सोमवार, 8 अगस्त 2022

देश को ‘‘56 इंच के सीने’’ के साथ ‘‘एकलव्य’’ जैसी ‘‘निशाने’’(दृष्टि) की आवश्यकता है!

प्रथम भाग:-

अमेरिका ने काबुल शहर के शेरपुर इलाके में रह रहे ‘अल कायदा’ के (ओसामा बिन लादेन के बाद बने) सरगना अयमान अल जवाहिरी को अपनी ही जमीन से ‘‘सीआईए ड्रोन’’ हमले द्वारा अचूक निशाने से मारकर 9/11 आतंकवादी हमले का बदला अंततः पूरा कर यह दिखा दिया कि ‘‘बाज के बच्चे मुंडेरों पर नहीं उड़ते’’। अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन व उसका ‘‘दिमाग’’ (सहयोगी) अल जवाहरी के नेतृत्व में 9/11/2001 को अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। तब न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड़ सेंटर व पेंटागन के टावरों पर दो अपहृत विमानों से 17 आत्मधाती आतंकवादियों द्वारा किये हमलों में लगभग 3 हजार (2977) नागरिक मारे गये थे। यह हमला 9/11 के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुआ। 

11 साल बाद वर्ष 2011 में अमेरिका ने ‘‘ऑपरेशन नेप्ट्यून स्पीयर’’ के तहत नेवी ‘‘सील कमांडो’’ पाकिस्तान के शहर एबटाबाद भेजकर वहां रह रहे अलकायदा के प्रमुख, सरगना ओसामा बिन लादेन को  मृत्यु के घाट उतार दिया। इसके 11 साल बाद और बेहतर तरीके से बिना कमांडो भेजे ड्रोन से अचूक निशाना लगाकर परिवार व रहवासी भवन को सुरक्षित रखते हुए अल जवाहिरी का खात्मा कर ठीक ही किया, ‘‘तत्र दोषम् न पश्यामि, शठे शाठ्यम् समाचरेत’’। अल जवाहिरी के मारे जाने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘न्याय कर दिया गया हैं, चाहे कितना भी समय लगे, चाहे आप कहीं भी छिप जाएं, अगर आप हमारे लोगों के लिए खतरा हैं तो अमेरिका आपको ढूंढेगा और आपको बाहर निकालेगा’’। इसे कहते हैं संप्रभुता और प्रभुसत्ता। भारत के लिए यह सबक है, जब गाहे-बगाहे, मीडिया अवसर ढूढ़कर अमेरिका से भारत की तुलना करने का कोई अवसर जाने नहीं देती है। 

स्पष्ट है उक्त दोनों खूंखार आतंकी सरगनाओं को मारने की कार्रवाई में अमेरिका ने कोई अंतरराष्ट्रीय कानून का न तो पालन किया और संयुक्त राष्ट्र संघ अथवा सुरक्षा परिषद से दूसरे देश में घुसकर हमला करने की न तो गुहार की और न ही अनुमति ली और न ही एक क्षण के लिए शायद सोचा भी होगा। भारत में भी 26/11/2008 को ‘‘लश्कर ए तोयबा’’ के सरगना जकीउर रहमान लखवी, संस्थापक हाफिज सईद, साजिद मीर व जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मौलाना मसूद अजहर ने मिलकर जैश-ए-मोहम्मद के अजमल कसाब सहित 10 आतंकवादियों द्वारा मुंबई के 7 विभिन्न जगहों में बम्ब ब्लास्ट करवाया, जिसमें लगभग 160 से ज्यादा निर्दोष नागरिक मारे गये व 300 से ज्यादा घायल हुए। यह आतंकवादी घटना 26/11 के रूप में प्रसिद्ध हुई। यद्यपि इसके पूर्व इसी मुंबई में जब उसे बम्बई (बाम्बे) कहा जाता था, 12 मार्च 1993 (11 के अगले दिन) 11 जगह बम ब्लास्ट हुए, जिसमें 257 लोग मारे गए और 713 घायल हुए, जिसका मास्टमांइड़ दाऊद इब्राहिम था।

अमेरिका व भारत सहित विश्व में ‘‘आतंकवाद’’ को लेकर शायद 11 अंक का बड़ा महत्व लगता है। अमेरिका ने तो 11 वे महीने में हुई आतंकी घटना का 11-11 साल के अंतराल में इस ‘11’ अंक का पूर्ण बदला ले लिया। परन्तु भारत लगभग 14 साल गुजर जाने के बाद भी मसूद अजहर व हाफिज सईद का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। उल्लेखनीय बात यह है कि उक्त आतंकी घटना में शामिल मसूद अजहर वही है, जिसे भारत सरकार ने कंधार विमान अपहरण घटना (वर्ष 1999) में 176 यात्रियों व 11 क्रू सदस्यों की जान के बदले तीन खूंखार आतंकी जिसमें मसूद अजहर भी शामिल था, को अपहरणकर्ताओं से हुई सौदेबाजी के तहत भारतीय जेल से छोड़ा गया था। भारतीय संसद, पठानकोट एयर बेस व पुलवामा आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड मसूर अहमद ही माना जाता है। दाऊद इब्राहिम कासकर, हाफिज सईद, मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किया है व तब देर किस बात की?      

एक क्रूरतम अपराधी को सबक सिखाने के लिए, अमेरिकन कानून या अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुकदमा चलाये बिना और उसे कानूनी अपराधी घोषित कराये बिना, सिर्फ और सिर्फ देश की अस्मिता की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का बेखौफ मजाक उड़ाकर उल्लंघन कर, अमेरिकन राष्ट्रपति ने पहले अल कायदा के सरगना नंबर एक लादेन व बाद में नंबर दो जवाहिरी को समाप्त कर दिया।

उक्त घटनाओं में हुई खूंखार आतंकवादियों की मृत्यु के कारण आतंकवादी गतिविधियों में कमी होने की आशा में शायद विश्व ने राहत महसूस की होगी। तभी शायद अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होने के बावजूद संबंधित देशों ने न तो कोई विरोध प्रकट किया और न ही सुरक्षा परिषद में अमेरिका की इस कार्रवाई के विरुद्ध कोई दुस्साहस दिखाया गया। तालिबान के प्रवक्ता ने सख्त लहजे में नहीं, बल्कि ट्वीट कर हमले की निंदा करते हुए यह कहा कि यह अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांत व दोहा समझौता का स्पष्ट उल्लंघन है। जिस पर अमेरिका ने पलटवार कर ‘‘मियां की जूती मियां के सर’’ पर मारते हुए यह जवाब दिया कि आतंकवाद को समर्थन देने के कारण तालिबान ने ही दोहा संधि का उल्लंघन किया है।

मतलब साफ है। देश की आन-बान और शान पर कोई आतंकवादी संगठन प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दे, देश के निर्दोष नागरिकों को आतंकवादी घटनाओं में मृत्यु के घाट उतार दिया जाए, तब उस देश के शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह बजाय ‘‘अंधे के आगे रो कर अपने दीदे खोने के’’, ऐसी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने वाले को इस तरह का भुगतयमान परिणाम दे, ताकि भविष्य में इस तरह की आतंकवादी घटनाओं की पुनरावृति करने का दुस्साहस फिर न हो सके। क्योंकि ‘‘अपनी करनी ही पार उतरनी’’ साबित होती है। 

शेष क्रमशः अगले अंक में ------------------

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का ‘‘साहसिक’’ कथन!

 ‘‘कंगारू कोर्ट चला रहा है मीडिया’’

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय एनवी रमना ने रांची में ‘‘एस बी सिन्हा मेमोरियल लेक्चर’’ के उद्घाटन अवसर पर बोलते हुए यह कहा कि देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ‘‘गैर-जिम्मेदार’’ होकर ‘‘कंगारू अदालते’’ चला रहे है, जिस कारण से अनुभवी जजों को भी फैसला करने में दिक्कत हो रही है। न्याय से जुड़े मुद्दों पर गलत एजेंडा चलाना/एजेंडा आधारित बहसे, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं। मीडिया से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्ष कामकाज प्रभावित होती है। तथापि ‘‘प्रिंट मीडिया काफी हद तक जिम्मेदारी’’ निभा रहा है। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने उक्त एक कथन में ही चार महत्वपूर्ण बातें एक साथ कह दी हैं। आइये! क्रमशः इनका आगे विश्लेषण करते हैं। 

लोकतंत्र के चार खंभों में से दो प्रमुख खंभे न्यायपालिका और मीडिया है। यहां पर एक खंभा लोकतंत्र के दूसरे खंभे पर सिर्फ आरोप/आक्षेप ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि चिंताजनक वस्तु स्थिति का वर्णन भी कर रहे है। निश्चित रूप से इससेे देश के लोकतंत्र का संतुलन कहीं न कहीं अवश्य गड़बड़ा जाएगा और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। हां मीडिया के कुछ लोग अवश्य उक्त कथन के लिये माननीय मुख्य न्यायाधीपति पर यह आरोप जड़ सकते है कि जिस तरीके से उन्होंने ‘‘मीडिया ट्रायल’’ की आलोचना की है, वह स्वयं न्यायालय द्वारा प्रतिपादित न्याय के उस सिंद्धान्त के प्रतिकूल है, जहां आरोपी या दोषी कहे जाने के पूर्व न्याय के मूल सिंद्धान्त के अनुसार आरोपी को सफाई का पर्याप्त व उचित अवसर दिया जाना चाहिए। इस न्याय सिंद्धान्त का पालन स्वयं मुख्य न्यायाधीश महोदय ने वर्तमान में नहीं किया है।  

75 साल के स्वतंत्र भारत के इतिहास में व इसके पूर्व भी मीडिया, जिसे ‘‘मधुमक्खी का छत्ता’’ कहा जा सकता है, पर इसी कारण कोई सामान्य रूप से हाथ नहीं डाल पाता है। तब ऐसी स्थिति में एक ऐसे प्रमुख व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश है, की उक्त टिप्पणी साहसिक होकर चिंता में ड़ालने वाली है। सामान्यतः मुख्य न्यायाधीश या न्यायालय को इस तरह की टिप्पणी से बचना चाहिए, खासकर जब वे किसी मामले के निपटारे के समय (प्रांसगिक उक्ति) न कहकर सार्वजनिक कार्यक्रम में कह रहे हों। वास्तव में यह कार्य तो कार्यपालिका व विधायिका का है, क्योंकि सुधार लाने का कार्य अंततः विधायिका और कार्यपालिका का ही है। यदि ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश आगे होकर टिप्पणी कर रहे है, तो यह ज्यादा चिंता का विषय है।

मैं पूर्व में कई बार लिख चुका हूं, यदि देश को सुधारना है, नैतिक मूल्यों के स्तर को गिरते हुए रोकना है, तो इस ‘‘अफलातून के नाती’’ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ‘‘जहां मुर्गा नहीं बोलता वहां क्या सवेरा नहीं होता’’? अब तो मीडिया की स्थिति ‘‘मीडिया ट्रायल’’ से होकर कंगारू कोर्ट तक पहुंच गई। "हाथ कंगन को आरसी क्या", न्यायाधिपति अब जब स्वयं कह रहे है, तो लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए इसके चैथे खंभे मीडिया को इस पर  गंभीरता से आत्मावलोकन करना ही होगा। आदर्श स्थिति यही होगी, मीडिया स्वयं अपने ‘‘व्यामिचार’’ पर प्रतिबंध लगाये, बजाए सरकार आगे आकर प्रतिबंध लगाये। मीडिया हाउस यदि ऐसा नहीं करते है, तो न केवल लोकतंत्र को बचाने के लिए, बल्कि मीडिया द्वारा पैदा की जा रही अराजकता को समाप्त करने के लिए सरकार को कुछ न कुछ युक्तियुक्त प्रतिबंध मीडिया पर इस तरह से लगाने होंगे, जहां अवश्य मीडिया की स्वतंत्रता भी बनी रहे, और वे जिम्मेदार मीडिया के रूप में देश व समाज के प्रति अपना दायित्व व रोल अदा कर योगदान कर ‘‘जीवट लोकतंत्र’’ को जीवित रख सके। वैसे भी मीडिया को सीख देने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मीडिया तो दूसरो को सीख देता है। मीडिया को सीख देना तो ‘‘नानी के आगे ननिहाल की बातें करने’’ जैसा है। परन्तु जिस प्रकार एक अच्छे शिक्षक को विद्यार्थी को अच्छी शिक्षा देने के के पूर्व खुद की भी पूरी तैयारी करनी होती है, ठीक उसी प्रकार मीडिया का भी दायित्व होता है।

सार्वजनिक जीवन के लिए ‘कंगारू कोर्ट’ एक नये शब्द की उत्पत्ति है। जो ‘मीडिया’ की अवस्था (अव्यवस्था?) का बयान (बखान?) कर देती है। असंवैधानिक गैर कानूनी तरीके से, कानून को नजरअंदाज करने वाली कार्रवाई ‘कंगारू कोर्ट’ है। 

जहां तक कंगारू कोर्ट के कारण अनुभवी जजों को फैसले लेने की दिक्कत का सवाल है, यह कथन माननीय मुख्य न्यायाधीश की ‘‘सूरदास खल कारी कमरी चढ़े न दूजो रंग’’ वाली छवि के अलावा न्यायाधिपतियों की योग्यता, सक्षमता, विद्धवता, कार्य कुशलता पर एक हल्का सा प्रश्न चिन्ह अवश्य लगाता है। अभी तक यह मात्र ‘गासिप’ के रूप में चर्चा का विषय रही है कि न्यायाधीश भी कानून व तथ्यों से परे उनके साथ या सामने गुजर रही परिस्थितियों से प्रभावित हो जाते है। अब इस बात पर स्वयं मुख्य न्यायाधीश ने एक मुहर सी लगाकर उसे ‘‘गोसिप’’ से बाहर कर सत्य के धरातल पर ला दिया है।  

जहां तक बात लोकतंत्र पर खतरे की घंटी बजने की है, वहीं लोकतंत्र तो मीडिया को उतनी आजादी या आवारागर्दी करने का अवसर दे रहा है, जो उसी (लोकतंत्र) को ही खा जा रहा है। अर्थात भस्मासुर बन गया है। याद कर लीजिए! आपातकाल के वे दिन जब लोकतंत्र के निलंबित (समाप्त नहीं) होने के कारण मीडिया की हालत क्या हो गई थी।

अंत में प्रिंट मीडिया कोे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ऊपर रख कर प्रिंट मीडिया की जो तुलनात्मक प्रंशसा माननीय न्यायाधिपति ने की है, निश्चित रूप से वह तथ्यात्मक रूप से सही है। पुनः माननीय मुख्य न्यायाधीश को इस बात के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने दोनों मीडिया के बीच खिंची बारीक रेखा को सही गुणात्मक रूप से उभारा है।शायद इसका ही यह परिणाम रहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस विषय पर मुख्य न्यायाधीश को ट्रोल नहीं किया गया व इस पर ज्यादा आलोचनात्मक बहस नहीं हुई। 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना उच्चतम न्यायालय के उन 4 वरिष्ठ न्यायाधीशों सर्व श्री जस्टिस चेलमेश्वर, मदन लोकुर, कुरियन जोसेफ एवं जस्टिस रंजन गोगोई से एक कदम आगे बढ़ गये है, जिन्होंने भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार 12 जनवरी 2018 को बाकायदा पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपने विचार रखते हुए अदालत के प्रशासन में अनियमितताओं पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे। मजे की बात तो यह है कि जिस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग कर उक्त उन चारों माननीय न्यायाधीशों ने अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखी, उसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की धज्जियां उड़ाते हुए शायद आंखें तरेरते हुए आईना दिखाते हुए उन्हें अपनी सीमा में रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी माननीय मुख्य न्यायाधीश ने दी है।  

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

(सामान्य) ’’अनारक्षण’’ में भी आरक्षण?

देश की ’’विलक्षण’’ राजनीति ’’आरक्षण’’ के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई है, चाहे फिर कोई भी राजनीतिक दल क्यों न हो। बल्कि यह कहा जाए कि भारत का लोकतंत्र तो ‘‘विश्यस सर्किल ऑफ इन्कॉम्पीटेंसी’’ अर्थात वोटों की राजनीति के दुष्चक्र में आरक्षण से केंद्रित होकर घूमता हुआ चारों तरफ से घिरा हुआ है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने अवश्य यह प्रतिबंध लगाया है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी स्थिति में, कहीं भी नहीं होना चाहिए। बावजूद इसके ‘‘क्षते क्षारप्रक्षेपः’’विभिन्न राज्य सरकारें समय-समय पर इस 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन कर आरक्षण की सीमा बढ़ाती रही हैं। और तब उच्चतम न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करना पड़ता है।
मध्य प्रदेश में अभी 52 जिलों की 23012 ग्राम पंचायतें, 52 जिला पंचायत,  313 जनपद पंचायते, 362754 पंच, 298 नगर परिषद 76 नगर पालिकाएं और 16 नगर निगमों के चुनाव संपन्न हुए हैं। प्रदेश में अनेक अनेक जगहों में यह देखने में आया कि अनारक्षित सामान्य वर्गो में भी आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधियों को राजनीतिक पार्टियों ने चुनावों में उतारा है। एक अनुमान के अनुसार अधिकतर जिलों में उक्त स्थिति पायी गई है। जहां 18 नगर निगमों में लगभग 20 से 25 प्रतिशत उम्मीदवार सामान्य अनारक्षित वार्डों से आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों ने चुनाव लडे़। परिणाम स्वरूप सम्पन्न हुए स्थानीय शासन के सम्पूर्ण चुनावों में कुल 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षित व्यक्ति चुनाव लड़े है। यानी ‘‘ज्यादा जोगी मठ उजाड़’’ जैसी स्थिति पैदा हो गयी है। यद्यपि यह संविधान या किसी कानून का उल्लंघन अवश्य नहीं है, परन्तु उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित आरक्षण के संबंध में खीची गई लक्ष्मण रेखा की भावना का खुल्लम-खुल्ला ‘‘वैधानिक’’ तरीके से उल्लंघन जरूर है। निश्चित रूप से यह परिस्थिति सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के हकों पर कुठाराघात है। इसलिए आरक्षित वर्ग को ‘‘अपनी ही खाल में मस्त रहने का सुख’’ प्रदान करने वाले इस वैधानिक कवच व आवरण को हटाये जाने की महती आवश्यकता है।
अतः यह कानून बनाये जाने की तुरंत आवश्यकता है कि सामान्य वर्ग से आरक्षित वर्ग का व्यक्ति चुनाव ही नहीं लड़ सके, ऐसा प्रावधान पंचायत अधिनियम व जनप्रतिनिधित्व कानून में किये जाने की नितांत आवश्यकता है। मेरे बैतूल जिले में भी स्थानीय शासन के चुनावों में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगेे। यह कोई पढ़ाई की कक्षा नहीं है, जहां आरक्षित वर्ग के व्यक्ति अनारक्षित वर्ग को चुनकर अपनी योग्यता को प्रमाणित कर चयनित होता है। शायद वह ऐसा इसलिए करता है कि यह चयन उसके व्यक्तित्व के विकास को और गति व संबल प्रदान करती है।  
अब जनपद, जिला पंचायत, नगर पंचायत और नगरपालिका व नगर निगमों के अध्यक्षों के चुनाव संपन्न होना शेष है, जिसकी प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ होने वाली है। ऐसा लगता है कि इन संस्थाओं के अध्यक्षों के चुनाव में भी ‘‘अंधे की रेवड़ी समान’’ कई जगह सामान्य वर्ग में भी आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों की उम्मीदवारों का चयन राजनीतिक दल करेंगे। मेरे जिले बैतूल में जिला पंचायत पहली बार व नगरपालिका परिषद सालो-साल बाद सामान्य वर्ग की होने के बावजूद आरक्षित वर्ग के सदस्यों को अध्यक्षीय उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है। यही स्थिति इंदौर व अन्य कई जगहों में भी बन रही है। निश्चित रूप से यह स्थिति कहीं न कहीं सामान्य वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात होगी।  
बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है की जातिगत आरक्षण की व्यवस्था संविधान में अस्थायी रूप से की गई है। अर्थात जिस उद्देश्य (समग्र विकास व उत्थान) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, उसकी पूर्ति हो जाने पर यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, ऐसा संविधान निर्माताओं ने आरक्षण का प्रावधान करते समय सोचा था। परन्तु वर्तमान में क्या स्थिति हुई है, आप हम सब जानते है। यदि आरक्षण के बनाये रखने के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि कमजोर वर्ग का उत्थान अभी तक नहीं हुआ है, इसलिए ‘‘घी (आरक्षण) खाया बाप ने सूंघो मेरा हाथ’’ की तर्ज पर आरक्षण की व्यवस्था आज भी चलते रहना चाहिए। तो फिर आपको यह सोचना होगा कि 75 साल के लगातार आरक्षण के कवच व सुविधा के बावजूद, ‘‘नाच का आंगन अभी टेढ़ा’’ ही है अर्थात यदि विकास व उत्थान नहीं हुआ तो इसका मतलब साफ है कि सिर्फ आरक्षण से इन वर्गों का विकास व उत्थान संभव नहीं हो पायेगा। और यह नीति कहीं न कहीं गलत या अपूर्ण है। अतः इसके विकल्प पर विचार करना होगा। अनुसूचित जाति के रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बावजूद ‘‘ऊंना कांड’’ से लेकर दलित उत्पीड़न की अनेक घटनाएं उनके कार्यकालों में घटी। स्वयं महामहिम की उनकी पत्नि के साथ ‘पुरी’ में पंडाओं द्वारा दुर्व्यवहार किया गया था।
दूसरी स्थिति में अर्थात् विभिन्न विकास हो जाने का दावा किये जाने की स्थिति में भी आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो जाने से भी उसे समाप्त करना होगा। परंतु चुनावी वोट की राजनीति के चलते वर्तमान में स्थिति बद से बदतर हो रही है। आरक्षण समाप्त होने के बजाय जो शेष अनारक्षित क्षेत्र रह गया है, वहां भी आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों को तरजीह (प्रिफरेंस) दी जा रही है, जो किसी भी रूप में उचित नहीं कही जा सकता है। सामान्य वर्ग, पिछड़े, कुचले, गरीब, अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए आरक्षण के खिलाफ नहीं है। तथापि वह जातिगत आरक्षण के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण चाहता है, जिसमें आर्थिक रूप से पिछड़ा सामान्य वर्ग भी शामिल हो। सामान्य रूप से आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने से वह मात्र ‘‘ऊंट के मुंह में जीरा’’ समान है, जिससे सामान्य वर्ग की संतुष्टि नहीं होती है।
वस्तुतः सामान्य वर्ग अपनी आवाज को आरक्षित वर्ग के समान वोट के रूप में एक मजबूत धागे में पिरोकर एक-जाए रूप से मजबूत न कर वर्तमान राजनीति में वह एकमात्र उपेक्षित वर्ग हो गया है, और इस वर्ग की स्थिति ‘‘अपना लाल गंवाय के दर दर मांगे भीख’ जैसी रह गया है, इनका उपयोग प्रत्येक राजनीतिक दल समय आने पर अपने हित में तो बरगला-कर कर लेता है। परन्तु उस वर्ग के हितों की बात ‘‘नक्कारखाने में तूती की आवाज’’ बनकर रह जाती है, और कोई राजनीतिक दल अन्य वर्गो के विपरीत सामान्य वर्ग के थोक वोटों में कमजोर होने के चक्कर में उनकी चिंता नहीं करता। मध्यप्रदेश में सपाक्स पार्टी का जन्म ही सामान्य वर्ग के कर्मचारियों व आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था। परंतु दुर्भाग्यवश सक्षम नेतृत्व विहीन सपाक्स पार्टी इस दिशा में आगे कुछ नहीं कर पायी, और ‘‘दूर के ढोल सुहावने’’ हो कर रह गयी।
अतः यदि समाज में वर्ग विभेद-जाति विभेद को समाप्त करना है और समरसता लानी है, तब आपको अनारक्षित वर्ग को और आगे व्यवधान डाले बिना धीरे-धीरे उनका क्षेत्र बढ़ाना होगा और आरक्षित वर्ग के क्षेत्र को कम करना होगा। और एक स्थिति ऐसी लानी होगी, जब देश में समाज में आरक्षित और अनारक्षित वर्ग का विभाजन प्रायः समाप्त हो जाए। तभी देश में पूर्व समरसता आ जाएगी जो देश के विकास को ज्यादा गति प्रदान करेगी। अंततः तभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मूल मंत्र ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ को धरातल पर उतारकर उसे सार्थक कर सकेंगे।

रविवार, 24 जुलाई 2022

भारत का ’’जन’’ व ’’तंत्र’’! (जनतंत्र) कब ’स्वस्थ’ होकर मजबूत होगा।

कहने को तो भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक (जनतांत्रिक) देश है। लेकिन 75 साल का ’’लोकतांत्रिक जीवन’’ जीने के बाद भी ’’लोकतंत्र’’ जो कि भारत की पहचान है, क्या भारत का लोकतंत्र विश्व में सबसे बड़ा व उच्च कोटि का लोकंतत्र है? यह बात क्या निश्चिंतता से कही जा सकती है? भारतीय लोकतंत्र पर प्रश्नवाचक चिन्ह विभिन्न घटनाओं के  कारण लगता रहता है और लगाया भी जाता रहा है, जो कि ‘‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’’ की उक्ति को चरितार्थ करता लगता है। इसके लिए दोषी कौन है! यक्ष प्रश्न यही है?      लोकतंत्र ’जन’ व ’तंत्र’ दो महत्वपूर्ण तत्वों से मिलकर बना है। परन्तु क्या दोनों तत्व ’जन’ व ’तंत्र’ प्रायः विकसित हैं, यह एक प्रश्नवाचक चिन्ह कुछ क्षेत्रों में पूर्व से लगाया जाता रहा है। वर्तमान के संदर्भ में इसका कारण अभी दो प्रमुख घटनाओं से है। इस कारण से उक्त प्रश्न पुनः उत्पन्न हुआ हैं, जिसकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हूं। प्रथम - राष्ट्रपति चुनाव में 15 सांसदों के मतों को अवैध घोषित होना। दूसरा - भोपाल दैनिक भास्कर की एक न्यूज है, जिसमें प्रमुखता से बतलाया गया है कि, हाल में चुने गये जिला पंचायत व जनपद सदस्यों की धार्मिक स्थलों में बाड़ाबंदी व सैर सपाटे के लिए उन्हें अपने शहर/गांवों से दूर भेजा गया, ताकि उनके वोट सुरक्षित रहकर विपक्षी दल हथिया न लें। यह स्थिति प्रदेश के अधिकांश भागों की ही नहीं है, बल्कि पूर्व में हमने कई प्रदेशों में (हाल में ही महाराष्ट्र में) ऐसी स्थिति को देखा है। मेरे शहर बैतूल भी अछूता नहीं रहा और वह भी इस बंधक बनाये जाने की प्रक्रिया के दौड़ में शामिल होकर यहां पर दूसरे जिले के कुछ सदस्य शहर के बाहर की एक हाॅटल में रुके हुये हैं। ‘‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’’। हमने यह भी देखा है कि इस बंधक बनाये जाने की प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियांे की स्वतंत्रता कुछ समय के लिए अवरूद्ध हो जाती है। मोबाइल फोन तक ले लिये जाते है। घरों के बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं होती है। हाँ इन सबके प्रतिफल में शाही स्वागत भोजन व आराम जरूर मिलता है। 

उक्त दोनों महत्वपूर्ण घटनाएं क्या देश के स्वस्थ लोकतंत्र के सीने को 56 इंच समान चैड़ा करती हैं, या उस पर कलंक लगाती हैं? इस पर आम जनता, जिसकी स्थिति उस ‘‘अंधे के जैसी है जिसने बसंत की बहार नहीं देखी’’, ने कभी गंभीरता से सोचा है? या सोचने का प्रयास भी किया है? निश्चित रूप से ये घटनाएं हमारे देश के लोकतंत्र के माथे पर एक कलंक समान हैं। यह उन चुने हुये जनप्रतिनिधियों, जो लोकतंत्र का आभामंडल हैं, के लिए भी अत्यन्त शर्मसार करने वाला है। वह इसलिए कि आज 75 साल का लम्बा समय बीतने के अनुभव के बावजूद भी हमारा लोकतंत्र इतना परिपक्व नहीं हो पाया है, जहां चुने गये जनप्रतिनिधियों जो हजारों-लाखों वोटों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और जो जनता के आईकाॅन हैं, ये ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’’ वाले आईकाॅन स्वयं अपना ही वोट डालने में सक्षम नहीं है, अनपढ़ हैं, तब हम उस जनता जिसकी नियति ही ‘‘उस भेड़ के जैसी हो ‘‘जो जहां जायेगी वहीं मुंडेगी’’, से क्या उम्मीद करें, कि जिनको पढ़ाने लिखाने व समाज तथा देश के प्रति जिम्मेदार बनाने और अच्छे उच्च स्तर के जीवन की ओर ले जाने का दायित्व व कर्तव्य संविधान ने इन जन-प्रतिनिधियों को ही दिया है। 

दूसरा स्वस्थ लोकतंत्र में भय और बंधन नहीं होता है, प्रेम व प्रीति होती हैै, वही अच्छा सफल लोकतंत्र कहा जाता है। ‘‘सहज पके सो मीठा होय’’। लेकिन जब चुने हुये प्रतिनिधियों के प्रति अपनी ही पार्टी का विश्वास चुनते ही कमजोर हो जाये, ‘‘स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती’’ की स्थिति पैदा हो जाये, जिस कारण से पार्टी को अपने ही चुने हुये प्रतिनिधियों के वोटों को सुरक्षित रखने के लिए अज्ञातवास में भेजना पड़े, जो आजकल समस्त पार्टियों की एक प्रथा-परिपाटी बन गई है। तब निश्चित रूप से लोकतंत्र पर उंगली उठना स्वाभाविक है। तथापि आलोचक इन उंगली उठाने वालों को यह कहकर चुप करा सकते हैं कि अज्ञातवास की यह नीति आज की नहीं हैै, बल्कि महाभारत काल से चली आ रही है। परन्तु तब के अज्ञातवास और आज के अज्ञातवास में भेजने/जाने के कारण में जमीन आसमान का अंतर है। 

आखिर यह व्यवस्था सुधरेगी कैसे? इसके दो ही रास्ते हैं। और दोनों ही रास्तों को एक साथ अपनाना होगा, तभी सुधार की गुंजाइश है। प्रथम ‘‘भय बिनु प्रीति न होई’’ के सिद्धांत को अपनाते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किये जाने की नितांत आवश्यकता है जहां चुने हुए जनप्रतिनिधी का किसी भी चुनाव में डाला गया मत अवैध घोषित होने पर स्वयमेव उसकी सदस्यता तुरंत प्रभाव से समाप्त हो जानी चाहिए। 

दूसरा जो पार्टी चुने हुए प्रतिनिधियों को चाहे व पार्षद पंचायत सदस्य हो या विधायक-सांसद हो, यदि किसी भी मामले में जहां बहुमत के टेस्ट के लिये मताधिकार का उपयोग होने वाला हो और उस कारण से उनको बंधक किया जाकर अन्य सुरक्षित स्थानों पर भेजा जाता है। और, तब यदि ऐसी रिपोर्ट मीडिया में आती हैं, या बंधक सदस्य के परिवार का कोई सदस्य शिकायत करता है। तब संबंधित उच्च न्यायालय को जनता के हित में तुरंत स्व-संज्ञान लेकर पुलिस अधिकारियों को छापा मारने की कार्रवाई करने के आदेश देने चाहिए, ताकि ‘‘न बासी बचे न कुत्ता खाय’’। उच्च व उच्चतम न्यायालय के लिए यह कोई नई बात नहीं है। क्योंकि हमने देखा है कि सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में असफलता/अकर्मण्यता के कारण न्यायालयों ने स्वयं संज्ञान में लेकर समय-समय पर उचित कार्यवाही कर आवश्यक आदेश पारित कर आम जनता को राहत प्रदान की है। इन दोनों उपायों को यदि हम सख्ती से लागू कर पालन करेंगे, तो निश्चित रूप से देश का लोकतंत्र मजबूत होगा। क्योंकि वर्तमान कानून ‘‘ओस चाटने के समान हैं जिनसे प्यास कभी नहीं बुझ सकती’’। कहा जाता है कि ‘‘लोहा लोहे को काटता है’’, अतः लोकतंत्र की मजबूती के लिये आवश्यक सुधार किये जाने से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता यदि कुछ समय के लिए बाधित भी होती है तो वह गौण है।

बुधवार, 20 जुलाई 2022

उपराष्ट्रपति के पद पर जगदीप धनखड़ का चयन! मोदी का मास्टर स्ट्रोक।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली की यह विशेषता रही है कि वे हमेशा देश के सामने ऐसा कुछ कर जाते है, निर्णय ले लेते है, जो प्रायः ‘‘भूतो न भविष्यति’’ मीडिया और राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के विपरीत, ‘‘अचानक’’ व कुछ अलग हटकर होता है। उपराष्ट्रपति का चयन भी इसी शैली का परिणाम है। याद कीजिए! जब मुख्तार अब्बास नकवी का केंद्रीय मंत्रिमंडल से संवैधानिक बाध्यता के कारण इस्तीफा हुआ था, तब राजनीतिक क्षेत्रों में यह कयास लगाये जा रहे थे कि वे देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। इस बात के कयास लगने में भी देश का पिछला इतिहास रहा है। खासकर कांग्रेस का जहां मुस्लिम तुष्टिकरण की ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी’’ नीति के तहत राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति समय-समय पर बनाये जाते रहे है। अटलजी के समय डॉ. कलाम राष्ट्रपति चयनित किये गये थे। तथापि राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है, और न ही उनका चयन इस दृष्टि से हुआ था। 

अभी हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश में रामपुर, आजमगढ़ के उपचुनाव में भाजपा की जीत और उससे भी महत्वपूर्ण विपक्षी मुस्लिम उम्मीदवार की हार ने भाजपा पार्टी को एक अवसर प्रदान किया। वे मुसलमान जिन्होेंने पार्टी पक्ष में मतदान किया, (‘‘घी का लड्डू टेढ़ा ही भला’’) विश्वास किया है, उसे बनाये रखने के लिए उन्हे कहीं न कहीं इनाम दिया जाये और यह इनाम निश्चित रूप से उपराष्ट्रपति पद के रूप में मुख्तार अब्बास नकवी के रूप में संभव थी, जो शायद होनी भी थी। परन्तु अचानक इस राजनीतिक परिदृश्य (सिरानियों), परसेप्शन को नरेन्द्र मोदी ने पलट दिया, ‘‘अंधों के सामने हाथी’’ जो उनकी कार्य करने की पद्धति की पहचान बन चुकी है। ममता जैसी तेज तर्रार और मोदी जैसे व्यक्तिव को चुनौती देने वाली मुख्यमंत्री को समय-समय पर जगदीप धनखड़ ने जिस तरह से कार्नर करने का लगातार प्रयास किया, उस कारण से वे निश्चित रूप से मोदी की नजर में चढ़े हुए थे। दूसरा कारण राजस्थान व हरियाणा में होने वाले चुनावों में (किसान आंदोलन) व जाटों के धावों को सहलाने के लिए भी उनका चयन करने में भी यह प्रमुख मुद्दा रहा है। ‘‘यत्नम् विना रत्नम् न लभ्यते’’। तीसरी शायद यह बात भी हो सकती हैं कि आदिवासी राष्ट्रपति के चयन में आदिवासी वोटों की राजनीति करने का  आरोप लगने के बाद मुस्लिम राजनीति करने के आरोप से बचने के लिए शायद नकवी का अंततः चयन नहीं किया गया। इससे स्पष्ट होता है, यदि मोदी को परिस्थितिवश किसी एक मुद्दे से पीछे हटना होता भी है, तो वह उससे बड़े मुद्दे को लपक कर अपने पीछे हटने वाले कदम का एहसास तक नहीं होने देते है। यह मोदी जी के कार्य करने की शैली भी है। 

वैसे भी देश में इस समय मोदी की नीति को सफल राजनीति में बदलने में महारत हासिल होने की शैली को चुनौती देने वाले नेता दूर-दूर तक नजर नहीं आते है। ‘‘यह सन्नाटा क्यों है भई’’। यह स्थिति वैसी ही हो गई जैसे इंदिरा गांधी के समय लगभग ऐसी ही स्थिति थी। परंतु तत्समय परिस्थितियों में एक बड़ा महत्वपूर्ण अंतर यह था कि इंदिरा गांधी के समय एक से बढ़कर एक धाकड़, साहसी, निडर, अनुभवी और विद्वान राजनीतिक विरोधी रहे, और इंदिरा गांधी को ‘‘ज्य़ादा जोगी मठ उजाड़’’ की स्थिति से निपटने में ज्यादा कौशलपूर्ण ताकत लगानी पड़ती थी। परंतु मोदी के लिए बड़ी राहत की बात यह है कि राहुल गांधी जैसे ‘‘अधजल गगरीनुमा’’ अधिकांश नेता ‘‘छलक छलक कर’’ इनसे लोहा लेने के लिए खड़े होने का मात्र आभास प्रदान करते हुए दिखते है। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता अब उम्र की ढलान पर होने पर ‘‘ज्यों ज्यों भीगे कामरी, त्यों त्यों भारी होय’’ का प्रतीक बन गये हैं, ऐसे में उनका आभामंडल भी कम होते जा रहा है। 

अतः जब दबंग और मजबूत विपक्ष न हो, तब लोकतंत्र को जीवित रहने के लिए पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र इतना मजबूत होना चाहिए कि पार्टी के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप बन कर वह सार्थक विपक्ष की भूमिका भी अदा करे। अर्थात सत्तारूढ़ पार्टी के सत्ताधीशो पर लगाम लगाने का काम करे! दुर्भाग्य से इस मामले में भाजपा, कांग्रेस से भी ज्यादा बदतर स्थिति में हैं, जहां आवाज ही नहीं है तो दबाने का प्रश्न ही कहा होता है। आखि़र ‘‘अरहर की टटिया में अलीगढ़ी ताले’’ कांग्रेस में किसी समय आवाज जरूर थी। इंदिरा गांधी के जमाने में चंद्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकांत जैसे आवाज उठाने वाले धुरंधर युवा तुर्क नेता थे। उसके बाद वर्तमान में जी-23 का ग्रुप बना। परंतु उसकी आवाज को दबा दिया जाता या अनसुना कर दिया जाता है। लोकतंत्र में एक तंत्र को स्थापित करने की परिस्थितियां दिन प्रतिदिन भाजपा में बन रही है जो पार्टी के स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होगी। इतिहास इस बात को सिद्ध भी करता है। भविष्य क्या होगा? यह समय ही बतलायेगा। ‘‘दिल्ली भले ही दूर सही’’ फिर भी अच्छे भविष्य की कामना करते हुए।

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