मंगलवार, 26 मार्च 2024

अपराध रहित व भ्रष्टाचार विहीन विधायिका का आह्वान करने वाले अरविंद केजरीवाल खुद ही भ्रष्टाचार के आरोप में अंततः गिरफ्त में आ गए।

 ‘‘ईमानदार राजनीति’’ के ‘‘परसेप्शन’’ पर ‘‘भ्रष्टाचार का तड़का’’।


याद कीजिए! अप्रैल 2011 में दिल्ली के जंतर मंतर पर ‘‘जन लोकपाल विधेयक’’ के लिए महाराष्ट्र के रालेगांव सिद्धि निवासी, समाजसेवी गांधीवादी बाबूराव हजारे जो अन्ना हजारे के नाम से जाने जाते हैं, का ‘‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन ग्रुप’’ के बैनर तले भ्रष्टाचार के विरुद्ध, गैर राजनैतिक, अहिंसा वादी आंदोलन लगभग चार महीने सफलतापूर्वक चला। इस आंदोलन को एक तरफ परदे के पीछे संघ प्रचारक एवं भारतीय जनता पार्टी के पूर्व महासचिव रहे चिंतक गोविंदाचार्य चला रहे थे, तो दूसरी ओर पर्दे पर ‘‘मैग्सेसे पुरस्कार’’ विजेता, भारतीय राजस्व सेवा से इस्तीफा देकर आए नौकरशाह संयुक्त आयकर आयुक्त रहे अरविंद केजरीवाल चला रहे थे। आंदोलन के दौरान दिन प्रतिदिन अरविंद केजरीवाल मंच से दहाड़ मार कर बोलते थकते नहीं थे कि यह जो संसद है, वह दागी है, क्योंकि उसमें 150 से ज्यादा सांसद दागी हैं, जिन पर भ्रष्टाचार और अपराधों के गंभीर आरोप है। ‘‘असली संसद’’ तो सामने खड़े लोग (जनता) हैं। अरविंद केजरीवाल की यह मांग रही थी कि जिन भी सांसदों पर अपराधिक अपराध और भ्रष्टाचार के प्रकरण चल रहे हैं, वे सब पहले संसद से इस्तीफा देकर न्यायालय में मुकदमा लड़ कर बाईज्जत बरी होकर आयें। फिर जनता के बीच जाकर चुनाव लड़कर चुनकर संसद में जाएं। यही सही स्वच्छ संसदीय लोकतंत्र होगा।

याद कीजिए! जब अन्ना आंदोलन के प्रमुख कर्ता-धर्ता अरविंद केजरीवाल ने संसदीय लोकतंत्र को अपराध व भ्रष्टाचार से मुक्त करने के उक्त मुद्दे को लेकर भ्रष्टाचार मुक्त और अपराधी/आरोपी विहीन संसद और विधानसभा की कल्पना को लेकर एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात कही, तब केजरीवाल के आंदोलनकारी गुरु भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मुख्य चेहरा अन्ना हजारे ने ऐसी ‘‘घर का देव और घर का पुजारी’’ वाली राजनीतिक पार्टी बनाने से साफ इनकार कर दिया था। शायद अन्ना ने जयप्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी संपूर्ण क्रांति के आंदोलन से सीख ली, जहां जेपी ने नई राजनीतिक पार्टी जनता पार्टी बनाई तो जरूर, परंतु स्वयं उन्होंने सत्ता में भागीदारी नहीं की। ‘‘घर का कुआ है तो डूब थोड़े ही मरेगें’’। 

अन्ना शायद इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके थे कि जयप्रकाश नारायण की बनाई नई राजनीतिक पार्टी जनता पार्टी का कुछ ही समय में सत्ता के लिए लड़ाई के चलते क्या ह्रास हुआ? अतः अन्ना ने जेपी की सत्ता में भागीदारी की अनिच्छा के एक कदम और आगे बढ़ते हुए जेपी के समान नई राजनीतिक पार्टी बनाने से साफ इनकार कर दिया। शायद इसलिए कि यदि उक्त मुद्दों को लेकर नई राजनीतिक पार्टी बनाई जाएगी तो सत्ता की अंतर्निहित इच्छा लिए नई राजनीतिक पार्टी को फेवीकॉल समान मजबूत सत्ता तत्व से युक्त इस बुरी तरह से जकड़ कर वह उसे अपने वर्तमान स्वरूप के ढांचे (भ्रष्टाचारी) में ही समाहित कर नई पार्टी को भी अपने अनुरूप ढाल लेगा। यानि कि ‘‘फिर बेताल कंधे पर’’। तब फिर तंत्र को बदलने के लिए नई राजनीतिक पार्टी बनाने वाला नेतागण भी अंततः स्वयं उनके गिरफ्त में आ ही जाएंगे, जिसका परिणाम आज ‘‘खुल्ला खेल फरक्काबादी’’ का नारा लगाने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की भ्रष्टाचार के आरोप में हुई गिरफ्तारी के रूप में देखने को मिल रहा है। लबो लुआब यह कि ‘‘कडवी बेल की तूमड़ी उससे भी कड़वी होय’’।

पुनः याद कीजिए! इस देश में जब-जब भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन हुए वे सफल होकर तत्कालीन सत्ता को बदलने में तो सफल जरूर हुए, परंतु सत्ता के तंत्र को बदल नहीं पाए, सिर्फ ‘‘मुखौटा’’ ही बदला गया। विपरीत इसके भ्रष्टाचार का मजबूत तंत्र जिसे हम ‘‘लोकतंत्र’’ का नाम देते हैं, स्वयं पारस पत्थर बनकर अधिकांश आंदोलनकारी नेताओं को अंततः भ्रष्टाचारी बना दिया जो भ्रष्टाचार समाप्त करने नये राष्ट्र के निर्माण में निकले थे। गुजरात के युवाओं का भ्रष्टाचार के विरुद्ध नव-निर्माण आंदोलन से प्रारंभ हुआ आंदोलन बिहार में पहुंचकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में परिवर्तित हो गया। इस कारण ही आपातकाल लगा और अंततः आपातकाल हटने के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। परंतु सत्ता के भ्रष्ट तंत्र को जयप्रकाश नारायण के सिपहसालार परिवर्तित नहीं कर पाए और कहते हैं ना कि ‘‘कचरे से कचरा बढ़े’’ तो, संपूर्ण क्रांति के आंदोलन की पैदाइश लालू यादव से लेकर देवीलाल जैसे अनेक खांटी नेता भ्रष्टाचार में गले की कंठ तक डूब गए। इसी प्रकार विश्वनाथ प्रताप सिंह का भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन सफल होकर वे स्वयं प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जरूर आरूढ़ होकर सत्तारूढ़ हो गये। परंतु वह भी सिर्फ सरकार के चेहरा बदलने तक ही सीमित रहा, तंत्र बदलने में वे भी पूर्णतः असफल रहे।

अरविंद केजरीवाल के समर्थक आम पार्टी के कार्यकर्ता गण जरूर यह कह सकते हैं कि ‘‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’’ का नारा देने वाले निश्चित रूप से स्वयं तो नहीं खा रहे हैं, परन्तु आगे का कथन न खाने दूंगा को धरातल पर जरूर अनर्थ अथवा अर्थहीन कर दिया है। क्योंकि समस्त दागी, भ्रष्टाचारी नेताओं जिन पर उक्त नारा देने वालो ने स्वयं भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप समय-समय पर लगाए बावजूद फिर उन्हें गले भी लगा लिया। वे सब ‘‘झंडू बाम हो गये’’। ऐसा शायद इसलिए भी जरूरी हो गया ंकि एक दूसरा नारा भी दिया गया था, ‘‘सबका साथ, सबका विकास सबका प्रयास’’। सबके साथ में भ्रष्टाचारी भी तो शामिल है, जिनकी भागीदारी इस कारण से शायद आवश्यक हो गई। ‘‘जब गंगोत्री ही मैली है, तो गंगा मैली क्यों न होगी’’। सरकार पर यह आरोप भी लगता है कि ईडी की यह कार्रवाई का समय निश्चित रूप से ‘‘राजनीति’’ से प्रेरित होकर पक्षपात पूर्ण है। क्योंकि ईडी, इनकम टैक्स, सीबीआई की कार्रवाई सिर्फ विपक्षी नेताओं पर (लगभग 95 प्रतिशत से ऊपर) हो रही है। वह भी विशुद्ध कानूनन् न होकर राजनीतिक गठजोड़ फायदा नुकसान के हिसाब से सत्तारूढ़ पार्टी के इशारां पर हो रही है, यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित दिखता भी है। अब तो इस ‘टूल’ में ‘‘भारतीय स्टैट बैंक’’ को भी शामिल कर लिया गया है जो इलेक्ट्राल बॉड के मामले में उच्चतम न्यायालय में सीबीआई के रूख से बिलकुल सिद्ध होता है।       

केजरीवाल का सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन प्रांरभ से ही दोहरा चरित्र व झूठ का आवरण ओढ़े हुए गुजरते समय के साथ विवादित भी रहा है। ‘‘राजनीति में नहीं आऊंगा’’। ‘‘कांग्रेस से कोई समझौता नहीं करूगा’’ आदि-आदि। ‘‘चंचल नार की चाल छिपे नहीं’’। तथापि शासकीय सेवाकार्य उत्कृष्ट, उज्जवल रहा है। मात्र ‘आरोपी’ हो जाने के आधार पर दागी सांसदों से इस्तीफा मांग कर सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले केजरीवाल की स्वयं की पार्टी के अधिकांश विधायक व मंत्रियों पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हो चुके हैं (62 में से 35 विधायकों पर)। बल्कि कुछ तो जेल के अंदर काफी समय से हैं। बावजूद इसके किसी भी दागी/आरोपी विधायक द्वारा न तो स्वयं इस्तीफा दिया गया और न ही मंत्रियों के बर्खास्त करने का काम केजरीवाल ने किया। काफी समय तक जेल में रहने के बाद मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया। केजरीवाल स्वयं देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री बन गये, जिन्हें मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए गिरफ्तार किया गया है। इसके पूर्व तीन अन्य मुख्यमंत्रियों लालू प्रसाद यादव, जयललिता एवं हेमंत सोरेन जिन्होंने गिरफ्तार होने के पूर्व इस्तीफा दे दिया था, के विपरीत केजरीवाल ने जेल से ही सरकार चलाने की घोषणा की है। 

केजरीवाल को अपनी गलती सुधारते हुए ‘‘नैतिकता का सम्मान’’ करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर ‘‘एक नदी के भांति अपनी राह खुद बनाने वाले’’ अपनी गिरती छवि को सुधारने के अवसर को जाने नहीं देना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि केजरीवाल एक पढ़े लिखे राजनीति की नई ईबारत लिखने वाले एक ऐसे सफल राजनेता बन गये कि इतने कम समय में उन्होंने जो राजनैतिक उंचाईयां व सफलता प्राप्त की है ऐसी कोई मिसाल विगत कुछ दशकों में देखने को नहीं मिली है। दबंग व्यक्तित्व के धनी दृढ़ता से अपने से उंचे हिमालय पर बैठे नेताओं को तर्क से जवाब देकर सामना करने की हिम्मत आज कल कम ही नेताओं में दिखती है। इसीलिए आज उन्हें इस बात पर जरूर अंतर्मन से विचार करना चाहिए कि ‘‘इंडिया अग्रेस्ट करप्शन’’ मंच के उनके पुराने साथी जिन्होंने अन्ना आंदोलन में केजरीवाल के साथ भाग लिया क्योंकि वे बाबा रामदेव, किरण बेदी, कुमार विश्वास, प्रशांत भूषण, राजेन्द्र सिंह, पीवी राजगोपाल, आशुतोष, योगेन्द्र यादव, स्वामी अग्निवेश आदि एक-एक करके छोड़कर चले गये। इंडिया अगेंस्ट करप्शन का झंडा उठाकर उक्त आंदोलन से उपजी ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के शीर्ष चार नेताओं की भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार होकर जेल में अभी तक रहने से व विधायकि से इस्तीफा न देने के कारण इसे गिरती राजनीति की नैतिकता का निम्नतम स्तर ही माना जायेगा।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि यदि राजनीति से भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना है, तो आपको राजनीति से दूर रहकर ही तंत्र को बदलना होगा और यह तभी बदल पाएगा जब तंत्र का जनतंत्र का एक-एक जन इस दिशा में देश को नई दिशा देने के लिए बिना किसी राजनीतिक प्लेटफार्म के कुछ करने के लिए तत्पर होकर कार्य करने के लिए खड़ा हो जाएगा। इस बात को समझने के लिए अन्ना आंदोलन के समय केजरीवाल के भाषण की इन लाइनों को पढ़ लीजिए! ‘‘इस कुर्सी के अंदर कुछ न कुछ समस्या है, जो भी इस कुर्सी पर बैठता है, वह गडबड़ हो जाता है। तो कहीं न ऐसा तो नहीं कि जब इस आंदोलन से कोई विकल्प निकल गए और वे लोग जब कुर्सी पर जाकर बैठेंगे, तब वो भी कहीं भ्रष्ट न हो जाए ये, भारी चिंता है हम लोगों के मन में’’।

केजरीवाल की तत्समय की मन की चिंता आज स्वयं उन पर ही फलीभूत होते हुए दिख रही है।

रविवार, 10 मार्च 2024

लोकतंत्र की हत्या रोकने के लिए संविधान का अतिक्रमण?

लोकतंत्र पर लगे ‘‘अभूतपूर्व काले दाग’’ को मिटाने के लिए ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय!

‘‘निर्णय की तथ्यात्मक गलतियां’’ 

उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू की परिकल्पना के अनुरूप विश्व प्रसिद्ध फ्रांसीसी वास्तुकार ‘‘ली कार्बजियर’’ द्वारा डिजाइन की गई 20वीं सदी का देश का नया बना शहर चंडीगढ़ के मेयर चुनाव को लेकर उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की गई थी। 5 फरवरी को पहली बार हुई सुनवाई के दौरान माननीय मुख्य न्यायाधीश ने कहा ‘‘क्या इस तरह से चुनाव कराए जाते हैं’’? यह लोकतंत्र का मजाक है, हत्या है। क्या चुनाव अधिकारी का ऐसा बर्ताव हो सकता है’’। ’हम हैरान हैं! इस ‘‘शख्स पर केस चलना चाहिए’’। यह सब आश्चर्य मिश्रित ‘‘कठोर कथन’’ कहकर उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय को इस बात के लिए भी हड़काया कि ऐसे मामले में अंतरिम आदेश पारित क्यों नहीं किये गये? 

सबसे ‘‘आश्चर्यजनक बात’’ यह भी रही कि बिना किसी शक-शुबहा के लोकतंत्र की हत्या होते देखने के तथ्य से सहमति दर्शाने के बावजूद उच्चतम न्यायालय ने स्वयं भी ऐसा कोई ‘‘अपेक्षित आदेश’’ न्याय के लिये पारित नहीं किया। इस प्रकार कहीं न कहीं तथ्यों पर स्वयं के पर्यवेक्षण (ऑब्जरवेशन) एवं निष्कर्षानुसार कार्रवाई न करके प्रथम दृष्ट्वा उच्चतम न्यायालय की गलती प्रतीत होती है। उच्चतम न्यायालय द्वारा संपूर्ण न्याय देने की प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 142 में निहित व्यापक विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए और विधान को परे रखकर कौन-कौन सी गलतियां उच्चतम न्यायालय ने की हैं, जैसा कि एक उदाहरण ऊपर दिया गया है। इसकी विवेचना की जानी आवश्यक है। ख़ास तौर से इस सिद्धांत को देखते हुए कि कोई भी संस्था या व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो ग़लती न करता हो। ‘‘चांद को भी ग्रहण लगता है’’। 

पहले यह समझना आवश्यक है कि संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग सामान्यतः विशिष्ट कानून के अभाव में अथवा कानून में अपूर्णता या कमी होने के कारण उपचार के लिए न्याय हित में अत्यंत आवश्यक और अपरिहार्य होने पर ही किया जाता है। यहां पर उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश न दिए जाने के कारण एक ‘‘एसएलपी’’ (विशेष अनुमति याचिका) उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी! प्रथम गलती उच्चतम न्यायालय की तब हुई, जब उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय को फटकारने के बाबजूद अंतरिम आदेश न देकर याचिकाकर्ता को त्वरित सहायता प्रदान न करते हुए 15 दिन बाद प्रदान की! इस कारण से 30 जनवरी को अवैध रूप से चुना गया महापौर 18 फरवरी तक कार्यरत रहा, जब तक उसने पद से (वह भी परिस्थितियों वश) इस्तीफा नहीं दिया, क्योंकि चुनाव अधिकारी ने परिणाम घोषित होते ही उसे तुरंत चार्ज दिलवा दिया था। क्योंकि ‘‘तकल्लुफ में है तक़लीफ़ सरासर’’। 

उच्च न्यायालय के आदेशानुसार की गई चुनावी प्रक्रिया की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग का अवलोकन करने पर पता चला कि पीठासीन चुनाव अधिकारी अनिल मसीह वैधानिक एवं लोकतांत्रिक रूप से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने कर्तव्य के निर्वहन में न केवल असफल दिख रहे थे, बल्कि कहीं न कहीं ‘‘कूट रचित’’ (फोर्जरी) करते हुए भी दिखाई दे रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने उक्त कथित अपराध कदाचार एवं न्यायालय के समक्ष गलत बयानी के लिए न्याय चुनाव अधिकारी के विरुद्ध रजिस्टर को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के अंतर्गत तीन हफ्ते का कारण बताओ सूचना पत्र देने के आदेश भी दिए। याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं चुनाव अधिकारी के विरुद्ध कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज न करवाना और फिर दायर एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) में इस तरह की सीधी कोई मांग न करने के बावजूद उच्चतम न्यायालय का उक्त निर्देश कितना ‘‘न्यायोचित’’ है?, यह दूसरा प्रश्न है। तीसरा देश की सर्वोच्च न्यायालय की इस तरह की टिप्पणियों के बाद अधीनस्थ न्यायालय में चुनाव अधिकारी के खिलाफ आगे की जाने वाली कार्यवाही क्या प्रभावित नहीं होगी? 

सबसे बड़ा प्रश्न यहां यह उत्पन्न होता है कि चंडीगढ़ मामले में उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक व कानूनी नजरिये से चंडीगढ़ के निर्वाचित महापौर का चुनाव अवैघ घोषित कर हारे हुए उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित कर, जिसकी स्पष्ट मांग याचिका में नहीं थी, क्या कानून व नियम का पूर्ण रूप से पालन किया है? देश के न्यायिक इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ है। इस प्रश्न का संवैधानिक व कानून की दृष्टि से सूक्ष्म विवेचन किया जाना आवश्यक है। बावजूद इस तथ्य के उच्चतम न्यायालय ने अंततः पीड़ित पक्ष को राहत प्रदान की और लोकतंत्र की जो हत्या निर्वाचन अधिकारी ने तथ्यों के विपरीत परिणाम घोषित कर की थी, उसका इलाज कर लोकतंत्र की सुचिता को बनाये रखकर सुरक्षित किया।

उच्चतम न्यायालय का उक्त आदेश निम्न कारणों से संविधान@कानून का पालन करते हुए दिखाई नहीं देता है। तथापि अंतिम निर्णय निश्चित रूप से तथ्यों के आधार पर सही है। अन्यथा ‘‘चंदन धोई मछली पर छूटी ना गंध’’ की उक्ति चरितार्थ होना लाजमी है। आप जानते है, हमारे देश में कोई भी ‘‘चुनाव’’ गलत प्रक्रिया अपनाये जाने पर अथवा चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का उपयोग किये जाने पर उक्त निर्वाचन को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का प्रावधान है। क्योंकि सामान्यतया एक बार चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ हो जाने पर गलत रूप से नामांकन को स्वीकार या अस्वीकार कर दिया जाये, तब भी चुनावी प्रक्रिया रोकी नहीं जाती है, बल्कि ‘‘चुनाव परिणाम’’ को ही चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। ऐसा कानूनी प्रावधान है। 

चंडीगढ़ चुनावी प्रक्रिया को समय समय पर विभिन्न कारणों से उच्च न्यायालय मे चुनौती दी गई थी, जिनमें एक कारण समय पर चुनाव न कराना, चुनाव तिथी एक बार तय हो जाने बाद लम्बी अवधि के लिए स्थगित कर देना, एक पार्षद को अवैध रूप से हिरासत में रखने से मुक्ति के लिए, राजनीतिक पार्टी से संबंधित व्यक्ति की चुनाव अधिकारी के रूप में नियुक्ति आदि! उच्च न्यायलय द्वारा दिए गये अंतरिम स्थगन आदेश को अस्वीकार करने के विरूद्ध दायर चुनाव याचिका में उच्चतम न्यायलय ने केन्द्र व चंडीगढ़ प्रशासन एवं अन्य पक्षों को नोटिस देने के साथ निर्वाचन के समस्त रिकार्ड अपने समक्ष प्रस्तुत किये जाने के निर्देश देते हुए दो सप्ताह बाद की तिथि निश्चित की। उच्चतम न्यायालय ने भी तुरंत अंतरिम स्थगन आदेश पारित नहीं किया। मतलब उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव याचिका का निपटारा नहीं हुआ था, मात्र अंतरिम स्थगन आवेदन का निराकण हुआ था, जिसके विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गई थी। यह तो वही बात हुई है कि ‘‘जल की मछलियां जल में ही प्यासी’’। यहां एक उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि उच्च न्यायालय में दायर याचिका में याचिकाकर्ता ने पुनः चुनाव किये जाने की प्रार्थना की थी, खुद को विजयी घोषित करने की नहीं। 

मतलब उच्चतम न्यायालय के सामने स्थगन आदेश आवेदन पर आदेश पारित करने का मामला था। चूंकि यहां पर उच्चतम न्यायालय की नजर में चुनावी धांधली आईने के समान स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रही थी और हारे हुए आदमी को जीता हुआ दिखा दिया, यह स्पष्ट है। तब उच्चतम न्यायालय ने बजाय स्थगन आदेश देने के, तथा उच्च न्यायालय को याचिका के गुण-दोष के आधार पर आदेश पारित करने के निर्देश देने की बजाए, स्वयंस्फूर्त रूप से अपील को अंतिम रूप से ही निर्णित कर दिया, जो याचिकाकर्ता की मांग ही नहीं थी। इस प्रकार स्पष्ट रूप से उच्चतम न्यायालय द्वारा एक कानूनी@तथ्यात्मक गलती की और एक गलत परिपाटी डाली गई! 

यद्यपि यह जरूर कहा जा सकता है कि न्याय देने के लिए गलत परिपाटी डाली गई! उच्चतम न्यायालय की दूसरी महत्वपूर्ण गलती दिख रही है, पुलिस जांच अधिकारी के समान न्यायालय भी तथाकथित आरोपी जो जब तक प्रतिवादी था, से प्रश्नोंत्तर करने लगी और जब उसके बाद एक प्रतिवादी के रूप मे प्रस्तुत किये गये व्यक्ति को उच्चतम न्यायालय प्रथम दृष्टिया आरोपी ठहरा देता है, तब सुनवाई के समय अधीनस्थ न्यायालय स्वतंत्र निर्णय दे पायेगा, उसके लिये ‘‘तत्ता कौर न निगलने का न उगलने का’’ वाली स्थिति तो उत्पन्न नहीं हो जायेगी? बड़ा यक्ष प्रश्न यह है? यह उच्चतम न्यायालय का ही बनाया हुआ नियम व सिद्धांत है कि ‘‘न्याय न केवल मिलना चाहिए, बल्कि मिलते हुए दिखना भी चाहिए’’। कहते हैं कि ‘‘जंह पांच पंच तंह परमेश्वर’’, यहां पर उच्चतम स्तर पर किये गये आदेशानुसार बनाये जाने वाले आरोपी के साथ न्याय हो पायेगा? अधीनस्थ न्यायालय स्वतंत्र रूप क्या निर्णय ले पायेगी? सबसे महत्वपूर्ण गलती यह रही कि बहस के दौरान उच्चतम न्यायालय का यह कथन कि हम हॉर्स ट्रेंडिंग नहीं होने देंगे। यह कहीं से कहीं तक चुनाव याचिका का भाग नहीं था, लेकिन चुनाव याचिका के दायर होने के बाद और सुनवाई के एक दिन पूर्व महापौर के इस्तीफा देने व 3 पार्षदों के द्वारा दल-बदल करने के कारण उक्त स्थिति का भी संज्ञान लिया गया लगता है, जो याचिका की विषय वस्तु नहीं थी। तब मसीह के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के साथ मसीह के ‘‘मसीहा’’ का पता लगाने की जांच के आदेश भी दिए जा सकते थे? 

ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उसके पास उपलब्ध असीमित अधिकार को अनुच्छेद 142 के अधीन सही ठहराने के बजाय चुनाव याचिका के लिए बने कानून में आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, क्योंकि ‘‘कड़े गोश्त के लिए पैने दांतों की ज़रूरत होती है’’। ताकि इस तरह की स्थिति पैदा होने पर ऐसे प्रत्येक मामले में त्वरित व तुरंत निर्णय लेने में निम्न न्यायालय सक्षम हो सकंे। यह निर्णय कानून की सीमाओं से ऊपर उठकर न्याय की कुर्सी पर बैठे न्यायाधीपति के साहस व उनके विवेक पर ज्यादा निर्भर करता है। इसलिए यदि ‘‘न्याय तंत्र’’ की मूल कमियों को भविष्य में दूर नहीं किया गया तो, उस पर बैठा हुआ न्यायाधीश आज के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ जैसा साहसी नहीं हुआ तब ऐसे निर्णय नहीं आ पायेगें, और फिर न्याय न तो ‘न्यायिक’ और न ‘अन्यायिक’ तरीेके से आ पायेगा?

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

अनेकता में एकता नहीं!

‘‘अनैतिकता’’ में एकता

विश्व में भारत देश की पहचान के रूप में एक कथन अभी तक कहा जाता रहा है ‘‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेकता में एकता भारत की पहचान है’। यह बात या नारा भिन्न भिन्न संस्कृति, धर्म, जाति, भाषा, बोली, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान, रंग-रूप आदि को लेकर कही जाती रही है। परंतु अब समय आ गया है कि लगता है कि उक्त कथन में हल्का सा संशोधन कर ‘‘अनेकता’’ की जगह ‘‘अनैतिकता में एकता’’ कर दिया जाना चाहिये। दुर्भाग्य वश, देश की सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र व पार्टियों में ही नहीं बल्कि जीवन के समस्त क्षेत्रों में यह एक नई पहचान बन गई है। नैतिकता की तो ऐसी गत हो गई है कि ‘‘करो तो सबाब नहीं, न करो तो अजाब नहीं’’। शायद इसीलिए अनीतिकता से भरिपूर्ण इसी राजनीति के लिए यह कहना पड़ जाता है कि राजनीति के ‘‘इस हमाम में हम सब नंगे हैं’’। इसीलिए तो कहा जाता है कि स्वयं कांच के घर में रहने वालों को दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेकना चाहिए। 

देश की राजनीति में ‘‘नैतिकता के पतन’’ का सबसे बड़ा और नंगा नाच (उदाहरण) वर्ष 1970-80 के दशक में कांग्रेस के युग में हुआ था, जब विपक्ष की पूरी की पूरी सरकार ही भजनलाल के नेतृत्व में गैरकांग्रेसी से ‘‘कांग्रेसी’’ हो गई। ठीक उसी प्रकार बल्कि उससे भी अभी तक का सबसे विकृत रूप  हाल में ही हुए चंडीगढ़ मेयर के चुनाव में अनैतिकता का अकल्पनीय अप्रीतम उदाहरण देखने को मिला, जहां ‘‘रक्षक ही भक्षक’’ होकर लोकतंत्र को इतना तार-तार कर दिया गया कि उच्चतम न्यायालय तक को कहना पड़ गया कि यह तो ‘‘लोकतंत्र की हत्या’’ है। वह जमाना था, लोहिया के ‘‘गैर कांग्रेसवाद’’ का, जिसका विस्तार संविद (संयुक्त विधायक दल) शासन के रूप में हो रहा था। परन्तु तब कांग्रेस ने भी अपने पूरे सत्ता काल में अनुच्छेद 356 का बार-बार दुरुपयोग करते हुए चुनी गई सरकारों को हटाकर 77 बार राष्ट्रपति शासन लागू करके कौन सी नैतिकता का परिचय दिया था? तत्समय नैतिकता की दुहाई देने वाली जनसंघ पार्टी अपना राजनीतिक सफर प्रारंभ कर जनता पार्टी से होकर आज वह विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी ‘‘भारतीय जनता पार्टी’’ के रूप में स्थापित हो गई है। ‘‘पार्टी विद द डिफरेंस’’, ‘‘सबको परखा-हमको परखो’’ का नारा देकर सत्ता में आते ही उसने भी वही ‘‘अनैतिकता की कैंची’’ की धार को ‘‘तेज’’ कर सरकारों को पलटाया है, जिसकी पहले वह नैतिकता का पाठ पढ़ाकर, झंडा उठाकर आलोचना करती रही है। 10 साल के एनडीए के शासनकाल में 8 से अधिक सरकार (गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र आदि) जिन्हें ‘‘जनादेश’’ नहीं मिला था, उसी अनैतिकता के धारदार औजार का उपयोग कर जनादेश के विपरीत अपनी सरकार बनाई व विपक्षी सरकार गिराई। इन 10 सालों में विभिन्न पार्टियों में 740 से अधिक विधायक व सांसद भाजपा में शामिल कराये गये। 

ऐसा नहीं है कि भाजपा ने नैतिकता के मापदंड को उच्चतम स्तर पर कभी नहीं रखा हो। परंतु वह जमाना ‘‘अटल-आडवाणी की भाजपा’’ का था। जब अटल बिहारी वाजपेई ने नैतिकता के मापदंड के उच्चतम स्तर को बनाए रखने के लिए मात्र एक वोट के खातिर अपनी सरकार की बलि देने में हिचक नहीं की थी। अटल बिहारी वाजपेई का लोकसभा में दिया गया भाषण का वह कथन आज भी भी दिलों दिमाग में गूंजता है, ‘‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी जाएंगी। लेकिन देश का लोकतंत्र बने रहना चाहिए’’। जबकि उसके पूर्व झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों की खुल्लम-खुल्ला खरीद फरोक कर कांग्रेस ने पी वी नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार बचाई थी। अटल बिहारी वाजपेई के चाणक्य कहे जा सकने वाले प्रमोद महाजन भी ऐसा ही अनैतिक कार्य करके सरकार को बचा सकते थे। परंतु अटल बिहारी वाजपेई ने ऐसा होने नहीं दिया। जबकि पार्टी के विस्तार के लिए सत्ता में बने रहने के लिए मजबूरी में आवश्यक बुराई के रूप में उक्त हल्का सा अनैतिक कदम उठाया जा सकता था, जिसकी पार्टी की आज की वर्तमान मजबूत स्थिति में बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। यह था नैतिकता का उच्चतम मापदंड। आज की राजनीति में नैतिकता की अपेक्षा करना अंधों की दुनिया में आईना बेचने के समान हो गया है।

ताजा मामला हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक घटनाक्रम का है। राजनीति के शतरंज के शह-मात के खेल में अनैतिकता के ‘‘शह’’ को ‘‘मात’’ अनैतिकता ने ही दे दी। हंसी तब आती है, जब पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर विधानसभा में तथाकथित रूप से बजट पारित होने के बाद ‘‘लोकतंत्र व नैतिकता की दुहाई’’ की बात करते हैं। निश्चित रूप से देश की राजनीति का यह शायद पहला उदाहरण है, जहां दोनों ही पक्षों ने अनैतिकता को साध्य ही नहीं बल्कि साधन भी बना लिया। ‘‘मानों अंधेरे घर में सांप ही सांप’’। परंतु प्रश्न यह है कि यहां पर अनैतिकता का खेल प्रारंभ किसने किया? विपक्षी दल भाजपा ने विधानसभा में कोई अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया था, बल्कि राज्यसभा चुनाव की वोटिंग के समय कांग्रेस के 6 विधायकों को अनैतिक रूप से तोडा जाकर, उन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बल की सुरक्षा में हरियाणा में पंचकूला के सेक्टर एक पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में रखा गया। क्या यह नैतिक कदम था? 

यह कहा जा सकता है कि चुने गए प्रतिनिधियों के बाजार की मंडी में जब कोई बिकने के लिए आया है, तो उसमें बोली लगाने अथवा खरीदने वाली की गलती क्या है? परंतु प्रश्न यह है कि मंडी में स्वेच्छा से स्वतः आया अथवा लाया गया? यदि वे स्वेच्छा से आए तो फिर उन्हें उन्मुक्त कर स्वतंत्र क्यों नहीं रहने दिया गया? अर्धसैनिक बल की सुरक्षा में दूसरे राज्य क्यों ले जाया गया? इसलिए जयराम ठाकुर को सरकार गिराने में असफल होने की खींच निकालने के लिए नैतिकता की दुहाई व लोकतंत्र की हत्या करने का कोई नैतिक अधिकार बनता नहीं है, बचता नहीं है। ‘‘कमली ओढ़ लेने से कोई फकीर नहीं हो जाता’’। जिस अनैतिकता से सरकार गिराने का प्रयास हिमाचल प्रदेश में किया गया, कमोबेश उसी अनैतिकता का उपयोग कर सरकार बचाने का प्रयास  सफल भी हुआ। इसी को कहते है ‘‘जैसे को तैसा’’ (टिट फॉर टेट)। विधानसभा अध्यक्ष ने जिस तरह से विपक्षी भाजपा के 15 विधायकों को निलंबित कर बजट पारित करवाया, निश्चित रूप से वह संसदीय मर्यादाओं का घोर उल्लंघन और अनैतिक है। परंतु संसदीय कार्यप्रणाली में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। हां अनैतिकता ही अनैतिकता पर भारी पड़ गई, ऐसा पहली बार हुआ है। लगता है कुएं में ही भांग पड़ी हुई है। क्योंकि इसके पूर्व अधिकांश मामलों में एक पक्ष को ही अनैतिकता के हथियार का उपयोग करने का अवसर मिलता था, दोनों पक्षों को नहीं। झारखंड में ‘‘ऑपरेशन लोटस’’ असफल होने के बाद भाजपा के लिए यह दूसरा झटका है। यद्यपि वहां पर इस तरह की अनैतिकता का टेस्ट नहीं हो पाया था, क्योंकि ऐसा करने का अवसर ही उत्पन्न नहीं हो पाया था।

कहा भी गया है ‘‘लोहा लोहे को काटता है’’, ‘‘डायमंड कटस डायमंड’’। इसीलिए राजनीति में निश्चित सफलता के लिए आज अनैतिकता की काट नैतिकता नहीं, बल्कि उससे भी बड़ी अनैतिकता हो गई है। गांधी जी का यह सिद्धांत आज की राजनीति में पूरी तरह से खोखला हो गया है कि ‘‘साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए’’।

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