रविवार, 31 मार्च 2019

बिगड़े नेताओं के ‘‘बिगडे़ बोल’’-‘‘विवादित बोल’’! फायदा-नुकसान कितना!

भारतीय राजनीति में हमेशा से ही ‘‘बयानवीर’’ मीडिया में सुर्खिया पाते रहे है। विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के कुछ नेतागण अपने बेवाक बयानों के माध्यम से सुर्खियाँ बटोरनें के उदे्श्य से ऐसे बयान देते रहते है, जिसके परिणाम स्वरूप उनकी छाप एक चर्चित चेहरे की होकर वे माने जाने बयानवीर लगते है। ऐसे बयानों को मीडिया विवादित बयानों की संज्ञा देकर महिमा-मड़ित करना अपना संवैधानिक, वैधानिक व नैतिक कर्तव्य बोध महसूस करते है। चुनावी मौसम में ही इस तरह के ‘‘विवादित’’ बयानों की बाढ़ सी आ जाती है।   
सर्वप्रथम मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि नेताओं के ऐसे चर्चित बयानों को मीडिया विवादित बयान क्यों कहता है। बयान या तो सत्य होता है या असत्य। या आज की हमारीे राजनैतिक परिवेश को देखते हुये इन दोनों के बीच  इसकी एक और श्रेणी हो सकती है, अर्धसत्य! ठीक उसी प्रकार जैसे लाल व हरे सिंग्लन के बीच पीला सिंग्नल। अधिकांश स्थितियों मंे बयानवीर बयानों का खंडन नहीं करते है। अत्यालोचना व फजीहत होने पर ही अपनी सुरक्षा में स्पष्टीकरण अधिकतम-‘‘मेरे कहने का यह मतलब नहीं था’’ या ‘‘मेरे कथन का गलत अर्थ निकाला गया है, कथन कर देते है। इन बयानों को सत्य, सत्य से दूर, सत्य से परे, झूठे, तथ्यहीन, तथ्यों के बिलकुल विपरीत, अश्लील, अमर्यादित, तीच्छण, चुभने वाले, अंधविश्वासी, अंधभक्त इत्यादि-इत्यादि से श्रंगारित किया जा सकता है। वे सब श्रंग्रार, संज्ञाएँ या उपमाएँ बयान की प्रकृति को देखते हुये दी जा सकती है। लेकिन ये बयान ‘विवादित’ कैसे प्रश्न यह है? 
विवादित शब्द का शाब्दिक अर्थ तथ्य के सत्य या झूठ होने पर प्रश्न वाचक चिन्ह लगाना या उँगली उठाना या संदेह करना है। लेकिन आप जानते है, इस समय जितने भी चर्चित विवादित बयानों की आंधी आई हुई है, परस्पर विरोधी पक्ष के लोग उक्त बयानों के तथ्यों को विवादित न मानकर उसे। सही ठहराते है, जैसा कि बयानवीर भी उसे सही मानते है। प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षी, बयानवीर व्यक्ति व उस की राजनैतिक पार्टी पर पलटवार कर जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करने का प्रयास लगातार करते रहते है, जो मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज बनती है।ं मतलब स्पष्ट है! राजनैतिक दलांे के नेतागण परस्पर एक दूसरो के विवादित बयानांे को स्वयं विवादित न मानकर उससे राजनीति में कितना फायदा मिल सकता है, उसे उठाने का प्रयास प्रत्यारोपित बयानांे की झड़ी लगाकर की जाती है। 
बयान से संबंधित एक ओर बात जो मेरे समझ से परे है कि बयानवीरांे के विवादित बयान की प्रतिक्रिया में जब उनकी विरोधी पार्टियो द्वारा बयानवीरों पर हमला किया जाता है तब उनका मुख्य तर्क हमेशा यही होता है की वोट बैंक की राजनीति के चलते इस तरह के उक्त बयान आये हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि है जब प्रतिक्रिया में आप उन बयानों के बाबत स्वयं ही कहते है कि वे देेश हित में नहीं है, देश के विरूद्ध है, समाज के हित में नहीं, देश को तोड़ने वाले है, सांप्रदायिकता एकता को नुकसान पहंुचाने वाले है, शांति भंग करने वाले है, धार्मिक उन्माद पैदा करने वाले है। तब उक्त विवादित बयानवीरों की पार्टियों को राजनैतिक फायदा कैसे मिल सकता है, जैसा प्रत्यारोप सामान्यतया लगाया जाता है, प्रश्न यह है? यदि वास्तव में ऐसा होता है, तो इसका यही मतलब  निकता है, बयान देने वालों से खतरनाक वे वोटर है, जो इन बयानों के आधार पर बयानवीरों को वोट देते है जैसा की विपक्षी आरोप लगा रहे हैं।   
एक उदाहरण के द्वारा मैं अपनी बात को समाप्त करना चाहूगाँ। इडिया ओवर सीज कांग्रेस प्रमुख सैम पित्रोदा जो काग्रेस के गांधी परिवार के पारिवारिक सदस्य समान है, ने अपने हाल के ही बयान में न केवल एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाएँ बल्कि मुम्बई बम कांड के हमले में पाकिस्तान को एक देश के रूप में दोष मुक्त तक बता दिया। ऐसे आत्मघाती बयान पर अमित शाह के द्वारा प्रेस वार्ता बुलाकर यह कथन करना कि कांग्रेस हर बार चुनाव आते ही वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति करती है कितनी तथ्यात्मक रूप से सही है, बड़ा प्रश्न यह है? उनका यह कहना तो बिलकुल समायोचित है कि सेना के शहीदो का अपमान हुआ है व आंतकियों का मनोबल बड़ा है। कांग्रेस शहीदांे के खून पर राजनीति करती है, क्या वोट बैंक की राजनीति शहीदों के उपर हो सकती है। पित्रोदा को इस बयान पर देश से माँफी मागना चाहिए। मतलब साफ है। पित्रोदा व कांग्रेस के बयान किसी भी आम सोच वाले नागरिक के गले नहीं उतर सकते है। बयानों के द्वारा राजनीतिकरण के चक्कर में जाने अनजाने में वे देश व सेना पर ही प्रश्न वाचक चिन्ह लगा देते है। इससे कांग्रेस का निश्चित रूप से नुकसान ही होगा। जब बयान से फायदा नहीं होता है तो तब फिर यह प्रत्यारोप कैसे लगाया जा सकता है कि ये विवादित बयान वोट बैंक व तुष्टीकरण की राजनीति के तहत है। देश में पूर्व में भी जितने विवादित बयान आये, उनमें से अधिकांश बयान आत्मधाती ही सिद्ध हुये हैं। उससे बयानकर्ता या उसकी पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला। यदि यह मान भी लिया जाये कि उक्त बयान से गैर समझदार व अंधभक्त लोग कांग्रेस केा वोट दे दंेगे, तो इसके विपरीत उससे ज्यादा समझदार व कई संभ्रात कांग्रेसी भी (उक्त बयान से अपने को अलग कर) कांग्रेस से दूर अवश्य भागेगें।
इन विवादित बयानों की एक ओर बड़ी विशिष्टता व खासियत यह भी है कि जब ये वास्तव में विवाद का रूप लेकर हानि पहँुचाने की स्थिति में आ जाते है, तब समस्त राजनैतिक पार्टियाँं खासकर (भाजपा व कांग्रेस) ऐसे बयानों से अपना पल्ला यह कहकर झाड़ लेती है कि वे बयान बयानवीर के व्यक्तिगत विचार है, पार्टी का उससे कोई लेना देना नहीं है (भले ही बयान कर्ता पार्टी की नीति निर्धारण कार्यसमिति के सदस्य क्यों न रहे हों)। पार्टी सामान्यतः ऐसे बयानवीरों के खिलाफ न तो कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही करती है और न ही भविष्य में ऐसा कदम न उठाने हेतु उसे कोई चेतावनी देती है। उन्हे बयान वापिस लेने या खेद व्यक्त करने के लिए भी नहीं कहती है। पार्टियों का यह स्टैंण्ड़ पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने/दिखाने के लिये किया जाता है, भले ही इससे देश के लोकतंत्र का स्तर गिर रहा है क्षरण हो रहा है। यही तो हमारे देश की लोकतंत्र की खूबी है?
कुछ चुनिंदा बयान व उनके प्रभाव व असर को मैं अवश्य यहाँ रेखांकित करना चाहूँगा। गुजरात चुनाव 2007 में सोनिया गांधी ने कहा था ‘मौत का सौदागर’। लोकसभा चुनाव वर्ष 2014 में सत्ता के लिए ‘जहर की खेती’ करती है, भाजपा-सोनिया गांधी। यकीन मानिए 'चायवाला' पीएम नहीं बनेगा-मणिशंकर अय्यर। गुजरात चुनाव 2017 'नीच किस्म' का आदमी-मणिशंक्कर अय्यर। 'खून की दलाली'-राहुल गांधी। सेनाप्रमुख को ‘सड़क का गुड़ा’ कहना-संदीप दीक्षित। म.प्र. चुनाव 2018 'माई का लाल'-शिवराज सिंह चौहान। 'हनुमान दलित थे'-योगी आदित्यनाथ, राजस्थान के विधानसभा चुनाव 2018।  2019 पुलवामा हमले पर 'वोट के लिए जवान मार दिये' गये-राम गोपाल यादव, पुलवामा हमला 'मैंच फिक्सिंग'-बी.के. हरिप्रसाद इत्यादि-इत्यादि। 

बुधवार, 27 मार्च 2019

‘‘पर्रिकर’’ ‘‘वाद’’ को ढूँढता मेरा देश। ‘व’’ ‘‘गांधीवाद’’ से चलकर ‘‘पर्रिकरवाद’’ तक पहुंचने का सुखद अहसास!

देश के प्रथम आई.आईटी शिक्षा प्राप्त (गोवा के) मुख्यमंत्री एवं पूर्व रक्षामंत्री डॉ. मनोहर गोपाल कृष्ण प्रभु पर्रिकर लम्बी बीमारी से अदम्य आत्मबल के साथ लड़ते हुये अब इस दुनिया में नहीं रहे और ‘‘स्वर्गवासी’’ हो गये। याद कीजिये! विधानसभा में बजट प्रस्तुत करते समय उनका वह चेहरा, जो चिकित्सकीय उपकरणों से ढ़का हुआ था। एक उदघाटन समारोह में उनका जनता से पूछते हुये ऊरी फिल्म का डायलॉग ‘‘हाउ इज द जोश’’ उनके कड़े परिश्रम करने की जीवटता को दर्शा रहा था। जीवन के अंतिम क्षणों में जब व्यक्ति को स्वतः मृत्यु का आभास होने लगता है, तब आज के युग में ऐसे बिरले अदम्य साहसी कम ही दृष्टिगोचर होते हैं। 
‘परि’ ग्राम के रहने के कारण उनका उपनाम ‘‘पर्रिकर’’ पड़ा। वे लगभग एक साल से जीवन को अंत करने वाली एडवांस्ट स्टेज की पैंक्रियाटिक कैंसर की लाइलाज बीमारी से ग्रस्त होकर जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे, जिसका यह परिणाम होना ही था। लेकिन आज मृत्यु से कहीं अधिक सर्वत्र उनकी चर्चा न केवल स्वयं की ईमानदारी की, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुंलद करने की हिम्मत दिखाने वाला, नैतिकता, निष्ठा, बौद्धिक कौशल और एक वास्तविक गांधीवादी साधारण आम आदमी के रूप में उनकी पहचान को लेकर हो रही है। 
बात जब हम गांधीवाद की करते है, तो निश्चित रूप से सर्वमान्य स्वीकृत तथ्य अंहिसा के संदेश के साथ-साथ सदाचार और एक बेहद सामान्य साधारण जीवन दृष्टि ही गांधीवाद के  अंर्तनिहित मुख्य तत्व हैं। इसके उलट 21वीं सदी के इस भौतिक युग में पर्रिकर जी ने गांधीवाद को एकदम नया आयाम दिया, जिसे मैने ‘‘पर्रिकरवाद’’ इसलिये कहा, क्योंकि तत्समय की परिस्थिति में यद्यपि गांधीवाद को सम्मान देने वाले हजारों लोग थे, परन्तु मेरी सोच का एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण गांधीवाद का तुलनात्मक रूप से ज्यादा उदारवादी होना था। यदि दोनांे वादों के आम व्यक्ति की तुलना की जाएं, तो पाएँगें गांधी जी के आम व्यक्ति का चेहरा ‘‘काव्यात्मक’’ भाव लिये हुये था, जबकि स्वयं पर्रिकर जी का आम चेहरा एक सफाचट निर्विकार भाव के ग्रामीण परिवेश के साधारण इंसान का रहा। यद्यपि पर्रिकर जी शहरवासी हो गये थे, उसके बावजूद ग्रामीण परिवेश की निश्छलता उन्हांेने छोड़ी नहीं थी। उनकी सादगी की तुलना हम पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री इन्द्रजीत गुप्त जैसे कम्युनिस्ट नेताओं या 70 के दशक के आरएसएस प्रचारकों से कर सकते है। 
वर्तमान राजनीति में सत्ता को वैश्या की उपमा (संज्ञा) दी जाती है। इसीलिये सत्ता का भोग करने वाला कोई भी व्यक्ति सत्ता के चारित्रिक दोष व दुःप्रभाव के कारण अपने जीवन के अन्य चरित्रों को अच्छुण्ण नहीं रख पाता है। परन्तु ऐसी स्थिति में भी मनोहर पर्रिकर ने अपने निश्छल चरित्र व आत्मबल के बल पर सम्पूर्ण पूर्ण निष्ठा के साथ राजनैतिक जीवन को जिस प्रकार की पूर्णतः गांधीवादी सामान्य सरलता के बीच जिया, तथा आज की आवश्यक राजनैतिक पहचान की परछाई नहीं पड़ने दी वह सब प्रशंसनीय है। उनके व्यक्तित्व की एक ओर विशेषता विरोधियों को अपना बनाकर साथ में लेकर चलने की क्षमता भी रही है। ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ का ईसाईयों से विरोध का एक आम भाव परसेपशन जगजाहिर है। पर्रिकर के संघ का एक स्वयंसेवक होने के बावजूद उन्होंने बड़ी ईसाई जनसंख्या (केथोलिक) का विश्वास जीत कर चार बार गोवा के मुख्यमंत्री बने, जो उनकी कुशल रणनीति, विरोधियों को भाँपने के साथ-साथ उनकी हृदय की विशालता की गहराई को भी दर्शाता है। वे जाति व धर्म से ऊपर उठकर सोशल इंजीनियरिग के सूत्रधार रहे। ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ नारा भले ही अभी मोदी ने दिया हो, लेकिन इसके असली पुरोधा पर्रिकर ही थे। इसीलिए भौतिक रूप से जीवन समाप्त हो जाने के बाद भी, वे देश की तेजी से प्रदूिषत हो रही राजनीति को शुद्ध करने के कार्यशील साधन के रूप में हमेशा याद किये जायेगें।
गांधीवादी युग में गांधीवाद को अपनाना ज्यादा सहज व सरल था। उसकी तुलना में वर्तमान कलियुग में पर्रिकरवाद के आदर्शो को अपनाना अत्यधिक कठिन जीवन यात्रा है। इसीलिए मैंने गांधीवाद से आगे बढ़कर उसे पर्रिकरवाद कहा है। इसे अतिश्योक्ति न मानंे। मुझे वह क्षण ख्याल आ रहा है, जब नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था, तभी पर्रिकर जी का नाम भी अध्यक्ष पद के लिये उभरा था। लेकिन क्षेत्रफल की दृष्टि से गोवा के देश के सबसे छोटे प्रदेश होने के कारण तथा शायद गडकरी के संघ प्रमुख मोहन भागवत से धनिष्ठ व्यक्तिगत रिश्ते होने के कारण पर्रिकर जी अध्यक्ष नहीं बन पाये। अन्यथा आज भाजपा की संस्कृति व कार्य प्रकृति कुछ और ही होती।
गांधी राष्ट्र के राष्ट्रपिता थे, जबकि पर्रिकर राष्ट्र के सबसे छोटे राज्य गोवा के मुख्यमंत्री थे। तत्समय (गांधी युग) सत्ताधीशों में जन सेवा का भाव ज्यादा हुआ करता था। जबकि आज के राजनैतिज्ञों का ‘‘सेवा’’ व ‘सेवाभाव’ से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है बल्कि आज राजनीति येन केन प्रकारेण सत्ता सुख पाने मात्र का हथियार भर बन कर रह गई है। इसलिये वर्तमान परिस्थितियों में पर्रिकरवाद का महत्व ज्यादा बढ़ जाता है। 
देश के जिन नेताओं, पार्टियों व सार्वजनिक जीवन में महत्व रखने वाले गणमान्य नागरिकों ने पर्रिकर जी को श्रंृद्धाजंली दी है, यदि वे सब पर्रिकरवाद को 50 प्रतिशत भी अपना सके तो, देश की अधिकांश समस्याओं का समाधान यूँ ही संभव है, क्यांेकि ईमानदारी व नैतिकता का लगातार ह्रास ही हमारे देश की प्रमुख समस्याओं की मूल जड़ है। पर्रिकर जी के प्रति उन सबकी यही सच्ची श्रंृंद्धाजंली होगी। इसीलिए मेरा अनुरोध है, श्रृंद्धाजंली देते समय वे सब लोग इस तथ्य पर अवश्य विचार करें कि वे उस योग्य है अथवा नहीं, और यदि नहीं, तो आज से ही पर्रिकरवाद को अपनाने के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर अपेक्षित चरित्र अपनाना प्रारंभ करंे, ताकि हमारा देश तीव्रतम गति से वास्तविक रामराज्य की ओर अग्रेसित हो सकंे। यानी मैं पर्रिकर जी को शब्दों से नहीं कर्तव्यों से श्रृंदाजंलि देना चाहूगाँ। मैंने स्वतः अब तक उनकी सार्वजनिक राजनैतिक ईमानदारी को अपने जीवन में लागू किया है आज से ही आगे एक साधारण सामान्य सादगी पूर्ण जीवन-चर्या में अपने जीवन को ढ़ालने का प्रयास करूगाँ। 
पुनश्चः आज जब जगह-जगह ‘‘मैं भी चौकीदार हूँ’’ व ‘‘चौकीदार चोर है’’ की मुहिम चलाई जा रही है, तब आज के समय की वास्तविक आवश्यकता हैं ‘‘मैं हूँ पर्रिकर अनुयायी’’। देश के स्वस्थ स्वास्थ्य के लिये ज्यादा से ज्यादा इस मुहिम को चलाया जाना अति आवश्यक हैं। 

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