शनिवार, 2 जुलाई 2022

अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, साहसिक, एवं अचंभित करने व दूरगामी परिणाम देने वाला भाजपा का ‘‘दार्शनिक’’ निर्णय।

भाजपा हाईकमान मतलब सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह (बाकी तो?) के एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद पर बैठालने और देवेंद्र फडणवीस को मजबूर कर उपमुख्यमंत्री पद को स्वीकार करने के निर्णय ने राजनीति के इस मिथक को पुनः शत शत सिद्ध किया है, कि जो कुछ होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है।
महाराष्ट्र की राजनीति में धूमकेतु के समान तेजी से उभरते चाणक्य, राजनीतिज्ञ देवेंद्र फडणवीस के साथ एक दिलचस्प योग जुड़ा है कि जब वह शपथ विषम समय (आड टाइम) लेते हैं, तो राजनीति में भूचाल सा आ जाता है। याद कीजिए! पिछली बार जब उन्हें भोर सुबह 7.30 बजे शपथ ली थी, तब 3 दिन में ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से चलते होना पड़ा था। और आज मुख्यमंत्री के बजाय उपमुख्यमंत्री पद की शपथ मन मसोस कर, मजबूरी में वह भी शाम को 7.30 बजे लेना पड़ गयी। इसके पहले जब वह वर्ष 2014 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उनका शपथ ग्रहण का समय सायं 4.27 बजे था। तब उनका कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरे पांच साल चला।
बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या यह निर्णय अचानक लिया गया? वस्तुतः इसकी पटकथा तो गुजरात के वडोदरा में गहन रात्री में हुई अमित शाह के साथ एकनाथ शिंदे की तथाकथित मुलाकात में ही शायद यह लिखी जा चुकी थी। तथापि निर्णय जब भी लिया गया हो, ऐसा लगता है कि उक्त निर्णय में देवेंद्र फडणवीस को पूरी तरह से विश्वास में नहीं लिया गया। राज्यपाल के समक्ष फडणवीस ने दावा प्रस्तुत कर पत्रकार वार्ता की थी। तब उनका महाराष्ट्र भाजपा ने एक ट्वीटस के जरिए फडणवीस का वीडियो क्लिक जारी किया था, तब वे मराठी में यह कहते हुए दिख रहे है कि मैं नये महाराष्ट्र के निर्माण के लिए पुनः आउंगा। तबके उनके मुस्कुराते चेहरे के भाव की तुलना में, बाद में हुई उस पत्रकार वार्ता में जहां उन्होंने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी, तब माथे पर उभरी सलवटे के कारण चेहरे के तनाव वाले भाव से स्पष्ट हो जाता है कि,फडणवीस को उच्चतम स्तर पर हुए निर्णय में भागीदारी या विश्वास में नहीं लिया गया। फडणवीस के मुस्कुराते चेहरे के साथ दावा करते समय यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री वे ही बनेंगे। क्योंकि सरकार बनाने का दावा स्वयं एकनाथ शिंदे ने किया हो ऐसा करते या ऐसा उनका कथन मीडिया में दिखा नहीं। यद्यपि फडणवीस ने शपथ ग्रहण के पूर्व हुई पत्रकार वार्ता में यह घोषणा की थी कि शिंदे ने सरकार बनाने का दावा किया है व हमने (भाजपा) उन्हे समर्थन का पत्र राज्यपाल को दिया है। संवैधानिक स्थिति भी यही है कि यदि भाजपा शिवसेना घट की साझी सरकार (गठबंधन की) हो तो उसके नेता को ही सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाता है। और यदि सबसे बड़े दल का नेता सरकार बनाने का दावा करता है, तो उन्हे अपने बहुमत समर्थकों की सूची राज्यपाल को देनी होती है, जो देवेंद्र फडणवीस ने पूर्व में दी थी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिंदे के समर्थन में पत्र राज्यपाल को कब दिया? क्या यह सब चुपचाप राजनीति की अंधेरी गली में हो गया?
राजनीतिक घटनाक्रम जिस तेजी से, बदला उससे स्पष्ट होता है कि देवेंद्र फडणवीस को शायद अंतिम समय में ही यह सूचना दी गई थी कि उन्हे मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा रहा है। तब उनके आंखों से आंसू निकले, जैसा कि उनके एक समर्थक विधायक ने मीडिया में आकर दावा भी किया है। आंसू सुख व दुख दोनों के होते हैं। फडणवीस की एक आंख के आंसू खुशी के थे क्योंकि भाजपा की सरकार बन रही है और उस उद्धव की विदाई हो रही है जिस उद्धव ने वर्ष 2019 में फडणवीस के पास सेे सत्ता आते-आते छीन ली थी। तो दूसरी आंख के आंसू दुख व संकट के है। उनके मुह में पका हुआ निवाला हाथ डालकर खींच कर आश्चर्यचकित कर दिया गया। ऐसा लगता है, जब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बनाने का निर्णय हाईकमान ने सुनाया/बताया तब शायद फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनना होगा, यह स्पष्ट नहीं किया होगा। तभी तो उन्होंने पत्रकार वार्ता करते समय सरकार से बाहर रहने की घोषणा की। उनकी इतनी हिम्मत तो नहीं हो सकती थी कि हाईकमान का निर्णय हो जाने के बावजूद वे उसकी अवहेलना कर विपरीत मंत्रिमंडल से बाहर रहने के कथन की बात प्रेस से करते। प्रेस में उक्त कथन की घोषणा जब प्रधानमंत्री, अमित शाह व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के हमेशा खुले कानों में पड़ी, तब हाईकमान की अनुशासन की घुट्टी मिलने पर देवेंद्र फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जेपी नड्डा का यह कथन कि फडणवीस से उपमुख्यमंत्री बनने का आग्रह व केन्द्रीय नेतृत्व का निर्देश दिया था। साथ-साथ "आग्रह" व "निर्देश" से अपने आप में यह स्पष्ट संदेश देता है। यह बात इससे और स्पष्ट हो जाती है कि शपथग्रहण समारोह में मंच पर पहले दो ही कुर्सियां लगी थी, जो बाद में बढ़ाकर तीन की गई।
बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में एक तरह से सिद्धांतों व तर्को की बलि दी जाकर नये सिद्धांत व तर्क की सुविधा अनुसार गढ़ना आज की राजनीति की सामान्य, सार्वजनिक, स्वीकृत प्रक्रिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र का घटा घटनाक्रम है। याद कीजिए 2019 के चुनाव परिणाम आने के बाद जब उद्धव ठाकरे ने 56 विधायकों के रहते हुए मुख्यमंत्री पद की मांग भाजपा से की थी, तब भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया था। तब भाजपा ने यह नहीं कहा था कि उद्धव जो बाल ठाकरे के पुत्र है, का हिन्दुत्व बाला साहेब से अलग है। क्योंकि चुनाव साथ में लड़े और वोट साथ में मांगे गये थे। परन्तु आज सिर्फ 40 विधायकों के उन शिंदे नेता को बाबासाहेब के हिन्दुत्व के नाम पर मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिन्होंने ढाई साल तक उद्धव के उस हिन्दुत्व को झेला व साथ दिया जिसकी शिंदे ने अब आलोचना करके न केवल उद्धव का साथ छोड़ा, बल्कि भाजपा ने उन्हे भी हाथों हाथ लिया। कांग्रेस व एनसीपी के साथ गठजोड़ करने पर उद्धव उस हिन्दुत्व के उत्तराधिकारी नहीं रहे, जिस हिन्दुत्व को कांग्रेस विरोध के आधार पर बालासाहेब ठाकरे ने मजबूत किया था, ऐसा कथन भाजपा व शिंदे इस समय लगातार कह रहे हैं।
शिंदे उक्त आरोप लगाते समय दो तथ्यों को भूल गये। प्रथम बाला साहेब ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई आपातकाल जो स्वाधीन भारत का अभी तक का सबसे बड़ा लोकतंत्र विरोधी ‘‘काला’’ अध्याय रहा है, का समर्थन किया था। दूसरा उस भाजपा जिसके हिंदुत्व को बेहतर मानकर मजबूत करने के लिए उनसे हाथ मिलाया, वही भाजपा का पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने पर हिंदुत्व कमजोर नहीं होता है, लेकिन उद्धव का हिंदुत्व कांग्रेस के साथ पर कमजोर हो जाता है। यही तो राजनीति का असली दोहरा चेहरा है। हिन्दुत्व की बात करने वाली भाजपा क्या आज हमारी हिंदू संस्कृति को भूल गई है। आज भी कमोवेश प्रचलित हमारी हिन्दू परिवार के मुखिया की राजनीतिक सामाजिक प्रसिद्ध व साख का उत्तराधिकारी प्रायः एक सीमा तक उनकी औलाद होती है। यह एक सामान्य आम जनों के बीच स्वीकृत तथ्य है। इसीलिए तो परिवारवाद की स्थिति बनती है, जिसका राजनीतिक हथियार (ताकत व कमजोरी) के रूप में उपयोग किया जाता रहता है। इस परिवारवाद की वृत्ति के कारण उद्धव ठाकरे को ‘‘ठाकरे’’ नाम की सहानुभूति मिलना स्वाभाविक है।
हिन्दुत्व बाला साहेब ठाकरे के नाम के साथ उनके पुत्र उद्धव के साथ ‘ठाकरे’ होने के कारण रहेगा या ठाकरे द्वारा फर्श से अर्श बनाये गये नेता एकनाथ शिंदे के साथ है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है। क्या बालासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व उस भाजपा से अलग है, जो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होकर जिसकी पहचान ही हिंदुत्व है। फिर भाजपा को हिन्दुत्व बचाने या विस्तारित मजबूत करने के लिए शिवसैनिकों की जरूरत क्यों है? मतलब साफ है। 2019 के चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा अधिकतम 106 सीटों तक ही पहुंच पाई थी। तब भाजपा को यह एहसास हो गया था कि उसके पूर्ण बहुमत के आड़े वस्तुतः न तो एनसीपी है और न ही कांग्रेस, बल्कि हिन्दुत्व का नारा उठाने वाली शिवसेना ही है। और इसलिए यदि महाराष्ट्र में भाजपा को अपने दम पर सत्ता में बैठना है, तो शिवसेना को कमजोर करना ही होगा। उस कमजोरी (कमी) की भरपाई करके ही भाजपा मजबूत होगी। अदृश्य (छिपे हुए) उद्देश्य को लेकर ही दूरगामी परिणामों की आशा में यह पूरी राजनीति की पटकथा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच ही तय हुई है। शायद जेपी नड्डा भी इसमें भागीदार नहीं रहे होगें। और इसको अंजाम देना का तरीका निश्चित रूप से अमित शाह का ही रहा होगा। वैसे इसका एक दूसरा कारण दल बदल की कानूनी पेचीदगी के कारण अनिर्णय की स्थिति के रहते पिछली शर्मिंदगी करने वाली गलती से सबक लेकर भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद फिलहाल छोड़ दिया है, यह भी संभव है।
इसलिए तात्कालिक रूप से सामान्य राजनीतिक दृष्टिकोण से उपरोक्त शीर्षक मे लिखे गये शब्दों के मोती जरूर लगा सकते हैं। परन्तु वास्तव में यह हड़बड़ाहट में नहीं बल्कि बहुत ही सोची समझी दूर दृष्टि से लिया हुआ निर्णय है। सही या गलत, यह भविष्य के परिणाम तय करेंगे। और तब तक देवेंद्र फडणवीस के आंसू बहते रहेंगे उसमें खुशी व गम दोनों शामिल रहेगें। आज की राजनीति की यही नियति है। कम से कम भाजपा की यह स्पष्ट नीति अवश्य रही है कि पार्टी सर्वोच्च है और व्यक्ति छोटा होता है। अतः यदि व्यक्ति की बलि देने में से पार्टी मजबूत होती है, तो वह एक सेकंड की देरी लगाये बिना, बेहिचक पार्टी बलि ले लेती है। किसी का बलिदान ही तो किसी के लिए फलीदान होता है। आडवाणी से लेकर अनेकोंनेक उदाहरण आपके सामने है।

मंगलवार, 28 जून 2022

‘उच्चतम न्यायालय’’ कहीं स्वयं ‘‘भ्रम’’ का शिकार (‘‘एक परसेप्शन’’) तो नहीं हो गया है?

राजनीति में थोड़ी बहुत भी दिलचस्पी रखने वाले नागरिकों से लेकर राजनैतिक पंडितों,भविष्यवक्ताओं, विश्लेषक, विचारकों  और मीडिया से लेकर राजनेताओं तक में महाराष्ट्र में चल रही राजनीतिक घटनाक्रम जो देश को उद्वेलित किए हुए हैं, को लेकर उच्चतम न्यायालय क्या अंतरिम आदेश पारित करेगा?, निर्देश देगा? इस पर परस्पर न काफी विरोधाभासी विचारों, मतों, आकलनों की चर्चा होती रही, बल्कि शंका व अनिर्णय के बादल भी ‘‘अंतरिम आदेश’’ के बावजूद राजनीतिक क्षेत्र में छाये रहें। ऐसी स्थिति में भ्रम को दूर, विवाद को निर्णित करने के लिए लोग न्यायालय की ओर दृष्टि जमाये रखते है व सहायता हेतु न्यायालय की शरण में  जाते है। परंतु ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय भी स्वयं ‘‘भ्रम (कन्फ्यूजन) के बादल’’ के घेरे में आ गया प्रतीत होता है, ऐसी ‘‘कुछ-कुछ ध्वनि’’ कल पारित अंतरिम आदेश से निकलती लगती सी है। क्योंकि जो अनिश्चितता और भ्रम का वातावरण समस्त पक्षों, दर्शकों व पाठकों के बीच बना हुआ है, उस स्थिति में सिर्फ तुरंत सहायता एक पक्ष (विद्रोही गुट) को अवश्य इस बात की मिली है कि शाम को समाप्त होने वाली जीवनदायिनी रेखा की लाल बत्ती की समय सीमा बढ़कर 12 जुलाई तक की हो गई है। लेकिन उच्चतम न्यायालय स्वयं भ्रम के संकट में कैसे आ गया है? आगे इसे देखते हैं।

महाराष्ट्र में जो कुछ राजनीतिक घटनाक्रम घट रहा है, दल बदल हुआ है, वह देश में कोई पहली बार नहीं हुआ है और न ही सुप्रीम कोर्ट में इस तरह का मामला कोई पहली बार आया है। दल बदल होने पर ‘‘संख्या के दावे की सत्यता’’ के संबंध में उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक के प्रसिद्ध एसआर बोम्मई मामले में अंतिम रूप से प्रतिपादित कर दिया है कि सरकार के बहुमत का फैसला विधानसभा के फ्लोर पर ही तय होगा, राज्यपाल निवास या अन्य कोई जगह नहीं। जिस निर्णय का अभी तक पालन किया जा रहा है। लेकिन महाराष्ट्र के राजनैतिक घटनाक्रम के लगभग सात दिन व्यतीत हो जाने के बावजूद गुवाहाटी से मुंबई विद्रोही गुट नहीं पंहुचा है। इस कारण अभी तक उक्त स्थिति (फ्लोर टेस्ट) पर पहुंची ही नहीं है, यह एक राजनैतिक विश्लेषक के लिसे आश्चर्य की स्थिति है। महाराष्ट्र में दो तिहाई बहुमत से ज्यादा अधिक विधायकों के दल बदलने के कारण जाहिर तौर पर सरकार के अल्पमत में आ जाने के बावजूद भी न तो विद्रोही गुट ने सरकार से इस्तीफे की मांग की है और न ही अविश्वास का प्रस्ताव स्पीकर या राज्यपाल के पास दिया है। इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा जो परदे के पीछे रहकर परसेप्शन का निर्माण कर रही है और जो इस दलबदल के कारण भविष्य में सत्तारूढ़ होने जा रहा है, ने भी अविश्वास प्रस्ताव का कोई नोटिस ही अभी तक नहीं दिया है। 

उच्चतम न्यायालय के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा बहस की जा रही थी, तब माननीय न्यायाधीश ने एक तरफ जहां यह कहा कि विधानसभा उपाध्यक्ष जिनको अविश्वास का नोटिस मिला वे खुद स्वयं के मामले में जज बन गए और नोटिस को खारिज कर दिया। ऐसी स्थिति में डिप्टी स्पीकर ऐसे बागी विधायकों पर अयोग्यता की कार्रवाई कर सकते हैं अथवा नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न उत्पन्न होता है। बावजूद उक्त टिप्पणी के उच्चतम न्यायालय ने उपाध्यक्ष को अपने कर्तव्य निर्वाह का पालन करने से कार्य करने के लिए किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई है। यथास्थिति बरकरार रखने की मंशा दिखाने के बावजूद, ‘‘अंतरिम उपाय’’ के रूप में सिर्फ विधायकों की अयोग्यता के नोटिस की अवधि 14 दिन बढ़ाई है। अर्थात बागी विधायक 12 तारीख तक अपना जवाब प्रस्तुत कर सकते हैं। 

उच्चतम न्यायालय का कन्फ्यूजन (भ्रम) एक और जगह दिखता है, जब न्यायालय यह कहता हैं कि, अनुच्छेद 179 के तहत उपाध्यक्ष को हटाने का जब नोटिस हो तब, क्या डिप्टी स्पीकर के पास संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत ‘‘अयोग्यता की याचिका’’ पर सुनवाई का अधिकार है? यह पर्यवेक्षण (ऑब्जरवेशन) तथ्यात्मक रूप से कुछ गलत सा लगता है। क्योंकि डिप्टी स्पीकर के अविश्वास की जो सूचना मिली थी, वह उन्होंने अस्वीकार (रिजेक्ट) कर दी थी। इस प्रकार तथ्यात्मक रूप से अविश्वास का कोई नोटिस तत्समय उनके पास लंबित नहीं है। क्योंकि नोटिस को अस्वीकार करने के आदेश पारित होने के बाद नोटिस का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। हां यदि डिप्टी स्पीकर के अविश्वास के नोटिस अस्वीकार करने का आदेश गलत है, तो उसको न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए थी, जैसा कि शिवसेना के वकील अभिषेक सिंघवी का कथन था। और उच्चतम न्यायालय को निरस्त करने के आदेश की वैधानिकता पर टिप्पणी करनी चाहिए थी। परन्तु चूंकि बागी गुट ने उक्त पारित अवैधानिक आदेश को चुनौती ही नहीं दी, बल्कि उपाध्यक्ष के नोटिस व शक्ति (अधिकार) को चुनौती दी है। शायद इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने अविश्वास की सूचना को अस्वीकार करने आदेश की वैधता पर फिलहाल कोई भी विचार ही नहीं किया है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उपाध्यक्ष को इस अविश्वास का सूचना पत्र मिला अथवा नहीं, और क्या उन्होंने उक्त सूचना पत्र मिलने की स्थिति में उसे अवैधानिक मानकर निरस्त कर दिया इस तथ्य पर उच्चतम न्यायालय स्वयं भ्रम की स्थिति है, शायद इसीलिए न्यायालय में उपाध्यक्ष को शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिये है। 

2020 के राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय को छोड़कर ‘‘किहोतो’’ मामले से लेकर अभी तक ऐसे मामलों में जहां स्पीकर विधायकों को अयोग्यता के संबंध में कार्रवाई प्रारंभ कर देते हैं, तब न्यायालय स्पीकर के कार्य क्षेत्र में दखल नहीं देती रही है, जैसा कि अनुच्छेद 212 में  रोक (बार) भी है। आदेश पारित होने के बाद ही न्यायालय में आदेश को चुनौती दी जाती है। इस बात को न्यायालय के ध्यान में लाने पर माननीय न्यायाधीश का यह कथन रहा कि अध्यक्ष के अधिकार को उक्त मामले में चुनौती नहीं दी गई थी, जो अभी दी गई है। 

तथाति उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है डिप्टी स्पीकर ने रिकॉर्ड पर कहा है कि कभी भी उन्हें पद से हटाने का नोटिस नहीं दिया गया। जबकि उनके वकील राजीव धवन का यह कहना रहा कि उपाध्यक्ष के प्रति अविश्वास का जो नोटिस दिया गया था, वह विधायकों के अधिकृत ईमेल के जरिये नहीं आये थे। अतः वैधानिक न होने के कारण संज्ञान योग्य नहीं हंै। राज्यपाल का अभी-अभी उठाया गया यह कदम भी बहुत ही आश्चर्यजनक है कि सरकार के तथाकथित अल्पमत में आने के बाद आने के बाद 22, 23 एवं 24 जून 3 दिनों में राज्य सरकार ने जो प्रशासकीय आदेश जारी किए हैं, उनकी रिपोर्ट मांगी है। वास्तविकता व परसेप्शन में महाविकास आघाडी की सरकार के अल्पमत में आ जाने के बावजूद किसी भी पक्ष द्वारा सरकार के बहुमत को चुनौती न देने के कारण तकनीकि व संवैधानिक रूप से उद्धव सरकार की अभी भी बहुतमत की सरकार होने के कारण राज्यपाल का उक्त हस्तक्षेप अनधिकृत ज्यादा वैधानिक कम व राजनैतिक कदम है। 

इस पूरे प्रकरण में एक बात में बड़ी समानता व सामंजस्य दिखता है कि प्रत्येक पक्ष परदे के पीछे या आवश्यकतानुसार सामने आकर अपना-अपना ‘परसेप्शन’ बनाना चाहते हैं। इससे इस बात को पुनः बड़ा बल मिलता है कि राजनीति में एक एक्शन (कार्यरूप) से कहीं अधिक परसेप्शन का महत्व है। भाजपा निश्चित रूप से सरकार बनाती हुई दिख रही है, परन्तु ऐसा होते हुए वह बिल्कुल भी नहीं दिखना चाहती है। असम के मुख्यमंत्री के प्रथम दिन की जब मैं विधायकों की उपस्थिति की जानकारी ना होने के बयान को इसी संदर्भ में देखिये। ‘न केवल होना चाहिए बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए’’ न्याय के इस सिद्धांत के इस परसेप्शन के विरुद्ध उपरोक्त परसेप्शन है। इससे यह समझा जा सकता है कम से कम उपरोक्त निर्मित स्थिति न्यायिक नहीं है। इस प्रकार शिवसेना ‘‘कहीं खुशी कई गम’’ के भाव से ‘‘कहीं गरम तो कहीं नरम’’ आवश्यकतानुसार दिखने का परसेप्शन बना रही है, जबकि वास्तव में यदि परिस्थिति उसे अनुमति दे देती तो वह अभी तक कड़क कार्रवाई कर देती। अभी भी सेना प्रमुख की हैसियत से उद्धव उन विद्रोही को वापस आने की बार-बार गुहार कर रहे है, तो पटल (काउंटर) में विद्रोही गुट अभी भी सेना प्रमुख उद्धव को अपना नेता मानने की बात कह रहे है। जबकि विद्रोही गुट भाजपा के साथ ‘सत्ता’ की भागीदारी सुनिश्चित कर चुकी है। परन्तु वह अभी भी उस शिवसेना का भाग दिखना चाहती है, जिसके नेता उद्धव ठाकरे है। उद्धव ठाकरे पर नवाब मलिक के दाउद से संबंध है, जिसे मंत्री बनाकर आरोप लगाकर वे बागी मंत्री अभी भी मंत्रिमंडल में बने रहकर संख्या की शोभा बनाये हुए है। उद्धव  भी मंत्रियों से विभाग छीन कर परन्तु मंत्रिमंडल से मुक्त न कर सत्ता का आकर्षण बनाये हुये है। इस तरह के परसेप्शन का ‘‘खेला’’ का महागठजोड़ कभी आपने इसके पूर्व देखा है? जो होता है वह दिखता नहीं और जो दिखता है वह होता नहीं, आज की सफल राजनीति का यही मूल मंत्र है जो पारदर्शी सिंद्धान्त की राजनीति के विपरीत है। परन्तु ‘सिंद्धान्त’ की याद दिलाकर मैं भी ‘‘प्रबुद्ध बहुमत’’ से हटकर ‘‘मूर्ख’’ के साथ नहीं दिखना चाहता हूं।

शनिवार, 25 जून 2022

असम में ‘‘दोहरी’’ ‘‘बाढ़’’! का ‘तांडव’।

मेरे पारिवारिक मित्र संपादक विंदेश तिवारी का पेपर ‘‘दैनिक आत्मा का तांडव’’ नाम से बैतूल से काफी समय से प्रकाशित होते आ रहा है। इसमें मेरे लेख भी छपते रहते हैं। एक समय मैंने उनसे पूछा था कि यह नाम क्यों रखा हैं? तब उन्होंने मुझे यह जवाब दिया था कि जो आत्मा (दिल) से आवाज निकलती है, वह अनिर्लिप्त व सही होने के कारण तांडव मचाती है, क्योंकि सत्य हमेशा कड़वा होता है।
आज सुबह उनका फोन आया। उन्होंने मुझे याद दिलाया कि मेरे पेपर का नाम ‘‘आत्मा का तांडव’’ ‘असम’ में चल रही घटनाओं के परिपेक्ष में सही सिद्ध हो रहा है। वहां आई बाढ़ ने तांडव मचा के रखा है। मैंने कहा असम में तो बाढ़ हर साल आती रहती है। ब्रम्हपुत्र नदी में हर साल आयी बाढ़ से हजारों-लाखों लोग बेघर हो जाते है। जान माल का भीषण नुकसान होता है। तब तिवारी जी बोले! इस बार बाढ़ के साथ एक और बाढ़ आई है। मैंने पूछा कौन सी बाढ़ आई है? तब उन्होंने कहां ‘‘एमएललों की बाढ़’’। तब मेरा ध्यान वहां से चल रही महाराष्ट्र की राजनीतिक बाढ़ के तूफान व उबाल पर गया। तिवारी जी आगे बोले! असम के मुख्यमंत्री अंतरात्मा से बोले है और इसलिए वे सही बोले हैं। मैंने कहां अभी किसी पत्रकार ने उनसे पूछा, महाराष्ट्र के विधायकगण यहां असम में आये है और होटल में ठहरे हुये है। तो उनका यह जवाब था, मुझे पता नहीं कि महाराष्ट्र के विधायक असम में रह रहे है अथवा नहीं। हमारे यहां कई होटले बहुत अच्छी हैं। महाराष्ट्र से ही नहीं और भी प्रदेश से विधायक गण आते-जाते रहते है और रह सकते है। मैंने तिवारी जी से कहा कि मुख्यमंत्री गलत बयानी कर रहे हैं। कहां ‘‘आत्मा’’ से बोल रहे है? और यदि वास्तव में उनके उक्त कथन तथ्यात्मक रूप से सही है तो, क्या वे राष्ट्रीय व प्रादेशिक टीवी नहीं देखते हैं? पेपर नहीं पढ़ते हैं? क्या उनकी आईबी, एलआईबी, सीआईडी इतनी कमजोर हो गई है कि असम में चार दिनों से चल रही राजनीतिक जद्दोजहद की घटना, जहां 40 से अधिक विधायकों के वीडियो, फोटो, बयान वायरल होकर प्रदेश, देश व पूरा विश्व जान रहा है, देख रहा है और पढ़ रहा है। परंतु असम के हृदय की आत्मा से बोलने वाले मुख्यमंत्री उक्त जानकारी से अनभिज्ञ हैं, यह समझ से परे है । क्या ऐसा व्यक्ति  व्यक्ति राजनीति में रहने योग्य भी  हैं? तब तिवारी जी बोले, आप नहीं समझ पायेंगे। उनका मूल चरित्र क्या रहा है? वे मूल ‘जन-संघी’ से होकर भाजपाई नहीं बने है। वे मूलरूप से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रहे है, इसलिए यह कांग्रेस के ‘‘चरित्र की आत्मा की आवाज’’ है। तब  अंततः मैंने तिवारी जी के आगे हार मान ली। 
बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि राजनीति में प्रत्यक्ष सामने घट रही घटनाओं, या बनाई जा रही स्थितियों को स्वीकार करने में कोई हिचक क्यों होना चाहिए? कहा जाता है "दीवार पर लिखी इबारत" यदि आप पढ़ेंगे नहीं तो तो मात्र आपके न पढ़ने से वह मिट नहीं जायेगी,अमिट ही रहेगी। 500 से ज्यादा राज्य सरकार की फोर्स व अर्धसैनिक बल होटल की किलेबंदी किए हुए हैं। ‘परींदे’ को भी अपना आई कार्ड दिखाने पर ही अंदर-बाहर जाने-आने दिया जाता है। आखिर क्या होटल मैनेजमेंट के अनुरोध पर यह पुलिस फोर्स ग्राहकों की सुरक्षा के लिये आई है? पुलिस फोर्स के खर्चे का भुगतान "हाकिम की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी से बचने वाला" होटल मैनेजमेंट करेगा? इसके पूर्व होटल में जो गेस्ट लोग ठहरते थे, क्या उनके लिए इसी तरह का पुलिस बंदोबस्त किया जाता था? या अभी जो विशिष्ट गेस्टों की सुरक्षा के लिए यह चाक चौबंद पुलिस व्यवस्था की जा रही है? और यदि यह सब व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा उनकी जान-माल की सुरक्षा  हेतु की जा रही है, तो क्या ऐसी व्यवस्था राज्य सरकार होटलों मैं आने-जाने वाले समस्त ग्राहकों जिनकी जान पर संकट के बादल आये हो, के उनके अनुरोध पर राज्य सरकार ऐसी ही सुविधा उपलब्ध कराएगी? सवाल तो इन विधायकों के रहने खाने के भीमकाय खर्चों का भी है। तो क्या यह मान लिया जाये कि "जिसके राम धनी उसे कौन कमी"! प्रत्येक राज्य सरकार का यह एक सामान्य व संवैधानिक दायित्व होता है कि प्रदेश की सीमा में प्रवेश करने वाले प्रत्येक नागरिक की जान माल की रक्षा करे और खतरा होने पर उन्हें सुरक्षा प्रदान करे। यह ज्ञात नहीं है, कि जो विधायक गण ठहरे है उन्होंने यह कथन किया है कि अपनी जान को खतरे की आशंका को देखते हुए सुरक्षा की मांग की है। मुख्यमंत्री ने पहले ही दिन विधायकों के आने के पहले  ही सुबह-सुबह खुद होटल रैडिसन ब्लू  पहुंचकर व्यवस्था की जानकारी ली, जहां महाराष्ट्र के विधायकों को ठहराया गया। (ठहरे नहीं हैं।) आख़िर "डायन को भी दामाद प्यारे होते हैं"। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि प्रदेश में विधायकों के आने से जीएसटी में वृद्धि होगी। क्यों न हो, उक्ति है कि "यत्नम् विना रत्नम् न लभ्यते"!
बाढ़ की विभीषिका से घिरा हुआ असम के मुख्यमंत्री का पत्रकारों के प्रश्नों के जवाब में दिए गए उक्त उत्तर मुख्यमंत्री के लिए शोभा नहीं देते हैं? यदि मुख्यमंत्री उक्त राजनीतिक घटनाक्रम की सत्यता की जानकारी को स्वीकार कर लेते, तो कौन सा पहाड़ टूट जाता? इस स्वीकारिता से न तो उनके कौशल व चाणक्य बुद्धि पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगता और न ही ‘‘ऑपरेशन लोटस’’ पर कोई विपरीत प्रभाव पड़ता। विपरीत इसके, क्या इससे मुख्यमंत्री की कार्यकुशलता और क्षमता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता है? क्योंकि यदि एक मुख्यमंत्री को अपने राज्य में चल रहे एक बड़े महत्वपूर्ण राज्य की चुनी हुई सरकार को पलटाने के राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी नहीं है, जिसकी जानकारी उनको छोड़कर प्राय: सबको है, तब वे राज्य में आई नदियों की बाढ़ से ऐसे कमजोर तंत्र के रहते कैसे निपट पाएंगे? क्योंकि उन्हें बाढ़ की वास्तविक व विस्तृत जानकारी ही नहीं होगी? एक गंभीर प्रश्न मुख्यमंत्री के उक्त उत्तर से उत्पन्न होता है। क्या असम की जनता का भाग्य सुरक्षित नेतृत्व के हाथों में है? विपक्ष से लेकर भाजपा हाईकमान तक ने इस बयान पर मुख्यमंत्री को न तो कटघरे में खड़ा किया और न हीं इस्तीफा मांगा है? विपक्ष की यह स्थिति भी जनता के प्रति विपक्ष कितनी जिम्मेदारी निभाता है? उसको भी इंगित करती है।
‘ऑपरेशन लोटस’’ का अधिकार वर्तमान राजनीति में राजनीतिक पार्टी को है। क्योंकि "संघे शक्ति: कलौ युगे" वाली राजनीति के वर्तमान स्वरूप में कोई भी ‘‘दूध का धुला’’ नहीं है। ‘‘नीति’’ जो ‘‘राजनीति’’ हो गई है, सिर्फ मौके को भुनाने की होती है। "जूं के डर से कोई गुदड़ी थोड़े ही फेंकता है"। जिनको भी अवसर मिलता है, वह उसे पूरी तरह से भुनाने का प्रयास करता है। अतः ऐसे ‘‘ऑपरेशन’’ में सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हथियारों, हथकंडों का ही उपयोग किया जाये, तो वह ज्यादा उचित होता है। परन्तु सरकारी खर्च और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर उसमें होने वाला खर्चा "डेढ़ पाव आटा और पुल पर रसोई" वाली जनता के पैसे का है, जिसे किसी राजनीतिक पार्टी के हित के लिए खर्च करने का अधिकार किसी भी राजनीतिक पार्टी अथवा सरकार को नहीं है। लेकिन जनता पर भार पड़ने वाले ऐसे मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय को भी संज्ञान लेना चाहिए। जनता को भी ऐसी घटनाओं का संज्ञान लेकर अपने ज्ञान में वृद्धि कर तदनुसार पैसे के ऐसे खर्चे के दुरुपयोग को रोकने के लिए आगे बढ़कर कार्रवाई करे, क्यों कि "बिल्ली न हो तो चूहों की मौज हो जाती है"  तभी इस तरह की प्रशासनिक और शासन की सत्ता के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सकती है।
वर्षा (बरसात) वैसे तो जीवन के लिए जीवनदायिनी होती है, परंतु अधिक वर्षा बाढ़ में परिवर्तित होकर विनाशकारी हो जाती है। असम में इस समय दो तरह की वर्षा हो रही है। एक वर्षा ने असम का सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त कर सैकड़ों नागरिकों को *बेदखल* कर दिया है, तो दूसरी वर्षा ने *वर्षा* (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का सरकारी आवास) से *बेदखल* कर लाखों व्यक्तियों को एक साथ जिनके नेता को वर्षा बेदखल कर दिया है, को रोड़ पर ला दिया है। "कालस्य कुटिला गति:"! अतः दोनों सामान्य वर्षा नहीं है, जो लाभदायक होती, बल्कि बाढ़ में परिवर्तित हो गई है। इसलिए नुकसान तो होना ही है। वैसे मुख्यमंत्री की राजनीतिक  बाढ़ पर मुस्कुराते और इशारे करती हुई प्रतिक्रिया नदी की बाढ़ से उत्पन्न भीषण नुकसान के कारण माथे पर आने वाली चिंता की सलवटो पर भारी हो गई है। यह स्वयं में एक चिंता का विषय है।अभी तो आई इस बाढ़ ने *वर्षा* से ही बेदखल किया है। परंतु बाढ़ के विकराल रूप होने पर क्या वह *मातोश्री* को भी ढहा देगी? इसके लिए थोड़ा इंतजार अवश्य करना होगा।

मंगलवार, 21 जून 2022

हिंसा का ’समर्थन न’ करने के बावजूद आंदोलन हिंसात्मक ?

 'अग्नीपथ' के विरोध में "अग्निवीरों’’ द्वारा ‘अग्निपथ’ पर बिहार!

देश की सुरक्षा के लिए नौजवानों के लिए (14 जून) सेना में भर्ती हेतु नई प्रक्रिया ’अग्निपथ’ योजना (जो पूर्व में हर आफ ड्यूटी का ही रूप है) के अंतर्गत ’अग्निवीर’ बनाए जाने योजना की घोषणा होते ही अगले ही दिन ’बिहार’ जो देश के कई ’अहिंसावादी’ राष्ट्रीय आंदोलनों की जननी व अग्रणी रहा है, में ’हिंसावादी’ विरोध प्रदर्शन प्रारंभ होकर उपद्रव, तोड़फोड़, लूटमार आगजनी प्रारंभ हो गई, जो देश के कई भागों में धीरे-धीरे विस्तारित होती गई। कई राजनीतिक दलों एवं नेताओं द्वारा हिंसा का समर्थन न करते हुए आंदोलनकारियों की मांग का समर्थन करते हुए उनसे शांतिपूर्ण आंदोलन की अपील की गई। यह भी कहा गया हिंसा किसी समाधान का रास्ता नहीं है। सरकारी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए। कानून हाथ में नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन ‘‘घर घाट एक करने के’’ बावजूद आंदोलन का हिंसात्मक रूप कमोबेश बरकरार है।

महत्वपूर्ण प्रश्न यह पैदा होता है कि आंदोलन को हिंसात्मक स्वरूप कौन दे रहा है? क्या स्वयं आंदोलनकारी हिंसात्मक रुख अपनाए हुए हैं? यह प्रश्न इसलिए उत्पन्न होता है कि यदि आंदोलन स्वस्फूर्त है, तब प्रायः इन आंदोलनकारी युवकों ने इस हिंसा का विरोध क्यों नहीं किया और न ही ऐसा कोई बयान उनकी तरफ से अभी तक आया हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यह आंदोलन बिना कोई नेता के नेतृत्व विहीन है। सरकार को भी यह देखना आवश्यक होगा कि आंदोलन में सभी लोग क्या वे युवा (या उनके परिवार के लोग) हैं जो सेना में भर्ती होना चाहते हैं और जिनके हित अग्निपथ योजना से अहित हो रहे है, अथवा अन्य अवांछनीय तत्व भी हैं। तब विपक्ष पर राजनीति करने के सरकार के आरोप को ज्यादा बल मिल सकता है। यदि आंदोलन विपक्ष द्वारा योजनाबद्ध रूप से निर्मित, प्रेरित या उत्प्रेरित व पोषित है, जैसा कि आंदोलन प्रारंभ होने के बाद से ही सत्ता पक्ष, विपक्ष पर लगातार आरोप लगाते आ रहा है, यह कहकर कि देश के युवाओं को विपक्ष गुमराह कर रहा है। तब ऐसी स्थिति में विपक्ष अपनी हिंसा में अपनी असलिगंता को मजबूती देने के लिए स्पष्ट रूप से क्यों नहीं घोषणा करता है कि यदि आंदोलन का हिंसात्मक रूप जारी रहेगा तो विपक्ष युवकों के इस आंदोलन का समर्थन तब तक नहीं करेगा जब तक हिंसा जारी रहेगी। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार विपक्ष ताल ठोक कर यह कहता है कि वे हिंसा का समर्थन किसी भी स्थिति में नहीं करते हैं।

वैसे हिंसा के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने वाली भाजपा व उनकी सरकारें इस तरह की स्थितियों से निपटने में सिद्धहस्त उनकी सरकारें (जैसे बुलडोजर मुख्यमंत्री योगी नाथ) हिंसाई उपद्रवियों पर बुलडोजर कार्रवाई करने के नाम पर ‘‘गिन गिन कर पैर’’ क्यों रख रही हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है? उत्तर प्रदेश के कई भागों में ‘‘अग्निपथ योजना’’ के विरोध को लेकर हिंसात्मक आंदोलन हुए। परंतु बुलडोजर मुख्यमंत्री योगी ने अभी तक उस तरह की कोई जवाबी बुलडोजर कार्रवाई नहीं की और न ही मंशा दिखाई, जैसा कि उत्तर प्रदेश में कुछ समय पूर्व हुए दंगों के समय की गई थी। क्या दोनों घटनाओं की हिंसा में अंतर है? या अंतर बनाया जा रहा है? आखिर हिंसा ’हिंसा’ ही होती है। इस तरह की ’दोहरी नीति’ अपनाई जाने से ही ओवैसी जैसे विवादास्पद व्यक्तियों की ‘‘आंखों में सरसों फूलने लगती है’’, और अनचाहे ही उन्हें अपनी नेतागिरी चमकाने का अवसर व बल मिल जाता है।

स्वतंत्र भारत के पिछले 75 वर्षों में किसी भी आंदोलन के संबंध में सत्ता व विपक्ष की परस्पर भूमिका, भागीदारी व नीतिगत रोल में प्रायः कोई बदलाव नहीं आया है। हां सत्ता-विपक्ष में बैठे चेहरों का परस्पर बदलाव जरूर हुआ है, जैसे कि ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’। इसी कारण से आज भी वर्तमान आंदोलन के संदर्भ में सत्ता-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर ’देश हित’ के नाम पर ’देश हित को एक तरफ (साइड)’ में कर ’राजनीति’ चमकाने के लिए चल रहा है। वैसे भी भाजपा ने विपक्ष खासकर कांग्रेस पर  गंभीर आरोप लगाया है कि वह ’राष्ट्रनीति’ के बजाय ’राजनीति’ कर रही है। राष्ट्र नीति से राजनीति शब्द कब अलग हो गया, इसका पता देश की जनता को चल ही नहीं पाया। अब चंूकि राजनीति एक गाली सूचक शब्द हो गई है, बदनाम हो गई है और भाजपा उक्त आरोप लगाकर बदनाम ’राजनीति’ शब्द पर मोहर लगा रही है। तब आश्चर्य की बात यह है कि जिस राजनीति के मैदान में खेल कर, राजनीति कर, जीत कर, राजनेता बनकर उक्त बयान देने में सक्षम व प्राधिकृत हुए हैं, उसी का निरादर कर रहे हैं, यह तो वही बात हुई कि ‘‘बाप से बैर, और पूत से सगाई’’!! इस स्तर पर यह भी सोचने की गहन आवश्यकता है कि आखिर राजनीति नैतिक मूल्यों रहित होकर उसका स्तर इतना क्यों गिर गया कि आज सही स्वच्छ और ईमानदार आदमी न तो राजनीति में आना चाहता है और यदि आ भी जाए तो उसके सफल होने की संभावनाएं भी लगभग निरंक ही होती है। इसके लिए राजनीति में अंदर तक घुसे हुए, डूबे हुए राजनेता ही सिर्फ जिम्मेदार नहीं है, बल्कि जनता भी उतनी ही दोषी है जिनके सहारे ये नेतागण राजनीति कर पाते हैं।

सरकार, यहां तक कि सेना की तरफ से यह कहां जा रहा है कि नौजवान युवाओं को बहकाया, बरगलाया, भड़काया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही उत्पन्न होता है, क्या ऐसे बहक जाने वाले युवकों को सेना में भर्ती किया जाना देश हित में होगा? इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाना चाहिए? बिना तथ्यों व जांच के मुद्दे का सामान्यीकरण कर इस तरह के कथनों से बचना चाहिए।

एक बात और! स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत सरकार की सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना के संदर्भ में युवाओं के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के चलते युवाओं को समझाने के लिए तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारीगणों ने मीडिया के सामने आकर अग्निपथ योजना के विभिन्न गुणों और फायदों को देश के नौजवानों के सामने रख उन्हें समझाने का प्रयास किया। परंतु साथ ही आंदोलन को भी गलत ठहराया। जबकि उक्त कार्रवाई की जिम्मेदारी, योजना बनाने से लेकर पूरी तरह से कार्यान्वित करने तक का अधिकार क्षेत्र केंद्रीय शासन, रक्षा मंत्रालय व गृह मंत्रालय का है। भारत सरकार की उक्त सैनिक भर्ती नई नीति नीति ’अग्निपथ’ में किसी भी प्रकार की संशय या गलतफहमी को दूर करने के लिए रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव या सेना के मीडिया प्रवक्ता (पीआरओ) अथवा अधिकतम जब तीनों सेनाओं के चीफ सीडीएस पद निर्मित किया गया है, तो सीडीएस ने स्पष्टीकरण देना चाहिए था। तथापि जनरल विपिन रावत की मृत्यु के बाद फिलहाल सीडीएस का पद रिक्त है। अतः पुरानी व्यवस्था अनुसार चीफ आफ स्टाफ कमेटी अर्थात आर्मी चीफ के द्वारा स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए था। परंतु धमकी भरे अंदाज में आंदोलित नवयुवको पर दबाव बनाने के लिए एयर मार्शल व वाइस एडमिरल सहित चार वरिष्ठ सैनिक अधिकारियों को सरकार ने कैमरे के सामने पत्रकार वार्ता में बैठाला और यदि उन्होंने स्वयं स्पूर्ति से पत्रकार वार्ता आयोजित की है तो यह एक बड़ा गंभीर मामला है जो उनका क्षेत्राधिकार या कर्तव्य नहीं है।  

राष्ट्रनीति या आंदोलन का राजनीतिकरण हो रहा है, यह सिद्ध होना तो अभी शेष है, परंतु निश्चित रूप से उक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस से सेना के राजनीतिकरण का एक हल्का सा प्रारंभिक आभास अवश्य पैदा होता है। जिससे हर हालत में बचा जाना चाहिए था। क्योंकि उक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा गया कि आंदोलन के पीछे असामाजिक तत्वों के साथ-साथ कुछ कोचिंग संस्थाओं का हाथ है। अग्निपथ योजना वापिस नहीं ली जाएगी। इस तरह के आरोप लगाने व अग्निपथ योजना को वापस लेने का नीतिगत निर्णय का पूर्ण अधिकार भारत सरकार उनके मंत्रियों और पार्टी के पदाधिकारियों को है। सेना को नहीं। अतः इस ’चूक’ की गंभीरता को समझना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो पाए और किसी को भी सेना पर उंगली उठाने का इस तरह का अवसर न मिल सके।

एक बात और! आंदोलन समाप्त करने के लिए ’अग्निपथ योजना वापस लिए बिना’ दूसरे विकल्पों व उपायों पर सरकार क्यों नहीं विचार करना चाहती है? आंदोलन का मुख्य आक्रोश का कारण प्रमुख रूप से वे युवा लोग हैं, जो पिछले दो-तीन सालों से सेना में भर्ती के लिए तैयारी कर रहे हैं, ट्रेनिंग ले रहे हैं। कुछ लोगों ने परीक्षा पास कर ली है। तो कुछ ने प्रथम स्तर को पार कर लिया है, तो कुछ के मेडिकल फिटनेस भी हो चुके हैं। कुछ लोगों ने इंटरव्यू भी पास कर लिया है और पिछले साल भर से उनको सर्विस सिलेक्शन बोर्ड द्वारा अगली कार्रवाई के लिए पत्र पर पत्र तारीख बढ़ाने के दिए जा रहे हैं। यदि ऐसे लोगों की अंतिम भर्ती पूर्व नियम व घोषणा अनुसार पूरी कर ली जावे तो इसमें सेना का नुकसान क्या है? अधिकतम आप यह मान लीजिए की यह योजना 6 महीने बाद लागू की जा रही है। कई आंदोलनकारी युवाओं ने कहा है की पुरानी योजना के साथ नई योजना समानांतर या विकल्प रूप में चलती रहे तो इसमें नुकसान कहां है? और यदि वास्तव में यह योजना पुरानी योजना से ज्यादा अच्छी है, फायदेमंद है, और देश हित में है, तो सेना में भर्ती होने वाले नौजवान इसे ही अपनाएंगे, पुरानी योजना को नहीं। सरकार को अपनी नई योजना की विश्वसनीयता पर विश्वास होना चाहिये। 

सरकार को इस समय कृषि कानून के समय अपनाई गई, किसी को ‘‘जूते के बराबर भी नहीं समझने’’ वाली अक्खड़ नीति से बचना चाहिए। यदि तत्समय केंद्रीय सरकार किसानों को न्यूनतम खरीदी मूल्य के कानूनी प्रावधान बनाने की गारंटी दे देती तो, आंदोलन खत्म हो जाता और तीनों कृषि कानून वापिस नहीं लेने पड़ते। भारत सरकार की किसी योजना, नीति या बनाए गए कानून के संबंध में प्रधानमंत्री ने अग्निपथ योजना का नाम लिये बिना सांकेतिक रूप से प्रथम बार यह स्वीकार किया है कि तात्कालिक रूप से कोई योजना अप्रिय लग सकती है, लेकिन समय के साथ उसका फायदा मिलता है। जब कोई सुधार लाया जाता है तो वर्तमान में कुछ फैसले अनुचित प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन बाद में वे महत्वपूर्ण साबित होते है व राष्ट्र निर्माण में सहायक होते है। ऐसी स्वीकृति तीनों कृषि कानून, जीएसटी या नोटबंदी के समय नहीं की गई, बल्कि अभी की तरह यही कहा गया कि किसानों, व्यापारियों व आम जनता को ठीक तरह से कानून नहीं समझाया गया है, बल्कि बरगलाया गया है।

अंत में सरकार को पिछली घटनाओं से सबक लेकर खुले दिल दिमाग व मन से घटनाओं पर नज़र रखते हुये राज्यों की स्थिति पर विचार कर सहमति का रास्ता निकालने की आवश्यकता है। 


गुरुवार, 9 जून 2022

क्या ‘‘न्यायिक प्रक्रिया’’ पर देश की ‘‘राजनीति’’ ‘‘राजनेताओं’’ और आध्यात्मिक धर्मगुरूओं का विश्वास कम होते जा रहा है?


भारतीय जनता पार्टी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के न्यूज चैनल टाईम्स नाउ-नवभारत में टीवी डिबेट के दौरान दिये गये ‘‘पैगंबर मोहम्मद’’ के प्रति तथाकथित विवादित कथनों को लेकर देश में ही नहीं ‘‘खरबूजे़ को देख कर रंग बदलने वाले खरबूजों’’ की तरह कुुछ अरब (खाड़ी देश) मुस्लिम देशों में हलचल पैदा होकर हंगामा मच गया है। ‘‘इस्लामी सहयोग संगठन’’(ओआईसी) जो मूलतः 57 मुस्लिमों  देशों का संगठन है, जिन्होंने बाकायदा लिखित बयान जारी कर निंदा कर भारत सरकार से तुरन्त कार्यवाही करने की मांग की है। कतर, कुवैत, ईरान की सरकारों ने बाकायदा भारतीय राजदूतों को तलब कर अपना कड़ा विरोध जताया गया। ईरान तो अपने ही देश की लोकोक्ति ‘‘हर सुख़न मौका व हर नुक़्ता मुक़ाने दारद’’भूल गया। 
अभी तक 15 देश विरोध जता चुके हैं। आश्चर्यजनक व देश को शर्मसार करने और ‘‘सूप बोले तो चलनी भी बोले’’ वाली घटना तो ‘कतर’ देश की है, जहां हमारे देश के उपराष्ट्रपति के दौरे के दौरान ही राजदूत को तलब करने की हिमाकत की गई। इसे सहन न किया जाकर, माकूल जवाब दिया जाना चाहिए। विश्व पटल पर मजबूत होते भारत के लिए यह स्थिति न केवल कुछ शर्मसार करने वाली है, बल्कि हमारे देश के आंतरिक मामलों में विदेशों द्वारा यह हस्तक्षेप जैसी स्थिति है। वास्तव में भारत सरकार को यह कहकर की ‘‘इस तरह की प्रतिक्रियाएं हमारे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानी जाएंगी’’, कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए थी। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उक्त बयान भारत सरकार या भाजपा की अधिकृत लाइन नहीं है। इसीलिए भारत सरकार व भाजपा ने अपने को इस बयान से बिलकुल अलग-थलग कर अधिकृत बयान जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है, जिसकी विदेश मंत्रालय के स्तर पर कदापि आवश्यकता नहीं थी।
वैसे भी विश्व की सबसे बड़ी सदस्य संख्या वाली पार्टी होने के कारण व्यक्तिगत स्तर पर कई महत्वपूर्ण सदस्य ‘‘छपास’’ की कमजोरी के चलते विवादित बयान देते रहते रहे हैं। परन्तु इसके लिए भारत सरकार को ही कटघरे में खड़े कर देना अन्याय पूर्ण व औचित्य हीन होगा। वैसे स्वयं ‘‘कांच के घर’’ में रहने वाले मुस्लिम देश जहां उनके देशों में ही अल्पसंख्यकों के साथ खासकर शिया-सुन्नी के बीच कैसा व्यवहार किया जा रहा है, किसी से छिपा नहीं है। चीन में मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारो के लिए ओआईसी मूकदर्शक की मुद्रा में बैठा है, ऐसे देश ही ‘‘टफन ग्लास’’ से घिरे भारत पर पत्थर फेंकने का अपरिणाम रहित असफल प्रयास कर रहे हैं। खैर फिर कभी इस विषय पर विस्तृत चर्चा, किसी अन्य लेख में।
इस घटना के आश्चर्यजनक दो पहलू है। प्रथम घटना के सात दिवस बाद मुस्लिम देशों के ऐतराजों के तत्पश्चात ही दबाव में भारतीय जनता पार्टी ने नूपुर शर्मा के खिलाफ पार्टी संविधान नियम के विरूद्ध कार्यवाही करते हुये छः साल के लिए पार्टी से निलम्बित/निष्कासित कर दिया। जबकि पार्टी संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान है कि सर्वप्रथम संबंधित सदस्य को कारण बताओं सूचना पत्र जारी कर ही निलंबित किया जा सकता हैं। तत्पश्चात ही उनके द्वारा प्रस्तुत जवाब पर अनुशासन समिति विचार कर या विशिष्ट परिस्थिति में अध्यक्ष विशेषाधिकार का उपयोग कर संबंधित व्यक्ति को छः साल के लिए निष्कासित कर सकते हैं। परन्तु नूपुर शर्मा के मामले में निष्कासन के पूर्व इस तरह की कोई वैधानिक नियम की पूर्ति करने का कोई विचार ही पार्टी के जेहान में नहीं आया। क्यो?
इससे यह भी प्रतीत होता है कि वह भारत सरकार जो रूस-यूक्रेन युद्ध में अंतर्राष्ट्रीय विभिन्न देशों के दबाव में नहीं आई, बल्कि देशहित को देखते हुये बनाई गई नीति को उसने जारी रखा। वहीं भाजपा को प्रस्तुत मामले में मुस्लिम देशों के आगे झुककर अपनी पार्टी के संविधान के खिलाफ आनन-फानन में अवैधानिक तरीके से देश व प्रधानमंत्री की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर पड़ने वाले प्रभाव के दबाव के चलते कार्यवाही करनी पड़ी। यह तो ‘‘जूं के ड़र से गुदड़ी फेंकना’’ हुआ। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा की कार्यवाही, सरकार खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अंतर्राष्ट्रीय छवि को धक्का न पहुंचे और अरब देशों से बड़े व गहरे व्यापारिक संबंधों को देखते हुये कि ‘‘सर सलामत तो पगड़ी हजार’’ उक्ति के अनुसार देशहित में उठाया गया उक्त कदम भी हो सकता है। 
दूसरी बात जिस मंच-मीडिया के माध्यम से उक्त तथाकथित विवादित बयान विश्व में प्रसारित हुआ है, उस मीडिया व प्रोग्राम एंकर के खिलाफ कोई कार्यवाही सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने या सरकार की अन्य किसी भी एजेंसी ने अभी तक नहीं की है। उक्त एंकर ने टीवी डिबेट के दौरान उक्त विवादित कथन को रोकने का कोई भी प्रयास नहीं किया। न ही डिबेट के दौरान माफी मांगने को कहा और न ही उक्त चैनल ने बाद में भी इस अप्रिय स्थिति जिस कारण कानपुर में दंगा-फसाद हो गया, के लिए माफी मांगी। जब देश में ही विभिन्न लोग खासकर मुस्लिम संगठन, क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, सिंद्धान्त को आधार मानकर नूपुर शर्मा के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही करने मांग कर रहे हैं व उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की जा रही है। तब उस मीडिया चैनल के खिलाफ न्यायोचित कार्यवाही क्यों नहीं? यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सिर्फ उत्पन्न ही नहीं होता है, बल्कि यह देश की एकता, अखंडता, सांप्रदायिकता चिंता का एक बड़ा गंभीर विषय बन जाता है। क्योंकि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ही कानपुर में दंगे भड़के, जिस पर उत्तर प्रदेश सरकार आवश्यक कानूनी कार्यवाही कर रही है।
इस घटना पर एआईएमआईएम अध्यक्ष, सांसद एवं बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी का ‘‘अपनी डफली अपना राग वाला ’’यह कथन कि नूपुर शर्मा के खिलाफ सात दिवस बाद कार्यवाही करना देरी से की गई कार्यवाही है, और उसे तुरन्त गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? ‘‘गधा मरे कुम्हार का और धोबन सती होय’’ निलम्बन महज दिखावा है। यह बयान न केवल कानून व्यवस्था पर विश्वास न करने वाला बयान है, बल्कि उनके द्वारा कानून को हाथ में लेने जैसी स्थिति है। ओवैसी को यह याद दिलाना जरूरी है, हालाकि वे भूले नहीं है, बल्कि हमारी जनता व मीडिया भूल जाती है कि, ‘‘अगर आप कांटे फैलाते हैं तो कृपया नंगे पैर न चलें’’। इन्ही असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने वर्ष 2013 में हैदराबाद में सरेआम जनता के बीच कहा था कि हम (मुसलमान) 25 करोड़ हैं, और तुम (हिंदू) 100 करोड़ हो, 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो, देख लेंगे किसमें कितना दम है। वाह,‘‘ गंजी कबूतरी और महल में डे़रा’’। ओवैसी से पत्रकारों द्वारा इस भड़काऊ व शांति भंग पैदा करने वाले बयान पर प्रतिक्रिया पूछने पर उन्होंने उस बयान की निंदा नहीं की, बल्कि उन्होेंने कहा था कि अभी प्रकरण न्यायालय में है। न्यायालीन व्यवस्था पर विश्वास रखिये, उनका निर्णय आने दीजिये। अंततः वे सही साबित भी हुये, जब हाल ही में न्यायालय ने उक्त बयान को भड़काऊ बयान नहीं मानकर अकबरुद्दीन को बरी कर दिया।
क्या असदुद्दीन ओवैसी का स्वयं द्वारा प्रतिपादित न्याय का यह सिंद्धान्त वर्तमान प्रकरण पर लागू नहीं होता है? जो वे न्याय प्रक्रिया से परे नूपुर शर्मा के विरूद्ध कार्यवाही करने की मांग कर रहे है। नूपुर शर्मा का उक्त बयान सांप्रदायिक है या संविधान द्वारा प्रदत्त बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की सीमा का अतिक्रमण कर, देशहित के खिलाफ, माहोल बिगाड़ने वाला है या पैगंबर मोहम्मद के विरूद्ध है, यह तय तो न्यायालय ही करेंगा। हां आप (असदुद्दीन ओवैसी) जरूर पूज्य पैगंबर मोहम्मद साहब के वकील बनकर नूपुर शर्मा के खिलाफ न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रख सकते है और सफलता न मिलने पर उच्चतम न्यायालय तक जा सकते है। परन्तु तब तक तो आपको वैसा ही धैर्य रखना होगा जैसा कि आपने अपने भाई के मामले में न्यायालीन निर्णय आने तक का रखा व दूसरों को भी ऐसी ही सलाह दी थी।
इसीलिए मैंने पहले ही कहा है कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया ध्वस्त होती जा रही है। इसके एक ही नहीं अनेकानेक उदाहरण आपके सामने हैं। हमारे देश में आज एक नहीं अनेक केजरीवाल है, जो कि ‘‘माल कैसा भी हो, हांक हमेशा ऊंची लगाते हैं’’ स्वयं ही अभियोजक, वकील, जज और जनता बनकर संविधान द्वारा स्थापित न्यायिक प्रक्रिया अपनाये बिना ही प्रकरण को निर्णित कर देते है। जैसा कि सत्येन्द्र जैन के मामले में उन्होंने किया। हम टीवी चैनलों पर अक्सर असंवैधानिक, अवैधानिक, सांप्रदायिक, देश विरोधी, सामाजिक व्यवस्था को तार-तार करने वाली जातिवादी बयानों आदि आदि को सुनते हैं, देखते हैं, वीडियोज् देखते हैं और स्टिंग ऑपरेशन देखते हैं। बावजूद इसके संबंधित पक्षों या सरकार द्वारा यही कहा जाता है कि इसकी सत्यता की जांच करने के बाद ही तदनुसार आवश्यक कार्यवाही की जाएगी। तब यही सिद्धांत नूपुर शर्मा के कथन के मामले में क्यों नहीं अपनाया जा रहा है, प्रश्न सबसे बड़ा यही है? 
हमारे देश की खूबी परिपक्व होता विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। देश का यह लोकतंत्र चार खम्बों पर टिका हुआ है और इन चार खम्बों में सबसे महत्वपूर्ण न्यायपालिका ही है, जो शेष तीन खम्बों को मजबूती प्रदान करती है। अतः यदि न्यायपालिका कमजोर होगी तो लोकतंत्र व अंततः देश ही कमजोर होगा। अन्यथा आज ‘अंलकारों’ के साथ किस तरह के शब्दों का उपयोग पक्ष-विपक्ष किसी भी घटना को लेकर परस्पर कर रहे है, वह कहीं न कहीं हमारे ‘तंत्र’ को कमजोर ही करती जा रही है। इससे भविष्य में आपके बोलने की इस तरह की स्वतंत्रता भी प्रतिबंधित हो सकती है। इस बात को ध्यान में रखना होगा। फिर भी मेरा देश महान! मेरे नेता, जनता महान।

शुक्रवार, 3 जून 2022

अरविंद केजरीवाल अभियोजक, वकील, जज, जनता और भविष्यवक्ता! सब एक साथ?


दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को आय से अधिक संपत्ति के मामले में प्रर्वतन निदेशालय (ईडी) ने गिरफ्तार कर लिया। अन्ना आंदोलन से निकली गले तक पानी पी-पी कर भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध ईमानदारी की डंके की चोट पर स्थापित नई वैकल्पिक स्वच्छ राजनीति का दावा करने वाली आप पार्टी व उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल; भ्रष्ट्राचार के मामले में गिरफ्तार उनके ही मंत्री सत्येन्द्र जैन को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के समान तुरंत मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की बजाए उसे क्लीन चिट दे रहे हैं। यह न केवल  उनके दोहरे चरित्र का घोतक है, बल्कि उन्होंने एक ही झटके में भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध ईमानदारी से कड़ी मुहिम चलाने वाली अपनी छवि को समाप्त कर दिया। क्यों? शायद उक्त मामले की आगे *जांच की आंच* उन पर भी आ सकती हो? भविष्यवक्ता होने की दृष्टि से शायद उन्होंने अपनी सुरक्षा को ढाल बनाने हेतु उक्त नीति अपनायी हो? इस प्रकार वे इस प्रकरण में उसी राजनीति का हिस्सा हो गए हैं, जिसको बदलने को लेकर ही राजनीति में आने का दावा उन्होंने किया था। 
एक तरफ पंजाब के मुख्यमंत्री, मंत्रिमंडल में अपने ही मंत्री के विरूद्ध खुद साक्ष्य जुटाकर उन्हे गिरफ्तार करवाती है। वही दूसरी ओर भगवंत मान चेले के गुरू केजरीवाल कार्यवाही करना तो दूर, उन्हे ‘‘हरीशचंद्र’’ बनाने में बेशर्मी से आधारहीन तथ्यों व तर्कों के साथ तुले हुये है। जिस भारतीय संविधान का सहारा लेकर वे अपने विरोधियों पर गंभीर आरोप लगाने में कभी भी चुकते नहीं हैं, उसी संविधान में यह भी व्यवस्था है कि हरिश्चंद्र बने रहने के लिए आरोप लगाने के बाद जांच से उत्पन्न आरोपों की गर्मी की भाप से गुजर कर  निर्दोष बाहर आने पर ही, अर्थात जांच की परीक्षा में सफलतापूर्वक परिणाम निकलने पर ही सत्यवादी हरिश्चंद्र कहलायेेगें? केजरीवाल के निर्दोष घोषित कर देने के प्रमाण पत्र से नहीं। केजरीवाल के ध्यान में यह बात अवश्य ज्ञात होगी। यही सिंद्धान्त अन्ना आंदोलन का मूल आधार जिसके लिए ‘‘अन्ना’’ के साथ केजरीवाल लड़े थे। जिस आंदोलन की अंतिम परिणिति की उत्पत्ति नौकरशाह केजरीवाल से राजनेता केजरीवाल के रूप में हुई।
एक आईआरएस (भारतीय राजस्व सेवा) अधिकारी आयकर कमिश्नर के रूप में कार्य कर चुके अरविंद केजरीवाल का यह कथन कि मैंने सत्येन्द्र जैन के सारे कागजात देखे है, केस बिल्कुल फर्जी है और उसे झूठा फसाया जा रहा है। हम  कट्टर ईमानदार व देशभक्त लोग है। सर कटा सकते हैं, लेकिन भ्रष्ट्राचार नहीं करेगें। वे यही तक नहीं रूके, बल्कि यह भी कह गये कि वह पदविभूषण या इस जैसा अन्य कोई भूषण पाने तक के अधिकारी हैं। अरविंद केजरीवाल ने किस हैसियत (एथोरिटी, प्राधिकार) से उन्होंने उक्त निर्णय दे दिया जो सिर्फ उन पर ही बंधनकारी हो सकता है, किसी अन्य पर नहीं। पढ़ा लिखा आदमी भी कभी-कभी अक्ल के अजीरण के कारण पगला सा होकर पागल जैसी हरकतें करने लग जाता है। वर्तमान जैन मामले में केजरीवाल का कार्य-रूप लगभग वैसा ही दिखता है। इस कड़ी में वे उपरोक्त अभियोजक, वकील, जज व जनता के साथ भविष्यवक्ता भी बन गये, जब वे टीवी पर आकर यह घोषणा कर देते है कि निकट भविष्य में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी गिरफ्तार होने वाले हैं। 
यह बात भी सही है कि वर्ष 2015 में इन्ही अरविंद केजरीवाल ने अपने द्वितीय कार्यकाल (क्योंकि पहला कार्यक्रम तो मात्र 50 दिन का ही रहा।) में अन्य राजनीतिक पार्टियों व नेताओं को आईना दिखाते हुए अपने खाद्य मंत्री असीम अहमद खान को एक बिल्ड़र से 6 लाख रू. रिश्वत मागने के आरोप में बर्खास्त कर प्रकरण सीबीआई को सौंप दिया था। परंतु इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले *ट्रेलर* जारी किया जाता है, जो बड़ा प्रभावी होता है। परंतु हमेशा यह जरूरी नहीं होता कि फिल्म भी उतनी ही प्रभावी हो। यही सिद्धांत अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लेकर की गई कार्रवाई व अब बचाव पर भी लागू होती है। इसी प्रकार पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी अपने कार्यकाल के प्रारंभिक दिनों (लगभग 70 दिन के भीतर) में ही स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया। अरविंद केजरीवाल की पूरी फिल्म *सत्येंद्र जैन प्रकरण* ने 2015 के ट्रेलर को गलत ही सिद्ध कर दिया। अभी भगवंत मान की पूरी फिल्म देखनी बाकी है?  
क्या अरविंद केजरीवाल की याददाशत बहुत कमजोर हो गई है? या उन्हे याद दिलाना होगा? अंन्ना आंदोलन में भाग लेते समय भ्रष्ट्राचार को लेकर जिस बात को प्रमुखता से उछाला व मुद्दा बनाया गया था वह यही था, कि संसद में 150 से अधिक अपराधी व दागी सांसद चुनकर आये है, जिन पर सामान्य से लेकर जघन्य अपराधों के मुकदमें चल रहे है। यह असली संसद नहीं है असली संसद वह है जो लोग सामने खड़े हुए हैं। अतः दागी सांसद सब इस्तीफा देकर बाहर आयें। मुकदमा लडे़। और मुकदमें से बरी होने पर फिर से चुनाव लड़कर अंदर आए। क्या सरे आम दिन-दहाडे अरविंद केजरीवाल स्वयं को न्यायाधीश मानकर सत्येन्द्र जैन को क्लीन चिट देकर अन्ना आंदोलन के उक्त मूल सिंद्धान्त की हत्या नहीं कर रहे है? एक आरोपित भ्रष्ट्राचारी को सरंक्षण देना भी अपराध में शामिल होने समान ही है। इस बात को समझाइश देने की आवश्यकता अरविंद केजरीवाल को नहीं है। क्योंकि वे खुद कहते है कि मैं पढ़ा लिखा आदमी हूं, कानून की बहुत समझ है। इसलिए मैं कहता हूं कि वे पढ़े-लिखे नहीं बल्कि *ज्यादा पढ़े लिखे* हैं।

बुधवार, 1 जून 2022

मेरा देश भारत महान! लेकिन मैं?

भारत मेरी मातृभूमि है। मैं देश का नागरिक हूं। इसलिए बेशक बेहिचक मेरा देश महान है। परन्तु ‘‘एक हाथ से ताली नहीं बजती‘‘। मैं कितना महान हूं? इसी के जवाब में मेरा देश कितना महान है? उत्तर मिल जायेगा। लेकिन इसके पूर्व में ‘‘मैं’’ व ‘हम’ पर कुछ बातें अवश्य आपसे साझा करना चाहता हूं। 

प्रायः हम सब दिनचर्या में ‘हम’ शब्द का प्रयोग ‘मैं’ की तुलना ज्यादा करते है। जैसे ‘‘हम बदलेगें, युग बदलेगा’’ विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन गायत्री परिवार का महत्वपूर्ण मूल ‘नारा’ है। परन्तु हम ‘‘हमारा देश महान’’ के बदले ‘‘मेरा देश महान’’ प्रयुक्त करते है। ‘हम’ में ‘‘मैं’’ शामिल है, परन्तु हम का मैं स्वयं को छोड़कर दूसरे के ‘‘मैं’’ को शामिल कर वह ‘हम’ को पूरा करता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में मैं छूट जाता है, जिससे व्यक्ति स्वयं को अप्रभावी कर लेता है। क्योंकि व्यक्ति की सामान्यतः प्रवृत्ति यही होती है। ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’’ की वीडियो पर चलते हुए अर्थात पड़ोसी, दूसरे से अच्छे व्यवहार, आचरण व कार्य की आशा करते है और इसी आशा में, मैं (स्वयं) को भूल जाते हैं। यह मानकर कि दूसरा तो करेगा ही। अतः यदि ‘मैं’ सार्थक रूप से जमीन में उतर गया तो वह ‘हम’ में परिवर्तित हो जाता है अन्यथा वह ‘‘अपने मुंह मियां मिट्ठू‘‘ होकर रह जाता है। इसीलिए ‘‘मेरा देश महान’’ कहा गया है। जो ‘‘मैं + मैं’’ ‘‘हम’’ बनकर देश को मजबूती प्रदान करेगा। अतः आज के समय की आवश्यकता स्वयं को सुधारने की ही है। ‘मेरा देश महान’ के कुछ उदाहरण आगे आपके सामने प्रस्तुत है, जिस पर गंभीरता पूर्वक विचार कर मंथन करे कि निम्न घटनाएं मेरे देश को कितना ‘महान’ बनाती है।  

1. जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान दर की चीन से तुलनात्मक रूप से करते हुए भारत 2027 तक विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। वर्ल्ड रिकार्ड बनाने की आदत जो है, हमारी! बधाई?

2. हमारे देश में 15 न्यूज चेनल ‘‘नम्बर वन’’ है। परन्तु सूचना एवं प्रसारण विभाग सोये हुये हैं।

3. 27 मई 2022 को दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में एक कुत्ते को टहलाने के कारण दो आईएएस दंपति (पति-पत्नि) संजीव खिरवार और रिंकू दुग्गा को राष्ट्रीय राजधानी से क्रमशः लद्दाख और अरूणाचल प्रदेश में तबादला कर दिया गया। यानी कि ‘‘कुत्ते ने न घर का रखा ना घाट का‘‘। शायद नेता से ज्यादा ताकत  कुत्ते की? शायद इसी कारण से नेतागिरी में जब इस शब्द के द्वारा महिमा मंडित किया जाता है, तो बुरा नहीं माना जाता है?) 

4. आंतकवादी यासीन मलिक को टेरर फंडिग मामले में 25 मई 2022 को न्यायालीन उम्रकैद की सजा होने पर भी राजनेताओं (महबूबा मुफ्ती, फारूख अब्दुला) द्वारा हमदर्दी बताना व न्यायालीन आदेश का भी समर्थन न करना, उच्च कोटी के देशप्रेम का घोतक तो नहीं है? अथवा कहीं यह ‘‘मौसेरे भाइयों का दर्द छलकना तो नहीं‘‘?

5. स्वतंत्र भारत देश के अभी तक के इतिहास में जब ईमानदारी ‘‘गूलर का फूल’’ हो गई है, यह देश में पहला मामला है, जब 24 मई 2022 को पंजाब के मुख्यमंत्री ने अपने ही स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला को भ्रष्टाचार में लिप्त होने पर बचाने के बजाए न केवल पकड़वाया, बल्कि उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाई कर बिना देर किये मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर आपराधिक कार्यवाही कर एफआईआर भी दर्ज की। लेकिन मीडिया में इस तरह की त्वरित, चरित्र निर्माण करने वाली घटना की देशव्यापी चर्चा होने के बजाए, ज्ञानवापी मुद्दा ही मीडिया व जनता के बीच छाया रहा है। आखिर ‘जन’ व ‘तंत्र’ इतना निरीह क्यों हो गया है?

6. देश की लगभग 140 करोड़ की जनसंख्या में कोई तो एक बंदा हो, जो गइराई से जड़ जमाती मंहगाई की नींव को खोदने के लिए (जैसा कि धार्मिक स्थलों को खोदने के लिये) उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दे। या सिर्फ मंदिर-मस्जिदों के लिए ही न्यायालयों में याचिकाएं दायर होती रहेगी? कई महत्वपूर्ण बात महत्वपूर्ण मामलों में स्वयं संज्ञान लेकर जनता को राहत पहंुचाने वाली उच्चमत न्यायालय, उक्त मामले में स्वतः संज्ञान क्यों नहीं ले रहा है? जो देश की लगभग 90 प्रतिशत जनता से जुड़ा हुआ मामला है। 

7. 15 मई 2022 को देश के बैडमिंटन खेल के इतिहास में अभी तक की सबसे बड़ी विजय, ‘‘थॉमस कप’’ पर भारत का कब्जा हो गया। 14 बार की विजेता इंडोनेशिया को सीधे 3-0 सेट से हराकर ‘लक्ष्यसेन’ की टीम ने लक्ष्य प्राप्त कर 73 साल बाद रचा इतिहास। परन्तु इस खुशी में भारतवंशी लगभग नदारत, सिवाएं कुछ खेल प्रेमियों और राजनेताओं के औपचारिक बधाई संदेश को छोड़कर। हां प्रधानमंत्री ने जरूर फोन पर चर्चा कर व्यक्तिगत बधाई दी। क्या देश में उपलब्धियों का मतलब सिर्फ राजनैतिक या सैनिक क्षेत्र तक ही सीमित है, जिन पर ही देशव्यापी प्रतिक्रियाएँ होती है? 

8. जेल में (फरवरी 2022) 100 दिनों से ज्यादा बंद महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक वास्तव में नवाब होकर जनता के मालिक है। इसलिए उन पर नैतिकता के कानून की कोई कैंची ही नहीं चलती है। अतः वे बड़े ठाठ बाट से जेल में भी मंत्री बने हुये है। स्वतंत्र भारत के इतिहास की यह पहली अनोखी अंचभित करने वाली घटना है, जो संविधान की भावनाओं का साफ-साफ उल्लघंन प्रतीत होता है। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने शायद नैतिकता में पतन की इतने निचले स्तर की कल्पना स्वयं की ही नहीं थी, इसलिए ऐसी आपातकालीन स्थिति से निपटने का कोई प्रावधान संविधान में रखा ही नहीं गया। क्या देश के समस्त मंत्रियों का आत्म स्वाभीमान मर गया है? जो जेल में रहकर मंत्री के इस्तीफे की दबाव पूर्वक मांग नहीं कर पा रहे है? क्यों नहीं वे न्यायालय की शरण ले रहे है? क्या इस ‘‘एक चुप सौ को हराए‘‘ नीति से उनके सम्मान पर भी प्रश्नवाचक चिंह नहीं लगता है? क्या इससे मंत्रिपद की गरिमा बिल्कुल भी घट नहीं गई है, जिसके गौरवपूर्ण आकर्षण के कारण ही तो राजनेता, मंत्री बनने के लिये मरे जाते है। 

9.अभी दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को भी प्रर्वतन निदेशालय (ईडी) ने धन-शोधन निवारण अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तार किया है। परन्तु 24 घंटे बीत जाने के बावजूद न तो उन्होंने इस्तीफा दिया और न ही भ्रष्ट्राचार के विरूद्ध बिगुल बजाने का अकेले दावा करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उन्हे बर्खास्त किया है? वैसे 24 घंटे में भ्रष्ट्राचार के आरोप में ‘‘लोक सेवक’’ के जेल में बंद रहने पर उन्हे तुरन्त नौकरी से निलम्बित कर दिया जाता है। कई मामलो में न्यायालय ने विधायक/मंत्री को लोकसेवक माना है। 

10. आर्यन शाहरूख खान केस (अक्टूबर 2021) के माध्यम से फिल्म इंडस्ट्रीज को बदनाम करने में अधिकतर मीडिया और राजनेताओं के परस्पर आरोप-प्रत्यारोप के बीच आर्यन के खिलाफ कोई सबूत न होने पर अभियोजन द्वारा चार्जशीट में न केवल उसका नाम शामिल न करना, बल्कि यह कहना, कि उसने दूसरे लोगो को ड्रग्स लेने से रोका, यह ‘‘बालू की दीवार पर खड़े‘‘ अभियोजन के लिए हास्यादपद स्थिति नहीं है? वर्तमान एनसीबी, सीबीआई व ईडी इत्यादि के ताबड़तोड़ छापे राजनैतिक विरोधियों की आवाज को दबाने के बीच एनसीबी की अभीयोजन टीम द्वारा पूर्व अभियोजन टीम को पूरी तरह से अस्वीकार (आर्यन के मामले में) करना सातवें आश्चर्य से कम नहीं? यहां यह उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने आरोपी को अपराध से डिसचार्ज (निर्वहन) नहीं किया है। इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या केस में मीडिया द्वारा ट्रायल कर अभियोगी रिया चक्रवती को हत्या तक का अपराधी बताकर सजा देने की मांग भी कर दी गई। जबकि जांच के अंतिम निष्कर्ष में प्रकरण में  अधिकतम आत्महत्या का मामला का ही निकल पाया। आत्महत्या को प्रेरित करने का आरोप (धारा 306) भी नहीं पाया गया। 

11. मई 2022 में दिल्ली बीजेपी प्रवक्ता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा की पंजाब पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारी पर दिल्ली पुलिस ने आरोपी के परिवार की शिकायत के आधार पर पंजाब पुलिस के विरूद्ध ही अपहरण का प्रकरण दर्ज कर लिया व दिल्ली पुलिस के कहते पर हरियाणा के कुरुक्षेत्र में पंजाब पुलिस के काफिले को रोक कर आरोपी को पंजाब पुलिस से छुड़वाकर दिल्ली पुलिस को सौंप दिया। देश के इतिहास में इस तरह की पहली घटना है।

12. देश के इतिहास में पहली बार दो राज्यों असम-मिजोरम के बीच जमीन को लेकर जबरदस्त हिंसा व खुनी संघर्ष हुआ जिसमें पुलिस फोर्स की गोलियों में 5 पुलिस कर्मियों सहित 6 लोगों की जान चली गयी। 50 से अधिक घायल हो गये। 

13. उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता आजम खां के मंत्री रहते हुये जनवरी 2014 में  रामपूर स्थित डेयरी से 7 भैंसें चोरी हो गई। वारदात पर तुरंत संज्ञान लेते हुए पुलिस प्रशासन ने कार्यवाही की और 24 घंटे बाद ही पुलिस ने भैंसें बरामद भी कर ली। परन्तु फिर भी पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर की सजा दी गई।

14. वर्ष 1967 के बाद से देश में आया-राम गया-राम के चलते कई संयुक्त विधायक दल सरकारांे का निर्माण हुआ। परन्तु हद तो तब हो गई, जब हरियाणा की सियासत ने आया-राम गया-राम के दल-बदल के नए आयाम स्थापित करते हुए पूरा का पूरा मंत्रिमंडल का ही दल बदल करवा दिया व जनता पार्टी के मुख्यमंत्री रातोरात बिना इस्तीफा दिये कांग्रेस के मुख्यमंत्री कहलाने लगे। ‘‘को नृप हमहिं  का हानी‘‘।

15. तमिलनाडु के अरियालुर में 27 नवंबर 1956 को भीषण ट्रेन हादसा हुआ था. हादसे में करीब 142 लोगों की मौत हो गई। लाल बहादुर शास्त्री ने रेल हादसे के बाद नैतिकता के आधार पर तुरंत इस्तीफा देकर वे देश के पहले ऐसे नैतिकता का उच्चतम मादंड स्थापित करते हुए राजनैतिज्ञ मंत्री सिद्ध हुये। यद्यपि इसके बाद नीतीश कुमार ने भी वर्ष 1999 में गैसला ट्रेन हादसे में 290 लोगों की मृत्यु होने के कारण इस्तीफा दिया था। तत्पश्चात् तत्कालीन रेल मंत्रियों सुरेश प्रभु, ममता बनर्जी ने भी भीषण रेल दुर्घटनाओं के बाद इस्तीफे की पेशकश की थी, परन्तु नैतिकता का यह आवरण सिर्फ रेल मंत्रालय तक ही सीमित रहा।  

16. सरकार भले ही पेट्रोल-डीजल की कीमत निर्धारित करने में अपनी भूमिका से इनकार करती है। परन्तु दिन प्रतिदिन, हफ्ता-पखवाड़ा डी़जल-पेट्रोल के मूल्यों में होने वाली वृद्धि ‘‘चुनाव के समय’’ बिना किसी रूकावट के पूरी चुनावी अवधि में बिना नागा ‘‘अवकाश’’ ले लेती है। यह छुट्टी सरकार ही तो देगी? अंतर्राष्ट्रीय बाजार नहीं? ‘‘आदर्श चुनाव संहिता’’ लागू होते ही मूल्य वृद्धि भी ‘‘आदर्श’’ दिखने के लिए ‘‘रूक’’ जाती रही। इसे क्या कहा जाए ‘‘दो नावों की सवारी या फिर दोनों हाथों में लड्डू‘‘?

17. सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में सीबीआई को सरकारी तोता निरूपित कर दिया है। कोयला ब्लाक आवंटन घोटाले और अन्य मामलों की सीबीआई जांच में केंद्र के हस्तक्षेप पर चिंता जाहिर करते हुए न्यायालय ने कहा कि सीबीआई पिंजरे में बंद ऐसा तोता बन गई है जो अपने मालिक की बोली बोलता है। राजनैतिक हित के लिए सरकार जगह-जगह छापे लगवाती है। स्थिति अभी भी वही है परन्तु ‘मालिक’ अवश्य बदल गया है। 

18. पिछले कुछ समय से देश में सीबीआई (केन्द्रीय जांच ब्यूरो), ईडी (प्रर्वतन निदेशालय), एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) एनसीबी (नारकोटिक कंट्रोल ब्यूरो) विजिलेंस आदि केंद्रीय एजेंसियों के छापे विरोधी दलों के नेताओं या उनके समर्थकों पर ही लग रहे हैं। सिवाय मध्यप्रदेश में एक छापा भाजपा समर्थक बिल्डर के विरुद्ध  अवश्य लगा था।

19. हरियाणा के एक आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का 30 साल में 54 बार तबादला (ट्रांसफर) किया गया। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड। जबकि इस अवधि में विपरीत सिंद्धान्तों वाली सरकारें आती जाती रही। लगता है कि ‘‘कुएं में ही भांग पड़ी है‘‘।

अंत में निष्कर्ष रूप में मेरा भारत देश महान इसलिए भी है क्योंकि उपरोक्त तत्वों की उपस्थिति व साथ के बावजूद देश प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा हैं। आइये ‘‘मेरे’’, ‘‘अपने’’ ‘‘हमारे’’, महान देश भारत को महान बनाने में अपना तुच्छ किंतु महान योगदान अवश्य करे।

गुरुवार, 12 मई 2022

अवैध गिरफ्तारी (?) से मुक्ति के लिए की गई ‘‘अवैध कार्रवाई‘‘ ’’क्या वैधानिक’’ हो जाएगी?

‘'पुलिस बनाम पुलिस का अभूतपूर्व शर्मनाक शर्मसार कर देने वाला संग्राम’’
क्रमशः शेष गतांक से आगे 
द्वितीय भागः- 
आइए! इस पूरी घटना के कानूनी व स्थापित प्रक्रिया के पहलू पर गंभीरता पूर्वक विस्तृत विचार करें। जहां पूरा प्रकरण अपराध पंजीयत होने से लेकर रिहाई तक राजनैतिक उद्देश्य से विद्वेष निकालने के लिये समस्त पक्षों अर्थात् आप-भाजपा द्वारा बेशर्मी के साथ कार्यान्वित किया गया। भाजपा द्वारा तेजिंदर पाल को निर्दोष बताते हुए ‘‘आप’’ व अरविंद केजरीवाल पर सत्ता का राजनैतिक दुरुपयोग कर पंजाब पुलिस पर दबाव डालकर बग्गा के विरुद्ध झूठा प्रकरण दर्ज कराने का गंभीर आरोप लगाया गया। वैसे अरविंद केजरीवाल जो राजनीति के प्रारंभिक चरण में भाजपा एवं नरेंद्र मोदी पर किस तरह से मीडिया की ब्रांडिंग व सत्ता तथा संवैधानिक संस्थागत संस्थाओं का विपक्षी विरोधियों के विरुद्ध दुरुपयोग के आरोप लगाते थकते नहीं थे। सत्ता में आने के बाद आज केजरीवाल का भी चरित्र अपने प्रतिद्वंदी भाजपा से ज्यादा एक कदम आगे ही हो गया है। जहां अब स्वयं उन पर आरोपी की झड़ी लग रही है। कपिल मिश्रा, अलका लांबा, कुमार विश्वास आदि उनके राजनीतिक विरोधी इसके जीवंत उदाहरण जो केजरीवाल द्वारा राजनैतिक द्विवेश से अपने साथियों द्वारा की गई कार्यवाही को झेल रहे हैं। दिल्ली अर्ध-राज्य के विज्ञापन खर्चे की तुलना देश के किसी भी राज्य से कर लीजिए, स्थिति आपके सामने स्पष्ट हो जाएगी। 
कृपया बग्गा द्वारा किए गए विभिन्न ट्वीट्स की भाषा को पढ़ लें। इनमें से कुछ तो मीडिया भी भाषा के निम्न स्तर को देखते हुए पूरे ट्वीट्स नहीं दिखा रहा है, और पूर्व में उस पर दर्ज कई अपराधिक मामलों को देखते हुए हिस्ट्रीशीटर होकर भाजपा द्वारा बग्गा को बेगुनाह बतलाना तो बिल्कुल भी सही  प्रतीत नहीं लगता हैं। उच्चतम न्यायालय में प्रशांत भूषण के चेंबर में जाकर थप्पड़ मारना, अरुन्धिति राय के पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में हंगामा, राजीव गांधी के विरूद्ध अपमानजनक टिप्पणी के लिये छत्तीसगढ़ में प्रकरण दर्ज हुआ। पश्चिमी बंगाल में अमित शाह की रोड़ शो में हिंसा फैलाना, पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा दंगा फैलाने की नीयत से भड़काऊ भाषण देने पर सजा देना आदि अनेकानेक आपराधिक घटनाएं बग्गा के सिर पर मुकुट धारण किये हुयी हैं। तथापि बंदूक से निकली गोली जैसी तेजी से पुलिसिया तरीके से की गई कार्यवाई व प्रति कार्यवाई ने पूरे प्रकरण को संदेह के दायरे में जरूर ला दिया है।
यह तो प्रकरण का एक पक्ष हुआ जिसकी रचयिता ‘‘सिंर मुंडाते ही ओले पड़ने’’ वाली पंजाब पुलिस रही। परंतु इसका दूसरा पक्ष दिल्ली पुलिस व हरियाणा सरकार व पुलिस का भी इस हाई वोल्टेज ड्राजा में गजब का रोल रहा, जो आज तक के आपराधिक न्यायशास्त्र (क्रिमिनल जूरिसप्रूडेंस) के इतिहास में कभी भी नहीं हुआ। आज तक आपने कभी सुना है कि एक आरोपी के पिता की शिकायत के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार करके ले जा रही पुलिस के विरुद्ध अपहरण व मारपीट के अपराध को दूसरी पुलिस द्वारा तुरंत-फुरंत बिना जांच के प्रकरण दर्ज कर ले? परंतु दिल्ली पुलिस ने न केवल ऐसा किया, बल्कि हरियाणा पुलिस को तदनुसार सूचित भी किया। आरोपी के पिता प्रीति पाल सिंह बग्गा के मीडिया में दिए गए बयानों पर थोड़ा गौर तो कर लीजिए। वे कहते हैं कि सुबह पंजाब पुलिस के कुछ आदमी जो पूर्व में भी आ चुके हैं, मेरे बेटे, को पगड़ी पहनने का समय दिए बिना ही उठाकर ले गए। (पंजाब पुलिस उनके घर पांच बार नोटिस देने जा चुकी है)। मेरे को थ्प्पड़ मारा व परिवार के साथ मारपीट भी की। फिर किसी बयान में वह यह कहते दिखते हैं कि कुछ गुंडे आए थे, जो उठाकर ले गए। फिर यह भी कहते हैं, दिल्ली पुलिस को बताए बिगर मेरे लड़के को ले गए। (यह तथ्य उन्हे कैसे मालूम? क्या दिल्ली पुलिस उनसे मिली हुई है?) इन सब कथनों से आप स्वयं ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं। 
अपहरण के अपराध की उक्त परिभाषा कानून की किस किताब में लिखी है जरा बताएं तो? पंजाब पुलिस को अच्छी तरह से पहचान करने वाले व्यक्ति द्वारा आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में आयी पुलिस के विरुद्ध अपहरण सहित धारा 452, 342, 365, 295 एवं 34 के अंतर्गत प्रकरण न्यायालय द्वारा नहीं, बल्कि अपनी ही दूसरे राज्य के थाने की पुलिस द्वारा दर्ज कराना सातवें आश्चर्य से कम नहीं है? पुलिस टीम तो अपने आला आंका अधिकारियों के निर्देश पर कर्त्तव्य (ड्यूटी) निर्वाह करने गयी थी। क्या आंकाओं के विरूद्ध भी मारपीट व अपहरण का मामला दर्ज किया गया? हां पंजाब पुलिस की अवैधानिक निरोध की कार्रवाई की स्थिति में सक्षम न्यायालय में उनके विरुद्ध आवश्यक कार्यवाही अवश्य की जा सकती है। परंतु दिल्ली पुलिस को बगैर किसी न्यायालीन आदेश के पंजाब, पुलिस की आपराधिक के तारतम् में की गई कार्यवाही भी प्रांरभ से ही शून्य के बावजूद भी उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी अधिकार कदापि नहीं था। 
दिल्ली पुलिस की सूचना पर हरियाणा पुलिस ने ‘‘मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त’’ की तर्ज पर उसी तत्परता से दिल्ली पुलिस जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, के अनुरोध/आदेश पर कार्रवाई करते हुए बग्गा को पंजाब पुलिस की हिरासत से कुरुक्षेत्र में छुड़ाकर दिल्ली पुलिस को (हिरासत में नहीं) सौप कर उसकी गैरकानूनी रूप से छीनी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता को वापस प्रदान कर दिया। इस प्रकार एक बार पुनः कुरुक्षेत्र की महाभारत की लड़ाई की याद ताजा हो गई। ‘‘एक ही परिवार के कौरव पांडव’’ के बीच महाभारत की कुरुक्षेत्र की लड़ाई में तो धर्म की जीत हुई। परंतु यहां पर एक ही वर्ग दो पुलिस थानों के बीच अधिकारों  साथ राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में कानूनी रूप से कौन जीतेगा, इसका अंतिम निराकरण तो अभी न्यायालय द्वारा होना शेष है। 
क्या आप केन्द्रीय गृह मंत्रालय को बधाई नहीं देना चाहेगे? 75 वें स्वाधीनता वर्ष में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, यदि एक पुलिस बल के हत्थे अवैधानिक चढ़ जाए और केंद्रीय गृह मंत्रालय बचा नहीं पाए तो अमृत महोत्सव मनाने का फायदा क्या? और यदि ऐसी त्वरित कार्रवाई नहीं होती तो, क्या अमृत महोत्सव मनाने का उद्देश्य सफल कहलाता? इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस को तुरंत-फुरंत कार्यवाही करनी पड़ी। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यहां उत्पन्न होता है, हरियाणा पुलिस ने अपहरणकर्ता से अपहृत व्यक्ति की बरामदी के बाद अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार कर कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की? यदि हरियाणा पुलिस ने अपहरणकर्ता को गिरफ्तार नहीं किया तो, दिल्ली पुलिस ने उन अपहरणकर्ताओं के पीछे जाकर उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास क्यों नहीं किया? इसके जवाब में ही दिल्ली व हरियाणा पुलिस की बेगुनाही (यदि है?) छुपी हुई है। चोरी का माल बरामद होने पर चोर को भी तो गिरफ्तार किया जाता है। मतलब साफ है, अपहरण की धारा का सहारा लेकर दिल्ली व हरियाणा पुलिस ने जिस तरह से पंजाब पुलिस की कस्टडी से गिरफ्तार आरोपी को छुड़ाया, वह दिल्ली पुलिस की अपनी कार्यवाही को कानूनी रूप देने का बेशर्मी पूर्वक असफल प्रयास मात्र है, लेकिन ‘‘सूरदास खल कारी कमरी, चढ़े न दूजो रंग’’ तो क्या किया जा सकता है?
दिल्ली पुलिस की इस कार्य पद्धति ने देश की स्वाधीनता के 75 वर्ष में न्यायालय के अतिरिक्त एक नया न्याय तंत्र स्थापित किया है। जहां पुलिस द्वारा स्वयंमेव ही न्यायिक अधिकार अपने में आत्मसात कर त्वरित न्याय दिला देना। एक राज्य की पुलिस द्वारा तथाकथित अवैध रूप से गिरफ्तार व्यक्ति को दूसरे राज्य की पुलिस गिरफ्तारी को अवैध मानकर पुलिस बल की कस्टडी से छुड़ाकर कर मामले को समाप्त कर सकती है, यह नई न्यायिक पद्धति व प्रणाली है। इसे तो ‘‘अंधों का हाथी’’ कहना ज्यादा उचित होगा। वैसे आपको इस तथ्य से अवगत करा दूं कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 48 के अनुसार प्राइवेट व्यक्ति, एक नागरिक को भी किसी अन्य व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में हिरासत में रखने का अधिकार है। शायद यह अधिकार जो पुलिस के अधिकार क्षेत्र में एक हस्तक्षेप के समान है, के प्रतिकार में तो पुलिस ने स्वयं-मेव यह न्यायिक अधिकार प्राप्त तो नहीं कर लिया है? निश्चित रूप से न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया में कई बार समय लगता है। इससे कई बार न्याय पाने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। परंतु इस तरह की पुलिस की अन्याय के खिलाफ न्याय दिलाने की तुरंत प्रक्रिया का संदेश निश्चित रूप से न केवल जनता के बीच बल्कि अन्य पुलिस प्रशासन के बीच भी जाएगा? अभी तक तो पुलिस की भूमिका जांच के द्वारा न्याय दिलवाने की (देने की नहीं) रही है। परंतु अब वह स्वयं न्यायिक पुलिस अधिकारी भी बन गई है, यह उक्त घटना की एक बड़ी उपलब्धि नहीं क्या है?
अब दिल्ली पुलिस द्वारा पंजाब पुलिस से अपहृत किए गए अपराधी को छुड़ाने के पश्चात घटनाक्रम में न्यायालय के प्रवेश, न्यायालीन प्रक्रिया व आदेश पर भी कुछ गंभीर विचार करने की आवश्यकता हैं। 7 तारीख शुक्रवार सुबह लगभग 8.30 बजे पंजाब पुलिस के द्वारा बग्गा की गिरफ्तारी के बाद बग्गा के पिताजी द्वारा पंजाब पुलिस के विरुद्ध उनके बेटे के अपहरण की शिकायत करने के बाद तुरंत एफ आईआर दर्ज कर लगभग 1.00 बजे द्वारका न्यायालय के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष दिल्ली पुलिस द्वारा आवेदन प्रस्तुत कर सर्च वारंट जारी कराया गया। पंजाब पुलिस से बग्गा को हरियाणा पुलिस के सहयोग से छुड़ाने के बाद ड्यूटी मजिस्ट्रेट के समक्ष रात्रि में बग्गा को प्रस्तुत किया गया जिन्होंने दोपहर में मेट्रोपोलिन मजिस्ट्रेट द्वारा जारी सर्च वारंट के अनुपालन में बग्गा को वयस्क होने के कारण दिल्ली पुलिस से भी न केवल स्वतंत्र करने का आदेश दिया बल्कि आरोपी को आवश्यक अस्थाई सुरक्षा प्रदान करने के आदेश भी दिए। (आजकल यह बहुत चलन मैं हो रहा है कि कोई स्क्रीन (पर्दे) पर चलने वाला अभियुक्त को न्यायालय या केंद्रीय राज्य सरकारें आनन-फानन में ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी’’की तर्ज पर सुरक्षा उपलब्ध करा देती हैं।) माननीय ड्यूटी मजिस्ट्रेट ने उक्त तथ्य का कोई संज्ञान नहीं लिया कि अभियुक्त को मोहाली थाने में दर्ज एफआईआर के सिलसिले में पंजाब पुलिस ने दिल्ली आकर उसके निवास से उसको गिरफ्तार कर मोहाली कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ले जा रही थी। एक तरफ पंजाब सरकार द्वारा उच्च न्यायालय में दायर हैबीएस कॉरपस सहित दो पिटिशन पर सुनवाई 7 तारीख को की जाकर 8 तारीख को हरियाणा सरकार को शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। परंतु तुरंत कोई भी अंतरिम आदेश पारित नहीं हुआ, बल्कि याचिका सुनवाई हेतु 10 तारीख के लिए निश्चित की गई। बावजूद इसके बग्गा की पंजाब उच्च न्यायालय में मोहाली थाने में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने के लिए दायर याचिका में  अंतरिम आवेदन पर अर्ध रात्रि में सुनवाई कर गिरफ्तारी वारंट रोकने के आदेश जारी किये गये।
अंत में जैसे लोहा लोहे को काटता है, हीरा(डायमंड) हीरे को काटता है, उसी प्रकार दो (-) क्या प्लस (+) हो जाएगा? नहीं! न्यायालीन प्रक्रिया में तो कम से कम ऐसा नहीं चलता है। स्पष्ट है, इस बात का दुख होता है कि राजनेताओं के शह पर ‘‘पुलिस तंत्र’’ को अपनी राजनीति का तंत्र बनाने वाले वे सत्ता नायक ही कसूरवार है, जिनके मजबूत कंधों पर इस प्रवृत्ति को विराम लगाने की जिम्मेदारी है। और जनता? वह तो हमेशा के समान ‘‘निरीह’’ है।

स्वाधीनता के ‘‘अमृत महोत्सव वर्ष’’ में कमजोर होता ‘‘गण’’ व ‘‘तंत्र’’।

पतन पर तेजी से जाती हुई ‘‘राजनीति’’ का ‘‘हाई वोल्टेज ड्रामा’’।

विषय लेख लम्बा होने से पाठकों की सुविधा की दृष्टि से इसे दो भागों में लिखा जा रहा हैंः-   प्रथम भाग

30 नवंबर को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के निवास के समक्ष दिल्ली युवा मोर्चा के प्रदर्शन में दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता, युवा इकाई के सचिव तेजिंदर पाल सिंह बग्गा, निवासी जनकपुरी, दिल्ली ने फिल्म ‘‘द कश्मीर फाइल्स’’ पर की गई केजरीवाल की टिप्पणी से नाराज होकर बग्गा द्वारा अरविंद केजरीवाल के प्रति कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसे लेकर आप पार्टी के प्रवक्ता मोहाली निवासी सनी अहलूवालिया द्वारा तेजिंदर पाल द्वारा सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक सौहाद्र व सद्भाव बिगाड़ने की शिकायत की गई। जिस पर मोहाली पुलिस द्वारा 3 अप्रैल (कुछ मीडिया रिपोर्ट में 1 अप्रैल बतलाया है) को थाना पंजाब स्टेट साइबर क्राइम में एक एफआईआर दर्ज की गई। दर्ज मुकदमें के सिलसिले में जांच में शामिल होकर सहयोग देने के लिए पंजाब पुलिस द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 ए के अंतर्गत 5 बार नोटिस भेजने के बावजूद बग्गा के जांच में उपस्थित न होने पर पंजाब पुलिस ने दिल्ली आकर भा.द.स. की धारा 153 ए, 505 व 506 के अंतर्गत आरोपित बग्गा को जनकपुरी स्थित स्थित, उनके निवास से  गिरफ्तार कर लिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रस्तुत प्रकरण में पुलिस को संज्ञेय अपराधों में बिना वारंट के अपराधी को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार है।

इस पर जिस तरह ‘‘ढाई हाथ की ककड़ी और नो हाथ के बीज’’ समान राजनैतिक भूचाल पैदा किया गया और पुलिस तंत्र किस तरह से निरुत्साहित (पंजाब पुलिस) व अति-उत्साहित (दिल्ली व हरियाणा पुलिस) होकर कानून की धज्जियां उड़ाते हुए बदनाम पुलिसिया अंदाज में कार्रवाई करके संघीय ढांचे पर हथौड़े चलाकर तार-तार करते रहे, वह देश व राजनीति के लिए अत्यंत ही शर्मसार है। हद तो तब और हो जाती है जब बेशर्म होकर राजनीतिज्ञगण बेशर्मी से आरोप-प्रत्यारोप लगाकर सिर्फ उसी राजनीति को चमकाने में लग जाते हैं, जो उनके कार्यकलापों से शर्मसार हुई जा रही है। क्या आजकल देश को हाई वोल्टेज ड्रामा की ओर तो ले जाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है? जैसे उपरोक्त पुलिसिया के हाई वोल्टेज ड्रामे के साथ वर्तमान में बुलडोजर का भी हाई वोल्टेज ड्रामा, बेरोजगारों की विभिन्न क्षेत्रों में भर्ती न निकालने का, उच्चतम महंगाई को शांतिपूर्ण सहने का भी हाई वोल्टेज ड्रामा देश में चल रहा है? जिनके पीछे राजनीतिक दलों का ही तो हाथ हैं?

उक्त पूरी घटनाक्रम देश के स्वतंत्र भारत के इतिहास की अभी तक की इस तरह की एकमात्र अनोखी घटना होकर 75 वें स्वतंत्रता वर्ष के लिए ‘‘न भूतो न भविष्यति’’ एक कलंक होकर सिर झुकाने के लिए मजबूर करने के साथ गंभीर चिंतन के लिए विवश कर देती है।  किसी अपराध व तदनुसार अपराधी से निपटने के लिए अभी तक की अपने तरह की यह प्रथम बिल्कुल ही असामान्य व अस्वाभाविक पुलिसिया प्रक्रिया से कई गंभीर व अनुतरित प्रश्न उत्पन्न होते हैं। यह घटना इस बात को भी सिद्ध करती है कि हमारे देश के गणतंत्र व संघीय ढांचे में अभी भी आधारभूत मूल कमियां हैं, जो मात्र एक व्यक्ति की गिरफ्तारी पर उजागर हो जाती है। इस पूरी घटना ने प्रारंभिक अवस्था में न्यायालय को तो लगभग एक तरफ दरकिनार ही कर दिया। दिल्ली पुलिस जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और हरियाणा पुलिस दोनों मिलकर पंजाब पुलिस पर बुरी (पूरी) तरह से हावी हो गए। परिणाम स्वरूप दिल्ली पुलिस पंजाब पुलिस से एक आरोपी को ठीक उसी प्रकार से छुड़ा कर ले आती है, जिस प्रकार किसी जमाने में ‘‘एक बंधक को माधोसिंह गैंग के कब्जे से मोहर सिंह गैंग अधिक बल के आधार पर छुड़ाकर ले आता रहा होगा’’। मानो दिल्ली पुलिस यह दर्शना चाह रही होगी कि ‘‘बाज के बच्चे मुंडेरो पर नहीं उड़ा करते’’। कानून के राज की बात तो कोई कर ही नहीं रहा है, तो पालन करना तो दूर की बात हो गई।   

सर्वप्रथम आरोपी तेजिंदर पाल सिंह बग्गा के खिलाफ मोहाली पुलिस द्वारा दर्ज की गई ‘‘प्रथम सूचना पत्र’’ जिसे कानून में कहीं परिभाषित नहीं किया गया है, ठीक उसी प्रकार  गिरफ्तारी को भी परिभाषित नहीं किया गया है। को ही ले ले। दर्ज एफआईआर गलत है या सही, इसे निरस्त (नस्ति) करने का अधिकार क्षेत्राधिकार प्राप्त न्यायालय को ही है। किसी थाने या राजनेताओं को नहीं। हां अवश्य जांच के दौरान पर्याप्त आवश्यक साक्ष्य न मिलने पर जांच अधिकारी प्रकरण को समाप्त करने के लिए क्लोजर रिपोर्ट (प्रकरण बंद करना) संबंधित मजिस्ट्रेट के पास अवश्य भेज सकता है। तब भी जांच अधिकारी अपने स्तर पर प्रकरण नस्ती नहीं कर सकता है। यही कानूनी स्थिति है। 

यहां पर न तो जांच अधिकारी ने ऐसा किया और न ही आरोपी को निचली अदालते तथा पंजाब उच्च न्यायालय से इस संबंध में कोई अंतरिम सहायता मिली। जहां तक पंजाब पुलिस की उक्त कार्रवाई करने के आशय या राजनीतिक दबाव के चलते दुरूराशय का प्रश्न है, जैसा कि आरोपी व उसका परिवार लगातार लगा रहे हैं और अब तो यह भाजपा-आप के बीच यह एक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के युद्ध में परिवर्तित हो गया है। पंजाब पुलिस की सदृशयता का अंतिम निराकरण तो न्यायालय के द्वारा ही निर्णीत होगा और तब तक पंजाब पुलिस को न्यायालीन आदेश के बिना आगे कार्रवाई करने से रोका नहीं जा सकता था। तब तक तत्समय  ऐसा कोई आदेश नहीं था।

मतलब राजनैतिक उद्देश्य व विद्वेष को लेकर (यदि ऐसा मान भी लिया जाए तो भी) दर्ज की गई एफआईआर पर मोहाली पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही प्रथम दृष्टया दंड प्रक्रिया संहिता व भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अधिकार क्षेत्र में व वैध थी, तथापि वह देखने की न्यायालय की नज़र में नहीं बल्कि दिल्ली और हरियाणा पुलिस के लिए। आरोपी को जांच में शामिल होकर सहयोग देने के लिए पंजाब पुलिस द्वारा 5 बार नोटिस दिए जाने के बावजूद ‘‘अपने खोल में मस्त रहने वाला’’ बग्गा उपस्थित नहीं हुआ। जहां तक अंर्तप्रातींय पुलिस कार्यवाही के लिए अभियुक्त को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने के लिए नियमों की बात है, द.प्र.स. की अध्याय (सेम)V(5)की धारा 41 से 60 में आवश्यक सक्षम प्रावधान दिए गए हैं।

सामान्यतया एक राज्य की पुलिस को दूसरे राज्य में जाकर अभियुक्त को गिरफ्तार करने के लिए सामान्य प्रक्रिया के तहत उस राज्य की स्थानीय पुलिस को (प्रशासनिक, सुरक्षा व कानून व्यवस्था की दृष्टि से) सूचित करना आवश्यक होता है। परंतु यदि दूसरे राज्य की पुलिस को स्थानीय पुलिस पर विश्वास न हो तो, वह बिना सूचना के भी सीधे आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है, ताकि स्थानीय पुलिस द्वारा आरोपी को सूचना देने की आशंका की स्थिति में उसके फरार होने की संभावना न हो। जिसकी संभावना प्रस्तुत मामले में पूरी तरह से थी, जो बात के घटनाक्रम से सिद्ध भी होती है। यदि पुलिस गिरफ्तार आरोपी को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर धारा 57 (76 वारंट निष्पादन की दशा में) के अंतर्गत सक्षम/निकटतम न्यायालय में रिमांड हेतु प्रस्तुत कर देती है, तो दं. प्र. सं. की धारा 167 के अनुसार ट्राजिस्ट रिमांड लेने की कतई आवश्यकता नहीं है। 

गिरफ्तार अभियुक्त को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाने में यदि 30 किलोमीटर से अधिक दूरी पर जाना पड़ता है तो ट्राजिस्ट पास लेना चाहिये। ऐसा मीडिया के कुछ भाग में बताया जा रहा है। परंतु 30 किलोमीटर का ऐसा कोई प्रावधान मेरी नजर में नहीं आया। यूपी के महत्वपूर्ण बहु चर्चित विकास दुबे प्रकरण में भी अभियुक्त को उज्जैन से गिरफ्तार कर उत्तर प्रदेश बिना ट्रांजिट रिमांड के ले जाया गया था ऐसा म.प्र. पुलिस का कहना था। जबकि उल्ट इसके यूपी पुलिस ने ट्रांजिस्ट रिमांड लेने का दावा किया था। तथापि अधिकतम यह एक नियम है, कानून नहीं। अर्थात् यह एक अनियमितता(इररेगुलारिटी) हो सकती है, लेकिन गैरकानूनी अवैध(इलेगलिटी)नहीं और अनियमितता के लिये पुलिस के विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही अवश्य की जा सकती है। परंतु गैरकानूनी होने पर अभियुक्त को मुक्ति का अधिकार मिल जाता है। दोनों में अंतर को समझना होगा।

अतः जब तक एफआईआर दर्ज है और वह सक्षम न्यायालय द्वारा निरस्त नहीं की गई है, तब तक मोहाली पुलिस को अभियुक्त को गिरफ्तार करने का वैधानिक अधिकार था। जहां तक 7 साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी न करने के उच्चतम न्यायालय के निर्देश की बात की जा रही है, उसमें भी कुछ परिस्थितियों में ही गिरफ्तारी न करने के निर्देश है। वैसे हम जानते हैं कितने मामलों में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन होता है। उच्चतम न्यायालय के निर्देश तो ‘‘अरहर की टटिया में अलीगढ़ी ताले’’ के समान होकर रह गए हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे कि अपराधी को हथकड़ी पहनाकर कोर्ट के अनुमति के बिना पुलिस को अधिकार न होने के उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद दैनंदिन पुलिस द्वारा बेशर्मी के साथ अपराधियों को हथकड़ी पहना कर न्यायालय की ठीक नाक के नीचे प्रस्तुत किया जाता है। गिरफ्तारी के समय व उसके बाद उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय डी.के.बसु वि. पश्चिम बंगाल सरकार (ए.आई.आर.1997 एस.सी. 610 में) दिया गया 11 सूत्रीय निर्देशों का आज भी कितना पालन होता है, यह हमसे छुपा नहीं है। वास्तविकता में तो जैसे कानूनी अधिकार कानूनी किताबों पर सुशोभित देखते है, धरातल पर नहीं। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की भी लगभग वही स्थिति है। 

शेष अगले अंक में.......

शुक्रवार, 6 मई 2022

‘‘अशांत’’‘प्र‘’शांत’ किशोर को स्वयं एक ‘‘रणनीतिकार’’ की आवश्यकता?

पूर्व केन्द्रीय मंत्री असलम शेर खान ने आज सुबह मुझे मैसेज कर प्रशांत किशोर के बाबत् राय पूछी। तदानुसार उन्हे अपनी बेबाक राय लिखते-लिखते वह एक लेख के रूप में ही परिवर्तित हो गयी, जो रूबरू प्रस्तुत है। 

प्रशांत किशोर राजनीति के खेल में ‘‘ब्रांडिंग’’ लाने के लिए जाने जाएंगे।   

2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद प्रथम बार प्रशांत किशोर का नाम सार्वजनिक रूप से आया व एक रणनीतिकार के रूप में चर्चित हुआ। मोदी की जीत में प्रशांत किशोर की नई नीति ब्रांडिग की रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान माना गया। तब से प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति में ‘‘विभिन्नता में एकता’’ लिये हुये ‘‘नीतिगत मूल्यों की सिंद्धान्त की राजनीति से एकदम दूर’’ एक रणनीतिकार के रूप में विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए चुनावी जीत के लिए एक तुरुप के इक्के के रूप में चल निकले हैं। उन्होंने बहुत ही चतुराई से उन्हीं राजनीतिज्ञ व राजनीतिक दलों जेडीयू, आप, तृणमूल कांग्रेस, वाईएसआर कांग्रेस, से डीएमके तक विभिन्न परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लिए रणनीतिकार होकर रणनीति बनाई, जिनकी राजनीतिक जमीनी धरातल पूर्व से ही काफी मजबूत रही है। इसलिए वे राजनैतिक ‘‘दलों व व्यक्तियों’’ के चुनाव करने की अपनी ‘नीति’(रण नीति नहीं?) में वे असफल नहीं रहे, और विजय पथ पर पूर्व से चली आ रही विजयी पार्टी की सफलता का श्रेय सफलतापूर्वक अपने सिर लेते रहे। 

परंतु वर्ष 2017 में जब वे कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में  रणनीतिकार बने तो कांग्रेस का जमीनी आधार लगभग समाप्त की ओर हो जाने के कारण प्रशांत किशोर उत्तर प्रदेश कांग्रेस में कोई नई परिणामोंन्मुख जान नहीं ड़ाल पाये। पिछले आम चुनावों से भी बहुत कम सीटें मिली।अतंतः वे कांग्रेस को सफलता नहीं दिला पाय एव बुरी तरह से असफल हो गए।  परन्तु उक्त असफलता का ‘ठीकरा’ न तो कांग्रेस ने और न ही राजनैतिज्ञ विश्लेषकों व पंडितों ने उनके सिर पर फोड़ा। वो इसलिए कि कांग्रेस की जमीनी सच्चाई को सब जानते थे कि रेत से तेल निकालना आसान काम नहीं है। इसलिए मैं प्रशांत किशोर को शुद्ध रणनीतिकार के रूप में स्वयं के लिए मानता हूंय दूसरों के लिए रणनीतिक सलाहकार के रूप में नहीं। क्योंकि रणनीतिकार बनते समय उन्होंने राजनीतिक दलों को चुनने की सही नीति अपनायी जहां उनकी रणनीति से ज्यादा पूर्व से ही पार्टियों की मजबूत जमीन जीत का आधार विद्यमान थी।

आज की भारतीय राजनीति में सिर्फ एक ‘‘कला’’ (रणनीति) से राजनैतिक युद्ध नहीं जीता जा सकता है। साम, दाम, दंड, भेद रण (युद्ध) जीत के पुराने हथियार रहे हैं, जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है। ‘‘चार एम’’ अर्थात मनी पावर, मसल पावर, मांब पावर व मीडिया पावर के साथ ही अच्छी रणनीति सफल हो सकती है, यह आज की राजनीति की कड़वी सच्चाई है। प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर गांधी जयंती से पूर्वी चंपारण के गांधी आश्रम से तीन हजार किलोमीटर की सुराज पद यात्रा शुरू करने की घोषणा की है। जब वे यात्रा पर निकलेंगे और जनता से सीधे रूबरू होंगे, तब वह स्थिति, अभी तक की उनकी कार्यप्रणाली के बिल्कुल विपरीत होगी। क्योंकि रणनीतिकार तो बंद कमरों के अंदर अपने कुछ सलाहकारों के साथ बैठकर ही रणनीति बनाता है। इसलिए प्रशांत किशोर के जनता के बीच जाने पर ही वे धरातल पर मौजूद राजनीतिक सच्चाई को जान पाएंगे, जो उनके लिए एक नया अनुभव भी होगा। और तब वे यदि आगे राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में काम करना चाहेंगे, तो ज्यादा सफल हो सकते हैं। 

प्रशांत किशोर ने पत्रकारवार्ता में नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुये बेरोजगारी व ध्वस्त होती शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिंह लगाया। एक रणनीतिकार के रूप में व जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप मेें तब वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की पूरी रणनीति बनाते रहे। पिछले 15 दिनों से 600 से ज्यादा स्लाइड़ दिखाकर वे कांग्रेस के लिए मुख्य रणनीतिकार बनने के लिए शर्तो के साथ बातचीत कर रहे थे। लेकिन अंततः बात बन नहीं पायी। यहां यह उल्लेखनीय है कि ये वही प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में मोदी के नेतृत्व की बढ़ाई करते हुए सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व की आलोचना की थी। प्रशांत किशोर की उपरोक्त मनः स्थित को देखते हुए वे एक भ्रांत (कन्फ्यूज्ड) व्यक्तित्व हो गए हैं। और शायद इसीलिए वे एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए रणनीतिकार से राजनेता बनने की और स्वयं की रणनीति बनाने में जुट गये है। यहां प्रशांत किशोर का दोहरा परस्पर विरोधी ‘चेहरा’ दिखता सा है। अब उनका व्यक्तित्व उनके नाम प्रशांत किशोर के विपरीत हो गया है। अर्थात न तो वे शांत (प्र शांत) और न ही किशोर (अनुभवी होने के कारण) रह गए हैं। स्पष्ट है, राजनीति में आने की संभावना टटोलते व बनाते हुए उन्हे कमरे के अंदर की ब्रांडिग की रणनीति के बजाय जनता के बीच राजनैतिक मुद्दों को तलाशने की रणनीति बनानी की नई पारी खेली होगी। तभी तो वे किशोर रह पाएंगे। (अनुभवी व्यक्ति तो प्रोड हो जाता है।)

प्रशांत किशोर ने फरवरी 2020 में ‘‘बात बिहार की’’ कार्यक्रम की घोषणा की थी लेकिन वे शुरू नहीं कर पाये जो उनकी विश्वसनीयता पर एक प्रश्नचिंह अवश्य लगाता है। क्योंकि इस संबंध में उनका स्पष्टीकरण बेहद घिसा-पिटा कोरोना संक्रमण काल का कारण बताया जो गुणदोष (मेरिट) पर आधारित नहीं है।  

राजनीति में एक राजनीतिज्ञ रणनीतिकार दूसरों को सफलता अवश्य दिला सकता है, परंतु वह स्वयं के लिए रणनीति लागू करके राजनीति में सफलता दिला दें, ऐसा अवश्यंभावी होना संभव नहीं हो पाता है। ठीक उसी प्रकार जैसे घर का वकील और डॉक्टर सामान्यतया स्वयं के ‘प्रकरण’ और ‘रोगी’ को देखने की बजाय दूसरे विशेषज्ञों की सहायता अपने आत्मविश्वास को बल देने के लिए लेते हैं। ऐसा ही राजनीति में भी कुछ विशिष्ट योग्य लोग दूसरों को तो ‘‘राजा’’ बनाने की क्षमता रखते है, परन्तु स्वयं नहीं बन पाते है, ‘‘प्रजा’’ ही बने रहना पड़ता है।  इस सत्य को शायद प्रशांत किशोर ने नई पारी खेलने के पहले ही स्वीकार कर लिया है जब  वे यह कहते हैं कि यदि नई पार्टी बनी भी तो मैं एक साधारण सदस्य रहूंगा।

राजनैतिक युद्ध के पटल में रणनीति एक हिस्सा अवश्य व आवश्यक होती है। परन्तु यदि आपके पास युद्ध लड़ने के समस्त साधन, संसाधन, शस्त्र-अस्त्र, तंत्र नहीं है तो, न तो रणनीतिकार रणनीति बना पाएगा और न ही रण में विजय दिला पाएगा। प्रशांत किशोर की यही सच्चाई व वास्तविक स्थिति है। पर्दे के पीछे काम करना अलग बात है और पर्द से निकलकर जनता के बीच सीधे जाकर काम करना अलहदा कार्य प्रणाली है। इस सच्चाई से प्रशांत किशोर जल्दी ही वाकिफ और रूबरू हो जाएंगे। ईश्वर प्रशांत किशोर को इस नई पारी खेलने के लिए पहली पारी समान ही सफलता प्रदान करें। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ!

बुधवार, 4 मई 2022

राणा दंपत्ति का जमानती आदेश! कितना न्यायिक! कितना संवैधानिक!

राजीव खण्डेलवाल                    
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)                                                        
मुम्बई सत्र न्यायाधीश ने राणा दंपत्ति के जमानत आदेश मंे जो शर्ते लगायी है, उनमें अन्य शर्तो के साथ आगे उल्लेखित दो शर्ते महत्वपूर्ण है। प्रथम राणा दंपत्ति उक्त विषय पर कोई ‘‘पत्रकार वार्ता’’ अर्थात् मीडिया से चर्चा नहीं करेगें। दूसरा वे भविष्य में ‘‘इस तरह का दोबारा विवाद आगे नहीं करेंगे ’’ अर्थात् इस ‘‘अपराध की पुनरावृत्ति नहीं करंेगे’’, जैसा कि मीडिया द्वारा कहा गया है। 
प्रश्न यह है कि मीडिया से बातचीत करने का जो प्रतिबंध माननीय न्यायालय ने लगाया है, वह कितना न्यायिक, संवैधानिक होकर संविधान में दी गई बोलने के ‘‘प्रतिबंध के साथ दी गई सीमित (पूर्ण नहीं) स्वतंत्रता’’ के अंतर्गत आता है? बड़ा प्रश्न यहां इस कारण से भी हो जाता है कि माननीय न्यायाधीश ने पटल (काॅउटर) में मीडिया को इस विषय पर कोई स्टोरी प्रसारित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। अर्थात् यदि मीडिया एक तरफा उक्त घटना पर अपनी स्टोरी आरोपी के विरूद्ध मिर्च-मसाला के साथ प्रसारित करता है, जैसा कि प्रायः मीडिया हमेशा से प्रायः करते आये हैं। तब उस स्टोरी के तथ्यों के गलत होने पर आरोपी मीडिया में जाकर अपने बचाव में अपना पक्ष नहीं रख सकते हंै। यह क्या बात हुई ‘‘किसी पर करम, किसी पर सितम’’।
निश्चित रूप से मेरा ऐसा मानना है कि इस तरह का प्रतिबंध आरोपी की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार पर एक प्रकार का कुठाराघात सा है। पुलिस प्रशासन को इस बात का अविरल कानूनी अधिकार ही नहीं है, बल्कि यह उसका दायित्व भी है कि यदि अपराधी/अभियोगी मीडिया से बात करते समय स्थापित सीमाओं का अथवा किसी कानून का उल्लघंन करते हैं, तो पुलिस उनके खिलाफ नई एफआईआर दर्ज करके आवश्यक कानूनी कार्यवाही कर गिरफ्तार कर सकती है। (चारा मामले में लालू यादव पर एक नई कई एफआईआर दर्ज हुई थी)
आज कल व्यक्ति के संवेदनशील मामलों में अपराधी बनने पर राज्य सरकारों को अपराधी की ‘‘सम्पत्ति के अतिक्रमण का ख्याल’’ आ जाता है। और यह ख्याल दिलाने के लिये ‘‘अहो दुर्रताबलन दिरेधिता’’ और वह अपने कानूनी अधिकारों का अतिक्रमण कर अपराधी के तथाकथित अतिक्रमण पर तुरंत-फुरंत बुलडोजर चला देते है। क्योंकि आज की राजनीति में यह एक वोट प्राप्त करने का मुद्दा जो हो गया है। जैसा कि प्रस्तुत मामले में भी मुम्बई महानगर पालिका ने राणा दंपत्ति के खार स्थिति फ्लैट पर अगली कार्यवाही करने के लिए नोटिस चिपका दिया है। उक्त अपराध घटने के पूर्व क्यों नहीं? महानगर पालिका द्वारा की कार्यवाही कानून सम्मत व अधिकार सम्पन्न होने के बावजूद ‘‘समय के चुनाव’’ में महानगर पालिका के ’’दुरा’’/’’आशय ’’ को स्पष्ट रूप से इंगित करता हैं? यह प्रतिबंध कहीं न कही संविधान में दी गई सीमित (असीमित नही) स्वतंत्रता को भी उल्लंघन करता हुआ प्रतीत होता हैं, जो कार्य शायद पुलिस प्रषासन का है। 
एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि माननीय सत्र न्यायाधीश ने इस विषय पर मीडिया से बातचीत करने पर प्रतिबंध राणा दंपत्ति पर लगाया। परन्तु उनके परिवार के सदस्य व सहयोगियों पर कोई प्रतिबंध न लगाने के कारण यदि वे लोग इस विषय पर मीडिया से बातचीत करे, तो क्या प्रतिबंध अप्रभावी होकर ‘‘बालू की दीवार’’ नहीं हो जायेगा? और क्या वह न्यायिक अवमानना की सीमा में आयेगा? 
जहां तक पुनः अपराध न करने की दूसरी शर्ते है, वास्तव में वह भी सामान्य शर्त नहीं है। माननीय सत्र न्यायालय ने यह कहकर कि वे दोबारा इस तरह का विवाद नहीं करेगें, उन्हे प्रथमदृष्ट्यिा एक तरह से अपराधी ही मान लिया है, जो कि जमानत के मूल सिंद्धातों के विरूद्ध है। जमानत प्रकरण में मुख्य रूप से यह देखा जाता है कि अभियोगी जमानत मिलने पर गवाहों को ड़राये-धमकाये नहीं, उसके भागने की संभावनाएं न हो और वह जांच में पूर्ण सहयोग करे। प्रथमदृष्ट्यिा यदि अपराधी गंभीर अपराध को अंजाम देने वाला माना जा रहा है, तो न्यायालय द्वारा सामान्यतः जमानत ही नहीं दी जाती है। आरोपी ने अपराध किया या अथवा नहीं, यह अवधारित करना सामान्यतः जमानत आवेदन की सुनवाई के समय नहीं बल्कि यह तो मुकदमें का ट्रायल होने पर ही निर्णित होगा। परन्तु जमानत आवेदन पर सुनवाई के दौरान माननीय सत्र न्यायाधीश की टिप्पणी निचली ट्रायल कोर्ट में चलने वाली कार्यवाही को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाली हो सकती है, इस बात को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है। 
जमानत के मामलों में सामान्यतः सत्र न्यायधीश के समक्ष बहस होने के बाद जमानत देने अथवा न देने का निर्णय ले लिया जाता है। कभी समय की कमी के कारण विस्तृत निर्णय अगले दिन के लिये रख दिया जाता है। परन्तु 30 तारीख को बहस समाप्ति के बाद प्रकरण आदेशार्थ बंद करने के बाद दो तारीख तक निर्णय सुरक्षित रख कर निर्णय देने कहा गया। फिर 4 तारीख के लिए निर्णय को बढ़ा दिया गया। इस प्रकार अभियुक्तों की तीन दिन की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हुआ है। सेशंन कोर्ट तत्काल ही बहस के बाद जमानत देने की घोषणा करके अगले दिन विस्तृत निर्णय दे सकती थी, ताकि उन्हे दूसरे दिन समस्त औपचारिकता पूरी करने पर जमानत मिल जाती। माननीय सत्र न्यायाधीश से यह जानकारी ली जानी चाहिए कि इस तरह का जमानती आदेश कितने अन्य प्रकरण में दिये गयें, जहां प्रकरण आदेशार्थ वह होने के बाद 3-4-5 दिन बाद निर्णय दिये गये हों। जमानत का एक अधिकार है व अस्वीकार एक अपवाद है, उच्चतम न्यायालय का यह एक प्रतिपादित सिंद्धान्त है और जैसा कि कहा गया हैः ‘‘दीर्घसूत्री विनश्यति’’। यहां पर न्यायालय की शायद उपरोक्त समय लगने वाली प्रक्रिया के कारण उक्त सिंद्धान्त की भावना को कहीं न कहीं हल्की सी चोट जरूर पहंुची है। 
राजनैतिक आपराधिक मामलों में न्यायालय के शायद अतिरिक्त सावधानी और सुरक्षा बरतने के कारण वह एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया नहीं रह पाती है। अतः इस पर उच्चतम न्यायालय को कोई न कोई स्पष्ट निर्देश और सिंद्धान्त जारी करना चाहिए। ताकि निचली अदालतें संवेदनशील मामलों में अपराध की घटना व अपराधियों के वजूद के कारण अपने आस-पास उत्पन्न परिस्थितियों से अप्रभावित हुये बिना निश्चित होकर ड़रे बिना, निर्भिक, निर्विकार भाव से पूर्ण कौशल व बुद्धि का उपयोग कर अपनी न्यायिक कर्तव्यों को निभा सकें।

‘‘तेल नीति’’ पर ‘‘राजनीति’’ नहीं, बल्कि दृढ़ राष्ट्रहित, जनहित व ‘‘पारदर्शी नीति’’ की आवश्यकता है।

‘‘तेल का खेल’’, ‘‘न खेला होवे कब’’?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  कोरोना के विषय पर बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की मींटिग में समस्त राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सहकारी संघवाद की याद दिलाते हुये कहा कि वे अपने-अपने प्रदेशों में वेट को घटाकर अपने राज्य के नागरिकों को तेल की मंहगाई से राहत प्रदान करें। प्रधानमंत्री ने तेल कीमतों में ‘‘मंहगाई की आग’’ का कारण ‘‘रूस-यूक्रेन युद्ध’’ को बतलाया। पिछले 8 वर्षो में पेट्रोल 70-75 रू. से बढ़कर सैकड़ा (100) पार कर गया, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का मूल्य 130-135 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 40-60 डॉलर तक आ गया था। रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व 24 फरवरी तक क्रुड़ आईल की कीमत अंर्तराष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर से भी कम लगभग 95 डाॅलर रहने के बावजूद भी हमारे देश में औसत 100 रू. से ऊपर पेट्रोल के दाम पहुंच गये थे। परन्तु प्रधानमंत्री की इस बेतहाशा तूफानी बढ़ोतरी पर कोई नजर नहीं गई। भले ही इसका कोई कारण नहीं बतलाया हो, परन्तु इस बढ़ोतरी का कारण ‘‘न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः‘‘, अर्थात धन से कभी तृप्त न होने वाली लालसा के अलावा और क्या हो सकता है? यद्यपि यह कारक देश के खजाने में वृद्धि करने में निसंदेह बहुत सहायक रहा।

केन्द्रीय सरकार द्वारा नवम्बर 2021 में एक्साइज ड्यूटी घटाकर राज्य सरकारों से वेट कम करने की अपील की गई थी। तब समस्त बीजेपी शासित राज्यों ने अपने राज्यों में वेट की दर घटा दी थी। परन्तु विपक्षी राज्योें ने नहीं घटाई। सिवाएं पंजाब को छोड़कर जहां चुनाव होने वाले थे, वहां पर वेट अवश्य घटाया गया। उक्त बैठक में ही विपक्षी राज्यों पर तंज कसते हुये प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण आक्षेप यह लगाया कि वेट कम न करना एक तरह से राज्यों के लोगों के साथ अन्याय है। यानी ‘‘जबरा मारे और रोने भी न दे‘‘

आपको याद होगा, देश के उपभोक्ताओं के लिये पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण की नीति को यूपीए सरकार ने सरकारी ‘‘नियंत्रण से मुक्त‘‘ कर कंपनियों के पाले में ड़ाल दिया था, यह कहकर कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (क्रूड़ ऑयल) के बढ़ते घटते मूल्य के आधार पर पेट्रोलियम कंपनीयां देशी बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम को तदनुसार निर्धारित कर सकेगीं और इस तरीके से तकनीकि रूप से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के लिए सरकार ने स्वयं को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया था। इसे डायनमिक प्राइसिंग कहते है। यह ‘‘आधिकारिक सैंद्धातिक’’ स्थिति है। परन्तु वास्तविक रूप से धरातल पर उतरी हुई नहीं है। बल्कि यह जैसी ‘‘बहे बहार पीठ तब वैसी दीजे’’ की नीति अपना लेती है। यह इस बात से सिद्ध होती है कि दिन-प्रतिदिन, हफ्ता-पख़वाड़ा डीजल-पेट्रोल के मूल्यों में होने वाली वृद्धि ‘‘चुनाव के समय’’ बिना किसी रूकावट के पूरी चुनावी अवधि में बिना नागा ‘‘अवकाश’’ ले लेती है। यह छुट्ठी सरकार ही तो देगी? अंर्तराष्ट्रीय बाजार नहीं? ‘‘आदर्श चुनाव संहिता लागू‘‘ होते ही मूल्य वृद्धि भी ‘‘आदर्श‘‘ दिखाने के लिए ‘‘रुक‘‘ जाती है?

 देश की राजनीति में पेट्रोलियम उत्पाद के मूल्यों को लेकर क्या पक्ष क्या विपक्ष दोनों ने ही सत्ता के समय की अपनी नीति व विपक्ष के रूप में अपनी आलोचनात्मक नीति को देश हित में सही ठहराया है। इसे ही कहते है ‘‘कालस्य कुटिला गति’’ मतलब पक्ष से विपक्ष या ‘विपक्ष’ से ‘पक्ष’ होने पर राजनैतिक दलों द्वारा तेल की अपनी मूलभूत नीति में भी बहुत आसानी से सुविधाजनक परिवर्तन कर लिया जाता है। जनता द्वारा समस्त दलों को गिरगिट समान बदलती इस तेल नीति का आईना दिखाना आवश्यक है, ताकि वे अपने गिरेबानों में झांक सके। दुर्भाग्यवश यह संभव नहीं हो पा रहा है। इसलिए उक्त शीर्षक दिया गया है।

प्रधानमंत्री की राज्यों को वेट कम करने की सलाह की इस दोहरी नीति पर नागरिकों को ध्यान देने की अति आवश्यकता है। प्रधानमंत्री जब राज्यों को वेट घटाने की बात कहते है, तो वे यह कहना नहीं भूलते हैं, बल्कि इस बात पर जोर देते हैं कि इन छः महीनों में कर्नाटक को 5 हजार करोड़ व गुजरात (दोनो भाजपा शासित राज्य) को 3-4 हजार करोड़ का राजस्व का घाटा वेट घटाने के कारण उठाना पड़ा। तथापि उक्त राज्यों के पड़ोसी राज्यों (विपक्षी शासित) ने 5 हजार करोड़ का अतिरिक्त राजस्व वेट न घटाने के कारण कमा लिया। प्रधानमंत्री ने यह भी माना कि टैक्स में कटौती करने से राजस्व की हानि होती है, लेकिन आम जनता को राहत मिल जाती है। बड़ा प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री इस सिद्धांत को ‘‘चैरिटी बिगत्स एट होम’’ की तर्ज पर एक्साइज ड्यूटी के संबंध में क्यों नहीं अच्छी तरह से लागू करते है? पिछले 8 सालों में पेट्रोल-डीजल में क्रमशः 45%, 75% तक की एक्साइज ड्यूटी में वृद्धि (लगभग 30 रू. प्रति लिटर) होकर केन्द्र सरकार के राजस्व में चार गुना इजाफा हुआ। नवम्बर 2021 में मात्र 5 रू. व 10 रू. प्रति लिटर पेट्रोल-डीजल में कमी की गई थी। तथापि यह भी एक तथ्य है कि इसका 42 प्रतिशत राज्यों के पास चला जाता है। अब शायद 100 रू. जिसमें 100 प्रतिशत अर्थात 50 रू कीमत व 50 रू समस्त करो के करारोपण का योग शामिल हैं मूल्य को आधार मूल्य मानकर तेल के मूल्यों में वृद्धि की तुलनात्मक निष्कर्ष निकाले जाकर जनता को गुमराह किया जा रहा हैं। एक्साइज ड्यूटी बढ़ातेे समय प्रधानमंत्री को सहकारी संघवाद की याद व जनता को राहत देने का ख्याल शायद नहीं आया? यही ‘‘एक आंख से हसने और एक आंख से रोने वाली’’ दोहरी नीति है। ऐसी स्थिति में एक्साइज ड्यूटी में अल्प कमी कर सरकार राहत देने का दावा कैसे कर सकती है? अतः एक्साइज ड्यूटी बढ़ाते समय उसे अन्याय नहीं माना है। जब बढ़ोत्री ‘अन्याय’ ही नहीं तब ‘न्याय’ (छूट) की आवश्यकता कहां है? 

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है, जब भी पेट्रोल उत्पादकों पर खासकर डीजल पर करारोपण चाहे एक्साइज ड्यूटी हो अथवा वेट, उसका केसकेड़िंग प्रभाव होता है। अर्थात 2ग2त्र 4 न होकर 5 हो जाता हंै। क्योंकि अधिकतम परिवहन साधनों में फ्ूयल डीजल का उपभोग (कंजूमशन) होने के कारण भाडे़ में वृद्धि होने से समस्त जीवनपयोगी वस्तुओं के मूल्य में भी वृद्धि हो जाती है और इस प्रकार 10 रू. मूल्य की वृद्धि अंत में जाकर 12-13 रू. की वृद्धि में परिवर्तित हो जाती है। यह 2 से 3 रू. की अतिरिक्त वृद्धि जो ट्रान्सपोटेशन के कारण हो जाती है, वह देश के विकास में खर्च नहीं होती जैसा कि केन्द्रीय सरकार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाते समय जनता से अपील करती है या दावा करती है कि बढ़ा हुआ टैक्स देश के विकास में खर्च होगा। यह बढी हुई वृद्धि ट्रान्सपोर्ट के लागत में ही लग जाती है।

 प्रश्न यह है देश को चलाने वाले देश के राजनैतिज्ञ जो जनता की सेवा के नाम पर राजनैतिक क्षेत्र में आते है, और जैसा कि कहा भी जाता हैः-‘‘परोपकाराय सताम् विभूतयः’’ और जनता की सेवा के लिए पक्ष व विपक्ष के सौंपे गये दायित्व का बीड़ा उठाने का संकल्प लेते है, वे तेल की इस दोहरी नीति को कब छोड़ेगें? और देश का उद्धार करेंगें? और इस दुमही नीति के लिए देश से वे कब माफी मागेंगें? 

यूपीए सरकार के प्रथम कार्यकाल (2004 से 2009) में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 50 डाॅलर से बढ़कर 160 डाॅलर प्रति बैरल तक पहंुच गई थी। जबकि पेट्रोल का दाम तब भी 45-50 रू. प्रति लिटर ही था। परन्तु कम्यूनिष्टिों के दबाव के आगे सरकार ने तेल की कीमत लगभग नहीं बढ़ाई। आर्थिक मंदी के कारण जनवरी 2009 में कच्चे तेल की कीमत घटकर 50 डाॅलर हो गयी। 2014 में एक पत्रकार वार्ता में मनमोहन सिंह का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि ‘‘इतिहास मेरे प्रति दयालु’’ होगा। एनडीए सरकार के समय कच्चे तेल के मूल्य में भारी गिरावट के बावजूद भी तेल के महगे होने के कारण भारी अंतर से हुये मुनाफे को वह कम कर जनता को राहत क्यों नहीं दे पा रही है? बल्कि जनता से बढ़ी कीमतों का भार देशहित में बुनियादी ढांचों के विकास के लिए सहने को कह रहे है। लोकोक्ति (मुहावरा) ‘‘तेल देखों; तेल की धार नहीं’’ के अर्थ को ही तेल की कीमत ने बदल दिया है। वास्तव में जनता का ही ’’तेल’’ निकल रहा है। कयोंकि तेल मतलब सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि खाद्य तेलों के मूल्यों में बढ़े हुयें आयात के बावजूद भी अंगार लगी हुयी है। 56 इंच सीना लिये हुये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब सालों से चले आ रहे कठिन, बेहद विवादस्पद विषयों तीन तलाक व अनुच्छेद 370 को समाप्त कर सुलझा सकते है और किया है। इस प्रकार देशहित में साहसपूर्ण निर्णय के लिए स्वयं को सिद्ध कर चुके है। तब पेट्रोलियम उत्पादकों को जीएसटी में शामिल क्यों नहीं कर रहे हैं? पहली बार जीएसटी की जब अवधारणा आई थी, तब ‘‘एक राष्ट्र-एक दर’’ के सिद्धांत के आधार पर उसमें समस्त वस्तुओं पेट्रोल उत्पाद सहित (माल) को शामिल किया जाना था। जिस प्रकार यूपीए सरकार के समय भाजपा शासित सरकारांे के मुख्यमंत्रियों ने जीएसटी का अप्रत्यक्षतः विरोध किया था। उसी प्रकार आज पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए कुछ विपक्षी सरकारें भी अपनी अनिच्छा व्यक्त कर चुकी है। तथापि विगत दिवस ही झारखड़ के वित्तमंत्री ने पेट्रोल-डीजल कोे जीएसटी में लाने का स्वागत किया है। 

पेट्रोलियम उत्पादकों को जीएसटी मंे लाने से वास्तव में किसी भी राज्य का नुकसान नहीं होगा। क्योंकि जिस प्रकार वस्तु के क्रय-विक्रय पर ‘वेट’ जिससे राज्यों को सीधे राजस्व मिलता है को समाप्त कर जीएसटी लागू करने पर वस्तुतः उससे होने वाला राजस्व का तय फ्रामूले के अनुसार राज्य कोे अपना हिस्सा केन्द्र सरकार से मिलता है। मतलब राजस्व में हानि नहीं होती है। इसका एक प्रत्यक्ष राजनैतिक फायदा यह है कि राज्य सरकारें तेल पर कर बढ़ने की स्थिति में जिम्मेदारी व बदनामी से भी बच जायेगी। यदि केेन्द्र सरकार ‘‘ओस चाट कर प्यास बुझाने वाली‘‘ नहीं बल्कि दृढ़ता से एक्साईज ड्यूटी में उद्देश्यपूर्ण राहत पहंुचाने वाली कमी करे जिससे नागरिकों को वास्तविक राहत महसूस हो तब विपक्षी शासित राज्यों पर भी नैतिक रूप से दबाव बढ़ जायेगा। और आज नहीं तो कल जब चुनाव का समय आयेगा तब निश्चित रूप से पंजाब के समान अन्य राज्य भी वेट कम करने के लिए मजबूर होगें। क्योंकि ‘‘खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है‘‘। 

आप जानते है कच्चे तेल का देश में उत्पादन यूपीए सरकार के समय 30 प्रतिशत होता था पिछले तीन वर्षो से लागत कच्चे तेल के चाल उत्पादन के लागत जिसका आयात जो अभी एनडीए सरकार के समय घटकर 15 प्रतिशत के आस-पास रह गया। वर्ष 2013-14 में 77 प्रतिशत से बढ़कर 84 प्रतिशत रह गया। प्रधानमंत्री ने 10 प्रतिशत आयात कम करने का लक्ष रखा था। भारत विश्व का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। जहां घरेलू मांग की पूर्ति अधिकतम अंर्तराष्ट्रीय बाजार से आयात कर ही की जाती है, इस कारण हमारे देश की मेहनत से कमाई गई विदेशी मूद्रा भंडार का भारी मात्रा में खर्च होता है। यह हमारे बजट, जीडीपी मतलब देश के विभिन्न आर्थिक पहलुओं को किसी न किसी तरह से नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। वैसे आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि भारत रिफाइड़ कच्चे तेल का दुनिया में शीर्ष 10 देशों में शामिल है। क्या अब भी सरकार तेल के आयात कम करने के लिए वैकल्पिक उर्जा स्त्रोतों के विकास के अतिरिक्त तेल पर एक आवश्यक नई नीति नहीं बनानी चाहिए? 

 प्रथम तो देश में नये तेल कुओं की खोजकर नई तकनीक का उपयोग कर कच्चे तेल के धरेलु उत्पादन को बढ़ाना आवश्यक है, ताकि आयात पर निर्भरता कुछ कम हो सके। पिछले 7 सात सालों से अंर्तराष्ट्रीय बाजार में कीमत कम होने के कारण तेल पूल में संग्रहित अतिरिक्त राजस्व की कुछ राशी तेल के शोध, रिसर्च पर खर्च किया जाना चाहिए। दूसरी बात हमें कहीं न कहीं देश के भीतर कन्यजूम्शन की मांग को नियंत्रित करना होगा। जिस प्रकार हमने जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाये है। उसी प्रकार तेल के उपभोग को नियंत्रित करने के लिए राशनिंग एक तरीका हो सकता है। दूसरा तरीका सार्वजनिक व वाणिज्यिक परिवहन को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति की तेल के उपभोग की एक अधिकतम सीमा तय कर उससे उपर जाने वाले तेल के उपयोग पर अतिरिक्त कर लगाकर उपभोग को निरूतासित किया जा सकता है। जैसे बिजली की दरों की बात हो, अधिक उपभोग  पर सरकार अधिक कर लगाती है। यह काम आसान नहीं होगा। परन्तु जब तब सोचेगें नहीं तो उसका हल कैसे निकलेगा? आयात पर खर्च होने वाली महत्वपूर्ण मंहगी विदेशी मूद्रा के कारण इस मुद्दे पर भी गहनता से  त्वरित विचार करेने की आवश्यकता है। 

अंत में एक बात और भाजपा प्रवक्ता यह कहते-कहते नहीं थकते है, देशहित में बढ़ा हुआ कर देश के विकास में खर्च होगा। देश की आय जब किसी भी भी स्त्रोत या करारोपण से हो तो उसका उपयोग अंततः देश के विकास में ही तो खर्च होता है। पेट्रोलियम में सेस का मामला ही ले लीजिये। कैग (सीएजी)  ने एक रिपोर्ट में सेस की राशी जिस के अंतर्गत वसूली गयी है, उसका उपयोग उस तरह नहीं हुआ है। मात्र 21 प्रतिशत राशि ही अपेक्षित उद्देश्य के लिए की गई। अतः सरकार का जनता से उक्त आव्हान भी तथात्मक रूप से गलत सिद्व होता हैं। चंूकि बात हमेशा देश के विकास की जाती है। परन्तु देश को निर्मित व अंशदान देने वाले नागरिकों के विकास की बात पर कोई दल ध्यान नहीं दे रहा है। तो क्या देश और नागरिक का विकास अलग-अलग है? नागरिक है, तभी तो देश हैः ‘‘सर सलामत तो पगड़ी हजार‘‘!

तेल की महंगाई की जनता की इस सहनसीलता को देखते हुए एक टीवी चैनल ने तो राष्ट्रीय सहनशक्ति सूचकांक की नई अवधारणा की ही घोषणा कर दी है।

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