सोमवार, 17 सितंबर 2018

‘‘सरकारें ’’ देशहित में ‘‘जुमलों’’ से कब बाहर आयेगीं?

यद्यपि हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दावा करते हैं, और हैं भी। तथापि जनता लोकशाही से, लोकतांत्रिक तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यो के आधार पर देश चलाने की अपेक्षा करती है। लेकिन पिछले कई  दशकों से हमारे देश में लोकतंत्र के नाम पर ‘‘जुमले बाजी’’ ही चल रही है। एक ‘जुमले’ मात्र से कई बार सरकार बनने या बिगड़ने लगती है। 
वर्ष 1965 में ‘‘जय जवान जय किसान’’ के चुनावी नारे की बोट पर चढ़कर कांग्रेस ने चुनाव तो जीता, लेकिन आज तक न तो जवानों की वन रेंक वन पेंशन को अंतिम रूप से संतोषप्रद निदान हो पाया है (जबकि सेना के मामलो में असंतोष किंचित सा भी नहीं रहना चाहिये) और न ही किसानो की जय-जय कार लगने के बावजूद उनको फसल के लागत मूल्य का दुगना मूल्य मिला हैं। अर्थात यह भी अभी तक जुमला ही रह गया है। 
निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं देशी रियासतों के राजाओं के प्रिविपर्स व विशेषाधिकार की समाप्ति के बाद इंदिरा गांधी ने वर्ष 1971 में ‘‘गरीबी हटाओं’’ का नारा दिया था, जिस नारेे के द्वारा उन्होने गैर कांग्रेस-वाद के नारे के विरूद्ध भारी भरकम जीत दर्ज की थी। लेकिन बाद में वह एक जुमला सिद्ध हो गया। ‘‘गरीब’’ की गरीबी कितने प्रतिशत कम हुई, यह तो भगवान ही जाने (क्योकि आम जनता ने आज तक ऐसा महसूस नहीं किया)। वास्तव में, यदि गरीबी कम हुई होती तो कांग्रेस को (60 साल की सत्ता के बाद भी) आज भाजपा पर देश की आर्थिक स्थिति को खराब कर गरीब विरोधी सरकार होने का आरोप नहीं लगाना पड़ता। अर्थात् आर्थिक स्थिति के कारण गरीबी बढ़ती गई ‘‘यह स्वयं कांग्रेस भी मान रही है। परन्तु तत्समय तो यह जुमला बहुत उछला कि’’ भले ही गरीबी कम न हो पाई हो अपितु गरीब जरूर खत्म होते जा रहे है; और यही आज  भी देश का सबसे बड़ा जुमला सिद्ध हो रहा है। 
वर्ष 1977 को ही ले; जब आपातकाल के कारण ‘‘जे.पी’’ (जय प्रकाश नारायण) ने ‘‘इंदिरा हटाओं देश बचाओं’’ के नारे (जो शायद देवकांत बरूआ, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ‘‘इंदिरा ही भारत हैं, भारत ही इंदिरा है’’ के कथन के संबंध में दिया था) के साथ-साथ जनता पार्टी द्वारा ‘‘मानवाधिकार’’, व ‘‘स्वतंत्र मीडिया’’ एवं ‘‘लोकतंत्र बचाने’’ का नारा दिया था। इस जुमले पर घमंडी कांग्रेस सरकार बुरी तरह से घराशाही हो गई थी। लेकिन जनता पार्टी ने ‘‘शासक’’ हो जाने मात्र को ही लोकतंत्र बहाली मानकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। ढ़ाई वर्ष के अल्प काल में ही लोकतंत्र स्वच्छंदता व अराजकता में बदल गया और जनता पार्टी को आरएसएस की दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अपनी सत्ता बीच में ही खोना पड़ी। इस तरह लोकतंत्र बचाओं का नारा भी अंततः एक जुमला ही सिद्ध होकर रह गया और वास्तविक लोकतंत्र अर्थात ‘‘जनता’’ का ‘‘जनता के लिए’’ एवं ‘‘जनता द्वारा’’ के संबंध में जन नागरिक आज भी प्रतीक्षारत है।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 में ‘‘जब तक सूरज चाँद  रहेगा इंदिरा तेरा नाम रहेगा’’ के नारे के साथ सहानुभूति लहर पर चढ़कर तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत (314सीट) प्राप्त करने के बावजूद उक्त बहुमत कांग्रेस ने मात्र 5 साल में ही खो दिया और इस प्रकार इंदिराजी का नाम चांद के अस्तित्व तक रहने की बात मात्र एक कल्पना होकर रह गई।  
इसके पश्चात् वर्ष 1989 में मंडल व कमंडल का जुमला आया। इस पर भी सरकार बनती बिगडती गई। मंडल का डंक आज तक भी भुक्त भोगी भोग/भुगतने को मजबूर है और ‘‘कमंडल’’ आज भी भगवान श्रीराम जन्म स्थल (अपनी अधिकृत जगह पर) मंदिर बनने का रास्ता ताक रहा है। ‘‘सौगंध राम की खाते है, मंदिर वही बनायेगे’’; ‘‘विपक्ष’’ से ‘‘सत्ताधारी दल’’ होकर, देश के 23 राज्यो में शासन करने वालों के नारे को अभी भी न्यायालय के निर्णय का इंतजार है। इस प्रकार राम मंदिर के निर्माण का नारा भी लगातार आज तक जुमला मात्र ही बना हुआ है। ऐसा कब तक बना रहेगा यह भी भविष्य के गर्भ में है। धारा 370 हटाने का बहुत पुराना संकल्प को आज भी लोग मात्र एक जुमला ही मानते है। महिलाओं को बराबर का अधिकार एवं विधायिका में 33 प्रतिशत का आरक्षण देने का प्रस्ताव भी कई वर्षो से संसद में अटका हुआ रहकर जुमले का पहनाव ओढ़कर निरीह बनकर प्रतिभूत होने की बाँट जोह रहा है और वास्तविकता नहीं बन पाया है। 
प्याज की महगाँई के आसूँ एक सरकार को बदल देते है तो सत्तारूढ़ होने वाले दल को कुछ ही समय में रूला भी देते है और इस तरह ‘‘प्याज’’ भी एक जुमला ही बनकर रह जाता है। इस प्रकार समस्या जस की तस बनी रहती है। वर्ष 2010 में तृणमूल कांग्रेस द्वारा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान दिया गया नारा ‘माँ’ ‘माटी’ व ‘मानुष’ के तीनो तत्वों का आज कही अता-पता न होकर वह एक जुमला मात्र बच गया है। विदेशों से कालाधन लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15 लाख जमा होगंे, इस सर्वाधिक आकर्षक जुमले को कौन भूल सकता है? क्योकि वर्तमान सरकार ने स्वतः ही बाद में इसे जुमला मान लिया। ‘‘गर्दन जमीन पर कट रही है व टेबिल पर बिरयानी खा रहे है’’ यह भी मात्र एक आरोप न रहकर जुमला ही सिद्ध हुआ। आज तक सीमा पर आंतकी गतिविधियों व शहीदो की संख्या में कितनी तुलनात्मक कमी हुई है? यह आपके सामने ही हैं। ‘‘एक राष्ट्र एक दर’’ का समस्त पक्षो द्वारा दिये गया नारे का जी.एस.टी. में आज क्या हर्स हुआ है यह आपके सामने ही हैं। रूपया गिर रहा है, देश की साख गिर रही है, यह कथन भी रूपये के 73 डॉलर तक पहुचने के कारण बुरी तरह से एक जुमला ही सिद्ध हो रहा है। आज की सबसे बड़े आश्चर्य की बात तो केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का वह बयान है जो पेट्रोल व डीजल के मूल्यो की वृद्धि पर  आया है कि ‘‘हम इसके लिये कुछ नहीं कर सकते’’ यह स्वीकारिता आज का सबसे बड़ा जुमला बना हुआ है। कारण स्वयं रविशंकर प्रसाद सहित एनडीए के अधिकांश सदस्योे ने कुछ वर्षो पूर्व ही तत्कालीन यूपीए सरकार को पेट्रोल व डीजल की मूल्य वृद्धि पर बुरी तरह से घेरा था। उस समय उन्होंने बैलगाड़ी व साईकल के प्रदर्शन द्वारा अपना सांकेतिक विरोध भी दर्ज कराया था। आज इस जुमले पर वर्तमान सरकार स्वयं ही असहाय हैं। ‘‘विदेशी घरती पर मोदी का डंका’’ भी एक जुमला इसलिए हो गया है क्योकि सीमा से लगे समस्त पडोसी देशों में (भूटान को छोड़कर) मोदी का डंका नहीं बज पा रहा हैं (इस संबंध में अटलजी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘हम लोग अपने दोस्त तो बदल सकते हैं पर पडोसी नहीं बदले सकते’’) वर्तमान में पड़ोसियों से संबंध किस स्तर तक गिर गये है, यह सर्वविदित ही है। वर्तमान के ‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ एवं ‘‘अच्छे दिन-आने वाले है’’ बहुप्रचलित जुमलों  के परिणाम आपके सामने है। क्या वास्तविकता को देखते हुये हम इन्हे जुमला कहने से परहेज कर सकते है?
कभी-कभी सोचकर हास्यास्पद लगता है कि राजनीतिक जुमलेबाजी से ग्रस्त नेतागण घरेलू जीवन में कैसा बर्ताव करते होंगे? घर में मनपसंद सब्जी ना बनने पर; देखिये मैं इस प्रकार की सब्जी की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस प्रकार की सब्जी को कोई जगह नहीं हैं। बच्चों द्वारा किसी चीज के लिए जिद करने पर देखिये ये आपके निजी विचार है। पार्टी आपकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं। पत्नी के साथ घरेलू झगड़े को लेकर रिश्तेदारों के बीच देखिये मेरे शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। मुझे बदनाम करने के लिए ये विपक्ष की एक चाल है और अंत में पत्नी के द्वारा सुलह न करने पर देखिये मेरे शब्दों का गलत मतलब निकाला गया है। मेरे कहने का कदापि यह मतलब नहीं था इत्यादि-इत्यादि।
इस प्रकार यह स्पष्ट है इस देश की राजनीति चाहे पक्ष द्वारा हो अथवा विपक्ष के द्वारा हो, जुमलो पर ही आधारित व केन्द्रित होती है; वास्तविकता पर नहीं। जनता असहाय मूक दर्शक मात्र बन कर रह गई है। समस्त नेतागण देश को सोने की चिड़िया कहते नहीं अघाते। यदि वास्तव में देश को सोने की चिड़िया बनाना है तो सरकारों को अपनी कार्यशैली को जुमलों से हटकर एक कदम आगे बढ़कर वास्तविकता व हकीकत में उतारने की आवश्यकता है। तभी हमारा यह देश विकास की ओर तेजी से आगे बढ़ पायेगा। अन्यथा विश्व के अन्य देशों की तुलना में हम हमेशा पिछड़ते ही जायेगे व पिछड़ते-पिछड़ते एक समय अंतिम निचले स्तर पर खड़े हो जायेगे। क्योकि विश्व तो ‘‘वास्तविकता’’ का अनुशरण करते हुये तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है, जहाँ शायद इस तरह के जुमलों का कोई स्थान नहीं है। 
अतं में वर्ष 1989 के चुनाव में वी.पी. सिंह को लेकर बना एक जुमला ‘‘राजा नहीं फकीर हैं, देश की तकदीर हैं’’ जो शायद देश की यर्थाथ स्थिति को ही व्यक्त करता है, इसलिये वह (एक मात्र) जुमला नहीं रह गया है। लेकिन इसके विपरीत भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का देश के नागरिको से स्वच्छता का आव्हान निश्चित रूप से जुमला सिद्ध न होकर एक सफल अभियान बनते जा रहा है। इसी प्रकार से समस्त जुमलों को मूर्त रूप देने की समय की आवश्यकता है। लेख खत्म करते-करते एक बात और ध्यान में आयी केजरीवाल की अभूतपूर्व नायाब घोषणा ‘‘आपकी सरकार आपके द्वार‘‘ की तर्ज पर जो 70 से अधिक सेवाओं को घर पहुंच सेवा के रूप में मूर्तरूप देने का ऐतहासिक संकल्प लिया गया हैं। उम्मीद है वह संकल्प जुमला न रहकर तेजी से वास्तविकता का असली जामा पहन सकेगा, ताकि दूसरे नेताओं व दल के लिये भी यह प्रेरणा स्रोत बनकर वे सही व सार्थक दिशा को अपनाने में अग्रसर होगें।    

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

क्या देश के नागरिको के रहवासी भवन के प्रति सुरक्षा की गांरटी हेतु कानूनी प्रावधान बनाने का समय नहीं आ गया है?

विगत एक हफ्ते के भीतर देश की राजधानी दिल्ली के पास एनसीआर में नवनिर्मित या निर्माणाधीन या पुरानी बिंल्डिग अचानक ढ़ह जाने की लगातार चार घटनाएँ हो गई जिस कारणं सम्पत्ति के अलावा जानमाल का भी बड़ा नुकसान हो गया। ये घटनाएं 17, 21, 22 जुलाई 2018 के बीच गाजियाबाद, शाहबेरी, मसूरी, साहिबाबाद में हुई हैं। शाहबेरी नोएडा में छह-छह मंजिला दो निर्माणाधीन इमारत गिरने से 10 लोगो की मौत हो गईं। मसूरी में पांच मंजिला निर्माणाधीन इमारत के ढहने से 2 लोगो की मृत्यु हो गई। नोएडा के सेक्टर 63 में भी एक निर्माणाधीन बिंल्डिग की दीवार गिरने से लोगो की जान चली गई। ग्रेटर नोएडा सूरजपुर के पास मुबारकपुर गांव में तीन मंजिला इमारत गिर गई जिसमें से तीन लोगो को मलबे में से निकाल कर किसी तरह बचाया गया। गाजियाबाद के अशोक वाटिका इलाके में एक मकान के ढहने से 1 व्यक्ति की मृत्यु हो गई। इस के अलावा एक इमारत के पिलर के झुकने के कारण 16 परिवार को दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा। आज ही भिंवडी में सात साल पुरानी इमारत ढ़ह गई। ये समस्त निर्माण कोई बाढ़ या भूंकप की प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं ढ़हे, बल्कि निर्माण में गुणवत्ता की कमी या भवन के जर-जर हो जाने के कारण ढहे। आखिर इन घटनाओं के लिए दोषी कौन? आज के प्रदूषित वातावरण से अलग लिये हुया यह एक ज्वलंत प्रश्न है।
सामान्य नागरिक जिदंगी भर की अपनी मेहनत पसीने की कमाई से बचत करके स्वयं के रहने के लिए या तो स्वयं भवन बनवाता है या बिल्ड़रों से खरीदता है। इस प्रकार लगातार हो रही भवन दुर्घटनाओं के कारण उसके मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि उसकी सामाजिक सुरक्षा का कोई दायित्व किसी संस्था या सरकार का है अथवा नहीं? घटना घटित हो जाने के बाद सरकारें बिल्ड़रांे के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कर एक नही कई-कई जाँच एजेंसियां एक साथ बैठा देती हैं और घटना में जानमाल की हानि होने पर पीड़ित परिवार को 2-4 लाख रूपये का मुआवजा देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेती है। परन्तु साधारण गरीब परिवार की जिदंगी भर की कमाई से एक मात्र निर्मित भवन के नुकसान की भरपाई के लिये कुछ नहीं देती हैं।
जरा सोचिये! एक आम नागरिक की जिंदगी में रोटी और कपड़े के बाद उसका एकमात्र  जीवनदायी सपना होता है कि उसका स्वयं का मकान हो जिसमें वह शांति व सुख का अहसास महसूस कर जीवन आराम से व्यतीत कर सके। वह अपनी कडी मेहनत पसीने की कमाई से विभिन्न अत्यावश्यक खर्चो में भी जीवन भर थोड़ी-थोड़ी कटौती करके बचत कर या तो किश्तों में बिल्ड़र्स को पैसे देता है या मकान-ऋण लेकर उसे किश्तों में जमा करता है। 99 प्रतिशत मामलों में मकान के निर्माण की दृष्टि से मकान मालिक को कतई तकनीकि जानकारी नहीं होती है। इसलिए निर्माण के लिए वह सम्पूर्ण रूप से ठेकेदार इंजीनियर्स व बिल्डर पर ही निर्भर रहता है। बिल्डरों के मामले में भी अधिकांशतः तकनीकि रूप से सर्वथा अनभिज्ञ सा अर्धभिज्ञ होते है। जब कोई बिल्डर्स से मकान खरीदता है और वही मकान किसी तकनीकि दोष या भवन निर्माण सामग्री घटिया होने के कारण अचानक एक दिन भर-भराकर गिर जा़ता है, तब उस नागरिक के सामने (बेघर हो जाने के कारण) एक बड़ा संकट सामने आ खड़ा होता है कि अब उसे आंधी बरसात एवं गर्मी से सुरक्षित रखने वाली उसकी छत सदा के लिए उससे छिन गई है। साथ ही यह संकट उसके व्यवसाय प्रोफेशन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल कर संकट को और बढाता है। इस प्रकार उसको दोहरा नुकसान झेलना पड़ता है। 
जब कोई व्यक्ति किसी निजी एंजेसी से या राजमिस्त्री से मकान का निर्माण कराता है और उसमें कोई तकनीकि दोष होने के कारण या निर्माण सामग्री सहित कार्य की गुणवत्ता न होने से जब वह मकान ढ़ह जाता है तब भी उसके पास कोई चारा नहीं बचता है। उसमे कानूनी कार्यवाही के लिए आर्थिक और मानसिक हिम्मत भी नहीं बचती है। वह मात्र निर्दोष मूक दर्शक बना रहता है। उक्त समस्त त्रासदी से निपटने के लिए आज तक न तो जनता ने ही जीवन के अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग किया और न किसी सरकार ने ही इस संबंध में ऐसे भुक्तभोगी नागरिको के नुकसान की भरपाई के लिए कभी कुछ सोचा हैं। 
आज इस विषय पर गंभीरता से सोचने का समय क्या नहीं आ गया है? और यदि आज भी हम इस दिशा में नहीं सोचते है, तो ऐसी घटनाओं में निरंतर वृद्धि होने की बात के बाद तो हमें सोचने के लिये मजबूर होना ही पड़ेगा। लेकिन तब तक सैकड़ो निर्दोष जीवन व बेहताशा सम्पत्ति का नुकसान अवश्य हो चुका होगा। अतः केन्द्रीय व राज्य सरकारंे अविलम्ब ऐसे भुक्तभोगी नागरिकों के हितो की रक्षा लिए कुछ न कुछ कानून अवश्य बनायें जिसमें सर्वप्रथम यह प्रावधान किया जाय कि जब भी कोई बिल्डर मकान बेचता है, तब उस पर अनिवार्य कानूनी दायित्व एवं बाध्यता हो कि वह भवन का आवश्यक इश्ंयोरंेस करा कर ही बेचे। भले ही ऐसे इश्ंयोरंेस का शुल्क वह अपनीे मूल रकम में शामिल कर उपभोक्ता से वसूले। दूसरा या तो यह इश्ंयोरंेस कम से कम 25 वर्षो के लिए हो अथवा वार्षिक प्रीमियम का प्रावधान रखने पर सोसायटी के वार्षिक शुल्क में ही प्रीमियम की राशि को जोड़ दिया जाय। नगर पालिका, नगर पंचायत या ग्राम पंचायतों में इंजीनियर्स की टीम बनाई जाय जो प्रत्येक प्राइवेट निर्माण की अनवार्य रूप से जांच कर गुणवत्ता में कोई कमी पाई  जाने पर वैसे घटिया निर्माण कार्य को रोक सके। ताकि ऐसी आपदाओं पर रोक लगे।
जिस प्रकार से आज कल केन्द्रीय व राज्य सरकारे करोड़ो-अरबों रूपये की सब्सिड़ी व जीवन दायनी सुविधाएं मुफ्त देकर लोगो को अक्रमण्य बना रही है, तब उसकी तुलना में जिसने अपनी जिदंगी भर की कमाई भवन लेने में लगाई और उसका वह भवन घटिया निर्माण होने के कारण ढह जाए तब उस स्थिति में क्या सरकार का कोई दायित्व नहीं बनता है कि वह पीड़ित को आर्थिक   सहायता देकर नुकसान की भरपाई करे। अभी हाल में मोटर वीहकल एक्ट में संशोधन प्रस्तावित कर यह प्रावधान किया गया है कि दुर्घटना में मृत्यु होने पर 2 लाख का मुआवजा दिया जाय। जब पीड़ित किसान को फसल खराब होने पर सरकार मुआवजा देती है, प्राकृतिक आपदा आने पर थोडा़ -बहुत आंशिक ही मुआवजा देती है। तब इस प्रकार की मानव निर्मित आपदा जिनको रोकने का दायित्व प्रजातंत्र में चुनी हुई सरकार का ही होता हैं, ऐसी (लापरवाही व दुराशय के कारण हुई) दुर्घटना पर पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का प्रावधान कानून में क्यों नहीं होना चाहिए? इस लेख का मुख्य विचारणीय विषय यही हैं। पीड़ित नागरिकों का इसमें दोष नहीं है। अविलम्ब इस विषय में सोचकर संबंधित क्षेत्रों से चर्चा करके कोई न कोई सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता आज के समय की मांग है। ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं के बढ़ने से रोका जा सके। अन्यथा बेकसूर निर्दोष, नागरिक अनवरत इस तरह की आर्थिक एवं मानसिक पीड़ा सहने को मजबूर होते रहेंगे। 

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