बुधवार, 1 जुलाई 2020

हमारे देश में ‘‘कानून‘‘ क्या ‘उल्लंघन‘ के लिए ‘‘ही’’ बनाए जाते हैं?


                                                                  
राष्ट्रहित में सभ्य व अनुशासित तरीके से समाज में जीने के लिए नागरिकों के लिये प्रथम ‘‘संविधान’’ का निर्माण और फिर संविधान द्वारा प्रदत अधिकारों के तहत विधायिका द्वारा आवश्यकतानुसार विभिन्न कानून नियम बनाए गये हैं। नियम व कानून बनाने तथा संशोधन करने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। इन्ही पारित कानूनों के द्वारा प्राप्त अधिकारों के तहत कार्यपालिका भी नागरिकों के जीवन में अनुशासन ढ़ालने के लिए समय-समय पर आवश्यक आदेश, निर्देश जारी करती रहती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि, हम शायद इतने अनुशासनहीन नागरिक हो गये हैं कि, सांस लेने से लेकर मरने तक अनुशासित रूप से जीने के लिए (जिनमें बहुत से कार्य बिना कानून के व स्वेच्छा से ही होना चाहिये) हमारे देश में शायद इतने नियम कानून बने है जो शायद विश्व में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। कुछ कानून तो ऐसे है जो बेतुके, अप्रांसगिक अवांछित और अजीबोगरीब है। शायद इसलिये क्या हमें ‘नागरिक’ कहलाने का या दावा करने का ‘‘मौलिक नैतिक’’ हक है?
क्या आप जानते है कि देश में करीब 3.1 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनके निपटारे में 364 साल लगेंगे, बशर्ते न्यायाधीशों की संख्या प्रति 10 लाख लोगों पर 10.5 की हो। प्रधानमंत्री नियुक्त होने के फौरन बाद नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय सचिवों से कहा था कि, आप अपने विभाग से संबंधित मुझे 10 ऐसे कानून या नियम बताइए जिन्हें हम निरस्त कर सकते हैं। एनडीए सरकार द्वारा अपने दो कार्यकाल में अभीतक 1874 पुराने कानून को खत्म कर चुकी है। देश में लागू संपूर्ण कानूनों की कोई सूची उपलब्ध नहीं है। केन्द्रीय कानूनों की संख्या अनुमानित 3000 के करीब बताई जाती है। इसी तरह 1998 में गठित जैन आयोग ने अनुमान लगाया था कि 25000-30000 के आसपास राज्यों के कानून हो सकते है इसके अलावा प्रशासकीय और स्थानीय कानूनों की तो गणना ही संभव नहीं है।
कोरोना काल में बने नियमों व आदेशों और तदनुसार जारी निर्देशों ने मेरे ध्यान में यह बात पुनर्जीवित की है कि, क्या हमारा ‘‘गरीब’’ देश इतने भारी भरकम अमीर कानूनों का भार सहन कर सकता है? भारी भरकम व अमीर शब्द का प्रयोग इसलिये किया है कि, वास्तव में कुछ कानून ऐसे है, जिनका परिपालन भारी भरकम प्रक्रिया लिये हुये है; व कुछ के निष्पादन व अनुपालन बहुत ही खर्चीले हैं। इन पर विस्तृत चर्चा फिर कभी करेगें। आज तो आपका ध्यान सिर्फ उन्ही कानूनों तक सीमित रखना चाहता हंू, जो विद्यमान में धरातल पर लागू हैं। उनमें से कितने कानूनों का कितने लोग पूर्णतः या लगभग पूर्णतः या किस सीमा तक पालन करते हैं? इसका जवाब निश्चित रूप से ‘‘न’’ में ही होगा। आइए! इसका कुछ विश्लेषण कर हम स्वयं का आत्मविवेचन व आत्मावलोकन कर लें। 
यदि हम अधिसंख्यक कानूनों के बाबत चर्चा करने का प्रयास करेगें तो, विषय काफी बड़ा हो जाएगा। इसलिए हम अभी सिर्फ कोरोना संकटकाल में बने नियमों, आदेशों व निर्देशों के धरातल पर लागू व प्रभावी होने व उपयोगी होने की ही चर्चा करेगें। इस चर्चा के द्वारा सामान्य रूप से देश में लागू समस्त कानूनों की स्थिति की समीक्षा एक आइने के समान आपके सामने आ जायेगीं। विश्वव्यापी कोरोना वायरस से बचने के लिए विश्व स्वास्थ संगठन ने कुछ सावधानियाँ बतलाई हैं। इनमें तीन प्रमुख सावधानियां मास्क, बार-बार सैनिटाइजेशन करना व स्वच्छता बनाये रखना तथा सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाना है। इन सावधानियों को लागू करने व अपनाने के लिए सरकार ने महामारी अधिनियम 2005, दंड प्रक्रिया संहिता (धारा 144) भारतीय दंड संहिता (धारा 188) व अन्य संबंधित कानूनों व नियमों के अंतर्गत विभिन्न आदेश, निर्देश जारी किए हैं। महामारी अधिनियम 2005 के अंतर्गत नियम भी बनाए हैं।  
कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए सबसे मुख्य व महत्वपूर्ण सावधानी ‘‘मानव दूरी‘‘ (‘‘सोशल डिस्टेंसिंग‘‘) की चर्चा कर लें। जिसके पालन हेतु ही तो पूरे देश में बिना समय दिये लॉक डाउन लगाया गया था। सोशल डिस्टेंसिंग का स्पष्ट मतलब है, 6 फीट की मानव दूरी बनाएं रखना। अब जरा देख लीजिए! इस 6 फुट की मानव दूरी का पालन कहाँ व कैसे हो रहा है? तथा व्यवहार में यह कितना संभव है? सर्वप्रथम कुछ जगह तो परिस्थितियां ऐसी है, जहां इसका पालन होना किसी भी स्थिति में संभव ही नहीं है। सामान्य दुकानदारों की ही बात कर लें। उनकी दुकानें सामान्यतः अधिकतर 10-11 फुट से ज्यादा चौड़ी नहीं होती हैं। व्यवहारिक रूप से वहां पर 6 फीट की मानव दूरी बनाए रखना असंभव है? दुकान के बाहर तो फिर भी 6 फीट के गोले बनाकर ग्राहकों को खड़ा किया जा सकता है, और भुगतान भी ई वालेट (डिजिटल भुगतान) द्वारा अनिवार्य करने पर वहां भी 6 फीट की मानव दूरी बनाये रखी जा सकती है। लेकिन क्या समस्त ग्रामीण, अनपढ़, वृद्ध ग्राहक खासकर महिलाएँ ई वालेट का उपयोग कर सकती है? क्या वे उसका उपयोग करना जानती हैं? यहां तक भी ठीक है। लेकिन सामान (गुड्स) की डिलीवरी 6 फीट दूर से कैसे हो सकेगी? इसका कोई रास्ता न तो बतलाया गया है, न ही दिखता है। इस प्रकार एक ग्राहक और दुकानदार के बीच एक बार के पूरे ट्रांजैक्शन (खरीद-बिक्री) के दौरान ही (6 फीट की मानव दूरी की सावधानी नहीं बरत पाने से़) संक्रमण का पूरा खतरा ग्राहक व दुकानदार के बीच बना रहता है। 
इसी प्रकार समस्त प्रकार के वाहनों (चार पहिया कार, जीप इत्यादि ,तिपहिये और द्वि-पहिये में) 6 फीट की दूरी बनाए रखना, वर्तमान में बनाए गए नियम व उसमें दी गई छूटों को देखते हुए बिल्कुल ही असंभव है। जब तक कि इन वाहनों की (डिजाईन) बनावट में तदनुसार आमूल-चूल परिर्वतन नहीं कर दिया जाता है। इसी तरह बस, ट्रेन और हवाई जहाजों में भी एक एक सीट आल्टरनेट (वैकल्पिक) छोड़ने के बावजूद 6 फीट की मानव दूरी बनाये रखना संभव नहीं हो पाएगा। वैसे ही कारखानों में बहुत सी उत्पादन प्रक्रियाएं ऐसी है, जिनमें कार्य निष्पादन करते हुए 6 फीट की मानव दूरी बनाए रखना बमुश्किल है। ये कुछ उदाहरण मात्र हैं जो मैंने कलमबद्ध किए हैं, जहाँ नागरिकों के लिये स्वःस्फूर्त अथवा पुलिस के डंडे़ के ड़र के बावजूद 6 फीट की मानव दूरी के नियम का पूर्णतः पालन करना किसी भी तरह से संभव नहीं है।
आइए; अब उन नियमों और कानूनों की चर्चा कर ले, जिनका अस्तित्व सिर्फ कागजों पर ही दिखता है। कहीं भी लागू होता नहीं दिखता। सार्वजनिक जगहों पर थूकना, धूम्रपान करना, पेशाब करना, आवाज की सीमित तीव्रता में डी.जे. बजाना, उसकी समय व समयावधि तय होना, दीपावली की आतिशबाजी की समय सीमा, अतिथि सत्कार की संख्या व खाने के ‘‘मीनू’’ पर प्रतिबंध इत्यादि अनेक ऐसे दैनिक जीवन के कर्म हैं, जिन्हें विभिन्न कानून नियम बनाकर प्रतिबंधित/सीमित  किया गया है। इन कानूनों और नियमों का कितना पालन हो रहा है, यह लिखने की आवश्यकता नहीं है। 
क्या कभी हमने कभी सोचा है कि, हम दिन प्रतिदिन ऐसे नए-नए कानून और नियम बनाकर कहीं नागरिकों को दिन प्रतिदिन इनका उल्लंघन करने और उन्हें गैर जिम्मेदाराना नागरिक बनाने की ओर तो नहीं ढकेल रहे हैं? इसलिये जब हम कोई नया कानून बनाते हैं, तो उसके पालन के संबंध में कानून बनाते समय ही विचार कर लेना चाहिए और उसके शत प्रतिशत पालन की प्रक्रिया भी निर्धारित कर ली जानी चाहिए। कानून सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए ही नहीं बनाए जांय। कुछ कानून तो ऐसे होते हैं, जिनका पढ़ा-लिखा नागरिक या सरकार स्वयं भी पालन नहीं कर पाती है। एक उदाहरण फूड़ सेफ्टी अधिनियम (फसाई) का प्रस्तुत हैं। ‘‘फसाई’’ अधिनियम के अंतर्गत बने नियम के अधीन जारी लाइसेंस के नियम की अनुसूची 4 में वर्णित के हाईजिननिक व सैनेटरी प्रावधानों पर गौर कीजिये, जिसका अनुपालन लगभग असंभव है! जैसे रेस्टोंरेट की दीवार पर पेंट की किंचित खुरचन भी दिखाई दे जाए तो, उसके लिये फाइंन का प्रावधान है। क्या यह व्यवहारिक व संभव है? अतः स्पष्ट है कानून का पालन करवाने वाले तंत्र (कार्यपालिका, शासन एवं प्रशासन) स्वयं अपने अधीनस्थ कर्मचारियों व संस्थाओं द्वारा कानून का पालन नहीं करवा पाती हैं।
इत तरह से कोई भी नागरिक कानून का लगातार उल्लंघन करने का दोषी बनकर एक अनुउत्तरदायी व्यक्ति बन जाता है। तब किसी बड़े अपराध के लिए कानून बनाने की स्थिति में, उस नागरिक का वह अनुउत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार व स्वभाव, उस कानून का पालन कराने में, रुकावटें पैदा नहीं करेगा? इसलिए कानून बनाने के पहले चाहे वे कितने ही हल्के या छोटे, उनको लागू करने के पहले जनता को शिक्षित किया जाना अत्यंत जरूरी है। ताकि उन कानूनों का पालन करने के लिए उन्हें प्रेरित और उत्प्रेरित किया जा सकें। जिससे वे कानून अनुयायी नागरिक बन सकें। कानून के उल्लंघन करने की स्थिति में दिये जाने वाले दंड प्रावधानों से भी उन्हें भली भाँति अवगत व शिक्षित कराया जाए। एक तय समय सीमा की लक्ष्मण रेखा के बाद उन्हे कठोरतम रूप से दंडि़त भी किया जावें। यह सही है कि कानून का पालन कानून के डंडे के डर से ही होता है। लेकिन क्या हम अपनेे देश में इस ‘ड़र’ परसेप्शन (अनुभूति) को बदलने का प्रयास नहीं कर सकते?
वास्तव में कुछ कानून के कष्टकारी व अस्पष्ट प्रावधानों के कारण भी उनका पूरा अनुपालन नहीं हो पाता है। दूसरी ओर इन प्रावधानों की जटिलता व क्लिष्टता के रहने से सरकारी मशीनरी को इनके दुरूपयोग द्वारा भ्रष्टाचार करने को बढ़ावा मिलता है। अतः ऐसी स्थिति में कानून की उपयोगिता कितनी प्रभावी है, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। 
यदि हम पीछे मुड़कर देखे; तो कानून का पालन नहीं हो पाने का एक कारक वास्तव में ‘‘संस्कारों’’ में कमी आ जाना भी रहा है। याद कीजिए! हमारे ‘‘संस्कारित देश’’ की वे ‘‘परम्पराएँ’’ (कस्टमरी कानून) जिनके पालन हेतु कानून के किसी ड़डें का भय नहीं, वरण सामाजिक व पारम्परिक आवश्यकताएं, बेरोजगार का भय व लिहाज ही होता रहा है। जैसे ब्राम्हण समाज के सदस्यों द्वारा जनेऊ पहनना। सात फेरे लेना। मृतक को ‘‘आग’’ देने वाले व्यक्ति से 13 दिन की दूरी बनाये रखना। चौके मंे हर किसी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित रहना। बाथरूम जाने पर नहाना। मुस्लमानों के द्वारा ‘‘खतना’’ करवाना आदि अनेक प्रथाएं व नैतिक मूल्यों को मान्यताएं जैसे झूठ बोलना, चोरी करना पाप है, इत्यादि जो हमारी पूर्व पीढियों में रही; जिनका पालन बिना किसी दबाव या ड़र के हम सब करते रहे हैं। 
अतः स्पष्ट है कि कानूनों की संख्या सीमित कर उसका पालन अधिकतम स्वेच्छापूर्ण हो, ऐसी दीर्घकालीन नीति नागरिक को ‘‘कानूनदा’’ बनाये जाने के लिये जरूरी हैं।

सोमवार, 29 जून 2020

भारतीय राजनीति में ‘सवालों’ के ‘जवाब’ के ‘उत्तर’ में क्या सिर्फ ‘सवाल’ ही रह गए हैं?

भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम युग रहा है। जब राजनीति के धूमकेतु डॉ राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी बाजपेई, बलराम मधोक, के. कामराज, भाई अशोक मेहता, आचार्य कृपलानी, जॉर्ज फर्नांडिस, हरकिशन सिंह सुरजीत, ई. नमबुरूदीपाद, मोरारजी भाई देसाई, ज्योति बसु, चंद्रशेखर, तारकेश्वरी सिन्हा जैसे अनेक yu हस्तियां रही है। ये और उनके समकक्ष अनेक नेता गण संसद मैं व बाहर इतने हाजिर जवाब होते थे, जब इनसे मीडिया या अपने विपक्षियों द्वारा कोई प्रश्न पूछा जाता था। तब उनका उत्तर सामने वाले से उल्टा प्रश्न करना नहीं होता था, जैसे कि आजकल यह एक परिपाटी ही बन गई है। बल्कि वे सटीक जवाब देकर सामने वाले को निरूतर कर आवश्यकतानुसार प्रति-प्रश्न करने में भी सक्षम होते थे व माहिर थे।
आज की राजनीति में चूंकि उत्तर देने वाले के पास कोई सही उत्तर होता नहीं है, इसलिए वह दाये-बाये बगले झांकता हुआ, निरूतर दिखने की बजाए, उत्तर देने के प्रयास में सहूलियत अनुसार प्रश्नकर्ता पर ही दूसरा असंबंधित प्रश्न दाग देता है। फिर  प्रश्न कर्त्ता भी वापस उत्तर देने के बजाय पुनः प्रश्न कर बैठता है। इस प्रकार भारत की लोकतांत्रिक राजनीति सार्थक प्रश्नोत्तर की बहस के बदले मात्र ‘‘प्रश्नों’’ व "प्रश्नों के प्रश्न" पर  जाकर अटक गई है। उत्तर कब मिलेगा? भोली भाँली जनता कब तक उत्तर की प्रतीक्षा रत रहेगी? यह मालूम नहीं।ऐसा लगता है जब तक जनता सिर्फ उत्तर देते रहेगी, और प्रश्न नहीं करेगी, तब तक राजनेतागण जनता को ‘उत्तर’ देने के लिये मजबूर करके, उनकी मजबूरी को ही अपना दायित्व पूर्ण हुआ मान कर, सिर्फ प्रश्न पूछते रहने को ही वे अपना ‘‘कर्त्तव्य मानते रहेगें’’ और जनता से सिर्फ उत्तर देते रहने की अपेक्षा कर कहकर जनता को ही ‘‘उत्तरदायी’’ जरूर बनाते रहेगें। यह संविधान का मखौल नहीं तो क्या है? क्योंकि संविधान ने तो जनता को जन प्रतिनिधियों से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया है और उन प्रश्नों के समाधानकारक उत्तर देने का संवैधानिक दायित्व व कर्त्तव्य राजनेताओं का ही हैं।
उपरोक्त प्रश्नोंत्तर की स्थिति को वर्तमान भारत चाइना के बीच उत्पन्न तनाव के संदर्भ में देखियें! आईने समान; स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। मीडिया, प्रेस विज्ञप्ति व टीव्ही चेनलों के द्वारा कराई जा रही बहसों में आरोप-प्रत्यारोप का तीव्र गति से निरंतर मूवमेंट चीन व भारत युद्ध के तथाकथित अनुभूति (परसेप्शन) को रोकने के लिये पक्ष विपक्ष के बीच घमासान युद्ध के  रूप में  लगातार चल रहा है। ‘‘उत्तर’’ कोई नहीं दे रहा है। ‘‘बेशर्मी’’ के साथ कहा जा रहा है कि हमारे उत्तर तोे हमारे द्वारा पूछे गए ‘‘प्रश्न’’ ही है। ‘‘जनाब यह हमारे उत्तर देने का स्टाईल है’’। पहले आप उसका उत्तर तो दे दीजिए, तब हम से उत्तर की उम्मीद कीजिए जनाब! ‘‘पहले आप’’ ‘‘पहले आप’’ के चक्कर में कोई भी व्यक्ति उत्तर देने के अपने राजनैतिक दायित्व से बच कर बाजू से सुरक्षित रूप से निकलते जा रहा है। यह भारत देश है। मेरा देश है। लेकिन कोविड़-19 ने विश्व के अन्य किसी भी देश की तुलना में, हमारे देश को इस दृष्टि से सबसे ज्यादा अपनाया है कि वह संक्रमण के साथ नई-नई खोज व उपलब्धियाँ ईजाद कर रहा है, जो उपलब्धि विश्व के अन्य देशों में "कोविड़-19" को नहीं मिली है।
जब प्रश्न यह पूछा जाता हैं कि भारतीय जमीन पर चीन का कब्जा तो नहीं है, क्योंकि प्रधनमंत्री के बाद रक्षामंत्री, विदेश मंत्री व विदेश मंत्रालय तथा कुछ मीडिया रिपोर्टिंग के कारण स्थिति कुछ अस्पष्ट सी हो गई है। तब उसका ‘सुस्पष्ट’ जवाब देकर स्थिति स्पष्ट कर समझाने के बजाए, यह कह दिया जाता है कि वर्क 1962 में 43180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन को प्लेट में रखकर किसने दी? जब यह प्रश्न पूछा जाता है कि अगस्त 2008 में दो राजनैतिक पाटियों (कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना) के बीच समझौता (एमओयू) क्यों व किस लिये किया गया था? तब स्थिति स्पष्ट करने के बजाए जवाब में प्रश्न ‘‘दाग’’ (तोप समान) दिया जाता है कि, अगस्त 2015 में महासचिव अरूण सिंह के नेतृत्व में राम माधव सहित भाजपा का प्रतिनिधी मंडल चीन से क्या बात चीत करने के लिये गया था? यूपीए की नीतियों से चीन को ’’फायदा’’ मिला; एनडीए की सरकार के दौरान चीन से व्यापार कई गुना क्यों बढ़ गया? यह सब आरोप प्रत्यारोप ‘‘राजनीति’’ नहीं तो और क्या हैं?शायद "सियासत" होगी ? यदि दोनों पक्ष अपने से संबंधित प्रश्न का सीधा जवाब दे देते, तो बात दूसरी होती। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चीन के साइड खडे है, चीन के हितो की बात कर रहे है। इस तरह के कथन करने वाले विपक्षी चीन के हाथों में  खेलने का आरोप  लगाने का एक अवसर अपने विरोधियों  को अनजाने और अनचाहे ही प्रदान कर रहे हैं। कम से कम प्रधानमंत्री की सत्य निष्ठा वह देश के प्रति प्रामाणिकता पर संदेश तो मत कीजिए ।  अभी तक के भारतीय राजनीति में  तीन तीन बार युद्ध होने के बावजूद  इस तरह के आरोप प्रधानमंत्री पर किसी ने कभी नहीं लगाया। भारतीय राजनीति में भारत-चीन विवाद के संदर्भ यह ‘‘खेल’’ भले ही‘‘खेल-खेल’’ में खेला जा रहा है, जो सातवें आश्चर्य से कम नहीं है। लेकिन ‘‘खेल भावना से खेला जा रहा यह खेल’’ सिर्फ और सिर्फ भारत में ही संभव है, जो विश्व में एक राष्ट्र के रूप में भारत की स्थिति को कहीं न कहीं कमजोर करता है। बल्कि दुश्मन देश को एक संबल भी प्रदान करता है।एक भारतीय नागरिक होने के नाते इससे  बचिए। इस संबंध में विपक्षी पार्टी राकांपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार के हाल के बयानों से कुछ तो सीख लीजिए ?
‘‘राजनीति‘‘ न करने वाले बयान देने वाले समस्त पक्ष इस बात को भूल जाते है कि आप राजनीति करके, राजनैतिक दल बनाकर, राजनैतिक दलगत चुनावों में भाग लेकर ही अपनी राजनीतिक चमक को पैना करते रहते है। विश्व के कुछ देशों जैसे जर्मनी में चुनावी प्रणाली ऐसी हो गई कि वोट तो राजैतिक दल को ही देना होता है व्यक्ति को नही। इसीलिए यह कहना कि हम राजनीति नहीं करते है, तथ्यात्मक रूप से गलत है। फिर भी इस आत्मस्वीकोरिति के लिए राजनीतिक दलों के साहस की प्रशंसा की जानी चाहिए, कि उन्होनें राजनीति की गिरावट के ऐसे गिरते स्तर को देखने हुए संकट काल में सार्वजनिक रूप से देश हित में कम से कम राजनीति न करने की बात कर, उससे दूर रहने की बात तो रखी है। शायद इसलिए कि इस गिरावट के लिए वे स्वयं ही तो जिम्मेदार हैं। वैसे उनका यह कथन ठीक उसी प्रकार का हैं जिस प्रकार जब कोई  "वीआईपी" नेता पर उसकी विरोधी पार्टी‘‘ आरोपों का स्वचलित तोप का गोला दाग दिया जाता है। और फिर वही व्यक्ति जब विपक्षी पार्टी में शामिल हो जाता है, तब उनको शामिल कराने वाली पार्टी स्वयं को पारस पत्थर मानकर उसे पवित्र कर आरोप से दोष मुक्त कर देती है। ठीक इसी प्रकार राजनीति शब्द का प्रयोग भी  राजनैतिक दल आवश्यकतानुसार करते रहते है। अर्थात कभी ’’प्रेम’’ कभी "जरूरत" तो कभी ’’गाली’’ के रूप में ।
भारत चीन सीमा विवाद से उत्पन्न वर्त्तमान गलवान संकट के संबंध में सत्ता व विपक्ष दोनों पक्ष राजनीति न करने का कथन जोर शोर से बुलेट स्पीड़ से करते है। लेकिन प्रत्युत्तर में वर्ष 1962 से लेकर वर्त्तमान घटना तक घटी समस्त घटनाओं पर जमी धूल की परत को झटककर उसे उजागर कर एक दूसरे को नीचा दिखाते रहने का प्रयास किया जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में बनी सहमति के बावजूद, सर्वसमस्त बयान जारी न होना, इसका एक ठोस सबूत व उदाहरण है।स्पष्टतः दुखद स्थिति हैं। विदेश मंत्रालय ने विस्तृत बयान 25 जून को जारी कर स्थिति को काफी स्पष्ट किया है। यदि यह बयान पहिले ही आ जाता, तो शायद तू तू मैं मैं की स्थिति नहीं बनती?
लेकिन यहां पर एक बड़ा प्रश्न उत्पन्न होता है कि लोकतंत्र में राजनीति नहीं होगी तो क्या होगी? लेकिन जब आप यह कहते हैं कि हम राजनीति नहीं कर रहे हैं, तो वास्तव में आप राजनीति की बात न कर, क्या राजद्रोह की नीति की बात कर रहे होते हैं? क्योंकि जब आप स्वयं यह कहते हैं कि हम राजनीति नहीं कर रहे हैं, तो आप इस बात को प्रमाणित कर रहे हैं कि, इस देश की राजनीति इतनी गंदी हो गई है, जो देश हित में नहीं हो रही है। ऐसी ‘‘राजनीति’’ के कारण देश की एकता सुरक्षा और स्वाभिमान पर आंच आ सकती है।अरे साहब! संविधान में लोकतंत्र में आप को राजनीति के माध्यम से ही शासन करने का अधिकार दिया है। चुनाव में भाग लेकर शासन करना या विपक्ष में बैठना यह "लोकतांत्रिक राजनीति' का ही परिणाम है, किसी नीति का नहीं।
विपक्ष की धारणा यही रही है कि, सरकार की आलोचना करना, उसे सचेत करना और उसकी कमियों को उजागर करना ही उसका अधिकार, कर्त्तव्य व राजनीति है। यह बात आजकल अक्सर जोर शोर से भारत-चीन सीमा पर उत्पन्न विवाद के संदर्भ में विपक्ष द्वारा अक्सर कही जाती है। लेकिन क्या वास्तव में सही रूप में विपक्ष अपना दायित्व निभा रहा हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है? विपक्ष यह भूल जाता है उसका अस्तित्व ही "पक्ष वि+पक्ष‘‘ मैं समाया हुआ है। अर्थात ‘‘पक्ष‘‘ द्वारा किए गए सही कार्यों की प्रशंसा करते हुए और उन्हें और प्रेरित व उत्प्रेरित प्रेरित  करके उनकी कमियों, गलतियों को सुधारात्मक और सुझावात्मक तरीके से समालोचना करना ही स्वस्थ लोकतंत्र में स्वस्थ विपक्ष का कार्य है। लेकिन क्या हमें यह सब होते दिख रहा है? विपक्ष कह सकता है जब 'पक्ष' ही सही रूप में काम नहीं कर रहा है और वह 'विपक्ष' को सहन करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं है, तब विपक्ष के पास का क्या चारा रह जाता है? इसलिए लोकतंत्र की सफलता के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को देश के प्रति उत्तरदायी राजनीति करना आवश्यक है। लेकिन स्वस्थ्य राजनीति के लिये। उससे भागने की लिए नहीं।
विभिन्न समय व अवसरों के संदर्भ व विषय भले ही समान हो; लेकिन ‘स्थिति’ परस्पर अदला बदली हो जाने पर प्रश्नोंत्तर में भी अदला-बदली हो जाती है। एक उदाहरण से समझियें! यूपीए सरकार के समय अंतर्राष्ट्रीय बाजार 105 डालर प्रति बैरल कच्चा तेल के मूल्य की स्थिति में देश के उपभोक्ताओं के लिए 75-80 पेट्रोल-डीजल की कीमत  होने पर भाजपा बैलगाड़ी यात्रा निकाल दे, तो खुशी बैलगाड़ी वाली भाजपा के शासन में 40-50 डालर प्रति बैरल कीमत हो जाने के बावजूद घरेलु उपभोक्ताओं को डीजल की कीमत पहली बार पेट्रोल से भी बढ़कर 80 रू. हो जाने पर कांग्रेसी साईकल यात्रा निकालते है। मूल्य की बढ़ोत्री की रक्षा में आगे आकर दोनों सरकारों के बयान व आलोचनाओं के स्तर व तरीके लगभग एक से ही होते है। जबकि दोनों अवसरों पर सत्ता पर विपरीत विचार धारा वाले दल कब्जे पर होते है। यही भारतीय राजनीति की उत्तरदायी  वैशिष्ट्य लिए हुए नैतिकता  विहीन नियति हैं।

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