शुक्रवार, 1 मार्च 2024

लोकतंत्र पर लगे ‘‘अभूतपूर्व काले दाग’’ को मिटाने के लिए ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय!

 लोकतंत्र की हत्या रोकने के लिए संविधान की हत्या?

उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू की परिकल्पना के अनुरूप विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी वास्तुकार ‘‘ली कार्बजियर’’ द्वारा डिजाईन की गई 20वीं सदी का देश का नया बना शहर चंडीगढ़ के मेयर चुनाव को लेकर उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की गई थी। 5 फरवरी को पहली बार हुई सुनवाई के दौरान माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कहा ‘‘क्या इस तरह से चुनाव कराए जाते हैं’’? यह लोकतंत्र का मजाक है, हत्या है। क्या चुनाव अधिकारी का ऐसा बर्ताव हो सकता है’’। ’हम हैरान हैं! इस ‘‘शख्स पर केस चलना चाहिए’’। यह सब आश्चर्य मिश्रित ‘‘कठोर कथन’’ कहकर उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय को इस बात के लिए भी हड़काया कि ऐसे मामले में अंतरिम आदेश पारित क्यों नहीं किये गये? परंतु ‘‘आश्चर्यजनक बात’’ यह भी रही कि बिना किसी शक-शुबहे के लोकतंत्र की हत्या होते देखने के तथ्य से सहमति दर्शाने के बावजूद उच्चतम न्यायालय ने स्वयं भी ऐसा कोई ‘‘अपेक्षित आदेश’’ अंतरिम आदेश न्याय के लिये पारित नहीं किया। इस प्रकार कहीं न कहीं तथ्यों पर स्वयं के पर्यवेक्षण (ऑब्जरवेशन) एवं निष्कर्षानुसार कार्रवाई न करे प्रथम दृष्टया उच्चतम न्यायालय ने गलती की। उच्चतम न्यायालय द्वारा संपूर्ण न्याय देने की प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 142 में निहित व्यापक विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए और विधान को परे रखकर कौन-कौन सी गलतियां उच्चतम न्यायालय ने की हैं, जैसा कि एक उदाहरण ऊपर दिया गया है। इसकी विवेचना की जानी आवश्यक है। ख़ास तौर से इस सिद्धांत को देखते हुए कि कोई भी संस्था या व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो गलती न करता हो?

पहले यह समझना आवश्यक है कि संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग सामान्यतः विशिष्ट कानून के अभाव में अथवा कानून में अपूर्णता या कमी होने के कारण उपचार के लिए न्याय हित में अत्यंत आवश्यक और अपरिहार्य होने पर ही किया जाता है। यहां पर उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश न दिए जाने के कारण एक ‘‘एसएलपी’’ उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी! प्रथम गलती उच्चतम न्यायालय की तब हुई, जब उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय को फटकारने के बाबजूद अंतरिम आदेश न देकर याचिकाकर्ता को त्वरित सहायता प्रदान न करते हुए 15 दिन बाद प्रदान की! इस कारण से 30 जनवरी को अवैध रूप से चुना गया महापौर 18 फरवरी तक कार्य करता रहा, जब तक अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया क्योंकि चुनाव अधिकारी ने परिणाम घोषित होते ही उसे तुरंत चार्ज दिलवा दिया था।

उच्च न्यायालय के आदेशानुसार की गई चुनावी प्रक्रिया की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग का अवलोकन करने पर पता चला कि पीठासीन चुनाव अधिकारी अनिल मसीह वैधानिक एवं लोकतांत्रिक रूप से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने कर्तव्य के निर्वहन में न केवल असफल दिख रहे थे, बल्कि कहीं न कहीं ‘‘कूट रचना’’ (फोर्जरी) करते हुए भी दिखाई दे रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने उक्त कथित अपराध एवं न्यायालय के समक्ष झूठ बोलने के लिए न्याय चुनाव अधिकारी के विरुद्ध रजिस्टर को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के अंतर्गत तीन हफ्ते का कारण बताओ सूचना पत्र देने के आदेश भी दिए। याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं चुनाव अधिकारी के विरुद्ध कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज न करवाना और फिर दायर एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) में इस तरह की कोई मांग न करने के बावजूद उच्चतम न्यायालय का उक्त निर्देश कितना ‘‘न्यायोचित’’ है? यह दूसरा प्रश्न है। तीसरा; देश की सर्वोच्च न्यायालय की इस तरह की टिप्पणियों के बाद अधीनस्थ न्यायालय में चुनाव अधिकारी के खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही क्या प्रभावित नहीं होगी? 

सबसे बड़ा प्रश्न यहां यह उत्पन्न होता है कि चंडीगढ़ मामले में उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक व कानूनी नजरिये से चंडीगढ़ के निर्वाचित महापौर का चुनाव अवैघ घोषित कर हारे हुए उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर जिसकी मांग याचिका में नहीं था, कानून व नियम का पूर्ण रूप से पालन किया? इस प्रश्न का संविधान व कानून की दृष्टि से सूक्ष्म विवेचन किया जाना आवश्यक है। बावजूद इसके उच्चतम न्यायालय ने अंततः पीड़ित पक्ष को राहत प्रदान की और लोकतंत्र की जो हत्या निर्वाचन अधिकारी ने तथ्यों के विपरीत परिणाम घोषित किया था, उसका इलाज कर लोकतंत्र को सुरक्षित किया।

उच्चतम न्यायालय का उक्त आदेश निम्न कारणों से कानूनों का पालन करते हुए दिखाई नहीं देता है। यद्यपि अंतिम निर्णय निश्चित रूप से तथ्यों के आधार पर सही है। यहां तुलना उचित नहीं होगी। गांधी जी ने भी कहा था कि पवित्र साध्य की प्राप्ति के लिए साधन भी उतना ही पवित्र होना चाहिए! आप जानते है हमारे देश में कोई भी चुनाव गलत रूप से प्रक्रिया अपनाये जाने पर या चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का उपयोग किये जाने पर उक्त निर्वाचन को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दाखिल किये जाने का प्रावधान है। क्योंकि एक बार चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने पर उसे रोका नहीं जा सकता है बल्कि ‘‘चुनाव परिणाम’’ को ही चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। यदि चुनावी प्रक्रिया के दौरान गलत रूप से नामांकन को स्वीकार या अस्वीकार कर दिया जाये, तब भी चुनावी प्रक्रिया रोकी नहीं जाती है बल्कि चुनाव परिणाम को ही चुनौती दी जा सकती है, ऐसा कानूनी प्रावधान है। 

चंडीगढ़ चुनावी प्रक्रिया को समय समय पर विभिन्न कारणों से उच्च न्यायालय मे चुनौती दी गई थी, जिनमें एक कारण समय पर चुनाव न कराना, चुनाव तिथी एक बार तय हो जाने बाद लम्बी अवधि के लिए स्थगित कर देना, एक पार्षद को अवैध रूप से हिरासत में रखने से मुक्ति के लिए आदि। राजनैतिक पार्टी से संबंधित व्यक्ति की चुनाव अधिकारी के रूप में नियुक्ति आदि! उच्चतम न्यायलय ने चुनाव याचिका दायर होने के बाद उच्च न्यायलय द्वारा दिए गये अंतरिम स्थगन आदेश को अस्वीकार करते हुए केन्द्र व चंडीगढ़ प्रशासन को एवं अन्य पक्षों को नोटिस देने के आदेश देते हुए तीन सप्ताह बाद की तिथि निश्चित की। मतलब चुनाव याचिका का निपटारा नहीं हुआ, मात्र अंतरिम आवेदन का निराकण हुआ है, जिसके विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गई थी। अंतरिम स्थगन आदेश प्राप्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने भी उस पर अंतरिम आदेश पारित न करते हुए चुनाव अधिकारी को निर्वाचन के समस्त रिकार्ड अपने समक्ष प्रस्तुत किये जाने के निर्देश देकर 2 सप्ताह बाद की तिथि निश्चित कर दी। 

मतलब उच्चतम न्यायालय के सामने स्थगन आदेश आवेदन पर आदेश पारित करने का मामला था। चूंकि यहां पर उच्चतम न्यायालय की नजर में चुनावी धांधली आईने के समान स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी और हारे हुए आदमी को जीता हुआ दिखा दिया यह स्पष्ट है। तब उच्चतम न्यायालय ने बजाय स्थगन आदेश देने के, तथा उच्च न्यायालय को याचिका के गुण-दोष के आधार पर आदेश पारित करने के निर्देश देने की बजाय स्वयंस्फूर्त रूप से अपील को निर्णीत कर दिया। जो याचिकाकर्ता की मांग ही नहीं थी, इस प्रकार स्पष्ट रूप से उच्चतम न्यायालय द्वारा एक कानूनी गलती की और एक गलत परिपाटी डाली गई! 

यद्यपि यह जरूर कहा जा सकता है कि न्याय देने के लिए गलत परिपाटी डाली गई! उच्चतम न्यायालय की दूसरी महत्वपूर्ण गलती स्पष्ट रूप दिख रही है, पुलिस जांच अधिकारी के रूप में वह आरोपी से प्रश्नोंत्तर करने लगी और जब उसके बाद उच्चतम न्यायालय उसके समक्ष एक प्रतिवादी के रूप मे प्रस्तुत किये गये व्यक्ति को आरोपी ठहरा देता है, तब सुनवाई के समय अधीनस्थ न्यायालय स्वतंत्र निर्णय दे पायेगा, प्रश्न यह है? यह उच्चतम न्यायालय का ही बनाया हुआ नियम व सिद्धांत है कि ‘‘न्याय न केवल मिलना चाहिए, बल्कि मिलते हुए दिखना भी चाहिए’’। यहां पर उच्चतम स्तर पर उस आरोपी के साथ न्याय के नाम पर अन्याय हुआ। उच्चतम न्यायालय के रहते अधीनस्थ न्यायालय तुरंत स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय ले पायेगी? सबसे महत्वपूर्ण गलती यह रही कि बहस के दौरान उच्चतम न्यायालय का यह कथन कि हम हॉर्स ट्रेंडिंग नहीं होने देगें। यह कहीं से कहीं तक चुनाव याचिका का भाग नहीं था, लेकिन चुनाव याचिका के गठित होने के बाद और सुनवाई के एक दिन पूर्व महापौर के इस्तीफा देने व 3 पार्षदों के द्वारा दल-बदल करने के कारण उक्त स्थिति का भी संज्ञान लिया गया था, जो याचिकाकर्ता की विषय वस्तु नहीं थी। इस निर्णय से जो होना ही था वह हुआ, लेकिन इसके द्वारा वह विषय साइड लाइन हो गया। (इसलिए इसी निर्णय की उम्मीद देश के लोकतंत्र में लोकतांत्रिक तरीके की और इससे यह स्पष्ट होता है)? 

ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उसके पास उपलब्ध असीमित अधिकार को अनुच्छेद 142 के अधीन सही ठहराने के बजाय चुनावी पिटीशन के लिए बने कानून में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, ताकि इस तरह की स्थिति पैदा होने पर त्वरित व तुरंत निर्णय न्यायालय लेने में सक्षम हो सके। सही निर्णय के लिये उसमें निहित गंभीर कानूनी व संवैधानिक तथ्यों को नजरअंदाज कर देना भविष्य में इस तरह की परिस्थिति बने जरूरी नहीं है, ऐसे ही सही निर्णय फिर मिल जायें। ये निर्णय कानून की सीमाओं से ऊपर उठकर न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर उसके साहस व उसके विवेक पर ज्यादा निर्भर करता है और इसलिए यदि तंत्र की कमी को भविष्य में दूर नहीं किया जाये तो, उसमें बैठा हुआ व्यक्ति उतना साहसी नहीं होगा और आज के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ का ऐसा निर्णय नहीं आ पायेगा, और फिर न्याय न तो न्यायिक और न अन्यायिक तरीेके से आ पायेगा।

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2024

तेजस्वी का ‘‘तेज’’क्या राष्ट्रीय राजनीति में युवा ‘‘चेतना को चैतन्य’’ कर नेतृत्व करेगा?

‘‘तेजस्वी का तहलका’’

‘तेजस्वी‘‘ कहीं भारतीय राजनीति में सशक्त युवाओं के पदार्पण के ‘‘पर्यायवाची’’ तो नहीं होते जा रहे हैं? ‘‘युवा मोर्चा‘‘ भाजपा का युवा संगठन है, जिसके अध्यक्ष नवम्बर 2020 से कर्नाटक के ‘‘तेजस्वी’’ सूर्या एल. एस. है, जो ‘‘सूर्य‘’ के समान चमक रहे हैं और तेजस्वी नाम को जिसका अर्थ चमकदार, उर्जावान, प्रतिभाशाली है, अपने कार्य से सफल सिद्ध कर रहे है। वे मात्र वर्ष 2019 में 28 वर्ष की उम्र में ही बंगलौर दक्षिण से संसद के लिए चुने गए। इसी प्रकार ‘‘लालू के लाल’’ तेजस्वी प्रसाद यादव, क्रिकेटर से राजनेता बने, वर्ष 2015 में मात्र 26 वर्ष की उम्र में विधायक के लिए चुनकर उप-मुख्यमंत्री बने। ‘‘चारा कांड’’ के सजायाफ्ता उनके पिताजी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री, लालू प्रसाद यादव की ‘‘छत्र छाया’’ नहीं, बल्कि "गहन काली छाया" के साथ मात्र नौंवी पास की पढ़ाई की ‘‘डिग्री’’ लिए तेजस्वी यादव है। उनकी माताजी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी सहित तेजस्वी पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं। ‘‘यानी कि पूरा का पूरा थान ही डैमेज है।’’ उक्त काली पृष्ठभूमि से होने के बावजूद और विधानसभा में सत्ता पक्ष की विश्वास मत पर स्पष्ट दिख रही जीत की स्थिति को अर्थात स्वयं की हार की स्थिति को मतदान के पूर्व ही भाषण के समय ही स्वीकार कर लिया था जैसा कि बाद में मतदान में भाग न लेकर सदन से वॉकआउट कर दिया था। ऐसी विपरीत स्थिति में भी तेजस्वी का  लगभग 40 मिनट का जिस तरह का जोरदार भाषण विधानसभा में विश्वास मत पर चर्चा के दौरान हुआ, उससे वे इस समय देश की समस्त मीडिया से लेकर आम जनों, बुद्धिजीवियों में चर्चित होकर राजनीति में बेहद प्रभावी होकर चमक लेकर एक प्रखर वक्ता के रूप में उभरे हैं। तेजस्वी का यह भाषण अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार गिरने पर संसद में दिये गये भाषण की याद दिलाते हुए उनके व्यक्तित्व को एक नया अवतार प्रदान करता है व राष्ट्रीय राजनीति में उनके पिताजी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण स्थान दिला सकता है, ऐसा कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। तेजस्वी के अपने समकालीन कई युवा नेताओं (राहुल...?) के बारे में यह कहा जा सकता है कि ‘‘जो उगता हुआ नहीं तपा तो डूबता हुआ क्या तपेगा’’?

सामने प्रत्यक्ष दिख रही निश्चित हार की मानसिकता से उबर कर, उपर उठकर और पिताजी की दाग नुमा छवि के वटवृक्ष के नीचे चलने के बावजूद उक्त घेरे (चक्रव्यूह) से निष्कलंक बाहर निकल कर आ जाना, एक नई युवा राष्ट्रीय राजनीति को इंगित करता है कि तेजस्वी ‘‘उथले पानी की मछली नहीं है’’। फिर ‘‘सुशासन बाबू’’ की छवि लिए राष्ट्रीय राजनीति के स्थापित क्षितिज राजनीतिक अनुभव में अपने से कई गुना बड़े, उम्र दराज, पांच बार की जीत, परन्तु कभी भी पूर्ण बहुमत प्राप्त न करने के बावजूद 17 साल में नौंवी बार बने ऐसे बिहार के ऐसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सत्ता को चुनौती देते हुए, विधानसभा में अपने ‘तेज’ से तेजस्वी ने सबको ‘चमका’ दिया। जिस तत्परता, कौशल व शालीनता के साथ ‘‘अपशब्दों’’ (जो आज की राजनीति का अंलकारित महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है), का प्रयोग किए बिना विधानसभा में अपनी बात रख कर ‘‘राजा दशरथ’’, ‘‘माता कैकयी’’ का उल्लेख कर सामने वाले की बोलती बंद कर उन्हें भौंचक्का कर देना, तेजस्वी यादव का यह एक नया ‘‘एंग्री मैन’’ का रूप है। जो देश की राजनीति में आगे अग्रेषित होता हुआ स्पष्ट दिख रहा है। नाम (तेजस्वी) के विपरीत ‘‘तेजी’’ से न चलने की नीति, विपरीत परिस्थितियों में ठंडे दिमाग से तेजस्वी यादव ने जिस तरह नीतीश कुमार जो कि ‘‘ऐसे ऊंट के समान हैं जो अपनी पूंछ से मक्खी तक नहीं उड़ा सकते’’ को विधानसभा में सफलतापूर्वक ‘‘गुस्साये’’ नहीं, बल्कि ‘‘मुस्कराते’’ हुए घेरा, उसने नीतीश की अंततः हुई जीत की सफलता में भी तेजस्वी की हार की असफलता को ढक दिया। नीतीश कुमार को निरूत्तर कर सिर्फ पूर्व के लालू-राबड़ी के ‘‘जंगलराज’’ की याद दिलाने के अलावा नीतीश के पास कुछ बचा नहीं था। इस जंगलराज को भी जेडीयू की विधायक बीमा भारती ने जिसने विश्वास मत के पक्ष में मतदान किया, ने रोते हुए जिस प्रकार नीतीश की सरकार को जंगलराज कहा उससे नीतीश कुमार का जंगलराज का आरोप भी बोथल हो गया। नीतीश यह बतलाने में पूरी तरह से असफल रहे कि उन्होंने एनडीए को क्यों पकड़ा व महागठबंधन का साथ क्यों छोड़ा? ‘‘औसर चूकी डोमनी गावे ताल बेताल’’।

तेजस्वी बार-बार अपने बयानों और किए गए कार्यों से यह अहसास दिलाते रहे कि जिन उद्देश्य को लेकर नीतीश कुमार ने ‘‘एनडीए’’ को छोड़कर ‘‘महागंठबंधन’’ के साथ सरकार बनायी थी, उसी गठबंधन की सरकार ने 17 महीनों में ऐसे अनेकोनेक कार्य किए जो पूर्व में 2005 से लेकर 2024 तक 17 साल की नीतीश कुमार की सरकार में नहीं हुए और इन 17 महीनों की सरकार चलाने में तेजस्वी ने कोई रुकावट नहीं डाली। न ही अपने प्रत्युत्तर में ऐसा कोई असहयोग का स्पष्ट आरोप नीतीश कुमार ने तेजस्वी पर लगाया। हां यह आरोप जरूर लगाया कि उनकी बातों को राजद कोटे के मंत्री गंभीरता से नहीं ले रहे थे। नीतीश कुमार का एनडीए में आने का तर्क बेहद ही लचर, अविवेकपूर्ण, तर्कहीन व बिल्कुल दमदार नहीं, बल्कि एक तरह से हास्यास्पद था। जेडीयू को कमजोर करने के आरोप लगाने के साथ जिस एनडीए को कमजोर करने के लिए और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ आगामी लोकसभा चुनाव में पहले 200 व बाद में मात्र 100 सीटों पर ही समेटने की बात की हुंकार भरने वाले नीतीश कुमार जब यह कहते है कि ‘‘इंडिया’’ गठबंधन ने उनकी बात नहीं सुनी, इसलिए वे जहां थे, वापस वहीं आ गए। लालू, कांग्रेस से मिले हुए थे, यह आरोप भी लगाया। तब क्या नीतीश कुमार का यह कर्तव्य नहीं होता था कि ‘‘गठबंधन’’ छोड़कर ‘‘एनडीए’’ में जाने की बजाए अपनी बची-कुची ताकत के आधार पर उक्त घोषित उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए जुट जाते? परन्तु विपरीत इसके वे अपनी मान-सम्मान का ख्याल किए बिना, उस एनडीए को कमजोर करने की बजाय, उसी एनडीए को मजबूत करने में शामिल हो गए। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नीतीश कुमार का उद्देश्य एनडीए को कमजोर करना नहीं था, जब एनडीए छोड़कर ‘महागठबंधन’ में शामिल हुए थे।

सामान्यतया ऐसा कभी नहीं होता है और न ही ऐसा मानवीय स्वभाव होता है कि एक व्यक्ति जो अपने दुश्मन को निपटाने के लिए पहले ‘‘दुश्मन के दुश्मन से’’ हाथ मिलाता हो, असफल होने पर अथवा बीच में ही लड़ाई छोड़ने पर, वह प्रथम दुश्मन से लड़ने की बजाए उसके साथ ही शामिल होकर समर्पण कर दें। यह तभी होता है, जब वास्तव में वह दुश्मन ‘‘जानी दुश्मन’’ न होकर दिखाने के लिए दुश्मन होता है, और ऐसा परसेप्शन बनाया जाता है। यदि राजनीतिक रूप से अपने दुश्मन से लड़ने में सक्षम नहीं है, इस लड़ाई में दूसरों का वांछित सहयोग नहीं मिल रहा है, तो उचित तो यही होता कि कुछ समय का इंतजार करते या परिस्थितियों का सामना कर विद्यमान परिस्थिति, के आधार पर ही लड़ने का प्रयास करते, न कि उसी दुश्मन से मिलकर उसी को मजबूत करने का कार्य करें। इसी को कहते हैं कि ‘‘ओछे की प्रीत बालू की भीत’’। नीतीश कुमार के पूरे कार्य का निचोड़ यही ‘‘गैर जिम्मेदारी’’ है, जिसकी ‘‘जिम्मेदारी’’ से वे भाग नहीं सकते हैं।

तेजस्वी ने भाषण में कई बातें सकारात्मक कहीं, तो कुछ के द्वारा सामने वाले को आइना दिखाने का सफल प्रयास किया। एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन तीन विधायक के अचानक उनके प्रति पाला पलटकर विश्वास मत के दौरान विश्वासघात करने के बावजूद तेजस्वी ने उनके प्रति राजनीतिक ‘‘उदारता’’ दिखाई। वर्तमान में हममें से शायद किसी ने भी किसी नेता में इस तरह की बहुआयामी प्रतिभा नहीं देखी होगी। तेजस्वी का यह रवैया उनके व्यक्तित्व को बहुत बड़ा कर देता है। 

नीतीश कुमार का युवाओं को नौकरी देने के संबंध में तेजस्वी पर श्रेय लेने का आरोप लगाने पर तेजस्वी ने जिस प्रकार जवाब दिया, वह वाकई में काबिले तारीफ व सटीक था। उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्ता पक्ष को चुनौती दी, जो काम करेगा वह ‘‘श्रेय’’ लेगा। चूंकि मैंने वह काम किया जो नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव के समय कहा था कि "अपने बाप से पैसा लायेगा’’? ‘‘जेल से पैसे लेगा’’? साथ ही उन्होंने सत्तापक्ष को यह चुनौती भी दी कि आप भी जब कोई काम करेंगे तो क्या श्रेय नहीं लेंगे? आप ओल्ड पेंशन लागू कीजिए और श्रेय लीजिए। हम भी इसे स्वीकार करेगें।

राजद के दो विधायक आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद, बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी के अध्यक्ष की अनुमति के बिना सत्ता पक्ष के साथ बैठकर पाला पलटने पर तेजस्वी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि आपको जब भी हमारी जरूरत हो, हम आपके साथ है। पूर्व में भी हमने आपको खराब स्थिति से उबारा है। यह कथन भविष्य की संभावनाओं का खुला रखने का द्वार ही कहा जायेगा। 17 महीनों के शासन में कहीं यह याद नहीं आता है कि तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार से अपनी असहमति या नाराजगी जाहिर की हो। इसके बावजूद नीतीश कुमार ने कई बार लालू प्रसाद यादव के जंगल राज का उद्हरण किया। सचमुच में इस 40 मिनट के भाषण ने नीतीश कुमार की लगभग 40 साल से अधिक की जो राजनीतिक पूंजी कमाई थी, जिस कारण वे सुशासन बाबू भी कहलाये, जो पूंजी इस बार पाला बदलते ही समाप्त हो गई। ऐसी रातों के ऐसे ही सवेरे होते हैं’’। और उस पर तेजस्वी के भाषण ने ऐसा तडका लगा दिया की जो जली हुई पूंजी की अग्नि पर राख पड़ी थी, वह उस राख को तेजस्वी के भाषण ने ठंडा (शीतल) कर दिया, जिससे वह भविष्य में चिंगारी के रूप में भी न जल सके। ‘‘ईंट की लेनी और पत्थर की देनी’’इसी को कहते हैं।

युवा नेतृत्व की देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भागीदारी को रेखांकित करता यह लेख अपूर्ण ही कहा जायेगा, यदि इसमें  उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का उल्लेख न किया जाए। उत्तर प्रदेश विधानसभा में अखिलेश यादव ने जो बजट भाषण दिया, निश्चित रूप से अखिलेश भी ‘‘तेजस्वी’’ की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। दोनों ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’। वे पहली बार वर्ष 2012 में विधानसभा का चुनाव लड़े व मात्र 38 वर्ष की उम्र में उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। अखिलेश के भाषण में युवा उत्साह के साथ राजनीतिक अनुभव की परिपक्वता भी पूरी तरह से परिलक्षित हो रही थी। इन तीनों युवा नेताओं के मर्यादित विधायकि उद्बोधन और देश की राजनीतिक क्षितिज पर तेजी से उभरते व्यक्तित्व के कारण भविष्य में और भविष्य के गर्भ में छुपी अन्य संभावनाओं के मद्दे नजर अब शायद किसी नागरिक को यह कहने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी कि इंदिरा के बाद कौन? मोदी के बाद कौन? सर्व-धर्म, सम-भाव, सर्वसमाज की भावना लेकर बढ़े तेजस्वी जैसे लोग आगे बढ़कर देश के नेतृत्व करे, इन्ही शुभकामनाओं के साथ।

इंडिया ‘‘गठबंधन‘‘ का पहला ‘‘शक्ति परिक्षण‘‘ चंडीगढ़ मेयर चुनाव!

 क्या उच्चतम न्यायालय भी ‘‘एक्शन’’ (कार्रवाई) कम ‘‘परसेप्शन’’ बनाने में ज्यादा लग गया है?

‘‘खूबसूरत शहर पर लोकतंत्र कमजोर करने का बदनुमा दाग’’!

वर्तमान राजनीति निसंदेह ‘‘क्रिया’’ (कार्रवाई एक्शन) की बजाए ‘‘धारणा‘‘ (परसेप्शन) और ‘‘नरेटिव‘‘ से परिपूर्ण है। और इस मामले में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कोई मुकाबला ही नहीं है। इसी ‘‘परसेप्श्न व नरेटिव’’ के सहारे प्रधानमंत्री ‘‘अबकी बार 400 के पार’’ का आत्मविश्वास से भरा कथन संसद में कर रहे थे। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इस दावे से एकदम से इंकार भी तो नहीं किया जा सकता है? ‘‘कर्ता से करतार हारे’’।

कहते है न, जिस वातावरण में हम रहते हंै, प्रभाव उसका अवश्य पड़ता है। ऐसा ही कुछ राजनीति की ‘‘क्रिया व बनी धारणा’’ का प्रभाव न्यायपालिका पर भी पड़ता हुआ दिख रहा है। पिछले कुछ समय से उच्चतम न्यायालय में जिस तरह की न्यायालीन कार्रवाई हुई है, जो कुछ तीक्ष्ण टिप्पणियां न्यायालय द्वारा कुछ एक मामलों में की गई, परन्तु बाद में उन्हीं मामलों में जो फैसले आये उनका उन कहीं गई टिप्पणियों से वैसा सरोकार न होने/रखने के कारण, न्यायालय में भी ‘‘धारणा‘‘ की (परसेप्शन) स्थिति बनती हुई प्रतीत होती दिखती है।

चंडीगढ़ जिसका नाम देवी दुर्गा के एक रूप ‘‘चण्डी’’ के कारण पड़ा, वर्ष 1952 में बना देश का एक बहुत ही सुंदर शहर है। इसके वास्तुकार विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी ली कार्बजियर थे। इसीलिए इसे ‘‘सिटी ब्यूटीफुल’’ भी कहा जाता है। इस शहर की सुंदरता को मैंने भी देखा है। विश्व में यह शायद एकमात्र ऐसा शहर है, जिसे तीन राजधानी (ट्रिपल क्राउन) होने का गौरव प्राप्त है। प्रथम एक व दो पंजाब तथा हरियाणा राज्य की राजधानी व तीसरा है, ‘‘केन्द्र शासित प्रदेश’’ (संघ राज्य क्षेत्र) है। इसका एक प्रशासक होता है, जो सीधे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। चंडीगढ़ महापौर का कार्यकाल उत्तर भारत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की तुलना में मात्र 1 वर्ष का होता हैं। 

अभी चंडीगढ़ मेयर का जो चुनाव हुआ है, जिसका कार्यकाल 16 जनवरी को समाप्त हो चुका है, ‘‘उस चंडीगढ़’’ का था, जिसकी कमान केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। अर्थात् केन्द्रीय प्रतिनिधी होने कारण सीधे रूप से राज्यपाल के पास है। मतलब चंडीगढ़ प्रशासन की कोई भी गलती अथवा उपलब्धि के लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय व राज्यपाल ही उत्तरदायी अथवा अधिकरी माने जायेगें। ‘‘कमर का मोल होता है तलवार का नहीं’’। महामहिम राज्यपाल बनवारीलाल जो मध्य भारत के अग्रणी अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र ‘‘द हितवाद’’ के मालिक रहें हैं, के इस्तीफा को चंडीगढ़ चुनाव परिणाम, के उक्त परिदृश्य के परिपेक्ष में भी देखा जा सकता है। ‘‘कहु रहीम कैसे निभे बेर केर को संग’’।

लोकतंत्र को तार-तार कर देने वाली चंडीगढ़ मेयर के चुनावी प्रक्रिया का मामला पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से आवश्यक सहायता न मिलने पर उच्चतम न्यायालय पहुंचा। सुनवाई के दौरान प्रथमदृष्ट्यिा ‘‘वीडियो’’ क्लिक देखने के बाद माननीय मुख्य न्यायाधीश की यह बेहद तल्ख टिप्पणीयाॅ थी कि ‘‘यह जनतंत्र की हत्या है’’। ‘‘लोकतंत्र मजाक है’’। ‘‘पूरे मामले से हम हैरान है। ‘‘चुनाव अधिकारी क्या कर रहे है? ‘‘चुनाव अधिकारी पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए’’। उक्त टिप्पणियों ने तो देश के लोकतंत्र की जड़ों को ही हिला दिया। एक बार तो ऐसा लगा कि ‘‘देश में लोकतंत्र तख़्त पर नहीं तख़्ते पर है’’। उच्च न्यायालय की इस बात के लिए भी आलोचना की गई कि ऐसे मामले में ‘‘अंतरिम आदेश’’ क्यों नहीं दिया गया? उक्त तल्ख टिप्पणी के बावजूद आश्चर्य की बात यह रही कि स्वयं उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्ता कुलदीप कुमार टीटा जिसे मेयर चुनाव में तथाकथित गड़बड़ी कर हराया गया था, के पक्ष में कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया गया। न तो प्रथम दृष्ट्या दिखते ‘‘शून्य’’ चुनाव परिणाम पर रोक लगाई, जिससे की अवैध रूप से निर्वाचित अध्यक्ष को कार्य करने से रोका जा सकता था और न ही लोकतंत्र का गला घोटने वाले अधिकारी के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करने के अथवा तत्काल जांच के आदेश दिये। मतदान को एक साजिश के तहत विकृत किया गया हैं, यह अभी अनुत्तरित हैै।

हाईकोर्ट ने जहां तीन हफ्ते बाद सुनवाई के लिए प्रकरण रखा, वहीं उच्चतम न्यायालय ने दो हफ्ते बाद 19 फरवरी सुनवाई निश्चित की। तत्काल कोई राहत उच्चतम न्यायालय से याचिकाकर्ता को नहीं मिली, सिवाए चुनाव प्रक्रिया के पूरे रिकॉर्ड को संरक्षित करने के साथ निर्वाचन अधिकारी को व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश दिये गये। इससे इस बात को पूरा बल मिलता है कि, उच्चतम न्यायालय ने यह (परसेप्शन) तो पूरा बनाया कि वह लोकतंत्र का प्रहरी है और संविधान में प्रद्रत्त, वर्णित निष्पक्ष व न्यायप्रिय चुनाव आयोग के अपने कर्तव्य के पालन में असफल होने पर वह सबसे बड़ा अभिरक्षक (कस्टोडियन) है। परन्तु क्या वास्तव में ऐसा ‘‘परिणाम’’ फलितार्थ हुआ? ऐसे कुछ अन्य ऐसे मामले को आगे उद्धरित किया गया है।

महाराष्ट्र के मामलों को देख लीजिए! जहां उच्चतम न्यायालय ने शिवसेना की टूट पर विधानसभा अध्यक्ष एवं चुनाव आयोग द्वारा की गई कार्रवाई पर यह कहा था, उद्धव ठाकरे इस्तीफा न देकर यदि विश्वास मत हासिल करते हुए हार जाते, तब उच्चतम न्यायालय उनको मुख्यमंत्री पद पर पुनर्स्थापित कर सकता था। यह न्यायालय का न्याय के प्रति क्या मात्र परसेप्शन था? क्योकि अंत में जो निर्णय आया वास्तव में उसमें क्या हुआ? ‘‘काजी के प्यादे घोड़ों पर सवार हो गये’’। स्पीकर के निर्णय ने यह स्थिति ला दी कि समस्त विधायक शिंदे ग्रुप के ही हो गये और अब विधानसभा में शिंदे ग्रुप के व्हिप का विरोध करना सदस्यता खोने के खतरे से खाली नहीं होगा। इसी प्रकार इलेक्ट्रोल बाॅड के विषय में उच्चतम न्यायालय का निर्णय महीनों से आदेशार्थ बंद है। आगामी होने वाले लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ होने अथवा चुनाव होने के बाद निर्णय आयेगा, तब क्या याचिका का उद्देश्य ही व्यर्थ नहीं हो जाएगा?

उच्चतम न्यायालय की चंडीगढ़ महापौर के मामले में दो प्रमुख गलती स्पष्ट रूप से प्रतीत होती दिखती है। प्रथम वीडियो के आधार पर उपरोक्त रिमार्क किये गये, जिस वीडियो की पुष्टि कोई ‘‘फोंरेसिक जांच’’ किये बिना उस पर विश्वास कर तथा उसका साक्ष्यात्मक मूल्य कितना होगा, उस पर विचार किये बिना ‘मत’ बना लेना, कितना न्यायोचित है? दूसरा उच्चतम न्यायालय ने तल्ख व तीखे तेवर दिखाकर वही स्टैंड लिया जो उच्च न्यायालय ने शांतिपूर्वक रहकर यह कहकर लिखा कि यह जांच का विषय है, इसलिए दूसरे पक्ष का जवाब आने पर ही इस पर कोई आदेश पारित किया जा सकता है। इससे उच्च न्यायालय की तुलनात्मक रूप से गरिमा ज्यादा दिखती प्रतीत है, भले ही कानूनी रूप से उनका स्टैंड सही नहीं कहा जा सकता है। परन्तु उन्हे भी ‘‘सही’’ करने का काम तो उच्चतम न्यायालय ने नहीं किया। ऐसा लगता है, उच्चतम न्यायालय के मन-मस्तिष्क में वह ‘‘सर्वोच्च’’ के साथ श्रेष्ठतम है, ‘‘भाव’’ के साथ परिस्थितियों, तथ्यों पर कई बार गहराई पर जाये बिना ऐसी त्वरित टिप्पणियां व आदेश पारित कर दी जाती है, जो सामान्यतः कानूनविदों के गले उतरती नहीं है।  

शुरू से ही देखे, मेयर के चुनाव में प्रशासन ने रुकावटें डाली व गंभीर अनैतिकता का प्रदर्शन किया। सामान्यतः 1 जनवरी को मेयर पद ग्रहण कर लेता है। यहां पर संख्या की दृष्टि से भाजपा व अकाली दल के 16 पार्षद (14+1+1) सांसद प्रतिनिधि सहित थे। जबकि आप व कांग्रेस पार्टी में गठबंधन हो जाने के कारण कुल 20 पार्षद हो गये थे। पहली बार जब 10 जनवरी को मेयर चुनाव की तारीख 18 जनवरी घोषित हुई थी, तब तक आप व कांग्रेस का गठबंधन नहीं हुआ था। बल्कि कांग्रेस के उम्मीदवार ने भी पर्चा भरा था। बाद में जब कांग्रेस उम्मीदवार को फार्म वापिस लेने के लिए वह कार्यालय न पहुंच सके उसके लिए घर में ही उसे नजरबंद कर दिया गया था। उच्च न्यायालय के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर होने पर उनकी मुक्ति हुई। परन्तु 18 जनवरी की चुनावी तिथि के पूर्व ही 16 तारीख को  गठबंधन हो गया। पीठासीन अधिकारी (चुनाव अधिकारी) चुनावी तिथि के दिन तथाकथित रूप से बीमार हो गये। तद्नुसार सहायक आयुक्त (डीसी) ने चुनाव की नई तारीख 06 फरवरी निश्चित की। ‘‘कमली ओढ़ लेने से कोई फ़कीर नहीं बन जाता’’, चुनाव अधिकारी भी उस व्यक्ति मनोनीत पार्षद अनिल मसीह को बनाया गया जो भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा का पदाधिकारी रहा है, यह भी बेहद हैरत की बात हैं। 06 फरवरी को निश्चित की गई चुनावी तारीख को गठबंधन के उम्मीदवार कुलदीप कुमार टीटा ने हाईकोर्टं में चुनौती दी। तब पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 23 तारीख को अंतरिम आदेश पारित करते हुए 30 जनवरी को चुनाव कराने के आदेश इस निर्देश के साथ दिये कि ‘‘पूरी चुनावी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की जावे। तदनुसार हुए चुनाव में चुनाव अधिकारी द्वारा 8 वोट अवैध घोषित किये गये, जिसके लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। विपरित इसके उन वैध मतों को तथाकथित रूप से अवैध करने की प्रक्रिया करते स्वयं चुनाव अधिकारी ‘‘कैमरे‘‘ में पकड़े गये, जो वीडियो उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत की गई। चुनाव परिणाम घोषित करते ही पीठासीन अधिकारी द्वारा तथाकथित जीते गए उम्मीदवार मनोज कुमार सोनकर को तुरंत बुलाकर महामहिम की कुर्सी पर बैठा दिया। 

एक तरफ देश में ‘‘ईवीएम’’ के बदले ‘‘बैलेट पेपर’’ पर चुनाव होने की मांग लगातार उठ रही है। इस पर प्रबुद्ध वर्ग का असंतोष व जन आंदोलन बढ़ते जा रहा है। इन जन आंदोलनकारियों को यह सोचना होगा कि इस तरह दिनदहाड़े बैलेट पेपर पर किस बेशर्मी के साथ डाका डाला जा सकता है, जिससे बैलेट से चुनाव कराना कितना खतरनाक है, और हो सकता है? कभी बैलेट चुनाव के समय इतनी भयावह स्थिति होती थी कि मत पेटियां ही गायब कर दी जाती थी। इसीलिए तो ईवीएम को लाया गया था। हां उसमें कमियां जरूर व अनेक है, उनमें सुधारों का सुझाव जरूर कुछ लोगो ने दिया है। महत्वपूर्ण सुझाव ‘‘वीवीपैड’’ की गिनती की जाने की हैं। तब न तो बैलेट पेपर में गड़बड़ी होने की संभावनाएं रहेगी और साथ ही ईवीएम में ‘चिप’ के द्वारा गड़बड़ी की जाने की तथाकथित आशंका को वीवीपैड की गिनती करके दूर किया जा सकेगा। मेयर चुनाव परिणाम आने के तत्काल बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा द्वारा ट्वीट पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा मेयर चुनाव जीतने के लिए भाजपा चंडीगढ़ इकाई को बधाई। भाजपा के ट्विटर हैंडल पर कहा गया ‘‘यह तो अभी झांकी है’’। क्या ये प्रतिक्रियाएँ जल्दबाजी में हुई गलती तो नहीं है?

सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

कर्पूरी ठाकुर की सादगी का एक आंखों देखा हाल।

 //संस्मरण//   ‘‘तांगे में बैठकर बस स्टैंड गये’’

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी को भारत रत्न दिए जाने पर लिखे मेरे लेख पर भोपाल निवासी श्री नरेंद्र भानू खंडेलवाल ने मुझे फोन पर कर्पूरी ठाकुर की सादगी, जो उन्होंने देखी व जिसके प्रत्यक्षदर्शी मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री जी डी खंडेलवाल रहे, का रूबरू वर्णन में आगे कर रहा हूं, जैसा की श्री नरेंद्र भानू खंडेलवाल ने मुझे फोन पर बतलाया।

मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री गोवर्धन दास जी खंडेलवाल वर्ष 1967 में बनी संविद सरकार जिनकी जनक व नेत्री स्वर्गीय राजमाता विजयाराजे सिंधिया थीं, के मुख्यमंत्री ठा. गोविंद नारायण सिंह के मंत्रिमंडल में पहले समाज कल्याण विभाग के राज्य मंत्री और बाद में आदिम जाति कल्याण एवं बिजली विभाग के कैबिनेट मंत्री जनसंघ कोटे से रहे। हम लोग उस समय प्रोफेसर कॉलोनी में चार बंगले के बंगला नंबर तीन में रहते थे, जहां बाद में कभी सुश्री उमा भारती भी रहीं।

बात उस समय की है, जब डॉ राम मनोहर लोहिया के ‘‘गैर कांग्रेस वाद’’ के नारे व नीति के चलते वर्ष 1967 में देश में संविद सरकारें बनने का दौर चला था। मध्य प्रदेश में ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि प्रदेशों में भी संयुक्त विधायक दल की (संविद) सरकारें गैर कांग्रेस वाद के आधार पर बनी थी। संपूर्ण देश में गैर कांग्रेसी वाद को मजबूत करने के लिए समस्त विपक्षी दलों को एक साथ खड़े रखने की नीति को मजबूत करने के तहत शायद पार्टी निर्देशों के तारम्तय में मेरे पिताजी जी डी खंडेलवाल जी ने उस समय की समस्त संविद सरकारों के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री को विचार विमर्श करने के लिए एक बैठक अपने निवास, चार बंगले में बुलाई थी। तब कर्पूरी ठाकुर, जो उस समय बिहार के उपमुख्यमंत्री थे, भोपाल हमारे निवास पर आए थे। उस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय, राजमाता विजयाराजे सिंधिया व उपमुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा भी बैठक में उपस्थित थे। पंडित दीनदयाल जी की सादगी का आलम यह था कि एक पत्रकार ने जब यह पूछा कि दीनदयाल जी भी आए हैं? तब उनको यह बतलाया गया कि आपके सामने जो अभी चप्पल पहने जा रहे हैं, यही दीनदयाल जी हैं।

मीटिंग समाप्ति के बाद कर्पूरी ठाकुर जी को इंदौर एक निजी कार्यक्रम में जाना था। वे बस से इंदौर जा रहे थे। नरेंद्र भानू खंडेलवाल, जो उस समय हमारे पारिवारिक सदस्य थे और मैं और मेरा छोटा भाई उनके द्वारा चलाई जारी शिक्षा क्लासेस में पढ़ने भी जाते थे, घर पर उपस्थित थे। कर्पूरी ठाकुर जी को बस स्टैंड छोड़ने के लिए कार में बैठने के लिए नरेंद्र जी ने कहा तो उन्होंने कहा मैं सरकारी गाड़ी का उपयोग नहीं करूंगा, क्योंकि मैं निजी यात्रा पर जा रहा हूं। तब नरेंद्र जी स्वयं ‘‘तांगे’’ पर उनको लेकर बस स्टैंड छोड़ने गए और 5 रू 50 पैसे की इंदौर की बस का टिकट कटवाया। वह पैसे भी कर्पूरी ठाकुर ने ही दिए, यह कहकर कि जब मैं कार से बस स्टैंड नहीं आया हूं, निजी यात्रा पर जा रहा हूं, आपसे पैसे कैसे ले सकता हूं? सादगी के इस रूप की कल्पना आज तो संभव ही नहीं है, ओढ़ना तो दूर की बात है। इसी सादगी में मैं अपने स्वर्गीय पिताजी की सादगी को भी जोड़ना चाहता हूं। संविद सरकार में शामिल जनसंघ घटक के समस्त मंत्रियों को जब ‘‘कच्छ आंदोलन’’ में भाग लेने के लिए मंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया। तब मेरे पिताजी इस्तीफा पत्र लेकर घर से गवर्नर हाउस सरकारी गाड़ी से नहीं गए, बल्कि स्कूटर से गए और उस समय स्कूटर पर जाते हुए उनकी फोटो समाचार पत्रों में छपी थी। तब कोई सोशल मीडिया नहीं था। हम दोनों भाई भी स्कूल पॉलिटेक्निक बस स्टॉप से बस पकड़ कर जवाहर चैक माडल स्कूल जाते थे, जबकि अन्य मंत्रियों के बच्चों को स्कूल छोड़ने सरकारी गाड़ियां जाती थी।

कर्पूरी ठाकुर की ऐसी सादगी को नमन। मैं नरेंद्र जी का हृदय की गहराई से धन्यवाद करना चाहता हूं कि मुझे उन्होंने उक्त तथ्यों से अवगत कराया, जिसकी जानकारी मुझे अभी तक नहीं थी। 

सादगी का उक्त वर्णन जैसा कि नरेंद्र भानू खंडेलवाल जी ने बतलाया।

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

‘जननायक’’ कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व का ‘‘आकलन’’ करने में इतने वर्ष क्यों लग गए?


मोदी का ‘‘जादू’’ हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को कब ‘‘भारत रत्न’’ दिलाएगा
?

देरी से दिया गया सम्मान

भारत देश का सर्वोच्च सम्मान ‘‘भारत रत्न’’ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और खांटी समाजवादी और शोषितों के जननायक, महानायक, गरीबों के मसीहा स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर को दिए जाने का निर्णय भले ही अत्यंत देरी से लिया गया हो, तब भी अत्यंत स्वागत योग्य और एक ‘‘गलती’’ को सुधारने का देरी से किया गया सफल प्रयास है। आपको याद दिला दें। कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु 64 वर्ष की आयु में 17 फरवरी 1988 को हुई थी। वे पहली बार वर्ष 1952 में बिहार विधानसभा के लिए चुने गये थे। ‘‘यूं तो दुनिया मुर्दा परस्त है’’, दिवंगत लोगों की ही प्रशंसा करती है। परन्तु ‘‘भारत रत्न’’ देने का यह कोई नियम नहीं है कि ‘माननीय’ को देश के लिए किए गए सर्वोच्च उत्कृष्ट कार्यों की प्रशस्ति के लिए मृत्यु उपरांत ही ‘‘भारत रत्न’’ दिया जाकर सम्मानित व याद किया जा सकता है। बल्कि ऐसे उदाहरण है हमारे देश में, जब जीवित व्यक्ति को भी देश के प्रति उनके योगदान के लिए भारत रत्न देकर सम्मानित किया गया है, जैसे सचिन तेंदुलकर (वर्ष 2014 में) क्योंकि वे उसकी योग्यता, पात्रता रखते थे।

सम्मान अविवादित! परन्तु राजनीतिक सोउद्देश्य लिये हुए।

जहां तक कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व का सवाल है या उनको ‘‘भारत रत्न’’ दिए जाने का प्रश्न है, यह निर्विवाद है। यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि देश की समस्त राजनीतिक पार्टियों ने केंद्र सरकार के इस निर्णय की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। परंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या ‘‘भारत रत्न’’ वास्तव में कर्पूरी ठाकुर को सिर्फ सम्मान देने के उद्देश्य से दिया गया है, जिसके वे निसंदेह हकदार है। अथवा इस घोषणा के साथ ‘‘राजनीति’’ भी जुड़ी हुई है? देश की वर्तमान में जो राजनीतिक परिस्थितियां विद्यमान है, उनमें हर क्षेत्र में न केवल राजनीति प्रविष्टि हो जाती है, बल्कि राजनीति को घुसेड़ भी दिया जाता है, ऐसा हम देखते चले आ रहे हैं। फिर चाहे धर्म में राजनीति का ही प्रश्न क्यों न हो? शिक्षा, कला, खेल इत्यादि क्षेत्रों में के मूल क्षेत्रों के अतिरिक्त वहां भी राजनीति हमेशा हावी रहती है। इसलिए यदि स्वर्गीय कपूरी ठाकुर को मृत्युपरांत शीघ्र ही कुछ समय बाद होने वाले लोकसभा चुनाव के पूर्व भारत रत्न दिया गया है, तो इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक उद्देश्य भी छुपा हुआ ही नहीं है, बल्कि दिखता हुआ शामिल है/शामिल दिखता हुआ है।

‘‘मोदी है तो मुमकिन है’’। 

याद कीजिए! पिछले कुछ समय से मीडिया में नीतीश कुमार के ‘एनडीए’ में शामिल होने की खबरें लगातार छप रही थी या ज्यादा उचित कहना यह होगा कि ऐसी खबरें सो/दुः उद्देश्य छपाई जा रही थी। परन्तु यह मुहिम असफल होने के बाद ही बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए शायद केंद्रीय शासन ने उक्त निर्णय लिया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जातिगत जनसंख्या की गणना के निर्णय की काट के परिपेक्ष में भी इस निर्णय को देखा जा रहा है। मैं पहले भी कई बार स्पष्ट कह चुका हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नरेटिव फिक्स करने और परसेप्शन बनाने के ‘‘मास्टर ऑफ मास्टर’’ है, जिस कारण से वह विरोधियों को ‘हतप्रद’ कर ‘चित’ कर देते हैं। कई बार तो विरोधियों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति और निर्णय की प्रशंसा मजबूरी में सही, करनी ही पड़ जाती है। यही देश का ‘‘मोदी नामा’’ है। ‘‘मोदी है तो मुमकिन है’’, यह जिस किसी ने भी कहा है, गलत नहीं है।

अत्यंत सादगी से परिपूर्ण जीवन

कर्पूरी ठाकुर का जन्म गांव पितौंझिया में जिसे अब ‘‘कर्पूरी ग्राम’’ कहां जाता है, बाल काटने के पेशे से जुड़े सीमांत किसान के घर में हुआ था। 1970 के दशक के राजनीतिज्ञों में कर्पूरी ठाकुर का एक महत्वपूर्ण, विशिष्ट, अति सम्मानीय, स्थान रहा है। वे देश के ऐसे मुख्यमंत्री थे, जो अत्यंत गरीबी के चलते राजनीति में आये थे। वे जीवनपर्यंत दलित, शोषित व वंचित वर्ग के उत्थान के लिए संघर्ष करते हुए कुछ-कुछ सफलता भी प्राप्त की। वे देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने ‘‘मंडल’’ व उसकी प्रतिक्रिया में आये ‘‘कमंडल’’ के काफी पहले वर्ष 1978 में ‘‘मुगेरीलाल आयोग’’ की रिपोर्ट को लागू कर सिर्फ पिछड़ा वर्ग को ही आरक्षण (12 फीसदी) व अतिपछड़े वर्ग को 8 प्रतिशत आरक्षण प्रदान नहीं किया, बल्कि गरीब सवर्ण को भी सबसे पहले 3 फीसदी आरक्षण प्रदान किया था। लम्बे समय तक विधायक रहने के साथ उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री पद पर दो बार तथा नेता प्रतिपक्ष पर विराजित होने के बावजूद उनका मानना था कि ‘‘तलवार म्यान में ही अच्छी लगती है’’। उनके सरल स्वभाव, हृदय व अत्यंत सादगी पूर्ण जीवन को महात्मा गांधी के कुछ निकट अवश्य कहा जा सकता है। 

बेहद ईमानदार व्यक्तित्व

स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर कुछ उन चुनिंदा राजनीतिज्ञों में से रहे है, जिन्होंने राजनीति को भी शुद्ध जन सेवा के रूप में लिये व जिये, जिनके लक्षण, दर्शन व कल्पना भी आज दुर्लभ है। अर्थात यह भावना आज ‘‘थोथे बांस कड़ाकड़ बाजें’’ दुर्लभ व लुप्त होती हुई व ‘‘लुप्त प्रजाति’’ में परिवर्तित हो गई है। स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर, डाॅ. राम मनोहर लोहिया के राजनैतिक चेले और लालू, नीतीश, रामविलास पासवान व सुशील मोदी के राजनीतिक गुरू रहे। मधु लिमये जैसे दिग्गजों के साथी रहे। वे अपने कर्मों व जीवन शैली से शुद्ध व कष्टदायक, ईमानदारी के पर्यायवाची हो गये थे।

ध्यानचंद को भारत रत्न कब? 

देश में अनेक ऐसी सफल और श्रेष्ठतम प्रतिभाएं हैं, जो उक्त सर्वोच्च पुरस्कार पाने की अधिकारी (एनटाइटल) होने के बावजूद ‘‘भारत रत्न’’ उन्हें तब तक नहीं मिल सकता है, जब तक राजनीति पर वोट बैंक के रूप में उनका प्रभावी प्रभाव व पकड़ न हो। तेंदुलकर ऐसे ही खिलाड़ी थे, जिनकी प्रतिभा पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। परंतु यदि उनका करोड़ो खेल प्रेमी जनता पर प्रभाव न होता तो उन्हें भी भारत रत्न शायद ही मिलता। ध्यानचंद को खेल रत्न दिए जाने की मांग काफी पुरानी है। अतः देश के असंख्य खेल प्रेमियों को केंद्रीय सरकार का ध्यान ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने पर आकर्षित करना है तो उनको यह जज्बा पैदा कर प्रदर्शित करना होगा, परसेप्शन बनाना होगा कि यदि ध्यानचंद को ‘‘भारत रत्न’’ नहीं दिया गया तो, देश के करोड़ों खेल प्रेमी प्रेमियों का ‘‘ध्यान’’ वर्तमान से हटकर उस ओर केंद्रित करना होगा जो उन्हें आश्वासित करें। क्योंकि लोकतंत्र में तो राजनीतिक पार्टिया मुद्दों की नहीं, वोट बैंक की ही राजनीति को समझती हैं, और उसी से प्रभावित व हडकायी होती है। मतलब साफ है! ध्यानचंद पर ध्यान नहीं तो हमारा वोट पर भी ध्यान नहीं? हाँ! यदि ध्यानचंद किसी आरक्षित वर्ग (अजा.अजजा.पिछड़ा अति पिछड़ा) से होते तो शायद चुनावी वर्ष में उन्हें भी भारत रत्न मिल जाता।

‘‘बेशर्म’’ शब्द ने भी हाथ खड़े कर दिये।’’

देश की राजनीति का सबसे गंदा चरित्र का सबसे ताजा उदाहरण बिहार में विध्वस रूप में देखने को मिल रहा है। इसके लिए देश की अधिकतर पार्टी व नेतागण जिम्मेदार है। जैसा कि राजनीति के लिए कहा भी गया है ‘‘इस हमाम में हम सब नंगे है’’। एक तरफ कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर बिहार को गौरवान्वित किया गया है, तो दूसरी तरफ उसी भारत रत्न की उर्वरा भूमि बिहार में राजनीति का जिस तरह का नंगा नाच अभी चल रहा है, उसके लिए यही कहा जा सकता है कि ‘‘तत्ता कौर न निगलने का न उगलने का’’। ये ‘‘दावत है या अदावत है’’? वैसे बेशर्मी हमेशा नंगी ही होती है या यह कहे नंगा (साधु संतों को छोड़कर) बेशर्म ही होता है। जिस बेशर्मी का नंगा प्रदर्शन हुआ है, शायद उसके लिए अब ‘‘बेशर्म’’ शब्द भी परेशान होकर, बेशर्म होकर यह कहने लग गया कि आज की ‘‘राजनीति की बेशर्मी’’ को पूरी तरह व्यक्त करने का सामर्थ्य अब मेरे पास नहीं रहा है। कृपया अब अन्य कोई मजबूत ‘‘शब्द’’ की खोज कर ले? एक दौर था, जब हरियाणा के भजनलाल ने पूरी की पूरी सरकार का ही दलबदल करा कर इतिहास बनाया था। अब उसके ‘‘मास्टर ऑफ मास्टर’’ ‘‘सुशासन बाबू’’ नीतीश कुमार हो गये है। भ्रष्टाचार के आरोप का प्रभाव तो सिर्फ एक-दो या कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित रहता है। परन्तु आर्थिक दृष्टिकोण से ईमानदार नीतीश कुमार की ‘‘बेईमान राजनीति’’ राजनीति को पूरी ही भ्रष्ट कर दे रही है, जो व्यक्तिगत ईमानदारी से ज्यादा घातक, खतरा समाज, देश व राजनीति के लिए है।

नीतीश कुमार ‘‘सिद्धांत’’ पर अडिग!

जो लोग नीतीश कुमार को ‘‘पलटू राम’’ कह रहे है, वे एक तरफा गलत आरोप नीतीश कुमार पर लगा रहे है। देश की पूरी राजनीति ही ‘‘पलटू राम’’ से भरी हुई है। क्या ‘‘राम’’ शब्द से परहेज रखने वाली राजनीतिक पार्टियों में भी पलटू राम के रूप में ‘‘राम’’ मौजूद नहीं है? और अगले ही दिन (30 जनवरी) को ‘‘हे राम’’ की समाधि पर श्रद्धांजलि देने जाने की भी मजबूरी होगी? नीतीश कुमार ने ‘‘सिद्धांत’’ की राजनीति की है। वह सिद्धांत एक मात्र यह रहा कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर साधन की पवित्रता को बाजू में रखकर एन केंन प्रकारेण बैठे रहे, जब कि गांधी जी ने साध्य के साथ साधन की सुचिता व पवित्रता पर बहुत जोर दिया था। अतः गलती नीतीश कुमार की नहीं, बल्कि उनका आकलन करने वाले राजनीतिक पंडितों की है, जोे नीतीश कुमार के मूल सिद्धांत ‘‘कुर्सी को जकड़ कर पकड़ने’’ के सिद्धांत को पकड़ नहीं पाए। शायद नीतीश कुमार बचपन व अपनी युवावस्था में ‘‘कुर्सी पकड़ दौड़’’ खेल में हमेशा प्रथम आते रहे होंगे। स्पष्ट है नीतीश कुमार अपने सिद्धांत पर अडिग रहकर 9 वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह उनके सिद्धांत के प्रति कट्टरता व जीवटता को दिखाता है? अतः ब्रेकिंग न्यूज नीतीश कुमार का पलटू राम होना नहीं है, बल्कि राजनीतिक पार्टियां का पलटू राम होना है। ठीक उसी प्रकार जैसे मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चैहान चुनाव के पूर्व तक मुख्यमंत्री बना रहना ब्रेकिंग न्यूज थी, हटाना ब्रेकिंग न्यूज नहीं बनती। शपथ लेना व इस्तीफा व फिर शपथ लेना, यह उनकी दिनचर्या बन गई। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह कथन याद कीजिए ‘‘मैं तो कुर्सी छोड़ना चाहता हूं, पर कुर्सी मुझे छोड़ नहीं रही है’’। उक्त बात गहलोत स्वयं पर तो लागू नहीं कर पाए। परन्तु शायद उनके मन, दिमाग में नीतीश कुमार का भाव उक्त कुर्सी पकड़ ज्यादा होगा, इसलिए उक्त बात नीतीश कुमार पर पूर्णता सही लागू होती है। मुझे लगता है कि 8वीं बार मुख्यमंत्री पद पर शपथ लेने के बावजूद लोग उन्हें सुशासन बाबु के आगे से सुशासन मुख्यमंत्री के नाम से प्रचलित नहीं कर पाये। तब शायद उनको लगा होगा कि 9वीं बार शपथ ग्रहण करने पर अब तो बाबू (सुशासन) से मुख्यमंत्री (सुशासन) मान ले?

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