शुक्रवार, 22 मई 2020

‘‘कोरोना’’ ‘‘कोविड-19’’ बीमारी कहीं ‘‘हिंदी भाषा’’ को ‘‘अंग्रेजी’’ से ’’संक्रमित‘‘ कर ‘‘बीमार’’ तो नहीं कर रही है?


इस कोरोना काल में कई नए नए शब्दों का ईजाद हो रहा है। इनसे हम रोज रूबरू हो रहे हैं। इन शब्दों को देखने से यह बात ध्यान में आई कि ये सब अंग्रेजी शब्द जिनका उपयोग वर्तमान में धड़ल्ले से हो रहा है, क्या इनके हिंदी शब्द नहीं हैं? जिनका अर्थ समान व सामान्य रूप से वही समझा जा सके? वैसे भी आज के जमाने में ‘‘शुद्धता‘‘ कहां रह गई है? ‘मिश्रण‘ (मिलावट) का जमाना है। इसी कारण हिंदुस्तान के नागरिकों के जीवन में ज्यादातर अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का प्रयोग काफी समय से बहुत ज्यादा में चलन में है। कोरोना काल में हिंदी प्रेमी बुद्धिजीवियों व साहित्यकारों का ध्यान भी शायद उक्त तथ्यों व स्थिति की ओर नहीं गया है। लंबे समय से प्रचलित अंग्रेजी शब्दों के बाबत फिलहाल मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन जो नए शब्द अभी के इस कोरोना काल के चलते लॉक डाउन मे चलायमान हैं, उन पर प्रत्येक हिंदी भाषा प्रेमी व्यक्ति को जरूर ध्यान देने की आवश्यकता है।
 आज यदि हम इन अंग्रेजी शब्दों जिनका उल्लेख मैं आगे करने जा रहा हूं उनके बदले हिंदी शब्दों को प्रचलन में तथा उपयोग में नहीं लाते है, तो वे सब हमारे जीवन की दैतन्दित आदत मे शुमार होकर हिन्दी भाषा के अंग बन जाएगें। इस तरह कुछ समय के पष्चात इस बात के ध्यान मे आने पर लेन पर फिर इन अंग्रेजी शब्दों की जगह हिंदी शब्दों का प्रयोग जब हम करेगें तो वे शब्द निश्चित रूप से हमे एक सामान्य हिन्दी बोलचाल के शब्द नहीं लगेगंे। वे हमें क्लिष्ट महसूस होंगे और तब हमे उन्हें अपने जीवन में अंगीकार करना कठिन होगा। इसलिए मेरा समस्त हिंदी, विज्ञ प्रेमी व साहित्यकारों से अनुरोध है कि वे इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करें। ठीक उसी प्रकार जैसे पूराने बीमार को सुधारने के बदले हम नये बीमार न बनें। इसी बात पर ध्यान देना हैं। तभी हम इस पुरानी बीमारी को सुधार पायेगें।
आइए अब हम उन अंग्रेजी शब्दों पर विचार करें जो इस कोरोना काल में बहुतायत से हम सभी के दैनन्दिन उपयोग में समा गए हैं।
लॉक डाउन, हॉटस्पॉट, बफर जोन, क्वोरंटीन, सोशल डिस्टेंसिंग, ह्यूमन डिस्टेंस/इिस्टेंसिंग सेनिटाइजेशन जैसे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग इस समय धड़ाके से किया जा रहा है। क्या हिन्दी में इनके मूल समानार्थी या पर्यायवाची शब्द नहीं हैं? जिनका हमेषा उपयोग समस्त मीडिया करें ताकि वह हमारे जीवन की दिनचर्या का अभिन्न अंग बन जाये । देश के हिंदी के साहित्यकारों और हिंदी भाषा के मूर्धन्यों को आगे बढ़कर मीडिया व सरकार को इनके हिंदी मूल शब्द बताकर उनका पूरा प्रचार-प्रसार करवाना चाहिए। वैसे आप सभी जानते हैं, इस कार्य हेतु इस समय मीडिया ही सबसे बड़ा हथियार, प्लेटफॉर्म और साधन हैं, जिस माध्यम द्वारा किसी भी चीज, तथ्य और शब्दों को कम मेहनत से ज्यादा से ज्यादा जनता के बीच व्यक्ति के जीवन में प्रचलित उतारा जा सकता है। मैं जब इन शब्दों के  हिंदी पर्यायवाची शब्दों को मीडिया के द्वारा प्रसारित करने की बात कह रहा हूं तभी यह बात भी ध्यान में आई कि मीडिया स्वयं ही इसका पालन नहीं कर रहा है। 
आप जरा मीडियो के ही नामांे पर गौर फरमाइये। हिंदी भाषा की वास्तविक स्थिति आपको समझ में आ जाएगी। ‘‘आज तक‘‘ (तेज) को छोड़कर अधिकतम चेनलों के नाम अंग्रेजी शब्दों द्वारा बने लिए हुए हैं। एबीपी न्यूज, जी न्यूज, एनडीटीवी, इंडिया न्यूज 18, आर रिपब्लिक भारत, इंडिया न्यूज, इंडिया टीवी, आईएनडी 24, आई.बी.सी 24 ,सुदर्षन न्यूज, टी.वी.19 भारत वर्ष, दूरदर्शन न्यूज, डी.डी न्यूज, न्यूज स्टेट, स्वराज, इंडिया वाईस, न्यूज नेशन,न्यूज वल्ड इंडिया, टोटल टी.वी, भास्कर न्यूज चेनल, इत्यादि और न जाने कितने सब चैनलों के नाम पूरी तौर से अंग्रेजी भाषा व शब्दावली में बने हैं इन अंग्रेज दॉ मीडिया वालों से हिंदी शब्दों के उपयोग की कैसे उम्मीद कर सकते हैं। सबसे विराट प्रश्न तो यहीं उत्पन्न हो जाता है। इसलिए मैं सोचता हूं कि इस समय समस्त हिंदी प्रेमी नागरिकों साहित्यकारों हिंदी विशेषज्ञों के साथ सरकार (जिसका यह प्रथम दायित्व है कि राष्ट्रभाषा हिंदी होने के कारण समस्त अधिकृत स्तर (प्लेटर्फाम) पर हिन्दी का ही प्रचार-प्रसार करे एवं करवाना सुनिश्चित करें। साथ बैठकर हिंदी की इस अवस्था (अव्यवस्था?) पर विचार कर कुछ न कुछ रास्ते निकालने की आवश्यकता है। ताकि हिन्दी को उसका वह स्थान मिल सके जिसकी की वह अधिकारी है। सरकार एवं सरकारी अधिकारियों व कर्मचारिंयों का यह ‘‘संवैधानिक’’ व भारतीय दायित्व भी है।

‘‘कोरोना वायरस’’ कहीं देश की ‘‘विदेश नीति’’ को भी ‘‘बीमार’’ तो नहीं कर रहा है?

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली का बयान भारत की विदेश नीति के संदर्भ में बहुत ही चिंताजनक है। वे कहते है कि भारतीय वायरस ‘‘चीनी व इटली वायरस’’ की तुलना में अधिक घातक लगते हैं। वे आगे कहते है, कि भारत से नेपाल आ रहा कोरोना वायरस इटली और चीन से भी ज्यादा खतरनाक है। इसके पहले नेपाल ने भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्सों लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी पर दावा करते हुये नया मानचित्र भी जारी कर दिया था। इसके पूर्व विश्व स्वास्थ संगठन पर जब चीन के विरुद्ध कोरोना वायरस की उत्पत्ति के संबंध में जांच के लिए प्रस्ताव लाया जा रहा था, तब भारत ने विश्व की महाशक्तियों के साथ लीड रोल अदा कर संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव पारित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। लेकिन उस समय भी ‘‘सार्क‘‘ देशों का नेतृत्व करने के बावजूद ‘‘सार्क‘‘ के 8 देशों में से सिर्फ एक बांग्लादेश व भूटान ने ही भारत का साथ दिया। शेष 5 मालद्वीप, श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान देशों ने चीन के विरुद्ध भारत का साथ नहीं दिया। कोरोना संकट काल में क्या यह विदेश नीति पर बड़ा संकट नहीं है? मामला चूंकि चीन से जुड़ा है और चीन से हमारे संबंध अच्छे नहीं है, इसलिए यह और ज्यादा चिंता का विषय है।
इसमे कोई शक नहीं है कि आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गिनती विश्व की पांच महा शक्तियों के साथ की जाती है। लेकिन यदि हम अपने चारों तरफ स्थित पड़ोसियों को ही अपने साथ नहीं रख पा रहे हैं, तब ऐसी महाशक्ति बनने का फायदा क्या? दूसरे इसका विपरीत प्रभाव भी विश्व में हमारी मजबूत होती स्थिति पर पड़ेगा। कोरोना के इस संकट काल में हमारी विदेश नीति निर्धारकों को क्या इस पर शीघ्रता से व गहनता से देश हित में विचार करने की आवश्यकता नहीं है?

गुरुवार, 21 मई 2020

‘‘बस’’ की ‘‘राजनीति!’’ ‘‘लोकतंत्र’’ की ‘‘जिजीविषा’’ (जीवित रहने) का धोतक है।

 
पिछले 3 दिनों से उत्तर प्रदेश में 1000 बसों पर राजनीति चल रही है, लेकिन बस, सिर्फ ‘‘बस’’ नहीं चल पा रही है। कोरोना संकट काल में खाली पड़ी सड़कों पर जीवन को गति देने वाली सार्वजनिक परिवहन की एक मुख्य ईकाई ‘बस’ का चक्का जाम की स्थिति को देखना भी एक आत्म संतुष्टि हो सकती है। अथवा शायद सत्ता पक्ष के अहं की तुष्टि का जरिया तो नहीं है? भाजपा (सत्ता पक्ष) व कांग्रेस (विपक्ष) दोनों ‘बस’ एक दूसरे पर राजनीति करने व राजनीति चमकाने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन इस बीच एक तीसरा पक्ष विपक्ष (मायावती) जो इस नाटक में भागीदार ही नही है, वह दोनांे पक्ष पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगा देती है। परन्तु तब ज्यादा आश्चर्य होता है, जब मीडिया दोनों पक्षों को राजनीति न करने की बिन मांगी सलाह भी दे देता है। कोरोना वायरस संकट काल में कई नागरिकों के मन में निराशा भरे भाव सवार हो जाने के कारण वे आत्महत्या के विचारों की ओर ढकेले जा रहे हैं। लेकिन मीडिया भी उक्त सुझाव देकर क्या आत्महत्या की ओर अग्रेसित  नहीं हो रहा है? अथवा मीडिया का यह सुझाव भी कहीं कोरोना के संकट काल की गंभीरता को तो प्रदर्शित नहीं कर रहा है? आइए इन गंभीर आरोपों प्रत्यारोपांे व मीडिया के गंभीर सुझाव की गंभीरता पर आगे विचार कर लें।
सबसे बड़ा प्रश्न आज हमारे सामने यह है कि क्या ‘‘राजनीति’’ मात्र आरोप प्रत्यारोप का ही माध्यम है? राजनीति करना पाप है? जिस लोकतंत्र की हम विश्व में दुहाई देते थकते नहीं हैं, हमारे इस वर्तमान लोकतंत्र की खुराक (भोजन) उसकी ताकत, उसका मेरुदंड क्या है? यह राजनीति ही इस वर्तमान लोकतंत्र की शक्ति, ताकत, भोजन, पहचान सब कुछ है। इसलिए मीडिया राजनीतिक दलों को इस ‘राजनीति’ को छोड़ने की सलाह देकर अनजाने में ही सही, कहीं लोकतंत्र को खत्म करने का रास्ता तो नहीं बता रहा है? और यदि हाँ तो लोकतंत्र के खत्म हो जाने से मीडिया कहां रहेगा? इसलिए मै यह कहता हूं कि मीडिया को राजनीतिक दलों को ऐसी आत्मघाती सलाह देने से बचना चाहिए था?
आइए अब यह देखें कि ‘‘बस’’ पर ‘‘राजनीति’’ किसने प्रारंभ की है? सर्वप्रथम कांग्रेस की राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमती प्रियंका वाड्रा गांधी की तरफ से एक चिट्ठी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी को लिखी जाती है कि, वे 1000 बसें प्रवासी मजदूरों को उनके गृह नगर पहुंचाने के लिए देने को तैयार हैं, बताईयें कब और कहा भेजें। वैसे यह कार्य कोई सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति करता तो राजनीति नहीं होती व इतना जी का जंजाल नहीं बनता। हमारे देश के परिपक्व होते लोकतंत्र में यह मान लिया गया है कि कोई भी राजनेता बिना ‘‘राजनीति’’ के सेवा भावना से ओतप्रेत होकर सामाजिक सेवा या सेवा के कोई भी कार्य नहीं कर सकता है। राजनीति रूपी क्रिकेट के मैदान में बिना सिक्का उछाले टॉस किए बिना, प्रथम पारी खेलना स्वयं निश्चित कर ओपनिंग बैट्स वूमैन के रूप में प्रियंका गांधी उतरी। जब इस देश में ऐन केन प्रकारेन श्रेय लूटने की राजनीति का बोलबाला हो, तब भी प्रियंका गांधी आगे बढ़कर स्वयं अपनी ‘‘राजनीतिक’’ पहल के श्रेय लूटने का दावा क्यों नहीं कर रही है, यह भी एक ‘‘संतोष मिश्रित’’ आश्चर्य का विषय है। 
प्रवासी मजदूरों की समस्या केवल उत्तर प्रदेश में ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब जैसे कांग्रेस शासित प्रदेशों में भी व्याप्त है। प्रियंका वाड्रा के भीतर अपनी पार्टी की सरकारों को प्रथम प्राथमिकता देते हुए उनके प्रति यह सेवा भाव की भावना क्यों जागृत नहीं हुई? यही से तो राजनीति प्रारम्भ होती है। शायद उनका यह दावा हो कि राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़  में प्रवासी मजदूरो की यह समस्या नहीं है। महाराष्ट्र की समस्या के लिए शायद प्रियंका इसलिए भी आगे नहीं बढ़ी है क्योंकि वह ‘मिश्रित’ सरकार है तथा प्रियंका वाड्रा ‘मिलावट’ में नही शुद्धता में विश्वास करती है। अथवा यह मान लिया जाए कि उनका अपनी सरकारों के तथाकथित अकर्मण्यता के चलते उनसे मोह भंग हो गया है। 1000 बसे राजस्थान दिल्ली से आने की बात कांग्रेस ने कहीं है। सर्वप्रथम तो उक्त बसें राजस्थान और दिल्ली में ही क्यों नहीं लगाई गई? उन प्रदेशों की सरकारों को क्यों नहीं चिट्ठी लिखी गई? राजनीति का क्रम यहॉ से आगे बढते जा रहा है। लेकिन प्रियंका वाड्रा राजनीति करते-करते यह भूल गई या उनसे चूक हो गई कि जिस पक्ष के साथ वह क्रिकेट की राजनीति जैसा खेल खेल रही हैं, अपनी बैटिंग की पारी आने पर वह भी चौके छक्के लगाने में निपुण व तत्पर है। प्रियंका का विरोधी पक्ष अर्थात वर्तमान  का सत्ताधारी पक्ष तोे पक्ष विपक्ष दोनों की ही राजनीति में पारंगत है, क्योकिं वह सफलतापूर्वक विपक्ष की राजनीति करते हुये ही सत्ता में पंहुचा है। अतः वह राजनीति करने में प्रियंका से कहीं ज्यादा सक्षम व बलवान है। अपनी पारी शुरू करते ही उसने यह दर्शा भी दिया है।
ओपनर बैट्समैन के रूप में उतरे योगी ने  सामने के छोर पर खड़े बैट्समैन के द्वारा प्रस्तावित इन 1000 बसों की सूची मांग कर चौका जड़ दिया। फिर इस सूची का सत्यापन कराकर उसमें कुछ टैक्सी, ऑटो, ई रिक्शा, टाटा मैजिक, एंबुलेंस, गुडस वाहन इत्यादि शामिल बताकर पुनः दूसरा चौका जड़ दिया। प्रियंका वाड्रा ने मानवीय भूल,टाइपिंग त्रुटि जताकर अपने बॉलर से स्पिन गेंद फिकवा कर बैट्समैन को आउट कर दिया। लेकिन योगी कहां यही रुकने वाले थे। उन्होंने बसों की फिटनेस, इंश्योरेंस, रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस इत्यादि दस्तावेजों की मांग कर छक्का ही मार दिया। लंच ब्रेक हो जाने के कारण अभी खेल रुका हुआ है।
कोरोना के संकट  काल का यही तो रोना है। यह राजनीति नहीं है, भाई साहब! सवाल सैकड़ों मजदूरों की जिंदगी का प्रश्न है।उनकी जान (जीवन) इन बसांे के द्वारा घर पहुंचने पर नहीं अटकी हुई है जनाब, बल्कि इन कागजी घोड़ो में अटकी हुई है। यदि खुदा न खास्ता कोई  दुर्घटना हो जाए तो आप लोग ही सबसे पहले हमारे कान उमेठने आ जाएंगे। राजनैतिक रेला, मेला रेला जैसे उत्सव के समय लगने वाली बसों  के संबंध में परमिट से लेकर मोटर यान अधिनियम के कितने प्रावधानों का पालन आरटीओ कितना करवाते है? लेकिन आज तो कोरोना का संकट काल है। यही तो राजनीति है, महोदय। हम राजनीति नहीं कर रहे हैं? हमनें मानवीय दृष्टिकोण अपनाया हुआ है। यदि हम भी राजनीति में उलझे होतेे तो हम प्रियंका वाड्रा से इन बसों के संबंध में प्राथमिक उपचार पेटी (फर्स्ट ऐड बॉक्स) की मांग सहित मोटर वाहन अधिनियम के समस्त प्रावधानों का शत-प्रतिशत पालन करवाते। हमारी सदाशयता पर शंका मत कीजिए? हम मजदूरों के प्रति निश्चित रूप से संवेदनशील हैं? और यह संवेदनशीलता प्राथमिक उपचार की पेटी की पूर्ति की मांग न करके दिखाई है। क्योंकि जो मजदूर गरीबी और भूख के कारण मृत्यु और आत्महत्या की दशा में खड़ा है, उसको यह प्राथमिक उपचार पेटी क्या सहायता दे पायेगी?
बसों के कागजों के सत्यापन के बाद 879 बसों के कागज ही सही पाए गए। यद्यपि अभी उपमुख्यमन्त्री दिनेश शर्मा ने (79़140़78) 297 कबाड़ी बसों, ड्राइवरांे के खानंे का कोई प्रबन्ध न होना आदि कर्मियों .का उल्लेख कर रहे है। लेकिन शेष रही बसों के लिये वे अभी भी कुछ भी नही कह रहे हैं। अब सरकारी वाहनों (राजस्थान सरकार) व निजी वाहनों का मुददा उठाया जा रहा है। ध्यान कीजीये! मन्दिर में दान का शुद्विकरण (फिल्टर) दान पेटी में नहीं होता है। समस्त प्रकार के स्त्रोत से उपार्जित धन में आता है। टैक्स चुकाया हुआ या कर चोरी का, लूट का, आंतकवाद के पैसे का दान। तब उत्तर प्रदेश की सरकार के जो मिला, जैसा मिला को स्वीकार करते हुये उसका उपयोग श्रमिको के हित में कर शेष समस्त कमियों को जनता के बीच उजागर कर दें। समस्या कहाँ है? लेकिन है। कुप्रबंध व अधूरे कागजातों के चलते मजदूरों की सुरक्षा का प्रश्न उठाते समय माल वाहन में जा रहे श्रमिकों व पैदल भूखे व बिना हयूमेन डिस्टेटिंग के चल रहे श्रमिक पर ध्यान उन प्रश्न कत्ताओं का नहीं गया? तब दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध एक भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई। 
लेकिन बात जब राजनीति के ‘‘क्रिकेट’’ की हो तो,उसका मजा चौके छक्के के बिना नहीं आता है। योगी जी नहीं चाहते हैं कि वे इक्के दुक्के द्वारा रन बटोरें। वे चौका छक्का ही मारना चाहते हैं, इसलिए 879 या लगभग पांच सौ सही बसो का आंकड़ा, 1000 का जब हो जाएगा, तभी बस चलवा कर छक्का मारेंगें। यह ‘‘राजनीति’’ नहीं है महोदय। यह तो (राजनीतिक) खेल है। आज की राजनीति में तो मात्र दुश्मनी ही होती है। ’खेल’ कहां होता है। खेल तो खिलाड़ी से लेकर दशकों तक को आनंद ही आनंद देता है। लेकिन हां! कभी-कभार खेल-खेल में भी राजनीति हो जाती है। ‘‘खेल’’ में ‘‘राजनीति’’ का उदाहरण हमारे सामने भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट खेल का है। तो क्या उसका एक छोटा सा प्रतिबिंब उत्तर प्रदेश की बस तमाशा बिन ‘बस’ राजनीति भर नहीं है?मैं नहीं जानता। वर्त्तमान राजनीति की असीमित सीमा की एक बानगी और देखिये! प्रथम सूचनापत्र दर्ज करने में भी राजनीति प्रियंका वाड्रा के विरूद्ध एफ.आई.आर. न कर उनके निज सचिव के विरूद्ध की गई। क्या उत्तर प्रदेश सरकार निज सचिव को रिसपांड कर रही थी, या प्रियंका वाड्रा को जिम्मेदार मान रही ? 
अंत में एक बात और। अभी-अभी कांग्रेस के बस के वापस जाने के निर्देश के बाद अभी स्थगित हुये खेल में प्रियंका राजनीति करते हुए जनसेवा करने का आभास (वास्तविकता कितनी?) दिला रही है। जबकि योगी जी राजनीति करते हुए नकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। कायदे से आपको सिर्फ ‘‘आम खाने से मतलब होना चाहिए था, गुठली गिनने से नहीं।’’ वैसे भी आप किसी व्यक्ति की आस्था को ‘‘वैष्णों देवी’’ से बदल कर ‘‘तिरूपति बालाजी’’ में करने के लिये विवष नहीं कर सकते हैं। उसी सिद्धांत के द्वारा इन बसों को उत्तर प्रदेश या अन्य कांग्रेसी शासित प्रदेशों में भेजने का कथन किया गया हैं वैसे यह देखने की बात होगी कि प्रियंका वाड्रा की ये वापिस जाती बसे रास्ते में मिलने वाले मजदूरों को बैठायेगी अथवा नहीं। ‘‘खेल’’ तो अभी सिर्फ स्थगित हुआ है, राजनीति इस खेल को समाप्त नहीं होने देगी।

मंगलवार, 12 मई 2020

कोई तो मुझे बताएं ‘‘अक्ल का चूरण’’ कहां मिलेगा।


रेल्वे ट्रैक पर हुये ‘‘शहीद’’ पन्द्रह मजदूरों को अनुग्रह क्षतिपूर्ति की राशि एक करोड़ क्यों नहीं?

राष्ट्रीय लॉक डाउन के चलते उत्पन्न निशब्दता को शुक्रवार अल सुबह (भोर) जालना औरंगाबाद (महाराष्ट्र) रेलवे ट्रैक पर थक हार कर सो (गहन निद्रामग्न) रहे 16 में से 15 प्रवासी मजदूरों की मालगाड़ी के उनके ऊपर से निकल जाने से वीभत्स दर्दनाक मौत हो गई। उक्त मौत ने छाई निस्तब्छता को ऊगते सूरज के पूर्व के अंधेरे में जिस प्रकार चित्कारतीमानवीय चीखों ने कैमरों को सबूत दिए बिनाभंग किया उसे शब्दोंभावों और दृश्यों में व्यक्त करना एक मानव के लिए संभव नहीं है। मजदूर की भूख की तड़पनसूर्य देवता के तपस में सहनीय नहीं होती हैलेकिन चन्द्रमा की सुहावनी रात्री के अंधकार में भूखा मजदूर गहरी नींद में सोकर इतना सकून महसूस करता है कि उसके जीवन काल को रौंदता शोर-कोलाहल भी उसके निंद्रा को तोड़ नहीं पाता है और वह मजदूर चिर निंद्रामग्न होकर ईष्वर को प्यारा हो जाता है। नींद का यह सुख एक मजदूर को तो प्राप्त है। लेकिन एक  भर-पेट व्यक्ति के पास शायद नहींक्योंकि वह निंद्रा के आमास में अपने जीवन की व्यवहारिक चिंताओ के बीच घूमता रहता है। 

 उक्त र्दुघटना प्राकृतिक हैमानव निर्मित हैरेलवे की लापरवाही के कारण हुई है या आत्महत्या है अथवा गैर इदातन हत्या हैइन सब मुद्दों की आहुतियाँ तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों के चलते गठित होने वाले आयोग की वेदी पर लग जाएगी। लेकिन इससे हमारे सामने खड़ा हुआ यह विराट प्रश्न समाप्त नहीं हो जायेगा कि आखिर इस देश का गरीब मजदूर कब तक इस तरह की असामयिक मौत को गले लगा कर और जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए अपने एक नागरिक होने के कर्तव्य की मजबूरी समझ कर निभाता रहेगा। आगे क्या यह कर्तव्य बोध (यह स्थिति) की मजबूरी इस देश में सिर्फ गरीब मजदूरों के साथ ही रहेगीयह एक विराट यक्ष प्रश्न है?
आप और हम सब जानते हैं किराष्ट्रीय लॉक डाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के संबंध में नीति बनाने को लेकर केंद्र व राज्य सरकारें हमेशा असमंजस में रही हैं। उनकी अस्पष्ट नीति के चलते इन प्रवासी मजदूरों की समस्याओं का निश्चित सकारात्मक सफलतापूर्वक निदान नहीं हो पाया। इन सबका दुष्परिणाम ही उक्त रेलवे ट्रैक की दुखद घटना हैइसको खुले दिल से स्वीकार कर लेने में कतई कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
प्रवासी मजदूरों के संबंध में समय-समय पर जारी किए गए आदेशों के क्रम व गुणत्ता (मेरिटस) को देखिएस्थिति स्वयमेव इतनी स्पष्ट होगी कि आप स्वयं ही समझ जाएंगे। प्रवासी मजदूरों को प्रांरभ में अपने ही स्थानों में रुकने का आदेश देना। बाद में फिर विदेशों से अपने नागरिकों की स्वदेश वापसी व कोटा से विद्यार्थियों के अपने-अपने प्रदेशों में जाने के लिये कुछ राज्य सरकारों द्वारा घोषित राष्ट्रीय लाक डाउन की नीति के विरूद्ध आवागमन की अनुमति देने के बाद बढ़ते दबाव को देखते हुएप्रवासी मजदूरों को भी अपने-अपने प्रदेशों में लौटने की अनुमति देना। लेकिन कुछ राज्यों द्वारा प्रवासियों को अपने प्रदेश में लाने का विरोध। पहले बस से जाने की गृहमंत्रालय की अव्यवहारिक अनुमति। और फिर 24 घंटे के भीतर ही रेलवे द्वारा श्रमिक ट्रेन चलाने की घोषणा करना। पहले राज्य सरकारों के माध्यम से टिकट देनाफिर टिकट न लेने की घोषणा। पहले निशुल्क यात्रा की स्पष्ट घोषणा नहीं की गई थीजो बाद में की गई)। तदुपरान्त स्पष्टीकरण भाड़ा 85 प्रतिशत रेल्वे द्वारा व पंद्रह प्रतिशत राज्य सरकारों द्वारा वहन किया जायेगा। फिर कुछ राज्य सरकारों द्वारा 15 प्रतिषत भाड़े की राशि को वहन करने में टालमटोल करना मना करना व असमंजस उत्पन्न कर देना। बिहार सरकार द्वारा 14 दिन की कोरोन्टाइन अवधि की समाप्ति के पश्चात ही मजदूर को किराये की वापसी का कथन। कुछ सरकारों द्वारा श्रमिकों से प्रस्थान के पूर्व कोरोना टेस्ट की मांग। इस तरह के तमाम प्रशासनिक आदेश एक दूसरे के पूरक न होकरविरोधाभासी निकलते रहे और ये प्रवासी गरीब मजदूर इन पाटों के बीच पिसते गये।
इन सब परिस्थितियों से उत्पन्न भूखभुखमरीमानसिक तनावअवसाद और परिवारों से मिलने की दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती तड़पन ने उनके मन में निराशा के भाव उत्पन कर दिये। इसके अलावा राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों पर पुलिस बलों द्वारा जहाँं-तहाँं लगाए गए चेकिंग बैरीकेड़ के रहते इन प्रवासी मजदूरों ने रोटी लेकर (अज्ञानता वश) रेलवे ट्रैक पर चलने को अपने जीवन का आधार माना ताकि वे इन रोटी व पटरी के बल पर जीवन की पटरी को भी अपने गृह नगर पहुंचकर कुछ दुरूस्त कर पाये। परन्तु उनको यह वास्तविक ज्ञान नहीं था कि रेलवे ट्रैक पर मालगाडियाँ भी चल रही हैं। शायद यात्री गाड़ी व मालगाड़ी में विभेद न कर पाने की परिस्थितिजन उत्पन्न बुद्धि शून्य व अविवेक ने उन्हें रेलवे ट्रैक पर चलने के लिए मजबूर कर दिया। जिसकी कुछ व्यक्तियों क्षेत्रों द्वारा आलोचना करनाश्रमिकों की परिस्थिति जन उत्पन्न अनभिज्ञता का मजाक उड़ाना हैजो वास्तव में निंदनीय है।
प्रश्न अब यह उत्पन्न होता है की मध्य प्रदेश के शहडोल व उमरिया जहां के वे मजदूर निवासी हैंकेन्द्र सरकार ने 2 लाख महाराष्ट्र सरकार ने 5 लाख व मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मात्र 5 लाख की अनुग्रह राशि की घोषणा की गई। (शायद सरकार ने इसे एक स्वभाविक दुर्घटना माना हो) क्या यह अल्प राशी उचित हैइसी कोरोना कॉल में देश की विभिन्न सरकारों ने डाक्टरों सहित स्वास्थ्य कर्मियों व पुलिस कर्मचारियों को इस कोरोना बीमारी के संक्रमण को रोकने के कर्तव्य निर्वहन के दौरान उनकी मृत्यु हो कर शहीद हो जाने की स्थिति में 50 लाख से एक करोड़ तक न केवल उन्हें अनुग्रह राशि दिए जाने की घोषणा की गई हैबल्कि अन्य सुविधाओं के साथ उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की भी पेशकश की गई हैं। क्या ये मृत मजदूर कोरोना वीर नहीं हैं यह एक बड़ा ही मार्मिक प्रश्न है। एक बेचारे बेगुनाह (श्रमिक) व्यक्ति का कुव्यवस्थाअव्यवस्था के चलते व्यवस्था (सिस्टम) की बलि चढ़कर मौत के मुंह में समा जाना बलिदान नहीं तो क्या हैंऔर यदि यह बलिदान है तोबलिदान तो वीरो द्वारा ही दिया जाता है। तब ये बलिदानी कोरोना वीर कैसे नहीं हुएशायद इसलिए कि ये स्वयं को वोट बैंक नहीं बना सके या आज के बाजार में इनकी मीडिया के सामने या राजनैतिकसार्वजनिक जीवन में वह ब्रांडिंग नहीं हुई जैसी अन्य कोरोना वीरों की हुई है। (यहां अन्यों के हक पर आपत्ति नहीं की जा रही है।)
एक महत्वपूर्ण बात और! इन मजदूरों के दुर्घटनाग्रस्त होकर उनकी मृत्यु (शहीद) हो जाने से आपराधिक कानून व्यवस्था का प्रष्न भी पैदा होता है। इस घटना के लिए नियुक्त नोड़ल आफिसर जिम्मेदार समस्त प्रशासनिक अधिकारियों (रेल्वे सहित) के खिलाफ धारा 307 का प्रकरण क्यों नहीं दर्ज किया जाना चाहिएआपको याद दिलाना चाहता हूंउत्तराखंड में जब तबलीगी मरकज का मामला तेजी से बढ़ाया और बार-बार अनुरोध करने के बावजूद तबलीकी अपनी जांच कराने के लिए प्रशासन के समक्ष उपस्थित (सरेंडर) नहीं हुए। तब उत्तराखंड प्रदेश के डीजीपी अतुल कुमार रजूड़ी ने कहा कि यदि ऐसे तबलीगी जो कोरोना टेस्टिंग के लिए स्वयं को उपलब्ध नहीं करा रहे हैंयदि पुलिस प्रशासन उनको पकड़ कर लाता हैऔर यदि वे संक्रमित पाए जाते है व उनके संपर्क से दूसरा कोई व्यक्ति संक्रमित होता है। तब उनके खिलाफ आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 सहित भारतीय दण्ड सहिंता के अतंर्गत धारा 307 का अपराध दर्ज किया जाएगा। डीजीपी वहीं नहीं रुकेबल्कि एक कदम और आगे जाकर उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसे किसी संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तब अपराध की धारा 307 धारा 302 में परिवर्तित हो जाएगी।
इस बात में शायद कोई शक होगा कि उक्त हादसा से सम्पूर्ण तंत्रों की असफलता का दुष्परिणाम हैइसलिए इस घटना से संबंधित व्यवस्था (सिस्टम) में लगे सभी अधिकारियों की जांच कर दोषी अधिकारियों को चिन्हित किया जाकर कार्रवाई की जावेंताकि भविष्य में इस तरह की गलतियों की पुर्नवृत्ति न हो सकें।
आप और हम सब जानते हैं किराष्ट्रीय लॉक डाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के संबंध में नीति बनाने को लेकर केंद्र व राज्य सरकारें हमेशा असमंजस में रही हैं। उनकी अस्पष्ट नीति के चलते इन प्रवासी मजदूरों की समस्याओं का निश्चित सकारात्मक सफलतापूर्वक निदान नहीं हो पाया। इन सबका दुष्परिणाम ही उक्त रेलवे ट्रैक की दुखद घटना हैइसको खुले दिल से स्वीकार कर लेने में कतई कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
प्रवासी मजदूरों के संबंध में समय-समय पर जारी किए गए आदेशों के क्रम व गुणत्ता (मेरिटस) को देखिएस्थिति स्वयमेव इतनी स्पष्ट होगी कि आप स्वयं ही समझ जाएंगे। प्रवासी मजदूरों को प्रांरभ में अपने ही स्थानों में रुकने का आदेश देना। बाद में फिर विदेशों से अपने नागरिकों की स्वदेश वापसी व कोटा से विद्यार्थियों के अपने-अपने प्रदेशों में जाने के लिये कुछ राज्य सरकारों द्वारा घोषित राष्ट्रीय लाक डाउन की नीति के विरूद्ध आवागमन की अनुमति देने के बाद बढ़ते दबाव को देखते हुएप्रवासी मजदूरों को भी अपने-अपने प्रदेशों में लौटने की अनुमति देना। लेकिन कुछ राज्यों द्वारा प्रवासियों को अपने प्रदेश में लाने का विरोध। पहले बस से जाने की गृहमंत्रालय की अव्यवहारिक अनुमति। और फिर 24 घंटे के भीतर ही रेलवे द्वारा श्रमिक ट्रेन चलाने की घोषणा करना। पहले राज्य सरकारों के माध्यम से टिकट देनाफिर टिकट न लेने की घोषणा। पहले निशुल्क यात्रा की स्पष्ट घोषणा नहीं की गई थीजो बाद में की गई)। तदुपरान्त स्पष्टीकरण भाड़ा 85 प्रतिशत रेल्वे द्वारा व पंद्रह प्रतिशत राज्य सरकारों द्वारा वहन किया जायेगा। फिर कुछ राज्य सरकारों द्वारा 15 प्रतिषत भाड़े की राशि को वहन करने में टालमटोल करना मना करना व असमंजस उत्पन्न कर देना। बिहार सरकार द्वारा 14 दिन की कोरोन्टाइन अवधि की समाप्ति के पश्चात ही मजदूर को किराये की वापसी का कथन। कुछ सरकारों द्वारा श्रमिकों से प्रस्थान के पूर्व कोरोना टेस्ट की मांग। इस तरह के तमाम प्रशासनिक आदेश एक दूसरे के पूरक न होकरविरोधाभासी निकलते रहे और ये प्रवासी गरीब मजदूर इन पाटों के बीच पिसते गये।

शुक्रवार, 8 मई 2020

कर्नाटक सरकार का कदम ‘‘साहसिक’’! लेकिन ‘‘सामयिक’’ नहीं।


कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा ने कल कर्नाटक प्रदेश से विभिन्न प्रदेशों को जाने वाली दस श्रमिक ट्रेनों के आरक्षण को निरस्त करने का अनुरोध रेल मंत्रालय से किया है। यह कहा गया कि प्रदेश में शीघ्र ही औद्योगिक क्रियाएं व उत्पादन प्रारंभ होने जा रही हैं, जिसके लिए इन श्रमिकों की आवश्यकता है। यह बिल्कुल सही भी है। यद्यपि कुछ क्षेत्रों में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि, कर्नाटक के उद्योगपतियों व बड़े बिल्ड़र्स के दबाव में सरकार ने यह निर्णय लिया। तथापि मुख्यमंत्री का उक्त निर्णय प्रवासी मजूदरों के अपने गृह निवास जाने के लिये उनके स्वयं के द्वारा अनुमति देने के बाद मई दिवस पर प्रदेश की आर्थिक गतिविधयां को बहाल करने के लिये मजदूरांे से राज्य में रहने की अपील के बाद आया है।
सरकार का निर्णय यद्यपि सही और वैसा ही साहसिक है, जैसा की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्वप्रथम लॉक डाउन की घोषित राष्ट्रीय नीति के विरुद्ध, विभिन्न प्रदेशों में कार्य वाले प्रदेश के प्रवासी मजदूरों श्रमिकों को प्रदेश (गृह नगर) वापस बुलाने का निर्णय लिया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री का यह निर्णय भी न केवल लॉक डाउन की संशोधित वर्तमान नीति के विरुद्ध है, बल्कि  प्रवासी मजदूर के अपने गृह प्रदेश जाने के लिये अनुमति देने के 30 मई के उनके स्वयं के निर्णय के भी विरूद्ध है।
आज ही केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रारंभ की जा रही ऑपरेशन वंदे भारत जिसके द्वारा सरकार विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों को भारत देश में स्थित रिश्तेदारों के पास पहुंचने के लिए हवाई व जल मार्ग से रास्ता उपलब्ध करा रही है। मतलब साफ है। एक तरफ भारत सरकार विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की ‘‘स्वदेश-वियोग’’ (होम सिकनेस) की भावनाओं को मद्देनजर रखते हुये करते हुए उन्हे स्वदेश आने की सुविधा उपलब्ध करा रही है। वहीं दूसरी ओर कर्नाटक सरकार इस भावना के विपरीत कार्य कर रही है। वैसे उनका यह कदम राज्य व वहां कार्यरत श्रमिकों के आर्थिक हितो को ध्यान में रखकर ही उठाया है। लेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान में आज जो स्थिति निर्मित हुई हैं, उस कारण से उक्त कदम आज सामयिक न होने के कारण श्रमिक गण इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
पूरे देश में श्रमिकों को अपने-अपने प्रदेशों में जाने की सुविधा केंद्रीय सरकार ने कर्नाटक सहित समस्त राज्य सरकारों की से चर्चा कर सहमति लेने के बाद ही थी, व शेष सरकारे उसे कार्य रूप में परिणित भी करने लगी। तब निश्चित रूप से कर्नाटक के श्रमिकों के मन में अपने परिवार के लोगों से मिलने के भाव (घर वियोग की भावना) में और ज्यादा वृद्धि होगी ही। पिछले डेढ़ महीनों से कोई कार्य न होने के कारण उत्पन्न कार्य अवसाद और उनके ठहरने व खाने की ठीक व्यवस्था न होने के कारण व उक्त व्यवस्था के चरमराती हो जाने के कारण, इन श्रमिकों के मन में घर जाने की भावना तेजी से फैली है। सरकार को श्रमिकों के आर्थिक हित में उक्त संवेदनापूर्ण निर्णय लेने के पूर्व पहले यह व्यवस्था करनी अत्यावश्यक थी कि, उनके मन में उक्त भावनाओं को शांत करने के लिए कुछ आवश्यक त्वरित कदम उठाएं जाते। तुरंत औद्योगिक गतिविधियां प्रारंभ कर श्रमिकों को काम में जाने का विकल्प देना चाहिए था, जोर जबदस्ती नहीं।  हम भारतीयों के बचपन की यह आदत रही है कि बच्चों को किसी कार्य को मना करने पर वह उसे और ज्यादा करने की जिद करता है। साथ ही उन्हें यह विश्वास भी दिलाया जाना चाहिए था कि, नियोक्ता लोगों द्वारा आपको चरणबद्ध रूप से (एक साथ नहीं) बल्कि अलग-अलग ग्रुपों में एक हफ्ते की (वेतन सहित) छुट्टी देकर आपको अपने-अपने घर में जाने की अनुमति दी जाएगी। इससे उत्पादन कार्य भी चालू हो जाए और श्रमिक गण धीरे धीरे क्रमशः अपने घर जाकर परिवारजनों से मिलकर वापस काम में आ सकेंगंे। इस तरह से समस्त उत्पादकों और श्रमिकों के उद्देश्यों की परस्पर पूर्ति कुछ हद तक अवश्य हो जाती। साथ ही साथ सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिये था कि नियोक्ता ने इन श्रमिकों को इस लॉक डाउन की अवधि का वेतन का भी भुगतान किया है।
एक अच्छा निर्णय, यदि सामयिक न हो, वह कैसे आलोचना का शिकार हो सकता है, कर्नाटक के मुख्यमंत्री का उक्त आदेश इसका सटीक उदाहरण है। देश में किसी भी स्थान में (प्रतिबंधित क्षेत्रों को छोड़कर) श्रमिकों के आने जाने के संवैधानिक अधिकार का यह उल्लंघन तो नहीं है ऐसा कुछ आलोचक गण कह भी सकते हैं। बल्कि वे इसकी तुलना 1975 में आपातकाल के दौरान विचारों की अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार पर लगे प्रतिबंध से भी कर सकते हैं। वह आपातकाल का संकट काल था तो यह कोरोना का संकट काल है। किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध न तो उसे किसी औद्योगिक संस्थान में कार्य करने के लिए मजबूर किया जा सकता है और न ही उसे जबरदस्ती उस जगह रोका जा सकता है।
अंत में एक बात और, यदि केंद्रीय सरकार आर्थिक स्थिति को बदहाली से बचाने के लिये औद्योगिक इकाईयों उत्पादन प्रारंभ करने के लिए मजदूरों की आवश्यकता उपलब्धता की को जरूरी मानती है तो, फिर पूरे देश में ही जरूरत की इस ‘‘भावना’’ को लेकर ऐसी नीति क्यों नहीं बनाई? जो एक भूल है। सरकार के पास इस समय एक ऐसा अवसर आया है, जहां वह पूरे देश में प्रवासी मजदूरों का मूल निवास, गृहनगर, जिला व प्रदेश सहित सूचीबद्ध कर ले साथ ही इन श्रमिकों की कार्य निपुणता की प्रकृति को भी नोट करे, ताकि भविष्य में शांति काल में सरकार एक ऐसी कार्ययोजना बना सकें जिसमें जिस प्रदेश का श्रमिक है, उसे उसी प्रदेश में यथा संभव उसके मूल निवास स्थान पर या पास के जिलों में उसकी कार्य की प्रकृति के अनुरूप औद्योगिक इकाईयों में रोजगार दिला सके। प्रवासी मजदूरों के भागम-भाग के इस दौर में बहुत से एक समान कार्य प्रकृति वाले मजदूर ऐसे अवश्य होंगंे जो परस्पर एक दूसरे प्रदेशों में रोजगार करने जाते होगें। इस प्रकार धीरे-धीरे प्रवासी मजदूरों की संख्या बिना रोजगार घटे प्रवासी के रूप में कम हो सकेगी। कोरोला कॉल की यह भी एक और गुणात्मक उपलब्धि होगी।

गुरुवार, 7 मई 2020

कोरोना वीरों का सेना द्वारा सम्मान ‘‘सही’’। लेकिन ‘‘समय’’ ‘‘तरीका’’ व ‘‘औचित्य’’ कितना सही?

दो दिन पूर्व देश की सेना के तीनों अंगों के प्रमुख सहित चीफ आफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने एक संयुक्त पत्रकार वार्त्ता की। इसमें तीन मई को पूरे देश में सेना के तीनो अंगो के द्वारा कोरोना वीरों योद्धाओं के सम्मान किये जाने की घोषणा की गई। तदानुसार तीन मई को वायु और नौसेना की एयरक्राफ्ट द्वारा डिब्रुगढ़ से कच्छ व श्रीनगर (कश्मीर) से त्रिवेन्दम (केरल) तक, विमानांे की फ्लाई पास्ट कर, फूल बरसा कर, रोशनी कर, बैंड बजाकर उन्हें प्रणाम कर, शुक्रिया अदा कर, उनकी हौसलाजाही की। इस प्रकार इन कोरोना वीरों के इन विपरीत परिस्थितियों में दिये गये अभूतपूर्व योगदान को याद किया गया। ये कोरोना वीर स्वास्थ्य कर्मी, पुलिसकर्मी, मीडिया के लोग व डिलेवरी बाय है। ये लोग पूरे देश में अपनी जान की परवाह किये बिना हम नागरिकों को लगातार सुरक्षित रख कर जीवन प्रदान कर रहे हैं। उनका यह कृत्य व सर्मपण किसी भी रूप में कम नहीं हैं, खासकर, तुलनात्मक रूप से, उन युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों या सीमा के सीमा प्रहरियों से, जो दुश्मन देश द्वारा आक्रमण या सीमा का उल्लंघन किए जाने पर सीमा की रक्षा करते-करते, हसतें-हसतें अपनी जान दे देते हैं। 
कुछ अर्थों में तो इन कोरोना वीरों का कार्य इन सैनिकों से भी ज्यादा है। वह इस अर्थ में, जहॉं सैनिक व सीमा प्रहरी, शत्रु सैनिकों का जीवन समाप्त करने के उद्देश्य से इस मानसिकता के साथ अपना फर्ज व दायित्व निभाते हैं कि, उनकी मृत्यु तो कभी भी संभव है। परिवार का प्रत्येक सदस्य भी इस मानसिकता के साथ घर के अपने उस सदस्य को उक्त ड्यूटी पर भेजता है, जाने देता है। जबकि ये कोरोना वीर, योद्धा खासकर स्वास्थ्यकर्मी गण तो कोरोना वायरस के आने के पूर्व तक सामान्यतया मानसिक तनाव के बिना दूसरों का जीवन बचाते हुए कार्य करते रहें, इसलिए उन्हें भगवान का रूप भी कहा जाता रहा है। लेकिन संक्रमित कोरोना के आने के बाद स्वास्थ कर्मियों के मन में प्रत्येक क्षण मृत्यु के भय के मानसिक तनाव के साथ जो जान की बाजी लगाकर भी अपना दायित्व निभा रहे हैं, वह निश्चित रूप से वंदनीय है, और इसके लिए उन्हें सैल्यूट किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से ऐसे योद्धाओं को सम्मान व नमन कर उनका उत्साहवर्धन किए जाने पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है। लेकिन एक प्रश्न अवश्य यह उत्पन्न होता है कि, क्या सेना के लिये, यही एक तरीका था, उनके सम्मान का?
सेना द्वारा जो आज प्रतीकात्मक सम्मान किया गया, उसका वह रूप सही है? बिना भावना में बहे उस पर विचार करने की आवश्यकता है। सम्मान का एक प्रतीकात्मक लेकिन दृढ़ भावना लिये हुये तरीका सेना के लोग पूरे देश में एक निश्चित समय निश्चित कर इन वीरों के सम्मान में जो जहाँ भी है, वहीं दो मिनिट खड़़े रहकर भी सम्मान व्यक्त कर सकते थे। एक तरीका प्रत्येक जिलो में कोतवाली व अस्पतालों में सैनिक जाकर राष्ट्रगान गाकर भी सम्मान व्यक्त कर सकते थे। अन्य और प्रतीकात्मक सकारात्मक तरीके पर भी विचार किया जा सकता था। इस प्रकार एक बड़े खर्चे से भी बचा जा सकता था और सम्मान भी हो जाता। आखिर सम्मान प्रतीकात्मक रूप से ही तो किया जाता है। 
प्रधानमंत्री की अपील पर देश के नागरिकों ने पूर्व में भी दो दो बार इन वीर योद्धाओं के हौसलाजाई के लिये उनके सम्मान के समर्थन में तालियां, थालियां बजाई व दिएँ जलाये। प्राथमिक रूप से देष की आंतरिक व्यवस्था में सेना द्वारा इस तरह के सम्मान किये जाने की आवष्यकता क्या है? इस पर पृथक से बहस हो सकती है। विशेषकर इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए जब उसी दिन ही जम्मू-कष्मीर के हंदवाडा में आंतकवादियों के साथ में हुई मुठभेड़ में हमारी सेना के एक मेजर एक कर्नल एक लांस नायक व एक नायक सहित एक पुलिस सब इंस्पेक्टर शहीद हो गए। सेना द्वारा जो फूल बरसाए जा रहे थे वे न केवल कोरोना शहीद वीरों के के प्रति श्रद्धांजलि है, बल्कि वह पुष्पवर्षा उन कोरोना योद्धा की हौसलाजाही के लिए भी बरसाए जा गयेे हैं। यह पुष्पवर्षा हौसलाजाही के कारण सुख की भी प्रतीक है, तो इस कोरोना संक्रमण काल में कर्त्तव्य निभाते हुये शहीदों के प्रति श्रद्धांजली भी मानक है। इसलिये उसी दिन सुबह ही जब सेना व पुलिस के पांच अफसर और जवान शहीद हो गए थेे तो सेना द्वारा ही दूसरी जगह पुष्प वर्षा कर सुख व हर्ष व्यक्त करना कहां तक उचित होगा, प्रश्न यह है? इसीलिए यदि इस कार्यक्रम को निरस्त नहीं भी किया जाता तो कम से कम  स्थगित तो अवश्य किया जाना चाहिए था।
संयुक्त रूप से सेना के सीडीएस प्रमुख द्वारा पत्रकार परिषद बुलाकर उक्त निर्णय की जानकारी देश की जनता को सीधे देना क्या उचित है? वैसे इसके पूर्व पत्रकार वार्ता सायं 6 बजे किये जाने की पूर्व घोषणा के तरीके व औचित्य पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि उक्त सायं 6 बजे होने वाले पत्रकार वार्ता की घोषणा से पूरे देश में सन्नाटा आंशका व भययुक्त कोतुहल श्रोताओं नागरिकों के मन में संचारित हुई। आखिर सेना प्रमुख को आज आंतरिक या बाह्नय सुरक्षा को गंभीर आंशका के न रहते हुये लगभग शांति की स्थिति में पत्रकार वार्ता बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ गई। यह भी एक अलग बहस का विषय हो सकता है। यह कार्य तो देश के रक्षा मंत्री या प्रधानमंत्री भी कर सकते थे और शायद उन्हें ही करना चाहिए था। देश की सेना को मीडिया के माध्यम से जनता से सीधे, कम से कम बात (युद्ध के संकटकाल को ही छोड़कर) शांतिकाल में ही करना चाहिए। प्रजातंत्र में चुनी हुई सरकार को ही देष की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा मामलों सहित समस्त मामलों में जनता से सीधे बात करना चाहिए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके। अन्यथा यह एक प्रकार से सेना की देश के उन आंतरिक कार्यों में सीधे (क्षेत्राधिकार के बाहर) भागीदारी होगी। इसका निर्णय तो वास्तव में सरकार को लेना चाहिए। सेना को देश की सीमा की रक्षा व विदेशी आक्रमणकारी आक्रांतो के आक्रमण से देश की रक्षा करना तथा आंतरिक सुरक्षा में सरकार द्वारा बुलाए जाने पर उस स्थिति से निपटना के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं के समय अपना सहयोग देने तक ही सेना को सीमित रखना चाहिए।
सेना कोरोना वीरों के सम्मान में की गई कार्यवाही देश के कुछ भागों से आई आलोचना पर जनरल बिपिन रावत की आई प्रतिक्रिया तो और भी दुर्भाग्य पूर्ण है व शालिनतापूर्ण नहीं है। उनका यह कथन था कि उत्साहवर्धन किया जाना आवश्यक था और कुछ पढे़ लिखे व्यक्तियों अनपढ़ होते है, और कुछ अनपढ़ पढे़ लिखे होते है। जनरल रावत आलोचना करते समय शायद यह भूल गये कि हौसला अफजाई की सबसे बड़ी आवश्यकता उसी दिन शहीद हुये कर्नल की वीरागना शेरनी पत्नी की भी जानी थी। वह साहसी विधवा ने आासुओं की एक बूंद गिराये बिना अपने निवास को ही कर्म भूमि और युद्ध भूमि मानकर अपने भावों व कृत्य से वीरागना होने का परिचय दिया। जनरल रावत ने एक टेलीफोन उक्त वीरागना को कर उनको दो शब्द सांत्वना के उन्हे नहीं कहें। यदि वे उनके दुख में व्यक्तिगत रूप से शामिल होते तो उनका यह कदम तत्समय ज्यादा उचित व सामयिक होता। 
अंत में एक बात और। वास्तव में आज यदि देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों की चिंता किए बिना नागरिक कर्तव्यों को पूर्ण रूप से निभा दे तो, इस देश का प्रत्येक ऐसा नागरिक वीर योद्धा ही है, और तब शायद ऐसे सम्मानों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। क्योंकि तब समस्त नागरिक एक ही श्रेणी में में हो जाएंगे और परस्पर एक दूसरों की ओर नजर कर परस्पर सम्मानित हो लेगंे। 

मंगलवार, 5 मई 2020

काश! मैं भी एक ‘‘शराबी’’ होता?

लाकडाउन द्वितीय के समाप्त होते ही लाकडाउन तृतीय के प्रारंभ में आज शराब की बिक्री की छूट मिलने पर देश के विभिन्न अंचलों में एक डेढ़ किलोमीटर लंबी लाइने लग रही है। कुछ जगह तो लाठी चार्ज के भी समाचार आये हैं। इससे तो यही लगता है कि कोविड़-19 से उत्पन्न आर्थिक मंदी के बदहासी के इस दौर में भी नागरिकों के पास अपनी दैनिक जीवन चर्या की पूर्ति के अतिरिक्त शराब खरीदने के लिए पर्याप्त पैसा है। इस स्थिति का फायदा उठाकर सरकार को इन शराब क्रेताओ की सूची बनवा कर प्रत्येक से उनकी आय का एक घोषणा पत्र भरवाया जावंे, ताकि सरकार के पास एक डाटा तैयार हो जाए कि किन-किन आय वर्ग के लोग, शराब क्रय करने के लिए पैसा खर्च कर रहे हैं। ताकि जब सरकार विभिन्न आय वर्गों के लिए कोई योजना छूट या रियायत देने की नीति बनाती है, तब वह इन आंकड़ों के आधार पर सही हितग्राहियांे को ही छूट प्रदान कर सकेगी।
वैसे सरकार ने शराब बेचने के लिए मानव दूरी बनाए रखने के लिए खड़े होने के लिये लाइन व गोलाई का चिंह्यकन सुनिश्चित की है तथा पुलिस तैनात की है। इससे तो यही लगता है कि इस कोरोना काल में इस संक्रमित बीमारी के बचाव में आम नागरिकों की बढ़ाने के लिए समस्त वैज्ञानिक खोज व आविष्कारों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची है, कि शराब के उपभोग से? न केवल कोरोना पर काबू पाया जा सकता है, बल्कि इससे सरकार का खाली खजाना भी भरेगा। किताबे जिन्हे पढ़कर छात्र अपनेे बौद्धिक स्तर को उंचा उठते है, लेकिन इससे सरकार को बहुत कम टैक्स (जीएसटी अधिकतम करमुक्त होने) मिलने के कारण ही शायद सरकार ने किताबों को लाकडाउन के दौरान छूट देने की तुलना में शराब को तरहीज दी है। सरकार की नजर में शायद आम नागरिक शराबी बन कर कोरोना के गम को भूल जाएगा। तब शायद इन कोरोना वीरों के सम्मान के लिए भी सरकार के निर्देश पर सेना पुष्प वर्षा करेगी? ऐसा तो नहीं कि पूर्व में जहरीली शराब की खपत के कारण होने वाली अनेक दुघटनाओं के वर्तमान में न होने से मीडिया के छपास विहीन हो जाने से उनके दबाव के चलते सरकार ने दबाव में तो यह निर्णय नहीं लिया? आखिर सरकार के इस कदम से यह स्पष्ट हो गया कि संकट काल में वेश्यावृत्ति की आय व शराब की आय में कोई अंतर नहीं रह गया है।    
  वैसे सामाजिक सुधारों को उठाने का कदम भरने वाली समस्त राजनीतिक पार्टियां के हजारों कार्यकर्ता गण तथा आध्यात्मिक पुट देते हुए नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले धर्मगुरु गण के शिष्य गण इन लंबी कतारों के बीच आकर अपना क्या दायित्व और कर्तव्य नहीं निभाएंगे? शायद इसीलिये कि ये कतारें न तो मतदान के दिन की कतारें हैं और न ही गुरूओं के दर्शन के लिए लालायित श्रद्धालुओं की लंबी कतारें हैं। वैसे भी राजनैतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व इन कतारों में लगे हुए अपने कार्यकर्ताओं की पहचान करवा कर पार्टी की सदस्यता से इनको निलंबित भी नहीं करेंगे। शायद इसीलिये एक तो किसी भी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता के लिए शराब पीना कोई अयोग्यता नहीं है। दूसरे आज की राजनीति में नेतागणों के बीच दारु नहीं, तो शराब का प्रचलन तो एक सामान्य शिष्टाचार की बात हो गई है।
मीडिया से लेकर सरकार चाहे वह केंद्रीय हो या राज्य की, समस्त सरकार विरोधी राजनैतिक पार्टियां अपने-अपने प्रदेशों में सरकार की शराबबंदी खोलने के निर्णय की आलोचना करना तो अपना धर्म समझेगी। लेकिन उनके मुंह से एक भी शब्द इन नागरिकों के लिए समझाइश के रूप में ही सही शायद नहीं निकलेगा, इनकी आलोचना तो दूर की बात है। इसीलिए हमारा देश अनेकता में एकता लिए हुए विचित्र किंतु सत्य देश है। प्रणाम।

"कोटा के छात्रों को अपने-अपने प्रदेशों में लाने का निर्णय क्या आत्मघाती तो सिद्ध नहीं हो रहा हैं?"


लगभग पूरा विश्व कोविड-19 कोरोना से पीडित होकर प्रताड़ित हैं। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिये केन्द्रीय सरकार से लेकर राज्य सरकारें दिन प्रतिदिन बदलती परिस्थितियों को देखते हुए न केवल आवश्यक कदम उठा रही हैं, बल्कि  समय-समय पर जारी आदेशों में आवश्यक संशोधन भी कर रही हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या जो शायद प्रांरभ से ही महसूस की जा रही है, वह यह है,कि सरकार या प्रशासन के स्तर पर जो भी आदेश निर्देश जारी किए जा रहें हैं, वे सिर्फं सामने दिख रही सिर्फ समस्यों को ध्यान में रखकर ही समाधान हेतू जारी किए जा रहे हैं,। लेकिन उन आदेशों से उत्पन्न हो सकने वाले प्रभाव,दुष्प्रभाव (साइड इफेक्टस) तथा बाय प्रोडक्टस पर विचार नहीं किया जा रहा है जिस कारण से पूर्ण समाधान कारक न होकर न केवल उन उद्श्यों की पूर्ण प्राप्ति नही हो पा रही है, बल्कि नई नई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। यही स्थिति छात्रों के वापसी के मुद्दे को लेकर हुई हैं।

लाक डाउन के पूर्व, भारत सरकार ने विदेशों में रह रहे बहुत से भारतीयों को विशिष्ट हवाई उड़ानों के द्वारा अपने देश में वापस लाया था। इस कारण कुछ समय पश्चात मजदूरों के हितो के लिए भी ऐसे ही कार्यवाही किये जाने के लिए एक दबी सी आवाज  उठी थी। लेकिन तब वह आवाज ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई थी। जब कोटा के विद्यार्थियों को सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री घोषित राष्ट्रीय लाक डाउन की नीति के विरूद्व बस भेजकर अपने प्रदेश में वापस लाऐ और तत्पश्चात मध्य प्रदेश की सरकार ने भी ऐस ही किया। तब प्रवासी मजदूरों की ओर से देश के अधिकांश भागों में यह मांग तेजी से उठने लगी कि उन्हें भी कोटा के छात्रों के समान अपने-अपने प्रदेशों में भेजे जाने की अनुमति दी जाकर व्यवस्था की जावे। इस मांग को इस कारण से भी और बल मिला कि उनके रूकने, खाने पीने की व्यवस्था ठीक से नहीं हो पाई व समय व्यतीत होते होते चरमरासी गई। इसके अतिरिक्त वर्तमान स्थितियों के कारण उत्पन्न आशंकाओं के बादल के चलते घर के बाहर लंबे समय से रहने के कारण मानसिक दबाव व मानसिक तनाव से उत्पन्न हतोउत्साह के कारण प्रवासी मजदूरों की वापसी की मांग पिछले 3दिनों में इतनी तेजी से उभरी कि सरकार को उनकी मांग मान कर कुछ सावधानियों व शर्तो के साथ लाक डाउन में ढील देनी पड़ी। यहाॅं पर उक्त समस्या सुलझी अथवा नहीं यह तो अगले कुछ दिन में पता लगेगा। लेकिन इसने एक नई समस्या को अवष्य जन्म दे दिया, जिस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता हैं।
एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 9 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जिनमें से  कुछ लागोें को छोड़ भी दिया जाए तो भी, करोड़ों की संख्या में इन प्रवासी मजदूरों का विस्थापन किया जाना है। यह वास्तविकता के धरातल पर उतर पाएगा, ऐसा संभव लगता नहीं हैं। एक तो सरकार ने सिर्फ बसो के माध्यम से उन्हें ले जाने की शर्त जो लगाई, यदि उसकी अक्षरतः पालन भी किया जाता तो महीनों इस व्यवस्था पालर्नाथ लग जाते। लेकिन सरकार को शीघ्र ही सुध आगई व दुसरे ही दिन लेख लिखते लिखते सरकार ने अपने उक्त आदेश में संशोंधन कर श्रमिक रेल प्रारंभ कर दी, जिसके लिए उन्हें धन्यवाद। लेकिन सरकार के इस संशोधित आदेश के बावजूद यह मतलब कदापि नहीं निकलेगा की सरकार औद्योगिक गतिविधियों को सामान्य लाने में फिलहाल व निकट भविष्य में इच्छुक नहीं है, इसके विपरीत भी यदि सरकार की औद्योगिक क्रिया कलाप प्रारंभ करने की की इच्छा भी हो, तब भी इन प्रवासी मजदूरों के वापस अपने अपने गांव में प्रदेशों में जाने से औद्योगिक क्रियाएं, उत्पादन प्रक्रिया कैसे प्रारंभ हो पाईगी, यह एक बहुत ही बड़ा प्रश्न है। इस पर शायद सरकार ने गंभीरता से विचार नहीं किया है। इसलिए सरकार को प्रवासी मजदूरों के आवागमन में ढील देने के बावजूद उनको रोकने के लिए निम्न आवश्यक कदम उठाया चाहिए।
प्रथम उनके खाने-पीने व रहने की व्यवस्था में तुरंत सुधार किया जा कर उन्हें उनके कैंपों में इस बात की समझाईश दी जावे कि शीघ्र ही औद्योगिक उत्पादन व निर्माण प्रक्रिया प्रांरभ हो रही हैं, जिस कारण से आपका रोजगार (एंप्लाॅयमेंट) जारी रहेगा ताकि आप अपने घर को भी सहायता भेज पाएगें। इसलिए आप सामुहिक रूप से अपने प्रदेशो में वापिस जाने को टालें।। यह भी बताया जाए कि आपके अपने प्रदेशों में रोजगार न होने के कारण आप दूसरे प्रदेशों में रोजगार के अवसर तलाशते हुए आए थे, आज भी आपके प्रदेश में रोजगार के उतने प्रर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हो पांएगे जिससे आपको रोजगार मिल पाए। इसलिए भी आपका रूकना आप के हित में ही हैं। मजदूरों के मन में उत्तर विश्वास दिलाने के लिए सरकार को तुरंत निर्माण व उत्पादन की गतिविधिया प्रांरभ कर दे देना चाहिए ताकि, उनके डगमगाते विश्वास को विराम लगा कर कुछ हद तक उनका पलायन रोका जा सके। तभी हम देश की आर्थिक स्थिति को गिरने से कुछ संभाल पाएगें अन्यथा जैसा कि मैं बार-बार पूर्व में भी लिखता रहा हॅू व प्रसिद्व आर्थिक विशेषज्ञ नारायण मूर्ति (इन्फोसिस के पूर्व चेयरमेन) ने भी अभी कहा है कि आर्थिक व्यवस्था से उत्पन्न हालात इस रोग की तुलना में ज्यादा मृत्यु के कारक बनेंगे । तब आपके दोनो उद्वेश्य जान व जहान बचाने में असफल हो जावेगें ।

हरियाणा के मंत्री अनिल विज का बयान। राष्ट्रीयता की भावना के प्रतिकूल"

विगत दिवस हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज का यह बयान आया कि, दिल्ली मै नौकरी करने वाले हरियाणा के रहने वाले लोगो की प्रतिदिन दिल्ली हरियाणा में आवाजाही से  कोरोना के मामले हरियाणा में बढ़ रहें हैं। इस पर दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने आरोप को नकारते हुये ज्यादा तूल न देने वाली प्रतिक्रिया आई। यद्यपि अनिल विज के उक्त बयान को मीडिया ने प्रसारित तो किया, लेकिन वह मीडिया की न तो सुर्खी बन पाया और न ही उस पर मीडिया ने कोई सार्थक बहस करवाई। अनिल विज का उक्त बयान एक सामान्य राजनीतिक बयान हो सकता है लेकिन उसमें छिपे हुए निहितार्थ भाव जो बहुत ही खतरनाक है, को समझना अति आवश्यक हैं ।
अनिल विज उक्त बयान के द्वारा आखिर क्या दर्शाना चाहते हैं। हरियाणा के निवासिंयो को दिल्ली सरकार द्वारा नौकरी दिए जाने पर उनको धन्यवाद देने के बजाय मंत्री का यह कहना कि उनकी दिन प्रतिदिन हरियाणा में आने जाने की आवाजाही से कोरोना फैल रहा हैं, न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि पूर्णता अपरिपक्वता लिया हुआ बयान है। साथ ही यह हरियाणा सरकार की कोरोना वायरस को रोकने में हो रही असफलता (यदि कोेई है तो)े पर पर्दा ड़ालने का असफल प्रयास मात्र ही हैं। कोेरोना वायरस का संक्रमण मात्र हरियाणा या दिल्ली की समस्या नहीं हैं, बल्कि पूरे देश की गंभीर समस्या है। माननीय मंत्री हरियाणा के नागरिक नहीं है? बल्कि भारत देश के नागरिक हैं, जिसमें हरियाणा और दिल्ली राज्य शामिल हैं। नागरिकता की दृष्टि से वे अपने जन्म स्थल सहित भारत देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब वे विदेश जाएंगे तब हरियाणा का पासपोर्ट नहीं होगा, भारत देश का अशोक चक्र लिए हुए पासपोर्ट होगा। ऐसी स्थिति में उनका उत्तरदायित्व हरियाणा सरकार के मंत्री होते हुए सिर्फ हरियाणा प्रदेश में ही कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकना ही नहीं हैं, बल्कि एक नागरिक की हैसियत सें उनकी जानकारी में (यदि) दिल्ली में नौकरी करने वाला हरियाणिवी, दिल्ली प्रदेश में कोरोना फैला रहे हैं, तो उसकी जानकारी दिल्ली प्रदेश सरकार को देवे ताकि कोरनटाइन में रखकर उनका इलाज हो सकें। यह दायित्व उनका एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से बनता है। क्या वे इस बात से अनभिज्ञ है कि डुयटी पर जाने वाले व्यक्तियों की थर्मल टेस्टिंग सहित समस्त सावधानियांे को बरतना होता है। ऐसा संक्रमित व्यक्ति यदि हरियाणा सीमा में आ गया है तो, लाक डाउन के कारण जब प्रत्येक प्रदेश की सीमा सील बंद है, तब उसे वहीं रोक कर उसकी जांच करा कर उसे कोरनटाइन मैं भेजें, बजाएं अपनी असफलता या जिम्मेदारी को दूसरे प्रदेश पर ढोलें।
कश्माीर से कन्याकुमारी तक भारत एक हैं, विविधता में एकता लिये हुए हमारा देश भारत है, इस धारणा को संबल प्रदान करने वाली भाजपा पार्टी के हरियाणा सरकार के मंत्री अनिल विज है। इसलिए उनका उक्त कथन ज्यादा दुख का विषय हैं ।  

सोमवार, 4 मई 2020

भय्यूजी महाराज! ‘‘एक विलक्षण व्यक्तित्व’’! ‘‘कुछ सुनहरी यादे’’।


29 अप्रेल को पू. भय्यूजी महाराज की जंयती के अवसर पर                                                                                           
‘नाथ सम्प्रदाय’’ के परम पूज्य, गुरुजी श्री उदय सिंह देशमुख जी जो पूरे देश में भय्यूजी महाराज के नाम से प्रख्यात थे, की जयंती (प्रकट दिवस) 29 अप्रैल को आ रही है। निश्चित रूप से ऐसे अवसर पर उनके साथ बिताए कुछ महत्वपूर्ण अनुभव व सुनहरी यादें का दिलों दिमाग और आंखों में तरोताजा हो जाना स्वभाविक ही है।
मुझे याद आता है, मेरी उनसे पहली मुलाकात मेरे पारिवारिक पत्रकार मित्र श्री अनूप दुबौलिया ने 11 वर्ष पूर्व इंदौर में करवाई थी। पहली ही मुलाकात में उनके चेहरे के तेज और आंखों के आकर्षण ने मुझे उनकी ओर आकर्षित कर दिया था। यद्यपि इसके पूर्व मैं कई आध्यात्मिक गुरुओं, संतो, महंतो, महाराजाओं, पंडितों, कथा प्रवचकांे व धार्मिक प्रकांड ज्ञाताओं से मिलता रहा हूं। जीवन के क्रम मे सार्वजनिक, धार्मिक सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकमो में भागीदारी के साथ-साथ श्री रुक्मणी बालाजी मंदिर बालाजीपुरम् के प्राण प्रतिष्ठिा कार्यक्रम (जिसका में संयोजक था, जिसमे लाखांे लोगों ने भागीदारी की थी) के दौरान, चारों पीठों के शंकराचार्य गण जी, गायत्री आंदोलन के डॉ प्रणव पंड्या जी, पूज्य प. अवधेशानंद जी महाराज, पूज्य डॉ. रावतपुरा सरकार, अर्जुनपुरी जी महाराज, रासलीला मर्मज्ञ बड़े ठाकुरजी, साध्वी ़ऋतम्भरा सहित अनेक संतों विद्यमानों के सानिध्य व संपर्क में रहने के सुअवसर मिले। लेकिन मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि, पहली बार मुझे अंदर से यदि किसी आध्यात्मिक संत ने खींचा और आकर्षित किया व अंदर तक प्रेरित किया तो वे भय्यूजी महाराज ही थे। आध्यात्मिक, प्रवचन, संवाद, चर्चा व सम्पर्क के दौरान मुझे कई बार यह यह बतलाया गया था कि बिना गुरु के व्यक्ति का जीवन अधूरा है, क्योंकि मेरा कोई गुरू नहीं था। स्पष्ट रूप से मैं यदि यह स्वीकार करूं कि, भय्यूजी महाराज से मिलने के पूर्व तक अनेकानेक संतो के संपर्क में आने के बावजूद भी, मेरे आंतरिक मन को किसी को भी गुरु के रूप में स्वीकार करने की प्रेरणा नहीं मिली, थी, तो गलत नहीं होगा। भैय्यूजी महाराज से मिलने के बाद और लगातार उनके जीवंत संपर्क में रहने से कुछ ऐसा महसूस होने लगा था कि यदि मुझे अपने जीवन में पूर्णता प्रदान करने के लिए किसी को गुरू बनाना ही है, तब इस इस कसौटी में मैंने भय्यूजी महाराज को ही अपने सबसे निकटतम पाया। उनका मुझ पर इतना आशीर्वाद व प्रेम था कि उन्होंने मुझे अपने ट्रस्ट में एक ट्रस्टी भी नियुक्त किया था।
आध्यात्मिक और सामाजिक क्षेत्र के श्रेष्ठतम गुरुओं को और संतों व श्रेष्ठियों को सुना है और उनसे चर्चा भी होती रही है। लेकिन मुझे इन सब से अलग भय्यूजी महाराज लगे, वह इसलिए कि उनकी संदेशों में, प्रवचनों में, बातों में आध्यात्मिक तत्व लिये हुए सामाजिक संदेश हमेशा रहता था। आध्यात्मिक गुरु सिर्फ आध्यात्म के बारे में बताते हैं, और सामाजिक श्रेष्ठि सामाजिक दृष्टिकोण से अपनी बात रखते हैं। यद्यपि उक्त दोनों तत्व समाज की सेवा ही करते हैं, लेकिन इन दोनों गूढ़ तत्वों का सर्वश्रेष्ठ संयोजन मैंने भय्यूजी महाराज में ही पाया। उनके व्यक्तित्व में इतना तेज, आंखों में सम्मोहन लिए हुए आकर्षण ऐसा था, जो व्यक्ति को अपने आप ही उनके नजदीक खींच ले जाता था। यह तभी संभव होता है, जब एक संत का निश्छल व्यक्तित्व होता है। इसी आर्कषण के कारण मैं उनकी ओर खिंचता चला गया।
  उनकी सबसे बड़ी खूबी जो मैंने पाई कि वे मठाधीश समान कोई संत नहीं थ,े जिनका बहुत बड़ा लंबा चौड़ा आश्रम हो। उनका कहना था ‘‘प्रत्येक घर एक आश्रम है‘‘। वे स्वयं के सम्मान के लिये एक माला (हार) की बजाए, एक पेड़ लगाकर उसे पूजने के लिये कहते थे। उन्होंने अपने मुख से कभी भी कोई दान की बात नहीं की। उनके शिष्य खासकर महाराष्ट्र व गुजरात से आने वाले, बिना मांगे लाखों रुपया सहायता राशि के रूप में दे जाते थे। एैसे सहयोग से सरकारों के साथ मिलकर संयुक्त योजना के रूप में (पी.पी.माड्ल़ द्वारा) वे विकास कार्य सम्पन्न करवाते थे।
  विभिन्न सामाजिक सामूहिक उत्तरदायित्व को भी वे बखूबी निभाते थे। हजारों लोगों की शिक्षा, प्रौढ़शिक्षा, कन्या विवाह, बेटी बचाओं, हरित क्रांति पारधियों का व्यस्थापन, राष्ट्र के प्रति प्रेम, सम्मान व उत्तरदायित्व की भावना का प्रसार आदि आदि कार्यो का उन्होनें जिम्मा उठाया। इन सामाजिक व विकास कार्यो के बेहतरीन ढं़ग सेे पारर्दषिता के साथ क्रियान्वन के लिये उन्होंने सदगुरू धार्मिक एवं परमार्थिक ट्रस्ट की स्थापना की थी। ट्रस्ट के अधीन 23 विभाग थे एवं लगभग 80 योजनाएँ चलती है। शायद इसीलिए ही वे आध्यात्मिक कम राजनीतिक,सामाजिक संत ज्यादा माने जाते थे। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत, बाल ठाकरे, लता मंगेश्कर व अन्ना हजारे से लेकर देश के प्रमुख राजनीतिक नेताओं चाहे वह किसी भी राजनैतिक विचारधारा के ही हो, प्रसिद्ध सामाजिक व्यक्तियों कलाकारांे (वे स्वयं भी कलाकार रहे व माड़ल का भी कार्य किया) इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में कार्य काने वाले प्रभावशाली सम्मानीय व्यक्तियों के साथ उनके आत्मीय घनिष्ठ संबंध थे। इन्ही संबंध के रहते वे जनहित में अनेक कार्य, योजनाएँं और सुझाव उन नेताओं को देते थे, जिनके निष्पादित होने पर क्षेत्रीय जनता विकास की ओर अग्रेसित होती थी। इस प्रकार इन आत्मीय संबंधों का उपयोग उन्होंने सैदव सिर्फ सामाजिक न्याय के लिये ही किया। सामाजिक सुधार के वे एक अग्रदूत थे। प्रबुद्ध शिक्षित बुद्धिजीवी वर्गों के बीच उनकी लोकप्रियता शायद इसी कारण से थी। उनको राष्ट्रीय प्रसिद्धि तब मिली, जब उनके द्वारा एक वर्ष पहिले ही, प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने की घोषणा कर दी थी, जो बाद में साकार होकर सत्य सिद्व हुई। महाराष्ट्र की राजनीति में उनका गहरा प्रभाव था।
एक बात और जो भैय्यूजी महाराज को अन्य आध्यात्मिक गुरूओं से थोड़ा अलग करती है वह भैय्यूजी महाराज का व्यवहारिक दृष्टिकोण (एर्प्रोच)। आध्यात्मिक गुरूओं के समान प्रकांड ज्ञान के ज्ञाता होने के बावजूद भैय्यूजी महाराज इस अर्थ में अन्य प्रकांड, ज्ञानी गुरूओं से  अलग थे कि, वे अपने अपार ज्ञान के भंडार से उतना ही व्यवहारिक ज्ञान श्रोताओं को देते थे जिन्हें वे श्रोता गण अपने दिमाग मैं स्टोर न कर उसे बाहर निकाल कर व्यवहार रूप में अपने जीवन में लागू कर कार्य रूप में परिणित कर सकें। शायद इसीलिए गुरूजी व्यवहारिक गुरू ज्यादा माने जाते थे, जिसका फायदा अंततः समाज को ही मिलता था। क्योंकि यह बात स्पष्ट है कि ज्ञान का भंडार तो असीमित हो सकता है, लेकिन यदि उसका धरातल में उपयोग नहीं हो पा रहा है तो, वह ज्ञान कोई काम का नहीं हैं। गुरूजी, लोगों की स्वभाविक व्यवहारिक धरातल पर उतारने व काम करने की कठिनाई को जानते थे। कार्यषैली की यह विषेषता ही भैय्यूजी महाराज को उनके समकक्ष विद्वान, ज्ञानी आघ्यात्मिक व सामाजिक श्रेष्ठीयांे के बीच एक अलग विषिष्ट स्थान बनाती है।
  पीछे मुड़कर पू. गुरूजी के पृथ्वी से अपने शरीर को अचानक छोड़कर जाने के दुखद क्षण का याद आना भी स्वाभाविक ही है। मुझे याद आता है, उनके स्वर्गवासी होने के लगभग 3 महीने पूर्व बैतूल में होने वाली मेरी किताब के विमोचन कार्यक्रम के लिए मैं उनसे मिला था और मैंने उनसे विमोचन कार्यक्रम मैं आने के लिए अनुरोध किया था, जिसे  उन्होंने स्वीकार किया था। इसमें तत्कालीन केंद्रीय मंत्री सुश्री उमा श्री भारती एवं डॉ. वेद प्रताप वैदिक भी आए थे। मुझे अभी भी वे क्षण याद है, जब उन्होंनेे गमछा बुलाकर मेरे गले में डाल कर सम्मानित कर मुझे अभीभूत कर दिया था।
उनके द्वारा स्वयं की जीवन लीला समाप्त करने पर कई प्रश्न उठे। लेकिन मैं मानता हूं उनका ‘‘व्यक्तित्व’’ व्यक्तिगत जीवन से कई गुना ऊँचा उठा हुआ था। अभी इस समय हम महाभारत, रामायण सीरियल देख रहे हैं, जिसमें भी महान व्यक्ति भीष्म पितामह, भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण ने भी ऐसे कुछ कार्य कथन किए थे, जो सामान्य जनों की नजर में गलत थे। वे सब उन महान व्यक्तियों के कदमों को स्वीकार नहीं कर पा रहें थे, लेकिन इससे उन सबका व्यक्तित्व भी गलत हो गया था, ऐसा नहीं था। क्योंकि जिस कार्य को पूरा करने के लिए वे सब (भगवान सहित) पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, उनका बखूबी अंजाम उन्होंने दिया था। इसलिए उनके कुछ समझ में न आने वाले कार्य उनके व्यक्तित्व को महान बनाने में आड़े नहीं आए। ठीक इसी प्रकार भय्यूजी महाराज ने जिन उद्देश्यों के लिए अवतरण लिया था, उसका पूरी तरह से क्रियान्वयन किया। व्यक्तिगत मानवीय कमियां, उनके विशाल कर्म योगी व्यक्तित्व के कार्य करने में आड़े नहीं आई। इस शाश्वत सत्य को तो आपको मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति या भगवान भी जो मानव के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुऐ है, वह सम्पूर्ण नहीं हो सकता है, उसमें कुछ न कुछ गुण या दोष की कमी अवश्य होगी ही।
अंत में पूज्य गुरु भय्यूजी महाराज की जयंती पर मैं उन्हें सादर नमन करता हूं और श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

क्या राष्ट्रीय लॉक डाउन की विस्तृत समीक्षा किए जाना, ‘समय’ की आवश्यकता नहीं है?

सामयिक सुझाव
देश में राष्ट्रीय लॉक डाउन लागू किए एक महीना व्यतीत हो गया है। लेकिन केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग व देश का मीडिया लाकडाउन के बाद देश में कोरोना की औसत वृद्धि दर में कमी को दर्शाकर जनता को एक तरह से भ्रमित कर रहा है। एनडीटीव्ही ने बाकायदा ग्राफ के माध्यम से औसत वृद्धि दर लाकडाउन की अवधि में कम दर्शाने की कोशिश की है। स्वास्थ्य विभाग ने लॉक डाउन के लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद नियमित प्रेसवार्ता में कहा था कि यदि लॉक डाउन न किया जाता तो देश में 18 लाख से ज्यादा संक्रमित मरीज हो जाते। 
हमारे देश में कोरोना का प्रथम मरीज केरला प्रदेश में 30 जनवरी को पाया गया था। देश में जब 24 मार्च को लॉक डाउन लागू किया गया, तब मात्र लगभग 520 कोरोना संक्रमित रोगी थे। 30 जनवरी से 24 मार्च तक कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या बहुत ही धीरे-धीरे एक एक दो-दो करके ही बढ़़ती रही। लॉक डाउन के प्रथम सप्ताह में कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि का औसत प्रतिदिन का लगभग पैंतीस चालीस का था। उसके बाद 2 सप्ताह तक लगभग 100 का औसत रहा। फिर लगभग 500-600 का औसत रहा और अभी पिछले हफ्ते से 1200 से ज्यादा का औसत आ रहा है।  न केवल मरीजों की संख्या 23000 को पार कर गई, बल्कि देश में हॉटस्पॉटों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन संक्रमित मरीजों की गणना को आधार दिन, तारीख, सप्ताह या महीने को अपनी सुविधानुसार लेकर आकड़ो के खेल के जादू से  कोरोना मरीजों की संख्या में वृद्धि दर में कमी का दावा सफलतापूण भ्रमित कर किया जा रहा है। लाकडाउन के पूर्व तक 50 दिन में कुल 520 व्यक्ति संक्रमित हुये जबकि लाकडाउन की 30 दिन की अवधि में 22000 संक्रमित रोगी की वृद्धि हुई में वृद्धि की दर से मतलब है (जो वास्तविकता को दर्षित नहीं करती है) या कुल मरीजों की कुल संख्या से मतलब है। आकड़े आपके सामने है। यह ठीक उसी प्रकार है जब भाजपा दिल्ली के चुनाव में बुरी तरह हारने के बावजूद उसका यह दावा कि उसने पिछले चुनावों से ज्यादा वोट पाये है। यदि यह वृद्धि की दर कम है तो फिर लाकडाउन समाप्ति पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जाता। मतलब साफ है, जिस कोरोना की बीमारी का एकमात्र इलाज लाक डाउन कर (ह्यूमन) डिस्टेंस (सोशल डिस्टेंस) के साथ अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरती जा कर ही संभव है, वह उद्देश्य वर्तमान में लॉक डाउन के बावजूद सफल होता नहीं दिख रहा है। फिर सरकार नागरिक और स्वास्थ्य सिपाही (डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मी) कोरोना को रोकने के लिए और क्या करें यह एक चिंता का विषय है।  
यह तो विदित ही है, इस रोग की मारक दवा अंतिम रूप से नहीं बन नहीं पाई है। यद्यपि   भारत सहित पूरे विश्व के वैज्ञानिक इस दिशा में तेजी से प्रयास कर रहे हैं, और हमें शीघ्र ही इसमें सफलता मिलने की आशा हमें करना चाहिए। लेकिन तब तक क्या किया जाए महत्वपूर्ण प्रश्न यह है? कोरोना को संक्रमित होने से रोकने का एकमात्र इलाज अभी तक कुछ सुरक्षा व सावधानिओं के साथ फिलहाल लॉक डाउन को ही माना गया है। इसके अलावा अधिकतम टेस्ट ही इसका फिलहाल उपाय है। क्या यह सही नहीं है कि लॉक डाउन को सही तरीके से पूर्णतः अपेक्षित ढ़ग से सरकार द्वारा लागू नहीं किया जा रहा है तथा सही तरीके से समस्त नागरिकों द्वारा भी उसका पालन नहीं किया जा रहा है? जबकि प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट घोषणा की थी कि पूरे देश में पूर्णरूप रूप से पूर्ण लॉक डाउन लागू किया जा रहा है। 
यह लॉक डाउन जो व्यक्तिगत रूप से शून्य खर्चा लिए हुए है, लेकिन एक राष्ट्र की दृष्टि में यह फिलहाल सबसे महंगा इलाज सिद्ध हो रहा है। इस वैश्विक संक्रमित महामारी की बीमारी के कारण ही विश्व के अधिकांश राष्ट्रांे की आर्थिक गतिविधियां सुन्न सी पड़ गई है और विश्व एक गहरे आर्थिक संकट की और ढकेला जा रहा है, जो उक्त बीमारी के संक्रमण को रोकने के तरीकों के कारण ही है। इसीलिए विश्व के कई देश इस कोरोना के संक्रमित होने से रोकने के प्रयासों को लागू करने के समय ही साथ-साथ उससे पड़ने वाले ऋटणात्मक आर्थिक प्रभाव पर भी गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर हो गए हैं। अब आर्थिक दृष्टिकोण लेकर इस संक्रमित महामारी बीमारी का इलाज करने के तरीके खोजे जा रहे हैं। अमेरिका तो विश्व का पहला देश रहा है जब उसके राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रांरभ में आर्थिक दृष्टि को ध्यान में रखते हुये लॉक डाउन लगाने से इंकार करते हुए पूरे देश में दो लाख से ज्यादा व्यक्ति की मृत्यु की आंशका तक बेहिचक व्यक्त कर दी थी। हम तो अपने देश में एक-एक व्यक्ति की जान बचाने के खातिर पूरी व्यवस्था की आहुति लगाए हुए हैं। ‘‘जान’’ जरूरी है लेकिन सिर्फ जान नहीं बल्कि जान के साथ ‘‘जहान’’ की भी आवश्यकता है जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने स्वयं कहा था। क्या इसकी समीक्षा किए जाने की आवश्यकता का समय नहीं आ गया है? ऐसा लगता है कि इस संक्रमित बीमारी से निपटने के लिये लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी और तब तक हमारा देश लाक डाउन से पड़ने वाले इस आर्थिक चोट को नहीं झेल पाएगा। इसलिए सरकार और नागरिकगण दोनों को इस मुद्दे पर अपने कार्य नीति आचार व व्यवहार के पुनरीक्षण किए जाने की नितांत आवश्यकता है।
यह बात आईने के समान स्पष्ट है कि देश के विभिन्न अंचलों में नागरिकगण लॉक डाउन का 100 प्रतिशत पालन नहीं कर रहे हैं, जो लॉक डाउन की पूर्ण सफलता की एक पहली आवश्यक शर्त है। आश्चर्य है देश ने प्रधानमंत्री के एक दिन के स्वस्फूर्ति जनता कर्फ्यू के आह्वान का लगभग पालन किया था, गले लगाया था। लेकिन तीन दिन बाद घोषित लॉक डाउन पुलिस तंत्र के डंडे की ताकत व ड़र के बावजूद भी पूरी तरीके से लागू नहीं हो पाया। इससे यह स्पष्ट है जनता को एक दिन के लिए तो स्वयं के घर में रखा जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक नहीं। बार-बार देश का मीडिया भी जनता को यह दृश्य दिखा भी रहा है। तो फिर सरकार को क्या करना चाहिए?
मेरी दृष्टि में प्रथम तो सरकार को पूरे देश मे लॉक डाउन शिथिल कर सिर्फ घोषित देश के समस्त हॉटस्पॉटों में ताकत के साथ 100 प्रतिशत कर्फ्यू लागू कर कड़ाई से पालन करवाना चाहिए। शेष जिलों को लाक डाउन से मुक्त कर सामान्य दैनिक जीवन दिन-चर्या चलते देना चाहिए। इन मुक्त जिलों में जिले के भीतर समस्त गतिविधियां को सावधानी व सुरक्षा के साथ प्रारंभ करना चाहिये। कोरोना मुक्त जिले की सीमाओं से लगे जिले भी यदि संक्रमण मुक्त है जो इन सभी जिलों के बीच अंतर जिला मूवमेंट करने की भी अनुमति देना चाहिए। इससे दो संदेश स्पष्ट रूप से नागरिकों के बीच जाएंगे। प्रथम तो वे नागरिक गण जिनके द्वारा लॉक डाउन का पालन करने के इनाम स्वरूप उनके क्षेत्र में लॉक डाउन समाप्त किया जाकर उन्हें सामान्य जीवन जीने की छूट प्राप्त होगी, जिसके की वे अधिकारी हैं। इस कारण से स्वयं के स्वार्थ को देखते हुए व नैतिक व सामाजिक दबाव के कारण उन नागरिकों पर भी दबाव पड़ेगा कि वे 14 या 21 दिन उनके क्षेत्र में लागू कर्फ्यू का पालन कर अपने रहवासी क्षेत्र को भी हॉटस्पॉट से हटाकर सामान्य जिंदगी जीने की ओर आगे बढ़ सकेंगें। इस प्रकार जब लॉक डाउन का क्षेत्र कम हो जाएगा, तब सरकार के पास अतिरिक्त पुलिस फोर्स रहेगी जिसके द्वारा वह कर्फ्यू को सख्ती के साथ लागू करवा पायेगी। सरकार को इस पर गंभीरता से विचार कर इस दिशा में निर्णय लेना चाहिए। सरकार के पास उपलब्ध विशेषज्ञों से विस्तृत और गंभीर चर्चा कर आर्थिक व्यवस्था पर कम दुश दुश्प्रभावित करने वाले प्रयासों के साथ इस बीमारी का इलाज करें अन्यथा आगे 6 महीने से से 1 साल के बाद जब हम जागेंगे तब हमारे पास व्यवस्था सुधारने के लिए कोई प्रभावी सार्थक हथियार नहीं रहेगा और तब हमे यह कहना पड़ेगा ‘‘अब पछताए होत क्या जब चिडि़याँ चुग गई खेत’’। 
अंत में सरकार के समक्ष प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों का मुद्दा सामने लाना आवश्यक है। जनता के बीच एक भावना घर कर रही है कि बड़े सक्षम लोगों को तो सरकार ने अपने खर्चे से विदेशों से भारत बुला दिया। कोटा में पढ़ने वाले सक्षम विद्याथियों को कुछ प्रदेशों सरकारी खर्चे पर वापस अपने-अपने प्रदेश बुला दिया। लेकिन दिहाड़ी प्रवासी मजदूर की हजारों की संख्या में होने के बावजूद उन्हे अपने राज्यों में वापिस नहीं जाने दिया जा रहा है। क्या गरीबो का कोई माइबाप नहीं है? वास्तव में जब केन्द्र व राज्य सरकारों इन मजदूरों के ठहरने व खाने पीने पर करोडांे रूपये खर्चे कर रही है, तब उनकी मांग को स्वीकार कर कोटा के छात्रों के समान ही क्रमशः चरणबद्ध तरीके से उन्हे उनके राज्य में छोड़ने का प्रबंध केन्द्र व राज्य सरकारे क्यों नहीं कर रही है? यह समझ से परे है। उनके वापिस अपने-अपने गांवों में पहुंच जाने पर सरकार की एक बड़ी धन राशि व्यय होने में भी बहुत कमी आ जायेगी। क्या उपरोक्त सिर्फ मजदूरों के लिये है छात्रों व विमान यात्रियों के लिये नहीं? लेख समाप्त करते-करते उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की मजदूरों के वापसी के संबंध में एक कार्य योजना की घोषणा हुई है, जिसका न केवल हार्दिक स्वागत किया जाना चाहिये, बल्कि पूरे देश में इस ‘‘योगी माड़ल’’ को लागू भी किया जाना चाहिये। 

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

भारतीय जनता पार्टी ‘‘मुस्लिम विरोधी नहीं’’ वरण ‘‘मुस्लिम विरोधी छाप’’ लिए हुये हैं।

भारतीय राजनीति मैं जनसंघ जो आगे चलकर वर्तमान भाजपा के रूप में परिवर्तित हुई है,के सम्बन्ध में एक जमाने से ही यह शाश्वत तथ्य सर्वमान्य रूप से विद्यमान हो गया है कि भाजपा एक मुस्लिम विरोधी राजनीतिक पार्टी है और कॉंग्रेस मुस्लिम परस्त राजनीतिक पार्टी हैं। वास्तव में कांग्रेस पर न केवल आजादी के बाद से बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि आजादी के पूर्व से भी यह आरोप लगता रहा है कि कांग्रेस हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाती रही है और इसी नीति के अन्तर्गत वह सदैव ही राष्ट्रीय सुरक्षा व देश हित को दर किनार करती आ रही हैं। ऐसे कई अवसर हमारे देश में आए जब कांग्रेस पर आरोप लगा कि उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते राष्ट्रीय हित में या तो निर्णय लिए ही नहीं या गलत निर्णय के लिये।
इसके विपरीत भाजपा जनसंघ के जमाने से ही अपने आप को हमेशा एक राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही और ऐसे प्रस्तुतीकरण में उसकी सबसे बड़ा सहायक उसकी मुस्लिम विरोधी छवि ही रही। एक उदाहरण आपके सामने प्रस्तुत हैं। शाहबानांे मामले में उच्चतम न्यायालय के अंतिम बंधनकारी निर्णय को तबकी राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने संसद में बिल लाकर निर्णय को पलट दिया था, तब भाजपा ने ही उसका पुरजोर तरीके से विरोध किया था। भाजपा के सत्ता में आने के बावजूद मोदी के प्रथम कार्यकाल में भी कमोबेश भाजपा की यही छवि बरकरार रही। इसी कार्यावधि में हज यात्रा सब्सिडी की समाप्ति जैसे कुछ कदम उठाये गये। यद्यपि सत्ता में आने व बने रहनें के लिये भाजपा ने मुसलमानों की सामाजिक दुर्दशा को सुधारने के लिए भी कुछ कदम उठाए। ट्रिपल तलाक उन्मूलन ऐसा ही एक बड़ा प्रगतिशील कदम माना गया, जिसका मुस्लिम समुदाय विशेषकर महिला मुस्लिम समाज ने दिल से समर्थन किया।
मोदी के दूसरे कार्यकाल में दो बड़ी घटनाएं ऐसी हुई है, जिनसे भाजपा की स्थापित छवि पर विपरीत असर पड़ा है। जिन आधारो पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी नहीं है। प्रथम शाहीन बाग में 100 दिन से ज्यादा चले लंबे चक्का जाम आंदोलन को समाप्त कर चक्का जाम हटा कर वहॉं के रहवासियों को हो रही असुविधाएं एंव तकलीफों को दूर करने के लिए केंद्रीय सरकार ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाये और न ही कोई कारवाई की। जबकि दिल्ली में पुलिस विभाग जिसकी यह जिम्मदारी है, वह दिल्ली प्रदेश सरकार के अधीन न रहकर केंन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन हैं। राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के चुनाव तक कोई कार्यवाही न करना तो समझ में आता है, लेकिन चुनाव उपरान्त भी कोई कार्यवाही न करना समझ से परे है। बल्कि इसके विपरीत केंद्रीय शासन और भाजपा के नेता गण उक्त जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व का ठीकरा लगातार दिल्ली की प्रदेश सरकार के सिर पर फोड़ते रहें। भला हो ‘‘कोरोना’’ आगमन का जिसके कारण उक्त चक्काजाम समाप्त हुआ। याद कीजिए, उसी दौरान दिल्ली में दंगा भड़कने के बाद जब केन्द्रीय सरकार ने ऐजन्डा तय कर लिया तब 2 दिन के अंदर ही दंगे को पूर्णतः नियंत्रित कर लिया गया था। ठीक इसी प्रकार शाहीन बाग में भी त्वरित व प्रभावी कार्यवाही करके चक्का जाम को समाप्त कर इस मामले को बहुत ही अच्छे ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 
दूसरी घटना वर्तमान तबलीगी जमात के मरकज एवं देश में फैलकर छुपते फिरने और कोरोना फैलाने की दुर्भावना के मामले को लेकर है। 10 मार्च से लेकर 28 मार्च तक केन्द्र सरकार के ठीक नाक के नीचें निजामुद्वीन मस्जिद दिल्ली में तबलीगी जमातियों द्वारा जिस तरह का नंगा नाच नाचा जा रहा था, वह देश के सामने आ चुका है। देश की बाह्य व आंतरिक सुरक्षा में लगे हुए छटवे प्रमुख व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को स्वयं रात के 10-11 बजे जाकर मस्जिद प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद से अनुरोध करके निजामुद्वी्न मस्जिद खाली करानी पड़ी। तिस पर भी मौलाना मोहम्मद साद के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत निरोधक आदेश तुरंत तो छोडिये वरण आज तक भी जारी नहीं किये गये। दूसरे दिन मात्र एक सामान्य प्रथम सूचना पत्र निजामुद्वीन थाने में दर्ज की गई जिसके बाद से मोहम्मद साद फरार है। तब शासन प्रशासन द्वारा यह प्रसारित किया गया कि वह 14 दिन के कोरोनटर््ाईन मे है। हद तो तब हो गई जब पुलिस प्रशासन द्वारा यह स्पष्टीकरण दिया गया कि मौलाना साद के कोरोनटर््ाईन होने के कारण उससे 14 दिन तक पूछताछ नहीं की जा सकती है। देश में लागू दंड पक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपराधी आरोपी से सीधे पूछताछ की है, न कि उसके वकील के माघ्यम से यह विशिष्ट सुविधा भी साद को दी जा रही है। परन्तु क्यों?
एक अपराधी जिस पर राष्ट्रीय लॉंक डाउन के नियमों के उल्लघंन सहिता भारतीय दंड सहिता के कई अपराधो के संगीन आरोप है। इसके अतिरिक्त वीसा नियमों का उल्लघन करने वाले विदेशियों को प्रश्रय देने का आरोप है। साथ ही कुछ क्षेत्रों मे तो यह भी आरोप लगाया जाता है कि एक गहन साजिश व षडयंत्र के तहत मौलाना मोहम्म साद ने तबलीगी जमात के माध्यम से पूरे देश में कोरोना फैलाने का षडयंत्र रच रखा है। वस्तुतः 22 प्रदेशों में कोरोना संक्रमित तबलीगी पाए गए है। ऐसी असहनीय स्थिति में ऐसे जघन्य अपराधी से गहरी छानबीन हेतु तुरन्त पूछताछ न करना, न केवल आश्चर्य जनक है, बल्कि देश की सुरक्षा व हितो के एकदम विपरीत भी है। इन 14 दिनांे में साद ने बैठे संचार के आधुनिक माध्यमों का उपयोग करके क्या-क्या गुल खिलाए होगंे इसकी केवल कल्पना भर की जा सकती हैं। इतना ही नहीं तबलीगी जमात के रोहिंग्या मुसलमानों से भी संबंध है तथा तबलीगीयों ने रोहिंग्याओं के साथ मिलकर कोरोना फैलाया गया है, यह आरोप भी मौलाना साद पर लगभग है। साथ ही विदेशांे से हवाला द्वारा अवैध रूप से बड़ी धन राशि प्राप्त करने का आरोप भी मौलाना साद पर लगाया गया है। ऐसे गहन आरोपांे से सुशजित आरोपी से ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक डॅंाक्टर समस्त सुरक्षा कवच के साथ अपने रोगी की देख भाल एवं इलाज कर रहा है, से समस्त (पीपीडी किट इत्यादि सहित) सुरक्षा कवच पहने पुलिस टीम मौलाना साद से गहन पूछताछ तत्काल क्यों नहीं कर सकती थी, यह एक महत्वपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न हैं। 
तबलीगी जमातीयांे के प्रति लोगों में कितना रोश है, इसे आप भोपाल के एक व्यक्ति (उसका नाम में भूल रहा हॅूं) जिसने फेसबुक पर अपना कुछ मिनटो का एक वीडियों डाला है। उसको देखिए, जिसमें वह कहता है प्रधानमंत्री मोदी को देश की जनता ने इस संकट काल में उनके द्वारा तीन बार किये गये राष्ट्रीय आव्हान को पूरा समर्थन दिया। लेकिन निजामुद्वीन से भागे तबलीगी जमातियों को सरकार अपना मेहमान क्यों मान रहीं है? उनसे बार-बार सामने आने के लिए विनम्र अनुरोध क्यों कर रहीं है, यह सब समझ से परे है। न्याय संगत होगा, इन्हें पकड करके ला कर निजामुद्वीन मस्जिद में बंद कर देना चाहिए और भोजन व इलाज की कोई सुविधा न देकर उन्हें कोरोना से होने वाली मृत्यु का भयावद्ध एहसास होने देना चाहिए। न तो यह मेरे विचार है, और न ही मैं इससे सहमत हूॅं,। लेकिन यह वही जमात है, जिसकी देश के अंदर कोरोना के कुल संक्रमित मरीजों में लगभग 35 प्रतिशत की भागीदारी है। उक्त व्यक्त भावनाओं से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है अथवा नहीं यह निर्णय मैं आप सबके विवेक पर छोड़ता हँू।       
 इस संदर्भ में मध्यप्रदेश के भोपाल की एक कार्य योजना का यहां उल्लेख करना भी सामयिक ही होगा। मिसरोद (भोपाल) से बाहर सीधा भोपाल इंदौर की रोड़ को जोड़ने वाला लम्बा फलाई ओवर व आठलेन रोड़ बनाते समय रास्ते में आये समस्त लगभग 100 मंदिरों मठो को हटाया गया। लेकिन इसके विपरीत कमला पार्क में राजाभोज केवल स्टेआर्क फलाई ओवर का निर्माण करते समय मस्जिद का जरा सा हिस्सा आने के कारण डिजाइन को ही बदलना पड़ा, मस्जिद के पुल के निर्माण के रास्ते में आने वाले भाग को हटाया नहीं गया। यह शिवराज की भाजपा सरकार का उठाया गया कदम था जो मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम भय के परिणाम स्वरूप था, आप स्वयं ही समझियें। ऐसा ही एक मुस्लिम तुष्टिकरण से संबंधित आदेश रायसेन कलेक्टर का है। ‘‘रमजान’’ में मुस्लिम समाज को रोजे के लिये आवश्यक सामग्री पहुंचाने के निर्देश अधीनस्थ प्रशासनिक अधिकारियों को दिये। लेकिन ऐसे ही निर्देश नवरात्री के समय उपवास रखने वाले हिन्दुओं के लिये नहीं दिये गये। 
उपरोक्त दोनों घटनाएं व मध्यप्रदेश की सरकार की उक्त कार्य प्रणाली, क्या इस बात को सिद्व नहीं करती हैं कि भाजपा मुस्लिम विराधी पार्टी नहीं है, बल्कि वास्तव में छदम मुस्लिम विरोधी छाप लिए हुये है? क्या भाजपा में अल्पसंख्यक मोर्चा व संघ में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन भी यही इंगित नहीं करता है ? इन घटनाओं ने भाजपा के उक्त मिथक मुस्लिम विरोधी को चकनाचूर कर दिया है, जिसे देश स्वीकार भी कर लेता यदि यह वास्तव में देश हित में होता। लेकिन वस्तुतः दोनों घटनाओं में समय पर कड़ी व प्रभावी कार्यवाही न करना राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रि हित के बिल्कुल विरूद्ध है। भाजपा की उक्त अकर्मण्यता क्या उसकी नीति में कुछ बदलाव की सूचक है? या यह भी कोई राजनीति का भाग है, यह तो भाजपा ही जाने । लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा के कट्टर समर्थको को छोड़ भी दें तो भी, एक सामान्य नागरिक जो भाजपा की कई नीतियों का समर्थक नहीं है, लेकिन वह यह अवश्य मानता है देशहित के विरूद्व काम करने वाले मुस्लिम कट्टवाद जिसके कारण ही मुसलमानों के मन में देश के प्रति घृणा फैलाई जाती है, इनके खिलाफ समय पर सही व कड़क प्रभावी कार्यवाही कर सकती है तो वह एकमात्र पार्टी भारतीय जनता पार्टी ही है। ऐसी सोच वाले नागरिकों को निश्चित रूप से भाजपा के बदलते रूख से निराशा ही हाथ लगेंगी। भाजपा को इस पर गहराई से गहन आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। अंततः भाजपा की अब मुस्लिम तुष्टीकरण या मुस्लिम भयाक्रात (मुस्लमानों से ड़र) की नीति है, यह समय ही तय करेगा।
 धन्यवाद!

‘प्रधानमंत्री जी का राष्ट्र के नाम संबोधन ! कितनी आशा ! कितनी निराशा!‘‘


कोविड-19 (कोरोना) के भारत में आने के बाद हमारे देश के प्रधानमंत्री का यह चैथा संबोधन हूआ है । यह तो तय ही था की लाॅक डाउन कुछ समय के लिये आगे बढेगा।  कुछ दिन पूर्व ही प्रधान मंत्री की देश के मुख्यमंत्रियों के साथ कुछ विडीयों कान्फ्रेसिंग के दौरान 10 से ज्यादा मुख्यमंत्रियों ने न केवल लाॅक डाउन बढाये जाने की वकालत की थी, बल्कि तीन प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने तो प्रधानमंत्री के संदेश आने के पूर्व ही लाॅक डाउन की अवधि 30 अप्रैल तक बढा दी थी । किसी भी मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से लाकडाउन बढाने का विरोध नहीं किया था । प्रश्न यह है कि जनता अपने मन में जो आकांक्षाये, छूट की मंशा इस संदेश के लिये पाली थी, क्या उसकी पूर्ति या आंशिक पूर्ति हुई है तथा प्रधानमंत्री द्वारा समय पूर्व उठाये गये कदमों का,जैसा उन्होने स्वकथित किया है, का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है ।
आप जानते ही हैं । विगत दिवस प्रधानमंत्री ने यह बात कही थी कि अब ‘‘जान है तो जहान है‘‘ के आगे अब जान है ‘‘और‘‘ जहान भी सूत्र पर कार्य किया जायेगा । लेकिन प्रधान मंत्री के आज के संदेश में कम से कम 07 दिन तो जान है और जहान भी है का सूत्र नजर नहीं आयेगा । अभी 20 तारीख तक तो ‘‘जाॅन है तो जहान है‘‘ पर ही सरकार आगे कार्यशील रहेगी। प्रधानमंत्री ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि अगले 20 दिन 02 मई तक देश में लाॅक डाउन की स्थिति रहेगी। 07 दिनों बाद नागरिकों द्वारा लाॅक डाउन का कडाई से पालन करने की स्थिति में कोरोना मरीजों की संख्या न बढने पर सामान्य दैनिक जीवन दिनचर्या के लिए आंशिक छूट पर विचार किया जायेगा और तदानुसार जान है ‘‘और‘‘ जहान है को लागू किया जा सकता है । यधपि सरकार ने दूसरे दि नही लम्बी चैेडी एडवाइजरी जारी कर दी लेकिन उसमें भी कई अपूर्णतायें जैसे कारपेंटर,प्लम्बर,इलेक्ट्रिसियन को छूट दी गई है लेकिन उसको कार्य करने के लिये आवश्यक सामान जिनसे क्रय कर सकें उन दुकानों को छूट नहीं दी है । 
प्रधानमंत्री ने देश के नाम संदेश में प्रारम्भ में ही एक बडी महत्वपूर्ण बात कही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज आने के पूर्व ही सरकार ने विदेशों से विमानों से आने वाले यात्रियों की सक्रिनिंग चेंकिंग प्रारम्भ कर दी थी ।  लेकिन जानकारों का कहना है कि वस्तुतः यहा पर सरकार ने अदूरदर्शिता का परिचय और सावधानी से काम नहीं लिया। जैसा कि आपको मालूम ही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज 30 जनवरी को केरला प्रदेश में आया था । यघपि चीन में हुबई प्रदेश की राजधानी वुहान में अक्टूबर में ही वहां के डाॅक्टर ने कोरोना बीमारी की पुष्टि कर दी थी । लेकिन चीन ने विश्व को प्रथम कोरोना रोगी की जानकारी सर्वप्रथम 30 दिसम्बर को दी थी । 07 जनवरी को वुहान में रहने वाले समस्त विदेशी नागरिकों को यह सूचना जारी कर दी गई थी कि आपका वीजा की अवधि कम की जा रही है, और आप 03 दिन के अन्दर अपने-अपने देश लौट जाएं । तदानुसार 10 जनवरी को भारत में आइटीबीपी के दो जहाजों द्वारा लगभग 560 व्यक्ति भारत वापस आयें । भारत में प्रथम कोरोना रोगी आने के पूर्व तक यह स्पष्ट हो चूका था कि विश्व के लगभग 30 देशों में एक लाख व्यक्ति कोरोना के रोग से संक्रमित हो चुके थे । 30 जनवरी को सरकार के सामने कोरोना की आगे आने वाली कुुछ भयावहता का चित्रण तो सामने आ चुका था । लेकिन शायद सरकार इस कोरोना बीमारी की गंभीरता को तत्समय समझ नही पाई । इस कारण उस समय सरकार ने प्लेन से उतरने वाले यात्रियों की मात्र थर्मल रीडिंग ली गई और साथ में उनसे यह घोषणा पत्र भरवाया गया कि वे स्वयं घर में 14 दिन कोरोनटाईन में रहेगें । यह निश्चित रूप से पर्याप्त सावधानी नही थी । 
हम सब जानते है कि हमारे देश में शपथ पत्र या स्व घोषणा (सेल्फ डिक्लरेषन) का कितना महत्व नागरिक लोग मानते है और उसका पालन करते है । इसके अतिरिक्त हवाई यात्रियों को भी शायद यह जानकारी रही होगी कि उनकी थर्मल चेकिंग होगी । इसलिये शायद पेरासिटामाल दवाई का अधिकांशतः उपयोग करने के कारण एयरपोर्ट पर कोरोना के सम्भावित संक्रमित व्यक्ति अधिकांशतः नहीं पकडे गये । नागरिकों सहित सरकार यह जानती थी कि विदेशों से आने वाले यात्रियों के द्वारा ही देश में कोरोना का आना सम्भव है । तब सरकार को 30 जनवरी के बाद से ही बाहर से आने वाले विमानों को देश में या तो उतरने ही नहीं देना था व उन्हें वापस भेज देना चाहिये था । अथवा यात्रियों को उतार कर  उन्हें अपने नियत्रण में लेकर उनकी जाॅच कर 14 दिन तक एयरपोर्ट व आस पास स्थित होटलों व अन्य स्थानों में रिपोर्ट आने तक उन्हें रोक कर कोरोनटाईन में रखना चाहिये था । तब निश्चित ही भारत में एक भी कोरोना संक्रमित रोगी नहीं होता और न ही सक्रमण फैलता । तब देश को लाॅक डाडन किये बिना ही हम न केवल देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को सरुक्षित रख पाते, बल्कि देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी वैसे ही सामान्य गति से चलता रहता जैसा कि पूर्व में चल रहा था । यहां एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठने ने 30 जनवरी को ही पी एच आई सी सी की एडवाइजरी जारी कर दी थी ।   
एक प्रश्न अवश्य यह पैदा होता है कि जो लगभग 1500000 व्यक्ति (एक अनुमान के अनुसार) जो विदेशों से अन्तर्राष्ट्रीय उडानों द्वारा भारत में आए थे, उनके प्रति भारत सरकार का क्या दायित्व था। एक अनुमान के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत लोग भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के विदेशों में रहने वाले व्यक्ति थें और शेष विदेशी नागरिक थे । भारत से जाने वाले भारतवंशी अपने सुनहरे भविष्य अवसर और समृध्द जीवन के लिये वे विदेशों में जा कर या तो नौकरी कर रहे थे या व्यवसाय कर रहे थे । उनमें से कुछ लोग वहां के नागरिक भी बन गये थे । ऐसे समस्त भारतीयों को भारत सरकार ने जबरदस्ती विदेश नहीं भेजा था। वे स्वयं अपनी इच्छा से भारत से गये थे । इसलिये भारत सरकार का कोई कानूननी दायित्व न हाने के बावजूद, भारतीय होने के कारण भारतीय संस्कृति के आभा मंडल फलस्वरूप भारत सरकार का यह नैतिक दायित्व था कि वे अपने मूल के लोगों की जान माल की रक्षा करें । शायद इसी कारण से उन्हे न केवल भारत आने से रोका नहीं गया बल्कि सरकार ने स्वयं पहल करके विशिष्ट व चार्टर्ड उडानों के द्वारा उन्हें अपने देश में लाया भी।  
लेकिन निश्चित रूप से इस प्रारम्भिक चूक के बाद केन्द्रीय सरकार बल्कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में पूरे राष्ट्र ने समस्त राज्यों की सरकारों सहित कोरोना को सक्र्रंमित होने से रोकने के लिए जिस तेजी से कदम उठाये वह काबिले तारीफ है । इसी कारण विश्व में इस समय सबसे सूझबूूझ और कठोर निर्णय लेने वाले नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी को सराहा गया है । विश्व स्वास्थ संगठन ने भी बारम्बार प्रधान मंत्री मोदी की भूरी भूरी प्रशंससा की है । साथ ही विश्व के ताकतवर देश अमेरिका,इग्लैण्ड,ईजराईल इत्यादि देशों ने भी हमारे देश के प्रधान मंत्री के नेतृत्व को सराहा जो निश्चित रूप से देश के लिये एक गौरव की बात है । मोदी के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सामान्य व्यक्ति (स्वयं सेवक) से होते हुये उन्होने प्रधान मंत्री पद को महान बनाया । वे ‘‘महान‘‘  होकर प्रधान मंत्री पद पर नहीं बैठे जबकि इस देश में महान होने के कारण प्रधानमंत्री पद पर बैठने की परम्पराये रहीं है । 
प्रधानमंत्री ने स्थिति को सामान्य लाने के लिये एक छुपी हुई चेतावनी भी नागरिकों को दी है। यधपि यहां उनका कुछ विरोधाभास दिखता है । एक तरफ वे कहते है मुझे देश के नागरिकों पर पूर्ण विश्वास है ओर उनको धन्यवाद भी देता हूें कि उन्होने लाॅक डाउन का पालन किया है । तब सात दिवस बाद छूट देने के लिये छुपी हुई चेतावनी देने की शायद आवश्यकता नहीं थी । लेकिन जब हम स्वयं देखते है देश के कुछ नागरिकगण अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाहन निश्चित रूप से नहीं कर रहे है जैसा कि मीडिया भी दिखा  रहा है।  इस कारण से सम्पूर्ण जनता को भुगतना पड रहा है और आगे भी पड सकता है । इसलिये प्रधान मंत्री की यह चेतावनी हमारी स्वयं की कार्य पघ्दति को देखते हुये सामान्य स्थिति लाने के लिये समायोचित ही है । 
एक बात इस कोरोना से पुनः सिध्द होती है कि कोई भी व्यक्ति या चीज पूर्ण नहीं होता है । कोरोना एक बुरे भयानक सपने के रूप में हमारे आखों के भीतर समा गया हेै । लेकिन इसके बावजूद इस भयंकर बुरी बीमारी से भी कई फायदे भी हमारे देश को हुये है। जैसे पेट्रोलियम उत्पाद के मूल्यों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में आई भारी गिरावट के कारण व उसके  उपभोग में कमी के कारण उसकी खपत कम हुई है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हुई है । वाहनों के आवागमन की कमी के कारण वायु प्रदुषण में कमी के साथ-साथ सडक दुर्घटनाओं में कमी व उससे मरने वालों की संख्या में भी काफी कमी हुई है । जानवरों, पक्षियों को ज्यादा खूला स्वच्छ वातावरण मिला हैं । कार्बन आक्साईड में कमी, औधेागिक कचरे में कमी पारिवारिक संबंधों में प्रगढता व जीवन का आनन्द, बिजली,पानी की बचत सहित ‘‘ स्वच्छ भारत अभियान‘‘ को भी मजबूती मिली है । 
ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति में भी गुण दोष होते है । व्यक्तित्व पूर्ण रूप से कभी  गुणात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। यही सिध्दांत मोदी जी पर भी लागू होता है जिस कारण प्रारम्भ में समय पर आवश्यक कदम उठाने में महत्वपूर्ण चूक होने से उत्पन्न परिस्थितियों को निपटने के लिसे उन्हें समस्त आवश्यक कदम तेजी से उठाकर उक्त चूक के दुष्परिणाम को नियंत्रित किया है । वैसे हमारे देश में पूर्व में गांधी जी, नेहरू जी जेसे महान व्यक्तियों ने भी एतिहासिक भूले की है ।                 
अंत मे सरकार को कोरोना समाप्त करने के लिये उठाये जाने वाले कदमों के साथ इस बात पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि यदि सरकार ने कोरोना बीमारी के साथ साथ (बाद में नहीं) हो रही आर्थिक बदहवासी की नाकेबंदी नही की तो इसके  दुष्परिणाम जो तुरंत दिखाई न देकर चार छैः महीने बाद दिखेगें तब इस आर्थिक मंदी ब्रेक डाउन से उत्पन्न बेराजगारी, भुखमरी मानसिक तनाव व इन सबके कारण खराब होने वाली कानून  व्यवस्था के कारण ज्यादा जाने (जीवन) समाप्त होने की आशंकायें उत्पन्न हो सकती है । तब भी सरकार का जान है तो जहान है सिध्दात का उदेश्य असफल ही हो जायेगा ।
वैसे सरकार सहित हम सब नागरिकों को दक्षिण कोरिया से सबक लेने की आवश्यकता है जहां पर लाॅक डाउन किये बिना न केवल कोरोना को नियंत्रित किया गया बल्कि देश में कल आम चुनाव सम्पन्न कर पिछले 28 साल के इतिहास से सर्वाधिक वोट 62.96 प्रतिशत डाले गये जो समस्त विश्व के लिये एक दिशा ही नहीं चुनौती भी है ।

Popular Posts