मंगलवार, 15 अगस्त 2017

न्यायपालिका की ‘‘अवमानना’’के लिये क्या कुछ सीमा तक न्यायपालिका ही दोषी नहीं?


विगत पखवाड़ा भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस.खेहर ने भवन के व्यावसायिक उपयोग से संबंधित एक मामले में पीड़ा के साथ यह टिप्पणी की कि इस देश के लोग न्यायालयों के निर्णयो का पालन नहीं कर रहे हैं। कानून तोड़ने तथा कोर्ट के आदेशांे की धज्जिया उड़ाने में वे अपनी शान समझते हैं। बिना शक, माननीय मुख्य न्यायधीश की उक्त पीड़ा व चिंता सही हैं। लेकिन सिर्फ नागरिको को इसके लिये जिम्मेदार ठहराने का उनका यह कथन पूर्णतः सही नहीं कहा जा सकता। मुख्य न्यायाधीश के उक्त कथन को दो भागों में बांटा जा सकता हैं। एक तो ‘‘कानून को तोड़ना’’ व दूसरा कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर उनकी अवमानना करना। आगे सिर्फ न्यायालय की अवमानना का ही विश्लेषण किया जा रहा हैं। 
अवमानना का अर्थ न्यायापालिका के निर्णयों की अवहेलना करना, उनका पालन न करना और निर्णय में दी गई समय (मूल अथवा बढाई गई) सीमा में उनको लागू न करना हैं। यथार्थ में न्यायालय का यह भी दायित्व हैं कि वह अपने निर्णयों को पारित करने के साथ-साथ उन्हे समय-बद्ध सीमा में पूरी दृढ़ता के साथ लागू भी करे/करवाये। इसेे लागू करने में यदि कोई भी पक्ष उदासीनता दर्शाता हैं, अपेक्षित कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता हैं, तो वह अवमानना का दोषी हैं, और उसे कानून के प्रावधान के अनुसार सजा दी ही जानी चाहिए। वास्तव में न्यायालय की अवमाननाओं के लिये मुख्य रूप से स्वतः न्यायालय ही जिम्मेदार होते हैं। अगले कुछ उदाहरणों से यह तथ्य आपके समझ में आ जॉंएगा। 
माननीय उच्चतम् न्यायालय के उस निर्णय को याद कीजिए जहॉं न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने हथकड़ी पहनाने को अमानवीय व अपमान जनक बतलाया था। (देखिये सुनील बतरा विरूद्ध दिल्ली प्रशासन ए.आई.आर.1978 पेज 1678) माननीय उच्चतम् न्यायालय ने अन्यत्र कई प्रकरणों में  भी यह आदेश दिया गया था कि अभियोगियों को न्यायालय में हथकड़ी लगाये बिना प्रस्तुत किया जाना चाहिऐ। सुरक्षा की दृष्टि से यदि हथकड़ी लगाया जाना आवश्यक ही हैं, तो न्यायिक अधिकारी के आदेश के अधीन गिरफ्तारी वारंट जारी किये जाने पर ही हथकड़ी लगायी जानी चाहिए। (देखिये सुनील गुप्ता विरूद्ध म.प्र. शासन 1990 एस.सी.सी. पेज 441 एवं ए.आई.आर.1980 एस.सी पेज 540)। लेकिन आये दिन हम देखते हैं कि प्रायः सभी न्यायालयों में अधिकांश आरोपियों को (प्रभावशालियों को छोड़कर) न्यायालय के ठीक आंख के सामने हथकड़ी लगाकर पेश किया जाता हैं। अतः जब अधीनस्थ न्यायालय ही अपने उच्चतम् न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करवाती हैं और न ही चूक करने वाले संबंधित के खिलाफ कोई कार्यवाही करती हैं, तब फिर न्यायालय की आंख के सामने हो रही ऐसी अवमानना के लिये स्वयं न्यायालय ही सबसे बड़े दोषी नहीं तो अन्य कौन?
इसी प्रकार उच्चतम् व उच न्यायालय ने बहुत से निर्णय ऐसे पारित किये हैं जिनका सामान्यतः अक्षरशः  पालन किया जाना संभव नहीं होता हैं। न ही उतनी सक्षम व्यवस्था (सिस्टम) सरकार या न्यायालय के पास हैं कि वह अपने ऐसे निर्णयों को पूरी भावना के साथ दृढ़ता पूर्वक लागू/पालन करवा सके। अतः ऐसेेे मामलो में भी न्यायालय ही अवमानना के लिये जिम्मेदार माने जायेगे। उदाहरणस्वरूप माननीय उच्चतम् न्यायालय केे न्यायमूर्ति आर.सी.लाहोटी ने नाईज पालुशन विरूद्ध अज्ञात (आई.आर. 2005 पेज 3136) में दिये गये निर्णय में निर्देश दिया था कि रात्रि 10 बजे तक ही फटाके, डीजे बजाया जाना चाहिये (कुछ अपवाद को छोड़कर)। आज इस निर्णय का कितना पालन हो पा रहा हैं, और पालन न होने पर अवमानना के लिए न्यायालयों ने कितनी कार्यवाही की हैं? न्यायालय ने उक्त निर्णय देते समय यह नहीं सोचा कि हमारे समाज में शादी व त्यौहारों के वक्त देर रात्री तक संगीत मय कार्यक्रम गाजे बाजे, फटाको के साथ चलते रहते हैं, जिस कारण बिना दुराशय के मासूमियत (इनोसंेसली) के साथ आदेश का उल्लघंन हो रहा हैं। जब किसी कार्यक्रम के लिये प्रशासन से अनुमति मांगी जाती हैं, तब प्रशासन अनुमति देते समय उक्त निर्णय के तहत रात्री 10 बजे तक ही अनुमति देता हैं। इस तरह केवल कागजी कार्यवाही में ही उक्त निर्णय का पालन हो पा रहा हैं। यद्यपि उक्त आदेश के पीछे न्यायालय की मंशा ध्वनि बाधा व प्रदूषण के कारण नागरिको को होने वाली तकलीफ को रोकने की कोशिश हैं। लेकिन न्यायालय ने अपने निर्णय में शादी, धार्मिक आयोजन जैसे कार्यक्रमों के लिये कोई सामान्य अपवाद भी नहीं छोड़ा हैं।   
उच्च न्यायालय का एक और निर्णय जिसमें मध्यप्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग की चेकपोस्ट पर नियुक्त हम्मालो की ‘‘सेवा की समाप्ति के आदेश’’ को अवैध घोषित करके उन्हे नियमित करने के आदेश दिये गए थे। लेकिन मध्यप्रदेश शासन ने वित्तीय स्थिति का हवाला देकर उन्हे अभी तक नियमित नहीं किया हैं। इसी प्रकार संविदा शिक्षक वर्ग, दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी आदि अनेक ऐेसे मामले हैं जो धरातल पर निर्णय के परिणाम की वास्तविकता की राह जोह रहे हैं लेकिन न्यायालय ने न तो अपने संबंधित आदेशों में कोई संशोधन ही किया और शायद ही अवमानना की कोई कार्यवाही की हो। 
इसी प्रकार उच्चतम् न्यायालय ने ‘‘राष्ट्रीय राजमार्ग व राज्य मार्ग (स्टेट हाइवे) की 500 मीटर निकट परिधि में शराब की दुकान को बंद करने’’ के आदेश दिये थे। जिसेे निष्प्रभावी बनाने के लिये उत्तर प्रदेश जैसी कुछ सरकारों ने राष्ट्रीय राजमार्ग की परिभाषा ही बदल दी व अधिसूचना द्वारा प्रभावित कुछ राजमार्गो के कुछ खंड़ो को राजमार्ग से ही हटा दिया। इक्कीसवी सदी में विकास का दम भरने वाली ऐसी सरकारो से उच्चतम् न्यायालय ने यह नहीं पूछा कि प्रगति के इस दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग को अंतर्राष्ट्रीय मार्ग घोषित किया जाना चाहिए? या राष्ट्रीय मार्ग की 6 लेन को 8 लेन में परिवर्तित किया जाना चाहिए? अथवा उसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंर्तगत ग्रामीण मार्ग घोषित करके न्यायालयीन आदेश को अंगूठा दिखाना चाहिए? इस प्रकार सरकारे न्यायिक निर्णयों को प्रभावहीन करने के लिये वैधानिक लेकिन अनैतिक प्रयास करने लगी हैं जिस पर शायद ही न्यायालयों ने अपने निर्णय को इस तरह से प्रभावहीन करने के कारण सरकार के विरूद्ध कोई कार्यवाही की हो।
यहॉ पर ‘‘कानून का पालन न करने’’ व ‘‘न्यायालय के आदेश का पालन न करने’’ के अंतर को भी समझना आवश्यक हैं। हमारे देश में अनगिनत बहुत पुराने कानून हैं। हाल में ही बहुत से पुराने कानून जो अप्रासंगिक हो चुके हैं, उनको संसद ने समाप्त कर दिया हैं। इसके बावजूद कानून व उनके प्रावधान इतने ज्यादा व क्लिष्ट हैं कि एक सामान्य नागरिक के लिये उन सबका पूर्णतः पालन करना लगभग असंभव सा हैं। सड़क चलते थूकना, ध्रूम्रपान करना एक अपराध हैं। लेकिन इसका कितना पालन नागरिकों द्वारा किया जाता हैं या सरकार द्वारा कराया जाता हैं? इस प्रकार के कानूनो के होने से नागरिको में कानून के उल्ल्घंन की प्रवृत्ति बढते जा रही हैं जिसका प्रभाव बंधनकारी न्यायालीन आदेशो के पालन पर भी पड़ रहा हैं। इसके लिये न केवल नागरिकों को उनके नैतिक दायित्व का लगातार बारम्बार बोध कराये जाने हेतु अनवरत पाठशाला लगाई जानी चाहिए बल्कि सरकार को भी ऐसी प्रणाली (सिस्टम) विकसित करना चाहिए जो कानून का पालन करा सके व ऐसे कानून बनाने से बचना चाहिये जिनका अधिकांशतः दिन प्रतिदिन उल्लघंन होता हैं और उन उल्लघंनों के विरूद्ध कोई कार्यवाही भी नहीं होती हैं।
लेकिन समस्या का दूसरा व महत्वपूर्ण पहलू हैं न्यायालय द्वारा ऐसे अव्यावहारिक आदेश पारित कर देना जो ‘‘विधायिका द्वारा पारित कानून न होने के बावजूद उनके समान ही हैं, के पर्यायावाची भाषित होने के कारण वैसा ही न्यायिक प्रभाव रखतेे हैं। इस वजह से ऐसे आदेश के  उल्लघंन के परिणाम स्वरूप न्यायालय की अवमानना होती हैं। ‘‘कानून का उल्लघंन अवमानना नहीं लेकिन न्यायालय के आदेश का उल्लघंन अवमानना’’ हैं। इसलिये माननीय उच्चतम्/उच्च न्यायालय को ऐसे आदेश पारित नहीं करना चाहिए जिन्हे पूर्णतः लागू नहीं करवाया जा सकता हैं। यद्यपि ऐसे आदेश जनहित में हो सकते हैं। इसके लिये सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि ऐसे जनहित के मामलो में न्यायालय सीधे आदेश पारित करने के बजाय केन्द्रीय/राज्य सरकारों को यथोचित कानून/नियम बनाने के लिये निर्देश दे, ताकि ऐसे निर्देशों के आधार पर सरकारों द्वारा बनाए गए कानून/नियम का पालन न हो पाने की स्थिति में ‘‘न्यायालय की अवमानना नहीं होगी वरण् कानून का उल्लघंन होगा’’ जिसके लिये कानून में सजा का प्रावधान हैं।  
यह संवैधानिक व्यवस्था हैं कि उच्चतम् न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिंद्धान्त देश का कानून  होता हैं जो पूरे देश पर बंधनकारी रूप से लागू होता हैं। इसका वही प्रभाव होता हैं जो देश के संसद द्वारा पारित कानून का होता हैं। यही स्थिति उच्च न्यायालयों व राज्यो पर भी लागू होती हैं। अवमानना की घटनाओं के बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण न्यायिक सक्रियता के रहते आज कल न्यायालय द्वारा कानून की व्याख्या करने के साथ-साथ कानून बनाने के आदेश दिये जा रहे हैं जो कार्य विधायिका वह कार्यपालिका का हैं। इस सबके बावजूद यदि अभी भी न्यायालय कीे अवमाननाओं की घटनाओं को रोका नहीं  गया तो न्यायपालिका का सबसे मजबूत आधार कि ‘‘उसका निर्णय बंधनकारी हैं,’’ असफल हो जावेगा और अंततः न्यायपालिका कमजोर होते जायेगी। 
   

सोमवार, 31 जुलाई 2017

‘नैतिकता’’ के आवरण का दावा करने के लिये ‘‘अनैतिकता’’ को ओढना कितना नैतिक!

बिहार की राजनीति में तेजी से बदलते राजनैतिक घटना क्रम के चलते 18 घंटे से भी कम समय में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का रंग हरा से भगवा हो गया। इस बदलते घटना क्रम में सभी पार्टीयों ने भ्रष्टाचार को लेकर नैतिकता को विभिन्न रूप में इस तरह से परिभाषित किया व उसका चीर-हरण़ कर इतना नंगा कर दिया कि नैतिकता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया, जिससे शायद स्वयं नैतिकता ही शर्मशार हो गई। राजनीति में एक समय राजनैतिक शुचिता व नैतिक आयाम के तहत (स्वं. लाल बहादुर शास्त्री) तत्कालीन रेल्वे मंत्री ने मात्र एक रेल दुर्घटना के घटित होते ही इस्तीफा देकर जो लक्ष्मण रेखा खीची थी, वह अब इतिहास और किताबों के पन्ने की बात हो कर रह गई हैं।
राजनैतिक हमाम में नंगी हुई समस्त राजनैतिक पार्टियों की नैतिकता को देखने परखने व व्याख्या करने का एक और मोैका बिहार के इस राजनैतिक घटना चक्र ने  दिया हैं। सर्वप्रथम बात नीतीश कुमार की नैतिकता की ही ले लें। राजनैतिक शुचिता, नैतिकता और जीरो टालरेंस (शून्य सहनशीलता) को महामुद्दा बनाकर नीतीश कुमार ने आकर्षक सत्ता सुंदरी मुख्यमंत्री की कुर्सी को ऐसी ठोकर मारी कि न्यूटन का ‘‘क्रिया की प्रतिक्रिया वाला’’ सिंद्धान्त याद आ गया। तदनुसार ही नीतीश द्वारा त्यागी गई मुख्यमंत्री की कुर्सी विपक्षी दल के हृदय की दीवार से टकराकर वापस आकर 16 घंटे में पुनः उन्हे प्राप्त हो गई, क्योंकि वह नैतिकता के फेविकॉल से लबरेज थी। 
वास्तव में  इस नाटक की शुरूवात तो उस दिन से ही हो गई थी, जब सी.बी.आई.ने भारतीय रेल्वे की निविदा के एक मामले में पूर्व रेल्वे मंत्री लालू प्रसाद यादव पर रेल्वे की हेरिटेज होटल बीएनआर होटल के विकास, मंेटेनेनस व आपरेशन (चलाने) के लिये हुये टेंडर में उनके परिवार पर तेजस्वी सहित सम्पत्ति लेने का फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया गया। लालू यादव ने निविदा की शर्तो को (निविदा कर्त्ता) सुजाता होटल के पक्ष में कम करते हुये उसे फायदा पहंुचाया, जिसके एवज में निविदा कर्ता द्वारा बेहद कम कीमत पर डिलाइट मार्केटिग कम्पनी को 3 एकड़ जमीन दी गई, जो बाद में लालू के परिवार को हस्तांतरित कर दी गई। अतः स्पष्ट हैं कि तेजस्वी यादव आदेश देने में या फायदा पहंुचाने देने की स्थिति में नहीं थे। उन पर यह आरोप भी नहीं हैं कि उनने रेल्वे मंत्री के साथ मिलीभगत करके फायदा पहंुचाने का आदेश करवाया। इस प्रकार उसे निविदाकर से सीधे कोई फायदा भी नहीं मिला था। रेल्वे मंत्री को भी सीधे निविदाकार से फायदा नहीं मिला था। परिस्थितियांे जन नीतीश कुमार के इस कथन को कि उन्हांेने भ्रष्टाचार से कभी भी समझौता नहीं किया हैं, जिसके फलस्वरूप बिहार में यह राजनैतिक तूफान उठा, जो बिहार के हित में हैं, देखना होगा। इस संदर्भ में उनसे क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि न्यायालय द्वारा सजायाफ्ता जमानतदार लालू यादव जो सजायाफ्ता होने से चुनाव लड़ने योग्य भी नहीं थे, उनके व उनकी पार्टी ‘‘राजद’’ के साथ गंठबंधन कर जब उन्होंने चुनाव लड़ा था, तब उनकी वह नैतिकता व जीरो टालरेंश कहॉं चला गया था। यदि सजायाफ्ता व्यक्ति जीरो टालरेंश की परिधि में आ सकता हैं, तो मात्र प्रथम सूचना पत्र में नामित (जिसके विरूद्ध अभी जांच व अनुसंधान ही चल रहा है) व्यक्ति के विरूद्ध जब आरोप पत्र भी अभी पेश नहीं हुआ हैं, तब वह व्यक्ति जीरो टालरेंश की परिधि के बाहर कैसे हो सकता हैं? चुनाव (जो लोकतंत्र की आत्मा, प्राण और उसे वायु देने वाला होता है) लड़ने के अयोग्य लालू यादव के साथ नीतीश ने न केवल चुनाव लड़ा बल्कि जनता ने लालू को नीतीश से ज्यादा बहुमत देकर न केवल लालू यादव के अछूतापन को धोया ही, बल्कि नीतीश ने स्वयं मुख्यमंत्री पद को स्वीकार कर लालू को अंगीकृत भी किया। तब क्या यह सब कुछ सही था! श्रीमान सुशासन बाबु!नीतीश कुमार राजनीति के बडे़ चतुर खिलाड़ी रहे हैं, एवं कौन सी चाल कब चलना हैं, वे अच्छी तरह से जानते और समझते हैं, इसीलिये अबकी छटवीं बार भी वे पुनः मुख्यमंत्री बन गए हैं।  
आरजेडी के अध्यक्ष लालू यादव पर ही नहीं, बल्कि उनके कुनबे के कई सदस्यों पर भ्रष्ट्राचार के न केवल गंभीर आरोप लगे हैं, बल्कि कुछ पर तो मुकदमें भी चल रहे हैं। यदि नीतीश कुमार का ऐसे लालू के साथ मिलकर (स्वयं का बहुमत न होने के बावजूद, और लालू से कम सदस्य होने के बावजूद) मुख्यमंत्री की शपथ लेना जीरो टालरेंश के अंर्तगत था। तब नाबालिग तेजस्वी यादव के प्रति लगाया गया आरोप जीरो टालरेंश क्यों नहीं? क्यांेकि तब वे उस कृत्य के कर्ता भी नहीं थे, मात्र वे अधिकतम मासूम (इनोंसेंस) लाभार्थी थे। ठीक उसी प्रकार जैसा रिश्वत देने वाला नहीं ‘‘लेने वाला’’ भ्रष्टाचारी होता हैं, लेकिन वह लाभार्थी जरूर होता हैं। तेजस्वी के बचपन में लालू द्वारा स्वीकृत किए गए रेल्वे के टेंडर के कारण तेजस्वी को हुए लाभ के आरोप में भी नाबालिक तेजस्वी को कानूनन् जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता हैं। नीतीश कुमार यदि वास्तव में भ्रष्टाचार के विरोधी थे, तो उन्हे भ्रष्टाचार के आगे आत्मसर्म्पण करने के बजाय भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का साहस तेजस्वी यादव से इस्तीफा मांगकर दिखाना चाहिये था, और (इस्तीफा न देने की स्थिति में) तेजस्वी को बर्खास्त करना चाहिये था। भले ही उस स्थिति में उनकी सरकार ही क्यो न चली जाती। तब भाजपा बिन मांगे ठीक उसी प्रकार बाहर से समर्थन देकर नीतीश की सरकार बनाती जैसा कि कांग्रेस ने दिल्ली में बिना मांगे प्रथम बार अरविंद केजरीवाल को बाहर से समर्थन देकर ‘‘आप’’ की सरकार बनाई थी। तब कुर्सी प्र्रेम का जो आरोप नीतीश कुमार पर लगा, उससे शायद वे बच सकतेे थे। नीतीश कुमार की नैतिकता तब कहॉं गई थी, जब उन्होने उस भाजपा से हाथ मिलाकर गठबंधन सरकार बनाई जिस भाजपा के खिलाफ जनता ने उन्हे आरजेड़ी के साथ मिलकर सरकार बनाने का जनादेश दिया था। 
बात लालू यादव व राहुल गांधी की नैतिकता की भी कर ले। लालू यादव ने आज नीतीश कुमार पर धारा 302 हत्या के आरोपी होने के जो गंभीर आरोप लगाये, वह आरोप लालू नेे कल तक नहीं लगाया था, क्योंकि तब नीतीश स्वंय लालू द्वारा बनाये गये मुख्यमंत्री थे। हत्या का आरोप  जो विधानसभा चुनाव के  पूर्व का है, तब लालू यादव ने विधानसभा के चुनाव में नीतीश कुमार को कम मत मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री क्यांे बनाया? लालू को अपने नेता शरद यादव की उस नैतिकता को याद रखना चाहिये जब उनका नाम हवाला कांड में आने पर उन्होंने तुरंत लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, चालान या ट्रायल की प्रतीक्षा नहीं की थी। इसलिये दूसरो की नैतिकता का सवाल उठाने के पहले स्वयं की नैतिकता भी तो परखों! यह कहा भी गया हैं कि कांच के घर में रहने वाले दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते। 
जहॉ तक राहुल गांधी व कंाग्रेस की नैतिकता का प्रश्न हैं, उस पर चर्चा या विचार करना मात्र समय की बर्बादी हैं। स्वतंत्रता प्राप्त होने के समय की या उसके पूर्व की कांग्रेस व आज की कांग्रेस में जमीन आसमान का अंतर हैं। कंाग्रेस का यदि भ्रष्टाचार से परहेज होता, तो 1984 में तीन चौथाई बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी आज 50 से भी कम सीटों पर सिमट कर राजनैतिक हाशिये में नहीं आ जाती। इसलिये कांग्रेस से भ्रष्टाचार या नैतिकता के मुद्दे पर कुछ भी आशा करना नितांत बेवकूफी कहलायेगी।
अंत में भाजपा की भी बात कर लें। भाजपा मानती है कि वह ऐसा पारस पत्थर हैं जो समस्त बुराइयों को अच्छाई में बदलकर सोना बना देती हैं। नीतीश कुमार राजनैतिक खेल की पहली पारी में उनके साथ ओपनर थे, तब वे सोना थे और तब उनके चौंके, छक्के ही नहीं, उनका एक एक रन भी भाजपा को अच्छा लगता था। तब धीमी गति से रन बनाने का आरोप लगाकर उन्हे टीम से निकाला नहीं गया था। जब तक भाजपा के साथ थे, नीतीश कुमार सुशासन बाबू के साथ बिहार के विकास के प्रतीक थे। नीतीश कुमार के पाला बदलकर भाजपा का साथ छोड़ने के साथ ही बिहार का विकास रूक गया व भाजपा को उनके डीएनए में ही खोट नजर आने लगा। लेकिन वह डीएनए जब एनडीए में मिल गया तो वह डीएनए अब पुनः बिहार के विकास को प्रतीक का चेहरा माना जा रहा हैं। भाजपा को सुशासन बाबू नीतीश कुमार की इस नैतिकता को समर्थन देने के लिये धन्यवाद? 
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