बुधवार, 14 जून 2017

राज(नीति)!आंदोलन से उपवास तक!

पिछली एक तारीख से महाराष्ट्र व मध्यप्र्रदेश के कुछ भागो में विभिन्न मांगो को लेकर किसानों एवं भिन्न -भिन्न किसान संगठनों द्वारा आंदोलन चलाया जा रहा हैं जो दिन प्रति दिन तीव्र होकर फैलता जा रहा हैं। देश के मध्य स्थित प्रदेश हमारे मध्य प्रदेश मंे भी आंदोलन इतना तीव्र हो गया हैं कि उसके हिंसक रूप धारण कर लेने के कारण हुई गोली चालन व मारपीट के कारण 6 किसानो की दुखदः मृत्यु हो गई। अकेला मध्यप्रदेश ही वह प्रदेश हैं जिसे लगातार पिछले पांच वर्षो से कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता व किसानो के हित में कार्य प्रणाली के कारण पुरष्कार स्वरूप केन्द्र सरकार द्वारा ‘‘कृषि कर्मण’’ पुरस्कार दिया जाता रहा हैं। प्रदेश के कृषि मंत्री 5-5 बार पुरष्कार प्राप्त कर फूले नहीं समा रहे हैं। लेकिन कृषि क्षेत्र में लगातार अवार्ड़ प्राप्त करने वाले प्रदेश में किसानो का आंदोलन होना व उस आंदोलन का उग्र व हिंसक हो जाना और उक्त हिंसक आंदोलन के दमन हेतु गोली चालन होना (जिससे 5 किसानो की मृत्यु हो गई हैं,) अपने आप में एक बड़ी संजीदगी विहीन विरोधाभाषी स्थिति को प्रकट करता हैं।
प्रदेश सरकार का रवैया तो बहुत ही अक्षोभनीय व निर्लजता लिये हुये मूर्खता पूर्ण रहा हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री किसानांे की मृत्यु पर क्षति राशि की घोषणा करते रहे, तो दूसरी ओर उनके गृहमंत्री पुलिस द्वारा गोली चालन से न केवल लगातार साफ इंकार करते रहे बल्कि कुछ असामाजिक अज्ञात तत्वों को इस गोलीकांड के लिये जिम्मेदार भी ठहराते रहे। लेकिन अंततः उन्हे वस्तुस्थिति को स्वीकार कर पुलिस गोली चालन से 5 किसानों की मृत्यु को स्वीकार करना पडा़। गृहमंत्री का यह रवैया न केवल उनकी गैर संवेदनशीलता व अकुशलता को दर्शाता हैं बल्कि मुख्यमंत्री के स्टेंड़ के विरूद्ध भी रहा जिन्होेंने किसानो की गोली चालन में मृत्यु के पश्चात् तुरंत  प्रांरभ में मुआवाजा राशि 5 लाख की घोषणा कर दी थी, जिसे 5 लाख से बढ़ाकर 10 लाख किया गया और अंततः1 करोड़ करके संवेदनशील होने का अहसास (असफल) प्रयास किया गया। यदि सरकार की नजर में घटित नुकसान की पूर्ति मुआवजा राशि से हो जाती हैं तो पहले मात्र 5 लाख की घोषणा क्यांे की गई? यदि वह राशि सही थी तो फिर बढ़ाकर 10 लाख व दो दिन बाद 1 करोड़ क्यों कर दी गई? क्या 5 लाख की राशि की घोषणा के बाद आंदोलन में नरमी न आने के कारण आंदोलन को कमजोर करने के लिये 1 करोड़ रू. की राशि का दॉंव फेंका गया? प्रथम बार ही 1 करोड़ रू. की घोषणा क्यों नहीं की गई? आखिर कब तक इस तरह आंदोलनो में गई जाने व मृत्यु की एवज में मुआवजे की घोषणा कर मरहम लगाने का प्रयास किया जाता रहेगा? क्या जीवन के क्षतिपुर्ति का विकल्प सिर्फ पैसा (मुआवजा राशी) ही हो सकता हैं? आंदोलन से निपटने में विफल होने के लिये शासन, उपस्थित जनप्रतिनिधि प्रशासनिक मशीनरी व अराजक तत्वों को निश्चित सीमित समय में कड़क सजा मिलने का प्रावधान क्यों नहीं बनाया जाता हैं?, ताकि जान माल की हानि न हो सके। ऐसी स्थिति पैदा करने के लिये जो सामूहिक रूप से जिम्मेदार होते हैं उन पर कार्यवाही होकर उन्हे कड़क सजा़ क्यों नहीं दी जाती हैं? एक तरफ ‘‘सरकार की मुआवजा की घोषणा करते जाना’’ व दूसरी ओर आंदोलन में ‘‘असामाजिक तत्वों द्वारा गोली चालन किये जाने का कथन करना’’ क्या यह सब सरकार के मुखिया व गृहमंत्री के बीच संवादहीनता को नहीं दर्शाता है? क्या यही संवादहीनता की खाई प्रशासक, शासक, आंदोलित किसान एवं प्रबुद्ध नागरिकांे के बीच इतनी तो नहीं बढ़ गई जिसका दुष्परिणाम ही 6 लोगो की मौत का कारण बना? 
देश की सुरक्षा के लिये सीमा पर मरने वाले प्रदेश के जवानो के लिये कभी 1 करोड़ का मुआवजा मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दिया गया? हर पक्ष यही कहता हैं कि ऐसे समय राजनीति नहीं की जानी चाहिए। लेकिन दूसरे ही पल परस्पर एक दूसरे पर राजनीति करने का आरोप जड़ दिया जाता हैं। प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री मुआवजा की राजनीति में ही मशगूल हो गये। हाल में ही कुछ दिन पूर्व प्रदेश के मुख्यमंत्री जब बैतूल जिले के दौरे पर आये थे तब बैतूल शहर में रहने वाले एक जवान जिसकीे सीमा पर मृत्यु हो गई थी उसकेे घर वे (दो मिनट शोक व्यक्त करने) शायद ‘राजनीति’ न करने के कारण ही नहीं पंहुचे। जबकि उसके एक दिन पहले ही वे भोपाल से रीवा जाकर एक शहीद को श्रृद्धाजंली देकर आए थे। 
कश्मीर में सुरक्षा बल पर पत्थर फेकने वाले ‘व्यक्ति’ पर रबर बुलेट चलाने के मामले में तो उच्चतम् न्यायालय से लेकर मानवाधिकारी प्रश्न उठा देते हैं। लेकिन देश की पेट पूजा करने वाले किसानो की जब पुलिस/अर्द्धसैनिक बल द्वारा गोली चालन में हत्या हो जाती हैं तब न तो न्यायालय सामने आता हैं न ही तथाकथित बुद्धिजीवी मानवाधिकार के रखवाले लोग बस किसी न किसी रूप में एक जांच के आदेश की नियुक्ति की घोषणा हो जाती हैं।.
बात कुछ राहुल गांधी के दौरे की भी कर ले। राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि ‘‘वे प्रभावित किसान परिवारो से मिलने मंदसौर जा रहे हैं’’। यह आंदोलन जिसने हिंसक रूप ले लिया (किसके कारण/द्वारा, यह न्यायिक जांच का विषय हो सकता हैं) जिस कारण करोड़ो रू. की आम नागरिकों व सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान हुआ। एक बस जिसमें बच्चे व महिलाएॅं सवारी थी उस पर लगातार पत्थर फेके गए उन्हे उतार कर बाद में बस जला दी गई। ऐसे आंदोलन के बीच ऐसी अमानवीय हरकतो से प्रभावित व डरे हुये लोगो के ऑंसू पोछने के लिए राहुल गांधी से लेकर अन्य कोई नेता ने पहंुचने की इच्छा व्यक्त नहीं की। क्यों? तब वह राजनीति कहलाती और वे ऐसी जनहितैषी राजनीति नहीं करना चाहते हैं। वाह री राजनीति! 
शिवराज सिंह चौहान द्वारा उपवास पर बैठना कौन सी नीति हैं जिसमें राज-नीति बिलकुल  नहीं हैं? यदि 24 घंटे के उपवास से शांति आ सकती हैं, तो मुख्यमंत्री 3-4 दिन पूर्व ही, हिंसा प्रारंभ होते ही क्यों नहीं अनशन पर बैठ गये? उपवास पर बैठने को एक जुमले में ‘‘गंाधी गिरी’’ कहा जा सकता हैं। लेकिन यदि यह गांधी-गिरी हैं तो उसका हिंसा से क्या लेना देना हैं। लेकिन यहॉं पर दोनो पक्षों द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाया गया। मुख्यमंत्री द्वारा हिंसा की उच्चस्तरीय जांच कराने का भी निर्णय उपवास पर बैठने के बाद किया गया। जब एक न्यायिक जांच की घोषणा पहिले ही कर दी थी तब दूसरी उच्चस्तरीय जांच का क्या औचित्य? इससे तो यही मतलब निकलता हैं कि जंाच की घोषणा कर मामले को ठंडे बस्ते में डालना जो कमोवेश प्रत्येक सरकार किसी भी घटना को घटित होने पर अपने बचाव में (सफलतापूर्वक) करती चली आ रही हैं।

मंगलवार, 2 मई 2017

’आप’ का ‘आप’ (जनता) से ‘विश्वास’ क्यों खत्म होते जा रहा है?

दिल्ली नगर निगम के चुनाव में बुरी तरह से हारी आप पार्टी और उनके नेता पूरी तरह से बौंखलाये हुये हैं। आजकल मीड़िया से लेकर हर जगह ‘आप’ के ‘‘विश्वास’’ की चर्चा हो रही हैं। आखिर ‘‘आप’’ को हो क्या गया हैं? नगर निगम के चुनाव परिणाम किसी राजनैतिक दल के लिये बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम को जिस तरह राष्ट्रीय मीड़िया ने महत्व दिया और लगातार सुबह से शाम तक टी.वी. चेनलों पर लाईव परिणाम दिखाएॅ गये वैसी अहमियत मुम्बई या कोलकत्ता को कभी भी नहीं मिली। जबकि मुम्बई महानगर पालिका का बजट तो कुछ राज्यों के बजट से भी बड़ा हैं। यह ठीक वैसी ही घटना हैं जैसे कि पूर्व में दिल्ली विधानसभा के चुनावों व परिणाम को राष्ट्रीय कवरेज मिला था जबकि वह पूर्ण राज्य भी नहीं हैं, और बहुत ही छोटी सी विधानसभा हैं। तब ‘‘आप’’ के द्वारा ‘‘आप’’ को 70 में से 67 सीटो पर विजय मिली थी। जीत तब सही मानी गई थी। चुनाव आयोग, ईवीएम मशीन, मतदाता तब सब ‘‘आप’’ की नजर में सही थे। उस वक्त सिर्फ गलत और गलत थे तो मात्र विरोधी पार्टियॉं कांग्रेस व भाजपा जिन्हे दिल्ली के मतदाताओं ने लगभग पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया था। दो साल बाद अब दिल्ली की जनता ने नगर निगम के चुनाव के जो परिणाम दिये हैं क्या उसे मोदी सरकार के कार्यो के प्रति सकारात्मक अनुमोदन कहा जाय या केजरीवाल सरकार के प्रति नकारात्मक भाव या दस सालो से नगर निगम पर आरूढ़ भाजपा के कार्यो पर मुहर व जनादेश कहे। यह सब व्याख्या राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से, अपनी सुविधानुसार करने के लिये स्वतंत्र हैं। लेकिन प्रांरभिक प्रतिक्रिया में ‘‘आप’’ द्वारा उक्त परिणाम को अस्वीकार करके बवाल मचाकर ‘‘ईवीएम द्वारा जीता हुआ चुनाव’’ कहना, निश्चित रूप से निंदनीय, अनैतिक व अलोकतांत्रिक हैं।
ईवीएम मशीन पर अविश्वास जताकर चुनाव परिणाम को अस्वीकार कर देने का क्या यह मतलब नहीं हैं कि ‘आप’ उस जनता पर अविश्वास कर रहे हैं जिस जनता ने पहले दिल्ली विधानसभा में उसी ईवीएम मशीन का प्रयोग करके ‘‘आप’’ को लगभग पूर्ण रूप से (95% 70 में से 67को) चुना था। तब ‘‘आप’’ को इसी ईवीएम ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रतिक्रिया देने का अधिकार प्रदान किया था जिसे न तो ‘आप’ ने अस्वीकार किया था, और न ही कोई प्रश्नवाचक चिन्ह  लगाया था? यह 95 प्रतिशत बहुमत भी आप को उस परिस्थितियों के बाद मिला जब इसके पूर्व हुये लोकसभा के चुनाव में दिल्ली की सातो सीट पर उन्हे हार खानी पड़ी। इसके पूर्व केे विधानसभा चुनाव में भी आप को बहुमत नहीं मिला था एकतरफा कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन से सरकार बनानी पड़ी थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में आई सहानुमति की लहर में भी कांग्रेस को इतना प्रचंड बहुमत नहीं मिला जितना विधानसभा चुनाव में आजादी के बाद किसी भी विधानसभा चुनाव में शायद प्रथम बार किसी पार्टी को 95 प्रतिशत बहुमत प्राप्त हुआ हैं। न ही एग्जिेट पोल व न ही एग्जिट पोल में आप की इतनी प्रचंड़ जीत की संभावना व्यक्त की गई थी। खुद आप को भी लगभग इस पूर्ण जीत का ‘‘विश्वास’’ कदापि नहीं था। तब इस आश्चर्य चकित परिणाम पर ईवीएम पर उंगली न तो ‘‘आप’’ ने उठाई नहीं और ने ही ‘आप’ के विरोधियों ने, बल्कि इसे जनता जर्नादन का निर्णय मान कर हंसते हुये स्वीकारा गया। आप के नेताओं का लगातार यह कहना हैं कि लालकृष्ण आड़वानी के जमाने से व सुब्रम्हण्यम स्वामी के द्वारा ईवीएम मशीन पर आपत्ति जताई जा रही थी और इसी बीच भाजपा के द्वारा इस संबंध में शोध कर ईवीएम मशीन में छेड़खानी करके चालाकी से अपने अनुकूल परिणाम ला रही हैं। इसी कारण भाजपा लगातार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड़, दिल्ली इत्यादि चुनाव जीत रही हैं। यह सरासर जनादेश का घोर अपमान ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास भी हैं।
यदि यह भी मान लिया जाय कि भाजपा ईवीएम मशीन पर लगातार शोध करते करते उसमें गड़बडी करके अपने अनुकूल परिणाम ले आने में विशेषज्ञ हो गई हैं, जैसा कि ‘आप’ अब आरोपित कर रही हैं। तब ‘‘आप’’ को दो साल पूर्व हुये दिल्ली के चुनाव में कैसे भारी एक तरफा विजय मिल गई थी जो सही थी? ‘‘आप’’ के नेता ईवीएम मशीन पर गड़बडी का आरोप मढ़ते समय राजनैतिक वास्तविकता को भूल रहे हैं व अपने गिरेबान में झाक कर देखने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। जीते तो ईवीएम मशीन सही, हारे तो ईवीएम मशीन गड़बड। यह वही कहावत हैं कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कडवा थू। जबकि एक सामान्य व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिये भी मीठा व कड़वा दोनो ही जरूरी हैं। राजनीति में तो स्वाद राजनेता के हाथो में नहीं बल्कि उस जनता के हाथों में हैं जिसे जनता जर्नादन कहा जाता हैं, तो राजनैतिक पार्टी जनता से वोट लेने के दिन तक तो जनता को अपना भगवान मानती हैं, उनका सेवक कहलाना पंसद करती हैं, लेकिन जीतने पर खुद मालिक और भगवान बन जाती हैं।
इस चुनाव के पहले से ही ’’आप’’ ईवीएम मशीन में धांधली का आरोप लगा रही हैं। यदि ‘‘आप’’ को यह विश्वास था (बात फिर ‘‘विश्वास’’ के संकट की है) कि यह धांधली नहीं रूकेगी तथा ‘आप’ उस धांधली को रोकने में असमर्थ हैं तब ‘आप’ के द्वारा इस चुनाव में भाग लेने का क्या औचित्य था। आप ने इस मुद्दे को लेकर शुरू में ही चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं किया व जनता को आंदोलित क्यों नहीं किया। पानी पी पी कर हर मुद्दे पर सोशल मीड़िया के माध्यम से जनमत जानने का दावा करने वाली ‘‘आप’’ ने सोशल मीड़िया के द्वारा इस मुद्दे पर जनता की राय अभी तक क्यो नहीं ली?
आखिर ‘आप’ का (कुमार) ‘‘विश्वास’’ पर ‘‘अविश्वास’’ का संकट क्यों गहराता जा रहा हैं? उसका यह ‘‘अविश्वास’’ उसे कहॉं ले जायेगा? या ‘आप’ इस ‘‘अविश्वास’’ को कहॉं तक लेकर जाकर छोडते हैं? ‘आप’ आखिर ईवीएम मशीन पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हैं? उसका ‘‘विश्वास’’ ही जब खुद पर अविश्वास करने लग जाये तो उनके ‘‘अविश्वास’’ पर कौन ‘‘विश्वास’’ करेगा? यदि ‘आप’ को जीत की ओर लौटना हैं तो उन्हें जन-(के)-तंत्र के सामने खड़ा होना पडेगा व उसका सामना करना पडेगा। इसके लिये उन्हें अपने को शुरूवात की स्थिति में लौंटना पड़ेगा जहां से वे जनतंत्र कीे ऑंधी के कारण लोकतंत्र का भाग बन सकें थे। अन्यथा उनका आगे का राजनैतिक सफर सिफर हो जायेगा और ‘‘आप’’ इतिहास के पन्ने में गुम हो  जायेगे। आप की जगह मैं, तुम, हम, ही चलायमान होगें।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

Popular Posts