गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

आखिर! ‘न्याय’-‘इंसाफ’! इंसानियत एवं ‘न्यायप्रिय’ तरीके से ‘कैसे’ व ‘कब’ मिलेगा। ‘‘जन भावनाओं’’ से ‘‘न्याय व्यवस्था’’ नहीं ‘‘लोकतंत्र’’ चलता है।

6 दिसम्बर सुबह जैसे ही टीव्ही पर हैदराबाद की रेप पीडि़ता ‘‘दिशा’’ की वीभत्स हत्या के चारों अभियुक्तों के एनकाउंटर में मारे जाने की खबर आयी, लगभग पूरे देश में एक अजीब सी खुशी का माहौल पसर गया। तब से चारांे तरफ अधिकांश खुशी ही खुशी व्यक्त करते हुये एक ही आवाज आ रही है कि ‘‘इंसाफ’’ मिल गया है। देश में विद्यमान राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुये, ऐसे बहुत कम अवसर आये है, जब युद्ध को छोड़कर किसी अन्य मुद्दे/घटना पर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, प्रशंसा के स्वर लिये हुये सहमति की एकमतता सी दिख रही हो।  
हैदराबाद पुलिस पर पिछले नौ दिनों से प्रश्नचिन्ह व तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर.आर. के द्वारा वीभत्स घटना पर 3 दिन बाद देरी से दी गई प्रतिक्रिया पर तंज करने वाले लोग भी एनकाउंटर के बाद अब उनके प्रशंसक बन गये हैं। बच्चों से लेकर बूढे़ं तक, मानवाधिकारों के कुछ पैरोकारों से लेकर विभिन्न राजनैतिक दल के नेतागण और विधानसभा व संसद में कानून बनाने वाले सांसद, विधायकगण तक प्रायः सभी पुलिस बल को शाबासी दे रहे है। उनकी तारीफों के कसीदे गढ़े जा रहे हैं, उनका जिंदाबाद कर रहे है, अभिनंदन किया जा रहा है, धन्यवाद कहा जा रहा है, उन पर फूल बरसायें जा रहे हैं आदि इत्यादि। इतना ही नहीं, हैदराबाद पुलिस के इस कृत्य को माडल बनाकर अन्य प्रदेशों के पुलिस बल को ऐसे ही कार्य करने हेतु उत्प्रेरित करने के उद्देश्य से परोसा भी जा रहा है।इस प्रकार एक संवैधानिक, वैधानिक, कानूनी प्रक्रिया को पूरा किये बिना, जनता के मॉब लिचिंग (जिस पर उच्चतम न्यायालय पूर्व में अपनी कड़ी नाराजगी भी दर्ज कर चुका है) के कृत्य के समान ही एनकाउंटर की इस घटना को कही कानूनी जामा पहनाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है? अभी तक जिन हाथों को कानून से बंधा हुआ कहा जाता रहा है, उन्हे कानूनी बंधन से पूर्णतः मुक्त कर दोनों हाथों ंसे ताली बजाकर जिंदाबाद के नारे लगाये जा रहे हैं। वर्तमान आपराधिक न्याय व्यवस्था के अंतर्गत हमेशा प्रश्नों में रहने वाली आज की पुलिस की जांच व्यवस्था व कार्यप्रणाली तथा न्याय देने के लिये लम्बा समय खपाने वाली कानूनी व्यवस्था सउत्पन्न घोेर निराशा, जो लम्बे समय से चली आ रही है, के चलते अचानक की गई उक्त त्वरित कार्यवाही (तथाकथित न्याय) से उत्पन्न प्राप्त खुशी का इजहार, क्या वर्तमान व्यवस्था पर यह एक चोट, पूर्णतः अविश्वास व उसका नकारापन नहीं है?आगे इस विश्लेषण को बढ़ाने के पूर्व हुयी एनकाउंटर की चर्चा कर लंे। निश्चित रूप से एनकाउंटर  पुलिस बल का आत्मसुरक्षा का वह अधिकार है, जिस प्रकार देश के प्रत्येक नागरिक (व्यक्ति) को धारा 96 भारदीय दंड संहिता के अंतर्गत कानूनी रूप से आत्म-सुरक्षा का अधिकार प्राप्त होता है। एनकाउंटर तभी सही ठहराया जा सकता है, जब पुलिस पार्टी की स्वयं की जान पर खतरा इतना हो जाये कि आरोपियो को मारे बिना स्वयं की ही जान बच नहीं पायेगी। प्रश्न फिर वही है? क्या इस प्रकार से अंजाम दिया गया एनकाउंटर भी पुलिस पार्टी की आत्मरक्षा के अधिकार की परिधि में आने के कारण उनके कर्तव्य बोध को ही प्रदर्शित कर रहा है? एनकाउंटर की एक निश्चित प्रक्रिया है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने काफी समय पूर्व ही दिये अपने एक निर्णय में निश्चित की हुई है। तदनुसार मजिस्ट्रियल, मानवाधिकार आयोग तथा सीबीआई भी उक्त प्रकरण की सीधे जांच करेगी। पुलिस पार्टी को विभिन्न जांच एजेंसीयों को सैकड़ो प्रश्नों का जवाब प्रथम दृष्टया (संभावित) अभियुक्तों के समान देना होगा। अपने जवाब व साक्ष्य से समस्त जांच एजेंसीयों को संतुष्ट करना होगा। तभी पुलिस बल अपने को निर्दोष सिद्ध कर पायेगें। पहले भी एनकाउंटर में हुई हत्या के कई मामलों में पुलिस बल पर जांच के बाद हत्या के मुकदमे चले हैं, व चल रहें है।पुलिस ने तुरंत पत्रकार वार्ता न करके सायं 3.30 बजे के बाद पत्रकार वार्ता (जिस देरी पर प्रश्नचिन्ह लगना लाजमी भी है) द्वारा एनकाउंटर की घटनाक्रम का सिलसिलेवार विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। फिर भी, एनकाउंटर की इस घटना पर कुछ सवाल तो अवश्य उठते हैं। पुलिस पार्टी द्वारा घटना का ‘‘रीक्रियेशन’’ (जो उनका अधिकार एवं दायित्व भी है) इतनी भोर सुबह (3.30 बजे के लगभग) करना क्या अति आवश्यक था। यद्यपि पुलिस के पास यह मजबूत तर्क है कि पूर्व में अभियुक्तों को दिन में न्यायालय में ले जाते समय जन भावना भड़की थी। दूसरा एक अभियुक्त के हाथ में लाठी थी, वह कैसे और कहां से आई? क्योंकि पुलिस का यह कथन है कि एक अभियुक्त ने फोर्स से पिस्टल छीनी (लाठी नहीं)। क्या अभियुक्तों द्वारा प्रयोग किया गया बल पुलिस बल के जीवन के लिए इतना घातक था कि उन्हे ढ़ेर करने के अलावा कोई अन्य विकल्प ही नहीं बचा था? यदि अभियुक्त भाग रहे थे, जैसा कि दावा किया गया है, तो कमर के नीचे गोली क्यों नहीं मारी गई? क्या चारों अभियुक्तों में से किसी को भी कमर के नीचे एक भी गोली लगी? पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही सही स्थिति स्पष्ट होगी। तीसरा आज की परिस्थितियों में समस्त आरोपो से बचने के लिए सामान्यतः विडियों रिकार्डिंग की जाती है, जो शायद नहीं की गई, क्यों?यह एनकाउंटर नहीं था। सामान्यतः एनकाउंटर में आमने-सामने मुठभेड़ होती हैं। यहां तो आरोपीगण जिन्हे पुलिस द्वारा न्यायिक अभिरक्षा से पुलिस अभिरक्षा में लिया गया था, जिसकी सुरक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी पुलिस बल की ही थी। तब जहां पुलिस बल को समस्त आवश्यक सुरक्षा बरतनी चाहिए थी, वह क्यो नहीं बरती गई? पुलिस कस्टडी में अभियुक्त / आरोपी पर मुकदमा चलने के बाद अपराध सिध्द होने के बाद ही वे अपराधी कहलाते हैै और हमारी न्यायव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिध्दांत यह भी है कि कोई दोषी भले ही छूट जाये लेकिन निर्दोष को सजा न हो। ऐसी अवस्था में प्रश्न यह किया जा सकता है कि यह एनकाउंटर न होकर काउटिंग (गिनकर)  मार गिराने की घटना तो नही है? पुलिस कस्टड़ी में पुलिस द्वारा एनकाउंटर का शायद यह पहला उदाहरण है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि यदि यह एनकाउंटर सही है, जैसा कि पूरा देश भी प्रायः मान रहा है। तब हमारे देश की विद्यमान कानून  पुलिस व न्यायपालिका के ढ़ाचे व कार्यप्रणाली कोे देखते हुये उक्त जघन्य घटना के के अभियुक्तों को (जिन्हे अभी अपराधी भी मान ले) तोे इतनी जल्दी फांसी नहीं मिल सकती थी, आज उत्पन्न खुशी का तत्कालिक कारण शायद यही है। लेकिन इसे मात्र ‘‘एक अपवाद माना जाय’’ ऐसा किसी भी प्रंशसक ने क्यो नहीं कहा? जनमानष की यह दशा देश की चिंताजनक वीभत्स स्थिति की ओर इंगित करती है। प्रायः प्रत्येक व्यवस्था में अपवाद अवश्य होते है। इस घटना को अपवाद मानकर भविष्य के लिये इससे सबक लेकर व्यवस्था (सिस्टम) की कमियों में आमूलचूल परिर्वतन करें, तभी यह अपवाद प्रेरक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि अपवाद बार-बार नहीं होते है।आज के पढे लिखे युग में संवैधानिक रूप से परिपक्व अपने लोकतांत्रिक देश में क्या इस तरह न्यायार्पण की प्रक्रिया को स्वीकार कर सकते है? हमारी सोच व बौद्धिक स्थिति किस स्तर पर पहुच गयी है, जहां संवैधानिक व्यवस्था के तहत एक निश्चित समय सीमा में न्याय न कर पाने की असफलता के कारण अभियुक्त (अपराधी नहीं) को एक गैर कानूनी तरीके से न्याय प्रदान करना, क्या भविष्य के लिये यह खतरे की घटीं नहीं है? तब क्या एनकाउंटर द्वारा सजा देने को कानून का भाग बना नहीं देना चाहिए? यदि वास्तव में जांच पश्चात एनकाउंटर सही भी पाया जाता है तो भी, इसे पुलिस की आत्मरक्षा का कार्य माना जावेगा। पुलिस का कार्य न्याय देना नहीं वरण अपराध की गहरी विवेचना व जांच कर सत्य को न्यायालय के सामने लाकर अभियुक्त को “सजा देना नहीं दिलाना“ है। अभियुक्तों को दंड देने का यह तरीका सभ्य समाज में नहीं हो सकता है, जैसा कि जन भावनाओं से व्यक्त हो रहा है। जन भावनाओं से न्याय व्यवस्था नहीं बल्कि लोकतंत्र चलता है, वह भी संवैधानिक सीमा के भीतर। इस मामले में मेनका गांधी का यह बयान काफी सामयिकी है कि घटना को इस तरह अंजाम देने से देश में गुंड़ाराज आ जायेगा।एनकाउंटर की घटना के तुरंत बाद अवाम में जो त्वरित प्रतिक्रिया हुई हैं, उसे हम यदि देश की आवाज-मांग व भावना माने-समझें यदि हमें एनकाउंटर को संवैधानिक जामा नहीं पहनाना है, तो फिर ऐसी पुर्नावृत्ति को रोकने के लिये बलात्कार के बाद हत्या जैसे घृणित अपराध को सजा के अंजाम तक पहुंचाने के लिये अल्प समय की अधिकतम सीमा 30 से 60 दिन जिसमें अभियुक्त का ट्रायल (मुकदमें) से लेकर अंतिम अपील उच्चतम न्यायालय व दया याचिका का निर्णय करने का समय भी शामिल हो, निश्चित कर अपराधी को फांसी पर लटका देने हेतु कानून बनाना अब समय की उत्कृष्ट मांग है। देश की न्यायप्रणाली का आधार भी यही है कि न्याय में देरी न्याय में अन्याय  है। तभी शायद इस तरह केे एनकाउंटर नहीं होगें व देश का अवाम भी कानून व नियम का पालन करता रहेगा, दिखेगा। अन्यथा पुलिस एनकाउंटर व मॉब लिचिंग में अंतर क्या रह जायेगा। राष्ट्रपति की भी क्षमा याचना पर निर्णय देने की की समय सीमा तय करने की आवश्यकता है, जो अभी तक नहीं हैं। अभी भी सजायाफ्ता का अंतिम निर्णय हो जाने के बावजूद राष्ट्रपति के पास कई क्षमा याचिकाएँ काफी समय से लम्बित हैं। राष्ट्रपति का उक्त घटना के बाद आया हालिया बयान अपूर्ण है, जहां उन्होंने केवल पास्को अधिनियम के अंतर्गत क्षमा याचिका के प्रावधान को समाप्त करने का सुझाव दिया है।कानूनन् धारा 164 के अंतर्गत मजिस्टेªट के समक्ष गवाहों द्वारा दिये गये बयानों को स्वीकृत साक्ष्य माना जाता है। तब धारा 164 का क्षेत्राधिकार बढ़ाकर पुलिस के समक्ष अपराध को स्वीकार करने वाले अभियुक्त के दिये गये बयान को मजिस्टेªट के समक्ष लेकर, उसे ही अंतिम ( पूर्ण ) मानकर उसे क्यों सजायाफ्ता घोषित न कर दिया जाय? ऐसा संशोधन करके न्याय तंत्र का काफी समय बच सकता है। वैसे भी ब्रिटिश शासन के जमाने का वर्ष 1861 का पुलिस अधिनियम व भारतीय दंड संहिता वर्ष 1860 में आमूलचूल परिर्वतन कर पुलिस की जांच प्रक्रिया व अपराध को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार परिभाषित कर कानून बदल लेना चाहिये।एक बात और! कानून के द्वारा ड़र-दहशत व बदले की भावना की “सत्ता“ स्थापित कर क्या ऐसे बदषी अपराधों को रोका जा सकता है? शायद नहीं। याद कीजिये! निर्भया कांड के बाद कितने नये कड़क कानून बनाये व वर्तमान कानून में कितने नये कड़क प्रावधान किये गये, लेकिन फिर भी एक के बाद एक निर्भया कांड होते जा रहे है। इसलिए कड़क कानून व कड़क सजा के साथ-साथ सजा देने के तरीके को भी घटना की वीभत्सता के अनुरूप ही वीभत्स बनाना होगां। तब शायद अपराधी के मन मेें सजा के तरीके का खौफ पैदा हो सकता है, जो शायद उसे अपराध करने से रोक सकता है। इन सब सुझावों के साथ यदि वास्तव में ऐसे घृणित अपराधो को रोकना है तो, लोगों की घृणित व विकृत मानसिकता खासकर महिलाओं के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदलने के लिये लगातार नैतिक शिक्षा की एक पीरियेड छात्रों सहित नागरिकों को पढ़ाना होगा, पढना होगा।अन्त में वैसे क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि ‘‘बापू’’ के देश में जब “महात्मा गांधी“ की 150 वीं जयंती मनाई जा रही है, जिन्होने साध्य व साधन दोनो की पवित्रता व नैतिकता पर पूर्ण जोर दिया है (जो उनकी ‘‘अंहिसा’’ के बाद एक बड़ी पहचान है) वहां आज साधन की नैतिकता को इस एनकाउंटर द्वारा सिरे से नकार दिया गया है। क्या इस पर भी हमें गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता नहीं है?    x

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

आखिर ‘‘संविधान’’ ‘‘नैतिक’’ कब होगा?

आपको प्रश्न का ‘‘शीर्षक’’ पढ़ने पर थोड़ा आश्चर्य अवश्य होना चाहिए। आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उत्पन्न होगा कि क्या हमारा संविधान नैतिक नहीं है? अनैतिक है? यह प्रश्न आज स्वभाविक रूप से हाल ही में महाराष्ट्र में हुई सत्ता आरूढ़ की घटना ने पुनः जाग्रत कर दिया है। हाल ही में 26 नवम्बर को हमने संविधान दिवस मनाया है, जिस कारण से यह घटना ज्यादा ज्वलंत मुद्दा बन गई है। निश्चित रूप से 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू हुआ था। तत्समय डॉ. भीमराव अम्बेड़कर सहित संविधान सभा के समस्त सदस्यों के मन में संविधान और नैतिकता दो-दो पृथक पहलू नहीं ही थे। मतलब उस समय की परिस्थितियाँ ऐसी थी, जब संविधान (विधान, कानून, नियम) व नैतिकता एक ही सिक्के के दो पहलू थे, बल्कि इसके उलट दो पहलू के एक ही सिक्के थे, कहना गलत नहीं होगा। अर्थात उस काल में न केवल संविधान पूर्ण रूप से नैतिक था, बल्कि नैतिकता भी संवैधानिक कपड़ा को ओढ़े हुये थी। प्रांरभ से ही संवैधानिक-नैतिकता या नैतिक-संविधान एक दूसरे के पर्यावाची रहे, अर्थात ये दोनों शब्द एक दूसरे में समाहित रहे थे।
स्वतत्रंता प्राप्ति के 72 साल के इतिहास में देश के चौमुखी-सर्वागीण विकास सहित लोकतंत्र व संविधान भी विकास की ओर अग्रेसित होते हुये परिपक्व हुये है। लेकिन दुर्भाग्यवश नैतिकता का जो उच्च स्तर स्वतंत्रता प्राप्ति के समय था, उसमे दुर्त गति से उसी तरह की गिरावट आई है, जिस प्रकार आज प्रदूषण में तेजी से आई गिरावट के कारण उसे दिन प्रतिदिन यंत्रो से नापना होता है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन प्रदूषण की चर्चा नहीं होती है। एक संस्कृति प्रधान व गहरी धार्मिक आस्था रखने वाले देश में ‘‘नैतिकता’’ जिस पर ही देश की आधार भूत संरचना खड़ी हुई है, का हा्रस इस तरह से होता जायेगा और हम निष्क्रिय बने रहेगें, यह कल्पना ही अकल्पनीय है। 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज तक घटित प्रमुख राजनैतिक घटनाक्रम का शैनेः शैनेः विश्लेषण कीजिए तो, आप महसूस करेगें हर बड़ी घटित राजनीतिक घटना के पश्चात मीडिया से लेकर बुद्धिजीवीओं एवं परस्पर विरोधी पक्षों द्वारा एक दूसरे पर यह आरोप लगाना एक जुमला सा बन गया है कि, ये क्रियाये-प्रक्रियायें -प्रतिक्रियायें संवैधानिक, वैधानिक, नियमानुसार व कानूनी तो है, लेकिन नैतिक नहीं है, जैसा कि अभी महाराष्ट्र में हाल में ही तेजी से घटित हुए राजनैतिक घटनाक्रम पर आयी प्रतिक्रियाओं से भी स्पष्ट है, जब पुनः यही जुमला जड़ दिया गया है। यद्यपि पूर्व में कुछ अवसरों पर ऐसी घटनाओं को असंवैधानिक भी कहा जाता रहा।  
वास्तव में आज कोई भी कार्य संवैधानिक होकर नैतिक क्यों नहीं हो सकता है? यही एक बड़ा यक्ष प्रश्न पुनः आज हम सबके सामने खड़ा है। निश्चित रूप से देश के विकास में सबसे बड़ा रोढ़ा मूल रूप से यह नैतिक पतन ही है। ‘‘नैतिकता’’ के निरतंर गिरते हुये पतन की आज की स्थिति ने आज उसके अस्तित्व को ही दाँव पर लगा दिया है। इसके दुष्परिणामों पर आगे नजर डालिये। 
इस पतन के कारण ही देश में प्रायः शांति भंग होती है, अपराध बढ़ते है, तथा आम जनता की दिनचर्या व आम कार्यो में उन्हें सामान्यतः अधिक तकलीफ उठानी पड़ती है। देश में अभी हाल में घटित कई वीभत्स बलात्कार की घटनाओं के कारण पूरे देश के क्रोधित दुखित व क्षोभ से भरा हुआ होने का कारण मात्र कानून व्यवस्था का असफल होना ही नहीं, बल्कि नैतिकता के पतन से उत्पन्न भंयकर बुरे परिणामों के ये उदाहरण मात्र है। उत्पादन व निर्माण कार्य गुणवक्ता की कमी का प्रमुख कारण, नैतिकता में आई कमी से उत्पन्न मुनाफाखोरी की प्रबल भावना ही है, जिससे खरबों रूपये देश के बर्बाद हो रहे है। इसी कारण आज संयुक्त हिन्दु परिवार टूट रहे हैं (जो देश को एकसूत्र में रखे जाने में एक रीढ़ की हड्डी सिद्ध हुये थे)। देश के स्वस्थ्य ‘‘स्वास्थ्य’’ पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में, गुरू व शिष्य के बीच मौजूद गौरवान्वित संबंधो की स्थिति आज क्या हो गई है? लाखों करोडों व्यक्तियों के परम पूज्य धर्माचारियों का स्ंिटग ऑपरेशन में फँसना किस उच्च नैतिकता को दर्शाता है? और न जाने कितने क्षेत्रों में। मतलब जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में देश के चतुर्मुखी विकास में मानक उच्च स्तर को बनाये रखने में विभिन्न अवरोधों के बने रहने का एक प्रमुख मूल कारण नैतिक मूल्यों का लगभग समाप्त हो जाना ही है। यदि एक लाईन में कहां जाए कि समस्त बुराइयों की जड़ में नैतिकता की कमी है व इसके विपरीत जहां नैतिक स्तर को बनाये रखा गया हैं वहां इसके अच्छे कार्य के रूप में परिणाम आते है। 
इसीलिए क्या आज इस बात की महती आवश्यकता नहीं है, जब भी हम संविधान में संशोधन करे, कोई कानून बनाये, अथवा नियम बनाये, तब-तब कानून का अनिवार्य रूप से पालने करने का स्पष्ट प्रावधान भी कर दिया जाना चाहिए? (जहां उसके पालन करने से इधर-उधर भागने का कोई जगह (रास्ता) ही न हो।) तब इनके उल्लंघन पर इतनी कड़क व कठोर सजा का प्रावधान किया जावें कि कोई व्यक्ति या संस्था उल्लंघन करने की कल्पना भी न कर सकें। तभी नैतिकता पर संवैधानिक कवच का असली जामा पहनाया जा सकता है। सामान्यतः संविधान के तनिक भी उल्लंघन को ही नैतिकताओं की कमी माना जाना चाहिए। यही सामान्य धारणा/अनुभूति (आभास) होना चाहिए। लेकिन आज तो संविधान का पालन करने के बावजूद भी नैतिकता का पालन करने के आरोप/ढि़ढ़ोरा लगभग हर संविधान का पालन करने के कृत्य (आदेश) के साथ पीटा जाता हैं, जिस पर ही लगाम लगाने की व इस अंतर को समाप्त करने की आज के समय की उत्कट मांग व आवश्यकता है। 
अभी हाल में ही घटित महाराष्ट्र की घटनाक्रम को समझिये! नैतिकता व संविधान! प्रधानमंत्री से लेकर पीएमओं, महामहिम राष्ट्रपति व राज्यपाल का इस पूरे घटनाक्रम में जो रोल रहा है, उस पर न केवल उनके द्वारा उठाये गये कदमों की संवैधानिकता पर ही प्रश्नचिन्ह नहीं लग रहा हैं, बल्कि नैतिकता को भी बिल्कुल ताक पर रख दिया गया है, यह आरोप भी लग रहा है। आप जानते ही है, देश में राष्ट्रपति शासन (महाराष्ट्र में) इस समय पहली बार नहीं लगा है। पूर्व में प्रत्येक बार विहित प्रक्रिया का पालन कर कैबिनेट की बैठक कर निर्णय कर राष्ट्रपति शासन लगाये गये थे। लेकिन आज यह पहली बार हुआ है कि, बगैर कैबिनेट की बैठक किये, नियम 12 के तहत विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुये, प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश राष्ट्रपति को की गई। दूसरी महत्वपूर्ण बात राष्ट्रपति ने उठकर सुबह 5.47 बजे के पूर्व (यर्थाथ कितने बजे?) प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये?चंूकि राजपत्र में यह अधिसूचना 5.47 समय पर प्रकाशित हुई है। (निश्चित रूप से उन्होने सोते हुये हस्ताक्षर नहीं किये)।
क्या भारत का ‘दुश्मन’ के साथ युद्ध छिड़ गया था? जिससे निपटने के लिये ‘‘आपातकाल’’ की अधिसूचना पर बिना एक सेंकेंड व्यर्थ व्यतीत किये, भोंर तड़के सुबह हस्ताक्षर करना अति आवश्यक था? जिस प्रकार रेल्वे, चिकित्सा इत्यादि अत्यावश्यक सेवाएँ अनवरत चलाती रहती है, महामहिम राष्ट्रपति को भी अनवरत सेवाओं में संलग्न मानकर देश के सम्मान की रक्षा के लिए अल सुबह उठाकर हस्ताक्षर कराये गये? निश्चित रूप से यह संवैधानिक तो है, लेकिन नैतिक बिल्कुल भी नहीं है। इसी संवैधानिक कार्य को नैतिक भी बनाया जा सकता था, यदि सामान्य दिनचर्या के दौरान राष्ट्रपति हस्ताक्षर करते। ठीक इसी प्रकार यदि राज्यपाल भी सामान्य कार्य समय में  हस्ताक्षर कर सीना ठोक कर दिन के उजाले मंे शपथ दिलाते, तब नैतिकता के कवच पर हथोड़ा नहीं चलता। परन्तु शायद तब राज्यपाल को देवेन्द्र फडणवीस के शपथ दिलाने का अवसर ही नहीं मिलता, क्योंकि तब तक वहीं दूसरा पक्ष अपनी संख्याबल की परेड़ कराकर राज्यपाल के समक्ष दावा ठोंक देते। 
राज्यपाल के ‘‘विवेक’’ के निर्णय पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। यह सुरक्षा उन्हे संविधान में दी गई है। सामान्यतः उनका निर्णय न्यायिक समीक्षा के परे रहता है। यद्यपि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल के निर्णय को न्यायिक समीक्षा की परिधि में माना है। प्रश्न फिर महाराष्ट्र के राज्यपाल के सम्पूर्ण आचरण को नैतिक क्यों नहीं माना जा रहा है? जिस व्यक्ति (देवेन्द्र फडणवीस) ने पूर्व में बहुमत न होने के आधार पर राज्यपाल के निमंत्रण को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर सरकार बनाने से मना कर दिया था, दावे-प्रतिदावे के बीच  उसके सरकार बनाने के किये गये पुनः दावे का बिना कोई भौतिक या अन्य तरीके से सत्यापन किये, उन्हे सरकार बनाने के लिये निमत्रंण देना क्या गिरते हुये नैतिक स्तर का नापने का एक मीटर नहीं बन गया है? इसी तरह घटित अनेक घटनाओं के बीच सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह भी रहा है कि, राजनीति के तराजू में कभी भी नैतिकता का पलड़ा संविधान के पलड़े से उपर नहंीं रह पाया। विश्व के सबसे बडे़ संविधान के सामने विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति से उत्पन्न नैतिकता को हमेशा ही झुकना पड़ा है। यह देश का नहीं, समाज का नहीं, बल्कि एक ‘व्यक्ति’ का दुर्भाग्य है, क्योंकि व्यक्ति से ही समाज व अंततः देश का निर्माण होता है। इसीलिए राजनीति के तराजू के नैतिकता के पलड़े को संविधान के पलड़े के बराबर लाने के लिये किसी कानून की आवश्यकता नहीं हैं। संविधान संशोधन या किसी नियम की आवश्यकता नहीं, बल्कि आवश्यकता है तो सिर्फ और सिर्फ प्रत्येक व्यक्ति को अपने शेष जीवन को व्यतीत करते हुये स्वतः के नैतिक स्तर को उस सीमा तक ऊपर उठाने के प्रयास की, जिस प्रकार प्रदूषण के अंक को कम करने का प्रयास अपने जीवन को बचाने के लिए कर रहा है। निश्चित रूप से तब ही हमारा देश पुनः सोने की चिडि़याँ कहला सकेगा। क्या आप हम सबका यह कर्त्तव्य नहीं है कि देश की पुनः सोने की चिडि़याँ बनाने में लग जाएं? 

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