सोमवार, 3 जून 2019

‘‘परिपक्व लोकतंत्र’’ में ‘‘परिपक्व’’ होते मतदाता का ‘‘परिपक्वता पूर्ण’’जनादेश!


विश्व के सबसे बड़े लोकतंात्रिक देश भारत में हुये 17 वंे आम चुनाव का जनादेश आपके सामने है। ऐतिहासिक जीत से लेकर ऐतिहासिक हार के परिणामों की व्याख्या विभिन्न लेखों व प्रतिक्रियाओं के माध्यम से आप मीडिया में अवश्य देखेगंे/पढे़गें। वैसे तो हर आम चुनाव परिणाम पिछले चुनाव परिणाम से कुछ न कुछ भिन्न स्थिति लिये होता है। लेकिन यह चुनाव परिणाम वास्तव मेें पिछले हुयेे आम चुनावों से बिल्कुल ही अलग कुछ मिथकों को तोड़ते हुये अलग है, जिसकी विस्तृत समीक्षा की जानी आवश्यक है। 
पिछले पांच वर्षो में उत्पन्न व बनी परिस्थतियों व लगभग ढाई महीने से हो रहे लगातार घमासान चुनावी प्रचार से उत्पन्न वातावरण को देखते हुये इस चुनाव में जिस तरह की लेन्ड स्लाईड़ विजय नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में मिली है, वह न केवल अधिकतर चुनावी सर्वेक्षणों को (सिवाए आज तक के एग्जिट पोल को छोड़कर) गलत सिद्ध करती हुई कुछ अचभिंत भी करती हैं, बल्कि पूर्व की जीत से हटकर कुछ अलग ही तरह की है। पहले भी आम चुनावों में जब तब ऐसे विशाल जीत के अचभिंत परिणाम आते रहे है। लेकिन उन परिणामों में व आज के परिणाम के बीच मूल अंतर यह है कि वर्तमान में किसी तरह की कोई तात्कालिक प्रभावी घटना घटित न होने के (सिवाए कुछ लोगो की नजर में बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक की घटना को छोड़कर) या कोई देशव्यापी लहर उत्पन्न न होने के बावजूद यह विराट जीत मोदी को मिली है। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में मोदी के पक्ष में अंडर करेन्ट की बात अवश्य कही गई थी, लेकिन वह वास्तव में सुनामी में परिवर्तित हो गई। क्योंकि पूर्व के आम चुनावों में वर्ष 1977 में आपात्तकाल के फलस्वरूप और वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न प्रतिक्रिया स्वरूप चली सुनामी के कारण एकतरफा परिणाम आये थे। तो फिर क्या यह जनादेश मोदी के 5 वर्षो के कार्यो के प्रतिफल की प्रतिच्छाया है? परिणाम है? शायद ऐसा कहना पूर्ण रूप से उचित नहीं होगा, बल्कि कुछ हद तक कहीं अतिश्योक्ति पूर्ण कथन न मान लिया जाय। इसके विपरीत दूसरा कारण क्या यह माना जाय कि मतदाता के मन में मोदी के 5 साल के विकास को देखकर ऐसा भाव उत्पन्न हुआ कि 5 साल की अवधि में किये गये वादानुसार कार्य कर वांछित परिणाम देने के लिए पर्याप्त नहीं है इसीलिए उसे दूसरा 5 साल का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि ज्यादा गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो इन सबसे बढ़कर एक महत्वपूर्ण आंकलन  यह भी हो सकता है कि ऐसे मतदातागण जो मोदी के समर्थन में नहीं थे, मोदी की तथाकथित वादाखिलाफी से नाराज थे, चाहे फिर वह बेरोजगारी का मुद्दा हो, नोटबंदी होे, जीएसटी से परेशानी होे या निम्न स्तर की जुमलेबाजी हो या सीमाओं की सुरक्षा का बार-बार उल्लघंन का मामला हो, इत्यादि अनेक मुद्दों को लेकर मोदी को वोट नहीं देने का विचार करते समय फौरिक विकल्प के तौर पर उनके सामने राहुल गांधी का चेहरा सामने आया और चूंकि उसकी मनस्थिति मोदी की तुलना में राहुल गांधी को स्वीकार न कर सकी, जिस कारण (सक्षम विकल्प के अभाव में, मजबूरी में, अनिच्छापूर्वक) उसे मोदी को वोट देना पड़ा और मोदी समर्थक वोटों के साथ जोड़ने पर भाजपा की यह ऐतिहासिक जीत हो गई। जो भी हो, मतदाताओं का यह एक परिपक्व पूर्ण निर्णय कहा जा सकता है। 
दूसरी परिपक्वता मतदाताओं ने तब दिखाई जब सत्ताधारी पार्टी को पुनः सत्ता में बनाए रखने के लिए उन्होंने 12 प्रमुख प्रदेशों में 50 प्रतिशत मतो से अधिक की जीत दी। मतदाताओं की परिपक्वता की चरम स्थिति तब सामने आई जब उन्हीं मतदाताओं ने जिन्होंने मात्र छः महीने पूर्व हुये मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों में भाजपा की सत्ता के खिलाफ स्थानीय मुद्दे के आधार पर वोट देकर भाजपा को हराया था, वे ही मतदाताओं ने लोकसभा  चुनाव में स्थानीय मुद्दो व उम्मीदवारांे से हटकर राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा को वोट देकर वे कांग्रेस व विपक्ष के खिलाफ हो गये। यह भी उनकी लोकतंत्र के प्रति बढ़ती परिपक्वता को ही दर्शाता है। 
भाजपा का शीर्षस्थ नेतृत्व खासकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पूर्णरूप से वास्तव में आज की राजनीति के चाणक्य सिद्ध हुये है। उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए कि भाजपा के विरोध में उगलते हुये जलते हुये चलने वाले कुछ प्रमुख ज्वलंत मुद्दों को चुनावी मैदानी मुद्दो से हटाकर, महत्वहीन कर, चुनाव को उन्होने मोदी विरूद्ध मोदी पर केन्द्रित कर दिया। क्योंकि राहुल गांधी का व्यक्तित्व तुलनात्मक रूप से मोदी के सामने दूर-दूर तक नहीं टिक पा रहा था। भाजपा  नेतृत्व प्रबंधक मोदी के व्यक्तित्व को जितना बड़ा बनाते गये, राहुल गांधी से लेकर अन्य समस्त विपक्षी नेता उनके सामने उतने ही बौने सिद्ध होते गये। मोदी के व्यक्तित्व की विराटता के सामने लगभग शून्य की स्थिति होने के कारण मोदी की यह विराट जीत संभव हो पायी। कुल 542 सीटों की तुलना में तो 303 सीटों की जीत बहुत ज्यादा नहीं होती है, क्योंकि पूर्व में कांग्रेस एक बार 514 में से (27 सीटों में बाद में हुये थे) 406 सीटे प्राप्त कर चुकी है। पूरे देश के संदर्भ में चुनावी परिणाम का आंकलन के लिये यदि हम एक ही लाठी से हाकेगें तो कहीं न कहीं हम गच्चा खा जायेगंे। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि पूरे देश में भाजपा का एक जैसा पूर्ण प्रसार नहीं हो पाया है, जैसा कि कभी कांग्रेस का था। हिन्दी भाषी राज्य, दक्षिण के राज्य और नार्थ ईस्ट के राज्य तीनों क्षेत्रों की स्थितियां, परिस्थतियां, भूगोल व राजनीति अलग-अलग हैं। यदि राजनीति को इन तीनों भागों में बांटकर भाजपा की उपलब्धि पर विचार करंे तो निश्चित रूप से यह मोदी की सूनामी ही कहलायेगी व 303 का आंकडा ज्यादा प्रभावी दिखेगा। 
अंत में जनता की परिपक्वता को आधार मानकर कहा जा सकता है कि हमारे देश की जनता भी अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के समान सीधे मत देने योग्य व सक्षम हो गई है, यह चुनाव परिणाम से सिद्ध होता हैं। इसीलिए यह परिणाम हमें इस बात पर गहनता से सोचने का विकल्प भी देता है कि (हमारे) देश में राष्ट्रपति प्रणाली अपनायी जाए तो क्या वह बेहतर सिद्ध होगी? सोशल मीडिया में भी यह टिप्पणी हुई है कि पहले एमपी के द्वारा पीएम चुने जाते थे और अब पीएम के द्वारा एमपी चुने गये है जो देश की लोकतंात्रिक प्रणाली के लिये स्वास्थवर्धक नहीं है। देश के सभी सम्माननीय मतदाताओं को मत का सही उपयोग कर स्पष्ट निर्णय लेने के लिए पुनः हार्दिक बधाईयाँ। लोकतंत्र और परिपक्व हो ताकि देश के विकास में रूकावटें कम होती जायें क्योंकि कमजोर लोकतंत्र ही देश के विकास की राह में रूकावट बनती है। इन्ही शुभकामनाओं के साथ, आगामी पांच साल की अग्रिम सफलता के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयां इस विशिष्ट टिप्पणी के साथ दे रहा हूँ कि उन्होने 10 प्रतिशत का आर्थिक आधार पर जो सवर्णो को आऱक्षण दिया है, उसकी तय आर्थिक सीमा को कम कर बीपीएल की तय सीमा के निश्चित  कर समस्त नागरिक को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जावें, जो न केवल आमजनों की लोकप्रिय मांग है, बल्कि देश के सर्वगीण सर्व वर्ग विकास के लिये पोषक तत्व भी सिद्ध होगी।

बुधवार, 15 मई 2019

‘‘ममता बनर्जी’’ का बयान ‘‘मैं मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानती’’ क्या संघ वाद पर कुठाराघात नहीं?

भारत देश कुल 29 राज्य व 7 केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलाकर संघ (यूनियन) बना है। देश का एक प्रमुख पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल की तेजतर्राट मुख्यमंत्री दीदी का यह क्षोभ पैदा करने वाला बयान आया कि नरेन्द्र मोदी को मैं प्रधानमंत्री नहीं मानती हूँ। उनका यह बयान जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक नेताओं महबूबा मुफ्ती, फारूख अब्दुल्ला के तथाकथित अलगावादी कहेे जाने वाले बयानों के साथ अलगाव कार्य नेताओं से भी ज्यादा खतरनाक नहीं है? हम सब जानते है कि भारत में संघीय लोकतंात्रिक संसदीय व्यवस्था है। वर्ष 2014 में हुये पिछले आम चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में देश की जनता ने पहली बार पूर्ण बहुमत से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को विजय श्री दिलाई और संवैधानिक रूप से नरेन्द्र्र मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री चुने गये। 
देश की लोकतंात्रिक व्यवस्था के द्वारा चुने गये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति दूसरी चुनी हुई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उक्त कथन निश्चित रूप से पूर्णतः अराजक व संवैधानिक व्यवस्था की चूल को हिलाने वाला है। आश्चर्य तो इस बात का है उनके इस अमर्यादित व अलोकतांत्रिक कथन पर पूरे देश के मीडिया से लेकर राजनैतिक विश्लेषको, राजनैतिक नेताओं, पार्टियांे व विशाल बुद्धिजीवी वर्ग की जो त्वरित प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी, वैसी न होना भी एक निराशा लिये हुये आश्चर्य जनक दुखद पहलू है। यही देश की राजनीति का दुर्भाग्य भी है। 
अभी-अभी आया ममता का यह बयान न केवल वास्तव में बहुत ही नग्न है, बल्कि कल्पना से परे राजनीति के निम्नतर स्तर का है कि जहाँ उन्होंने यह कहा कि नरेन्द्र मोदी बंगाल में आकर झूठ बोलते है और हाथ उठाते हुई वह यह कहती है कि ‘‘मन करता है मैं उन्हे लोकतंत्र का जमकर थप्पड़ मारू’’ मैं समझता हूँ कि अब वे दीदी कहलाने की अधिकारी भी नही रही है। इसके पूर्व वे पीएम के मुह पर सर्जिकल टेप व उनके होठो पर ब्यूकोप्लास चिपकाने की बात कह चुकी है। ताकि  मोदी झूठ न बोल सके। जय श्री राम के नारे पर उनकी घुड़की को भी सारा देश देख चुका है। अमित शाह ने आज जो ममता को लेकर बयान दिया है, वह शायद भविष्य की कार्यवाही की ओर इंगित करता है जब चुनाव के बाद ममता की सरकार को कहीं भंग न कर दिया जाये। ममता के द्वारा इस आम चुनाव में अभी तक जो बहुत ही ‘‘प्रिय ममतामयी वाणी’’ का उद्गार उदघोषित हो रहा है उसके लिये उक्त कार्यवाही ही शायद अंतिम विकल्प व सही जवाब होगा।
ममता का मोदी के चक्रवाद फानी के संबंध पर फोन पर बात न करने के बयान को लेकर जो पलटवार किया है कि मैं मोदी की नौकर नहीं हूँ राजनैतिक अशिष्टता की निम्नतर श्रेणी है। चक्रवाद फानी के संबंध में सहायता देने के संबंध में बुलाई मीटिंग में मुख्यमंत्री के बदले मुख्य सचिव को बुलाये जाने पर ममता ने यह तर्क देकर कि यह एक संघीय ढाचा हैं, आप मुख्यमंत्री के बिना मिटिंग कैसे कर सकते है, बयान देकर जो पलटवार किया, वह उनकी दोगली व दोहरी नीति को ही दर्शाता है। एक तरफ संघीय ढ़ाचे के होते हुये चुने हुये प्रधानमंत्री मोदी को न केवल एक्सपायरी प्रधानमंत्री कह रही है बल्कि उन्हे प्रधानमंत्री मानने से ही इंकार कर दिया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यसचिव को बुलाने पर संघीय ढाचे की दुहाई का तर्क दे रही है।  
वर्तमान राजनीति में खासकर चुनावी दौर में मतभेदों का मनभेदों की सीमा तक ले जाना भी सामान्य प्रक्रिया मानकर उसे सहन किया जा सकता है। लेकिन यदि इसे उस सीमा तक ले जाया जाये कि वह देश व संविधान के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दे, संवैधानिक व्यवस्था को आखंे दिखाने वाला हो, तो यह स्थिति किसी भी रूप में स्वीकार योग्य नहीं हो सकती हैं। एक समय एनडीए के सदस्य रही ‘‘प्रिय’’ भाजपा के नेतृत्व में बनी सरकार में मंत्री रही ममता दीदी का भाजपा व मोदी के विरूद्ध इस तरह की लगातार घृणा-स्पद लिये हुये बयान क्या उनकी निराशा हताशा को नहीं दिखाता है? खासकर उक्त बयान पर तो राजनीति से परे सार्वजनिक जीवन के समस्त पक्षों को उनके विरूद्ध कानूनी व कड़े राजनैतिक कदम उठाये जाने की आवश्यकता नहीं है क्या? वर्ष 2019 के आम चुनाव में सत्ता व विपक्ष के बीच सबसे ज्यादा खटास लिये हुये रण उत्त्तर-प्रदेश, बिहार से भी ज्यादा जो दिखाई दे रहा हैं वह पश्चित बंगाल ही है। इस तूनक मिजाजी मुख्यमंत्री ममता के बयान पर देश के उन तथाकथित लेखक बुद्धिजीवियों व अवाडऱ् वापसी गैंग के बयान नहीं आये जो पूर्व में देश में घटित हुई कई घटनाओं के चलते जैसा सेना शोर्य का चुनाव में उपयोग पर आये हुआ बयान हो या मीटू का मामला हो, या असहिष्णुता के मुद्दे पर राष्ट्रीय पुरस्कार पद्म-श्री लौटाने का मामला हो, इत्यादि-इत्यादि घटनाओं के संबंध में बयान देने में एक मिनट की भी देरी नहीं करते रहे है।  

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