गुरुवार, 17 नवंबर 2022

उच्चतम न्यायालय का निर्णय ‘‘न्यायिक’’ परन्तु आंशिक!

19 वर्षीय ‘‘अनामिका’’ का अपहरण कर गैंगरेप के बाद की गई हत्या के पौने 11 साल बाद छावला हत्याकांड के तीनों आरोपियों रवि कुमार, राहुल और विनोद को जिन्हे उच्च न्यायालय ने ‘‘शिकार’’ की तलाश में ‘‘शिकारी’’ का तमगा तक दे दिया था, अधीनस्थ निचली दोनों न्यायालय; सत्र न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष फरवरी 2014 में फांसी की सजा दिए जाने व पुष्टि के आदेश के बावजूद संवैधानिक क्षेत्राधिकार का न्यायिक उपयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय ने उन्हें पर्याप्त सबूत के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए यह कहते हुए बरी कर दिया की निर्णय नैतिक दोषारोपण व भावनाओं के आधार पर नहीं व ‘अन्यत्र से’ प्रभावित हुये बिना होना चाहिए। उक्त प्रकरण मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर ही आधारित था, जहां श्रृंखला को पूरा होना चाहिए। माननीय न्यायाधिपतियों ने अपने बरी आदेश में यह कहा कि जघन्य अपराध में शामिल होने के बावजूद, पुलिसिया जांच व मुकदमे के दौरान बरती गई लापरवाहियों के कारण आरोपियों को निष्पक्ष ट्रायल न मिलने से छोड़़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने बरी करते समय कहीं भी यह स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया कि अभियुक्त गण उक्त दहलाने वाली घटना में शामिल (संलग्न) नहीं थे, तथापि उच्चतम न्यायालय ने जांच की संपूर्ण प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियों को पाते हुए दोषियों को (बाइज्जत नहीं?) छोड़ने के आदेश दिये।
न्याय का पुराना चला आ रहा यह सर्वमान्य सिद्धांत अभी भी है, कि 99 दोषी भले ही छूट जाये, परन्तु एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। इसलिए यह भी कहा जाता है कानून अंधा होता है। इस सिद्धांत में ही पीडि़त परिवार की व्यथा, आक्रोश, गुस्सा, लाचारी शामिल है जहां, 99 दोषी छूट जाये जिसमें ये तीनों दोषी भी शामिल हैं। यह न्यायपालिका की ‘‘दूरस्थाः पर्वताः रम्याः’’ वाली छवि को प्रस्तुत करता है। तथापि यह निर्णय ‘‘कानून जनता के लिये हैं, या जनता कानून के लिये है’’, स्थिति पर चिंतन करने के लिए विवश भी करता है।
उक्त वीभत्स घटना का तीन राज्यों से संबंध है। ‘‘अनामिका’’ मूल रूप से उत्तराखंड के पौडी गांव की रहने वाली थी, जो तत्समय दिल्ली के छावला कुतुब विहार में रह रही थी, जिनके शव की बरामदगी हरियाणा के रेवाड़ी के एक खेत से हुई।
उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों ने जांच प्रक्रिया में कई गंभीर प्रश्न उठाये है। अनेक कमियों को इंगित किया है, जो प्रमुख रूप से निम्न हैं 1. लड़की का शव 3 दिन दिन तक खेत में पड़ा रहा और उस पर किसी की नजर न जाना (संदेहपूर्ण स्थिति) 2. खुले 3 दिन व रात तक पड़ी लड़की के शव से आरोपी रवि के बालों के गुच्छे की बरामदगी विश्वसनीय नहीं लगती। 3. शव की बरामदगी को लेकर हरियाणा व दिल्ली पुलिस के बयानों में अंतर। 4. आरोपियों का सैंपल भी 14-16 तारीख को लेने के बाद बिना सुरक्षा के 11 दिन रखे जाने के बाद 27 तारीख को भेजा गया। (सैंपल में हेर फेर की आशंका) 5. पीड़िता का डीएनए प्रोफाइल 48 घंटे के बाद जांच के लिये लेबोरेटरी भेजा गया। 6. जब्त गाड़ी पुलिस थाने में खड़ी रही, छेड़छाड़ हो सकती थी। 7. आरोपियों की पहचान परेड न करा कर शिनाख्त नहीं की गई। 8. कुछ गवाहों का प्रति परीक्षण (क्रॉस एग्जामिनेशन) न होना। 9. काल रिकार्डस्।  
बड़ा प्रश्न यहां यह उठता है, कि क्या यह ‘‘मोहरों की उपेक्षा और कोयलों पर मुहर’’ का उदाहरण तो नहीं है? क्या ये समस्त त्रुटियां इतनी घातक (फैटल) हैं, जिनके आधार पर उच्चतम न्यायालय ने मजबूरी में अभियुक्तों को छोड़ने का आधार बनाया। जबकि प्राचीन न्याय शास्त्र के अनुसार ‘‘ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने का ही नाम न्याय है’’, जिसे ‘‘अरुंधती दर्शनम् न्याय’’ कहा जाता है। इसी आधार पर इन्ही त्रुटियों को दो निचली अदालतों ने घातक न मानकर बेहिचक सजा देने का आदेश देकर उसकी पुष्टि की थी। शायद क्या उच्चतम न्यायालय ने ‘‘काकदंत गवेषणा: न्याय’’ का उदाहरण तो प्रस्तुत नहीं किया? यदि वास्तव में उक्त खामियां सजा के निराकरण, निर्धारण के लिये महत्वपूर्ण है, तो उच्चतम न्यायालय का दूसरा महत्वपूर्ण दायित्व व संवैधानिक न्यायिक कर्तव्य क्या यह नहीं था कि इन कमियों के लिए नियम, कानून, संविधान के अनुसार अपना कर्तव्य, दायित्व व जिम्मेदारी न निभाने के लिए उन गैर-जिम्मेदाराना जांच अनुसंधान अधिकारियों को खोजकर (पॉइंट आउट कर) उनके खिलाफ एक कड़ी टिप्पणी (स्ट्रक्चर) कर विभागीय जांच के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के आदेश दे देते? साथ ही कानून के अनुसार बुद्धि-विवेक का उपयोग करने में असफल रहने के कारण (इस कारण तीन निर्दोषों को 11 वर्ष कारावास में अकारण रहना पड़ा), अधीनस्थ न्यायाधीशों के विरूद्ध भी आवश्यक कार्रवाई करते? इस आदेश की यह एक बहुत बड़ी कमी परिलक्षित होती दिखती है।
जब उच्चतम न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों की कमियों को दर्शित कर रहा है, तब तो उसके उपचार के लिए संवैधानिक व्यवस्था उच्चतम न्यायालय है। परन्तु उच्चतम न्यायालय की कमियों को दूर करने के लिए कौन सा संवैधानिक उपचार है? या हम यह मान ले कि उच्चतम न्यायालय ‘‘उच्चतम’’ (‘न्यायिक क्षेत्र का राजा’) होने के कारण उसे मानवीय त्रुटि हो ही नहीं सकती हैं? जिस प्रकार राजा कोई गलती नहीं करता है जैसा पुराने समय में माना जाता था। ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं! उच्चतम न्यायालय के आदेश में हुई त्रुटि को सुधारने के लिए संविधान में जहां सिर्फ रिव्यू पिटीशन और तत्पश्चात रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा प्रकरण में निर्धारित की गई अवधारणा अनुसार अंतिम रूप से क्यूरेटिव पिटीशन दायर की जा सकती है। तथापि पुनर्विचार याचिका का दायरा बहुत ही सीमित होता है। वे ही त्रुटियां जो अभिलेख के फेस पर (पहली नजर में) स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है, उन्ही के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है।
यदि उच्चतम न्यायालय अभियोजन की हुई उक्त त्रुटियों के कारण निर्दोष व्यक्तियों को फांसी पर चढ़ाने वाले आदेश और फांसी की सजायाफ्ता पाये अभियुक्तों की रिहाई के आदेश में बदलने के लिए लापरवाही व चूक के लिए उन दोषी अधिकारियों के विरूद्ध उक्त आदेश में कोई कड़ी कार्रवाई करने का आदेश/निर्देश/संकेत दे देती, और वास्तविक अभियुक्तों को पकड़ने के लिए एक एसआईटी का गठन कर जांच करने का आदेश दे देती तो, निश्चित रूप से संतृप्त परिवार को कुछ सांत्वना अवश्य मिल जाती। यद्यपि ‘‘ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती’’,। उच्चतम न्यायालय का यह दायित्व जरूर बनता है, जब एक लड़की की निर्मम तरीके से हुई हत्या व हैवानियत, बर्बरता पूर्ण, अमानवीय तरीके से हुए सामूहिक बलात्कार का कोई आरोपी दोषी नहीं है, तो कोई न कोई व्यक्ति तो दोषी अवश्य है, जिसने उक्त अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया था, लेकिन पीडि़त पक्ष को तो ‘‘न तो ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम’’। प्रसिद्ध रूसी उपन्यास ‘‘अपराध एवं सजा’’ में लेखक दोस्तोवस्की का यह कथन महत्वपूर्ण है ‘‘यदि आप पकड़े नहीं जाते हैं तो अपराध पुरस्कृत है’’।
उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय से देश आमतौर पर स्तब्ध है व कुछ जनाक्रोश भी है। न्यायालय द्वारा अभियोजन की बतलाई गई कुछ त्रुटियों के संबंध में कुछ प्रमुख कमियां/खामियां भी मुख पर (ऑन द फेस) अवश्य दिखती है, जो कि न्याय के ‘‘दूध का दूध और पानी का पानी’’ के सिद्धान्त पर प्रश्नचिन्ह लगाती है? प्रथम कुछ गवाहों के प्रति-परीक्षण न होने को लेकर! निश्चित रूप से अभियोजन ने गवाहों को प्रस्तुत किया, तभी तो प्रति-परीक्षण की बात उत्पन्न हुई? और यदि प्रति-परीक्षण नहीं हुआ तो यह तो बचाव पक्ष की गलती है। इस महत्वपूर्ण त्रुटि (उच्चतम न्यायालय की नजर में) के लिए अधीनस्थ न्यायालयों के माननीय न्यायाधीशों की गलतियों की भर्त्सना कर चेतावनी देकर लताड़ा, क्यों नहीं गया5? बचाव पक्ष का यह दावा देखने को नहीं मिला कि सत्र न्यायाधीश ने प्रति परीक्षण का अवसर ही नहीं दिया। पहचान परेड के संबंध में भी परीक्षण न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) में यह तथ्य आया है कि रात्रि होने के कारण उन्हें पहचानना संभव नहीं था। व्हीकल जब्ती के बाद थाने में ही तो रहती है, (क्या यहां भी सुरक्षित नहीं है?) इस पर प्रश्न चिन्ह लगाना कितना उचित है? दूसरा डीएनए टेस्ट के संबंध में अभी हाल में ही अमेरिका में 1987 के एक प्रकरण काफी समय बाद डीएनए टेस्ट अभियुक्त का होकर उस आधार पर उसे निर्दोष छोड़ा गया।
उच्चतम न्यायालय का यह कथन कि निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं होते है, का क्या आधार है? क्या दोनों अधीनस्थ न्यायालयों ने भावनाओं से अभिभूत होकर निर्णय दिया? सत्र न्यायालय के समक्ष चल रही सुनवाई (ट्रायल) के समय तो भावनाओं के प्रवाह की एक संभावना हो सकती है। क्योंकि घटना ताजा-तरोज थी। परन्तु उच्च न्यायालय के सामने भी वही भावनाओं का वेग हो गया? इस पर उच्चतम न्यायालय ने शायद बारीकी से विचार नहीं किया। अतः महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उक्त त्रुटि तकनीकी है अथवा अपूरणीय (सुधारे जाने योग्य नहीं) है। इन सब प्रश्नों के निराकरण हेतु, उच्चतम न्यायालय का प्रकरण को अनुच्छेद 142 के अंतर्गत लेकर पूर्ण रूप से समस्त बिंदुओं पर विचार कर निर्णय लेकर मीडिया व पीड़ित परिवार द्वारा निर्णय के प्रति बनाई गई मलिन छवि को दूर करना चाहिए।
एकदम से यह नहीं कहा जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय ने न्याय नहीं दिया है, सिर्फ इसलिए कि ऐसे किये गये जघन्य अपराध की फांसी की सजा प्राप्त अपराधियों को आम संवेदनाओं के विरुद्ध जाकर बरी कर दिया गया है। वीभत्स घटना व अधीनस्थ न्यायालय द्वारा दिये अधिकतम सजा प्राप्त अपराधियों सिर्फ इन दो परिस्थितियों के चश्मे से ही उच्चतम न्यायालय के निर्णय को देखना न तो तार्किक, न्यायिक होगा और न ही उच्चतम न्यायालय के साथ समानता का न्याय? तथापि प्रकरण की सम्पूर्णता के साथ विद्यमान कानूनी प्रावधानों को दृष्टिगत रखते हुए समस्त पक्ष पीडि़ता, न्यायालय व नागरिकों द्वारा देखने पर ही सही न्याय हो पायेगा। इस प्रकार ‘परी’ (एंटी रेप एक्टिविस्ट) की फाउंडर योगिता भयाना के यह कथन कि इस निर्णय के बाद न्याय प्रणाली से विश्वास उठ गया है, पर उच्चतम न्यायालय के पुनर्विचार करने से सांत्वना मिलेगी।
ऐसे प्रकरण बर्बरतापूर्वक किये जघन्य अपराधों के मामलों में एमिकस क्यूरी की दोषियों को सुधारने की संभावनाओं को दृष्टिगत करते हुए उनके प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया अपनाने का अनुरोध करना कितना न्यायिक है और यह कड़ी सजा के सिद्धांत के कितने विपरीत है? इसकी समीक्षा की भी क्या आवश्यकता नहीं है?
उच्चतम न्यायालय ने पीड़ित परिवार को दिये गये मुआवजे को धारा 357 द.प्र.स. के अधीन कानूनी मानकर सही ठहराया गया है। मतलब इसका यह है कि उच्चतम न्यायालय ने अभियोजन का आधा पक्ष अर्थात पीडि़ता की गैंगरेप कर हत्या की गई को सिद्ध माना है। परन्तु किसने की? अब यह प्रश्न उक्त निर्णय के बाद अनुत्तरित हो गया है? इस स्थिति के लिए न्याय व्यवस्था, जांच अनुसंधान पद्धति, अभियोजन कौन कितना-कितना जिम्मेदार है, इसका हल एक जिम्मेदार सरकार व न्यायपालिका ही निकाल सकती है।
वर्ष दिसम्बर 2012 में ही हुई ‘‘निर्भया’’ केस की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज गूंजी थी, जिस कारण आपराधिक कानून तक में संशोधन करने पड़े थे। बलात्कार की धारा 376 एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 181,182 में भी परिवर्तन किए गए। नया पॉक्सो एक्ट कानून अस्तित्व में आया। जुवेनाइल जस्टिस बिल में भी संशोधन किए गया। इसके पूर्व हुये वर्ष 2012 के इस छावला अनामिका प्रकरण की तुलना की जाए तो ‘‘उत्तराखंड की अनामिका’’ ‘‘उत्तर प्रदेश की निर्भया’’ से पिछड़ गई। 11 वर्ष के ‘तथाकथित अन्याय’ की तुलना में 7 वर्ष में ही न्याय मिल गया।

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2022

देश की राजनीति का ‘‘नैरेटिव’’ नरेन्द्र नहीं! ‘अरविंद’ तय कर रहे हैं।

वर्ष 2014 में नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने के और प्रधानमंत्री बनने के बाद व केजरीवाल की राष्ट्रीय राजनीति में आने के पूर्व तक नरेंद्र मोदी प्रमुख एक मात्र नेता मीडिया की सुर्खियों में बने रहे। कहा जाता है, वर्ष 2014 का चुनाव मीडिया मैनेजमेंट जिसके पीछे प्रशांत किशोर का बड़ा हाथ था, के कारण ही जीतने में नरेन्द्र मोदी सफल रहे थे। तब से देश की राजनीति (सियासत) का नैरेटिव मोदी ही तय (फिक्स) करते चले आ रहे हैं। जो वे कहते रहे, मीडिया उसे ब्रेकिंग न्यूज बना कर चलाता रहा और पूरी राजनीतिक चर्चा व सियासत मीडिया से लेकर राजनीतिक क्षेत्रों लेखकों व राईटअप में उसी के इर्द-गिर्द होती रही। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी ने राजनीति में अपनी अलग शैली स्थापित की, जो 75 वर्षो से चली आ रही स्थापित राजनीतिक शैली से हटकर थी। मोदी उसमें पूर्णतः सफल भी रहे। यद्यपि वह शैली कितनी सही थी, गलत थी उसके गुणदोष पर विचार मंथन जरूर किया जा सकता है। लेकिन वह शैली उनकी राजनीतिक यात्रा में कहीं आड़े नहीं आयी, बल्कि उनके विजय रथ को आगे बढ़ाने में परोक्ष-अपरोक्ष सहयोग ही देती रही। 
अरविंद केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद पहले पांच साल वे साहसपूर्वक सीधे बेबाक तरीके से नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा करते रहे, चाहे फिर बात नालियों को साफ करने की ही क्यों न रही हो। लेकिन उसके दुष्परिणाम स्वरूप आप पार्टी दिल्ली की लोकसभा की सातों सीटें हार गई एवं नगर निगम में भी सफलता नहीं मिली। राजनैतिक विश्लेषक संजय कुमार के अनुसार जब कोई प्रिय नेता लोकप्रिय हो, तब उस पर हमला करने का असर उल्टा ही होगा। जैसा कि ‘‘चांद पर थूका हुआ वापस थूकने वाले मुंह पर ही पड़ता है।’’ शायद इसी नीति को अपना कर वर्ष 2017 में हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव के परिणाम के बाद व पंजाब में खराब प्रदर्शन के बाद केजरीवाल ने ‘‘गज में कब्ज़ा करने की बजाय इंच में कब्ज़ा करने की नीति’’ के तहत अपने भाषणों में, चर्चा में, कथनों में, ट्वीट्स में लगभग पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया, जिसका उन्हें भी फायदा मिला। फलतः दिल्ली सरकार उपराज्यपाल के साथ बेहतर सामंजस्य के साथ कार्य कर पायी। जब आप पार्टी पंजाब चुनाव में उतरी तब केजरीवाल मोदी पर पुनः आक्रामक हो गये और पंजाब की सफलता के बाद तो राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के लिये वे बेहद ही आक्रामक तरीके से नरेन्द्र मोदी पर हमला कर रहे हैं। मीडिया मैंनेजमेंट में उनकी कार्यशैली का कोई जोड़ नहीं हैं।  
जब आप पार्टी मात्र एक छोटे से आधे-अधूरे राज्य दिल्ली पर सत्ता पा काबिज थी, तब भी केजरीवाल ने ‘‘करनी न करतूत, लड़ने को मज़बूत’’ की तर्ज पर उसी मीडिया का प्रबंधन (मैनेजमेंट) अच्छी तरह से किया। नरेन्द्र मोदी के बाद दूसरी आवाज राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की तुलना में एक प्रदेश के मुख्यमंत्री की पूरे देश में बार-बार सुनने को मिलती थी, जिस मीडिया की केजरीवाल ने मोदी की विजय यात्रा में दुरुपयोग के लिए कड़ी आलोचना की थी, उस मीडिया का महत्व समझ कर उसे अच्छी तरह से मैनेज करने में वे सफल रहे है। अब तो उनके पास पंजाब राज्य की सत्ता भी आ गई हैं। अतः अब वे और बेहतर तरीके से मीडिया को मैनेज करने में संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। इस कारण से आज स्थिति यह हो गई है, देश की राजनीति का नैरेटिव प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री आप पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल कर रहे है जिनका ध्येय वाक्य है कि ‘‘माल कैसा भी हो, हांक हमेशा ऊंची लगानी चाहिये’’। आगे उदाहरणों से आप इस बात को अच्छी तरह से समझ जाएंगे। 
ताजा उदाहरण आपके सामने है, दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया के जेल जाने की आशंका मात्र से उनकी तुलना शहीदे-आज़म भगत सिंह से करने पर उन्हें परह़ेज, गुरेज और शर्म तक नहीं आयी। वैसे भी वर्तमान निम्न स्तर की नैतिकताहीन राजनीति में बेशर्म शरारतपूर्ण व अंहकार से भरे बयान पर शर्म का प्रश्न आप क्यों उठाना चाहते है? उससे भी बडी बेशर्म मीडिया निकली जिसने ‘‘गधा मरे कुम्हार का और धोबन सती होय’’ के समान उनके कथनों को हाथों-हाथ झेलकर बार-बार सुना कर हमारे कानों को पका दिया। किसी भी मीडिया की केजरीवाल से यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि अरविंद केजरीवाल जी आपके द्वारा मनीष सिसोदिया की शहीद भगत सिंह से किसी भी रूप में तुलना वैसे भी किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराई जा सकती है और न ही की जा सकती है। आप अपनी तुलना के शब्द बाण वापस लीजिए व उक्त महती त्रुटि के लिए क्षमा मांगिये अन्यथा हम आपके उन कथनों बयानों को प्रसारित नहीं करेंगे। रवीश कुमार बार-बार गोदी मीडिया जरूर कहते है परंतु मुझे लगता है कि वे ‘‘एक तवे की रोटी क्या पतली क्या मोटी’’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए केजरीवाल के जाल में फंसे मीडिया का उल्लेख नहीं करके पक्षपात करते हैं। जबकि मीडिया के बाबत एक प्रसिद्ध उक्ति है की वह नेताओं को फंसा कर रखते हैं। लेकिन यहां केजरीवाल के मामले में स्थिति तो उल्ट है। 
सीबीआई के समक्ष 9-10 घंटे लम्बे चले बयान के बाद मनीष सिसोदिया ने सीबीआई पर बड़ा आरोप लगा कर कहा कि, उन्हें मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव (ऑफर) दिया गया था। परन्तु नाम बताने से परहेज किया गया। फिर भी मीडिया उनकी इस बिना सिर पैर के तथ्य हीन बयान को बार-बार ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलाता रहा। यानी केजरीवाल के लिए तो मीडिया का रोल ऐसा है कि ‘‘लड़े सिपाही और नाम सरदार का’’। इसके पूर्व भी ऑपरेशन लोटस द्वारा विधायकों की खरीद-फरोद कर सरकार गिराने के मनीष सिसोदिया के आरोप के संबंध में भी आज तक उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया गया, जिसने पैसे ऑफर किये गए और न ही उस तथाकथित विधायक/व्यक्ति का कथन,शपथ पत्र या पहचान तक बताई गई, जिसे ऑफर किया गया हो। यह झूठी, मनगढ़ंत न्यूज भी कई दिनों तक चलती रही। हद तो तब हो गई जब सीबीआई द्वारा पूछताछ के बाद मनीष सिसोदिया के सिर पर लटक रही गिरफ्तारी की तलवार जो अंततः गिरी ही नहीं, इस तथ्य के बावजूद केजरीवाल ने गुजरात के महेसाणा जिले के ऊंझा में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनीष सिसोदिया का गुजरात चुनाव में प्रचार करने से रोकने के लिए गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने जनता से ‘‘जेल के ताले टूटेंगे मनीष सिसोदिया छूटेंगे’’ के नारे भी लगवाए । इस सफेद नहीं काले झूठे बयान को मीडिया ने जिस तरह सुर्खिया देकर चलाया और हमेशा प्रश्न करने वाले केजरीवाल से इस झूठ के संबंध में एक भी प्रति-प्रश्न न करना देश की राजनीति के नैरेटिव को केजरीवाल द्वारा निश्चित करने के तथ्य को ही सिद्ध करता है।
जिस तरह ‘‘सोती हुई लोमड़ी सपने में मुर्ग़ियां ही गिनती रहती है’’, राजनेता तथा आम नागरिकों के लिए नए-नए अन्य अकल्पनीय नैरेटिव देने वाले केजरीवाल के ताजा नैरेटिव को भी देखिए। इंडोनेशिया जहां पर मात्र सिर्फ 2% ही हिंदू हैं, की करेंसी में गणेश जी की फोटो का हवाला देते हुए देश की करेंसी में भगवान श्री गणेश और लक्ष्मी माता की तस्वीर लगाने की मांग जोर-शोर से कर डाली। क्या केजरीवाल उसी इंडोनेशिया में अल्पसंख्यक हिंदू के भगवान की फोटो लगाए जाने के पीछे के भावार्थ को समझ कर भारत देश में भी अल्पसंख्यकों (2 नहीं 20 प्रतिशत से ज्यादा) के ईस्टों (भगवानों) की फोटो लगाने की वकालत करेंगे? सिक्के के हमेशा दो पहलू होते हैं, इसे शायद केजरीवाल हमेशा भूल जाते हैं । केजरीवाल का उक्त कथन भी उनके अनेकों अनेकोंनेक झूठे कथनों के समान गलत है। सिर्फ वर्ष 1998 में एक बार भगवान गणेश की फोटो वहां की करंसी में छपी थी। उसके बाद से वर्तमान तक कभी भी गणेश जी की फोटो नहीं छपी है। तथापि केजरीवाल द्वारा उक्त मांग के पीछे बताये गए कारणों के प्रतिफल/परिणाम का तो भविष्य में ही पता लगेगा। परन्तु क्या केजरीवाल ने इस बात की पूर्ण संतुष्टि व सुरक्षा की ग्यारंटी कर ली है कि इन तस्वीरों वाली करंसी का दुरुपयोग भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, जनप्रतिनिधियों के खरीद-फरोक, नशा, वैश्यागमन आदि समस्त बुराइयों में नहीं होगा? अन्यथा इन बुराइयों के लिए उपयोग की जाने वाली करंसी अवैध मानी जाएगी? (केजरीवाल तो नए-नए अप्रचलित सुझावों को देने में माहिर हैं जो?) क्योंकि ये हमारी संस्कृति व आस्था के प्रतीक है। यदि किसी प्रतीक की फोटो व नाम के उपयोग से ही सब कुछ हरा-भरा हो जाता तो केजरीवाल जी, क्या यह बतलाने का भी कष्ट करेंगे की अहिंसा के पुजारी, प्रतीक व पर्यायवाची राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गांधी शताब्दी वर्ष 1969 से देश की करंसी पर फोटो होने के बावजूद क्या देश अहिंसक हो गया ? सत्ता एवं शेष विपक्ष की इस नए नैरेटिव पर सियासत कई नए नए सुझावों के साथ आ गई। हद तो तब हो गई जब हिंदुत्व का नारा उठाने वाली, पहचान वाली पार्टी भाजपा को यह तक कहना पड़ गया की केजरीवाल गुजरात और हिमाचल में हो रहे विधानसभा चुनावों को दृष्टि में रखते हुए हिंदुत्व का कार्ड न खेलें। इसे ही तो नैरेटिव कहते हैं, जिसके मास्टर निसंदेह रूप से आज अरविंद केजरीवाल ही हैं। सही या गलत या अलहदा विषय है।
कुछ राजनैतिक पंडितों का यह कहना है कि केजरीवाल की कार्यशैली (कार्य क्षमता नहीं?) ‘‘मोदी की नकल’’ है। फिर चाहे वह विक्टिम कार्ड की बात हो या गुजरात मॉडल के समान दिल्ली माॅडल की बात हो, राष्ट्रवाद की या पार्टी में सर्वोच्च स्थिति व लोकप्रियता की बात हो। परन्तु वर्ष 2014 से 2022 तक पहुंचते-पहुंचते केजरीवाल नकलची न रहकर नई नई ईजाद कर (अन्वेषणकर्ता होकर)भाजपा को *नकलची* होने के लिए मजबूर कर रहे हैं। करंसी नोट पर भगवान की फोटो की मांग के प्रत्युत्तर में भाजपा व अन्य दलों के नेताओं द्वारा अन्य हस्तियों/विभूतियों की फोटो लगाने की मांग इसी का परिणाम है।

बुधवार, 19 अक्तूबर 2022

‘‘राष्ट्रमाता’’ हीरा बेन को ‘‘राजनीति’’ में घसीटना अनुचित होकर ‘‘निम्नतर स्तर’’ की राजनीति नहीं?

देश के प्रधानमंत्री व गुजरात के ही नहीं, बल्कि देश के प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी की मां का जीवन उनके बेटे के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद बेहद सादगीपूर्ण होकर प्रेरक व प्रेरणा देने वाली है। न तो वे राजनैतिक परिवार से है और न ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि वैसी रही है। नरेन्द्र मोदी के ‘‘स्वयंसेवक’’ होकर राजनीति में आने के बाद भी राजनीति में उनकी न तो कभी दिलचस्पी रही और न ही उन्होंने कभी भी राजनीति में किसी भी तरह का कोई हस्तक्षेप किया है। ऐसा कोई आरोप विरोधियों द्वारा लगाया भी नहीं गया है। तब फिर अचानक एक हफ्ते पूर्व एक पुराना वीडियो वायरल कर और फिर प्रेस वार्ता कर प्रधानमंत्री की माता हीराबेन के नाम पर राजनीति प्रारंभ क्यों हुई? क्या आगामी होने वाले गुजरात के चुनाव (जिसकी अभी तक अधिकारिक घोषणा भी नहीं हुई है) के कारण उन्हें राजनीतिक रूप से तो घसीटा नहीं जा रहा है?

यह राजनीति का ही नहीं बल्कि देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि एक अविवादित, निर्मल व्यक्तित्व के साथ तथाकथित क्षणिक, तनिक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से ‘‘अपना उल्लू सीधा करने के लिये’’ राजनीतिक विवाद में घसीटने का असफल प्रयास देश के प्रधानमंत्री की लगभग 100 वर्षीय वृद्ध माताजी के साथ किया जाए। इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि इसके लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? पक्ष-विपक्ष अथवा दोनों? सामान्य रूप से घृणित कथन कर विवादित बयान देने वाले आप पार्टी के नेता को ही इस निम्न स्तर की राजनीति को चमकाने के लिए जिम्मेदार ठहराया व माना जा रहा है। परंतु यह एक बड़ा गहरा विश्लेषण का विषय है, जिस पर गंभीर चिंता किये जाने की गहन आवश्यकता है, तभी आप पूरी परिस्थितियों का सही आकलन कर पाएंगे।

गुजरात आप पाटी के प्रदेश अध्यक्ष 33 वर्षीय गोपाल इटालिया पूर्व में भी कई बार विवादित होकर सुर्खियों में रह चुका है। कांस्टेबल व राजस्व क्लर्क की अल्प अवधि की नौकरी से बर्खास्त होकर वह आर्म्स एक्ट व अन्य आंदोलन के अंतर्गत जेल भी जा चुका है। जून 2020 में आप पार्टी से जुड़कर इटालिया ने राजनैतिक पारी प्रारंभ की व शीघ्र ही दिसम्बर 2021 में प्रदेश संयोजक बन गये। इटालिया के तीन पुराने (वर्ष 2018-2019 के) वीडियो को पिछले एक सप्ताह में भाजपा ने जारी किया है। वर्ष 2019 के इटालिया के नरेन्द्र मोदी के मां के संबंध में तथाकथित बयान को भाजपा के मीडिया सेल के द्वारा वायरल करने के बाद भाजपा की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपनी ‘‘अधजल गगरी को छलकाते हुए’’ प्रेस वार्ता कर गुजरात में राजनीति चमकाने के लिए केजरीवाल पर प्रधान सेवक की मां, राष्ट्रमाता का अपमान कर भद्दी-गंदी राजनीति करने का बड़ा आरोप लगाया है। प्रश्न यह है कि माता हीरा बेन के साथ हुई व हो रही तथाकथित राजनीति क्या सिर्फ आप ने ही की है? क्या भाजपा इसके लिए कतई जिम्मेदार नहीं है? निश्चित रूप से जो वीडियो वायरल किया गया है, जिसमें आप के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने जिस तरह की अभद्र टिप्पणियां व अपशब्द नरेन्द्र मोदी व उनकी माता के विरूद्ध की है, वे कदापि दोहराई नहीं जा सकती हैं। वे निंदनीय व अक्षम्य होकर राजनीति से परे उसकी घोर भर्त्सना हर हाल में की ही जानी चाहिए।
परन्तु वास्तव में आप एक ऐसी ‘‘बेशरम’’ पार्टी बन गई है, जहां केजरीवाल से लेकर विभिन्न नेताओं से प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया की टिप्पणियों के संबंध में मीडिया द्वारा प्रश्न पूछने पर उसका कोई जवाब न देकर न तो उसकी निंदा की गई और न ही बयान की आलोचना की गई। हजारों जवाबों से अच्छी है ‘‘आप’’ की खामोशी न जाने कितने सवालों की आबरू रखती है। विपरीत इसके पटेलों (पाटीदारों) की राजनीति कर उसे पटेल जाति व सम्मान से जोड़ने की राजनीति चमकाने का नया नैरेटिव बनाने का असफल प्रयास अवश्य किया गया। वस्तुतः आप पार्टी का नाम आप ही गलत है। तू-तड़ाक, तू-तू मैं-मैं से बातचीत करने वाली पार्टी ‘‘आप’’ कैसे हो सकती है? जिस पार्टी के ‘‘ताज में ऐसे नगीने जड़े’’ हुए हैं, उसे तो ‘‘तू तड़ाके पार्टी ही कहना ही सही वास्तविकता है। झूठ का पुलिंदा (ताजा उदाहरण मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर एक महीने बाद सलाखों से बाहर लेने की बात बाहर लाने की बात केजरीवाल ने गुजरात (मेहसाणा की रैली) में कही है) लिये हुए ऊल-जलूल बयान (मनीष सिसोदिया की भगत सिंह से तुलना करना) वीरों की पार्टी आम आदमी का न होकर व्यक्ति विशेष की रह गई है। बौद्ध धर्म दीक्षा समारोह में डॉ. अंबेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का बहिष्कार करने की बात कही गई है, को दोहराए जाने को लेकर उक्त विवाद की आंच गुजरात चुनाव पर पड़ने की आशंका के चलते स्वः स्फूर्ति से दिल्ली सरकार के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम को इस्तीफा देना पड़ा था। परन्तु यहां तो उलट गोपाल इटालिया का पार्टी बचाव कर रही है। केजरीवाल के इस दुःसाहस का दुष्परिणाम निश्चित रूप से आयेगा क्या?
परन्तु बावजूद इसके भाजपा व स्मृति ईरानी को इस बात का तो जवाब देना ही होगा कि वर्ष 2019 में दिये गोपाल इटालिया के उक्त बयान जिन्हें स्वयं भाजपा ने जारी किया है, तभी वर्ष 2019 में ही उनका संज्ञान लेकर तत्समय तुरंत क्यों नहीं कहा गया कि यह ‘‘राष्ट्रमाता’’ का अपमान है? तब भी नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री ही थे, भले ही गोपाल इटालिया प्रदेश अध्यक्ष नहीं थे। स्मृति ईरानी को इस बात को समझने में ही 3 साल लग गये? जो कथन निसंदेह असहनीय, घोर निंदनीय व अपमानजनक है। अतः ऐसी स्थिति में एक संकेत/निष्कर्ष यह भी निकलता है कि यह क्यों न माना जाए कि स्मृति ईरानी को प्रेसवार्ता कर जनता को उक्त बात बतानी पड़ी, भला ‘‘खलक का हलक कौन बंद कर सकता है’’? क्या यह राजनीति नहीं कहलायेगी? उक्त पुराने वीडियो को वायरल कर प्रेसवार्ता कर ‘हीरा बेन’ को राजनीतिक मुद्दा कौन बना रहा है? जिस बात की जानकारी अभी तक देश के नागरिकों को लगभग नहीं के बराबर (नगण्य) थी। उस वीडियो को वायरल कर उक्त अवांछनीय कथनों से संपूर्ण देश को अवगत किसने कराया? और उसके पीछे क्या उद्देश्य हो सकता है? जरा सा दिमाग पर जोर लगाएंगे तो सब कुछ समझ में आ जाएगा।
स्मृति ईरानी का प्रेस वार्ता में साफ शब्दों में यह कथन की आप पार्टी ने प्रधान सेवक की मां का अपमान ही नहीं किया, बल्कि ‘‘गुजरात में’’ एक 100 वर्षीय मां का अपमान किया है। उक्त कथन ‘‘खंूटे के बल पर बछड़ा कूदने के समान’’ है जो राजनीतिक दृष्टिकोण को पूरी तरह से स्पष्ट कर देता है। क्योंकि स्मृति ईरानी ने गुजरात के अपमान का जिक्र किया, देश के अपमान का नहीं। जबकि प्रधानमंत्री की मां होने के कारण राष्ट्रमाता होने से यह देश के अपमान की बात है। चूंकि चुनाव गुजरात के हो रहे हैं, देश के नहीं, इस एक तथ्य में ही संपूर्ण जवाब छुपा हुआ है।
स्मृति ईरानी का आगे यह कथन की यह सब राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, स्वयमेव ही साफ संदेश देता है। राजनीतिक लाभ किसे व कैसे होगा? उस पार्टी को जिसने राष्ट्रमाता के प्रति अनर्गल आधारहीन अक्षम्य शब्दों का प्रयोग किया हो, जिससे देश में नाराजगी है? अथवा उस पार्टी को जो इस पुराने कथन को वर्तमान में होने वाले चुनाव के संदर्भ में उठा रही है? जैसे ‘‘एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’ वैसे अरविंद केजरीवाल का यह ट्वीट भी चातुर्य राजनीति से परिपूर्ण है, जिसमें वे गोपाल इटालिया की गिरफ्तारी पर गुजरात के पटेल (पाटीदार) समाज में आक्रोश की बात कहते हैं, जिस पाटीदार आंदोलन में गोपाल इटालिया हार्दिक पटेल के साथ नेता रहे हैं। परंतु वे वह भूल जाते हैं कि विपरीत इसके इटालिया के कथन से पूरे देश में आक्रोश है।
..गुजरात में चुनाव आ गये है, जहां आप पार्टी पहली बार चुनावी मैदान में उतर कर उछल-कूद रही है। निश्चित रूप से इस बात का श्रेय अरविंद केजरीवाल को अवश्य जाता है कि देश की राजनीति की दशा व दिशा और नेरेटिव वे ही तय करते है, यह लगभग मीडिया द्वारा दी गई प्रत्येक घटना के कवरेज से सिद्ध होता है। क्या केजरीवाल के बनाए नेरेटिव को प्रभावहीन करने के लिए भाजपा ने राजनीतिक रूप से ‘‘ईट का जवाब पत्थर से’’ देने के लिए उक्त कदम उठाया? क्योंकि आश्चर्य की बात तो यह है कि देश व विश्व की सबसे बडी पाटी व सदस्य संख्या होने के बावजूद किसी भी कार्यकर्ता ने अभी तक देश में कही भी आप पार्टी या उसके प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ न तो थाने में रिपोर्ट लिखाई और न ही न्यायालय में निजी इस्तगासा पेश किया। मतलब कुल मिलाकर यह कि ‘‘करनी ना करतूत लड़ने को मजबूत’’।..
 स्मृति ईरानी का यह कथन तो बहुत ही हास्यास्पद व बिना किसी सबूत के है कि केजरीवाल के आदेश पर आप नेता ने तुक्ष राजनीति के चलते गुजरात और वहां के लोगों की भावनाएं आहत की हैं। ‘‘हुनर मदारी का और खेल जमूरे का’’। जबकि ‘‘आप’’ का यह दावा है कि यह पुराना वीडियो उस वक्त का है, जब गोपाल इटालिया आप पार्टी में थे ही नहीं। विपरीत इसके यदि काउंटर (पटल, प्रतिलेख) में स्मृति ईरानी पर क्या ऐसा ही आरोप नहीं लगाया जा सकता है कि उन्होंने पत्रकार वार्ता कर जो आरोप अरविंद केजरीवाल पर लगाए हैं, वह नरेन्द्र मोदी के इशारे पर है?
यद्यपि मैं यह समझता हूं कि प्रधानमंत्री बहुत ही बड़े दिलवाले व्यक्ति है और इस तरह की ओछी राजनीति में कभी न पड़ने वाले राजनेता है, जिनकी व्यक्तिगत जानकारी के बिना ही स्मृति ईरानी का उक्त कथन प्रेस वार्ता के माध्यम से सामने आया है। स्मृति ईरानी जी को आगे आकर इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि जब स्थापित नेताओं का परस्पर पार्टियों में आवागमन होता है, खासकर पिछले कुछ समय से भाजपा में कांग्रेस के कई दिग्गज विवादित, आरोपित, दोषी नेतागण भाजपा में शामिल हुए, तब उनके विवादित इतिहास को वहीं छोड़ दिया जाकर गले लगाया जाता है। तब ऐसी स्थिति में गोपाल इटालिया के आप पार्टी में आने के पूर्व के बयान की अहमियत क्या? और इसके लिए आप पार्टी कैसे जिम्मेदार ठहराई जा सकती है?
प्रेस वार्ता में स्मृति ईरानी की यह चुनौती तो और भी हैरत कर देने वाली है कि केजरीवाल गुजरात आकर नरेन्द्र मोदी की मां को गाली बके? निश्चित रूप से यह चुनौती चतुराई पूर्वक राजनीति से परिपूर्ण है। अन्यथा स्मृति ईरानी केजरीवाल को यह चुनौती देश के किसी भी स्थान के लिए देनी चाहिए थी। क्योंकि प्रधानमंत्री की मां होने के कारण वे राष्ट्रमाता (राष्ट्र की) है, सिर्फ गुजरात की नहीं। वस्तुतः तो स्मृति ईरानी का राष्ट्रमाता जी को इस तरह से चुनौती के लिए प्रस्तुत करना ही नितांत गलत है।
अभी तो गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है। परंतु चूंकि यह चुनाव प्रधानमंत्री के गृह राज्य का होने के कारण राजनैतिक आकलन करने वाले पंडितों की नजर में वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव की दिशा व दशा तय करने वाला होगा, इसलिए हर पार्टी इस विधान सभा के चुनाव को जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। परंतु यह समझ और कल्पना से बिल्कुल परे है कि राजनीति का स्तर कितना गिरकर स्तरहीन होकर समुद्र की कितनी गहराई की तल तक जाएगा? इसे रोकने की फिलहाल तनिक आशा भी दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही है। देश की गौरवशाली रही राजनीति का यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।

शनिवार, 8 अक्तूबर 2022

"आत्मनिर्भर भारत अभियान में’’ "रेवडियों" का स्थान कहां है ?

पिछले कुछ समय से हमारे भारत देश में रेवडियाँ , मुफ्त सौगातें बांटने पर "माले मुफ़्त दिले बेरहम" की आदी होती जा रही जनता से लेकर राजनैतिक पार्टियों, नेताओं और उच्चतम न्यायालय तक में बहस चल रही है। प्रत्येक पक्ष अपनी ’रेवड़ी’ को मूलभूत सुविधाएं के नाम से जरूरतमंद को जरूरी मुफ्त सहायता और दूसरों द्वारा दी जा रही उन्हीं आवश्यक सुविधाओं को मुफ्त ’रेवड़ी’ बताकर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है। पंजाब में आप पार्टी की अभूतपूर्व विजय जिसमें इस बात से अंजान कि 'भेड़ जहां जायेगी वहीं मुंडेगी"  में इन रेवडियो का बड़ा योगदान माना जाता है, के कारण  गुजरात में होने वाले आगामी विधान सभा चुनाव को देखते हुए प्रधानमंत्री तक को इसमें हस्तक्षेप कर रेवड़ी और मुफ्त आवश्यक सुविधा में अंतर को स्पष्ट करना पड़ा। इसी कड़ी में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस संबंध में समस्त राजनीतिक पार्टियों को पत्र लिखकर निर्देश जारी किए हैं जिसका विपक्ष ने विरोध शुरू कर दिया है। चुनाव आयोग के इस ताजा पत्र ने उक्त विवाद को ताजा कर दिया है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की देश का ‘मान’, ‘स्वाभिमान’ व ‘विकास’ को उच्चतम स्तर पर ले जाने के लिए घोषित कई योजनाओं में से एक ’ आत्मनिर्भर भारत’ प्रमुख योजना है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत ’ पांच स्तम्भ’ हैं -अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढ़ाँचा, प्रौद्योगिकी, जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी), माँग। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अभियान को प्रारंभ करने के बाद इसे रक्षा निर्माण व डिजिटल इंडिया तथा गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने से जोड़ा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत ही ’वोकल फार लोकल’ व ’मेक इन इंडिया’ का नारा दिया गया। प्रधानमंत्री की ’स्वनिधी योजना’ भी इस अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसानों की ’दोगुनी आय’ करने के लिए की गई ग्यारह घोषणाएं व गरीब श्रमिकों के लिए लागू की जा रही विभिन्न योजना जैसे किफायती किरायों के आवास परिसर बनाने की पहल,  श्रम संहिता में बदलाव, एक देश एक राशन कार्ड, विशेष क्रेडिट सुविधा आदि लागू की गई हैं।

'‘आत्मनिर्भर भारत’’ का शाब्दिक अर्थ देश की 130 करोड़ जनता के प्रत्येक वयस्क नागरिक का आत्मनिर्भर होना है, ताकि देश भी आत्मनिर्भर हो सके। आत्मनिर्भर का वास्तविक मलतब यही है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन यापन के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाए के लिए उसके पास आय के उपार्जन के इतने साधन हों कि मुफ्त सहायता/रेवडी लिए बिना अपनी न्यूनतम ’जरूरत की पूर्ति’ करते हुए वह समाज में सम्मान पूर्वक जी सके। इसके लिए किसी भी तरह की सरकारी, अर्द्धशासकीय, निजी या एनजीओं की सहायता की आवयकता न पड़े, एक वास्तविक आत्मनिर्भर भारत व नागरिक की यह एक आदर्श स्थिती है। परन्तु बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसे आत्मनिर्भर भारत बनाने के प्रयास के लिए क्या वैसी योजनाएं बन रही है या कार्य चल रहे हैं? इसके लिए सर्वप्रथम पहले तो सरकार को यह तय करना होगा कि जितनी भी सुविधाएं शासकीय योजनाएं या अर्द्धशासकीय स्तर पर जनता को जीने के लिए संवैधानिक अधिकार के रूप में उपलब्ध व प्राप्त है, को शैनः शैनः खत्म करने की एक बड़ी योजना बनानी होगी। आत्मनिर्भर भारत तभी आत्मनिर्भर कहलाएगा। परन्तु ऐसा लगता है कि ऐसी कोई भी दूरगामी योजना न तो शासन के पास है और न ही इस तरह का कोई ऐसा खाका जनता के सामने पेश किया गया है। इसलिए फिलहाल यह तो मानना ही होगा कि "तेल देख तेल की धार देखते हुए" आत्मनिर्भरता’ का नारा देकर एक ’दिवास्वप्न’ दिखाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है? ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार देश के प्रत्येक नागरिक को विदेशों से काला धन वापिस लाकर प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख जमा होने का वादा किया गया था, जिसे बाद में जुमलेबाजी तक करार कर दिया गया था। 

इस आत्मनिर्भर अभियान के संबंध में दो बिंदुओं पर अवश्य आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। सर्वप्रथम भारत विश्व के मात्र उन तीन देशों में शामिल है, जहां ’मुर्दों’ को भी बेचने पर कोई कानूनी शिकंजा या प्रतिबंध नहीं है, बल्कि शवों व अंगों की कालाबाजारी का एक बाजार है। दूसरा भारत उन 6 देशों में एक है जहां भुखमरी से मरने पर कोई कानूनन् अपराध गठित नहीं होता है। अर्थात इसे अपराध मानने का कोई कानून नहीं है। मतलब साफ है। इस देश में गरीबी इस हद तक निचले स्तर तक उतर गई है, जहां जरूरतमंद व्यक्ति मुर्दा के लिए लिए कफन न होने पर व अन्य आवश्यकताओं के लिए मुर्दे को बेचने की अनुमति है। भुखमरी का हाल बेहाल यह है कि भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 2014 में 99 वें स्थान से आज 119 देशों की सूची में 103 वे स्थान पर है। जहां हमारी स्थिति नेपाल व बंग्लादेश देशों से भी खराब है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू होने के बावजूद भुखमरी से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो उस जिले का कलेक्टर, विधायक, सांसद और अंततः प्रांतीय-केन्द्रीय शासन की जिम्मेदारी यदि संवैधानिक रूप से तय न की जाए तो, आत्मनिर्भर भारत का नारा कितना खोखला होगा? इसकी कल्पना की जा सकती है। उक्त जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को मृत्यु के पूर्व भुखमरी की  परिस्थितियों की जानकारी होने की स्थिति में धारा 304-ए के अंतर्गत दोषी अपराधी होने के लिए भारतीय दंड संहिता में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। इस देश की जनता आखिर कब जागरूक होगी? उसके सामने "आंखों में धूल झोंकने वाले" लोक लुभावने आकर्षक वादे पेश करने वाले राजनीतिक दलों, जन नेताओं की पहचान कर जनता विपरीत दिशा में उसका उतना ही कड़क जवाब चुनाव में उनकी जमानते जप्त करा कर क्यों नहीं देती? ताकि भविष्य में इस तरह की लोक-लुभावनी लगने वाली न लागू होने वाली आकर्षक योजनाएं के द्वारा जनता को बरगलाया न जा सके। आखिर 75 साल बाद उच्चतम न्यायालय और केंद्रीय चुनाव आयोग इस संबंध में अपने कर्तव्य के प्रति क्यों देरी से जागे? क्या जागने में हुई उक्त देरी के लिए उन्हे अपराध बोध के भाव से ’उन्मुक्त’ किया जा सकता है? अंततः न्यायपालिका और चुनाव आयोग ’मुफ्त सौगातों’ पर प्रभावशाली तरीके से रोक लगाकर देश के मेहनतकश नागरिकों के सम्मान को बढ़ाकर "उद्यमेन हि सिद्धयंति कार्याणि न मनौरथै:" की भावना से समस्त नागरिकों को मेहनत करने के लिए प्रेरित कर सकते है, इह बात की पुष्टि तो समय ही बतलायेगा।   

’मुफ्त सुविधाओं’ को लेकर आपको तीन प्रमुख दृष्टिकोण से देख कर आकलन करना होगा। ’प्रथम’ संवैधानिक अनिवार्यता क्या हैं? जैसे मुफ्त शिक्षा, मुफ्त चिकित्सा, हर हाथ को काम आदि-आदि। ’दूसरा’ जो यद्यपि संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है, तथापि देश के अमीर गरीब के बीच बढ़ती दूरी को देखते हुए निर्धन व अति निर्धनों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हे आवश्यक सुविधाएं मुफ्त देना, इस दृष्टिकोण से भी विचार करना होगा। ’तृतीय’ सिर्फ चुनावी लाभ की दृष्टि से जनता को "हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और" की लीक पर चलते हुए क्षणिक, अस्थाई लालच दिखाकर, गुमराह कर सत्ता में आने के लिए जनता से वोट लेना। इन समस्त परिस्थितियों के बीच इस तरह से संतुलन व सामंजस्य बनाया जावे कि धीरे-धीरे देश के प्रत्येक नागरिक को आत्मनिर्भर रूप से खड़ा किया जा सके। वर्तमान समस्या का हल यही है कि यदि राजनीतिक दृष्टिकोण, तुष्टीकरण की नीति को छोड़ कर शुद्ध जनहित की दृष्टि से व्यक्ति व अंततः देश के विकास को ध्यान में रखकर इस पर चिंतन किया जाये तो?

आत्मनिर्भर भारत की योजना के सिद्धांन्त को वृद्धाश्रम के सिद्धांन्त से सरल रूप से समझा जा सकता है। जिस प्रकार वृद्धाश्रम की प्रारंभिक अवस्था में समाज के लोग आगे आकर आश्रित व्यक्तियों को वृद्धाश्रम में शरण देकर उनके जीवन यापन की पूर्ति में सहयोग करते हैं। लेकिन इसे पूर्ण सफल तभी कहा जा सकता है, जब इसकी आवश्यकता को ही समाप्त कर दिया जाए, ताकि "न रहे बांस न बजे बांसुरी" की उक्ति चरितार्थ हो सके। मतलब वृद्धाश्रम में जाने के मूल कारण को समाप्त करने के लिए परिवार के सदस्यों को उनकी जिम्मेदारियों का आभास कराया जाकर, जनता को जागृत करने पर अंततः जिम्मेदारी निभाने पर इसकी आवश्यकता ही नहीं होगी। संयुक्त हिंदू परिवार की सरचना का आधार ही यही था। परंतु अब संयुक्त हिंदू परिवार  के टूटने से वृद्धाआश्रमों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ठीक इसी प्रकार आरंभिक अवस्था में एक नागरिक की न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति के लिए आवश्यक सहायता देते हुए उसे शैनः शैनः उक्त मुफ्त सौगातों को पूर्णता बंद कर दिया जाए, तभी सही अर्थों में आत्मनिर्भर भारत बन पाएगा।

केंद्रीय चुनाव आयोग ने चुनावी वादों को लेकर पूरी जानकारी नहीं देने पर और उससे देश पर पड़ने वाले असर को नजर अंदाज न करने का तर्क देकर, चिट्टी लिख कर राजनीतिक दलों को यह अहम निर्देश दिया है कि राजनीतिक दल वोटरों को अपने वादों के आर्थिक रूप से व्यावहारिक होने की प्रमाणिक जानकारी देंगे, ताकि मतदाता उसका आंकलन कर सकेगें कि ये वादे "थोथा चना बाजे घना" तो नहीं हैं। खोकले चुनावी वादों के दूरगामी प्रभाव होते है। उच्चतम न्यायालय में उन्हीं मुफ्त वादों व मुफ्त की सौंगातों या चुनावी रेवड़ीयों के कारण सरकारी कोष पर पड़ने वाले बोझ का मामला विचाराधीन है। उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार हेतु तीन जजों की बेंच को मामला सौंपा है। यद्यपि केंद्रीय चुनाव आयोग ने अप्रैल में हुई सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय को बतलाया था कि चुनाव से पहले या बाद में मुफ्त रेवडी देना राजनीतिक दलों का ’नीतिगत’ फैसला है। वह राज्य की नीतियों और पार्टियों की ओर से लिए गए फैसलों को नियंत्रित नहीं कर सकता है। परन्तु अब अपनी नजरअंदाज  करने की भूल को सुधारते हुए उक्त पत्र लिखकर चुनाव आयोग ने  इस संबंध में शायद अपना दृष्टिकोण बदला है।

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

‘नाम परिवर्तन’’ के साथ कुछ शब्दों पर भी ‘‘प्रतिबंध’’ समय की मांग है।


शहरों, भवनों, स्मारकों, रेलवे स्टेशनों आदि नामों के बदलने का एक सिलसिला देश में काफी समय से चल रहा है। उसी कड़ी में हाल में ही राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने की घोषणा प्रधानमंत्री जी ने की है। इसके लिए निश्चित रूप से वे बधाई एवं धन्यवाद के पात्र है। शायद यह परिवर्तन के युग की समय की आवश्यकता भी है। इस बदलाव को विशिष्ट पहचान (संस्कृति, भाषा, स्थान योगदान, बलिदान इत्यादि) को स्पष्ट रूप से चिन्हित, प्रदर्शित और महसूस करने का प्रयास कहा जा सकता है। इस ‘चलती हवा’ के साथ हम क्यों नहीं कुछ शब्दों जो हमारी संस्कृति पर चोट पहुंचाते हैं, प्रतिबंध लगाने का कार्य नहीं कर सकते हैं?

‘‘हरामजादा’’ ‘‘हराम’’ ऐसे शब्द हैं, जिन पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। क्योंकि इन शब्दों में हमारी सर्वोच्च आस्था का नाम जुड़ा हुआ है।। इसका  पूरा अर्थ बहुत ही बुरा नकारात्मक ध्वनित, प्रदर्शित होता है। ऐसा नहीं है कि शब्दों पर प्रतिबंध लगाने का यह कार्य पहली बार होगा। पूर्व में भी हम जरूरत के अनुरूप शब्दों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। याद कीजिए अनुसूचित जनजाति शब्द जिस शब्द (...) के लिए इसका प्रयोग किया गया है, उसे प्रतिबंधित किया जा चुका है। निर्भया, दिव्यांग शब्द की उत्पत्ति भी इसी कारण से हुई है। उक्त शब्दों को स्पीकर ने भी असंसदीय घोषित किया है। जब माननीयों के लिए उक्त शब्दों के उपयोग पर विधानसभा में प्रतिबंध है, तब उक्त प्रतिबंध को विधानसभा के बाहर बढ़ाकर आम प्रचलन में और आम जनता के लिए भी  क्यों नहीं लागू  कर दिया जाना चाहिए?

मेरे राम के देश में जहां हम रामराज्य से गुजर चुके हैं, आज वहां भव्य राम मंदिर निर्माण हो रहा है, उसी देश के राम भक्तों से यही अपील करता हूं कि वे उक्त अपशब्दों पर प्रतिबंध लगाने के लिए मुहिम चलाएं। परिस्थितियां इसके बिल्कुल अनुकूल है। आवश्यकता सिर्फ आपके जागृत होने मात्र की है।

यहां उल्लेखनीय है कि सांसद साध्वी निरंजन ज्योति के द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उक्त हरामजादों शब्द के उपयोग करने पर न केवल प्रधानमंत्री मोदी ने उनको फटकार लगाई, बल्कि उनको माफी भी मांगनी पडी।

रविवार, 11 सितंबर 2022

सिर्फ नामकरण नहीं! ‘‘भाव’’ को धरातल पर कार्य रूप में वस्तुतः उतारने से ही विकसित भारत।

आखिर नाम में क्या रखा? शेक्सपियर!

-:द्वितीय भाग:-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नाम परिवर्तन के साथ ठोस कार्यों से एक मजबूत, बोल्ड, निर्णायक सिद्ध होते जा रहे हैं, वहीं पूर्व यूपीए शासन ने सिर्फ योजनाओं के नामों में परिवर्तन के साथ कुछ गुलामी प्रतीकों के नामों में परिवर्तन किया है। तुलनात्मक रूप से काम करने में यूपीए का शासन बहुत पिछड़ा रहा है। मजबूत ऐसी स्थिति में कम से कम नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि नाम बदलने को लेकर जो तर्क देकर अर्थ और परिणाम की जो कल्पना की जा रही हैं, क्या वह भी उतनी ही मजबूत (स्ट्रांग) व वास्तविक होगी? क्योंकि इसी अवास्तविक धारणा को लेकर ही कर्तव्य पथ के मुद्दे पर विवाद का जन्म हुआ है। मैं यह मानता हूं कि वर्तमान व निकट भविष्य में नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प दूर-दूर तक दिखता नहीं है। ‘‘विकल्प हीनता’’ के मामले में देश इंदिरा गांधी के बाद से भी बुरी स्थिति से गुजर रहा है। ऐसी स्थिति में जनता का भी दायित्व हो जाता है कि वह नरेंद्र मोदी का नेतृत्व निष्कलंक और मजबूत तथा कम से कम त्रुटि वाला रहे इस ओर सहयोग करे। कोई भी अच्छे से अच्छा व्यक्ति पूर्ण नहीं होता है, उसमें कुछ न कुछ कमियां-गलतियां अवश्य होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ऐसी कोई गलती न हो, इसी जो उनको कमजोर करे, दृष्टिकोण को लेकर मेरी यह टिप्पणी है।
प्रधानमंत्री ने जिस विस्तार से ‘‘राजपथ को गुलामी का प्रतीक’’ बता कर नए भारत की कल्पना की, क्या यह मजाक नहीं होगा कि जब हम आजादी के 75 वर्ष पर अमृत महोत्सव मना कर खुशीयाली व्यक्त कर रहे हैं, वहीं आज यह कहां जा रहा है कि गुलामी के प्रतीक राजपथ से हम मुक्त हुए। इसी गुलामी के प्रतीक कर्तव्य पथ पर हमने स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की परेड धूमधाम से मनाई? गुलामी का प्रतीक राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ बदल देने से ही राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक का क्षेत्र में चलने रहने वाले लोग क्या कर्तव्य युक्त हो जाएंगे? इसलिए नाम परिवर्तन को इतना ज्यादा महिमामंडित करना गलत है। वैसे विपक्ष खासकर (शर्मदार?) कांग्रेस को इस मुद्दे पर मोदी की आलोचना करने का कोई नैतिक या तथ्यात्मक आधार नहीं है। वैसे कही-अनकही अर्थात राजनीति की आजकल यह प्रवृत्ति हो गई है कि जो कहा उसे शाब्दिक रूप से छोड़कर अनकहा भाव, अर्थ सहूलियत अनुसार निकाला जाए।
स्वतंत्र भारत का नागरिक खासकर स्वतंत्रता के बाद पैदा हुआ नागरिक जो अभी तक यह सोच रहा था कि वह ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी से मुक्त हुआ स्वतंत्र देश का एक नागरिक है। परंतु उसे गाहे-बगाहे कभी भी यह याद दिला दिया जाता है कि जिस देश में वह रह रहा है, वहां अभी भी गुलामी के कई प्रतीक मौजूद हैं, ‘‘हींग लगे न फिटकरी’’ के समान आसान है? ये होंगे भी या नहीं, मालूम नहीं? गुलामी का यह एहसास बार-बार करने की बजाय एक ही बार में समस्त गुलामी के प्रतीकों को हटाने का निर्णय क्यों नहीं ले लिया जाता है?
वैसे हमारी संस्कृति में ‘‘नाम व नामकरण’’ का बड़ा महत्व है। आज भी हिंदू समाज नवजात शिशुओं का नाम के समय की ग्रह स्थिति को देखकर पंडितों से और ज्योतिषियों से राय लेकर रखता है। प्रधानमंत्री की कर्तव्य पथ नाम रखने के पीछे रही भावना का पालन कर यदि कर्तव्य निभाना है, तब इस देश में बहुत से नागरिकों को भी अपना नाम बदलना होगा। उदाहरणार्थ मध्य प्रदेश के विधायक जालम सिंह, पूर्व निगम अध्यक्ष शैतान सिंह (जिन्हें में व्यक्तिगत रूप से जानता हूं) आदि अनेक नाम ऐसे हैं, जो नाम के विपरीत कार्य करने के कारण जनता का विश्वास जीतकर संवैधानिक पदों पर बने हुए रहे हैं। कई विजय कुमार ‘‘विजय’’ की चैखट पर नहीं पहुंच पाए तो कुछ सुखनंदन दुखों के ‘‘अवसाद में ही गुम’’ हो गए। कई दरिद्र नारायण अरबपति हैं। अमीर चंद गरीब नहीं हो सकता? अच्छा राम में कोई बुराई नहीं हो सकती? तो गोरे व्यक्ति का नाम कालू राम कैसे रखा जा सकता है? सज्जन कुमार दुर्जन (84 के दंगों का आरोपी) कैसे हो सकते हैं? विश्वास कुमार पर अविश्वास कैसे किया जा सकता है? ऐसी अंतहीन सूची है। ‘‘होइ है सोई जो राम रचि राखा’’।
अतः यदि वास्तव में बदलने की कोई की जरूरत हो तो आदरणीय लोगों की वो मानसिकता जो गुलामी से लबरेज है, जो स्वार्थ (सिर्फ स्वहित), जातिवादी व्यवस्था, परनिन्दा, अहंकार को ही सर्वश्रेष्ठ समझती है। सिर्फ नारों, बातों या नाम बदलने से रोटी-कपडा-मकान-श्रेष्ठ शिक्षा-उचित व सुलभ स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल सकती है। ’कर्तव्य पथ पर घूमने से, या नाम पट्टिका पढने-पढाने से नहीं, कर्तव्य के कडे परिश्रमी, सत्यनिष्ठा व्यवहार को आत्मसात कर पूर्णतः ईमानदारी पूर्वक अनुसरण से ही विकसित भारत की कल्पना साकार हो सकती है।
प्रधानमंत्री के गुलामी के प्रतीक को इतिहास बनाने के कुछ घंटों बाद ही ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का निधन हो गया। प्रधानमंत्री मोदी ने दुख व्यक्त कर शोक संदेश भेजकर श्रद्धांजलि अर्पित की। तथापि देश का मीडिया ‘‘आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास’’ प्रधानमंत्री के कर्तव्य भाव के संदेश को इतनी जल्दी भूल कर देश की जनता को हमारी गुलामी की सबसे बड़ी प्रतीक को विस्मृत करने की बजाए याद ताजा कर महिमामंडित कर प्रशस्त करने में अपना विस्तृत योगदान दिया। बजाय इसके कि वे प्रधानमंत्री के समान एक लाइन में समाचार देकर श्रद्धांजलि देकर अपने कर्तव्य बोध का एहसास करा सकते थे? तथापि मीडिया महिमामंडित करने के उक्त कार्य को इस आधार पर सही ठहरा सकता है कि एलिजाबेथ द्वितीय के निधन पर उनके सम्मान में एक दिन का राष्ट्रीय शोक रखने का निर्णय भारत शासन ने लिया है। इसीलिए यह भी कहा गया है कि (शेक्सपियर का कथन) ‘‘नाम में क्या रखा है’’।
मध्यप्रदेश शासन ने आम लोगों की खुशहाली के लिए वर्ष 2016 में देश में पहला हैप्पीनेस विभाग (राज्य आनंद संस्थान) ही बना दिया था। आज इस विभाग का रिपोर्ट कार्ड क्या है? क्या प्रदेश की जनता ‘खुश’ होकर ‘सुखी’ हो गई? बल्कि यह आनंद विभाग ही स्वयं अपने अस्तित्व को ज्यादा आनंद नहीं ले पाया। वर्ष 2018 में इसे धर्मस्व विभाग के साथ मिलाकर ‘‘आध्यात्म विभाग’’ बना दिया गया। वर्ष 2020 में देश में मध्यप्रदेश को हैप्पीनेस इंडेक्स में 25वीं रैंकिंग मिली है। नाम व काम करने के अंतर की यह वास्तविकता है। 

शनिवार, 10 सितंबर 2022

‘‘देश की समस्त समस्याओं का सरल व सुगम हल’’ ’नामकरण!

-ःप्रथम भागः-

देश में ही नहीं वरन विश्व में भारत के अभी तक के सर्वाधिक लोकप्रिय और किसी क्रिया-प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना अनोखी शैली व कार्यपद्धति से कुछ असंभव (जैसे राम मंदिर का निर्माण, तीन तलाक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति) से लगते ठोस कार्य करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर न केवल स्वयं को ‘‘कर्तव्य बोध’’ का एहसास दिलाया, बल्कि सबको भी अपना कर्तव्य निभाने के लिए एक संदेश भी दिया। यह बात उनके भाषण से स्पष्ट रूप से झलकती भी है। इस एक संदेश ने ही मुझे तुरंत प्रेरित-उत्प्रेरित किया और मैं यह लेख लिखकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूं? तय आपको करना है कि मैं अपने कर्तव्य का पालन करने में सफल हूं अथवा असफल?

प्रधानमंत्री ने ‘कर्तव्य पथ’ के नामकरण व ‘सेंट्रल विस्टा एवेन्यू’ के उदघाटन कार्यक्रम में एक नहीं तीन महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। प्रथम! ब्रिटिश इंडिया के जमाने की गुलामी की प्रतीक राजपथ वर्ष 1955 के पूर्व किंग्सवे नाम से जानी जाती थी। इसका निर्माण वर्ष 1911 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली करने के निर्णय के साथ प्रारंभ हुआ था, जो वर्ष 1920 में बनकर पूर्ण हुआ। राजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में इसका नाम किंग्सवे रखा गया था। आरंभिक रूप से यह सिर्फ राजाओं का ही रास्ता था। राजपथ रायसीना हिल स्थित ‘‘राष्ट्रपति भवन’’ को ‘‘इंडिया गेट’’ से जोड़ता है। यहां प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर भव्य प्रेरणात्मक राष्ट्रीय परेड का कार्यक्रम संपन्न होता है। इसमें भारतीय संस्कृति व ताकत का बखान व प्रदर्शन होता है। ‘‘राजपथ’’ को (गुलामी का प्रतीकात्मक नाम मानकर?) बदल कर राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत भारतीय नाम कर्तव्य पथ कर दिया है, जिस पर किसी भी नागरिक को कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। 

दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण कार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आजाद हिंद फौज के संस्थापक व स्वतंत्रता के पूर्व अखंड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, नेताजी के नाम से मशहूर (आज के नेता जी नहीं) सुभाष चंद्र बोस की विशालकाय 28 फुट ऊंची मूर्ति की स्थापना उसी जगह पर की गई, जहां पर पूर्व में इंग्लैंड के ‘‘जॉर्ज पंचम’’ की मूर्ति थी, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के 21 वर्ष बाद हटा कर दूसरी जगह ‘कोरोनेशन पार्क’ में विस्थापित कर दी गई थी। यहां यह याद रखने की बात है कि वहां पहले महात्मा गांधी की प्रतिमा लगाने का बात कही जा रही थी, लेकिन अंतिम निर्णय न हो पाने के कारण लग नहीं पाई। इन दोनों कृत्यों को देश में न केवल गुलामी के चिन्ह मिटाने के रूप में देखा गया बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व को  जो सम्मान इस देश में मिलना चाहिए था, जिसके वे हकदार हैं, उसकी पूर्ति कुछ हद तक अवश्य इस प्रतिमा लगने से हुई है। ये दोनों भाव लिए कृत्य के लिए निश्चित रूप से प्रधानमंत्री जी साधुवाद व बधाई के पात्र हैं। इसके लिए देश उनका हमेशा ऋणी रहेगा।

तीसरा किंतु विवाद का महत्वपूर्ण कारण बना उद्घाटन के इस अवसर पर दिया गया कर्तव्य बोध का संदेश। प्रधानमंत्री ने अपने उद्घाटन भाषण में नाम परिवर्तन के जो कारण बतलाए और जो अर्थ मीडिया व राजनेता निकाल रहे हैं, वही विवाद का एक बड़ा कारण बनते जा रहा है। इसी तीसरे विवादित होते कारण ने मुझे अपने कर्तव्य का अहसास कराया जो आपके सामने लेख के रूप में प्रस्तुत है।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जो प्रमुख बातें कहीं उसका लब्बु लबाब यही है कि कर्तव्य बोध के रूप में नए इतिहास का सृजन होगा। आज नई प्रेरणा व ऊर्जा मिली है। प्रधानमंत्री आगे कहते हैं राजपथ की आर्किटेक्चर और आत्मा भी बदली है। ‘‘गुलामी का प्रतीक राजपथ’’ अब इतिहास की बात हो गया है, हमेशा के लिए मिट गया है। गुलामी की एक और पहचान से मुक्ति के लिए मैं देशवासियों को बधाई देता हूं। परन्तु बड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है, कि वर्ष 1920 में जब इसका नाम किंग्सवे था, और स्वाधीनता प्राप्ति के बाद वर्ष 1955 में नाम बदलकर राजपथ कर दिया गया, तब यह कैसे गुलामी का प्रतीक रह गया है? क्योंकि गुलाम भारत की गुलामी का प्रतीक किंग्सवे का नाम आजाद भारत में पूर्व में ही बदला जा कर राजपथ किया जा चुका था। क्या किंग्सवे का हिंदी अर्थ राज पथ होने से राजा (शासकों) का पथ माना जाकर गुलामी का प्रतीक माना जा रहा था? ऐसा कुछ क्षेत्रों में कहा जा रहा है तो यह बिल्कुल गलत है। क्या हम ‘‘अनर्थ’’ की जगह ‘‘अर्थ’’ नहीं निकाल सकते है? ‘किंग्स’ का अर्थ ‘‘राज’’ नहीं ‘‘राजा’’ होता है। राज का अर्थ शासन लोकतंत्र से है। और यदि ऐसा नहीं है और राज शब्द से इतनी घृणा है, तो राजनीति के राज को लेकर क्या कहेंगे, करेंगे? क्या राज छोड़ देंगे? क्या राज-नीति (इसमें राज महत्वपूर्ण परंतु नीति गौण) की सीढ़ी चढ़कर बने मंत्री, मुख्यमंत्री केन्द्रीय मंत्री और प्रधानमंत्री पद को छोड़ देंगे? क्योंकि गुलामी का प्रतीक राज शब्द जुड़ा हुआ है? सकारात्मक सोच लेकर हम यह क्यों नहीं मान सकते हैं कि राजपथ में ‘‘रामराज’’ के राज का पुट शामिल है? क्या यह बात स्वीकारी नहीं जा सकती हैं कि अंग्रेजों की हर बात गलत नहीं थी, इसलिए हर कार्य/बात को गुलामी का प्रतीक मानना ठीक नहीं होगा? 

यदि सिर्फ नाम बदल कर कर्तव्य पथ कर देने से ही कर्तव्य बोध का भाव उत्पन्न हो जाएगा, ऐसी सोच व मान्यता है तो फिर यह बतलाना होगा कि उसी के पास ‘‘लुटियन जोन’’ में कनॉट प्लेस से रेडियल रोड वन से प्रारंभ होकर पीछे राजपथ से जाने वाला रास्ता का नाम क्वींस (रानी का रास्ता) को बदल कर जनपथ (पीपुल्स पाथ) किया गया था, तो क्या वह वास्तव में जनता (आम) का पथ हो गया? विपरीत इसके जनपथ तो आज अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों का निवास और महंगा वीआईपी मार्केट हो गया है, जो देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए प्रसिद्ध है। नाम बदलने से ही यदि सब कुछ अच्छा हो जाता? समस्त समस्याएं सुलझ जाती? देश गरीबी से खुशहाल हो जाता? तो फिर ‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या’’। ‘‘भ्रष्टाचार’’ का नाम बदलकर शिष्टाचार ईमानदारी कर दीजिए, अपराध का नाम बदलकर पुरस्कार कर दीजिए? आपको करना क्या है, सिर्फ नाम ही तो बदलना है? नाम के अनुसार भावनाएं व्यक्ति स्वयं में आत्मसात कर लेगा और यह देश के विकास, सुरक्षा, अखंडता, एकता बनाए रखने के लिए सबसे सुगम और सरल रास्ता सिद्ध हो जाएगा? तब ऐसी स्थिति में मंत्रिमंडल में पृथक से एक ‘‘नामकरण’’ विभाग का सृजन करना होगा?

विस्टा प्रोजेक्ट में जिसमें राजपथ भी शामिल है, नए संसद भवन, राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति निवास व प्रधानमंत्री निवास का निर्माण भी पुराने भवन को तोड़कर किया जा रहा है। इसके पीछे का भी उद्देश्य अंग्रेजी व गुलामी की प्रतीकात्मक मानसिकता समाप्त करना बतलाया जा रहा है। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले वर्ष 1947 के पूर्व के ब्रिटिश इंडिया के समस्त निर्माण व नाम अंग्रेजों व गुलामी के प्रतीक हैं, तो क्या हम उन सब को तोड़ने और नाम बदलने जा रहे हैं? बिल्कुल नहीं। ‘‘काग़ज की नाव पार नहीं लगती’’। देश में विद्यमान अधिकतर ‘‘राजभवन’’ अंग्रेजियत की निशानी है। आज भी गुलामी का सबसे बड़ा प्रतीक राष्ट्रमंडल ब्रिटिश ओपनिवेशिक संगठन है, जिसे स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1947 में औपचारिक रूप से गठित किया। इसमें ब्रिटिश साम्राज्य के लगभग समस्त पूर्व क्षेत्र भारत सहित शामिल है। इससे उपनिवेशवाद से हमें कब मुक्ति मिलेगी? सबसे महत्वपूर्ण कांग्रेस शासन द्वारा कोरोनेशन पार्क में जॉर्ज पंचम की विस्थापित की गई जो मूर्ति को विसर्जित होगी या नहीं? अंग्रेजों के जमाने की वर्ष 1860 की भारतीय दंड संहिता जो हमारी अपराधिक न्यायशास्त्र की रीढ़ की हड्डी है, अभी भी चली आ रही है। ऐसे अनेक पुराने ब्रिटिश कानून (लगभग 1500 से अधिक) आज भी प्रचलित है। ‘‘हाथी की सिर्फ पूछ ही निकल पायेगी’’ हाथी नहीं। यदि नाम परिवर्तन करना ही है तो इंडिया, भारत की जगह हिंदुस्थान नामकरण कब होगा? जो हमारी अस्मिता व संस्कृति की प्रतीक नहीं मूल पहचान है। 

बुधवार, 7 सितंबर 2022

विरोधाभाषी अजब-गजब व्यक्तित्व! केजरीवाल’’

-:द्वितीय भाग:-  द ग्रेट पॉलीटिकल शो (ड्रामा) ऑफ केजरीवाल’’!   

केजरीवाल के जवाब देने की शैली की दो पहचान है। प्रथम जवाब में वे प्रश्न ही पूछने लग जाते है, तो दूसरा, विषय (प्रश्न) को इस खूबसूरती व चालाकी से वे विषयांतर कर देते हैं कि ’’सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे’’। शायद इसी कारण उन्हें अपना स्टेण्ड पल-पल बदलने में असहजता व असुविधा महसूस नहीं होती है। उनके पुराने बयानों का वीडियो चला कर देख लें। प्रत्येक मुकदमे बाज, राजनेता अपराध में संलिप्त होने के कारण दाग-दार हैं। और इसलिए चुना हुआ दागी, सांसद, विधायक या जनप्रतिनिधियों को अपने पद बने रहने का कोई हक नहीं है जब तक कि वह अपने पद से इस्तीफा देकर मुकदमा लड़ कर, अंतिम रूप से निर्दोष सिद्ध होकर, फिर से चुनाव लड़कर, जनता का विश्वास प्राप्त कर, फिर से संसद या विधानसभा में आये। कड़क ईमानदार केजरीवाल इस सिद्धान्त को ‘आप’ के लगभग 35 से अधिक दाग-दार विधायक पर क्यों नहीं लागू करते है? जवाब नहीं? भला ’सांच को आंच क्या’?

अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में विश्वास मत पर बोलते हुए एक और नया शिगूफा छोड़ दिया। कट्टर बेईमान पार्टी (भाजपा) में कम पढ़े लिखे लोग हैं। आधे से ज्यादा अनपढ़ हैं। तो दूसरी तरफ ईमानदार पार्टी में आईआईटी के लोग हैं, विजन है। इसका अर्थ तो यही निकलता है कि देश की 70 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या जो आज भी अनपढ़ है, केजरीवाल की उक्त परिभाषा अनुसार भ्रष्ट है। केरल भारत का सबसे शिक्षित राज्य जहां 94 प्रतिशत साक्षरता है। इस हिसाब से तो केरल की तुलना में दिल्ली के लोग ज्यादा भ्रष्ट हैं (जहां साक्षरता का प्रतिशत 86.21 है)? केजरीवाल द्वारा तय किए गए नैरेटिव के अनुसार। केजरीवाल की झूठ की पराकाष्ठा का एक और उदाहरण आईने समान आपके सामने है। 6300 करोड़ रुपए से 277 विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप भाजपा पर मढ़ना। न सूत न कपास,! न कोई तथ्य! न कोई गवाह! न कोई दस्तावेज! न 6300 करोड़ रुपयों की आवा-गमन (लेन देन) का साक्ष्य? साक्ष्य में सिर्फ केजरीवाल की दहाड़ती सच्चाई का कथन मात्र? आप इसे सच क्यों नहीं मान लेते हैं? पेट्रोलियम उत्पाद के दाम बढ़ने का कारण भी इस 6300 करोड़ को बता दिया। झूठ का एक और पुलिंदा! ’’ऑपरेशन लोटस’’ के तहत दिल्ली सरकार को गिराने के गंभीर आरोप को हल्के-फुल्के ढंग से जड़ दिया। न कोई ऑडियो-वीडियो क्लिपिंग! न रुपए लेने देने वालों का नाम! न अन्य कोई साक्ष्य न कोई एफआईआर। सिर्फ मनीष सिसोदिया का बयान जो ब्रह्म वाक्य होने के कारण साक्ष्य मान लिया जाए?

दिल्ली के वर्तमान उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना जब वे राष्ट्रीय खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष थे, पर नोटबन्दी के समय 1400 करोड़ रूपये के तथाकथित घपले के आरोपी को जड़ देना झूठ की इंतिहा (पराकाष्ठा) ही हैं। एक शाखा के कैशियर द्वारा 16 लाख (22 लाख नहीं) के नोट अध्यक्ष के कहने पर बदलने की बात कही थी, को राजनीतिक गुणा भाग कर राजनीतिक गुणा भाग कर रुपए 1400 करोड़ के घोटाले में परिवर्तित करना ’’केजरीवाल गणित’’ से ही संभव हैं। शायद यह केजरीवाल की ’’आक्रमण करना ही अच्छे बचाव’’ (अटैक इज द बेस्ट डिफेंस) की नीति का ही परिणाम है। क्योंकि इन्हीं उपराज्यपाल ने शराब नीति को लेकर मनीष सिसोदिया के विरुद्ध सीबीआई जांच की सिफारिश की थी। उल्लेखनीय बात यहां पर  यह भी है कि उक्त नोट बदलने की जांच सीबीआई द्वारा पूर्व में ही की जा चुकी है, जिसकी मांग केजरीवाल अभी कर रहे है व नौटंकी कर रहे हैं (फिर झूठा कथन)। उक्त जांच में सक्सेना को निर्दोष पाया जाकर अन्य अभियुक्तों के विरूद्ध न्यायालय में प्रकरण पेश किया गया। वास्तव में यह आरोप भी इतना हास्यास्पद है कि हिन्दी मीडिया चैनल ’’टाईम नाउ नवभारत’’ के कार्यक्रम ’पाठशाला’ में एंकर ने केजरीवाल का दिल्ली के उपराज्यपाल पर 1400/- करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप को ’तर्क’ के लिये सही मानकर केजरीवाल द्वारा 1400 करोड़ की भ्रष्टाचार की गई गणना के गणित को ही आधार बनाकर गुजरात में आगामी होने वाला विधानसभा के चुनाव में आप की संभावनाएं पर उक्त गणित को लागू करते हुये गणनानुसार ’परिणाम स्वरूप’ आप 90 प्रतिशत से अधिक वोट पाने के अनुमान के कारण गुजरात में आप की सरकार ही बना दी। यह बहुत ही भद्दा और क्रूर मजाक केजरीवाल के जरा ज्यादा ही होशियारी भरे? आरोपों के कारण ही एंकर ने किया। इसी तरह आरोपों के सर्जन (क्रिएटिविटी) के चलते भविष्य में शायद अन्य टीवी प्रोग्राम ‘‘अजब-गजब’’ या ‘‘अद्भुत-अकल्पनीय-अविश्वसनीय’’ (आज तक) में केजरीवाल एपिसोड शामिल हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए?

वैसे उक्त अद्भुत अकल्पनीय अविश्वसनीय में शामिल शब्द अविश्वसनीय से एक बात जेहन में जरूर आयी कि इस अविश्वसनीय शब्द को जिस तरह से केजरीवाल ने ‘‘जिया’’ है, वैसे अन्य कोई उदाहरण आपको शायद ही मिले। कम समय की लगभग 10 साल की राजनैतिक यात्रा में ही केजरीवाल ने दिल्ली में दो बार व पंजाब में लगभग 90 प्रतिशत विधानसभा की सीटें जीतकर निसंदेह एक अकल्पनीय अविश्वसनीय कार्य जरूर किया है। परन्तु विपरीत इसके कसम खाते हुए राजनीति में नहीं आऊंगा, दागी सांसद इस्तीफा दे, ‘‘स्वराज’’ पत्रिका में लिखे अपने आदर्शों से पीछे हटना, सुरक्षा व वीआईपी कल्चर से दूर आदि आदि से उनकी विश्वसनीयता खत्म होकर अविश्वसनीय हो गई है।

गनीमत है, केजरीवाल इतनी ईमानदारी जरूर बरत रहे हैं कि अपनी पार्टी की हो रही दागदार छवि को स्वच्छ करने, धोने के लिए न्यायालय में जाकर साफ करने का प्रयास जरूर कर रहे हैं। अन्यथा उन्हे अपनी स्वप्रमाणित ईमानदारी के साथ यह कहने से कौन रोक सकता था कि न्यायालय भी ’’दाग से धुली नहीं है?’’ और जब मैंने कह दिया हमारा कोई विधायक, मंत्री अपराधी नहीं है, ईमानदार हैं, इतने छापे पड़ गये परन्तु कुछ नहीं मिला, ’लाकर’ में भी नहीं मिला। तब आप ’’अमिताभ बच्चन शो’’ समान मेरे जवाब को लॉक कर मेरे द्वारा दिये गये ईमानदारी के प्रमाण पत्र को मानिये? केजरीवाल जी ’प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती', ’चूहे का जाया बिल ही खोदता है’। तथ्य यह है कि सीबीआई व ईडी का कोई आधिकारिक बयान प्रकरण की प्रगति के संबंध में अभी तक सामने नहीं आया है, जहां उन्होंने आरोपी को क्लीन चिट दे दी हों? केजरीवाल जारी किये जा रहे प्रमाण पत्र के लिए किसी भी तंत्र को बदलने की या ‘वाशिंग मशीन’ की आवश्यकता नहीं है क्या? 

वाह रे केजरीवाल जी! ’शौकीन बुढ़िया चटाई का लंहगा’! गजब का जरूरत से ज्यादा, 56 इंच से भी ज्यादा का गरूढ़ भरा (कुमार) विश्वास को छोड़कर आत्मविश्वास। निश्चित रूप से कमजोर (नर्वस) दिल वालों को केजरीवाल को अपना गुरु मानकर उनका स्कूल ज्वाइन कर अपने कमजोर आत्मविश्वास को मजबूत कर लेना चाहिए? कम से कम मैं जरूर यह कह सकता हूं कि केजरीवाल को सुन-सुन कर मेरा भी आत्मविश्वास इतना ज्यादा बढ़ गया है कि मुझे यह लेख लिखने के लिए हिम्मत के साथ प्रेरित किया। हां मैं उन पर मनन करते हुए, सुनते हुए, पढ़ते समय अपनी ’’आंख कान और दिमाग’’ एक साथ खुला जरूर रखता हूं।

केजरीवाल का व्यक्तित्व एक ऐसी विशेषता लिये हुए है, जो दो एकदम परस्पर विपरीत ध्रुवों पर स्थित विचारों को ’’एक ही समय एक साथ जीने’’ का माद्दा रखते हैं। ’’आधा गिलास खाली है या भरा,’’ यह दोनों विकल्पों का एक साथ एक ही समय उपयोग की क्षमता ’एक म्यान में दो तलवारें रखने की कला’ के समान केजरीवाल के ही पास है, देश के अन्य किसी दूसरे राजनेता के पास नहीं। इसलिए दोहरा मापदंड अपनाने के लिए उन्हें कई उपाधियों से एक साथ सुशोभित किया जा सकता है। जैसे दोहरा चरित्र, ‘‘मुंह में राम-बगल में छुरी’’, कथनी-करनी में अंतर, सिद्धांतों की नहीं सुविधा की राजनीति, सुविधा अनुसार परिभाषाओं का गठन करना, कट्टर देश भक्ति के दावे के साथ बेबाक बेशर्मी से सफेद झूठ बोलना, गिरगिट समान रंग बदलना, साहस नहीं दुस्साहस के साथ गलत बात को सही प्रमाणित करने का अथक प्रयास करना, नौटंकी कार, मुखौटा, बाजीगर, पलटूराम (नीतीश कुमार समान नहीं) आदि आदि! अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘‘कालिया’’ का यह प्रसिद्ध डायलाग वर्तमान में केजरीवाल पर लागू होता हैं ’’हम जहां खडे हो जाते है, लाइन वही से शुरू होती हैं।’’ मैं ही कानून, न्यायाधीश, गवाह, आरोपी, शिकायतकर्ता होकर मेरा कथन ही अंतिम सत्य हैं। 

2014 में एक ओर जहां नवभारत टाइम्स ने लिखा केजरी सरकार एक्शन ड्रामा, इमोशन, संस्पेस का कंप्लीट पैकेज। वहीं प्रतिष्ठित ’’टाईम मैगनीज" ने वर्ष 2014 में केजरीवाल को विश्व के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में शामिल किया। विपक्षियों पर हवाई आरोप लगाकर सीबीआई जांच की मांग करने वाले केजरीवाल की सरकार पर शराब नीति व स्कूल निर्माण तथा बस खरीदी में हुए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से इंकार।  केजरीवाल भले ही सिसोदियां को ‘‘भारत रत्न’’ न दिला पाए, (भई वाह! छछूंदर के सिर पर चमेली का तेल!!) लेकिन केजरीवाल को उक्त ’आभूषणों’ के लिए (डॉ.) पीएचडी की डिग्री जरूर मिलनी चाहिए। अन्यथा अनाधिकृत दूसरो को चारित्रिक प्रमाण पत्र देने वाले, स्वयं को ही प्रमाण देने से बच क्यों रहे हैं? 

कि हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, जहां लोकतंत्र के स्वस्थ व मजबूत होने के लिये पक्ष-विपक्ष का मजबूत होना आवश्यक हैं, ताकि परस्पर एक दुसरे पर अंकुश लगाकर कोई भी पक्ष निरंकुश न हो पायें। परन्तु विद्यमान राजनैतिक स्थिति का सबसे दुखद पहलू यह है कि देश की राजनीति में कांग्रेस की प्रासंगिकता कुछ-एक अपवादों को छोड़कर (अमित शाह के शब्दों में शब्दों में कांग्रेस गायब होती जा रही है) तेजी से समाप्ति की ओर जाने के कारण लोकतंत्र एकतंत्रीय दिशा की ओर बढ़ने से उत्पन्न शून्य के चलते उक्त शून्य को भरने हेतु वैकल्पिक राजनीति का झंडा लिए हुए झंडाबरदार केजरीवाल ने स्वयं पलटूराम बनकर, और राजनीति को ’चलती का नाम गाड़ी’ बना कर वैकल्पिक राजनीति की ’’ भ्रूण-हत्या’’ कर दी। अन्ना के सानिध्य से आशा का केन्द्र बने ’’ईमानदार केजरीवाल’’ ने मात्र 8 वर्ष में ही दोहरे मापदंड अपना कर विश्वसनीयता खोकर देश व जनता को निराशा के अंधकार में धकेल दिया। अविश्वास या विश्वास पैदा न करने से ज्यादा खतरनाक विश्वासघात होता है, जिसके लिए केजरीवाल इतिहास में  पूर्णतः दोषी ठहराये जायेंगे।न्द्र बने ’’ईमानदार केजरीवाल’’ ने मात्र 8-9 वर्षों में ही देश व जनता को निराशा के अंधकार में धकेल दिया। अविश्वास होना या विश्वास पैदा न करने से ज्यादा खतरनाक विश्वासघात होता है, जिसके लिए केजरीवाल इतिहास में  पूर्णतः दोषी ठहराये जायेंगे।

मंगलवार, 6 सितंबर 2022

‘‘द ग्रेट पॉलीटिकल शो (ड्रामा) ऑफ केजरीवाल’’!

‘‘विरोधाभाषी अजब-गजब व्यक्तित्व! केजरीवाल’’                                                                                    -:प्रथम भाग:- नाटक का शो शुरू करने के लिए पर्दा उठाने के पूर्व, देश की राजनीति और राजनीतिक स्थिति-परिस्थितियों पर मंथन करना आवश्यक है, ताकि आप वस्तुस्थिति से अच्छे से भिज्ञ हो सकंे। विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हमारा भारत है, कहते-कहते हम थकते नहीं हैं और पड़ोसी देश चीन, पाकिस्तान को देखकर तो ’आत्मविमुग्ध’ व ’आत्मविभोर’ हो जाते हैं। लोकतंत्र का आधार, रीढ़ की हड्डी तथा उसे जीवंत, जीवट और जनोन्मुखी बनाये रखने के लिए दलीय, निर्दलीय व संघीय व्यवस्था हमारी संविधान की बिना प्रश्नचिन्ह लगे, खूबसूरत संवैधानिक व्यवस्था है। तथापि दल बदल विरोधी कानून लागू होने के बावजूद भी ‘‘थोक’’ में विधायकों की दल बदलने की घटनाओं में हाल में हुई बेतहाशा वृद्धि होने से हमारे संविधान की इस खूबसूरत व्यवस्था पर ‘‘चिंताजनक’’ प्रश्न चिन्ह अवश्य लगा है। यह ’’चिराग तले अंधेरा’’ की स्थिति दीखती है। स्वतंत्रता के पहले और उसके बाद भी कुछ समय तक राजनीति में भाग लेना गौरवशाली, सिर ऊंचा करने वाला और पूर्णतः राष्ट्र हित का कार्य माना जाता रहा है। अन्य कारकों के साथ मुख्य रूप से इसी कारण से ही न केवल देश को स्वतंत्रता मिली, बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए देश के सक्षम, योग्य, कर्मठ वर्ग बेहिचक राजनीति में सक्रिय भाग लेकर अपना-अपना योगदान देते रहे। 

परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 साल व्यतीत हो जाने के बाद जब देश अमृत महोत्सव मना रहा है, तब आज ’’राजनीति’’ की स्थिति क्या हो गई है? जहां ऐन-केन प्रकरण सिर्फ ‘‘राज’’ को भोग कर ‘‘नीति’’ को छिटक दिया जाता है। शायद ’’तेल देखो तेल की धार देखने वाली राजनीति’’ की ऐसी स्थिति की कल्पना सार्वजनिक व सामाजिक जीवन में नहीं की गई थी। जब कोई भी व्यक्ति गलत कार्य अथवा गलत कदम उठाया है, तो उसे टोकतें-रोकते हुए कहा जाता है ‘‘कम से कम यहां तो राजनीति’’ मत कीजिए। अर्थात राजनीति ‘‘राजनीतिक खेल का एक गंदा मैदान’’ रह गई है, जहां गंदगी व बू के कारण स्वच्छ ईमानदार व्यक्ति जाना ही नहीं चाहता है। यदि किसी कारणवश कोई चला जाता हैं, तो वह भी भ्रष्ट राजनीति का शिकार होकर ’’ढाक के तीन पात’’ के अंदाज में स्वयं के अस्तित्व को समाप्त कर उसका अभिन्न अंग बन जाता है। जैसे नौकरशाही, सामाजिक कार्यकर्ता, आंदोलनकारी, स्वच्छ, ईमानदार अरविंद केजरीवाल के राजनीति में आने का उदाहरण आप सबके सामने है। 

इस गंदी भ्रष्ट प्रभावशाली राजनीति का असर केजरीवाल पर इतना ज्यादा चढ़ गया कि ईमानदार व साहस पूर्वक बोलने वाले केजरीवाल को इस भ्रष्ट राजनीति की कुर्सी की सत्ता ने अपने ‘तंत्र’ के कुचक्र में ही मिलाकर विसर्जित कर उनकी अलग विशिष्ट पहचान को अस्तित्वहीन ही कर दिया। तदनुसार केजरीवाल भी ’’सावन के अंधे के समान’’ भ्रष्ट तंत्र का भाग बन कर वही सुविधाजनक राजनीतिक जीवन जीने भोगने लगे है, जिनके खिलाफ उंगली उठाते हुए आंदोलन किया, इतने लम्बे समय तक कि शायद उनकी दर्द से उंगली व लगातार बोलने के कारण मुंह कराह रह रहा होगा? मतलब राजनीति का परसेप्शन पूरी तरह से निर्माणात्मक की बजाय ऋणात्मक हो गया है। अर्थात सेवा करने की बजाय मेवा लेना वाला हो गया है। 

इस गंदी राजनीति का एक पुराना सिद्धांत है जिस सीढ़ी से चढ़ो उसी को हटा दो। विद्वान, तेजतर्रार नौकरशाह लेकिन राजनीति  के नौसिखिया केजरीवाल ने इस सिद्धांत को शिखर पर बने रहने के लिए बहुत तेजी से अपनाया। जिस लोकपाल व लोकायुक्त कानून बनाने के आधार पर व अन्ना के कारण  वे प्रसिद्धि के जिस शिखर पर पहुंचे और राजनीति में सफलता मिली उसको ही वे भूल गए।

काफी समय पश्चात, कुछ दिन पूर्व ही जब ‘‘निस्वार्थी’’ अन्ना हजारे का केजरीवाल को उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार लिखा शराब नीति के संबंध में पत्र सार्वजनिक हुआ, तब ’आप’ पार्टी सहित अन्य दलों की आई प्रतिक्रिया स्वार्थ से परिपूर्ण थी। शायद अन्ना ने ’’जिस थाली में खाय उसी में छेद करने’’ वाला मुहावरा नहीं सुना, जो अपनी चिट्ठी में केजरीवाल द्वारा रचित ‘‘स्वराज’’ किताब में लिखी उन आदर्शों की याद केजरीवाल को नहीं दिखाते? इसका कोई जवाब केजरीवाल के पास न कल था, न आज है और न कल होगा। इसलिए चुप रहना ही बेहतर हल है। कहते हैं न कि ’’सौ को हराए एक चुप’’। राजनैतिक विवाद-लडाई आरोप-प्रत्यारोप में जीत व सफलता के दो ही तरीके होते हैं। प्रथम चुप रहना ताकि समय के गुजरने के साथ कमजोर याददाश्त के कारण जनता भूल जाती हैं। दूसरा ’’आक्रमक होना सबसे अच्छा बचाव’’ (अटैच इज  द बेस्ट डिफेंस) हैं।      केजरीवाल इन दोनो हथियारों का उपयोग समयानुसार सफलतापूर्वक करते चले आ रहे हैं। जनता के विश्वास का हमेशा दावा करने वाले 62 में से 56 सदस्य का अटूट बहुमत होने के बावजूद जिस प्रकार दिल्ली विधानसभा मेें अनावश्यक रूप से प्रस्तुत विश्वास मत के जवाब में अरविंद केजरीवाल संबोधन कर रहे थे, उससे निश्चित रूप से यह बात बेशक सिद्ध हो जाती है कि कथनी व करनी में जो अंतर अच्छे व बुरे के बीच कैसा रहा है, अरविंद केजरीवाल ने अपने कृत्य से उस अंतर की गहराई को समुद्र तट की मीलों लम्बी दूरी के समान कर दिया है। अन्ना ने भी अपने पत्र में केजरीवाल की कथनी-करनी में अंतर की सच्चाई को स्वीकारा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ज्यादा आत्मबल व ’’काली रात को सफेद उजाला’’ के रूप में दमदारी से भाजपा से ज्यादा मीडिया का अच्छे तरीके से दुरूपयोग कर जनता के दिलों दिमाग तक में उतारने वाला एकमात्र कोई शख्स है, तो वह अरविंद केजरीवाल ही है। (हालांकि यह कहना भी ’’सूरज को दीपक दिखाने जैसा’’ है।) विधानसभा में जवाब देते समय उनके चेहरे से टपक रहा आत्मबल, आत्मविश्वास व चेहरे की भाव भंगिमा निश्चित रूप से असाधारण थी। ‘एडीआर’ की एक रिपोर्ट अनुसार आप के आधे से अधिक (लगभग 60 प्रतिशत) विधायकों के विरुद्ध 140 से ज्यादा चल रहे आपराधिक प्रकरणों के संबंध में केजरीवाल विधानसभा में स्थिति स्पष्ट कर यह गिना रहे थे, फलाने विधायक पर इतने प्रकरण चल रहे हैं और इतने में से वे छूट चुके है, शेष आपराधिक प्रकरण विचाराधीन है, किसी को भी सजा नहीं हुई है। ये बोलते समय उन केजरीवाल के चेहरे पर जरा सी भी शिकन तक नहीं थी, जो अन्ना आंदोलन के समय मात्र ‘दागी’ होने के आधार पर ही दागी सांसदों के इस्तीफे की मांग लगातार कर रहे थे। बल्कि ’’थोथा चना बाजे घना’’ की उक्ति को चरितार्थ करते हुए ’’ताल ठोक कर’’ जैसे न्यूज चैनलों के प्रोग्राम के नाम होते हैं, विधानसभा में विधानसभा में डेक्स ठोक-ठोक कर, चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहे थे, साथ ही जुमला भी जोड़ रहे थे कि देश को 75 सालों में किसी ने नहीं बदला, हम बदलेंगे? भारत को दुनिया का नंबर वन देश बनाएंगे? (क्या दिल्ली दुनिया का सबसे सर्वश्रेष्ठ शहर बन गया ?) देश में दो ही पार्टी रह गई है, एक कट्टर ईमानदार आप और दूसरी कट्टर बेईमान भाजपा। केजरीवाल वास्तव में यह प्रमाण पत्र देते और कहते समय भूल जाते है कि वे इस क्रिया में ईमानदारी का प्रमाण पत्र सामने वाले को ही दे रहे है, जब वे कहते है कि आप कड़क ईमानदार है। इतनी शालीनता उन्होंने जरूर रखी है, जब वे संबोधन में तुम की जगह आप का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार आप का प्रयोग सामने वाली भाजपा के लिए अपने आप हो जाता है व ईमानदारी का प्रमाण पत्र भी आपके (भाजपा) के पास पहुंच जाता है। 

यदि आप भाजपा है, तब प्रश्न पैदा होता है मैं कौन? केजरीवाल खुद ही मैं का बखान करते हुए कहते है, मेरे विधायकों पर केस चल रहे हैं, मैंने दिल्ली में स्कूलों की देश का सबसे सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था लागू की है। अच्छी स्वास्थ्य सेवा के लिए मोहल्ला चिकित्सा व्यवस्था की। इसी मैं में ही केजरीवाल का मैं (स्वयं) का झूठ छिपा हुआ है। यदि दिल्ली की स्कूल व चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है, तब वे यह दावा क्यों नहीं करते हैं कि हमारे 56 विधायकों व मंत्रियों के बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ रहे है और उनके परिवारों के सदस्य इन्हीं अस्पतालों में इलाज कराते हैं। विशेष कर उस स्थिति में जब ’’विदेशी अति महत्वपूर्ण गणमान्य’’ दिल्ली आकर केजरीवाल माडल की प्रशंसा करते चुकते-थकते नही हैं व विश्व प्रतिष्ठित पत्रिका न्यूयॉर्क टाईम के पृथक पृष्ठ पर दिल्ली सरकार के स्कूल मॉडल को छापती है। तब फिर स्वयं की पत्नी के इलाज का पच्चीस लाख के बिल का भुगतान दिल्ली सरकार के अस्पतालों के बजाए अन्य अस्पतालों (मैक्स हॉस्पिटल) को कैसे हो गया? ’’राम नाम जपना, जनता का माल अपना’’! इसका जवाब केजरीवाल जी से नहीं आता है और न ही आयेगा।

गुरुवार, 1 सितंबर 2022

अनियमित ‘‘ट्विन टाॅवर्स’’ को नियमित कर बचाया जाना चाहिए था?

 -ःद्वितीय भागः-

क्या बिल्डर्स एवं विकास प्राधिकरण के अहंकार व अनियमितता को ध्वस्त करने के मात्र एक तरीका यही रह गया था?
         

यदि ‘‘ट्विन टावर्स’’ को गिराने का निर्णय नहीं लिया जाता तो ऐसी स्थिति में एक बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न हो सकता था कि सोसाइटी के रहवासियों ने दो टावरों के बीच व रहवासी फ्लैटों के बीच न्यूनतम दूरी 16 मीटर से कम होकर मात्र 9 मीटर होने के कारण उन्हे खुली हवा मिलने में व अन्य दिक्कते होने की शिकायतें की थी उनका न्याय कैसे मिलता? निश्चित रूप से उनकी यह शिकायत जायज है। ‘‘लॉ ऑफ टॉर्टस्’’ (अपकृत्य कानून) के अनुसार भी उनका यह वैधानिक अधिकार है। परन्तु क्या इस तथ्य से इनकार किया जा सकता है कि इस देश में विभिन्न राज्य सरकारें; कॉलोनाइजेशन कानून व बाद में रेरा एक्ट आने के बावजूद, बिना अनुमति के अथवा अनुमति की शर्तो का उल्लंघन कर बनी इमारतों को कुछ पैसा जमा कराकर व फाइन (शास्ति, ब्याज) लगाकर नियमित करती चली आ रही हैं? ऐसी कालोनियों को तो तोड़ा नहीं जाता है?
देश में करोड़ों लोग झुग्गी झोपड़ीयों और पुरानी बस्ती में रहते हंै जहां दो, गलियों के बीच 16 मीटर की दूरी की सुविधा बिल्कुल भी नहीं है। फिर भी वे आजाद भारत की उस ‘‘खुली’’, ‘‘सांस’’ के साथ रह कर जीवन व्यतीत करते हैं। वहां स्वच्छ व साफ सांस लेने के लिए डिमोलेशन की कार्रवाई नहीं होती है। क्या यह सरकार का दायित्व नहीं है कि देश के हर नागरिक को वही सुविधा दे, उपलब्ध कराये व दिलवाये जो इन याचिकाकर्ता सोसाइटी के निवासियों की जायज मांग की पूर्ति के लिए कार्रवाई की गई है? सिर्फ इसलिए कि वे देश की उच्चतम न्यायालय के पास नहीं आये और न ही देश की मीडिया ने ‘‘आगे नाथ न पीछे पगह’’ समझ कर उनकी आवाज को उठाया? क्या वे ‘‘कसाई के खूंटे से बंधे रहने के लिए’’ अभिशाप हैं? उन्हें उनके उक्त कानूनी अधिकार से वंचित रखा गया?
यह सत्य है जीवन का कोई मूल्य नहीं हो सकता हैं और न ही उसे वापिस लाया जा सकता है। जिंदगी को रुपयों से भी तौला नहीं जा सकता है। बावजूद इसके दिनचर्या में हम देखते हंै कि इस देश में जब भी कोई भी घटना, दुर्घटना, सुनियोजित षडयंत्र पूर्वक घटना घटित होती है, जहां जान माल का नुकसान होता है, वहां शासन-प्रशासन हजारों, लाखों व करोड़ों की राशी मुआवजा के नाम पर प्रभावित लोगों को देकर हर बड़ी से बड़ी घटना के दुष्प्रभाव को लगभग प्रभावहीन कर भुक्तभोगी की क्षतिपूर्ति परिपूर्ति मान कर चुप करा दिया जाता है। क्योंकि वे जानते है कि उनके पास इसके अलावा विकल्प क्या है? इसलिए घटना से प्रभावित लोग इसे अपना (दु)र्भाग्य, नियति मानकर स्वीकार कर लेते हंै। बुरा मत मानइये! क्या यहां पर भी ‘‘कानून की लकीर का फ़कीर’’ बनने के बजाए यही तरीका अपना कर 600 करोड़ की राष्ट्रीय संपत्ति को बचाया नहीं जाना चाहिए था, जो अंततः देश के नागरिकों की मकान आवश्यकता की पूर्ति में काम ही आती? विशेषकर यह देखते हुए कि सुपरटेक कंपनी ने फायर, पर्यावरण पर स्पोर्ट अथॉरिटी की एनओसी ली हो। कपंनी ने यह भी दावा किया कि वे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में शामिल नहीं है। इस दिशा में शिकायत कर्ता को समझाने का प्रयास नहीं किया जा सकता था क्या? इस देश में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे, जहां न्यायालयों ने निर्माण कार्यों की अनियमितताओं को नियमित किया है। उदाहरणार्थ दिल्ली उच्च न्यायालय ने पूनम गुप्ता व अन्य द्वारा दिल्ली नगर निगम को अवैध निर्माण को नियमित करने से रोकने के लिए दायर की गई याचिका में अवैध निर्माण को नियमित करने के नगर निगम के अधिकार को स्वीकारा है। यद्यपि जर्जर भवन को तोड़ने के आदेश सामान्य रूप से होते रहे हैं। परन्तु यहां तो मजबूत नींव को 3700 किलो विस्फोटक लगाकर ‘‘भ्रष्टाचार’’ को ध्वस्त किया गया, ‘‘जर्जर भवन’’ को नहीं?
परन्तु दुर्भाग्य यह है कि इस देश का ‘‘अंगूठा चूसता मीडिया’’ आजकल प्रायः एक परसेप्शन बनाता है जिसका लोग, अधिकांशतः राजनेता व राजनीतिक दल ‘‘अंधानुकरण’’ करते है। मीडिया के द्वारा ट्विन टावर को अट्ठाहास् करती ‘‘भ्रष्टाचार’’ का पर्यायवाची, प्रतीक बनाकर इस गगनचुंबी इमारत को जमींदोज कर भ्रष्टाचार को नेस्ताबूद बनाने वाले परसेप्शन के विरुद्ध कौन खड़ा हो सकता है? अभी तक नौकरशाहों और न्यायाधीशों के मामले में रिश्वत अर्थात पैसों का नगद लेन-देन तथा नेताओं के मामले में अवैध तरीके से निर्मित की गई अकूत संपत्ति भ्रष्टाचार का प्रतीक/परसेप्शन रही है। एक ओर जहां ‘रिश्वत’ के मामले में जेल भेज दिया जाता रहा है, वहीं दूसरी भ्रष्टाचार से निर्मित अकूत संपत्ति को राजसात कर लिया जाता है। क्या आपने किसी राजनेता की भ्रष्टाचार से कुटी गई अकूत अचल संपत्ति का इस तरह से विध्वंस होते हुए देखा है? (राजनैतिक द्वेषभाव से की गई कार्रवाईयांे को छोड़कर?) तब फिर ऐसी ही कार्यपद्धति ट्विन टावर मामले में क्यों नहीं अपनाई गई? शायद विध्वंसात्मक भावना के हावी होने के चलते वैकल्पिक रास्ता सोचने का प्रयास ही नहीं किया गया?
मुझे लगता है, मैं भी इस मामले में कुछ न कुछ दोषी हूं, यदि समय रहते  उच्चतम न्यायालय के पास एक याचिका प्रेषित कर देता, तो शायद उच्चतम न्यायालय भी पुनर्विचार कर लेती। मेरी नजर में यह दोषपूर्ण निर्णय है, लेकिन निश्चित रूप से गैरकानूनी न होकर न्यायिक है। समस्त न्यायालीन अंतिम निर्णय कानूनी होने के बावजूद अन्य परिस्थितियों (में) के लिए दोषपूर्ण हो सकते हैं। तथापि तथ्य यह भी है कि सुपरटेक की पुनर्विचार याचिका को भी उच्चतम न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया था।
ऐसा लगता है, शायद देश की वर्तमान विकल्पहीन राजनीति के चलते विकल्पहीन, रचनात्मक निर्माण की भावना रहित निर्णय ‘‘अस्तित्व’’ को समाप्त कर मलबे के धुएं में परिवर्तित होकर स्वयं अस्तित्व हीन हो गया?

मंगलवार, 30 अगस्त 2022

‘‘भ्रष्टाचार की उच्चतम निशानी’’ ‘‘ट्विन टाॅवर्स’’ को जमींदोज करना क्या ‘‘अपरिहार्य’’ था?

-ःप्रथम भागः-

हमारा देश कानून का पालन करने व करवाने के मामले में ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’’ ‘‘अनेकता में एकता लिये हुए’’ एक ‘लचीला’ देश रहा है। यहां ‘‘तंत्र’’ जो शासन-प्रशासन को चलाता है, बुरी तरह से भ्रष्टाचार की गिरफ्त में (बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी कानून) होने के कारण भ्रष्टाचार ‘‘शिष्टाचार’’ में बदल कर चलते-फिरते जीवन का एक अपरिहार्य अंग बन गया है। इस पर चोट करने के लिए व सबक सिखाने के लिए एक ‘‘नजीर’’ बनाने की भावना के मद्देनजर निर्माण संबंधी विभिन्न कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए 9 वर्ष पूर्व बने इन ट्विन टावरों को 28 अगस्त 2022 को मात्र 9 सेकंड में ‘‘भूमिसात’’ कर भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘‘जेहाद’’ कर एक कठोर सांकेतिक संदेश दिया है। प्रश्न यह है कि दिल्ली के कुतुब मीनार से भी ऊंची 101 मीटर दोनों टावरों को जमींदोज करने के अतिरिक्त क्या अन्य कोई विकल्प नहीं रह गया था? या कि ‘‘आयी मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक’’। इस पर आगे मंथन करने के पूर्व पहले ट्विन टावर का संक्षिप्त इतिहास जान लीजिये। 

नवंबर 2004 में सुपर टेक कंपनी को नोएडा के सेक्टर 93 ए में 84247 वर्ग मीटर जमीन आवंटित हुई थी। सुपरटेक ग्रुप कंपनी ने एमराल्ड कोर्ट सोसाइटी बनाकर वहां फ्लैट निर्माण की परियोजना प्रारंभ की, जिसमें प्रारंभ में 11 मंजिलों के 14 टावर शामिल थे। तत्पश्चात वर्ष 2006 से 2012 के बीच इस योजना में तीन बार संशोधन होकर दो और टावर निर्माण करने की मंजूरी उसी जगह दी गई, जो कि पूर्व में नोएडा अथाॅरिटी एवं कंपनी ने ग्रीन एरिया दर्शाया गया था। वर्ष 2009 में उत्तर प्रदेश सरकार की भवन निर्माण संबंधी ‘‘एफएआर’’ बढ़ाने के निर्णय के बाद सुपरटेक कंपनी को अपनी परियोजना में संशोधन करने में सहायता मिली व प्लान को रिवाइज कर ‘‘उंगली पकड़कर पहुंचा पकड़ते हुए’’ 121 मीटर की ऊंचाई की 40 मंजिला निर्माण की स्वीकृति प्राप्त की। तत्पश्चात 32 मंजिला एपेक्स (टी.16) एवं 29 मंजिला सियोन (टी.17) नामक दो टावरों का निर्माण प्रारंभ किया गया (जिसे अभी जमींदोज किया गया) जिसकी कुल निर्माण लागत लगभग 300 करोड रुपए थी। एमराल्ड कोर्ट सोसाइटी के स्थानीय रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन जिनकी सोसाइटी के ठीक सामने ट्विन टावर का निर्माण हो रहा था, ने इसके निर्माण पर आपत्ति की और वर्ष मार्च 2012 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। 

वर्ष 2014 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नोएडा अर्थोरिटिज पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए फटकार लगाते हुए उक्त दोनों टॉवर को तोड़ने का आदेश दिया। न्यायालय ने एनबीआर 2006 एवं एनबीआर 2010 का उल्लघंन पाया। अर्थात दो टावरों के बीच 16 मीटर की दूरी के नियमों का पालन न करके मात्र 8 मीटर की दूरी पर एनओसी जारी कर दी गई। ‘‘एनबीसी 2005’’ (राष्ट्रीय भवन कोड) को भी ताक पर रखकर निर्माण किया गया। जिस जमीन पर उक्त दोनों टॉवर बने, वह पूर्व में बिल्डर द्वारा ग्रीन बेल्ट दिखाया गया था। उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान, कंपनी ने एक टावर तोड़ने की पेशकश की थी, जिसे अस्वीकार कर उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2021 में दोनों टावर तोड़ने के आदेश दिये। उक्त दोनों टॉवरों में 952 फ्लैट बने है, जिसकी लागत मूल्य लगभग 300 करोड़ रुपये और तोड़ते समय उसका बाजार मूल्य लगभग 600 करोड़ रुपये से अधिक ही है। कंपनी के चेयरमैन आर के अरोड़ा का यह स्पष्टीकरण आया कि कंपनी ने सब नियमों का पालन किया है व नोएडा अर्थोरिटिज की समय-समय पर ली गई आवश्यक स्वीकृति व इजाजत से ही निर्माण कार्य हुआ है। उन्होंने दावा किया है कंपनी ने 70 हजार से ज्यादा फ्लैट बनाये है, जिसमें कि कुल फ्लैट का मात्र 3 प्रतिशत ही विवादित रहा है।

उक्त डिमोलेशन से कई प्रश्न पैदा होते है कि भ्रष्टाचार का उच्चतम स्तर का प्रतीक बनाया जा चुका यह टावर क्या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए और आगे बिल्डर्स के लिए कड़क नजीर बनाने के लिए इसका जमींदोज किया जाकर 600 करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति जो अंततः राष्ट्र की संपत्ति हैं (क्योंकि उसमें लगने वाला समस्त माल हमारे देश का उत्पाद ही तो है।) धूल के धुंए में परिवर्तित करना अर्थात ‘‘अशर्फियाँ लुटें, कोयलों पर मुहर लगाना’’ जरूरी था? रेसीडेंट सोसायटीओं की शिकायत का निराकरण का अन्य कोई विकल्प नहीं था।

भ्रष्टाचार निश्चित रूप से एक बुराई की जड़ है और हम कहते भी है कि इसमें भ्रष्टाचार की बू आ रही हैं। जबकि वास्तव में भ्रष्टाचार में ही ‘बू’ है और वह स्वयं तकनीकि रूप से (व्यवहार में नहीं?) सुगंधित न होकर दुर्गंधित होता है। अर्थात भ्रष्टाचार एक घोर नकारात्मक भाव लिया हुआ कार्य है, जिसका कोई नैतिक बल न होने के बावजूद, सहूलियत अनुसार व्यक्ति उसका ‘उपयोग’ कर ही लेता है। उक्त टावर भ्रष्टाचार की नींव का वह नमूना हैं, जो विनाश के बदले निर्माण लिये हुए है। दो गगनचुंबी आवासीय इमारत जो जरूरतमंद नागरिकों के रहने के लिए बनाई गई, जहां अथाॅरिटीस को ‘‘उंगलियों पर नचाते हुए’’ स्वीकृति ली गई भले ही वह स्वीकृति मिली-भगत व भ्रष्टाचार के द्वारा हुई हो। हमने देखा है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार इतना धुल मिल गया है कि वह पूरी तरह से शिष्टाचार हो गया है, जैसे दोनों में ‘‘चोली दामन का साथ’’ हो। परन्तु उसे हम जमींदोज करने का प्रयास नहीं करते हैं। पुल, पुलिया, सड़क, बांध, सरकारी इमारतें, कारखानें आदि के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार के कारण वे ‘‘बालू की भीत के समान’’ टूट जाए, बह जाए, धंस जाए, गिर जाए तो हमें भूमिसात करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसीलिए यहां पर न्यायालय के डिमोलेशन के आदेश की जरूरत अवश्य ही नहीं है। वहां तो ‘‘तबेले की बला बंदर के सिर मढ़कर’’ ही काम हो जाता है। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के कारम डेम का उदाहरण आपके सामने है, जो पूरा होने के पहले ही भ्रष्टाचार की बली चढ़कर कई गांवों में संकट में डाल दिया।  

यदि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़क नजीर बनाना ही हैं, जहां लेन-देन, करने-कराने अर्थात दोनों पक्षों पर निरोधक कानून रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) जैसे लगाकर गिरफ्तार कर जेल के अंदर बंद करने की कार्रवाई कर ‘‘छठी का दूध क्यों नहीं याद कराया जाता’’? ऐसे करने से बिल्डिंग तोड़ने से ज्यादा कड़क नजीर उन भ्रष्टाचारियों द्वारा तंत्रों का दुरुपयोग कर ‘सांठगाठ’ से भविष्य में ऐसे निर्माण करने के लिए बिल्ड़र निरूत्साहित होते? यद्यपि 300 करोड़ रुपये बड़ी रकम होती हैं लेकिन इस देश में जहां हजारों, लाखों व करोड़ों रूपये के कांड (जैसे 2-जी) हो जाते है व भ्रष्टाचारी व अपराधी जेल के बाहर व देश के बाहर धूमते-फिरते रहते है। वहां ऐसी कंपनीयां के प्रोमोटर्स इन रकमों के आघात को सह सकती हैं। परन्तु जेल जाने के आघात को नहीं सह पायेगी। इसलिए ‘‘अंधे की लकड़ी’’ बने सुप्रीम कोर्ट का यह दायित्व था, कि बिल्डर और एथोरटी पर अनियमित टावर को अनियमित व गैरकानूनी तरीके से कानून व नियम की आड में नियमित कर बनाने पर आर्थिक लाभ के उद्देश्य को बोठल करने के लिए लागत के बराबर व उतनी ही राशि शास्ती के रूप में कंपनी से वसूल कर हितधारकों को बांट देती। साथ ही समस्त लोगों के खिलाफ जहां जांच के लिए गठित एसआईटी ने 26 अफसरों की संलिप्तता बतलाई थी, पर आपराधिक कार्रवाई करने का निर्देश देती और शासन-प्रशासन को निरोधक कानून का उपयोग करने का निर्देश देती तो, जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टावर जमींदोज किया गया वह तो प्राप्त हो जाता है और देश की 600 करोड़ की संपत्ति भी ‘‘धूल के गुबार’’ में परिवर्तित होने से बच जाती और जरूरतमंद नागरिकों को रहने के लिए मकान भी मिल जाते। सार यह कि ‘‘गेहूं के साथ घुन पिसने से’’ बच जाते।

गुरुवार, 25 अगस्त 2022

केजरीवाल मुफ्त की ‘‘रेवड़ियां’’ (चारित्रिक प्रमाण पत्र) देना बंद करें।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री तथा शिक्षा और आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ सीबीआई का छापा व ईडी की जांच पर तिलमिलाए दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं ’आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपनी ‘‘अधजल गगरी से छलका’’ हुआ पानी पी पी कर, बत्तीसी दबाकर, बारम्बार, जोरदार रूप से यह कहते कहते थक नहीं रहे हैं कि मनीष सिसोदिया 24 कैरेट के 100 प्रतिशत ‘‘कट्टर ईमानदार’’ व्यक्ति है, और उन्हें जबरन फंसाया जा रहा है। (अब ‘‘ईमानदारी‘‘ को भी ‘‘कट्टर’’ का आभूषण पहना दिया गया है।) वैसे आज की राजनीति में तो कट्टरता का बोलबाला ही है, शायद इसीलिए सामान्य रूप से इस शब्द का उपयोग हुआ हैं। विपरीत इसके शिक्षा के क्षेत्र में मनीष सिसोदिया जो कि अरविंद केजरीवाल की ‘‘अंगूठी के नगीना’’ हैं, ने ’’अदभुत’’ काम किया है, इसके लिए उन्हें ‘‘भारत रत्न’’ से विभूषित किया जाना चाहिये, बजाए जेल भेजने के ऐसी मांग काउंटर में सिसोदिया के बचाव में केजरीवाल ने कर डाली।kनिश्चित रूप से मनीष सिसोदिया ने यदि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर उसे एक श्रेष्ठ पद्धति में परिवर्तित कर दिया है, जैसा कि ‘‘अपनी खिचड़ी अलग पकाने वाले’’ अरविंद केजरीवाल व आप पार्टी लगातार न केवल दावा करते आ रहे है, बल्कि वह अपनी सरकार की उक्त सफलता (तथाकथित) शिक्षा नीति और मोहल्ला क्लीनिक और मुफ्त सुविधाएं के आधार पर अन्य प्रदेशों में सफलता पूर्वक वोट भी मांग रहे हैं। उनके कथनानुसार अमेरिका की प्रसिद्ध मैगजीन ’न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री की इस नीति की प्रशंसा करते हुए उनकी प्रशस्ति में मुख्यपृष्ठ पर एक लेख भी छापा है। (या छपवाया गया?) ऐसी स्थिति में ’भारत रत्न’ मांगना उनका ’अधिकार’ तो है? लेकिन यदि इस तरह से ’भारत रत्न’ की ‘‘मॉग व आपूर्ति’’ होने लग जाए तो ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे व्यक्ति यदि वे जीवित होते तो, निश्चित रूप से इन परिस्थितियों में देश का सर्वोच्य नागरिक पुरस्कार के बनाए रखने के लिए ‘‘भारत रत्न‘‘ वापस कर देते। 

निश्चित रूप से सही और सफल शिक्षा नीति लागू किये जाने के कारण मनीष सिसोदिया को भारत रत्न तो नहीं परन्तु पद्म् विभूषण पाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में भाग लेते हुए उन्हें आवेदन जरूर देना चाहिए। क्योंकि भारत रत्न तो प्रधानमंत्री की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति देते है। (आवेदन देने की कोई प्रक्रिया अन्य सम्मानों के समान नहीं है) वर्तमान स्थिति में यह संभव भी नहीं है। परंतु बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि एक नई अच्छी व सफल शिक्षा नीति होने का दावा किया जा रहा है, को क्या देश के अन्य राज्य लागू करने के लिए उतने ही लालायित है? हो सकता है, तुच्छ राजनीति के चलते अच्छी नीति होने के बावजूद भी दूसरे राज्य या केंद्र इसको अपनाने में हिचक रहे हों। अरविंद केजरीवाल के इस कथन से एक बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि देश के सेलिब्रिटीज् जिन्हें समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च, उच्च ईनाम, पदक व सम्मान मिले हैं, क्या उन्हे आईपीसी, दंड प्रक्रिया संहिता या अन्य आपराधिक कानूनों से उन्मुक्त कर दिया है? 

देश के इतिहास में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में सर्वोच्च अवार्ड सम्मान पाने के बावजूद अपराधों में लिप्त होने के कारण उन्हें न्यायालीन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ा व कई मामलों में उन्हें सजा भी हुई है। वे सब गणमान्य व्यक्ति राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत होने के कारण क्या उन्हें सीबीआई/ईडी के क्षेत्राधिकार से मुक्त होने का पुरस्कार भी मिल जाता है? इसलिए सिसोदिया को भारत रत्न की पात्रता होने के कारण उनकी अपराध में संलग्नता न होना मानना, बहुत ही बचकाना व बच्चों वाला तर्क एक बड़े पढ़े लिखे व्यक्ति का है। इसी कारण ‘‘अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते बनते’’ कभी कभी वे हंसी का पात्र भी बन जाते हैं। भाजपा का इस संबंध में किया गया तंज सटीक हैं। ‘‘सत्येन्द्र जैन के लिए पद्म विभूषण, मनीष सिसोदिया को भारत रत्न व अरविंद केजरीवाल को अगला नोबेल पुरस्कार‘‘! यानी सब ‘‘छछूंदरों के सर पर चमेली का तेल’’।

दूसरा उनका कहना कि मैं जानता हूं, मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार हैं। इस देश में ईमानदारी का प्रमाण पत्र देने का अधिकार कब व कैसे मुख्यमंत्री को या आरोपी स्वयं अथवा उनके शुभचिंतकों को दे दिया गया है, यह बात समझ, ज्ञान व जानकारी से परे है। आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टी के चरित्र का प्रमाण पत्र देने की लत क्यों लग गई है। जब उनके पार्टी के प्रवक्ता यह कहते है कि हमारे जितने भी मंत्रियों के खिलाफ केस चलाया गया है चाहे सत्येन्द्र जैन, मनीष सिसोदिया या पूर्व में अन्य कोई, वे सब कट्टर ईमानदार है। 

आप पार्टी के संयोजक केजरीवाल को क्या यह याद दिलाना होगा कि अन्ना आंदोलन जिनकी वे अवैध उत्पत्ति हैं, इसलिये की माइक पर गले फाड़कर चिल्ला-चिल्ला कर अन्ना के सामने वे यह कहते थकते नहीं थे, जो वर्तमान संसद है इसमें लगभग 150 से अधिक सांसद दागी हैं। असली ’’संसद तो सामने खड़े हुए लोग’’ है। इसलिए सही लोकतंत्र वही होगा, जब ये समस्त दागी (आरोपी) सांसद जिन पर विभिन्न गंभीर अपराधों सहित कई प्रकरण चल रहे हैं, संसद से इस्तीफा देकर चल रहे मुकदमे को लड़े और निर्दोष सिद्ध होकर फिर चुनाव लड़कर संसद में आयंे। सोभित उल्लेखनीय बात यह है कि महीनों से जेल में बंद मंत्री सत्येंद्र जैन से अभी तक न तो इस्तीफा लिया गया है और न ही उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया गया है। अब केजरीवाल इस सिद्धांत को ‘‘अंगद के पांव की तरह’’ जमे अपने ही विधायकों पर क्यों नहीं लागू कर पा रहे है? या लागू करना नहीं चाहते हैं? क्या उनका विधान/संविधान व लोकतंत्र अलग है? क्या वे पुराने जमाने के राजा समान हैं, जहां यह कहा जाता था कि ‘‘राजा कभी कोई गलती नहीं करता है’’? लोकपाल जो अन्ना आंदोलन की ‘‘रीढ़ की हड्डी’’ थी, अब राजनीतिक पटल से पारदर्शी तरीके से अदृश्य हो गई है? अपराधिक छवि लिए या अपराधिक मामले चलने वाले अपनी ही ‘‘नाक के बाल’’ नेताओं पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की वकालत केजरीवाल अब क्यों नहीं कर रहे हैं? 

 केजरीवाल जी को उनकी एक बात और याद दिलाना चाहता हूं, जब अन्ना आंदोलन के समय उन्होंने कुर्सी की एक बड़ी समस्या बतलाते हुए कहा था कि इस कुर्सी पर जो भी बैठता है, वह गड़बड़ हो जाता है। अन्ना आंदोलन से निकले विकल्प के इस कुर्सी पर बैठने पर कहीं वह भी गड़बड़ या भ्रष्टाचारी न हो जाए। यह आशंका उन्होंने तब व्यक्त की थी, जो अभी सही साबित हो रही है। तब आज उन्हें उसी कुर्सी से इतना प्यार मोहब्बत क्यों हो गई कि, कुर्सी पा कर उनकी ‘‘आंखों में सरसों फूलने लगी’’? या उनका नए-नए अन्वेषण करने के दावे के साथ यह दावा तो नहीं है कि उन्होंने कुर्सी के मूल चरित्र को ही बदल डाला है। इसलिए अब कुर्सी व्यक्ति पर हावी नहीं होगी, बल्कि व्यक्ति कुर्सी पर हावी होगी?   

80 प्रतिशत विधायकों पर चल रहे आपराधिक मुकदमों के संबंध में वही कथन है कि राजनीतिक द्वेष व स्वार्थ की दृष्टि से झूठे बनावटी मुकदमे दर्ज किए गए हैं। और वे सजायाफ्ता विधायक नहीं है। या तो वे बरी हो गए हैं अथवा कोर्ट में कार्रवाई चल रही है। यही तर्क तो अरविंद केजरीवाल के दागी सांसदों के संबंध में लगाए गए आरोपों के जवाब में अन्य राजनैतिक दल देते थे, तब तो वे सिरे से उक्त तर्क को नकार देते थे। राजनीति का यह दोहरापन या दोगलापन किसी को सीखना है, तो सबसे बड़ा शिक्षक इस देश में अभी यदि कोई है, तो वह केजरीवाल ही है। कांग्रेस हो या भाजपा (कमोबेश/कमोत्तर) वे उस भ्रष्ट राजनीति कीचड़ में कार्य करती चली आ रही है। इसलिए उनसे स्वच्छ राजनीति की अपेक्षा करना ज्यादती होगी। परन्तु स्वच्छ राजनीति की बात कर रहे अरविंद केजरीवाल जो अन्ना की पवित्रता के आशीर्वाद के साथ स्वच्छता की घुट्टी पीकर राजनीति न करने की कसम खाकर, यदि देश को सुधारने के लिये राजनीति में कसम तोड़कर उतरे है, तब केजरीवाल राजनीति के उसी कीचड़ का सहारा लेकर दाग-दार राजनीति करने लगे, तो सबसे ज्यादा दोषी व अपराधी कौन? ‘‘हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दिवान’’।  

अरविंद केजरीवाल देश की राजनीति में नये नवेले खिलाडी है। वे आज देश में नरेन्द मोदी के बराबर हर क्षेत्र में न केवल अपने को देखना चाहते हैं, बल्कि इस प्रयास में वे कई बार असहज होकर असमान्य बातें भी कर जाते हैं। ‘‘करघा छोड़ तमाशा जाय, नाहक चोट जुलाहा खाय’’। आपको याद होगा देश की राजनीति में वर्ष 2014 में एक बड़ा परिवर्तन आया, जब पर्दे के पीछे प्रशांत किशोर के बने प्लान से मीडिया की ब्रांडिंग कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में आशा से कहीं ज्यादा सफलता प्राप्त की थी। तब केजरीवाल ने मीडिया के दुरुपयोग की आलोचना यह कहकर की थी कि करोडों रुपये मीडिया मैनेजमेंट में खर्च किये गये। दिल्ली में आप की सरकार बनने के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली जो की पूर्ण राज्य भी नहीं है, के मीडिया खर्च के तुलनात्मक आंकड़े निकाले जाये तो कही दूर-दूर तक दिल्ली का मीडिया खर्चे अन्य प्रदेशों से ज्यादा है। शायद यह केजरीवाल की इस थ्योरी से मेल खाता है कि नरेन्द्र मोदी से वे आगे हंै। इसी क्रम में उन्होंने गुजरात में जा कर अगले पांच वर्षो में देश को विश्व का सर्वाधिक विकसित राष्ट्र बनाने की घोषणा की, जो नरेन्द्र मोदी अगले 25 वर्षों में करने की योजना बना रहे हैं (जिसकी घोषणा लाल किले से की गई थी)। सिर्फ इसलिए कि मैं (केजरीवाल) नरेन्द्र मोदी से आगे हूं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आगे होने के इसी क्रम में अब आप ने भाजपा पर मनीष सिसोदिया सहित अपने विधायकों की खरीद-फरोख्त व सीबीआई रेड, ईडी जांच की धमकी के आरोप जड़ दिए। आप के विधायकों का आत्मबल, मनोबल अरविंद केजरीवाल के मजबूत व चमत्कारिक नेतृत्व के बावजूद इतना कमजोर कैसे  हो गया है की ‘आप’ को आपके विपक्षी करोड़ों रुपए का लालच देकर खरीदने का ऑफर व धमकी देने की हिम्मत कर लेते हैं? विपरीत इसके भाजपा विधायकों की ईमानदारी और आत्मबल इतना मजबूत होता है कि कोई इस तरह की हरकत करने की सोच भी नहीं पाता है। इस प्रकार अरविंद केजरीवाल यहां भी नरेन्द्र मोदी से आगे निकल गए। 

मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के मामले में भी अरविंद केजरीवाल उन्नीस नहीं बीस सिद्ध हो रहे हैं। मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज हमारी संवैधानिक व्यवस्था में दी गई है। देश में स्कूली शिक्षा और शासकीय अस्पतालों में इलाज (अन्य विशिष्ट स्वास्थ्य योजनाओं के अतिरिक्त) मुफ्त में दी जा रही है। जिसे सरकार अपना कर्तव्य मानकर व जनता सामान्य सुविधा मानकर स्वीकार करती चली आ रही है। परंतु  केजरीवाल ने पहली बार इन सुविधाओं की इस तरह से ब्रांडिंग कर जनता को एहसान में डाला है कि सरकार उक्त सुविधाएं मुफ्त में रेवड़ियां के समान बांट कर एहसान कर रही है। इस मुफ्त की रेवड़ियां की अच्छी ब्रांडिंग के कारण ही पंजाब में जीत के बाद गुजरात में कुछ समय बाद होने वाले चुनाव में केजरीवाल को इसका फायदा न मिले इसके जवाब में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुफ्त की रेवड़ियां और जरूरतमंदों को मुफ्त सेवा देने में अंतर को समझाने का प्रयास करना पड़ा। इस प्रकार केजरीवाल वर्तमान राजनीति जहां ‘‘परसेप्शन’’ (वास्तविक कार्य नहीं) ही महत्वपूर्ण रह गया है, उसमें भी केजरीवाल नरेन्द्र मोदी को पछाड़ते हुए आगे दिख रहे है। ऐसा लगता है भविष्य में इसी तरह से अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी से आगे होते रहेंगे?

Popular Posts