बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

"आत्मरक्षा का अधिकार’’ ‘‘वास्तविकता में है! कितना’’?*‘‘पुलिस संज्ञान‘‘ के लिए कानून में संशोधन कीआवश्यकता.

*-:लेख का सार:-*.                  राजीव खण्डेलवाल
'‘आत्मरक्षा के अधिकार’’ की बात इसीलिए ध्यान में आयी, क्योंकि हाल ही में घटित उत्तर प्रदेश में ‘‘बलिया गोलीकांड‘‘ में आरोपी ठाकुर धीरेन्द्र प्रताप सिंह के द्वारा गोली चालान से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई, व हिंसा में दूसरे पक्ष के भी कई लोग घायल हो गयें । उक्त घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुयें वहां के विधायक सुरेन्द्र सिंह ने जातिवाद (ठाकुर) के आधार यह दावा किया। शासन और ला कमीशन व विधायिका का यह दायित्व है कि वह भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता में आवश्यक उचित संशोधन करके पुलिस की विभिन्न जांच एजेंसी को जांच के दौरान उक्त अधिकार के अस्तित्व मे पाए जाने पर उसका संज्ञान लेने का अधिकार दिया जावे। ताकि इस आधार पर एक निर्दोष व्यक्ति का गैरकानूनी ट्रायल न होकर उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रह सकें।                                                                               
राजीव खण्डेलवाल
                                                                                                                               ‘‘भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से 106 तक’’ में प्रत्येक नागरिक को ‘‘संपत्ति’’ और ‘‘जान’’ की ‘‘सुरक्षा’’ के साथ-साथ परिवार की सुरक्षा के लिये भी ‘‘आत्मरक्षा’’ का मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। इसका मूल आधार व सिंद्धान्त यह है कि, कई बार घटित हो रही हिंसक अपराधिक घटनाओं में हिंसा के शिकार ‘‘भुगतयमान नागरिकों’’ को इतना वक्त भी नहीं मिल पाता है कि, वे अपने बचाव के लिए पुलिस सहायता की मांग कर पाये। तब ऐसी स्थिति से निपटने के लिये ही यह आत्मरक्षा का अधिकार दिया गया है। आत्मरक्षा का अधिकार सिर्फ कानूनी ही नहीं, बल्कि मौलिक भी है। आत्मरक्षा का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन के अधिकार के तहत आता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में इस बात पर जोर दिया हैै कि, राइट टू सेल्फ डिफेंस एक मौलिक अधिकार है। परन्तु गाली गलौज के खिलाफ राइट टू सेल्फ डिफेंस उपलब्ध नहीं है। यानी अगर कोई आपको गाली देता है, तो आप इसके जवाब में उसको गाली नहीं दे सकते हैं। आत्मरक्षा का अधिकार सिर्फ शारीरिक हमले के खिलाफ ही उपलब्ध है। यह अधिकार पूर्ण रूप से अबाघित नहीं है, बल्कि इसमें सबसे बड़ा प्रतिबंध यह है कि, एक नागरिक को आत्मरक्षार्थ केवल उतने ही प्रतिरोधी बल का उपयोग करने की विधिक स्वतंत्रता है, जितनी परिस्थितियों में अति आवश्यक है। 
‘‘आत्मरक्षा के अधिकार’’ की बात इसीलिए ध्यान में आयी, क्योंकि हाल ही में घटित उत्तर प्रदेश में ‘‘बलिया गोलीकांड‘‘ में आरोपी ठाकुर धीरेन्द्र प्रताप सिंह के द्वारा गोली चालान से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई, व हिंसा में दूसरे पक्ष के भी कई लोग घायल हो गयें । उक्त घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुयें वहां के विधायक सुरेन्द्र सिंह ने जातिवाद (ठाकुर) के आधार यह दावा किया (जबकि अभियुक्त ने ऐसा कोई दावा नही किया था) कि आरोपी ने अपनी व परिवार की जान की सुरक्षा में आत्मरक्षार्थ गोली चलाई। आगे वे एक तथ्यात्मक महत्वपूर्ण बात कहते है कि, यदि वह गोली चालन नहीं करता तो, उसके परिवार के 10-12 लोगों की हत्या हो जाती, जो कुछ सदस्यों के घायल होकर अस्पताल में भर्ती होने से सिद्ध है। वास्तव में आत्मरक्षा का यह अधिकार भारतीय दंड संहिता में वर्णित है और उसको हमारी न्यायिक प्रणाली ने भी मान्यता दी है। इसी कारण इस आधार पर कई हत्या के अपराधियों को न्यायालयों ने छोड़ा भी है।
प्रश्न यहाँ पर यही उत्पन्न होता है कि, क्या वास्तव में यह अधिकार कानून्न व न्यापालिका द्वारा मान्यता देने के बावजूद वास्तविकता लिये हुये व्यवहारिक रूप से एक नागरिक को प्राप्त है? यह प्रश्न इसलिए भी पैदा होता है कि आपराधिक न्यायशास्त्र में पुलिस की विभिन्न जांच एजेंसीज, एस.टी.एफ. सीबीआई सीआईडी आदि की एक निर्धारित जांच प्रकिया होती है। परन्तु जांच की इस प्रक्रिया में नागरिक के आत्मरक्षा का अधिकार के संज्ञान लेने का कोई अधिकार या प्रावधान जॉच टीम को नहीं है। मतलब जांच के दौरान जांच टीम यदि यह पाती भी है कि हिंसा का शिकार अभियोगी ने उक्त आत्म रक्षा के अधिकार के तहत निर्धारित सीमा के अधीन ही अपनी जान व सम्पत्ति की सुरक्षा करते हुये आवश्यक बल का प्रयोग किया हैं। और तदनुसार हमलावर आरोपी की मृत्यु होती है, तब वह ‘‘हत्या‘‘ का ‘‘आरोपी‘‘ नही है, यह तय करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ न्यायालय को ही है। अर्थात जॉच में पाए गये तथ्यों के आधार पर उक्त निष्कर्ष पर पहूंचने के बावजूद जांच अधिकारी इस निष्कर्ष का संज्ञान लेकर उस अभियुक्त को छोड़ नहीं सकते है और उसके विरूद्ध धारा 302 के अंतर्गत अपराध पंजीयत करके न्यायालय में चालान प्रस्तुत करना ही होगा। 
लेकिन इसी अधिकार से जुडी हुई एक हास्यास्पद बात यह भी है, कि एक अपराधी के प्रथम सूचना पत्र में धारा 302 के अपराध के लिये नामित (दर्ज) होने के बावजूद भी, यदि जांच के दौरान पुलिस जांच, सीआईडी जांच या अन्य कोई जांच या समक्ष अधिकारी या न्यायालय के आदेश के अंतर्गत की गई जांच अधिकारी यह पाते है कि, उसके विरूद्ध धारा 302 के अंतर्गत अपराध नहीं बनता हैै, तो वहां पर पुलिस को यह ‘‘अधिकार‘‘ है कि वह आरोप पत्र से उस अभियुक्त का नाम हटा कर शेष अभियुक्त/अभियुक्तों के विरुद्ध न्यायालय में चालान प्रस्तुत कर दे। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि, जब एक अभियुक्त को 302 का ट्रायल हुये बिना जांच के दौरान पाये गये तथ्यों के आधार पर पुलिस को उसे अभियुक्त न मानने का अधिकार है। तब यही सिंद्धान्त पुलिस के लिये आत्मरक्षा के अधिकार का संज्ञान लेने के लिये क्यों नहीं लागू किया जाता? 
इस क्षेत्र से जुड़े हुये न्यायविद्व, फौजदारी अधिवक्तागण, बुद्विजीवीगण और मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्यिों की तरफ से पुलिस को यह क्षेत्राधिकार देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता में आवश्यक संशोधन किये जाने की मांग क्यों नहीं आई? यह एक बड़ा अनुत्तरित प्रश्न है? इस आवश्यक सुधार के लिए समस्त संबंधितो सहित शासन को भी गंभीरता से इस पर विचार करने की आवश्यकता है। वह इसलिए कि हमारी न्यायिक प्रणाली में कई बार दी गई सजा भुगतने की बजाए बजाय सजा देने की प्रकिया से गुजरना ज्यादा कष्टदायक भुगतयमान होता है। अर्थात प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन) पर्सिक्यूशन (उत्पीडन) में बदल जाता है। मतलब लम्बी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरता हुआ आरोपी इतना उत्पीडि़त व हलकान हो जाता है कि अंततः अपराध से छूट जाने के बावजूद उसकी साख, उसका सब कुछ इस ट्रायल के दौरान समाज व परिजनों के बीच व उनकी दृष्टि में खो जाती है। जिसे किसी भी स्थिति में पुनः वापिस प्राप्त नहीं किया जा सकता है। अतः न्यायिक प्रक्रिया के व्यवहारिक कष्टकारी भुगतयमान परिणाम को यदि आप आत्मरक्षा के अधिकार के साथ रखेगें, जोड़ कर देखेंगे तब आप यह महसूस कर पायेगें कि उस व्यक्ति को वास्तविकता में क्या फायदा हुआ? जब वर्षों ट्रायल (मुकदमा) चलने के बाद आत्मरक्षा के अधिकार के आधार पर आरोपी दोष मुक्त होता है, तब वह जेलों की सलाखें से बाहर तो आ जाता है। (क्योंकि सामान्यतया हत्या के आरोपी को जमानत नहीं मिल पाने के कारण वह जेल में ही रहता है)। परन्तु यदि आत्मरक्षा के उक्त अधिकार का संज्ञान लेने का क्षेत्राधिकार पुलिस क पास भी होता तो दोषमुक्त हुए आरोपी का न्यायालय में ट्रायल ही नहीं होता और इस प्रकार उसके अनावश्यक रूप से जेल में रहने से उसकी स्वतत्रंता के मूल व कानूनी अधिकार का न्यायिक प्रक्रिया (पुलिस द्वारा नहीं) द्वारा जो उल्लंघन हो रहा है वह नहीं होता। 
कुछ रूढिवादी, प्रतिक्रियावादी या प्रतिगामी अथवा कुछ अति सक्रियता वादी लोग चोह चिल्लाहट कर यह कह सकते है कि पुलिस को यह अधिकार दिये जाने पर वह उसका दुरूपयोग कर सकती है। अधिकारों के दुरुपयोग की बात तो वर्तमान में प्रत्येक क्षेत्र में विद्यमान है। बावजूद इसके क्या हम इस आधार पर आवश्यकतानुसार नए कानून का निर्माण या विद्यमान कानूनों में संशोधन नहीं कर रहे हैं? अतः यदि भारतीय दंड संहिता की धारा 96 से 106 तक में वर्णित जान माल की सुरक्षा का अधिकार को वास्तविक अर्थो में धरातल पर उतारकर उसका लाभ एक नागरिक को देना है, तो शासन और ला कमीशन व विधायिका का यह दायित्व है कि वह भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता में आवश्यक उचित संशोधन करके पुलिस की विभिन्न जांच एजेंसी को जांच के दौरान उक्त अधिकार के अस्तित्व मे पाए जाने पर उसका संज्ञान लेने का अधिकार दिया जावे। ताकि इस आधार पर एक निर्दोष व्यक्ति का गैरकानूनी ट्रायल न होकर उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित रह सकें। अन्यथा इन अधिकारों को समाप्त किया जाना ही उचित होगा।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

‘‘न्यूटन के गति‘‘ का नियम क्या ‘‘अपराधिक राजनीति पर भी लागू होता है?

 ‘‘न्यूटन‘‘ क्या भारतीय राजनीति को ‘‘न्यूट्रल‘‘ कर देगें?


मैं विज्ञान का छात्र रहा हूं। बचपन में मैंने पढ़ा है कि ‘‘न्यूटन के गति‘‘ के तीसरे नियम के अनुसार ‘‘हर क्रिया के बराबर (समान) और विपरीत प्रतिक्रिया होती है‘‘। प्रसिध्द वैज्ञानिक ‘‘न्यूटन‘‘ ने अपनी पुस्तक ‘‘प्रिंसीपिया मैथमैटिका‘‘ (वर्ष 1687) के पृष्ठ 20 पर उक्त नियम लिखा है। यह नियम दो वस्तुओं पर बल के पारस्परिक प्रभाव के बीच के बंधन का वर्णन करता है। इसके कई उदाहरण हैं! जैसे बन्दूक चलाना, नाव चलाना, मनुष्य का तैरते हुए आगे बढ़ना, रॉकेट लॉन्चिंग आदि आदि। इस सिद्धांत को अभी तक कोई चुनौती अधिकाधिक रूप से कहीं से भी नहीं मिली है और आज भी यह नियम सर्वमान्य है। यद्यपि न्यूटन के उक्त नियम में वस्तु का आकार पूरी तरह महत्वहीन है, लेकिन कुछ चल रहे नये शोधों के अनुसार प्रतिक्रिया वस्तु के आकार पर निर्भर करती हैं। अर्थात प्रतिक्रिया क्रिया के ‘‘बराबर, कम या ज्यादा‘‘ भी हो सकती हैं। परंतु राजनीति में अथवा अपराधिक क्षेत्र में या ज्यादा सही यह कहना होगा कि राजनीति के अपराधीकृत  होते जा रहे हैं क्षेत्र में भी यह सिद्धांत लागू होता है या किया जा रहा है, जो अभी ज्ञात हुआ है। किसी ‘‘आपराधिक कृत्य‘‘ को इस नियम का तर्क देकर उसका औचित्य सिद्ध करने का दुस्साहस निश्चित रूप से आज की गिरती हुई राजनीति में बिल्कुल उसी तरह संभव है जैसे हथेली पर सरसों उगाना। यह आश्चर्य का तो नहीं, लेकिन बेहद दुखद अवश्य है।

बात उत्तर प्रदेश की है, जहां बलिया जिले के दुर्जनपुर गांव (यथा नाम तथा गांव) में हुई गोली कांड में एक व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। ‘‘बलिया‘‘ उत्तर प्रदेश का सबसे पुराना हिस्सा और बिहार सीमा से लगा हुआ वह जिला है, जहां से कभी ‘‘युवातुर्क‘‘ चंद्रशेखर  सांसद हुआ करते थे, जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने। उत्तर प्रदेश को ‘‘उत्तम प्रदेश‘‘ बनाने की घोषणा वाले लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रदेश में उनके बैरिया विधानसभा क्षेत्र के विधायक सुरेंद्र सिंग उक्त घटना के ‘‘कारण‘‘ में न्यूटन के विश्व प्रसिद्ध उपरोक्त सिद्धांत का हवाला बहुत ही बेशर्मी से दे रहे हैं, और लगातार दे रहे हैं। यद्यपि विधायक का यह कथन तो कुछ सीमा तक सही है कि, इस मामले में मीडिया सिर्फ एक पक्ष को ही उद्धृत कर रहा है। दूसरे पक्ष के भी कई लोग घायल होकर अस्पताल में भर्ती है। उनको चोट कैसे आई और इसके लिए कौन कौन जिम्मेदार हैं, इस बाबत मीडिया बिल्कुल भी ‘‘हाईलाइट‘‘ नहीं कर रहा है। न ही विधायक की मांग के बावजूद दूसरे पक्ष के विरुद्ध प्रशासन द्वारा कोई ‘‘प्राथमिकी‘‘ दर्ज की गई है। परंतु वही विधायक उसी सांस मैं हत्या के आरोपी की भर्त्सना व आलोचना करना तो दूर, बल्कि उसके द्वारा गोली चलाया जाना आत्मा रक्षा में उठाया गया कदम कहकर, आरोपी हत्यारे धीरेन्द्र प्रताप सिंह की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं, जो भाजपा का कार्यकर्ता, होकर भाजपा के सैनिक प्रकोष्ट का अध्यक्ष व उनका सहयोगी हैं। अन्यथा विधायक के कथनानुसार तो आरोपी द्वारा गोली चालन न करने पर उसके ही परिवार के दस बारह लोगों की हत्या हो जाती। यद्यपि अब स्वयं आरोपी का यह कथन वायरल हो गया है कि, उसने गोली ही नहीं चलाई। वैसे भी आत्मरक्षा में गोली चलाने से सामने वाले व्यक्तियों की मृत्यु हो जाने पर मुकदमा तो धारा 302 का ही दर्ज होगा। अभियुक्त के प्रति सुरक्षा का अधिकार को तो न्यायालय ही तय करेगीं, पुलिस नहीं। यह भी कानून में एक कमी है, जिसकी फिर कभी चर्चा करेंगे। हद तो तब हो गई जब विधायक ने आरोपी हत्यारे के आत्मसम्मान की रक्षा से जाति के आत्मसम्मान तथा स्वयं के कर्तव्य को जोड़ दिया। विधायक सुरेंद्र सिंग आरोपी द्वारा की गई गोली चालन को ‘‘क्रिया की प्रतिक्रिया‘‘ बतलाते हुए घूम रहे हैं। यह सार्वजनिक जीवन जीने वाले चुने हुए जनप्रतिनिधि के लिए शर्मसार करने वाली बात है। 

ये वही विधायक सुरेंद्र सिंह है, जो हमेशा अपने ‘‘अटपटे, उलूल, जुलुल व विवादित‘‘ बयानों के कारण मीडिया में चर्चाओं में रहते हैं। आपको याद होगाय हाथरस बलात्कार कांड पर, पहले उनका यह बयान आया था कि ‘‘फर्जी महिला के दलित उत्पीड़न के नाम पर किसी का भी जीवन संकट में पड़ सकता है‘‘। फिर बाद में इसी घटना पर यह भी कहा कि ‘‘संस्कार‘‘ से ही ‘‘बलात्कार की घटनाएं रुकेगी‘‘। यहां तक तो फिर भी गनीमत थी। लेकिन आगे वे यह कह गए कि ‘‘माता-पिता अपनी जवान बेटी को सांशारिक वातावरण में रहने का तरीका सिखाएं‘‘। लेकिन लड़कियों के साथ लड़कों को भी संस्कार देने का बात वे भूल गए। ‘‘मुसलमान कई बीवियां रखते हैं और उनकी औलादे जानवर प्रवृत्ति की होती है।’’ वे मीडिया को ‘‘दलाल‘‘ तथा डॉक्टरों को ‘‘राक्षस‘‘ तक भी कह चुके हैं। इस तरह से वह हमेशा ही विवादित बयानों  से मीडिया की सुखीयों में बने रहते हैं। तथापि विधायक के इस (दुः) साहस की प्रशंसा इसलिए जरूर की जानी चाहिए कि, वे पीडि़त परिवार के लिए उपजी सहानुभूति की धारा व भीड़तंत्र के विरूद्ध भी अपने सहयोगी कार्यकर्ता आरोपी को बचाने के लिये न केवल अपने स्टैंण्ड पर अड़े हुये है, बल्कि इसके लिए उन्होने एक हफ्तेे बाद थाना पर हजारों साथियों के साथ धरना देने की चेतावनी भी दी हैं। अन्यथा ऐसी स्थिति में तो नेता ‘‘भाग‘‘ खड़े होते हैं। और एक सर्वकालिक तकिया कलाम कह देते कि ‘‘कानून अपना काम करेगा‘‘, और स्वयं को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त मान लेते हैं।

शायद विधायक को न्यूटन का क्रिया प्रतिक्रिया का नियम का वास्तविक अर्थ मालूम नहीं है। क्योंकि न्यूटन ने जो नियम बतलाया था, उसमें क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर की लेकिन ‘‘विपरीत दिशा‘‘ में होने की बात कही थी। यहां पर  विधायक के अनुसार न्यूटन की क्रिया प्रतिक्रिया के उक्त नियम को यदि लागू कर दिया जाए तो जिस व्यक्ति ने हत्या (क्रिया) की है, उसकी प्रतिक्रिया में इस कृत्य के विपरीत उसे कार्य करना होगा। अर्थात मृतक पीडि़त व्यक्ति के घर जाकर परिवार के सदस्यों के बीच रहकर  इस तरह से प्रायश्चित करना होगा, ताकि परिवार के लोग उस व्यक्ति की कमी व दुख को भूल जाए । अर्थात हत्या का आरोपी प्रायश्चित करते करते उस दुखित, पीडि़त परिवार में स्वयं को ...हुई जगह में लगभग ‘स्थापित‘ कर ले। वास्तव में न्यूटन की यही क्रिया की प्रतिक्रिया होगी। इस संबंध में आपको प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार राजेश खन्ना ‘‘काका‘‘ की एक फिल्म शायद उसका नाम ‘‘दुश्मन‘‘/‘‘रोटी‘‘ है, की याद दिलाना चाहता हूं, जिसमें राजेश खन्ना इसी तरह का प्रायश्चित करते हैं।

न्यूटन का यह नियम राजनीति में या सार्वजनिक जीवन में अच्छे कार्यों पर क्यों नहीं लागू होता है, यह एक शोध का विषय होना चाहिए। मतलब यदि एक पार्टी राजनीति में कोई अच्छा कार्य  करती  है तो, प्रतिक्रिया में उसकी एकदम विपरीत विरोधी दूसरी पार्टी उतना ही अच्छा काम क्यों नहीं कर पाती है? प्रश्न यह है। अर्थात भाजपा और कांग्रेस परस्पर एक-दूसरे के अच्छे कार्यों से प्रेरणा लेकर और बेहतर कार्य क्यों नहीं कर पाते हैं, कर सकते हैं? ‘‘रामराज्य‘‘ लाने के लिए यह स्थिति बनानी ही होगी। ‘‘न्यूटन‘‘ को शायद यह पता नहीं था कि भविष्य में, 21वीं सदी में, राजनीतिक अपराधीकरण के क्षेत्र में भी राज नेता अपने अपराधी साथियों की चमड़ी बचाने के चक्कर में उनके नियम को अपने तरीके से लागू करेंगे? अन्यथा वह अपने गति के तीसरे नियम के साथ और एक स्पष्टीकरण इस सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए अवश्य जोड़ देते। ताकि राजनेताओं को यह सिद्धांत का उपयोग करने में ‘‘असहजता‘‘ नहीं होती। वैसे न्यूटन की ‘‘आत्मा‘‘ ‘‘आकाश‘‘ से अवश्य देख रही होगी और अपना सिर फोड़ रही होगी ,यदि उसके सिद्धांत की ऐसी फजीहत होनी थी, तो शायद वे यह नियम निर्मित ही नही करते?

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

'चिट्ठी’ से महाराष्ट्र में उठा भूचाल! मुख्यमंत्री/राज्यपाल बर्खास्त किये जाने चाहिये?

हमारे देश की लोकतंत्रीय व्यवस्था ने यद्यपि अप्रत्यक्ष लोकतंत्रीय प्रणाली अपनाई हुई है। तथापि देश का वास्तविक शासक प्रधानमंत्री ही होता हैं, जिसका चुनाव प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष संसदीय प्रणाली द्वारा होता है। लेकिन इसी व्यवस्था में तीन बड़े संवैधानिक पद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति (देश के लिये) और राज्यपाल (प्रदेश के लिए) तथा केन्द्र शासित प्रदेश के लिए ‘उपराज्यपाल’ होते है, जो पद के लिये ‘‘शोभामय’’ होने के बावजूद तकनीकि रूप से ‘‘वास्तविक’’ शासकों के ऊपर ही होते है। यह प्रश्न आज इसीलिए पुनः उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि महाराष्ट्र के महामहिम राज्यपाल महोदय ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मंदिरों को खोलने के लिए चिट्ठी लिखी हैं।

राज्यपाल को किसी भी विषय पर अपने प्रदेश की जनता के हित में मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए न केवल चिट्ठी लिखने का अधिकार है, बल्कि वे विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को जनहित में रोक कर, पुर्नविचार के लिए मंत्रिमंडल के पास वापिस भेज सकते है। कुछ विशिष्ट स्थितियों में तो वे सरकार को निर्देश भी दे सकते है। यहां तक तो ठीक है। परन्तु आज यहां पर उनके अधिकार क्षेत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न उक्त ‘चिट्ठी’ क्या वास्तव में राजनीति से परे है, जनहित में है, अथवा उनके व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के तहत लिखी गई है? इसकी विस्तृत व निष्पक्ष चर्चा किये जाने की जरूर आवश्यकता है। राज्यपाल की उक्त चिट्ठी बिल्कुल भी ‘‘राजनीति से परे‘‘ नहीं है। यदि चिट्टी के लिखें मज़मून (जो स्पष्ट रूप से राज्यपाल की निष्पक्षता को संदिग्ध बनाती है) को छोड़ भी दे तब भी राज्यपाल का गोवा के मुख्यमंत्री जहां के भी वे राज्यपाल है, को उसी मुद्दे पर अर्थात मंदिर खोलने के लिए चिट्ठी न लिखने की स्थिति, जो उनकी पूर्व राजनीतिक पृष्ठभूमि व गोवा की सरकार की राजनीतिक स्थिति ‘‘समान‘ होने के कारण ही हुई है, महामहिम के ‘‘राजनीतिक एजेंडे‘‘ को स्पष्ट रूप से उभारती है। यह चिट्ठी महामहिम ने उस वक्त क्यों नहीं लिखी, जब सरकार द्वारा ‘‘बार‘‘ खोले गए थे, जिसका हवाला इस चिट्टी में देकर उन्होंने अपने (कु) तर्क को बल देने का (असफल) प्रयास किया है।  

इसमें कोई दो मत नहीं है कि राज्यपाल भी इस देश के एक संभ्रांत नागरिक है। और नागरिक होने के नाते उनके स्वयं का व्यक्तिगत अधिकार, नागरिक अधिकार तथा संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार और मानवाधिकार उन्हें प्राप्त है। क्या ये अधिकार पद पर रहते हुये स्थगित हो जाते है? प्रश्न सबसे बड़ा यहां पर यही है। यदि इन अधिकारों में से किसी का भी उल्लघंन सरकार या संस्थागत व्यवथापिका द्वारा हो रहा है, तो उनसे लड़ने के लिए, उसका विरोध करने के लिए और उन अधिकारों की रक्षा के लिए, बात जब शासन के विरूद्ध लड़ने की हो तब, इस संवैधानिक पद पर बैठेे रहकर भी क्या राज्यपाल अपने अधिकारों की रक्षा की लड़ाई लड़ सकते है? राजनैतिक शुचिता और नैतिकता (जो आज एक दूर की एक ‘‘कोड़ी’’ हो गई है) का यह तकाजा है कि उक्त अधिकारों की लड़ाई के लिये महामहिम संवैधानिक पद से इस्तीफा देकर ही एक ‘‘नागरिक’’ की हैसियत से देश के संविधान द्वारा प्रदत्त कानून का उपयोग करते हुये अपने स्वाभिमान की रक्षा की जानी चाहिये। यही एक सही व आदर्श स्थिति होगी। परन्तु देश का यही तो दुर्भाग्य है कि, चालाक व धूर्त राजनितिज्ञों ने इस नैतिकता व आदर्शवाद को जनता से छीनकर स्वयं को इन ‘‘आवरणों’’ से ढ़ककर इतना सुशोभित कर लिया है कि इस संबंध में वे उस जनता को आदर्शवाद व नैतिकता का सिर्फ पाठ सिखाने के कार्य को ही अपना आदर्श व नैतिक होना मानते है, जिस जनता की नैतिकता व आदर्शवाद को इन नेताओं ने ही अपने कार्यो व कार्य प्रणाली के द्वारा छींना हो।

‘‘महामहिम’’ यह लिखते है, जब बाजार, माल, चित्रपटगृह सब खोल दिये गये हो, तो ‘मंदिर’ क्यों नहीं खोले जा रहे है? तंज कसते हुये लिखते हैं, ‘‘लाकडॉउन का मजाक उडाया गया था, तो अब लाकडॉउन क्यों लगाया जा रहा है।’’ महाराष्ट्र के राज्यपाल आगे लिखते हुये मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को यह भी याद दिलाते है कि वे ‘‘हिन्दुत्व’’ के मजबूत पक्षधर रहे है, और सार्वजनिक रूप से भगवान श्री राम के प्रति अपनी भक्ति भी व्यक्त की है। उनके द्वारा विट्ठल रुक्मणी मंदिर का दौरा किया गया था। लेकिन दूसरी तरफ ‘‘देवी देवताओं’’ के स्थलों को नहीं खोला गया है। आगे फिर प्रश्नवाचक कथन लिखते है, ‘‘क्या आपने अचानक खुद को धर्मनिरपेक्ष (सेकुलर) बना लिया है?’’ इस शब्द का पत्र की लेखनी में चयन न केवल देश के लिए बहुत घातक है, बल्कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति उक्त बात कहता या लिखता तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी की जा सकती है। परन्तु संवैधानिक पद पर बैठे हुये माननीय ऐसे कथन कर रहे है, तो क्या वे यह भूल गये है कि, देश के संविधान का एक प्रमुख तत्व धर्मनिरपेक्षता है व स्वयं महामहिम भी इससे बंधे हुये है? और ‘‘हिन्दुत्व होना’’ ‘‘धर्म निरपेक्षता’’ का ही भाग है, जिसे समय-समय पर न्यायालय ने परिभाषित भी किया है। तब महामहिम इन दोनों शब्दों ‘‘हिन्दुत्व’’ व ‘‘धर्म निरपेक्षता’’ को एक दूसरे के विपरीत क्यों बता रहे है? क्या धर्मनिरपेक्ष होना एक अपराध है, गाली है, तो संवैधानिक पद पर बैठे महामहिम ने एक ‘‘हिन्दुत्व’’ वाले मुख्यमंत्री के धर्मनिरपेक्ष न होने से संविधान के विरूद्ध कार्य करने के कारण उन्हे मुख्यमंत्री पद से क्यों नहीं बर्खास्त कर दिया? क्या राज्यपाल के कहने का यह अर्थ कदापि नहीं निकलता है कि महामहिम व मुख्यमंत्री सेकुलर नहीं है? 

इस बात को भी महामहिम ने ध्यान में रखना चाहिये कि देश में सबसे ज्यादा कोरोना का संक्रमण महाराष्ट्र राज्य में ही है। अतः जहां तक ‘‘बार‘ खोलने का बात है, राज्यपाल शायद इस बात को भूल गये है कि सर्वप्रथम केंद्र सरकार द्वारा जारी ‘‘एसओपी‘‘ में ही बार खोलने की बात कही गई थी। जब स्वयं केन्द्र सरकार की नजर में ‘‘धार्मिक स्थानों‘‘ की अपेक्षा ‘‘बार‘‘ खोलने की प्राथमिकता हो तो, सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकारों को इसके लिये दोषी ठहराना कहां तक उचित है? अनलॉक 5 के चलते केन्द्र सरकार स्वयं यह नहीं मान रही है कि पूरे देश में समस्त गतिविधियां पूर्ण रूप से जारी की जा सकती है। इसीलिये इन पर निर्णय लेने का विवेकाधिकार राज्य सरकारों पर छोड़ा गया है। तब राज्यपाल की यह चिट्टी जो ‘‘पत्र की चारों तरफ की सीमाएं ’’सुंदर’’ सी लिखावट के बंधन से सजी हुई आबद्ध है, क्या वह क्षेत्राधिकार का उल्लघंन करने के कारण ‘‘सुंदरता‘‘ को नष्ट करती हुई नहीं लगती है? यह स्पष्ट नहीं है कि राज्यपाल ने उक्त चिट्टी स्वयं के अधिकार के हनन होने के कारण लिखी है या उनके पास इसके संबंध में कोई ज्ञापन, मांग पत्र या शिकायत आई है, जिसे उन्होनें मात्र ‘पोस्टमैंन’ की तरह अग्रेषित किया हो? जो सामान्य रूप से एक राज्यपाल का कार्य होता है। इसीलिए उद्धव ठाकरे का यह जवाब ठीक तो हो सकता है कि ‘‘मुझे अपना हिन्दुत्व साबित करने के लिए राज्यपाल के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं हैं।’’ परन्तु यदि वे स्वयं भी संवैधानिक नैतिकता की मर्यादा का पालन करते हुये महामहिम पद की गरिमा को बनाये रखने के लिए इस तरह के बयान नहीं देते तो, शायद उनकी गरिमा व साख और ज्यादा अच्छी बनी रहती।

अंत में; राज्यपालों के मुंह तभी खुलते हैं, जब राज्यपाल जिन राजनीतिक परिवेशों व पृष्ठभूमि से आते हैं, उसी पृष्ठभूमि व विचारधारा के विपरीत या केंद्र शासित पार्टी की विरोधी पार्टियों की राज्य सरकारों के होने पर ही महामहिम ‘‘सरकार‘‘ पर निशाना साधते हुए अपने विचार व्यक्त करते हैं। अन्यथा तो वे सरकारों की हां में हां ही मिलाते रहते हैं। क्या आपने उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्यप्रदेश में इतनी वीभत्स घटनाएं होने के बावजूद वहां के राज्यपाल को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चिंता व्यक्त करते हुये देखा है? इस संबंध में राकांपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार का प्रधानमंत्री को चिट्टी लिखी जाना न केवल सामयिक है, बल्कि इस चिट्ठी में जो ‘‘तेवर‘‘ दिखाए गये हैं, वह तो और भी साहसिक है और यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता को ही दर्शाता है।

‘‘मानक’’ का रखा जाए ध्यान तो खुशनुमा हो सकता है ‘‘जीवन’’!

 14 अक्टूबर ‘‘विश्व मानक दिवस के उपलक्ष्य में’’ लेख         


आज विश्व मानक दिवस है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए मानकीकरण के महत्व के रूप में नियामकों, उद्योग और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से ‘‘विश्व मानक दिवस’’ मनाया जाता है। यह अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (आईएसओ) के स्थापना दिवस के रूप में विश्व भर में मनाया जाता है। माना जाता है कि मानकों के तकनीकी फायदे हैं और इससे उत्पादों तथा सेवाओं को बेहतर बनाने तथा इनसे जुड़े उद्योगों को अधिक कुशल बनाने में मदद मिलती है।यदि इनमें मानकों का उचित पालन न हो तो व्यक्ति का जीवन सुखमय की बजाए दुखमय हो जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय मानक दिवस प्रतिवर्ष 14 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। यह दिन उन हजारों विशेषज्ञों के प्रयासों का सम्मान करता है जो अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियर्स (एएसएमई), अंतर्राष्ट्रीय इलेक्ट्रोटेक्निकल कमीशन (आईईसी), अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन (आईएसओ), अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार जैसे मानक विकास संगठनों के भीतर स्वैच्छिक मानकों को विकसित करते हैं। यूनियन (आईटीयू), इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स संस्थान (आईईईई) और इंटरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्स (आईईटीएफ)।

14 अक्टूबर को विशेष रूप से तारीख को चिह्नित करने के लिए चुना गया था, 1946 में, जब 25 देशों के प्रतिनिधियों ने पहली बार लंदन में इकट्ठा किया और मानकीकरण को सुविधाजनक बनाने पर केंद्रित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का फैसला किया। हालांकि एक साल बाद आईएसआंे का गठन हुआ था। लेकिन पहला विश्व मानक दिवस वर्ष 1970 में ही मनाया गया था।

इस दिन की शुरुआत मानकों के विकास संगठनों के भीतर स्वैच्छिक मानकों को विकसित करने वाले हजारों विशेषज्ञों के प्रयासों को सम्मान व श्रद्धजंली देने के लिए भी की गई। मंशा थी कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक मानकीकरण की दिशा में जो भी अच्छे प्रयास किए जा रहे हैं, उनका फायदा विकासशील देशों को भी मिलेगा। इससे न केवल उनके व्यापार में बढ़ोतरी होगी बल्कि सामाजिक−आर्थिक क्षेत्र में भी बदलाव आएगा। 

मानक के माध्यम से आज पूरा विश्व एक दूसरे से जुडा हुआ है। हमारा डेबिट, क्रेडिट कार्ड प्रत्येक एटीएम मशीन से हमारे लिए पैसे निकाल देता है। किसी भी दुकान से हमारे लिए वस्तुएं खरीद सकता है। जो बल्ब हम बाजार में कहीं से भी खरीदते हैं, वो हमारे घर में लगे होल्डर में फिट आता है।यह सब मानको के कारण ही संभव हुआ है। मानकों से ही मशीन, पुर्जों तथा उत्पादों में आपस में तालमेल अत्यंत सरल हुआ है।

इस दिन को मनाने का एक और उद्देश्य है। अर्थव्यवस्थाओं के लिए मानकीकरण की आवश्यकता के प्रति जागरूकता फैलाना है। कम दाम में उत्तम गुणवत्ता के उत्पाद तैयार करने या सेवाएं देने के लिए प्रक्रियाओं को लागू करते हुए लक्ष्यों को हासिल करने की क्षमता ही दक्षता है। 

व्यक्ति के जागने से लेकर सोने तक उत्पाद व सेवाओं के मानक

:-सुबह जिस अलार्म से उठते हैं, कई बार उसके धोखा देने से लोगों को बड़ा नुकसान हुआ है।

:-जिम में कसरत करते समय यदि उपकरण मानकों का नहीं है तो लेने के देने पड़ जाते हैं। 

:-नाश्ते के लिए प्रयोग होने वाला टोस्टर कई बार हादसों को जन्म देता है। इसमें भी जरूरी हैं मानक।      

:-दांत मांजने के लिए प्रयोग होने वाला ब्रश कमतर मानक का है तो अच्छे भले दांत खराब हो जाते हैं। 

:-ऑफिस या कारोबार तक जाने के लिए प्रयोग होने वाले वाहन की कमी से कई बड़े नुकसान हुए हैं। 

:-जिस लिफ्ट में हम ऊपरी मंजिल तक जाते हैं, उसके मानकों की कमी हमें मुश्किल में डाल देती है। 

:-जिस कंप्यूटर पर हम काम करते हैं, उसका मानकों से कमतर होने से हमारा कीमती समय खराब हो जाता है। 

:-जिस भोजन को हम स्वास्थ्यवर्द्धक समझ कर ग्रहण करते हैं। उसका सब स्टैंडर्ड होना हमें बीमार करता है। 

इस प्रकार के अनेकानेक उदाहरण हो सकते है।

रविवार, 4 अक्तूबर 2020

‘‘कारसेवक’’ क्या ‘‘अराजक’’ व ‘‘असामाजिक‘‘ तत्व थे?


अयोध्या के ‘‘विवादित ढांचा’’ ढहाए जाने के आरोप के मुकदमे का बहुप्रतीक्षित निर्णय आखिर 28 साल बाद आज आ ही गया। सीबीआई की विशेष न्यायालय ने 49 आरोपियों में से बचे समस्त 32 जीवित आरोपियों को सबूतों के अभाव में ‘‘निरापराधी’’ घोषित किया। ‘‘सम्मानित’’ आरोपियों सहित प्रायः देश ने इस निर्णय का स्वागत ही किया है।
आज जब निर्णय आने वाला था, तब मैं टीवी देख रहा था। ‘हेडलाइंस’ चालू हो गई थी। माननीय न्यायाधीश निर्णय का ’भाग’ पढ़ रहे थे। फिर एकदम से ब्रेकिंग न्यूज दिखाई गयी। समस्त 32 आरोपी निर्दोष घोषित कर बाईज्जत बरी कर दिए गए। चेहरे पर खुशी के भाव आ गये। धीरे-धीरे समाचार आगे बढ़ता है। माननीय न्यायाधीश कहते हैं, आरोपियों के विरूद्ध कोई साक्ष्य नहीं है, किसी भी आरोपी की संलिप्तता ढ़ाचा गिराने या उसके लिये लोगों का उकसाने में नहीं पायी गई। बल्कि इसके उलट कुछ आरोपियों ने तो ढांचा गिराने से रोकने का प्रयास भी किया। ‘चेहरे’ पर खुशी के भाव बढ़ते जाते हैं। जज कहते हैं, बाबरी विध्वंश की घटना अचानक हुई। पूर्व नियोजित नहीं थी। फिर आगे अचानक समाचार आता है, चूंकि ढांचा गिराया गया है, इसलिए निश्चित रूप से यह अज्ञात असामाजिक तत्वों का कार्य होगा। मुकदमें का सबसे दुखद पहलु यह है कि विशेष न्यायालय ने बचाव पक्ष के वकील द्वारा प्रस्तुत 400 पेजों की लिखित व मौखिक दलील स्वीकार कर ली, जिसमें यह कहा गया कि सांकेतिक कारसेवा के निर्देश की अवेहलना करने वाले अराजक तत्वों ने ही ढ़ाचा ढ़हाया। 
इसी दौरान मेरे पारिवारिक बुजुर्ग सेवानिवृत्त सहायक आयकर कमिश्नर जी का फोन आता है और वे मुझे बधाई देते हैं। मैं पूछता हूं, किस बात की बधाई? वे कहते हैं, सब छूट गए हैं। मैं एकदम से किंकर्तव्यविमूढ हो जाता हूं। समझ में नहीं आता है, बधाई कैसे स्वीकार करूं? ढांचे के ऊपर भगवा झंडा फहराने के बाद हुई कार सेवा के दौरान मुलायम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी से‘‘दो कोठारी‘‘ बंधु ( राम एवं शरद कोठारी) सहित  16  कारसेवक ‘‘शहीद‘‘ हो गए थे। इस कारण उत्पन्न जोश व आक्रोश ने आंदोलन को और हवा दी और तदनुसार राम जन्मभूमि आंदोलन के आयोजक कर्ताओं के आह्वान पर अपनी दृढ़ आस्था के साथ  पहुंचकर हजारों कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर उक्त विवादित ढांचे को गिराने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग दिया था। इन सब को माननीय न्यायालय ने अराजक व असामाजिक तत्व ठहराया दिया। इसलिये बधाई स्वीकार करने में हिचक थी। विश्व हिंदू परिषद से लेकर मंदिर आंदोलन के सर्मथक किसी भी नागरिक ने तथा "ढांचा" को गिराने वालों ने उक्त निर्णय की इस आधार पर आलोचना नहीं की कि ‘‘विवादित ढांचा‘‘ गिराने वाले लोग अराजक असामाजिक तत्व नहीं थे। किसी ने भी अभी तक उक्त आदेश के विरुद्ध इस मुद्दे पर अपील मे जाने की बात भी नहीं कही है। बल्कि समस्त सम्मानित आरोपित नेताओं के दोष मुक्त किए जाने से खुशी से सब लबालबाब है। सभी माननीयों के दोषमुक्त हो जाने पर ‘‘जान बची लाखों पाये’’ की खुशी में इतना डूब गये कि, हजारों कार्यकर्त्ताओं को न्यायालय द्वारा अराजक व असामाजिक ठहराये के निर्णय के भाग के किसी ने भी नोटिस (संज्ञान) नहीं लिया।
हमारा जीवन कितना खोखला है तथा छिछलापन व दोहरापन लिए हुयें है, यह उक्त निर्णय पर आयी प्रतिक्रिया से दर्शित होता है। पूरा देश जानता है! किन व्यक्तियों और संगठनों के आह्वान पर देश के राष्ट्रवादी सोच के लोग अयोध्या पहुंचे थे। मैंने भी आंदोलन में भागीदारी की थी। यद्यपि मैं अयोध्या नहीं गया था। परन्तु अयोध्या पहुंचे लोग किसी भी रूप में ’अराजकतावादी’ नहीं थे, यह देश के सामने स्पष्ट है। इसलिए उन लोगो द्वारा माननीय विशेष न्यायालय द्वारा उन लोगों के प्रति की गई उन टिप्पणी के लिए उच्च न्यायालय के दरवाजे जरूर खटखटाने चाहिए, जिनके आह्वान पर अपनी आस्था के साथ राष्ट्र के गौरव के प्रतीक भगवान श्रीराम जन्मस्थली अयोध्या में मंदिर निर्माण के वास्ते राम प्रेमी कारसेवक पहुंचे थे।
इस देश में कानून का उल्लघंन ही तो राजनैतिक आंदोलन होता है। यही नहीं ‘‘नियमानुसार कार्य करना’’ भी आंदोलन होता है। तब राजनैतिक या धार्मिक एजेंडे को लेकर किया गया श्रीराम जन्मभूमि आंदालेन के अंतर्गत अयोध्या कूच करने की योजना, निश्चित रूप से राजनैतिक/ धार्मिक कृत्य है। जहां कानून का उल्लंघन तो है, लेकिन वह अराजक तत्वों द्वारा नहीं, बल्कि राजनैतिक व धार्मिक आस्था लिये हुये व्यक्तियों द्वारा किया गया है। कानून के उल्लंघन मात्र से ही कोई व्यक्ति ‘‘अराजक’’ नही हो जाता हैं। अतः न्यायालय के उक्त अराजकता वाले निष्कर्ष को उच्च न्यायालय में चुनौती जरूर दी जानी चाहिये।

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

‘‘गिरता चरित्र‘‘ क्या हमें ‘‘चरित्रवान‘‘ बनने का संदेश देगा?

        
‘‘कोविड-19’’ सेे कमोबेश पूरा विश्व  संक्रमित है; कहीं हम से कम, तो कहीं ज्यादा। परन्तु हमारे देश में शासन व प्रशासन के विभिन्न अंगों के साथ लगभग संपूर्ण तंत्र ‘‘कोरोना काल’’ में जिस तरह से कार्य कर रहे हैं, वह स्थिति निश्चित रूप से शोचनीय, चिंताजनक और एक सीमा तक निंदा जनक भी है। ‘‘राम मंदिर निर्माण’’ के रास्ते चलकर ‘‘रामराज्य’’ लाने की कोशिश करने वाली एकमात्र पार्टी, वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को आखिर हो क्या गया है? क्या इसे हम मात्र कोविड-19 का अस्थाई प्रभाव कह कर टाल सकते हैं? अथवा समस्त क्षेत्रों के ‘तंत्र’ में हो रही गिरावट को रोकने के बजाय भाजपा सिर्फ राजनीति के चलते कहीं उसमें सहायक तो सिद्ध नहीं हो रही है?
जब मैं भाजपा को जिम्मेदार ठहराता हूं, तो कुछ लोग मुझसे कहते है कि आप कई बार अपनी पृष्ठभूमि के विपरीत चले जाते हैं। तब मैं यही कहता हूं कि मैं किसी के खिलाफ नहीं जाता हूं; अपनी नीर क्षीर विवेक से सिर्फ उपलब्ध तथ्यों का ही विश्लेषण करने का प्रयास मात्र करता हूं। चूंकि जब कभी तथ्य आपके विपरीत होते है, तब शायद आपको ऐसा लगता होगा। परन्तु आपकी बात तब ही सही हो सकती है, जब मैं गलत तथ्यों को अथवा तथ्यों को गलत रूप से प्रस्तुत कर विश्लेषण करू। वैसे एक बात और! उक्त आरोप में ही उत्तर भी निहित है। अर्थात मैं भाजपा की बात इसलिए करता हूं कि, वर्तमान में कांग्रेस अप्रासंगिक व अप्रभावी होती जा रही है। अतः किसी भी क्षेत्र में देश की स्थिति को सुधारने के लिये कांग्रेस की चर्चा करना मात्र समय की बर्बादी ही है। यद्यपि भाजपा के पास विराट व्यक्तित्व वाले नेतृत्व के साथ-साथ विशाल बहुमत भी है, परंतु दुर्भाग्यवश प्रखर प्रभावी सोच रखने वाला विपक्ष वर्तमान में लगभग नगण्य सा हो गया है। जबकि कांग्रेस के स्वर्णकाल अर्थात वर्ष 1952 से लेकर ऐतिहासिक अभूतपूर्व बहुमत (वर्ष 1984) के समय तक, विपक्ष नगण्य होने के बावजूद गंभीर विषयों पर सार्थक व बुलंद आवाज करने वाले समस्त क्षेत्रों के जानकार विपक्षी थे। इसलिये  आम नागरिकों की आकाक्षांओं एवं आशाओं की पूर्ति का केंद्र भाजपा उपरोक्त सुविधाजनक स्थिति मैं होने के बावजूद जब कोई आवश्यक जनहितकारी कदम नहीं उठा पाती है, तब उसे सचेत करना ही मात्र एक विकल्प रह जाता है। आइए! विषय पर आते है और आगे देखते हैं, आखिर हो क्या रहा है। 
देश की समस्त समस्याओं को सुशांत और सुशांत से संबंधित ‘रिया’ फिर ‘कंगना’ ‘दीपिका पादुकोण’ आगे शायद ‘करण जौहर’ और अब फिल्म उद्योग के ड्रग्स रैकेट तक सीमित कर भाजपा इसे क्या अपनी सफलता मान कर खुशफहमी पाले हुये है? या वास्तव में यह उसकी असफलता है? आखिर ‘‘सुशांत‘‘ को ‘‘शांत‘‘ क्यों नहीं होने दिया जा रहा है? शायद जब तक, महाराष्ट्र सरकार से लेकर बिहार सरकार का भाग्य ‘तय’ नहीं हो जाता? जबकि बेहद दुखद अवस्था में सुशांत ‘‘स्वर्गवासी‘‘ होकर स्वयं तो ‘‘शांत‘‘ हो गए (या कर दिये गये?) लेकिन वे जाते जाते ‘‘वर्तमान‘‘ को अशांत कर गए।
सुशांत प्रकरण में एक और अदभुत बात हुई है।कभी आपने सुना है,  पोस्टमार्टम या विसरा की  जांच रिपोर्ट देने के पूर्व  डॉक्टर्स और जांच एजेंसियों के बीच चर्चाओं का दौर होकर सहमति बनाने का प्रयास किया जाता है? जो सुशांत प्रकरण में एम्स के डॉक्टर्स व सीबीआई के बीच "विसरा" की जांच को लेकर की गई। फिलहाल सुशांत की आत्महत्या से लेकर हत्या तक की जांच का मामला एक तरफ रह  गया है, यानि कि ‘‘आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’’। जैसा कि स्वयं सुशांत के वकील ने सीबीआई पर आरोप भी लगाया है। सुशांत का खुद ड्रग्स का नशा करना और उसके फार्म हाउस में नशे (ड्रग्स) लेने से लेकर सप्लाई तक के मामले में एनसीबी की जांच में फिल्म उद्योग के बहुत से कलाकार एक-एक कर "रडार" पर आ रहे है, जिसने समाज के एक वर्ग में ‘‘तूफान‘‘ सा पैदा कर दिया है। फिल्मी कलाकार, लेखक, आलोचक और टीवी बहसों में बैठने वाले रजिस्टर्ड वक्ता, प्रवक्ता गण अब देश को यह समझाने में लगे हैं कि, सुशांत प्रकरण के कारण फिल्म उद्योग का यह एक घिनौना चेहरा आम लोगों के बीच सामने आया है। ‘‘दीपिका पादुकोण’’ जैसी प्रसिद्ध ग्लैमरस अभिनेत्री जिसे देश के लाखों युवा वर्ग अनुसरण करते हैं, के ड्रग्स स्कैंडल में नाम आ जाने से युवा वर्ग पर पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा, इससे चिंतित वक्ता, प्रवक्तागण मीडिया के प्लेटफार्म का उपयोग करके हमें उक्त आदर्श की बात समझाने का प्रयास कर रहे है।
आखिर आज हम कौन से समय में या किस युग में आ गए है? जिस सुशांत पर स्वयं ही उनसे जुडे़ हुये कुछ लोगो द्वारा ड्रग्स संबंधित आरोप लगाए जा रहे हो, जिसके फार्म हाउस में ड्रग्स की पार्टियां होती रही हो, और जो दो महिलाओं के साथ ‘लिव इन रिलेशन’ में रहता रहा हो, तब ऐसे ‘‘चरित्र‘‘ को मीडिया व बिहार की राजनीति का ‘‘आइकॉन‘‘ बना कर समाज को "चरित्र का आईना" दिखाने का प्रयास, क्या यह एक मजाक नहीं है, तो क्या है? दीपिका पादुकोण के तथाकथित कृत्य के कारण युवा वर्ग पर पड़ने वाले  बुरे प्रभाव को लेकर आलोचना करने वाले  क्यों यह भूल जाते हैं कि फिल्म उद्योग सिर्फ ड्रग्स सेवन का ही नहीं, बल्कि अश्लीलता, कास्टिींग काउचिंग, "भाई" व गैंगेस्टर से संबंध, पक्षपात, परिवारवाद आदि अनेक बुराइयों से भरा पड़ा हुआ है। और यह आज से नहीं है, काफी पहले से ही है। क्या इतने सालों से इन तथाकथित समाज सुधारकों की आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ था? तब इन्होनें ड्रग्स सेवन व अन्य बुराइयों के विरुद्ध आवाज क्यों नहीं उठाई? (तब बिहार चुनाव नहीं थे? और जब बिहार चुनाव थे, तब सुशांत जैसे प्रकरण नहीं थे?) क्या ‘‘लिव इन रिलेशन शिप‘‘ फिल्म उद्योग के कलाकारों या हमारे जीवन की नैतिकता को ऊंचा उठाती है? क्यों नहीं तथाकथित समाज सुधारक उक्त नैतिकता‘‘ को ऊंचा उठाने के लिए उन्हे ‘‘मेडल‘‘ प्रदान कर देते? क्योंकि आजकल खासकर फिल्म उद्योग मे तो हर चीज ‘‘प्रायोजित’’ ही तो होती है। 
धर्मेंद्र-हेमा मालिनी के बाबत किसी महिला या पुरुष कलाकार या बुद्धिजीव वर्ग व तथाकथित समाज सुधारको ने कभी आवाज नहीं उठाई? एक पत्नी के होते हुए बगैर विवाह-विच्छेद (तलाक) किये दूसरी शादी करना न केवल नैतिक मूल्यों की गिरावट है, बल्कि कानून का उल्लंघन होकर धारा 494 के अंतर्गत ‘‘द्विविवाह’’ का एक अपराध भी है। धर्मेंद्र ने पहली पत्नी के रहते हुए बगैर तलाक लिए दूसरी शादी ‘‘ड्रीम गर्ल‘‘ हेमा मालिनी से की थी। धर्मेंद्र की पहली पत्नी के द्वारा शिकायत न करने के कारण वे अपराधिक अभियोजन से बच गए थे। देश के ये दोनों कलाकार अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण इतने बड़े आइकॉन बन गए कि देश की जनता ने उन दोनों महान कलाकारों को देश की उस संसद में भेजा जहां कानून का निर्माण होता है। व्यभिचार (एडल्ट्री) जो धारा 497 के अंतर्गत एक घृणित सेक्स अपराध था,को उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय द्वारा अवैध घोषित कर दिया था।वही संसद जिसने शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित निर्णय को संविधान संशोधन विधेयक पारित कर "शून्य" कर दिया था। लेकिन उक्त अवैध घोषित धारा 497 को समाज सुधार व भारतीय संस्कृति को बनाएं रखने के लिए शाहबानो प्रकरण के समान  पुनर्स्थापित नहीं किया।
फिल्मी कलाकारों के बीच जो नशे का सेवन हो रहा है, क्या वास्तव में देश, समाज और स्वयं व्यक्ति के लिए इतना नुकसानदायक है कि उसको खत्म करने का बीड़ा मीडिया और उसके पीछे खड़ी सरकार ने उठा लिया है? मीडिया के पीछे सरकार की बात इसलिए कहीं जा रही है, क्योंकि अधिकतर मीडिया हाउसेस में अंबानी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप का ज्ञान मीडिया के लोगो को है। और ‘‘अंबानी‘‘ को कौन चला रहा है, यह देश जानता है। इसीलिए मीडिया के बीच के ही कुछ लोग ‘‘गोदी मीडिया‘‘ कहने में परहेज नहीं करते हैं। इस प्रकार ड्रग रैकेट के विरुद्ध कार्रवाई कर ‘‘रामराज्य की स्थापना‘‘ की ओर एक कदम और बढ़ाने का दावा जरूर किया जा सकता है? परंतु ड्रग्स सेवन के विरुद्ध आवाज कितनी खोखली है, इसका अंदाजा आपको आगे लग जाएगा। 
नशा सिर्फ क्या ड्रग्स का ही होता है? भांग, गांजा, चरस, हैरोइन, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम, हशीश, चिलम, सिगरेट, सिगार, हुक्का, शराब, पान, तंबाकू, बीड़ी, आदि न जाने कितनी चीजें लोग नशे के रूप में लेते हैं। सिर्फ फिल्म उद्योग के लोगों की ही ड्रग्स के नशे की बात क्यों की जा रही हैं? क्रिकेट, राजनीति, उच्च (एलीट) वर्ग (स्टेट्स के लिये) और न जाने कितने क्षेत्रों में यह रोग फैला हुआ है। जिस प्रकार मानसिक तनाव को दूर करने के लिये कुछ फिल्मी कलाकार ड्रग्स का सेवन कर रहे है। उसी प्रकार क्रिकेटर्स भी अच्छे परिणाम के लिये प्रतिबंधित दवाइयों का उपयोग करते है। क्या यह सब नशीली चीजें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है? लेकिन ऐसा लगता है कि इनमें से कई नशीले पदार्थ सरकार के लिए राजस्व का एक बड़ा साधन है। पैकिंग पर ‘‘स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है‘‘ लिखा हुआ एक रैपर चिपका दीजिए और फिर खूब ‘‘पीजिए’’ ‘‘धुआ छोडिये’’,‘‘गहरी सासें’’ लीजिये! और कहिये ‘‘दम मारो दम’’। आप ‘‘पीकर खुश‘‘ हैं क्योंकि आप ‘गम’ को पी रहे है और सरकार बिना पिए ही खुश है, क्योंकि सरकार को खजाने में भारी भक्कम पैसा मिलने से वह गमगीन नहीं है। और हम सबने यह देखा ही है ‘‘न बीबी न बच्चा’’, ‘‘न बाप बड़ा न मैया’’ ‘‘होल थिंग इज़ दैट कि भैया’’ ‘‘सबसे बड़ा रुपैया‘‘। 
सरकार का नशे के मामले में दो तरफा रवैया क्यों है ?एक तरफ कुछ नशीले द्रव्यों को कुछ वैधानिक चेतावनी के साथ विक्रय एवं उपयोग करने की अनुमति देती है, तो दूसरी ओर कुछ नशीली चीजों के विक्रय व उसके उपभोग पर प्रतिबंध लगाकर उसे एक अपराध घोषित करती है। इसी को कहते है ‘‘गुड़ खाए" और गुलगुलों" से परहेज़ करें’’। आखिर "नशा तो नशा" ही है। लगभग प्रत्येक नशा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हम देखते हैं, प्रत्येक वर्ष सिगरेट, तंबाकू से कैंसर व अन्य बीमारियां उत्पन्न होकर हजारों व्यक्ति मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। यदि कुछ दृव्यों को छोड़ दिया जाए तो, अधिकतर नशीली पदार्था के उपभोग से उपभोक्ताओं की आर्थिक बर्बादी ही होती है। और इस बर्बादी की ही कीमत पर सरकार अपनी जेब भरती है। यह कौन सा सामाजिक न्याय है? क्योंकि अंततः सरकार को भी तो नागरिकों के प्रति अपने जिम्मेदार होने का एहसास दिखाने के चलते इन व्यक्तियों के स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति पर करोडों रुपए आगे पीछे खर्च करने ही होते हैं। "आपदा को अवसर" में बदलने का एक मौका सरकार को "सुशांत" ने दे दिया है। उठाइये कदम और "अवसर" में बदलकर अपने कथन को तार्किक व वास्तविक तथ्यात्मक बल प्रदान कीजिये।

शनिवार, 26 सितंबर 2020

‘कोरोनाः ‘गैर जिम्मेदारों का ‘‘बेताज बादशाह’’। द्वितीय भाग

 क्रमशः गतांग से आगे : द्वितीय भाग 

‘‘शासन’’ ‘‘प्रशासन’’ ‘‘स्वास्थ्य योद्धा’’ "मीडिया" एंव "नागरिकगण" कटघरे में?  

अब ‘तंत्र’ के द्वारा शासित व्यक्तियों अर्थात नागरिकों की बात कर लें। वैसे तो अभी तक कोविड-19 की कोई दवाई नहीं बन पाई है। सभी परीक्षण चरण (स्तर) पर हैं। उपरोक्त वर्णित तीनों सावधानियां ही इसकी एहतियाति दवाइयां हैं ,जो रोग को आने से रोक तो सकती हैं। परन्तु रोग हो आने पर उसका इलाज नहीं कर सकती हैं। ये सावधानियां लगभग निशुल्क ही है। मास्क व सैनिटाइजेशन पर सामान्यतया 100 रू. महीने से ज्यादा का खर्चा नहीं है। अर्थात ‘‘न हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आये’’। इसके बावजूद कोरोना वायरस के इस तेजी से बढ़ते संक्रमण का मुख्य वास्तविक कारण तंत्र का शासक पक्ष नहीं बल्कि तंत्र द्वारा शासित हम आम नागरिक गण ही है। हम स्वस्थ बने रहने के लिए उक्त नगन्य खर्चीली सावधानियों को नहीं बरत पा रहे हैं। तो उसके लिए जिम्मेदार कौन? वैसे पढ़ने, लिखने, सुनने में उक्त  सावधानियां बरतना जितनी आसान दिखाई पड़ती है, कार्य रूप में परिणित करने पर उतनी है, नहीं! उसका कारण हमारे जीवन में मात्र अनुशासन की कमी का होना ही है। हर समय हमें उपरोक्त सावधानियां बरतने का ध्यान नहीं रह पाता है और कहीं न कहीं ‘जाने अनजाने’, ‘चाहे अनचाहे’ हमसे लापरवाही हो ही जाती हैं। चूंकि देश में इस समय हर जगह ‘‘रैकेट‘‘ (ड्रग्स) की ही चर्चा हो रही है, तब ‘‘कोरोना रैकेट’’ पर चर्चा क्यों न कर ली जाए। आखिर कोरोना रैकेट है क्या? आपको यह जानकर सुनकर आश्चर्य नहीं होता है कि जैसे ही किसी व्यक्ति की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव  आती है, उसकी हैसियत (स्टे्टस) स्वास्थ्य कर्मियों के बीच अचानक बढ़ जाती है? और तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण की संख्या के समान उसके इलाज का खर्च बढ़कर प्रतिदिन का सामान्यतया चालीस पचास हजार से लेकर एक डेढ़ लाख रूपये तक पहुंच जाता है। वह भी तब, जबकि कोरोना की अभी तक कोई गोली, इंजेक्शन या वैक्सीन नहीं है, जिस पर कोई पैसा खर्च हो। यही कोरोना रैकेट है। सामान्य सर्दी, जुकाम, खांसी होने पर डॉक्टरों के पास जांच करवाने जाने पर वे आपको भर्ती कर कोरोना टेस्ट करवाते हैं। और आमतौर पर कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव ही आती है। चार-पांच दिन के बाद आपको अस्पताल से छुट्टी भी दे दी जाती है। और आपको घर में ही ‘क्वारन्टाइन’ होने के लिए कहा जाता है। वैसे तो डॉक्टरों के पास आजकल कोविड-19 के मरीजों को छोड़कर अन्य बीमारियों के मरीजों को देखने का समय ही नहीं है। फिर भी यदि आप अन्य बीमारियों के चलते अस्पताल में भर्ती हैं और यदि आपकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो तुरंत आपको दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता है और आपके समस्त चार्जेस दो तीन गुना बढ़ा दिए जाते हैं। अभी तो हालत यह है कि कई अस्पतालों में दो-दो लाख रूपये लेकर अग्रिम बुकिंग कराई जा रही है। उक्त स्वास्थ्य इलाज की बातें जो  उल्लेखित की हैं, वह विभिन्न लोगों से हुई चर्चा पर आधारित हैं।  

 ‘कोरोना’ के लिये जो विभिन्न किट्स का उपयोग कर टेस्टिंग की जा रही है, (रैपिड टेस्ट, रियल टाइम पीसीआर टेस्ट, ट्रूनैट टेस्ट और सीबीएनएएटी टेस्ट, ऐंटीबॉडी टेस्ट, ऐंटीजेन टेस्ट) उन पर भी सरकार एवं भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद एकमत और दृढ़ नहीं है। जनवरी 20 में सिर्फ एक प्रयोगशाला थी, मार्च में  संख्या बढ़कर 121 हुई और अब 1,223 हो गई है। इस प्रकार प्रकार प्रयोगशाला की संख्या में बढ़ोतरी अदभुत है। टेस्टिंग प्रारंभ में मात्र कुछ सैकड़े प्रतिदिन की हो रही थी, उसमें भी लगातार तेजी से वृद्धि होकर आज प्रतिदिन 7-8 लाख के आसपास की हो रही है, जो भी एक बड़ी उपलब्धि है। इसी प्रकार सरकार ने टेस्टिंग किट का उत्पादन भी  उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया है। इस प्रकार इन सब 'आवश्यक' वृद्धि के लिए सरकार बधाई की पात्र है। इस प्रकार उपरोक्त उल्लेखित सावधानियां  जो कि अपने आप में अपूर्ण है की तुलना में डाक्टरों के द्वारा उपयोग की जाने वाली पीपीई किट ही 100 प्रतिशत सुरक्षित सावधानी है, तब हम उसके उत्पादन की बात क्यों नहीं करते? "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है"। इस कोरोना काल में भी हमारे देश ने यही सिद्ध किया हैं। आवश्यकतानुसार  कोरोना टेस्टिंग किट व मास्क उत्पादन की संख्या में कई गुना वृद्धि की गई है। क्या हमारे वैज्ञानिक अनुसंधान कर सामान्यजन के उपयोग हेतु सस्ती व अधिक समय तक उपयोग की जाने वाली पीपीई किट का निर्माण नहीं कर सकते है?क्योंकि यह किट लम्बे समय तक नहीं पहनी जा सकती है। इसलिए उन नागरिकों का यह दायित्व हैै कि भीड़ भाड़ वाले इलाके में जहाँ जाना अतिआवश्यक हो, वहीं पर ही ‘किट’ पहन कर इसका उपयोग करें। जिस प्रकार कपडों के शोरूमों में कपड़े बदलने वाले 'चेजिंग रूम' होते है, ठीक उसी प्रकार भीड़ भीड़ वाली जगहों पर 'किट' पहनने के लिए भी चेजिंग रूम बनाये जाने चाहिए। ताकि लम्बे समय तक किट पहनने की जरूरत नहीं रहेंगी। ठीक इसी प्रकार वाहनों में भी ग्लास के स्लाइडिंग पार्टीशन लगाये जाने से 'सुरक्षित' रूप से अधिक संख्या में व्यक्ति बैठ सकते है। इन सब बातों पर भी सरकार को अवश्य ध्यान देना चाहिए, ताकि लोग कोरोना के साथ बैगर किसी भय के जीवन जीने की आदत ड़ाल सकें। वह इस कारण भी कि एक बार संक्रमित होने के बाद संक्रमित हुआ व्यक्ति पुनः संक्रमित नहीं हो सकता है , इसकी गांरटी फिलहाल कोई नहीं दे रहा हैं। बल्कि इसके 'विपरीत आशंका' व्यक्त की जा रही है। एक बात और! संक्रमित व्यक्ति की पहचान बताने या न बताने के संबंध में भी सरकार दुविधां में है, जिसे तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। रेप पीड़िता समान  विक्टिम  की तरह  कोरोना  संक्रमित  व्यक्ति की पहचान को सार्वजनिक न करने का कोई औचित्य नहीं है। संक्रमित की पहचान आवश्यक रूप से बतलाई जानी चाहिये, ताकि अन्य जानकर व पड़ोसी सावधानी बरत सकें।                                                                                                                              'वायरस संक्रमित कोरोना काल' की कितनी "हितकर" "अहितकर" उपलब्धियां है? जिसके लिए यह बीमारी हमेशा याद की जायेगी। आइये उसकी भी चर्चा कर लें। प्रथम हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृति में इंसान की मृत्यु होने के बाद 13 दिन का शोक और एकांतवास रखा जाता है और पूर्ण शुद्धि के बाद ही सामान्य जीवन दिनचर्या पुनः प्रारंभ होती है। ठीक उसी प्रकार कोरोना ने 14 दिन के लिए व्यक्ति को जीते जी वनवास, अवसाद और एकांतवास में ड़ाल दिया है। दूसरी हमारी संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं के चलते घर के सदस्य, दोस्त, अड़ोसी-पड़ोसी या अन्य कोई भी परिचित के देहवसान पर हमें स्वाभाविक दुख होता है। सब व्यक्ति मिलकर अपनी संस्कृति के अनुसार अंतिम क्रिया कर्म कर दुख के वजन को कुछ कम करने का प्रयास करते है। अंततः समय ही सबसे बड़ी दवा होती है, जो इन घावो को भरती है। परंतु कोरोना काल की एक उपलब्धि यह भी है,और उसमें शासन की नीति का ज्यादा योगदान है कि, कोरोना से मृत्यु हो जाने के बाद आपको अपनी पुरानी प्रचलित संस्कृति के अनुसार न तो मृतक के अंतिम दर्शन हो पा रहे है, और न ही उसका अंतिम संस्कार कर पा रहे हैं। 13 दिनों की अंतिम यात्रा की धार्मिक प्रक्रिया हमारे हिन्दू धर्म शास्त्रों में बतलाई गयी है, लेकिन कोरोना के लिये वर्णित सावधानियों के पालनार्थ "उन क्रियाओं" पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। सावधानियां और ड़र के बीच एक ‘‘लक्ष्मण रेखा’’ निश्चित रूप से है। लेकिन सरकार, खासकर मीडिया इस 'अंतर' की बारीकी को समझने व समझाने के बजाय 'ड़र का खौंफ' पैदा कर रही है। इसी कारण से आम नागरिकों का बीमारी से लड़ने का 'अस्त्र' स्वालंबन, आत्मबल व आत्मविश्वास खत्म होते जा रहा है। जबकि इस बीमारी से लड़ने के लिये इन अस्त्रों की ही सबसे ज्यादा आवश्यकता है। इस बीमारी के साथ रहते हुये हम जीवन को ठीक उसी प्रकार ‘जी’ सकते है, जिस प्रकार  सड़क रेल हवाई  यात्रा दुर्घटना में मृत्यु दर लगभग 7.30 प्रतिशत (कोरोना की 1.9 प्रतिशत मृत्यु दर जो दुनिया में सबसे कम है की तुलना में) होने के बावजूद बिना ड़र के ट्रेन, बस और हवाई जहाज, जहां पर हम स्वयं चालक सीट पर नहीं बैठे होते है, तब भी यात्रा कर सामान्य जीवन जी रहे है। पूर्व में ‘सार्स’(एक्यूट रेस्पयरेटरी सिंड्रोम) बीमारी से 10 प्रतिशत, स्वाईन फ्लू से 4.5 प्रतिशत व ‘इबोला’ में इससे भी अधिक मृत्यु दर हमने देखी हैैैं। लेकिन तत्समय ऐसा ड़र न दिखाई नहीं दिया न महसूस किया गया। तीसरी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कोरोना की, यह है कि, यदि उक्त सावधानियां को पूर्ण रूप से पालन करके कोरोना से बचना है तो, निश्चित रूप से पूर्ण आत्म अनुशसित जीवन जीना ही होगा। तभी हम उक्त सावधानियां का पूर्ण रूप से पालन कर पायेगें और अपनी जीवन की रक्षा कर पायेगें। इस प्रकार कोरोना निश्चित रूप से एक नागरिक को मृत्यु के भय के कारण अनुशासित अवश्य ही बनायेगां। जब लॉकडाउन भी पूर्ण सफल सही विकल्प नहीं है जैसा कि नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य रेड्डी ने माना है। तब सरकार देश की समस्त गतिविधियों को सामान्य रखकर देश के जिम्मेदार नागरिकों को जिम्मेदार होने का एहसास देने का मौका क्यों नहीं देना चाहती हैं? ताकि देश की प्रगति तो इस कारण से न रूक पाए। इस सबके बावजूद यदि नागरिकगण सावधानी नहीं बरतते है तो, उनको आत्महत्या धारा 309, आत्महत्या के लिये उत्प्रेरित करना धारा 306 और गैर इरादतन हत्या धारा 304 का दोषी तथा महामारी अधिनियम के उल्लघंन का दोषी मानकर भारतीय दंड सहिंता की धारा 188 में उनके विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए। एक नागरिक के इस अपराधिक कृत्य के लिए 'सरकार' कैसे 'जिम्मेदार' ठहराई जा सकती है? इसलिए सरकार अनिश्चिताओं के आवरण से बाहर निकले और 'कोरोना' को अन्य बीमारियों के समान जीवन की 'आवश्यक बुराई' मानते हुए स्वयं पूर्ण सावधानी के साथ कार्य करें और जनता को भी करने की प्रेरणा दें। साथ ही स्वास्थ्य योद्धाओं का स्वागत व सम्मान करते हुये उनके ही बीच में मौजूद स्वास्थ्य सेवा में चल रहे रैकेट को समाप्त करने के लिए वर्तमान कानूनों में कड़े प्रावधान लाकर स्वास्थ्य सेवाओं पर कड़ी निगरानी रखें। चर्चा और सहमति बनाकर हर खर्चों की उचित "न्यूनतम" एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) तय कर उसका "सार्वजनिक प्रदर्शन" अनिवार्य कर उसकी उचित कड़ी निगरानी करके उसको 'धरातल' तक लागू भी करवाएं। तभी हम इस मानव निर्मित कोरोना वायरस को यथासंभव एवं अधिकतम सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे। इस प्रकार प्रत्येक नागरिक 'सावधानियों' के साथ लेकिन बिना ड़र के जिंदगी "जी" सकेगा, जो उसका अधिकार एवं कर्तव्य दोनों है। "जितना ज्यादा आत्म  अनुशासित जीवन, उतनी ही ज्यादा सावधानियों का पालन और और उतना ही भय मुक्त जीवन"! कोरोना से निपटने की यही एक "संजीवनी बूटी" है। अंत में इस लेख का समापन इस निष्कर्ष के साथ  किया जा सकता है कि "कोरोना ने संवैधानिक तंत्र लोकतंत्र के शासक व शासित  (नागरिक गण) दोनों पक्षों को असफल और गैर जिम्मेदार सिद्ध कर दिया है"।

बुधवार, 23 सितंबर 2020

‘कोरोना’: ‘गैर जिम्मेदारों का ‘‘बेताज बादशाह’’। ‘‘शासन’’ ‘‘प्रशासन’’ ‘‘स्वास्थ्य योद्धा’’ मीडिया एंव नागरिक कटघरे में?

                                                                                                                                                                     विषय लेख लम्बा होने से इसे दो भागों में लिखा जा रहा हैं:-  प्रथम भाग

‘‘नाँवल’’ ‘‘कोरोना वायरस’’ का पहला रोगी विश्व में 30 दिसंबर को चीन के ‘वुहान’ शहर में और 30 जनवरी को भारत के केरल प्रदेश के ‘त्रिशूर’ में ‘‘चिन्हित’’ हुआ था। तब से लेकर आज तक ‘‘कोरोना वायरस (कोविड-19)’’ के संक्रमण के कारण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चाहे वह ‘संस्थागत’ हो या ‘व्यक्तिगत’, ‘आर्थिक’, ‘मानसिक’, ‘शारीरिक’ आदि क्षेत्रों व अवस्था में आए ‘‘दुष्परिणामों‘‘ को प्रत्येक ‘व्यक्ति’ और ‘संस्था’ भुगत रही है। ‘‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’’ से लेकर देश का ‘‘समस्त तंत्र‘‘ ‘आवश्यक प्रबंध और सावधानियां’ स्वयं बरतने और दूसरों को बरतने के लगातार ‘संदेश’ देने के बावजूद (मानव निर्मित) ‘‘कोरोना‘‘ मानव के नियंत्रण में नहीं आ पा रहा है। और ‘मानव’ को लगातार कोरोना ‘‘रोने‘‘ के लिए विवश कर रहा है। आज इसके गहरे विश्लेषण की गंभीर आवश्यकता है। तभी वास्तविक समस्या व इसके पीछे छिपे एजेंड़े को समझा जा सकता है। इसे समझने के पूर्व ‘‘कोविड़-19’’ का संक्षिप्त परिचय देना आवश्यक है। कोविड़-19 एक वायरस से होने वाली खतरनाक और बहुत जल्दी फैलने वाली बीमारी है। बीमार व्यक्ति के खांसते, छींकते या बोलते समय मुह से निकली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से यह वायरस दूसरे व्यक्ति में फैलता है। जहां ये सूक्ष्म बूंदे गिरती हैं, उन सतहों को छूने से भी फैलता है। यह वायरस बिना किसी लक्षण के 14 दिनों तक मानव शरीर में रह सकता है और उससे दूसरों तक फैल सकता है। 
निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन के बीच हुई संभवतः कुछ दूरभि संधि के दुष्परिणामस्वरूप ही कोरोना वायरस की उत्पत्ति हुई है। यह बात कई बार, कई तरीको से सामने आ चुकी है कि, चीन के हुबेई प्रांत के शहर ‘‘वुहान‘‘ में ‘‘कोविड-19’’ का वायरस मानव द्वारा निर्मित हुआ है। इसके कुछ प्रमाण भी हैं। प्रथम दो चीनी वैज्ञानिक स्कॉलर बोताओ शाओ और ली शाओ का दावा है कि हुबेई प्रांत के वुहान शहर में स्थित एक सरकारी लैब सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल ने रोग फैलाने वाली इस बीमारी के वायरस को जन्म दिया हो। लैब में ऐसे जानवरों को रखा गया, जिनसे बीमारियां फैल सकती है, इसमें 605 चमगादड़ भी शामिल थे। वुहान शहर में तेजी से कोरोना का संक्रमण बढ़ने के बाद उससे ज्यादा तेजी से उस पर वहां पर नियंत्रण पा लिया गया। चीन ने इस रहस्मय बीमारी को गुप्त (सीक्रेट) रखने की पूरी कोशिश की। संपूर्ण चीन में संक्रमितों की संख्या अत्यंत ही अल्प अर्थात लगभग अभी तक कुल मात्र 85269 ही है, जहां पर कि विश्व में सबसे पहले कोरोना पैदा हुआ था, और वह भी वुहान व कुछ शहर तक सीमित रहकर ही, पूरे चीन में नहीं। जबकि चीन विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। उपरोक्त समस्त तथ्यों से उक्त आशंका को बल मिलता है। यदि कोविड़-19 मानव निर्मित नहीं था, तो चाइना ने किस तरह से शीघ्रतिशीघ संक्रमण के फैलने पर काबू पा लिया व उसे पूरे देश में फैलने नहीं दिया। जबकि विश्व में वह लगातार तेजी से फैल रहा है। यद्यपि चीन ने पलटवार कर अमेरिका पर ही वुहान में विश्व खेल के दौरान इस वायरस को प्लांट करने के आरोप लगाए। दूसरा कारण अमेरिका ने 22 अप्रैल को ‘‘डब्ल्यूएचओ‘‘ पर चीन का साथ देने के कारण उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था, जो अवश्य ही विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन के बीच कुछ न कुछ दूरभि संधि को ओर इंगित करता है। हाल में ही इटली से कोविड़-19 के बाबत एक बड़ी विस्फोटक सूचना विश्व को मिली है। वह यह कि कोविड़-19 ‘वायरस’ के रूप में न होकर ‘एक बैक्टीरिया’ के रूप में ऐमप्लीफाईड़ ग्लोबल 5 जी इलैक्ट्रोमैगेनेटिक रेडिएशन (जहर) के कारण लोग मर रहे हैं। वहां के डॉक्टरों ने डब्ल्यूएचओ के कानून का उल्लंघन करके कोविड़-19 से मरे मृत व्यक्तियों की लाशों का पोस्टमार्टम कर उक्त निष्कर्ष निकाला है। इस प्रकार यह एक बड़ा ग्लोबल घोटाला लगता है। यद्यपि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड़-19 को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी जरूर (वैश्विक स्वास्थ्य आपात्तकाल (पीएचईआईसी) घोषित की है। लेकिन चीन के खिलाफ कोई भी प्रतिबंधात्मक कार्यवाही नहीं की। प्रेसिडेंट ट्रम्प ने चीन पर इस कोरोना उत्पन्न करने के आरोप को आज दोहराया भी है। इसमें शासन-प्रशासन, मीडिया व डॉक्टरों के बीच एक मिली भगत का  गहरा आर्थिक रैकेट दिखता है, जिसकी चर्चा अपने देश के संदर्भ में आगे करेगें।
सर्वप्रथम ‘‘कोरोना’’ के संबंध में देश के ‘‘तंत्र’’ की ‘‘अव्यवस्था‘‘ व ‘‘असफलता‘‘ की चर्चा कर लें। याद कीजिए! जब कोरोना वायरस भारत में आया था, तब कोविड-19 की आरंभिक अवस्था में ही हमारे प्रधानमंत्री जी ने 24 मार्च को प्रथम लॉकडाउन घोषित करते समय यह नीतिगत बात की थी कि ‘‘जान है तो जहान‘‘ है। मतलब सर्वप्रथम जान की सुरक्षा प्रदान करना है। कुछ समय व्यतीत हो जाने के बाद भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण की विश्व से तुलनात्मक बेहतर स्थिति को देखते हुए 12 अप्रैल को राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुये द्वितीय लॉकडाउन की घोषणा के समय प्रधानमंत्री जी ने यह कहा कि ‘‘जान भी है और जहान भी है‘‘। अर्थात जान के साथ जहान दोनो पहलुओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन आज स्थिति क्या है? ‘‘न जान बच रही है और न ही जहान’’। 
जब विश्व में कोरोना वायरस के संक्रमण की संख्या तेजी से बढ़ रही थी और भारत में तुलनात्मक रूप से उसकी गति बहुत ही धीमी थी। तब अचानक बिना समय दिए पूरे देश में एक झटके में लॉक डाउन की घोषणा कर देश के आर्थिक पहिये को रोक दिया गया। आपको अनुभव होगा, तेजी से चलती हुई बस में अचानक एकदम से ब्रेक लगा दिया जाए तो, बस में बैठी सवारियां भी एक दूसरे के ऊपर गिर कर बस हिचकोले खाते हुए रूक जाती है। अचानक लॉकडाउन से देश की आर्थिक व्यवस्था भी इसी प्रकार से हिचकोले खाते हुए ‘‘जाम‘‘ हो गई। लेकिन संक्रमितों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। अंततः लगभग 2 महीनों बाद 17 मई को कंटेनमेंट जोन को छोड़कर पूरे देश से लॉकडाउन लगभग उठा लिया गया। जबकि आज संक्रमित होने की संख्या प्रतिदिन लगभग एक लाख के आसपास है व निरंतर बढ़ती जा रही है।  
यह बात एक आम आदमी की समझ से परे है कि, कम संक्रमितों की संख्या के समय पूरे देश में लॉकडाउन जरूरी क्यों था? और अब ‘‘लक्ष्मण रेखा‘‘ की सीमा से तेजी से बाहर जा रही  संक्रमितों की संख्या के बावजूद लॉक डाउन नहीं! क्यों? इसके लिए आपको थोड़ा बारीकी से शासन तंत्र की कोरोना वायरस कीे सामना करने की नीति का अध्ययन करना होगा। शासन तंत्र की नीतियों में दो स्पष्ट कमियां दृष्टिगोचर होती है। प्रथम कोरोना वायरस से लड़ने के लिए शासन ने जो भी नीतियां और सावधानियां बरतने के लिये जनता को संदेश दिये, उसके संबंध में शासन स्वयं में ही पूर्ण रूप से निश्चित (कन्फर्म्ड) नहीं है। अर्थात सरकार का स्वयं का इन नीतियों के बाबत पूर्णतः दृढ़ और निश्चित दृष्टिकोण व विश्वास नहीं है। सामान्यतया जब भी सरकार कोई नीति, निर्देश, नियम, कानून बनाती है, तो कम से कम उसकी स्वयं की नजर में तो वह पूर्ण परफेक्ट व असरकारक होती ही है। भले ही विपक्ष या नागरिक गण उसको सही नहीं माने या कुछ न कुछ कमियां निकालें। लेकिन दुर्भाग्यवश कोरोना सेे निपटने के मामले में स्वयं के द्वारा बनाई गई नीति के संबंध में सरकार पूरे समय असंमजस की स्थिति में ही रही है। फिर चाहे प्रवासी श्रमिकों के विस्थापन, कोरोना काल में श्रमिकों-कर्मचारियों को पूरी तन्खा देना व छटनी न करने की नीतिगत घोषणा (परन्तु निगरानी निरंक) श्रमिक गाड़ी, बसों, यात्री ट्रेन व प्लेन चलाने, ऑनलाईन या काऊंटर से रेलवे टिकिटों, का आरक्षण बस, टैक्सी, कार इत्यादि द्वि-चक्रवाहिनियों में सवारियों को बैठालने की संख्या, वर्क फ्रार्म होम, आदि-आदि। हवाई जहाज में अंदर बैठते समय 6 फीट की दूरी नहीं, लेकिन हवाई अड्डों की लाऊन्ज पर 6 फीट की दूरी आवश्यक जैसे विरोधाभाषी निर्णय आदि। मतलब साफ है! निर्धारित मापदंडों के बारे में जब सरकार खुद ही सुनिश्चित नहीं है, तब उन आधारों को सार्वजनिक रूप से लागू कर हम वायरस के संक्रमण को रोकने की पूरी आशा कैसे कर सकते हैं? अर्थात् आपका इरादा ही कमजोर रहा है। वह इस बात से भी सिद्ध होती है कि सरकार स्वयं कितनी लापरवाह है। वह उसके सरकारी कार्यक्रमों और सरकार चलाने वाले माननीयों द्वारा कोविड-19़ के प्रतिबंधों का निरतंर उल्लघंन करते हुये दिन प्रतिदिन देखी जा सकती है। तब उन पर कौन कार्यवाही करेगा। ‘सैइयां भये कोतवाल तो फिर ड़र काहे का!
कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए तीन मुख्य सावधानियां विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर हमारी केंद्रीय सरकार ने लगातार बतलाई हैं। मास्क, 6 फीट की दूरी एवं लगातार हाथ धोना और सैनिटाइज करना। ये तीनों बरती जाने वाली मुख्य सावधानियां भी अपने आप में और संयुक्त रूप से पूर्ण नहीं है। इसी कारण से ही कोरोना वायरस का संक्रमण रुक नहीं पा रहा है। मास्क लगाने के बावजूद आपकी आंखे व कान खुले हुये हैं, जहां से संक्रमण हो सकता है। सरकार फेस मास्क के उपयोग के लिए जोर क्यों नहीं दे रही है? जिसके द्वारा पूरे चेहरे को ढ़का जाकर संक्रमण को रोका जा सकता है। दूसरी 6 फीट की दूरी को खुद विश्व स्वास्थ संगठन और सरकार ने यह कहकर संदेह पैदा कर दिया है कि वायरस हवा में ट्रेवल कर आठ-दस फीट की दूरी तक हवा में तैरकर जाकर उसके ड्रॉपलेट गिर सकते है। इस प्रकार सरकार अपनी ही निर्धारित मापदंडों को कमजोर करती रही है। एन 95 मास्क को पहले सर्वश्रेष्ठ बतलाया जाकर फिर बाद में कहा गया कि यह स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वालों के लिए ही ज्यादा उचित है। आम आदमी ज्यादा समय तक यदि उक्त मास्क या सामान्य, मास्क का भी उपयोग करेगा, तो उसे सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। इसी मास्क के लगातार उपयोग करने पर भी आशंका व्यक्त की गई है। उपरोक्त तीनों सावधानियां का पूर्ण पालन हो इसके लिए ही सरकार ने शुरू में ही 21 दिन का लॉकडाउन लागू कर और फिर उसे बढ़ाते बढ़ाते लॉकडाउन-4 तक ले गयी। लेकिन नेशनल टास्क फोर्स के सदस्य डी.डी.सी.ए. रेड्ढी ने खुद यह माना है कि लॉकडाउन असरदार विकल्प नहीं है। क्योंकि बिना लक्षण वाले मरीजों की संख्या घर में भी हो सकती है, जो संक्रमण को फैलायेगें।
क्रमशः शेष अगले अंक में..........

शनिवार, 12 सितंबर 2020

*‘‘उद्धव ठाकरे’’ क्या राजनीति में दूसरे ‘‘राहुल’’ तो नहीं ‘‘होते’’ जा रहे?

फिल्मी कलाकार ‘कंगना रनौत‘ के मुंबई स्थित ‘‘कार्यालय’’ के तथाकथित कुछ अतिक्रमण के भाग को तोड़ने हेतु ‘‘इंसटेट काफी’’ के समान ‘‘तुंरत-फुरंत, तत्वरित गति’’ से कार्यवाही की गई। इससे ‘‘राजनैतिक गलियारों’’ में चल रही इस बात को बेशक बल मिल गया कि, महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र बिन्दु ‘‘उद्धव’’ कहीं दूसरे ‘‘राहुल’’ तो सिद्ध नहीं होने जा रहे हैं? क्योंकि इसके पहले ‘‘पालघर’’ ‘‘अर्नब गोस्वामी,’’ ‘‘सुशांत सिंह राजपूत’’ और अब ‘‘कंगना रनौत’’ इन समस्त मामलों में शिवसेना का रवैया बहुत ही गैर राजनैतिक, गैर जिम्मेदाराना, (राजनैतिक रूप से) अपरिपक्व और अदूरदृष्ट्रि पूर्व रहा। शिवसेना को जहाँ (सुशांत मामले में) तेजी से कार्यवाही करनी थी, वहाँ पर तो उसका रवैया बिल्कुल ढ़ीला-ढ़ाला रहा। परन्तु जहां प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से विक्टिम (शिकार) (जो मनाली से वापिस लौट रही थी) को समय दिया जाना चाहिये था, वहाँ ‘जल्दबाजी’ में कार्यवाही कर स्वयं को अनावश्यक विवाद में घसीट ले आयी। इस कारण से उन समस्त मामलों में सभी पक्ष तो एक तरफ हट गए और ‘‘शिवसेना ही मुख्य विलेन के रूप में हो गई या प्रस्तुत कर दी गई’’। 
इस बात का शिवसेना के पास कोई जवाब ही/भी नहीं है कि, मुंबई महानगर पालिका के पास ‘अतिक्रमण’ से संबंधित कितनी शिकायतें कंगना के विरूद्ध कार्यवाही करने के पूर्व तक लंबित थी? कंगना रनौत के विरूद्ध हुई शिकायत का कौन सा नम्बर था? क्या कंगना के पूर्व की लम्बित अन्य समस्त शिकायतों का निपटारा हो गया था? व ‘‘नियमों’’ का कितना पालन किया गया? इन प्रश्नों की निरूत्तर स्थिति के कारण शिवसेना की बहुत ‘भद’ और ‘किरकिरी’ हो रही है। जिस कारण से उपरोक्त समस्त मामलों पर समग्र रूप से विचार करने पर यह‘‘धारणा’’(परशेप्शन) बलवती व गहरी होती जा रही है कि ‘उद्धव’ याने कहीं ‘राहुल’ तो नहीं ? एक दबंग, दृढ़ व मजबूत ‘‘इंदिरा गांधी’’ जिन्हे उनके विरोधियों ने भी, कभी ‘‘मां दूर्गा’’ की संज्ञा तक दे ड़ाली थी, की छवि को जिस प्रकार राहुल गांधी ने अपनी मंदबुद्धि व अपरिपक्वता से ध्वस्त कर रखा है। ठीक उसी प्रकार महाराष्ट्र के ‘‘शेर बाला साहब ठाकरे’’ की छवि भी ‘उद्धव’ की कार्य प्रद्धति से निरंतर दिनोंदिन गिरती जा रही है। यद्यपि सामाजिक व व्यवहारिक रूप से उद्धव एक व्यवहार कुशल व्यक्ति जरूर है। 
आइये; कंगना रनौत पर कुछ चर्चा बढ़ाने  के पूर्व थोड़ी सी मीडिया की सुध भी ले लें! जो यहां पर जरूरी है। आखिरकार इस देश के ‘मीडिया‘ को हो क्या गया है?‘‘हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक’’ (डीएसटीडीवी) का सफल परीक्षण कर भारत विश्व का चैथा देश बन गया है, जिसकी कुछ समय तक, कुछ लाइन की न्यूज प्रसारित कर मीडिया ने अपने ‘दायित्व‘ की इतिश्री मान ली। भारत-चीन सीमा विवाद के बढ़ते तनाव के बीच दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई ‘‘पंचशील सहमति’’ को एक दो लाइन में प्रसारित कर मीडिया ने अपने महत्वपूर्ण ‘‘समय को बचाकर‘‘ ‘‘रनिंग कंमेंट्री’’ के लिये रख लिया। कंगना रनौत मनाली  (हिमाचल प्रदेश) से ‘‘कितने बजे‘‘ निकली ‘‘और कहां कहां पहुंची‘‘ है और कल ‘‘मुंबई कब पहुंचेगीं,’’ रास्तों में क्या खाया पिया। इन सब ‘बकवास’ की क्रिकेट समान लिविंग कमेंट्री (आंखों देखा हाल) आपके पास पहुंचा कर ही मीडीया अपने दायित्व को पूरा मानेगा? अन्यथा आप जनता उन मीडिया के स्टूडियो को तोड़ नहीं देंगे? क्योंकि ‘सुशांत’ के बाद कंगना रनौत को इस समय देश की सबसे बड़ी ‘‘आइकॉन’’ जो बना दिया है? मीडिया के पास मिसाइल तकनीक की उपलब्धि की रनिंग कमेंट्री लगातार कुछ दिनों तक करने का समय नहीं है, जिसमें वह यह बतलाए कि उक्त टेक्नोलॉजी आवाज की गति से 6 गुना तेज (मैक्स-6) गति से दूरी तय कर सकती है। उक्त टेस्ट डीआरडीओं (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) ने उड़ीसा तट के पास डॉक्टर अब्दुल कलाम कांम्पलेक्स से स्वदेशी मानव रहित स्क्रैमजेट प्रोपल्जन सिस्टम का उपयोग कर हाइपरसोनिक स्पीड़ फ्लाइट का सफल टेस्ट किया है। इस टेस्ट की तैयारी करने में कितना समय व धन लगेगा? आदि-आदि।
आइए, अब कंगना रनौत व उन को दी गई सुरक्षा की बात कर लें। ‘कंगना रनौत‘ को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘‘वाय श्रेणी’’ की सुरक्षा प्रदान कर दी हैं। जिसमें 11 पुलिस कर्मियों के साथ 2 पर्सनल सिक्यूरिटी आफीर्सस भी शामिल होते है। इस पर जनता के टैक्स चुकाए पैसा का खर्चा! कितना? प्रतिउत्तर में, कंगना रनौत ने गृहमंत्री अमित शाह को धन्यवाद भी दे दिया है। इस प्रकार लगभग 135 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में लगभग 450 सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों के क्लब में शामिल होकर वे माननीय हो गयी है। कंगना रनौत फिल्मी दुनिया की बहुत सफल नहीं तो भी एक नामचीन अभिनेत्री जरूर है। परन्तु एक मामले में उन्होंने सफलता जरूर प्राप्त की है, वह समय-समय पर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहकर, सिर्फ बयानों में ही बयानी दुश्मनी पैदा कर लेती है। फिलहाल वे ‘‘बेखौफ बयानवीर‘‘ बनी हुई हैं। लेकिन ‘‘बेखौफ’’ बयानों का कदापि यह मतलब नहीं है कि, आप ‘‘खौंफ’’ पैदा कर सुरक्षा की मांग करने लगे। उन्होंने पूरी की पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज पर ही यह आरोप जड़ दिया था कि, लगभग 99 प्रतिशत फिल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स लेते हैं, जिस जानकारी को उन्होनें आज तक एनसीबी के साथ शेयर क्यों नहीं किया? अभी फिलहाल वे सुशांत प्रकरण में लगातार विवादित अनर्गल बयानों और ट्विटर्स के माध्यम से सोशल मीडिया में तरोताजा हैं। और मुंबई महानगर पालिका की कार्यवाही ने ‘‘आग में घी ड़ालकर’’उन्हें बेचारी राष्ट्रीय हीरोईन तक बना दिया है। किसी ने (मेरी नहीं) एक टिप्पणी की है, सुशांत प्रकरण के अनचाहे गर्भ से कंगना प्रकरण का जन्म हो गया है। इस तरह से अन्य कोई सामान्य नागरिक यदि‘‘विवादित बयान’’ देकर सिर्फ बयान बाजी के भीतर (प्लेटफार्म पर) दुश्मन पैदा कर ले तो, क्या केंद्रीय सरकार उस प्रत्येक व्यक्ति को ‘‘वाय या अन्य श्रेणी’’ की सुरक्षा प्रदान करेगी?चूंकि यह प्रश्न उठाया गया हैं कि, अन्य अतिक्रमणों पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? मतलब साफ है कि इस देश में ‘‘अपनी-अपनी ढफली’’ ‘‘अपना-अपना राग’’।  
संविधान में भारत के प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा का दायित्व  सामान्यतया उस राज्य की सरकार पर ड़ाला गया जहां के वे नागरिक है। अतः कंगना रनौत को जान माल की सुरक्षा का कोई यदि खतरा है भी तो, उसकी सुरक्षा का  दायित्व भी महाराष्ट्र सरकार पर ही है। प्रारम्भ में कंगना द्वारा अपनी सुरक्षा के प्रति ड़र व आंशका व्यक्त करने पर उनकी सुरक्षा के बाबत महाराष्ट्र सरकार ने कंगना को सुरक्षा देने की पेशकश की थी। लेकिन कंगना ने यह कहकर उसे अस्वीकार कर दिया था कि, उसे मुंबई पुलिस पर भरोसा नही हैं। अतः उसे केन्द्र या मध्यप्रदेश पुलिस की सुरक्षा दिलायी जाए। केन्द्रीय सरकार ने कंगना रनौत को सुरक्षा देने के पूर्व महाराष्ट्र सरकार से इस संबंध में क्या कोई चर्चा की थी? क्या सुरक्षा एजेंसी (आई.बी. इत्यादि) से ‘‘खतरे‘‘ के संबंध में कोई रिपोर्ट ली गई ? और यदि खतरा है,तो कितना? कितनी सुरक्षा की आवश्यकता है। और इन सबसे बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता हैं कि कंगना को वास्तविक रूप से किससे खतरा हैं? खतरा किस बात का है? जान का? संपत्ति का? सम्मान का? गाली गलौच का? या....  
आपको शायद याद होगा, जब महाराष्ट्र सरकार की सुरक्षा को कंगना ने अस्वीकार किया था, तब शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा था कि यदि उन्हे महाराष्ट्र आने से ड़र लगता है (जैसा कि कंगना का स्वयं का बयान था) तो वे मुंबई वापिस न आए। इस बात का बतंगड़ बना दिया गया। एक व्यक्ति लगातार उस सरकार पर असुरक्षा का आरोप लगा रही हो, जो सुरक्षा देने को तैयार है। लेकिन आरोप लगाने वाली व्यक्ति सुरक्षा के प्रस्ताव को (राजनीति के चलते?) मना कर देती है। तब ‘उस सरकार’ के पास ‘चारा’ क्या रह जाता है? संजय राउत के उक्त बयान में कोई प्रत्यक्ष धमकी नहीं थी। इसके बावजूद संजय राउत को उक्त बयान को लेकर कटघरे में खड़े करने का प्रयास किया गया। जब महाराष्ट्र सरकार पर कंगना का विश्वास उठ गया है व उनकी जान को खतरा है, तब मुंबई आने पर उनके जान के खतरे को दूर करने के लिये महामहिम राज्यपाल को महाराष्ट्र सरकार को भंग नहीं करना पड़ेगां? परन्तु कंगना ने पलटकर चुनौती देती हुये कहा है कि मैं मुंबई आ रही हूं, ‘‘किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक लें‘‘। कंगना के आये लगातार ऐसे बयान सिर्फ ‘‘छुपे हुये राजनैति एजेंड़े‘‘ के परिणाम स्वरूप ही प्रतीत होते दिखते हैं। फिर चाहे ‘‘मुंबई की पीओके’’ से तुलना गृहमंत्री अनिल देशमुख की ओर इंगित करते हुये कहना कि पीओके से तालीबान में तब्दील हो गया। ‘‘सार्वजनिक रूप से, तू तड़ाके शब्दों’’ के द्वारा मुख्यमंत्री को संबोधित करना, फिल्मी इंडस्ट्रीज देश द्रोहियों से भरी हुई हैं, आदि-आदि। (बयानों की लम्बी फेहरिस्त है)
वर्तमान में मीडिया और देश की यही ‘‘नीति’’ बन गई है। और जब इस ‘‘नीति’’ पर ‘‘राजनेता’’ सवार हो जाते हैं, तब वह ‘‘राजनीति’’ कहलाने लगती है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री, महामहिम राज्यपाल, महाराष्ट्र एवं पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर ‘करणी सेना’, ‘आरपीआई’, ‘‘संत समाज‘‘ आदि तभी तो इस दौड़ में शामिल हो गये हैं। इसलिए सब कुछ जायज है। कंगना रनौत ने जिस प्रकार के लगातार आक्रमक विवादित बयान दिये है, क्या उसे किसी भी तरह उचित ठहराया जा सकता है? इस बयानों पर उक्त बयानवीर लोग कंगना को कटघरे में खड़े नहीं कर रहे है? सिर्फ उनकी राजनीति को सूट (अनुकूल) वाले बयानों को चुनकर राजनीति के "हवन कुंड" में अपनी आहूति देकर हवन की आग को ‘‘राजनीति चमकाने के चक्कर में’’ बुझने नहीं दे रहे है? निश्चित रूप से कंगना के प्रश्न व जवाब के शिवसेना के प्रत्युत्तर बचकाना व अपरिपक्व है, और उनका समर्थन नहीं किया जा सकता है। अरविंद केजरीवाल (थप्पड़ कांड) नरेंद्र मोदी (को चोर कहना) के प्रत्युत्तर में उनके ’मौंन’ से शिवसेना कुछ तो सीख ले ले?
लेकिन इससे कंगना रनौत का स्टेण्ड सही सिद्व नहीं हो जाता है। ‘क्रिया‘ की ‘प्रतिक्रिया‘ यदि गलत है, तो उक्त क्रिया स्वतः स्वय-मेव सही ही हो, यह आवश्यक नहीं है। प्रस्तुत प्रकरण में यही सब कुछ तो हो रहा हैं। इस संबंध में शरद पवार का रूख पूरी तरह से सामयिक, राजनैतिक परिपूर्णता लिये हुये परिपक्व है। शिवसेना को इससे सबक लेना चाहिये। परन्तु उपरोक्त घटनाओं के बावजूद शिवसेना द्वारा आगे कंगना के घर पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने के लिए नोटिस देना और गृहमंत्री अनिल देशमुख के द्वारा ड्रग्स एक्ट के अंतर्गत कंगना के विरुद्ध कार्रवाई करने के आदेश देना और फिर शिव सैनिकों द्वारा रिटायर्ड नौसेना अधिकारी द्वारा किए गए कथित व्हाट्सअप मैसेज पर हुड़दंग मचाना व मारापीटी करना। इन सब बढ़ती हुई कार्रवाईयों व घटनाओं से तो यही लगता है कि शिवसेना ने उपरोक्त लगातार हो रही फजीहत से कोई सबक नहीं लिया है। अर्थात उपरोक्त घटना उक्त ‘‘धारणा‘‘ कि ‘‘उद्धव राहुल हो गए‘‘ को ‘‘वास्तविकता‘‘ में बदल रही हैं। ‘‘सामना’’ (‘शिवसेना का मुखपत्र’) के अभी भी लगातार चलते (असफल) आक्रमण से शिवसेना की स्थिति आगे जाकर कहीं ऐसी न हो जाये कि वह जनता का ‘सामना’ करने की स्थिति में ही न रहे। तब ‘‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’’। तब शायद कहीं शरद पवार को भी आगे यह न कहना पड़े कि ‘‘नादां दोस्त से दानां दुश्मन ज्यादा अच्छा होता है‘‘।
अंत में इस पूरे प्रकरण को इस एक लाइन में संपादित किया जा सकता है ‘‘जिस ‘‘सजी सजाई थाली‘‘ को शिवसेना ने पूर्व में भाजपा के सामने से ‘‘खींच‘‘ लिया था, आज उपरोक्त समस्त  घटनाओं के द्वारा पकी पकाई खीर भाजपा को सौंप दी, जिसे लपकने में भाजपा ने बिल्कुल भी देरी नहीं की। यह राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

‘‘केशवानंद भारती‘’’ ने ‘भारतीय‘ संविधान को ऐतिहासिक रूप से ‘‘पुर्नपरिभाषित’’किया।


एक आम सामान्य भारती (भारतीय) के लिए ‘‘केशवानंद भारती‘‘ ‘‘भारतीय नागरिक‘‘ होने के बावजूद एक अनजान सा नाम है। परंतु निश्चित रूप से विधिक क्षेत्रों में ‘‘स्वतंत्रता के अधिकारों’’ व ‘‘मानवाधिकारों’’ की लड़ाई लड़ने वाले प्रहरी कार्यकर्ताओं, ‘‘सक्रियतावादी’’ (एक्टिविस्ट) आदि लोगों के बीच जरूर ‘‘केशवानंद भारती‘‘ का नाम वर्ष 1973 के बाद से कभी न कभी किसी न किसी रूप में जरूर आया होगा। क्योंकि ऐसे लोग जब उन अधिकारों की लड़ाई व रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय जाते हैं, तब कहीं न कहीं अपने उक्त अधिकारों की लड़ाई के समर्थन में ‘‘केशवानन्द भारती‘‘ प्रकरण का हवाला जरूर देते है। वह इसलिए, क्योंकि वस्तुतः उनकी लड़ाई उन अधिकारों को समाप्त करने वाले उन कानूनों से होती है, जो यद्यपि विधायिका ने पारित तो किए होते हैं, लेकिन वे कानून उनके अधिकारों का ‘संरक्षण’ करने की बजाय ‘क्षरण’ ही ज्यादा करते है। इसलिए वे ‘‘केशवानंद भारती‘‘ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय द्वारा ‘‘प्रतिपादित सिद्धांत’’(रूलिंग) "मूल ढांचा" का हवाला देकर उन कानूनों को संविधान के विरूद्ध बता कर अपने मुद्दे की लड़ाई को बल और मजबूती प्रदान करते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बात देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ। इस नए संविधान के द्वारा देश में लोकतांत्रिक, अप्रत्यक्ष चुनावी व्यवस्था (प्रधानमंत्री के लिए) लागू करने के बावजूद, एक नागरिक की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार तभी तक विद्यमान रह सकते हैं, जब तक संविधान उन अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है। केशवानंद भारती उच्चतम न्यायालय का वह प्रथम लीडिंग केस है, जो संविधान की रक्षा करने के साथ-साथ आपके संविधान प्रदत समस्त अधिकारों की रक्षा भी करता है। अभी तक जितने भी संविधान संशोधन हुये है, (लगभग 104) उनमें से वे संविधान संशोधन कानून जिनकें द्वारा संविधान के मूल तत्व (बुनियादी संरचना) पर जब कभी हथोड़ा चलाया गया है, तभी सर्वोच्च न्यायालय में उसकी सर्वोच्च व्याख्या (टेस्टिंग/बैरोमीटर) का लीडिंग (प्रमुख) केस केशवांनद भारती द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ही होता है। इस कारण विधिक क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों के दिमाग में उक्त केशवानंद भारती प्रकरण बैठ सा गया हैं।
आखिर केशवानंद भारती प्रकरण है क्या? इस को आगे थोड़ा समझते हैं। केरल के उत्तरी जिले कासरगोड इडलीनीर मठ के प्रमुख ‘‘केशवानन्द भारती‘‘ केरल सरकार के भूमि सुधार कानूनों को चुनौती देते हुए अंततः सुप्रीम कोर्ट तक गए थे। जहां पर उन्होंने 24, 25, 26 व 29 वें संविधान संशोधन कानून को चुनौती दी थी। 24 वें संविधान संशोधन कानून के द्वारा गोलकनाथ प्रकरण में प्रतिपादित  ऐतिहासिक सिद्धांत कि मूल अधिकारों में कमी संविधान संशोधन द्वारा नहीं की जा सकती है, को निष्प्रभावी कर दिया गया। 29 वें संविधान संशोधन कानून को इसलिए चुनौती दी गई थी, क्योंकि उसके द्वारा संविधान की "नौवीं" अनुसूची में केरल भूमि सुधार अधिनियम 1953 को शामिल करने के कारण उक्त कानून जिसके विरूद्ध मठ की जायदाद के लिए केशवानंद भारती मुकदमा लड़ रहें थे, को न्यायालय में कानूनन चुनौती नहीं दी जा सकती थी। उक्त मामलें की 68 दिनों तक सुनवाई चली थी। उनके वकील ‘‘नानी पालखीवाला"थे, व सहायक वकील फली.एस.नरीमन एवं सोली सोरबजी थे। पालखीवाला से उनके मुवक्किल केशवानंद भारती, मुकदमे के दौरान फैसला आने तक नहीं मिले थे। 
24 अप्रैल 1973 को मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने ( 1 के 7-6) बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया था कि ‘‘संविधान में संसद सर्वोच्च’’ नहीं है। यद्यपि ‘‘संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) को कोई भी संविधान संशोधन द्वारा नहीं बदला जा सकता हैं।‘‘ तदनुसार उच्चतम न्यायालय ने उक्त संविधान संशोधन के कुछ भाग को शून्य घोषित कर दिया।  इस प्रकार पहली बार ‘‘संविधान’’ के माध्यम से ‘‘न्यायपालिका’’ ने स्वयं को विधायिका के ऊपर वैधानिक रूप से स्थापित कर दिया, जो स्थिति आज तक चल रही है। जिसका फायदा यह हुआ है कि विधायिका व तदनुसार कार्यपालिका भी अपने उच्चतम न्यायालय द्वारा रेखांकित"क्षेत्राधिकार" से बाहर जाने की हिम्मत नहीं कर पाती है। 
केशवानंद भारती के इस ऐतिहासिक निर्णय  में उच्चतम न्यायालय ने ‘‘न्यायिक समीक्षा‘‘ ‘‘पंथनिरपेक्षता‘‘ ‘‘स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था‘‘ और ‘‘लोकतंत्र‘‘ को संविधान का मूल ढांचा बताया है। "संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है"। ‘‘बुनियादी संरचना‘‘ "लक्ष्मण रेखा" है, जिसे संविधान संशोधन द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। चुकि हमारे संविधान में "निषेधात्मक धारा" नहीं है (जैसा कि जर्मनी संविधान में एटर्निटी क्लॉज है)। जिसकी पूर्ति "उक्त निर्णय" करता है। उक्त निर्णय ‘‘न्यायिक सक्रियता’’ का भारतीय न्यायालय का पहला उदाहरण भी कहा जाता है। इस प्रकार उक्त प्रकरण केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल (एआईआर 1973 एस.सी. 1461) के नाम से भारत में ही नहीं विश्वव्यापी रूप से प्रसिद्ध हुआ। क्योंकि इस अहम फैसले पर बांग्लादेश, अफ्रीका महाद्वीप में भी न्यायालयों ने भरोसा जताया। संयोगवश सचिन तेंदुलकर इस निर्णय के दिन ही पैदा हुये हैं।  
केशवानंद भारती केस के पूर्व आइसी गोलकनाथ व अन्य विरूद्ध पंजाब राज्य व अन्य (1967 एआईआर 1643) जो गोलकनाथ प्रकरण के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के 11 जजों की फुल बेंच ने अपने पुराने निर्णय को पलटते हुए तत्समय पहली बार एक ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि, संसद संविधान संशोधन के द्वारा नागरिक के मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती है। उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 13, 14, 19 31, 32, 243, 246, 248 एवं 368 पर विचार करते हुये उक्त निर्णय दिया था। इस निर्णय के द्वारा 17 वां संविधान संशोधन जिनके द्वारा पंजाब सिक्योरिटी एवं लेड़ टेन्यू अधिनियम 1953 (जिसे गोलकनाथ ने चुनौती दी थी) को संविधान की ‘‘नौवी अनुसूची’’ में ड़ालने के कारण, उक्त अधिनियम 1953 जो मूल अधिकारों को कम कर रहा है को, 17 वें संशोधन के कारण चुनौती न दे सकने के कारण संविधान संशोधन कानून को ही ‘शून्य’ घोषित कर दिया था। 
केशवानंद भारती प्रकरण ने, उक्त गोलकनाथ प्रकरण जो संसद को संविधान के मूल अधिकारों को कम करने से रोकता है, से आगे जाकर संविधान के मूल ढांचे पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने से रोका गया। इंदिरा गांधी विरूद्ध राजनारायण के प्रकरण में केशवानंद भारती के मूल तत्व के सिद्धांत को अपनाते हुये 39 वां संविधान संशोधन अधिनियम को अवैध घोषित कर दिया गया। इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय एक कदम और आगे जाकर समानता व लिर्बटी (स्वतंत्रता) के अधिकारों को जो संविधान के मूल अधिकार में शामिल नहीं है, लेकिन संविधान की मूल तत्व (बेसिक स्ट्रक्चर) होने के कारण उसके साथ छेड़ छाड़ नहीं की जा सकती है, जैसा कि आपात्तकाल में पारित संविधान संशोधन कानून द्वारा किया गया था। इसी निर्णय को आगे मिनर्वा मिल्स लिमिटेड विरुद्ध भारत संघ (ए.आई.आर.1980 एससी 1789) में अनुसरण किया जाकर 42 वें संविधान संशोधन कानून जिसके द्वारा (प्रथम बार केशवानंद भारती के) मूल ढांचे के सिद्धांत को निष्प्रभावी कर असीमित संशोधन का अधिकार दिया था, के कुछ भागों को शून्य घोषित कर दिया। मूल ढ़ाचे के उक्त सिद्धांत को एल चंद्र कमा वि. भारत संघ, आर. आर कोहली वि. तमिलनाडू राज्य में ऊपर उल्लिखित "मिनर्वा प्रकरण" (जिसमें केशवानंद भारती प्रकरण का अनुसरण किया गया था) को अनुसरण करते हुये माना गया।  
उपरोक्त कारणों से केशवानंद भारती के फैसले को संविधान का रक्षक भी कहा जाता है। यद्यपि उक्त प्रकरण में केशवानंद भारती के अलावा अन्य पक्षकार भी थे व मूल विषय भी हटकर मठ की जमीन दूसरों को लीज पर देना से संबंधित था। एक अनोखी बात इस प्रकरण की यह भी रही कि स्वयं केशवानंद मठ की संपत्ति के जिस मुद्दे को लेकर लड़ रहे थे, उसमें वे हार गये और मठ को कोई फायदा नहीं हुआ। परन्तु उक्त निर्णय एक ऐतिहासिक नजीर बन गया। जिसमें आम भारतीय नागरिक को ऐतिहासिक स्थायी फायदा हुआ। इस प्रकार ‘‘केशवानंद भारती’’ न्यायिक निर्णयों के इतिहास में ‘‘एक मील का पत्थर’’ साबित हुये। ‘‘केशवानंद भारती’’ का ध्यान अभी इसलिए आया क्योंकि 79 साल की उम्र में केशवानंद भारती जो केरला के ‘‘शंकराचार्य‘‘ भी माने जाते हैं, का अभी हाल निकट में ही निधन हो गया हैं। 
उनको नमन! श्रंद्धांजली!

बुधवार, 9 सितंबर 2020

इलेक्ट्रानिक मीडिया में ‘‘बहसों’’ पर ‘‘प्रतिबंध’’ क्यों नहीं लगा देना चाहिए?


हाल में ही टीवी चैनल ’’आज तक’’ की ’’दंगल’’ बहस (डिबेट) पर कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव त्यागी की अचानक तबीयत बिगड़ने (हृदय घात) से उन्हें तुंरत आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी दुखद मुत्यु हो गई। इसके बाद आए ’’हृदयाघात’’ से हुई मृत्यु  के पश्चात मृतक की पत्नी ने साबित पात्रा को ’हत्यारा’ कहते हुए यह कहा कि पति  के आखिरी शब्द थे ‘‘इन लोगों ने मुझे मार डाला‘‘।

‘‘आज तक‘‘ टीवी समाचार चैनल मैं बेंगलुरु हिंसा पर जो बहस चल रही थी, उसमें शामिल एंकर रोहित सरदाना के प्रश्न व प्रतिउत्तर व कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी व भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के उत्तर और फिर प्रतिउत्तर, तीखी बहस,  तू तू मैं मैं, के साथ जो हुई निश्चित रूप से स्तरहीन थी। संबित पात्रा यह कहते हुए नजर आ रहे हैं ’’हमारे घर के जयचदो ने हमारे घर को लूटा है। अरे नाम लेने में शर्म कर रहे हो, वह घर  जला रहे हैं और यहां पर जयचंद नाम तक नहीं ले पा रहे हैं‘‘। एक ’’’टीका’ लगाने से कोई असली ’हिंदू’ नहीं हो जाता।’’ टीका लगाना है तो दिल में टीका लगाओं । त्यागी जी बीच-बीच में कहते रहे कि मै जवाब देना चाहता हूॅ, लेकिन अपेक्षा दरगुराज कर दी गई। खासकर के संबित पात्रा का राजीव त्यागी को बार-बार ‘जयचंद’ संबोधित करते हुये बोलने ने निश्चित रूप से ’’बहस’’ के स्तर को न सिर्फ गिराया हैं, बल्कि वे स्वयं भी स्तर की सीमा से बाहर हो जाते है। इस देश में ‘‘जयचंद‘‘ बोलना इतना आसान हो गया है? क्या राजीव त्यागी वास्तव में ‘‘जयचंद‘‘ थे? यदि उक्त जानकारी संबित पात्रा को थी, जैसा कि उन्होंने कहा, तो फिर वे उनके साथ डिबेट में बैठे ही क्यों ? उनके खिलाफ पुलिस में कार्रवाई क्यों नहीं करवाई गई ? अथवा वर्तमान में क्या जयचंदो की परिभाषा बदल गई है? 

यह पहली बार नहीं हैं, जब इस तरह की डिबेट आये दिन विभिन्न टीवी चैनलों में चल रही होती है। बल्कि प्रायः सभी टीवी चैनलों में टीवी डिबेट कहीं ’दंगल’, ‘हल्ला बोल’, ‘मुझे जवाब चाहिये’, ‘पूछता है भारत’, ’पांच का पंच’, ‘ताल ठोक के’, ’आर पार’ ‘राष्ट्र की बात’, ‘मुद्दा गरम हैं’, ‘सबसे बड़ा सवाल’ इत्यादि नामों से प्राईम टाईम पर लाईव प्रसारित की जाती हैं। सिवाए, एनडीटीवी को छोड़कर जिसनें कुछ सालों से इस तरह की बहसों को अवश्य बंद कर दिया है। इन सब बहसों में विषय शब्दों, वाक्यों, ईशारों, भाव भंगिमा इत्यादि सभी को सम्मिलित कर प्रायः स्तरहीन बहसे होती है, जो प्रायः उपरोक्त दिये गये ’’नामों’’ को सार्थक सिद्ध करती है। इसलिये आज के समय की आवश्यकता है कि यदि हम समय रहते इन बहसों में खासकर राजनैतिक व धार्मिक विषयों व ‘‘हिन्दू-मुस्लिम‘‘ को लेकर होने वाली बहसों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। यदि अभी भी हम नहीं चेते तो, हम उस खराब स्थिति में पहुंच सकते है, जहां से फिर वापिस लौटना मुश्किल होगा। 

यदि आप इन डिबेटों के विषय मजमून और एंकर के साथ उनमें भाग लेने वाले वक्ताओं, प्रवक्ताओं, विशेषज्ञांें को देखेगें और बहस में चल रही प्रश्नोत्तरी पर आप जरा सा भी ध्यान देगें, तो आपको बहुत ही स्पष्ट रूप से यह दिखेगा कि ये डिबेट मात्र देश की एकता, अखंडता, धर्मनिपेक्षता, सांप्रदायिक सदभाव, शांति, सुरक्षा इत्यादि सभी को तोड़ने वाली होती है। इनमें किस तरह के ‘‘लोगों’’ को ‘बहस’ में बैठाता जाता है, उन्हे ध्यान से जरूर से देखिए। अक्सर कोई न कोई अलगावादी, कश्मीर विरोधी, घृणित अपराध में लिप्त अपराधी, भ्रष्टचारी, आर्थिक अपराधी व देशद्रोही, साम्प्रदायिक व्यक्ति कई बार के धोर भारत विरोधी जहर उगलने वाले पाकिस्तानी प्रवक्तागण। ऐसे लोगों को मीडिया अपना सर्वाधिक प्रसारित होने वाला मंच जैसा कि वे दावा करते है, देकर इन जहरीले बातें व विषय को  आम जनता के दिमाग में ठूस ठूस कर भरकर बौद्धिक रूप से उन्हें प्रायः विक्षिप्त कर देश के प्रति उनकी आस्था प्रेम व विश्वास को धक्का नुकसान पहुंचाते रहते है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप यह विपरित तथ्य उजागर यह होता है कि, समस्त टीवी एंकर उक्त सब उल्लेखित मुद्दों को देश व समाज हित पक्ष में बताकर, लेकर ही उठाते है व बहस करवाते है, ऐसे चैनल हमेशा दावा करते है। लेकिन कभी भी उनके परिणाम सुखद न होकर हमेशा ही दुष्परिणाम आते है। इसका एक बड़ा कारण यह होता है कि वे ’सार्थक’ बहस करवाते कब हैं? बहसों में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन करना तो मानो लोकप्रियता का पैमाना हो गया है। बात केवल भाषा की मर्यादा तक सीमित नहीं रह गयी है। एक प्रसिद्ध न्यूज चैनल के लाइव डिबेट शो में तो हद ही हो गयी, जबकि सभ्यता की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख कर एक मौलाना ने बहस के दौरान एक महिला वक्ता को थप्पड़ ही जड़ दिये थें। 

प्रश्नों के उत्तर जब परस्पर विरोधी पक्ष देते है, तो वे अपनी सर्वोच्च्ता स्थापित करने के लिए कुछ ऐसी बातें जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कह जाते है, जिनका संबंध विषय वस्तु से दूर दूर तक नहीं होता है। उक्त समस्त पक्षों के बीच मौजूद गहरी खाई को कम करने के बजाय वह खाई को बढ़ाने का कार्य ही करती है। अर्थात समाज में विभाजन का कार्य ही करती हैं। जबकि बहस का उद्देश्य सार्थक परिणाम निकालकर समस्त पक्षों को उसके निकट ले जाने का प्रयास होना चाहिए। बहुत कम अवसर ऐसे आते हैं  जब एंकर इस तरह की गैर जायज बातों को रोकते है या उस मुद्दे पर गलत बयानी कहने वाले व्यक्तियों को डिबेट से बाहर कर देते है या उनका माईक बंद कर देते है। न्यूज चैनलो पर चीख-चिल्लाहट भरी एंकरिंग ने संवाद और शास्त्रार्थ की सारी परम्पराओ को ताक पर रख दिया है। राष्ट्रवाद धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर टीवी चैनलो के स्टुडियो में एक किस्म का एंकर जेहाद जारी है। चौकाने वाली बात तो यह है कि एंकर सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से जवाबदेही करने लगें हैं और सरकार की ओर से वे खुद जवाब देते हैं।

एक और चीज आपके लिए ध्यान में अवश्य आयी होगी। लगभग समस्त डिबेटों में भागीदार लोगो की उन विषयों पर स्वयं की अपनी कुछ न कुछ कमिया अवश्य होती है। जिसका उत्तर उनके पास सामान्यतया नहीं भी होता हैं। चूंकि दर्शक उसे लाईव देखतें है, तब अपने को निरूत्तर दिखने से रोकने के लिये ही, अपने विपक्षियों की उन विषयों पर उनके पूर्व के इतिहास की गलतियों को सामने लाकर उसे अपना ‘गुण‘ बताकर स्वयं की ’असफल’ रक्षा करते है। इस प्रयास में कई बार इस तरह की अनर्गल बातें ‘जाने अनजाने’ में चाहे-अनचाहे वे कह जाते है, जो देश व समाज हितों के विपरीत व नुकसान दायक होता है। हॉलाकि शायद कई बार कहने वाला वक्ता का वह आशय नहीं भी होता है। लेकिन एंकर ऐसे शब्दों को लपक कर टीआरपी के चक्कर में उनकी हैंड लाईन चलाकर ब्रेकिंग न्यूज बना देते हैं। इसीलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि देश हित में समस्त टीवी चैनल्स ‘एनडीटीवी‘ द्वारा अपनाये गये रूख को अपनाकर स्तरहीन अंतहीन डिबेट से बचें। क्योंकि वैसे भी ‘‘टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट‘‘ (टीआरपी) के चक्कर में मीडिया ‘येलो जर्नलिज्म‘, ‘पेड न्यूज‘, ‘फेक न्यूज‘, व ‘मीडिया ट्रायल‘ की विकृतियों से ग्रस्त  होकर अपनी मूल कृति व कृत्य से दूर हो चुका है।

 धन्यवाद।

बुधवार, 2 सितंबर 2020

"विवेक शून्य होती’’ ‘‘मीडिया’’ बनाम ‘कार्यपालिका’, ‘न्यायपालिका’ व समस्त तंत्र!

भारतीय मीडिया‘‘ ने ‘‘सुशांत‘‘ केस के प्रसारण (टाइम स्लॉट) का ‘विश्व रिकार्ड’ बनाया ? ‘बधाई’!

आपको याद ही होगा, 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुई वीभत्स बलात्कार से हुई हत्या ‘‘निर्भया कांड‘‘ का अभी तक का दुखद लेकिन सबसे अधिक प्रसारण ‘‘भारतीय मीडिया‘‘ में रहा है। परंतु ऐसा लगता है ‘‘सुशांत केस‘‘ ने प्रसारण के पिछले समस्त रिकार्डो को ध्वस्थ कर शायद नया विश्व रिकॉर्ड बना लिया है, यदि ‘‘कोरोना’’ को छोड़ दिया जाए, तो जो निःसंदेह एक घटना मात्र नहीं है। 
पिछले लगभग ढ़ाई महीनों (14 जून) से लगभग लगातार शायद ही कोई ऐसा दिन जाया हो, जब ‘‘मीडिया’’ एक विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) ‘‘डॉक्टर‘‘ के समान सुशांत प्रकरण की ‘‘चीर फाड़‘‘ न कर रहा हो। हमारे सामने अनेकानेक ऐसे उदाहरण हैं, जब ‘‘शव‘‘ के  एक नहीं, दो दो, तीन तीन बार ‘पोस्टमार्टम‘ किए गए हैं। बल्कि कुछ मामलों में तो दफनाए गए शव को जमीन से निकालकर उनका पुनः पोस्टमार्टम किया गया है। शायद इसीलिए तीव्र कार्य क्षमता व कुशलता दिखाने के चक्कर में ‘मीडिया‘ जांच एजेंसी पुलिस सीबीआई की तुलना में एक ही ‘शव‘ का दिन प्रतिदिन पोस्टमार्टम कर रहा है। जिसमें पाए गए तथाकथित ‘‘साक्ष्यों’’ के आधार पर अपनी राय जिसमें कुछ तथ्यों के व कुछ काल्पनिक व भविष्य लक्ष का आंकलन भी शमिल रहता है, के साथ रिपोर्ट भी बेबाक आपके सामने तुरंत फुरंत प्रस्तुत कर देता है। जबकि उक्त रिपोर्ट को पुलिस से लेने में हफ्तों लग जाते हैं। मेरी तो समझ से बाहर हो रहा है कि केंद्रीय सरकार और स्वयं केंद्रीय जांच अन्वेषण ब्यूरों (सीबीआई) के कान में जूं क्यों नहीं रेंग रही है कि, जब इतनी ‘‘अच्छी जांच‘‘ हमारे लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रहरी ‘‘चौथा स्तंभ‘‘ ‘‘मीडिया‘‘ कर लेती है तो, अधिकृत रूप से मीडिया को ही पुलिस एवं सीबीआई का ‘‘कार्य भार’’ क्यों न सौंप दिया जाए? इसके कई ‘‘फायदे‘‘ होगें। आइए देखते हैं।
पहली बात तो मीडिया ‘स्वयं ही प्राथमिकी तुरंत दर्ज‘ कर लेता है? जिसे दर्ज करने में पुलिस को हफ्तों महीनों लग जाते हैं। और तो और कई बार दर्ज ही नहीं हो पाती है। मीडिया को शिकायत दर्ज करने के लिए आवश्यक रूप से हमेशा ‘‘शिकायतकर्ता’’ की आवश्यकता नहीं होती है? जैसा कि कई बार घटनाओं का ‘‘न्यायालय’’ स्वतः संज्ञान ले लेते है। जबकि सामान्य प्रक्रिया में शिकायतकर्ता की शिकायत पर ही पुलिस प्राथमिकी दर्ज करती है। फिर जांच के लिए भी मीडिया को कोई लंबी चौड़ी फौज या तंत्र की आवश्यकता नहीं होती है? उसके पास उपलब्ध तंत्र व साधनों से वह सीबीआई से ज्यादा तेजी से ‘‘प्रभावी‘‘ जांच कर लेती है। तदुपरान्त ‘गवाह‘ बुलाने के लिए और उनकी ‘उपस्थिति सुनिश्चित‘ करने के लिए भी मीडिया को पुलिस के समान ‘‘सम्मन‘‘ भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ती है? क्योंकि मीडिया के एक इशारें पर गवाह ‘सम्मन‘ के बदले ‘सम्मान पूर्वक‘ ‘‘पूछताछ रूम‘‘ अर्थात स्टूडियों में पहुंच जाता है? फिर मीडिया के पास जांच का एक ऐसा ‘विशेषाधिकार‘ है, जो पुलिसिया जांच एजेंसी के पास नहीं है। ‘‘स्टिंग ऑपरेशन‘‘! इसके जरिए मीडिया सीबीआई की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली ढ़ग से जांच कर लेती है? 
इन सब से भी बढ़कर मीडिया को गवाहों (साक्ष्यों) जिनका मुकदमें का अंतिम निष्कर्ष तक पहंुचाने में महत्वपूर्ण योगदान होता है, को बुलाने में न तो उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान करनी होती है, (जैसा कि अभी तो सीबीआई को आरोपी रिया तक को सुरक्षा प्रदान करनी पड़ गई) और न ही उन्हें कोई ‘भत्ता‘ देना होता है। मीडिया तो मात्र एक कप ‘‘चाय‘‘ का प्याला पिलाकर अपना काम अच्छे से चला लेती है। कई बार आपने स्वयं मीडिया बहसों में भागीदार वक्ताओं को चाय की चुस्की लेते हुए देखा होगा। क्योंकि मीडिया भी जानती हैं कि वर्तमान युग में ‘‘चाय‘‘ का कितना महत्व है? फिर गवाहों के होस्टाइल (विरूद्ध गवाह) होने की कोई आशंका भी न के बराबर ही रहेगी? क्योंकि यहां पर तो गवाह बिना किसी दबाव के स्वयं ही तीव्र इच्छा लिए मीडिया की‘ पूछताछ रूम‘ स्टूडियो में पहुंच कर अपने को गर्वीला महसूस करते हैं? चूंकि मीडिया अपने जांच प्लेटफार्म पर हमेशा दो तीन विशेषज्ञों को भी भी जांच में सहयोग देने के लिए रखता है (जिस प्रकार न्यायालय में एमिकस क्यूरी के रूप में वकील सहायता देने के लिए होते हैं) इसलिए यहां वकीलों की भी आवश्यकता नहीं होगी? 
इन सब में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको इस बात का फायदा ही मिलेगा कि न्याय पाने के लिए, निर्णय के लिए लंबे समय तक ‘इंतजार‘ नहीं करना पड़ेगा। ‘‘त्वरित न्याय‘‘ की जो कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की है और जिसकी पूर्ति अभी तक हमारा विद्यमान वर्तमान न्याय तंत्र नहीं दे पाया है। उक्त कमी की पूर्ति भी मीडिया ने इंस्टेंट टी (चाय) के समान तुरंत निर्णय प्रदान कर जांच मुकदमा पूरा हुए बिना ही, न्याय कर दिया है? आत्महत्या को हत्या घोषित कर  रिया की गिरफ्तारी की मांग मीडिया में तेजी से उठ रही है। भला हो मीडिया का! गनीमत तो यह है कि यद्यपि आरोपी को दोषी तो मान लिया है, लेकिन उसने अभी तक उसे सजा (फांसी की) नहीं सुनाई है। एक बात और; तथ्यों के प्राप्त होते ही मीडिया तुरंत निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, बल्कि कुछ मामलों में तो वह पहले से ही निश्चित (आंकलित) निष्कर्ष (नरेटिव) मानकर जांच करता है। इसीलिए उसे निर्णय देने में कभी भी देरी नहीं होती है। एक चैंनल ने तो सीबीआई के रिया के सीबीआई द्वारा पूछताछ (इंटेरोगेशन) किए जाने के पूर्व ही सीबीआई द्वारा पूछे जाने वाले तथाकथित प्रश्नों को गढ़कर स्वयं ही रिया से पूछताछ कर ली। 
इस प्रकार समस्त ‘‘जिम्मेदार एजेंसीज के नकारा’’ हो जाने के कारण मीडिया को ‘‘जांच एजेंसी‘‘ बना देने से ‘‘कितने फायदे‘‘ होंगे? इसकी गिनती की है आपने? लंबी चौड़ी संख्या में जांचकर्ता, सीबीआई, एसटीएफ, नारकोटिक्स, नारको, चिकित्सीय विभाग, फॉरेंसिक मेडिको लीगल, डीआई, ‘ईडी’, वकील, न्यायाधीश गण इन सब की छुट्टी हो जाएगी। इस प्रकार इन सब पर होने वाले जनता के (अनगिनत खर्चों के) पैसे भी बच जाएंगे? मीडिया के जांच एजेंसी बन जाने से प्राप्त न्याय की गुणवत्ता पर भी कोई शक नहीं होना चाहिए? क्योंकि आप लगातार यह देख रहे हैं कि मीडिया उपरोक्त उल्लेखित समस्त कार्यों को स्वयं ही पूरी ‘‘निष्पक्षता’’ व ‘‘ईमानदारी’’ से सफलतापूर्वक परिणित कर रही है? (यद्यपि मीडिया की निष्पक्षता, ईमानदारी व सफलता पर विस्तृत चर्चा पृथक रूप से फिर कभी करेगें)। पिछले ढ़ाई महीनों से सफलतापूर्वक चल रहे ‘‘मीडिया ट्रायल‘‘ ने उपरोक्त समस्त निष्कर्षों को सिद्ध कर दिया है। शक की कतई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है। वैसे, मीडिया का भी हमेशा से यही दावा रहा है कि ‘‘सत्य को सामने लाना‘‘ और ‘‘सच का सामना करवाना‘‘ यही उसका वैधानिक संवैधानिक प्रथम दायित्व है। ऐसा वह न केवल मानता है बल्कि उसका पूरी ईमानदारी से पालन भी करता है। सत्यमेव जयते! इसलिए कि सुशांत प्रकरण में समस्त पक्ष सत्यमेव जयते अवश्य दुहराते हैं। सच लाने के प्रयास में मीडिया ने सरकार के उक्त दावे को भी सच ही सिद्ध कर दिया कि, देश में ध्वस्थ होती कानून व्यवस्था, खिसकती सामाजिक व्यवस्था, साम्प्रदायिक विषाक्तता, भुखमरी, हाहाकार करती बेरोजगारी, आर्थिक मंदी भारत-नेपाल-चीन तनाव, राष्ट्रीय सुरक्षा आदि कोई समस्या है ही नहीं जैसा  कि ‘‘विपक्षी’’ बेकार में आरोप लगाते रहते हैं। जनता ने भी इन समस्त समस्याओं की तुलना में देश की वर्त्तमान एकमात्र समस्या ‘सुशांत’ है जिसके ‘‘शांत’’ न होने के मीडिया के प्रयास पर जनता ने भी मोहर (’’टीआरपी’’ बढ़ाकर?) लगा दी है। 
एक बात और! इस बात का बड़ा दुख रहेगा कि, भारतीय प्रेस काउंसिल ने उपरोक्त सुशांत मामले में चल रही ‘‘मीडिया ट्रायल‘‘ पर तीन दिन पूर्व हीे एक एडवाइजरी जारी कर के अपने उत्तरदायित्व की पूर्ति मान लिया है! यह ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार सरकार ने एक कानून बना दिया है जिसके अनुसार सिगरेट या शराब के उत्पादों पर एक चेतावनी आवश्यक रूप से चिपका दी जाती है कि ‘‘यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है‘‘ और तदनुसार सरकार स्वयं को कर्तव्य से मुक्त मान लेती है। क्या प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने निर्देश जारी करने के बाद उसके प्रभाव की कोई समीक्षा की? और यदि जारी उन निर्देशों का पालन नहीं  हो रहा है तो, क्या प्रभावी कार्रवाई की गई या करने का निर्णय लिया गया? ‘परिषद’ को आगे आकर जनता को बतलाना ही होगा। क्या आपको लगता नहीं है कि सुशांत प्रकरण के लगातार ऊलूल जुलूल दिशाहीन, बल्कि गलत दिशा की ओर तर्कहीन प्रसारण ने मीडिया को मजाक का विषय बना दिया हैं? 
मीडिया के एक साथी जो ‘सिरफिरा’ ही कहलाएगा, ने कहा कि सीबीआई घटना की जांच नहीं कर रही है, बल्कि मीडिया सीबीआई की ‘जांच‘ कर रही है। उपरोक्त दोनों बातें आपके विवेक पर निर्णय हेतु छोड़ देता हूं! चंूकि सिक्के के दो पहलू होते हैं। इसलिए इस मुद्दे के दूसरे पहलू को भी देखिए। सुशांत फिल्म कलाकार होने के कारण यद्यपि आम जनता के लिए एक थोड़े बहुत सेलिब्रिटी अवश्य थे, लेकिन फिल्मी दुनिया के लिए वे मात्र एक आम सामान्य कलाकार ही थे। बस परिस्थितियां कुछ ऐसी बन गई थी कि, वे एक दया के पात्र भी हो गए थे (शायद यही कारण उनकी आत्महत्या का रहा होगा) आत्महत्या के पूर्व ‘‘सुशांत’’ नाम से कितने लोग परिचित थे? लेकिन मीडिया से लेकर संबंधित समस्त आवश्यक तंत्रों ने इस आम आदमी के साथ घटित घटना के सच को बाहर लाने का जो ‘‘साहसिक और भागीरथी प्रयास‘‘ अभी तक किया है, उसके लिए आप क्या उन्हें धन्यवाद भी प्रेषित नहीं करेंगे? वह इसलिए क्योंकि अब ‘‘आम आदमी‘‘ को यह अवश्य महसूस होने लगेगा कि, भविष्य में आम आदमी की सुनवाई हमेशा होगी, वह भी ‘आम तरीके‘ से नहीं बल्कि ‘विशिष्ट तरीकों ‘से ध्यान पूर्वक होगी।
अंत में डॉ. वेदप्रताप वैदिक की ‘‘मीडिया‘‘ पर की गई सटीक टिप्पणी का (‘‘साभार‘‘) उल्लेख करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूं। डॉ. वैदिक से न्यूर्याक में हुई अमेरिकन महिला मदाम क्लेयर से हुई मुलाकात में उक्त महिला का टीवी के बाबत यह कथन था कि ‘‘यह ‘‘इंडियट बॉक्स’’ अर्थात ‘‘मूरख बक्सा’’ है’’। मतलब मूर्खो का, मूर्खो के लिये व मूर्खो के द्वारा चलाये जाने वाला बॅक्सा है। इस टिप्पणी के बाद शायद ही कुछ कहने को रह जाता है। सुशांत घटना की रिपोर्टिंग को लेकर डॉ. वैदिक आगे लिखते हैं, हमारे टीवी चैनल ‘‘लगभग पगला गये है’’। आगे मैं इसे पूरा कर इस लेख का समापन करता हूं। सिर्फ स्वयं चैनल ही नहीं पगला से गये हैं, बल्कि उन्होनें इस देश की भोली-भाली जनता को भी (‘‘टीआरपी‘‘ के चक्कर में) लगभग पगला सा दिया है। इस प्रकार ‘‘सुशांत’’ को ‘‘शांत’’ न करने में राजनैतिक व मीडिया के हितों को दोनों के प्रयासों से साधा जा रहा है।  

सोमवार, 31 अगस्त 2020

‘‘मंदी के दौर’’ में माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘‘एक रूपये’’ का मूल्यांकन ‘बढ़ा’ दिया!


 "त्वरित टिप्पणी’’
माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘‘अवमानना’’ के मामलें में आखिरकार आज प्रशांत भूषण को जिन्हे पूर्व में दोषी पाया गया था, बहुप्रतिक्षित ‘‘सजा’’ सुना ही दी। ‘‘सजा’’ ‘‘एक रूपये का जुर्माना’’ (फाइन) और जुर्माना अदा न करने पर तीन महीनों की साधारण जेल तथा तीन साल तक वकालत करने पर प्रतिबंध लगाया गया। जुर्माना; एक रूपये जमा न करने पर विकल्प में जो सजा दी गई है, उक्त एक रूपये का मूल्याकंन आप खुद ही "विकल्प का मूल्यांकन" करके कर सकते है।
‘‘अवमानना’’ का यह प्रकरण कई मामलों में विशिष्टता लिए हुये है। प्रथमत: इस मामले में किसी भी व्यक्ति ने प्रशांत भूषण के विरूद्ध अवमानना की शिकायत नहीं की थी। प्रशांत भूषण द्वारा लिखे गये दो तथाकथित आपत्तिजनक ट्वीटस पर माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर प्रशांत भूषण को नोटिस दिया गया था। इससे एक विचार कौंधता है कि, क्या उच्चतम न्यायालय मानहानि का दृष्टिकोण लेकर, पूरे देश में न्यायालयों के बाबत लिखे जाने वाले लेख, टिप्पणी, भाषण इत्यादि का पर्यवेक्षण करते है? इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय ने कितने बार स्वतः संज्ञान से यही कार्यवाही की है? चुकि माननीय उच्चतम न्यायालय देश की सर्वोच्च न्यायालीन संस्था है, तो क्या अधीनस्थ न्यायालय को भी इस तरह का 'संज्ञान' नहीं लेना चाहिए? यदि वे ऐसा संज्ञान नहीं लेते है तो, यह उच्चतम न्यायालय की अवमानना तो नहीं होगी? 
दूसरी बात इस प्रकरण में ‘‘बार’’ के सम्मानीय प्रतिष्टित वकीलों ने भी न्यायालय को प्रभावित करने का प्रयास किया है। लगभग 1000 से ज्यादा अधिवक्ताओं ने एक ज्ञापन उच्चतम न्यायालय को प्रशांत भूषण के पक्ष में दिया था। यह शायद पहली बार हुआ कि एक व्यक्ति को दोषी "घोषित" किए जाने के बाद 'सजा' सुनाये जाने के पूर्व दोषी पाये जाने के निर्णय का विरोध किया गया। क्या सिर्फ इसलिए कि दोषी व्यक्ति उच्चतम न्यायालय के एक सम्मानित वकील है? क्या इसके पूर्व बार के सदस्यों ने इस तरह से कभी हस्तक्षेप किया है? ज्यादा अच्छा यह होता कि वे एक पुर्निविचार याचिका दायर करते? अटॉर्नी जनरल वेणु गोपाल ने भी न्यायालय से प्रशांत भूषण को चेतावनी देकर कोई सजा न देने का तर्क रखा था। यह भी इस प्रकरण की एक विशिष्टता है जहां  महान्यायवादी  अटॉर्नी जनरल की ओर से उपस्थित न होकर स्वयं प्रशांत भूषण के पक्ष में बोले हैं। ऐसा लगता है, माननीय उच्चतम न्यायालय कहीं न कहीं इस प्रकरण में उपरोक्त ज्ञापन के कारण दबाव व दुविधा में रही हो सकती हैं। उक्त दबाव कितना प्रभावी रहा होगा यह एक गंभीर चिंतन का विषय होगा। एक तरफ माननीय न्यायाधिपति उच्चतम न्यायालय की गरिमा को बनाये रखने के लिए प्रशांत भूषण से माफी मांगने के न्यायालय के अनुरोध के बावजूद उनके द्वारा मांफी न मागने पर वे सजा देने के लिए मजबूर व मजबूत थे। दूसरी ओर कड़क सजा न देकर साफ्ट होकर स्वयं को साफ्ट कॉर्नर बना लिया। एक रूपया जमा न करने पर विकल्प में दी गई सजा दो विपरीत दूरस्थ सिरों के समान है। न्यायालय "न्याय" व "न्यायपालिका" के बीच प्रमुख भूमिका अदा करने वाले "वकीलों" को शायद नाराज नहीं करना चाहती थी। इसीलिए शायद इस तरह की सजा का निर्णय आया। लेकिन इस दुविधा के चलते माननीय न्यायालय ने इसे एक 'अलग' (आइसोलेट) केस न रखने से यह एक "नजीर" बन गई है। भविष्य में किसी भी व्यक्ति द्वारा "माननीय का मान" न रख पाने के कारण दोषी पाये जाने पर वह व्यक्ति इस नजीर का उदहरण देते हुये मात्र एक रूपये में छूट सकता है। 
एक महत्वपूर्ण बात औ! जस्टिस अरूण मिश्रा 2 सितम्बर को रिटायर्ड होने वाले है। यदि आज सजा नहीं सुनाई जाती तो, इस मामलें में फिर से नई बैंच के सामने सुनवाई होती। 27 व 29 जून को किये गये ट्वीटस पर "दो महीने" के भीतर सुनवाई होकर निर्णय भी आ गया। परन्तु इन्ही प्रशांत भूषण पर नवंबर 2009 से चल रहे ‘‘अवमानना’’ का एक मामला उच्चतम न्यायालय में अभी भी 'लम्बित' है। अतः प्रस्तुत मामलें में सुनवाई में कुछ 'जल्दबाजी' सी प्रतीत होती लगती है?
आश्चर्यजनक रूप से, उच्चतम न्यायालय ने एक रुपए जमा करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया है। सामान्यतया जब इस तरह के जुर्माने होते हैं, तब तुरंत पैसे जमा न करने पर  कोर्ट उठने तक की सजा दी जाती है। लेकिन यहां पर एक रुपए जमा करने के लिए 15 दिन का समय दिया गया, वही माननीय उच्चतम न्यायालय ने करोड़ों रुपए की कुछ वसूली के मामलों में  तुलनात्मक रूप से इस तरह की सुविधा नहीं दी । इसका अर्थ यही निकलता है कि न्यायालय ने जी "सजा" देते समय भी प्रशांत भूषण को जेल न जाना पड़े, उसका एक रास्ता बनाने का प्रयास किया प्रतीत लगता है।
प्रशांत भूषण ने उच्चतम न्यायालय व अटॉर्नी जनरल के अनुरोधों को यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि, मुझे पीड़ा है। मुझे अदालत का अवमानना का दोषी ठहराया गया है। मैं सदमे में हूं। आगे उन्होंने कहा कि मेरा बयान सद्धभावनापूर्ण था। अगर मैं इस अदालत से मांफी मांगता हूं तो यह मेरी "अंतरात्मा" व उस "संस्था" की जिसमें मैं "आस्था" रखता हूं, की अवमानना होगी। प्रशांत भूषण का उक्त कथन शायद नये विवाद को जन्म दे सकता है। व्यक्ति और संस्था में कौन बड़ा है? निःसंदेह संस्था को ही बड़ा माना जाता रहा है। लेकिन यहां पर उन्होंने स्वयं की अंतरात्मा की आवाज को ‘संस्था’ से यदि बड़ा माना नहीं तो उसके 'बराबर' अवश्य ला दिया है।  
चूँकि मैं जूम ऐप (ऑन लाईन) के माध्यम से ‘‘स्वराज्य अभियान से’’ आज जुड़ा था, जहां पर सजा सुनने के बाद प्रशांत भूषण के पिताजी शांति भूषण ने यह कहा कि पूरे देश से एक-एक रूपया उच्चतम न्यायालय में जमा कर देना चाहिए। प्रशांत भूषण इस पर क्या निर्णय लेते है, यह देखने की बात होगी।

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