रविवार, 10 अक्तूबर 2021

“राजनीति“ और “कानून का मिश्रित नंगा स्तरहीन नाच“? ‘‘लखीमपुर खीरी’’।

विगत पाँच दिनों से तीनों प्रकार के मीडिया (प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक व सोशल) से लेकर सार्वजनिक जीवन जीने वाले नागरिकों व उत्तर प्रदेश के निवासियों के बीच जिला मुख्यालय लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के पैतृक गांव तिकुनिया-बनवीरपुर रास्ते में हुई दर्दनाक घटना ही छाई हुई है। जहां पर नौं नागरिक जिसमें चार किसान, तीन भाजपा कार्यकर्ता, एक ड्राइवर और एक पत्रकार शामिल है, अकाल मृत्यु के काल में चले गए। इनके अलावा 12 से 15 लोग घायल भी हुए हैं। इन सबकी जीवन लीला की दर्दनाक समाप्ति "उद्देश्य पूर्ण लिये हुई मानव निर्मित" है या परिस्थितियों जनित है, यह तो जांच का विषय है।  विभिन्न एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच के पूर्ण होने के पश्चात वस्तुस्थिति का पता लग पाएगा? यहां ‘‘प्रश्नवाचक चिन्ह’’ इसलिए लगा रहा हूं कि हमारे देश में किसी घटना, दुर्घटना या आकस्मिक, प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित वीभत्स घटनाओं के सार्वजनिक/राजनीतिक दुष्प्रभाव/दुष्परिणाम को कम करने के लिए स्पेशल सेल, एसटीएफ, जांच कमेटी, आयोग, न्यायिक जॉच आयोग इत्यादि बना दिये जाते हैं। प्रायः जांच आयोग की रिपोर्ट त्वरित न आ पाने के कारण समय बीतने के साथ ही लोग घटना व उसके (दुष्) प्रभाव को सामान्यतया भूल जाते हैं। जांच की रिपोर्ट कब आएगी, कैसी आएगी और उस पर किस तरह की कार्यवाही (एटीआर) होगी, बुद्धिजीवी नागरिकों को यह बताने की कदापि आवश्यकता नहीं है।

सर्वप्रथम लखीमपुर खीरी में हुई 9 डरावनी मौतों पर हो रही राजनैतिक नंगाई, नीचता, निकृष्टता व निम्नस्तर की बात कर लें। यहां पर यह कहना ज्यादा सही होगा कि ऐसे मुद्दों पर समस्त राजनीतिक पार्टियां चाहे वे पक्ष (सत्ता) की हों या विपक्ष की, सब एक दूसरे के विरुद्ध ‘‘उल्टी माला फेरने लगते हैं‘‘और स्वयं को अपने  विपक्षियों के सामने भुक्तभोगी परिवारों को सांत्वना देने की  होड़ में लगने के आड़ में ज्यादा ‘‘नंगाई‘‘ दिखाने में हमेंशा ही तत्पर सी रही है। क्या करें, ‘‘चूहे के बच्चे बिल ही खोदते हैं‘‘। इस अवांछनीय, निंदनीय घटना को लेकर राजनीतिक नौटंकी दिखाने में फिलहाल कांग्रेस ने शेष विपक्ष की तुलना में बढ़त प्राप्त कर बाजी जरूर  मार ली है। (यद्यपि चुनावी राजनीति में तो कांग्रेस पिछले कुछ समय से फिसड्डी ही सिद्ध हो रही है) लेकिन अपने नेताओं को घटनास्थल पर जाने से रोके जाने पर ‘‘तानाशाही‘‘ और ‘‘लोकतंत्र खतरे में है‘‘, का आरोप लगाते समय कांग्रेस शायद यह भूल गई है कि ‘‘कांच के घर में रहकर दूसरों पर पत्थर नहीं फेंके जाते हैं‘‘। क्योंकि कांग्रेस के लम्बे समय के शासन के समय भी इस तरह की बर्बरता पूर्ण अनेकोंनेक घटनाएं हुई हैं। तब क्या तत्कालीन कांग्रेस के शासन में तत्कालीन विपक्ष जो आज सत्ता में है, को ‘‘पीले चावल‘‘ देकर घटनास्थल का मुआयना करने और शांति बनाये रखने व पीडि़त मानवता पर मरहम लगाने के लिए बुलाया जाता था? कदाचित् इसका कदापि यह मतलब नहीं है कि भाजपा को ‘‘चित भी मेरी पट भी मेरी‘‘ करने के लिए यह छूट मिल जाती है कि वह भी कांग्रेस के उसी बुरे-गलत कार्य के नक्शे-कदम पर चले, जिसको वह पूर्व में पानी पी-पीकर, कोस कर जनता का आशीर्वाद प्राप्त कर सत्तासीन हुई है।

जिस प्रकार भाजपा घटित दुर्भाग्य पूर्ण घटना को अपने तरीक़े से अपने पक्ष में करने की राजनीति कर रही है। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक विपक्षी दल को भी राजनीति करने का समान अवसर भारत के वर्तमान रूप धारण किये हुये लोकतंत्र में प्राप्त है। उत्तर प्रदेश सरकार ने तुरंत आनन-फानन में प्रत्येक पीडि़त परिवार को 45 लाख रुपए के मुआवजे की राशि, पीडि़त परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार नौकरी, अपराधियों को क़ानून के अनुसार कड़ी सजा तथा घटना की एक सदस्यीय न्यायिक जांच हाईकोर्ट के सेवानिवृत जज द्वारा किये जाने की घोषणा कर पीडि़त परिवार के कभी न भरने वाले गहरे घावों पर मरहम लगाने का प्रयास अवश्य किया है। परन्तु वस्तुतः यह वास्तविक मरहम लगाने की बजाए आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए, राजनीति लिये हुई ज्यादा लगती है। क्योंकि इस तरह की घटनाओं में सरकार द्वारा कब इसके पूर्व  मृतकों को 45 लाख राशि के मुआवजे दिये गये हैं,सरकार यह बताये? प्रथम सूचना पत्र (एफ.आई.आर.) में नामजद व्यक्ति जो टेलीविजन पर दिखते है, की अभी तक गिरफ्तारी न होना किस तरह से न भरने वाले घावों पर लेप माना जाए? नियमों व रिवाज से हटकर राजनीतिक दृष्टि से की गई क्षतिपूर्ति की घोषणा के साथ ही मजबूत राजनैतिक संदेश देने के लिए केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का इस्तीफा क्यों नहीं लिया गया? उस स्थिति में जब उनके लड़के आशीष मिश्रा का नाम धारा 302 के अपराध के लिए एफ.आई.आर. में नामजद है। आखि़र ‘‘न्याय मिलता हुआ‘‘ कैसे दिखेगा जो न्याय का सिद्वांत हैं।

 कांग्रेस के द्वारा भी ‘‘मेरे बाप ने घी खाया सूंघो मेरा हाथ‘‘ वाली सिर्फ कोरी ओछी राजनीति ही की जा रही है, जो स्पष्ट झलकती दिखती भी है। जब एक ही घटना में 9 लोग मारे गये हों, तब सिर्फ 4 किसानों व एक पत्रकार के ही प्रति ही संवेदना क्यों? अन्य 4 भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रति सहानुभूति के दो शब्द भी क्यों नहीं? क्या राजनेताओं को इतना संवेदनशील नहीं होना चाहिये कि परस्पर विरोधी राजनैतिक विचार-धारा के होने के बावजूद नागरिकों के स्वर्गवासी हो जाने के बाद क्या हमें उस पीडि़त परिवार के प्रति शोक संवेदना व्यक्त कर सांत्वना नही देनी चाहिये? जैसा कि हमारी संस्कृति कहती भी है। कांग्रेस के दोनों मुख्यमंत्रियों से भी यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनके प्रदेश में इस तरह की मौत के लिए कब कब मुआवजा 50 लाख रूपये का दिया गया? और यदि दूसरे प्रदेशों में हुई असामयिक मौत के लिए मुआवजे की यह नई नीति नहीं है, तो निश्चित रूप से यह राजनीति तो है ही। जनता की गाढ़ी पसीने की कमाई के पैसे के टैक्स का किस तरह से दुरुपयोग हो रहा है, राजनैतिक मुआवजा देना इसका ज्वलंत उदाहरण है।

"किस सावधानी’’ से उक्त खीरी की घटना में ‘‘राजनीति‘‘ व राजनीतिकरण किया जा रहा हैं, इसकी एक बानगी गृहराज्य मंत्री का वह बयान है कि किसानों के प्रदर्शन में शामिल कुछ तत्वों ने भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं व एक ड्रायवर को पीट पीट कर मार डाला। यदि विधानसभा के चुनाव सामने नहीं होते तब उस घटना के लिए उन तथाकथित तत्वों को किसानों सहित खालिस्तानी व आंतकवादी ठहराया जाकर (जैसा कि 26 जनवरी को हुई घटना के लिए) उन्हें उत्तरदायी ठहरा दिया जाता। 

 किसानों को गाड़ी से रौंदने वालों के विरूद्ध धारा 302 (हत्या) का प्रकरण दर्ज होना घटना से उत्पन्न गुस्सा, क्षोभ व क्रोध को शांत करने के लिए क़ानून का दुरूपयोग करना नहीं तो क्या है ? उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि किसी भी तरह के दबाव में आकर सिर्फ आरोप के आधार पर गिरफ्तारी  कर जेल नहीं भेजा जाएगा । तब फिर फिर दबाव में आकर धारा 302 के अंतर्गत प्रथम सूचना पत्र क्यों दर्ज की गई ? गाडी के रोंदने से 4 लोगों की दर्दनाक असामयिक मौत होने के तत्पश्चात उत्पन्न उक्त हिंसा में 4 और अन्य व्यक्ति मार ड़ाले गये। क्योंकि ऐसी तीव्रगति (रेश) से लापरवाही पूर्वक वाहन की ड्रायविंग के कारण हुई मौत के लिए अधिकतम धारा 299, (गैर इरादतन हत्या) के लिए धारा 304, 304 ए ही लगनी चाहिये थी। क्योंकि किसी भी पक्ष का या घटना के सम्बन्ध में उपलब्ध साक्ष्य से प्रथम-दृष्टया कहीं भी यह आरोपित नही होता है कि, कार चालक ने भीड़ में मौजूद उन 4 व्यक्तियों को मारने के उद्देश्य से निशाना बनाकर उन पर गाड़ी चढ़ा दी। यह मात्र असावधानी और तीव्र गति के कारण अनियंत्रित हुई गाड़ी के भीड़ में घुस जाने से हुई। मतलब साफ है राजनीतिक जोड़ घटाने के चक्कर में राजनीतिक लाभ हानि को देखते हुए ही खीरी के मामले में कार्रवाई हो रही है, यह स्पष्ट है। लेकिन जब हमारे देश में वर्तमान में राष्ट्र भक्ति का एक मात्र पैरामीटर निम्न स्तर पर जाकर राजनीति करना ही रह गया हो, तब कौन नागरिक यह मुद्दा उठाने का साहस कर सकता है? इसीलिए  मीडिया से लेकर समस्त पक्ष परस्पर एक दूसरे पर आरोप लगाने वाले धारा 302 के अंतर्गत प्रकरण दर्ज करने के महत्वपूर्ण मुद्दे पर न केवल पूर्णतः शांत है बल्कि आश्चर्यजनक  रुप से एक असामान्य सहमति व एकमतता भी दिखती सी लगती है। क्योंकि मामला धारा 302 लगाने से कुछ न कुछ लाभ प्रत्येक पक्ष को मिलता हुआ अवश्य दिखता है, जिस कारण से उत्पन्न तनाव व अशांति को कम करने में सहायता भी मिली हैं। 4 लोगों की मौत गाडी से रोंदने के  तत्पश्चात उत्पन्न उक्त हिंसा में 4 व्यक्ति और मार ड़ाले गये जिसके लिए जिम्मेदार अभियुक्तों की गिरफ्तारी की बात उतनी दमदारी से कोई राजनैतिक पार्टी नही कर रही हैं क्यों? जिस काली लग्जरी हत्यारी कार ने भीड़ को रौंदकर किसानों को मारकर स्वर्ग लोक पहुचा दिया, वह केंन्द्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा की बतलाई जाती है। 

इसके अतिरिक्त गोली चालन की बात भी सामने आयी है और पुलिस ने घटनास्थल से कुछ (दो) कारतूस भी जब्त किये है। तथापि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गोली लगने से किसी भी मृत्यु को बिलकुल नकारा गया है। तब फिर जब तक जांच में आशीष मिश्रा के विरूद्व अपराध की संलिप्तता  का कोई प्रथम-दृष्टया साक्ष्य मिल जाने तक, उसे गिरफ्तार करना क्या सिर्फ राजनैतिक दबाव के अधीन ही नहीं कहलायेगा? न्याय का मतलब दोनो पक्षों को न्याय मिले ही नही बल्कि न्याय मिलता हुआ दिखे भी, यह सुनिश्चित करना भी न्यायिक प्रशासन का कार्य हैं। न्याय के तराजू का पलड़ा कहीं न कहीं कुछ न कुछ आशीष मिश्रा के पक्ष में  झुका हुआ अवश्य दिखता है। क्योंकि पांच दिन बाद भी उसको सिर्फ पूछताछ के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अंतर्गत सम्मन देकर बुलाया जाता है। क्या इसी प्रकार ऐसे अन्य गहन अपराधों के आम सामान्य आरोपियों को भी बुलाया जाता है? जवाब उ.प्र. पुलिस को देना है। जिन दो लोगों से पूछताछ कर अभी गिरफ्तारी की गई, क्या उनको भी ऐसा ही सम्मन देकर बुलाया गया था? उत्तर प्रदेश पुलिस बेहतर जानती हैं। प्रियंका गांधी को 48 घंटे तक अवैध रूप से डिटेन (हिरासत में) रखकर, फिर 24 घंटे के भीतर गिरफ्तारी बता कर, और फिर मुचलका भरने से इंकार करने पर बिना मुचलका भरे छोड़ देना। यह सब  कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नफा-नुक़सान की दृष्टि से विशुद्ध भारतीय ‘‘राजनीति‘‘ के चलते इस तरह क़ानून के दुरुपयोग अब हमारे राजनीतिक जीवन की एक अंग आवश्यक बुराई (नेसेसरी ईविल्स) बन चुकी हैं, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने अभी तक कोई संज्ञान न लेकर क़ानून के इस राजनैतिक दुरुपयोग पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगा पाया है।

चूंकि लखीमपुर खीरी के मामले को माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्वतः-संज्ञान में ले लिया हैै। शायद इसी कारण तत्पश्चात ही दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई है। और अब ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस को उच्चतम न्यायालय का सामना करने के लिए और कड़ी कार्यवाही करते हुये दिखना पड़ेगा, चाहे ऐसा मजबूरी में ही क्यों न करना पड़े।

सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

कपिल सिब्बल राजनीति के चलते वकील के मूल ज्ञान को भी भूल गये हैं क्या ?

पंजाब में विगत कुछ दिवसों से जो कुछ नाटकीय सियासी घटनाक्रम चल रहा है, वह अनपेक्षित और पूर्व में हुये राजनैतिक घटनाक्रम से कुछ हटकर है। इस कारण से सिर्फ कांग्रेस पार्टी की ही नहीं, बल्कि गांधी परिवार की बची कुची साख पर भी बट्टा लग रहा है, और किरकिरी हो रही है। भाजपा विगत कुछ समय से अल्पमत सरकारों को बहुमत में बदलकर कैसे सफल सरकारें चला रही हैं, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गोवा सहित कई राज्यों के उदाहरण आपके सामने है। कहीं भी ‘‘साझे की हंडिया चौराहे पर फूटने की नौबत’’ नहीं आयी। स्वयं कांग्रेस के प्रधानमंत्री नरसिंह राव के जमाने में अल्पमत सरकार को चलाना और मध्यप्रदेश के दिग्विजय सिंह का अर्जुन सिंह द्वारा अलग होकर नई पार्टी बनाने के बावजूद, अपनी अल्पमत सरकार को पांच साल चलाने के कई उदाहरण रहे है। लेकिन पंजाब में दो तिहायी से ज्यादा बहुमत पाने के कारण विपक्ष के लगभग अस्तित्व मेें न होने के कारण, शायद कांग्रेस स्वयं ही विपक्ष का रोल भी अदा करना चाह रही है, ऐसा लगता है। परन्तु इस तरह की राजनीति की फर्नीचर (अ)"नीति" के चलते कही कांग्रेस सत्ता से हटकर विपक्ष का भाग भी न रह पाये, प्रबल प्रभावी विपक्ष की बात तो दूर कांग्रेस हाईकमान की असफलता (फैलुयर) ने इसकी बड़ी आंशका पैदा कर दी है कि कहीं ‘‘हकीमों की फौज मरीज की मौत का सबब’’ न बन जाये। 

इन परिस्थितियों में जी 23 ग्रुप के महत्वपूर्ण सदस्य पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कानून व संविधान विशेषज्ञ कपिल सिब्बल का पंजाब की उत्पन्न मौजूद स्थिति पर बयान आना आश्चर्यजनक नहीं है, बल्कि यह बयान आना आश्चर्यचकित कर देने वाला है कि वर्तमान में पाटी में अध्यक्ष ही नहीं है, तो (पंजाब के संदर्भ में) फैसले कौन ले रहा है? यह समझ नहीं आ रहा है। राजनीति में विरोधियों पर तंज कसे जाते है। लेकिन अपनी ही पार्टी नेतृत्व के विरूद्ध वास्तविकता के विपरीत बयान न तो शोभायमान होते है और न ही ऐसे बयानों से नेतृत्व की गलतियों को सुधारा जा सकता है, जिसके लिए तंज कसे गयेे है। ऐसे बयान तो ‘‘कुल्हाड़ी में पैर दे मारने के समान’’ हैं। तथ्य यह है कि 16 दिसम्बर 2017 को कांग्रेस के लोकतांत्रिक रूप से चुने गये अध्यक्ष राहुल गांधी के 3 जुलाई 2019 को इस्तीफा दे देने के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी के द्वारा 10 अगस्त 2019 को सोनिया गांधी की अंतरिम कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की गई है। तब सिब्बल साहेब को यह अवश्य मालूम होना चाहिए और वास्तविकता में मालूम भी है (क्योंकि वे एक प्रसिद्ध विधि विशेषज्ञ है) कि कार्यकारी अध्यक्ष के अधिकार अध्यक्ष के समान ही होते है। अधिकारो में कोई कमी इस कारण से नही हो जाती हैं। इसलिए यह कहना कि अध्यक्ष न होने के कारण कौन निर्णय ले रहा है, बेहद ही हास्यादपद और अपरिपक्व बयान है, जो कहीं न कहीं राजनैतिक स्थिति का फायदा उठाकर नेतृत्व को कटघरे में खड़े करने का प्रयास मात्र ही है। जैसा कि कहा गया है ‘‘अविवेक: परम् आपदाम् पद्म:’’। कपिल सिब्बल जैसे संविधान व कानूनी विशेषज्ञ, राजनीतिज्ञ से उक्त गलत बयान बाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। तथापि नेतृत्व के निर्णय की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार उन्हे है, जो निर्णय न केवल गलत था, बल्कि गलत सिद्ध होकर पार्टी वहीं पुनः निर्णय लेने की मजबूरी की स्थिति में पहुंच गई है। 

स्वस्थ्य लोकतंत्र में पार्टी नेतृत्व के द्वारा उठाये गये कदमों को या गलत तरीके से उठाये गये कदमों को सही तरीके से उठाने का लोकतांत्रिक अधिकार पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं को है और होना ही चाहिए। जी 23 ग्रुप के सदस्य कपिल सिब्बल ने कई महत्वपूर्ण वैधानिक, संवैधानिक मुकदमें जीते है। वे जानते हैं कि ‘‘विभूषणम् मौनम् पंडिताणाम्’’, लेकिन इस तरह की तथ्यहीन, तथ्यों के विपरीत अर्नगल बातें कर कपिल सिब्बल; नवजोत सिंह सिद्धू के कारण पंजाब में उठती राजनैतिक ‘‘आग को ठंडा’’ करने के बजाय उसमें ‘‘घी ड़ालने’’ का ही कार्य कर रहे है। जो कार्य पंजाब की विपक्षी पार्टी भाजपा या आप पार्टी भी नहीं कर पाई है। 

नवजोत सिंह सिद्धू क्रिकेट के सफल ओपनर खिलाड़ी होने के बाद टीवी के लाफटर कार्यक्रमों के कारण उन्हे देश भर में प्रसिद्धि मिली। परन्तु उन्होंने हंसी-हंसी में ‘‘अपनी मुर्गी की डेढ़ टांग’’ वाली पृष्ठभूमि के चलते न केवल कांग्रेस के मंच को ही लाफटर कार्यक्रम के मंच में परिणित कर दिया है, बल्कि स्वयं भी इससे अछूते नहीं रह पाये है। यह समझ के बाहर है कि वे कांग्रेस के ‘‘नादां दोस्त हैं या दानां दुश्मन’’। नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री नियुक्ती के बाद सिद्धू स्वःनिर्णय का वह अधिकार, वे स्वयं द्वारा नियुक्त अपने मुख्यमंत्री को नहीं देना चाहते है, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में निर्णय के अधिकार वे स्वयं के लिये कांग्रेस हाईकमान से मांग रहे है, जिन्होंने सिद्धू की पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की है। मुख्यमंत्री चन्नी से सिद्धू की नाराजगी के जो कारण राजनीति क्षेत्र में सूत्रों के माध्यम से बाहर प्रकट होकर आयें हैं, वे यही है कि मुख्यमंत्री ने मंत्रियों के विभागों के बंटवारें व कुछ प्रमुख महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियुक्ति के मामलों में न केवल सिद्धू से कोई चर्चा ही नहीं की, बल्कि उनकी इच्छा के विरूद्ध नियुक्ति कर अपनी स्वतंत्र कार्य करने की शैली का आभास राजनैतिक क्षेत्रों में कराया है। वे शायद सिद्धू को ‘‘सही सिद्ध’’ करने में जी जान से जुट गये है, जिस कारण सेे सिद्धू के बताये गये रास्ते के अनुसार ही वे भी एक कठपुतली मुख्यमंत्री नहीं रहेगें, जैसा कि सिद्धू एक कठपुतली प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहना चाहते हैं। ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’ मुहावरा यहां पर सटीक बैठता है। कपिल सिब्बल जैसे व्यक्तियों के कारण ही यह मुहावरा बना है कि ‘‘घर को आग लगी घर के चिराग से’’।

अंत में बात जहां तक पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के द्वारा स्वयं के अपमान की जो बात कही हैं, वह 100% सही हैं। घड़ी के  कांटे को कुछ दिन पीछे ले जाईये। कांग्रेस हाईकमान से लेकर पंजाब प्रभारी हरीश रावत बारम्बार यह कहते रहे कि कैप्टन के नेतृत्व में ही कांग्रेस  आगामी विधानसभा का आम चुनाव लडेगी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि उक्त बयानों की बियार आने के मात्र एक सप्ताह के भीतर ही कैप्टन साहब को बेवजह अपमानपूर्वक तरीके से विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री की अनुमति व जानकारी के बिना ही विधायक दल की बैठक बुलाई जाकर हाईकमान द्वारा उन्हें अल्पमत में दिखाया जा कर दबाव बनाया गया और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया। जबकि एक हफ्ते पूर्व ही वे सोनिया गाॅधी से इस्तीफे की पेशकश कर चुके थें, जो उन्होनें अस्वीकार कर दिया था। हरीश रावत के शब्दों में जो व्यक्ति तीन तीन बार प्रदेश अध्यक्ष रहा हो और दो बार मुख्यमंत्री के पद पर रहा हूं, ऐसे सीनियर राजनीतिज्ञ व्यक्ति के साथ हाई कमांड का ऐसा व्यवहार अपमान नहीं तो क्या यह "मान" था?

बुधवार, 22 सितंबर 2021

शासन-प्रशासन नागरिकगण क्यों कानून का मखौल बनाने में तुले हुए हैं।

 ‘‘गणपति बप्पा मोरिया‘‘ ‘‘अगले बरस तू जल्दी आ’’ के जयकारों के साथ हमेशा की तरह गणेश जी का विसर्जन हो गया। पिछले वर्ष कोविड-19 की विश्व व्यापी महामारी से हमारा देश भी पीडि़त होने के कारण पूरे देश में प्रायः सार्वजनिक रूप से गणेश जी की स्थापना व कार्यक्रम नहीं हुये थे। इस वर्ष महामारी के प्रकोप कम हो जाने पर गणेश उत्सव कार्यक्रम की अनुमति शासन-प्रशासन द्वारा कोविड-19 की महामारी को देखते हुए लागू महामारी अधिनियम के अंतर्गत जारी विभिन्न प्रतिबंधों और सावधानियों का पालन करने की शर्त के साथ दी गई। सामान्यतया प्रायः निचले प्रशासनिक स्तर पर उत्सवों के पूर्व शांति समिति की बैठक बुलाई जाकर नागरिकों के प्रतिनिधियों को समझाइश व आवश्यक निर्देश दिये जाते है। बावजूद बैठक, कानून और नियमों का न तो नागरिकों ने उन प्रतिबंधों और सावधानियों का पालन किया है और न ही ‘‘अंगूठा दिखाते इन उच्छृंखल‘‘ नागरिकों से कानून का पालन करवाने के लिए जिम्मेदार प्राधिकारियों द्वारा उक्त कानून को लागू करवाने की कोई अपनी इच्छा शक्ति दिखाई हो। हम सब ने ‘‘आंखें नीची‘‘ कर बेशर्म निगाहों से समस्त संबंधित व्यक्तियों को या तो बेशर्मी से अथवा निष्क्रिय रहकर कानून का उल्लंघन होते करते देखा है। इस प्रकार पूरे देश में किस तरह से कोविड-19 के प्रतिबंधों का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि उसे एक मजाक बना दिया गया है। क्या यह ‘‘घर फूंक तमाशा देखने‘‘ जैसा नहीं है? पूरे देश में कोविड-19 के नियमों के उल्लंघन का एक भी प्रकरण कहीं भी दर्ज हुआ हो, ऐसा मीडिया ने कहीं रिपोर्ट नहीं किया है। क्या ‘‘कुएं में ही भांग पड़ी हुई है‘‘?

जब शासन-प्रशासन और नागरिकों तीनों पक्ष अच्छी तरह से यह जानते हैं की ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों के अवसर पर उक्त नियमों का पालन न तो किया जा सकता है और न ही ‘‘शठे शाठ्यम् समाचरेत‘‘ की नीति को चरितार्थ करते हुए उनका पालन करवाया जाना संभव है। तब ऐसी अवस्था में शासन-प्रशासन द्वारा धार्मिक उत्सवों, कार्यक्रमों के अवसर पर उक्त नियम से छूट के लिए आवश्यक अधिसूचना जारी क्यों नहीं की जाती? ताकि हमारी आंखों के सामने नियमों के उल्लंघन का नंगा नाच तो नहीं हो पाता। यदि इसी तरह से नियमों के उल्लंघन होते रहे, तब एक समय ऐसी स्थिति आ सकती है कि जब हम कानून के उल्लंघन के आदतन होकर, गहन अपराधों के लिए भी लोगों के मन दिमाग की स्थिति ऐसी हो जाए कि, वे यह प्रकल्पना करने लगे हैं कि कानून तो सिर्फ किताबों में ‘‘शोभा बढ़ाने‘‘ के लिए बनाए जाते हैं। उनको लागू करने वाली एजेंसी कभी भी कानून की ताकत का उपयोग कानून की ‘‘छाती पर मूंग दलते‘‘ तत्वों पर लागू करने के लिए नहीं करती है। तब ऐसी स्थिति में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अतः सभ्य समाज में सुशासन और सू प्रशासन में हम सबका मिलकर यह सामूहिक प्रयास होना चाहिए कि वे कानून जो हमें और समाज को नियमित स्वस्थ जीवन व्यतीत करने के लिए बनाए जाते हैं, उनका अक्षरसः पालन करने की आदत ड़ालें।

तीसरी लहर की जो बात कही जा रही है, वह उपरोक्त परिस्थितियों एवं मीडिया के इस संबंध में उदासीनता को देखते हुये वह उक्त आशंका को बल प्रदान कर सकती है। और चूंकि ‘‘गेहूं के साथ घुन भी पिसता है‘‘ अतः इस बात का विशेष ध्यान शासन-प्रशासन को रखने की आवश्यकता है।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

‘‘स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास में आज तक का सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका!’’

 क्या गुजरात में पुनः कोई ‘‘शंकर सिंह बाघेला‘‘ बनेगा?

देश की राजनीतिक दृष्टि से सबसे बड़े प्रदेश उत्तर-प्रदेश के बाद एक महत्वपूर्ण राज्य और प्रधानमंत्री व गृहमंत्री की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य गुजरात जिसे संघ व भाजपा ने अपनी राजनीति की एक 'प्रयोगशाला" बनाकर देश में ‘‘गुजरात मॉडल‘‘ के रूप में पेश किया गया है, आज वहां एक बिल्कुल सर्वथा नया "प्रयोग" कर नवनियुक्त, आरूढ़ मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण हुआ। यद्यपि मंत्रिमंडल का यह शपथ ग्रहण कल ही हो जाना चाहिए था। तथापि आज की सिद्धांतहीन चलताऊ राजनीति के विपरीत, ऐतिहासिक परिवर्तन करने की दृष्टि से पूरे के पूरे नये विधायक (कोई भी पुराने मंत्री नहीं) को ही मंत्रिमंडल में लिए जाने का समाचार ज्ञात होते ही लंबे समय से सत्ता पर बैठ कर सत्ता सुख भोग रहे राजनेताओं में असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। इसलिए उक्त राजनीतिक असंतोष को दूर करने के लिए शपथ गण समारोह को 24 घंटे टाला जाकर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास अवश्य किया गया है, जैसा कि नहीं बनाये गये कुछ पूर्व मंत्रियों के (स्वेच्छापूर्वक?) सामने आयें बयानों से लगता हैं।

यदि भारतीय राजनीति को पीछे मुड़कर इतिहास को देखें तो, स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र के राजनैतिक इतिहास में अभी तक किसी भी राज्य या केंद्र में "अंगारों पर पैर रखने का" ऐसा कोई उदाहरण आंखें गढा़ कर दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलता है। जहां मुख्यमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल को ही बदल दिया गया हो। यह "असामान्य कदम" व प्रक्रिया सामान्य प्रक्रिया तब कहलाती, जब एक पार्टी के सत्ताच्यूत जाने के बाद दूसरी पार्टी सत्तासीन होती है। ऐसा तभी संभव होता है। इस अनैपक्षित, अप्रत्याशित कदम ने इस बात को एक बार और सिद्ध कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का "56 इंच का सीना" सिर्फ विदेशों के लिए ही नहीं, (जिस कारण से पड़ोसी दुश्मन देश मोदी से घबराते हैं), बल्कि देश की राजनीति करने वालों के लिए भी है। राजनीति की वर्तमान प्रकृति, चरित्र, दशा, दिशा, लगभग पूर्णतः स्वार्थ युक्त होने के कारण राजनीति के निकृष्ट अवस्था में आ जाने के बावजूद, इस तरह हवा के बिल्कुल विपरीत, एकदम सफेद बिना दाग का चमकीला कदम उठाने का साहस सिर्फ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही हो सकता है कि "आयी मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक"। इस तथ्यात्मक सत्य को भूपेंद्र मंत्रिमंडल के गठन ने पुनः सिद्ध किया है।

दो दो बार मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार रहे, उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल व कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीत कर आए विधायक गण जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होकर मंत्री बने थे, उन्हें भी मंत्री न बनाना "उड़ता तीर लेने की तरह" एक बड़ा राजनीतिक दुस्साहस का कदम ही ठहराया जाएगा। तथापि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुये नये विधायकों मे से 3 विधायकों को नए मंत्रिमंडल में मंत्री बनाया गया। इस तरह के राजनैतिक दुस्साहस वर्तमान में देश हित में फिलहाल सिर्फ नरेंद्र मोदी ही उठा सकते हैं। "यत्नम् विना  रत्नम् न लभ्यते"। गुजरात जहां से नरेंद्र मोदी व अमित शाह अपनी राजनीतिक पारी खेलकर क्रमशः देश के शीर्षस्थ पद प्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद तक पहुंचे। इसलिए गुजरात के प्रति उक्त जोड़ी का ज्यादा चिंता करना स्वाभाविक ही है। शायद इसी कारण से प्रधानमन्त्री ने नए मंत्रिमण्डल को बधाई दी हैं। ऐसे बधाई के उदाहरण अन्य राज्यों के मंत्रिमण्डल के गठन के समय कम ही देखने को मिलते हैं। इस परिवर्तन का मूल्यांकन अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणाम पर ही निर्भर करेगा। देखना होगा कि "ऊंट किस करवट बैठता है"।

भाजपा हाईकमान के इस निर्णय से दो परस्पर विपरीत संदेश और जाते हैं। एक पूरी टीम को बदलकर विपक्ष के बजाय स्वयं भाजपा ने ही अपनी टीम को "नाकामी" करार कर दिया। दूसरा भाजपा के पास "टेस्ट टीम" के बराबर और उतनी ही मजबूत दूसरी टीम भी है, जो अगले वर्ष 2023 में होने वाले चुनावी (आम चुनाव) टी-20 मैच जीतने के लिए तैयार है । उक्त उठाए गए अकल्पनीय राजनीतिक कदम का राजनीतिक टीकाकारों के लिए एक और कारण से दिलचस्प विषय यह रहेगा कि गुजरात वह प्रदेश रहा है, जहां पूर्व में वर्ष 1995 में भाजपा में विद्रोह होकर सरकार गिर चुकी है। जहां भाजपा में एक ओर सामान्यतया  इस तरह की स्थिति देखने को नहीं मिलती है। वही दूसरी ओर खाटी संघी शंकर सिंह वाघेला दल बदल कर केशुभाई पटेल की सरकार को गिराकर खुद मुख्यमंत्री बन गए थे। कहते हैं "दूध का जला तो छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है"। बावजूद उक्त 'काले इतिहास' के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने उक्त नपा-तुला परिगणित (केल कूलंटड) कदम उठाया है, जो निश्चित रूप से कॉफी सोच समझकर और उपरोक्त घटनाओं पर विचारोंपरांत ही उठाया होगा।

सामान्य सामाजिक-राजनीति जीवन में ओल्ड़ इज़ गोल्ड़ श्रेष्ठतर माना जाता रहा है। हमारे र्दशन में यह प्रचलित है कि जहर के इलाज के दो तरीके होते है। एक जहर-जहर को काटता है। और दूसरा जहर के असर को अमृत द्वारा खत्म करना। गुजरात के मंत्रिमंडल के गठन ने उक्त समस्त परसेप्शन को एकदम से किनारे कर दिया गया है। मंत्री होने के कारण समस्त मंत्री, मुख्यमंत्री सहित निर्दोष न होकर उनमें कुछ न कुछ खामियां (सत्ता का दोष?) उत्पन्न हो गयी है। (संभवतः परिर्वतन का कारण परिदर्शित हो रहा है) इस कारण से और पिछले आम चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने की स्थिति को देखते हुये, आगामी विधानसभा के चुनाव चुनाव में सुनिश्चित जीत की प्राप्ति हेतु ही यह कदम उठाया गया प्रतीत लगता है। चुनाव में विजयी होकर  विजय रुपाणी और उनके मंत्रिमंडल मंत्रिमंडलीय साथियों (विजयी विधायकों) को अगले आम चुनाव में विजय सुनिश्चित करने हेतु आनंदीबाई पटेल को हटाकर नेतृत्व सौंपा जाकर विजय घोष करने का दायित्व दिया गया था। लेकिन उन्हें विजय सफर पूरा किए बिना ही असफल करार कर विजय दिलाने के योग्य न मानकर पराजित घोषित कर कर दिया। अतः इस कदम से पार्टी के भीतर राजनैतिक असंतोष का होना अवश्यंभावी है। क्योंकि राजनीति में सामान्यता कोई साधू-संत तो होता नहीं है। अतः इस उत्पन्न होने वाले अंसतोष की आशंका के दुष्परिणाम चुनाव परिणाम पर न पड़ने के लिए हाईकमान ने क्या-क्या कदम उठाये है, यह देखने-परखने की बात होगी। अन्यथा एक सर्वथा अप्रत्याशित कदम (मुख्यमंत्री चुनने से लेकर) उठाने से होने वाले फायदेे से उसकी प्रतिक्रिया में उत्पन्न नुकसान की संभावनाएं को देखते हुये कहीं यह प्रयास असफल व आत्मघाती तो नहीं होगा? फिलहाल यह  भविष्य के गर्भ में है।

चाल-चलन-चरित्र व चेहरे का शंखघोष करने वाली भाजपा राजनीति में निश्चित रूप से नये-नये योग व प्रयोग के युग के सिंद्धात की शुरूवात कर रही है। जब यह तर्क है कि मंत्री रहने के कारण सत्ता का अपना चारित्रिक दोष होने के कारण उनकी स्वच्छ छवि में कुछ न कुछ आंशका के बादल हो सकते है, तो वहीं सिद्धांत एक बार से अधिक चुने गए पुराने विधायकों पर क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिये? क्योंकि वर्तमान में विधायक भी तो सत्ता के एक प्रतीक ही होते है। क्योंकि "लाल तो गुदड़ी में भी नहीं छुपते"। अंततः संघ व भाजपा हाई कमांड  की "नेतृत्व में आमूलचूल परिवर्तन"  की यह नई "शल्य नीति" क्या भाजपा शासित सभी राज्यों में आम चुनाव होने के पूर्व  तथा आगामी वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व केंद्रीय स्तर पर भी लागू होगी ? यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा। 

कुछ समय पूर्व तक भाजपा अनुभव व नये खून के सुमिश्रण की नीति को अपनी सत्ता की राजनीति में अपनाकर बढ़ावा दे रही थी। लेकिन पिछले कुछ समय से  भाजपा की कार्यनीति व कार्यप्रणाली का यदि बारीकि से विश्लेषण किया जाए तो, यह स्पष्ट हो जाता हैं कि वह देश को निम्न राजनैतिक प्रयोग व सिंद्धातों के संकेत व दिशा देने का प्रयास कर रही है। 

1. (नौकरशाही समान) राजनीति में भी उम्र की समय सीमा का अलिखित निर्धारण। 

2. अनुभव को लगभग तिलांजली दे देना। 

3. नये खून को अधिकतम तरजीह देना। 

4. पूर्व प्रधानमन्त्री स्वं. अटल बिहारी बाजपेयी का सत्ता में आने के पूर्व जनता से यह सवाल यह रहता था कि पांच साल में रोटी पलट दो अन्यथा वह जल जायेगी, को दल में अपनाना। 

5. दूसरे दलो से "आयात" किये गये नेताओं को पदस्थापना देकर उनकी मूल विचार धारा को अपनी विचार धारा की मूलभूत पृष्ठभूमि में पूर्णतः विलीनिकरण का प्रयास। 

भाजपा उक्त पहली बार किए गए प्रयोग व  सिंद्धांत को क्या "कार्यकर्त्ताओं के धरातल तक" भी उतारेगी? अथवा यह मान लिया जाये कि "पद की सत्ता" के बिना, कार्यकर्ता ईमानदार व स्वच्छ छवि लिये होता है। ‘सत्ता’ ही "दुर्गण की जननी" है। यदि फिर ऐसा है, तो पूरी राजनैतिक कवायद सिर्फ सत्ता के लिये क्यों? इस प्रश्न का जवाब भी शायद भाजपा के पास ही है ?

अतः में उपरोक्त पूरे घटनाक्रम को एक लाइन में संक्षिप्त (समअप) किया जा सकता है। ‘‘मुख्यमंत्री ने स्वयं के विरूद्ध ही सर्वसम्मति से अविश्वास प्रस्ताव पारित करवाकर, स्पीकर ने भी इस्तीफा देकर, अपनी आवाज को बंद कर नये मुख्यमंत्री के नेतृत्व में पूरे नये मत्रियों के गठन का रास्ता साफ किया और नये मुख्यमंत्री पर भी सदन के नये चौकीदार (स्पीकर) की व्यवस्था की।‘‘


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन्म दिवस की पूर्व संध्या पर उठाए गए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए मैं प्रधानमंत्री को प्रयोग की सफलता सहित जन्मदिवस की शुभकामनाएं प्रेषित करता हूं।

बुधवार, 15 सितंबर 2021

‘भाजपा ने गुजरात में भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त कर इतिहास रचा‘‘।

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी का अचानक इस्तीफा जितना  आश्चर्यचकित लिया हुआ निर्णय रहा, उससे भी कहीं ज्यादा अचंभित करने वाला और बिल्कुल ही नाटकीय, अनेपक्षित,अप्रत्याशित निर्णय उनके उत्तराधिकारी के चुनाव के रूप में केन्द्रीय पर्यवेक्षक कृषि मन्त्री नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा ‘‘दादा‘‘ (अपने लोगों के बीच में भूपेंद्र पटेल दादा नाम से ही लोकप्रिय है) भूपेंद्र पटेल की मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्ति की घोषणा करने पर हुई। वैसे भाजपा इस तरह के निर्णय के लिए जानी जाती रही है। पूर्व में भी भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्रियों के चुनाव में कुछ इसी तरह के चैकाने वाले निर्णय सफलतापूर्वक लिए हैं। 

वास्तव में भाजपा ने आगे आने वाले विधानसभाओं के चुनावों में सत्ता व्यवस्था विरोधी भावना (एंटी इनकंबेंसी) तथा महामारी कोविड-19 से लड़ने की अव्यवस्था से उत्पन्न असंतोष से लड़ने के लिए चुनाव पूर्व मुख्यमंत्रियों को बदलने की नई नीति को अपनाया है, जिसकी सफलता का आकलन तो आगामी आने वाले विधानसभा चुनावों के परिणाम पर निर्भर करेगा। वैसे तो इस नीति का आंशिक सफलतापूर्वक क्रियान्वयन असम चुनाव मे देखने को मिल चुका हैं। जहां हुये आम चुनाव में पदासीन मुख्यमन्त्री सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमन्त्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित न कर नयें व्यक्ति के मुख्यमन्त्री पद पर आने के अवरोध को रणनीति के तहत हटाया गया। फिर विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद पदासीन मुख्यमन्त्री को जीत का सेहरा बांधने की बजाय एक दूसरे प्रभावशाली व्यक्ति हिमंता बिस्वा सरमा जो कि कुछ समय पूर्व ही कांग्रेस से भाजपा में आये थे, को मुख्यमन्त्री पद पर आरूढ किया। 2012 में उत्तराखण्ड में आम चुनाव के तुरन्त पूर्व, भूतपूर्व मुख्यमन्त्री मेजर जनरल भुवन चन्द्र खण्डूरी को पुनः मुख्यमन्त्री बनाया गया। विधानसभा के आम चुनाव के पूर्व इस तरह की मुख्यमंत्री बदलने की सोच या कवायद सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी में हो सकती है। कांग्रेस पार्टी सहित किसी भी पार्टी में इस तरह के साहसिक निर्णय की कल्पना ही नहीं की जा सकती है, कार्यरूप देना तो दूर की बात हैं। हां, कांग्रेस में ऐसा होना संभव है, तभी जब ऐसा व्यक्तित्व ‘‘गांधी‘‘ जैसी पारिवारिक पृष्ठभूमि लिए हुये हो। 

वैसे कुछ राजनीतिक टीकाकार और विपक्ष भाजपा के इस कदम को 2017 में आनंदीबाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद पाटीदार समुदाय में उत्पन्न असंतोष को दूर करने की कवायद भी ठहरा रहा है। निश्चित रूप से इस कदम के द्वारा पटेल समुदाय के असंतोष को दूर करने का प्रयास अवश्य किया गया है। लेकिन यदि सिर्फ यही एकमात्र कारण होता, तो गुजरात जैसे महत्वपूर्ण प्रधानमन्त्री व गृहमन्त्री के गृह राज्य के मुख्यमन्त्री जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए तब फिर राजनीति के नए-नए नवाचार भूपेंद्र पटेल की बजाए उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल को बनाते, जो आनंदीबाई पटेल के बाद भी एक स्वाभाविक सशक्त दावेदार थे, और आज भी विजय रुपाणी के इस्तीफे के बाद सर्वाधिक सशक्त दावेदार राजनीतिक क्षेत्रों में न केवल माने जा रहे थे, बल्कि स्वयं नितिन पटेल ने भी अप्रत्यक्ष कथित रूप से मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी, जो सामान्यतया भाजपा में नहीं की जाती है। बावजूद इसके नितिन पटेल को मुख्यमन्त्री बनाने से न तो यह चौकाने वाला निर्णय कहलाता या ठहराया जाता और न ही यह भाजपा की राजनीति की नई प्रयोगशाला का ‘‘प्रयोग‘‘ कहलाता, जो वर्तमान में भाजपा कर रही है और आगें करना चाहती है।  ‘नामी‘ व्यक्ति के ‘बदनाम‘ होने की संभावनाए के रहते "गुमनाम" भूपेन्द्र पटेल (जो नेता चुनने के लिये बुलाए गई विधायक दल की बैठक में सबके पीछें की लाईन में बैठे थें), को आगे लाने का एक कारण यह भी हो सकता हैं। वैसे "संघ दृष्टि" से लाइन के सबसे पीछे बैठा व्यक्ति को संख्या की गणना करने के कारण उसकी अहमियत सबसे सामने बैठे "अग्रेसर" के ठीक पीछे बैठें दूसरे नम्बर के व्यक्ति से ज्यादा होती हैं। (ऐसा ही गुजरात में भी घठित हुआ।) भाजपा हाईकमान का उक्त निर्णय इस बात को पुनः सत्यापित करता है कि सरकार और संगठन के किसी भी पद पर बैठा हुआ नेता सिर्फ एक ‘‘कार्यकर्ता‘‘ ही है जिस प्रकार ‘‘संघे शक्तिः कलौ युगे‘‘ के मार्ग पर चलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक ‘‘स्वयंसेवक‘‘ होता है। 

देश के राजनीतिक इतिहास में यह शायद पहला अवसर है, जब एक ऐसे व्यक्ति को सीधे मुख्यमंत्री पद पर आसीन किया जा रहा है जो न तो पहले कभी मंत्री रहे हैं और जो मात्र 4 वर्ष पूर्व वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के राज्यपाल पद पर नियुक्ति किए जाने के  कारण इस्तीफा देने से उत्पन्न रिक्त स्थान उपचुनाव में ऐतिहासिक (एक लाख सत्रह हजार से भी ज्यादा ) मतों से जीतकर पहली  बार विधायक बने। इससे भी बड़ा एक उदाहरण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का आपके सामने है, जो कभी विधायक  नहीं बने, बल्कि सीधे मुख्यमंत्री बने। परंतु दोनों में मूल-भूत अंतर यह है कि उद्धव ठाकरे हिंदू सम्राट शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के राजनैतिक उत्तराधिकारी होने के नाते  शिवसेना पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के कारण सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि देश में उनका एक स्थापित नाम और उनकी स्थापित पार्टी है। एक उदाहरण अन्ना आंदोलन से उत्पन्न पूर्व नौकरशाह अरविंद केजरीवाल का भी हैं। उन्होनें नवंबर 2012 में एक नई पार्टी ‘आप‘ बनाकर 2 साल के भीतर ही विधानसभा चुनाव जीतकर कांग्रेस के सहयोग से बनी सरकार के सीधे मुख्यमन्त्री बनें। वर्ष 1982 में प्रसिद्ध तेलुगू फिल्मी कलाकार पद्मश्री एन टी रामाराव ने भी सर्किट हाउस में हुए अपने अपमान से आहत होने पर एक नई पार्टी तेलगु देशम पार्टी का गठन कर 9 महीने के अन्दर ही विधानसभा के आम चुनाव में बहुमत प्राप्त कर सीधे मुख्यमन्त्री बनें। जबकि भूपेंद्र पटेल के साथ इस तरह की कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि नहीं रही है और न ही ‘‘काम बोलता है‘‘ अथवा ऐसी अलंकृत राजनैतिक पहचान रही है। वे राजनीति में सिर्फ ‘‘कारपोरेशन‘‘ अहमदाबाद महानगर पालिका की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन तक ही सीमित रहे हैं। यद्यपि पूर्व में ऐसे कुछ उदाहरण अवश्य मिल सकते है, जो विधायक होने के बाद मंत्री बने बिना सीधे मुख्यमंत्री बन गए। जैसे मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा, शिवराज सिंह चौहान, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर ,बिहार में राबड़ी देवी, और अभी हाल में ही उत्तराखंड में नियुक्त किए गए पुष्कर सिंह धामी आदि।

एक और बात के लिए भाजपा हाईकमान को बधाई दी जानी चाहिए कि वे इस तरह के लिए गए अप्रत्याशित निर्णयों के फलस्वरुप परिवर्तन, राज्यों के शीर्षस्थ स्तर पर बहुत आसानी से कर लेते हैं। और पार्टी में किसी तरह का मुखर असंतोष, विरोध या विद्रोह नहीं हो पाता है, जैसा कि ऐसी स्थिति में अन्य किसी भी दूसरी पार्टी में हो तो, वहां विद्रोह पैदा हो जाता है। क्यों कि भाजपा का कार्यकर्ता ‘‘हाकिम की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी कभी नहीं चलता‘‘। जिन प्रदेशों में  कांग्रेस सत्ता में हैं, वहां किस तरह सिर फुटव्वल सड़क पर हाई कमांड के बार-बार समझौता करवाने के बावजूद ‘‘मैं भी रानी, तू भी रानी, कौन भरेगा पानी‘‘ की तर्ज पर चलती रहती है, यह सब देश देख रहा हैं। अतः देश की अन्य समस्त पार्टियों को भाजपा की इस ‘‘कला‘‘ को सीखने की आवश्यकता अपनी अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखते हुए जरूरी है। आम चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने की परिवर्तन की इस नीति को भाजपा द्वारा अपना कर  चुनाव के पूर्व अभी तक चार-चार मुख्यमंत्री बदले गए, जिनसे अन्य पार्टियों को उक्त सबक मिलता है और उन्हे यह सीख लेनी  भी चाहिए। 

अब परिवर्तन की बयार का अगला नंबर निश्चित रूप से ‘‘माल कैसा भी हो, हांक ऊंची लगाने वाले‘‘ शिवराज सिंह चौहान पर आकर टिक जाता है। उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद मध्यप्रदेश में आम चुनाव के पूर्व नेतृत्व परिवर्तन होना अवश्यंभावी सा दिखता है। एक तो भाजपा अभी तक आम चुनाव में जाने के पूर्व मुख्यमंत्री बदलने की नई नीति अपना रही है, जिसके परिणाम स्वरूप बदलाव होना लाजिमी ही है। दूसरे शिवराज सिंह को वैसे भी 15 वर्ष से अधिक मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए हो चुके हैं। वर्तमान राजनीति के "मूड" को देखते हुए व भाजपा की "राजनीतिक उम्र सीमा" के बंधन की अपनाई गई नीति को देखते हुए, शिवराज सिंह का जाना ब्रेकिंग न्यूज नहीं होगी, बल्कि जब तक वे पद पर बने हुए है वह एक आश्चर्यजनक बात व ब्रेकिंग न्यूज अवश्य बनी रहेगीं। ‘‘आखिर काठ की हांडी को कितनी बार चूल्हे पर चढ़ायेगी‘‘ पार्टी? वैसे, मध्यप्रदेश में भी, ‘असम‘ जैसा सफल प्रयोग दोहराया जा सकता हैं। अंत में राजनीति का एक सर्वमान्य सिद्धांत हमेशा से यह रहा है कि वह हमेशा अनिश्चितताओ से भरी रहती है। भाजपा के इस कदम ने राजनीति को पहचान देने वाले इस चरित्र की पुनः पुष्टि ही की है।

Popular Posts