मंगलवार, 30 नवंबर 2021

कहीं तीनों कृषि कानून की वापसी का "मास्टर स्ट्रोक" आत्मघाती गोल न सिद्ध हो जाए?

प्रधानमंत्री के इस आश्चर्यचकित  व किसानों के माथे पर 1 साल से उमरी चिंता की लहरों को समाप्त करने वाली वाले  का एक दूसरा पहलू भी है, (जैसा कि  सिक्के के दो पहलु होते है) जिस पर राजनीतिक दल टिप्पणी कर सकते हैं। आंदोलन के लम्बे समय तक चलने के कारण उत्पन्न थकान, हताशा व निराशा की अवस्था में मुख्य मांग के अप्रत्याशित अचानक स्वीकार हो जाने पर उसका स्वागत न करने का मतलब क्या निकलता है? मांग मानो तो मुश्किल और न मानो तो भी मुश्किल? बिलकुल "भ‌ई गति सांप छछूंदति केरी" वाली स्थिति है। मतलब क्या आंदोलन अंतहीन चलता जाए? यदि किसानों की नजर में 700  से ज्यादा किसान मरे (शहीद?) हैं, तो क्या आंदोलन के अंतहीन चलते  देने की स्थिति में उनकी संख्या 7000 हो जाए और विपक्ष को दिन प्रतिदिन प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने के लिए टीवी चैनलों में बहस में आने का मौका मिले सके? आपको यह अधिकार है, प्रधानमंत्री से पूछिए जिस किसान आंदोलन को अपने आंदोलनजीवी परजीवी किसान कहा था। जिन्हें टिकड़े टुकड़े गैंग, माओवादी, नक्सलियों, खालिस्तानियों और आतंकवादियों तक करार कर दिया गया था, जिसे देशव्यापी आंदोलन न मानकर मात्र बॉर्डर तक सीमित बताया गया। जिनको किसान न मानकर छद्म किसान बतलाया गया और न जाने क्या-क्या? राजनीति में इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। परंतु सत्ताधारी पार्टी के नेताओं द्वारा उपरोक्त सब अलंकारों से आंदोलन को अंलकिृत-विभूषित करने के बावजूद प्रधानमंत्री ने किसानों की मूल प्रमुख मांग को स्वीकार कर किसानों व देश के हित में दरियादिली का ही परिचय दिया है। तब किसान व देश हित में निर्णय होने के कारण विपक्ष को अपना आलोचना कर अधिकार सुरक्षित रखते हुये उसका कम से कम औपचारिक रूप से तो स्वागत करना था? जो नहीं हुआ। सही है, "पेट के रोगी को घी नहीं पचता"। चूंकि प्रधानमंत्री ने उक्त *अलंकारों को वापस लिए बिना, तथाकथित पाकिस्तानी चीनी प्रेरित किसान आंदोलन की मांग स्वीकार कर ली हो, तब  इसक क्या अर्थ निकाला जाए? हमेशा के समान  आलोचक गण  अपना पूर्ण दायित्व निभाने में कहां चूक करते हैं ? अतः निर्णय की आलोचनाएं भी बहुत हुयी। ‘‘बहुत देरी से लिया गया निर्णय है’’। कहावत भी तो इसीलिए है ‘‘देर आयद दुरुस्त आयद’’। ‘‘न्याय में देरी न्याय को अस्वीकार करने के समान है’’  न्याय के इस सिद्धांत को यहां इस राजनैतिक निर्णय पर लागू नहीं किया जा सकता है। 

विपक्षी दल यह प्रश्न अवश्य उठा सकते हैं  कि यह निर्णय राजनीति से प्रेरित होकर लाभ-हानि को देखते हुए लिया गया है। और यदि ऐसा है भी तो इसमें नई बात कौंन सी है? हर राजनीतिक पार्टी अपने लाभ-हानि को देखते हुए ही तो कदापि देशहित के नाम पर निर्णय लेती है, नहीं लेती है अथवा अनिर्णय की स्थिति होती है। चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में। एक बात पत्थर की लकीर के समान हमेशा से लिखी हुयी है कि कोई भी आंदोलन की पूरी 100 प्रतिशत मांगे न तो स्वीकार होती है न और ही स्वीकार योग्य होती है। आंदोलन खत्म करने में दोनों पक्ष को एक कदम आगे व दो कदम पीछे उठाने ही होते है।

प्रधानमंत्री के इस निर्णय को राजनैतिक चर्चाओं में एक तरफ पाच राज्यों में होने वाले आगामी आम चुनावों खासकर उत्तर प्रदेश और पंजाब की विधानसभाओं के चुनाव को दृष्टिगत करते हुए राजनैतिक दूरदर्शिता लिए हुए होना बतलाया जा रहा है। इस कारण किसान आंदोलन से भाजपा को जो संभावित नुकसान पहुचने की आंशका का अनुमान किया गया हैं, उसकी क्षतिपूर्ति हो सके। इस निर्णय से प्रधानमंत्री की मजबूत छवि वाली नेता की स्थिति में देश में ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कहीं न कही आंच पहुंची हैं। इसके अतिरिक्त कहीं न कहीं किसान आंदोलन के संबंध में केन्द्रीय सरकार से निर्णय लेने हुई देरी की चूक अवश्य हुई है। यदि 11 दौर की हुई बातचीत के दौरान ही सिर्फ  एमएसपी जिसे स्वयं सरकार लंबे समय से मान रही है, पर कानून का आवरण चढ़ाने की मांग को यदि स्वीकार कर लिया जाता जिससे  सरकार को कुछ भी नुकसान नहीं था। क्योंकि निश्चित मात्रा की एमएसपी पर खरीदी की मांग तो किसी भी पक्ष द्वारा नहीं की गई थी जिस से आर्थिक भार बढ़ सकता था ।  अतः  आंदोलन निश्चित रूप से तभी समाप्त हो जाता। और आज संसद द्वारा पारित तीन कानूनों को वापिस लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती जो सीमांत किसानों के हित में है। और इतनी बड़ी हुई जनहानि से भी बचा जा सकता था। इससे सरकार की किरकिरी भी हुई हैं। 

कानूनों को वापिस लेते समय  पार्टी व सरकार ने यह दावा किया है कि यह कानून किसानों के हित मे है और अधिकांश किसान लोग इस कानून से सहमत है। मात्र किसानों के एक वर्ग को सरकार संतुष्ट नहीं कर पायी। यदि एक वर्ग को संतुष्ट करने के लिए बहुसंख्यक की उपेक्षा की जाकर कानून को समाप्त किया जाता है तो न केवल यह देश में नई  परिपाटी को जन्म देगी बल्कि भविष्य में यह देश के लिए खतरनाक परिपाटी भी सिध्द हो सकती हैं। संसद जब कानून बनाती है, तो देश का कोई भी कानून ऐसा नहीं कि उसके दुरूपयोग की संभावना विद्यमान न हो या सब जनो को संतुष्ट किया जा सकें। परंतु कोई भी कानून दुरूपयोग की आंशका के चलते या संतुष्टि के आधार पर न तो रद्द किया जाता है, न ही उसे बनाने से रोका जाता है।

प्रमुख मांग के मान लेने के बाद इस आंदोलन में किसकी जीत हुई है और किसकी हार हुई है, इसे कोई भी पक्ष स्वीकार करने को तैयार नहीं है। सिवाएं अन्नदाता सामान्य किसान आंदोलनकारी जिन्होंने मिठाई खाकर और फटाखे फोड़कर अपनी खुशी का खुलकर इजहार किया है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि "देयर इज़ नो रोज़ विदाउट ए थ्रोन" अर्थात जहां फूल होते हैं वहां कांटे भी होते हैं। शीर्षस्थ किसान नेताओं ने इस तरह की कोई खुशी जाहिर नहीं की और न ही भाजपा नेताओं, प्रवक्ताओं ने प्रधानमंत्री के इस निर्णय का मिठाई खाकर, खि़लाकर व पटाखे फोड़कर स्वागत किया है, जैसा कि वे अन्यथा हमेशा करते आए हैं। मतलब साफ है, जैसा कि हमेशा से चला आ रहा है, हर महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे नीति कम, राजनीति, स्वार्थनीति और पार्टी के हित आगे व सर्वोपरि होते है। तीनों कृषि कानूनों बिल को वापिस लेने के निर्णय पर आयी प्रतिक्रियाओं और  निर्णयो से यह स्पष्ट हो जाता हैं।

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद किसान संघर्ष समिति की दो बार हुई बैठक में लिये गये निर्णय से यह आंशका बलवती होती जा रही है कि प्रधानमंत्री का उक्त कहे जाने वाला मास्टर स्ट्रोक कहीं आत्मधाती गोल में न बदल जाए अथवा "वाटरलू न सिद्ध हो जाए" ? जिस उम्मीद को लेकर प्रधानमंत्री ने ऐतिहासिक और न्यायोंचित निर्णय की घोषणा  इस आशा पर की थी कि किसान व संयुक्त किसान मोर्चा उक्त निर्णय से आत्मविभोर व हर्षित होकर प्रधानमंत्री की घर वापसी की अपील को मानकर आंदोलन का तंबू उखाड़ लेंगे। परन्तु ऐसा लगता है कि "चूल्हे से निकले और भाड़ में गिरे"। एक गवैया (गांव वाला) कहे जाने वाला किसान नेता टिकैत ने ऐसी लगड़ी मारी कि केंद्र सरकार को उफ तक करने का मौका नहीं मिल पा रहा है। प्रारंभिक रूप से प्रधानमंत्री  के निर्णय का स्वागत करते किसम ने हुये आंदोलन वापिस लेने से इंकार कर दिया, जब तक कि टेबिल पर बैठकर  एमएसपी पर कानून व अन्य मुद्दों पर कोई बातचीत नहीं होगी  तब तक आंदोलन पूर्णतः चलता रहेगा। संयुक्त किसान मोर्चा के इस निर्णय से भाजपा "आगे कुआं पीछे खाई" की स्थिति में आ गयी और उसकी मानो "पैरों तले जमीन खिसक गई"। 

जिस  हाबड़ तोड़ तरीके से प्रधानमंत्री ने निर्णय की घोषणा की उसमें उनकी कुछ त्रुटियों साफ-साफ दृष्टिगोचर होती है, जिससे अपेक्षित परिणाम मिलने पर आशंका के बादल छा गए। पहली  सीधे श्रेय लेने व देने के चक्कर में संयुक्त किसान मोर्चा के साथ सरकार की चर्चा कराये बिना ही टीवी के माध्यम से एक तरफा घोषणा कर किसम को श्रेय न दे देने के चक्कर में किसानों को सीधे श्रेय देने का असफल प्रयास किया। यदि टेबल पर बातचीत में उक्त निर्णय लिया जाता तो समस्त मुद्दों पर सहमति बन कर संयुक्त विज्ञप्ति द्वारा निर्णय की घोषणा की जाती तो सकिम को इधर-उधर बगले झांकने का मौका नहीं मिल पाता । दूसरा उनके द्वारा इस आंदोलन में मारे गये किसान व उनके परिवारों के प्रति श्रंद्धाजलि व सहानुभूति के  दो शब्द भी न कहना सबसे बड़ी भूल सिद्ध हो गई। तीसरा आंदोलित किसानों की इस आंदोलन से हुई आर्थिक बरबादी के लिए व शहीद हुये किसानों को न तो अभी तक कोई मुआवजा मिला और न ही कोई घोषणा कृषि कानून वापसी के निर्णय  के साथ हुई।  प्रधानमंत्री एक और गलती यह भी रही कि इन तीनों कानून से जो छोटे कृषको  को  फायदे होने की बाद जो  वे लगातार कह रहे है व अभी भी कानून समाप्ति की घोषणा  के समय पर भी कर रहे  है, अब उन कानूनों की समाप्ति के बाद उन फायदे की पूर्ति किस तरह से होगी, इसका कोई  वैकल्पिक सुझाव या उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपने 18 मिनट के भाषण में कहीं  नहीं किया । अंतिम गलती  एक साल से धूप, ठंड बरसात मैं रोड पर बैठे किसानों के परिवार खासकर महिलाओं के  जज्बे के प्रति एक शब्द भी न बोलना। ये सब अल्प  छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कारण संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री की उक्त घोषणा के उपर ज्यादा प्रभावी हो गए लगते हैं। जिससे आम किसान घोषणा से सहमत होता हुआ खुशी का इज़हार करने के बावजूद किसान नेताओं के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाया। इसलिए ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री अपने उद्देश्यों को पाने में पिछड़ रहे है, जो एसकेएम के लिए गए निर्णयो से झलकता भी है।

              इस एक निर्णय का एक बहुत ही खतरनाक मैसेज  प्रधानमंत्री पर अल्पसंख्यको के तुष्टीकरण के आरोप प्रधानमंत्री लगने के रूप में हो सकता है, जो आरोप भाजपा अन्य दलों पर हमेशा से लगाती चली आ रही है। कहते हैं, "कालस्य कुटिला गति:",  प्रधानमंत्री जब स्वयं कहते है कि अधिकांश किसान कृषि बिल से सहमत है, मात्र एक वर्ग को हम संतुष्ट नहीं कर पाये। उनकी संतुष्टि के लिए पूरा कानून वापिस लिया जा रहा है। मतलब साफ है अल्पसंख्यको का तुष्टिकरण ही तो हुआ । अल्पसंख्यक का मतलब जाति विशेष से नहीं बल्कि बल्कि संख्या बल से होता है । यही सिंद्धान्त यहां पर लागू होता है।

    प्रियंका गांधी का "विषकुम्भम् पयोमुखम्" के अनुरूप  प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहना कि  एक साल से अधिक दिनों तक जब किसान संघर्ष कर रहे थे, और 700 से अधिक किसानों की शहादत हो गई तब अब माफी किस बात की ? तब मोदी को कोई परवाह नहीं थी। उनका यह कथन दोहरी राजनीति से प्रेरित ही नहीं बल्कि शिकार है। शायद वे यह भूल गई है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुये उनकी हत्या पर पूरे देश में हुये सिख दंगों में हजारों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतारा गया था। तब कई सालों बाद पूरे गांधी परिवार व कांग्रेस पार्टी ने देश से मांफी मागी थी। 

              जब राकेश टिकैट  यह कहते कि सरकार हमें बातचीत के लिए बुलाये तभी बातचीत कर घर वापसी पर विचार होगा निरर्थक हो जाता है जब स्वयं प्रधानमंत्री ने पूर्व में हुई सर्व दलीय बैठक में कहा था कि कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर किसान से केवल एक फोन दूर है। वह एक फोन दूर ही रह गया। न तो किसान ने और न ही प्रधानमंत्री ने निर्णय लेने के पूर्व उक्त एक फोन करने की आवश्यकता समझी।

          अंत में  एक दिलचस्प बात उभर कर आती है। जब तीनों कृषि कानून पारित किए गए तब यही कहा गया कि यह किसानों के व्यापक हित में है। जब इन कानूनों को वापस लेने का निर्णय की घोषणा की गई, तब भी यही कहा गया यह किसानों के हित में  लिया गया निर्णय है। इससे भी ज्यादा मजेदार बात यह रही कि कानून को वापस लेते समय भी कानूनों को गलत न बतलाते हुए उनके गुणों का उल्लेख करते हुए किसानों के हितो में बताया गया । ताली दोनों हाथों से बजती है लेकिन यहां पर एक हाथ से ताली बजा कर उपरोक्त तीन तीन अर्थ निकल कर मोदी है तो मुमकिन है कथन को सिद्ध ही किया है। प्रधानमंत्री द्वारा  बिना एहसान  लादे यही कर्तव्य का निर्वाह गली तेरी करते हुए किसानों को मिठाई खाने खिलाने व पटाखे फोड़ने का अवसर देने के बावजूद सकम द्वारा आगे के तयशुदा  आंदोलन को  स्थगित  कर प्रधानमंत्री के निर्णय की सकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकते थे परंतु एक कदम भी  टस से मस हुए बिना खुशी बनाना किस चरित्र का द्योतक है ? एहसान फरामोसी नहीं तो क्या ? यही भारतीय राजनीति की विशेषता व चरम उत्कर्ष है। वैसे इस वापसी निर्णय और उस पर हुई प्रतिक्रिया ने इस मुहावरे को गलत सिद्ध कर दिया है कि मुंह (गाल) फुलाना और मुस्कुराना एक साथ नहीं होता है ।

मंगलवार, 23 नवंबर 2021

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘‘मास्टर स्ट्रोक’’? तीनों कृषि कानून की वापसी!

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी शायद अभी तक के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं, जो अचानक कड़क और राहत देने वाले निर्णय अपने साथियों को आभास हुये बिना आसानी और विनम्रता से दृढ़ता पूर्वक ले लेते हैं, फिर चाहे वह रात्रि (08 बजे नोटबंदी) या कोविड-19 के कारण लागू राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा (08 बजे) अथवा सुबह ( 09 बजे कृषि कानून की वापसी की घोषणा) का समय हो। नोटबंदी के बाद अब संसद द्वारा पारित हुये तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा ऐतिहासिक होकर नरेंद्र मोदी का यह एक और मास्टर स्ट्रोक है। ‘‘ऐतिहासिक’’ इसलिये कि इस देश में शायद इसके पूर्व कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि संसद द्वारा पारित विधेयक के कानून बन जाने के बाद उसे इंप्लीमेंट (लागू) किए बिना रद्द करने की घोषणा प्रधानमंत्री द्वारा की गई हो। यद्यपि वर्ष 2015 में भूमि अधिग्रहण कानून जो संसद द्वारा पारित कानून न होकर अध्यादेश द्वारा लागू किया गया कानून था, संसद में पारित कराने के असफल प्रयास के बाद सरकार को चार बार जारी अध्यादेश को वापस लेना पड़ा था। मास्टर स्ट्रोक होने का यह कदापि मतलब नहीं है कि देश की संपूर्ण जनता एकमत से उसे स्वीकारें, समर्थन करें व ताली बजाए। कई बार परिस्थितियों का बराबर आकलन न कर पाने की स्थिति में अथवा निर्णय को लागू करने वाली तंत्र की विफलता के कारण, कई बार ऐसे होता है, जब जिस उद्देश्य के लिए, निर्णय लिये जाते है वे उक्त कारणों से पूर्णतः सफल नहीं हो पाते हैं। जब ‘‘मास्टर ब्लास्टर’’ मास्टर स्ट्रोक (छक्का) मारता है, तो जरा सी भी ताकत स्ट्रोक में कम लगने पर वह सीमा पर कैच होकर आउट हो जाता है। यही स्थिति राजनीति में प्रधानमंत्री द्वारा मारे गए मास्टर स्ट्रोक की भी है।

किसानों की सबसे प्रमुख मांग संसद द्वारा पारित तीनों कानूनों को वापस लेने के लिये लगभग एक साल (360 दिन) से चले विश्व का सबसे लम्बा अहिंसक व शांतिप्रिय किसान आंदोलन में अचानक ही आज एक सुखद मोड़ तब आया जब ‘‘गुरु’’ ‘‘प्रकाश’’ पवित्र पर्व गुरूनानक जयंती पर ’बिना किसी शर्त के या बातचीत के (जो 11वीं दौर की होने के बाद 12 जनवरी से बंद थी) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बिना किसी पूर्व सूचना के डी.डी.न्यूज (मीडिया) के माध्यम से देश के नागरिकों को संबोधित करने हुये क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन व पवित्र हृदय से अपने स्वभाव व कार्यशैली के विपरीत, प्रशंसनीय लचीलापन दिखाते हुए, किसानों की उक्त प्रमुख मांग स्वीकार करने की घोषणा करते हुए यह कहा कि ‘‘शायद हमारी तपस्या में कुछ कमी रही होगी जिस कारण से हम कुछ किसान भाइयों को प्रकाश जैसा सत्य नहीं समझा पाए’’। यह कहकर प्रकाश पर्व की महत्ता को ईशारे में इंगित किया। साथ ही प्रधानमंत्री ने यद्यपि एक नई शुरुआत की उम्मीद करते हुए किसानों से अपने-अपने घर और गलियारों में लौटने की अपील की, तथापि उन्होनें इस आंदोलन में 700 से भी ज्यादा मृत व्यक्तियों व परिवारो के लिए व किसानो की एक साल के आंदोलन में झुलसे कड़क तपस्या के लिए एक शब्द भी सहानुभूति में नही कहा।

यह विनम्रता व भावुकता ली हुयी घोषणा 56 इंच का सीने लिये, एक दृढ़, कड़क प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति ही कर सकता हैं। प्रधानमंत्री द्वारा आंदोलित किसानो की सबसे महत्वपूर्ण मांग के विनम्रतापूर्वक स्वीकार करने के बाद कम से कम संघर्षशील सयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं सहित समस्त राजनैतिक नेताओं को उक्त घोषणा का पहली प्रतिक्रिया में ही स्वागत करते हुये प्रधानमंत्री को धन्यवाद जरूर देना चाहिए था। धन्यवाद के साथ यदि-परन्तु-लेकिन-किंतु लगाते हुये अन्य लम्बित मांग को पूरा करने की मांग भी की जा सकती है। परन्तु देश की वर्तमान में गलाकाट व एक दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति के चलते, इस शिष्टाचार को निभाने में प्रायः सभी असफल रहे। वस्तुतः इस देश का राजनीतिक वातावरण अब इतना खराब हो चुका है कि परस्पर विचारों का आदान-प्रदान का होना, बिना वैमनस्य व निम्न शब्दों के (गिरते स्तर के कारण) होना, परस्पर जीवंत सम्पर्क रखना, लगभग असंभव सा हो गया है। मौजूदा राजनैतिक पस्थितियों परस्पर अविश्वास लिये व सिर्फ स्वयं के राजनैतिक हित साधक लिये हो गयी है कि यदि आपके विरोधी राजनीतिज्ञ आपको प्लेट में चांदी की एक (वर्क) परत लगाकर मिठाई प्रस्तुत करें, तब भी आप उसे खाकर धन्यवाद देने की बजाय उस चांदी की (वर्क) परत पर शक करने लग जाते हैं कि कहीं यह नकली होकर नुकसानदायक तो नहीं है? विरोधियों द्वारा किया अच्छा कार्य के लिए पीठ थपथपाने वाला बड़ा दिल अब ढूंढो नहीं मिलता हैं। देश की प्रगति में सबसे बड़ा रोड़ा ऐसी ही कुत्सित विचारों के प्रवाह का होना है। 

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रारंभिक टिप्पणी किसान नेता राकेश टिकैत की रही जो यद्यपि ‘‘सकिम’’ अध्यक्ष नहीं हैं, (अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी हैं) तथापि किसान आंदोलन का सबसे प्रमुख चेहरा बने हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का औपचारिक अभिवादन कर धन्यवाद दिये गये बिना कहा कि बिना बातचीत किसान वापिस घर नहीं लौंटेंगे। वे अपने पूर्व कथन (लगातार) को भूल गए कि ‘‘कानून वापसी के बाद घर वापसी होगी‘‘ लगभग एक साल (360 दिन) से चल रहे इतने बड़े किसान आंदोलन जिसमे 700 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई हो, का नेतृत्व करने वाले नेता से कदापि यह उम्मीद नहीं की जा सकती है। राकेश टिकैत का यह भी कहना रहा कि यह प्रधानमंत्री की यह मीडिया के सामने घोषणा है, संसद में नहीं। प्रधानमंत्री का सार्वजनिक रूप से किसी निर्णय की घोषणा लगभग संसद में दिए गए घोषणा के समान ही प्रभावी होकर बंधनकारी जैसी ही होती है। ऐसा कोई उदाहरण किसान नेता या विपक्षी दल नहीं बता सकते है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से कोई कानून को बनाने की या खत्म करके या अन्य कोई कार्य करने की घोषणा की हो, जो बाद में झूठी सिद्ध हुई हो। तथापि घोषणाओं को धरातल पर उतारने में समय अवश्य लग सकता है। राकेश टिकैत आगे प्रश्न उठाते हुये कहते है कि क्या नरेंद्र मोदी संसद से ऊपर है? उनका यह अर्थहीन प्रश्न मामले को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास मात्र है। प्रधानमंत्री निश्चित रूप से संसद से ऊपर नहीं है, लेकिन उस संसद के एक प्रमुख भाग जरूर है जिसने किसानों के हित में तीनों कानून पारित किये थे। निश्चित रूप से किसम (किसान संघर्ष समिति) को प्रधानमंत्री की इस घोषणा का फौरी तौर पर तुरंत स्वागत करना चाहिए था। जरूर वे यह कह सकते हैं कि हम संघर्ष समिति की बैठक तुरंत बुलाकर प्रधानमंत्री की आंदोलन समाप्त कर घर-खलियान वापसी की अपील पर निर्णय लेंगे। क्योंकि इस तरह के आंदोलनों को चलाने वाली संघर्ष समितियों में संयोजक/अध्यक्ष विचार विमर्श किये बिना व सहमति के बिना किसी निर्णय की घोषणा नहीं कर सकते हैं, किसी भी आंदोलन के ये मूल तत्व होते हैं। क्योंकि एक व्यक्ति के एक गलत निर्णय से आंदोलन को हानि पहुंच सकती है। 

शनिवार, 20 नवंबर 2021

कंगना जी ‘‘वचन’’ का पालन कर पद्मश्री को वापस कर दीजिये!


‘‘टाईम्स नाउ’’ न्यूज चैनल को दिये गये एक लम्बे इंटरव्यू में अपने विवादास्पद बयानों के कारण हमेशा सुर्खियों में रहने वाली फिल्मी कलाकार कंगना रनौत ने कहा कि ‘‘1947 में भीख में मिली आजादी ‘‘आजादी’’ कैसे हो सकती है। वह भीख थी, आजादी नहीं। असली आजादी 2014 में मिली’’। उक्त कथन पर देशव्यापी, सर्वव्यापक आलोचना होनी ही थी, जो सही भी है। उक्त कथन पर आयी प्रतिक्रियाओं व आलोचनाओं पर कंगना ने सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर बचाव में एक पोस्ट किया। इस पोस्ट में एक कदम आगे बढ़कर कंगना ने कहा कि ‘‘1947 में कौंन सा युद्ध हुआ मुझे नहीं पता! ‘‘अगर मुझे कोई बता सकता है तो अपना पद्मश्री वापस कर दूंगी और माफी भी मागूंगी। कृपया मेरी इसमें मदद करे’’। 

एक (तथाकथित अबला) महिला जो मदद की गुहार कर रही हो (यद्यपि जिनको पहले से ही भारत सरकार ने ‘‘वाय प्लस’’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की है), उनकी मदद करना एक भारतीय नागरिक का कर्तव्य हो जाता है। इसलिये कंगना जी, निश्चित रूप से में न केवल आपकी निशुल्क मदद करने को तैयार ही नहीं हूं, बल्कि तुरंत ही आगे मदद भी कर रहा हूं। अर्थात आपके प्रश्न का आपको संतुष्ट करने वाला और समधानकारक उत्तर दे रहा हूं। गणतंत्रीय भारत देश स्वतत्रं देश है या नहीं, यह तो प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने वाली कंगना ही बता पायेगी? लेकिन इस देश की युगों-युगों से चली आ रही भारत देश भारतीय संस्कृति में भगवान राम, दानवीर कर्ण, राजा हरिश्रचंद्र जैसे अनेक महान विभूतियां हुई हैं, जिन्होंने ‘‘प्राण जाए पर वचन न जाये’’ को अक्षरसः मानते हुये अपने दिये गये वचनों को पूर्ण किया। उम्मीद है, आपको संतुष्ट करने वाला उत्तर अर्थात आपके निरुत्तर होनेे पर आप भी अपने वचनों का अवश्य पालन करेगी। अर्थात् देश से माफी मांग कर अपने कथनानुसार पद्मश्री अवश्य वापस कर देंगी।

आइये, सर्वप्रथम उन्होंने ‘‘टाईम्स नाउ’’ से बातचीत में क्या-क्या प्रमुख बातें कहीं तथा उनका सार व अर्थ क्या है? उन्होेंने साफ तौर पर कहा कि वर्ष 1947 में मिली आजादी भीख थी, और असली आजादी 2014 में मिली है। इस पर आयी प्रतिक्रियाओं पर इंस्टाग्राम में की गई पोस्ट में वे कहती ‘‘1947 की भौतिक आजादी हो सकती है, अर्थात् शारीरिक आजादी हमारे पास थी। एक मृत सभ्यता जीवित हुई। परन्तु 2014 में देश की चेतना व विवेक मुक्त हुई है’’। मतलब क्या अटलजी के शासन में भी विवेक व चेतना मुक्त नहीं हुई थी? इसका भी तो जवाब तो दीजिये कंगना जी? उन्हे याद दिलाना होगा कि 1977 में आपातकाल हटने के बाद तत्समय उसे दूसरी आजादी बतलाया गया था। तब भी आपातकाल में हुये अत्याचार के विरूद्ध देश का विवेक जाग्रत हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी की पहली सामूहिक लड़ाई 1857 में शुरू हुुई थी। उन्होंने गांधीजी पर तंज कसते हुये आलोचना करते हुए कहा कि आजाद हिंद फौज की छोटी सी लड़ाई, राष्ट्रवाद के साथ उत्पन्न ‘‘राईट विंग’’ भी लड़कर ले सकती थी और सुभाष चंद्र बोस पहले प्रधानमंत्री बन सकते थे। क्यों आजादी को कांग्रेस के कटोरे में ड़ाला गया? गांधीजी पर तंज कसते हुये उन्होेंने कहा ‘‘दूसरा गाल देने से भीख मिलती है, आजादी नहीं।’’

उनके समस्त शब्दों व कथनोें को पढ़ने-सुनने से यह बात अपने आप में बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि वे अत्यधिक भ्रमित (कन्फ्यूज्ड) होकर स्वयं को ही अपनी उलूल-झूलूल बातों में उलझा रही हैं। जब वह यह कहती हैं कि ‘‘1947 में कौंन सी लड़ाई लडी’’? तब उनको यह समझाना होगा व उन्हें समझना भी होगा कि स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई सिर्फ सैनिक युद्ध से ही नहीं जीती जाती है, वरन् उसके बिना भी हो सकती है व हुयी हैं। कालांतर में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन सैनिक युद्ध न होकर एक जन आंदोलन व राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हुआ। अंततः देश ने 15 अगस्त 1947 को जो स्वाधीनता प्राप्त की वह बातचीत के टेबल पर ही प्राप्त हुई थी, दान में दी गई भीख नहीं थी।

कंगना रनौत में इस बात की समझ होनी ही चाहिए (यदि नहीं है तो इतिहास की किताबें पढ़ ले) कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन 1 दिन या 1 वर्ष अर्थात सिर्फ वर्ष 1947 का ही नहीं था, जैसा कि कंगना ने पूछा कि 1947 में कौंन सा युद्ध हुआ था? कंगना की बात को शाब्दिक रूप से सही मान भी ले कि यदि 1947 में कोई लड़ाई नहीं हुई तो आजादी कैसे? तब वे यह भी बतलायें कि वर्ष 2014 में कौन सा युद्ध हुआ? कौन सी लड़ाई लड़ी गई, जिस कारण से वे 2014 में आजादी मिलने की बात कह रही है।

कंगना जब वर्ष 1947 में आजादी नहीं मिलने की बात कह रही हैं, तब फिर उन्होंने 1947 में काैंन सी आजादी को कांग्रेस के कटोरे में ड़ालने की बात कर गंाधी जी की आलोचना की? यदि ‘‘आपकी’’ नजर में वर्ष 2014 में ही असली आजादी मिली, तो वर्ष 2014 को स्वतंत्रता वर्ष या कोई नया स्वतंत्रता दिवस घोषित करने के लिए आप आगे क्यों नहीं आई? कांग्रेस को ‘‘कटोरे में मिली आजादी’’ द्वारा बनाया गए संविधान को बदल कर नया संविधान लागू करने पर ‘‘स्वतः संज्ञान’’ ‘आपने’ क्यों नहीं लिया गया? इन प्रश्नों का जवाब कंगना को देना होगा। 

दूसरा प्रश्न 1947 में मिली आजादी को कांग्रेस के कटोरे में तथाकथित रूप से ड़ालने से क्या हमारी आजादी समाप्त हो जाती? क्या उस आधार पर आजादी पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है? ‘‘आखिर आजादी आजादी है’’। और कंगना जी यह 1947 की आजादी ही है जो 2014 के बाद भी चली आ रही है, जहां आप मुक्त भाव से निड़र होकर निरतंर निर्भीक बोल रही है। आपके उलूल-झूलूल बयानों से न केवल देश के महत्वपूर्ण समय का अपव्यय हो रहा है बल्कि मेरा भी समय आपकी बकवास का जवाब देने में जाया हो रहा है। इसीलिए आपके टीवी इंटरव्यू, इंस्टाग्राम द्वारा आए विचारों से असहमत भाजपा सहित देश की लगभग समस्त पाटियों व बुद्धिजीवियों ने आलोचना कर विरोध दर्ज कराया है। तथापि कंगना के समर्थन में सोशल मीडिया में एक मेसेज चल रहा है, जहां पर कंगना को सच (तथाकथित?) बोलने के साहस के लिए यह कहकर समर्थन किया जा रहा है कि भारत आजाद देश न होकर आज भी राष्ट्र मंडल का सदस्य है। 

यदि यह मान भी लिया जाए कि तथ्यात्मक रूप से उक्त आधार सही है, तो वर्ष 2014 के बाद तथाकथित रूप से मिली आजादी (कंगना के शब्दों में) के बाद भी भारत राष्ट्रमंडल देशों के समूह का सदस्य बना हुआ है। यदि 1947 में आजादी नहीं बल्कि मात्र सत्ता का हस्तांतरण हुआ है, जैसा कि सोशल मीडिया में दुष्प्रचारित किया जा रहा है, तो वर्ष 2014 में क्या हुआ? 

स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन और देश का बंटवारे होने में कांग्रेस और उन्हे नेताओं की भूमिका की आलोचना जरूर की जा सकती है। बहुत से मुद्दों को लेकर उनके समक्ष प्रश्नों का जंजाल खड़ा किया जा सकता है। परंतु देश को स्वतंत्रता या आजादी निश्चित रूप से 1857 के गदर युद्ध से प्रारंभ होकर आजाद हिंद फौज (जिसने आक्रमण कर अंग्रजों से कुछ प्रदेश मुक्त कराये थे) के नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे गरम दल व कांग्रेज जैसे नरम दल और मंगल पांडे, भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, खुदीराम बोस, सुखदेव थापर, शिवराम राजगुरू, अशफाक उल्ला ख़ाँ बटुकेश्वर दत्त जाने माने अनेक क्रांतिकारियों के संयुक्त व सामूहिक योगदान से ही प्राप्त हुई है। और वह भी 15 अगस्त 1947 को ही। इस ऐतिहासिक तथ्य को कंगना को अपने दिल दिमाग में अच्छी तरह से फिट कर दिमाग को दुरूस्थ कर लेना चाहिये।

आज कंगना ने पुनः अपनी छपास आदत व हेड़लाइंस हंटर (जैसा कि टाइम्स नाउ के एंकर ने उपाधी भी दी) के चलते महात्मा गांधी को भी सत्ता का लोभी बता कर उनका अपमान किया है। कंगना को शायद राष्ट्रपिता और राष्ट्रपति में अंतर का ज्ञान नहीं है। महात्मा गांधी देश के राष्ट्रपिता है, राष्ट्रपति नहीं, जो सत्ता का प्रतीक होता है। यद्यपि यदि वे चाहते तो सत्ता पर जरूर आसीन हो सकते थे। बावजूद सत्ता त्याग करने वाले, सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले महात्मा को सत्ता का भूखा कहना स्वयं को मूर्ख सिद्ध करना ही है। देश के नागरिकों को स्व-स्फूर्ति अब आगे आकर गंभीर रूप से सोचना होगा कि पिछले कुछ समय से कुछ बयानवीरों के इस तरह के आये राष्ट्र विरोधी व देश की अंखड़ता को खंडि़त करने का प्रयास करने वाले बयानों की बाढ़ को रोकने के लिए ऐसे प्रभावी कड़क कानून बनाए जाएं जिनके खौंफ व ड़र से लोग व्यक्तिगत और प्रेस की स्वतंत्रता का इस तरह दुरुपयोग कर देश की आजादी को खंडित करने का प्रयास न कर सकें। कंगना के उक्त कथन उनकी विक्षिप्त मानसिकता को ही दर्शाते है। अतः उनका मानसिक इलाज पूर्ण होने तक उनकी भारतीय नागरिकता निलंबित कर देनी चाहिये।

अंत में कंगना रनौत के प्रश्न का यही जवाब है कि उनका प्रश्न बकवास पूर्ण है, अर्थहीन अर्थात निरर्थक व तथ्यों के बिल्कुल परे होकर उनकी आदत के मुताबिक मात्र एक जुमलेबाजी ही है। यह बात उन को अच्छी तरह से इस लेख के द्वारा समझा दी गई है, यदि वे जरा सी भी समझदार हैं और समझना चाहती हैं तो?। इस तरह उनके इस प्रश्न का उत्तर इस प्रश्न को समाप्त करने में ही निहित है, जो इस लेख के माध्यम से किया गया है।

शनिवार, 13 नवंबर 2021

‘‘.....’’ ‘‘ब्राडिंग’’ ने ‘‘महंगाई डायन’’ न होकर आज के जीवन की ‘‘आवश्यक बुराई’’ के रूप में ‘‘स्वीकार्यता’’ हो गई है।

‘‘पीपली लाईव’’ (वर्ष 2010) फिल्म का पेट्रोल-डीजल सहित महंगाई पर यह गाना ‘‘सखी सईया तो खूब ही कमात है महंगाई डायन खाये जात है’’, यूपीए सरकार के समय भाजपा ने बहुत गाया था। यद्यपि काफी समय पूर्व वर्ष 1974 में मनोज कुमार की फिल्म ‘‘रोटी कपड़ा और मकान’’ का महंगाई पर यह गाना भी बहुत प्रसिद्ध हुआ था ‘‘एक हमें आपकी लड़ाई मार गई, दूसरी ये यार की जुदाई मार गई, तीसरी हमेशा की तन्हाई मार गई, चौथी ये खुदा की खुदाई मार गई, शक्कर में ये आटे की मिलाई मार गई, पाउडर वाले दूध दी मलाई मार गई, राशन वाले लैन की लम्बाई मार गई, जनता जो चीखी, चिल्लाई मार गई, बाकी कुछ बचा, तो महँगाई मार गई’’ कहने का मतलब यही है। इस देश में महंगाई चुनावी राजनीति में हमेशा बड़ा मुद्दा रही है। पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के विरोध में अटलजी, स्मृति ईरानी सहित विरोध के प्रतीक बैलगाड़ी, साइकल, सिलैन्ड़र, पद यात्रा आदि एक ही समान रहे, सिर्फ झंडे़-डंडे अलग रहे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में महंगाई के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस सरकार को बुरी तरह से घेरा और सत्ता प्राप्त करने में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा भी रहा। सुषमा स्वराज्य के नेतृत्व वाली भाजपा की दिल्ली सरकार महंगाई पर महंगे प्याज के निकले आंसूओं से पलट गई। परन्तु आज वास्तव में महंगाई राजनीति में कोई मुद्दा रह गया है क्या? बड़ा प्रश्न है? ऐसा लगता है, जिस प्रकार भ्रष्टाचार राजनीति में बकलोल (बकवास करने) के अलावा कोई मुद्दा नहीं रह गया है, ठीक उसी प्रकार महंगाई की भी आज यही स्थिति हो गई है। सिवाए पान ठेले चौराहों पर आपसी बातचीत व गपशप कर चर्चा तक ही सीमित हो गयी है।

उक्त उत्पन्न सोचनीय स्थिति का सबसे बड़ा कारण आज की राजनीति में जो ब्राडिंग की राजनीति जिसकी शुरूवात वर्ष 2014 से प्रारंभ हुई, का हावी होना हैं। इस कारण से आम नागरिकों की अनचाहे ही महंगाई की अप्रिय स्थिति को आवश्यक बुराई के रूप में मजबूरी में स्वीकार करने की सी मनः स्थिति हो गई है। क्योंकि दिन प्रतिदिन बढ़ती महंगाई के विरोध में वैसा उग्र विरोध, प्रर्दशन का कोई भी प्रयास विपक्षी राजनैतिक पाटियों का अथवा जनता के स्तर पर उस तरह का देखने को नहीं मिलता है, जो यूपीए सरकार के समय बढ़ती महंगाई को लेकर भाजपा बढ़-चढ़ कर करती रही थी। उसका एक बड़ा कारण भाजपा जब विपक्ष में थी, तो उसे विरोध कर सजग विपक्ष की भूमिका अदा करने का खेल बखूबी आता था। जिस कारण वह सत्ता के शिखर पर भी पहुंची। परन्तु कांग्रेस के सालोें साल तक सत्ता पर रहने के कारण उत्पन्न ‘‘अलाली व दलाली’’ ने और पूर्व में विरोध का अनुभव न होने कारण कांग्रेस सक्षम विरेाधी पक्ष की भूमिका का निर्वाह करने में लगभग असफल ही रही है। यह स्थिति तब है, जब आज जनता के बीच जाने के लिए मुद्दों की कोई कमी नहीं है। यद्यपि भाजपा आंकड़ों के सहारे यह दावा जरूर कर रही है कि महंगाई की दर जो यूपीए सरकार में थी, तुलनात्मक रूप से वह अभी कम ही है। वर्ष 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आयी तब उपभोक्ता महंगाई दर (सीपीआई) (कन्जूमर प्राइस इंडेक्स) 9.4 थी जो लगभग प्रत्येक वर्ष घटकर 2015 (5.9), 2016 (4.9) 2017(4.5), 2018 (3.6), 2019 (3.5) तक कम हुई, तथापि कोरोना काल 2020 (7.27) व 2021 में (5.3) अवश्य हो गई है। भाजपा महंगाई कम करने के दावे को इस आधार पर भी ताकत से कह रही है कि जनता का विरोध प्रत्यक्षतः सामने लगभग नगण्य ही है, जो सत्य भी है। बावजूद, महंगाई का यह मुद्दा इस समय ज्यादा परेशान करने वाला इसलिए है कि खाद्य तेल, सब्जियों व पेट्रोलियम उत्पाद के भाव काफी बढ़े हुये है, जब आम जनता कोविड काल में हुई परेशानियों से आर्थिक रूप से परेशान होकर भुगत रही है। 

आगे अभी सिर्फ बात पेट्रोलियम उत्पाद की दरों में हुई बढ़ोत्री को लेकर ही करते हैं। वर्ष 2021 में जून से अभी तक 48 बार मूल्यों में वृद्धि होकर लगभग 12 रू. से ज्यादा की वृद्धि पेट्रोल में हुई है। केंद्रीय सरकार ने पिछले वर्ष 2014 से पिछले सात वर्षो में केंद्रीय उत्पाद शुल्क क्रमशः 9.48 व 3.50 प्रतिलिटर से बढ़कर 32.90 रू. 31.80 रू. (12 से अधिक बाद बढ़ाकर) हो गया है। अब पेट्रोल-डीजल पर क्रमशः 15 रू. व 10 रू. की एक्साइज डूयटी में कमी कर देश भर में पेट्रोल में 5.72 रू. से 6.35 रू. व डीजल में 11.16 से 12.88 रू. तक की राहत देकर दीपावली उपहार कहकर न केवल जनता से पीठ थपथपाने के लिए कह रही है, बल्कि विपक्षी दलों की सरकारों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिये भी कह रही है। क्योंकि केन्द्र के निर्णय के पश्चात भाजपा एवं सहयोगी दलों द्वारा शासित 12 राज्य सरकारों और गैरभाजपाई-गैरकांग्रेसी उडीसा सरकार ने पेट्रोल व डीजल में वैट की दरें घटाकर क्रमशः लगभग 10 व 5 रू. की मूल्यों में कमी कर कांग्रेस शासित सरकारों पर नैतिक रूप से वैट कम करने के लिए दबाव ड़ाला है। परिणामस्वरूप और पंजाब विधानसभा के आगामी होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर पंजाब की कांग्रेस सरकार ने शायद इसीलिए पेट्रोल व डीजल कीमत कम की है। अभी राजस्थान सरकार ने भी दबाव झेलते हुए वैट कम कर दिया है।

भाजपा व केन्द्र सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमत कम करने के बाद ताल ठोककर कह रही है कि जब केन्द्र सरकार व उसकी सहयोगी दलों की राज्य सरकारों ने महंगाई को देखते हुये एक्साइज ड्यूटी कम कर जनता को राहत दी है, तो जो लोग महंगाई के लिए ट्वीटस् व जबानी चिल्ला-चौट कर रहे थे, वे अपने कांग्रेस शासित राज्यों में वेट की दर कम कर पेट्रोल-डीजल की महंगाई कम क्यों नहीं कर रहे है? यह उनका दोहरापन ही दिखाता है? आखिर क्या यह न्यायपूर्ण होगा कि एक तरफ केन्द्रीय सरकार उत्पाद कर बढ़ाकर तेल को महंगा कर और दूसरी ओर राज्य सरकारों से वैट की दर कम कर तेल सस्ता करने के लिए कहे। ऐसा कहते समय केन्द्र सरकार शायद यह भूल गई है कि केन्द्र के समान ही राज्य सरकारों की आय का मुख्य स्त्रोत भी पेट्रोलियम उत्पाद पर वैट (कर) ही है, अर्थात् ‘‘मीठा मीठी गप गप कड़वा कड़वा थू थू’’।

लगातार मूल्य वृद्धि के दौरान भाजपा पार्टी के प्रवक्ता, मंत्री और सरकार का अभी तक का दावा यही रहा है कि यह पैसा देश के विकास के लिए विभिन्न जनकल्याणकारी योजना में लग रहा है। देश के नागरिकों को अपना कुछ न कुछ सहयोग देश के विकास के लिए इस माध्यम से देना चाहिए। अचानक मूल्यों की यह बढ़ोत्री को रोककर उसमें कमी कर सरकार क्या यह संदेश देना चाहती है कि अब जनता के उतने योगदान की आवश्यकता नहीं है? या विकासशील योजनाओं का बजट तदनुसार कम हो जायेगा? आगे आकर भाजपा व सरकार को जवाब देना चाहिये।

राजनीति में किस बेशर्मी से आकडों को किस तरह घुमाकर स्वयं को सही सिद्ध किया जा सकता है, उक्त दावों से यह बात बिलकुल सिद्ध होती है। भाजपा व केन्द्र सरकार से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि पिछले समय में जो पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में वृद्धि हुई है, वह केंद्र सरकार द्वारा उत्पाद कर बढ़ाये जाने और सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल की ‘‘डायनामिक प्राइसिंग’’ (दिन प्रतिदिन की मूल्य निधारण) नीति के कारण ही हुई है? अथवा राज्य सरकारों के द्वारा वेट की दर बढ़ाने के कारण हुई? जब इस अवधि में राज्य सरकारों ने वेट की दर नहीं बढ़ाई, तब इस पूरी की पूरी पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में वृद्धि केंद्र सरकार की नीति के कारण ही तो हुई है। इसीलिए यदि केंद्र सरकार ने पिछले 1 वर्ष के भीतर लगभग 30 रू से अधिक मूल्य बढ़ाकर 10 कम कर दिया तो वास्तव में यह क्या मूल्यों में कमी या छूट कहलायेगी? इस आधार पर राज्य सरकारों को आप नैतिक रूप से कैसे गलत ठहरा कर वेट की राशी कम करने का नैतिक दबाव ड़ाल सकते है। भाजपा शासित राज्यों ने भी हाईकमान का अनुसरण करते हुये ही वैट की राशी कम की, जिसमें जनता को राहत देने के उद्देश्य गौंण रहा है। क्योंकि यदि जनता को वास्तव में राहत देने की प्राथमिकता होती तो केन्द्र सरकार की पहल के पहले ही इन राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में वैट की दर कम क्यों नहीं की, जो अभी की? मतलब साफ है तेल नीति में मूल्य नीति के साथ राजनीति भी की जा रही है। नीति अथवा जनहित की राजनीति नहीं?  

जब तक केंद्र सरकार अंतिम बार जब राज्य सरकारों द्वारा पेट्रोल-डीजल पर बढ़ाये गये वैट के दिन के स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमत नहीं ले आती है, तब तक केन्द्र को राज्यों को वैट कम करने का बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। कहा भी गया है, ‘‘तेल देखो, तेल की धार देखो’’। यहां तो तेल (गाडियों के) इंजनों में जल कर खर्च होकर जनता का तेल निकल रहा है। उसकी महंगाई की आंच से उसका पेट जल रहा है, और कंठ सूख रहा है। कांग्रेस शासित राज्य कह रहे है कि केंद्र अपनी एक्साइज ड्यूटी को पुरानी दर पर लाये तभी वे उस पर सोचेगें। तो, क्या लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों का अपने राज्य के नागरिकों के प्रति यह दायित्व नहीं है कि व पेेट्रोल-डीजल के बढ़ते मूल्य को अपने अधिकार क्षेत्र में लागू वैट की दर कम कर राहत प्रदान करे? क्या जीएसटी लागू होने के पूर्व राज्य सरकारें विभिन्न मालों पर जब छूट देती थी, तब क्या वह सेंट्रल एक्साइज डूयटी कम होने पर ही देती थी? कांग्रेसी राज्य सरकारों को इसका जवाब देना चाहिए? जब ऐसा नहीं था, तब अपने दायित्व को निभाने व असफल होने पर केंद सरकार पर आरोप मढ़ने का प्रयास क्यों?  

अंत में वर्ष 2010 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने प्रथम बार पेट्रोल की कीमतों को अपने नियत्रंण से मुक्त करते हुये उनकी कीमतों का निर्धारण तेल कंपनियों के पाले में ड़ालकर बाजार के हवाले करते हुये यह कहा था कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (क्रुड़ ऑयल) के दाम बढ़ने पर उपभोक्ताओं पर भार ड़ाला जायेगा और सस्ता होने पर होने पर उपभोक्ता को इसका लाभ मिलेगा। इसे डायनमिक प्राइसिंग कहा गया। अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने डीजल की कीमत को भी नियत्रंण मुक्त कर दिया। परन्तु वास्तव में दाम कम होने पर उपभोक्ता को प्रायः कभी भी लाभ नहीं मिला (तथापि मार्च 2021 में तीन बार कटौती अवश्य हुई) और बाजार मूल्य बढ़ने पर दाम बढ़ने की नीति भी हमेशा लागू नहीं रही। अर्थात् यह आधिकारिक सैद्धांतिक स्थिति मात्र है। धरातल पर वास्तविक रूप से पूर्णतः उतरी हुई नहीं है। दिन-प्रतिदिन, हफ्ता-पखवाड़ा, इजाफा, पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में होने वाली वृद्धि चुनावी समय में अवकाश लेकर अचानक रूक जाती है, यह हम सबने देखा है। फिर चाहे वह बिहार (सितंबर-अक्टूबर 2020) अथवा बंगाल चुनाव (मार्च-अप्रैल 2021) का समय हो। इसलिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि पेट्रोल-डीजल का मूल्य निर्धारण वास्तव में कौंन कर रहा है?

बुधवार, 3 नवंबर 2021

आपराधिक न्यायिक व्यवस्था में ‘‘आमूलचूल परिवर्तन’’ का समय नहीं आ गया है?

हमारी आपराधिक दांडिक न्याय व्यवस्था मुख्य रूप से आपराधिक दंड संहिता 1973 एवं भारतीय दंड संहिता 1860 पर ही निर्भर है, जो हमारे देश में ब्रिटिश भारत के समय से चली आ रही हैं। यद्यपि दंड प्रक्रिया संहिता 1861 को वर्ष 1973 में बदलकर नई दंड प्रक्रिया संहिता 1973 लागू की गई। परन्तु भारतीय दंड संहिता 1860 की ही चली आ रही है। हमारी न्यायिक दंड प्रणाली का मूल सिद्धांत है, न्याय न केवल सहज, सरल, सुलभ व शीघ्रताशीघ्र मिलना चाहिए, बल्कि ऐसा होते हुये दिखना भी चाहिए। अर्थात वास्तविकता के साथ परसेप्शन का भी होना अत्यंत आवश्यक है। क्या वर्तमान में ऐसा हो रहा है? दोनों ही बातें हमारी वास्तविकता व परसेप्शन न्याय से काफी दूर हो गई है, खासकर आम लोगों से तो न्याय बहुत ही दूर हो गया है। और हम अब भी ‘‘लकीर के फकीर‘‘ बने हुए हैं। प्रसिद्ध फिल्मी कलाकार, सेलिब्रिटी शाहरुख खान के ‘‘लख्ते जिगर शहजादे‘‘ आर्यन खान के साथ दो अन्य अभियुक्त को आज जमानत स्वीकृत होने पर यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक है।

पिछले 25 दिनों से जेल में बंद आर्यन को मुम्बई उच्च न्यायालय ने आज जमानत पर छोड़ने  के आदेश दिए । एक जमानतीय अपराध जैसा कि विस्तृत तर्क किया गया जिसमें जमानत देने के अधिकार कानूनी रूप से एनसीबी के जांच अधिकारियों के पास ही थे, लेकिन निचली अदालत से लेकर सत्र न्यायालय तक ने आर्यन के जमानत आवेदन को, तथ्यों को देखते हुये उसे जमानत योग्य न मानकर आवेदन अस्वीकार कर दिया था। अंततः मुम्बई उच्च न्यायालय ने देश के नामी गिरामी क्रिमिनल वकील सतीश मानशिंदे, अमित देसाई सहित वकीलों की फौज के साथ पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी के 3 दिन लगातार बहस करने के बाद, आज जमानत आवेदन न्यायालय ने सुनवाई के दौरान ही अचानक स्वीकार कर ली। अचानक इसलिए कि तीन दिनों तक चली बहस में जब लगभग सायं 4.45 बजे अभियोजन के वकील की बहस समाप्त हुई, तब प्रत्युत्तर में डिफेंस वकील के तर्क पूर्ण होने के पूर्व ही माननीय न्यायाधिपति ने प्रकरण आदेश बंद कर फिर अचानक जमानत दिये जाने का निर्णय दिया। विस्तृत आदेश दूसरे दिन देने के बात कही। प्रश्न यह है, इस देश के कितने शहजादे, कितने नागरिक ऐसे ‘‘अंगूठी के नगीने‘‘ हैं, जो ऐसे जमानतीय अपराधों में जहाँ न तो ड्रग्स का सेवन पाया गया और न ही खरीदी और न ही पजेशन पाया (तथापि कंस्ट्रक्टिव पजेशन का आरोप अभियोजन द्वारा जरूर लगाया गया) वहाँ जमानत पाने के लिए मुकुल रोहतगी जैसे महंगे वकीलों की सेवा प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। अन्यथा सामान्य व वरिष्ठ वकील भी निचली दोनों अदालतों में जमानत पाने में असफल रहे। 

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्रकरण में आरोपी जमानत पाने योग्य थे, तो लम्बी चौड़ी वकीलों की फौज की बहस की आवश्यकता क्या जरूरी थी। सामान्य रूप से अभी तक की प्रचलित प्रक्रिया में माननीय न्यायाधीश का कार्य केस डायरी को देखकर, दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद आदेश पारित करना होता है। परन्तु यदि प्रकरण में केस डायरी के पढ़ने के बाद न्यायाधीश यह प्राथमिक निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि प्रकरण में जमानत दी अथवा नहीं दी जानी चाहिये! तब लम्बी चौड़ी बहस के बजाए क्या न्यायाधीश का यह दायित्व नहीं होना चाहिये कि वह जमानत देने या न देने के निर्णयक प्रांरभिक निष्कर्ष पर पहंुचने पर उनके दिमाग में उत्पन्न किन्ही शंकाओं, स्पष्टीकरण व ‘‘प्रश्नों’’ पर वे संबंधित वकीलों से सीधा उत्तर मांगकर महत्वपूर्ण न्यायिक समय की बचत नहीं की जा सकती है? ‘‘कुएं में बांस डालने की‘‘ क्या जरूरत? साथ ही यह पद्धति के विकसित होने पर न्यायालयों में बड़े बड़े वकीलों की सामान्यतया आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी? इससे लोगों को सस्ता न्याय मिल सुलभ हो सकेगा।

एक जमानतीय अपराध में 25 दिन जेल में रहना अवैध रूप से अभियुक्त के स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होना ही कहलायेगा। अवैध रूप से जेल में बंद किये गये व्यक्ति के ‘‘कांटों पर लेट कर गुजारे‘‘ दिनों को उच्चतम न्यायालय कैसे वापिस ला सकता है? ‘‘गतः कालो न आयाति‘‘ अर्थात ‘‘गया समय वापस नहीं आता‘‘। न्याय व्यवस्था पर यह प्रश्न बार-बार उठता है। क्योंकि जमानत एक अधिकार है, और रिफ्यूजल (अस्वीकार) अपवाद। यह न्याय सिद्धांत स्वयं उच्चतम न्यायालय ने कई बार प्रतिपादित किया है। यद्यपि उच्च न्यायालय में एएओं अनिल सिंह का कथन यह कि एनडीपीएस एक्ट के तहत जमानत कोई नियम नहीं है। बावजूद इसके 25 दिन की गैरकानूनी रूप से जेल में बंदी एक नागरिक के स्वतंत्रता के अधिकारों के हनन के लिए कोई व्यक्ति नहीं, हमारी न्यायिक व्यवस्था ही जिम्मेदार है। यह आपको मानना ही पड़ेगा कि ‘‘कानून जनता के लिये है, जनता कानून के लिये नहीं‘‘। इसलिए इस व्यवस्था पर आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता आ गई है। 

तुलसीदास जी ने कहा है- ‘‘कष्ट खलु पराश्रयः‘‘ अर्थात ‘‘पराधीन सपनेहुं सुख मांही‘‘ अतः उच्चतम न्यायालय एवं सरकार की ओर इस बात पर गंभीर रूप से विचार किए जाने की आवश्यकता है। जमानत की प्रक्रिया व आपराधिक जांच की प्रक्रिया व गिरफ्तारी के विषय में व्यापक परिवर्तन कर एक नई क्रांतिकारी व्यवस्था (मैकेनिज्म) डेवलप करने की न्याय के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए और एक नागरिक की संविधान द्वारा प्रदान की गई स्वतंत्रता अधिकार की वास्तविक सुरक्षा के लिए नितांत आवश्यक है। जमानत आदेश के बाद जेल से छूटने में 2 दिन लग जाने के कारण जेल मैन्युअल में सुधार की बात भी सामने आई है । प्रस्तावित सुधार के संबंध में एक सुझाव आगे दे रहा हूं।

-:सुझावः-

आपको याद होगा माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने एक लैंडमार्क निर्णय में एक नागरिक की गिरफ्तारी की दशा में पुलिस ज्यादती को रोकने के लिए जांच अधिकारी को क्या-क्या कार्रवाई व सावधानी बरतनी चाहिए, उस संबंध में व्यापक दिशानिर्देश दिए थे, जिसके देशव्यापी प्रचार प्रसार के समाचार पत्रों के माध्यम से करने के निर्देश भी साथ ही जारी किए गए थे। इस प्रकार यह एक अलिखित नियम उच्चतम न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी के संबंध में बनाए गए। अपराध घटित होने पर एफ आई आर दर्ज होने के बाद एक आरोपी को गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर आगे जांच हेतु पुलिस या न्यायिक रिमांड मांगा जाता है, यह हमारी सामान्य न्यायिक प्रक्रिया है। वास्तव में मजिस्ट्रेट का यहां पर यह दायित्व होता है कि प्रस्तुत केस डायरी में उल्लेखित तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर अभियोगी को रिमांड पर दिया जाए अथवा नहीं। लेकिन वास्तविकता में यह एक अलिखित प्रक्रिया पद्धति सी बन चुकी है कि पुलिस द्वारा रिमांड मांगने पर मजिस्ट्रेट मेकेनिकल तरीके से प्रायः बिना माइंड को एप्लाई किये रिमांड दे देते हैं। यदि इस स्टेज पर मजिस्ट्रेट केस डायरी का गहन अध्ययन कर रिमांड आदेश पारित करें तो, मैं यह मानता हूं कि निश्चित रूप से 90प्रतिशत प्रकरणों में रिमांड की बजाए मजिस्ट्रेट को आरोपी को पुलिस कस्टडी से छोड़ने के आदेश देना पड़ेगा। बिना कस्टडी के अधिकांश मामलों में जांच की जा सकती है। और जहां आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है, तब पुलिस उसे पुनः गिरफ्तार कर उस आधार पर मजिस्ट्रेट से रिमांड मांग सकती है। 

यही रवैया (एटीट्यूड) जमानतों के मामले में भी निचली अदालतों का होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान में न्यायालय में ऐसा परसेप्शन पैदा हो गया है कि प्रायः निचली अदालतें जमानत देने में हिचक करती हैं और वे स्वयं कोई निर्णय का भागी न बनकर टालने की दृष्टि से जमानत आवेदन को अस्वीकार कर देती है। इस हिचक का एक कारण एक तरह का एक परसेप्शन का उत्पन्न होना भी है, जहां निचली अदातलों द्वारा जमानत देने पर उन पर अनावश्यक शंका की उंगली न्याय से जुड़े क्षेत्रों में उठ जाती है और तब उच्च न्यायालय भी संरक्षण प्रदान करने के बजाए शंका की आंतरिक जांच में लग जाता है। निचली अदालतों द्वारा अस्वीकार किये गये जमानतों के प्रकरणों में 95 प्रतिशत मामलों में उच्च न्यायालय में जमानत हो जाती है। तथापि इस प्रक्रिया में महीनों लग जाते हैं और एक नागरिक को न्यायिक प्रक्रिया के दोष के चलते स्वतंत्रता का अधिकार छीना जा कर उसे अवैध रूप से जेल में रहना होता है। जब केस डायरी में उपलब्ध तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय होता है व उच्च न्यायालय जमानत दे सकती है, देती है, तब उन्हीं तथ्यों के आधार पर निचली अदालतें अर्थात मजिस्ट्रेट (सिवाय सुनवाई के क्षेत्राधिकार को छोड़कर) और सत्र न्यायाधीश जमानत क्यों नहीं दे सकते हैं और क्यों नहीं देते हैं, यह एक बड़ा भारी प्रश्न न्याय क्षेत्र में काम करने वाले न्यायविदो और कानून मंत्रालय के सामने होना चाहिए? क्योंकि यहां तक विद्ववता का प्रश्न है वकीलों से लेकर न्यायाधीशों तक की कमोवेश उन्नीस-बीस ही होता है। तथापि अनुभव के आधार पर उनकी विद्धवता में बढ़ोतरी अवश्य होती है। 

अतः उच्च न्यायालय को जमानत देते समय इस बात को भी देखना चाहिए कि निचली अदालतों ने जमानत क्यों नहीं दी थी। और यदि मजिस्टेªट/सत्र न्यायाधीश ने अपने कर्तव्यों व दायित्वों व विवेक का सही ढ़ग से न्यायिक उपयोग नहीं किया है, तो उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणी की जाकर उनके सर्विस रिकार्ड में वह दर्ज होनी चाहिये। उच्च न्यायालय को यह भी सुनिश्चित (एनश्योर) करना चाहिए की निचली अदालतें जमानत देने के मामले में सिर्फ और सिर्फ अपने न्यायिक विवेकाधिकार का न्यायिक प्रयोग ही करें, बाहरी परिस्थितियों या परसेप्शन से बिल्कुल भी प्रभावित न हो। निश्चित रूप से आप मानिए, तब अधिकांश जमानती प्रकरण निचली अदालतों में ही निपट जाएंगे और उच्च न्यायालय का जमानती कार्य का बोझ  भी कम हो जाएगा तथा त्वरित न्याय भी मिल सकेगा।

मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की इस प्रकरण के प्रसारण में अपनाई गई भूमिका पर आपका ध्यान आकर्षित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अब हमारे देश में मीडिया चौथा स्तम्भ (खम्बा) न रहकर मात्र एक शोपीस होकर व कुछ मामलों में स्वार्थ युक्त निश्चित एजेंडा लेकर चला हुआ है। आर्यन खान ने क्या खाया-पिया। किस रंग की कौन सी गाड़ी में वह जेल से घर गया। जीपीएस द्वारा उनके रास्ते भर की लोकेशन की रनिंग कमेंट्री क्रिकेट समान दी गई। आर्यन के जेल में बीते दिनों (दिवसों) को घंटों और मिनटों में परिवर्तित कर हेड लाइन बनाई गई। गनीमत है, कितने सेकंड आर्यन ने जेल में गुजारे, उसकी गणना बख्श दी गईं। और भी न जाने क्या-क्या? यह हमारे राष्ट्रीय न्यूज चैनलों (कुछ एक को छोड़कर) की राष्ट्रीय न्यूज की हैडलाइन व ब्रेकिंग न्यूज की बानगी है। इन समाचारों की दिनभर कमेंट्री चलाकर मीडिया देश की खराब होती न्यायिक प्रणाली व व्यवस्था, नशाखोरी, ड्रग्स इत्यादि महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुधार लाने की कवायद के चलते मीडिया इस तरह का प्रसारण कर देश के प्रति अपने दायित्व का बखूबी निर्वाह कर अपने को सबसे बड़ा देश प्रेमी सिद्ध कर रहा है? आखिर मीडिया को हो क्या गया है? कम से कम प्रस्तुत मामले में ही मीडिया को आर्यन के पिताजी शाहरुख खान से ही सीख और सबक ले लेते? आर्यन की गिरफ्तारी से लेकर जेल से छूट कर उसके घर आने तक शाहरुख खान ने इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया तक में एक शब्द भी इस मामले में किसी भी पक्ष के लिये पक्ष-विपक्ष में नहीं कहा। यह उनकी परिपक्वता व उनकी मामले की प्रति गंभीरता को ही दर्शाता है। उक्त मामले की रिपोर्टिंग करते समय यही गंभीरता की आवश्यकता मीडिया से भी अपेक्षित थी।

चूंकि मैं स्वयं वकील हूं; अनुभव के आधार पर जो कुछ न्यायालय में घटित होते हुए मैंने देखा है, समझा है, सुना है, उनके आधारों पर ही मैंने उक्त सुझाव दिए हैं। अतः न्याय हित में वर्तमान में चली आ रही न्याय देने की प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने ही होंगे। और इसके लिए बार काउंसिल, ऑफ इंडिया कानून मंत्रालय के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय को स्वयं संज्ञान लेकर कुछ न कुछ कदम अवश्य उठाना ही होगा।

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