मंगलवार, 29 सितंबर 2020

‘‘गिरता चरित्र‘‘ क्या हमें ‘‘चरित्रवान‘‘ बनने का संदेश देगा?

        
‘‘कोविड-19’’ सेे कमोबेश पूरा विश्व  संक्रमित है; कहीं हम से कम, तो कहीं ज्यादा। परन्तु हमारे देश में शासन व प्रशासन के विभिन्न अंगों के साथ लगभग संपूर्ण तंत्र ‘‘कोरोना काल’’ में जिस तरह से कार्य कर रहे हैं, वह स्थिति निश्चित रूप से शोचनीय, चिंताजनक और एक सीमा तक निंदा जनक भी है। ‘‘राम मंदिर निर्माण’’ के रास्ते चलकर ‘‘रामराज्य’’ लाने की कोशिश करने वाली एकमात्र पार्टी, वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को आखिर हो क्या गया है? क्या इसे हम मात्र कोविड-19 का अस्थाई प्रभाव कह कर टाल सकते हैं? अथवा समस्त क्षेत्रों के ‘तंत्र’ में हो रही गिरावट को रोकने के बजाय भाजपा सिर्फ राजनीति के चलते कहीं उसमें सहायक तो सिद्ध नहीं हो रही है?
जब मैं भाजपा को जिम्मेदार ठहराता हूं, तो कुछ लोग मुझसे कहते है कि आप कई बार अपनी पृष्ठभूमि के विपरीत चले जाते हैं। तब मैं यही कहता हूं कि मैं किसी के खिलाफ नहीं जाता हूं; अपनी नीर क्षीर विवेक से सिर्फ उपलब्ध तथ्यों का ही विश्लेषण करने का प्रयास मात्र करता हूं। चूंकि जब कभी तथ्य आपके विपरीत होते है, तब शायद आपको ऐसा लगता होगा। परन्तु आपकी बात तब ही सही हो सकती है, जब मैं गलत तथ्यों को अथवा तथ्यों को गलत रूप से प्रस्तुत कर विश्लेषण करू। वैसे एक बात और! उक्त आरोप में ही उत्तर भी निहित है। अर्थात मैं भाजपा की बात इसलिए करता हूं कि, वर्तमान में कांग्रेस अप्रासंगिक व अप्रभावी होती जा रही है। अतः किसी भी क्षेत्र में देश की स्थिति को सुधारने के लिये कांग्रेस की चर्चा करना मात्र समय की बर्बादी ही है। यद्यपि भाजपा के पास विराट व्यक्तित्व वाले नेतृत्व के साथ-साथ विशाल बहुमत भी है, परंतु दुर्भाग्यवश प्रखर प्रभावी सोच रखने वाला विपक्ष वर्तमान में लगभग नगण्य सा हो गया है। जबकि कांग्रेस के स्वर्णकाल अर्थात वर्ष 1952 से लेकर ऐतिहासिक अभूतपूर्व बहुमत (वर्ष 1984) के समय तक, विपक्ष नगण्य होने के बावजूद गंभीर विषयों पर सार्थक व बुलंद आवाज करने वाले समस्त क्षेत्रों के जानकार विपक्षी थे। इसलिये  आम नागरिकों की आकाक्षांओं एवं आशाओं की पूर्ति का केंद्र भाजपा उपरोक्त सुविधाजनक स्थिति मैं होने के बावजूद जब कोई आवश्यक जनहितकारी कदम नहीं उठा पाती है, तब उसे सचेत करना ही मात्र एक विकल्प रह जाता है। आइए! विषय पर आते है और आगे देखते हैं, आखिर हो क्या रहा है। 
देश की समस्त समस्याओं को सुशांत और सुशांत से संबंधित ‘रिया’ फिर ‘कंगना’ ‘दीपिका पादुकोण’ आगे शायद ‘करण जौहर’ और अब फिल्म उद्योग के ड्रग्स रैकेट तक सीमित कर भाजपा इसे क्या अपनी सफलता मान कर खुशफहमी पाले हुये है? या वास्तव में यह उसकी असफलता है? आखिर ‘‘सुशांत‘‘ को ‘‘शांत‘‘ क्यों नहीं होने दिया जा रहा है? शायद जब तक, महाराष्ट्र सरकार से लेकर बिहार सरकार का भाग्य ‘तय’ नहीं हो जाता? जबकि बेहद दुखद अवस्था में सुशांत ‘‘स्वर्गवासी‘‘ होकर स्वयं तो ‘‘शांत‘‘ हो गए (या कर दिये गये?) लेकिन वे जाते जाते ‘‘वर्तमान‘‘ को अशांत कर गए।
सुशांत प्रकरण में एक और अदभुत बात हुई है।कभी आपने सुना है,  पोस्टमार्टम या विसरा की  जांच रिपोर्ट देने के पूर्व  डॉक्टर्स और जांच एजेंसियों के बीच चर्चाओं का दौर होकर सहमति बनाने का प्रयास किया जाता है? जो सुशांत प्रकरण में एम्स के डॉक्टर्स व सीबीआई के बीच "विसरा" की जांच को लेकर की गई। फिलहाल सुशांत की आत्महत्या से लेकर हत्या तक की जांच का मामला एक तरफ रह  गया है, यानि कि ‘‘आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’’। जैसा कि स्वयं सुशांत के वकील ने सीबीआई पर आरोप भी लगाया है। सुशांत का खुद ड्रग्स का नशा करना और उसके फार्म हाउस में नशे (ड्रग्स) लेने से लेकर सप्लाई तक के मामले में एनसीबी की जांच में फिल्म उद्योग के बहुत से कलाकार एक-एक कर "रडार" पर आ रहे है, जिसने समाज के एक वर्ग में ‘‘तूफान‘‘ सा पैदा कर दिया है। फिल्मी कलाकार, लेखक, आलोचक और टीवी बहसों में बैठने वाले रजिस्टर्ड वक्ता, प्रवक्ता गण अब देश को यह समझाने में लगे हैं कि, सुशांत प्रकरण के कारण फिल्म उद्योग का यह एक घिनौना चेहरा आम लोगों के बीच सामने आया है। ‘‘दीपिका पादुकोण’’ जैसी प्रसिद्ध ग्लैमरस अभिनेत्री जिसे देश के लाखों युवा वर्ग अनुसरण करते हैं, के ड्रग्स स्कैंडल में नाम आ जाने से युवा वर्ग पर पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा, इससे चिंतित वक्ता, प्रवक्तागण मीडिया के प्लेटफार्म का उपयोग करके हमें उक्त आदर्श की बात समझाने का प्रयास कर रहे है।
आखिर आज हम कौन से समय में या किस युग में आ गए है? जिस सुशांत पर स्वयं ही उनसे जुडे़ हुये कुछ लोगो द्वारा ड्रग्स संबंधित आरोप लगाए जा रहे हो, जिसके फार्म हाउस में ड्रग्स की पार्टियां होती रही हो, और जो दो महिलाओं के साथ ‘लिव इन रिलेशन’ में रहता रहा हो, तब ऐसे ‘‘चरित्र‘‘ को मीडिया व बिहार की राजनीति का ‘‘आइकॉन‘‘ बना कर समाज को "चरित्र का आईना" दिखाने का प्रयास, क्या यह एक मजाक नहीं है, तो क्या है? दीपिका पादुकोण के तथाकथित कृत्य के कारण युवा वर्ग पर पड़ने वाले  बुरे प्रभाव को लेकर आलोचना करने वाले  क्यों यह भूल जाते हैं कि फिल्म उद्योग सिर्फ ड्रग्स सेवन का ही नहीं, बल्कि अश्लीलता, कास्टिींग काउचिंग, "भाई" व गैंगेस्टर से संबंध, पक्षपात, परिवारवाद आदि अनेक बुराइयों से भरा पड़ा हुआ है। और यह आज से नहीं है, काफी पहले से ही है। क्या इतने सालों से इन तथाकथित समाज सुधारकों की आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ था? तब इन्होनें ड्रग्स सेवन व अन्य बुराइयों के विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाई? (तब बिहार चुनाव नहीं थे? और जब बिहार चुनाव थे, तब सुशांत जैसे प्रकरण नहीं थे?) क्या ‘‘लिव इन रिलेशन शिप‘‘ फिल्म उद्योग के कलाकारों या हमारे जीवन की नैतिकता को ऊंचा उठाती है? क्यों नहीं तथाकथित समाज सुधारक उक्त नैतिकता‘‘ को ऊंचा उठाने के लिए उन्हे ‘‘मेडल‘‘ प्रदान कर देते? क्योंकि आजकल खासकर फिल्म उद्योग मे तो हर चीज ‘‘प्रायोजित’’ ही तो होती है। 
धर्मेंद्र-हेमा मालिनी के बाबत किसी महिला या पुरुष कलाकार या बुद्धिजीव वर्ग व तथाकथित समाज सुधारको ने कभी आवाज नहीं उठाई? एक पत्नी के होते हुए बगैर विवाह-विच्छेद (तलाक) किये दूसरी शादी करना न केवल नैतिक मूल्यों की गिरावट है, बल्कि कानून का उल्लंघन होकर धारा 494 के अंतर्गत ‘‘द्विविवाह’’ का एक अपराध भी है। धर्मेंद्र ने पहली पत्नी के रहते हुए बगैर तलाक लिए दूसरी शादी ‘‘ड्रीम गर्ल‘‘ हेमा मालिनी से की थी। धर्मेंद्र की पहली पत्नी के द्वारा शिकायत न करने के कारण वे अपराधिक अभियोजन से बच गए थे। देश के ये दोनों कलाकार अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण इतने बड़े आइकॉन बन गए कि देश की जनता ने उन दोनों महान कलाकारों को देश की उस संसद में भेजा जहां कानून का निर्माण होता है। व्यभिचार (एडल्ट्री) जो धारा 497 के अंतर्गत एक घृणित सेक्स अपराध था,को उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय द्वारा अवैध घोषित कर दिया था।वही संसद जिसने शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित निर्णय को संविधान संशोधन विधेयक पारित कर "शून्य" कर दिया था। लेकिन उक्त अवैध घोषित धारा 497 को समाज सुधार व भारतीय संस्कृति को बनाएं रखने के लिए शाहबानो प्रकरण के समान  पुनर्स्थापित नहीं किया।
फिल्मी कलाकारों के बीच जो नशे का सेवन हो रहा है, क्या वास्तव में देश, समाज और स्वयं व्यक्ति के लिए इतना नुकसानदायक है कि उसको खत्म करने का बीड़ा मीडिया और उसके पीछे खड़ी सरकार ने उठा लिया है? मीडिया के पीछे सरकार की बात इसलिए कहीं जा रही है, क्योंकि अधिकतर मीडिया हाउसेस में अंबानी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप का ज्ञान मीडिया के लोगो को है। और ‘‘अंबानी‘‘ को कौन चला रहा है, यह देश जानता है। इसीलिए मीडिया के बीच के ही कुछ लोग ‘‘गोदी मीडिया‘‘ कहने में परहेज नहीं करते हैं। इस प्रकार ड्रग रैकेट के विरुद्ध कार्रवाई कर ‘‘रामराज्य की स्थापना‘‘ की ओर एक कदम और बढ़ाने का दावा जरूर किया जा सकता है? परंतु ड्रग्स सेवन के विरुद्ध आवाज कितनी खोखली है, इसका अंदाजा आपको आगे लग जाएगा। 
नशा सिर्फ क्या ड्रग्स का ही होता है? भांग, गांजा, चरस, हैरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम, हशीश, चिलम, सिगरेट, सिगार, हुक्का, शराब, पान, तंबाकू, बीड़ी, आदि न जाने कितनी चीजें लोग नशे के रूप में लेते हैं। सिर्फ फिल्म उद्योग के लोगों की ही ड्रग्स के नशे की बात क्यों की जा रही हैं? क्रिकेट, राजनीति, उच्च (एलीट) वर्ग (स्टेट्स के लिये) और न जाने कितने क्षेत्रों में यह रोग फैला हुआ है। जिस प्रकार मानसिक तनाव को दूर करने के लिये कुछ फिल्मी कलाकार ड्रग्स का सेवन कर रहे है। उसी प्रकार क्रिकेटर्स भी अच्छे परिणाम के लिये प्रतिबंधित दवाइयों का उपयोग करते है। क्या यह सब नशीली चीजें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है? लेकिन ऐसा लगता है कि इनमें से कई नशीले पदार्थ सरकार के लिए राजस्व का एक बड़ा साधन है। पैकिंग पर ‘‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है‘‘ लिखा हुआ एक रैपर चिपका दीजिए और फिर खूब ‘‘पीजिए’’ ‘‘धुआ छोडिये’’,‘‘गहरी सासें’’ लीजिये! और कहिये ‘‘दम मारो दम’’। आप ‘‘पीकर खुश‘‘ हैं क्योंकि आप ‘गम’ को पी रहे है और सरकार बिना पिए ही खुश है, क्योंकि सरकार को खजाने में भारी भक्कम पैसा मिलने से वह गमगीन नहीं है। और हम सबने यह देखा ही है ‘‘न बीबी न बच्चा’’, ‘‘न बाप बड़ा न मैया’’ ‘‘होल थिंग इज़ दैट कि भैया’’ ‘‘सबसे बड़ा रुपैया‘‘। 
सरकार का नशे के मामले में दो तरफा रवैया क्यों है ?एक तरफ कुछ नशीले द्रव्यों को कुछ वैधानिक चेतावनी के साथ विक्रय एवं उपयोग करने की अनुमति देती है, तो दूसरी ओर कुछ नशीली चीजों के विक्रय व उसके उपभोग पर प्रतिबंध लगाकर उसे एक अपराध घोषित करती है। इसी को कहते है ‘‘गुड़ खाए" और गुलगुलों" से परहेज़ करें’’। आखिर "नशा तो नशा" ही है। लगभग प्रत्येक नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हम देखते हैं, प्रत्येक वर्ष सिगरेट, तंबाकू से कैंसर व अन्य बीमारियां उत्पन्न होकर हजारों व्यक्ति मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। यदि कुछ दृव्यों को छोड़ दिया जाए तो, अधिकतर नशीली पदार्था के उपभोग से उपभोक्ताओं की आर्थिक बर्बादी ही होती है। और इस बर्बादी की ही कीमत पर सरकार अपनी जेब भरती है। यह कौन सा सामाजिक न्याय है? क्योंकि अंततः सरकार को भी तो नागरिकों के प्रति अपने जिम्मेदार होने का एहसास दिखाने के चलते इन व्यक्तियों के स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर करोडों रुपए आगे पीछे खर्च करने ही होते हैं। "आपदा को अवसर" में बदलने का एक मौका सरकार को "सुशांत" ने दे दिया है। उठाइये कदम और "अवसर" में बदलकर अपने कथन को तार्किक व वास्तविक तथ्यात्मक बल प्रदान कीजिये।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

‘कोरोनाः ‘गैर जिम्मेदारों का ‘‘बेताज बादशाह’’।

 क्रमशः गतांग से आगे : द्वितीय भाग 

‘‘शासन’’ ‘‘प्रशासन’’ ‘‘स्वास्थ्य योद्धा’’ "मीडिया" एंव "नागरिकगण" कटघरे में?  

अब ‘तंत्र’ के द्वारा शासित व्यक्तियों अर्थात नागरिकों की बात कर लें। वैसे तो अभी तक कोविड-19 की कोई दवाई नहीं बन पाई है। सभी परीक्षण चरण (स्तर) पर हैं। उपरोक्त वर्णित तीनों सावधानियां ही इसकी एहतियाति दवाइयां हैं ,जो रोग को आने से रोक तो सकती हैं। परन्तु रोग हो आने पर उसका इलाज नहीं कर सकती हैं। ये सावधानियां लगभग निशुल्क ही है। मास्क व सैनिटाइजेशन पर सामान्यतया 100 रू. महीने से ज्यादा का खर्चा नहीं है। अर्थात ‘‘न हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आये’’। इसके बावजूद कोरोना वायरस के इस तेजी से बढ़ते संक्रमण का मुख्य वास्तविक कारण तंत्र का शासक पक्ष नहीं बल्कि तंत्र द्वारा शासित हम आम नागरिक गण ही है। हम स्वस्थ बने रहने के लिए उक्त नगन्य खर्चीली सावधानियों को नहीं बरत पा रहे हैं। तो उसके लिए जिम्मेदार कौन? वैसे पढ़ने, लिखने, सुनने में उक्त  सावधानियां बरतना जितनी आसान दिखाई पड़ती है, कार्य रूप में परिणित करने पर उतनी है, नहीं! उसका कारण हमारे जीवन में मात्र अनुशासन की कमी का होना ही है। हर समय हमें उपरोक्त सावधानियां बरतने का ध्यान नहीं रह पाता है और कहीं न कहीं ‘जाने अनजाने’, ‘चाहे अनचाहे’ हमसे लापरवाही हो ही जाती हैं। चूंकि देश में इस समय हर जगह ‘‘रैकेट‘‘ (ड्रग्स) की ही चर्चा हो रही है, तब ‘‘कोरोना रैकेट’’ पर चर्चा क्यों न कर ली जाए। आखिर कोरोना रैकेट है क्या? आपको यह जानकर सुनकर आश्चर्य नहीं होता है कि जैसे ही किसी व्यक्ति की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव  आती है, उसकी हैसियत (स्टे्टस) स्वास्थ्य कर्मियों के बीच अचानक बढ़ जाती है? और तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण की संख्या के समान उसके इलाज का खर्च बढ़कर प्रतिदिन का सामान्यतया चालीस पचास हजार से लेकर एक डेढ़ लाख रूपये तक पहुंच जाता है। वह भी तब, जबकि कोरोना की अभी तक कोई गोली, इंजेक्शन या वैक्सीन नहीं है, जिस पर कोई पैसा खर्च हो। यही कोरोना रैकेट है। सामान्य सर्दी, जुकाम, खांसी होने पर डॉक्टरों के पास जांच करवाने जाने पर वे आपको भर्ती कर कोरोना टेस्ट करवाते हैं। और आमतौर पर कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव ही आती है। चार-पांच दिन के बाद आपको अस्पताल से छुट्टी भी दे दी जाती है। और आपको घर में ही ‘क्वारन्टाइन’ होने के लिए कहा जाता है। वैसे तो डॉक्टरों के पास आजकल कोविड-19 के मरीजों को छोड़कर अन्य बीमारियों के मरीजों को देखने का समय ही नहीं है। फिर भी यदि आप अन्य बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती हैं और यदि आपकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो तुरंत आपको दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है और आपके समस्त चार्जेस दो तीन गुना बढ़ा दिए जाते हैं। अभी तो हालत यह है कि कई अस्पतालों में दो-दो लाख रूपये लेकर अग्रिम बुकिंग कराई जा रही है। उक्त स्वास्थ्य इलाज की बातें जो  उल्लेखित की हैं, वह विभिन्न लोगों से हुई चर्चा पर आधारित हैं।  

 ‘कोरोना’ के लिये जो विभिन्न किट्स का उपयोग कर टेस्टिंग की जा रही है, (रैपिड टेस्ट, रियल टाइम पीसीआर टेस्ट, ट्रूनैट टेस्ट और सीबीएनएएटी टेस्ट, ऐंटीबॉडी टेस्ट, ऐंटीजेन टेस्ट) उन पर भी सरकार एवं भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद एकमत और दृढ़ नहीं है। जनवरी 20 में सिर्फ एक प्रयोगशाला थी, मार्च में  संख्या बढ़कर 121 हुई और अब 1,223 हो गई है। इस प्रकार प्रकार प्रयोगशाला की संख्या में बढ़ोतरी अदभुत है। टेस्टिंग प्रारंभ में मात्र कुछ सैकड़े प्रतिदिन की हो रही थी, उसमें भी लगातार तेजी से वृद्धि होकर आज प्रतिदिन 7-8 लाख के आसपास की हो रही है, जो भी एक बड़ी उपलब्धि है। इसी प्रकार सरकार ने टेस्टिंग किट का उत्पादन भी  उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। इस प्रकार इन सब 'आवश्यक' वृद्धि के लिए सरकार बधाई की पात्र है। इस प्रकार उपरोक्त उल्लेखित सावधानियां  जो कि अपने आप में अपूर्ण है की तुलना में डाक्टरों के द्वारा उपयोग की जाने वाली पीपीई किट ही 100 प्रतिशत सुरक्षित सावधानी है, तब हम उसके उत्पादन की बात क्यों नहीं करते? "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है"। इस कोरोना काल में भी हमारे देश ने यही सिद्ध किया हैं। आवश्यकतानुसार  कोरोना टेस्टिंग किट व मास्क उत्पादन की संख्या में कई गुना वृद्धि की गई है। क्या हमारे वैज्ञानिक अनुसंधान कर सामान्यजन के उपयोग हेतु सस्ती व अधिक समय तक उपयोग की जाने वाली पीपीई किट का निर्माण नहीं कर सकते है?क्योंकि यह किट लम्बे समय तक नहीं पहनी जा सकती है। इसलिए उन नागरिकों का यह दायित्व हैै कि भीड़ भाड़ वाले इलाके में जहाँ जाना अतिआवश्यक हो, वहीं पर ही ‘किट’ पहन कर इसका उपयोग करें। जिस प्रकार कपडों के शोरूमों में कपड़े बदलने वाले 'चेजिंग रूम' होते है, ठीक उसी प्रकार भीड़ भीड़ वाली जगहों पर 'किट' पहनने के लिए भी चेजिंग रूम बनाये जाने चाहिए। ताकि लम्बे समय तक किट पहनने की जरूरत नहीं रहेंगी। ठीक इसी प्रकार वाहनों में भी ग्लास के स्लाइडिंग पार्टीशन लगाये जाने से 'सुरक्षित' रूप से अधिक संख्या में व्यक्ति बैठ सकते है। इन सब बातों पर भी सरकार को अवश्य ध्यान देना चाहिए, ताकि लोग कोरोना के साथ बैगर किसी भय के जीवन जीने की आदत ड़ाल सकें। वह इस कारण भी कि एक बार संक्रमित होने के बाद संक्रमित हुआ व्यक्ति पुनः संक्रमित नहीं हो सकता है , इसकी गांरटी फिलहाल कोई नहीं दे रहा हैं। बल्कि इसके 'विपरीत आशंका' व्यक्त की जा रही है। एक बात और! संक्रमित व्यक्ति की पहचान बताने या न बताने के संबंध में भी सरकार दुविधां में है, जिसे तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। रेप पीड़िता समान  विक्टिम  की तरह  कोरोना  संक्रमित  व्यक्ति की पहचान को सार्वजनिक न करने का कोई औचित्य नहीं है। संक्रमित की पहचान आवश्यक रूप से बतलाई जानी चाहिये, ताकि अन्य जानकर व पड़ोसी सावधानी बरत सकें।                                                                                                                              'वायरस संक्रमित कोरोना काल' की कितनी "हितकर" "अहितकर" उपलब्धियां है? जिसके लिए यह बीमारी हमेशा याद की जायेगी। आइये उसकी भी चर्चा कर लें। प्रथम हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृति में इंसान की मृत्यु होने के बाद 13 दिन का शोक और एकांतवास रखा जाता है और पूर्ण शुद्धि के बाद ही सामान्य जीवन दिनचर्या पुनः प्रारंभ होती है। ठीक उसी प्रकार कोरोना ने 14 दिन के लिए व्यक्ति को जीते जी वनवास, अवसाद और एकांतवास में ड़ाल दिया है। दूसरी हमारी संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं के चलते घर के सदस्य, दोस्त, अड़ोसी-पड़ोसी या अन्य कोई भी परिचित के देहवसान पर हमें स्वाभाविक दुख होता है। सब व्यक्ति मिलकर अपनी संस्कृति के अनुसार अंतिम क्रिया कर्म कर दुख के वजन को कुछ कम करने का प्रयास करते है। अंततः समय ही सबसे बड़ी दवा होती है, जो इन घावो को भरती है। परंतु कोरोना काल की एक उपलब्धि यह भी है,और उसमें शासन की नीति का ज्यादा योगदान है कि, कोरोना से मृत्यु हो जाने के बाद आपको अपनी पुरानी प्रचलित संस्कृति के अनुसार न तो मृतक के अंतिम दर्शन हो पा रहे है, और न ही उसका अंतिम संस्कार कर पा रहे हैं। 13 दिनों की अंतिम यात्रा की धार्मिक प्रक्रिया हमारे हिन्दू धर्म शास्त्रों में बतलाई गयी है, लेकिन कोरोना के लिये वर्णित सावधानियों के पालनार्थ "उन क्रियाओं" पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। सावधानियां और ड़र के बीच एक ‘‘लक्ष्मण रेखा’’ निश्चित रूप से है। लेकिन सरकार, खासकर मीडिया इस 'अंतर' की बारीकी को समझने व समझाने के बजाय 'ड़र का खौंफ' पैदा कर रही है। इसी कारण से आम नागरिकों का बीमारी से लड़ने का 'अस्त्र' स्वालंबन, आत्मबल व आत्मविश्वास खत्म होते जा रहा है। जबकि इस बीमारी से लड़ने के लिये इन अस्त्रों की ही सबसे ज्यादा आवश्यकता है। इस बीमारी के साथ रहते हुये हम जीवन को ठीक उसी प्रकार ‘जी’ सकते है, जिस प्रकार  सड़क रेल हवाई  यात्रा दुर्घटना में मृत्यु दर लगभग 7.30 प्रतिशत (कोरोना की 1.9 प्रतिशत मृत्यु दर जो दुनिया में सबसे कम है की तुलना में) होने के बावजूद बिना ड़र के ट्रेन, बस और हवाई जहाज, जहां पर हम स्वयं चालक सीट पर नहीं बैठे होते है, तब भी यात्रा कर सामान्य जीवन जी रहे है। पूर्व में ‘सार्स’(एक्यूट रेस्पयरेटरी सिंड्रोम) बीमारी से 10 प्रतिशत, स्वाईन फ्लू से 4.5 प्रतिशत व ‘इबोला’ में इससे भी अधिक मृत्यु दर हमने देखी हैैैं। लेकिन तत्समय ऐसा ड़र न दिखाई नहीं दिया न महसूस किया गया। तीसरी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कोरोना की, यह है कि, यदि उक्त सावधानियां को पूर्ण रूप से पालन करके कोरोना से बचना है तो, निश्चित रूप से पूर्ण आत्म अनुशसित जीवन जीना ही होगा। तभी हम उक्त सावधानियां का पूर्ण रूप से पालन कर पायेगें और अपनी जीवन की रक्षा कर पायेगें। इस प्रकार कोरोना निश्चित रूप से एक नागरिक को मृत्यु के भय के कारण अनुशासित अवश्य ही बनायेगां। जब लॉकडाउन भी पूर्ण सफल सही विकल्प नहीं है जैसा कि नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य रेड्डी ने माना है। तब सरकार देश की समस्त गतिविधियों को सामान्य रखकर देश के जिम्मेदार नागरिकों को जिम्मेदार होने का एहसास देने का मौका क्यों नहीं देना चाहती हैं? ताकि देश की प्रगति तो इस कारण से न रूक पाए। इस सबके बावजूद यदि नागरिकगण सावधानी नहीं बरतते है तो, उनको आत्महत्या धारा 309, आत्महत्या के लिये उत्प्रेरित करना धारा 306 और गैर इरादतन हत्या धारा 304 का दोषी तथा महामारी अधिनियम के उल्लघंन का दोषी मानकर भारतीय दंड सहिंता की धारा 188 में उनके विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। एक नागरिक के इस अपराधिक कृत्य के लिए 'सरकार' कैसे 'जिम्मेदार' ठहराई जा सकती है? इसलिए सरकार अनिश्चिताओं के आवरण से बाहर निकले और 'कोरोना' को अन्य बीमारियों के समान जीवन की 'आवश्यक बुराई' मानते हुए स्वयं पूर्ण सावधानी के साथ कार्य करें और जनता को भी करने की प्रेरणा दें। साथ ही स्वास्थ्य योद्धाओं का स्वागत व सम्मान करते हुये उनके ही बीच में मौजूद स्वास्थ्य सेवा में चल रहे रैकेट को समाप्त करने के लिए वर्तमान कानूनों में कड़े प्रावधान लाकर स्वास्थ्य सेवाओं पर कड़ी निगरानी रखें। चर्चा और सहमति बनाकर हर खर्चों की उचित "न्यूनतम" एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) तय कर उसका "सार्वजनिक प्रदर्शन" अनिवार्य कर उसकी उचित कड़ी निगरानी करके उसको 'धरातल' तक लागू भी करवाएं। तभी हम इस मानव निर्मित कोरोना वायरस को यथासंभव एवं अधिकतम सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक 'सावधानियों' के साथ लेकिन बिना ड़र के जिंदगी "जी" सकेगा, जो उसका अधिकार एवं कर्तव्य दोनों है। "जितना ज्यादा आत्म  अनुशासित जीवन, उतनी ही ज्यादा सावधानियों का पालन और और उतना ही भय मुक्त जीवन"! कोरोना से निपटने की यही एक "संजीवनी बूटी" है। अंत में इस लेख का समापन इस निष्कर्ष के साथ  किया जा सकता है कि "कोरोना ने संवैधानिक तंत्र लोकतंत्र के शासक व शासित  (नागरिक गण) दोनों पक्षों को असफल और गैर जिम्मेदार सिद्ध कर दिया है"।

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