गुरुवार, 18 जून 2015

मानवीय संवेदनाएॅं - मानवाधिकार - कानून से कितने ऊपर ?

पिछले 48 घंटो से पूरे मीडिया में ‘‘मोदी’’ ही छाए हुये है। फिर चाहे वह ललित मोदी हो या कुछ अंशो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मानवीय संवेदनाओं के आधार पर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर एक फरार घोषित (वांटेड) आरोपी जिसके विरूद्ध एक तथाकथित लुक आउट वांरट जारी किया गया है (ऐसा कुछ क्षेत्रों में कहा गया है) कि उनकी केसर पीडित पत्नी की सहायता के लिए दी गई सुविधा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसलिये की वे भारत सरकार के लिये आर्थिक व आपराधिक मामले में एक वांटेड आरोपी है जिस पर कोई विवाद नहीं है। जिस तरह की परिस्थितियॉं ,घटनाएॅ इस मामले में अभी तक सामने आयी है, क्या वह सिर्फ मानवीय संवेदनाओं या अन्य तथ्यों.....के आधार पर उत्पन्न हुई है, इस पर एक प्रश्न चिन्ह अवश्य लगता है। 
जहॉं तक मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है एक मानव व नागरिक होने के नाते मानवीय संवेदनाओं का होना न केवल स्वाभाविक है बल्कि यह अत्यन्त आवश्यक भी है। इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता है। जब हम एक घोषित सजायाफ्ता आरोपी के मानवाधिकार को जो कि मानवीय संवेदनाओं पर ही आधारित होता है, का न केवल नैतिक रूप से सर्मथन करते है बल्कि अंतराष्ट्रीय न्यायालय एवं हमारे उच्चतम न्यायालय भी इसको मान्यता प्रदान करते है। यद्यपि मानवाधिकार का कोई लिखित काूनन हमारे संविधान में नहीं है। तब फिर भारतीय नागरिक की की पत्नी के विदेश में इलाज और उसका जीवन बचाने के लिए एक भारतीय महिला द्वारा स्वास्थ लाभ प्रदान करने के लिये मानवीय संवेदना के आधार पर सुविधा उपलब्ध कराने पर इतना हाहाकार क्यों ? प्रश्न यही से उत्पन्न होता है लेकिन उत्तर निरूत्तर होकर आरोप व प्रत्यारोप में उलझ सा गया है। क्या सुषमा स्वराज ने सिर्फ और सिर्फ मानवीय संवेदनाओं के आधार पर ही ललित मोदी को सहायता दी थी या फिर इसमें अन्य कोई तथ्य परस्पर - स्वार्थ पूर्ति व नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगे हुए है, इस बात की राजनैतिक आरोप - प्रत्यारोप से परे गहरी विवेचना किया जाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सके।
                किसी की जान बचाने के लिए छोडा जाने के पीछे मानवीय संवेदना का ही मुख्य रूप से आधार होता है जब पूर्व में केन्द्रीय मंत्री मुफ्ती मोहम्मद (वर्तमान में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री) की बिटिया को छुडाने के लिए पाकिस्तानी आंतकियों द्वारा किये गए विमान के अपहरण को छुडाने के लिए देश की संप्रभुता एवं आंतरिक स्थिति पर गहरा आघात करने वाले खुंखार आंतकवादियों को मानवीय आधार पर छोडा जा सकता है। तब इसी परिप्रेक्ष्य में सुषमा स्वराज द्वारा की गई कार्यवाही को देखे तो इसकी चर्चा भी मीडिया में नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि इस घटना के सिक्के के को देखे तो इसकी चर्चा भी मीडिया में नहीं होनी चाहिएा। लेकिन यदि इस घटना के सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए जो स्थिति कुछ और ही नजर आती है। 
             सुषमा स्वराज पिछली लोकसभा में विपक्ष की नेता रहने से लेकर वर्तमान में भारत सरकार की विदेश मंत्री है जिनके ललित मोदी से पारिवारिक संबंध है , इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता है। ललित मोदी के आपराधिक प्रकरण को सुषमा स्वराज की पुत्री बांसुरी द्वारा मुख्य वकील यू यू ललित के साथ केस लडने से लेकर सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौेशल जो कि ललित मोदी के 22 साल से वकील है, द्वारा अपने भतीजे के संबंध में यू.के. में यूनिर्वसिटी में प्रवेश के लिए ललित मोदी से मांगी गई सहायता (जो उनको मिली भी) से उनके पारिवरिक संबंध व आर्थिक हित सिद्ध होते है। यदि एक नागरिक को किसी घोषित भगोडा आरोपी के संबंध में कोई जानकारी मिलती है तो उसका यह नागरिक दायित्व होता है कि वह पुलिस को तुरंत उसकी जानकारी देकर गिरफ्तारी करने में सहयोग करे। जब सुषमा स्वराज का घोषित अपराधी ललित मोदी से लगातार संपर्क रहा हैं और पारिवारिक संबंध रहे हैंे तब उन्होनें उसी समय ललित मोदी को स्वदेश आकर समर्पण कर देश के कानून का सामना करने की सलाह क्योें नहीं दी। (फिर चाहे भले ही वे उसे नहीं मानते ?) यह एक प्रासंगिक प्रश्न है। यदि उन्होने ऐसी कोई सलाह दी थी तो ऐसा कोई कथन इस संबंध में पिछले 48 घंटो में सुषमा जी का नहीं आया है। मेैं यह सोचता हूॅ कि मुद्दे का यही टर्निग पांईन्ट है। या तो उनसे सलाह न देने में चूक हुई है जो उनका एक संवैधानिक दायित्व था या उन्होनें एक पारिवारिक मित्र की हैसियत से व पूर्व से ही अनुग्िरहत होने से एवं हितो के टकराव के कारण व उनके परिवारक आर्थिक (लाभ) के संबंधों के मंद्देनजर पद का उपयोग कर उन्हे फायदा पहुॅचाया गया। मैं इसे पद का दुरूपयोग नहीं कहूॅगा क्योंकि सुषमा जी की छवि अभी तक इस तरह की बिलकुल नहीं रही है। वीजा की समयावधि और सीमा को लेकर अनेक प्रश्न दिनभर चर्चित रहे जिसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन स्वयं सुषमा जी का बचाव निश्चित रूप से उन्हें कमजोर सीढी पर ही खड़ा करता है क्यांेकि जिस चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर ललित मोदी की व्यक्तिगत उपस्थिति उनकी पत्नी के इलाज के समय सहमति देने के लिये पुर्तगाल में जरूरी थी जिस आधार पर उन्होंने हस्तक्षेप किया, लेकिन पुर्तगाल का कानून ऐसा नहीं कहता है। जिस नैतिकता को लेकर उन्होंने सार्वजनिक जीवन की जिन उचाईयांे को अभी तक पाया है उनके समान बिरले ही मंत्री राजनैतिज्ञ होगंे। अतः उन्हें अपनी असावधानी पूर्वक हो गई गलती को स्वीकार कर नैतिक मूल्यों के आधार पर इस्तीफा देकर लाल बहादुर शास्त्री जी की लाईन में खडे हो जाना चाहिए, जनता उन्हे अपने सिर पर बैठायेगी। 
             अन्त में लेख लिखते समय ललित मोदी ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वंसुधरा राजे सिंधिया को भी लपेटे में ले लिया जैसा कि ब्रेकिंग न्यूज में आ रहा है जिस पर प्रथक से चर्चा आगे की जायेगी।

शुक्रवार, 12 जून 2015

‘‘आप’’ की ‘‘नैतिकता’’ आप ‘के’ लिये

राजीव खण्डेलवाल:
   ‘‘आपकी’’ नैतिकता का पैमाना ‘‘आप’’ के लिए अलग तथा स्वयं के लिये दूसरा। दिल्ली के कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर पद पर रहते हुये गिरफ्तार हुये व उसके बाद अभी तक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा उन्हें मंत्री पद से न हटाया जाना शायद भारतीय राजनीति के इतिहास का यह दूसरा अवसर है। गिरफ्तारी के तरीके के मुद्दे पर बहस की जा रही है। उसे राजनैतिक बदले की भावना की कार्यवाही बताया जा रहा है। लेकिन इन सबसे हटकर ‘आप’ राजनीति में नैतिकता, मर्यादा व सिंद्धान्त के मुद्दे कोे लेकर राजनीति में नई प्रविष्ट कर राजनीति को नई दिशा देने का सफल प्रयास किया जा रहा था। लेकिन पिछले कुछ समय से आप में जो कुछ चल रहा है,तब से लेकर अभी तक जब दिल्ली के कानून मंत्री की गिरफ्तारी हई, उससे उक्त नैतिकता व सिंद्धान्तों की अस्मिता तार - तार हो कर राजनीति के गंदे तालाब में समुद्र की गहराई तक घुस गई। 
    याद कीजिए ‘‘आप’’ के प्रारंभिक बयानों को जिनमें दूसरे नेताओं व मंत्रीयों पर आरोप लगने के तुरंत बाद जॉच के निराकरण होने तक तथा न्यायालय के निर्णय आने तक इस्तीफा मंागे जाते रहे थे। अब वही सिद्धान्त (स्टेण्ड) आप द्वारा अपने कानून मंत्री के लिए क्यों नहीं अपनाया जा रहा है? यह बिंदु समझ से परे है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि राजनीति में आने के बाद राजनैतिकों पर ‘‘राजनीति’’ अपना प्रभाव जरूर डालती है। जो भी व्यक्ति राजनीति को सुधारने के लिए उसके   राजनीति के सम्पर्क में आता है राजनीति स्वयं बदलने के बजाय उस व्यक्ति को ही बदल कर अपने ही रंग (दोष) में रंग लेती है जिस प्रकार पारस पत्थर कार्य करता है। यदि राजनीति एवं बदले की भावना के आधार पर उपरोक्त गिरफ्तारी की गई तो क्या दिल्ली के गृहसचिव धर्मपाल का स्थानांतरण गुण दोष के आधार पर किया गया है अथवा राजनैतिक द्वेष की भावना से किया गया है? केजरीवाल को यह समझना होगा कि ‘‘उनका कथन ही पत्थर की लकीर’’ है यह भ्रम ठीक नहीं हैं जैसा कि उन्होनें कानून मंत्री की डिग्री के मामले में अपना संतोष व्यक्त कर उसे ठीक बतलाया था। केजरीवाल को समझना यह होगा कि वे ‘‘सीताराम केसरी’’ (कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष) के समान व्यक्ति नहीं है जिनके बाबत यह कहा जाता रहा कि ‘‘न खाता न बही जो ‘केसरी’ कहे वही सही’’। 
    केजरीवाल ने प्रांरभ में जिस सैद्धांतिक राजनैतिक प्रक्रिया को प्रारंभ किया था व उसको बढाने का प्रयास किया था, लगता है वह अब मृतपाय होती जा रही है। वास्तव में केजरीवाल उन करोडो लोगो की आशाओं व भावनाओं पर तुषाराघात कर रहे है, जिन्होने नैतिकता व सिद्धान्त की चमक की उम्मीद केजरीवाल की राजनीति से की थी। यदि वे तुंरत अपने कानून मंत्री से इस्तीफा ले लेते तो ‘सिंद्धान्त की राजनीति ’में थोड़ा उपर उठ जाते जो अवसर उन्होनें खो दिया है। इस घटना ने उसी सामान्य ज्ञान को पुनः सही सिद्ध किया है कि राजनीति में सभी एक ही थैली के चट्टे बटृे होते हैं। अब देश के नागरिको को फिर अन्य किसी केजरीवाल को ढूढना होगा। यह देश का दुर्भाग्य है कि यहॉं जनता किसी व्यक्ति को केजरीवाल या अन्ना बनाने का प्रयास नहीं करती है ,बल्कि जो व्यक्ति अपने को अन्ना या केजरीवाल जिस भी रूप में प्रस्तुत करता है जनता उसे रूप में स्वीकार कर लेती है। अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त करने हेतु जनता को अपनी सोच बदलना होगा व उसे भी व्यक्तित्व गढ़ने में अपने खून पसीने का कुछ अंश समर्पित करना होगा। 

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)

शुक्रवार, 5 जून 2015

मैगी पर ‘‘बवाल’’ 32 साल से जमा ‘‘उबाल’’ ! सभी खाद्यान्नों पर सवाल?


    नेस्ले के खाद्य उत्पादन मैगी के विक्रय पर दिल्ली और केरल सरकार ने न केवल बिक्री पर प्रतिबंध लगाया बल्कि बिहार की अदालत में मैगी के ब्रॉड एंबेसेडर अमिताभ बच्चन ,माधुरी दीक्षित ,प्रीति जिंटा पर प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश भी दे दिये। विगत तीन दिवस से अन्य प्रदेशो में भी इस पर कार्यवाही करने के संकेत मिल रहे है। अच्छे दिन आये हैं की भावना के साथ उक्त कार्यवाही सतही रूप से बिल्कुल ठीक लगती है लेकिन निश्चत रूप से उक्त कार्यवाही भेदभाव पूर्वक होने के कारण प्रश्न चिन्ह भी लगाती है। नेस्ले के प्रोडक्ट मैगी के अतिरिक्त अन्य कंपनीयों केे इसी प्रकार के उत्पादको को लेबोटरी जॉच कर उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? पिछले 32 सालो से मैगी बिक रही है। अचानक क्या अब उसमें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व पाए गये हैं? प्रश्न यह है कि मैगी की संरचना में जो हानिकारक खाद्य तत्व अब पाये गये है क्या 32 सालो से उन्ही तत्व का उपयोग हो रहा था? यदि हॅा तो 32 सालो से समस्त राज्य सरकारे व केन्द्र सरकार के अधीन जॉच करने वाली प्रयोग शालाएॅ (लेब) क्या सो रही थी? उन्हे नियमित जॉच कर नेस्ले कम्पनी के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश देना चाहिए था। प्रश्न यह भी उठता है इस पर माननीय अदालत ने प्रोडक्ट की कंपनी के खिलाफ ही नहीं बल्कि उक्त उत्पाद का प्रचार करने वाले ब्रांड एंबेसेडर के खिलाफ तो आपराधिक कार्यवाही की। लेकिन उस उत्पाद के प्रमोशन करने के लिए साधन व प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के लिए और उसे प्रसारित करने लिए समस्त प्रिन्ट/इलेक्ट्रनिक मीडिया जिसने उसी प्रकार पैसे लेकर मैगी का विज्ञापन व प्रसार किया जिस तरह ब्रांड एंबेसेबर ने पैसे लेकर उक्त ब्राड के विज्ञापन का प्रमोशन किया एके खिलाफ कोई कार्यवाही क्यो नहीं की ? 
    चॅूकि घातक उत्पादनों पर पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। इसलिए इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जब मैगी मंे मोनोसोडियम, ग्लूटामेट की मात्रा अधिक तथा सीसे की घातक मात्रा पाई गई तब पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध क्यो नहीं लगाया गया। इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाय तो एक तरफ सरकार सिगरेट के विषय में वैधानिक चेतावनी ‘‘स्वास्थ के लिये हानिकारक है ’’के साथ बिक्री बढाने के लिए विज्ञापन की अनुमति देकर खजाना भर रही है तो दूसरी ओर कई ब्रांड एंबेसेबर अनेकांे प्रोडक्टस का विज्ञापन कर रहे हैं। वास्तव में यह समय की आवश्यकता है कि सरकार राष्ट्रीय नीति बनाये और जो भी खाद्य पदार्थ स्वास्थ के लिए हानिकारक हैं देश में उनके उत्पादन /आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाये व उनके विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाया जाये ताकि देश व देश का स्वास्थ ठीक रखने के लिए देश में उत्पादित/आयात होने वाले किसी भी प्रकार के खाद्य संपूर्ण हानि रहित हांे तथा न केवल मैगी अपितु अन्य किसी भी हानिकारक खाद्यों के कारण होने वाले खाद्य सुरक्षा पर व्यय (खर्च) एंवं तकलीफ से नागरिकों को बचाया जा सके। इससे सरकार को एक ओर जहॉ प्रारभिक राजस्व का नुकसान होगा जिसकी क्षतिपूर्ति देश की अन्य पापुलर योजनाओं के नाम पर होने वाले अरबो रूपये के अनुत्पादक व्यय (जिसकी मात्र 10 प्रतिशत राशि ही जरूरतमंद व्यक्ति के पास पहॅुचती है) को बचाकर की जा सकती है। अपेक्षा कड़क है। निर्णय एवं कार्यवाही उससे भी कड़क हो, इसलिए ‘‘एक कठोर व्यक्ति ही अच्छे दिन आयंेगे के नारे को असली’’ जामा पहनाने के लिये ऐसे कठोर निर्णय ले सकता है, और तभी जनता की अग्नि परीक्षा से गुजर कर देश की आर्थिक स्थिति में बदलाव ला सकता है।  

गुरुवार, 4 जून 2015

Pregnant women who exercise are less likely to have a Caesarean or give birth to a large baby

  • Exercising cuts Caesarean risk by 20% and chance of large baby by 31%
  • It raises the chance of giving birth to a baby that is normal weight
  • Babies born large tend to be heavier as children and into adulthood
  • Advising expecting women to exercise could prevent childhood obesity

Pregnant women have Caesarean exercise reduces the risk of the fifth, according to a new study.
They also nearly one-third less likely to give birth to a big baby, the study showed.
Previous studies suggest that larger babies are more likely to have weight problems as adults.
Physical exercise and increase their chances of normal weight infants, Canadian scientists say.

Play Exercises For Pregnant Women

Exercises in Preparation for Delivery for 7-9 months pregnant

Pregnant women who exercise have cut a fifth of the risk of caesarean section, a study finds

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  • It raises the chance of giving birth to a baby that is normal weight
  • Babies born large tend to be heavier as children and into adulthood
  • Advising expecting women to exercise could prevent childhood obesity

Pregnant women have Caesarean exercise reduces the risk of the fifth, according to a new study.
They also nearly one-third less likely to give birth to a big baby, the study showed.
Previous studies suggest that larger babies are more likely to have weight problems as adults.
Physical exercise and increase their chances of normal weight infants, Canadian scientists say.

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