गुरुवार, 8 अगस्त 2019

अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) समाप्त! लेकिन उपबंध (1) क्या 370 का भाग नहीं?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के इतिहास में राष्ट्रीय सुरक्षा व अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से वर्ष 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सबसे बड़ा कदम उठाकर पाकिस्तान को युद्ध में बुरी तरह से पटकनी देकर बंग्लादेश का निर्माण किया था। भारतीय सेना ने उक्त युद्ध में दो लाख से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों जिसमें सिविलियन्स, नागरिकगण व कुछ बंगाली लोग भी शामिल थे, का आत्मसमर्पण करवा कर पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। उस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिये, तबके विपक्ष के नेता भाजपाई अटल बिहारी बाजपेयी ने इंदिरा गांधी को मां दुर्गा तक की संज्ञा दी थी। 
आज गृहमंत्री अमित शाह ने बड़ा ऐतिहासिक राजनैतिक कदम उठाने के पूर्व उक्त कदम को लागू करने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पड़ने वाले प्रभाव का समुचित प्रबंध करते हुये, संविधान के अनुच्छेद (धारा) 370 (1) को छोड़कर अनुच्छेद 370 की शेष समस्त उपधाराएं (खंड 2 एवं 3) को समाप्त करते हुये, धारा 370 की धार को ही बोठल कर दिया। साथ ही धारा 35ए भी समाप्त कर दी। लद्दाख व जम्मू-कश्मीर दो नये केन्द्र शासित प्रदेश बना कर आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘अगस्त क्रंाति’’ की याद दिला दी। (इसी सावन महीने में ही चंद्रयान 2 का सफल परीक्षण एवं ट्रिपल तलाक बिल भी पारित हुआ। राम जन्मभूमि मामले में उच्चतम न्यायालय में प्रतिदिन सुनवाई भी आज प्रांरभ हो गई हैं) इस प्रकार दोहरी नागरिकता, दो झंडे और दो विधान के प्रावधानों को एक झटके में समाप्त कर दिया। 
इंदिरा गांधी द्वारा बांग्लादेश निर्माण के समय उठाये गये कदम एवं अमित शाह के आज पूरी तैयारी के साथ उठाये गये कदमों में कई समानताएं हैं। प्रथम इंदिरा गांधी ने घोषित रूप से पाकिस्तान पर आक्रमण कर बांग्लादेश का निर्माण नहीं करवाया, बल्कि पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में वहां के निवासियों जिन्हे मुक्तिवाहिनी कहा गया द्वारा पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचार के विरूद्ध चला रहे आंदोलन जो बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में परिणित हो गया था, को पूरी तरह से मदद देकर स्वतंत्र होने में पूरी सहायता की थी। ठीक उसी प्रकार गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले एक हफ्ते से जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त फौज इस आधार पर भेजी कि वहां पर आंतकी गतिविधियों एवं उनके द्वारा की जाने वाली आंतकी कार्यवाहियों का इनपुट मिला है, अमरनाथ यात्रियों पर हमले की आंशका है। अतः कानून शांति व्यवस्था व नागरिकों की सुरक्षा बनाये रखने का कारण बताया जाकर, राजनैतिक नेताओं की गिरफ्तारी, कर्फ्यू व धारा 144 लगाई गई। स्पष्ट है, घोषित रूप में अनुच्छेद 370 पर संशोधन करने की घोषणा के उद्देश्य से उक्त कार्यवाही नहीं की गई। अतः आज जब संसद में धारा 370 में संशोधन लाने की घोषणा की गई, तब यह महसूस हुआ कि यह उक्त एजेंड़ा हिडन (छिपा हुआ) हैं, ठीक वैसा ही, जैसा कि इंदिरा गांधी के बंग्लादेश बनाने के समय फौज भेजने के निर्णय के साथ था। 
एक समानता यह भी है कि जहां इंदिरा गांधी ने दुश्मन देश के दो टुकड़े किये, वहीं गृहमंत्री ने ‘‘गृह’’ (घर) जम्मू-कश्मीर (भारत का ताज) के दो टुकड़े कर दिये। बांग्लादेश बनाकर विश्व में एक राष्ट्र की और बढ़ोत्री हुई, तो अमित शाह के संकल्प पत्र से 29 प्रदेश वाला भारत 28 प्रदेश में सिमट गया व केन्द्र शासित प्रदेश के रूप में दो प्रदेशों की वृद्धि हुई। इंदिरा गंाधी ने जहां पश्चिम पाकिस्तान के अत्याचार से पीडि़त पूर्वी पाकिस्तान की जन भावना के अनुरूप कार्य कर बांग्लादेश बनाया, वही अमित शाह ने सेना व बंदूक के साये में वहां की जनता को (बिल्कुल) विश्वास में लिये बिना जम्मू-कश्मीर का राज्य का स्ट्टेस खत्म कर केन्द्र शासित प्रदेश कर दिया।
उक्त कदम ऐतिहासिक कई कारणों से है। पिछले 70 सालों से जनसंघ से लेकर भाजपा तक सत्ताधारी पार्टी का एजेंडा संविधान की धारा (अनुच्छेद) 370 जो कि स्वयं में एक अस्थायी संक्रमण कालीन प्रावधान है, को पूर्णतः समाप्त कर एक राष्ट्र, एक निशान व एक विधान की लगातार वकालत करते रहने का रहा है। अस्थायी का मतलब ही यह होता है कि उसे किसी न किसी दिन समाप्त होना ही है, जैसा कि स्व. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनुच्छेद 370 के संबंध में कहा था कि यह घिसते-घिसते घिस जायेगा। शिवसेना ही एक मात्र ऐसी राजनैतिक पार्टी है, जो शुरू से इस मुद्दे पर भाजपा के साथ रही है। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार अलग-अलग अवसरांे पर लगभग कुल छः वर्ष की अवधि में रही। नरेन्द्र मोदी भी वर्ष 2014 से 2019 तक पांच साल की अवधि में प्रधानमंत्री रहे। लेकिन नरेन्द्र मोदी की दूसरी पारी में आज यह कदम उठाने के पूर्व किसी भी सरकार ने उक्त साहस नहीं दिखाया। भाजपा को वर्ष 2014 के चुनाव में भी पूर्ण बहुमत मिला था, जैसा की आज प्राप्त है। भाजपा के पास राज्यसभा में पूर्ण बहुमत तब भी नहीं था, और आज भी नहीं है (अपने बलबूते पर)। इन तथ्यों के रहते हुये राजनाथ सिंह के बदले अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने जो यह कदम उठाया वह साहसिक व ऐतिहासिक ही कहा जायेगा। क्योंकि पूर्व में अटल जी व नरेन्द्र मोदी राजनाथ सिंह के गृहमंत्री रहते हुये यह कदम नहीं उठा पाये। ऐतिहासिक इस कारण से भी है कि पिछले कुछ दिनों से जम्मू-कश्मीर में सरकार जो कार्यवाही कर रही थी, उसका लबालूब निष्कर्ष यही निकल रहा था कि सरकार जम्मू-कश्मीर में ‘‘कुछ’’ करने जा रही है व अधिकतम धारा 35ए को समाप्त कर सकती है। लेकिन समस्त समीक्षकों, आलोचकों, समालोचकांे को हतबद्ध कर अमित शाह ने न केवल धारा 35ए को समाप्त किया, बल्कि जम्मू-कश्मीर प्रदेश का राज्य का दर्जा समाप्त कर उसके दो टूकडे़ कर दो अलग-अलग केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख बना दिया। यह कदम ऐतिहासिक इसीलिये भी है, क्योंकि भाजपा अपने एजेंडे़ से दो कदम और आगे जाकर (जिसकी कल्पना किसी भी ने नहीं की थी) जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया। लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से काटकर नया केन्द्र शासित प्रदेश बनाना व जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा समाप्त कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाना निश्चित रूप से समस्त राजनैतिक आलोचकों के लिये एक आश्चर्यजनक व कौतूहल पूर्ण कदम रहा है।  
यह निर्णय इसलिये भी ऐतिहासिक है कि वे पार्टियाँ जो प्रायः संसद में व संसद के बाहर कभी भी भाजपा के साथ खड़ी दिखाई नहीं दी है, लेकिन भाजपा के इस ऐतिहासिक कदम के साथ संसद में आज खड़ी हुई दिख रही है। इसमें प्रमुख रूप से बसपा, एआईडीएमके, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, आप, टीआरएस, एवं तेलगु देशम पार्टी शामिल है। अतः यदि आज उक्त ऐतिहासिक कदम से कुछ क्षेत्रों में सरदार पटेल की याद ताजा हो रही है, तो यह अतिश्योक्ति नहीं है। 
एक बात और! कांग्रेस को अनुच्छेद 370 में किये जा रहे संशोधन के विरोध इस आधार पर कि यह महाराजा हरिसिंह के साथ किये गये वायदे का उल्लंघन है और कोई नैतिक बल व अधिकार नहीं है क्योंकि कांग्रेस ने स्वयं वर्ष 1969 में निजी बैंको के राष्ट्रीय करण के साथ पूर्व राजाओं का प्रिविपर्स समाप्त कर 562 रियासतों के साथ भारत में शामिल करते समय किये गये समझौते का उल्लंघन किया था। तब उक्त कदम को बड़ा क्रंातिकारी प्रगतिशील व ऐतिहासिक बतलाया था।    
आइये, अब सिक्के के दूसरे पहलू को भी थोड़ा समझने का प्रयास करें। एक बात जो समझ से बिल्कुल परे है, वह जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाना, जो भाजपा सहित देश की किसी भी पार्टी के एजेंडा में शामिल नहीं था। निश्चित रूप से कश्मीरियों का जम्मू-कश्मीर के प्रति एक प्राकृतिक भावनात्मक लगाव है। कुछ लोगो का अनजाने या ना-समझी मंें ही सही, अनुच्छेद 370 से भावनात्मक लगाव है, यह भी सही है। क्योंकि वे भारत से जुडाव का बंधन इसी को मानते है,  जो यद्यपि सही नहीं हैं। अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) के उपबंधों में प्रतिबंध के प्रावधान रहने के बावजूद अनुच्छेद 370 के उपबंध (1) का प्रयोग करते हुये भारत के अधिकांश कानून कश्मीर पर लागू कराये गये। इस प्रकार व्यवहारिक रूप से इन 70 वर्षो में अनुच्छेद 370 के प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया गया था। धारा 35ए के कारण ही देश के नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार अभी तक नहीं था। अतः अनुच्छेद 370 (2) एवं (3) को समाप्त करते समय गृहमंत्री ने कश्मीरियों की भावनात्मक भावना को ध्यान में रखे बिना उक्त राज्य जिसे विशेष दर्जा प्राप्त था का न केवल विशेष दर्जा समाप्त किया, बल्कि उसे अन्य प्रदेशों के समान एक राज्य भी नहीं रहने दिया। उसे दिल्ली, गोवा समान केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर जहां एक समय ‘‘महाराजा’’ राज्य करते थे से लेकर गर्वनर जनरल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री फिर मुख्यमंत्री व अंत में राज्यपाल के बाद अब उपराज्यपाल के अधीन कर दिया है, जो निश्चित रूप से कश्मीरियों के सम्मान को भावनात्मक रूप से ठेस पहंुचता है। इस स्थिति को देखते हुये जब गृहमंत्री ने राज्य को केन्द्र शासित राज्य बनाने का कोई उचित, आवश्यक व स्वीकार योग्य कारण नहीं बतलाया हैं, जबकि उनका उद्देश्य तो धारा 370 में संशोधन कर उसका विशेष दर्जा समाप्त करना मात्र था। जम्मू-कश्मीर राज्य के विभाजन की मांग कभी भी, किसी, ने किसी कार्नर से नहीं उठाई थी, तब इस विभाजन की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी यदि राजनैतिक रूप से यह आवश्यक था, तब उसे विभाजित कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के बदले दो राज्य बनाते तो ज्यादा बेहतर होता। 
संसद में जम्मू एवं कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक व अनुच्छेद 370 में संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय व उस पर हुई बहस का जवाब देते हुये अमित शाह द्वारा दिये उस कथन पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर को कोई फायदा नहीं मिला (उनके शब्दों में ‘‘कोई मुझे बताएं तों...’’।) आगे उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की अधिकांश समस्यायें चाहे वह विकास, भ्रष्टचार, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, अपराध आदि किसी से भी संबंधित हो या आंतकवादी घटनाएं हो, उन सबके लिये अनुच्छेद 370 ही मुख्यतः जिम्मेदार है। अनुच्छेद 370 के कारण ही देश के लगभग 116 कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो पाये। लेकिन उन्होंने यह नहीं बतलाया कि अनुच्छेद 370 के प्रतिबंध के प्रावधान के बावजूद अधिकतम महत्वपूर्ण कानून जम्मू-कश्मीर में की विधानसभा में पारित करवाकर लागू किये गये। जब पीडीपी व भाजपा की संयुक्त सरकार थी, तब वे 116 कानून विधानसभा में पारित करवाकर क्यों नहीं लागू करवाये गये, यह प्रश्न विपक्ष द्वारा न तो पूछा गया और शायद उसका कोई जवाब भी नहीं था। अमित शाह के अनुसार यदि समस्त समस्याओं की जड़ अनुच्छेद 370 है, जैसा कि उन्हांेने संसद में अपने भाषण में कहां है, तो हमारे उत्तर पूर्वी प्रदेश व अन्य प्रदेश नागालैंड (अनुच्छेद 371ए) असम (371 बी) मणिपुर (371 सी) आंध्र प्रदेश तेलंगाना (371 डी) सिक्किम (371 ई) मिजोरम (371 जी) अरूणचल प्रदेश (371 एच) एवं गोवा (371 आई) एवं महराष्ट्र गुजरात हिमाचल प्रदेश (371), इन सभी राज्यों को विशेष दर्जा उपरोक्त उल्लेखित अनुच्छेदों को संविधान में शामिल करके दिया गया है। क्या  उक्त इन्ही आधारों पर ही उपरोक्त उल्लेखित समस्त अनुच्छेदों को संविधान से हटाकर (जैसा कि 370 (2) एवं (3) के साथ किया गया) कर विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के लिए सरकार क्या संसद के अगले सत्र में बिल लायेगी? ताकि उक्त समस्त विशेष दर्जा प्राप्त प्रदेशों का समुचित विकास हो सके। दुर्भाग्य की स्थिति तो यह है कि कोई भी पार्टी किसी भी समय चाहे देश में कितने ही संकट की स्थिति क्यों न हो बिना राजनीति किये सिर्फ और सिर्फ देश हित में कार्य करना ही नहीं चाहती है। निरपेक्ष रूप से शुद्धता के साथ सिर्फ देश हित में कार्य इस देश में कब संभव होगा? यद्यपि आज संसद में बार-बार यह कहा जा रहा था कि चर्चा राजनीति से ऊपर उठ कर की जानी चाहिये। लेकिन उक्त कथन में ही राजनीति भी परिलक्षित हो रही थी। यह एक बड़ा अवसर अमित शाह के लिये था। देश की जनता इस मुद्दे पर उनके साथ थी। यदि वे थोड़ा सा भी राजनीति से ऊपर उठकर बहस करते, तो शायद वे असरदार से सरदार होकर लौहपुरूष भी कहलाते। उदाहरणार्थ यह कहने की कतई आवश्यकता नहीं थी कि धारा 370 से जम्मू-कश्मीर के मात्र 3 परिवार को ही फायदा मिला जो न तो सच था और न ही समायोचित था। जूनागढ़ व हैदराबाद रियासत का भारत में विलय का मामला सरदार पटेल ने संभाला था, इसलिये समस्या नहीं हुई, जबकि कश्मीर का मुद्दा नेहरू के कारण आज तक विवादित बना रहा। उक्त कथन चीरफाड़ के बाद मरहम लगाने वाले तो कम से कम नहीं थे।  
खैर अब तो यही आशा है कि गृहमंत्री के आशानुरूप स्थिति तेजी से सामान्य होगी, ताकि गृहमंत्री लोकसभा में दिये गये आश्वासन के अनुसार जम्मू-कश्मीर पुनः देश का 29 वां राज्य बन सके, ताकि उसकी मुकुटमणि की स्थिति को पुर्नस्थापित किया सके।  
अंत में एक बात और सरकार द्वारा संसद भवन में रोशनी कर खुशी का अतिरिेक्त प्रर्दशन करने का औचित्य क्या है? ऐसी स्थिति में, जबकि वह जनता जिसके फायदे के लिये उक्त कानून बनाया गया कर्फ्यू में ड़र व खौंफ के माहोल में है, व उसे अपनी खुशी(?) व्यक्त करने का अवसर सरकार नहीं दे रही है। इसीलिए ऐसे अति उत्साह से बचा जाना चाहिए था। खैर अब तो मोदी सरकार का अगला कदम निश्चित रूप से ‘राम जन्म भूमि’’ ही होना चाहिये जो पूरे राष्ट्र की मांग व आवाज है।

बुधवार, 31 जुलाई 2019

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने आखिर गलत क्या कहाँ ?


भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जो पूर्व में भी अपने कई बयानों के कारण मीडिया व देश की राजनीति में न केवल चर्चित रही, बल्कि उनके बयानों के कारण भाजपा को शर्मिदंगी भी उठानी पड़ी है, व पार्टी की किरकिरी भी हुई है। प्रधानमंत्री तक को पार्टी की छवि बचाने के लिये यह कहना पड़ा कि गोड़से को देशभक्त बताने वाले उनके बयान के लिये वे साध्वी को कभी भी दिल से माफ नहीं कर पाएगें। 
वही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का सीहोर में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में यह उद्बोधन/कथन सामने आया है कि ‘‘हम नाली साफ करवाने के लिए नहीं बने है। हम आपका शौचालय साफ करने के लिए बिल्कुल नहीं बनाएं गए हैं। कृपया इसे समझें! हम जिस काम के लिए चुने गए हैं, वह काम हम ईमानदारी से कर रहे हैं’’। आगे उन्होंने ये भी जोड़ा कि ‘‘निर्वाचन क्षेत्र के समग्र विकास के लिए स्थानीय विधायक और नगरपालिका पार्षदों सहित स्थानीय जनप्रतिनिधयों के साथ काम करना संसद के सदस्य का कर्तव्य है।’’ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का यह बिल्कुल सीधा सादा सही अर्थो में संवैधानिक रूप से सत्य बयान होने के बावजूद भी उस पर तुच्छ राजनीति भी हो सकती है, यह शायद सिर्फ हमारे देश में ही संभव है। उक्त बयान पर मीडिया से लेकर राजनैतिक नेताओं तक ने बवाल और बवंडर मचा दिया। इससे यह भी सिद्ध होता है कि देश का राजनैतिक स्तर, नेताओं का बौद्धिक स्तर व मीडिया की गुणवता का स्तर निम्न होकर कितने नीचे गिर सकता है? किसी बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देते समय उस बयान के प्रसंग में जाए बिना राजनेताओं द्वारा अनर्गल व असंदर्भित प्रतिक्रिया देकर मीडिया के सहयोग से किस तरह से वे सुर्खियों में आना चाहते हैं, उसके निम्न स्तर का यह एक ‘‘श्रेष्ठ’’ उदाहरण है। 
बयान पर प्रतिक्रिया देने के पहिले जरा सोचिए तो! साध्वी ने उक्त कथन कहां पर किस संदर्भ में व किनके समक्ष दिया है। किसी भी बयान को उसके संर्दभ से अलग कर उस पर प्रतिक्रिया देना अपरिपक्वता नहीं तो और क्या है? साध्वी के बयान पर दी गई प्रतिक्रिया, बयान के तथ्यों से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती है। अतः बिना सोचे समझे, या यह कहां जाए तो ज्यादा बेहतर होगा कि जानबूझकर सोची समझी योजनाबद्ध रूप से उक्त बयान को प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम की सीमा तक ले जाकर, उसके विरूद्ध ठहराकर, आलोचना करने का जिस तरह माध्यम उक्त बयान को बनाया गया है, वह नितांत बचकाना कार्य लगता है। सांसद असदुद्ीन ओवैशी ने कहां मुझे कतई हैरानी नहीं हुई, न मैं इस वाहियात बयान से स्तब्ध हूूँ, वह ऐसा इसलिए कहती हैं, क्योंकि उनकी सोच ही ऐसी है। सांसद भारत में हो रहे जाति तथा वर्गभेद में यकीन करती हैं। वह साफ-साफ यह भी कहती है कि जो काम जाति से तय होता है वह जारी रहना चाहिए यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और उन्होंने खुलेआम प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का विरोध किया। 
जरा ओवैसी केे उक्त बयान पर ध्यानपूर्वक गौर कीजिये। जो बात साध्वी ने कही ही नहीं, वह ओवैसी उनके मुख में जबरदस्ती डलवाना चाहते है। यह देखा जाना चाहिऐ कि साध्वी अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठी हुई थी, और जब किसी कार्यकर्ता ने उन्हें सफाई की कोई समस्या बताई तब उन्होंने उक्त कथन किया, कि मुझे आपने इस कार्य के लिए नहीं चुना गया है। उनका यह कथन पूर्णतः सही है। लेकिन देश में आज कल राजनैतिक वातावरण भाजपा के ईर्द गिर्द सीमित मात्र होकर शैनेः शैनेः एक तंत्रीय प्रणाली होता जा रहा है। भाजपा में रहते हुए कड़क सही बात बोलने की जो हिम्मत उन्होंने दिखाई है, वह काबिले तारिफ है। उसके लिये वे साधुवाद की पात्र है।
आखिर उन्होंने गलत क्या कहा है? हमारे देश में लोकतंत्र को पूर्ण सही रूप से सच्चे अर्थो में स्थापित करने की प्रक्रिया स्वरूप ही संविधान और कानून समस्त विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप पंचायत स्तर से लेकर राष्ट्र को चलाने की केन्द्रीय शासन की व्यवस्था तक प्रत्येक स्तर पर अलग-अलग तंत्र स्थापित किया गया है। पंचायत का कार्य ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामों का विकास करना है, जिसे पंचायती राज कहा गया है। नगर पंचायत, नगर पालिका व नगर निगम के माध्यम से स्थानीय स्वशासन स्थापित कर कस्बे-शहर में साफ सफाई करने से लेकर शौचालय व सड़कों की सफाई के कार्य के साथ-साथ सर्वांगींण विकास के कार्य का उत्तरदायित्व स्थानीय स्वशासन अर्थात पार्षदों का ही है। मतलब निश्चित रूप से मूलतः सफाई का कार्य विधायक या सांसद का नहीं है, और न ही जनता उन्हे इस कार्य के लिये चुनती हैं। इसके लिये तो सामान्य पार्षद चुने जाते है। लेकिन जनप्रतिनिधी होने के नाते सफाई कार्य व स्वच्छता पर निगरानी रखना जनप्रतिनिधी होने के नाते जरूर उनका दायित्व बनता है, क्योंकि आजकल क्षेत्र का विकास नापने का एक मापदंड स्वच्छता भी है। 
विधायक को विधानसभा क्षेत्र के विकास व प्रदेश के नागरिकों के हित के लिए आवश्यक कानून बनाने के लिए विधानसभा भेजा जाता है। ठीक उसी प्रकार सांसद को संसदीय क्षेत्र के विकास के साथ-साथ देश हित में देश के नागरिकों के सर्वांगीण शांतिपूर्ण विकास व देश की आंतरिक-बाह्य सुरक्षा के लिए पर्याप्त समुचित कानून बनाने के लिए चुना जाता है। इसीलिये विकास के लिये विधायक निधि व सांसद निधि का प्रावधान भी किया गया है। मतलब साफ है कि विधायिका जिसमें सांसद व विधायक शामिल है, का कार्य मुख्य रूप से मूलतः कानून बनाना है। ट्रांसफर, पोस्टिंग व्यक्तिगत कार्य और साफ सफाई का कार्य सांसद का नहीं है। यद्यपि नागरिकों के चुने हुए प्रतिनिधी होने के नाते सांसद यदि उक्त कार्यों पर प्रभावी निगरानी रखते है, तो अवश्य वे एक सजग विधायक या सांसद कहलाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी के विधायक व प्रदेश के उपाध्यक्ष अरविंद भदोरिया इस बात के लिए बधाई के पात्र है, कि उन्होंने साध्वी की भावनाओं को सही परिपेक्ष में समझा, और उसे सही बतलाया। वास्तव में साध्वी ने जो कहा, उसे इस बात से भी समझा जा सकता है, कि गिलास आधा भरा है, अथवा आधा खाली। साध्वी ने गिलास आधा भरा है, के अनुसार कथन किया। बात कही। बाकी नासमझ लोगों ने उसे आधा खाली जताने की कोशिश की। 
ओवैसी से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा से यह पूछा जाना चाहिये कि वास्तव में सांसद के संविधान में निहित कार्य, दायित्व, जिम्मेदारी व अधिकार क्या है? जिनका वर्णन संविधान में किया गया है। जब साध्वी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अत्यंत महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान कार्यक्रम का कोई संदर्भ या जिक्र तक नहीं किया और न ही इस ओर इग्ंिांत ही किया है अथवा किसी भी तरह से उक्त अभियान की कोई आलोचना की है, तब उनसे उनके उक्त बयान को राष्ट्रीय अभियान से जबरदस्ती संर्दभित कर,स्पष्टीकरण मांगने की आवश्यकता बन गई ? उक्त बयान सेे पार्टी की छवि को कैसे नुकसान पहंुच गया, यह समझना मुश्किल है। इससे तो यही सिद्ध होता है, कि भाजपा में भी सांसदों को सही बात दिल से कहने की स्वतंत्रता नहीं है? उन्हे अपने कार्यकर्ताओं को सही बात (जो प्रायः कड़वी होती है) समझाने का अधिकार नहीं है। उन्हे परिपक्व बनाने व अपने दायित्व के प्रति जाग्रत करने का अधिकार नहीं है? शायद कड़वी बात कहना आज की राजनीति में संभव ही नहीं है।  
निश्चित रूप से ‘‘साध्वी’’ उस तरह की अनुभवी व बड़ी राजनीतिज्ञ नहीं है, जैसे (अन्य) लोग राजनीति में आते हैं। इसीलिए वेे वह राजनैतिक सावधानी नहीं बरत पाई, जो आज की राजनीति में अत्यंत आवश्यक है। यदि वे उस बयान के साथ यह भी जोड़ देती कि मोदी जी के राष्ट्रीय स्वच्छता कार्यक्रम को आप लोग आगे बढ़ाये, तो शायद यह बवंडर नहीं होता। चंूकि वह कोई स्वच्छता अभियान की बैठक तो नहीं ले रही थी? न ही कोई समीक्षा कर रही थी, न ही उक्त कथन साध्वी ने किसी संगोष्ठी में, किसी टीवी डिबेट में या किसी सार्वजनिक मंच पर दिया था। शायद देश में आज की राजनैतिक स्थिति में सीधे सज्जन और साध्वी जैसों की आवश्यकता ही नहीं है। इसलिए आवश्यकता साध्वी के कान उमेठने की नहीं, बल्कि राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता को जागृत करने की है। ऐसे कार्यकर्ताओं को उनका दायित्व बोध कराकर, परिपक्व बनाने की है, जो अपने मोहल्ले के नाली साफ करने के लिए भी सांसद से अपेक्षा रखते हैं। 
लेख को शुरू से अंत तक पढ़ने के लिये धन्यवाद!

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