शनिवार, 12 जनवरी 2019

केन्द्रीय सरकार का ‘‘आर्थिक आधार’’ पर 10 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय! कितना अधूरा! कितना पूर्ण?

वास्तव में हमारे देश में यदि किसी भी ‘‘सरकार’’ से कोई निर्णय अपने पक्ष में करवाना हो तो सरकार के चुने जाने के 4 साल तक तो वह आपकी मांगे व मुद्दो पर गंभीरता से कोई विचार ही नहीं करती है, क्योकि तब तक वह आपके चुनावी दबाव में ही नहीं होती है। परन्तु चुनावी वर्ष में चुनावी मोड में आ जाने के बाद आपका मुद्दा, फिर चाहे वह गलत हो या सही, कोई भी सरकार राजनैतिक दृष्टि से नफा-नुकसान का आकलन करते हुये उस पर विचार कर निर्णय लेती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता हैं, जनता का दबाव सरकार पर बढ़ता जाता है और सरकार निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाती है।
केन्द्र सरकार द्वारा सवर्ण समाज को आर्थिक आधार पर आठ लाख से कम सालाना आमदनी वालो को 10 प्रतिशत सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानो में प्रवेश देने पर आरक्षण देने का निर्णय लिया है, वह कुछ इसी मानसिकता व परिस्थितियों का परिणाम हैं। क्योकि हाल में ही तीन हिन्दी भाषी प्रदेशों में भाजपा के हार का एक कारण सवर्ण वर्ग की नाराजगी होना बतलाया गया है एक और तथ्य का यहाँ उल्लेख किया जाना समयाचिन होगा कि देश की लगभग 31 प्रतिशत सर्वण हिन्दू 125 लोकसभा सीट पर जीतकर आते है। फिर भी सिद्धान्त रूप से इस निर्णय का स्वागत इसीलिए किया जाना चाहिए कि पहली बार आर्थिक आधार पर आरक्षण के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाकर केन्द्रीय शासन स्तर पर निर्णय लिया गया है। यद्यपि इसको अभी असली जामा पहनाना है, जो इतना आसान काम नहीं है। केन्द्रीय सरकार ने जो निर्णय लिया गया है व जो दिख रहा है, वह न केवल निर्णय अपूर्ण है, बल्कि तुरन्त वास्तविक धरातल पर उतरने वाला भी नहीं है।
आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत सवर्ण समाज को आरक्षण देने का प्रस्ताव वर्तमान में लागु 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक अधिकतम सीमा के अलावा होगी। पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा को उच्चतम न्यायालय ने कई अवसरो पर उचित, वैध व संवैधानिक ठहराया हैं व इसकी सीमा को लांघ कर पचास प्रतिशत से अधिक किये किसी भी प्रकार के आरक्षण को उच्चतम न्यायालय ने अवैध घोषित किया है। आरक्षण के संबंध में वर्तमान में कानूनी, संवैधानिक व न्यायिक स्थिति यही है। ×आपको याद ही होगा सपाक्स पार्टी व वृहत्त सवर्ण समाज की माँग 10 प्रतिशत आरक्षण की कमी भी नहीं रही है। बल्कि उनकी मूल माँग जो है, वह जातिगत आधार पर पचास प्रतिशत आरक्षण जो लागू है उसे जातिगत आधार के बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने की मांग रही है। क्योकि जातिगत आधार पर आरक्षण देने से समाज में समरस्ता के बदले विघटन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। यदि आर्थिक आधार पर सम्पूर्ण समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण दिया जाता है (जो कि आरक्षण का मूल आधार ही होना चाहिये) तो निश्चित रूप से न केवल आरक्षण देने की उद्देश्य की पूर्ति होगी, बल्कि विभिन्न समाज के बीच वर्ग-भेद-जाति के आधार पर भेद असमानता भी नहीे होगी, बल्कि समरस्ता की खिचड़ी भी बनेगी। वह यह समरस्ता की खिचड़ी नहीं है जो भाजपा ने कल दिल्ली में बनाई थी, क्योकि वह तो वर्ग विशेष की खिचड़ी थी जो समरस्ता की कैसे हो गई, यह समझ के परे है। गरीबी व अमीरी के आधार पर जो समाज में भेद व खाई है वह अंतर भी आर्थिक आधार से कम होगा। केन्द्र सरकार भी भली भाँति जानती है कि उसका यह निर्णय संविधान व उच्चतम न्यायालय के प्रतिपादित सिंद्धान्त के विरूद्ध व प्रतिकूल है, जो वह लागू नहीं करवा सकती हैं। जब तक कि इस संबंध में संविधान में आवश्यक संसोधन नहीं किया जाता हैं। फिलहाल सरकार चुनावी मोड़ में आ जाने के कारण जनता को खुश (अपीज) करने का शार्ट (छोटा) रास्ता है जो कितना प्रभावी होगा, वक्त ही बतायेगा। यदि वास्तव में सरकार और समस्त दल सरकार के इस निर्णय से सहमत है, तो फिर सरकार एक अध्यादेश लाकर लागू इसे तुरंत क्यों नहीं लागू करके अपने इरादे को नेक बताने का प्रयास नहीं करती है? वास्तव में यदि यह चुनावी लालीपाप नहीं है, तो सरकार ने निर्णय लेने के पूर्व पहले संविधान में आवश्यक संशोधन क्यों नहीं किया? तत्पश्चात ही संविधान संशोधन के अनुसार निर्णय लिया जाना समयोचित होता। तब उन पर चुनावी संकट का आरोप नहीं लगता।

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

कहीं भाजपा का ‘‘कमल’’(भगवा) एजेंडा’’ कांग्रेस के ‘‘नाथ’’ ने चुरा तो नहीं लिया है?

मध्यप्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में ‘‘कमल’’ को अनाथ न होने देने वाले हमारे पडोसी जिले छिंदवाडा के कमलनाथ द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली गई जिसके लिये उन्हे हार्दिक बधाईयाँ, वंदन व अभिनंदन। सम्पन्न शपथ ग्रहण समारोह में वास्तव में ऐसा लगा ही नहीं कि वह किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह हैं। देश के इतिहास में जहाँ तक मुझे याद है कंाग्रेसी मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में साधू-संतो की इतनी संख्या में उपस्थिती पहली बार हुई जो कि अभी तक भगवा बिग्रेड़ की बपौती मानी जाती रही है। इस देश में अधिकांश साधू-संतो को जन्म जात रूप से विश्व हिन्दू परिषद का भाग ही माना जाता रहा हैं जो ‘‘आरएसएस’’ का प्रमुख अग्रणी सहयोगी संगठन हैं तथा भाजपा के भगवा मुद्दे को आगे बढ़ाने में मजबूती से सहयोग करता आया है। 
याद कीजिए वर्ष 2003 के सुश्री उमाश्री भारती के शपथ गहण समारोह को, जहाँ न केवल उनके पूज्य.‘‘गुरू’’ मंच पर थे, बल्कि अन्य धार्मिक नेता व साधु-संत भी थे जिसे मैंने बहुत ही नजदीक से देखा था। यदि यह कहा जाए कि राजनीति में भाजपा के शपथ ग्रहण समारोह में साधू-संतो की उपस्थित सामान्य रूप से प्रचलित तौर पर अनिवार्य मानी जाती रही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले कुछ समय से राहुल गांधी के मंदिर-मंदिर जाने पर मीडिया द्वारा कांग्रेस को (साफ्ट) कोमल हिन्दू का प्रमाण पत्र दिया जाता रहा हैं। उसी कड़ी में यदि कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह को देखा जाये तो निश्चित रूप से ऐसा आभास होता है जैसे उक्त कार्यक्रम के द्वारा कमलनाथ ने भाजपा के भगवा विचार प्रेम की चोरी कर ली हो। कमलनाथ द्वारा शपथ ग्रहण के पूर्व मंदिर में परिवार सहित पूजा की गई जो इसी का एक भाग था। इस शपथ ग्रहण समारोह में देश का अधिकांश विपक्ष भी शामिल हुआ। शपथ ग्रहण के तत्काल बाद प्रथम आदेश के रूप में किसानों की ऋण माफी पर हस्ताक्षर कर दिए ऐसा करके वचन पत्र के सबसे महत्वपूर्ण आश्वासन  की पूर्ति कर दी और कम से कम आज तो यही सिद्ध किया है कि मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ ने वांछिल शुरूवात की है,ं और प्रदेश में सामंजस्य का वातावरण बनाया हैं। यह संदेश देकर उन्होने अपने मजबूत कदम जमीन पर रखे है जिसके लिये फिलहाल वे बधाई के पात्र है।
परन्तु एट्रोसिटी एक्ट (आत्याचार अधिनियम) के विषय में उनके द्वारा (एन.ड़ी टी.वी. को दिए गए इंटरव्यू में) किसी प्रकार का रूख स्पष्ट न करना उनकी कमजोरी को ही सिद्ध करता है। हम यह उम्मीद करते है कि वे शीघ्र अपना रूख स्पष्ट करेगें व माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई न्यायिक समीझा/प्रक्रिया को पुर्नस्थापित करके कानून के राज की स्थापना करना मात्र है। वह किसी विशेष वर्ग के खिलाफ न होकर समस्त वर्गो के हित में होगा। तभी उनके व्यक्तित्व को मजबूती मिल सकेगी। एक बात और कमलनाथ जिस तरह त्वरित ठोस निर्णय अपने घोषण पत्र का जो भाग है दिये जा रहे है निश्चित रूप से यदि चली तो उपरोक्त भाजपा के कर्णधारो के माथे पर तल सिलवटंे आना अवश्यंभावी है।

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