रविवार, 4 अक्तूबर 2020

‘‘कारसेवक’’ क्या ‘‘अराजक’’ व ‘‘असामाजिक‘‘ तत्व थे?


अयोध्या के ‘‘विवादित ढांचा’’ ढहाए जाने के आरोप के मुकदमे का बहुप्रतीक्षित निर्णय आखिर 28 साल बाद आज आ ही गया। सीबीआई की विशेष न्यायालय ने 49 आरोपियों में से बचे समस्त 32 जीवित आरोपियों को सबूतों के अभाव में ‘‘निरापराधी’’ घोषित किया। ‘‘सम्मानित’’ आरोपियों सहित प्रायः देश ने इस निर्णय का स्वागत ही किया है।
आज जब निर्णय आने वाला था, तब मैं टीवी देख रहा था। ‘हेडलाइंस’ चालू हो गई थी। माननीय न्यायाधीश निर्णय का ’भाग’ पढ़ रहे थे। फिर एकदम से ब्रेकिंग न्यूज दिखाई गयी। समस्त 32 आरोपी निर्दोष घोषित कर बाईज्जत बरी कर दिए गए। चेहरे पर खुशी के भाव आ गये। धीरे-धीरे समाचार आगे बढ़ता है। माननीय न्यायाधीश कहते हैं, आरोपियों के विरूद्ध कोई साक्ष्य नहीं है, किसी भी आरोपी की संलिप्तता ढ़ाचा गिराने या उसके लिये लोगों का उकसाने में नहीं पायी गई। बल्कि इसके उलट कुछ आरोपियों ने तो ढांचा गिराने से रोकने का प्रयास भी किया। ‘चेहरे’ पर खुशी के भाव बढ़ते जाते हैं। जज कहते हैं, बाबरी विध्वंश की घटना अचानक हुई। पूर्व नियोजित नहीं थी। फिर आगे अचानक समाचार आता है, चूंकि ढांचा गिराया गया है, इसलिए निश्चित रूप से यह अज्ञात असामाजिक तत्वों का कार्य होगा। मुकदमें का सबसे दुखद पहलु यह है कि विशेष न्यायालय ने बचाव पक्ष के वकील द्वारा प्रस्तुत 400 पेजों की लिखित व मौखिक दलील स्वीकार कर ली, जिसमें यह कहा गया कि सांकेतिक कारसेवा के निर्देश की अवेहलना करने वाले अराजक तत्वों ने ही ढ़ाचा ढ़हाया। 
इसी दौरान मेरे पारिवारिक बुजुर्ग सेवानिवृत्त सहायक आयकर कमिश्नर जी का फोन आता है और वे मुझे बधाई देते हैं। मैं पूछता हूं, किस बात की बधाई? वे कहते हैं, सब छूट गए हैं। मैं एकदम से किंकर्तव्यविमूढ हो जाता हूं। समझ में नहीं आता है, बधाई कैसे स्वीकार करूं? ढांचे के ऊपर भगवा झंडा फहराने के बाद हुई कार सेवा के दौरान मुलायम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी से‘‘दो कोठारी‘‘ बंधु ( राम एवं शरद कोठारी) सहित  16  कारसेवक ‘‘शहीद‘‘ हो गए थे। इस कारण उत्पन्न जोश व आक्रोश ने आंदोलन को और हवा दी और तदनुसार राम जन्मभूमि आंदोलन के आयोजक कर्ताओं के आह्वान पर अपनी दृढ़ आस्था के साथ  पहुंचकर हजारों कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर उक्त विवादित ढांचे को गिराने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग दिया था। इन सब को माननीय न्यायालय ने अराजक व असामाजिक तत्व ठहराया दिया। इसलिये बधाई स्वीकार करने में हिचक थी। विश्व हिंदू परिषद से लेकर मंदिर आंदोलन के सर्मथक किसी भी नागरिक ने तथा "ढांचा" को गिराने वालों ने उक्त निर्णय की इस आधार पर आलोचना नहीं की कि ‘‘विवादित ढांचा‘‘ गिराने वाले लोग अराजक असामाजिक तत्व नहीं थे। किसी ने भी अभी तक उक्त आदेश के विरुद्ध इस मुद्दे पर अपील मे जाने की बात भी नहीं कही है। बल्कि समस्त सम्मानित आरोपित नेताओं के दोष मुक्त किए जाने से खुशी से सब लबालबाब है। सभी माननीयों के दोषमुक्त हो जाने पर ‘‘जान बची लाखों पाये’’ की खुशी में इतना डूब गये कि, हजारों कार्यकर्त्ताओं को न्यायालय द्वारा अराजक व असामाजिक ठहराये के निर्णय के भाग के किसी ने भी नोटिस (संज्ञान) नहीं लिया।
हमारा जीवन कितना खोखला है तथा छिछलापन व दोहरापन लिए हुयें है, यह उक्त निर्णय पर आयी प्रतिक्रिया से दर्शित होता है। पूरा देश जानता है! किन व्यक्तियों और संगठनों के आह्वान पर देश के राष्ट्रवादी सोच के लोग अयोध्या पहुंचे थे। मैंने भी आंदोलन में भागीदारी की थी। यद्यपि मैं अयोध्या नहीं गया था। परन्तु अयोध्या पहुंचे लोग किसी भी रूप में ’अराजकतावादी’ नहीं थे, यह देश के सामने स्पष्ट है। इसलिए उन लोगो द्वारा माननीय विशेष न्यायालय द्वारा उन लोगों के प्रति की गई उन टिप्पणी के लिए उच्च न्यायालय के दरवाजे जरूर खटखटाने चाहिए, जिनके आह्वान पर अपनी आस्था के साथ राष्ट्र के गौरव के प्रतीक भगवान श्रीराम जन्मस्थली अयोध्या में मंदिर निर्माण के वास्ते राम प्रेमी कारसेवक पहुंचे थे।
इस देश में कानून का उल्लघंन ही तो राजनैतिक आंदोलन होता है। यही नहीं ‘‘नियमानुसार कार्य करना’’ भी आंदोलन होता है। तब राजनैतिक या धार्मिक एजेंडे को लेकर किया गया श्रीराम जन्मभूमि आंदालेन के अंतर्गत अयोध्या कूच करने की योजना, निश्चित रूप से राजनैतिक/ धार्मिक कृत्य है। जहां कानून का उल्लंघन तो है, लेकिन वह अराजक तत्वों द्वारा नहीं, बल्कि राजनैतिक व धार्मिक आस्था लिये हुये व्यक्तियों द्वारा किया गया है। कानून के उल्लंघन मात्र से ही कोई व्यक्ति ‘‘अराजक’’ नही हो जाता हैं। अतः न्यायालय के उक्त अराजकता वाले निष्कर्ष को उच्च न्यायालय में चुनौती जरूर दी जानी चाहिये।

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