गुरुवार, 17 नवंबर 2022

उच्चतम न्यायालय का निर्णय ‘‘न्यायिक’’ परन्तु आंशिक!

19 वर्षीय ‘‘अनामिका’’ का अपहरण कर गैंगरेप के बाद की गई हत्या के पौने 11 साल बाद छावला हत्याकांड के तीनों आरोपियों रवि कुमार, राहुल और विनोद को जिन्हे उच्च न्यायालय ने ‘‘शिकार’’ की तलाश में ‘‘शिकारी’’ का तमगा तक दे दिया था, अधीनस्थ निचली दोनों न्यायालय; सत्र न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष फरवरी 2014 में फांसी की सजा दिए जाने व पुष्टि के आदेश के बावजूद संवैधानिक क्षेत्राधिकार का न्यायिक उपयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय ने उन्हें पर्याप्त सबूत के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए यह कहते हुए बरी कर दिया की निर्णय नैतिक दोषारोपण व भावनाओं के आधार पर नहीं व ‘अन्यत्र से’ प्रभावित हुये बिना होना चाहिए। उक्त प्रकरण मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर ही आधारित था, जहां श्रृंखला को पूरा होना चाहिए। माननीय न्यायाधिपतियों ने अपने बरी आदेश में यह कहा कि जघन्य अपराध में शामिल होने के बावजूद, पुलिसिया जांच व मुकदमे के दौरान बरती गई लापरवाहियों के कारण आरोपियों को निष्पक्ष ट्रायल न मिलने से छोड़़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने बरी करते समय कहीं भी यह स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया कि अभियुक्त गण उक्त दहलाने वाली घटना में शामिल (संलग्न) नहीं थे, तथापि उच्चतम न्यायालय ने जांच की संपूर्ण प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियों को पाते हुए दोषियों को (बाइज्जत नहीं?) छोड़ने के आदेश दिये।
न्याय का पुराना चला आ रहा यह सर्वमान्य सिद्धांत अभी भी है, कि 99 दोषी भले ही छूट जाये, परन्तु एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। इसलिए यह भी कहा जाता है कानून अंधा होता है। इस सिद्धांत में ही पीडि़त परिवार की व्यथा, आक्रोश, गुस्सा, लाचारी शामिल है जहां, 99 दोषी छूट जाये जिसमें ये तीनों दोषी भी शामिल हैं। यह न्यायपालिका की ‘‘दूरस्थाः पर्वताः रम्याः’’ वाली छवि को प्रस्तुत करता है। तथापि यह निर्णय ‘‘कानून जनता के लिये हैं, या जनता कानून के लिये है’’, स्थिति पर चिंतन करने के लिए विवश भी करता है।
उक्त वीभत्स घटना का तीन राज्यों से संबंध है। ‘‘अनामिका’’ मूल रूप से उत्तराखंड के पौडी गांव की रहने वाली थी, जो तत्समय दिल्ली के छावला कुतुब विहार में रह रही थी, जिनके शव की बरामदगी हरियाणा के रेवाड़ी के एक खेत से हुई।
उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों ने जांच प्रक्रिया में कई गंभीर प्रश्न उठाये है। अनेक कमियों को इंगित किया है, जो प्रमुख रूप से निम्न हैं 1. लड़की का शव 3 दिन दिन तक खेत में पड़ा रहा और उस पर किसी की नजर न जाना (संदेहपूर्ण स्थिति) 2. खुले 3 दिन व रात तक पड़ी लड़की के शव से आरोपी रवि के बालों के गुच्छे की बरामदगी विश्वसनीय नहीं लगती। 3. शव की बरामदगी को लेकर हरियाणा व दिल्ली पुलिस के बयानों में अंतर। 4. आरोपियों का सैंपल भी 14-16 तारीख को लेने के बाद बिना सुरक्षा के 11 दिन रखे जाने के बाद 27 तारीख को भेजा गया। (सैंपल में हेर फेर की आशंका) 5. पीड़िता का डीएनए प्रोफाइल 48 घंटे के बाद जांच के लिये लेबोरेटरी भेजा गया। 6. जब्त गाड़ी पुलिस थाने में खड़ी रही, छेड़छाड़ हो सकती थी। 7. आरोपियों की पहचान परेड न करा कर शिनाख्त नहीं की गई। 8. कुछ गवाहों का प्रति परीक्षण (क्रॉस एग्जामिनेशन) न होना। 9. काल रिकार्डस्।  
बड़ा प्रश्न यहां यह उठता है, कि क्या यह ‘‘मोहरों की उपेक्षा और कोयलों पर मुहर’’ का उदाहरण तो नहीं है? क्या ये समस्त त्रुटियां इतनी घातक (फैटल) हैं, जिनके आधार पर उच्चतम न्यायालय ने मजबूरी में अभियुक्तों को छोड़ने का आधार बनाया। जबकि प्राचीन न्याय शास्त्र के अनुसार ‘‘ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने का ही नाम न्याय है’’, जिसे ‘‘अरुंधती दर्शनम् न्याय’’ कहा जाता है। इसी आधार पर इन्ही त्रुटियों को दो निचली अदालतों ने घातक न मानकर बेहिचक सजा देने का आदेश देकर उसकी पुष्टि की थी। शायद क्या उच्चतम न्यायालय ने ‘‘काकदंत गवेषणा: न्याय’’ का उदाहरण तो प्रस्तुत नहीं किया? यदि वास्तव में उक्त खामियां सजा के निराकरण, निर्धारण के लिये महत्वपूर्ण है, तो उच्चतम न्यायालय का दूसरा महत्वपूर्ण दायित्व व संवैधानिक न्यायिक कर्तव्य क्या यह नहीं था कि इन कमियों के लिए नियम, कानून, संविधान के अनुसार अपना कर्तव्य, दायित्व व जिम्मेदारी न निभाने के लिए उन गैर-जिम्मेदाराना जांच अनुसंधान अधिकारियों को खोजकर (पॉइंट आउट कर) उनके खिलाफ एक कड़ी टिप्पणी (स्ट्रक्चर) कर विभागीय जांच के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के आदेश दे देते? साथ ही कानून के अनुसार बुद्धि-विवेक का उपयोग करने में असफल रहने के कारण (इस कारण तीन निर्दोषों को 11 वर्ष कारावास में अकारण रहना पड़ा), अधीनस्थ न्यायाधीशों के विरूद्ध भी आवश्यक कार्रवाई करते? इस आदेश की यह एक बहुत बड़ी कमी परिलक्षित होती दिखती है।
जब उच्चतम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों की कमियों को दर्शित कर रहा है, तब तो उसके उपचार के लिए संवैधानिक व्यवस्था उच्चतम न्यायालय है। परन्तु उच्चतम न्यायालय की कमियों को दूर करने के लिए कौन सा संवैधानिक उपचार है? या हम यह मान ले कि उच्चतम न्यायालय ‘‘उच्चतम’’ (‘न्यायिक क्षेत्र का राजा’) होने के कारण उसे मानवीय त्रुटि हो ही नहीं सकती हैं? जिस प्रकार राजा कोई गलती नहीं करता है जैसा पुराने समय में माना जाता था। ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं! उच्चतम न्यायालय के आदेश में हुई त्रुटि को सुधारने के लिए संविधान में जहां सिर्फ रिव्यू पिटीशन और तत्पश्चात रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा प्रकरण में निर्धारित की गई अवधारणा अनुसार अंतिम रूप से क्यूरेटिव पिटीशन दायर की जा सकती है। तथापि पुनर्विचार याचिका का दायरा बहुत ही सीमित होता है। वे ही त्रुटियां जो अभिलेख के फेस पर (पहली नजर में) स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है, उन्ही के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है।
यदि उच्चतम न्यायालय अभियोजन की हुई उक्त त्रुटियों के कारण निर्दोष व्यक्तियों को फांसी पर चढ़ाने वाले आदेश और फांसी की सजायाफ्ता पाये अभियुक्तों की रिहाई के आदेश में बदलने के लिए लापरवाही व चूक के लिए उन दोषी अधिकारियों के विरूद्ध उक्त आदेश में कोई कड़ी कार्रवाई करने का आदेश/निर्देश/संकेत दे देती, और वास्तविक अभियुक्तों को पकड़ने के लिए एक एसआईटी का गठन कर जांच करने का आदेश दे देती तो, निश्चित रूप से संतृप्त परिवार को कुछ सांत्वना अवश्य मिल जाती। यद्यपि ‘‘ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती’’,। उच्चतम न्यायालय का यह दायित्व जरूर बनता है, जब एक लड़की की निर्मम तरीके से हुई हत्या व हैवानियत, बर्बरता पूर्ण, अमानवीय तरीके से हुए सामूहिक बलात्कार का कोई आरोपी दोषी नहीं है, तो कोई न कोई व्यक्ति तो दोषी अवश्य है, जिसने उक्त अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया था, लेकिन पीडि़त पक्ष को तो ‘‘न तो ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम’’। प्रसिद्ध रूसी उपन्यास ‘‘अपराध एवं सजा’’ में लेखक दोस्तोवस्की का यह कथन महत्वपूर्ण है ‘‘यदि आप पकड़े नहीं जाते हैं तो अपराध पुरस्कृत है’’।
उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय से देश आमतौर पर स्तब्ध है व कुछ जनाक्रोश भी है। न्यायालय द्वारा अभियोजन की बतलाई गई कुछ त्रुटियों के संबंध में कुछ प्रमुख कमियां/खामियां भी मुख पर (ऑन द फेस) अवश्य दिखती है, जो कि न्याय के ‘‘दूध का दूध और पानी का पानी’’ के सिद्धान्त पर प्रश्नचिन्ह लगाती है? प्रथम कुछ गवाहों के प्रति-परीक्षण न होने को लेकर! निश्चित रूप से अभियोजन ने गवाहों को प्रस्तुत किया, तभी तो प्रति-परीक्षण की बात उत्पन्न हुई? और यदि प्रति-परीक्षण नहीं हुआ तो यह तो बचाव पक्ष की गलती है। इस महत्वपूर्ण त्रुटि (उच्चतम न्यायालय की नजर में) के लिए अधीनस्थ न्यायालयों के माननीय न्यायाधीशों की गलतियों की भर्त्सना कर चेतावनी देकर लताड़ा, क्यों नहीं गया5? बचाव पक्ष का यह दावा देखने को नहीं मिला कि सत्र न्यायाधीश ने प्रति परीक्षण का अवसर ही नहीं दिया। पहचान परेड के संबंध में भी परीक्षण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) में यह तथ्य आया है कि रात्रि होने के कारण उन्हें पहचानना संभव नहीं था। व्हीकल जब्ती के बाद थाने में ही तो रहती है, (क्या यहां भी सुरक्षित नहीं है?) इस पर प्रश्न चिन्ह लगाना कितना उचित है? दूसरा डीएनए टेस्ट के संबंध में अभी हाल में ही अमेरिका में 1987 के एक प्रकरण काफी समय बाद डीएनए टेस्ट अभियुक्त का होकर उस आधार पर उसे निर्दोष छोड़ा गया।
उच्चतम न्यायालय का यह कथन कि निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं होते है, का क्या आधार है? क्या दोनों अधीनस्थ न्यायालयों ने भावनाओं से अभिभूत होकर निर्णय दिया? सत्र न्यायालय के समक्ष चल रही सुनवाई (ट्रायल) के समय तो भावनाओं के प्रवाह की एक संभावना हो सकती है। क्योंकि घटना ताजा-तरोज थी। परन्तु उच्च न्यायालय के सामने भी वही भावनाओं का वेग हो गया? इस पर उच्चतम न्यायालय ने शायद बारीकी से विचार नहीं किया। अतः महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उक्त त्रुटि तकनीकी है अथवा अपूरणीय (सुधारे जाने योग्य नहीं) है। इन सब प्रश्नों के निराकरण हेतु, उच्चतम न्यायालय का प्रकरण को अनुच्छेद 142 के अंतर्गत लेकर पूर्ण रूप से समस्त बिंदुओं पर विचार कर निर्णय लेकर मीडिया व पीड़ित परिवार द्वारा निर्णय के प्रति बनाई गई मलिन छवि को दूर करना चाहिए।
एकदम से यह नहीं कहा जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय ने न्याय नहीं दिया है, सिर्फ इसलिए कि ऐसे किये गये जघन्य अपराध की फांसी की सजा प्राप्त अपराधियों को आम संवेदनाओं के विरुद्ध जाकर बरी कर दिया गया है। वीभत्स घटना व अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये अधिकतम सजा प्राप्त अपराधियों सिर्फ इन दो परिस्थितियों के चश्मे से ही उच्चतम न्यायालय के निर्णय को देखना न तो तार्किक, न्यायिक होगा और न ही उच्चतम न्यायालय के साथ समानता का न्याय? तथापि प्रकरण की सम्पूर्णता के साथ विद्यमान कानूनी प्रावधानों को दृष्टिगत रखते हुए समस्त पक्ष पीडि़ता, न्यायालय व नागरिकों द्वारा देखने पर ही सही न्याय हो पायेगा। इस प्रकार ‘परी’ (एंटी रेप एक्टिविस्ट) की फाउंडर योगिता भयाना के यह कथन कि इस निर्णय के बाद न्याय प्रणाली से विश्वास उठ गया है, पर उच्चतम न्यायालय के पुनर्विचार करने से सांत्वना मिलेगी।
ऐसे प्रकरण बर्बरतापूर्वक किये जघन्य अपराधों के मामलों में एमिकस क्यूरी की दोषियों को सुधारने की संभावनाओं को दृष्टिगत करते हुए उनके प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया अपनाने का अनुरोध करना कितना न्यायिक है और यह कड़ी सजा के सिद्धांत के कितने विपरीत है? इसकी समीक्षा की भी क्या आवश्यकता नहीं है?
उच्चतम न्यायालय ने पीड़ित परिवार को दिये गये मुआवजे को धारा 357 द.प्र.स. के अधीन कानूनी मानकर सही ठहराया गया है। मतलब इसका यह है कि उच्चतम न्यायालय ने अभियोजन का आधा पक्ष अर्थात पीडि़ता की गैंगरेप कर हत्या की गई को सिद्ध माना है। परन्तु किसने की? अब यह प्रश्न उक्त निर्णय के बाद अनुत्तरित हो गया है? इस स्थिति के लिए न्याय व्यवस्था, जांच अनुसंधान पद्धति, अभियोजन कौन कितना-कितना जिम्मेदार है, इसका हल एक जिम्मेदार सरकार व न्यायपालिका ही निकाल सकती है।
वर्ष दिसम्बर 2012 में ही हुई ‘‘निर्भया’’ केस की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज गूंजी थी, जिस कारण आपराधिक कानून तक में संशोधन करने पड़े थे। बलात्कार की धारा 376 एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 181,182 में भी परिवर्तन किए गए। नया पॉक्सो एक्ट कानून अस्तित्व में आया। जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी संशोधन किए गया। इसके पूर्व हुये वर्ष 2012 के इस छावला अनामिका प्रकरण की तुलना की जाए तो ‘‘उत्तराखंड की अनामिका’’ ‘‘उत्तर प्रदेश की निर्भया’’ से पिछड़ गई। 11 वर्ष के ‘तथाकथित अन्याय’ की तुलना में 7 वर्ष में ही न्याय मिल गया।

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

देश की राजनीति का ‘‘नैरेटिव’’ नरेन्द्र नहीं! ‘अरविंद’ तय कर रहे हैं।

वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के और प्रधानमंत्री बनने के बाद व केजरीवाल की राष्ट्रीय राजनीति में आने के पूर्व तक नरेंद्र मोदी प्रमुख एक मात्र नेता मीडिया की सुर्खियों में बने रहे। कहा जाता है, वर्ष 2014 का चुनाव मीडिया मैनेजमेंट जिसके पीछे प्रशांत किशोर का बड़ा हाथ था, के कारण ही जीतने में नरेन्द्र मोदी सफल रहे थे। तब से देश की राजनीति (सियासत) का नैरेटिव मोदी ही तय (फिक्स) करते चले आ रहे हैं। जो वे कहते रहे, मीडिया उसे ब्रेकिंग न्यूज बना कर चलाता रहा और पूरी राजनीतिक चर्चा व सियासत मीडिया से लेकर राजनीतिक क्षेत्रों लेखकों व राईटअप में उसी के इर्द-गिर्द होती रही। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी ने राजनीति में अपनी अलग शैली स्थापित की, जो 75 वर्षो से चली आ रही स्थापित राजनीतिक शैली से हटकर थी। मोदी उसमें पूर्णतः सफल भी रहे। यद्यपि वह शैली कितनी सही थी, गलत थी उसके गुणदोष पर विचार मंथन जरूर किया जा सकता है। लेकिन वह शैली उनकी राजनीतिक यात्रा में कहीं आड़े नहीं आयी, बल्कि उनके विजय रथ को आगे बढ़ाने में परोक्ष-अपरोक्ष सहयोग ही देती रही। 
अरविंद केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहले पांच साल वे साहसपूर्वक सीधे बेबाक तरीके से नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा करते रहे, चाहे फिर बात नालियों को साफ करने की ही क्यों न रही हो। लेकिन उसके दुष्परिणाम स्वरूप आप पार्टी दिल्ली की लोकसभा की सातों सीटें हार गई एवं नगर निगम में भी सफलता नहीं मिली। राजनैतिक विश्लेषक संजय कुमार के अनुसार जब कोई प्रिय नेता लोकप्रिय हो, तब उस पर हमला करने का असर उल्टा ही होगा। जैसा कि ‘‘चांद पर थूका हुआ वापस थूकने वाले मुंह पर ही पड़ता है।’’ शायद इसी नीति को अपना कर वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव के परिणाम के बाद व पंजाब में खराब प्रदर्शन के बाद केजरीवाल ने ‘‘गज में कब्ज़ा करने की बजाय इंच में कब्ज़ा करने की नीति’’ के तहत अपने भाषणों में, चर्चा में, कथनों में, ट्वीट्स में लगभग पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया, जिसका उन्हें भी फायदा मिला। फलतः दिल्ली सरकार उपराज्यपाल के साथ बेहतर सामंजस्य के साथ कार्य कर पायी। जब आप पार्टी पंजाब चुनाव में उतरी तब केजरीवाल मोदी पर पुनः आक्रामक हो गये और पंजाब की सफलता के बाद तो राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के लिये वे बेहद ही आक्रामक तरीके से नरेन्द्र मोदी पर हमला कर रहे हैं। मीडिया मैंनेजमेंट में उनकी कार्यशैली का कोई जोड़ नहीं हैं।  
जब आप पार्टी मात्र एक छोटे से आधे-अधूरे राज्य दिल्ली पर सत्ता पा काबिज थी, तब भी केजरीवाल ने ‘‘करनी न करतूत, लड़ने को मज़बूत’’ की तर्ज पर उसी मीडिया का प्रबंधन (मैनेजमेंट) अच्छी तरह से किया। नरेन्द्र मोदी के बाद दूसरी आवाज राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की तुलना में एक प्रदेश के मुख्यमंत्री की पूरे देश में बार-बार सुनने को मिलती थी, जिस मीडिया की केजरीवाल ने मोदी की विजय यात्रा में दुरुपयोग के लिए कड़ी आलोचना की थी, उस मीडिया का महत्व समझ कर उसे अच्छी तरह से मैनेज करने में वे सफल रहे है। अब तो उनके पास पंजाब राज्य की सत्ता भी आ गई हैं। अतः अब वे और बेहतर तरीके से मीडिया को मैनेज करने में संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। इस कारण से आज स्थिति यह हो गई है, देश की राजनीति का नैरेटिव प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री आप पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल कर रहे है जिनका ध्येय वाक्य है कि ‘‘माल कैसा भी हो, हांक हमेशा ऊंची लगानी चाहिये’’। आगे उदाहरणों से आप इस बात को अच्छी तरह से समझ जाएंगे। 
ताजा उदाहरण आपके सामने है, दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया के जेल जाने की आशंका मात्र से उनकी तुलना शहीदे-आज़म भगत सिंह से करने पर उन्हें परह़ेज, गुरेज और शर्म तक नहीं आयी। वैसे भी वर्तमान निम्न स्तर की नैतिकताहीन राजनीति में बेशर्म शरारतपूर्ण व अंहकार से भरे बयान पर शर्म का प्रश्न आप क्यों उठाना चाहते है? उससे भी बडी बेशर्म मीडिया निकली जिसने ‘‘गधा मरे कुम्हार का और धोबन सती होय’’ के समान उनके कथनों को हाथों-हाथ झेलकर बार-बार सुना कर हमारे कानों को पका दिया। किसी भी मीडिया की केजरीवाल से यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि अरविंद केजरीवाल जी आपके द्वारा मनीष सिसोदिया की शहीद भगत सिंह से किसी भी रूप में तुलना वैसे भी किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराई जा सकती है और न ही की जा सकती है। आप अपनी तुलना के शब्द बाण वापस लीजिए व उक्त महती त्रुटि के लिए क्षमा मांगिये अन्यथा हम आपके उन कथनों बयानों को प्रसारित नहीं करेंगे। रवीश कुमार बार-बार गोदी मीडिया जरूर कहते है परंतु मुझे लगता है कि वे ‘‘एक तवे की रोटी क्या पतली क्या मोटी’’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए केजरीवाल के जाल में फंसे मीडिया का उल्लेख नहीं करके पक्षपात करते हैं। जबकि मीडिया के बाबत एक प्रसिद्ध उक्ति है की वह नेताओं को फंसा कर रखते हैं। लेकिन यहां केजरीवाल के मामले में स्थिति तो उल्ट है। 
सीबीआई के समक्ष 9-10 घंटे लम्बे चले बयान के बाद मनीष सिसोदिया ने सीबीआई पर बड़ा आरोप लगा कर कहा कि, उन्हें मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव (ऑफर) दिया गया था। परन्तु नाम बताने से परहेज किया गया। फिर भी मीडिया उनकी इस बिना सिर पैर के तथ्य हीन बयान को बार-बार ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलाता रहा। यानी केजरीवाल के लिए तो मीडिया का रोल ऐसा है कि ‘‘लड़े सिपाही और नाम सरदार का’’। इसके पूर्व भी ऑपरेशन लोटस द्वारा विधायकों की खरीद-फरोद कर सरकार गिराने के मनीष सिसोदिया के आरोप के संबंध में भी आज तक उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया गया, जिसने पैसे ऑफर किये गए और न ही उस तथाकथित विधायक/व्यक्ति का कथन,शपथ पत्र या पहचान तक बताई गई, जिसे ऑफर किया गया हो। यह झूठी, मनगढ़ंत न्यूज भी कई दिनों तक चलती रही। हद तो तब हो गई जब सीबीआई द्वारा पूछताछ के बाद मनीष सिसोदिया के सिर पर लटक रही गिरफ्तारी की तलवार जो अंततः गिरी ही नहीं, इस तथ्य के बावजूद केजरीवाल ने गुजरात के महेसाणा जिले के ऊंझा में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनीष सिसोदिया का गुजरात चुनाव में प्रचार करने से रोकने के लिए गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने जनता से ‘‘जेल के ताले टूटेंगे मनीष सिसोदिया छूटेंगे’’ के नारे भी लगवाए । इस सफेद नहीं काले झूठे बयान को मीडिया ने जिस तरह सुर्खिया देकर चलाया और हमेशा प्रश्न करने वाले केजरीवाल से इस झूठ के संबंध में एक भी प्रति-प्रश्न न करना देश की राजनीति के नैरेटिव को केजरीवाल द्वारा निश्चित करने के तथ्य को ही सिद्ध करता है।
जिस तरह ‘‘सोती हुई लोमड़ी सपने में मुर्ग़ियां ही गिनती रहती है’’, राजनेता तथा आम नागरिकों के लिए नए-नए अन्य अकल्पनीय नैरेटिव देने वाले केजरीवाल के ताजा नैरेटिव को भी देखिए। इंडोनेशिया जहां पर मात्र सिर्फ 2% ही हिंदू हैं, की करेंसी में गणेश जी की फोटो का हवाला देते हुए देश की करेंसी में भगवान श्री गणेश और लक्ष्मी माता की तस्वीर लगाने की मांग जोर-शोर से कर डाली। क्या केजरीवाल उसी इंडोनेशिया में अल्पसंख्यक हिंदू के भगवान की फोटो लगाए जाने के पीछे के भावार्थ को समझ कर भारत देश में भी अल्पसंख्यकों (2 नहीं 20 प्रतिशत से ज्यादा) के ईस्टों (भगवानों) की फोटो लगाने की वकालत करेंगे? सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं, इसे शायद केजरीवाल हमेशा भूल जाते हैं । केजरीवाल का उक्त कथन भी उनके अनेकों अनेकोंनेक झूठे कथनों के समान गलत है। सिर्फ वर्ष 1998 में एक बार भगवान गणेश की फोटो वहां की करंसी में छपी थी। उसके बाद से वर्तमान तक कभी भी गणेश जी की फोटो नहीं छपी है। तथापि केजरीवाल द्वारा उक्त मांग के पीछे बताये गए कारणों के प्रतिफल/परिणाम का तो भविष्य में ही पता लगेगा। परन्तु क्या केजरीवाल ने इस बात की पूर्ण संतुष्टि व सुरक्षा की ग्यारंटी कर ली है कि इन तस्वीरों वाली करंसी का दुरुपयोग भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, जनप्रतिनिधियों के खरीद-फरोक, नशा, वैश्यागमन आदि समस्त बुराइयों में नहीं होगा? अन्यथा इन बुराइयों के लिए उपयोग की जाने वाली करंसी अवैध मानी जाएगी? (केजरीवाल तो नए-नए अप्रचलित सुझावों को देने में माहिर हैं जो?) क्योंकि ये हमारी संस्कृति व आस्था के प्रतीक है। यदि किसी प्रतीक की फोटो व नाम के उपयोग से ही सब कुछ हरा-भरा हो जाता तो केजरीवाल जी, क्या यह बतलाने का भी कष्ट करेंगे की अहिंसा के पुजारी, प्रतीक व पर्यायवाची राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गांधी शताब्दी वर्ष 1969 से देश की करंसी पर फोटो होने के बावजूद क्या देश अहिंसक हो गया ? सत्ता एवं शेष विपक्ष की इस नए नैरेटिव पर सियासत कई नए नए सुझावों के साथ आ गई। हद तो तब हो गई जब हिंदुत्व का नारा उठाने वाली, पहचान वाली पार्टी भाजपा को यह तक कहना पड़ गया की केजरीवाल गुजरात और हिमाचल में हो रहे विधानसभा चुनावों को दृष्टि में रखते हुए हिंदुत्व का कार्ड न खेलें। इसे ही तो नैरेटिव कहते हैं, जिसके मास्टर निसंदेह रूप से आज अरविंद केजरीवाल ही हैं। सही या गलत या अलहदा विषय है।
कुछ राजनैतिक पंडितों का यह कहना है कि केजरीवाल की कार्यशैली (कार्य क्षमता नहीं?) ‘‘मोदी की नकल’’ है। फिर चाहे वह विक्टिम कार्ड की बात हो या गुजरात मॉडल के समान दिल्ली माॅडल की बात हो, राष्ट्रवाद की या पार्टी में सर्वोच्च स्थिति व लोकप्रियता की बात हो। परन्तु वर्ष 2014 से 2022 तक पहुंचते-पहुंचते केजरीवाल नकलची न रहकर नई नई ईजाद कर (अन्वेषणकर्ता होकर)भाजपा को *नकलची* होने के लिए मजबूर कर रहे हैं। करंसी नोट पर भगवान की फोटो की मांग के प्रत्युत्तर में भाजपा व अन्य दलों के नेताओं द्वारा अन्य हस्तियों/विभूतियों की फोटो लगाने की मांग इसी का परिणाम है।

बुधवार, 19 अक्तूबर 2022

‘‘राष्ट्रमाता’’ हीरा बेन को ‘‘राजनीति’’ में घसीटना अनुचित होकर ‘‘निम्नतर स्तर’’ की राजनीति नहीं?

देश के प्रधानमंत्री व गुजरात के ही नहीं, बल्कि देश के प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी की मां का जीवन उनके बेटे के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद बेहद सादगीपूर्ण होकर प्रेरक व प्रेरणा देने वाली है। न तो वे राजनैतिक परिवार से है और न ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि वैसी रही है। नरेन्द्र मोदी के ‘‘स्वयंसेवक’’ होकर राजनीति में आने के बाद भी राजनीति में उनकी न तो कभी दिलचस्पी रही और न ही उन्होंने कभी भी राजनीति में किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप किया है। ऐसा कोई आरोप विरोधियों द्वारा लगाया भी नहीं गया है। तब फिर अचानक एक हफ्ते पूर्व एक पुराना वीडियो वायरल कर और फिर प्रेस वार्ता कर प्रधानमंत्री की माता हीराबेन के नाम पर राजनीति प्रारंभ क्यों हुई? क्या आगामी होने वाले गुजरात के चुनाव (जिसकी अभी तक अधिकारिक घोषणा भी नहीं हुई है) के कारण उन्हें राजनीतिक रूप से तो घसीटा नहीं जा रहा है?

यह राजनीति का ही नहीं बल्कि देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि एक अविवादित, निर्मल व्यक्तित्व के साथ तथाकथित क्षणिक, तनिक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से ‘‘अपना उल्लू सीधा करने के लिये’’ राजनीतिक विवाद में घसीटने का असफल प्रयास देश के प्रधानमंत्री की लगभग 100 वर्षीय वृद्ध माताजी के साथ किया जाए। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? पक्ष-विपक्ष अथवा दोनों? सामान्य रूप से घृणित कथन कर विवादित बयान देने वाले आप पार्टी के नेता को ही इस निम्न स्तर की राजनीति को चमकाने के लिए जिम्मेदार ठहराया व माना जा रहा है। परंतु यह एक बड़ा गहरा विश्लेषण का विषय है, जिस पर गंभीर चिंता किये जाने की गहन आवश्यकता है, तभी आप पूरी परिस्थितियों का सही आकलन कर पाएंगे।

गुजरात आप पाटी के प्रदेश अध्यक्ष 33 वर्षीय गोपाल इटालिया पूर्व में भी कई बार विवादित होकर सुर्खियों में रह चुका है। कांस्टेबल व राजस्व क्लर्क की अल्प अवधि की नौकरी से बर्खास्त होकर वह आर्म्स एक्ट व अन्य आंदोलन के अंतर्गत जेल भी जा चुका है। जून 2020 में आप पार्टी से जुड़कर इटालिया ने राजनैतिक पारी प्रारंभ की व शीघ्र ही दिसम्बर 2021 में प्रदेश संयोजक बन गये। इटालिया के तीन पुराने (वर्ष 2018-2019 के) वीडियो को पिछले एक सप्ताह में भाजपा ने जारी किया है। वर्ष 2019 के इटालिया के नरेन्द्र मोदी के मां के संबंध में तथाकथित बयान को भाजपा के मीडिया सेल के द्वारा वायरल करने के बाद भाजपा की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपनी ‘‘अधजल गगरी को छलकाते हुए’’ प्रेस वार्ता कर गुजरात में राजनीति चमकाने के लिए केजरीवाल पर प्रधान सेवक की मां, राष्ट्रमाता का अपमान कर भद्दी-गंदी राजनीति करने का बड़ा आरोप लगाया है। प्रश्न यह है कि माता हीरा बेन के साथ हुई व हो रही तथाकथित राजनीति क्या सिर्फ आप ने ही की है? क्या भाजपा इसके लिए कतई जिम्मेदार नहीं है? निश्चित रूप से जो वीडियो वायरल किया गया है, जिसमें आप के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने जिस तरह की अभद्र टिप्पणियां व अपशब्द नरेन्द्र मोदी व उनकी माता के विरूद्ध की है, वे कदापि दोहराई नहीं जा सकती हैं। वे निंदनीय व अक्षम्य होकर राजनीति से परे उसकी घोर भर्त्सना हर हाल में की ही जानी चाहिए।
परन्तु वास्तव में आप एक ऐसी ‘‘बेशरम’’ पार्टी बन गई है, जहां केजरीवाल से लेकर विभिन्न नेताओं से प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया की टिप्पणियों के संबंध में मीडिया द्वारा प्रश्न पूछने पर उसका कोई जवाब न देकर न तो उसकी निंदा की गई और न ही बयान की आलोचना की गई। हजारों जवाबों से अच्छी है ‘‘आप’’ की खामोशी न जाने कितने सवालों की आबरू रखती है। विपरीत इसके पटेलों (पाटीदारों) की राजनीति कर उसे पटेल जाति व सम्मान से जोड़ने की राजनीति चमकाने का नया नैरेटिव बनाने का असफल प्रयास अवश्य किया गया। वस्तुतः आप पार्टी का नाम आप ही गलत है। तू-तड़ाक, तू-तू मैं-मैं से बातचीत करने वाली पार्टी ‘‘आप’’ कैसे हो सकती है? जिस पार्टी के ‘‘ताज में ऐसे नगीने जड़े’’ हुए हैं, उसे तो ‘‘तू तड़ाके पार्टी ही कहना ही सही वास्तविकता है। झूठ का पुलिंदा (ताजा उदाहरण मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर एक महीने बाद सलाखों से बाहर लेने की बात बाहर लाने की बात केजरीवाल ने गुजरात (मेहसाणा की रैली) में कही है) लिये हुए ऊल-जलूल बयान (मनीष सिसोदिया की भगत सिंह से तुलना करना) वीरों की पार्टी आम आदमी का न होकर व्यक्ति विशेष की रह गई है। बौद्ध धर्म दीक्षा समारोह में डॉ. अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का बहिष्कार करने की बात कही गई है, को दोहराए जाने को लेकर उक्त विवाद की आंच गुजरात चुनाव पर पड़ने की आशंका के चलते स्वः स्फूर्ति से दिल्ली सरकार के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम को इस्तीफा देना पड़ा था। परन्तु यहां तो उलट गोपाल इटालिया का पार्टी बचाव कर रही है। केजरीवाल के इस दुःसाहस का दुष्परिणाम निश्चित रूप से आयेगा क्या?
परन्तु बावजूद इसके भाजपा व स्मृति ईरानी को इस बात का तो जवाब देना ही होगा कि वर्ष 2019 में दिये गोपाल इटालिया के उक्त बयान जिन्हें स्वयं भाजपा ने जारी किया है, तभी वर्ष 2019 में ही उनका संज्ञान लेकर तत्समय तुरंत क्यों नहीं कहा गया कि यह ‘‘राष्ट्रमाता’’ का अपमान है? तब भी नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री ही थे, भले ही गोपाल इटालिया प्रदेश अध्यक्ष नहीं थे। स्मृति ईरानी को इस बात को समझने में ही 3 साल लग गये? जो कथन निसंदेह असहनीय, घोर निंदनीय व अपमानजनक है। अतः ऐसी स्थिति में एक संकेत/निष्कर्ष यह भी निकलता है कि यह क्यों न माना जाए कि स्मृति ईरानी को प्रेसवार्ता कर जनता को उक्त बात बतानी पड़ी, भला ‘‘खलक का हलक कौन बंद कर सकता है’’? क्या यह राजनीति नहीं कहलायेगी? उक्त पुराने वीडियो को वायरल कर प्रेसवार्ता कर ‘हीरा बेन’ को राजनीतिक मुद्दा कौन बना रहा है? जिस बात की जानकारी अभी तक देश के नागरिकों को लगभग नहीं के बराबर (नगण्य) थी। उस वीडियो को वायरल कर उक्त अवांछनीय कथनों से संपूर्ण देश को अवगत किसने कराया? और उसके पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है? जरा सा दिमाग पर जोर लगाएंगे तो सब कुछ समझ में आ जाएगा।
स्मृति ईरानी का प्रेस वार्ता में साफ शब्दों में यह कथन की आप पार्टी ने प्रधान सेवक की मां का अपमान ही नहीं किया, बल्कि ‘‘गुजरात में’’ एक 100 वर्षीय मां का अपमान किया है। उक्त कथन ‘‘खंूटे के बल पर बछड़ा कूदने के समान’’ है जो राजनीतिक दृष्टिकोण को पूरी तरह से स्पष्ट कर देता है। क्योंकि स्मृति ईरानी ने गुजरात के अपमान का जिक्र किया, देश के अपमान का नहीं। जबकि प्रधानमंत्री की मां होने के कारण राष्ट्रमाता होने से यह देश के अपमान की बात है। चूंकि चुनाव गुजरात के हो रहे हैं, देश के नहीं, इस एक तथ्य में ही संपूर्ण जवाब छुपा हुआ है।
स्मृति ईरानी का आगे यह कथन की यह सब राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, स्वयमेव ही साफ संदेश देता है। राजनीतिक लाभ किसे व कैसे होगा? उस पार्टी को जिसने राष्ट्रमाता के प्रति अनर्गल आधारहीन अक्षम्य शब्दों का प्रयोग किया हो, जिससे देश में नाराजगी है? अथवा उस पार्टी को जो इस पुराने कथन को वर्तमान में होने वाले चुनाव के संदर्भ में उठा रही है? जैसे ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’ वैसे अरविंद केजरीवाल का यह ट्वीट भी चातुर्य राजनीति से परिपूर्ण है, जिसमें वे गोपाल इटालिया की गिरफ्तारी पर गुजरात के पटेल (पाटीदार) समाज में आक्रोश की बात कहते हैं, जिस पाटीदार आंदोलन में गोपाल इटालिया हार्दिक पटेल के साथ नेता रहे हैं। परंतु वे वह भूल जाते हैं कि विपरीत इसके इटालिया के कथन से पूरे देश में आक्रोश है।
..गुजरात में चुनाव आ गये है, जहां आप पार्टी पहली बार चुनावी मैदान में उतर कर उछल-कूद रही है। निश्चित रूप से इस बात का श्रेय अरविंद केजरीवाल को अवश्य जाता है कि देश की राजनीति की दशा व दिशा और नेरेटिव वे ही तय करते है, यह लगभग मीडिया द्वारा दी गई प्रत्येक घटना के कवरेज से सिद्ध होता है। क्या केजरीवाल के बनाए नेरेटिव को प्रभावहीन करने के लिए भाजपा ने राजनीतिक रूप से ‘‘ईट का जवाब पत्थर से’’ देने के लिए उक्त कदम उठाया? क्योंकि आश्चर्य की बात तो यह है कि देश व विश्व की सबसे बडी पाटी व सदस्य संख्या होने के बावजूद किसी भी कार्यकर्ता ने अभी तक देश में कही भी आप पार्टी या उसके प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ न तो थाने में रिपोर्ट लिखाई और न ही न्यायालय में निजी इस्तगासा पेश किया। मतलब कुल मिलाकर यह कि ‘‘करनी ना करतूत लड़ने को मजबूत’’।..
 स्मृति ईरानी का यह कथन तो बहुत ही हास्यास्पद व बिना किसी सबूत के है कि केजरीवाल के आदेश पर आप नेता ने तुक्ष राजनीति के चलते गुजरात और वहां के लोगों की भावनाएं आहत की हैं। ‘‘हुनर मदारी का और खेल जमूरे का’’। जबकि ‘‘आप’’ का यह दावा है कि यह पुराना वीडियो उस वक्त का है, जब गोपाल इटालिया आप पार्टी में थे ही नहीं। विपरीत इसके यदि काउंटर (पटल, प्रतिलेख) में स्मृति ईरानी पर क्या ऐसा ही आरोप नहीं लगाया जा सकता है कि उन्होंने पत्रकार वार्ता कर जो आरोप अरविंद केजरीवाल पर लगाए हैं, वह नरेन्द्र मोदी के इशारे पर है?
यद्यपि मैं यह समझता हूं कि प्रधानमंत्री बहुत ही बड़े दिलवाले व्यक्ति है और इस तरह की ओछी राजनीति में कभी न पड़ने वाले राजनेता है, जिनकी व्यक्तिगत जानकारी के बिना ही स्मृति ईरानी का उक्त कथन प्रेस वार्ता के माध्यम से सामने आया है। स्मृति ईरानी जी को आगे आकर इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि जब स्थापित नेताओं का परस्पर पार्टियों में आवागमन होता है, खासकर पिछले कुछ समय से भाजपा में कांग्रेस के कई दिग्गज विवादित, आरोपित, दोषी नेतागण भाजपा में शामिल हुए, तब उनके विवादित इतिहास को वहीं छोड़ दिया जाकर गले लगाया जाता है। तब ऐसी स्थिति में गोपाल इटालिया के आप पार्टी में आने के पूर्व के बयान की अहमियत क्या? और इसके लिए आप पार्टी कैसे जिम्मेदार ठहराई जा सकती है?
प्रेस वार्ता में स्मृति ईरानी की यह चुनौती तो और भी हैरत कर देने वाली है कि केजरीवाल गुजरात आकर नरेन्द्र मोदी की मां को गाली बके? निश्चित रूप से यह चुनौती चतुराई पूर्वक राजनीति से परिपूर्ण है। अन्यथा स्मृति ईरानी केजरीवाल को यह चुनौती देश के किसी भी स्थान के लिए देनी चाहिए थी। क्योंकि प्रधानमंत्री की मां होने के कारण वे राष्ट्रमाता (राष्ट्र की) है, सिर्फ गुजरात की नहीं। वस्तुतः तो स्मृति ईरानी का राष्ट्रमाता जी को इस तरह से चुनौती के लिए प्रस्तुत करना ही नितांत गलत है।
अभी तो गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है। परंतु चूंकि यह चुनाव प्रधानमंत्री के गृह राज्य का होने के कारण राजनैतिक आकलन करने वाले पंडितों की नजर में वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव की दिशा व दशा तय करने वाला होगा, इसलिए हर पार्टी इस विधान सभा के चुनाव को जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। परंतु यह समझ और कल्पना से बिल्कुल परे है कि राजनीति का स्तर कितना गिरकर स्तरहीन होकर समुद्र की कितनी गहराई की तल तक जाएगा? इसे रोकने की फिलहाल तनिक आशा भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। देश की गौरवशाली रही राजनीति का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।

शनिवार, 8 अक्तूबर 2022

"आत्मनिर्भर भारत अभियान में’’ "रेवडियों" का स्थान कहां है ?

पिछले कुछ समय से हमारे भारत देश में रेवडियाँ , मुफ्त सौगातें बांटने पर "माले मुफ़्त दिले बेरहम" की आदी होती जा रही जनता से लेकर राजनैतिक पार्टियों, नेताओं और उच्चतम न्यायालय तक में बहस चल रही है। प्रत्येक पक्ष अपनी ’रेवड़ी’ को मूलभूत सुविधाएं के नाम से जरूरतमंद को जरूरी मुफ्त सहायता और दूसरों द्वारा दी जा रही उन्हीं आवश्यक सुविधाओं को मुफ्त ’रेवड़ी’ बताकर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है। पंजाब में आप पार्टी की अभूतपूर्व विजय जिसमें इस बात से अंजान कि 'भेड़ जहां जायेगी वहीं मुंडेगी"  में इन रेवडियो का बड़ा योगदान माना जाता है, के कारण  गुजरात में होने वाले आगामी विधान सभा चुनाव को देखते हुए प्रधानमंत्री तक को इसमें हस्तक्षेप कर रेवड़ी और मुफ्त आवश्यक सुविधा में अंतर को स्पष्ट करना पड़ा। इसी कड़ी में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस संबंध में समस्त राजनीतिक पार्टियों को पत्र लिखकर निर्देश जारी किए हैं जिसका विपक्ष ने विरोध शुरू कर दिया है। चुनाव आयोग के इस ताजा पत्र ने उक्त विवाद को ताजा कर दिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की देश का ‘मान’, ‘स्वाभिमान’ व ‘विकास’ को उच्चतम स्तर पर ले जाने के लिए घोषित कई योजनाओं में से एक ’ आत्मनिर्भर भारत’ प्रमुख योजना है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत ’ पांच स्तम्भ’ हैं -अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढ़ाँचा, प्रौद्योगिकी, जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी), माँग। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभियान को प्रारंभ करने के बाद इसे रक्षा निर्माण व डिजिटल इंडिया तथा गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने से जोड़ा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत ही ’वोकल फार लोकल’ व ’मेक इन इंडिया’ का नारा दिया गया। प्रधानमंत्री की ’स्वनिधी योजना’ भी इस अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसानों की ’दोगुनी आय’ करने के लिए की गई ग्यारह घोषणाएं व गरीब श्रमिकों के लिए लागू की जा रही विभिन्न योजना जैसे किफायती किरायों के आवास परिसर बनाने की पहल,  श्रम संहिता में बदलाव, एक देश एक राशन कार्ड, विशेष क्रेडिट सुविधा आदि लागू की गई हैं।

'‘आत्मनिर्भर भारत’’ का शाब्दिक अर्थ देश की 130 करोड़ जनता के प्रत्येक वयस्क नागरिक का आत्मनिर्भर होना है, ताकि देश भी आत्मनिर्भर हो सके। आत्मनिर्भर का वास्तविक मलतब यही है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन यापन के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाए के लिए उसके पास आय के उपार्जन के इतने साधन हों कि मुफ्त सहायता/रेवडी लिए बिना अपनी न्यूनतम ’जरूरत की पूर्ति’ करते हुए वह समाज में सम्मान पूर्वक जी सके। इसके लिए किसी भी तरह की सरकारी, अर्द्धशासकीय, निजी या एनजीओं की सहायता की आवयकता न पड़े, एक वास्तविक आत्मनिर्भर भारत व नागरिक की यह एक आदर्श स्थिती है। परन्तु बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसे आत्मनिर्भर भारत बनाने के प्रयास के लिए क्या वैसी योजनाएं बन रही है या कार्य चल रहे हैं? इसके लिए सर्वप्रथम पहले तो सरकार को यह तय करना होगा कि जितनी भी सुविधाएं शासकीय योजनाएं या अर्द्धशासकीय स्तर पर जनता को जीने के लिए संवैधानिक अधिकार के रूप में उपलब्ध व प्राप्त है, को शैनः शैनः खत्म करने की एक बड़ी योजना बनानी होगी। आत्मनिर्भर भारत तभी आत्मनिर्भर कहलाएगा। परन्तु ऐसा लगता है कि ऐसी कोई भी दूरगामी योजना न तो शासन के पास है और न ही इस तरह का कोई ऐसा खाका जनता के सामने पेश किया गया है। इसलिए फिलहाल यह तो मानना ही होगा कि "तेल देख तेल की धार देखते हुए" आत्मनिर्भरता’ का नारा देकर एक ’दिवास्वप्न’ दिखाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है? ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार देश के प्रत्येक नागरिक को विदेशों से काला धन वापिस लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख जमा होने का वादा किया गया था, जिसे बाद में जुमलेबाजी तक करार कर दिया गया था। 

इस आत्मनिर्भर अभियान के संबंध में दो बिंदुओं पर अवश्य आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। सर्वप्रथम भारत विश्व के मात्र उन तीन देशों में शामिल है, जहां ’मुर्दों’ को भी बेचने पर कोई कानूनी शिकंजा या प्रतिबंध नहीं है, बल्कि शवों व अंगों की कालाबाजारी का एक बाजार है। दूसरा भारत उन 6 देशों में एक है जहां भुखमरी से मरने पर कोई कानूनन् अपराध गठित नहीं होता है। अर्थात इसे अपराध मानने का कोई कानून नहीं है। मतलब साफ है। इस देश में गरीबी इस हद तक निचले स्तर तक उतर गई है, जहां जरूरतमंद व्यक्ति मुर्दा के लिए लिए कफन न होने पर व अन्य आवश्यकताओं के लिए मुर्दे को बेचने की अनुमति है। भुखमरी का हाल बेहाल यह है कि भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 2014 में 99 वें स्थान से आज 119 देशों की सूची में 103 वे स्थान पर है। जहां हमारी स्थिति नेपाल व बंग्लादेश देशों से भी खराब है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू होने के बावजूद भुखमरी से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो उस जिले का कलेक्टर, विधायक, सांसद और अंततः प्रांतीय-केन्द्रीय शासन की जिम्मेदारी यदि संवैधानिक रूप से तय न की जाए तो, आत्मनिर्भर भारत का नारा कितना खोखला होगा? इसकी कल्पना की जा सकती है। उक्त जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को मृत्यु के पूर्व भुखमरी की  परिस्थितियों की जानकारी होने की स्थिति में धारा 304-ए के अंतर्गत दोषी अपराधी होने के लिए भारतीय दंड संहिता में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। इस देश की जनता आखिर कब जागरूक होगी? उसके सामने "आंखों में धूल झोंकने वाले" लोक लुभावने आकर्षक वादे पेश करने वाले राजनीतिक दलों, जन नेताओं की पहचान कर जनता विपरीत दिशा में उसका उतना ही कड़क जवाब चुनाव में उनकी जमानते जप्त करा कर क्यों नहीं देती? ताकि भविष्य में इस तरह की लोक-लुभावनी लगने वाली न लागू होने वाली आकर्षक योजनाएं के द्वारा जनता को बरगलाया न जा सके। आखिर 75 साल बाद उच्चतम न्यायालय और केंद्रीय चुनाव आयोग इस संबंध में अपने कर्तव्य के प्रति क्यों देरी से जागे? क्या जागने में हुई उक्त देरी के लिए उन्हे अपराध बोध के भाव से ’उन्मुक्त’ किया जा सकता है? अंततः न्यायपालिका और चुनाव आयोग ’मुफ्त सौगातों’ पर प्रभावशाली तरीके से रोक लगाकर देश के मेहनतकश नागरिकों के सम्मान को बढ़ाकर "उद्यमेन हि सिद्धयंति कार्याणि न मनौरथै:" की भावना से समस्त नागरिकों को मेहनत करने के लिए प्रेरित कर सकते है, इह बात की पुष्टि तो समय ही बतलायेगा।   

’मुफ्त सुविधाओं’ को लेकर आपको तीन प्रमुख दृष्टिकोण से देख कर आकलन करना होगा। ’प्रथम’ संवैधानिक अनिवार्यता क्या हैं? जैसे मुफ्त शिक्षा, मुफ्त चिकित्सा, हर हाथ को काम आदि-आदि। ’दूसरा’ जो यद्यपि संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है, तथापि देश के अमीर गरीब के बीच बढ़ती दूरी को देखते हुए निर्धन व अति निर्धनों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हे आवश्यक सुविधाएं मुफ्त देना, इस दृष्टिकोण से भी विचार करना होगा। ’तृतीय’ सिर्फ चुनावी लाभ की दृष्टि से जनता को "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" की लीक पर चलते हुए क्षणिक, अस्थाई लालच दिखाकर, गुमराह कर सत्ता में आने के लिए जनता से वोट लेना। इन समस्त परिस्थितियों के बीच इस तरह से संतुलन व सामंजस्य बनाया जावे कि धीरे-धीरे देश के प्रत्येक नागरिक को आत्मनिर्भर रूप से खड़ा किया जा सके। वर्तमान समस्या का हल यही है कि यदि राजनीतिक दृष्टिकोण, तुष्टीकरण की नीति को छोड़ कर शुद्ध जनहित की दृष्टि से व्यक्ति व अंततः देश के विकास को ध्यान में रखकर इस पर चिंतन किया जाये तो?

आत्मनिर्भर भारत की योजना के सिद्धांन्त को वृद्धाश्रम के सिद्धांन्त से सरल रूप से समझा जा सकता है। जिस प्रकार वृद्धाश्रम की प्रारंभिक अवस्था में समाज के लोग आगे आकर आश्रित व्यक्तियों को वृद्धाश्रम में शरण देकर उनके जीवन यापन की पूर्ति में सहयोग करते हैं। लेकिन इसे पूर्ण सफल तभी कहा जा सकता है, जब इसकी आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया जाए, ताकि "न रहे बांस न बजे बांसुरी" की उक्ति चरितार्थ हो सके। मतलब वृद्धाश्रम में जाने के मूल कारण को समाप्त करने के लिए परिवार के सदस्यों को उनकी जिम्मेदारियों का आभास कराया जाकर, जनता को जागृत करने पर अंततः जिम्मेदारी निभाने पर इसकी आवश्यकता ही नहीं होगी। संयुक्त हिंदू परिवार की सरचना का आधार ही यही था। परंतु अब संयुक्त हिंदू परिवार  के टूटने से वृद्धाआश्रमों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ठीक इसी प्रकार आरंभिक अवस्था में एक नागरिक की न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति के लिए आवश्यक सहायता देते हुए उसे शैनः शैनः उक्त मुफ्त सौगातों को पूर्णता बंद कर दिया जाए, तभी सही अर्थों में आत्मनिर्भर भारत बन पाएगा।

केंद्रीय चुनाव आयोग ने चुनावी वादों को लेकर पूरी जानकारी नहीं देने पर और उससे देश पर पड़ने वाले असर को नजर अंदाज न करने का तर्क देकर, चिट्टी लिख कर राजनीतिक दलों को यह अहम निर्देश दिया है कि राजनीतिक दल वोटरों को अपने वादों के आर्थिक रूप से व्यावहारिक होने की प्रमाणिक जानकारी देंगे, ताकि मतदाता उसका आंकलन कर सकेगें कि ये वादे "थोथा चना बाजे घना" तो नहीं हैं। खोकले चुनावी वादों के दूरगामी प्रभाव होते है। उच्चतम न्यायालय में उन्हीं मुफ्त वादों व मुफ्त की सौंगातों या चुनावी रेवड़ीयों के कारण सरकारी कोष पर पड़ने वाले बोझ का मामला विचाराधीन है। उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार हेतु तीन जजों की बेंच को मामला सौंपा है। यद्यपि केंद्रीय चुनाव आयोग ने अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय को बतलाया था कि चुनाव से पहले या बाद में मुफ्त रेवडी देना राजनीतिक दलों का ’नीतिगत’ फैसला है। वह राज्य की नीतियों और पार्टियों की ओर से लिए गए फैसलों को नियंत्रित नहीं कर सकता है। परन्तु अब अपनी नजरअंदाज  करने की भूल को सुधारते हुए उक्त पत्र लिखकर चुनाव आयोग ने  इस संबंध में शायद अपना दृष्टिकोण बदला है।

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

‘नाम परिवर्तन’’ के साथ कुछ शब्दों पर भी ‘‘प्रतिबंध’’ समय की मांग है।


शहरों, भवनों, स्मारकों, रेलवे स्टेशनों आदि नामों के बदलने का एक सिलसिला देश में काफी समय से चल रहा है। उसी कड़ी में हाल में ही राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने की घोषणा प्रधानमंत्री जी ने की है। इसके लिए निश्चित रूप से वे बधाई एवं धन्यवाद के पात्र है। शायद यह परिवर्तन के युग की समय की आवश्यकता भी है। इस बदलाव को विशिष्ट पहचान (संस्कृति, भाषा, स्थान योगदान, बलिदान इत्यादि) को स्पष्ट रूप से चिन्हित, प्रदर्शित और महसूस करने का प्रयास कहा जा सकता है। इस ‘चलती हवा’ के साथ हम क्यों नहीं कुछ शब्दों जो हमारी संस्कृति पर चोट पहुंचाते हैं, प्रतिबंध लगाने का कार्य नहीं कर सकते हैं?

‘‘हरामजादा’’ ‘‘हराम’’ ऐसे शब्द हैं, जिन पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। क्योंकि इन शब्दों में हमारी सर्वोच्च आस्था का नाम जुड़ा हुआ है।। इसका  पूरा अर्थ बहुत ही बुरा नकारात्मक ध्वनित, प्रदर्शित होता है। ऐसा नहीं है कि शब्दों पर प्रतिबंध लगाने का यह कार्य पहली बार होगा। पूर्व में भी हम जरूरत के अनुरूप शब्दों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। याद कीजिए अनुसूचित जनजाति शब्द जिस शब्द (...) के लिए इसका प्रयोग किया गया है, उसे प्रतिबंधित किया जा चुका है। निर्भया, दिव्यांग शब्द की उत्पत्ति भी इसी कारण से हुई है। उक्त शब्दों को स्पीकर ने भी असंसदीय घोषित किया है। जब माननीयों के लिए उक्त शब्दों के उपयोग पर विधानसभा में प्रतिबंध है, तब उक्त प्रतिबंध को विधानसभा के बाहर बढ़ाकर आम प्रचलन में और आम जनता के लिए भी  क्यों नहीं लागू  कर दिया जाना चाहिए?

मेरे राम के देश में जहां हम रामराज्य से गुजर चुके हैं, आज वहां भव्य राम मंदिर निर्माण हो रहा है, उसी देश के राम भक्तों से यही अपील करता हूं कि वे उक्त अपशब्दों पर प्रतिबंध लगाने के लिए मुहिम चलाएं। परिस्थितियां इसके बिल्कुल अनुकूल है। आवश्यकता सिर्फ आपके जागृत होने मात्र की है।

यहां उल्लेखनीय है कि सांसद साध्वी निरंजन ज्योति के द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उक्त हरामजादों शब्द के उपयोग करने पर न केवल प्रधानमंत्री मोदी ने उनको फटकार लगाई, बल्कि उनको माफी भी मांगनी पडी।

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