गुरुवार, 11 जुलाई 2024

‘मध्य प्रदेश! अजब-गजब प्रदेश का अजीबोगरीब शपथ ग्रहण!’


‘‘लोकतांत्रिक अजूबा।’’

वर्ष 1990 से विजयपुर विधानसभा से छह बार कांग्रेस पार्टी से बने विधायक और दो बार लोकसभा तथा दो बार विधानसभा का चुनाव लड़कर हार चुके ग्वालियर-चंबल संभाग के कांग्रेस के कद्दावर नेता राम निवास रावत मध्य प्रदेश के ही नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक राजनीति के ‘‘ऐतिहासिक महापुरुष’’ बन गये हैं।  आज के युग में हर व्यक्ति के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में कुछ भी अजूबा होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। शायद इसीलिए ‘‘अजूबा’’ होने के बाद भी ‘‘आश्चर्य’’ नहीं कहलाता है, क्योंकि हमारा मन, बुद्धि उस अजूबे के प्रति कुछ न कुछ तैयार अवश्य रहता है, इस सोच के साथ कि ‘‘अजब तेरी कुदरत अजब तेरे खेल’’ यानी अपवाद इस सृष्टि का एक अभिन्न अंग है। लोकतंत्र में भी अपवाद होते हैं, परन्तु ये अपवाद भी संवैधानिक मान्यताओं व प्रथा, परिपाटियों व रिवाजों के अधीन ही होते हैं। लेकिन रामनिवास रावत को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की भाजपा सरकार में मंत्री पद की शपथ दिला कर मंत्रिमंडल में शामिल कर निश्चित रूप से एक ऐसा अजूबा हुआ है, जो ‘‘न तो भूतो न भविष्यति है’’ और न ही ऐसी कल्पना भी दूर-दूर तक की जा सकती है।

दोबारा शपथ: अभूतपूर्व। एकमात्र उदाहरण।

दूसरी पार्टीयों से विधायक तोड़कर इस्तीफा दिलाकर अपनी पार्टी में शामिल कराना और फिर शपथ दिला कर मंत्रिमंडल में शामिल करना एक असमान्य व नैतिक रूप से अलोकतांत्रिक होते भी हमारे देश की यह एक ’‘सामान्य प्रक्रिया’’ बनते जा रही है। फिर चाहे मंत्रिमंडल ‘‘शिवजी की बारात’’ ही क्यों न बन जाये, परन्तु राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त पार्टी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का सदस्य होते हुए पार्टी और विधायकि से इस्तीफा दिये बिना शपथ दिलाना निश्चित रूप से अभूतपूर्व होकर अकल्पनीय है और इस अभूतपूर्व पर ‘‘सोने पे सुहागा’’ तब और हो गया जब ’‘माननीय’’ को मात्र 15 मिनट के पश्चात फिर दूसरी बार शपथ लेनी पडी। सुबह 09.03 मिनट पर रामनिवास रावत ने त्रुटि वश हुई मानवीय भूल के कारण ‘‘राज्यमंत्री’’ की शपथ ली और तत्पश्चात भूल सुधारते हुए 9.18 बजे ‘‘केबिनेट मंत्री’’ की शपथ ली। इस प्रकार रामनिवास रावत का कांग्रेस विधायक के रूप में भाजपा सरकार में शपथ वह भी दो बार, स्वतंत्र भारत की पहली अजूबी घटना होकर मध्य प्रदेश को ‘‘अजब-गजब’’ की श्रेणी में रखने का एक पुख्ता कदम है?

विधायिकी से शपथ पूर्व इस्तीफा क्यों नहीं?

प्रश्न व जिज्ञासा की बात यह है कि इसी बीच क्या रामनिवास रावत ने राज्य मंत्री पद से इस्तीफा दिया था? इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है। राज्यपाल ने त्रुटि संज्ञान में आने के बाद उक्त क्या शपथ को अवैध घोषित किया? या शून्य मान ली गई? यदि ऐसा नहीं, तो फिर 9.03 बजे शपथ दिलाने के बाद क्या माननीय मुख्यमंत्री ने महामहिम राज्यपाल से यह लिखित अनुरोध किया कि रामनिवास रावत को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है, इसलिए उन्हें उक्त पद की शपथ दिलाई जाये? उक्त बिंदु फिलहाल भविष्य के गर्भ में ही है, जब तक इसका स्पष्टीकरण ‘‘राजभवन’’ या मुख्यमंत्री से नहीं आ जाता है। मंत्री पद की शपथ लेने के बाद रामनिवास रावत ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया है। बल्कि कुछ क्षेत्रों से तो यह खबर भी चलवाई जा रही है कि रामनिवास रावत ने इस्तीफा शपथ ग्रहण करने के पूर्व ही दे दिया था? इसका भी खुलासा माननीय स्पीकर की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा।  तथापि भाजपा ज्वाइन करते समय  प्रेस से चर्चा करते हुए एक पत्रकार द्वारा यह प्रश्न पूछे जाने पर वे विधायक पद से कब इस्तीफा देंगे, के जवाब में रामनिवास रावत ने कहा था कि जब भी मैं  विधायक पद से इस्तीफा दूंगा आपको बुलाकर बतलाऊंगा? लेकिन ऐसा अभी तक उनकी तरफ से नहीं हुआ है।

अनुभव का फायदा।

राजनीति में अनुभव का बहुत महत्व होता है, जो कई बार वक्त पर काम आता है। रामनिवास रावत के छह बार विधायक चुने जाने की तुलना में तीन बार के चुने गए छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस के विधायक कमलेश शाह के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस और विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होना रामनिवास रावत की तुलना में उनकी अनुभवहीनता को ही दिखलाता है। इसीलिए अभी हो रहे उपचुनाव में वे भाजपा के उम्मीदवार बनकर चुनाव लड़ रहे हैं, बावजूद इसके शायद आचार संहिता के चलते उन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका। जबकि कमलेश शाह को भी रामनिवास रावत के साथ मंत्री बनाए जाने की अपुष्ट खबरें थी। यह उनकी अनुभवहीनता ही थी कि उन्होने  कांग्रेस से इस्तीफा देते रामनिवास रावत के समान इस तरह का पक्का सौदा भाजपा से नहीं किया? इस प्रकार ‘अनुभव’ का फायदा उठाते 68 दिन पूर्व भाजपा जॉइन करते समय इस्तीफा न देकर राम निवास रावत ’कांग्रेसी’ होकर भी मंत्री पद पा गए। यदि कमलेश शाह; रामनिवास रावत समान विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने की जल्दबाजी नहीं करते, तो शायद वे भी मंत्री पद पा लेते?

1967 की ‘‘संयुक्त विधायक दल’’ (एस.वी.डी.) सरकार की पुनरावृति?

हालांकि ‘‘खलक का हलक’’ बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन आश्चर्य इस बात का होता है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस शपथ का तीखा विरोध क्यों किया? जब वे स्वयं यह कह रहे हों कि ‘‘कांग्रेस विधायक’’’ को मंत्री पद की शपथ दिला दी। तो वे यह क्यों नहीं मान लेते है कि भाजपा की सरकार 1967 की संयुक्त विधायक दल की सरकार के समान परिवर्तित हो गई है। तब अंतर सिर्फ इतना ही था कि ‘‘कांग्रेस’’ की जगह वहां ‘‘दल बदलू कांग्रेसी’’ ‘‘जनसंघ’’ के साथ सरकार में शामिल थे। अब सरकार में भाजपा व कांग्रेस (तकनीकी रूप से शपथ ग्रहण करने के समय तक रामनिवास रावत कांग्रेस के विधायक ही थे) दोनों शामिल है, जिसे जीतू पटवारी देश में राष्ट्रीय आम सहमति बनाने के लिए एक उठाया गया अनोखा कदम क्यों नहीं ठहरा देते हैं? इसलिए जीतू पटवारी को इस बात पर मुख्यमंत्री को धन्यवाद देना व बधाई देनी चाहिए कि बिना उनके अनुरोध व अनुनय-विनय के कांग्रेसी रावत को मंत्रिमंडल में शामिल किया। जबकि केंद्र में कांग्रेस की लोकसभा उपाध्यक्ष पद की मांग लगातार आवाज उठाने के बावजूद मानी नहीं गई। क्या जीतू पटवारी की नाराजगी और ‘‘अंगारों पर लोटने’’ का कारण यह तो नहीं है कि उनको मंत्री नहीं बनाया गया? 

पटवारी के विधानसभा अध्यक्ष पर आरोप गलत?

पटवारी का यह कथन गलत है कि विधानसभा अध्यक्ष व राज्यपाल ने ‘‘कर्तव्य पालन’’ और ‘‘लोकतंत्र की परंपराओं’’ का पालन नहीं किया है। जीतू पटवारी कृपया यह बतलाने का कष्ट करें कि 30 अप्रैल को रामनिवास रावत के कांग्रेस का ’हाथ’ छोड़कर भाजपा के ’राम’ होने के बाद उनकी सदन की सदस्यता समाप्त करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष याचिका कब दायर की गई? पटवारी जी, अयोग्यता की कार्रवाई करने में दूसरे पक्ष को भी सुनना अनिवार्य है, जिसके लिए नोटिस जारी किया जाता है। यह कोई ‘‘आधी रोटी में दाल झेलना नहीं है’’। इस संपूर्ण पूरी कार्रवाई में कुछ समय अवश्य लगता है। महाराष्ट्र का उदाहरण आपके सामने है, जहां 1 साल से भी ज्यादा समय स्पीकर को सुनवाई में लगा। इसलिए अध्यक्ष पर लगाया गया आरोप समय पूर्व (प्रीमेच्योर) है।

व्हिप का उल्लंघन नहीं? 

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विधानसभा के इस मानसून सत्र में रामनिवास रावत ने भाग नहीं लिया, जिससे यह पता लग जाता कि सदन में उनके बैठने की व्यवस्था अध्यक्ष ने कहां निर्धारित की है? इसके अतिरिक्त जब तक व्हिप का उल्लंघन न हो, विधायक की सदस्यता समाप्त नहीं होती है और प्रस्तुत प्रकरण में रामनिवास रावत द्वारा कोई भी व्हिप का उल्लंघन का नहीं किया गया है, क्योंकि वास्तव में कोई व्हिप अभी तक जारी ही नहीं किया गया है। स्वयं कांग्रेस के विधायक और विपक्ष के उपनेता हेमंत कटारे ने यह कथन किया है की विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने अभी तक नियमों के विपरीत जाकर कोई काम नहीं किया है और इसलिए स्पीकर की कुर्सी पर आरोप लगाना अच्छी परंपरा नहीं है आज की इस गंदी अस्वीकारिता की राजनीति में ऐसी साफ़गोई के लिए भी हेमंत कटारे का धन्यवाद जरूर किया जाना चाहिए।

मंगलवार, 9 जुलाई 2024

राष्ट्रपति’’ का नरेन्द्र मोदी को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण क्या ‘‘तकनीकि त्रुटि’’ है?


एनडीए को स्पष्ट बहुमत।

लोकसभा के चुनाव परिणाम आए हुए 1 महीने हो चुके हैं। 4 जून 2024 को लोकसभा के आम चुनाव के परिणाम आने के बाद स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी थी कि, चुनाव पूर्व बने दो महत्वपूर्ण गठबंधनों में से एक ‘‘एनडीए’’ को 293 सांसदों का स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। वहीं दूसरे गठबंधन ‘‘इंडिया’’ को 233 सीटें हीं मिली एवं बहुमत से वह कुछ दूर रहा। कहते हैं न कि ‘‘कर्ता से करतार हारे’’, परन्तु देश को एक मजबूत विपक्ष जरूर मिला। एक-दो दिन की राजनैतिक कयासों व अटकलों के बीच यह स्पष्ट हो गया था कि चुनाव पूर्व बने गठबंधन मजबूत है और गठबंधन दलों से कोई भी पार्टी बाहर आकर दूसरे गठबंधन के पक्ष में नहीं जा रही है। इसलिए जहां तक एनडीए के बहुमत का सवाल है, इस पर कोई प्रश्नवाचक चिन्ह न तो तथ्यात्मक रूप से कभी था और न ही मजबूत विपक्ष ने ऐसा कोई आरोप लगाया। जो इस तथ्य से भी सिद्ध होता है कि ‘इंडिया’ ने सरकार बनाने का दावा पेश ही नहीं किया था। यद्यपि ‘‘कस्तूरी की गंध सुगंध की मोहताज नहीं होती है’’, इसलिए एनडीए के चुने गये नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाना प्रथम दृष्ट्यिा पूर्णतः संवैधानिक, वैधानिक व तथ्यात्मक दिखता है। परंतु पिछले कुछ दिनों से राष्ट्रपति के नरेन्द्र मोदी को सरकार बनाने को लेकर कुछ प्रश्नवाचक चिन्ह सोशल मीडिया में एस.एन. साहू पूर्व विशेष सचिव पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायण का वायरल होता लेख द्वारा उठाये जा रहे हैं। उनमें से एक बहुत बड़ा कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भारतीय जनता पार्टी के 240 सदस्यीय संसदीय दल का अधिकृत रूप से नेता न चुना जाना और राष्ट्रपति द्वारा सरकार गठन का निमंत्रण देते समय उन्हें तय समय सीमा में बहुमत सिद्ध करने के लिए न कहना। आइये! आगे इसकी संवैधानिक व्याख्या करते हैं। 

त्रुटि ! तकनीकि अथवा संवैधानिक?

निश्चित रूप से हमारी संसदीय परम्पराएं, नियम व जो संवैधानिक व्यवस्था है, इसके अंतर्गत चुनाव परिणाम आने के बाद समस्त राजनीतिक पार्टियां अपने नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक बुलाकर संसदीय दल के नेता का चुनाव करती हैं। तत्पश्चात ही सबसे बडी पार्टी जिसका चुना हुआ नेता गठबंधन के अन्य दलों के समर्थन से समर्थन पत्र के माध्यम से या गठबंधन दल की संयुक्त बैठक में नेता चुना जाकर सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करता है। परन्तु वर्तमान में संसदीय दल का नेता चुने जाने के लिए भाजपा की नव निर्वाचित सांसदों की बैठक ही नहीं हुई। यह सरकार के गठन से जुड़ी एक स्पष्ट अनिवार्यता है। शायद इसीलिए  नरेन्द्र मोदी क्या अधिकृत रूप से नेता भाजपा संसदीय दल के चुने गये? यह प्रश्न सोशल मीडिया में उठाया जा रहा है, जो निश्चित रूप से एक त्रुटि प्रथम दृष्टया दिखती है, कि ‘‘कथा बिना कैसा व्रत’’, । परन्तु प्रश्न यह है कि यह त्रुटि कितनी गंभीर है? संवैधानिक है? या वर्तमान राजनैतिक परिणाम, परिस्थितियों व परिवेश को देखते हुए जानबूझकर की गई है? अथवा अनजाने में हुई है? इस पर गहनता से विचार करना होगा।

संसदीय परम्पराएं एवं पूर्व नजीरे।

इस संबंध में पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायण व रामास्वामी वेंकटरमन का उदाहरण दिया जा रहा है, जिसका उल्लेख ‘‘कयामत की नजर रखने वाले’’ पूर्व राष्ट्रपति के आर. नारायण के पूर्व विशेष सचिव एस. एन. साहू ने अपने एक लेख में किया है, जो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है। आइये! हम देखते है तत्समय उन दोनों महामहिमों ने क्या किया था। इस संबंध में हमारी पूर्व नजीरें, मिसालें, रिवाज क्या रहे? क्योंकि ‘‘हाथ की नस को हाथ से ही टटोला जाता है’’। पूर्व राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमन ने वर्ष 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को सबसे बड़ी पार्टी 194 सदस्य होने के बावजूद सरकार बनाने के लिए निमत्रंण इसलिए नहीं दिया था कि उन्होंने सरकार बनाने का दावा ही पेश नहीं किया था। तब राष्ट्रपति द्वारा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी/ग्रुप के नेता विश्वनाथ प्रताप सिंह को सरकार बनाने का निमत्रंण देते हुए 30 दिवस में बहुमत साबित करने के निर्देश दिये थे।

वर्ष 1996 के चुनाव में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी 161 सदस्यों के कारण व 146 सदस्यीय कांग्रेस के द्वारा दावा न करने से तत्कालीन राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने भाजपा संसदीय दल के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमत्रंण दिया था, जो सरकार 13 दिन में बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण गिर गई। 

वर्ष 1998 में पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन  ने सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए निमत्रिंत किया था, बावजूद इस तथ्य के कि चुनाव पूर्व ग्रुप या गठबंधन (एनडीए) को बहुमत नहीं मिला था (मात्र 182 सीट मिली थी)। तथापि निश्चित समय सीमा में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश जरूर दिया गया था। अर्थात् उपरोक्त उल्लेखित दोनों परिस्थितियों में सरकार बनाने का निमत्रंण देने के साथ ही तय समय सीमा में बहुमत सिद्ध करने के निर्देश जरूर दिये गये थे, जिनका पालन भी हुआ था। परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश न देने का सबसे बड़ा आधार यह कि चुनाव पूर्व गठबंधन एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिला है, जहां राष्ट्रपति उस बहुमत के प्रति पूर्णत: संतुष्ट थे जिसे पक्ष-विपक्ष सहित किसी ने भी चुनौती नहीं दी थी। अतः बहुमत सिद्ध करने के उक्त निर्देश देने की स्थिति किसी भी रूप में उत्पन्न नहीं होती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अटल बिहारी वाजपेयी को बहुमत सिद्ध करने का निर्देश तब दिया गया था, जब चुनाव में उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। इसलिए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में निमत्रिंत करते हुए बहुमत सिद्ध करने के निर्देश दिये थे, जो संवैधानिक व उचित थे। राष्ट्रपति द्वारा निर्णय के पीछे के तर्कों को पूर्व परिपाटी अनुसार सार्वजनिक न करना?

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दोनों ही स्थितियों में पूर्व राष्ट्रपतियों ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपने निर्णय के पीछे तर्कों व कारणों से देश के नागरिकों को अवगत कराया था। परन्तु वर्तमान में महामहिम ने ऐसा नहीं किया, क्यों? क्या इसलिए तो नहीं कि ‘‘तकल्लुफ में है तकलीफ सरासर’’?

राज्यसभा सदस्य या किसी भी सदन का सदस्य न होने पर संवैधानिक स्थिति। 

एक स्थिति ऐसी भी हो सकती है बल्कि पूर्व में हुई भी है, जब राज्यसभा के सदस्य डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई थी। तब मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य होने के कारण नव निर्वाचित लोकसभा के संसदीय दल का नेता  कदापि नहीं हो सकते थे। तथापि नव निर्वाचित सांसदों की बैठक बुलाकर नेता का चुनाव इसलिए किया जाता है ताकि वह नेता पक्ष (लोकसभा) होगा, जिस प्रकार नेता विपक्ष होता है। अतः राज्यसभा सदस्य को प्रधानमंत्री के रूप में दावा पेश करने के लिए सिर्फ बहुमत का लिखित में समर्थन का दावा प्रस्तुत करना ही काफी है। एक स्थिति और भी हो सकती है, जब वह किसी भी सदन का सदस्य न हो, तब भी वह प्रधानमंत्री पद के लिए दावा पेश कर सकता है, यदि उसके पास आवश्यक बहुमत है। तथापि छः महीने के अंदर उसका किसी भी सदन का सदस्य चुना जाना आवश्यक होगा। संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति की सहायता व सलाह के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद होगी। अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी। मतलब प्रधानमंत्री का ‘‘चुनाव’’ नहीं ‘‘नियुक्ति’’ होती है। दूसरे शब्दों में ‘‘मोल कमर का होता है, तलवार का नहीं’’। अनुच्छेद 75 (2) के अनुसार मंत्रिपरिषद जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होता हैं, लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी। अर्थात प्रधानमंत्री को संसद में बहुमत सिद्ध करना होगा। चूंकि वर्तमान में ऐसा निर्देश नहीं दिया गया है, इसलिए यह चूक कहीं महत्वपूर्ण तो नहीं है? यह देखना होगा।

शनिवार, 29 जून 2024

विकसित भारत का सफलतम ‘‘बैरोमीटर’’! पेपर लीक?

 ‘‘पेपर’’ के ‘‘कायदे ही कायदे’’! ‘‘वायदे ही वायदे’’।  ‘‘लीक’’ के ‘‘फायदे ही फायदे’’?

लोकतांत्रिक भारत।’

निसंदेह भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। परतंत्रता से मुक्त होकर ‘‘अविकसित’’ राष्ट्र से विकास की ओर कदम बढ़ाते हुए ‘‘विकासशील’’ देश होकर वर्ष 2047 तक ‘‘विकसित’’ राष्ट्र बनाने का लक्ष्य प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने रखा हुआ है। 26 जनवरी 1950 को हमारी स्वनिर्मित भारतीय संविधान द्वारा स्थापित लोकतंत्र की सफलता का ही यह एक अद्भुत क्षण है, जब 18 वें लोकसभा के पहले सत्र का ‘‘आगाज’’ 24 जून को हुआ। ‘‘अंजाम’’ क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। परंतु 24 जून का आगाज उस 25 जून की काली तारीख के पूर्व हुआ है, जब इसी लोकतंत्र की आपातकाल लगाकर हत्या करने का प्रयास किया गया था। परंतु तब भी लोकतंत्र पूरी तरह मरा नहीं था। हां मरणासन्न स्थिति में जरूर चला गया था। चूंकि 26 जनवरी 1950 को लागू संविधान के द्वारा इस लोकतंत्र की जड़े इतनी मजबूत थी कि 25 जून 1975 को मरणासन स्थिति में पहुंचने के बाद वही लोकतंत्र स्वस्थ होकर मजबूत होकर पुनः खड़ा हो गया और आज आरोपों व प्रत्यारोपों के बीच सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न करवा कर चमक-दमक के साथ चहक-दहक रहा है। स्वतंत्र भारत और लोकतंत्र का ‘‘गर्भनाल का संबंध’’ है, भला ‘‘उंगलियों से नाखून अलग हुए हैं कभी’’। इसीलिए राष्ट्रपति के अभिभाषण में आज यह कहा गया कि संविधान हमेशा ‘खरा’ उतरा है।

मजबूत होता लोकतंत्र?’

देश के लोकतंत्र को मजबूत करने में कई ‘‘खट्टे-मीठे’’ अनुभव एक नागरिक से लेकर चुने हुए जन-प्रतिनिधियों और संविधान द्वारा निर्मित समस्त ‘‘तंत्रों’’ को निश्चित रूप से हुए होंगें।  इसलिए कभी ‘‘नकारात्मकता’’ में भी ‘‘सकारात्मकता’’ का भाव देखने का प्रयास अवश्य करना चाहिये? क्योंकि हर नकारात्मक कदम में भी कभी कुछ सकारात्मक भाव होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। जैसा कि बाबा राम रहीम के मामले में उन्हें 19 से अधिक मिले गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड एवं लिम्का रिकॉर्ड के सकारात्मक पहलू पर मैंने एक लेख लिखा था। देश का लोकतंत्र सिर्फ सकारात्मक कार्य, भाव से ही मजबूत नहीं होता है, बल्कि ऐसे नकारात्मक भाव जहां पर पक्ष विपक्ष दोनों की सहमति से लेकर कार्यशैली एक सी ही होती है, उससे भी लोकतंत्र मजबूत होता है? इसका सबसे बड़ा उदाहरण नीट पेपर लीक जो ‘‘कांड’’ नहीं एक ‘‘कदम’’ है, की चर्चा सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विश्व व्यापी हो रही है, क्योंकि मामला लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों से है? अरे ‘‘इधर का सूरज उधर से उग जाये’’, तो इसमें हर्ज ही क्या है? यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है।

सर्वानुमति?

वैसे भारतीय लोकतंत्र में सहमति के मुद्दे कम ही होते हैं, अवसर भी कम ही आते हैं। सर्वानुमति का एक महत्वपूर्ण मुद्दा लोकसभा स्पीकर का निर्विरोध चुनाव का होना रहा है। परन्तु दुर्भाग्यवश वह बड़ी व जरूरी सर्वानुमति भी टूट गई और वर्ष 1976 के बाद 47 साल बाद 18वीं लोकसभा के स्पीकर का चुनाव मत विभाजन द्वारा हुआ है। यद्यपि स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में यह चौथा मौका है, जब स्पीकर का चुनाव हुआ है। तथापि 1952 के प्रथम लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में दिलचस्प बात यह थी कि विपक्षी उम्मीदवार ने सत्तापक्ष के उम्मीदवार जी.वी. मावलंकर को अपना मत दिया था व वैसे ही (पारस्परिक) उम्मीद उनसे की गई थी। दूसरी बार वर्ष 1967 में संजीव नीलम रेड्डी का चुनाव हुआ। तीसरी बार वर्ष 1976 में आपातकाल में हुए चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार जगन्नाथ राव जोशी जेल में थे। पेपर लीक का मामला एक ऐसा कार्य मुद्दा है, जिस पर पक्ष हो या विपक्ष, सत्ता हो या विरोधी, सब की गजब की ‘‘सर्वानुमति’’ इस मामले को लेकर रही है। क्योंकि ‘‘इस पेपर लीक की देवी ने बहुत से भक्त तारे हैं’’। वस्तुतः इस मामले में समस्त दल ‘‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है’’। इसीलिए लोकतंत्र मजबूती से आज आपके सामने खड़ा है? बात जब ‘‘नीट’’ व ‘‘नेट’’ परीक्षा की आती है, तो आप इसकी आलोचना क्यों करते हैं? ‘‘नीट’’ (परीक्षा) का अर्थ ही होता है ‘‘स्वच्छ’’ व ‘‘नेट’’ (राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा) का अर्थ ‘‘शुद्ध’’। तो फिर उसकी बुराई करना या ‘‘उसे गंदा, अशुद्ध कार्य ठहरना’’ किसी भी रूप से उचित नहीं कहलाएगा? इसलिए ‘‘नीट को क्लीन चिट’’ देकर राजनीति को ‘‘क्लीन’’ कर दीजिए?

‘‘फायदा ही फायदा’’?

लोकतंत्र में पक्ष-विपक्ष दो पक्षों के समान ही पेपर लीक के मामलों में भी विद्यार्थियों के दो पक्ष है, जहां एक मत के अनुसार पेपर लीक उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। यदि आप पेपर लीक के फायदे को जान लेंगे, तब फिर आप यह भी समझ जाएंगे कि इससे लोकतंत्र कैसे मजबूत हो रहा है? आईये इन फायदों? को समझने का प्रयास करते हैं।

प्रथम, पेपर लीक सरकार के ‘‘सबका साथ सबका विकास सिद्धांत को मजबूत करता है’’। वह ऐसे कि कमजोर कम बुद्धि वाले छात्र और बुद्धिमान छात्र दोनों का बराबर विकास इसके माध्यम से हो जाता है? दूसरा फायदा, बच्चों को सिलेबस अच्छे से रट जाता है, क्योंकि लीक पेपर को उन्हें बार-बार रटना पड़ता है। तीसरा फायदा देश के विद्यार्थियों को केंद्रीय शिक्षा मंत्री की जानकारी हो जाती है, क्योंकि देश के विद्यार्थियों से सीधा संवाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘‘परीक्षा पे चर्चा’’ के माध्यम से तो जरूर करते हैं। परन्तु शिक्षा मंत्री सामने नहीं आते हैं। अगला फायदा सरकार के खर्चों की बचत का होना है। क्योंकि पेपर लीक होने के बाद पूरी प्रक्रिया को फिर से पूरा करने में काफी समय गुजर जाता है और उतने समय तक सरकार वैधानिक रूप से बेरोजगारों को नौकरी देने से वंचित करने में सक्षम हो जाती है।

पेपर लीक से अगला फायदा ‘‘स्वरोजगार’’ को बढ़ावा मिलना भी है। जैसे ‘‘पकोड़ा बेचना’’ जिसका उदाहरण वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री ने एक टीवी इंटरव्यू में दिया था। छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों को भी फायदा मिलता है। पेपर लीक होने के कारण तुरंत नौकरी नहीं मिल पाने से जीवन यापन के लिए वैकल्पिक दूसरे रास्ते व्यापार उद्योग को चुनने की मजबूरी हो जाती है। मतलब यह कि ‘‘नौकरी छोकरी की छोड़ आस, धर खुरपा गढ़ घास’’। इस प्रकार देश का बेरोजगार युवा मजबूरी में ही सही, देश के व्यावसायिक प्रगति (ग्रोथ) में अपना योगदान देता है। ‘‘अंधे पीसे कुत्ते खाय’’ रूपी पेपर लीक ‘‘फिनॉमिनन’’ का एक योगदान प्रिंटिंग प्रेस उद्योग को भी होता है, क्योंकि पेपर बार-बार छापना पड़ता है। साथ ही पेपर के आवागमन के आउटसोर्स साधनों को भी आर्थिक मदद मिल जाती है। होटल उद्योग, समस्त प्रकार के परिवहन उद्योग की तो ‘‘चांदी’’ हो जाती है, क्योंकि पेपर लीक होने पर बार-बार छात्रों को ही नहीं उनके अभिभावकों को भी दूरस्थ पेपर सेंटरों में पेपर देने जाना होता है। यानी कि पेपर लीक अब ‘‘अकल आसरे कमाई की बजाय नकल आसरे कमाई’’ का माध्यम बन गया है। मानसिक श्रम और तनाव के कारण चिकित्सा उद्योग को भी फायदा पेपर लीक से होता है।

इस पेपर लीक से सबसे बड़ा फायदा 4 फरवरी 2024 में संसद द्वारा पारित ‘‘एंटी पेपर लीक’’ कानून जो राष्ट्रपति के द्वारा स्वीकृति प्रदान करने के बावजूद अभी तक लागू नहीं किया गया था, को 22 जून को अधिसूचना जारी कर लागू कर दिया गया। इसका एक और गैरकानूनी फायदा लगभग 900 करोड़ (अभी तक) का काला धन एक तरफ खप गया तो दूसरी तरफ 900 करोड़ की काली (ब्लैक की) कमाई बेरोजगार छात्रों, नागरिकों के हो गई? इसका एक फायदा भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों को भी हो सकता है, यदि वे बेरोजगारी भत्ते देने वाले अपने नियमों में यह परिवर्तन कर दें कि जिन बेरोजगारों को पेपर लीकेज की काली कमाई हुई है, उन्हें भत्ता नहीं मिलेगा?

पेपर लीकः राजनीति चमकाना!

पेपर लीक का एक फायदा ‘‘नीति के कफन’’ पर ‘‘राजनीति चमकाने’’ का भी है। पेपर लीक होने से समस्त राजनैतिक दलों को चाहे सत्तापक्ष के हो या विपक्ष के ‘‘राजनीति चमकाने’’ का अवसर मिल ही जाता है। सत्ता पक्ष, विपक्ष पर यह प्रत्यारोप लगा कर राजनीति चमकाता है कि विपक्ष की सरकारों के कार्यकाल में इससे भी ज्यादा पेपर लीक व छात्र प्रभावित हुए हैं। बावजूद इसके जब विपक्ष यह सिद्ध कर देता है कि सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकालों में ही पेपर लीक के ज्यादा प्रकरण हुए है, तब सत्ता पक्ष दम ठोकर यह कह कर विपक्ष को चुप करा देता है कि देश की प्रगति में ‘‘हर मोर्चे पर’’ आप से आगे हम दिखते रहेंगे, निकलते रहेंगे? आखिरय ‘‘सत्ता और विपक्ष की चकाचौंध से दृष्टि बाधित युवक किसकी ओर उंगली उठाये’’।

पेपर लीक के बाद सरकार की अक्रमण्यता अथवा कार्रवाई से लगभग सम्पूर्ण छात्र वर्ग खुश हो जाता है। पेपर लीक के बाद जब सरकार छोटी-मोटी त्रुटि कहकर पेपर निरस्त नहीं करती है, तब ‘लीकेज’ से लाभार्थी छात्रगण खुश हो जाते हैं। विपरीत इसके जब सरकार पेपर रद्द करके फिर से परीक्षा की घोषणा करती है, तब अधिकांश छात्रों का समूह ‘‘कभी खुशी कभी गम’’ की स्थिति में रहता है। खुशी इस बात की कि कमजोर छात्रों द्वारा पेपर लीक करके श्रेणी न पाये छात्रों का श्रेणी प्राप्त करने वाले मेधावी छात्रों का हक वापिस मिलने का अवसर मिलता है। तो वहीं दूसरी ओर उन्हें पुनः आवश्यक रूप से दूसरी बार परीक्षा की कड़ी मेहनत करने की स्थिति से गुजरना होता है, जो लादे हुए अतिरिक्त श्रम के कारण उनकी गम की स्थिति हो जाती है।

’एनटीए जिंदाबाद।  

मेरा भारत महान।’

विश्व ‘‘सिकल सेल’’ दिवसः 19 जून 2024।

शासन द्वारा महत्व!

मध्य प्रदेश के डिंडौरी में इस अंतराष्ट्रीय दिवस पर आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यपाल मंगू भाई पटेल, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं अन्य मंत्रियों की उपस्थिति में कहा है कि ‘‘भारतीय प्रजातंत्र में जनजाति का स्थान रीढ़ की हड्डी के बराबर है। जनजाति ही भारतीय संस्कृति और प्रजातंत्र को बल देता है’’। ‘‘2047 में विकसित भारत की पहचान होगा, सिकल सेल का पूर्ण उन्मूलन’’। ‘‘हवन शुरू हो गया है, पूर्ण आहूति 2047 में हो जायेगी’’। महामहिम उपराष्ट्रपति के उक्त कार्यक्रम में भागीदारी से यह बात स्पष्ट रूप से रेखांकित होती है कि सरकार इस रोग के उन्मूलन के प्रति कितनी गंभीर है। आइये! पहले यह जान लेते है कि यह भयावक बीमारी वास्तव में है क्या? 

सिकल सेल बीमारी है क्या?

‘‘सिकल सेल’’ एक जेनेटिक बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में आती है। इस बीमारी में रेड ब्लड सेल्स में ऑक्सीजन की कमी हो जाने से ‘‘सेल’’ का आकार गोल न बनकर आधे चांद या फिर हंसिए की तरह नजर आता है। इसलिए इसे ‘‘सिकल (हंसिया) सेल’’ कहते हैं। इसके चलते बच्चे की ग्रोथ पर असर पड़ता है। साथ ही दूसरे बच्चों की तुलना में इम्युनिटी भी कमजोर होती है। अतः सिकल सेल रोग एक घातक आनुवंशिक रक्त विकार हैं। इससे शरीर का खून सूख जाता है। हल्की पीलिया होने से बच्चे का शरीर पीला दिखाई देना, तिल्ली का बढ़ जाना, पेट एवं छाती में दर्द होना, सांस लेने में तकलीफ, हड्डियों एवं जोड़ों में विकृतियां होना, पैरों में अल्सर घाव होना, हड्डियों और जोड़ों में सूजन के साथ अत्यधिक दर्द, मौसम बदलने पर बीमार पढ़ना, अधिक थकान होना यह लक्षण बताए गए हैं। इससे दर्द, एनीमिया, संक्रमण आदि समस्याएं हो सकती हैं। इसके प्रकार है; सिकल हीमोग्लोबिन, सिकल बी प्लस थैलेसीमिया और सिकल बीटा-शून्य थैलेसीमिया। समय पर इस बीमारी का इलाज न कराया जाए, तो यह जानलेवा भी हो सकती है। इन्हीं सबके बारे में लोगों को जागरूक करने के मकसद से ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह दिन मनाया जाता है।

कब प्रारंभ हुई?

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस के रूप में मनाने के लिए दिसंबर 2008 में एक प्रस्ताव पारित किया था। इस दिवस पर प्रत्येक वर्ष अलग-अलग एक खास थीम रखी जाती है। वर्ष 2024 के लिए विश्व सिकल सेल दिवस का विषय है:प्रगति के माध्यम से आशाः विश्व स्तर पर सिकल सेल देखभाल को आगे बढ़ाना।

कार्य योजना की प्रगति। 

भारत में यह बीमारी खासतौर से छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पूर्वी गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिमी ओडिशा और उत्तरी तमिलनाडु में देखने को ज्यादा मिलती है। सिकलसेल एनीमिया आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में एक अहम स्वास्थ्य समस्या है। अतः इस बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए समुदाय स्तर पर स्क्रीनिंग द्वारा रोगी की पहचान कर जेनेटिक काउंसलिंग एवं प्रबंधन करना अत्यंत आवश्यक है। मध्य प्रदेश में सिकलसेल एनीमिया की रोकथाम एवं उपचार के लिये 15 नवम्बर 2021 जनजातीय गौरव दिवस को ‘‘राज्य हिमोग्लोबिनोपैथी मिशन’’ का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इसी श्रृखंला में ‘‘विश्व सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन’’ वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री ने प्रारंभ किया था। इस मिशन में अलीराजपुर एवं झाबुआ जिलें में पायलट प्रोजेक्ट के तहत कुल 9 लाख 17 हजार जनसंख्या की स्क्रीनिंग की गयी। मध्य प्रदेश के 22 जिले इस रोग से प्रभावित है जहां अब तक 22 लाख 96 हजार जेनेटिक कार्ड वितरित किये जा चुके हैं। डिंडौरी जिले में सबसे ज्यादा 1970 मरीज है। 

कारण लक्षण एवं दुष्परिणाम। 

सामान्य रूप से यह कहा जाता है कि इस रोग के मूल में खान-पान, पानी, स्वच्छता की कमी होना है, जिसका सीधा संबंध गरीबी से है। शायद इसीलिए यह बीमारी जनजातीय (आदिवासियों) में ज्यादा पाई जाती है। परन्तु यदि गरीबी ही एकमात्र कारण होता, तो पिछड़े व सामान्य वर्गो के गरीब भी इस बीमारी से ग्रसित होते। परन्तु ऐसा है नहीं। अतः आवश्यकता है इस बात की है कि इस बीमारी के मूल में जाए, तभी प्रभावी इसकी रोक थाम की जा सकती है। साथ ही इस बीमारी से पीड़ित, ग्रसित वर्ग के साथ-साथ ‘वृहत’ समाज के बीच जागरूकता फैलाने के लिए कोई ‘हस्ती’ फिल्मी, खेल यह अन्य क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य प्रसिद्ध व्यक्ति को ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाना चाहिए। तब कम समय, शक्ति व खर्च में अधिकतम परिणाम निकाले जा सकते हैं। 

लाईलाज?

इस बीमारी का पता लगाने के लिए एवं खास तरह का ब्लड टेस्ट किया जाता है, जिसे इलैक्ट्रोफोरेसिस कहते है। सामान्यतया सिकल सेल रोग का कोई इलाज नहीं है। सिकल सेल रोग का एक उपचार अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण है, जो बहुत जटिल है।

2047 तक एससीडी के उन्मूलन के लिए सरकारी मिशन।

भारत सरकार ने 2047 तक सिकल सेल रोग (एससीडी) को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 जुलाई 2023 को मध्य प्रदेश के शहडोल में राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन शुरू किया। राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का हिस्सा है। आयुष्मान भारत योजना में संशोधन करके सिकल सेल को भी इसमें शामिल कर दिया गया है।

राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन का फोकस क्षेत्र।

राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन 17 राज्यों के आदिवासी बहुल जिलों पर केंद्रित है, जहां इस बीमारी का प्रसार सबसे अधिक है। मिशन का लक्ष्य प्रभावित आदिवासी क्षेत्रों में 0-40 वर्ष के आयु वर्ग के 7 करोड़ लोगों में जागरूकता पैदा करना और सार्वभौमिक जांच करना है। सिकल सेल रोग झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिमी ओडिशा, पूर्वी गुजरात और उत्तरी तमिलनाडु और केरल में नीलगिरि पहाड़ियों के इलाकों में अधिक प्रचलित है।

मंगलवार, 11 जून 2024

‘‘माता’’ के दास ‘‘दुर्गा दास’’।

सिर्फ इतिहास ‘‘दोहराया’’ ही नहीं, बल्कि ‘‘बनाया’’ भी है।

बैतूल-हरदा-हरसूद लोकसभा क्षेत्र से पहले से अधिक मतों से विजयी सांसद दुर्गा दास उईके को सिर्फ एक मतदाता व नागरिक की हैसियत से ही नहीं, बल्कि गायत्री शक्तिपीठ, बैतूल के ट्रस्टी की दृष्टि से भी हृदय की गहराइयों से खूब आत्मिक बधाइयां व जनता का हार्दिक आभार! ‘‘जब मन में सफलता का संकल्प होता है, तब ईमानदारी से परिश्रम ही विकल्प होता है’’।  माता गायत्री के अनन्य भक्त, सेवक और गायत्री परिवार की टोली के महत्वपूर्ण सदस्य दुर्गादास उईके को परम पूज्य गुरुदेव और वंदनीय माताजी के आशीर्वाद के साथ जनता के आशीर्वाद से इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का फिर से अवसर प्राप्त हुआ है। मुझे नामांकन भरने के पूर्व और मतगणना प्रारंभ होने के पूर्व के वे क्षण याद आते हैं, जब मेरी उनसे बात हुई थी। तब मैंने यही कहा था कि ईश्वर ने आपके लिए बहुत अच्छा मौका लाया है। कमजोर विपक्ष होने से पिछले मतों से ज्यादा जीतने पर आपको केंद्र मे मंत्री पद मिल सकता है और आप इतिहास रच सकते हैं। वे कथन आज अक्षरशः सत्य सिद्ध हुए हैं।

कुछ व्यक्ति इतिहास रचते हैं, तो कुछ इतिहास दोहराते हैं। लेकिन बहुत कम अवसर ऐसे आते हैं, जब एक ही व्यक्ति एक साथ इतिहास दोहराता भी है और रचता भी है। शिक्षक से सांसद बने दुर्गादास उईके बैतूल की माटी के ऐसे ही शख्स है, जिन्होंने न केवल इतिहास दोहराया, बल्कि नया इतिहास भी रचा दिया। वर्ष 1994 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के मंत्रिमंडल में बैतूल-हरदा संसदीय क्षेत्र के सांसद कांग्रेस के असलम शेर खान के बाद दुर्गादास उईके बैतूल लोकसभा के दूसरे सांसद हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में 30 वर्ष बाद प्रतिनिधित्व मिला। असलम शेर खान भी राज्य मंत्री ही बनाए गए थे, जो प्रधानमंत्री कार्यालय में पदस्थ किए गए थे। इस प्रकार वर्तमान में उक्त इतिहास दोहराया गया है। दुर्गादास उईके स्वतंत्रता के बाद जनसंघ, जनता पार्टी और भाजपा के वे बैतूल लोकसभा क्षेत्र के पहले सांसद हैं, जिन्हें केंद्र में मंत्री बनाया गया है। इस दृष्टि से उईके भाजपा के बैतूल के पहले सांसद हैं, जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली है। इसलिए उन्होंने एक नया इतिहास भी रचा है। 

इसी तरह का नया इतिहास मेरे पिताजी स्वर्गीय गोवर्धन दास जी खंडेलवाल ने भी रचा था, जब वर्ष 1967 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के मंत्रिमंडल में जनसंघ पार्टी जिसका वर्तमान स्वरूप वर्तमान भाजपा है, के कोटे से उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था। इस प्रकार तत्समय प्रथम बार बैतूल जिले को (बैतूल विधानसभा) मध्य प्रदेश के मंत्रिमंडल में स्थान मिला था, तब एक नया इतिहास रचा गया था, जो अभी भी भाजपा की दृष्टि से अटूट है। आज वे इस दुनिया में नहीं लेकिन किसी शायर के चंद अशआर उन्हें समर्पित हैंः- ‘‘जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा, किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता है’’। यद्यपि घोड़ाडोगरी क्षेत्र के विधायक रामजीलाल उईके पटवा सरकार में संसदीय सचिव जरूर बनाए गए थे। कांग्रेस के तो कई विधायक रामजी महाजन, अशोक साबले, प्रताप सिंह उईके मंत्री बनाये गये। इसी के साथ स्वर्गीय जी.डी. खंडेलवाल जी ने एक इतिहास यह भी रचा था कि वे पहले और अभी तक के शायद एक मात्र ऐसे गैर आदिवासी विधायक थे, जिन्हें आदिवासी विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। यह भी संयोग ही है कि दुर्गादास उईके को भी वहीं आदिवासी विभाग जिसे अब जनजातीय विभाग कहा जाता है, का राज्य मंत्री बनाया गया है। 

वैसे दुर्गादास उईके कुशल वक्ता, मृदुभाषी, सहज, सरल व्यक्ति के धनी है, जो सक्रिय सांसद जरूर रहे हैं। परन्तु संसदीय क्षेत्र की जनता की जो तीव्र अपेक्षाएं उनसे रही हैं, शायद उनकी उतनी पूर्ति अभी तक नहीं हो पाई है। वस्तुतः जन आकांक्षाओं पर खरा उतरना ‘‘तलवार की धार पर चलने के समान होता है’’। अब उन्हें यह एक बड़ा अवसर मिला है कि वे जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप पूर्णतः खरा उतरे। ‘‘चुनौती खु़द को साबित करने का मौका़ देती है’’। इसलिए वे इस अवसर को जनहित में भुनाएं और इस जिले की जनता की इस तकिया कलाम पर हमेशा के लिए ताला लगा दें की जब भी  इस जिले के विकास की बात की जाती है, तो यहां की जनता छिंदवाड़ा में कमलनाथ द्वारा किए गए विकास का उदाहरण देने लग जाती है।  इस परसेप्शन और नरेशन को बदलने का एक सुनहरा अवसर दुर्गा दास उइके को मिला है। ‘‘आज की सफलता कल की उपलब्धियों की शुरुआत हो’’। विलक्षण प्रतिभा के धनी-ज्ञानी, विद्वान और अपनी बातों को अच्छी तरह से प्रस्तुत करने की कला का वह सरकार पर दबाव बनाकर अपने संसदीय क्षेत्र की जनता के हित में उपयोग करें, मेरी उनको जनहित में यही सलाह है, अपेक्षा भी यही है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 14 तारीख को ‘‘मूलतापी’’ पहुंच रहे हैं। मुझे लगता है कि माननीय राज्यमंत्री को इस पहले अवसर पर ही मूलतापी के विधायक चंद्रशेखर देशमुख के विशेष सहयोग से एक नई सौगात दिलाने का अवसर प्राप्त होगा। मूलतापी उद्गम नदी ताप्ती के विकास हेतु ताप्ती विकास प्राधिकरण, परिक्रमा स्थल के विकास की पड़ी लम्बित मांग अविलम्बित पूरी हो सकेगी। साथ ही मूलतापी को जिला बनाने की जनता की मांग पर गहनता से विचार विमर्श होकर अंतिम निर्णय पर पहुंचने का भी प्रयास होगा।

पुनः शत-शत बधाइयां।

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