गुरुवार, 20 जनवरी 2022

उत्तर प्रदेश के चुनाव में सामान्य वर्ग (जनता) विलुप्त हो गई है।

‘‘दिल्ली‘‘ की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, राजनीति में रहने से लेकर समझने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है। इसलिए पांच राज्यों के चुनाव में सबसे ज्यादा अहमियत उत्तर प्रदेश की है, जिसे 2024 के लोकसभा चुनाव के पूर्व का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है।            

वैसे तो उत्तर प्रदेश व बिहार देश के ऐसे राज्य हैं, जहाँ राजनीति का केंद्र बिंदु सिंद्धान्तः राष्ट्रवाद से प्रारंभ होकर अतंतः वस्तुतः धरातल पर जातिवाद पर उतर जाता है। यही दोनों प्रदेशों की राजनैतिक सच्चाई है। ‘‘सबका साथ, सबका-विकास, सबका-विश्वास और सबका-प्रयास’’ का नारा देने वाली भाजपा और बहुजन हिताय को बदल कर सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाए का मंत्र देने वाली बसपा तथा ‘‘सब आये, सबको स्थान व सबको सम्मान’’ की बात करने वाली सपा तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में सर्व समाज की भावना (जिसमें सामान्य वर्ग भी शामिल है) का सिद्धांत सिद्धांतः शामिल होने पर भी मेरे जैसे एक सामान्य व्यक्ति का दिल खुश होकर मन भी खिल जाता है। परन्तु पिछले तीन दिनों से उत्तर प्रदेश के गरमाते राजनीतिक पिच (पटल) पर जिस तरह की भागम-भागी, परस्पर व दूसरी पार्टीयों से पलायन का दौर दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों भाजपा-सपा के बीच चल रहा है और जिस तरह से उक्त पलायन के लिए कारण व जवाबी कसीदें गढ़े जा रहे है, उन्हे पढ़ कर देश की सामान्य वर्ग (जनता) की आंखें खुल जानी चाहिए।

‘‘सांझे की हंडिया चौराहे पर फोड़ने वाले’’ स्वामी प्रसाद मौर्य व उनके एक के बाद एक इस्तीफे देने वाले मंत्रियों व विधायकों की इस्तीफे देने के कारणों की भाषा जो लगभग एक सी है, पर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं। जब वे सब एक सुर में यह कहते नहीं थक रहे हैं कि दलितों, पिछड़ों, शोषितों, वंचितों, कुचला, कमजोर, गरीब, मजदूर वर्ग किसानों व बेरोजगार नौजवानों के साथ भाजपा नेतृत्व ने न केवल अत्याचार किया है, बल्कि वस्तुतः धोखा किया है और उनके हित में कुछ नहीं किया। वैसे स्वामी प्रसाद यह बतलाने में असफल रहे कि मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद उन्होंने इन वर्गो के हितों के लिये मंत्रीमंडल व पार्टी फोरम में कब-कब आवाज उठाई? और योगी सरकार ने जब कोई कार्यवाही नहीं की तब सत्ता के सुख के विकर्षण? के कारण उन्हे यह समझने में पांच साल लग गये? तब जब सत्ता का आकर्षण समाप्त हो रहा था। जबकि भाजपा उक्त आरोपों के बचाव में यह कह रही है कि हमने इन सब वर्गों के लिए जितना कार्य किया है, उतना किसी ने आज तक नहीं किया। मतलब साफ है! इस देश की 134 करोड़ जनता को इन्हीं वर्गों (उपरोक्त उल्लेखित) में विभाजित है और जिनके विकास किए जाने की बात भाजपा व समाजवादी पार्टी कर रही है। इसमें सामान्य वर्ग कहां खड़ा है? बड़ा प्रश्न यह है? यदि उपरोक्त वर्णित वर्गो का प्रतीकात्मक रूप जाति से संबंध न होकर केवल आर्थिक स्थिति से है, तो इसमें सामान्य वर्ग भी शामिल है, यह माना जायेगा। इस दृष्टि से तो स्वागत किया जाना चाहिये। अन्यथा जैसा कि कहा जाता है ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध‘‘, विकास की दौड़ में सामान्य वर्ग को छोड़कर शेष पिछड़े वर्गो की सुध लेने की बात समस्त पार्टियां कर रही है। 

यह बात सामान्य वर्ग को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि वह ‘‘न तो तीन में है न तेरह में‘‘। एक बात स्पष्ट है कि इस देश के सामान्य वर्ग की संख्या पिछड़े वर्ग के बाद अन्य सभी वर्गो अनुसूचित जाति, जनजाति, अल्पसंख्यकों के लगभग बराबर की है (मात्र 1-2 प्रतिशत कम ज्यादा)  ‘‘घर का न घाट का’’ वाली स्थिति में है। बावजूद इसके सामान्य वर्ग के हितों की खुलकर उनकी जनसंख्या की हिस्सेदारी के हिसाब से बात करने वाली वाला कोई भी स्थापित राजनीतिक पार्टी नहीं है। सवर्ण वर्ग के नेता भी अपने हितों को लेकर लेकर उतने अग्रणी नहीं है। वास्तव में वे पिछड़े-अगड़े की लड़ाई में अगड़े कहलाने के बावजूद आगे न होकर बहुत पीछे या यह कहा जाय कि लड़ाई में ही नहीं है, तो ज्यादा ठीक व व्यवहारिक होगा।

सवाल यहां पर वर्ग विभाजन की बात करना बिल्कुल नहीं है। क्योंकि देश के राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए यह अत्यंत हानिकारक है। लेकिन जब सभी राजनीतिक दल और मीडिया अगड़े-पिछड़े की बात कर सिर्फ पिछड़ों के राजनीतिक हितों की बात करें और बाकी जनता को उनके हाल पर छोड़ दे जो देश हित में नहीं होगा। इनमें सुधार आखिर कौन ला सकता है? जनता ही इसमें सुधार ला सकती है, जिसके वोटिंग पैटर्न के आधार पर उक्त परसेप्शन उत्पन्न हुआ है, यदि देश हित में वे अपना वोटिंग पैटर्न बदले, तभी। 

अब इन इस्तीफों पर भी कुछ चर्चा करना जरूरी हो गया है। भाजपा के कुछ नेता व मीडिया के कुछ भाग में यह खबर आ रही है कि इन विधायकों की टिकट कट रही थी, और यह युक्तियुक्त आशंका उनको हो गई थी, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। यदि यह बात सही है तो भाजपा का उच्च नेतृत्व उन्हें मनाने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या नेतृत्व को यह उम्मीद थी कि वे सब भाजपा की राजनीति में लगभग पांच साल रहकर बदलकर संतों की श्रेणी में आ गये है? और इसलिए वे बिना किसी पूर्व से बड़े राजनैतिक पद-लालच, आर्कषण प्लेटफार्म के पार्टी में वापस लौट आएगें? जब पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा व अन्य पार्टियों से भाजपा में नेताओं की भारी भीड़ आई थी, तब भाजपा ने गले में हार डाल कर उनका हार्दिक स्वागत किया था। तब शायद भाजपा को उनके ‘‘ज्यादा जोगी मठ उजाड़’’ का अंदाजा या आशंका नहीं होगी। अतः तब यदि वे वजनदार नेता थे, जिसका फायदा भाजपा को चुनाव में मिला भी (वे चुनाव जीते भी) तो अब क्या वे अस्तित्व हीन प्रभावहीन हो गए? क्या उनके जाने से पार्टी को नुकसान नहीं होगा? यह कहना या ऐसा आकलन करना पूर्णता सही नहीं होगा। यह भारी दल-बदल पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भाजपा के पक्ष में हुये दल बदल के समान परिणाम लिये (निराशावादी) होगा अथवा पूर्व में जब 2017 में हुये विधानसभा चुनाव के पूर्व दल बदल के समान फायदा (सत्ता) मिलेगी? ‘‘उँट किस करवट बैठेगा’’ यह तो समय ही बतलायेगा। यद्यपि जितना फायदा उनके आने से हुआ होगा, उतना उनके जाने से नहीं होगा क्योंकि पार्टी के पास राज्य व केंद्र में योगी व मोदी जैसे जमीन से जुड़े हुए लोकप्रिय नेता है। यद्यपि उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और कद्दावर मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने स्वामी प्रसाद मोर्य के पिछड़े कार्ड के जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछड़ा वर्ग होने के कथन की चूक कर दी। नरेन्द्र मोदी सिर्फ एक वर्ग के नहीं, बल्कि समस्त वर्ग के नागरिक प्रधानमंत्री है। 

वर्तमान चुनावी राजनीति में मृतात्माएं (जिन्ना) व जानवर (सांप, नाग व नेवला) की प्रविष्ट होकर वह जीवित व्यक्ति के व्यक्तित्व पर हावी हो रही है। यह राजनीति की गिरती दशा-दिशा का एक और सूचकांक है। तथापि निचले पंचायत स्तर पर जाने वाले नेताओं के प्रभाव को निष्प्रभावी या कम करना इतना आसान नहीं होगा। परंतु इस कारण से एक परसेप्शन जरूर बन रहा है कि डूबते जहाज को बुद्धिमान व्यक्ति छोड़कर चला जाता है। इस कारण से अखिलेश यादव ने एक रेनबो बना कर (सात छोटी-छोटी पार्टियों को जोड़ कर) एक मजबूत विकल्प देने का जो प्रयास कर रहे हैं, को भी मजबूती मिल रही है।

एक और अकाट्य लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य! राजनीति में मूल्यों की नीति, सिद्धांत व नैतिकता को समस्त राजनीतिक पार्टियों ने बेमानी कर दिया है। स्वामी प्रसाद मोर्य के भाजपा को समाप्त करने के लिये उक्त कथन करते समय शायद यह भूल गये कि सांप व नाग मिलकर राष्ट्र को जाति-तोड़ वाले जातिवादी नेवले को अपने में लपेटकर, बांधकर रखने की क्षमता रखते हैं।

शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

कोविड-19 म्यूटेन की राजनीतिज्ञों से प्रगाढ़ दोस्ती!

 वैसे भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और लोकतंत्र बगैर राजनीति के चल ही नहीं सकता है, बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतंत्र में प्राण फूंकने वाली राजनीति ही हैं। यह राजनीति उसको चलाने वाले राजनेताओं के सर पर हमेशा सवार रहती है, जिसके चलते ये राजनेतागण विभिन्न सार्वजनिक निर्णय जनता के हित के लिये लेते है, जिसे हमेशा जनहित और देशहित में लिया गया निर्णय करार दिया जाता है। चूंकि हमारे संविधान में लोकतंत्र की यही मूल व्यवस्था है, जहां के राजनैतिक दल चुनावों में भाग लेकर जनता का प्रतिनिधित्व चुनकर आकर उनकी सेवा करने का बीड़ा व जिम्मेदारी उठाना बखूबी निभाते आ रहे हैं। चूंकि संविधान में प्रत्येक पांच वर्ष में जनता का जनादेश प्राप्त करने की व्यवस्था है, इसलिए उस व्यवस्था के अनुपालन में आगामी मार्च से मई तक पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होना है। इसकी तैयारी में कोविड-19 से संक्रमित, ग्रसित हमारा देश दो कोविड लहरों सेे गुजरने के बाद तीसरी लहर के द्वार पर खड़ा होने के बावजूद राजनैतिक दल उक्त संवैधानिक दायित्व को बिना हिचकिचाहट के निभाने का कार्य कर रहे हैं। 

संविधान की इसी मूल तत्व व भावना को हमारे देश के समस्त राजनैतिक दलों ने पढ़ा, महसूस किया और पूरी तरह से अपने में उतार लिया। ऐसा करके राजनेताओं ने कोविड-19 के संक्रमण काल में खासकर कोविड के बढ़ते हुये नए ओमीक्रॉन म्यूटेन के चलते स्वयं के और उनको वोट देने वाली जनता के जीवन की चिंता न करते हुये, लोकतंत्र को मजबूत रखने के तत्व को ज्यादा महत्वपूर्ण व मजबूत मानते हुए शहीद होने की आशंकाओं से ड़रे परे बिना एक देश भक्त होने का अहसास व कर्तव्य पालन का दर्शन न केवल देश को कराया बल्कि संपूर्ण विश्व को भी कराया जिसके लिये वे सब साधुवाद के पात्र है। उन्हे शत् शत् नमन।

देश के प्रधानमंत्री ने अपने 84वें मन की बात में नागरिकों को आत्म अनुशासन का पाठ पढ़ा कर सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष ने भी रैली रोकने की जिम्मेदारी से अपने को बहुत ही सुविधाजनक तरीके से अलग कर लिया। अब यह जिम्मेदारी स्वयं नागरिकों की हो गई कि वे आत्मानुशासन का अनुपालन करते हुये रैलियों सहित भीड़ भरे स्थानों पर न जाय, अन्यथा समस्त दुष्परिणामों की जिम्मेदारी उनकी स्वयं की होगी। लेकिन सत्ता व विपक्ष दोनों पक्ष नागरिकों के व्यक्तिगत कार्यक्रम जैसे शादी, पार्टियां और शव यात्रा के अवसरों पर लगाए गए संख्या के प्रतिबंध पर एक शब्द भी नहीं बोले। गोया, कोविड-19 के विभिन्न वेरिएंट, देसी भाषा में कीड़ा राजनेताओं को सम्मान करने के कारण या उनके खौफ व ड़र से (जो शायद उसने जनता के मन के अंदर महसूस किया है) वह लाखों की रैलियों और जन सभाओं में जाकर जनता को परेशान व संक्रमित नहीं करता है? या जाने से ही परहेज करता है? अथवा ‘‘जामर’’ लगे होने के कारण जाने में असफल रहता है? कारण कोई भी हो सरकार व विपक्ष दोनों का सर्वानुमति से उत्पन्न यह विश्वास है। इसीलिए लोकतंत्र की गाड़ी लगातार चलते रहे उसके लिए रैली, रेला और सभा की भीड़ आवश्यक है, जिसकी पूर्ति वे पूरी तन्मयता व कर्तव्य परायणता से कर रहे है? कोविड-19 का वेरिएंट चाहे उसके कितने ही भाई-बहन हो अभी तो एक नया भाई ने नये वैरिएंट के रूप में सामने आ गया है उसे ओमीक्रॉन से 50 प्रतिशत ज्यादा घातक बताया जा रहा है। राजनेताओं व उनके मंच के सामने बैठे नागरिकों वे गले लगाकर चूमता है। परन्तु आम नागरिकों को उनके जन्मदिवस, शादी या अन्य अवसर शव यात्रा में शामिल होने वाले नागरिक के गले लगने पर काटकर मृत्यु का ड़र पैदा कर देता है। क्या कमाल है?  

संवेदनशील सरकार होने के कारण कोविड-19 काल में संक्रमितों व मृत्यु की संख्या अल्प से अल्पतर हो जाने पर कोविड-19 प्रोटोकॉल के प्रतिबंध से पूर्व में पूर्णतः मुक्त किए गए जन्म दिवस, शादी विवाह और शव यात्रा जैसे अवसर पर अब जैसे-जैसे संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है, उक्त व्यक्तिगत कार्यक्रमों में शामिल होने वाले की संख्या को लगातार कुछ कुछ दिनों के अंतराल में ठीक उसी प्रकार की कमी कर सीमित की जा रही है जिस प्रकार तेल की कीमतें बढ़ती रही है। और दोनों ही चीजें राष्ट्र के विकास मंत्रियों ने पेट्रोल-डीजल के बढ़े मूल्यों के माध्यम से नागरिकों को अपना योगदान देने की बात की थी। जन के विनाश को बचाने के लिए आवश्यक है? सार्वजनिक परिवहन, ऑफिसेस में 50 प्रतिशत उपस्थिति कम कर और सरकारी आफिसों में निरंक उपस्थिति का वर्क फ्रॉम होम की नीति लागू की जा रही है। इस प्रकार कोविड से बचाव के लिये जिस प्रकार अन्य क्षेत्रों में प्रतिबंध लगाया जा रहा है। वैसा सार्वजनिक रैलियों और सभाओं पर कोई अभी तक वास्तविक प्रभावी प्रतिबंध नहीं लगा है। यदि प्रतिबंध लगा भी है तो कोविड-19 के प्रोटोकॉल को मानने के शर्त के साथ अनुमति दी गई होगी, जिसका अनुपालन न होकर खुल्लम खुल्ला उल्लंघन हो रहा है। और उस पर अपराधिक या किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। इसलिए अब यदि नागरिको को अपने व्यक्तिगत शादी-ब्याह जन्मदिवस या मौत-मिट्टी के कार्यक्रमों में अपने समस्त परिचितों व रिश्तेदारों को बुलाना होगा तो सबसे आसान तरीका उनके पास यही रहेगा कि वे साथ में एक छोटी-मोटी सी राजनीतिक रैली या सभा करने की घोषणा कर दें। बेरोकटोक आपके व्यक्तिगत कार्यक्रम भी ठीक उसी प्रकार से संपादित हो जाएंगे जिस प्रकार से सार्वजनिक रैली, सभाएं लाखों की भीड़ इकट्ठा होकर विसर्जित होने के बाद नागरिक बेरोकटोक अपने घर वापस पहुंच जाते हैं। 

यद्यपि अभी तक चुनाव की घोषणा नहीं हुई है। तथापि आचार संहिता लागू होने पर लगने वाले प्रतिबंधों से फिलहाल उन्मुक्त होने के कारण उसका फायदा उठाकर सरकारी कार्यक्रमों को चुनाव पूर्व चुनावी रैलियों में कैसे बदला जा सकता है, आप सब देख रहे है। जब प्रधानमंत्री स्वयं अपने भाषणों में मंच पर या सभा स्थल पर कोविड-19 के प्रोटोकॉल का पालन नहीं करवा पा रहे है। तब उनके जनता को दिये जा रहे कोविड-19 से बचने के लिए सावधानी बरतने के संदेश की कितनी अहमियत रह जाती है? इस पर आगे कुछ भी कहना व्यर्थ होगा।

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

हाय री ‘‘सर्वानुमति‘‘! ‘‘लोकतंत्र की यह कैसी ‘सर्वानुमति’’।

अक्सर हमारे देश के राजनीतिज्ञों एवं राजनैतिक पार्टियों पर परस्पर या अन्य पक्षों द्वारा यह आरोप जड़ दिया जाता है कि देश के मान, सम्मान, विकास, अखंडता व सुरक्षता के मामले में वे कभी भी एक होते हुये दिखते नहीं है। यद्यपि हमारी देश की संस्कृति का मूलभूत सूत्र व सिंद्वान्त ही ‘‘अनेकता में एकता लिये हुये कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमारा देश एक है’’ रहा है। लेकिन इस सिंद्धान्त को मानते हुये ओैर उक्त आरोप जो एक परसेप्शन है, को नकारते हुये इस देश के राजनीतिज्ञों में कुछ मुद्दों को लेकर जो अभूतपूर्व एकता दिखाई देती हैं, वह देश के हित में है? या विपरीत? इस पर भी कुछ आलोचक अपनी कलम तेढ़ी व भृक्टी (भंगिभाए) तिरछी करते हो तो करते रहे, ‘‘अंधा क्या जाना बसंत की बहार‘‘। खैर इसका जवाब फिर कभी खोजेगे, अभी तो बात सर्वानुमति की एकता को लेकर कर ले। 

आपको याद होगा, हाल ही में (23 दिसम्बर 2021 को) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोरोना के बढ़ते हुये संक्रमित मरीजों व चुनावी रैलियों में आ रही? अथवा लाई जा रही भीड़ को देखते हुये चिंता व्यक्त करते हुये कोरोना की संभावित तीसरी लहर से जनता को बचाने के लिये प्रधानमंत्री एवं चुनाव आयोग को रैलियों को रोकने व चुनाव टालने का सुझाव दिया था। न्यायालय ने कहा कि राजनैतिक दलों की रैलियों व सभाओं में लाखों लोगों को बुलाने के कारण कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करना संभव नहीं है। न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘‘जान है तो जहान है’’। (यद्यपि ये वाक्यांश पूर्व में कोविड-19 के पहले-दूसरे दौर में शासनारूढ राजनीतिज्ञों ने भी लॉकडाउन व प्रतिबंध लगाने के समर्थन में कहे थे ) तथापि अभी तक चुनावों की घोषणा नहीं हई है। संविधान के अनुसार उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में आगामी मार्च से मई महीने के बीच विधानसभा के चुनाव होने है, जो एक संवैधानिक अनुपालन है। यद्यपि अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन के अधिकार का सहारा लेते हुये उच्च न्यायालय के उक्त निर्देश पर प्रश्नवाचक चिन्ह अवश्य उठाये जा सकते है कि क्या यह न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता भी है अथवा नहीं! चूंकि यह एक अलहदा विषय है, जिस पर फिर कभी अलग से चर्चा की जायेगी।

उच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्देश पर राजनैतिक दलों की जो प्रतिक्रियाएं आयी है, उससे प्राप्त निष्कर्ष उन लोगों के मुह पर कड़ा तमाचा है जो यह कहते थकते नहीं हैं कि इस देश में राजनैतिक पाटियां राष्ट्रहित के मुद्दों पर कभी भी एक नहीं हो पाती है। आश्चर्यजनक रूप से नहीं, बल्कि देश के वर्तमान राजनैतिक चाल-चरित्र के चलते समस्त राजनैतिक दलों ने सर्वसम्मति से चुनाव आयोग से कोविड प्रोटोकाल का पालन करते हुये’ नियत समय पर’ चुनाव कराने की बात कही है। ‘‘आखिर बाज के बच्चे मुंडेरो पर नहीं उड़ा करते‘‘। विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत ऐसे ही नहीं कहलाता है? लोकतंत्र की नींव, रीढ़ की हड्डी और मुख्य आधार संविधान में निर्धारित समय पर चुनाव कराकर जनता का जनता के लिये अंततः चुने हुए जन प्रतिनिधित्वों को शासन सौंप देना ही असली जनतंत्र-लोकतंत्र है। यह बात और है कि ‘‘जनता तो भेड़ है, जहां जाएगी वही मूंडी जाएगी‘‘। 

 एक तरफ देश के अभी तक के सर्वाधिक लोकप्रिय अनोखे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीे ‘‘मन की बात’’ करते समय न केवल अपने मन की बल्कि नागरिकों के (जिन्होंने उन्हे इस शीर्ष तक पहुंचाया) के मन की भी बात कहते करते हैं। ‘‘अनोखे‘‘ इसलिये कि वे पहले प्रधानमंत्री जिन्हाने अभी तक 84 बार देश के नागरिकों से ‘‘मन की बात‘‘ की है जो कि ‘‘नानी के आगे ननिहाल की बातें‘‘ करने जैसा है। जबकि मोदी के पूर्व अभी तक के समस्त पूर्व प्रधानमंत्री गण सामान्यतः सिर्फ स्वाधीनता दिवस पर ही राष्ट्र को सम्बोधित करते रहे थे। मन मोहने वाले मनमोहन सिंह भी नहीं करते थे। प्रधानमंत्री ने सबकी मन की बात जिसमें उनका मन भी शामिल है ।,कहा कि कोविड-19 अभी गया नहीं है। लोगों को पूर्ण सुरक्षा व सावधानी बरतनी है। 84 वीं मन की बात करते हुये देशवासियों को नये साल की बधाई देते हुये प्रधानमंत्री ने नागरिकों से अपील की स्वयं की सजगता व स्व-अनुशासन ही कोरोना के नये वेरिएंट ओमीक्रान के खिलाफ हमारी शक्ति है। वहीं टीवी स्क्रीन पर लाखोें की भीड़ को कोविड प्रोटोकॉल का पूरा उल्लघंन पाते हुये, देखते हुये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे की तर्ज‘‘ पर अपने विचारों का उदधोषण करते हुये, लगातार दिख रहे है। विपक्ष भी इस क्रम से दूर बिल्कुल नहीं है। वह भी दोनों पक्षों में बराबरी की भागीदारी से सर्वानुमति के साथ है। 

इस देश में सर्वानुमति या आम सहमति का यह अकेला उदाहरण नहीं है। सर्वानुमति (सर्वसम्मति) के अनेकानेक क्षेत्र है, जिनको याद कर ले तो आप अवश्य ही यह महसूस करेगें कि यह देश कम से कम आधी सर्वानुमति से तो अवश्य चल ही रहा है। बात जब सांसदों, विधायको की तनख्वाह बढ़ाने की होती है अथवा पेंशन देने व फिर बढ़ाने की होती है, तब सर्वानुमति अपने आप आ जाती है। मतभेद व मनभेद निरंक व निरर्थक हो जाते है। सब ‘‘मन मन भावे मूंड हिलावे‘‘ की स्थिति को प्राप्त हो जाते हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक शासक यदि आर्थिक रूप से कमजोर होगा तो वह सही ईमानदार शासन कैसे चला पायेगा? कमजोर आर्थिक स्थिति उन्हे कहीं न कहीं ईमानदारी से डोलने पर मजबूर कर सकती है। अतः देश हित में अपने आर्थिक स्थति को मजबूत कर ईमानदार बने रहने की परिस्थितियां बनाये रखने की सर्वानुमति पर किसी को कोई आपत्ति क्यों होना चाहिए? यह समझ से परे है।   

जब भी राजनैतिक पार्टियां परस्पर एक दूसरे के खिलाफ कीचड़  उछालने व आलोचना करती है, तब भी उनमें गजब की सर्वानुमति होती है। ‘‘आखिर हमाम में सभी नंगे होते हैं’’।  प्रत्येक राजनैतिक पाटी अपने ही शासन को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर की ओर ले जाने का दावा करती है। साथ ही दूसरे (अपने विपक्षियों) को नकारा, निकम्मा व शून्य तक कह देती हैं। चूंकि इन कमियों या उपलब्धियों को यदि नागरिक नहीं उभार पा रहे है, तो देश के राजनैतिक दलों को तो यह ‘‘कार्य’’ करना ही होगा? और इसीलिए उनके बीच यह सर्वानुमति है। 

एक और महत्वपूर्ण सर्वानुमति पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। समस्त राजनैतिक दलों में इस बात की अविवादित सर्वानुमति है कि महिला आरक्षण बिल संसद से पारित होना बेहद जरूरी है ताकि महिलाओं को विधायिका में एक तिहायी आरक्षण मिल सके। परन्तु यह सर्वानुमति होने के बावजूद आरक्षण बिल संसद में आज तक पारित  नहीं हो पाया है। तथापि उसी संसद में बिना सर्वानुमति वाले अनेको बिल यहां तक कि कई विवादित बिल भी सर्वानुमति, सहमति या बहुमत से पारित हो चुके है या रदद भी कर दिये गए है। ऐसा लगता है कि सभी पार्टी के पुरूष सांसद अन्दरखाने में शायद इस बात पर सहमत है कि बिल पारित न होवे। परदे के पीछे संसद के सेंट्रल हाल में गप-शप में मशगूल पुरूष सांसदांे द्वारा महिलाओं को आरक्षण न मिलने के शायद तौर-तरीके दूढे जाते है। यह भी तो सर्वानुमति ही है। वैसे सदन की समस्त महिला सदस्या आरक्षण को लेकर एकमत तो है, लेकिन यह एकमतता पार्टी की लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर पाती है, क्योंकि लक्ष्मण रेखा उलांघने के (दु)साहस के दुष्परिणाम को उन्होंने अवश्य पढ़ा है। यह भी एक तरह की सर्वानुमति ही है।

इसके अतिरिक्त अन्य अनेक मुद्दे है जिन पर प्रायः सभी राजनैतिक दलों की परस्पर अलिखित अथवा मौन सहमति या सर्वानुमति होती है। जैसे राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता को संवैधानिक पद, राज्यपाल के रूप मे नियुक्तियाँ, संवैधानिक संस्थाओं का राजनैतिक हित के लिये दुरूपयोग, पार्टी में आंतरिक वास्तविक लोकतंत्र, हाईकमान का वजूद, राजनीति में नैतिकता की दवाई ,राजनीति से अपराधीकरण की मुक्ति , अर्थात आरोपियों अभियोगीयों व अपराधियों को लोकसभा, विधानसभा में टिकिट देने का मामला (कानून अपना काम रहा है, करेगा) या दल बदलुओं को नवाजने का मामला हो आदि आदि।

किसी भी तरह के गंभीर अपराध, राजनैतिक आंदोलन व सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की बात होने पर उस राज्य के विपक्षी दल घटना की मुखर आलोचना करने में तुरंत-फुरंत सामने आ जाते हैं। परन्तु दूसरे राज्यों में जहां उसी विपक्षी दल की सरकारें होती है, वहां पर हुई इस तरह की घटनाएं पर वे मरहम-पट्टी का आवरण लगाकर चुप्पी साध लेते है। घटना तेरी-मेरी कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं? मतलब इसे स्पष्ट शब्दों में कहां जाये तो यह अपराध भाजपा का है और यह कांग्रेस का है या अन्य दलों का है, इस पर अपने अंदर झाके बिना, आत्मविलोकन किये बिना घटना वर्णित कर बेशर्मी से महिमा मंडित कर दिया जाता है। बयानवीरों के बयानों के तीक्ष्ण बाणों से इस पर भी सर्वानुमति बन गई है। राजनीतिज्ञों की कथनी-करनी के अंतर की सर्वानुमति का उल्लेख करने की आवश्यकता है क्या? परिवारवाद को सिंद्धान्त गलत कहते हुये इसे अपनाने की भी सर्वानुमति है।  

वैसे उक्त वर्णित पूरी सर्वानुमति को एक लाइन में रेखांकित किया जा सकता है कि वर्तमान में सत्ता का चरित्र इतना बलवान, मजबूत व हावी हो गया है कि उस पर आरूढ़ होने वाला राजनेता सत्ता को न हकाल (चला) कर, सत्ता उन राजनेताओं पर हावी होकर चढ़कर उन्हे चला रही है, जिस कारण से ही आज की सत्ता की राजनीति में उक्त सर्वानुमति परिलक्षित हो रही है। अर्थात यह सत्ता के कारण उत्पन्न सर्वानुमति है।

अब तो आप समझ ही गये होगें कि इस देश में शासन सर्वानुमति से देशहित में राजनीतिज्ञों द्वारा चलाया जा रहा है? कहां है विरोध?

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

‘‘कानून’’ अपना काम कर रहा है? परन्तु ‘‘सरकार’’ अपना काम कब करेगीं?

लखीमपुर खीरी के तिकुनिया गांव में घटित वीभत्स, नरसंहार हत्याकांड में 8 लोग मारे गये। इनमें से 4 किसान आरोपी आशीष मिश्रा जो कि केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी के सुपुत्र की एक्सयूवी गाड़ी से कुचलकर मारे गये। 1 पत्रकार और 3 राजनैतिक कार्यकर्ताओं (भाजपा) की भीड़ ने हत्या कर दी। उक्त वीभत्स कांड की जांच हेतु उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त एसआईटी पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप करते हुये असाधारण कदम उठाते हुये राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक सदस्यीय न्यायिक आयोग पर भरोसा न करते हुये एक सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) हाईकोर्ट जज जस्टिस राकेश जैन की नियुक्ति की। साथ ही एसआईटी के जांच अधिकारियों की सूची मंगाकर तीन इंसपेक्टर श्रेणी के अधिकारियों की जगह यूपी के न रहने वाले यूपी केडर के तीन आई.पी.एस. अधिकारियों को एसआईटी में नियुक्त करने के निर्देश दिये। वरना उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त एस आई की हैसियत तो यह थी कि- 
वही कातिल, वही शाहिद, वही मुंसिफ़ ठहरे,                     
अक़रबा मेरे करें क़त्ल का दावा किस पर। 
इस तरह की जब भी कोई घटनाएं घटित होती है तो,पीडि़त जनता व नेताओं द्वारा न्यायिक जांच की ही मांग की जाती है। क्योंकि वही एकमात्र सही व निष्पक्ष जांच मानी जाती है, जिसमें जनता को भी भागीदारी करने का मौका मिलता है। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय द्वारा एक सदस्ययी न्यायिक जांच पर भरोसा न करने का मतलब साफ है कि उच्चतम न्यायालय उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नियुक्त जज पर भरोसा नहीं कर रही है। न्यायिक जांच पर प्रश्न नहीं है। बल्कि यह उत्तर प्रदेश की न्यायिक स्थिति पर एक गंभीर प्रश्न हैं? उच्चतम न्यायालय के निर्देश में हो रही जांच में एसआईटी ने अंततः रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट के आधार पर सीजीएम न्यायालय में धारा 279, 338, 304ए हटाकर और उसकी जगह भारतीय दंड संहिता की धारा 326, 307, 302, 34 एवं 120बी, लगाये जाने का आवेदन दिया, जिसे न्यायालय ने स्वीकार कर लिया।
तत्पश्चात ही वस्तुतः जहां मुकदमें की कानूनी लड़ाई और जांच तेजी से होनी चाहिये थी, अर्थात एक तरफ एफआईआर में पूर्व से ही दर्ज केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी का बयान लिया जाना था। तो दूसरी ओर अभियुक्तों द्वारा मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश के विरूद्ध सक्षम न्यायालय में अपील तथा अग्रिम जमानत के लिए कार्यवाही की जानी चाहिये थी। परन्तु बजाए इसके चलती राजनीति की धार और तेज हो गई और दोनों पक्ष बल्कि तीनों पक्ष सत्ता पक्ष, विपक्ष और पीडि़त पक्ष अपनी-अपनी तलवार भांझकर सामने आ गये। 
एक तरफ पीडि़त पक्ष, एफआईआर में दर्ज अभियुक्त मंत्री को पूर्व से चली आ रही बर्खास्तगी और गिरफ्तारी की मांग पर तुरंत जोर देने लगा तो, सरकार हमेशा की तरह यह कहकर कि कानून अपना काम कर रहा है और करेगा, पल्ला झाड़कर अपना बचाव करने लगी। इस घिसे-पिटे ‘‘स्टीरियो टाइप’’ बचकाने तर्क के साथ सरकार व पार्टी आरोपी मंत्री के बचाव में आगे आकर यह कथन कि हमारी सरकार द्वारा बैठाई गई एसआईटी की जांच रिपोर्ट में ही तो हमारे ही मंत्री पुत्र के खिलाफ रिपोर्ट आई है। इसका मतलब स्पष्ट है कि न केवल सरकार बल्कि जांच एजेंसी निष्पक्ष रूप से कार्य कर न्याय दिलाने की ओर अग्रसर हो रही है। तथ्यात्मक रूप से समस्त पक्षों के तर्क, बहुत कुछ तथ्यों पर आधारित होने के बावजूद राजनीति कैसी की जाती है, खासकर उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव के परिपेक्ष को देखते हुये इसे आगे देखना आवश्यक है।
केन्द्रीय एवं संसदीय कार्य मंत्री प्रहलाद जोशी का यह कथन कि, चूंकि मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है, जो उक्त पूरे मामले को देख रहा है, निरीक्षण व परिवेक्षण कर रहा है, तब इस मामले में सरकार का हस्तक्षेप कदापि उचित नहीं होगा। बचाव में दिया गया उक्त तर्क प्रकरण की वीभत्सता, गंभीरता व स्वरूप को देखते हुए एक मजाक ही कहलायेगा। इसी तरह की प्रतिक्रिया केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने भी दी। उन्होंने कहा कि कानून अपना काम कर रहा हैं। बिना किसी भेदभाव के निष्पक्षता के साथ कार्यवाही हो रही है और इस पर किसी के ज्ञान (विरोधी दलों) की जरूरत नहीं है। बकौल अकबर इलाहाबादी-
क़ौम के गम में डिनर खाते हैं हुक़्काम के साथ                                                                                    
रंज़ लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ 
घटना की वीभत्सता से उत्पन्न रोष के प्रभाव को कम करने के लिए तथा आगे और प्रतिक्रिया स्वरूप स्थिति रौद्र रूप न ले ले, को देखते हुये उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस जांच, एसआईटी व न्यायिक आयोग की घोषणा कर जांच शुरू कर दी थी। उच्चतम न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुये जांच के तरीके दिशा और गति से असंतुष्ट होकर तीन बार सरकार को फटकार लगाते हुय हस्तक्षेप कर एसआईटी में मूलभूत परिवर्तन कर एक न्यायिक सदस्य की नियुक्ति करवायी। तत्पश्चात उस जांच की गति व दिशा कुछ हद तक ठीक हुई। एसआईटी के उक्त कार्यवाही का श्रेय लेते समय नेतागण इस तथ्य को भूल गये।
जांच एजेंसी की निष्कलंकता व पवित्रता को प्रमाणित करने वाले लोगो को इस बात पर ध्यान देना होगा कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश में होने वाली जांच के बावजूद ‘‘बालू की दीवार पर टिकी हुई’’ हमारी जांच एजेंसी की जो कार्यपद्धति है व सत्ता का जो चरित्र व तंत्र विद्यमान है, उसके कारण सत्ता से अप्रभावित हुये सही जांच करने में आंशिक रूप से ही सफल हो पाती है, जैसा कि जैन हवाला कांड में उच्चतम न्यायालय की लताड़ के बावजूद सीबीआई ने आधे अनमने मन से आधी अधूरी जांच की थी और सही निष्कर्ष पर नहीं  पहुंच पायी।  
अतः यह कहना तथ्यों के विपरीत है कि यह जांच उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित की गई एसआईटी द्वारा की जा रही है। इसके विपरीत एसआईटी में लगे जांच अधिकारीगण व स्टाफ राज्य के गृह मंत्रालय के अधीन है। दुर्भाग्यवश? अथवा सौर्भाग्यवश? जो मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा और षड़यत्रंकर्ता के रूप मंे उसके पिताजी केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री जिनके अधीन पूरे देश का पुलिस विभाग आता है। क्या देश का लोकतंत्र इतना परिपक्व और कार्यपालिका खासकर पुलिस विभाग इतनी स्वच्छ, सक्षम, साहसी और ईमानदार हो गयी है कि इन विशिष्ट परिस्थितियों के रहते केंन्द्रीय गृह राज्यमंत्री के सुपुत्र के खिलाफ चल रही जांच 100 प्रतिशत ईमानदारी के साथ हो सके? यदि प्रधानमंत्री सिर्फ गृह राज्य मंत्री से गृह विभाग ही छीन ले ते तो भी इतना भद नहीं होती। यदि उत्तर प्रदेश सरकार ने उसके द्वारा नियुक्त एसआइटी (उच्चतम न्यायालय के परवेेक्षण में) के द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर कानून की धारा बढ़ायी है, तो निश्चित रूप से उससे उसकी 50 प्रतिशत निष्पक्षता तो सिद्ध होती है। परन्तु सरकार की कानून के प्रतिबद्धता न केवल 100 प्रतिशत होनी चाहिये, बल्कि ऐसा होते हुये भी निष्पक्ष दिखना भी चहिये। 
केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री के अधीन वह पुलिस विभाग आता है, जो केन्द्रीय मंत्री के सुपुत्र की आपराधिक जांच कर रही है, तो निष्पक्ष होकर भी (यदि यह मान लिया जाए) निष्पक्ष दिखना संभव नहीं है। ठीक उसी प्रकार जैसा कि न्याय का यह मान्य सिद्धांत है कि न्याय न केवल मिलना चाहिये, बल्कि न्याय होते हुये दिखना भी चाहिये। इस प्रकार 50 प्रतिशत नकारात्मक प्रभाव को इस पूरे प्रकरण में वह भाजपा नकार रही है, जिनके नेता लालकृष्ण आडवानी और एनडीए के अध्यक्ष रहे शरद यादव जैसे व्यक्तियों ने जैन हवाला कांड में नाम आने मात्र पर अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था। क्या मामला कोर्ट मंे लम्बित होने से अभियुक्त को प्रत्येक स्थिति के लिये प्रत्येक स्थिति के लिये अभयदान मिल जाता है? 
मंत्री को बर्खास्त करना या उसके द्वारा इस्तीफा देना तो दूर बल्कि ‘‘एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा’’वाली स्थिति तब हो गई, जब केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री, आरोपी ने जिस तरह का व्यवहार पत्रकारों से किया, वे अपना वही पुराने अंदाज में दिखने लगे, जिसके लिये वे न केवल जाने जाते है। बल्कि खुद सार्वजनिक रूप से उक्त घटना के पूर्व दावा भी कर चुके है। सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति का लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहलाने वाले मीडिया पर ऐसे दुर्जन प्रहार का संज्ञान आखिर कौंन लेगा? मीडिया (संबंधित पत्रकार) ने भी अभी तक इस संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं कराई है। क्या उनके भी हाथ पाव फूल गये? मंत्री महोदय ने जब गलत व्यवहार किया है और यदि उन्होंने कानून का उल्लघंन नहीं किया है, जिस कारण से यदि एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई है तो, फिर ‘‘एक हाथ से ताली बजाने की कोशिश’’ करती हुई मीडिया की इस हाय तौबा का मतलब क्या है? अपशब्दों का बवाल राजनेताओं में ही नहीं बल्कि मीडिया में भी प्रचलित है। वे अपने को सबसे ऊपर मानकर कालर खड़ी कर दूसरों को कुछ न मानकर मुह से उन पर बंदूक छोड़ने पर गुरेज़ नहीं करते है।     
अंततः अटल बिहारी वाजपेयी के ‘‘राजधर्म’’को अपनाने की नीति को आगे बढ़ाते हुये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सबसे अच्छी बात तो यही होगी कि वे मंत्री अजय मिश्रा को तुरन्त अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर ‘‘देर आयद दूरूस्त आयद’’ की तर्ज पर ठीक उसी तरह जिस प्रकार तीनों कृषि कानून बिल को वापस लिया गया, अपनी दृढ़ छवि को बनाए रखे, जो देश के लिए भी आवश्यक है। उनका यह कदम लोकतंत्र को और मजबूत ही करेगा। पुरानी कुछ अच्छी परिपाटी व उदाहरणों को आगे बढ़ाने में भी यह सार्थक सिद्ध होगा।

रविवार, 19 दिसंबर 2021

‘‘राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष करों का योगदान‘‘।

केन्द्रीय वित्त मंत्रालय, आयकर विभाग द्वारा पूरे देश में 13 सितंबर 2021 से 17 दिसम्बर 2021 के बीच ‘‘आजादी का अमृत महोत्सव’’ कार्यक्रम के अंतर्गत उपरोक्त विषय पर सेमीनार का आयोजन किया गया। आयकर अधिकारी, बैतूल द्वारा आयोजित इस सेमीनार में भाग लेते हुये मेरे द्वारा कहे गये उद्बोधन के प्रमुख अंश प्रस्तुत है।

किसी भी राष्ट्र का विकास निसंदेह उसकी आर्थिक मजबूत स्थिति पर ही निर्भर होता है। देश की दृढ़ व मजबूत आर्थिक स्थिति के लिए नागरिकों को कर के रूप में अपना अंशदान देना होता है। कर अर्थात टैक्स  लैटिन भाषा "टैक्सो" से लिया गया शब्द है। वैसे "कर" कराधान से निकला शब्द है, जिसका तात्पर्य आकलन से होता है। कर देश के नागरिकों द्वारा स्थानीय शासन, राज्य शासन या केंद्रीय शासन को दिए जाने वाला अनिवार्य वित्तीय भुगतान है, जो आर्थिक असमानता को दूर करता है। आधुनिक लोकतंत्र में किसी भी सरकार के लिए यह आय का मुख्य स्त्रोत हो गया है। कर के रूप में यह अंशदान भारत में दो तरह से हैं। एक प्रत्यक्ष कर व दूसरा अप्रत्यक्ष कर। आपको पहले यह समझना होगा कि प्रत्यक्ष कर किसे कहते हैं। वह कर जो सामान्यतया आय पर और उसका भुगतान व्यक्ति सीधे करता है, सामान्यतया प्रत्यक्ष कर कहलाता है। इसे हम मुख्य रूप से आयकर के रूप में जानते हैं। यह भी दो मुख्य प्रकार का होता है। व्यक्तिगत आयकर एवं दूसरा निगमित (कम्पनी) कर। आयकर पर सरचार्ज व सेस भी लगता है। तथापि दान कर और राज्यों द्वारा आरोपित वृत्ति कर भी प्रत्यक्ष कर ही है। पूर्व में प्रत्यक्ष कर के रूप में एस्टेट ड्यूटी (संपत्ति शुल्क) व वेल्थ टैक्स ( धन कर) भी लगता था, जिसे समय-समय पर  आवश्यकता के अनुरूप समाप्त कर दिया गया था। फ्रिज बेनिफिट टैक्स नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारियों को दिये जाने वाले बेनिफिट पर राज्य सरकार को दिया जाता है। सर्वप्रथम देश में आयकर वर्ष 1860 में लगाया गया। वैसे मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कर का संदर्भ मिलता है। वर्ष 1922 में पहला  आयकर कानून आया। जबकि 1961 में वर्ष 1922 के अधिनियम को समाप्त कर नया आयकर अधिनियम लाया गया। वर्तमान में भी आयकर अधिनियम 1961 को समाप्त कर नये आयकर अधिनियम की आवश्यकता महसूस की जा रही  है। इस कारण से एक नया आयकर कोड भी कुछ वर्ष पूर्व बनाया गया था जो विचार विमर्श के लिए सार्वजनिक रूप से लम्बित है।  

दूसरा अप्रत्यक्ष कर जो माल के विक्रय या सर्विस के रूप में एक उपभोक्ता को सामान्यतया खर्चे के रूप में देना होता है। इसमें पहले विक्रय कर, कमर्शियल टैक्स, वेट, प्रवेश कर, सर्विस टैक्स, सीमा शुल्क, उत्पाद कर, स्वच्छ भारत सेस (15.11.2015 से लागू), कृषि कल्याण सेस, इंफ्रास्ट्रक्चर सेस इत्यादि अप्रत्यक्ष कर होते थे। इन सब अधिकांश करों को मिलाकर अब जीएसटी के नाम से एक अप्रत्यक्ष कर 1-7-2017 से लागू किया गया है। वस्तुओं पर अभी भी वेटकर लागू है, जैसे पेट्रोलियम उत्पाद। स्टॉक एक्सचेंज में सिक्योरिटीज पर भी वर्ष 2004 में सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स  लगाया गया है। कम्पनी को अपने लाभ निवेशकों को दिये गये लाभाश पर डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स देना होता है। इसके अतिरिक्त राज्य शासन भी अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष कर जैसे प्रॉपर्टी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, पंजीकरण शुल्क, लग्जरी टैक्स, टोल टैक्स व अप्रत्यक्ष कर मनोरंजन शुल्क, मंडी टैक्स इत्यादि लगाते रहें हैं, जो राज्यों की आय के स्त्रोत के अतिरिक्त साधन है।

हमारे देश की आय में प्रत्यक्ष करों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। चालू वित्तीय वर्ष में प्रथम तिमाही में कुल राजस्व रुपए 2,46,519.80 करोड़ प्राप्त हुआ जबकि इसी अवधि में पिछले वर्ष रुपए 1,17,783.87 करोड़ मिले थे। इस प्रकार लगभग 109% की वृद्धि हुई। सितंबर 2021 को समाप्त हुई तिमाही तक कुल प्रत्यक्ष कर के रूप में भारत सरकार को 570568 लाख करोड़ रुपए की शुद्ध राजस्व (रिफंड राशि घटाने के बाद) की प्राप्ति हुई है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 56% अधिक है। जबकि इसी अवधि में अप्रत्यक्ष करों से कुल राजस्व 675742 करोड़ हुई जो मासिक औसत 1.15 लाख करोड़ हुई है। माह नवंबर तक राजस्व संग्रहण 93795 लाख करोड़ रू. का हुआ है । नवंबर माह में 131526 करोड़ रुपए की प्राप्ति हुई ,जो जीएसटी लागू होने के बाद का अभी तक का  दितीय द्वितीय उच्चतम राजस्व है। अप्रैल 2021 में रुपए 141354 करोड़ राजस्व प्राप्त हुआ था जो अभी तक का जीएसटी का उच्चतम रिकॉर्ड है। इस प्रकार जीएसटी का संग्रहण (कलेक्शन)  भी अनुमानित बजट की आय से कहीं ज्यादा हुआ है।

भारत में आयकर की अधिकतम दर 42.74% (सरचार्ज  सहित) है। विश्व में सबसे अधिकतम आयकर की  दर स्वीडन में 57.19% है । विश्व के 14 देश ऐसे हैं जहां पर किसी प्रकार का व्यक्तिगत या निगमित आयकर नहीं है। इनमें अधिकतर तेल उत्पादक देश शामिल है । जहां तक देश में कुल (डायरेक्ट टैक्सपेयर्स) प्रत्यक्ष करदाता की संख्या का प्रश्न है, उनकी कुल संख्या अभी लगभग 82.7 मिलियंस है, जो देश की कुल जनसंख्या का मात्र 6.25% है। जबकि अमेरिका में 40% से अधिक लोग आयकर दाता हैं। अतः स्पष्ट है हमारे देश मे टैक्स देने वालो की संख्या तुलनात्मक रूप से बहुत कम है। इसलिए सरकार को देश के विकास में और अधिक नागरिकों को भागीदार बनाने के लिए उन्हे प्रत्यक्ष कर की सीमा में लाने की नीति व प्रयास करने चाहिए। बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जैसे कृषि क्षेत्र जहां बड़े कृषक हैं, फार्म हाउस खेती करते हैं, उनको आयकर की परिधि में लाने पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। ताकि वे भी देश के विकास में अपना अंश देकर अपने को गौरवान्वित महसूस कर सकें। एक अध्ययन के मुताबिक 4% अमीर किसानों को आयकर के दायरे में लाकर लगभग 25 हजार करोड रू. से अधिक का राजस्व जुटाया जा सकता है और साथ ही इस तरीके से काले धन को सफेद का जो माध्यम बन गया है उस पर भी रूकावट भी आ जायेगी, जिससे सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है।

परंतु सरकार का डायरेक्ट प्रत्यक्ष कर करदाता के प्रति उतना संवेदनशील रुख नहीं रहा है जितना (इनडायरेक्ट टैक्सपेयर्स) अप्रत्यक्ष करदाता के प्रति। आपको याद होगा कि जब डीजल और पेट्रोल की कीमतें लगातार दिन प्रतिदिन बढ़ रही थी, तब पेट्रोलियम मंत्री से लेकर पूरी सरकार का यही रुख रहा कि नागरिकों को देश के विकास में अपना अंश देने के लिए इस मूल्य वृद्धि में कर के रूप में अपना सहयोग देकर आगे आना चाहिए और यह उनका देश के प्रति कर्तव्य व दायित्व भी है। परंतु यही भावना सरकार ने डायरेक्ट टैक्स करदाता के प्रति व्यक्त नहीं की, जो खेद जनक है। 

वैसे प्रत्यक्ष कर की वसुली हेतु हो रहे खर्चे तथा अप्रत्यक्ष कर के समान लगभग अधिकाश  नागरिकों को देश के राजस्व में कर के रूप में अपना अंश देने के लिये कुछ क्षेत्रों से यह सुझाव  कॉफी समय पूर्व से आया है कि आयकर की बजाय बैंकिंग कैश ट्रान्जेक्सन टैक्स (बीसीटीटी)(बैंक से लेन-देने पर कर) (0.25%/0.50%/1.00%) लगा देना चाहिये। इससे  न केवल अधिकतम नागरिक कर देने वालों की संख्या में शामिल होकर कर दाताओं का दायरा बढ़ जायेगा बल्कि राजस्व में भी वृद्धि होगी।  क्योंकि जन-धन योजना के अंतर्गत आज देश में अधिकाश नागरिकों के न केवल बैंक खाते खुले है, बल्कि बैंक ट्रान्जेक्संस् भी बढ़े है। साथ ही कर वसूली के लिए इतने बड़े आयकर के अमले की आवश्यकता न होने पर कर वसूली के खर्चे में जो अभी लगभग 1% कुल राजस्व का है, मैं भी काफी कमी हो जाएगी।वैसे वर्ष 2005 में आयकर के अतिरिक्त कुछ मामलों में यह टैक्स लगाया गया था, जो वर्ष 2009 में वापस ले लिया गया। इसके अतिरिक्त राजस्व बढ़ाने के लिए व्यय कर के भी सुझाव कुछ क्षेत्रों से आये है जिस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिये।

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