रविवार, 20 दिसंबर 2015

त्वरित न्यायिक सक्रियता! क्या न्यायपालिका कार्यपालिका बनते जा रही है?

भारतीय संविधान के तीन प्रमुख स्तम्भ है। विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका। संविधान में तीनों के कार्य क्षेत्र स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं तथा उन्हें सीमंाकित भी किया गया है। संविधान लागू होने के 65 साल व्यतीत हो जाने के बावजूद तीनों संस्थाएॅं समय-समय पर एक दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप करने के आरोपो के साथ साथ सर्वोच्चता के मुद्दे पर भी बहस व विवाद करते रहती है, तथा प्रथक-प्रथक रूप से दूसरी संस्थाओं के साथ सांमजस्य के साथ परस्पर मान सम्मान का ध्यान रखते हुए कार्य करते चली आ रही है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद न्यायिक सक्रियता (यह शब्द सर्व प्रथम उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती के द्वारा प्रकाश में लाया गया) के कारण न्यायपालिका ने कई बार ऐसे निर्णय दिये है जो प्रथम दृष्टया कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण प्रतीत होते हैं। लेकिन जनता के हित में होने के कारण अन्ततोगत्वा जनता ने उन निर्णयों को सर अंाखो पर रखकर स्वीकार किया है। तथापि न्यायिक क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग ने इस तरह कानून से परे जाने के आधार पर उक्त निर्णयों की आलोचना भी की हैं।
विगत तीन दिवस आये माननीय उच्चतम् न्यायालय के निर्णयों व आज उच्च न्यायालय दिल्ली के निर्भया मामले में आये निर्णय ने पुनः इस विवाद को न केवल सतह पर ला दिया बल्कि एक नया विवाद भी पैदा कर दिया। माननीय उच्चतम् न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुये उत्तरप्रदेश के लोकायुक्त की नियुक्ति स्वयं कर उत्तर प्रदेश सरकार को उसे कार्याविन्त करने के आदेश दिये है जो स्पष्टतः कार्यपालिका का कार्य होने के कारण उच्चतम न्यायलय द्वारा प्राथमिक दृष्टि में कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कहा जा सकता है। लेकिन यह निर्णय तब आया जब पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार को लोकायुक्त की नियुक्ति कंे संबंध में दिये गये निर्देश का उसने पालन नहीं किया तब उच्चतम् न्यायालय ने मजबूरी में उक्त नियुक्ति का आदेश पारित किया। इसके विपरीत लोक हित के विरूद्ध निर्भया कांड में उच्च न्यायालय द्वारा (‘‘आदेश की तारीख पर बालिग हो जाने के बावजूद चूॅकि यौन अपराध करने वाला आरोपी अपराध करते समय नाबालिग था’’) नाबालिक अभियुक्त की रिहाई को रोकने से इनकार कर दिया, चूॅंकि वैसा आदेश पारित करना कानूनन् सम्भव नहीं था। इस प्रकार यहॉं उच्च न्यायलय ने जनता की भावना के अनूरूप निर्णय नहीं दिया, जबकि पूर्व में कानूनन् सम्भव न होने के बावजूद कई ऐसे निर्णय दिये गये जो जन हित में थे। फिर चाहे वह सी.एन.जी का मामला हो, या ड़ीजल गाडी का मामला हो, या अन्य अनेक ऐसे मामले हुये हैं, जहॉ उच्चतम् न्यायालय द्वारा कानून के स्पष्ट प्रावधान न होने के बावजूद जनता की भावना के अनुसार जनहित में निर्णय दिये गये हैं। इस प्रकार न्यायालय द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में बार बार हस्तक्षेप हो रहा है, क्योकि कार्यपालिका अपने कार्य क्षेत्र में अपने दायित्वो को पूरा करने में बारम्बार असफल हो रही है। इसीलिए इस कमी की पूर्ति न्यायिक सक्रियता के मद्ेदनजर न्यायालय जन हित में दिये गये अपने निर्णयो के द्वारा करने का प्रयास कर रही है। अब समय आ गया है कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे हेतु उच्चतम संवैधानिक स्तर पर एक समिति बनाई जाय जो इस पर गंभीरता से विचार करे, ताकि भविष्य में इस तरह के निर्णय जन हित में आड़ में न आवे अन्यथा न्यायिक-सक्रियता न्यायिक आराजकता में बदल भी सकती है जिसकी कल्पना आज के शासन व न्यायिक वर्ग शायद नहीं कर पा रहे है।
अंत में लेख की समाप्ति करते करते एक संभ्रात और स्वच्छ छवि व उच्च सोच के नागरिक के समक्ष यह लेख लिख रहा था, के मुख से निकली गई बात को रेखांिकत करना आवश्यक मानता हूं, जो वास्तव में एक प्रश्न पैदा करती है ‘‘न्यायपालिका द्वारा इस तरह के आदेश जो प्राथमिक रूप से अधिनियम के दायरे के बाहर है, जनहित में होने के कारण जिन पर निर्णय वास्तव में मूल रूप से कार्यपालिका व विधायिका को लेना चाहिए था, इस कारण नहीं ले पा रहे है क्योंकि जनहित के बावजूद राजनीति का दंश उतर जाने के कारण उनके द्वारा राजनैतिक रूप से (शायद सम्भावित जन आक्रोश के कारण) निर्णय लेना संभव नहीं हो पा रहा था तो ‘‘क्या कहीं कार्यपालिका व न्यायपालिका के बीच इस हेतु कोई अलिखित गुप्त संधि तो नहीं है?’’

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

‘‘असहिष्णुता‘‘> - <‘‘सहिष्णुता‘‘,आमिर खान + मीडिया’’

  आज जिस तरह पूरे देश में चारो तरफ सहिष्णुता व असहिष्णुता पर बहस चल रही है, उसकी ‘‘गर्म हवा’’ देश की संसद के दोनो सदन तक वृहस्त चर्चा के माध्यम से पहुॅच चुकी है। ऐसा लग रहा है कि देश की समस्त समस्याओं का एक मात्र कारण व इलाज ‘असहिष्णुता’ - ‘सहिष्णुता’ है। यद्यपि बहस ‘‘असहिष्णुता’’ के नाम पर हो रही है लेकिन सहिष्णुता बताये बगैर असहिष्णुता पर बहस पूरी नहीं हो सकती है। यद्यपि असहिष्णुता पर बहस पिछले कुछ समय से खासकर बिहार चुनाव के समय से चल रही है परन्तु फिल्म उद्योग के एक बडे ‘‘आईकॉन’’ आमिर खान की अनजाने में लेकिन सोच समझकर की गई टिप्पणी जिसके द्वारा मूल रूप से उन्होने उनकी पत्नी की भावना को प्रकट किया था, पर पूरे देश में एक बवाल व भूचाल सा मच गया। आमिर द्वारा टिप्पणी बहुत सोच समझकर की गई थी यह इसलिए कह रहा हूॅ कि आमिर ने उस टिप्पणी के बाद एक एक शब्द की दुबारा पुष्टि की थी।
बवाल व भूचाल मचने के मूलतः तीन-चार कारण हो सकते है। एक तो टिप्पणी चूॅंकि आमिर खान ने की है जो देश के तीन सबसे अधिक पसंद किये जाने वाले (जो संयोग वश सभी मुस्लिम) हीरो में से एक है। सत्यमेव जयते, अतुल्य भारत जैसे कार्यक्रम को चलाये जाने के कारण वे फिल्मी आईकॉन से ज्यादा देश के आईकॉन हो गये हैं, दूसरे आमिर खान का मुस्लिम होना, तीसरा आमिर खान की पत्नी का हिन्दू होना, और चौथा बयान के समय का चुनाव। जब समाचार पत्र व इलेक्ट्रानिक मीडिया की डिबेट (बहस) के कारण देश का वातावरण सहिष्णुता व असहिष्णुता के भॅंवर में पहले से ही फंसा हुआ है, तब आम लोगो का ध्यान आमिर के बयान पर ज्यादा गया।
असहिष्णुता (या सहिष्णुता) पर चर्चा कर जो भी लोग उसका जोरदार तरीके से विरोध कर रहे है उन्हें भी इस बात की समझ ही नहीं है कि ‘‘असहिष्णुता भी कभी सार्थक हो जाती है या सहिष्णुता भी कभी घातक हो सकती है’’। वास्तव में 130 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाला देश का प्रत्येक वयस्क नागरिक जिस दिन असहिष्णु हो जायेगा, उस दिन अखंड भारत की कल्पना पूरी हो जायेगी। लेकिन हमारा देश महान भारत सहिष्णुता के मामले में किसी भी देश से श्रेष्ठ सहिष्णु है। इसके लिए हमें किसी व्यक्ति ,संस्था या अन्य देश के प्रमाण पत्र की आवश्यकता बिलकुल नहीं हैं। चौक चौराहों एवं अखबारो सहित समस्त प्रकार के मीडिया में इस संबंध में चल रही बहस क्या यह देश की जनता की सहिष्णुता नहीं दिखाता है? या मीडिया की असहिष्णुता को नहीं दर्शाता है? यह कौन तय करेगा? क्या यह तय करने की आवश्यकता नहीं है? किसी भी बात को लेकर मीडिया जिस तरह लगातार बेवजह बे-बहस चलवाती है, क्या यह मीडिया की असहिष्णुता नहीं है? देश की यथार्थ सहिष्णुता का फायदा लेकर असहिष्णुता का पाठ वास्तव में वे लोग पढाना चाह रहे है जो लोग स्वयं इससे ग्रसित है। उनको स्वयं के सहिष्णु होने की आवश्यकता है।
यह सहिष्णुता का ही परिचायक है जहॉं 130 करोड से अधिक की जनसंख्या के बीच मात्र सैकडो, हजारो लोगो की असहिष्णुता की प्रतिक्रिया आमिर खान के उक्त पुष्टि किये गये बयान के संबंध में आई, जो वास्तव में मूलतः निंदनीय है। निंदनीय इसलिए नहीं कि आमिर खान ने जो कुछ कहा वह व्यक्तिगत रूप से सही नहीं हो सकता है। लेकिन निदंनीय इसलिए कि उसको सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर मीडिया के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व के क्षेत्र में प्लेग की महामारी के समान फैला दिया, जिससे देश की बदनामी हुई है, जो कि वास्तविकता के विपरीत कोसो दूर व परे है। देश की सीमा के कुछ भाग पर हमला करने वाले तुलनात्मक रूप से आंतकवादी संगठन कम अपराधी है जिसका सटीक जवाब देकर गौरव पूर्ण रूप से हम सुरक्षित रह सकते है। लेकिन देश की सहिष्णुता के कारण ही अनजाने में ही आमिर खान का देश पर असहिष्णुता का आक्रमण वाइरल के समान विश्व में फैल गया जिसको हमें सुधारने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी व लम्बा समय भी लगेगा। वास्तव में आमिर खान को अपनी पत्नी से ही प्रेरणा लेना चाहिए जो सहिष्णु है वे इसलिये कि वे स्वयं की नजर में असहिष्णुता की भुक्त - भोगी होने के बावजूद उन्होंने अपने विचार को वाइरल नहीं किया, बल्कि पति को बताकर उनके साथ शेयर करने का प्रयास किया। यदि वे चाहती तो स्वयं ही मीडिया के माध्यम से बात कर सकती थी।
जब हम देखते है कि आम लोगो के सामने किसी व्यक्ति को मारा जाता है गोलियों से भूना जाता है, महिलाओं के साथ अश्लीलता की जाती है तथा सभी मूक दर्शक बने रहते है तब हमारी सहिष्णुता सहनशीलता ,क्या प्रशन्सनीय होती है? तब वक्त की मांग असहिष्णु होने की होती है। इसलिए आलोचक, समालोचक, लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी, और डिबेट करने-कराने वाले देश को सहिष्णु व असहिष्णु अलग अलग खानो में या मत में न बंाटे, बल्कि नागरिको को सिर्फ इस बात की प्रेरणा दे कि वक्त पर वक्त की मांग के अनुसार सही रूप से सहिष्णु - असहिष्णु रहे, तभी हमारा उद्धार होगा। देश का उद्धार होगा।
फिल्मी कलाकार आमिर को इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए कि सेक्स परदेे के अंदर ही मान्य है। उसी प्रकार उनके या उनके परिवार के आहत विचार जिसके आहत होने का कोई सीधा या परोक्ष कारण देश की सरकार से नहीं है तब उन्होंने देश के आन बान सम्मान पर किसी दूसरे व्यक्ति को प्रश्न् चिन्ह लगाने का अवसर (अनजाने में ही सही) क्यों प्रदान किया? अन्ततः आमिर की पत्नी को कब महसूस हुआ कि ‘असहिष्णुता’ के कारण उनके जीवन पर संकट आया है? पूर्व में आमिर ने स्वतः देश व मोदी के नेतृत्व की तारीफ की थी तो फिर अचानक क्या घट गया कि पत्नी किरण राव के बहाने उन्हे देश का वातावरण इतना असहिष्णु महसूस होने लगा कि वे विदेश में स्थानांतरण की बात करने लगे। ऐसी कौन सी घटना उनकी पत्नी व उनके परिवार के साथ घटित हुई जिस कारण उनमें उक्त भावना उत्पन्न हुई? क्या आमिर खान यह बताने का कष्ट करेगे की उनकी फिल्म से रूष्ट होकर जनता ने कभी उनके परिवार को घमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलायेगे कि उनके किस पड़ोसी ने धमकी दी? क्या आमिर खान यह बतलाने का प्रयास करेगे कि उनसे किस डॉन ने पैसे वसूली की मांग की जिस कारण उक्त भावना उत्पन्न हुई? इस संबंध में क्या उन्होने कोई प्रथम सूचना पत्र जान के खतरे के रूप में दर्ज कराई? यदि यह सब नहीं हुआ है तो ऐसेे में आमिर खान व पत्नी को बताना ही होगा कि पिछले आठ महीनों में ऐसी कौन सी घटना हुई है जिसके कारण 130 करोड के देश में अन्य नागरिको के मन में आमिर की पत्नी किरण राव के मन में वह विचार आया व दहशत की भावना उत्पन्न हो गई जो 130 करोड़ नागरिको के दिल में उत्पन्न न हो सकी जबकि आमिर की तुलना में आम नागरिको को वैसा सुरक्षा तंत्र तथा आईकॉन के पावर के दम पर उपलब्ध सुरक्षा शक्ति प्राप्त नहीं थी जिस कारण आम नागरिको को तो आमिर खान से ज्यादा डरना चाहिए था।
अन्त में आमिर को देशद्रोही कहना ज्यादती होगा लेकिन उनके द्वारा की गई हरकतों से देश को जो नुकसान हुआ है व देश की छवि का जो ह्रास हुआ है वह किसी देशद्रोही द्वारा की गई कार्यवाही से कम नहीं है।  

सोमवार, 23 नवंबर 2015

‘‘बिहार चुनाव से निकले संकेत’’ ‘‘कई मानो में अभूतपूर्व व महत्वपूर्ण ’’

1).     चुनावी पूर्व सर्वेक्षण और एक्जिट पोल पहले की तरह बुरी तरह से फ्लाप और लगभग विपरीत रहे। लेकिन इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया में चुनावी विश्लेषण के दौरान बढत व घटत बताते समय पहली बार यह घटित हुआ कि प्रथम डेढ घंटे में जिस तरह से एनडीए को दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ना बताया गया और तदनुसार उसका औचित्य व कारणों की समीक्षा भी की जाने लगी। लेकिन शाम होते होते सम्पूर्ण परिणाम आने तक परिस्थितियॉं एकदम बदलकर परिणाम विपरीत हो गये। इस कारण सुबह के प्रारंभिक तर्को को बेमानी ठहराकर उन्हीं व्यक्तियों द्वारा अब विपरीत तर्क दिए जाने तथा परिणाम को ठीक बताने के प्रयास किये गये। शायद इसीलिए कहा गया है कि ‘‘जो जीते वही सिकंदर ...........’’ 
2).     ‘‘भाजपा की धरोहर अटल, आडवाणी एवं मुरली मनोहर के नेतृत्व ने जहांॅ पार्टी को 2 से 120 तक पहंॅुचाया और नरेन्द्र मोदी को प्रारंभिक दिनों की राजनीति में मजबूती प्रदान की। परन्तु प्रधानमंत्री पद पर मोदी के सत्ताशीन होने के बाद जिस तरह से इन तीनो नेताओं को (अटल जी की अस्वस्थ्यता के कारण) साइडलाईन किया उसी का फल आडवाणी जी के जन्म दिवस के अवसर पर उक्त चुनाव परिणाम के रूप में मिला’’ ..............ऐसा कुछ व्यंगकारो ने कथन किया है?
3).     लालू प्रसाद यादव एक घोषित सजायाफ्ता अपराधी है एवं अन्य कई भ्रष्टाचार के प्रकरणों में अभियोगी भी है। उनके एक ईमानदार, स्वस्थ्य छवि, व विकास पुरूष कहलाने वाले नीतीश कुमार के साथ मिलने के जो परिणाम आये हैं वे इस तथ्य को पुनः रेखांकित करते है कि यदि सही व्यक्ति गलत व्यक्ति का साथ लेगा तो उसका नुकसान होगा और गलत व्यक्ति द्वारा सही व्यक्ति का सहारा लेने पर फायदा होगा। साथ ही परस्पर लड़ने के बजाय यदि एकत्रित होकर चुनाव लडा जाय तो उसमें विजयी होने की सम्भावना ज्यादा रहेगी। जैसा कि पिछले चुनाव की अपेक्षा 8.31 प्रतिशत ज्यादा वोट मिलने के बावजूद दो विपरीत ध्रुवों वाले ‘‘महागठबंधन’’ के सामने ‘‘भाजपा’’ को हार का सामना करना पडा। 
4).      यह चुनाव दो तरह के विपरीत संकेत एक साथ इंगित करता है जो चुनाव प्रणाली की कमी को दर्षाता है। जहॉ स्पष्टतः सीटों की संख्या की दृष्टि से भाजपा की भारी हार परिलक्षित होती है वहीं पर वोटो की संख्या की दृष्टि से भाजपा की भारी जीत प्रतीत होती है। वह इस अर्थ में कि भाजपा ने सत्ता से बाहर रहने के बावजूद पिछले चुनाव की अपेक्षा इस चुनाव में 8.31 प्रतिषत अधिक वोट प्राप्त किये जो भाजपा के पक्ष में परिर्वतन के वोट कहे जा सकते है। 
5).     यह चुनाव इस बात को भी इंगित करता है कि यदि आपको अपनी जीत सुनिष्चित करना है व उसमें निरंतरता बनाये रखना है, तो आपकी जीत का आधार आप की स्वयं की मजबूत नींव ही हो सकती है। दूसरे की कमजोर पिच को अपनी जीत का आधार मानने से विरोधी की कमजोर पिच के सुधर जाने की स्थिति में आप विजय से दूर होते जायेगे क्योकि आप की स्वयं की पिच मजबूत नहीं है।  
6).      भाजपा के मार्गदर्षक मंडल ने चुनाव परिणाम पर जो साझा बयान जारी किया वह भी इस चुनाव के तथ्यों से मेल नहीं खाता है क्योकि भाजपा हारी नहीं है, बल्कि सीटों के आंकडों की लड़ाई में विपक्ष अवष्य जीत गया हैं। भाजपा में किसी एक व्यक्ति के जिम्मेदारी स्वीकार करने की परंपरा भी नहीं रही है। जनसंघ से लेकर भाजपा तक व अन्य समस्त पार्टियां (सिवाय कम्यूनिष्टों के) में यह प्रथा कभी नहीं रही। अभी तक भारतीय राजनीति का यह मान्य स्वीकृत सिद्धान्त रहा है कि जीत का श्रेय मुखिया को एवं हार पर अपयष का भार सामूहिक नेतृत्व को दिया जाता है। दूसरी बात ‘‘जंॉच कमेटी में वे लोग नहीं होने चाहिए जो नीतिकार व भागीदार रहे’’ यह भी गलत है। क्योकि एक बहुत अच्छा क्रिकेट खिलाडी भी जो बहुत समय तक खेल से दूर रहा हा उसे यदि एकाएक अम्पायर बना दिया जाये तो वह भी एक अच्छा अम्पायर साबित नहीं हो पाता है। बिहार में यदि पार्टी की हार व तथ्यों सही का पता लगाना है तो उन लोगो को भी शामिल किया जाना आवष्यक है जो नीतिकार व भागीदार थे तभी इस पर सम्पूर्ण सार्थक चर्चा हो सकेगी। कोैन सी नीति सही थी कौन सी नीति गलत थी, व निर्धारित नीतियो का कितना पालन किया जा सका इन सब तथ्यों का विष्लेषण चुनावों में शामिल लोगों के साथ मिलकर ही किया जा सकता है। 

7).     किसी भी भारतीय फिल्म की सफलता केवल हीरो पर निर्भर नहीं होती वरण उसमें विलेन का होना भी आवश्यक होता है। ठीक इसी प्रकार महागठबंधन में नीतीश हीरो के साथ लालू जैसा सशक्त विलेन भी था। जबकि भाजपा में केवल मोदी जी ही हीरो थे जिनका भाजपा ने इस प्रकार दुरूपयोग किया कि अन्जाने में वे हीरो न रहकर विलेन के रूप में प्रस्तुत करा दिये गए। चंूॅंकि (अ) उन्हे नीतीश से नहीं लालू से ज्यादा (ताष के खेल में हुकुम के इक्के का सामान्य दुर्री की काट के लिए दुरूपयोग तुल्य) मुखातिब होना पडा तथा (ब़) भाजपा ने अपना हीरो (होने वाला मुख्यमंत्री) घोषित ही नहीं किया था। 
8).     स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार शायद देश के प्रधानमंत्री ने केवल एक राज्य में 30 से अधिक चुनावी सभाएंॅ की हैं।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2015

सर संघचालक मोहन भागवत जी को शत्-शत् नमन्

Photo: www.india.com
राजीव खण्डेलवाल:
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पिछले समस्त सर संघचालको से अलग अपनी विशिष्ट भूमिका वहन करने वाले सर संघचालक माननीय मोहनराव जी भागवत का पांचजन्य/आर्गनाइजर को विगत समय दिए गए विशेष साक्षात्कार ने देश में एक नया भूचाल पैदा कर दिया है। ऐसे साक्षात्कार की उम्मीद सिर्फ दृढ़, साहसी, और निरतंर राष्ट्र के लिये सोचने वाले व्यक्ति से ही की जा सकती हैं। इस पर जिस तरह की प्रक्रिया देश के विभिन्न अचंलो से आ रही है वह वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुये स्वाभाविक ही हैं। आरक्षण के जमे हुये बर्फ को पिघलाने के लिये व आरक्षण के संबंध में वर्तमान संवैधानिक, राजनैतिक, व सामाजिक स्थिति कोे तोडनें के लिए ऐसे साहस पूर्ण विचारो के आघात की प्रबल आवश्यकता थी, जो माननीय भागवत जी ने ‘‘आरक्षण’’ पर अपने बेबाक विचार व्यक्त कर परिपूर्ति कर दी।
जब देश में संविधान सभा में डॉ भीमराव आम्बेडकर के द्वारा ‘‘आरक्षण’’ का प्रस्ताव लाया गया था तब उनका यह स्पष्ट मत था कि देश के कुचलित, अविकसित अत्यधिक पिछडे, कमजोर, अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्गांे के उत्थान के लिए एक ऐसी आरक्षंण व्यवस्था किया जाना अत्यन्त आवश्यक है जो अन्य सुदृढ़, मजबूत, विकसित एवं विकासशील वर्गों के मुकाबले ठहर सकने योग्य उनके आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिये अस्थायी व्यवस्था बन सके। इस प्रकार प्रारंभ में ही संविधान में आरक्षण की यह अस्थायी व्यवस्था किये जाने के साथ ही, निर्धारित समयावधि में अपेक्षित उद्वेश्य की पूर्ति न हो पाने की दशा में, दस - दस वर्षो के लिए आरक्षण बढाये जाने का प्रावधान किया गया था। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आरक्षण की समयावधि की समीक्षा का प्रावधान आरक्षण को संविधान में प्रावधित करते समय ही कर दिया गया था। भागवत जी ने उक्त विशेष साक्षात्कार में कहीं यह नहीं कहा कि आरक्षण समाप्त होना चाहिए। उन्होनें सिर्फ इतना ही कहा कि जिस उद्धेश्य के लिए पिछले 65 साल से आरक्षण की नीति लागू की गई है उसका कितना प्रभाव, कितना, यर्थाथ फायदा उन (कुचले) वर्गो को मिल सका है, उसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
                              इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है खासकर मंडल आयोग कि सिफारिश लागू होने के बाद जो आरक्षण की नीति अपनाई गई व लागू की है उसके तहत सिर्फ और सिर्फ वोटो की राजनीति के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था को समय - समय पर बढाया गया। इसके परिणाम स्वरूप कालान्तर में एक दिन ऐसा आ जाता जब आरक्षित वर्ग , अनारक्षित वर्ग से अधिक हो जाता। भला हो माननीय उच्चतम् न्यायालय का जिसने आरक्षण की सीमा को अधिकतम 50 प्रतिशत पर सीमित कर दिया। राजस्थान में जाटो को आरक्षण देकर कुल आरक्षण लगभग 68 प्रतिशत (उच्चतम् न्यायालय द्वारा घोषित सीमा से अधिक) कर दिया गया जो न केवल गैर संवैधानिक है वरण राजनीति के दिवालियापन का बेशरम उदाहरण भी है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि वोटो के लिए आरक्षण की ऐसी राजनीति के चलते कालान्तर में आरक्षण की सीमा 70 से 80 प्रतिशत हो जाती तथा एक दिन ऐसा आता जब गैर आरक्षित वर्गों के लिए कुछ भी नहीं बचता ,और तब आरक्षण की मूलभूत भावना की हत्या ही हो जाती। इसलिए यदि सर संघचालक जी ने आज की राजनीति से प्रभावित हुये बिना देश में आरक्षण की समीक्षा पर बल दिया है तो यह पैमाना उन सब राष्ट्रवादी नागरिको के लिए है जो राष्ट्रवादी देश भक्त होते हुये भी तथाकथित वोटो के प्रलोभन के लिए जाने अनजाने में आरक्षण की उस नीति का समर्थन कर रहे है, जिससे देश और समाज अंततः विघटन की ओर चला जायेगा। आज उन शूर ,वीर, साहसी नेताओं की आवश्यकता है जो जनता के बीच आगे आकर आरक्षण को समाप्त या बढाने जाने के विपरीत उसकी वर्तमान में कितनी प्रासंगिकता है, किस सीमा तक है, कब तक है, यदि इस दृष्टि सेे विचार करंेगे तो निश्चत रूप से देश को मजबूत बनाये रखने में महत्वपर्ण योगदान देगें। देश के एक राज्य गुजरात में पटेलो द्वारा आरक्षण की मांग पर पटेलो के नेता हार्दिक पटेल का यह रूख कि हमें भी आरक्षण दो या समाप्त करो। इसका मतलब साफ है कि आरक्षण का दायरा इतना विशाल और जातिगत होता जा रहा है तथा जिस मूल आर्थिक कारणों के कारण समूह विशेष को दुर्बल व कमजोर व अविकसित पाकर आरक्षण प्रदान किया गया है उसी कारण से अब सामान्य जाति का व्यक्ति भी आरक्षण की मांग कर रहा है। 
                              आरक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू क्रिमीलेयर भी जिस पर भी विचार किया जाना आवश्यक है आरक्षण के कारण आरक्षित जातियों के उन सक्षम वर्गो द्वारा आरक्षण का फायदा उठाया गया है जिसे क्रिमीलीयर कहते है। उन सक्षम वर्गो को आरक्षण का फायदा अब आगे क्यो मिलना चाहिए, इस पर समस्त बुद्धिजीवी का भी मुह बंद है। इतिहास में यह अवसर बार बार नहीं आता। आरक्षण के लाभ से दरकिनार किये गये शेष बचे वर्गाे को यदि आरक्षण का फायदा दिया जायेगा तो आरक्षित असमानता की जो दूरी बढ रही है वह कम होती जायेगी। अतः यह आवश्यक है कि आरक्षण पर देश में गंभीर विचार हो तथा उसे एक निश्चित दिशा तक ले जाने का प्रयास हो ताकि व्यक्ति का स्वयं का भला हो, और समाज का भला हो। 
                              मेरे विचार में देश के दबे, कुचले,कमजोर एवं अक्षम वर्गों के लिए आरक्षण का औचित्य तो सदैव था, है और रहेगां चॅूकि प्रत्येक जाति में सक्षम एवं अक्षम आरक्षित वर्ग सदैव रहते आये है तथा रहेगे भी। जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था से जाति का अक्षम वर्ग तो पहुॅच बनाने में सफल नहीं हो पाता और वह कमजोर ही बना रह जाता है। परन्तु आरक्षण का आधार लेकर आरक्षित जातियों के सक्षम अयोग्य वर्ग (क्रिमीलेयर) भी हर सम्भव लाभ प्राप्त करते रहते है। दूसरी ओर अनारक्षित जातियों के कमजोर एवं अक्षम वर्गो के सर्वथा योग्य व्यक्ति अपना औचित्य पूर्ण हिस्सा प्राप्त करने से वंचित हो जाते है। अतः समाज एवं न्याय के हित में आरक्षण की व्यवस्था का आधार जाति न होकर केवल और केवल व्यक्ति का पिछडा पन यानी आर्थिक आधार पर अक्षमता होना चाहिए जिसके तहत देश में सम्पूर्ण समाज को समग्रता में लाभ मिल सके तथा जाति के नाम पर आरक्षण के तहत क्रीमीलेयर के जो अयोग्य व्यक्ति अभी अनुचित लाभ प्राप्त करते जा रहे हैं उन पर लगाम लग सके। यानी समग्रता में बराबरी से सबको औचित्यानुसार एवं न्यायपूर्ण लाभ के अवसर प्राप्त हों तथा सबका बराबर विकास हो सके।
                              अतः मेरा पुनः मोहन भागवत जी को विकट विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह मुद्वा उठा कर अपने अत्यंत संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित विचार व्यक्त कर समाज का यथोचित संदेश देने के लिये साधूवाद एवं नमन्। 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

नावेद का जिंदा पकड़ना सफलता? या भारतीय राजनीति की पैतरेबाजी को देखते हुये अपशकुन!

                    पंजाब के गुरूदासपुर में हाल में हुई आंतकवादी घटना में पंजाब पुलिस, अर्ध सैनिक बल, व भारतीय सेना ने दीनानगर थाने पर हुये आतंकवादी हमले को सफलतापूर्वक विफल कर दिया। न केवल एक आतंकवादी को मार डाला गया बल्कि दूसरे आतंकवादी नावेद को जिंदा पकडने में भी सफलता प्राप्त की। यद्यपि इसमें एस पी (खुफिया) बलजीत सिंह ,भारतीय पुलिसकर्मी व तीन नागरिक सहित सात लोग भी शहीद हुये। सैनिक-अर्ध सैनिक क्षेत्रो से लेकर सार्वजनिक जीवन के कुछ क्षेत्रो में एक आतंकवादी को जिंदा पकडने पर खुशी भी जाहिर की गई। यह माना गया कि ‘‘आंतकवादी घटनाओं में पाकिस्तान के हाथ लगातार सने हुये है’’ यह सिद्ध करने के सबूतों की कड़ी में नावेद एक महत्वपूर्ण साक्ष्य सिद्ध होगी, यहॉं तक तो बात ठीक लगती है।
                    यदि सिक्के को पलटकर देखे और तदनुसार भारतीय राजनीति के दूसरे पहलू को देखा जाएॅ तो बहुत से नागरिकों के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से कौंधता है कि क्या आंतकवादी नावेद का जीवित रहना भारतीय लोकतंात्रिक राजनैतिक परिवेश व वर्तमान परिस्थतियो के प्रसंग में उचित है? उसे भी हमले में क्यो नहीं मार डाला गया? देश हित में यह प्रश्न उठना जायज भी है। 22 साल पहले मुंबई में हुये सीरियल बम ब्लास्ट वाले मामले में अभी हाल ही में मात्र एक अपराधी याकूब मेमन को ही फंासी पर लटकाया जा सका व शेष अभियुक्तो की फांसी की सजा को बदल दिया गया। इसके बावजूद भी इस देश के लोकतंत्र के प्रहरी माने जाने वाले देश प्रेमी बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर कुछ राजनैतिक पार्टियांे के नेताओं व सार्वजनिक जीवन के सम्माननीय गणमान्य नागरिक गण तथा कला व अन्य क्षेत्रों के कुछ ‘‘कोहिनूरों’’ ने उसकी फंासी केा मानवता व धर्म जाति के आधार जैसे विभिन्न कारणों पर उसे क्षमा प्रदान कर सजा बदलने की अपील उच्चतम् न्यायालय से लेकर राज्यपाल व राष्ट्रपति तक से की थी। उक्त प्रकरण में स्वाधीन भारत के इतिहास में पहली बार फंासी दिये जाने के दो धंटे पूर्व तक देश की सबसे बडी अदालत देश की न्याय प्रक्रिया को अपना कर ‘न्याय’ देने के लिए विशेष रूप से बैठी। अंततः पूर्व में दिये गये निर्णय की ही पुष्टी की गई। इस पर कुछ लोगो ने लोकतंत्र की विचार व बोलने की आजादी की उदारता का अनुचित रूप से फायदा लेते हुये उस ‘न्याय’ को ‘अन्याय’ ठहराने की बेगैरत जुर्रत की।
                    लोकतंत्र बनने के बाद से लगातार पिछले 68 वर्षो में देश में कानून की स्थिति भी ऐसी बनावटी बनाकर रख दी हैै और हर क्षेत्र एवं स्तर पर भ्रष्टाचार इस कदर व्याप गया है जिसमें (1) न्याय मिलने में अत्यधिक समय लगता है। (2)पहॅुच /पैसे/दंबगई /आतंकवाद वाले आरोपी पर अपराध साबित करना दिन में तारे गिनने जैसा होता है। (3). अपराधी साबित हो जाने के बाद भी (क) विभिन्न न्यायलय/राज्यपाल/राष्ट्रपति आदि के पास पुनः पुनः प्रकरण चलता रहता है (ख) जेल में रहकर भी पसन्द का खाना, पीना ,पहनना तथा वहीं से अपनी पसन्दगी का व्यापार /धन्धा/राजनीति व षड़यंत्र चलाये जा सकते हैं। ऐसे में नावेद जैसे आरोपियो पर अपराध सिद्ध करने तक देश के न्याय तंत्र का समय एवं धन खर्च करना क्या व्यर्थ नहीं होगा? 
अन्तर्मन को यह बात कचोटती है कि ‘‘ऐसी राजनीति के चलते करोडो रूपये आतंकवादी के खाने, पीने व सुरक्षा आदि पर खर्च कर सरकार ,न्यायपालिका, और पूरे न्यायिक तंत्र का महत्वपूर्ण समय लगा कर पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया अपना कर ,जब आतंकवादी (नावेद) को फंासी का दण्ड़ सुनाया जायेगा तब फिर पुनः देश के ही तथाकथित बुद्धिजीवी नागरिक मानवता के नाम पर आगे आकर राष्ट्रपति से लेकर उच्चतम् न्यायालय तक से वैसे ही क्षमा माफी की याचना नहीं करेगे जैसा कि मेमन के मामले में उनके द्वारा असफल प्रयास किया गया था, इस बात की क्या कोई ग्यारंटी दे सकता है? लेकिन इन दयावान बुद्विजीवी वीर व्यक्तियो के मन में कमी यह भाव नहीं आया कि वे आतंकवादी तथा अपने देश के विरोधी निर्णीत घोषित अपराधी से भी ‘‘शहीद हुये सैनिको’’ की जिंदगी भी वापस दिलाने के लिए भी अपील करते। कुत्ते की पूॅछ को कितना ही सीधा करने का प्रयास किया जाय वह जस की तस बनी रहती है, कभी भी सीधी नहीं होती है। उसी के समान वर्तमान में भारतीय राजनीति की भी वही गति है। इस लिए युद्ध लडने वाले सैनिको को आगे से सदैव इस बात का कूटनीतिक ध्यान रखना होगा कि किसी भी आतंकवादी घटना में आतंकवादी को मार डालने के बजाय उससे गुप्त जानकारी प्राप्त करने की उम्मीद में यदि वे उसे जिंदा पकडते है तो वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिवेश में निराकरण तक होने वाला न्याय हम भारतीयों के सीने में अपेक्षाकृत ज्यादा कष्ट दायक होगा। खासकर नौजवानो के दिल में , क्योकि बाद में वही कहानी दुहराई जा सकती है। कुछ लोग मेरे विचारो से मत भिन्नता अवश्य रखते होगे ,लेकिन उन सब विचारो का समर्थन करने के बावजूद भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति को देखते हुए मैं अपने विचारो पर अड़िग हूॅ। 
                    ‘‘भले ही सौ अपराधी बच निकलंे परन्तु एक भी निरपराध को सजा न हो’’ ऐसी कानूनी व्याख्या के कारण अपराधी का दोष सिद्ध करना वैसे ही मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में बमुश्किल फंासी की सजा प्राप्त व्यक्ति उपरोक्त परिस्थितियों का लाभ लेकर फंासी की सजा को बदलवा लेगा यह उचित आशंका ही इस लेख की उत्पत्ति का कारक है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

‘‘व्यापमं’’कांड कितना व्यापक!

(सी.बी.आई की जॉच का निर्णय प्रदेश शासन के अधिकार क्षेत्र में?) 
                  
                पिछले दिनो ''आज तक'' न्यूज चेनल के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की मौत व जबलपुर के मेडीकल कॅालेज के डीन डॉ अरूण शर्मा की मौत के बाद व्यापमं प्रकरण अखिल भारतीय मुद्दा बनते जा रहा है। वर्ष 2007 में प्रथम बार व्यापमं के घोटाले की जानकारी सामने आयी। यद्यपि यह कहा गया है कि वर्ष 2004 के बाद से ही यह घोटाला चला आ रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति से अभी तक देश के इतिहास के पन्नो में हजारो घोटाले कांड दर्ज हुए जिनमें लाखो करोडो रूपये का लेन देन हो चुका जिसमें कुछ कांडो में जनहानि भी हुई है। लेकिन व्यापमं घोटाला इस मामले में अपनी तरह का ऐसा अलग मामला है जो न केवल मध्य प्रदेश व भारत में बल्कि विदेश में भी अभी तक ऐसा भीषण कांड नहीं हुआ है। इसमें हजारो करोडां़े रूपये से लेकर 47 से अधिक संदेहास्पाद मृत्यु हो चुकी हैं। मध्य प्रदेश का व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) प्रदेश के अंदर विभिन्न प्रवेश परीक्षा के आयोजन के साथ साथ विभिन्न पदो पर नौकरियों की भर्ती के लिए भी परीक्षा आयोजित करते चला आ रहा है। जिस तरह से व्यापमं कांड की परतंे दिन प्रतिदिन ख्ुालते जा रही है और अभी तक भी जितनी जॉच हुई हैं (जबकि अभी तक मात्र 20 प्रतिशत से कम जॉच हो पाई है ) उनसे व्यापमं की सभी परीक्षाओ पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि व्यापमं के इतने व्यापक कांड में अभी तक दो हजार से अधिक आरोपियो के विरूद्ध चालान प्रस्तुत किए जा चुके है तथा अन्य 500 से अधिक के विरूद्ध जॉच विचाराधीन हैं। बहुत से आरोपी फरार हैं। यदि जंॉच का दायरा बढाया गया तो इस दृष्टि से यह देश का सबसे अनोखा और अकेला कांड है जो पैसो की दृष्टि से नहीं बल्कि आरापियो की संख्या की दृष्टि से भी सबसे बडा कांड कहा जा सकता है। 
दूसरे इस कांड में देश के इतिहास में पहली बार राज्य के पदासीन गवर्नर पर एफ आई आर तक दर्ज हो चुकी है। इस कारण भी यह अनोखा कांड बन गया है जिसमें प्रथम सूचना पत्र दर्ज होने के बावजूद भी महामहिम राज्यपाल को इस्तीफा नहीं देना पड़ा और न ही उन्होनें जरूरत समझी। यू पी ए सरकार द्वारा नियुक्त पूर्व  गवर्नर से न तो भाजपा नेताओं ने इस्तीफा लेने की जरूरत समझी, न ही मांग की, और न ही केन्द्र की भाजपा सरकार ने उन्हे पद से हटाया। वह भी इस तथ्य के बावजूद कि राजनैतिक रूप से अन्य कांग्रेसी गर्वनरों को पद से हटने के लिये या तो उन्हे मजबूर किया या उन्हे स्थानांतरित कर हटाया गया। तीसरे इस कांड का महत्वपूर्ण व दर्दनाक पहलू यह है कि वे दो हजार परीक्षार्थी जो व्यापमं की परीक्षा में बैठे थे वे अबोध (इनोसेन्स) अपराधी है जिन्हें आदतन अपराधी के समान जेल में बंद किया गया तथा अधिकांश मामले में उच्च न्यायालय द्वारा जमानत नहीं दी जा रही है। इसके विपरीत व्यापमं को आधार बनाकर बदले में आर्थिक लाभ पाने के उद्ेदश्य से जो लोग काम कर रहे हैं, वे व्यापमं के संक्षम अधिकारी हैं तथा उनको संरक्षण और बढावा देने वाले उनसे फायदा लेने वाले अन्य कई सरकारी आई ए एस अफसर ,उनके बडे अधिकरी एवं प्रदेश के मंत्री, व नेताओं के नाम आने के बावजूद ,उन सब पर वैसी आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा रही है। (मात्र कुछ को छोड़कर) अपना जीवन प्रारंभ करने वाले विद्यार्थीगण जो अपने भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए शार्ट कट रास्ता अपनाने की मनसा के कारण उक्त कांड के भागीदार आरोपी बन गये है। इस कांड में सबसे बडा खेल जॉच एजेंसिया कर रही है जो दलालो के फोन रिकार्ड कर उन सब विद्याथियों से भी धन वसूली कर रही है जो न तो परीक्षा में बैठे है और न जिन्होने कोई लाभ ही प्राप्त किया।
              अब तक की घटना से यह बात सिद्ध होती है कि उक्त कांड में जो प्रभावशाली व्यक्तिगण हैं ,चाहे वे अफसर या राजनेता हो या न्याय क्षेत्र से जुडे व्यक्ति हो जिन पर भी उगलियॉं उठी है उनकी जॉच म.प्र.शासन द्वारा गठित एस टी एफ या एस आई टी से किया जाना मुनासिब व सफलता पूर्वक संभव नहीं है। यद्यपि उक्त जॉच की निगरानी उच्च न्यायालय द्वारा की जा रही है। वास्तव में यह इतना बडा कांड है जिसकी जॉच सी बी आई से भी हो पायेगी यह भी संदेहास्पद है। मुख्यमंत्री का यह कथन कि यदि माननीय उच्च न्यायालय म.प्र.शासन के विरूद्ध कोई भी जॉच सी बी आई से कराना चाहते है तो वे तैयार है। इसके लिये वे यदि उच्च न्यायालय से कहेंगे तो वह भी उच्च न्यायालय की अवमानना के समान होगा। उनका यह कथन बिलकुल गलत है। इसके लिए उच्च न्यायालय के आदेश की आवश्यकता या अनुमति बिलकुल जरूरी नहीं है। जॉच का अधिकार प्रदेश शासन को है तदनुसार मुख्यमंत्री स्वयं यह जॉच करा सकते है। इसके पूर्व कितनी सी बी आई जॉच के लिए उच्च न्यायालय से अनुमति ली गई? अभी तक हाई कोर्ट ने सी बी आई जॉच के मध्यप्रदेश शासन के अधिकार पर किसी प्रकार की रोक अपने पूर्व आदेशो में जिसमें अन्य आवेदको के सी बी आई की जॉच की मांग को निरस्त करते समय नहीं लगाई है। वास्तव में इसकी तभी सही जॉच हो पायेगी जब उच्चतम् न्यायालय के न्यायधीश के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग का गठन किया जाकर जॉच करेगी तभी इस व्यापमं गेट कांड की गठाने खुल पायेगी। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इस केस में मीडिया द्वारा अभी तक अपेक्षित तवज्जों नहीं दी गई। जब उनके एक साथी की असामयिक मृत्यु हुई तभी मीडिया कार्यशील हुआ। अक्षय सिंह की मृत्यु के पूर्व 44 मौते होने के बावजूद भी मीडिया ने अपेक्षित संज्ञान नहीं लिया। क्या मीडिया अपनी इस गैर जिम्मेदारी सेे इंकार कर सकता है?

                        (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)  


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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

‘‘आचार संहिता‘‘ का विदेश मंत्री द्वारा कितना उल्लघन! कितना सच?


     पिछले लगभग बीस दिनो से आई पी एल के पूर्व कमिश्नर ,खेल प्रशासक ,उधोगपति ललित मोदी के संबध में ललित गेट स्केडल (कांड) की भागवत कथा लगातार न्यूज चेनल्स व समाचार पत्रों में आ रही है। खासकर ‘‘टाईम्स नाऊ’’ न्यूज चेनल्स ने ललित गेट काड़ में कुछ अनछुये पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया है। लेकिन कई बार अति उत्साह में जो गलती व्यक्ति से हो जाती है ,अर्नब गोस्वामी ‘‘मुख्य संपादक टाईम्स नाऊ’’ भी वही गलती कर रहे है। जिस प्रकार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अति उत्साह में ललित मोदी (भगोड़ा) की सहायता को मानवीय संवेदनाओं का रूप देने का प्रयास किया, वही गलती अर्नब गोस्वामी ने ललित गेट कांड में सुषमा स्वराज पर आचार संहिता (कोड़ ऑफ कंडक्ट) के उल्ल्घन का आरोप लगा कर किया। 
    कल दोपहर से ललित मोदी के पिता के के मोदी जो कि इंडोफिल कंपनी के सी एम डी है से ‘‘टाईम्स नाऊ‘‘ के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी की टेलीफोन पर हुई बातचीत में जैसे ही के के मोदी ने यह कहा कि सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल को वकील की हैसियत से कंपनी द्वारा भुगतान किया गया है, वे कंपनी के रिटेनर की हैसियत से वकील हो सकते है। वैसे ही अर्नब गोस्वामी द्वारा ‘‘टाईम्स नाऊ’’ में ब्रेकिग न्यूज के रूप में यह न्यूज चलाई जाने लगी कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल को मोदी की कंपनी के द्वारा फीस का भुगतान होने के कारण कंपनी के पे रोल पर होने से इस तथ्य की जानकारी क्या सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को दी गई थी। यदि हांॅ तो प्रधानमंत्री इसका जवाब दंे। यदि नहीं तो सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को यह जानकारी न देना क्या उनके द्वारा कोड ऑफ कंडक्ट के नियम का घोर उल्लघंन नहीं है? यह प्रश्न  अर्नब गोस्वामी की कार्यशैली पर ही प्रश्न उत्पन्न करता है। विवेचना के इसी बिंदु पर आगे चर्चा की जा रही है। 
     ललित गेट के सुषमा स्वराज से लेकर वसंुधरा राजे तक के विभिन्न पहलुओं व मुद्देा की विवेचना पर न जाकर ,अभी मै मात्र अर्नब गोस्वामी के उक्त स्टेण्ड पर सबका ध्यान आकर्षित  करना चाहता हूॅ। वास्तव में स्वराज कौशल को मिली फीस की राशी की जानकारी उनके पति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को न देना आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) का बिलकुल उल्लंघन नहीं है। ‘संघ’ ‘राज्य’ व केन्द्र प्रशासित राज्यो के मंत्रियों के लिए कोड़ ऑफ कंडक्ट का कोई कानून या लिखित नियम नहीं है। बल्कि यह केन्द्रीय सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र है जो भारतीय संविधान व जन प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 के अलावा मंत्रियों 
के आचरण के संबंध मे जारी किया गया मात्र दिशा निर्देश भर है जो नैतिक बल तो रखता है परन्तु कानून नहीं। उक्त परिपत्र के अनुछेद 3(2) केा यदि सावधानी पूर्वक पढ़ा जाय तो उसके अनुसार केन्द्रीय मंत्री ,राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री  एवं अन्य मंत्री या उन पर ‘‘निर्भर व्यक्ति’’(डिपेन्डेंट) भारत में या विदेश में कोई विदेशी सरकार के संगठन में रोजगार को प्रधानमंत्री की पूर्व अनुमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकते है। ़(जहॉ) वे पत्नी या मंत्री पर निर्भर व्यक्ति पूर्व से ही रोजगार में है वहॉ पर उक्त रोजगार से संबधित मामले को प्रधानमंत्री केा (रोजगार चालू रखा जाय या नहीं के लिये) रिपोर्ट किया जाना चाहिए। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि स्वराज कौशल को यदि ललित मोदी की कंपनी में रोजगार पर मान भी लिया जाये तो भी चूॅकि वे मंत्री की पत्नी नहीं है बल्कि वे मंत्री के पति हैै तथा मंत्री पर निर्भर व्यक्ति नहीं है व इडोफिल कंपनी विदेशी कंपनी नहीं है इसलिए उन पर यह आचार संहिता का नियम लागू नहीं होता है। इस प्रकार उक्त तथ्य के उजागर होने के बावजूद भी प्रस्तुत मामले में किसी भी तरह का कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लघंन नहीं होता है।  इस विषय में अर्नब गोस्वामी द्वारा उक्त कोड ऑफ कंडक्ट को पढे बिना जो ब्रेकिग न्यूज चलाई गई वह सत्य से परे होने के कारण विदेश मंत्री की इमेज को अनावश्यक रूप से बदनाम करने वाली है। इससे क्या यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता है कि इसी तरह से गलत विवेचना कही ललित गेट के अन्य मुद्दो पर भी तो नहीं की गई है?   

गुरुवार, 18 जून 2015

मानवीय संवेदनाएॅं - मानवाधिकार - कानून से कितने ऊपर ?

पिछले 48 घंटो से पूरे मीडिया में ‘‘मोदी’’ ही छाए हुये है। फिर चाहे वह ललित मोदी हो या कुछ अंशो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मानवीय संवेदनाओं के आधार पर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर एक फरार घोषित (वांटेड) आरोपी जिसके विरूद्ध एक तथाकथित लुक आउट वांरट जारी किया गया है (ऐसा कुछ क्षेत्रों में कहा गया है) कि उनकी केसर पीडित पत्नी की सहायता के लिए दी गई सुविधा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसलिये की वे भारत सरकार के लिये आर्थिक व आपराधिक मामले में एक वांटेड आरोपी है जिस पर कोई विवाद नहीं है। जिस तरह की परिस्थितियॉं ,घटनाएॅ इस मामले में अभी तक सामने आयी है, क्या वह सिर्फ मानवीय संवेदनाओं या अन्य तथ्यों.....के आधार पर उत्पन्न हुई है, इस पर एक प्रश्न चिन्ह अवश्य लगता है। 
जहॉं तक मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है एक मानव व नागरिक होने के नाते मानवीय संवेदनाओं का होना न केवल स्वाभाविक है बल्कि यह अत्यन्त आवश्यक भी है। इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता है। जब हम एक घोषित सजायाफ्ता आरोपी के मानवाधिकार को जो कि मानवीय संवेदनाओं पर ही आधारित होता है, का न केवल नैतिक रूप से सर्मथन करते है बल्कि अंतराष्ट्रीय न्यायालय एवं हमारे उच्चतम न्यायालय भी इसको मान्यता प्रदान करते है। यद्यपि मानवाधिकार का कोई लिखित काूनन हमारे संविधान में नहीं है। तब फिर भारतीय नागरिक की की पत्नी के विदेश में इलाज और उसका जीवन बचाने के लिए एक भारतीय महिला द्वारा स्वास्थ लाभ प्रदान करने के लिये मानवीय संवेदना के आधार पर सुविधा उपलब्ध कराने पर इतना हाहाकार क्यों ? प्रश्न यही से उत्पन्न होता है लेकिन उत्तर निरूत्तर होकर आरोप व प्रत्यारोप में उलझ सा गया है। क्या सुषमा स्वराज ने सिर्फ और सिर्फ मानवीय संवेदनाओं के आधार पर ही ललित मोदी को सहायता दी थी या फिर इसमें अन्य कोई तथ्य परस्पर - स्वार्थ पूर्ति व नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगे हुए है, इस बात की राजनैतिक आरोप - प्रत्यारोप से परे गहरी विवेचना किया जाना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सके।
                किसी की जान बचाने के लिए छोडा जाने के पीछे मानवीय संवेदना का ही मुख्य रूप से आधार होता है जब पूर्व में केन्द्रीय मंत्री मुफ्ती मोहम्मद (वर्तमान में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री) की बिटिया को छुडाने के लिए पाकिस्तानी आंतकियों द्वारा किये गए विमान के अपहरण को छुडाने के लिए देश की संप्रभुता एवं आंतरिक स्थिति पर गहरा आघात करने वाले खुंखार आंतकवादियों को मानवीय आधार पर छोडा जा सकता है। तब इसी परिप्रेक्ष्य में सुषमा स्वराज द्वारा की गई कार्यवाही को देखे तो इसकी चर्चा भी मीडिया में नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि इस घटना के सिक्के के को देखे तो इसकी चर्चा भी मीडिया में नहीं होनी चाहिएा। लेकिन यदि इस घटना के सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाए जो स्थिति कुछ और ही नजर आती है। 
             सुषमा स्वराज पिछली लोकसभा में विपक्ष की नेता रहने से लेकर वर्तमान में भारत सरकार की विदेश मंत्री है जिनके ललित मोदी से पारिवारिक संबंध है , इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता है। ललित मोदी के आपराधिक प्रकरण को सुषमा स्वराज की पुत्री बांसुरी द्वारा मुख्य वकील यू यू ललित के साथ केस लडने से लेकर सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौेशल जो कि ललित मोदी के 22 साल से वकील है, द्वारा अपने भतीजे के संबंध में यू.के. में यूनिर्वसिटी में प्रवेश के लिए ललित मोदी से मांगी गई सहायता (जो उनको मिली भी) से उनके पारिवरिक संबंध व आर्थिक हित सिद्ध होते है। यदि एक नागरिक को किसी घोषित भगोडा आरोपी के संबंध में कोई जानकारी मिलती है तो उसका यह नागरिक दायित्व होता है कि वह पुलिस को तुरंत उसकी जानकारी देकर गिरफ्तारी करने में सहयोग करे। जब सुषमा स्वराज का घोषित अपराधी ललित मोदी से लगातार संपर्क रहा हैं और पारिवारिक संबंध रहे हैंे तब उन्होनें उसी समय ललित मोदी को स्वदेश आकर समर्पण कर देश के कानून का सामना करने की सलाह क्योें नहीं दी। (फिर चाहे भले ही वे उसे नहीं मानते ?) यह एक प्रासंगिक प्रश्न है। यदि उन्होने ऐसी कोई सलाह दी थी तो ऐसा कोई कथन इस संबंध में पिछले 48 घंटो में सुषमा जी का नहीं आया है। मेैं यह सोचता हूॅ कि मुद्दे का यही टर्निग पांईन्ट है। या तो उनसे सलाह न देने में चूक हुई है जो उनका एक संवैधानिक दायित्व था या उन्होनें एक पारिवारिक मित्र की हैसियत से व पूर्व से ही अनुग्िरहत होने से एवं हितो के टकराव के कारण व उनके परिवारक आर्थिक (लाभ) के संबंधों के मंद्देनजर पद का उपयोग कर उन्हे फायदा पहुॅचाया गया। मैं इसे पद का दुरूपयोग नहीं कहूॅगा क्योंकि सुषमा जी की छवि अभी तक इस तरह की बिलकुल नहीं रही है। वीजा की समयावधि और सीमा को लेकर अनेक प्रश्न दिनभर चर्चित रहे जिसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन स्वयं सुषमा जी का बचाव निश्चित रूप से उन्हें कमजोर सीढी पर ही खड़ा करता है क्यांेकि जिस चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर ललित मोदी की व्यक्तिगत उपस्थिति उनकी पत्नी के इलाज के समय सहमति देने के लिये पुर्तगाल में जरूरी थी जिस आधार पर उन्होंने हस्तक्षेप किया, लेकिन पुर्तगाल का कानून ऐसा नहीं कहता है। जिस नैतिकता को लेकर उन्होंने सार्वजनिक जीवन की जिन उचाईयांे को अभी तक पाया है उनके समान बिरले ही मंत्री राजनैतिज्ञ होगंे। अतः उन्हें अपनी असावधानी पूर्वक हो गई गलती को स्वीकार कर नैतिक मूल्यों के आधार पर इस्तीफा देकर लाल बहादुर शास्त्री जी की लाईन में खडे हो जाना चाहिए, जनता उन्हे अपने सिर पर बैठायेगी। 
             अन्त में लेख लिखते समय ललित मोदी ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वंसुधरा राजे सिंधिया को भी लपेटे में ले लिया जैसा कि ब्रेकिंग न्यूज में आ रहा है जिस पर प्रथक से चर्चा आगे की जायेगी।

शुक्रवार, 12 जून 2015

‘‘आप’’ की ‘‘नैतिकता’’ आप ‘के’ लिये

राजीव खण्डेलवाल:
   ‘‘आपकी’’ नैतिकता का पैमाना ‘‘आप’’ के लिए अलग तथा स्वयं के लिये दूसरा। दिल्ली के कानून मंत्री जितेन्द्र तोमर पद पर रहते हुये गिरफ्तार हुये व उसके बाद अभी तक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा उन्हें मंत्री पद से न हटाया जाना शायद भारतीय राजनीति के इतिहास का यह दूसरा अवसर है। गिरफ्तारी के तरीके के मुद्दे पर बहस की जा रही है। उसे राजनैतिक बदले की भावना की कार्यवाही बताया जा रहा है। लेकिन इन सबसे हटकर ‘आप’ राजनीति में नैतिकता, मर्यादा व सिंद्धान्त के मुद्दे कोे लेकर राजनीति में नई प्रविष्ट कर राजनीति को नई दिशा देने का सफल प्रयास किया जा रहा था। लेकिन पिछले कुछ समय से आप में जो कुछ चल रहा है,तब से लेकर अभी तक जब दिल्ली के कानून मंत्री की गिरफ्तारी हई, उससे उक्त नैतिकता व सिंद्धान्तों की अस्मिता तार - तार हो कर राजनीति के गंदे तालाब में समुद्र की गहराई तक घुस गई। 
    याद कीजिए ‘‘आप’’ के प्रारंभिक बयानों को जिनमें दूसरे नेताओं व मंत्रीयों पर आरोप लगने के तुरंत बाद जॉच के निराकरण होने तक तथा न्यायालय के निर्णय आने तक इस्तीफा मंागे जाते रहे थे। अब वही सिद्धान्त (स्टेण्ड) आप द्वारा अपने कानून मंत्री के लिए क्यों नहीं अपनाया जा रहा है? यह बिंदु समझ से परे है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि राजनीति में आने के बाद राजनैतिकों पर ‘‘राजनीति’’ अपना प्रभाव जरूर डालती है। जो भी व्यक्ति राजनीति को सुधारने के लिए उसके   राजनीति के सम्पर्क में आता है राजनीति स्वयं बदलने के बजाय उस व्यक्ति को ही बदल कर अपने ही रंग (दोष) में रंग लेती है जिस प्रकार पारस पत्थर कार्य करता है। यदि राजनीति एवं बदले की भावना के आधार पर उपरोक्त गिरफ्तारी की गई तो क्या दिल्ली के गृहसचिव धर्मपाल का स्थानांतरण गुण दोष के आधार पर किया गया है अथवा राजनैतिक द्वेष की भावना से किया गया है? केजरीवाल को यह समझना होगा कि ‘‘उनका कथन ही पत्थर की लकीर’’ है यह भ्रम ठीक नहीं हैं जैसा कि उन्होनें कानून मंत्री की डिग्री के मामले में अपना संतोष व्यक्त कर उसे ठीक बतलाया था। केजरीवाल को समझना यह होगा कि वे ‘‘सीताराम केसरी’’ (कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष) के समान व्यक्ति नहीं है जिनके बाबत यह कहा जाता रहा कि ‘‘न खाता न बही जो ‘केसरी’ कहे वही सही’’। 
    केजरीवाल ने प्रांरभ में जिस सैद्धांतिक राजनैतिक प्रक्रिया को प्रारंभ किया था व उसको बढाने का प्रयास किया था, लगता है वह अब मृतपाय होती जा रही है। वास्तव में केजरीवाल उन करोडो लोगो की आशाओं व भावनाओं पर तुषाराघात कर रहे है, जिन्होने नैतिकता व सिद्धान्त की चमक की उम्मीद केजरीवाल की राजनीति से की थी। यदि वे तुंरत अपने कानून मंत्री से इस्तीफा ले लेते तो ‘सिंद्धान्त की राजनीति ’में थोड़ा उपर उठ जाते जो अवसर उन्होनें खो दिया है। इस घटना ने उसी सामान्य ज्ञान को पुनः सही सिद्ध किया है कि राजनीति में सभी एक ही थैली के चट्टे बटृे होते हैं। अब देश के नागरिको को फिर अन्य किसी केजरीवाल को ढूढना होगा। यह देश का दुर्भाग्य है कि यहॉं जनता किसी व्यक्ति को केजरीवाल या अन्ना बनाने का प्रयास नहीं करती है ,बल्कि जो व्यक्ति अपने को अन्ना या केजरीवाल जिस भी रूप में प्रस्तुत करता है जनता उसे रूप में स्वीकार कर लेती है। अपेक्षित लक्ष्य प्राप्त करने हेतु जनता को अपनी सोच बदलना होगा व उसे भी व्यक्तित्व गढ़ने में अपने खून पसीने का कुछ अंश समर्पित करना होगा। 

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)

शुक्रवार, 5 जून 2015

मैगी पर ‘‘बवाल’’ 32 साल से जमा ‘‘उबाल’’ ! सभी खाद्यान्नों पर सवाल?


    नेस्ले के खाद्य उत्पादन मैगी के विक्रय पर दिल्ली और केरल सरकार ने न केवल बिक्री पर प्रतिबंध लगाया बल्कि बिहार की अदालत में मैगी के ब्रॉड एंबेसेडर अमिताभ बच्चन ,माधुरी दीक्षित ,प्रीति जिंटा पर प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश भी दे दिये। विगत तीन दिवस से अन्य प्रदेशो में भी इस पर कार्यवाही करने के संकेत मिल रहे है। अच्छे दिन आये हैं की भावना के साथ उक्त कार्यवाही सतही रूप से बिल्कुल ठीक लगती है लेकिन निश्चत रूप से उक्त कार्यवाही भेदभाव पूर्वक होने के कारण प्रश्न चिन्ह भी लगाती है। नेस्ले के प्रोडक्ट मैगी के अतिरिक्त अन्य कंपनीयों केे इसी प्रकार के उत्पादको को लेबोटरी जॉच कर उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? पिछले 32 सालो से मैगी बिक रही है। अचानक क्या अब उसमें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व पाए गये हैं? प्रश्न यह है कि मैगी की संरचना में जो हानिकारक खाद्य तत्व अब पाये गये है क्या 32 सालो से उन्ही तत्व का उपयोग हो रहा था? यदि हॅा तो 32 सालो से समस्त राज्य सरकारे व केन्द्र सरकार के अधीन जॉच करने वाली प्रयोग शालाएॅ (लेब) क्या सो रही थी? उन्हे नियमित जॉच कर नेस्ले कम्पनी के खिलाफ कार्यवाही करने का आदेश देना चाहिए था। प्रश्न यह भी उठता है इस पर माननीय अदालत ने प्रोडक्ट की कंपनी के खिलाफ ही नहीं बल्कि उक्त उत्पाद का प्रचार करने वाले ब्रांड एंबेसेडर के खिलाफ तो आपराधिक कार्यवाही की। लेकिन उस उत्पाद के प्रमोशन करने के लिए साधन व प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के लिए और उसे प्रसारित करने लिए समस्त प्रिन्ट/इलेक्ट्रनिक मीडिया जिसने उसी प्रकार पैसे लेकर मैगी का विज्ञापन व प्रसार किया जिस तरह ब्रांड एंबेसेबर ने पैसे लेकर उक्त ब्राड के विज्ञापन का प्रमोशन किया एके खिलाफ कोई कार्यवाही क्यो नहीं की ? 
    चॅूकि घातक उत्पादनों पर पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। इसलिए इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जब मैगी मंे मोनोसोडियम, ग्लूटामेट की मात्रा अधिक तथा सीसे की घातक मात्रा पाई गई तब पूरे देश में एक साथ प्रतिबंध क्यो नहीं लगाया गया। इस सिक्के के दूसरे पहलू को देखा जाय तो एक तरफ सरकार सिगरेट के विषय में वैधानिक चेतावनी ‘‘स्वास्थ के लिये हानिकारक है ’’के साथ बिक्री बढाने के लिए विज्ञापन की अनुमति देकर खजाना भर रही है तो दूसरी ओर कई ब्रांड एंबेसेबर अनेकांे प्रोडक्टस का विज्ञापन कर रहे हैं। वास्तव में यह समय की आवश्यकता है कि सरकार राष्ट्रीय नीति बनाये और जो भी खाद्य पदार्थ स्वास्थ के लिए हानिकारक हैं देश में उनके उत्पादन /आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाये व उनके विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाया जाये ताकि देश व देश का स्वास्थ ठीक रखने के लिए देश में उत्पादित/आयात होने वाले किसी भी प्रकार के खाद्य संपूर्ण हानि रहित हांे तथा न केवल मैगी अपितु अन्य किसी भी हानिकारक खाद्यों के कारण होने वाले खाद्य सुरक्षा पर व्यय (खर्च) एंवं तकलीफ से नागरिकों को बचाया जा सके। इससे सरकार को एक ओर जहॉ प्रारभिक राजस्व का नुकसान होगा जिसकी क्षतिपूर्ति देश की अन्य पापुलर योजनाओं के नाम पर होने वाले अरबो रूपये के अनुत्पादक व्यय (जिसकी मात्र 10 प्रतिशत राशि ही जरूरतमंद व्यक्ति के पास पहॅुचती है) को बचाकर की जा सकती है। अपेक्षा कड़क है। निर्णय एवं कार्यवाही उससे भी कड़क हो, इसलिए ‘‘एक कठोर व्यक्ति ही अच्छे दिन आयंेगे के नारे को असली’’ जामा पहनाने के लिये ऐसे कठोर निर्णय ले सकता है, और तभी जनता की अग्नि परीक्षा से गुजर कर देश की आर्थिक स्थिति में बदलाव ला सकता है।  

गुरुवार, 4 जून 2015

Pregnant women who exercise are less likely to have a Caesarean or give birth to a large baby

  • Exercising cuts Caesarean risk by 20% and chance of large baby by 31%
  • It raises the chance of giving birth to a baby that is normal weight
  • Babies born large tend to be heavier as children and into adulthood
  • Advising expecting women to exercise could prevent childhood obesity

Pregnant women have Caesarean exercise reduces the risk of the fifth, according to a new study.
They also nearly one-third less likely to give birth to a big baby, the study showed.
Previous studies suggest that larger babies are more likely to have weight problems as adults.
Physical exercise and increase their chances of normal weight infants, Canadian scientists say.

Play Exercises For Pregnant Women

Exercises in Preparation for Delivery for 7-9 months pregnant

Pregnant women who exercise have cut a fifth of the risk of caesarean section, a study finds

Pregnant women who exercise are less likely to have a Caesarean or give birth to a large baby

  • Exercising cuts Caesarean risk by 20% and chance of large baby by 31%
  • It raises the chance of giving birth to a baby that is normal weight
  • Babies born large tend to be heavier as children and into adulthood
  • Advising expecting women to exercise could prevent childhood obesity

Pregnant women have Caesarean exercise reduces the risk of the fifth, according to a new study.
They also nearly one-third less likely to give birth to a big baby, the study showed.
Previous studies suggest that larger babies are more likely to have weight problems as adults.
Physical exercise and increase their chances of normal weight infants, Canadian scientists say.

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Exercises in Preparation for Delivery for 7-9 months pregnant

Pregnant women who exercise have cut a fifth of the risk of caesarean section, a study finds

शनिवार, 30 मई 2015

Can I start exercising at 7-9 months pregnant?

Can I start exercising at 7-9 months pregnant?

You must learn that the first of the techniques is a traditional squat. With this technology, you often place high on the back. Sometimes you will hear bodybuilding slut is being called. Time for you to help support your shoulder blades should hold back. You can keep your wrist rigid or power-lifter in style just depends on your personal ability, enhanced. This is what you can do if you rotate your shoulders, because you need to keep your elbows under your wrists. If this happens, you would be likely to pinch a nerve in turn, your rotator cuff, can hit. For some people, making their arms go numb.

Focus on concentration, breathing and exercising the perineum muscle for the later stage of your pregnancy. These will give strength and prepare your body for delivery. All dad-to-be can also involve in these exercises.

Play Exercises For 7-9 Months Pregnant video

Exercises in Preparation for Delivery for 7-9 months pregnant

Traditional barbell squat

To perform this exercise proper alignment of the hips is something that has been the subject of considerable debate. Generally, you should keep your back slightly curved inwards, rather than circular. It will attach to muscles that protect the spine. You can also use of the hip in a neutral position. With this situation, you turn your back to the top of the pelvis and flatten your back to push forward his lower pelvis. You exaggerate the movement and pushing too much, you can complete your back. Create your neutral spine Use only enough rotation. Keep your head in line with your torso forward. You keep your head up, looking forward rather than up or down Also, if you keep your spine aligned and can avoid injury.

If you go down as if sitting in a chair.

They measure your knees pass your toes Do not allow to expand. This particular exercise is under some pressure on your knee joint, and your knees go forward more stress you put on them. If you sit a little, giving more stress on your weight, your knees, your quads, your heels instead will be transferred through your toes. Correctly in order to execute this movement, you have to balance and flexibility. You can try to place your heel on the block. This improves your balance, it takes a little flexibility. You better pull the ankle rather than eliminate symptoms by using the blocks to respond to its lack of flexibility.

Next of The Best Exercise

 

शनिवार, 9 मई 2015

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न्याय की अवधारणा! सबको समान न्याय ! कठोर सजा! अपराधी प्रवृत्ति में कमी ?

सलमान खान के हिट एंड़ रन मामले में आये निर्णय के झरोखे से यदि न्याय की उक्त अवधारणा को देखा जाय तो लगभग 13 साल बाद एक बिग सेलिब्रिटी सलमान खान का निर्णय आ ही गया जो न्याय की इस मूलभूत अवधारणा को प्राथमिक रूप से सही सिद्ध करता है कि (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड) न्याय में देरी होना अन्याय तुल्य है।  

सामान्य रूप से जब किसी रोड़ दुर्घटना में कोई व्यक्ति या व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है तो चालक पर लापरवाही का प्रकरण धारा 304 अ के अन्तर्गत दर्ज कर आरोपी को जमानत पर छोड़ दिया जाता है जिसमें अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। धारा 304 (2) में अपराध दर्ज होने पर अपराध गैर जमानती होकर उसमें दस साल तक की सजा का प्रावधान है। तदनुसार उक्त पुराने प्रकरण में सलमान खान को दी गई सजा यदि बहुत कठोर नहीं है तो कम भी नहीं कही जा सकती है। भारतीय आपराधिक जूरी एडेन्स का एक आधार यह भी है कि कड़ी सजा होने के प्रावधान से अपराधी डरंे जिससे अपराध में कमी आयेगी। क्या उक्त सिंद्धान्त केे लक्षण सलमान खान के केस के निर्णय में दिख रहे है? 

जब से सलमान खान को सजा मिली है तब से इलेक्ट्रानिक मीडिया व प्रिन्ट मीडिया ने उन्हें लगातार सुर्खियों में रखकर अपनी न केवल टीआरपी बढाने का प्रयास किया बल्कि जाने अनजाने में घोषित अपराधी की टीआरपी भी बढाई है। मीडिया चेनल्स यदि निर्णय के पूर्व व बाद के सलमान के चहेतों की तुलना करें तो पाएॅगे कि निर्णय के बाद सलमान के चहेते बहुत ज्यादा बढ़ गए है।  अर्थात् कठोर सजा होने के बावजूद समाज ,सेलेब्रिटीज ,राजनीतिज्ञ फिल्मी क्षेत्रों से लेकर प्रश्ंासक हर कोई के दिल में सलमान खान के प्रति अपराध बोध या अपराधी होने के भाव आये हे ऐसा लगता नहीं है। पं्रशसक सहित सभी क्षेत्रों के व्यक्तियों ने सलमान की लगभग प्रशंसा ही की है आलोचना नहीं। अपितु इन सभी के मन में सलमान के प्रति पीड़ित दया भाव ही ज्यादा झलकता है। इस अपराध के संबंध में न तो उन्हे सीख दी गई, न ही ,उन्हें कोसा गया, न ही उनमें स्वयं में कोई सीख लेने की तत्परता ही दिखी जैसा कि सजा देने के प्रभाव से उत्पन्न होना चाहिए था। हमारी भारतीय संस्कृति में जब कोई हमारा परिचित व्यक्ति स्वर्गवासी हो जाता है तो उसकी अवगुणों की आलोचना करने के बजाय उसके सदगुणों की प्रशंसा ही करते हैं। सलमान के संबंध में भी शायद इसी सास्ंकृतिक मनोदशा को अपनाया गया है। यदि यह सही है तो न्याय प्रक्रिया की इस अवधारणा पर पुर्नविचार करना आवश्यक होगा कि कठोर सजा से अपराधिक प्रवृत्ति को कैसे रोका जा सकता है। 

हमारे देश में कानून का मूलमंत्र ही यह है कि कानून सबके लिए एक ही है व बराबर है। चूंकि सलमान खान एक सेलेब्रिटी है तो यह भी देखना होगा कि उसके केस में क्या कानून के इस आधार का पालन हो पाया है। सेलेब्रिटी होने से लाभ व नुकसान दोनो होते है। उपरोक्त निर्णय पर यदि इस आधार पर विचार किया जाय तो सेलेब्रेटी होने के कारण सलमान खान की सजा कुछ

कठोर लगती है जैसा कि सलमान खान के डिफेन्स वकील ने दो निर्णयों (परेरा व नन्दा केस ) का उदाहरण देकर जताने का प्रयास किया है। दूसरी ओर सेलेब्रिटी होने से उन्हें यह फायदा भी मिला कि उसी दिन उनको अंतरिम जमानत दे दी गई जहॉ न्यायालय देर शाम तक ही बैठी रही जिसमें सामान्यतया दो चार दिन लग जाते है तथा सजायाप्ता अपराधी को तुरन्त जेल जाना पड़ता है। सलमान पर दिया गया निर्णय न्याय प्रणाली को यह अवसर प्रदान करता है कि उसको हम और ज्यादा जनहितैषी व सुलभ तथा शीघ्र प्राप्य बनाने के लिये क्या प्रयास कर सकते है। इस विषय पर समस्त संबधित आवश्यक पक्षों को गहनता से विचार करना चाहिए। 

‘‘अपराध’’ की नई ‘‘परिभाषा’’! ‘कुमार’ ‘विश्वास’ के ‘‘कुमार’’ पर ‘‘पूर्ण‘‘विश्वास’’...! लेकिन..... ?

राजीव खण्डेलवाल:
Domo picture: theguardian.com
हमारे देश भारत में हर कुछ सम्भव है। मीडिया भी किसी भी तथ्य को वास्तविक घटना का रूप देने में पूर्णतः सक्षम है फिर चाहे वह घटना भले ही वास्तविक रूप में घटित ही न हुई हो। पिछले दो दिनो से एक महिला द्वारा कुमार विश्वास के संबध में लिखा गया पत्र (शिकायत ?) जो किसी भी रूप में कुमार विश्वास के विरूद्ध अपराध तो दूर कोई आरोप भी नहीं जड़ता है। पर   इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पुलिस ट्रायल के पूर्व ही मीडिया ट्रायल कर विश्वास को अपराधी घोषित कर सजा तक दे डाली और अब शायद मीडिया का अगला कदम विश्वास द्वारा तथाकथित सजा न भुगतने कि स्थिति पर केन्द्रित होगा?

आखिर उक्त महिला द्वारा पुलिस को दिये गये आवदेन पर प्राथमिक स्ूाचना तक दर्ज कर डाली गई जिसमें यह कथन किया गया है कि कुमार विश्वास आगे आकर कहे कि उक्त महिला से उनका कोई अवैध संबंध नहीं है। इस तरह से सोशल मीडिया में इस तथाकथित अवैध संबंध कोे लेकर झूठी अफवाह फैल रही है जिसे कुमार विश्वास खारिज नहीं कर रहे है। उक्त झूठी अफवाह के कारण उनका दाम्पत्य जीवन टूट गया है और उनके पति ने उन्हें घर के बाहर कर दिया है। महिला का कहीं भी यह आरोप नहीं है कि यह झूठी अफवाह कुमार विश्वास ने फैलायी है। उन्हे व उनके पति का कुमार विश्वास पर इतना गहरा विश्वास है कि उनके कथन (खंडन) मात्र से उनके पति उस (झूठी) अफवाह को झूठी मान लेगें और वह फिर से अपने पति के साथ रहने लग जायेगी। उनके पति का उनकी पत्नी पर ‘‘विश्वास’’ नहीं है जिसे वह स्वयं एक झूठी अफवाह कह रही है बल्कि उसके पति को ‘‘कुमार विश्वास’’ के खंडन पर जरूर ‘‘विश्वास’’ है शायद इसलिए क्योकि उनका नाम ‘‘कुमार’’ ‘‘विश्वास’’ है। पत्नी को भी ‘‘विश्वास’’ पर ‘‘विश्वास’’ है कि उनके खंडन मात्र से पति को अफवाह के संबंध में ‘‘अविश्वास’’ हो जायेगा।  

आपराधिक दंड प्रक्रिया में आरोपित हुये बगैर स्वयं को ही आरोप - हीन सिद्ध करने का यह नया फंडा आखिर पूरी मीडिया को खूब भाया है। इसी कारण से कुमार विश्वास का उसी तरह से चरित्र हनन हो रहा है जिस तरह से उक्त महिला का झूठी अफवाह फैलने के कारण हुआ है। जब महिला खुद मात्र खंडन का विश्वास से अनुरोध कर रही है तब मीडिया स्वयं कुमार विश्वास से सूचक (लीडिग) प्रश्न पूछकर कर उनके चऱित्र हनन का ‘‘ताल ठोक के’’ ‘‘हल्ला बोल’’ कर (मीडिया चेनल के प्रोग्राम) प्रयास क्यों किया जा रहा है। यद्यपि कुमार विश्वास को महिला की इच्छा अनुसार एक सामान्य खण्डन जारी करने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए था। जब महिला खुद अरविन्द केजरीवाल के पास उस अफवाह के संबंध में मिली और अरविन्द केजरीवाल ने इस संबंध में स्वयं तुरन्त खंडन कर दिया तब उसे ही युक्तियुक्त खंडन क्यो नहीं मान लिया जाता है। मीडिया ने सीधे उस महिला के पति से भी सम्पर्क क्यो नहीं किया कि क्या आपने अपनी पत्नी को अपने से अलग कर  दिया है जिसका आधार मात्र वह अफवाह है जो आपकी पत्नी आरोपित कर रही है। पुलिस  भी एफआईआर दर्ज करने के बाद महिला के पति और कुमार विश्वास से इस संबंध में सीधा प्रश्न क्यों नहीं कर रही है। इसका जवाब तुरन्त मिल जाता तो महिला को समाधान मिल जाता, एफआईआर फाईल हो जाती व प्रकरण समाप्त हो जाता तथा मीडिया ट्रायल को भी अपना आयना दिख जाता। 

यहॉ फिर यही प्रश्न पैदा होता है जो प्रश्न अरविन्द केजरीवाल ने उठाया कि मीडिया का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए। जब मीडिया इस तरह से एक नागरिक के व्यक्तिगत प्राइवेसी का   अधिकार व नागरिक अधिकार का हनन कर सकता है तब मीडिया की जवाबदेही व जिम्मेदारी क्यों नहीं निश्चित कीे जानी चाहिए ? जब इस देश के संविधान में विधायिका, कार्यपालिका,न्यायपालिका और मीडिया को लोकंतत्र के चार स्वतंत्र स्तम्भ व एक दूसरे के पूरक मानकर प्रत्येक की जवाबदारी व जवाबदेही निश्चित की गई है तब मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर मीडिया को उच्छ्रंखल नहीं होने दिया जा सकता है। लोकंतात्रिक देश होने के कारण न्यायपालिका और विधायिका के साथ मीडिया की जिम्मेदारी अंततः जनता के प्रति ही होती है। जनता का मतलब भीडतंत्र नहीं हो सकता है। बल्कि प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत स्वंतत्रता व नागरिक अधिकारो की सुरक्षा का दायित्व मीडिया पर भी है, और मीडिया अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है।

यह आपराधिक दंड सहिंता का अनोखा उदाहरण होगा जहॉ कोई आवेदिका किसी व्यक्ति के विरूद्ध भारतीय दंड सहिता या अन्य किसी अधिनियम के अन्तर्गत आरोप लगाये बिना अनावेदक के साथ मीडिया सहित राजनैतिक पार्टियॉं राजनीति का गंदा खेल खेलकर कुमार विश्वास पर    वे सब आरोप  मढ़ने का प्रयास कर रहे है जो स्वयं आवेदिका नहीं लगा रही है तथा आरोपित हुये बिना व्यक्ति को अपनी सफाई देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। महिला आयोग की अभी तक की गई सम्पूर्ण कार्यवाही के तरीके को भी देखा जाय तो उसमें भी राजनीति की बू ही आती है। जब 21 वी सदी में हर क्षेत्र में विकास हो रहा हो, तब न्याय के विकास की शायद यह एक नई परिभाषा है।       

                               (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)   

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

मानवीय संवेदनाएं समाप्त होने के कगार पर ?

  •  विगत दिवस दिल्ली में तुर्कमान गेट चौक पर रात रोडरेज में जिस तरह कुछ लोगो के समूह ने एक बेटे के सामने उसके पिता को पीट-पीट कर मार डाला और 'भीड'-'तंत्र' उसे जिस निहायत लाचारी व ''शराफत'' से देखता रहा ,वह निहायत दिलदहला देने वाली घटना ,हमारे विभिन्न तंत्रो पर कई प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रही है जो घटना से दूरस्थ लोगो को मानवीय संवेदनाआंे के साथ बैचन कर रही है।
  • हम भारतीय वैसे तो अपने आप को बडा स्वाभिमानी ,सामाजिक और परोपकारी दिखने वाला  व्यक्ति मानते हैं। लेकिन यह घटना शायद हमारे व्यक्तित्व का दोहरापन ही है। हमने कई बार यह देखा है कि जब किसी अकेले व्यक्ति को चार गुण्डों बदमाशो द्वारा मारने पीटने से लेकर चाकू मारने, गोली मारकर हत्या करनेे तक की घटना हमारे सामने घटित हो जाती है तब हमारी मर्दानगी  सहित समस्त गुण भय से काफूर हो जाते है व हम एक दर्शक मात्र रह जाते हैं। यदि बहुत साहसी युवा कोई होता तो वह घटना को मोबाईल में कैच कर उसे ब्रेकिंग न्यूज के लिए दे देता। लेकिन स्वयं आगे आकर उस व्यक्ति  के साथ होने वाली घटना को ब्रेक करने का प्रयास नहीं करता है। इसके  विपरीत यदि कोई साइकिल चालक या पैदल चलने वाला व्यक्ति किसी बडे़ वाहन से टकरा जाता है, तब वही जनता अपने अंदर का पौरूष दिखाकर उस बडे वाहन वाले व्यक्ति पर पिल पडती है। फिर चाहे भले ही बडे़ वाहन वाले व्यक्ति का कोई दोष न भी हो और वह मानवीय संवेदना वश स्वयं घायल होने के बावजूद, दूसरे व्यक्ति को मानवीय सहायता देने का प्रयास भी कर रहा हो। 
  •  यह अनुभव मैं आप लोगो के साथ इसलिए शेयर कर रहा हूॅ क्योकि जिस दिन दिल्ली में यह घटना घटी उसी दिन मेरा भाई अजय खण्डेलवाल भोपाल से बैतूल आ रहा था। होशंगाबाद के पास एक मासूम सी बच्ची मेरे भाई की गाडी से हल्के से स्वयं टकरा गई जिससे उसे हल्की सी चोट आ गई। मेरे भाई ने उसको गाडी में बिठाकर अस्पताल पहॅुचाने का प्रयास किया। तभी दूर खडी छोटी सी भीड भाई पर अपना पौरूष जमाने का प्रयास करने लगी। कहने का मतलब यह है कि भीड भी  निरीह व्यक्ति के सामने अपना पौरूष दिखाती है और बलशाली के सामने चूहा बन जाती है। आखिर हम इतने संवेदनहीन क्यो हो गये है? इस अंत हीन दुख भरे प्रश्न् का उत्तर खंगालने के लिए हमें चारो तरफ नजर दौडानी होगी, वास्तव में हमारी संवेदनाये अंतरमुखी होकर इतनी कम जोर पड़ गई हैं कि हम संवेदना को ही भूल जाते है। यदि कभी ऐसी घटना हमारे परिवार के साथ दुर्भाग्यवश हो जाये तो हमारे दिल पर क्या बीतेगी ?
  • क्या यह 'तंत्र' का दोष नहीं है ? जिस तंत्र में हम रहते है ,जीते है वहॉं कोई शरीफ व्यक्ति ऐसे मामलों में सामने आकर अपना सामाजिक कर्तव्य व मानवीय दायित्व निभाना नहीं चाहता है क्योकि हमारे तंत्र की जॅंाच प्रक्रिया से लेकर ,न्याय प्िरक्रया  इतनी दूषित हो गई है कि अभियोजन पक्ष ,अभियोगी बन जाता है और अभियोगी ,अभियोजन। अर्थात् हमारी वर्तमान तंत्र प्रक्रिया में अपराधी की तुलना में उसको सजा दिलाने वाले व्यक्ति को आत्म सम्मान ताक पर रखकर बेवजह ज्यादा तकलीफ झेलनी पडती है। 
  • जहॉ हम एक ओर अपराधी/आतंकवादी तक के मानव अधिकार की चिन्ता करके प्रगतिवादी कहलाने का गर्व महसूस करते हैं वही एक आम व्यक्ति को क्या दूसरे आम व्यक्ति से मानवीय संवेदना के मानवाधिकार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए? आखिर यह मानवाधिकार क्या है? यह कानून या संविधान द्वारा प्रदत्त मूल नागरिक अधिकार नहीं है ,तथा ऐसा कहीं वर्णित भी नहींे है बल्कि मान्यता प्राप्त यह वह अधिकार है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार चार्टर (1948) में मान्यता दी गई है व जिसे न्यायालयो ने भी मूल अधिकार के समान मान्यता दी है। ऐसी स्थिति में मानवीय दृष्टिकोण के मद्देनजर मानवीय संवेदनाओं के मानवाधिकार को मान्यता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? इस पर खास ंकर उस विशिष्ट प्रबंध वर्ग को गौर करने की आवश्यकता है जो हमेशा ''मानवाधिकार की'' ''अन्याय पूर्ण सीमा तक'' वकालत करते आ रहे है। भ्रष्टाचार के लोभ में जॉच एजेंसियों के द्वारा किए जाने वाली परेशानियों तथा विभिन्न कारणों से न्याय प्रक्रिया में हो रही देरी व कमियों के कारण इतनी विपरीत स्थिति पनप गई है कि एक ओर हम पढ लिख कर शिक्षित होकर 21वी सदी में जाने का झण्डा लेकर उत्सर्ग हो रहे लोगो की मानवीय संवेदनाएॅं  मानवाधिकार को अक्षुण्य रखने की ओर अग्रसर रहने की बजाय, हमारी संवेदना का हा्रस होकर ऐसे निम्नस्तर पर जा पहुॅची है जिससे यदि हम उबर नहीं पाये तो जीवन के अनेक क्षेत्रों में किये जाने वाले विकास का कोई फायदा नहीं होगा। क्योकि मानवीय संवेदनाये जीवन के हर क्षेत्र के हर पहलू को प्रमाणिक रूप से परिणाम रूप में प्रभावित करती हैं। मैं यह मानता हूॅ कि मानवीय संवेदनाओं का सीधा संबंध नैतिक मूल्यों से है। इसीलिए नैतिकता का पाठ प्रत्येक नागरिक को स्वयं पढना और उसके द्वारा दूसरो को भी पढाया जाना अत्यावश्यक है।                                                                                                                                        जयहिंद  

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

‘‘महाभारत‘‘की आधुनिक इबारत! ‘‘आप की महाभारत’’!

पिछले कुछ दिनो से ‘‘आप’’ में चली आपसी घमासान और ‘‘महाभारत‘‘ के होते यह परिणाम तो होना ही था। यह ‘परिणाम’ कुछ लोगो के लिए दुश्परिणाम है तो कुछ नेताओ के लिये नेतागिरी चमकाने के लिये सुपरिणाम भी साबित हो सकता है। विश्व के सबसे बडे लोकतंात्रिक देश भारत में लोकतंत्र का अलग तरीके से राग अलापने वाली ‘‘आप’’ पार्टी देश के लोकतांत्रिक नागरिको के समक्ष लोकतंत्र व जनतंत्र का कौन सा आदर्श नमूना पेश करने जा रही है? यह प्रश्न यक्ष प्रश्न से भी बडा होकर भी अंत में दुर्भाग्यवश उक्त घटित घमासान के कारण अस्तित्व हीन हो गया। 

पिछले कुछ समय से ‘आप’ में जो कुछ घटित हो रहा है वह ‘आप’ न होकर तू-तडाको से होता हुआ गाली-गलौच, धक्का-मुक्की और हाथापाई में बदल गया व एफ आई आर दर्ज करने की नौबत तक आ गई इस प्रकार ‘‘परस्पर सद्भाव’’ ‘दुर्भाव व वैमैनस्य’ में बदल गया। अलग प्रकार के ‘लोकतंत्र’ व बेहतर वैकल्पिक व्यवस्था का दावा करने वाली ‘‘आप‘‘ की उक्त परिभाषा आप जनता को भी शायद ही भाये। कई चीजे अभी तक जो ‘आप’ में घटी वह शायद राजनैतिक क्षेत्र में पूर्व में अभी तक नहीं हुई है। अभी तक राजनैतिक पार्टियों में दबाव की राजनीति हेतु धमकी इस बात के लिये दी जाती थी कि यदि आप ने हमारी बात नहीं सुनी, हमारी मागें नहीं मानी तो हम पार्टी, से हट जायेंगे, इस्तीफा दे देंगंे। लेकिन ‘आप’ में यह पहली बार हुआ है कि जब किसी व्यक्ति (योगेन्द्र यादव) ने सशर्त इस्तीफा इस शर्त के साथ दिया था कि यदि पार्टी हमारी सब मंागंे मान लेती है तो हमारा वही पत्र इस्तीफा मानकर स्वीकार कर लिया जावे। 

इससे यह बात भी सिद्ध होती है कि ‘आप‘ में विभिन्न विचार धारा के लोग आपस में एक साथ किस तरह व किन परिस्थतियो में काम कर रहे थे जिसे तथाकथित लोकतंत्र का मजबूत फेविकोल का जोड भी अंततः एकजुट नहीं रख पाया। आप पार्टी ने प्रेस क्रांफ्रेंस कर यह बतलाया था कि मीटिग के एक दिन पूर्व दोपहर तक योगेन्द्र यादव व प्रशान्त भूषण से समस्त बातो पर सहमति बन गई थी, उनकी समस्त मॉंगें स्वीकार कर ली गई थी (इन्हीं सब बातांे को अरविंद केजरीवाल ने राष्ट्रीय समिति की बैठक को संबोधित करते हुये भी कहा था) संयुक्त माफी का बयान जारी होने वाला था । अर्थात् बात करने से लेकर सहमति बनाने तक आप पार्टी हाईकमान को प्रशान्त भूषण व योगेन्द्र यादव से कोई परहेज या उनसे बातचीत पर कोई आपत्ति नहीं थी, कोई ग्लानि भी नहीं थी । जबकि तब तक उन पर विभिन्न तरह के कई पार्टी विरोधी गंभीर आरोप पार्टी हराने से लेकर भाजपा व कंाग्रेस से मिलने के विषय तक के उन्हीं लोगों द्वारा लगाये गये थे जो बातचीत में शरीक थे, वे आरोप तब तक अप्रभावकारी होकर आपसी बातचीत चलती रही । यदि सफल बातचीत किर्याविन्त हो जाती तो वे दोनांे आदमी जो पार्टी के संस्थापक सदस्य हैं, पार्टी के वरिष्ठतम् सम्माननीय सदस्य कहलाते। लेकिन अब दोनो को विलेन/विभीषण बना दिया गया । सब नैतिकताओं व सिद्धान्तो की सीमा से बाहर जाकर ‘‘पूर्व नियोजित रिमोट द्वारा निर्णित निर्णय’’ को ‘‘लोकतांत्रिक निर्णय’’ का रूप देने का असफल प्रयास किया गया। इन सब में सबसे बडा फायदा देश की स्थापित दोनों सबसे बडी राजनैतिक पार्टियों को भविष्य में होगा। 

‘‘सबको देखा हमको परखो’’ के नारे के साथ पार्टी विथ डिफरेंट का नारा लगाने वाली भाजपा को लोगो ने कांग्रेस की तुलना में गले लगाया। अन्ना ‘आदोलन’ से उत्पन्न ‘आप’ पार्टी के ’आम आदमी’ के नारे को शायद गरीबी हटाओ नारे से ज्यादा लुभावना मानकर ‘आम जनता’ ने खूब पंसद कर ‘‘आप‘‘ को बेहतर भविष्य कीे आशा में दिल्ली का सिरमौर बनाया। लेकिन इस घटना ने पार्टी विथ डिफरेंट को पार्टी विथ डिफरेंसेंस ;कपििमतमदबमेद्ध बनाकर विकल्प व सिद्धान्तो की राजनीति करने वाले की ओर देखने वाली जनता को गहरा सदमा पहुॅचाया है । इस घटना से अच्छे विकल्प की राजनीति की आकांक्षा लेकर चलने वाले नागरिको को बडा झटका लगेगा व भविष्य में शायद सैद्धान्तिक वैकल्पिक राजनीति का झण्डा लेकर आगे आने वाले अन्य कोई शख्श पर विष्वास जमाने में जनता को लम्बा समय लगेगा । यही असली नुकसान आज की विघटन की इस प्रक्रिया से हुआ ह,ै जिसकी चिंता या अहसास दोनों पक्षों ने नहीं किया बल्कि इस ‘विष्वास‘ की चिता दूसरे विष्वास (कुमार) जो कुछ समय पूर्व तक अपने को निर्गुट (निष्पक्ष) बता रहा थे, की आहुति से जला दी गई।

वास्तविक लोकतंत्र ,पारदर्शिता व नैतिक मूल्यो की बार बार दुहाई देने वाले ‘आप’ पार्टी के नेताओं ने अपनी पूरी कार्यवाही को मात्र इस आधार पर सही ठहराने का प्रयास किया कि विशाल लोकतंात्रिक बहुमत से उक्त पूरी कार्यवाही व निर्णय हुआ है। वे यह भूल गए कि अन्ना आदोलन के समय अन्ना सहित इन्ही सब नेताओं ने जनता के विशाल बहुमत से चुने गये सांसदों व बहुमत के संसद के निर्णयो को मानने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि रामलीला ग्राउड में यहॉं जो जनता आई है वही असली संसद है, वे नहीं हैं जो संसद भवन में है। अर्थात् तत्समय बहुमत के आकडे़ा के सिद्धान्तो के विपरीत नैतिकता, पारदर्शिता व सिद्धान्तो के मूल्यांे का सहारा लेकर इसे मजबूत करने का आव्हान किया गया। लेकिन अब ‘आप’ की नैतिकता यह हो गई है कि घोर पार्टी विरोधी कार्य करने वाले व्यक्ति को बहुमत के आधार पर राष्ट्रीय कांउसिल से निपटाया तो जाता है लेकिन पार्टी से निकाला नहीं जाता। कोई कारण बताओ सूचना पत्र उन्हंे अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिये नहीं दिया जाता है (लोकतंात्रिक प्रक्रिया?) । बातचीत के दौरान उस आरोपित पार्टी विरोधी व्यक्ति की समस्त 5 मंॅागंे तो मान ली जाती हैं क्योकि वे पार्टी हित मेें हैं, लेकिन फिर भी यह माना जाता है कि वह व्यक्ति पार्टी विरोधी है।

यह भी शायद पहली बार हुआ है कि आप पार्टी जो पूर्व में समस्त पार्टियांे के आंतरिक लोकतंत्र पर प्रहार करते हुये देखी गई, वही आज अन्य पार्टियों के ‘‘सर्वसम्मत निर्णय‘‘ के विपरीत ‘‘बहुमत‘‘ के निर्णय को सबसे बडी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बता कर अपनी पीठ थपथपाकर आत्मविभोर हो रही है । यह बहुमत वैसा ही है जैसा कि अन्य दूसरी पार्टियों में सर्वसम्मत (तथाकथित) निर्णय के रूप में होता रहा है। विकल्प की राजनीति करने वालों को यह समझना होगा कि राजनीति में सिघ्दांतों के साथ पूर्ण सही चमतबमचजपवद (परसेप्षन) का होना भी आवष्यक है तभी वह सिध्दान्त सही कहलाता है । तकनीकि रूप से सिध्दान्तों की बात की जाकर चमतबमचजपवद (परसेप्षन) के पूर्ण अभाव में वही तर्क दिये जा रहे है जो अन्य राजनैतिक पार्टीयॉं हमेषा लोकतंत्र के लिये लोकतंत्र की रक्षा में देती चली आ रही हैं । यह वही स्थिति है जैसा कि न्याय के बाबत् कहा जाता है ‘‘न्याय होना ही नहीं चाहिए बल्कि न्याय मिलता हुआ दिखना भी चाहिए’’ 

एक और नई चीज जो ‘‘आप‘‘ में घटित हुई वह स्टिंग ऑपरेषन जिसके जनक खुद केजरीवाल रहे जिसके द्वारा उन्होने देष की जनता से भ्रष्टाचार को समाप्त करने का आव्हान किया था। वहीं केजरीवाल के साथ किये गये ‘‘स्टिंग ऑपरेषन‘‘ को व्यक्तिगत बातचीत बताकर, तथा सार्वजनिक करने पर नैतिकता का प्रष्न लगाकर, उसे अप्रभावी करने का असफल प्रयास किया गया जो वास्तव में केजरीवाल के लिये भष्मासुर सिध्द हो गया । 

अंत में आधुनिक महाभारत की नई इबारत इसलिये कि महाभारत के धृतराष्ट ईष्वर प्रदत्त दृष्टिहीनता के कारण जो कुछ पाप उनके सामने धटित हो रहा था उसको सुनने व जानने के बावजूद (न देखने की मजबूरी) चुप रहकर मौन स्वीकृति देते रहे, लेकिन केजरीवाल ‘दूर‘ ‘दृष्टि‘ के होने के बावजूद महा धृष्टराज इसलिये कहलायेगें क्योकि सही मायनों में उक्त घटनाओं के पूर्ण पूर्व नियोजित कार्यक्रम व पूर्व निर्णित निर्णय के वे स्वयं निर्माता-निर्देषक थे । 

क्या यही ‘‘बदलाव की’’ या ‘‘वैकल्पिक‘‘ राजनीति है घ् शायद यह भविष्य नहीं बतलायेगा जैसे कि अन्य मामले में यह जुमला कहा जाता है, क्योंकि यह वर्तमान के गर्त में समाप्त होकर, अब किसी नये भविष्य की कल्पना करने की लोकतांत्रिक मजबूरी लोकतांत्रिक जनता की होगी । 
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