शनिवार, 2 जुलाई 2022

अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, साहसिक, एवं अचंभित करने व दूरगामी परिणाम देने वाला भाजपा का ‘‘दार्शनिक’’ निर्णय।

भाजपा हाईकमान मतलब सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह (बाकी तो?) के एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद पर बैठालने और देवेंद्र फडणवीस को मजबूर कर उपमुख्यमंत्री पद को स्वीकार करने के निर्णय ने राजनीति के इस मिथक को पुनः शत शत सिद्ध किया है, कि जो कुछ होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है।
महाराष्ट्र की राजनीति में धूमकेतु के समान तेजी से उभरते चाणक्य, राजनीतिज्ञ देवेंद्र फडणवीस के साथ एक दिलचस्प योग जुड़ा है कि जब वह शपथ विषम समय (आड टाइम) लेते हैं, तो राजनीति में भूचाल सा आ जाता है। याद कीजिए! पिछली बार जब उन्हें भोर सुबह 7.30 बजे शपथ ली थी, तब 3 दिन में ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से चलते होना पड़ा था। और आज मुख्यमंत्री के बजाय उपमुख्यमंत्री पद की शपथ मन मसोस कर, मजबूरी में वह भी शाम को 7.30 बजे लेना पड़ गयी। इसके पहले जब वह वर्ष 2014 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उनका शपथ ग्रहण का समय सायं 4.27 बजे था। तब उनका कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरे पांच साल चला।
बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या यह निर्णय अचानक लिया गया? वस्तुतः इसकी पटकथा तो गुजरात के वडोदरा में गहन रात्री में हुई अमित शाह के साथ एकनाथ शिंदे की तथाकथित मुलाकात में ही शायद यह लिखी जा चुकी थी। तथापि निर्णय जब भी लिया गया हो, ऐसा लगता है कि उक्त निर्णय में देवेंद्र फडणवीस को पूरी तरह से विश्वास में नहीं लिया गया। राज्यपाल के समक्ष फडणवीस ने दावा प्रस्तुत कर पत्रकार वार्ता की थी। तब उनका महाराष्ट्र भाजपा ने एक ट्वीटस के जरिए फडणवीस का वीडियो क्लिक जारी किया था, तब वे मराठी में यह कहते हुए दिख रहे है कि मैं नये महाराष्ट्र के निर्माण के लिए पुनः आउंगा। तबके उनके मुस्कुराते चेहरे के भाव की तुलना में, बाद में हुई उस पत्रकार वार्ता में जहां उन्होंने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी, तब माथे पर उभरी सलवटे के कारण चेहरे के तनाव वाले भाव से स्पष्ट हो जाता है कि,फडणवीस को उच्चतम स्तर पर हुए निर्णय में भागीदारी या विश्वास में नहीं लिया गया। फडणवीस के मुस्कुराते चेहरे के साथ दावा करते समय यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री वे ही बनेंगे। क्योंकि सरकार बनाने का दावा स्वयं एकनाथ शिंदे ने किया हो ऐसा करते या ऐसा उनका कथन मीडिया में दिखा नहीं। यद्यपि फडणवीस ने शपथ ग्रहण के पूर्व हुई पत्रकार वार्ता में यह घोषणा की थी कि शिंदे ने सरकार बनाने का दावा किया है व हमने (भाजपा) उन्हे समर्थन का पत्र राज्यपाल को दिया है। संवैधानिक स्थिति भी यही है कि यदि भाजपा शिवसेना घट की साझी सरकार (गठबंधन की) हो तो उसके नेता को ही सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाता है। और यदि सबसे बड़े दल का नेता सरकार बनाने का दावा करता है, तो उन्हे अपने बहुमत समर्थकों की सूची राज्यपाल को देनी होती है, जो देवेंद्र फडणवीस ने पूर्व में दी थी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिंदे के समर्थन में पत्र राज्यपाल को कब दिया? क्या यह सब चुपचाप राजनीति की अंधेरी गली में हो गया?
राजनीतिक घटनाक्रम जिस तेजी से, बदला उससे स्पष्ट होता है कि देवेंद्र फडणवीस को शायद अंतिम समय में ही यह सूचना दी गई थी कि उन्हे मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा रहा है। तब उनके आंखों से आंसू निकले, जैसा कि उनके एक समर्थक विधायक ने मीडिया में आकर दावा भी किया है। आंसू सुख व दुख दोनों के होते हैं। फडणवीस की एक आंख के आंसू खुशी के थे क्योंकि भाजपा की सरकार बन रही है और उस उद्धव की विदाई हो रही है जिस उद्धव ने वर्ष 2019 में फडणवीस के पास सेे सत्ता आते-आते छीन ली थी। तो दूसरी आंख के आंसू दुख व संकट के है। उनके मुह में पका हुआ निवाला हाथ डालकर खींच कर आश्चर्यचकित कर दिया गया। ऐसा लगता है, जब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बनाने का निर्णय हाईकमान ने सुनाया/बताया तब शायद फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनना होगा, यह स्पष्ट नहीं किया होगा। तभी तो उन्होंने पत्रकार वार्ता करते समय सरकार से बाहर रहने की घोषणा की। उनकी इतनी हिम्मत तो नहीं हो सकती थी कि हाईकमान का निर्णय हो जाने के बावजूद वे उसकी अवहेलना कर विपरीत मंत्रिमंडल से बाहर रहने के कथन की बात प्रेस से करते। प्रेस में उक्त कथन की घोषणा जब प्रधानमंत्री, अमित शाह व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के हमेशा खुले कानों में पड़ी, तब हाईकमान की अनुशासन की घुट्टी मिलने पर देवेंद्र फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जेपी नड्डा का यह कथन कि फडणवीस से उपमुख्यमंत्री बनने का आग्रह व केन्द्रीय नेतृत्व का निर्देश दिया था। साथ-साथ "आग्रह" व "निर्देश" से अपने आप में यह स्पष्ट संदेश देता है। यह बात इससे और स्पष्ट हो जाती है कि शपथग्रहण समारोह में मंच पर पहले दो ही कुर्सियां लगी थी, जो बाद में बढ़ाकर तीन की गई।
बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में एक तरह से सिद्धांतों व तर्को की बलि दी जाकर नये सिद्धांत व तर्क की सुविधा अनुसार गढ़ना आज की राजनीति की सामान्य, सार्वजनिक, स्वीकृत प्रक्रिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र का घटा घटनाक्रम है। याद कीजिए 2019 के चुनाव परिणाम आने के बाद जब उद्धव ठाकरे ने 56 विधायकों के रहते हुए मुख्यमंत्री पद की मांग भाजपा से की थी, तब भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया था। तब भाजपा ने यह नहीं कहा था कि उद्धव जो बाल ठाकरे के पुत्र है, का हिन्दुत्व बाला साहेब से अलग है। क्योंकि चुनाव साथ में लड़े और वोट साथ में मांगे गये थे। परन्तु आज सिर्फ 40 विधायकों के उन शिंदे नेता को बाबासाहेब के हिन्दुत्व के नाम पर मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिन्होंने ढाई साल तक उद्धव के उस हिन्दुत्व को झेला व साथ दिया जिसकी शिंदे ने अब आलोचना करके न केवल उद्धव का साथ छोड़ा, बल्कि भाजपा ने उन्हे भी हाथों हाथ लिया। कांग्रेस व एनसीपी के साथ गठजोड़ करने पर उद्धव उस हिन्दुत्व के उत्तराधिकारी नहीं रहे, जिस हिन्दुत्व को कांग्रेस विरोध के आधार पर बालासाहेब ठाकरे ने मजबूत किया था, ऐसा कथन भाजपा व शिंदे इस समय लगातार कह रहे हैं।
शिंदे उक्त आरोप लगाते समय दो तथ्यों को भूल गये। प्रथम बाला साहेब ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई आपातकाल जो स्वाधीन भारत का अभी तक का सबसे बड़ा लोकतंत्र विरोधी ‘‘काला’’ अध्याय रहा है, का समर्थन किया था। दूसरा उस भाजपा जिसके हिंदुत्व को बेहतर मानकर मजबूत करने के लिए उनसे हाथ मिलाया, वही भाजपा का पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने पर हिंदुत्व कमजोर नहीं होता है, लेकिन उद्धव का हिंदुत्व कांग्रेस के साथ पर कमजोर हो जाता है। यही तो राजनीति का असली दोहरा चेहरा है। हिन्दुत्व की बात करने वाली भाजपा क्या आज हमारी हिंदू संस्कृति को भूल गई है। आज भी कमोवेश प्रचलित हमारी हिन्दू परिवार के मुखिया की राजनीतिक सामाजिक प्रसिद्ध व साख का उत्तराधिकारी प्रायः एक सीमा तक उनकी औलाद होती है। यह एक सामान्य आम जनों के बीच स्वीकृत तथ्य है। इसीलिए तो परिवारवाद की स्थिति बनती है, जिसका राजनीतिक हथियार (ताकत व कमजोरी) के रूप में उपयोग किया जाता रहता है। इस परिवारवाद की वृत्ति के कारण उद्धव ठाकरे को ‘‘ठाकरे’’ नाम की सहानुभूति मिलना स्वाभाविक है।
हिन्दुत्व बाला साहेब ठाकरे के नाम के साथ उनके पुत्र उद्धव के साथ ‘ठाकरे’ होने के कारण रहेगा या ठाकरे द्वारा फर्श से अर्श बनाये गये नेता एकनाथ शिंदे के साथ है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है। क्या बालासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व उस भाजपा से अलग है, जो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होकर जिसकी पहचान ही हिंदुत्व है। फिर भाजपा को हिन्दुत्व बचाने या विस्तारित मजबूत करने के लिए शिवसैनिकों की जरूरत क्यों है? मतलब साफ है। 2019 के चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा अधिकतम 106 सीटों तक ही पहुंच पाई थी। तब भाजपा को यह एहसास हो गया था कि उसके पूर्ण बहुमत के आड़े वस्तुतः न तो एनसीपी है और न ही कांग्रेस, बल्कि हिन्दुत्व का नारा उठाने वाली शिवसेना ही है। और इसलिए यदि महाराष्ट्र में भाजपा को अपने दम पर सत्ता में बैठना है, तो शिवसेना को कमजोर करना ही होगा। उस कमजोरी (कमी) की भरपाई करके ही भाजपा मजबूत होगी। अदृश्य (छिपे हुए) उद्देश्य को लेकर ही दूरगामी परिणामों की आशा में यह पूरी राजनीति की पटकथा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच ही तय हुई है। शायद जेपी नड्डा भी इसमें भागीदार नहीं रहे होगें। और इसको अंजाम देना का तरीका निश्चित रूप से अमित शाह का ही रहा होगा। वैसे इसका एक दूसरा कारण दल बदल की कानूनी पेचीदगी के कारण अनिर्णय की स्थिति के रहते पिछली शर्मिंदगी करने वाली गलती से सबक लेकर भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद फिलहाल छोड़ दिया है, यह भी संभव है।
इसलिए तात्कालिक रूप से सामान्य राजनीतिक दृष्टिकोण से उपरोक्त शीर्षक मे लिखे गये शब्दों के मोती जरूर लगा सकते हैं। परन्तु वास्तव में यह हड़बड़ाहट में नहीं बल्कि बहुत ही सोची समझी दूर दृष्टि से लिया हुआ निर्णय है। सही या गलत, यह भविष्य के परिणाम तय करेंगे। और तब तक देवेंद्र फडणवीस के आंसू बहते रहेंगे उसमें खुशी व गम दोनों शामिल रहेगें। आज की राजनीति की यही नियति है। कम से कम भाजपा की यह स्पष्ट नीति अवश्य रही है कि पार्टी सर्वोच्च है और व्यक्ति छोटा होता है। अतः यदि व्यक्ति की बलि देने में से पार्टी मजबूत होती है, तो वह एक सेकंड की देरी लगाये बिना, बेहिचक पार्टी बलि ले लेती है। किसी का बलिदान ही तो किसी के लिए फलीदान होता है। आडवाणी से लेकर अनेकोंनेक उदाहरण आपके सामने है।

मंगलवार, 28 जून 2022

‘उच्चतम न्यायालय’’ कहीं स्वयं ‘‘भ्रम’’ का शिकार (‘‘एक परसेप्शन’’) तो नहीं हो गया है?

राजनीति में थोड़ी बहुत भी दिलचस्पी रखने वाले नागरिकों से लेकर राजनैतिक पंडितों,भविष्यवक्ताओं, विश्लेषक, विचारकों  और मीडिया से लेकर राजनेताओं तक में महाराष्ट्र में चल रही राजनीतिक घटनाक्रम जो देश को उद्वेलित किए हुए हैं, को लेकर उच्चतम न्यायालय क्या अंतरिम आदेश पारित करेगा?, निर्देश देगा? इस पर परस्पर न काफी विरोधाभासी विचारों, मतों, आकलनों की चर्चा होती रही, बल्कि शंका व अनिर्णय के बादल भी ‘‘अंतरिम आदेश’’ के बावजूद राजनीतिक क्षेत्र में छाये रहें। ऐसी स्थिति में भ्रम को दूर, विवाद को निर्णित करने के लिए लोग न्यायालय की ओर दृष्टि जमाये रखते है व सहायता हेतु न्यायालय की शरण में  जाते है। परंतु ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय भी स्वयं ‘‘भ्रम (कन्फ्यूजन) के बादल’’ के घेरे में आ गया प्रतीत होता है, ऐसी ‘‘कुछ-कुछ ध्वनि’’ कल पारित अंतरिम आदेश से निकलती लगती सी है। क्योंकि जो अनिश्चितता और भ्रम का वातावरण समस्त पक्षों, दर्शकों व पाठकों के बीच बना हुआ है, उस स्थिति में सिर्फ तुरंत सहायता एक पक्ष (विद्रोही गुट) को अवश्य इस बात की मिली है कि शाम को समाप्त होने वाली जीवनदायिनी रेखा की लाल बत्ती की समय सीमा बढ़कर 12 जुलाई तक की हो गई है। लेकिन उच्चतम न्यायालय स्वयं भ्रम के संकट में कैसे आ गया है? आगे इसे देखते हैं।

महाराष्ट्र में जो कुछ राजनीतिक घटनाक्रम घट रहा है, दल बदल हुआ है, वह देश में कोई पहली बार नहीं हुआ है और न ही सुप्रीम कोर्ट में इस तरह का मामला कोई पहली बार आया है। दल बदल होने पर ‘‘संख्या के दावे की सत्यता’’ के संबंध में उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक के प्रसिद्ध एसआर बोम्मई मामले में अंतिम रूप से प्रतिपादित कर दिया है कि सरकार के बहुमत का फैसला विधानसभा के फ्लोर पर ही तय होगा, राज्यपाल निवास या अन्य कोई जगह नहीं। जिस निर्णय का अभी तक पालन किया जा रहा है। लेकिन महाराष्ट्र के राजनैतिक घटनाक्रम के लगभग सात दिन व्यतीत हो जाने के बावजूद गुवाहाटी से मुंबई विद्रोही गुट नहीं पंहुचा है। इस कारण अभी तक उक्त स्थिति (फ्लोर टेस्ट) पर पहुंची ही नहीं है, यह एक राजनैतिक विश्लेषक के लिसे आश्चर्य की स्थिति है। महाराष्ट्र में दो तिहाई बहुमत से ज्यादा अधिक विधायकों के दल बदलने के कारण जाहिर तौर पर सरकार के अल्पमत में आ जाने के बावजूद भी न तो विद्रोही गुट ने सरकार से इस्तीफे की मांग की है और न ही अविश्वास का प्रस्ताव स्पीकर या राज्यपाल के पास दिया है। इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा जो परदे के पीछे रहकर परसेप्शन का निर्माण कर रही है और जो इस दलबदल के कारण भविष्य में सत्तारूढ़ होने जा रहा है, ने भी अविश्वास प्रस्ताव का कोई नोटिस ही अभी तक नहीं दिया है। 

उच्चतम न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा बहस की जा रही थी, तब माननीय न्यायाधीश ने एक तरफ जहां यह कहा कि विधानसभा उपाध्यक्ष जिनको अविश्वास का नोटिस मिला वे खुद स्वयं के मामले में जज बन गए और नोटिस को खारिज कर दिया। ऐसी स्थिति में डिप्टी स्पीकर ऐसे बागी विधायकों पर अयोग्यता की कार्रवाई कर सकते हैं अथवा नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न उत्पन्न होता है। बावजूद उक्त टिप्पणी के उच्चतम न्यायालय ने उपाध्यक्ष को अपने कर्तव्य निर्वाह का पालन करने से कार्य करने के लिए किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई है। यथास्थिति बरकरार रखने की मंशा दिखाने के बावजूद, ‘‘अंतरिम उपाय’’ के रूप में सिर्फ विधायकों की अयोग्यता के नोटिस की अवधि 14 दिन बढ़ाई है। अर्थात बागी विधायक 12 तारीख तक अपना जवाब प्रस्तुत कर सकते हैं। 

उच्चतम न्यायालय का कन्फ्यूजन (भ्रम) एक और जगह दिखता है, जब न्यायालय यह कहता हैं कि, अनुच्छेद 179 के तहत उपाध्यक्ष को हटाने का जब नोटिस हो तब, क्या डिप्टी स्पीकर के पास संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ‘‘अयोग्यता की याचिका’’ पर सुनवाई का अधिकार है? यह पर्यवेक्षण (ऑब्जरवेशन) तथ्यात्मक रूप से कुछ गलत सा लगता है। क्योंकि डिप्टी स्पीकर के अविश्वास की जो सूचना मिली थी, वह उन्होंने अस्वीकार (रिजेक्ट) कर दी थी। इस प्रकार तथ्यात्मक रूप से अविश्वास का कोई नोटिस तत्समय उनके पास लंबित नहीं है। क्योंकि नोटिस को अस्वीकार करने के आदेश पारित होने के बाद नोटिस का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। हां यदि डिप्टी स्पीकर के अविश्वास के नोटिस अस्वीकार करने का आदेश गलत है, तो उसको न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए थी, जैसा कि शिवसेना के वकील अभिषेक सिंघवी का कथन था। और उच्चतम न्यायालय को निरस्त करने के आदेश की वैधानिकता पर टिप्पणी करनी चाहिए थी। परन्तु चूंकि बागी गुट ने उक्त पारित अवैधानिक आदेश को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उपाध्यक्ष के नोटिस व शक्ति (अधिकार) को चुनौती दी है। शायद इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने अविश्वास की सूचना को अस्वीकार करने आदेश की वैधता पर फिलहाल कोई भी विचार ही नहीं किया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उपाध्यक्ष को इस अविश्वास का सूचना पत्र मिला अथवा नहीं, और क्या उन्होंने उक्त सूचना पत्र मिलने की स्थिति में उसे अवैधानिक मानकर निरस्त कर दिया इस तथ्य पर उच्चतम न्यायालय स्वयं भ्रम की स्थिति है, शायद इसीलिए न्यायालय में उपाध्यक्ष को शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिये है। 

2020 के राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय को छोड़कर ‘‘किहोतो’’ मामले से लेकर अभी तक ऐसे मामलों में जहां स्पीकर विधायकों को अयोग्यता के संबंध में कार्रवाई प्रारंभ कर देते हैं, तब न्यायालय स्पीकर के कार्य क्षेत्र में दखल नहीं देती रही है, जैसा कि अनुच्छेद 212 में  रोक (बार) भी है। आदेश पारित होने के बाद ही न्यायालय में आदेश को चुनौती दी जाती है। इस बात को न्यायालय के ध्यान में लाने पर माननीय न्यायाधीश का यह कथन रहा कि अध्यक्ष के अधिकार को उक्त मामले में चुनौती नहीं दी गई थी, जो अभी दी गई है। 

तथाति उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है डिप्टी स्पीकर ने रिकॉर्ड पर कहा है कि कभी भी उन्हें पद से हटाने का नोटिस नहीं दिया गया। जबकि उनके वकील राजीव धवन का यह कहना रहा कि उपाध्यक्ष के प्रति अविश्वास का जो नोटिस दिया गया था, वह विधायकों के अधिकृत ईमेल के जरिये नहीं आये थे। अतः वैधानिक न होने के कारण संज्ञान योग्य नहीं हंै। राज्यपाल का अभी-अभी उठाया गया यह कदम भी बहुत ही आश्चर्यजनक है कि सरकार के तथाकथित अल्पमत में आने के बाद आने के बाद 22, 23 एवं 24 जून 3 दिनों में राज्य सरकार ने जो प्रशासकीय आदेश जारी किए हैं, उनकी रिपोर्ट मांगी है। वास्तविकता व परसेप्शन में महाविकास आघाडी की सरकार के अल्पमत में आ जाने के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा सरकार के बहुमत को चुनौती न देने के कारण तकनीकि व संवैधानिक रूप से उद्धव सरकार की अभी भी बहुतमत की सरकार होने के कारण राज्यपाल का उक्त हस्तक्षेप अनधिकृत ज्यादा वैधानिक कम व राजनैतिक कदम है। 

इस पूरे प्रकरण में एक बात में बड़ी समानता व सामंजस्य दिखता है कि प्रत्येक पक्ष परदे के पीछे या आवश्यकतानुसार सामने आकर अपना-अपना ‘परसेप्शन’ बनाना चाहते हैं। इससे इस बात को पुनः बड़ा बल मिलता है कि राजनीति में एक एक्शन (कार्यरूप) से कहीं अधिक परसेप्शन का महत्व है। भाजपा निश्चित रूप से सरकार बनाती हुई दिख रही है, परन्तु ऐसा होते हुए वह बिल्कुल भी नहीं दिखना चाहती है। असम के मुख्यमंत्री के प्रथम दिन की जब मैं विधायकों की उपस्थिति की जानकारी ना होने के बयान को इसी संदर्भ में देखिये। ‘न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए’’ न्याय के इस सिद्धांत के इस परसेप्शन के विरुद्ध उपरोक्त परसेप्शन है। इससे यह समझा जा सकता है कम से कम उपरोक्त निर्मित स्थिति न्यायिक नहीं है। इस प्रकार शिवसेना ‘‘कहीं खुशी कई गम’’ के भाव से ‘‘कहीं गरम तो कहीं नरम’’ आवश्यकतानुसार दिखने का परसेप्शन बना रही है, जबकि वास्तव में यदि परिस्थिति उसे अनुमति दे देती तो वह अभी तक कड़क कार्रवाई कर देती। अभी भी सेना प्रमुख की हैसियत से उद्धव उन विद्रोही को वापस आने की बार-बार गुहार कर रहे है, तो पटल (काउंटर) में विद्रोही गुट अभी भी सेना प्रमुख उद्धव को अपना नेता मानने की बात कह रहे है। जबकि विद्रोही गुट भाजपा के साथ ‘सत्ता’ की भागीदारी सुनिश्चित कर चुकी है। परन्तु वह अभी भी उस शिवसेना का भाग दिखना चाहती है, जिसके नेता उद्धव ठाकरे है। उद्धव ठाकरे पर नवाब मलिक के दाउद से संबंध है, जिसे मंत्री बनाकर आरोप लगाकर वे बागी मंत्री अभी भी मंत्रिमंडल में बने रहकर संख्या की शोभा बनाये हुए है। उद्धव  भी मंत्रियों से विभाग छीन कर परन्तु मंत्रिमंडल से मुक्त न कर सत्ता का आकर्षण बनाये हुये है। इस तरह के परसेप्शन का ‘‘खेला’’ का महागठजोड़ कभी आपने इसके पूर्व देखा है? जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं, आज की सफल राजनीति का यही मूल मंत्र है जो पारदर्शी सिंद्धान्त की राजनीति के विपरीत है। परन्तु ‘सिंद्धान्त’ की याद दिलाकर मैं भी ‘‘प्रबुद्ध बहुमत’’ से हटकर ‘‘मूर्ख’’ के साथ नहीं दिखना चाहता हूं।

शनिवार, 25 जून 2022

असम में ‘‘दोहरी’’ ‘‘बाढ़’’! का ‘तांडव’।

मेरे पारिवारिक मित्र संपादक विंदेश तिवारी का पेपर ‘‘दैनिक आत्मा का तांडव’’ नाम से बैतूल से काफी समय से प्रकाशित होते आ रहा है। इसमें मेरे लेख भी छपते रहते हैं। एक समय मैंने उनसे पूछा था कि यह नाम क्यों रखा हैं? तब उन्होंने मुझे यह जवाब दिया था कि जो आत्मा (दिल) से आवाज निकलती है, वह अनिर्लिप्त व सही होने के कारण तांडव मचाती है, क्योंकि सत्य हमेशा कड़वा होता है।
आज सुबह उनका फोन आया। उन्होंने मुझे याद दिलाया कि मेरे पेपर का नाम ‘‘आत्मा का तांडव’’ ‘असम’ में चल रही घटनाओं के परिपेक्ष में सही सिद्ध हो रहा है। वहां आई बाढ़ ने तांडव मचा के रखा है। मैंने कहा असम में तो बाढ़ हर साल आती रहती है। ब्रम्हपुत्र नदी में हर साल आयी बाढ़ से हजारों-लाखों लोग बेघर हो जाते है। जान माल का भीषण नुकसान होता है। तब तिवारी जी बोले! इस बार बाढ़ के साथ एक और बाढ़ आई है। मैंने पूछा कौन सी बाढ़ आई है? तब उन्होंने कहां ‘‘एमएललों की बाढ़’’। तब मेरा ध्यान वहां से चल रही महाराष्ट्र की राजनीतिक बाढ़ के तूफान व उबाल पर गया। तिवारी जी आगे बोले! असम के मुख्यमंत्री अंतरात्मा से बोले है और इसलिए वे सही बोले हैं। मैंने कहां अभी किसी पत्रकार ने उनसे पूछा, महाराष्ट्र के विधायकगण यहां असम में आये है और होटल में ठहरे हुये है। तो उनका यह जवाब था, मुझे पता नहीं कि महाराष्ट्र के विधायक असम में रह रहे है अथवा नहीं। हमारे यहां कई होटले बहुत अच्छी हैं। महाराष्ट्र से ही नहीं और भी प्रदेश से विधायक गण आते-जाते रहते है और रह सकते है। मैंने तिवारी जी से कहा कि मुख्यमंत्री गलत बयानी कर रहे हैं। कहां ‘‘आत्मा’’ से बोल रहे है? और यदि वास्तव में उनके उक्त कथन तथ्यात्मक रूप से सही है तो, क्या वे राष्ट्रीय व प्रादेशिक टीवी नहीं देखते हैं? पेपर नहीं पढ़ते हैं? क्या उनकी आईबी, एलआईबी, सीआईडी इतनी कमजोर हो गई है कि असम में चार दिनों से चल रही राजनीतिक जद्दोजहद की घटना, जहां 40 से अधिक विधायकों के वीडियो, फोटो, बयान वायरल होकर प्रदेश, देश व पूरा विश्व जान रहा है, देख रहा है और पढ़ रहा है। परंतु असम के हृदय की आत्मा से बोलने वाले मुख्यमंत्री उक्त जानकारी से अनभिज्ञ हैं, यह समझ से परे है । क्या ऐसा व्यक्ति  व्यक्ति राजनीति में रहने योग्य भी  हैं? तब तिवारी जी बोले, आप नहीं समझ पायेंगे। उनका मूल चरित्र क्या रहा है? वे मूल ‘जन-संघी’ से होकर भाजपाई नहीं बने है। वे मूलरूप से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे है, इसलिए यह कांग्रेस के ‘‘चरित्र की आत्मा की आवाज’’ है। तब  अंततः मैंने तिवारी जी के आगे हार मान ली। 
बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि राजनीति में प्रत्यक्ष सामने घट रही घटनाओं, या बनाई जा रही स्थितियों को स्वीकार करने में कोई हिचक क्यों होना चाहिए? कहा जाता है "दीवार पर लिखी इबारत" यदि आप पढ़ेंगे नहीं तो तो मात्र आपके न पढ़ने से वह मिट नहीं जायेगी,अमिट ही रहेगी। 500 से ज्यादा राज्य सरकार की फोर्स व अर्धसैनिक बल होटल की किलेबंदी किए हुए हैं। ‘परींदे’ को भी अपना आई कार्ड दिखाने पर ही अंदर-बाहर जाने-आने दिया जाता है। आखिर क्या होटल मैनेजमेंट के अनुरोध पर यह पुलिस फोर्स ग्राहकों की सुरक्षा के लिये आई है? पुलिस फोर्स के खर्चे का भुगतान "हाकिम की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी से बचने वाला" होटल मैनेजमेंट करेगा? इसके पूर्व होटल में जो गेस्ट लोग ठहरते थे, क्या उनके लिए इसी तरह का पुलिस बंदोबस्त किया जाता था? या अभी जो विशिष्ट गेस्टों की सुरक्षा के लिए यह चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था की जा रही है? और यदि यह सब व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा उनकी जान-माल की सुरक्षा  हेतु की जा रही है, तो क्या ऐसी व्यवस्था राज्य सरकार होटलों मैं आने-जाने वाले समस्त ग्राहकों जिनकी जान पर संकट के बादल आये हो, के उनके अनुरोध पर राज्य सरकार ऐसी ही सुविधा उपलब्ध कराएगी? सवाल तो इन विधायकों के रहने खाने के भीमकाय खर्चों का भी है। तो क्या यह मान लिया जाये कि "जिसके राम धनी उसे कौन कमी"! प्रत्येक राज्य सरकार का यह एक सामान्य व संवैधानिक दायित्व होता है कि प्रदेश की सीमा में प्रवेश करने वाले प्रत्येक नागरिक की जान माल की रक्षा करे और खतरा होने पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करे। यह ज्ञात नहीं है, कि जो विधायक गण ठहरे है उन्होंने यह कथन किया है कि अपनी जान को खतरे की आशंका को देखते हुए सुरक्षा की मांग की है। मुख्यमंत्री ने पहले ही दिन विधायकों के आने के पहले  ही सुबह-सुबह खुद होटल रैडिसन ब्लू  पहुंचकर व्यवस्था की जानकारी ली, जहां महाराष्ट्र के विधायकों को ठहराया गया। (ठहरे नहीं हैं।) आख़िर "डायन को भी दामाद प्यारे होते हैं"। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि प्रदेश में विधायकों के आने से जीएसटी में वृद्धि होगी। क्यों न हो, उक्ति है कि "यत्नम् विना रत्नम् न लभ्यते"!
बाढ़ की विभीषिका से घिरा हुआ असम के मुख्यमंत्री का पत्रकारों के प्रश्नों के जवाब में दिए गए उक्त उत्तर मुख्यमंत्री के लिए शोभा नहीं देते हैं? यदि मुख्यमंत्री उक्त राजनीतिक घटनाक्रम की सत्यता की जानकारी को स्वीकार कर लेते, तो कौन सा पहाड़ टूट जाता? इस स्वीकारिता से न तो उनके कौशल व चाणक्य बुद्धि पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगता और न ही ‘‘ऑपरेशन लोटस’’ पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ता। विपरीत इसके, क्या इससे मुख्यमंत्री की कार्यकुशलता और क्षमता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता है? क्योंकि यदि एक मुख्यमंत्री को अपने राज्य में चल रहे एक बड़े महत्वपूर्ण राज्य की चुनी हुई सरकार को पलटाने के राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी नहीं है, जिसकी जानकारी उनको छोड़कर प्राय: सबको है, तब वे राज्य में आई नदियों की बाढ़ से ऐसे कमजोर तंत्र के रहते कैसे निपट पाएंगे? क्योंकि उन्हें बाढ़ की वास्तविक व विस्तृत जानकारी ही नहीं होगी? एक गंभीर प्रश्न मुख्यमंत्री के उक्त उत्तर से उत्पन्न होता है। क्या असम की जनता का भाग्य सुरक्षित नेतृत्व के हाथों में है? विपक्ष से लेकर भाजपा हाईकमान तक ने इस बयान पर मुख्यमंत्री को न तो कटघरे में खड़ा किया और न हीं इस्तीफा मांगा है? विपक्ष की यह स्थिति भी जनता के प्रति विपक्ष कितनी जिम्मेदारी निभाता है? उसको भी इंगित करती है।
‘ऑपरेशन लोटस’’ का अधिकार वर्तमान राजनीति में राजनीतिक पार्टी को है। क्योंकि "संघे शक्ति: कलौ युगे" वाली राजनीति के वर्तमान स्वरूप में कोई भी ‘‘दूध का धुला’’ नहीं है। ‘‘नीति’’ जो ‘‘राजनीति’’ हो गई है, सिर्फ मौके को भुनाने की होती है। "जूं के डर से कोई गुदड़ी थोड़े ही फेंकता है"। जिनको भी अवसर मिलता है, वह उसे पूरी तरह से भुनाने का प्रयास करता है। अतः ऐसे ‘‘ऑपरेशन’’ में सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हथियारों, हथकंडों का ही उपयोग किया जाये, तो वह ज्यादा उचित होता है। परन्तु सरकारी खर्च और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर उसमें होने वाला खर्चा "डेढ़ पाव आटा और पुल पर रसोई" वाली जनता के पैसे का है, जिसे किसी राजनीतिक पार्टी के हित के लिए खर्च करने का अधिकार किसी भी राजनीतिक पार्टी अथवा सरकार को नहीं है। लेकिन जनता पर भार पड़ने वाले ऐसे मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय को भी संज्ञान लेना चाहिए। जनता को भी ऐसी घटनाओं का संज्ञान लेकर अपने ज्ञान में वृद्धि कर तदनुसार पैसे के ऐसे खर्चे के दुरुपयोग को रोकने के लिए आगे बढ़कर कार्रवाई करे, क्यों कि "बिल्ली न हो तो चूहों की मौज हो जाती है"  तभी इस तरह की प्रशासनिक और शासन की सत्ता के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सकती है।
वर्षा (बरसात) वैसे तो जीवन के लिए जीवनदायिनी होती है, परंतु अधिक वर्षा बाढ़ में परिवर्तित होकर विनाशकारी हो जाती है। असम में इस समय दो तरह की वर्षा हो रही है। एक वर्षा ने असम का सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त कर सैकड़ों नागरिकों को *बेदखल* कर दिया है, तो दूसरी वर्षा ने *वर्षा* (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का सरकारी आवास) से *बेदखल* कर लाखों व्यक्तियों को एक साथ जिनके नेता को वर्षा बेदखल कर दिया है, को रोड़ पर ला दिया है। "कालस्य कुटिला गति:"! अतः दोनों सामान्य वर्षा नहीं है, जो लाभदायक होती, बल्कि बाढ़ में परिवर्तित हो गई है। इसलिए नुकसान तो होना ही है। वैसे मुख्यमंत्री की राजनीतिक  बाढ़ पर मुस्कुराते और इशारे करती हुई प्रतिक्रिया नदी की बाढ़ से उत्पन्न भीषण नुकसान के कारण माथे पर आने वाली चिंता की सलवटो पर भारी हो गई है। यह स्वयं में एक चिंता का विषय है।अभी तो आई इस बाढ़ ने *वर्षा* से ही बेदखल किया है। परंतु बाढ़ के विकराल रूप होने पर क्या वह *मातोश्री* को भी ढहा देगी? इसके लिए थोड़ा इंतजार अवश्य करना होगा।

मंगलवार, 21 जून 2022

हिंसा का ’समर्थन न’ करने के बावजूद आंदोलन हिंसात्मक ?

 'अग्नीपथ' के विरोध में "अग्निवीरों’’ द्वारा ‘अग्निपथ’ पर बिहार!

देश की सुरक्षा के लिए नौजवानों के लिए (14 जून) सेना में भर्ती हेतु नई प्रक्रिया ’अग्निपथ’ योजना (जो पूर्व में हर आफ ड्यूटी का ही रूप है) के अंतर्गत ’अग्निवीर’ बनाए जाने योजना की घोषणा होते ही अगले ही दिन ’बिहार’ जो देश के कई ’अहिंसावादी’ राष्ट्रीय आंदोलनों की जननी व अग्रणी रहा है, में ’हिंसावादी’ विरोध प्रदर्शन प्रारंभ होकर उपद्रव, तोड़फोड़, लूटमार आगजनी प्रारंभ हो गई, जो देश के कई भागों में धीरे-धीरे विस्तारित होती गई। कई राजनीतिक दलों एवं नेताओं द्वारा हिंसा का समर्थन न करते हुए आंदोलनकारियों की मांग का समर्थन करते हुए उनसे शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील की गई। यह भी कहा गया हिंसा किसी समाधान का रास्ता नहीं है। सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। कानून हाथ में नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन ‘‘घर घाट एक करने के’’ बावजूद आंदोलन का हिंसात्मक रूप कमोबेश बरकरार है।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह पैदा होता है कि आंदोलन को हिंसात्मक स्वरूप कौन दे रहा है? क्या स्वयं आंदोलनकारी हिंसात्मक रुख अपनाए हुए हैं? यह प्रश्न इसलिए उत्पन्न होता है कि यदि आंदोलन स्वस्फूर्त है, तब प्रायः इन आंदोलनकारी युवकों ने इस हिंसा का विरोध क्यों नहीं किया और न ही ऐसा कोई बयान उनकी तरफ से अभी तक आया हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यह आंदोलन बिना कोई नेता के नेतृत्व विहीन है। सरकार को भी यह देखना आवश्यक होगा कि आंदोलन में सभी लोग क्या वे युवा (या उनके परिवार के लोग) हैं जो सेना में भर्ती होना चाहते हैं और जिनके हित अग्निपथ योजना से अहित हो रहे है, अथवा अन्य अवांछनीय तत्व भी हैं। तब विपक्ष पर राजनीति करने के सरकार के आरोप को ज्यादा बल मिल सकता है। यदि आंदोलन विपक्ष द्वारा योजनाबद्ध रूप से निर्मित, प्रेरित या उत्प्रेरित व पोषित है, जैसा कि आंदोलन प्रारंभ होने के बाद से ही सत्ता पक्ष, विपक्ष पर लगातार आरोप लगाते आ रहा है, यह कहकर कि देश के युवाओं को विपक्ष गुमराह कर रहा है। तब ऐसी स्थिति में विपक्ष अपनी हिंसा में अपनी असलिगंता को मजबूती देने के लिए स्पष्ट रूप से क्यों नहीं घोषणा करता है कि यदि आंदोलन का हिंसात्मक रूप जारी रहेगा तो विपक्ष युवकों के इस आंदोलन का समर्थन तब तक नहीं करेगा जब तक हिंसा जारी रहेगी। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार विपक्ष ताल ठोक कर यह कहता है कि वे हिंसा का समर्थन किसी भी स्थिति में नहीं करते हैं।

वैसे हिंसा के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने वाली भाजपा व उनकी सरकारें इस तरह की स्थितियों से निपटने में सिद्धहस्त उनकी सरकारें (जैसे बुलडोजर मुख्यमंत्री योगी नाथ) हिंसाई उपद्रवियों पर बुलडोजर कार्रवाई करने के नाम पर ‘‘गिन गिन कर पैर’’ क्यों रख रही हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है? उत्तर प्रदेश के कई भागों में ‘‘अग्निपथ योजना’’ के विरोध को लेकर हिंसात्मक आंदोलन हुए। परंतु बुलडोजर मुख्यमंत्री योगी ने अभी तक उस तरह की कोई जवाबी बुलडोजर कार्रवाई नहीं की और न ही मंशा दिखाई, जैसा कि उत्तर प्रदेश में कुछ समय पूर्व हुए दंगों के समय की गई थी। क्या दोनों घटनाओं की हिंसा में अंतर है? या अंतर बनाया जा रहा है? आखिर हिंसा ’हिंसा’ ही होती है। इस तरह की ’दोहरी नीति’ अपनाई जाने से ही ओवैसी जैसे विवादास्पद व्यक्तियों की ‘‘आंखों में सरसों फूलने लगती है’’, और अनचाहे ही उन्हें अपनी नेतागिरी चमकाने का अवसर व बल मिल जाता है।

स्वतंत्र भारत के पिछले 75 वर्षों में किसी भी आंदोलन के संबंध में सत्ता व विपक्ष की परस्पर भूमिका, भागीदारी व नीतिगत रोल में प्रायः कोई बदलाव नहीं आया है। हां सत्ता-विपक्ष में बैठे चेहरों का परस्पर बदलाव जरूर हुआ है, जैसे कि ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’। इसी कारण से आज भी वर्तमान आंदोलन के संदर्भ में सत्ता-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर ’देश हित’ के नाम पर ’देश हित को एक तरफ (साइड)’ में कर ’राजनीति’ चमकाने के लिए चल रहा है। वैसे भी भाजपा ने विपक्ष खासकर कांग्रेस पर  गंभीर आरोप लगाया है कि वह ’राष्ट्रनीति’ के बजाय ’राजनीति’ कर रही है। राष्ट्र नीति से राजनीति शब्द कब अलग हो गया, इसका पता देश की जनता को चल ही नहीं पाया। अब चंूकि राजनीति एक गाली सूचक शब्द हो गई है, बदनाम हो गई है और भाजपा उक्त आरोप लगाकर बदनाम ’राजनीति’ शब्द पर मोहर लगा रही है। तब आश्चर्य की बात यह है कि जिस राजनीति के मैदान में खेल कर, राजनीति कर, जीत कर, राजनेता बनकर उक्त बयान देने में सक्षम व प्राधिकृत हुए हैं, उसी का निरादर कर रहे हैं, यह तो वही बात हुई कि ‘‘बाप से बैर, और पूत से सगाई’’!! इस स्तर पर यह भी सोचने की गहन आवश्यकता है कि आखिर राजनीति नैतिक मूल्यों रहित होकर उसका स्तर इतना क्यों गिर गया कि आज सही स्वच्छ और ईमानदार आदमी न तो राजनीति में आना चाहता है और यदि आ भी जाए तो उसके सफल होने की संभावनाएं भी लगभग निरंक ही होती है। इसके लिए राजनीति में अंदर तक घुसे हुए, डूबे हुए राजनेता ही सिर्फ जिम्मेदार नहीं है, बल्कि जनता भी उतनी ही दोषी है जिनके सहारे ये नेतागण राजनीति कर पाते हैं।

सरकार, यहां तक कि सेना की तरफ से यह कहां जा रहा है कि नौजवान युवाओं को बहकाया, बरगलाया, भड़काया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही उत्पन्न होता है, क्या ऐसे बहक जाने वाले युवकों को सेना में भर्ती किया जाना देश हित में होगा? इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाना चाहिए? बिना तथ्यों व जांच के मुद्दे का सामान्यीकरण कर इस तरह के कथनों से बचना चाहिए।

एक बात और! स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत सरकार की सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना के संदर्भ में युवाओं के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के चलते युवाओं को समझाने के लिए तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारीगणों ने मीडिया के सामने आकर अग्निपथ योजना के विभिन्न गुणों और फायदों को देश के नौजवानों के सामने रख उन्हें समझाने का प्रयास किया। परंतु साथ ही आंदोलन को भी गलत ठहराया। जबकि उक्त कार्रवाई की जिम्मेदारी, योजना बनाने से लेकर पूरी तरह से कार्यान्वित करने तक का अधिकार क्षेत्र केंद्रीय शासन, रक्षा मंत्रालय व गृह मंत्रालय का है। भारत सरकार की उक्त सैनिक भर्ती नई नीति नीति ’अग्निपथ’ में किसी भी प्रकार की संशय या गलतफहमी को दूर करने के लिए रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव या सेना के मीडिया प्रवक्ता (पीआरओ) अथवा अधिकतम जब तीनों सेनाओं के चीफ सीडीएस पद निर्मित किया गया है, तो सीडीएस ने स्पष्टीकरण देना चाहिए था। तथापि जनरल विपिन रावत की मृत्यु के बाद फिलहाल सीडीएस का पद रिक्त है। अतः पुरानी व्यवस्था अनुसार चीफ आफ स्टाफ कमेटी अर्थात आर्मी चीफ के द्वारा स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए था। परंतु धमकी भरे अंदाज में आंदोलित नवयुवको पर दबाव बनाने के लिए एयर मार्शल व वाइस एडमिरल सहित चार वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों को सरकार ने कैमरे के सामने पत्रकार वार्ता में बैठाला और यदि उन्होंने स्वयं स्पूर्ति से पत्रकार वार्ता आयोजित की है तो यह एक बड़ा गंभीर मामला है जो उनका क्षेत्राधिकार या कर्तव्य नहीं है।  

राष्ट्रनीति या आंदोलन का राजनीतिकरण हो रहा है, यह सिद्ध होना तो अभी शेष है, परंतु निश्चित रूप से उक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस से सेना के राजनीतिकरण का एक हल्का सा प्रारंभिक आभास अवश्य पैदा होता है। जिससे हर हालत में बचा जाना चाहिए था। क्योंकि उक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा गया कि आंदोलन के पीछे असामाजिक तत्वों के साथ-साथ कुछ कोचिंग संस्थाओं का हाथ है। अग्निपथ योजना वापिस नहीं ली जाएगी। इस तरह के आरोप लगाने व अग्निपथ योजना को वापस लेने का नीतिगत निर्णय का पूर्ण अधिकार भारत सरकार उनके मंत्रियों और पार्टी के पदाधिकारियों को है। सेना को नहीं। अतः इस ’चूक’ की गंभीरता को समझना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो पाए और किसी को भी सेना पर उंगली उठाने का इस तरह का अवसर न मिल सके।

एक बात और! आंदोलन समाप्त करने के लिए ’अग्निपथ योजना वापस लिए बिना’ दूसरे विकल्पों व उपायों पर सरकार क्यों नहीं विचार करना चाहती है? आंदोलन का मुख्य आक्रोश का कारण प्रमुख रूप से वे युवा लोग हैं, जो पिछले दो-तीन सालों से सेना में भर्ती के लिए तैयारी कर रहे हैं, ट्रेनिंग ले रहे हैं। कुछ लोगों ने परीक्षा पास कर ली है। तो कुछ ने प्रथम स्तर को पार कर लिया है, तो कुछ के मेडिकल फिटनेस भी हो चुके हैं। कुछ लोगों ने इंटरव्यू भी पास कर लिया है और पिछले साल भर से उनको सर्विस सिलेक्शन बोर्ड द्वारा अगली कार्रवाई के लिए पत्र पर पत्र तारीख बढ़ाने के दिए जा रहे हैं। यदि ऐसे लोगों की अंतिम भर्ती पूर्व नियम व घोषणा अनुसार पूरी कर ली जावे तो इसमें सेना का नुकसान क्या है? अधिकतम आप यह मान लीजिए की यह योजना 6 महीने बाद लागू की जा रही है। कई आंदोलनकारी युवाओं ने कहा है की पुरानी योजना के साथ नई योजना समानांतर या विकल्प रूप में चलती रहे तो इसमें नुकसान कहां है? और यदि वास्तव में यह योजना पुरानी योजना से ज्यादा अच्छी है, फायदेमंद है, और देश हित में है, तो सेना में भर्ती होने वाले नौजवान इसे ही अपनाएंगे, पुरानी योजना को नहीं। सरकार को अपनी नई योजना की विश्वसनीयता पर विश्वास होना चाहिये। 

सरकार को इस समय कृषि कानून के समय अपनाई गई, किसी को ‘‘जूते के बराबर भी नहीं समझने’’ वाली अक्खड़ नीति से बचना चाहिए। यदि तत्समय केंद्रीय सरकार किसानों को न्यूनतम खरीदी मूल्य के कानूनी प्रावधान बनाने की गारंटी दे देती तो, आंदोलन खत्म हो जाता और तीनों कृषि कानून वापिस नहीं लेने पड़ते। भारत सरकार की किसी योजना, नीति या बनाए गए कानून के संबंध में प्रधानमंत्री ने अग्निपथ योजना का नाम लिये बिना सांकेतिक रूप से प्रथम बार यह स्वीकार किया है कि तात्कालिक रूप से कोई योजना अप्रिय लग सकती है, लेकिन समय के साथ उसका फायदा मिलता है। जब कोई सुधार लाया जाता है तो वर्तमान में कुछ फैसले अनुचित प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन बाद में वे महत्वपूर्ण साबित होते है व राष्ट्र निर्माण में सहायक होते है। ऐसी स्वीकृति तीनों कृषि कानून, जीएसटी या नोटबंदी के समय नहीं की गई, बल्कि अभी की तरह यही कहा गया कि किसानों, व्यापारियों व आम जनता को ठीक तरह से कानून नहीं समझाया गया है, बल्कि बरगलाया गया है।

अंत में सरकार को पिछली घटनाओं से सबक लेकर खुले दिल दिमाग व मन से घटनाओं पर नज़र रखते हुये राज्यों की स्थिति पर विचार कर सहमति का रास्ता निकालने की आवश्यकता है। 


गुरुवार, 9 जून 2022

क्या ‘‘न्यायिक प्रक्रिया’’ पर देश की ‘‘राजनीति’’ ‘‘राजनेताओं’’ और आध्यात्मिक धर्मगुरूओं का विश्वास कम होते जा रहा है?


भारतीय जनता पार्टी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के न्यूज चैनल टाईम्स नाउ-नवभारत में टीवी डिबेट के दौरान दिये गये ‘‘पैगंबर मोहम्मद’’ के प्रति तथाकथित विवादित कथनों को लेकर देश में ही नहीं ‘‘खरबूजे़ को देख कर रंग बदलने वाले खरबूजों’’ की तरह कुुछ अरब (खाड़ी देश) मुस्लिम देशों में हलचल पैदा होकर हंगामा मच गया है। ‘‘इस्लामी सहयोग संगठन’’(ओआईसी) जो मूलतः 57 मुस्लिमों  देशों का संगठन है, जिन्होंने बाकायदा लिखित बयान जारी कर निंदा कर भारत सरकार से तुरन्त कार्यवाही करने की मांग की है। कतर, कुवैत, ईरान की सरकारों ने बाकायदा भारतीय राजदूतों को तलब कर अपना कड़ा विरोध जताया गया। ईरान तो अपने ही देश की लोकोक्ति ‘‘हर सुख़न मौका व हर नुक़्ता मुक़ाने दारद’’भूल गया। 
अभी तक 15 देश विरोध जता चुके हैं। आश्चर्यजनक व देश को शर्मसार करने और ‘‘सूप बोले तो चलनी भी बोले’’ वाली घटना तो ‘कतर’ देश की है, जहां हमारे देश के उपराष्ट्रपति के दौरे के दौरान ही राजदूत को तलब करने की हिमाकत की गई। इसे सहन न किया जाकर, माकूल जवाब दिया जाना चाहिए। विश्व पटल पर मजबूत होते भारत के लिए यह स्थिति न केवल कुछ शर्मसार करने वाली है, बल्कि हमारे देश के आंतरिक मामलों में विदेशों द्वारा यह हस्तक्षेप जैसी स्थिति है। वास्तव में भारत सरकार को यह कहकर की ‘‘इस तरह की प्रतिक्रियाएं हमारे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानी जाएंगी’’, कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए थी। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उक्त बयान भारत सरकार या भाजपा की अधिकृत लाइन नहीं है। इसीलिए भारत सरकार व भाजपा ने अपने को इस बयान से बिलकुल अलग-थलग कर अधिकृत बयान जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है, जिसकी विदेश मंत्रालय के स्तर पर कदापि आवश्यकता नहीं थी।
वैसे भी विश्व की सबसे बड़ी सदस्य संख्या वाली पार्टी होने के कारण व्यक्तिगत स्तर पर कई महत्वपूर्ण सदस्य ‘‘छपास’’ की कमजोरी के चलते विवादित बयान देते रहते रहे हैं। परन्तु इसके लिए भारत सरकार को ही कटघरे में खड़े कर देना अन्याय पूर्ण व औचित्य हीन होगा। वैसे स्वयं ‘‘कांच के घर’’ में रहने वाले मुस्लिम देश जहां उनके देशों में ही अल्पसंख्यकों के साथ खासकर शिया-सुन्नी के बीच कैसा व्यवहार किया जा रहा है, किसी से छिपा नहीं है। चीन में मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारो के लिए ओआईसी मूकदर्शक की मुद्रा में बैठा है, ऐसे देश ही ‘‘टफन ग्लास’’ से घिरे भारत पर पत्थर फेंकने का अपरिणाम रहित असफल प्रयास कर रहे हैं। खैर फिर कभी इस विषय पर विस्तृत चर्चा, किसी अन्य लेख में।
इस घटना के आश्चर्यजनक दो पहलू है। प्रथम घटना के सात दिवस बाद मुस्लिम देशों के ऐतराजों के तत्पश्चात ही दबाव में भारतीय जनता पार्टी ने नूपुर शर्मा के खिलाफ पार्टी संविधान नियम के विरूद्ध कार्यवाही करते हुये छः साल के लिए पार्टी से निलम्बित/निष्कासित कर दिया। जबकि पार्टी संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान है कि सर्वप्रथम संबंधित सदस्य को कारण बताओं सूचना पत्र जारी कर ही निलंबित किया जा सकता हैं। तत्पश्चात ही उनके द्वारा प्रस्तुत जवाब पर अनुशासन समिति विचार कर या विशिष्ट परिस्थिति में अध्यक्ष विशेषाधिकार का उपयोग कर संबंधित व्यक्ति को छः साल के लिए निष्कासित कर सकते हैं। परन्तु नूपुर शर्मा के मामले में निष्कासन के पूर्व इस तरह की कोई वैधानिक नियम की पूर्ति करने का कोई विचार ही पार्टी के जेहान में नहीं आया। क्यो?
इससे यह भी प्रतीत होता है कि वह भारत सरकार जो रूस-यूक्रेन युद्ध में अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न देशों के दबाव में नहीं आई, बल्कि देशहित को देखते हुये बनाई गई नीति को उसने जारी रखा। वहीं भाजपा को प्रस्तुत मामले में मुस्लिम देशों के आगे झुककर अपनी पार्टी के संविधान के खिलाफ आनन-फानन में अवैधानिक तरीके से देश व प्रधानमंत्री की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर पड़ने वाले प्रभाव के दबाव के चलते कार्यवाही करनी पड़ी। यह तो ‘‘जूं के ड़र से गुदड़ी फेंकना’’ हुआ। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा की कार्यवाही, सरकार खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का न पहुंचे और अरब देशों से बड़े व गहरे व्यापारिक संबंधों को देखते हुये कि ‘‘सर सलामत तो पगड़ी हजार’’ उक्ति के अनुसार देशहित में उठाया गया उक्त कदम भी हो सकता है। 
दूसरी बात जिस मंच-मीडिया के माध्यम से उक्त तथाकथित विवादित बयान विश्व में प्रसारित हुआ है, उस मीडिया व प्रोग्राम एंकर के खिलाफ कोई कार्यवाही सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने या सरकार की अन्य किसी भी एजेंसी ने अभी तक नहीं की है। उक्त एंकर ने टीवी डिबेट के दौरान उक्त विवादित कथन को रोकने का कोई भी प्रयास नहीं किया। न ही डिबेट के दौरान माफी मांगने को कहा और न ही उक्त चैनल ने बाद में भी इस अप्रिय स्थिति जिस कारण कानपुर में दंगा-फसाद हो गया, के लिए माफी मांगी। जब देश में ही विभिन्न लोग खासकर मुस्लिम संगठन, क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, सिंद्धान्त को आधार मानकर नूपुर शर्मा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करने मांग कर रहे हैं व उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की जा रही है। तब उस मीडिया चैनल के खिलाफ न्यायोचित कार्यवाही क्यों नहीं? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सिर्फ उत्पन्न ही नहीं होता है, बल्कि यह देश की एकता, अखंडता, सांप्रदायिकता चिंता का एक बड़ा गंभीर विषय बन जाता है। क्योंकि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ही कानपुर में दंगे भड़के, जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार आवश्यक कानूनी कार्यवाही कर रही है।
इस घटना पर एआईएमआईएम अध्यक्ष, सांसद एवं बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी का ‘‘अपनी डफली अपना राग वाला ’’यह कथन कि नूपुर शर्मा के खिलाफ सात दिवस बाद कार्यवाही करना देरी से की गई कार्यवाही है, और उसे तुरन्त गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? ‘‘गधा मरे कुम्हार का और धोबन सती होय’’ निलम्बन महज दिखावा है। यह बयान न केवल कानून व्यवस्था पर विश्वास न करने वाला बयान है, बल्कि उनके द्वारा कानून को हाथ में लेने जैसी स्थिति है। ओवैसी को यह याद दिलाना जरूरी है, हालाकि वे भूले नहीं है, बल्कि हमारी जनता व मीडिया भूल जाती है कि, ‘‘अगर आप कांटे फैलाते हैं तो कृपया नंगे पैर न चलें’’। इन्ही असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने वर्ष 2013 में हैदराबाद में सरेआम जनता के बीच कहा था कि हम (मुसलमान) 25 करोड़ हैं, और तुम (हिंदू) 100 करोड़ हो, 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो, देख लेंगे किसमें कितना दम है। वाह,‘‘ गंजी कबूतरी और महल में डे़रा’’। ओवैसी से पत्रकारों द्वारा इस भड़काऊ व शांति भंग पैदा करने वाले बयान पर प्रतिक्रिया पूछने पर उन्होंने उस बयान की निंदा नहीं की, बल्कि उन्होेंने कहा था कि अभी प्रकरण न्यायालय में है। न्यायालीन व्यवस्था पर विश्वास रखिये, उनका निर्णय आने दीजिये। अंततः वे सही साबित भी हुये, जब हाल ही में न्यायालय ने उक्त बयान को भड़काऊ बयान नहीं मानकर अकबरुद्दीन को बरी कर दिया।
क्या असदुद्दीन ओवैसी का स्वयं द्वारा प्रतिपादित न्याय का यह सिंद्धान्त वर्तमान प्रकरण पर लागू नहीं होता है? जो वे न्याय प्रक्रिया से परे नूपुर शर्मा के विरूद्ध कार्यवाही करने की मांग कर रहे है। नूपुर शर्मा का उक्त बयान सांप्रदायिक है या संविधान द्वारा प्रदत्त बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा का अतिक्रमण कर, देशहित के खिलाफ, माहोल बिगाड़ने वाला है या पैगंबर मोहम्मद के विरूद्ध है, यह तय तो न्यायालय ही करेंगा। हां आप (असदुद्दीन ओवैसी) जरूर पूज्य पैगंबर मोहम्मद साहब के वकील बनकर नूपुर शर्मा के खिलाफ न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रख सकते है और सफलता न मिलने पर उच्चतम न्यायालय तक जा सकते है। परन्तु तब तक तो आपको वैसा ही धैर्य रखना होगा जैसा कि आपने अपने भाई के मामले में न्यायालीन निर्णय आने तक का रखा व दूसरों को भी ऐसी ही सलाह दी थी।
इसीलिए मैंने पहले ही कहा है कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया ध्वस्त होती जा रही है। इसके एक ही नहीं अनेकानेक उदाहरण आपके सामने हैं। हमारे देश में आज एक नहीं अनेक केजरीवाल है, जो कि ‘‘माल कैसा भी हो, हांक हमेशा ऊंची लगाते हैं’’ स्वयं ही अभियोजक, वकील, जज और जनता बनकर संविधान द्वारा स्थापित न्यायिक प्रक्रिया अपनाये बिना ही प्रकरण को निर्णित कर देते है। जैसा कि सत्येन्द्र जैन के मामले में उन्होंने किया। हम टीवी चैनलों पर अक्सर असंवैधानिक, अवैधानिक, सांप्रदायिक, देश विरोधी, सामाजिक व्यवस्था को तार-तार करने वाली जातिवादी बयानों आदि आदि को सुनते हैं, देखते हैं, वीडियोज् देखते हैं और स्टिंग ऑपरेशन देखते हैं। बावजूद इसके संबंधित पक्षों या सरकार द्वारा यही कहा जाता है कि इसकी सत्यता की जांच करने के बाद ही तदनुसार आवश्यक कार्यवाही की जाएगी। तब यही सिद्धांत नूपुर शर्मा के कथन के मामले में क्यों नहीं अपनाया जा रहा है, प्रश्न सबसे बड़ा यही है? 
हमारे देश की खूबी परिपक्व होता विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। देश का यह लोकतंत्र चार खम्बों पर टिका हुआ है और इन चार खम्बों में सबसे महत्वपूर्ण न्यायपालिका ही है, जो शेष तीन खम्बों को मजबूती प्रदान करती है। अतः यदि न्यायपालिका कमजोर होगी तो लोकतंत्र व अंततः देश ही कमजोर होगा। अन्यथा आज ‘अंलकारों’ के साथ किस तरह के शब्दों का उपयोग पक्ष-विपक्ष किसी भी घटना को लेकर परस्पर कर रहे है, वह कहीं न कहीं हमारे ‘तंत्र’ को कमजोर ही करती जा रही है। इससे भविष्य में आपके बोलने की इस तरह की स्वतंत्रता भी प्रतिबंधित हो सकती है। इस बात को ध्यान में रखना होगा। फिर भी मेरा देश महान! मेरे नेता, जनता महान।

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