पर्याप्त लम्बा सफर कर चुका है लेकिन कई कमिंयो के बावजूद कोई बेहतर विकल्प न होने के कारण न केवल हमें इस प्रणाली को मजबूत करते रहना पड़ेगा बल्कि समय की मांग के अनुसार समय-समय पर आवश्यक संवैधानिक संशोधन भी करते रहने होंगे। अत: जब तक हम इस संसदीय प्रजातंत्र का उचित विकल्प नहीं ढूंढ लेते है या इसमें आवश्यक व्यापक सुधार के लिये उचित संशोधन नहीं कर लेतें है तब तक अन्ना व उनकी सिविल सोसायटी को इसी संसद को ही असली जनतांत्रिक संसद मानना होगा। उसमें व्याप्त कमियों के बावजूद उसके अस्तित्व को चैलेंज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि जिस जनता की अन्ना बात करते है उसी जनता ने उन १५० से अधिक अपराधियों को चुनकर संसद में भेजा है व अन्ना व उनकी टीम ने भी अपना महत्वपूर्ण 'मत' का उपयोग इसी संसद को चुनने में किया है।
            लोकतंत्र मे सबको अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है, यह बात अन्ना हजारे को समझ में आना चाहिये क्योंकि जिस जनता के समर्थन के आधार पर वे अपने विचारो को जनता व संसद के बीच पहुंचाते है उसी जनता द्वारा चुने गये सांसदो (जिसमें अपराधिक प्रकरण चल रहे सांसद भी शामिल है) द्वारा संसद में अपने विचार रखे जाते है। लेकिन सफलता से उत्पन्न दर्प भाव के कारण वे सिर्फ  इस बात पर ही विश्वास करने लगे है कि लोकपाल के मुद्दे पर वे ही एकमात्र 'सच' है और जो लोग उनके विचारों से जरा से भी असहमत है वे गलत है, यह धारणा लोकतंत्र में उचित नहीं है। मुझे एक कथन याद आता है कि जब सीताराम येचुरी कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहा करते थे तब उनके बाबत एक जुमला बहुत ही प्रसिद्ध था ''न खाता न बही जो केसरी कहे वही सही"। अन्ना जी भी शायद इसी दर्प व्याधि से ग्रसित है और बार-बार संसद को चेंलेंज कर खण्डित करने का खतरनाक प्रयास कर रहे है जो भारत के लोकतंत्र की मजबूती व स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। मैं बार- बार एक ही बात हमेशा कहता हूं कि कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता है। इसी तरह अन्ना जिन्होने देश की लोकशाही को जागृत करके स्वतंत्र भारत में जय प्रकाश नारायण के बाद सबसे बड़ा कार्य किया है, जरूरी नहीं है कि उनके हर विचार, बात व कार्य हर दृष्टि से हर हमेशा सही हो। अन्ना को अपने विचारों पर दृढ़ भी रहना चाहिये जैसा कि शरद पवार के थप्पड़ मामले में नही रह पाये। आश्चर्य! धीर, वीर गंभीर अन्ना के स्वभाव में विचलन भले क्षणिक ही क्यों न हो?
            हमारे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में त्रिस्तरीय न्याय प्रणाली है। एक न्यायालय का निर्णय दूसरी न्यायपालिका में बदल जाता है और तत्पश्चात ऊपरी अदालत में जाकर निर्णय में पुन: बदलाव हो जाता है। अत: एक निचली न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के विरूध्द जब हम उच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूध्द उच्चतम न्यायालय में अपील करते है। तीनो न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा एक ही तथ्य पर निर्णय तीन अलग-अलग तरह से दिया गया होता है, तो क्या हम न्यायपालिका के अस्तित्व पर ही उंगली उठाने लग जायेंगे? लेकिन अन्ना संसद के तथाकथित रूप से असफल होने पर संसद के अस्तित्व पर ही प्रश्र चिन्ह लगा रहे है। संविधान में संसद द्वारा दायत्वि न निभाने पर 5 वर्ष बाद सांसदो (सरकार)को  बदलने की व्यवस्था है जो हम (जनता) ठीक से नहीं कर पा रही है। यदि 5 साल की अवधि काफी लम्बी होती है तो उसमें संविधान संशोधन कर ५ साल की अवधि कम की जा सकती है। आपातकाल के दौरान संसद की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर तत्कालीन सरकार की स्वार्थ पूर्ति के लिए ६ वर्ष कर दी गई थी। यदि हम सांसदो के कार्यो से संतुष्ट नही है तो हम 'राईट टू रिकाल' का प्रावधान ला सकते है जैसा कि अन्ना मांग भी कर रहे है। देश के कई राज्यों में नगरपालिका स्तर पर यह प्रावधान लागू भी किया गया है। अनिवार्य मतदान की व्यवस्था की जा सकती है। अनेक चुनाव सुधारो की बात की जा सकती है। अर्थात व्यवस्था को सुधारने के विभिन्न संवैधानिक संशोधन किये जा सकते है। यदि हम मानते है कि आज की व्यवस्था ही 'अवांछनीय' हो गई है तो भी हम नई 'संवैधानिक' सभा की मांग भी कर सकते है। लेकिन माननीय अन्ना जी जब तक वर्तमान ५ वर्ष की व्यवस्था है तब तक संसद के अस्तित्व को चैलेंज कहना उचित नहीं है क्योंकि भीड तंत्र व लोकशाही में अंतर है। एक ओर जो भीड़ आपके सामने खड़ी है उसमें आपके विचारों से सहमत व असहमत दोनो प्रकार के लोग होते है। जैसा कि हम देखते है चुनावी माहौल में एक नेता अपने साथ भीड़ इकट्रठी किये होता है लेकिन उसका चुनावी परिणाम वोटों में परिवर्तन लाये आवश्यक या सच नहीं होता। यदि भीड़ ही एकमात्र समर्थन का मापदंड है तो अभी हुई मायावती की रेली, कांग्रेस के राहुल गांधी की सभा में हुई भीड़ रहने के बाबत क्या कहेंगे। क्या उनमें आये समस्त लोग अन्ना के जनलोकपाल के विरोधी है? क्योंकि उक्त रैलियो के नेतागण अन्ना से सहमत नहीं है। इसलिए यह अंदाज लगाना गलत है कि भीड उनके विचारों से सहमत है। वैसे यह खुशी की बात है कि सरकार द्वारा जो लोकपाल बिल आज संसद में पेश किया जा रहा है उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अन्ना व उनकी टीम ने इसे लोकसभा मेंपारित प्रस्ताव 'सेंस ऑफ हाऊस' के विपरीत बताकर उसी संसद की अवमानना माना है जिसके अस्तित्व पर वे लगातार प्रश्रचिन्ह लगाते रहे है।
            अन्ना इस देश की गैर राजनैतिक पूंजी है और जिस दिन वे राजनैतिक पूँजी होगे उस दिन वे 'राजनैतिक' तो हो जायेंगे, लेकिन 'पूंजी' नहीं रह पायेंगे। यह देश के लिये ठीक नहीं होगा क्योंकि देश को स्वतंत्र हुये 67 साल के इतिहास में विनोबा भावे, जय प्रकाष नारायण और अन्ना हजारे जैसे व्यक्तित्व बिरले ही पैदा होते है इसलिये अन्ना टीम से अपील है कि वे अन्ना को रालेगण सिद्धि का ताकतवर 'अन्ना' ही रहने दे 'सेलीब्रिटी' न बनाये। अन्ना जनता की आत्मशक्ति का केन्द्र पूंज है।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

संसद पर हमले की दसवीं बरसी: अफजल गुरू पर फॉसी के लिए अनशन क्यों नहीं?


राजीव खण्डेलवाल
मंगलवार दिनांक १३ तारीख को संसद पर १३ दिसम्बर २००१ को हुए कातिलाना हमले की दसवीं पूण्यतिथि पर मारे गये शहीदों को संसद भवन में देश के श्रेष्ठतम राजनैतिज्ञो द्वारा माला पहनाकर श्रद्धांजली दी गई। भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। लोकतंत्र की आत्मा, स्तम्भ, सम्प्रभुता संसद मानी गयी है व विधानसभा, नगरपालिका तथा ग्राम पंचायत उसकी सहायक शाखाए है। देश की अस्मिता का चीरहरण होकर लोकतंत्र की हत्या कर संसद पर १० वर्ष पूर्व हमला हुआ था जिसमें ७ लोग शहीद एवं १८ लोग घायल हुए थे। देश की सर्वोच्च (अंतिम) न्यायपालिका उच्चतम न्यायालय ने अंतिम रूप से वर्ष २००४ में संसद पर हमले के मामले को निर्णित कर फॉसी की सजा को बरकरार रखा। इसके बावजूद अफजल गुरू को देश की राजनीति और संवैधानिक प्रावधान के चलते आज तक फॉसी नहीं हो पायी। क्या १३ तारीख को देश के कर्णधारों को इस बात पर चिंता नहीं करना चाहिए था कि अफजल गुरू की फॉंसी की सजा अभी तक कार्यान्वित क्यों नही हो पाई? यदि महामहिम राष्ट्रपति द्वारा अफजल गुरू के परिवार द्वारा दायर दया याचिका (मर्सी पिटिशन) पर निर्णय न दिये जाने के कारण कोई संवैधानिक रूकावट है तो उसे दूर करने के उपायों पर विचार नहीं होना चाहिए था? क्या महामहिमजी से दया याचिका पर तुरंत निर्णय दिये जाने की अपील नहीं की जानी चाहिए थी? लेकिन शायद देश के राजनैतिक व्यवस्था के साथ-साथ नागरिकों की देश की सम्मान की रक्षा की भावना में गिरावट आना ही इसका मूलभूत कारण हो सकता है। यह इस बात से भी सिद्ध है कि देश का मीडिया जो दिल्ली के किसी मोहल्ले में हुई डबल मर्डर की घटना को तो पूरे देश में चर्चित कर देता है। लेकिन उसने भी सामान्य रूप से उक्त मुद्दे को १३ तारीख को उस तरह से देश के सामने नहीं रखकर, देश के कर्णधारो और नागरिको का ध्यान आकर्षित नहीं किया जैसा कि मीडिया से उम्मीद की जाती है और जो उसका दायित्व भी है।
कालाधन, भ्रष्टाचार और लोकपाल से भी यदि कोई बड़ा मुद यदि देश में वर्तमान में विद्यमान है तो वह अफजल गुरू को फासी देने का मुद्दा है। वह इसलिए क्योंकि वह मात्र एक अपराधी के फांसी का मुद नहीं है बल्कि देश की अस्मिता को लूटने वाला संवैधानिक व्यवस्था को ढहाने वाला ऐसा घृणापूर्ण कभी न माफ किया जा सकने वाला कृत्य है। इसके दाग को मिटाया तो नहीं जा सकता लेकिन उक्त अपराध को करने वाले व्यक्ति को अधिकतम मानवीय कानूनी सजा देकर स्वयं को तुच्छ रूप में संतुष्ट किया जाकर आने वाले समय को एक हल्की फुल्की चेतावनी जरूर दी जा सकती थी जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो। राष्ट्रपति के समक्ष लंबित अनेक फांसी की सजा को माफ करने वाली दया याचिकाए लंबित रहने के कारण महामहिम राष्ट्रपति के इस विवेकाधीन अधिकार पर प्रश्र उठना स्वभाविक है। क्या राष्ट्रपति के विवेकाधिकार को समाप्त तो नहीं कर देना चाहिए? या दया याचिका पर निर्णय लेने की कोई उचित समय सीमा का प्रतिबंध तो नहीं लगाना चाहिए? क्योंकि पूर्व में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में यह प्रतिपादित किया है कि सजा सुनाये जाने के बाद लम्बे समय तक फॉंसी की सजा को किर्यान्वित न करने के कारण उसे अमानवीय प्रताडऩा मानकर फॉसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया था। अत: इसकी समय सीमा क्यो नहंी निर्धारित की जानी चाहिए जैसे की अधिकतर कानूनों में समय सीमा का प्रावधान होता है। यदि राष्ट्रपति जी के पास दया याचिका पर विचार करने हेतु समय नहीं है तो उक्त प्रावधान को हटा क्यों नही देना चाहिए व अंतिम रूप से निर्णित उच्चतम न्यायालय के निर्णय का पालन होना चाहिए। यदि सब कुछ सही है तो क्या राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण यदि निर्णय नहीं हो पा रहा है तो इसका जवाब निश्चित रूप से केंद्रीय सरकार को जनता को देना पड़ेगा। क्योंकि तकनीकि रूप से कानूनी रूप से दया याचिका पर निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिया जाने के बावजूद व्यवहारिक रूप में महामहिम केंद्रीय सरकार के मत के अनुसार ही निर्णय लेते है। इससे यह बात सिद्ध होता है कि केंद्रीय सरकार इसे एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है जो की अनुचित व अवांछित है। जिस राजनैतिक उद्देश्य के लिए उसने इस मुद्दे को लटकाये रखा है। वह जिस उचित समय (जैसा समय-समय पर केन्द्रीय सरकार कहती रही है) की रास्ता देख रही है। वह समय आने पर भी उससे उसको फायदा नहीं होगा क्योंकि मामला देश की अस्मिता से जुड़ा है। लेकिन तुच्छ राजनैतिक दृष्टिकोण से कभी कभी मति मारी जाती है और देशहित ताक पर रख दिये जाते है। राष्ट्र यह जानना चाहता है कि इस देश में ऐसा कौन सा चेला है जो 'गुरूÓ को सजा न होने देने में सहायक सिद्ध हो रहा है।
अब मैं आपका ध्यान इस मुद्दे पर देश की विभिन्न राजनैतिक सामाजिक संगठन और स्थापित हस्तियों द्वारा कोई आंदोलन न छेडऩे की ओर ले जाना चाहता हूं। अन्ना ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनलोकपाल बिल लाने के लिए विभिन्न अवसरों पर अनशन कर पूरे देश को आंदोलित कर दिया। बाबा रामदेव कालाधन के मुद़दे पर रामलीला मैदान पर धरने पर बैठने से लेकर अपनी देशव्यापी यात्रा द्वारा पूरे देश को आंदोलित कर चुके है। विभिन्न राजनैतिक दल विभिन्न मुद्दो को लेकर गाहे बगाहे आंदोलन करते रहते है। अर्थात आंदोलन, अनशन हर व्यक्ति, संस्था और पार्टी की नजर में उनके उद्देश्य की पूर्ति का एक सफल हथियार रहा है। देश की अस्मिता को नुकसान पहुंचाने वाले अफजल गुरू को उसकी अंतिम तार्किक परणीति तक पहुंचाने अर्थात फांसी की सजा को लागू करने के लिए देश अनशन पर क्यों नहीं बैठ रहा है और देश क्यो नहीं आंदोलित हो रहा है? और इस उद्देश्य हेतु देश को आंदोलित करने के लिए गांधीवादी अन्ना हजारे आगे क्यों नहीं आ रहे यह सवाल मन को कंचोटता है। 'अन्नाÓ का नाम इसलिए नही कि 'अन्नाÓ ने ही समस्त मुद्दो को उठाने का ठेका ले रखा है बल्कि इसलिए अन्ना को आगे आना चाहिए क्योंकि देश में वर्तमान में वे ही एकमात्र शख्सियत है जिनकी स्वीकार्यता देश के मानस पटल पर (कुछ कमिंयों के बावजूद भी) प्रभावशाली रूप से विद्यमान है। 'टाईम्सÓ पत्रिका ने भी अन्ना की इस स्वीकारिता को माना है। दूसरे अन्ना के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण होना चाहिए क्योंकि जब वे प्रभावशाली कठोर जनलोकपाल बिल की बात करते है। तो इसका यह मतलब नहीं होता है कि मात्र कड़क प्रावधान हो बल्कि उन प्रावधानों का कड़कता की उस सीमा तक कार्यान्वित भी हो। उसी प्रकार जब भारतीय दण्ड संहिता में अधिकतम सजा (केपिटल पनिसमेंट) फांसी है तो फांसी होनी भी चाहिए तभी इस प्रावधान का अर्थ है। चूंकि अफजल गुरू की फॉसी का मुद्दा देश की सुरक्षा व अस्मिता से जुड़ा मामला है तो अन्ना को इस मुद्दे पर अनशन पर बैठना चाहिए ताकि वे अनशन के दबाव के द्वारा महामहिम राष्ट्रपति को निर्णय लेने के लिए मजबूर कर अफजल को फांसी दिलाकर उन शहीद परिवारों जिनके सदस्यों ने संसद की सुरक्षा के लिए अपना सबकुछ बलिदान कर दिया को कुछ सांत्वना मिल सके और देश के नागरिको में भी एक संतुष्टि का भाव पैदा हो सके। वैसे भी भ्रष्टाचार से बड़ा मुद़दा है देश की अस्मिता व प्रतिष्ठा का। यदि देश ही नहीं रहेगा, देश का प्रजातंत्र ही नहीं रहेगा तो भ्रष्टाचार का मुद्दा बेमानी हो जाएगा। मैं अन्ना से अपील करता हूं कि जैसे वे २७ तारीख को लोकपाल मुद्दे पर अनशन पुन: करने वाले है उससे पहले वे इसमें अफजल गुरू की फांसी का मुददा जोड़ दे तो देश के करोड़ो लोगो की भावनाओं का सम्मान करेंगे। यदि वे मुझे भी अनुमति देंगे तो मैं उनके साथ आमरण अनशन पर इस मुद्दे पर बैठने को तैयार हूं। लेकिन क्या अन्ना गांधीवादी होने और अहिंसा पर चलने के कारण देश के लिए अपनी जांन न्यौछावर कर देने के अपने कथन के बावजूद अफजल मुद्दे पर इसलिए अनशन पर नहीं बैठेंगे क्योंकि इससे एक व्यक्ति की हत्या होती है? देश का अवाम इस बात को समझना चाहता है? वैसे भी अन्ना लोकपाल के मुद्दे पर ही रूकने वाले नहीं है बल्कि स्वयं उन्होने यह घोषणा की है कि उनका अगला निशाना 'राइट टू रिकालÓ होगा। अत: जब वे देश की विभिन्न मूलभूत समस्याओं को लेकर अंतिम सांस तक अनवरत लड़ाई लडऩे के विचार व्यक्त कर चुके है। तब वे अफजल के मुद्दे पर क्यो चूक रहे है जिसका जवाब सिर्फ अन्ना ही दे सकते है।
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(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

खुदरा व्यापार-विदेशी सीधा निवेश (एफडीआई) बहस कितनी सही! कितनी गलत!



Photo taken from: firstpost.com


राजीव खण्डेलवाल:
इस समय पूरे देश में रिटेल सेक्टर में विदेशी सीधा निवेश (एफडीआई) पर चर्चा हो रही है। एफडीआई कितना कारगर है या नहीं इस पर मैं यहॉं चर्चा नहीं करूंगा। इससम्बंध में पूरे देश में इलेक्टानिक, प्रिंट मीडिया सहित अनेक फोरम पर चर्चा हो रही है। परन्तु मैं इसके कुछ  अनछुए पहलुओ पर देश के प्रबुद्ध नागरिको का ध्यान अवश्य आकर्षित करना चाहता हूं।
                      देश की राजनीति का यह एक स्थायी कल्चर हो गया है कि जब भी इस देश में कोई भी नई योजना, आयोजना, कार्ययोजना, नियम, कानून, सिद्धांत के विचार लाकर यथास्थिति में परिवर्तन करने का प्रयास किया जाता है तब उसके गुणदोष पर पक्ष-विपक्ष द्वारा विचार किये बिना, परिवर्तन लाने वाला पक्ष उसे पूर्णत: उचित ठहराता है और विरोधी पक्ष इसे पुर्णत: अनुचित। वास्तव में इस प्रकार का व्यवहार न तो सही है न उचित है और न ही देश के आगे बढऩे के लिए सही संकेत देता है। इस परिस्थिति पर गहन विचार विमर्श की आवश्यकता है। वास्तव में जब भी काई नई योजना या नीति की घोषणा सरकार द्वारा की जाती है तो वह न तो अपने आप में पूर्ण होती है, न हीं पूर्ण हो सकती है और न ही यह संभव है, बल्कि इसमें आलोचना का अवसर हमेशा विद्यमान रहता है। लेकिन न तो योजना लागू करने वाले आलोचना सुनने के लिए तैयार रहते है और न ही विपक्षी लोग आलोचना करते समय उसके विद्यमान गुणवत्ता का समर्थन किये बिना उस योजना के बारे में बिना सोचे मात्र उसकी आलोचना की चिंता को दिखाने की कोशिश करते है। इस कारण से वह विषय, मुद्दा, नीति जनता के बीच लाने का प्रयास तो एक तरफ रह जाता है और मात्र परस्पर विरोध की आड़ में वह विषय जिस से समाज के, देश के विकास को जो गति मिल सकती है (जिसके लिए वह लाया जाता है) वह धरा का धरा रह जाता है। किसी भी योजना या नीति के पक्ष-विपक्ष दोनो पक्ष होते है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिये। इसके अतिरिक्त जब उसे लागू करने की अवस्था आती है तब भी वर्तमान व्यवस्था में व्याप्त लालफीताशाही व भ्रष्टाचार के कारण उसे पूर्णत: लागू करना संभव नहीं हो पाता है। इस कारण उसके वे परिणाम हमें नही मिलते है जिसकी उम्मीद में वह नीति बनाई जाती है। यह हमारी नीतिगत कमजोरी ही नहीं बल्कि हमारी व्यवस्था की भी विफलता है जिसपर भी गहन मंथन की आज आवश्यकता है।
                      एफडीआई भारत के लिए कोई नया विषय नहीं है पिछले कई सालों से भारत में विभिन्न क्षेत्रो में एफडीआई के माध्यम से निवेश हुआ है। चाहे दुपहिया उद्योग का मामला हो, कार उद्योग या अन्य अनेक क्षेत्र हो जिसमें एफडीआई का निवेश होने के कारण न केवल उद्योगों की प्रगति हुई बल्कि संबंधित टेक्नॉलॉजी भी भारत में आई है जिसके आधार पर भारत नें अपनी स्वयं की टेक्नॉलाजी को विकसित भी किया है। जहां तक खुदरा व्यापार में एफडीआई के आने के कारण लाभ या हानि का प्रश्र है इसपर विचार करने के पूर्व मैं दोनो पक्षों को याद दिलाना चाहता हूं कि लगभग २० वर्ष पूर्व वर्ष १९९१ में जब भारत ने सर आर्थर डंकन प्रस्ताव के माध्यम से वल्र्ड ट्रेड ट्रीटी पर दस्तखत किये थे तब उसको लागू करने वाले सरकारी पक्ष ने सुनहरे भारत का सपना देश के नागरिको को दिखाया था और इसका विरोध करने वाले पक्ष ने इसकी तुलना 'ईस्ट इंडिया कंपनी' के आगमन से कर आर्थिक रूप से पराधीन भारत की आशंका जाहिर की थी। क्या दोनो पक्षों से यह नहीं पूछा जाना चाहिए हूं कि भारत आज दोनो स्थितियों मे कहा खड़ा है? ये हमारे राजनेताओं की आदत सी हो गई है कि किसी भी स्थिति को मात्र अपने राजनैतिक दृष्टिकोण से देखने के कारण उसे अपनी ओर अधिकतम सीमा तक खीचना  देश के आर्थिक विकास के लिए ठीक नही है। यदि डंकन प्रस्ताव की याद करें तो न तो भारत आज वैसा कमजोर हुआ और न ही भारत सोने की चिडिय़ा हुआ जैसा कि दावा तत्समय दोनो पक्षो द्वारा किया गया था। आईये खुदरा व्यापार में एफडीआई के कारण होने वाले प्रभाव के सम्बंध में हम समझ ले जिसपर पूरे देश में हो हल्ला  हो रहा है। एफडीआई पूर्णत: गलत नहीं है क्योंकि हमारे देश के आर्थिक ढांचे को देखते हुए देश के विकास के लिए पूंजीगत निवेश  की अत्यधिक आवश्यकता है जिसकी पूर्ती कुछ हद तक एफडीआई द्वारा हो सकती है। परन्तु देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति व देश की आर्थिक विकास की रीढ़ की हडड़ी हमारे किसान और व्यापारी बंधुओं की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर उनके हितो के लिए यदि निश्चित प्रतिबंध नहीं लगाये जाते है तो उससे हानि हो सकती है। इसलिए एक तो इसके निवेश की सीमा का प्रतिशत कम होना चाहिए, दूसरे उनकी संख्या तय होनी चाहिए, तीसरे माल की जगह की शहर से दूरी की न्यूनतम सीमा भी तय होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त इंफ्रास्टक्चर पर खर्च न केवल ५० प्रतिशत से अधिक होने चाहिए बल्कि वह वास्तव में हुआ है या नहीं इसकी प्रभावी निगरानी जॉच एजेंसी भी होना चाहिए। इस सबके बावजूद एफडीआई के बारे में जो गलत प्रचार है कि बिचोलिये का व्यवसाय खत्म हो जाएगा व वे बेराजगार हो जायेंगे यह सरासर गलत है। यदि उपरोक्त प्रतिबंधों के साथ रिटेल में एफडीआई आता है तो निश्चित रूप से उपरोक्त आशंका निर्मूल होगी। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं। शहर में सामान्यतया थोक खरीदी करने वाले व्यक्ति सस्ते माल के लिए बड़ी थोक दुकान से माल किराना खरीदते है। इसके बावजूद हमारी जो नेक्स्ट डोर शॉप (बाजू की दुकान) होती है उसी से डेली कन्ज्यूम होने वाली वस्तुओं की भी खरीदी की जाती है। अब यदि एफडीआई के तहत कोई मॉल वाल-मार्ट शहर में खुलता है तो थोक की खरीदी उक्त थोक विक्रेता के बजाय वालमार्ट से (सस्ती होने पर) खरीदी जायेगी लेकिन प्रतिदिन की खरीदी नेक्स्ट डोर शॉप से ही होगी अर्थात वालमार्ट के आने से होलसेल व्यवसाई पर मार अवश्य पड़ेगी परन्तु रिटेलर पर नहीं। इसलिए शरद यादवजी का यह कथन की दो करोड़ बिचोलिये लोग बेरोजगार हो जाएंगे गलत है। एक और बात है कि जब भी नई प्रणाली लायी जाती है तो कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। इस नीति के द्वारा  हमें शुद्ध  ताजा व सस्ता माल मिले, इंफ्रास्टक्चर खड़ा हो ताकि सब्जियां व अन्य वस्तुए सड़े गले नहीं। अत: एक बेहतर फायदे के लिए एक तत्कालिक नुकसान होता है तो वह हमें सहन करना चाहिये है। फिर एक बात और यदि हम बिचोलियो की बेरोजगारी के नाम पर निंदा करने देना चाहते है जिसके कारण जहां उत्पादक को माल के उत्पादन पर उचित मुनाफा नहीं मिल रहा है वही हमारा उपभोक्ता जिसके लिए उक्त उत्पादन किया जाता है उसको कई गुना उंचे भाव पर क्रय करना पड़ रहा है इसका कारण कई स्तर पर बिचोलियों का होना ही है। मुझे याद आता है जब कम्प्यूटर युग आया था तब भी लोगो ने उस समय उसका विरोध इस आधार पर किया था की इससे बेरोजगारी बढ़ेगी लेकिन हम देखते है कि आज हम कम्प्यूटर बिना अधूरे है। गैर उत्पादक (अनप्रेडिक्टिव) रोजगार कम होकर उत्पादक रोजगार के अवसर बढ़े है। बैंको व इंसोरेंश के क्षेत्र में एफडीआई आने के बावजूद भारतीय बैंक या इंशोरेंस कम्पनी लडख़ड़ाई नहीं है। वर्ष १९६९ में बैंको के राष्ट्रीयकरण के बात देश के ग्रामींण स्तर पर बैंको की शाखा खुलने से ग्रामींण जनता की त्रण की जरूरत की कुछ सीमा तक पूर्ति होनी के कारण तत्समय प्रचलित साहुकारी व्यवसाय के बंद होने कीआशंका के कारण बहुत से लोग बेरोजगार हो गये तो क्या बेरोजगारी की आशंका के कारण साहुकारी व्यवसाय चलने देना चाहिए था। इसी प्रकार जब ऑटो रिक्शे रोड पर चलाये गये तो क्या रिक्शे, टांगे वाले बेरोजगार नहीं हो गये? तब हमने क्या ऑटो चलाना बंद कर दिया? कहने का तात्पर्य यह कि जब भी किसी वर्तमान व्यवस्था को बदला जाता है या बदलने का प्रयास किया जाता है तब इसका प्रतिरोध होना स्वाभाविक है लेकिन समय के साथ-साथ व्यवस्थाएं अपना विकल्प ढूंढ लेती है और लार्जर सिस्टम का एक पार्ट हो जाती है। 
                      एक बात और क्या रोजगार के नाम पर बिचोलियो को मुनाफाखोरी करने देना उचित है? क्या उत्पादन मूल्य व उपभोक्ता मूल्य के बीच अन्तर कम नहीं होना चाहिए? ताकि एक तरफ उत्पादक को उसके लागत खर्च के अनुसार सही मूल्य मिले दूसरी तरफ उपभोक्ता को महंगाई से निजात पाने के लिए उसकी क्रयशक्ति के अनुरूप सस्ता माल मिले। यह वहीं वक्त है जब उत्पादक व उपभोक्ता के बीच की चैनल को कम किया जाए यदि ये चैनल्स ही रोजगार देने की एकमात्र व्यवस्था है तो फिर हम इन चैनल्स के आगे और ५-१० बिचौलिये को जोड़कर उन्हे रोजगार देकर उपभोक्ताओ को क्यों और महंगा माल नहीं दे देते? वास्तव में हम इसके गुण-दोष पर संवाद न कर मात्र विवाद कर रहे है जिस कारण इस मुद्दे से जुड़े अनछुए पहलू पर विचार करने के लिए मजबूर किया है कि क्यो सरकार नें उत्पादन मूल्य से उपभोक्ता मूल्य तक पहुंचने तक में विज्ञापन  जैसा अंधाधुंध गैर उत्पाद व्यय (जो वास्तविक उत्पादन मूल्य से कई गुना हो रहा है) कर माल के कीमत की कई गुना महंगी क्यों होने दिया जा रहा है? क्या उसपर कोई नियंत्रण की आवश्यकता नहीं है? जिससे माल का मूल्य कम होकर उपभोक्ता को सस्ता माल मिल सके। वास्तव समय की यह मांग है कि आज इस पहलू पर भी एक वृहद नीति की आवश्यकता है जिस पर न केवल सरकार बल्कि बड़े औघोगिक घराने भी आत्ममंथन करें।
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(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)
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