बुधवार, 13 मार्च 2019

आखिर देश को क्या हो गया है।

‘‘पुलवामा’’ में हुई बड़ी वीभत्स आंतकी घटना में 40 सैनिकों के शहीद हो जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप पाकिस्तान में घुस कर बालाकोट में किये गये हवाई हमलों के द्वारा ‘‘जैश-ए-मोहम्मद’’के आंतकवादी कैम्प (प्रशिक्षण शिविर) को नष्ट करने के बाद सम्पूर्ण देश ने एक जुट होकर सेना व सरकार को बधाई दी थी। कांग्रेस सहित समस्त राजनैतिक पार्टियों ने सेना के पराक्रम व अदम्य साहस की प्रशंसा कर बधाईयाँ दी थी। एक स्वर से यह कहा गया कि हर हाल में पाकिस्तान को माकूल जवाब देने के लिये वे सेना, सरकार व देश के साथ खडे़ हुये हैं। कांग्रेस ने बधाई देने में यद्यपि थोड़ी सी कंजूसी अवश्य बरती। उन्होंने सेना को तो खुलकर बधाई दी, नमन किया, लेकिन सरकार के प्रति उतनी उदारता नहीं बरती (शायद चुनाव सिर पर है इसलिये)। यद्यपि संकट की इस घड़ी में कांग्रेस ने सरकार के साथ खड़ा होनें का वायदा अवश्य किया (जो बाद में मात्र ‘नाटक’ ही सिद्ध हुआ)। लेकिन कांग्रेस ने वैसी ही उदारता नहीं दिखाई, जैसी वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध के परिणाम स्वरूप बंग्लादेश बनने के समय अटल जी ने इंदिरा जी के प्रति दिखाई थी। तब भी सेना लड़ी थी और आज भी सेना ही ने बहादूरी दिखाई। यद्यपि दोनो वक्त आक्रमण (सेना भेजने) का निर्णय राजनैतिक नेतृत्व ने ही लिया था। इसलिये आज भी राजनैतिक नेतृत्व को वर्ष 1971 के समान बधाई दी जानी चाहिए थी। लेकिन सरकार के नेतृत्व को बधाई देने में कांग्रेस से यह एक चुक छोटी सी हुई। तथापि वह राजनैतिक दृष्टि से उठाया गया कदम कहा जाकर, उसे क्षम्य माना जा सकता है। तत्पश्चात कांग्रेस लगातार बड़ी-बड़ी चूक करती जा रही है, जबसे कांग्रेस के नेताओं में बालाकोट हवाई हमले की साक्ष्य मांगने की होड़ सी मची हुई है। धीरे-धीरे समस्त प्रमुख विपक्षी दल भी इसमें सुर से सुर मिलाते जा रहे हैं। हद तो तब हो गई जब, कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद ने पुलवामा व बालाकोट घटना को नरेन्द्र मोदी व इमरान खान के बीच मैच फिक्सिंग ही करार दे दिया। 
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि घटना के तत्काल बाद कांग्रेस ने किस बात के लिये सेना की प्रशंसा की थी व बधाई दी थी। साफ झलकता है, तत्समय आपने बालाकोट  हवाई हमले में एयर फोर्स के साहसी विंग कमांडर अभिनंदन के द्वारा मिग 21 से पाकिस्तान के एफ 16 को मार गिराये जाने के साथ-साथ बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आंतकी बेस को समाप्त करने पर सेना के अदम्य साहस को सराहा था। यदि ऐसा नहीं था, तो उसे नकारे अथवा बधाई का कारण  देश को बताएँ। दो दिन बाद ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस सहित समस्त विपक्ष ने रूख ही बदल दिया और वे उक्त हवाई हमले तथा उसमें हुए संहारण के न केवल साक्ष्य मांगने लगे, बल्कि घटना पर ही शक की उंगली उठाने लगे है। वे अपने बयानों से भारत में न केवल बयानवीर बने अपितु पाकिस्तानी मीडिया के जाने अनजाने हीरो बन गए। क्या यही देशभक्ति है? इसका उल्लेख मैनें पिछले हफ्ते लिखे अपने लेख में किया था, जिसकी कमी आज भी हम महसूस कर रहे हैं। 
अब सत्ताधारी व विपक्ष दोनांे पक्ष ‘‘सेना पर राजनीति करने के आरोप-प्रत्यारोप’’ परस्पर लगाए जा रहे हैं। जहां तक राजनीति करने की बात है, बेशक दोनों ही पक्ष पूरी क्षमता, ताकत व निर्लजता के साथ राजनीति कर रहे हैं। घटना का राजनीतिकरण करने में सबसे पहला कदम भाजपा की तरफ से ही उठाया गया हैं। जब कर्नाटक के पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने साफ शब्दो में कहा कि हवाई हमले से पार्टी को 25 में से 22 सीटों पर फायदा होगा। तत्पश्चात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि 250 से अधिक आतंकवादी मारे गये, (तब तक सेना व सरकार ने ऐसा कोई खुलासा नहीं किया था)। मोदी जी रैलियों में स्वयं कह रहे हैं कि पाताल से आंतकवादियों को खोद निकालेगें। लेकिन कब और कितने शहीद हो जाने के बाद? पता नहीं? न बताऐगें? क्योंकि राजनैतिक पार्टियों के सदस्य तो शहीदों में बिरले ही मिलेगें। अब मोदी जी भारत के बजाय ‘‘विजयी भारत’’ की जय के नारे लगवा रहे हैं। अभी कौन सी विजय मिल गई, जिस कारण विजयी भारत के नारे? यदि बालाकोट विजय है, तो उसके तत्काल बाद से लगातार हो रही सीमापार उल्लघंन एवं आंतकी घटनाएं व उनमें हुये शहीदांे व नागरिकों की मृत्यु को क्या कहना चाहेगें? यही सब घटना का विशुद्ध राजनीतिकरण है।    
सेना के तीनो अंगों के द्वारा संयुक्त प्रेसवार्ता करके एयर स्ट्राइक कार्यवाही की विस्तृत आवश्यक जानकारी दे दी गई। तत्पश्चात एयर चीफ मार्शल ने भी एयर स्ट्राइक की जानकारी दे दी। तब साक्ष्य मांगते रहने का क्या औचित्य रह जाता है, विशेषकर उस स्थिति में, जब कांग्रेस सेना के र्शोर्य-पराक्रम को लगातार स्वीकार करती आ रही है। ये ही तो राजनीति है। साफ है, बयानों के द्वारा सेना पर विश्वास परन्तु कार्यरूप में अविश्वास जता रहे हैं। यदि एयर स्ट्राईक की कार्यवाही की जानकारी पत्रकार वार्ता करके सरकार देती तो, आप शायद उसे स्वीकार ही नहीं करते। प्रश्नवाचक चिन्ह सहित प्रश्नों की बाैंछार लगा देते। यानी यहाँ पर तो सेना पर विश्वास जताने के बावजूद सेना (जिसने पत्रकार वार्ता में समस्त जानकारी आवश्यक साक्ष्य सहित प्रस्तुत की थी) के कथनों को ही नहीं माना जा रहा है।
फिर भी सेना पर राजनीति करने के तरीको में भाजपा व विपक्षी पार्टियों में जमीन-आसमान का अंतर हैं। सेना पर भाजपा ने आसमानी राजनीति अर्थात् ऊंचाई की राजनीति की हैं। क्योंकि  सेना का चुनावी दृष्टि से फायदा लेने के लिये ‘‘मुद्दे’’ का राजनीतिकरण करने के बावजूद, देश, देश हित और राष्ट्रवाद के साथ वह मजबूती से जनता के सामने खड़ी हुई दिख रही है। दूसरी ओर साक्ष्य मांगने हेतु जिस तरह की अमर्यादित भाषा कांग्रेस प्रयोग कर रही है, वह उनके देशभक्त भारतीय नागरिक होने पर ही संदेह पैदा करके स्वयं ही प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं। क्योंकि उनके बयानों से विश्व में भारत का पक्ष कमजोर होते जाता है, तथा पाकिस्तान उन बयानों को अपने मीडिया में सुखर््िाया बनाकर हमारी सेना व सरकार के दावे की विश्व पटल में हवा निकाल रहा है। जिस प्रकार रक्षा राज्यमंत्री वी.के.सिंह ने बी.एस.येदियुरप्पा के बयान से असहमति दिखाई है। ठीक वैसे ही कांग्रेस पार्टी के पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह के बयान से अवश्य सीख लेनी चाहिये, जहां उन्होंने कहा,‘‘एक मरे या 100 मरें यह साफ संदेश जोरदार तरीके से गया है कि भारत निर्दोष जवानों और नागरिकों की शहादत बेकार नहीं जाने देगा।’’ 
बी.एस.येदियुरप्पा से 22 सीटों के जीतने के बयान पर अवश्य प्रश्न किया जाना चाहिये। अमित शाह से इस बात पर प्रश्न किया जा सकता है कि सेना व सरकार द्वारा कोई आकड़ा नहीं देने के बावजूद, 250 संख्या की जानकारी उन्हें कहां से मिल गई। चुनावी रैलियों में शहीदों की फोटांे के उपयोग पर भी प्रश्न किया जा सकता है। खुफिया एजेंसी की विफलता पर भी प्रश्न उठाया जा सकता है। ‘‘उरी’’ के बाद ‘‘पुलवामा’’ क्यों व आगे क्या? इस विफलता पर भी प्रश्न उठाये जाने चाहिये। देशप्रेम व निष्ठा पर आंच आने दिए बिना कांग्रेस, भाजपा को इन सब प्रश्नों के साथ कटघरे में खड़ा करके बेहतर सफल राजनीति कर सकती थी। परन्तु उक्त आंतकी घटना को ‘‘दुर्घटना’’ कहना, हवाई हमलों को ‘‘जंगल में ब्लास्ट कर’’, पेड़ व पहाडों से बदला’’ अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के हवाले से घटना के ‘‘वजूद’’ पर ही शक जाहिर करना, यह सब निश्चित रूप से देश हितेषी व परिपक्व राजनीति का घोतक नहीं है। क्योंकि इसमें नीति ही नहीं है। सिर्फ और सिर्फ दिमागी फितूर राजनैतिक दिवालिया पन व खोखले पन की निशानी भर ही हैं। ऐसे व्यवहार का बड़ा खामियाजा आने वाले लोकसभा चुनाव में निश्चित ही कांग्रेस को भुगतना पड़ेगा व पड़ना भी चाहिये।
क्या हमारे देश में देश की सुरक्षा, मान-सम्मान और देश हित से जुड़े हुये मुद्दे को अच्छुण्ण रखते हुये देश को बल प्रदान करने हेतु समस्त राजनैतिक दल देश के लिए खडे़ नहीं हो सकते हैं? जैसे ऐसी ही विकट विपरीत परिस्थितियों में अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में खड़े हो जाते हैं। बालाकोट हवाई हमले की घटना के विषय में सेना पर विश्वास करने के बाद, सबूत के नाम पर सरकार को कटघरे में दर्शाने के उद्देश्य से सेना पर ही अपरोक्ष रूप से अविश्वास जताने का आभास परिलक्षित कराने से कांग्रेस को कौन सा राजनैतिक फायदा होने वाला है, प्रश्न यह हैं? लेकिन ऐसे अवांछित व्यवहार से विश्व में हमारी किरकिरी अवश्य हो रही है। ऐसा महसूस होता है कि कांग्रेस का बौद्धिक स्तर निम्नतर से निम्नतम पर पहुंचता जा रहा हैं। हम किसी भी घटना का राजनीतिकरण राजनैतिक दृष्टि से फायदा लेने की दृष्टि से ही करते है। तब यह बात बिल्कुल समझ से परे है कि उक्त बयानों से प्रभावित होकर कौन सा वर्ग, समाज, नागरिकगण जो निरपेक्ष मतदाता है, कांग्रेस को वोट देने की सोच की ओर पलटेगा। 
इसीलिये शीर्षक में मैने ‘‘देश में क्या हो रहा है’’ के बदले ‘‘देश को क्या हो गया हैं’, लिखना ज्यादा सामयिक समझा क्योकि दोनों मेें महत्वपूर्ण अंतर है जिसको समझना आवश्यक है जिसके लिये फिर कभी।  

सोमवार, 4 मार्च 2019

देशप्रेम-राष्ट्रभक्ति-राष्ट्रवाद को ढूढ़ता मेरा प्यारा देश!

इस लेख का ‘‘शीर्षक’’ देख कर बहुत से लोगों को हैरानी अवश्य होगी और आश्चर्य होना भी चाहिये। पर बहुत से लोग इस पर आखें भी तरेर सकते है। यदि वास्तव में ऐसा हो सका तो, मेरे लेख लिखने का उद्देश्य भी सफल हो जायेगा। 
एक नागरिक, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा एक भारतीय पैदाईशी ही स्वभावगतः देशप्रेमी होता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार उसे जन्मते ही प्राप्त हो जाते है, और संवैधानिक कर्त्तव्य का बोध भी उसे हो जाता है। ऐसी सामान्य कानूनी मान्यता है। परन्तु जब हम इन गुणों की जमीनी वास्तविकता को धरातल पर परखतेे है और उनकी वास्तविक स्थिति को मापने का प्रयास करते है, तो न केवल हम अधिकतर जगह पर विफल होते हैं, वरण उसमे मैं अपने आप को भी असफल पाता हूँ। इसके लिए मैं स्वयं को दूसरो की तुलना में कुछ ज्यादा ही दोषी मानता हँू। एक देश भक्त नागारिक के कर्त्तव्यों का पूर्णतः पालन करने में मैं स्वयं भी असफल रहा हूँं। वास्तव में यह हमारा एक आम परिवेश है, जिसका मैं भी एक भाग भर हूँ। 
‘‘पुलवामा’’ आतंकी घटना के बाद से पूरे राष्ट्र में, समस्त प्रिंट, इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया से लेकर विभिन्न संगठनों, राजनैतिक पार्टियों एवं स्वयंसिद्ध-वीर नागरिकों के एक से बढ़कर एक बयानों की बयार सी आ गई है। पाकिस्तान से आक्रमक आक्रमण (युद्ध) कर मटिया-मेट, नष्ट-नाबूद करने से लेकर समाप्त कर देने तक के ओजस्वी बयान देकर स्वयं को सबसे बड़ा देश प्रेमी सिद्ध कर स्वयंभू देशभक्त होने का प्रमाण पत्र ले रहे हैं। यदि आप उन बयानों में ‘शब्दो’ का चयन देखें व उन शब्दों को थोड़ा भी ध्यानपूर्वक पढं़े, तो आपको उनमें मात्र खोखला पन सतही पन, व विरोधाभाष ही महसूस होगा। मात्र वे वीर रस की अभिव्यक्ति भर नजर आवेंगे। 
कुछ जुमले आगे उद्वरित हैं जैसे ‘‘पाकिस्तान झुक गया है’’, ‘‘अंतिम सासें गिन रहा है’’, ‘‘धबराया हुआ है, ‘‘घुटने टेक दिये है‘‘, ‘‘झुक गया है’’, ‘‘ड़र के मारे रात भर सोया नहीं है’’ ‘‘पाकिस्तान को समझ में आई उसकी औकात’’, ‘उसका पानी बंद कर दिया है’’, ‘‘भूखा मरेगा’’, ‘‘भीख मांगना पाकिस्तान की फितरत है’’, ‘‘शांति की भीख लिए गिडगिडा रहा है’’, ‘‘बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए’’, ‘‘हर मोर्चो पर पीटा है-ठोका है’’ इत्यादि-इत्यादि। हमारे देश के शांति प्रिय नागरिक भी वीर जवानों से भी ज्यादा, युद्ध करने की अनचाही, अनमांगी, साहसिक सलाह सरकार को दे रहे है। एक उदाहरण ‘‘इमरान खान बार-बार भारत से बातचीत का अनुरोध कर रहा है व शांति की भीख के लिये गिड़गिड़ा रहा है’’, ऐसा अधिकांश मीडिया उल्लेख कर रहे हैं। साथ ही साथ बार-बार वे यह भी दिखा रहे हैं कि ‘‘पाकिस्तान माननें को तैयार नहीं’’,‘‘पाकिस्तान नहीं सुधरा’’, ‘‘पाकिस्तान ने फिर सीमा का उल्लंघन किया है’’ एलओसी स्थित बालाकोट पर हवाई हमले के बाद गांवों में दहशत हैं। एक हमले के अंदर 60 से भी ज्यादा बार सीमा का उल्ल्घंन किया गया है जिसमें 15 से अधिक सैनिक व सिविलियन शहीद हुये हैं। समस्त मीडिया द्वारा दिये गये इतने सब शीर्षकों/अंलकारों से महिमा मंडित करने के बावजूद पाकिस्तान, सीमा का उल्ल्घंन करने का साहस/दूःसाहस लगातार कर रहा है तो, इस तरह की वाणी/कथनांे का तीर चलाकर क्या मीडिया हाऊसेस भी पाकिस्तान की सीमा पार उल्लघंन की कार्यवाहियों को अनजाने में ही सम्मान व ऊंचाई प्रदान नहीं कर रहे है? क्योंकि इन विरोधाभाषी कथनों का यही अर्थ निकलता है कि एक कमजोर घबराया हुआ व घुटने टेकने वाला मजबूर पाकिस्तान बावजूद लगातार आंतकी कार्यवाही कर हमारे सैनिकों व सिविलियनों को मार रहा है, जबकि एक मजबूत भारत बालाकोट पर हवाई हमले करने के बावजूद आंतकी घटनाओं को रोकने में आवश्यक कार्यवाही करने में असफल हो रहा है। शब्दों का खोखला पन भर ये ही है। भीख शब्द के उपयोग करने की यहाँ क्या आवश्यकता एवं औचित्य है?   
आखिर; क्या देश भक्ति, सिर्फ हमारे भाषण, लेखन, कथन, बयान और टीवी डिबेट तक ही सीमित होकर रह जावेगी, प्रश्न यह है? इसका कदापि यह मतलब भी नहीं है कि देश भक्ति सिद्ध करने के लिए हर नागरिक को सीमा पर जाकर बंदूक चलानी पढे़गी, बम फेकना पडे़गा। ‘‘देश भक्ति’’ का यथार्थ मतलब है, वर्तमान युद्ध की आशंका लिये हुई उत्पन्न स्थिति में, प्रत्येक नागरिक जो जहां कहीं जिस भी क्षेत्र में कार्यरत है, वह अपनी सम्पूर्ण ताकत, क्षमता, बुद्धि व भावनाओं के साथ देश हित के लिए वह वे सभी कार्य करे, जो उसका वैधानिक, संवैधानिक, मानवीय व नैतिक, कर्त्तव्य एवं दायित्व है। साथ ही सीमा पर लड़ने वाले हमारे जांबाज वीर सैनिकों के लिए वह कुछ ऐसा कर गुजरें, जिससे बहादुर वीर सैनिकों को यह महसूस हो कि भले ही वे सीमा पर तैनात है, लेकिन वे अकेले नहीं है। सम्पूर्ण समाज, स्थानीय लोगों सहित पूरा देश एकजुट होकर उनके साथ उनकेे परिवार को सहारा देने के लिए खडे़ है। यही वास्तविक देश भक्ति हैं। देश भक्ति को हम स्वयं अपने बैरो मीटर में नापें। इसे हम जितना सोचते जायेगंे, देश भक्ति की तीव्रता की भावना उतनी ही प्रबल होती जायेगीं। 
यहाँ एक उदाहरण देना चाहता हँू। हमारे देश में आज भी कई जगह ‘‘भारत मुर्दाबाद’’ व ’‘पाकिस्तान जिंदाबाद’’ के नारे लगाए जाते हैं। एक देश भक्त राष्ट्र में यह कैसे संभव हैं? कहीं न कहीं, जहां हमारी राष्ट्र भक्ति के प्रति कमजोरी उजागर होती है, वहीं पर देश विरोधी-देशद्रोही ताकतंे सिर उठाकर ऐसी हिमाकत कर जाती हैं। उन्हे रोकनंे के लिए हम न तो उनमें कोई ड़र व खौंफ पैदा कर पाते है, और न ही ऐसी घटना घटित हो जाने के बावजूद भी उनके विरूद्ध कोई कड़ी कार्यवाही करते है। तब हमारा देशप्रेम वैसा नहीं उमड़ता है कि हम उनको पकड़कर कानून के शिकंजे में बंद करवाएँ, उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करे। उनका सामाजिक बहिष्कार करे। शासन व प्रशासन भी ऐसी दशा में कई बार उदासीन ही रहता है, जो उनके देशप्रेम (की मात्रा) को इंगित करने का घोतक हैं। 
कैड़ल मार्च करना, ‘‘जय भारत’’ के नारे लगाना ‘‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’’ के नारे लगाना ये सब सिर्फ बयान बाजी ही कहलायेगी। इतने को हीे देशप्रेम मानना खोखला देश प्रेम होगा। देश प्रेम की दो स्थितियाँ हैं। एक वह, जो दुश्मन देश से पोषित व संचालित से बाहरी आतंकी शक्तियाँ से उत्पन्न देश की सुरक्षा व आत्मसम्मान को धक्का पहुचानंे के प्रयास का विरोध करते हैं। दूसरा, देश के भीतर की आंतरिक स्थिति जहां देश की संरचना को नुकसान पहुचाने वालों के विरूद्ध की जाने वाली कार्यवाही के प्रति हमारा राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। अभी मैं यहां बाहरी घटनाओं से निपटने के लिए मौजूद आवश्यक देशप्रेम की चर्चा कर रहा हूँ। देशप्रेम का एक उदाहरण और देखिये, अरूण जेटली का यह बयान ‘‘जिस तरह अलकायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर मार गिराया, हम भी ऐसी कार्यवाही कर सकते है’’। यह ऊपरी देशप्रेम है। यह बयान क्या आज ही आना चाहिये था? पिछले पांच सालो में पाकिस्तान द्वारा पोषित पुलवामा जैसी कई घटनाएं आंतकियों  द्वारा घटित की जा चुकी है। इन सबकी विस्तृत जानकारी हम विश्व को कई बार दे चुके है। तब उक्त बयान देने की बजाए, बिन लादेन की तरह हाफिज सईद व मसूद अजहर को पाकिस्तान के भीतर घुसकर मारने से उन्हे किसने रोक रखा था? देशप्रेम की वास्तविक झलक तब ही दिखेगी। एक उदाहरण से इस अंतर को समझिये ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘लाओं’’ और ‘‘अभिनंदन वापस ‘‘करो’’। यही अंतर हमारी देशभक्ति में भी है।  
अभी अभी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान ने वापिस किया है। पाकिस्तान को समझौते के तहत युद्धबंदी (पीओडब्लू) विंग कमांडर ‘‘अभिनंदन’’ को भारत को वापस करना ही था। पूर्व में भी कारगिल युद्ध के समय युद्धबंदी लेफ्टिनेंट कमबमपति नचिकेता को कारगिल युद्ध जारी रहने के बावजूद वापिस किया गया था। लेकिन यह अंतर्राष्ट्रीय कानून होने के बावजूद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय कानून को कितना मानता है, जो उसके द्वारा की जा रही आंतकवादी घटनाओं के घटने से स्वयं सिद्ध है। इसीलिए भारत सरकार व भारतीय सेना को इस बात के लिए धन्यवाद अवश्य ही दिया जाना चाहिए, जिन्होने अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर पाकिस्तान को विश्व पटल पर अलग-थलग करने के साथ ही सेना के द्वारा बनाये गये जबरदस्त दबाव के फलस्वरूप, पाकिस्तान को जिनेवा संधि (समझौता) को मानकर (विंग कमांडर अभिनंदन को वापिस भेजने की) कार्यवाही करने के लिए बाध्य होना पड़ा हैं। यह हमारी एक बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक सफलता व सैनिक बलों के जबरदस्त दबाव की जीत है। यहा एक कोतूहल भी पैदा होता है। जब हमारी सरकार व रक्षामंत्री यह मानते है कि जिनेवा समझौते के तहत युद्धबंदी ‘‘अभिनंदन’’ को पाकिस्तान द्वारा भारत को हर हालत में सौपना ही था तो, इसका क्या यह मतलब नहीं निकलता है कि भारत पाकिस्तान के विरूद्ध युद्ध छिड़ गया है? तभी तो ‘अभिनंदन’ युद्धबंदी कहलायेगे व जिनेवा संधि लागू होगी। 
युद्ध की वर्तमान आंशका की स्थिति में हममे से कितने नागरिकों ने शहीद परिवारों को किसी भी तरह का सहयोग पहंुचाया है, या व्यक्तिगत सांत्वना दी है, या अभिनेता अक्षय कुमार के सुझाव पर देश में खोले गये शहीदो की सहायता के लिये ‘‘आर्मी वेलफेयर फंड/बैटल केजुअल्टी फंड’’ में अपना अंशदान/सहायता राशी जमाकर अपने देशभक्त होने का परिचय दिया है? जब हम किसी राजनैतिक दल या सामाजिक संगठन के आव्हान पर अपने संसाधन से स्वयं के खर्च पर भोपाल-दिल्ली चले जाते है, तो क्या हम इन शहीद परिवारों के दुख में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर उन्हे सांत्वना देकर उनके परिवार के आत्मबल को बनाये रखने में सहयोग प्रदान कर देश प्रेमी होने का उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सकते है? ऐसे जुनून से भरी देशभक्ति की ही वर्तमान में सख्त आवश्यकता है। इन्ही भावनाओं को उभारने का प्रयास इस लेख का उद्देश्य हैं।
हमारे देश में ही शासन व प्रशासन की देशभक्ति का आलम यह है कि अलगाँवादी व्यक्तियों   जिन्हे स्वयं सरकार अलगाँवादी कहकर संबोधित करती है, उन्हे न केवल शासकीय सुरक्षा कराई जाती है, बल्कि लगातार करोडांे रूपया उनकी सुरक्षा व सुविधा पर खर्च होते है (यद्यपि अभी हाल में सरकार ने कुछ अलगाँवादी व्यक्तियों की सुविधाओं को समाप्त भी किया हैं, जो स्वागत योग्य है)। कश्मीर को स्वतत्रंता दिलाकर भारत को तोड़ने वाले अलगाँवादी व्यक्तियों की भारतीय नागरिकता समाप्त कर उनको जेल के सलाखों के भीतर क्यों नहीं डाला जाता है? ये सब अवांछित सुविधाएँ हमारी देशभक्ति की परिभाषा में ही संभव है, विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं।
आज जब अनवरत हो रही आंतकवादी घटनाओं के साथ पाकिस्तान बातचीत का राग अलाप कर विश्व को अंधेरे में रखने का प्रयास कर सकता है। तब प्रत्येक घटित आंतकवादी घटनाओं के बदले स्वरूप प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही करने की बजाए हम लगातार आगे होकर आक्रमण करते रहने के साथ बातचीत की पेशकश कर पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने में क्यों परहेज कर रहे है? (क्योंकि सरकार स्वयं यह कह रही है कि पुलवामा घटना के बाद जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट स्थित आंतकी बेस को समाप्त करने के लिये किया गया हवाई हमला हमारा मिलिट्री ऑपरेशन नहीं हैं) देश के जनमानस के जेहन में आज का यक्ष (सबसे बड़ा) प्रश्न यही हैं, जिसे सरकार को असली जामा पहनाना हैं।       

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