मंगलवार, 30 जनवरी 2018

उच्चतम न्यायालय के निर्णय की भावना का उल्लघंन क्या ‘‘अवमानना’’ की सीमा में नहीं आता हैं?

इस समय पूरे देश में पद्मावती-पद्मावत, राजपूत समाज व करणी सेना की ही चर्चा हैं। फिर चाहे वह पिं्रट मीडिया हो, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सोशल मीडिया हो। फिल्म ‘‘पद्मावती’’ को कई संशोधन व कट के पश्चात ‘पद्मावत’ के नाम से संेसर बोर्ड द्वारा फिल्म प्रदर्शन हेतु यू.ए. प्रमाण पत्र मिल जाने के बावजूद उक्त फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने के लिए मामला उच्चतम न्यायालय तक गया।मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा एवं राजस्थान की सरकारो ने अधिसूचना जारी कर इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया। उच्चतम न्यायालय ने मध्यप्रदेश एवं राजस्थान  सरकारे द्वारा दायर पुर्नविचार याचिका सहित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के बाद नागरिको की ‘‘रचनात्मक अभिव्यक्ति’’ की आजादी के मूलभूत अधिकार के सरक्षण के आधार पर अंतिम रूप से बंधनकारी आदेश पारित कर इन सरकारो द्वारा फिल्म प्रदर्शन पर लगे इस प्रतिबंध की ‘‘अधिसूचनाओं’’ को निरस्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उक्त फिल्म का प्रदर्शन पूरे देश में बिना रूकावट के किया जाय एवं इस हेतु आवश्यक समस्त सुरक्षा प्रदान करना राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य हैं। वास्तविक धरातल पर नहीं केवल तकनीकि रूप से ‘‘पेपर’’ पर प्रत्येक नागरिक चाहे वह फिल्म का विरोध करने वाला ही क्यो न हो व राजपूत समाज तथा करणी सेना से जुड़े लोग उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को (अंतिम व बंधनकारी होने के कारण) मजबूरी में ही सही, पालन करने के लिए सत्य कथन ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं, जिस प्रकार कोई व्यक्ति, विधायक अथवा मंत्री विभिन्न संवैधानिक पदो पर चुने जाने/नियुक्ति के समय शपथ लेते समय करते हैं। साथ-साथ वह यह भी कह रहे हैं कि फिल्म का विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार हैं, जो वास्तव में सही भी हैं। 
फिल्म प्रदर्शन पर ‘‘राज्य सरकारो के रोक लगाने के आदेश’’ को उच्चतम न्यायालय द्वारा हटा देने तथा फिल्म सेंसर बोर्ड़ द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर दिये जाने के बावजूद फिल्म की स्टोरी, फिल्माकंन, दृश्य-घटना इत्यादि विषय को लेकर आलोचकों का यह मानना कि आलोचना का सर्वाधिकार सुरक्षित हैं, ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि न्यायालयो के आदेशो की विवेचना सभं्रात नागरिकगण एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति मीडिया से लेकर विभिन्न फोरम पर क्रिया-प्रतिक्रिया देते समय समझते हैं। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की राज्य सरकार तो और एक कदम आगे निकल गई। उन्होने उच्चतम न्यायालय में पुर्नविचार याचिका भी दायर की। जबकि उनके गृहमंत्री ने कहा कि हम उच्चतम न्यायालय के आदेश का पूर्णतः पालन करेगंे व मांगने पर पीड़ितो को सुरक्षा भी प्रदान की जावेगी। लेकिन साथ-साथ ही वे लोगो से यह अपील भी करते हैं कि वे फिल्म देखने ही न जायंे। 
निश्चित रूप से कानून व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकारो का संवैधानिक दायित्व हैं, जैसा कि माननीय न्यायालयो ने बार-बार रेखांकित किया हैं। फिर भी, उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद करणी सेना व राजपूत समाज ने इस फिल्म को लेकर कानून व्यवस्था बनाये रखने के ‘‘हितार्थ’’ जनता कर्फ्यू लगाकर जनता से फिल्म न देखने की अपील की हैं। इस तरह कानून  व्यवस्था बनाये रखने में अपने सहयोग देने के कानूनी दायित्व का भले ही वे शब्दशः पालन कर रहे हो। परन्तु कानून का पालन करने का यर्थाथ मतलब न केवल उसमें लिखे गये प्रत्येक शब्द का अक्षरसः पालन करना हैं, बल्कि उसमें अन्तर्निहित ‘‘भावना’’ का भी उतनी ही दृढ़ता एवं सिद्धत से पालन करना होता हैं। तभी कानून का राज सही अर्थो में लागू हैं, ऐसा माना जा सकता हैं। उच्चतम न्यायालय ने समस्त पक्षो को सुनने के बाद यह आदेश पारित किया कि पूरे देश में बे रोक टोक फिल्म पद्मावत प्रदर्शित की जावे। इसका मतलब साफ यह हैं कि राज्य सरकारो को सिनेमाग्रहो व फिल्म वितरको को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करना और साथ ही प्रतिबंधात्मक कदम सहित कानून व शांति की हर हालत में व्यवस्था बनाये रखने के लिये जरूरी सभी उपाय करना आवश्यक है।ं लेकिन राज्य सरकारो ने न तो ऐसा कोई सार्थक कदम ही उठाया और न ही कोई ऐसी कार्यवाही ही की जिससे तात्कालिक पैदा होने वाले डर व तनाव के वातावरण से उन्मुक्त हुआ जा सके। 
फिल्म प्रदर्शन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान शांति व्यवस्था को भंग करना, तोड़फोड़ कर  हिंसा करना, अनर्गल, भड़कीले, उत्तेजित शब्दो का उद्घोष इत्यादि किया जाता रहा हैं। गुरूग्राम में स्कूल बस पर पथराव एक उदाहरण मात्र हैं। इस पर करणी सेना, राजपूत समाज का यह कथन कि उनकी आड़ में असामाजिक तत्वों के द्वारा हिंसा व शांति भंग की जा रही हैं। करणी सेना वास्तव में कानून में निहित उक्त मूल भावना को ही चूना लगा कर आंशिक रूप से अपने उद्श्यो में सफल सिद्ध होते दिख रही हैं। वह भी आंशिक नैतिकता के साथ, क्योकि संविधान द्वारा प्रदत्त उनके उस मौलिक अधिकार (जो उनकी भावना व आस्था की रक्षा करता हैं) पर चोट पहुंच रही हैं, जिसकी सुरक्षा की आड़/ऐवज में वे अपने उक्त कृत्यों को सही ठहराने का अर्धसफल प्रयास कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर देश के कुछ भागो में गणांे के बीच करणी सेना तंत्र के द्वारा जो ड़र का माहोल पैदा किया गया हैं, वह संवैधानिक भारत के 69 वे वर्ष में निश्चित रूप से तंत्र से सुशोभित गण के लिये अच्छा संकेत नहीं हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस फिल्म के प्रति क्रिया-प्रतिक्रिया भी राजनीति की भेट चढ़ गई हैं। इस फिल्म के बहाने समस्त पक्ष राजनीति करना चाहते हैं। 69 वे गणतंत्र की बेला में इस देश के नागरिको (चूँकि चुप रहना भी शांत भागीदारी मानी जाती हैं) राजपूतो व न्यायालय के एक के बाद एक उठाये गये कदमो को नमन? न्यायालयो से यह उम्मीद की जाती हैं कि वे न केवल आदेश पारित करे, बल्कि पूर्णरूप से आदेश को पूर्ण भावनाओं के साथ ही शीघ्र उन्हे उसी प्रकार लागू भी करवाये, जिस प्रकार टीएन शेसन ने पूर्व से ही लागू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधान को कठोर रूप से अंर्तनिहित मूल भावनाओं के साथ लागू करके लोगो को प्रथम बार यह एहसास करवाया कि चुनाव कम खर्चीले व निष्पक्ष हो सकते हैं। अन्यथा ‘‘पारित आदेश ‘‘न्यायालय की अवमानना’’ के समान ही होगा।   
अब बात फिल्म निर्माता व फिल्म की भी कर ले। जब फिल्म पद्मावती बनी तो निर्माता ने फिल्म प्रदर्शन के लिये प्रमाण पत्र हेतु सेंसर बोर्ड़ के पास भेजी। नियमानुसार फिल्म प्रदर्शन तारीख के निश्चित समयापूर्व सेंसर बोर्ड को नहीं दी गई। फिर फिल्म निर्माता द्वारा वह कालम को रिक्त छोड़ दिया था जिसमें यह स्पष्टीकरण होता कि फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर आधारित हैं अथवा काल्पनिक हैं। तत्पश्चात निर्माता द्वारा यह कहा गया कि यह फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर नहीं हैं, बल्कि यह फिल्म मोहम्मद जायशी कृत पद्मावत नाम के महाकाव्य पर आधारित हैं। इसके बावजूद अधिकांश इतिहास कार इसे सिर्फ कोरी कल्पना मानने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार स्थिति को और भी जटिल बनाने में फिल्म निर्माता के महायोगदान को नहीं नकारा जा सकता हैं। इसी कारण निर्माता द्वारा ऐतहासिक तथ्यों के साथ उक्त विवाद को तूल व बल देने में परिस्थिति जन्य अवसर मिल गया। फिल्म निर्माण के दौरान ही निर्माता द्वारा गंभीरता न बरतने के फलस्वरूप आपत्ति करने वाले व्यक्तियों व संगठनो के साथ चर्चा भी नहीं की गई। उसी समय फिल्म का प्रोमो उन्हे क्यों नहीं दिखाया गया? ये सब परिस्थितियाँ कहीं न कहीं फिल्म निर्माता को भी शक के घेरे में लाती हैं। 
फिल्म में चित्तौड़ के राजा राणा रतन सिंह की पत्नी व मेवाड़ की रानी पद्मावती (पद्मिनी) के जौहर व घूमर नृत्य पर राजपूत समाज को कड़ा ऐतराज हैं। निश्चित रूप से तत्समय 1600 से अधिक स्त्रियों के साथ रानी पद्मावती के जौहर व्रत ने राजपूतो के बीच आन-बान व गौरव रक्षा के लिये हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने के कारण उन्हे पूज्यमाता का दर्जा प्राप्त हुआ। लेकिन आज की परिस्थिति में क्या जौहर व्रत (सती प्रथा) को उचित ठहराया जा सकता हैं? सोशल मीडिया में कुछ लोगो का यह भी कथन हैं कि रानी पद्मावती को ‘‘जौहर व्रत’’करने के बजाय वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के समान रणक्षेत्र में जौहर करते हुये अपने प्राणो का त्याग कर वीरागना बनना चाहिये था।  
इन समस्त परिस्थितियो के बावजूद राजपूतो का इस सीमा तक के विरोध का तरीका उचित हैं क्या? ऐतहासिक तथ्यों के साथ फिल्मों द्वारा किये जा रहे खिलवाड़ की उक्त घटना पहली नहीं हैं। इसलिए अपना विरोध शांतिपूर्ण रूप से व्यक्त कर राजपूत समाज के कर्णधारो को अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेनी चाहिए थी। खासकर उस स्थिति में जब दो तीन राजपूतो को छोड़कर अन्य किसी ने भी फिल्म के प्रदर्शित होने के पूर्व फिल्म नहीं देखी थी। इस प्रकार का अंधा विरोध ‘‘अंधा’’ ही कहलायेगा। 69 वें गणतंत्र की पूर्व बेला पर पद्मावती-पद्मावत तक देश को सीमित कर देना क्या उचित हैं? इसका जवाब समस्त पक्ष को देश हित में देना जरूरी होगा।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

’’वैधानिकता’’ व ’’नैतिकता’’ के बीच उलझे ‘‘आप’’ के अयोग्य 20 विधायक!

अंततः महामहिम राष्ट्रपति ने आप के 20 विधायको को लाभ के पद पर होने के कारण उत्पन्न हुई कानूनी अयोग्यता की चुनाव आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर लिया। अतः उच्च न्यायालय में सोमवार को सुनवाई होने वाली आप के विधायको की याचिका भी शून्य हो गई। इसीलिये उनके द्वारा उक्त याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस ले ली गई। युवा वकील प्रशांत पटेल द्वारा वर्ष 2015 में राष्ट्रपति के समक्ष 21 विधायको के विरूद्ध संसदीय सचिव के पद पर नियुक्ति के कारण लाभ के पद पर होने के कारण उन्हे अयोग्य घोषित करने के लिए याचिका लगाई गई थी, जिसे उन्होने चुनाव आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दिया था। मामला लगभग दो वर्षो से लम्बित था। लेकिन अचानक रिटायरमेंट के पांच दिन पूर्व आयोग ने उक्त याचिका पर निर्णय कर, अयोग्य घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी जो केजरीवाल की नैतिकता एवं वैधानिकता के बीच झूल गई। 
‘आप’ के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा इन विधायको को संसदीय सचिव के लाभ के पद पर नियुक्त किया गया था तब उनके इस कृत्य को गैर कानूनी माना जाकर इसकी उपरोक्तानुसार शिकायत की गई थी। तभी अरविंद केजरीवाल को यह लगा था कि संभवतः संसदीय सचिव लाभ का पद होने के कारण ये नियुक्तियाँ अवैधानिक हो सकती हैं। अतः उनके द्वारा संसदीय सचिव के पद को लाभ की श्रेणी से हटाकर छूट की सीमा में लाने हेतु विधेयक विधानसभा में पारित किया गया (जैसे कि मध्यप्रदेश सहित अन्य कई विधानसभाओं में प्रस्ताव लाकर कानून बनाया गया था।) लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उस विधेयक को वापिस कर दिये जाने के कारण वह कानून का रूप नहीं ले सका। यद्यपि कानूनन् केजरीवाल को एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का अधिकार हैं। लेकिन यह अपने में एक तथ्य हैं कि कई राज्यो की विधानसभा में संसदीय सचिव के लाभ के पद की अयोग्यता को कानून बना कर हटा दिया गया हैं। 
केन्द्रीय सरकार ने भी इस तरह के कई लाभ के पदो को अयोग्यता की सीमा से बाहर लाकर संसद सदस्यों की सदस्यता को अछ्ण बनाये रखा। इसी कारण से सोनिया गांधी संसद सदस्य के साथ लाभ के पद भी धारण किये हुई थी, निर्णय के पूर्व ही संसद सदस्ता से इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़कर जीती। जया बच्चन को भी इसी कारण से इस्तीफा देना पड़ा था। यहां पर जो लोग अरविंद की नैतिकता की बात कर रहे हैं व उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रहे हैं वे लोग यह भूल जा रहे हैं कि वे स्वयं गैर नैतिक रहते हुये विधायिका के बहुमत का दुरूपयोग कर कानूनी अयोग्यता को छूट की सीमा में कानून बनाकर लाकर उन्होने उसे वैधानिक बनाया। अतः क्या राजनैतिक लाभ व सत्ता बनाये रखने के लिये अयोग्यता को वैधानिक बनाने के तौर तरीको को नैतिक कहा जा सकता हैं, एक बड़ा प्रश्न यह भी हैं? लेकिन इससे भी बड़़ा प्रश्न केजरीवाल की नैतिकता की वह लक्ष्मण रेखा हैं जो उन्होनेे स्वयं उस अन्ना आंदोलन के दौरान आगे बढ़ कर खींची थी, और वह बड़ी नैतिकता किसी मजबूरी में स्वीकारी हुई नहीं थी, बल्कि वैकल्पिक राजनीति की तलाश में सही जन-जन-नेता बनने के प्रयास में, अन्ना के पेड़ की छाया तले अरविंद केजरीवाल ने खुले दिल से उक्त महती नैतिकता स्वीकार कर नई राजनैतिक पार्टी को जन्म देकर, नई वैकल्पिक व्यवस्था को आगे बढाने का प्रयास पूर्ण नैतिकता के साथ किया था। तभी तो उन्होने दो वर्षो के भीतर ही दिल्ली में 70 सीट में से 67 सीट जीत कर अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त कर ऐेतहासिक रूप से सत्ता प्राप्त की थी। आज वही केजरीवाल नैतिकता से परे कानून की दुहाई देकर चुनाव आयोग के सिफारिश पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं? कानून एवं प्राकृतिक न्याय के आधार पर उनकीे आपत्ति व आरोप सही हो सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा नैतिकता की गड़ी गई परिभाषा के आगे वह दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरती हैं।
ठीक इसी प्रकार जब उच्च न्यायालय में मामला सोमवार को सुनवाई हेतु लगा हुआ था, तब चुनाव आयोग की सिफारिश पर महामहिम द्वारा सुनवाई के पूर्व ही हस्ताक्षर करना कितना ‘‘नैतिक’’ हैं, यह प्रश्न भी स्वभाविक रूप से उठेगा ही। जब आप के विधायको ने महामहिम राष्ट्रपति से इस संबंध में मुलाकात का समय माँगा था, तब वे यह जानते हुये भी कि वे लोग चुनाव आयोग की इस अयोग्यता की सिफारिश के संबंध में ही मिलना चाहते हैं, उनसे मिलने के पूर्व ही महामहिम द्वारा सिफारिश को स्वीकार कर लेना भी कितना नैतिक कहा जा सकता हैं? चुनाव आयोग के वकील का उच्च न्यायालय के समझ यह कथन कि आयोग ने राष्ट्रपति को सिफारिश भेज दी हैं अथवा नहीं, यह जानकारी वे आयोग से नहीं ले सके हैं, क्योंकि कार्यालय बंद हो गया था, यह भी कितना नैतिक हैं, जबकि सार्वजनिक रूप से (पब्लिक डोमेन में) यह बात आ चुकी थी की चुनाव आयोग द्वारा अयोग्यता की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी जा चुकी हैं। मगर मुख्य चुनाव आयुक्त जो कि 5 दिन बाद रिटायर्ड होने वाले हैं के द्वारा लम्बित याचिका पर अचानक निर्णय दे देना भी कितना नैतिक हैं, प्रश्न यह भी हैं?
कांग्रेस व भाजपा का इस मुद्दे पर केजरीवाल से इस्तीफा मांगना कितना नैतिक हैं? जबकि कई प्रदेशों में उनकी स्वयं की सरकारो ने इन पदो को लाभ के पद से मुक्त करने के लिये कानून बना दिया था। इसलिये यह बात नैतिकता की नहीं, बल्कि कानूनी मुद्दा हैं। कम से कम भाजपा व कांग्रेस के लिये भी यह कानूनी मुद्दा होना चाहिये। निश्चित रूप से केजरीवाल के लिये भी  अपनी नैतिक गलती को नैतिकता पूर्व स्वीकार करके आत्मावलोकन करने का एक बड़ा अवसर हैं, क्योकि नैतिकता की यह सीमा उन्होने स्वयं ही आगे आकर लिखी थी, ओढी थी। कानूनी रूप से वे उक्त पद को कानूनी लाभ दिलाने में असफल हो गये थे। लेकिन यह हमारा ही देश हैं जहां नैतिकता लिये हुये कानून का राज सिर्फ दूसरो पर ही लागू किया जाता हैं स्वयं पर नहीं लेकिन ‘‘लाभ’’ स्वयं पर लागू किया जाता हैं दूसरो पर नहीं किया जाता हैं।  
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

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