सोमवार, 23 जनवरी 2023

कुश्ती का अखाड़ा। यौन शोषण का आरोप! एक टूल (हथियार) के रूप में (दुरु)/उपयोग?

देश में आज कल अखाड़ों में कूदने का ही मौसम ही आ गया है। एक मीडिया चैनल के डिबेट का नाम तो अखाड़ा ही है। हो भी क्यों न? अखाड़ा वह मैदान है, जहां दो पक्ष (पहलवान) अपने दांव-पेंच लगाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर सामने वाले विपक्षी को चित करने का प्रयास करते हैं, जिसे कुश्ती कहा जाता है। राजनीति कुश्ती के अखाड़े में राजनैतिक दल और नेताओं के बीच परस्पर कुश्ती आम बात है (कभी-कभी नूरा कुश्ती के आरोप भी लगाये जाते हैं) राजनीति की हो गई वर्तमान स्थिति के कारण ‘‘कुश्ती का दंगल’’ निश्चित समय 5 साल में न होकर लगभग लगातार चलने वाली कुश्ती हो गई है। परन्तु जिस कुश्ती खेल से प्रेरणा पाकर अखाड़े के मैदान में अन्य लोग कूदते हैं, उनको देखकर मूल अखाड़ा अर्थात कुश्ती के अखाड़े के खिलाड़ी लोग कैसे अपने को अलग कर पाते? ‘‘भला खलक का हलक किसने बंद किया है’’। कुश्ती के अखाड़े में अभी तक तो जो खिलाड़ी टीम उतरती थी, उन्हें प्रोत्साहित (बकअप) करने के लिए उनके संघ के पदाधिकारी मैदान पर हमेशा तैयार खड़े रहते थे। परंतु अभी इस समय देश में कुश्ती के अखाड़े में बकअप करने वाला संघ ही एक पक्ष बन गया है। एक तरफ खिलाड़ियों की टीम है, तो दूसरी तरफ उनके मैदान में उतारने वाली भारतीय कुश्ती महासंघ स्वयं की है। मैच की रेफरी सरकार है, तथा साथ में ‘‘खूंटे के बल पर कूदने वाला बछड़ा’’ वह मीडिया भी है, जो आपको मालूम ही है, निष्पक्ष रहने की स्थिति में रह ही नहीं गया है। क्योंकि प्रायः उन सबके मालिक किसी न किसी राजनीतिक विचार धारा से जुड़कर अपने एजेंडा (उद्देश्यों) की पूर्ति के लिए मीडिया को लगभग कब्जा में रखे हुए हैं।

इस अखाड़े में पहली बार संघ के मातहत खिलाड़ी अपने मालिक संघ (जिनके हाथों में समस्त खिलाड़ियों की नकेल है), के ऊपर ‘‘सौ सुनार की और एक लोहार की’’ तर्ज पर हावी होते हुए दिख रहे हैं। खिलाड़ियों ने संघ से निपटने के लिए ‘‘ईंट से ईंट बजा देने’’ वाले भाव से जो आरोपों की बौछार की है, उसमें संघ की विभिन्न अनियमितताओं के आरोप के साथ सबसे महत्वपूर्ण आरोप कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सिंह जो कि एक सांसद (छःबार के) भी हैं, पर यौन शोषण का लगाया गया है। 

वैसे किसी भी मामले में जब यौन शोषण का आरोप होता है, तब मामला बहुत गंभीर हो जाता है और उस पर तुरंत एफ आई आर दर्ज होकर जांच हो कर कार्रवाई प्रारंभ हो जाती है। यहां पर जिस तरह से आरोप और उनका निपटारा खिलाड़ियों और सरकार के खेल मंत्री ने किया है, उससे स्पष्ट है की यौन शोषण का आरोप एक टूल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। क्योंकि खिलाड़ियों ने धरने पर बैठने के बाद यह मांग की थी कि यदि भारतीय कुश्ती महासंघ को भंग नहीं किया जाएगा तो धरने से जुड़ने वाले सभी युवाओं का करियर खत्म हो जाएगा? (एफआईआर की मांग नहीं की?) कार्रवाई न होने पर 4-5 महिला पहलवान एफआईआर दर्ज करायेगें। (इस सशर्त कथन का अर्थ आप बेहतर निकाल सकते है)‘‘ओछे की प्रीत और बालू की भीत’’ का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है?

यौन शोषण का मामला भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत आता है न की किसी जांच समिति के अधिकार क्षेत्र में। यह हस्तक्षेप योग्य संज्ञेय (कॉग्निजेबल) अपराध है, जिस पर पुलिस को ही कार्रवाई करनी होती है। मेडिकल जांच होती है और तदनुसार अनुसार कार्रवाई आगे बढ़ती है। लेकिन यहां पर तो सरकार के प्रस्ताव पर आरोप लगाने वाली महिला खिलाड़ी भी इस बात पर सहमत हो गई कि एक कमेटी इस शर्त के साथ बना दी जाए कि जांच पूरी होने तक महासंघ के अध्यक्ष, अध्यक्ष के रूप में कार्य नहीं कर सकेंगे। जांच कमेटी 4 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट दें। जब यौन शोषण के मामले में इस तरह की जांच की प्रक्रिया और सहमति शायद ही कभी देखी हो? इसलिए फिर से मै इस बात को दोहरा रहा हूं कि इस आरोपी को एक टूल के रूप में उपयोग किया जा कर खेल संघ और उनके अध्यक्ष पर दबाव बनाया जा रहा है। मेरा कहने का मतलब कदापि यह नहीं है कि अध्यक्ष बिल्कुल दूध के धुले हैं? या आरोपों में कुछ भी सच्चाई नहीं है? परंतु जिस तरीके से मामले को सुलझाया (टैकल किया) जा रहा है, इससे निश्चित रूप से यह ध्वनि निकलती है कि पहलवान एकजुट होकर लामबंद होकर कुश्ती संघ के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने जा रहे हैं और जिसमें उनको सफलता मिलती दिख भी रही है।

भारतीय कुश्ती महासंघ ने भी खिलाड़ियों के आरोपों का खंडन किया है। यौन शोषण के आरोपों को नकारा है। कुछ नये बनाये गये नियमों का विरोध का यह तरीका अपनाया जा रहा है। साफ कहा है कि इसके पीछे निजी एजेंडा है। प्रदर्शन के पीछे की छिपी हुई मंशा फेडरेशन पर दबाव बनाकर अध्यक्ष को हटाना है। यहां भी आश्चर्य की एक यह बात है कि सीधे किसी भी महिला पहलवान ने सीधे किसी व्यक्ति के विरुद्ध यौन शोषण का विशिष्ट आरोप न तो लगाया है और न ही इस संबंध में कोई प्रथम सूचना पत्र थाने में दर्ज कराई है। (अभी तक की जानकारी के अनुसार)। उनके प्रतिनिधित्व के रूप में स्वयं महिला पहलवान विनेश फोगाट ने जनरल रूप से महिला पहलवानों के यौन शोषण की बात इस स्पष्टीकरण के साथ कही है कि उन्होंने इस तरह के शोषण का सामना नहीं किया है। भाई वाह! ‘‘गवाह चुस्त, मुद्दई सुस्त’’! इससे कुश्ती संघ के आरोपों को बल मिलता है।

सबूत के साथ प्रदर्शन में बैठने के बावजूद अभी तक एफआईआर न लिखाने का कोई तार्किक कारण समझ में नहीं आता है। पिछले काफी समय से यौन शोषण चल रहा था, ऐसा आरोप लगाया गया। शायद ड़र के कारण तत्समय यदि तब एफआईआर नहीं लिखाई गई तो आज ड़र खतम होकर मीडिया के सामने बात की जा रही। तब भी एफआईआर दर्ज न कराना कहीं न कहीं इस बात को ही इंगित करता है कि इस पूरे प्रकरण का एक मात्र उद्देश्य ही भारतीय कुश्ती महासंघ की कुर्सी बदलवाना मात्र है।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि राष्ट्रीय महिला आयोग या राज्य महिला आयोग ने अभी तक यौन शोषण के आरोप के संबंध में कोई कदम नहीं उठाया है? महिला आयोग या मीडिया ने भी अभी तक यौन अपराध के संबंध में कोई प्रथम सूचना पत्र दर्ज न होने के बाबत पुलिस या खेल मंत्रालय की खिंचाई क्यों नहीं की है? यह भी समझ से परे है। खेल मंत्री द्वारा यौन शोषण के आरोपों सहित समस्त आरोपी को पुलिस अधिकार रहित समिति के सुपुर्द कर देना भारतीय दंड संहिता/दंड प्रक्रिया संहिता को साफ-साफ नजर अंदाज करना है, उसका उल्लंघन है।

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

इन्वेस्टर्स इन्वेस्टमेंट समिट की चकाचौंध की चमक।

क्या खोया-क्या पाया?

इंदौर (मध्य-प्रदेश) में 7वीं आयोजित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट की ऐतिहासिक सफलता में प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन एवं दो राष्ट्राध्यक्ष गुयाना के राष्ट्रपति मोहम्मद इरफान अली और सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद संतोखी भी खासतौर पर शामिल होने का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 65 से अधिक देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए। साथ ही 20 से अधिक देशों के राजदूत, उच्चायुक्त, वाणिज्य दूतावास के अफसर और राजनयिक शामिल हुये। उक्त समिट के आयोजन की ब्रांडिंग कुछ इस तरह से उच्चस्तरीय हुई कि आयोजक, भागीदार, मीडिया और आम जनता सबकी नजर में उक्त समिट बेहद सफल हुई और संबंधित समस्त लोग गदगद हो गये। ऐसी स्थिति में मेरा प्रश्न क्या खोया-क्या पाया? प्रथम दृष्टया में असहज होकर मुझे प्रतिगामी ठहराया जा सकता है? परंतु न तो मैं ऐसी समिट के मूलतः विरूद्ध हूं और न ही मैं इसकी सफलता (जिसका आकलन भविष्य में ही हो पाए) पर कोई प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं लगा रहा हूं। परन्तु बावजूद इसके पिछली हुई 6 समिट का जब अवलोकन करता हूं, तब निश्चित रूप से उक्त प्रश्न पैदा होता है। उक्त निष्कर्ष जानकारी आगे आपसे साझा कर रहा हूं। 
सर्वप्रथम इन 6 समिटों के हुए आंकड़ों पर गौर करे, कुल संख्या 6431 एमओयू अनुबंध हुये, जिसमें 17.03 लाख करोड़ रुपए राशि निवेश की घोषणाएं हुई थी। कमल नाथ सरकार के समय हुई समिट जिसे मैग्नीफिसेंट एमपी कहा गया था, घोषित 74000 करोड़ के निवेश की राशि इसमें शामिल नहीं है। क्या सरकार ने इस समिट के पूर्व इसमे आने वाले भागीदारों, प्रधानमंत्री और आम जनता को इस बात की जानकारी दी कि उक्त समिटों की घोषणाओं के वास्तविक परिणाम धरातल पर कितने प्रतिशत फलीभूत हुये? कितने एमओयू धरातल पर बिल्कुल नहीं उतर पाए? समय सीमा में कितने एमओयू लागू हुए? समय सीमा के बाहर औसत देरी प्रोजेक्ट को लागू करने में कितनी हुई? कितने घोषणावीर उद्योगपतियों को इस समिट में नहीं बुलाया गया? कुल घोषित निवेश की राशि 17.03 लाख करोड़ रुपए में से मात्र 152113 करोड़ रुपए खर्च हुई। इससे सीधे जुडा हुआ सवाल (नेक्सस) रोजगार का है। इन समिटों में कुल 237730 लोगों को रोजगार मिला। इन सब महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर यदि जनता को पारदर्शी तरीके से दे दिया जाता, तो इस समिट के आयोजन पर और चार चांद लग जाते। लेकिन वह हो नहीं पाया। शायद इसलिए कि पिछले आयोजनों से ऐसी कोई उल्लेखनीय सफलता आशातीत उपलब्धि नहीं मिली, जिसका उल्लेख करने से इस आयोजन में चार चांद लग जाते। 
यदि हम पिछली शिवराज सिंह सरकार की समिट का ही उदाहरण ले तो 5.63 लाख करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा हुई थी, जिसमें से मात्र 32597 करोड़ रुपए का ही निवेश हो पाया था जो 17 के आसपास है। जबकि कमल नाथ सरकार के समय हुए समिट में 74 हजार करोड़ रुपए का निवेश हुआ जो लगभग 12 प्रतिशत के आस-पास रहा। जहां तक बेरोजगारी की बात है, वित्तमंत्री द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत वर्ष 2021-22 आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार ही जहां प्रदेश की जीडीपी बढ़ी है, प्रति व्यक्ति आय में बढोतरी हुई, वही बेरोजगारी के मोर्चों पर 5.51 लाख नये बेरोजगार मात्र 1 साल के अंदर बढ़ गये हैं। तब स्वभाविक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इतना निवेश होकर उद्योगों के खोलने से उक्त रोजगार मिलने? के बावजूद बेरोजगारों की संख्या क्यों बढ़ रही है? और यदि वास्तव में निवेश ने हमारे प्रदेश और अंततः देश का विकास किया है, तो फिर इसका एक ही मतलब निकलता है, इन निवेशों से विकास तो जरूर हुआ है, परन्तु वह उस वर्ग का है जो विकसित/विकासशील है, अविकसित (गरीब) नहीं। मतलब साफ है अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई में विकास का भी योगदान है? ऐसे अनियोजित विकास पर गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत दुनिया के सबसे असमान देशों की सूची में शुमार है। आर्थिक असमानता बढ़ती हुई छुपी सामाजिक असंतोष को कहीं चिंगारी न दे दे, यह एक बड़ी चिंता का विषय हमारे सामने है। क्योंकि बढ़ती हुई असमानता का अंततः एक दुष्परिणाम गृह युद्ध के रूप में भी सामने आ सकता है, जैसा कि विश्व के कुछ देशों में हुआ है। 
नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस (एनसओं) के सर्वे के मुताबिक देश के टॉप 10 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास औसतन 1.5 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जबकि भारत के शहरों में निचले वर्ग के परिवारों के पास औसतन सिर्फ केवल 2,000 रुपये प्रति व्यक्ति की संपत्ति है। असमानता रिपोर्ट 2022 के अनुसार भारत के शीर्ष 10 फ़ीसदी अमीर लोगों की आय भारत की कुल आय का 57 फ़ीसदी है, 10 सबसे अमीर घराने देश की 65 प्रतिशत संपत्ति पर काबिज हैं। 1 फ़ीसदी अमीर घराने देश की कुल कमाई में 22 फीसदी हिस्सा रखते हैं व देश की कुल संपत्ति में से 33 प्रतिशत संपत्ति इन 1 अमीरों के पास है। जबकि विपरीत इसके निम्न और मध्यम वर्ग 50 फीसदी लोगों जिनकी सम्पत्ति में कुल हिस्सेदारी 3 फ़ीसदी है, की कुल आय का योगदान घटकर मात्र 13 रह गया है। आॅक्स फैम इंडिया दुनिया के 20 देशों में आपदा राहत व गरीबी उन्मूलन का काम कर रहा है। आॅक्स फैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब भारत में बसते है, जिनकी संख्या करीब 22 करोड़ 89 लाख है। इससे स्पष्ट है कि हमारी योजनाओं को वह सही दिशा का सही तड़का नहीं लग पाया है, जिसकी आवश्यक हमारी भौगोलिक, सामाजिक और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कच्चे माल को देखते हुये हैं। तभी तो गरीबी रेखा से नीचे व्यक्तियों का विकास उसके उपर वाली सीढियों से कहीं न कहीं ज्यादा दोगुना तक ही सही, विकास कर पायेगें। 
मेरी नजर में हुई इन समस्त समिटों का एक ऑडिट किया जाना नितांत आवश्यक है। ऑडिट का मलतब सिर्फ टैक्स ऑडिट या सामाजिक संस्थाओं, सोसायटी का ऑडिट नहीं होता है। ऑडिट का मतलब होता है जिस प्रोजेक्ट या आयोजन को सरकार ने अपने हाथों में लिया है, वह अपने उद्देश्यों में जमीन पर वास्तविक रूप में कितना खरा उतरा, ताकि उस पर हुए खर्चा न्यायोचित ठहराया जा सके। यह बात जनता के सामने आंकड़ों के साथ प्रस्तुत की जाकर आईने के समान स्थिति साफ होनी चाहिए, वही सही ऑडिट कहलाता है। और तभी सही मायने में ही सरकार की साख जनता के बीच बनती है। इस ऑडिट का अधिकार जनता के पास भी है। मतलब जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के पांच वर्ष के लेखा जोखा को परखने का अधिकार जनता के पास है, जो पुनः पांच साल के बाद मताधिकार के रूप में उपयोग होता है। परन्तु दुर्भाग्यवश इस देश की जनता के पास ऑडिट का अधिकार अर्थात मताधिकार होने के बावजूद वह अपने इस अधिकार को गुणदोष के आधार पर प्रयोग नहीं करती है। इसलिए 80 प्रतिशत चुने हुए व्यक्ति सही नहीं चुने जाते है जो अन्यथा नहीं चुने जाते? इसलिए क्या सच्चे अर्थो यह लोकतंत्र का उपहास नहीं है?  
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस आयोजन के संबंध में आया वक्तव्य पर ध्यान देने का कष्ट करें। मैं ‘‘सीएम नहीं’’ इस प्रदेश का ‘‘सीईओ भी हूं’’। मध्य प्रदेश के नक्शे में उद्योगपति जिस जगह उंगली रख देंगे, हम उद्योग के लिए वहां जमीन देने में 24 घण्टे का समय भी नहीं लगाएंगे। एकल खिडकी लागू है। बिजली भी अब पर्याप्त है। यहां स्किल्ड मैनपावर अच्छी है। ग्लोबल स्किल पावर पार्क हम भोपाल में बना रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि गुड गवर्नेंस में मध्यप्रदेश का स्थान पहले नंबर पर है।
एक समय ऐसा भी था कि इन उद्योगों को प्रारंभ करने के लिए इस देश में 100 से अधिक कानूनों व नियमों का पालन करना पड़ता था। आज भी विद्यमान कानून में 108 अफसरो में से कोई भी एक उद्योग को बंद करा सकता है, ऐेसा मेरे वरिष्ठ पारिवारिक मित्र एनआरआई उद्योगपति का बहुत पहले कथन था। शायद समिट करने की आवश्यकता भी इसीलिए पड़ी कि सरकार इनवेस्टर्स को इस बात को समझाये कि हमारे प्रदेश में नौकरशाही की लालफीता शाही नहीं है। हम अतिथि देवों भव की परंपरा का निर्वाह उद्योग स्थापित करने के मामले में भी करते है। यदि शिवराज सिंह के उक्त दावे सही है, तब इस समिट की आवश्यकता ही क्यों हुई? यदि ‘तंत्र’ आपका सही है, उद्योग लगाने के लिए आवश्यक तंत्र चुस्त-दुरूस्त मजबूत व सक्रिय है, तब इस तरह के महंगे आतिथ्य के समिट की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? क्या यह सब ब्रांडिंग के लिए तो नहीं किया जा रहा है? जैसा कि कुछ विपक्षी आरोप लगा रहे हैं। यह सरकार का दायित्व होता है व श्रेष्ठ सरकार भी वही कहलाती है, जहां सामान्य परिस्थितियों में सामान्य रूप से समस्त निर्माण गतिविधियां निर्बाध रूप से सम्पन्न हो सके। 
वृद्धाश्रम खोलना कोई अच्छी बात नहीं है। लेकिन वृद्धाश्रम खोलने की आवश्यकता इसलिए पड़ रही है कि हमारे समाज का परिवेश बदलता जा रहा है। संयुक्त हिन्दू परिवार की धारणा टूटते जा रही है। नई पीढ़ी अपने माता-पिता के प्रति अनुत्तरदायी होती जा रही है। इसलिए वृद्धाश्रम एक आवश्यक बुराई के रूप में आवश्यक हो गया है। यही सिद्धांत यहां भी लागू होता है। यदि समस्त सामाजिक तंत्र सुधर जाएंगे तो वृद्धाश्रम खत्म हो जाएंगे। ठीक इसी प्रकार यदि शासन-प्रशासन तंत्र-यंत्र सुधर जायेगा, तो समिटों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, यह मेरा अटूट विश्वास है। 

शनिवार, 31 दिसंबर 2022

‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप’’ दुष्परिणाम-दुरूपयोग?

 

 ‘‘बलात्कार’’ व सहमति के साथ ‘‘सहवास’’ में कुछ तो अंतर रहने दीजिए?                 

हाल में ही कुछ सेलिब्रिटीज की हत्या, वीभत्स हत्या और आत्महत्या होने पर यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि, ‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप’’ भारतीय संस्कृति में कितनी जायज व उचित है?‘‘मूलभूत निजता के अधिकार’’ के आधार पर उनके सामाजिक और कानूनी मान्यता देने के पूर्व इसके दुरुपयोग-दुष्परिणाम की कितनी संभावनाएं अंतर्निहित हैं? अतः इस पर वर्तमान बढ़ती हुई घटनाओं को देखते हुए ‘‘राजहंस के समान नीर-क्षीर विवेक बुद्धि’’ से गंभीरता से विचार किए जाने की क्या नितांत आवश्यकता नहीं है?

अभी तुनिषा शर्मा (साथी शीजान खान) द्वारा की गई आत्महत्या (हत्या?) और इसके पूर्व श्रद्धा वाल्कर (शरीर के 35 टुकड़े) (साथी आफताब अमीन पूनावाला) और झारखंड की रूबिका पहाडिन नामक (शरीर के 50 टुकडे) की जघन्य तरीके से हत्या की गई। इन तीनों ही मामलों में वे तीनों युवतियों बिना शादी किए हुए लिव-इन-रिलेशन में साथी व्यक्ति के साथ रह रही थी। अब ‘‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय’’। जुलाई 2022 में नोयडा में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले अजय चैहान ने आत्महत्या कर ली। इस प्रकार महिलाएं ही नहीं, बल्कि लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले पुरूष भी अप्राकृतिक मौत के शिकार हो रहे हैं। ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात इन मामलों में यह भी है कि युवक और युवती के बीच मनमुटाव, लड़ाई झगड़े हुए जिनकी रिपोर्ट भी की गई, जिसकी जानकारी युवतियांे के माता-पिता को भी थी। बावजूद इसके जब तक वे युवतियाँ इस दीन-दुनिया से बेरहमी से विदा नहीं कर दी गई, उनके माता-पिता से लेकर समाज व स्वयं युवतियों ने उनके लिव-इन-रिलेशन जीवन पर प्रभावी आपत्ति नहीं की, जिसके उक्त दुष्परिणाम देखने को मिले।

उल्लेखित प्रकरणों में तुनिषा शर्मा ने तो परेशान होकर अथवा अन्य कारणों से आत्महत्या कर ली। इनकी माता श्री हत्या का एंगल (दृष्टिकोण) लाने का भी प्रयास कर रही हैं। तूनिषा का साथी शीजान खान के साथ तीन महीने का रिलेशन रहा। मृत्यु के 15 दिन पूर्व ही दोनों के बीच ब्रेकअप हो गया था। धर्म के साथ उम्र में भी बड़ा अंतर था। श्रद्धा वाल्कर को तो बुरी तरीके से बेरहमी के साथ 35 टुकड़े-टुकड़े कर मौत के घाट उतार दिया गया। उपरोक्त मामलों में युवकों के अन्य कई युवतियों के साथ अंतरग संबंध थे, जो शायद कलह विवाद का कारण बने। कहते है कि ‘‘दूध का जला छाछ भी फूक कर पीता है’’, परन्तु अन्य युवतियों से अनैतिक संबंधों की जानकारी अभिभावकों को होने के बावजूद वे अपनी बेटियों को लिव-इन-रिलेशन से इन जीवन साथियों से अलग नहीं कर पाए, जैसा कि उनकी मृत्यु के बाद अब वे क्रोध, दुख व विषाद् व्यक्त कर रहे हैं। 

इन तीन प्रकरणों में से दो प्रकरणों में मुसलमान युवक जीवन साथी थे, जिस कारण इन प्रकरणों को ‘लव-जिहाद’ का एंगल देने का भी प्रयास किया गया। परंतु इसी तरह के अनेक प्रकरणों में हमने यह देखा है कि ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ के टूटने पर युवती उस साथी युवक के ऊपर बलात्कार का केस दर्ज करवाती है, जिसके साथ वह महीनों, वर्षों साथ में रहकर सहमति के साथ सहवास करती है। उसका यह आरोप कदापि नहीं होता है कि ‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप’’ के दौरान उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती साथी युवक ने सहवास किया। बल्कि आरोप यह लगाया जाता है कि उसके साथ शादी का प्रलोभन देकर शादी न करके धोखा कर या अन्य कोई लालच, धमकी, डर के कारण वह लिव इन रिलेशनशिप में रहती रही। ‘‘अपने बेरों को खट्टा कोई नहीं कहता’’। वास्तव में लिव-इन-रिलेशनशिप के टूटने के बाद युवतियों द्वारा इस तरह की लगभग की जा रही ब्लैकमेलिंग को रोकने के लिए सहमति के साथ किए गए सहवास को किसी भी स्थिति में बलात्कार की परिभाषा में नहीं लाना चाहिए, इस तरह के संशोधन की बलात्कार की परिभाषा में नितांत आवश्यकता है। धोके के साथ ली गई सहमति को धोखधड़ी का अपराध माना जाना चाहिये, जिस प्रकार ऐसी स्थिति में पुरूषों के लिये कानूनी व्यवस्था है। इसी कारण से भा.द.स. की धारा 376 लैंगिक रूप से समान नहीं है।   

बलात्कार में बल शब्द से ही यह स्पष्ट होता है कि बलपूर्वक जबरदस्ती युवती के साथ सहवास करना ही बलात्कार है। एक समय बलात्कार न केवल एक अत्यंत घृणित कृत्यों के साथ शब्द माना जाता रहा, बल्कि उससे एक खौफनाक खौफ और घृणित अपराध का आभास भी होता था। लेकिन आजकल बलात्कार और सहमति के साथ सहवास को बलात्कार की निकट लाकर बलात्कार की परिभाषा में आमूल-चूल परिवर्तन किया जाकर उसकी व्याख्या व उसकी भयानकता को कम करने का प्रयास एक ओर किया जा रहा है। तो दूसरी ओर कानून को कड़क बनाकर सजा को कड़क कर उक्त अपराध के अपराधी को अधिकतम सजा देने का प्रयास भी किया जा रहा है। निश्चित रूप से सजा को कड़क बनाए जाना तो उचित और जायज है। परन्तु विपरीत इसके बलात्कार की परिभाषा को विस्तृत करने के नाम पर लिबरल (उदार) करना बलात्कार की वीभत्सता भयानक और घृणा को कम करने के ही बराबर है।

वास्तव में लिव-इन-रिलेशनशिप हैं क्या? जब दो व्यस्क अपनी मर्जी से बिना शादी किये एक छत के नीचे रहते है, तो उसे लिव-इन-रिलेशनशिप कहते है। उसकी कोई कानूनी परिभाषा नहीं है। इसलिए यह अंधों का हाथी’’ बना हुआ है। परन्तु घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा एफ-2 में इसे परिभाषित किया गया है। तथापि उच्चतम न्यायालय ने ऐसे संबंधों की वैधता को बरकरार रखा है। वर्ष 1952 में गोकुल चंद बनाम परवीन कुमारी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि इस तरह कई सालों तक एक साथ रहना शादी ही मानी जायेगी। इसके बाद वर्ष 1978 में उच्चतम न्यायालय ने ‘‘बद्री प्रसाद बनाम डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन’’ के मामले की सुनवाई के दौरान बिना शादी किए एक ही घर में रहने को मान्यता दी और कहा कि दो व्यस्क लोगों का लिव-इन-रिलेशनशिप में रहना किसी भी भारतीय कानून का उल्लंघन नहीं है। वर्ष 2022 के पंजाब हाई कोर्ट के एक निर्णय ने विवाह के होते हुए भी दूसरे व्यक्ति के साथ ‘‘लिव-इन-रिलेशनशिप’’ में रहना अपराध नहीं माना है, क्योंकि एडल्टरी (व्यभिचार, परस्त्रीगमन/परपुरुष गमन) को अपराध की श्रेणी से पहले ही हटा दिया गया है, यद्यपि ‘तलाक’ के लिए यह एक वैधानिक आधार आवश्यक माना गया है। तथापि मेरी नजर में पंजाब उच्च न्यायालय का यह निर्णय उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय के विपरीत है, जहां लिव-इन-रिलेशनशिप को शादी की मान्यता दी है। तदनुसार ही और बालसुब्रमण्यम विरुद्ध सुल्तान के मामले में उच्चतम न्यायालय ने लिव-इन-रिलेशन से पैदा हुए बच्चे के पैतृक संपत्ति में अधिकार को मान्यता दी है। तथापि उच्चतम न्यायालय के द्वारा अवधारित लिव-इन-रिलेशनशिप को शादी की मान्यता देने की अवधारणा पर उसके ब्रेकअप होने पर क्या तलाक लेने की आवश्यकता होगी? यह एक बड़ा प्रश्न है, जो मन में उत्पन्न हुआ है, जिसके जवाब की प्रतीक्षा है।

लिव इन रिलेशनशिप की प्रथम स्टेज वर्तमान समय में सोशल मीडिया के माध्यम से चैट के सिलसिले का चालू होना होता है। फिर द्वितीय स्टेज डेट पर जाने की होती है। तत्पश्चात की अवस्था लिव-इन-रिलेशनशिप की होती है। इसकी कोई निश्चित समय अवधि नहीं है। आधुनिक परिवेश में एक नजर में लिव-इन-रिलेशनशिप एक दूसरे को समझने का बेहतर अवसर देकर परिणामस्वरूप शादी में परिवर्तित होकर अपना अस्तित्व समाप्त कर लिव इन रिलेशनशिप की अंतिम पड़ाव की यह एक आदर्श स्थिति है। इस दृष्टि से आधुनिक युग में लिव इन रिलेशनशिप का समर्थन किया जा सकता है, यदि शादी के पूर्व शारीरिक संबंध न बनाये जाएं क्योंकि सभ्य व नैतिक समाज में शादी ही शारीरिक संबंध बनाये जाने का एकमात्र वैध लाइसेंस है। परंतु वास्तविकता में यह अक्सर ‘‘दूर के ढोल सुहावने’’ ही सिद्ध होता है, क्योंकि व्यवहार व धरातल पर उक्त आदर्श स्थिति नगण्य ही है। इसलिए इसके वर्तमान में दिन-प्रतिदिन सामने आ रहे दुष्परिणाम को देखते हुए इसका विरोध तेजी से होते जा रहा है। इस पर ठीक उसी प्रकार से प्रतिबंध लगाये जाने चाहिए, जिस प्रकार से संविधान द्वारा प्रदत्त मूलभूत अधिकार से पूर्ण (एब्सुलूट) नहीं होते हैं, ताकि भारतीय सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्था चरमराये-भरभराये-ढ़हाये नहीं? क्योंकि यह हमारी संस्कृति की हमारी मूल पहचान है, के विरूद्ध होकर नैतिक व सामाजिक रूप से अस्वीकार है।

बुधवार, 21 दिसंबर 2022

सुशासन बाबू? न ‘‘सु‘‘ न ‘‘शासन‘‘ सिर्फ ‘‘बाबू’’ रह गये।

बिहार के छपरा जिले में जहरीली शराब से अभी तक लगभग 70 से ज्यादा अकाल मृत्यु होकर काल के गाल में समा चुके हैं। ‘कालस्य कुटिला गतिरू’। आंकड़े इससे भी ज्यादा हो सकते है। बिहार सरकार पर विपक्ष द्वारा ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार संख्या को दबा रही है। पोस्टमार्टम किये बिना ही शवों को दफनाया जा रहा है। जहरीली शराब से देश में मौत की यह न तो पहली घटना है और न ही बिहार राज्य तक ही सीमित है। परन्तु बिहार के मुख्यमंत्री और समस्त राजनीति के रंगों को अपना कर स्वाद चख चुके सुशासन बाबू बने नीतीश कुमार की ‘‘क्षते क्षार-प्रक्षेपरू’’ रूपी दुर्भाग्यपूर्ण, मानव निर्मित प्रशासनिक लापरवाही व असफलता के कारण उक्त घटना घटी। इससे उत्पन्न आक्रात्मक आलोचनाओं की प्रतिक्रियात्मक बयान, कथन, भाव-भंगिमा नीतीश कुमार की जो आयी है, निश्चित रूप से वह न केवल ‘‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’’ की उक्ति के अनुरूप अकल्पनीय, असोेचनीय व अस्वीकार्य है, बल्कि भौंचक्का करने वाली भी है। एक चुने हुए जनप्रतिनिधि का, जनता की जान-माल की सुरक्षा से लेकर उनकी समग्र विकास का दायित्व होता है, से जनता द्वारा चुने गये मुख्यमंत्री से आम भुगतमान जनता ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद कदापि नहीं कर सकती है। वस्तुतः यह लोकतांत्रिक जन-प्रतिनिधियों की कार्यकुशलता व कार्यप्रणाली की स्थापित मान्य परसेप्शन के एकदम विपरीत है।

शराबबंदी के कारण अवैध शराब के उपभोग से हुई मृत्यु और जहरीले शराब की खपत चाहे शराबबंदी हो अथवा न से हुई मृत्यु में अंतर है। यहां मूल प्रश्न जहरीले शराब के निर्माण, वितरण व उसके उपभोग का है न कि ‘‘शराबबंदी’’ का है, इसको सबको समझना होगा। जिन प्रदेशों में शराबबंदी लागू नहीं है, क्या नीतीश कुमार वहां जहरीले शराब से हो रही मृत्यु को ‘‘बद अच्छा बदनाम बुरा’’ की तर्ज पर उचित ठहरा सकते हैं? इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में सरकार की दो स्पष्ट असफलताएं सामने दिखाई दे रही है। प्रथम लागू की गई शराबबंदी को पूर्णतः लागू करने में राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति के बावजूद प्रशासनिक असफलता। द्वितीय जहरीले शराब के निर्माण को रोकने में सूचना तंत्र और प्रशासनिक तंत्र दोनों की बड़ी विफलता। 

अंततः एक मानव नागरिक की संलिप्तता, संलिगता व दोषी अपराधी, मनोवृत्ति, प्रवृत्ति के कारण ही कोई अपराध व आपराधिक वारदात घटती है। तो क्या सरकार हर अपराध के लिये यह कहकर कि ‘‘फिसल पड़े तो हर हर गंगे’’, अपने संवैधानिक कानून का राज बनाये जाने के दायित्व से मुक्त हो सकती है कि जिस अपराधी व्यक्ति ने कानून तोड़ा है, उसका दुष्परिणाम वैसा आना ही है? अर्थात अपराध किया इसलिए अपराधी भुगते? अरे ‘‘जान है तो जहान है’’ सुशासन बाबू, जो जान से गया वह क्या भुगतेगा? भुगतना तो उसके अभागे परिवार को है। उक्त सिद्धान्त सुशासन बाबू ने वर्तमान जहरीली शराब के पीने से हुई मौत पर एक बार नहीं लगातार तीन बार विभिन्न अवसरों पर कहा है। ऐसी स्थिति में सुशासन बाबू का सुशासन तो दूर शासन का भाव ही खत्म होता दिखता है, विपरीत इसके कहीं न कहीं उनका अहम, घमंड परिलक्षित होता और ‘‘अंधे के आगे रो कर अपने दीदे खोने’’ वाला दिखता है। जब वे विधानसभा में अपने साथी बिहार के उपमुख्यमंत्री के साथ ‘‘मुस्कराते हुए’’, साथ ही ‘‘रौद्र रूप’’ के साथ पत्रकारों की ओर आमुख होते हुए वे कहते है ‘‘जो पियेगा वह मरेगा ही’’, तब मानवीय संवेदनाएं तो दूर-दूर तक तनिक भी दिखाई नहीं देती है। जब ‘‘रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था’’, वही हाल नीतीश कुमार का है।  

निश्चित रूप से तथ्यात्मक, तकनीकी और कानूनी रूप से नीतीश कुमार के कथन शाब्दिक रूप से सही होने के बावजूद, लोकतंत्र के लोकप्रिय चुने गये जननेता के रूप में उनका यह कथन अत्यंत निंदनीय, अस्वीकार योग्य व भर्त्सना योग्य है। उक्त वर्णित भाव भंगिमा लिए उक्त अविवेकपूर्ण कथन ‘‘अविवेकरू परमापदाम् पद्मरू’’ का लक्षण है, इस कारण उन्हें स्वयं पद पर बैठने का कोेई नैतिक अधिकार नहीं रह जाता है और न ही मृतक 70 लोगों की आत्मा राज्यपाल के शरीर में प्रवेश कर उन्हें कुर्सी पर चैन से बैठने देगी? राज्यपाल को  सरकार को तत्काल भंग कर देना चाहिए।

आखिर लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का दायित्व होता क्या है? कानून व्यवस्था बनाये रखने से लेकर जनता जनार्दन का समुचित समग्र तथा संपूर्ण विकास के लिए विभिन्न कानूनों को विधानसभा में पारित करवा कर अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय देते हुए भरपूर उपयोग कर कानूनों को धरातल के स्तर पर अधिकतम लागू करवाने का दायित्व आखिरकार सरकार अथवा उनके मुखिया मुख्यमंत्री की ही होती है। वह ‘‘तबेले की बला बन्दर के सिर’’ मढ़कर बच नहीं सकता। लागू किये गये कानूनों का जो नागरिक उल्लंघन कर अपराध करते है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई अवश्य की जानी चाहिए। परंतु नीतीश कुमार का यह तर्क नहीं कुर्तक है कि कानून का उल्लंघन कर एक नागरिक ने अपराध किया है तो, मुआवजा का प्रश्न कहां उत्पन्न होता है? घटना में मरे व्यक्तियों जो प्रायः निर्बल व अत्यंत गरीब वर्ग के है, को मुआवजा दे देने से आपकी शराबबंदी की नीति गलत नहीं हो जाती है, न ही उसके औचित्य पर प्रश्न खड़ा हो जाता है। यह पूर्णतः मानवीय संवेदनशीलता का मामला है। भारतीय संस्कृति में जहां व्यक्ति कितना ही बुरा क्यों न हो, उसकी मृत्यु हो जाने पर सिर्फ उसके गुणों का बखान होता है? अवगुणों का नहीं? क्यों इस संस्कृति की इस पहचान, छाप को भी नीतीश कुमार भूल गये?

जेपी (जयप्रकाश नारायण) की कार्यस्थली से निकले नेता नीतीश कुमार शायद यह भूल गये है। वास्तव में इस देश में हर्जाना एक राजनैतिक टूल बन गया है, जहां घटना की गंभीरता व उससे उत्पन्न आक्रोंश को कम करने के लिए घटनाओं की प्रकृति को देखते हुए मानव जीवन के मूल्यों को भी विभिन्न कीमतों द्वारा निर्धारित कर तदानुसार लाखों रुपए से करोड़ों रुपयों में किया जाकर मुआवजे की ‘रेवड़ी’ बांट दी जाती है। नीतीश कुमार केजरीवाल की ‘‘सब धान बाइस पसेरी’’ वाली रेवड़ी नीति से असहमत हो, तब भी मुआवजा बांटना रेवड़ी नहीं है, इतना सुशासन बाबू को समझना होगा। 

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री, सुशील मोदी की उक्त दुखद घटना पर एक सधी हुई प्रतिक्रिया के लिए उनकी प्रशंसा अवश्य की जानी चाहिए। प्रथम उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुख्यमंत्री की नियत पर कोई शक नहीं है। बेशक शक की गुंजाइश की कोई संभावना भी नहीं है, क्योंकि बीते छः सालों में ढाई करोड़ लिटर अवैध शराब जब्त की जाकर, साढे छः लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई है। दूसरा यदि कोई नीति (शराबबंदी) असफल हो रही है, तो उस पर पुनर्विचार अवश्य किया जाना चाहिए। 

कहते हैं न कि ‘‘संगत का भी असर‘‘ होता है, जिसका आचरण, व्यवहार, कार्य क्षमता व कार्य कुशलता पर बड़ा व गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसा लगता है कि, ऊक्त उक्ति बिहार के मामले में सही सिद्ध होती दिख रही है। जहरीली शराब की हृदय हिला देने वाली जो घटना घटित हुई, कही वह नीतीश कुमार की एक अच्छी संगत एनडीए छोड़ने का दुष्परिणाम तो नहीं है? और उसके आगे मुआवजा न देने के अड़ियल अमानवीय रवैया से तो निश्चित रूप से आरजेडी की ‘‘राम मिलाई जोड़ी’’ की संगत का स्पष्ट असर दिखता है। इसलिए नीतीश कुमार को समस्त दृष्टिकोण से इस घटना से उत्पन्न अनेक प्रश्नचिन्हों पर गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श करना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि उनकी शराबबंदी की नीति 100 प्रतिशत सही है, और ये घटनाएं हर प्रदेश में होती रहती है, इसलिए इस नीति पर पुनर्विचार नहीं किया जायेगा, समायोचित नहीं होगा। ‘‘जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा’’ इस सिद्धांत को यदि नीतीश कुमार बेचारे, निरीह, मजबूर अपराधी मृतकों पर लागू कर रहे है, तो कभी स्वयं पर लागू कर सोचिये? दूध का दूध व पानी का पानी हो जायेगा। सत्य को असभ्य तरीके से कहना भी सत्य का अपमान होकर, सामान्य लोगों के गले में नहीं उतरेगा। 

शराबबंदी सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत अच्छी व्यवस्था है जो शांति के लिए जरूरी है। इस कारण सड़कों पर छेड़छाड़ की घटना घटनाएं कम ही होती है, महिलाएं ज्यादा सुरक्षित महसूस करती है। शराबबंदी दुनिया के कई देशों में लागू करने की कोशिश की गई। भारत में इन पांच प्रदेशों गुजरात, नागालैंड, मिजोरम, बिहार, उत्तराखंड में शराबबंदी लागू है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

क्या कांग्रेस का चिंतन और ‘‘राजनीतिक विवेक’’ ‘शून्य’ हो गया है?

यूपीए सरकार के समय एक अनाम लेखक भारतीय राजनीति में परोसे जा रहे अपशब्द, राजनीतिक गालियों, जहरीले बोल  (जिसे राजनीति का रिवाज बना दिया गया है) पर किताब लिखना चाहते थे। परन्तु उसमें वे असफल हो गये, क्योंकि तत्समय राजनैतिक वातावरण सदाचार युक्त होकर तुलनात्मक रूप से ठीक-ठाक ही था, और विपक्षी दल अटल जी और आडवाणी की भाजपा का चरित्र निश्चित रूप से वर्तनाम विद्यमान समय आज की तुलना में और कांग्रेस की तुलना में बहुत बेहतर था। अतः तत्समय विपक्ष अर्थात् भाजपा द्वारा सत्तापक्ष अर्थात् कांग्रेस के नेताओं को बहुत कम गालियां मिलने के कारण, वह किताब अधूरी ही रह गई। एनडीए सरकार आने के बाद जब गालियों का नया दौर चला (नए दौर की नई गालियां) तब उस अनाम व्यक्ति को पुनः ख्याल आया क्योंकि अब शब्दों से लेकर गालियों, जहरीले बोलों की निडर बाढ़ सी आ गई। सूप और चलनी सब बोलने लगे है।

राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व एवं अनुशासन समितियों द्वारा अधिकांश मामलों में ऐसे बयानों को रोकने के लिए नेताओं के खिलाफ प्रायः कोई बड़ी कड़ी कार्रवाई नहीं की जाती रही है, बल्कि उसे अनसुना, अनदेखा कर दिया जाता रहा है। इस प्रकार पिछले कुछ समय से इस रिवाज में तेजी से वृद्धि होकर कांग्रेस नेताओं द्वारा दी जा रही धडाधड गालियों से पर्याप्त सामग्री संचित हो जाने से मुझे ऐसा लगता है कि निकट भविष्य में किताब लिखी जा जाकर उसका प्रकाशन भी हो जाएगा। मेरे एक दोस्त जो यह लेख लिखते समय सामने ही बैठे थे, उन्होंने टोकते हुए तपाक से कहा, भाई साहब इस विषय पर एक नहीं कई किताबें लिखी जा सकती है, क्योंकि इस समय दिल्ली में जैसे कचरे का पहाड़ (जो एक राजनैतिक मुद्दा) बन गया है, वैसे ही गालियों का पहाड़ भी बन गया है। आप उनका अर्थ समझ ही गए होंगे। उन अभद्र गालियों का उदहरण करना यहां शोभायमान नहीं होगा। कांग्रेस की वर्तमान में हालत ऐसी ही है।

हाल ही में मध्य प्रदेश कांग्रेस के  नेता व पूर्व मंत्री दमोह (हटा) के राजा पटेरिया का बयान बड़ा गर्म चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस पर मध्य-प्रदेश सरकार के गृहमंत्री मिश्रा ने तुरन्त संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज कराकर पुलिस ने राजा पटेरिया को गिरफ्तार भी कर लिया। इन घटनाओं से एक बड़ा गंभीर प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या कांग्रेस का शीर्षस्थ नेतृत्व इतना विवेक शून्य हो गया है? क्या कांग्रेसी नेतृत्व को इतनी सी भी समझ नहीं हैं कि "अपने करनी ही पार उतरनी होती" है और इस तरह के "अधजल गगरी"  रूपी बयानवीरों के बयानों से कांग्रेस को कौन सा फायदा मिल पाएगा ? यदि कांग्रेस के बयान वीरों की यह बात मान भी जाए कि उनके बयानों का अर्थ का अनर्थ निकाला जाकर उन्हें बदनाम किया जा रहा है, तब भी उनके अर्थपूर्ण बयान से कांग्रेस या बयानवीर

 नेताओं को कोई फायदा होता दिखता नहीं है। क्योंकि ऐसे "थोथा चना बाजे घना वाले" बयानों की कोई भी उचित संदर्भ या औचित्य दिखाई देता नहीं है। फिर भी यदि उनके बयान के बताये गये अर्थ को ही सही मान लिया जाए तब भी क्या उससे कांग्रेस को चुनावी फायदा हो सकता है?  ऐसे बेतुके निर्लज्ज बयानों से तो जनता की नजर में  कांग्रेस नेताओं के प्रति सहानुभूति उत्पन्न  नहीं हो सकती है। स्पष्ट है कांग्रेस नेतृत्व का ध्येय वाक्य  "सूरदास खल करी कमरी चढ़े न दूजो  रंग" हो चुका है और कांग्रेस में सही राजनैतिक सोच, चिंतन व मारक नीति और  प्रवती का परिपक्व अनुभवी नेतृत्व ही नहीं रह गया है, तभी तो यह स्थिति हो गई है। गालियों जैसी आक्रामकता यदि कांग्रेस की नीति-रीति में होती तो सच मानिए  आज कांग्रेस की दशा और दिशा ही दूसरी होती।

विवेकहीन राजनैतिक शून्यता व दिमागी खोखलेपन का बड़ा उदाहरण राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा है, जो यात्रा के प्रारंभ होने के तुरंत बाद गुजरात में होने वाले चुनाव से नहीं (लगभग नहीं के बराबर) गुजरती है। परन्तु 2023 के दिसम्बर में मध्य-प्रदेश व राजस्थान से 12 व 18 दिनों के लिए गुजर रही है। यदि हार के  ड़र से राहुल गांधी के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगने की आशंका के कारण भारत जोड़ो यात्रा गुजरात  नहीं ले जायी गई तब भी 56 इंच के सीने वाले साहसी विपक्षी से मुकाबले में असफल ही ठहराया जायेगा। यह कोई धार्मिक यात्रा नहीं है? जैसा कि देश में लालाकृष्ण आडवाणी ने राम जन्मभूमि की धार्मिक यात्रा निकाली थी। तथापि उससे भी उन्हें व भाजपा  को बड़ा राजनीतिक फायदा मिला था। वस्तुतः भारत जोड़ो यात्रा निसंदेह एक राजनैतिक यात्रा ही है, जो कांग्रेस की जनता के बीच गिरते जनाधार को रोककर विस्तार करने की तथा राहुल गांधी के आभा मडंल पर पड़ी निराशा के धूल को हटाकर चमकीला बनाने का एक सार्थक प्रयास है कि "बाज के बच्चे मुंडेरो पर नहीं उड़ा करते" । परंतु यात्रा के दौरान ही कांग्रेस के नेताओं को जोड़ना तो दूर, चली आ रही टूटन में वृद्धि ही होती गई। कांग्रेस की टूटन रुकी नहीं। जनता की भीड़ आ रही है। परन्तु उसका फायदा तभी मिल पाता जब  कांग्रेस का संगठन मजबूत होता व जनता के मन में जगे उत्साह को कांग्रेस सही दिशा नेेतृत्व दे पाता। लेकिन दूर्भाग्यवश यह कहावत यहां चरिथार्त होती है ‘‘4 दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात’’। यात्रा अपनी क्षणिक चमक देती हुई  चल रही है। परन्तु इसका प्रभाव व लाभ कांग्रेस अपनी दिशाहीन नीति के कारण और कमजोर नेतृत्व के कारण नहीं उठा पा रही, जिसका ही यह परिणाम है कि चुनाव लड़ने के लिए ‘‘सबको परखा, हमको परखों’’ व ‘‘पार्टी विथ डिफ्ररेंश’’ का नारा गढ़ने वाली भाजपा को को अब नये नारे गढ़ने की आवश्यकता ही नहीं होती है। 

वस्तुतः कांग्रेस की कार्यप्रणाली ही भाजपा को चुनाव जिताने के लिए नारा देती है। जब-जब कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उपमा स्वरूप गाली दी, तब-तब प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बढ़ी, यानी "ज्यो ज्यो भीगे कामरी क्यों क्यों भारी होय" । यह एक सच्चाई है। वर्ष 2014 में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने चायवाला कहकर भाजपा को चाय वाला का नारा दे दिया जो अंततः सफल हो गया जिस कारण ‘‘चायवाला’’ ही प्रधानमंत्री बन गया। 2018 में राहुल गांधी ने ‘‘चौकीदार चोर है’’ के कथन को भी भाजपा ने मुद्दा बनाकर जनता की सहानुभूति बटोरी। नवीनतम उदाहरण राजा पटेरिया का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर दिया गया बयान है, जिसे दोहराना भी उचित नहीं है। उक्त कथन के लिए अभी तक राजा पटेरिया ने  गलती मानकर माफी नहीं मांगी है। बल्कि  पटेरिया ने हत्या शब्द का अर्थ हार बताकर एक  नई राजनीतिक शब्दावली को रचा है।

राजा पटेरिया का उक्त कथन आगामी मध्य-प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित न हो जाये? क्योंकि कांग्रेस ने उसके अर्थ या अनर्थ को अभी तक नहीं समझा है अन्यथा उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के पार्टी से अभी तक तुरन्त बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता। इसके पूर्व गुजरात चुनाव के दौरान कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मोदी के प्रति अपशब्दों का प्रयोग कर कांग्रेस को गुजरात चुनाव में नुकसान पहुंचाया । इसलिए "ज्यादा जोगी मठ उजाड़" की प्रतीक बन चुकी दिशाहीन कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने वाले कांग्रेस नेतृत्व की कमी के कारण मोदी व भाजपा को अगले पांच साल चुनावों में कोई खतरा नहीं है, यह साफ है।

परन्तु इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि भाजपा इस मामले में पूरी तरह दूध की धुली है। भाजपा नेताओं के भी ‘‘बकलोल’’ कम नहीं है। तथापि कमोत्तर जहरीले व थोड़ी बहुत मर्यादा लिए होते हैं। भाजपा का लगातार चिंतन शिविर व कार्यशाला लगाने के कारण यह बेहतर स्थिति हो सकती है। अतः वास्तव में कांग्रेस को दोहरी गति चिंतन शिविर लगाने की नितांत आवश्यकता है। 

बावजूद इससे बडा प्रश्न यह उठता है कि कांग्रेस हिमाचल में अच्छा परिणाम दे पायी। मतलब साफ है। कांग्रेस अपने बलबूते अथवा नेतृत्व के कारण नहीं, बल्कि वहां भाजपा सरकार के बुरी तरह से असफल रहने के कारण जनता की नजर में अलोकप्रिय हो जाने से उसे जीत मिली व चली आ रही परिपाटी का पालन हुआ। इसलिए तीसरा मजबूत वैकल्पिक विकल्प न होने पर "बिल्ली के भाग्य  से छींका टूटने"  के कारण कांग्रेस पुनः सरकार में आयी। यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर जो हिमाचल प्रदेश के ही है, सघन चुनावी दौरा नहीं करते तो शायद 25 सीटें भी नहीं मिल पाती। हिमाचल के चुनाव परिणाम भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को हिमाचल के संबंध में निर्णय लेने के लिए एक सीख जरूर देती है।

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