शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

क्या ‘‘आंदोलन’’ को अब ‘‘कानूनी’’ रूप से ‘‘परिभाषित’’ कर ‘‘कानून’’ में जोड़ा जायेगा।

70 दिन से उपर हो गये शाहीन बाग आंदोलन के चलते कई प्रश्न एक साथ उठ खड़े हुएँ  हैं। ये प्रश्न एक दिशा में न उठकर समस्त प्रभावित व अप्रभावित पक्षों के सामने उठ रहे हैं। ‘‘आंदोलन’’ से उत्पन्न सामान्यतः निम्न प्रश्न जेहन में आ रहे हैं, जिनका निराकरण किया जाना जरूरी है। 
नम्बर एक आंदोलनकारियों की नजर में बिना प्रशासनिक अनुमति के शांतिपूर्ण आंदोलन कब तक चलाया जाना चाहिये, चलाया जायेगा, या चलाया जा सकता है? दूसरा जनता की नजर में आंदोलन के माध्यम से घटना व चक्का जाम करके क्या आस-पास के प्रभावित रहवासी नागरिकों की सुविधाएँं, मूल अधिकारों व मानवाधिकारों को रोका जा सकता है? व कब तक? नम्बर तीन उच्चतम न्यायालय की नजर में आंदोलन चलाना यद्यपि एक वैधानिक अधिकार तो है, परन्तु उसे असीमित अवधि तक नहीं चलाया जा सकता तथा आंदोलन से अन्य जनता को कोई असुविधा / कष्ट भी नहीं होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय का वर्तमान हस्तक्षेप व ऐसी व्याख्या (आंदोलन के प्रति) क्या उचित है व उनके अधिकार क्षेत्र में है? शासन की नजर में बगैर अनुमति चल रहे आंदोलन के प्रति वह कब तक उनसे कोई वाद-संवाद स्थापित किये बिना मूक दर्शक बने रह सकेगा? विपक्ष की नजर में संसद द्वारा वैधानिक रीति से पूर्ण बहुमत द्वारा सीएए कानून के पारित हो चुकने के तत्काल बाद उसके विरोध में क्या जनतात्रिंक रूप से आंदोलन चलाया जा सकता है? और अंत में एक नागरिक की हैसियत से, एक नागरिक की नजर में समस्त सम्बन्धित पक्षों द्वारा शाहीन बाग में जो तमाशा किया जा रहा है, और आवश्यक कार्यवाही कर सकने वाले अधिकार प्राप्त समस्त पक्षकार तमाशबीन होकर रह रहे है, ऐसी स्थिति में नागरिक मूक दर्शक होकर कब तक भुगतता रहे। लगता है इन सब प्रश्नों के जवाब और प्रति जवाब में ही, न केवल शाहीन बाग की समस्या का हल निहित है, वनण आंदोलन की समस्या का हल भी संभव हो सकता है।
यह समझ से परे है। जब कोई भी व्यक्तियों का समूह, संस्थाएं या राजनैतिक दल किसी भी मुद्दे को लेकर आंदोलन करना चाहते हैं तो, उन्हे आंदोलन करने के लिए विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में  ‘‘क्या अनुमति’’ की आवश्यकता है? क्या संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के तहत संवैधानिक सीमा में  रहते हुये, शांतिपूर्ण आंदोलन का अधिकार नागरिकों को नहीं है? यह एक बड़ी बहस का प्रश्न है? इसके लिए आपको सबसे पहले यह समझना होगा कि आखिर आंदोलन है क्या? आंदोलन की आवश्यकता क्यों पड़ती है? आंदोलन का मतलब क्या होता है? जब संवैधानिक रूप से चुनी गई सरकार जनादेश के विपरीत, जनता की आकांक्षाओ व हितो के विपरीत कोई कार्य करती है, शासन चलाती है और ऐसे किसी भी मुद्दे पर अन्य समस्त तरीकों (बातचीत, ज्ञापन या संवाद के माध्यम) से प्रस्तुत किये गये विरोधों को जब सरकार नहीं सुनती है, तभी आंदोलन की उत्पत्ति होती है। आंदोलन का मकसद होता है, समूह का एक जगह एकत्रित होकर किसी मुद्दे पर सरकार का प्रभावी रूप से ध्यान आकर्षित करना, ताकि मजबूर होकर सरकार उस समस्या के निदान हेतु कार्यवाही करे। ‘‘आंदोलन’’ संगठित सत्त्ता तंत्र या व्यवस्था द्वारा शोषण और अन्याय किए जाने के बोध से उसके खिलाफ पैदा हुआ संगठित और सुनियोजित अथवा स्वतः स्फूर्त सामूहिक संघर्ष है। किन्तु ‘‘संघर्ष और ‘‘आंदोलन’’ एक चीज नहीं है। 
लोकतांत्रिक देश में चुनी हुई सरकार का ही यह दायित्व होता है कि वह अपने देश, क्षेत्र के नागरिकों के हित में सुुशासन, कल्याण, प्रगति, समृद्धि हेतु यथा संभव समस्त कार्य करे, शासन चलाये। ऐसा होने पर  शायद आंदोलन की आवश्यकता ही नहीं पडे़गी। लेकिन विद्यमान राजनैतिक परिस्थितियों के रहते एवं आज के राजनेताओं के ‘‘प्रचंड गुणों’’ के तहत आज की राजनीति में ऐसी आदर्ष स्थिति संभव नहीं है। इसीलिए आंदोलन हो रहे है। प्रायः यह अनुभव में आया है कि जब तक सरकारी कर्मचारियों से लेकर आम जन की दिनचर्या में कोई रूकावट न डाली जाये तब तक सरकार का ध्यान उस मुददे पर जाता ही नहीं है। अतः यह समझाना कि आंदोलन से आम जनता से लेकर शासकीय सेवकांे तक को तकलीफ होती है व शासकीय कार्य में अवरोध होता है इसलिए ऐसे आंदोलन नहीं करना चाहिए, गलत है। इसका मतलब तो यह होगा कि आंदोलन करना ही नहीं चाहिए। इसलिये आंदोलन तथा सहमति व सुविधा शब्दों का परस्पर कोई तालमेल नहीं है। क्योंकि आंदोलन का मूलतत्व ही विरोध व दबाव की भावना होती है। 
निश्चित रूप से शांतिपूर्ण आंदोलन ही संवैधानिक व्यवस्था होती है। कानून का शांतिपूर्ण तरीके से उल्लघंन ही संवैधानिक आंदोलन है, जैसे 4 से ज्यादा एकत्रित होकर धारा 144 का उल्लघंन करना। लेकिन हंसी तब आती है, जब ‘‘आंदोलन’’ के लिये सरकार-प्रशासन से अनुमति लेने की बात की जाती है, फिर वह आंदोलन कैसा? सरकार से अनुमति ही लेना है, तो वह सरकार जिसके द्वारा मांगो पर विचार न करने के कारण ही आंदोलन की स्थिति बनती है, अनुमति क्यों कर देगी? कई बार तो सरकार उसके लिए चर्चा करने को भी उचित नहीं समझती है। ऐसे में सहमति प्राप्त आंदोलन एक ढकोसला मात्र बन कर रह जावेगा। यह बात जरूरी है, कि आंदोलन करने के पूर्व सरकार को निश्चित समय सीमा के भीतर कार्यवाही करने की चेतावनी जरूर देनी चाहिए, ताकि सरकार को उस विषय पर विचार कर के कार्यवाही करने का पर्याप्त अवसर मिल सकें। 
हमने तो यह भी देखा है कि संसद में कानूनी रीति से सीएए विधेयक पारित होने के तुरंत बाद ही उसके विरोध में आंदोलन हो रहा है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक पार्टी के द्वारा जबरदस्त बहुमत से चुनाव जीतने के बाद भी दूसरे दिन से ही विरोधी पक्ष उसकी सरकार का विरोध करना प्रांरभ कर देते है। क्या यह कदम अतिश्योक्ति पूर्ण नहीं कहलायेगा? मतलब साफ है! इसे जनादेश का अपमान कहंे या यह कहें कि पांच साल के लिए प्राप्त जनादेश के सम्मान की कोई न्यूनतम समय सीमा हमारे लोकतंत्र में न तो अब तक रखी गई और न ही व्यवहार में पाई जाती है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को लगातार तीसरी बार (तीन चौथाई) बहुमत मिलने के बावजूद भगवान हनुमानजी के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा उनको घेरने का प्रयास करना जनादेश के अपमान का एक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने है।  
‘आंदोलन’ करने के कई स्वरूप है। धरना, प्रर्दशन, जुलूस, रैली, सांकेतिक हडताल, कलम बंद हड़ताल कम्रिक हड़ताल, अनिश्चित कालीन हड़ताल, भूख हड़ताल, आमरण अनशन, चक्काजाम, रेल-बस रोको आंदोलन, भारत या प्रदेश बंद, मौन व्रत आदि-आदि। आपको याद होगा वर्ष 1974 में जार्ज फर्नाडीज के नेतृत्व में ऑल इण्डिया रेलवे फेडरेशन द्वारा रेल रोकने के देशव्यापी आंदोलन के कारण पूरे देश में हाहाकर मच गया था। इससे आम नागरिकों को कितनी तकलीफ हुई थी, तब उस आंदोलन की तत्कालीन विपक्ष जो वर्तमान में सत्तापक्ष है ने आलोचना क्यों नहीं की थी। हमारे देश में तो नियमानुसार कार्य करने को भी आंदोलन कहा जाता है। मतलब साफ है, शासन चलाने में जब आप कोई अवरोध पैदा कर शासक व नागरिकों को पिन चुभायेगें तो ही आंदोलन का अस्तित्व महसूस होगा। आंदोलन राजनीतिक सुधारों या परिवर्तन की आकांक्षा के अलावा सामाजिक, धार्मिक, पर्यावरणीय या सांस्कृतिक लक्ष्यों की प्राप्ती के लिए भी चलाया जाता है। उदाहरणस्वरूप चिपको आंदोलन पेड़ों की रक्षा के लिए चलाया गया आंदोलन था। 
यदि हम जनता व सरकार को आंदोलन से होने वाली तकलीफो को ध्यान में रखते हुये आंदोलन की रूपरेखा बनायेगें तो फिर आपको अपने घर या संस्था के आफिस कम्पाउड़ से ही आंदोलन करना होगा। तभी किसी भी नागरिक को तकलीफ नहीं होगी। लेकिन क्या तब वह आंदोलन रह जायेगा (जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये किया जा रहा है) प्रश्न यह है। किसी भी सरकार को आंदोलन से निपटने के लिये समस्त कानूनी व संवैधानिक हथियार प्राप्त है, जिसका उपयोग करके वह आंदोलन से उत्पन्न जनता-कर्मचारियों को होने वाली असुविधाओं से बचा सकती है। लेकिन आंदोलनकारियों से स्वयं यह अपेक्षा करना क्या उचित होगा? यह आंदोलन की मूल व प्रभावी भावना को समाप्त करने जैसे ही होगा। यह कहावत तो आपने सुनी ही है कि ‘‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा’’ तथा ‘‘जब तक बच्चा  रोयेगा नहीं माँ दूध नहीं पिलायेगी।’’ उदाहरण स्वरूप मणीपुर की इरोम शर्मिला के 15 साल से ज्यादा भूख हड़ताल पर ‘आफ्स्पा’ कानून के विरोध में बैठने के बावजूद सरकार के कान में ‘जू’ तक नहीं रेगीं। आंदोलन में उपरोक्त भाव ही निहित है। 
अन्त में शाहीन बाग जैसे आन्दोलनों को हल करके जनता की तकलीफें दूर करने का एक उपाय यह समझ में आता है कि अनजान, अनभिज्ञ बच्चो व बूढी दादी-नानी को जिन्होनें वहॉ बैठाया तथा जो उनके खाने, पीने, सोने, जीने इत्यादि का प्रबन्ध कर रहे है जैसा कि भाजपा व सरकार के कुछ नुमाइंदो आरोप लगा रहे है, उन सबको सीधे जेल में क्यो नही डाल दिया जाता है? “फन्ड बन्द, तो आन्दोलन बन्द।“ लेकिन केन्द्रीय सरकार जिसकी सीधे जिम्मेदारी है के स्तर पर कोई भी कार्यवाही न करना (दिल्ली चुनाव सम्पन्न हो जाने भी हो जाने के बाद भी) सातवे आष्चर्य के समान ही है, क्योकिं इसके पूर्व देष के किसी भी मांग में हुये आंदोलन का केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार ने सफलतापूर्वक सामना कमोबेष कर हल निकाला है। फिर यहॉ बेरूखी क्यों? इसके क्या यह इंगित नहीं होता है कि भारतीय दंड संहिता एवं दंड प्रक्रिया में आंदोलन शब्द को परिभाषित करके तथा उसमें अन्य विधा जोडकर भविष्य में उसे संज्ञेय अपराध बना दिया जा सकता है।

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

काश! आज ‘टीएन शेषन’ होते तो शायद दिल्ली चुनाव में ‘यह सब’ नहीं हो पाता!

दिल्ली प्रदेश (?) विधानसभा के चुनाव हो रहे है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। दिल्ली देश की राजधानी होने के कारण अभी तक उसे वैसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सका है, जैसे अन्य राज्यों को मिला है। परिस्थितियों वश उसे पूर्ण राज्य व केन्द्रशासित प्रदेश के बीच की स्थिति में ही रखा गया है। शुरू-शुरू में यहां पर मुख्य कार्यकारी परिषद हुआ करती थी। यदि दिल्ली की मुम्बई से तुलना करे तो दोनों में ज्यादा फर्क नहीं है। वृहन् मुम्बई में महानगर पालिका (बीएम
सी) के द्वारा शासन चलाया जा रहा है। मुम्बई में महानगर पालिका वार्ड का सदस्य पार्षद कहलाता है, जबकि दिल्ली में पुराने वार्ड अब विधानसभा क्षेत्र बना दिए गए है, जहां के पार्षद ही बदली व्यवस्था के तहत विधायक कहलाते है। शायद इन्ही कारणों से केन्द्र में भाजपा के शासन के साथ दिल्ली जो देश की राजधानी होने के कारण केन्द्र बिन्दु है विधानसभा में जहां भाजपा के पिछले 20 वर्षो से भी ज्यादा समय से शासन से वंचित रहने के कारण, भाजपा द्वारा इस चुनाव को नाक के बाल बना लेने के परिणाम स्वरूप ही यह चुनाव परस्पर प्रतिद्वंवदता की चरम सीमा तक पहंुचते दिख रहा हैं।
याद कीजिए, टीएन शेषन की कार्यप्रणाली को, जिसके फलस्वरूप वे भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ गये है। शेषन के कार्यकाल के पूर्व, चुनाव जिस अव्यवस्थता के साथ धन व बाहुबल के आधीन हुआ करते थे, मतदाता उसके अभ्यस्त हो चुके थे। स्वच्छ व निष्पक्ष चुनाव के लिये आवश्यक कानूनी प्रावधान व आचार संहिता किताबों में तो थी, लेकिन धरातल पर वास्तविक रूप में वह कभी नहीं उतर पायी। टीएन शेषन  देश के ऐसे सर्वप्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जिन्होंने आते ही पहली बार चुनावी व्यवस्था में कई प्रभावी ऐतिहासिक व्यवस्थात्मक सुधार कर इतिहास में अपने को अमिट कर गये। मुख्यतः इस कारण ही चुनाव आयोग के अस्तित्व को नागरिकों ने पहली बार वास्तविक रूप में महसूस किया। उन्होंने सरकारी भवनों पर प्रचार प्रसार पर प्रतिबंध लगाया। रोड़ पार कर बैनर नहीं लगा सकते तथा जुलूस में शामिल होने वाले व्यक्तियों व वाहनों की सीमा निश्चित की इत्यादि इत्यादि। निजी सम्पत्तियों पर भी बिना अनुमति के प्रचार की मनाही कर दी गई। समस्त चुनावी खर्चों को पारदर्शी बनाने तथा सीमित कर सकने के उद्देश्य से व्यय का हिसाब रखना बंधनकारी बनाया गया। चुनाव खर्चों के नगद भुगतान की सीमा बांध दी गई व उसकी जांच के लिये एक एकाउट ऑफिसर की पृथक से नियुक्ति की गई। प्रचार प्रसार की समय सीमा भी तय की गई। पैसे बांटनें व बूथों को लूटने से रोक के लिये समुचित प्रभावी व्यवस्था की गई। ये सब प्रतिबंध न केवल लगाए गए वरण उन सबको अपेक्षित पूर्ण कठोरता के साथ सफलता पूर्वक लागू भी कराया गया। इससे भी बड़़ी बात यह रही कि उपरोक्त समस्त सुधार तत्समय प्रचलित चुनाव कानून व आचार संहिता के चलते ही किये गये। शेषन को चुनावी नियम में संशोधन की कतई आवश्यकता नहीं पड़ी। उन्होंने अपने कार्यकलापों व कार्यप्रणाली के द्वारा यह सिद्ध कर दिया था कि, यदि व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों के प्रति ईमानदार है, व उसकी कार्य सम्पन्न करने/कराने की दृढ़ इच्छाशक्ति रहे तो, वह वर्तमान प्रचलित कानूनों को ही कड़ाई से व सच्ची भावना से लागू करके स्वच्छ, निष्पक्ष व सस्ते चुनाव सफलतापूर्वक करवा सकता है। अन्यथा कानून में कड़क संशोधन कर देने के बावजूद इच्छाशक्ति के अभाव में सुधार लाना संभव नहीं है। यह उनकी कार्यशैली का ही खौंफ था कि उस समय एक मजाक बड़ा प्रचलित था, भारतीय राजनीति सिर्फ दो नाम से ही ड़रते है, एक खुदा और दूसरे टीएन शेषन से। इसीलिये वे ‘‘अल्सेशियन’’ भी कहलाए, क्योंकि उन्होंने कहा ‘‘आई ईट पालिटीशियसं फॉर ब्रेक फास्ट’’।  
इसीलिए अब दिल्ली में हो रहे ताजा विधानसभा चुनाव में उत्पन्न विशिष्ट विकट विकृत परिस्थितियों ने शेषन की याद को एकदम ताजा कर दिया है। सभी पार्टियों द्वारा परस्पर प्रतिद्वन्दियों के प्रति जिस तरह के अपशब्दों, गालियो,ं द्विअथी मुहावरों का इन चुनावों में बेरोकटोक बेतहाशा उपयोग हो रहा है, तथा उन अपशब्द-बाणों के द्वारा चुनाव को हिन्दु-मुस्लिम बनाया जा कर मानो लोकतंत्र की स्वच्छता, स्वतंत्रता व निष्पक्षता को ही खतरे में ड़ाल दिया गया है। दिल्ली चुनाव में जो राजनैतिक पाटियां चुनाव में भाग ले रही हैं, उनके द्वारा चुनावी दंगल में ‘‘आतंकवादी’’, ‘‘देशद्रोही’’ ‘‘पाकिस्तानी’’ और न जाने कौन-कौन से शब्दों के द्वारा अंगीकृत व अलंकीकृत किया जा रहा हैं। देशद्रोही को गोली मारो, हिन्दुस्थान-पाकिस्तान के बीच चुनाव है, शाहीन बाग में फिदाइन बम्ब तैयार किये जा रहे है, बिरयानी खिलाई जा रही है, आदि-आदि। 
गुणवक्ता (मेरिट्स) व योग्यता (परफार्मेंस) के मूल आधार पर ही जो वोट मांगे जाने चाहिए थे, वे मापदंड अब बिल्कुल ही दर किनार कर दिये गये हैं। इस पर अविलम्ब रोक लगाने की आज के समय की महतीं आवश्यकता है। इसके लिए शब्दों के ‘चुनाव’ व भाषण की समय सीमा पर प्रतिबंध लगाना अत्यावश्यक हो गया है जो कि बोलने के मूल अधिकार में प्रावधित भी (सीमित उपयुक्त प्रतिबंध) है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार शेषन ने पूर्व में आचार संहिता लागू कर कड़ाई से उसका पालन करवाया। ऐसे उपयुक्त प्रतिबंध लगा दिए जाने से इस तरह के साम्प्रदायिक भाषण व बे लगाम होती जबान-गाली-गलौज एवं बहु अर्थी व सार हीनता लिये निकृष्ट शब्दों के प्रयोग इत्यादि अनर्गल बातों पर स्वयं मेव प्रतिबंध लग जायेगा। तभी निष्पक्ष स्वच्छ व सही लोकतांत्रिक चुनाव की कल्पना को धरातल पर उतारा जा सकता है। यह कार्य अन्य कोई ‘‘शेषन‘‘ ही कर सकता है। इसीलिए शेषन को पुनः तुरन्त धरती पर उतारे जाने की आवश्यकता है।  
यद्यपि आज की राजनीति में निम्नतम स्तर से भी नीचे जाकर स्तरहीन बयानों की विवेचना/आलोचना करना समय की बरबादी ही होगी। परन्तु चुनावी राजनीति के बहाने, जीत का अंकगणित बैठाने के लिए, वोट में फायदे की संभावना को तलाशने के लिए क्या कोई भी, कुछ भी, बयान कभी भी, दें सकता है। विषेषकर कानून मंत्री व गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे हुए नेतागणों को क्या ऐसे बयान देना चाहिए, जो उनके स्वतः के ही विभाग के कर्त्तव्यों व दायित्वों की धज्जियाँ उड़ाते हुये नजर आ रहे है? क्या तथाकथित राजनैतिक फायदे की दृष्टि से इस सीमा तक बयान बाजी की जाये, जो देश की अख्ंाडता, सुरक्षा व कानूनी व्यवस्था के लिए बिलकुल भी स्वीकार्य न हो? एक तरफ तो कानून व्यवस्था के नाम पर प्रशासन आंदोलन, जुलूस, धरना व प्रदर्शन इत्यादि आयोजित करने के लिए राजनैतिक पार्टी के नेताओं को अनुमति नहीं देते हैं, वही दूसरी ओर बिना किसी वैधानिक अनुमति के लगभग 54 दिन से शाहीन बाग में यह धरना चलने दिया जा रहा है। ऐसे धरने से उस इलाके के लोगों के मूलभूत अधिकारांे का हनन-खनन व अंग-भंग हो रहा है जिस पर समस्त पक्ष दल नेता कार्यकर्ता आदि आश्चर्य जनक रूप से लगभग मौन है। 
भाजपा के गृहमंत्री की आंखों के सामने शाहीन बाग एक विचार धारा बनाई/बनते जा रही है, ऐसे बयान सम्पूर्ण भाजपा नेतृत्व द्वारा लगातार दिये जा रहे है। लेकिन उसे रोकने से लेकर हटाने तक का कोई भी सार्थक प्रयास आज तक केन्द्र सरकार द्वारा क्यो नहीं किया गया? इस प्रश्न का जवाब तो स्वयं अमित शाह को ही देना होगा, जिन्होंने स्वतः भी ऐसा ही प्रश्न उठाया है। 
दिल्ली के सांसद प्रवेश वर्मा ने अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी कहा है। इसे केजरीवाल ने बड़ा भावनात्मक मुद्दा बनाने की कोषिष की है। उन्होंने कहा “मैं दिल्ली का बेटा हूं और मुझे भाजपा आतंकवादी बता रहे“ है। परन्तु केजरीवाल यह तथ्य भूल गये कि एक समय उन्होने स्वयं के लिये ही कहा था “हाँ मैं आराजकतावादी हूँ“। यहाँ नोट करना जरूरी है कि आराजकतावादी व आतंकवादी मंें 19-20 का ही तो अंतर होता हैं। 
इस तरह के बयानों व गैर वैधानिक-कानूनी आंदोलन को रोकने के लिये चुनाव आयोग द्वारा कोई पहल न करने की अर्क्रमण्यता ने ही दिल्ली के समस्त नागरिकों को शेषन को ‘ऊपर’ से धरती पर बुलाने की प्रार्थना करने के लिये मजबूर अवश्य किया होगा। काश! चुनाव आयोग की आत्मा में अभी भी कोई शेषन पैदा हो जाए। वैसे कुछ-कुछ इंगित तो अवश्य हो रहा था, जब चुनाव आयुक्त ने गोली चलाने वाले आरोपी की पूरी जांच किये बिना ही उसके आम पार्टी से तथाकथित संबंध को सार्वजनिक करने के गलत कदम पर डी.सी.पी. राजेश देव के खिलाफ कार्यवाही कर उन्हे हटा दिया, जो यथार्थ में एक स्वागत योग्य कदम हो सकता था। लेकिन योगी के 1 फरवरी के अरावल नगर की रैली में दिये बयान पर 6 तारीख को नोटिस जारी कर चुनाव प्रचार समाप्त होने के बाद 7 तारीख को जवाब मांगना, क्या चुनाव आयोग द्वारा ही आचार संहिता का वैधानिक रूप से मजाक नहीं बनाया जा रहा है? स्पष्ट है, दिल्ली के इस चुनावी संग्राम में चुनाव आयोग के ठीक नाक के नीचे वह अपनी नाक बचाने में असफल रहा है। याद कीजिए! टीएन शेषन के उस शख्त रूख को जिसके चलते तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद का अपने पुत्र के पक्ष में चुनाव प्रचार करने के कारण पद से इस्तीफा देना पड़ा था।  

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