शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

2019 के लोकसभा चुनाव केे बाद ‘‘एनडीए’’ के प्रधानमंत्री क्या नितिन गडकरी होगें?

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आरएसएस के करीबी, कॉर्पोरेट और व्यापार जगत के चहेते और केन्द्र की मोदी सरकार के नियत अवधि में अपेक्षित परिणाम देने वाले सड़क परिवहन, जहाज रानी व गंगा सफाई विभाग के मंत्री नितिन गडकरी केे पिछले कुछ समय से जो बयान आ रहे है वे निश्चित रूप से सामान्य से हट कर रहे हैं। गडकरी के मन की बात की कुछ बानगिया निम्नानुसार हैंः-
पहला 4 अगस्त 2018 के ‘‘आरक्षण देकर क्या होगा नौकरियां ही नहीं है’’। दूसरा अक्टूबर 2018 में ‘‘भरोसा नहीं था जीतेगें, तो बडे़ वादे किए, लेकिन जीत गए’’। तीसरा 23 दिसम्बर 2018 को एक कार्यक्रम में उन्होने कहा, ‘‘यदि मैं पार्टी का अध्यक्ष हंू और मेरे सांसद और विधायक अच्छा नहीं करते है, तो कौन जिम्मेदार होगा’’? मुझे नेहरू के भाषण पसंद हैं, कहते हुये उन्होने कहा कुछ ‘‘सिस्टम को सुधारने के लिए दूसरे की तरफ उंगली क्यों करते हो, अपनी तरफ क्यों नहीं करते हो। जवाहर लाल नेहरू कहते थे ‘‘इंडिया इज़ नॉट ए नेशन. इट इज़ ए पॉपुलेशन, इस देश का हर व्यक्ति देश के लिए प्रश्न है, समस्या हैं, तो मैं इतना तो कर ही सकता हूँ कि मैं स्वयं देश के सामने समस्या नहीं बनूंगा’’। तीन विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान नितिन गडकरी ने कहा, सफलता के कई दावेदार होते है, लेकिन विफलता में कोई साथ नहीं होता। ‘‘सफलता का श्रेय लेने के लिए लोगों में होड़ रहती है, लेकिन विफलता को कोई स्वीकार नहीं करना चाहता, सब दूसरे की तरफ उंगली दिखाने लगते हैं। नेतृत्व को हार व विफलता की भी जिम्मेदारी स्वीकार करने चाहिए’’। एक टीवी कार्यक्रम को दिये साक्षात्कार में गडकरी ने कहा ‘‘हमारे पास इतने  नेता हैं, और हमंें उनके सामने बोलना पसंद है, इसलिए हमें उन्हे कुछ काम देना हैं। उन्होंने एक फिल्म के सीन का जिक्र करते हुए कहा कि ‘‘कुछ लोगों के मुंह में कपड़ा डाल कर मुंह बंद करने की जरूरत है’’। अभी हाल ही मंे यह बयान आया है कि सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, पर दिखाए हुए सपने अगर पूरे नहीं किए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है, इसलिए सपने वही दिखाओं जो पूरे हो सकें गडकरी ने कहा कि मैं सपने दिखाने वाले में से नहीं हूं मैं जो बोलता हूं वो 100 फीसदी डंके की चोट पर पूरा करता हूं। ये समस्त बयान निश्चित रूप से भाजपा की संस्कृति से न तो मेल खाते है और न ही भाजपा की आंतरिक कार्य पद्धति में सामान्य या असामान्य रूप से ंसंभव होते हैं। मतलब साफ है, संघ प्रमुख को विश्वास में लिये बिना या उनकी मूक सहमति या इशारों के बगैर ऐसे बयान संभव नहीं है। 
याद कीजिए भाजपा की कार्यप्रणाली जनसंघ के जमाने से जहां स्थापित पार्टी लाईन के बाहर जाकर जिसने भी कोई प्रश्न वाचक चिन्ह लगाया है, नेतृत्व पर उंगली उठाई है या नीतियों अथवा नीतिगत फैंसलों पर प्रश्न किया है उन्हे या तो पार्टी के बाहर ही कर दिया गया या उनके पर कतर दिये गये या (मार्गदर्शक मंडल बनाकर) उन्हे एक कोने में बैठा दिया गया। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष पीताम्बरा दास, बलराज मधोक से लेकर लालकृष्ण आडवानी तक, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुश्री उमा भारती आदि ऐसे अनेक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने है। इस वास्तविकता के बावजूद नितिन गडकरी ने जो कुछ भी विभिन्न अवसरो पर कहने की हिम्मत की, वह सत्यता है। लेकिन  भाजपा के आज के राजनैतिक परिवेश में कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितने ही उच्च ओहदे पर क्यों न हो, आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बिना ऐसा (दुः)साहसी कदम नहीं उठा सकता।  इसीलिए ऐसा भासित होता है कि भविष्य की स्थिति का आकलन कर 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद उत्पन्न होने वाली आशंका पूर्ण (आशा पूर्ण नहीं) स्थिति का मुकाबला करने के लिए नितिन गडकरी को आगे कर उन्हे एनडीए के प्रधानमंत्री पद की ओर अग्रेसित किया जा रहा है। इसका स्वागत भी किया जाना चाहिये। भविष्य के दुष्परिणाम की आशंकाओं को महसूस /स्वीकार करके राजनीति में जब योजना बद्ध दूर-दृष्टि की नीति अपनाई जाती है, तभी उस विपरीत स्थिति से सफलतापूर्वक निपटा जा सकता हैं। संभवतः संघ की इसी मंशा के अनुरूप नितिन गडकरी के उक्त बयान आये हों।
उक्त सच्चाई को मानते हुये ही शायद कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा गडकरी जी के बयान पर मैं एक हिन्दी की कहावत याद कराना चाहता हूं ‘‘कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना’’ याने उनकी निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहती है, और निशाने पर प्रधानमंत्री हैं।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

‘‘कुंभ’’ ‘‘महाकुंभ’’ और ‘‘अर्धकुंभ’’ में क्या कोई अंतर हैं?


प्रयागराज (इलाहबाद) में मकर संक्र्राति से ‘‘अर्धकुंभ’’ प्रारंभ हुआ है। लेकिन इस अर्धकुंभ को केन्द्रीय सरकार से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार व समस्त मीडिया चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक  इसे कुंभ या महा!कुंभ कहकर महिमा-मंडित कर रहे हैं। इस ‘‘कुंभ’’ के जबरदस्त प्रचार-प्रसार के कारण ही मुझे भी यह शक हुआ कि यह 6 साल में आने वाला अर्धकुंभ है, या 12 साल में आने वाला पूर्ण कुंभ है। लेख लिखते समय सामने बैठे व्यक्ति राकेश से भी मैने पूछा तो उसने भी यही जवाब दिया कि यह कुंभ है। निश्चित रूप से यह जबरदस्त प्रचार-प्रसार के परिणाम का ही साक्ष्य है।   
    कुंभक्या है? कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभका अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रहे थे तब अमृत की कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में छलक गई थीं। जहां- जहां ये बूंदें गिरी थी उन स्थानों पर तब से ही कुंभ का आयोजन होता आया है। उन तीन नदियों के नाम गंगा, गोदावरी, और क्षिप्रा है। कुछ इतिहास कार इसे 850 साल से ज्यादा पुराना मानते हुये आदि शंकराचार्य द्वारा इसकी शुरूवात किया जाना मानते है। कुछ दस्तावेज इसे 525 बी.सी. में शुरू होना मानते है। वास्तव में कुंभ मेलों का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है। इन मेलों का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री व्हेनसांग के लेख से मिलता है, जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन  के शासन में प्रसंगवश इन कुंभ मेलों के होने का वर्णन किया गया है।        कुंभ मेलों का आयोजन चार जगहों पर होता हैः-हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन।  उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है। इसके अलावा प्रति 6 वर्ष के अंतराल पर केवल दो स्थान प्रयाग और हरिद्वार में अर्धकुंभ  होता है। चूँकि प्रयाग में पिछला अर्धकुंभ वर्ष 2007 में हुआ था अतः वर्ष 2013 में हरिद्वार के बाद अब प्रयाग में अर्धकुंभ की बारी है।
    अर्धकुंभ क्या है? अर्ध का अर्थ है आधा! हरिद्ववार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है।  इसमे कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अर्धकुंभ की तैयारी में समस्त साधन-संसाधन झौंक दिये व आवश्यक बजट की उपलब्धता भी कराई है। पवित्र स्नानटैंट हाउस से लेकर ठहरने खाने-पीने, पर्यावरण, शौचालय, स्वच्छता से स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता तथा भारतीय संस्कृति की विरासत को दिखाने की प्रर्दशनी सांस्कृतिक नाटक, इत्यादि समस्त आवश्यक कार्यो की वृहत्तम स्तर पर जो सर्वोत्तम व्यवस्था विराट फैले कुंभ मेला क्षेत्र में की गई है, वह न केवल सर्वश्रेष्ठ व सराहनीय है, बल्कि अभी तक की उच्चतम व्यवस्था है। इस उच्च व्यवस्था ने 4 वर्ष पूर्व हमारे उज्जैन में हुये सिंहस्थ कुंभ की व्यवस्था को भी पीछे कर दिया है। इसलिए यदि इसे महाकुंभ का नाम दिया जा रहा है तो अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती। लेकिन इस अर्धकुंभ को ही (जो एक वास्तविकता है) महाकुंभ कहा जाता तो बेहतर होता। इसे कुंभ प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं थी।
  कही वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुये तो इसे कुंभके रूप में महिमा मंडित तो नहीं किया जा रहा है? वैसे यह भी जानना चाहिए कि ‘‘अर्धकुंभ’’ ‘‘कुंभ’’ का फल (प्रसाद) क्या एक समान ही है? यह भी पूछा जाना चाहिए कि 2013 में इलाहबाद (प्रयागराज) हुये कुंभ के 6 वर्ष बाद होने वाले अर्धकुंभ को क्या समाप्त कर दिया गया है? (यदि यह कुंभ है तो) इस ‘‘कुंभ’’ में उत्तर प्रदेश कैबिनेट की बैठक भी हो रही है, जो इस बात की परिचायक है कि यह ‘‘धार्मिक अर्धकुंभ’’ से ज्यादा यह एक ‘‘राजनैतिक महाकुंभ’’ है। इस महाकुंभ में भाग लेने वाले किसी भी संत, नागा-साधुओं ने अर्धकुंभ की जगह ‘‘कुंभ’’ प्रचारित करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई हैं। वास्तविकता को स्वीकारते हुये उसे अर्धकुंभकहने से क्या उसकी भव्यता में कोई कालाचिन्ह लग जाता? हम इस वास्तविकता की सत्यता को स्वीकार क्यों नहीं कर सकें यह प्रश्न समझ से परे है। मैं उत्तर प्रदेश सरकार को इस ‘‘अर्धकुंभ’’ की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था के लिए बधाई देते हुये यह अनुरोध जरूर करना चाहँूगा कि वे वास्तविकता को स्वीकार करते हुये उसके वास्तविक नाम ‘‘अर्धकुंभ’’ से ही उसका समापन कर गरिमा पूर्वक इस तथ्य को शालीनता से स्वीकार करें। 


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