बुधवार, 30 अगस्त 2017

गुरमीत सिंह पर आये सीबीआई न्यायालय के निर्णय के पश्चात् उत्पन्न स्थिति के लिये क्या मात्र प्रशासन ही जिम्मेदार हैं?

         
बहुप्रतीक्षित ‘‘मेसंजर ऑफ गाड’’ ‘‘बाबा’’ स्वयंभू ‘‘संत’’ ‘‘गुरमीत सिंह’’ ‘‘राम’’ ‘‘रहीम’’ ‘‘इन्संा’’ डेरा सच्चा सौदा प्रमुख पर निर्णय की तारीख 25 अगस्त पूर्व में ही दिनांक 18 अगस्त को तय की जा चुकी थी। समस्त प्रशासनिक, न्यायिक चेतावनी एवं जांच ऐजेंसीज के ‘‘इनपुट’’ होने के बावजूद हरियाणा पुलिस, पैरा मिलेट्री बल व शासन-प्रशासन सब असफल हो गये और बेलगाम हिंसा में 38 लोग अकारण ही अकाल मौत के शिकार हो गये। इस भयावह स्थिति के लिये जिम्मेदार कौन? निश्चित रूप से इसके लिये ऊपर उल्लेखित समस्त लोग मुख्यतःसामूहिक रूप से  जिम्मेदार हैं। लेकिन क्या मात्र ये ही सब जिम्मेदार हैं? अन्य कोई नहीं ? यह घटना का एक पहलू भर हैं। अनचाहे उत्पन्न हुई इस परिस्थति के दूसरे पहलू पर भी विचार किया जाना आवश्यक हो गया हैं। 
भारतीय न्याय व्यवस्था का यह एक पहला ऐसा मामला हैं जो अन्य मामलों से बिल्कुल अलग व कई कारणों से अनूठा हैं। न्याय के इतिहास में शायद यह पहली बार ही हुआ हैं जब किसी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा निर्णय घोषित करने के पूर्व पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने लगातार दो दिनों में पांच बार त्वरित सुनवाई कर सीबीआई कोर्ट द्वारा दिये जाने वाले निर्णय की घोषणा के बाद की संभावित आशंकित परिस्थतियों में कानून व्यवस्था बनाये रखने के उद्देश्य से न केवल कई कड़े व बहुत ही स्पष्ट निर्देश जारी किये वरण हरियाणा के डीजीपी को जमकर फटकार तक लगायी। यह भी कहा गया कि किसी भी संभावित अनपेक्षित उत्पात की स्थिति के लिये उन्हे ही जिम्मेदार ठहराया जायेगा। न्यायिक इतिहास में यह भी पहली बार ही हुआ हैं कि उच्च न्यायालय ने संबधित पक्ष को बिना कोई नोटिस दिये या शपथ पत्र लिये मामले की गम्भीरता को भॉंपते हुए संबधित पक्षकारों को बुलाकर तुरंत सुनवाई कर ऐतिहासिक समुचित आदेश एवं निर्देश पारित किए। यह मामला अपने आप में इस कारण से भी अनोखा हैं जिसमें पीड़िताओं द्वारा औपचारिक रूप से कोई प्रथम सूचना पत्र दर्ज नहीं कराया गया। अपितु घटना के संबंध मंे सिर्फ गुमनाम पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी एवं पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय को भेजे गए थे, जिसके संज्ञान में ही सीबीआई द्वारा जांच की गई थी। समस्त इनपुट और प्रशासनिक आदेश के बावजूद सरकार पूरी तरह से असफल रही और 18 अगस्त (जब निर्णय की तारीख 25 अगस्त तय की गई) से निर्णय के आते तक लाखो लोग पंचकुला सीबीआई न्यायालय के आस पास के क्षेत्र में जमा होने दिए गए। अतः ऐसी अनियत्रिंत स्थिति उत्पन्न हो जाने देने के लिए सरकार पूर्णतः जिम्मेदार हैं। जब प्रतिबंधात्मक आदेश के बावजूद ‘‘डेरा सच्चा’’ के समर्थक इतनी बडी संख्या में इक्ट्ठा हो गये जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई तब क्या माननीय न्यायाधीश जगदीप सिंह को निर्णय को कुछ दिन के लिये स्थगित नहीं कर देना चाहिए था ताकि इकठ्ठा हुई भीड़ समय के साथ तितर वितर हो जाती व तनाव पूर्ण स्थिति डिफ्यूज (सामान्य)हो जाती। पूर्व में भी धारा 376 से लेकर धारा 302 के साथ देशद्रोह सहित कई गंभीर भयानक अपराध के मामलों की सुनवाई न्यायालय, विशेष न्यायालय एवं सीबीआई कोर्ट के द्वारा कई कारणों से स्थगित की जाकर आगे बढाई गई हैं। तब परिस्थिति विशेष में सीबाीआई कोर्ट ने निर्णय को स्थगित कर स्थिति को बेकाबू होने से रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? विशेषकर ऐसी स्थिति में जब एक तरफ उच्च न्यायालय ने यह महसूस किया कि शासन प्रशासन स्थिति से निपटनेे के लिये मानसिक रूप से माकूल नहीं हैं। एक बार गुरमीत को न्यायालय में पेशी पर लाने पर हुये हंगामे के मद्देनजर न्यायालय ने असामान्य कदम उठाते हुये आगे वीडियो कांफ्रेस के जरिये लगातार सुनवाई की। वैसा ही निर्णय दिए जाने के दिन अति असामान्य स्थिति हो जाने के कारण निर्णय को यदि स्थगित कर दिया जाता, तो उस दिन 38 लोगों के जानमाल व करोडों रूपये की सम्पत्ति के हुए नुकसान से बचा जा सकता था व पंचकुला के निवासियों का ड़र व आंतक के साये में जिये 24 घंटे के जीवन को टाला जा सकता था। अतः सीबीआई न्यायालय के न्यायाधीश को 25 अगस्त के निर्णय को आगे न बढाने से उत्पन्न हुई स्थिति के लिये नैतिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता हैं, विशेष कर उन परिस्थितियों को देखकर जब स्वयं उच्च न्यायालय ने परिस्थतियों की वीभत्सता का आकलन करते हुये आदेश व प्रतिबंधात्मक निर्देश जारी किये हो।    
बात टीवी चंेनलो की ले ले। टीवी चेनलों द्वारा ‘‘बाबा’’ ‘‘राम’’ ‘‘रहीम’ का नाम बार-बार लेकर इन नामो को बदनाम करने में भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही हैं। विभिन्न चेनलो के ओवी वैन इस हिंसा में नष्ट हुये हैं। इसका समाचार देने में  जब वे परस्पर एक दूसरो की चेनल का नाम लेने पर परहेज करते रहे व सिर्फ न्यूज चेनल बोलते रहे हैं, तब बाबा ‘राम’ ‘रहीम’ के नाम पर यह मेहरबानी  क्यों नहीं कर रहे हैं। मात्र ‘‘गुरमीत’’ सिंह जो उसका मूल नाम हैं, का उल्लेख करने से क्या मीडिया रिपोर्टिग पूरी नहीं हो पाती हैं ? एक तरफ राम रहीम का नाम लेकर इन नामो को जाने अनजाने बदनाम किया जा रहा हैे जो करोड़ो लोगो के लिये आस्था की भावना हैं (‘‘राम रहीम’’ को भगवान बनाकर ‘‘राम’’ और ‘‘रहीम’’ को भगवान रहने से वचित किया जा रहा हैं) तो दूसरी तरफ उन 800 से अधिक गाड़ियों के काफिले का बार बार उल्लेख कर गुरमीत को महिमा मंडित किया जा रहा था। आज तक की ऐंकर अंजना ‘‘ओम कश्यप’’ ‘‘आज तक’’ की ओवी वैन पर हुए हमले के बाद बार-बार चिल्ला-चिल्ला कर गुरमीत के समर्थकों पर उन्हे दोषी मानकर भड़कती हैं। लेकिन उसके साथ ही वह यह भी रिपोर्ट करने लग जाती हैं कि गुरमीत केा हेलीकाप्टर के जरिये जेल ले जाया जायेगा। ऐसी रिपोर्ट करके जाने अनजाने में क्या वह समर्थको को गुरमीत के मौका स्थल (लोकेशन) को नहीं बता दे रही हैं? क्योकि यह जानकारी पाकर गुरमीत के समर्थक हेलीपेड़ पर इकठ्ठा हो सकते थे। इस मामले में एनडी टी.वी. ने कुछ समझदारी की रिपोर्टिग की। हिंसा की कुछ घटनाओ का सीधे लाइव प्रसारण नहीं किया। वहीं अन्य चेनल समस्त घटनाओं को लाइव  दिखा रहे थे। सबसे पहले व सबसे आगे के काल चक्र में मीड़िया को उनकी जिम्मेदारी सिखाने के लिये एक पाठशाला आयोजित करने की भी नितांत आवश्यकता हैं।
महत्वपूर्ण बात हैं गुरमीत समर्थक भारतीय नागरिको का समाज व देश के प्रति दायित्व व अपने गुरू के प्रति अति सीमा तक का असीमित अंधविश्वास! आखिर हमारा देश किस दिशा में जा रहा हैं? हमारी यह संस्कृति हमे कहां ले जा रही हैं? भारतीयता की बात करने वाली समस्त राजनैतिक पार्टियॉं स्वार्थसिद्धि हेतु किस तरह की राजनैतिक रोटियां सेंक रही हैं? ‘‘भारत व भारतीयता’’ के इतर सब कुछ इस उपद्रव में शामिल हैं। धर्म या कहे धर्म के ठेकेदार बाबाओं के साथ राजनीजिज्ञों का घाल मेल इतना गहरा हो गया हैं कि सत्ता साधने के लिये धर्म, संस्कृति सेवा भाव व नैतिकता सब कुछ बेमानी/बेपटरी हो गई हैं। गुरमीत को बलात्कार के अपराध में दोषी करार दिए जाने के बाद उसकेे समर्थको ने अंधभक्त बनकर अनगिनती सामान्य जनो की शांति भंग कर दी तथा देश की सम्पत्ति नष्ट कर दी। यह कैसी भारतीयता/संस्कृति? इस घटना के पूर्व भी आशाराम, रामपाल, रामवृक्ष, नित्यानंद व अन्य कई धर्मगुरू संत, बाबा, स्वामी सेक्स स्कंेडल में फंसे हुए हैं, जिन पर प्रकरण चल रहे हैं। इस सबके बावजूद उनके शिष्यों व समर्थको की आस्था ऐसे गुरूओं के प्रति कम नहीं हो रही हैं। उनका उनके गुरूओं के प्रति ऐसा समर्पण सिर्फ धार्मिक गहरे  अंधविश्वास के कारण हैं जो घातक हैं। फिर ऐसा ही समर्पण अपने देश व माटी के प्रति क्यो नहीं प्रदर्शित हो रहा हैं? जब पडोसी देश हमे लगातार ऑंख दिखाते रहता है व आंतकी घटनाओं को अंजाम देता रहता हैं तब यदि वे सब सड़क पर आकर ऐसी ही निष्ठापूर्ण श्रद्धा देश एवं देश की सम्पत्ति के प्रति प्रदर्शित करते तो निश्चित रूप से हमारे शासनाधीशों को दुश्मनों के विरूध एक कड़क निर्णय लेने के लिये न केवल सम्बल मिलता, बल्कि वे देश हित में निर्णय लेने हेतु मजबूर भी होते। 
एक सजायाफ्ता बलात्कारी एवं आरोपी हत्यारे ‘‘गुरू’’ के समर्थन में उसके समर्थक व शिष्य  सामने आकर किस संस्कृति या नैतिकता की किताब को लिख रहे हैं? उनका ऐसा अंधा समर्थन भी गुरमीत के अपराध से कम नहीं हैं। यह समर्थन देकर व्यक्ति अपने परिवार व समाज को किस नैतिकता का संदेश देना चाहता हैं। क्या इससे व्यभिचार को बढावा नहीं मिलेगा? क्या देश  हितैषी स्वस्थ्य संस्कृति के लिये उसके नागरिकों की इस तरह नैतिकता से गिरना चिंता का बड़ा विषय नहीं हैं? इस देश की संस्कृति के ठेकेदारों का इस प्रकार नैतिकता के गिरने पर और उसको गिरने से रोकने के लिये दूर-दूर तक कोई बयान बाजी करते नहीं दिखना क्या जाहिर करता हैं? न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हैं’’ ऐसे जुमले का बारम्बार बखान करने वाले राजनीतिज्ञों व धर्म के ठेकेदारों से यह जुमला सुनने के लिए हमारे कान तरसते रह गए। क्या गुरमीत के प्रति उनकी यह मौन सहमति/समर्थन नहीं माना जाना चाहिए?
इस पूरे घटना क्रम में उन दोनो साहसी साध्वियों की कोई (सार्थक) चर्चा तक नहीं कर रहा हैं जिन्होने विपरीत परिथतियों में भी लम्बे समय से आंतक व ड़र के साये में लड़ाई लड़ी व बिना समर्पण किये लड़ाई को उसके परिणाम तक पहुंचाया। उनके आगे हम नतमस्तक हैं। सरकार का यह दायित्व हैं कि जब एक आरोपी को जेड़ प्लस सुरक्षा प्रदान की जा रही थी तो उसके अत्याचार से पीड़ित अबलाओ को इस भयावी, मायावी राक्षस से बचाने के लिये आवश्यक सुरक्षा व सुविधा अभी तक क्यों नहीं दी गई? वे समस्त साध्वी जो आश्रम में सेवा दे रही थी उन्हे अभी तक किसी नारी आश्रम में क्यों नहीं भेजा गया व उनके बीच विभिन्न महिला संगठनों के माध्यम से मोरल पुलिसिंग क्यों नहीं की गई? अनुत्तरित प्रश्न के सही उत्तर व उनका क्रियान्वयन ही व्यवस्था को सुधार पायेगा। 
अंततः गुरमीत को विशेष न्यायाधीश केन्द्रीय जांच ब्यूरो के द्वारा 20 वर्ष की सजा सुनाई गई। विशेष न्यायाधीश को हेलीकाप्टर से सुरक्षा कारणो से रोहतक जेल में बनाई अस्थाई कोर्ट तकं पंहुचाना भी न्याय के इतिहास में प्रथम बार हुआ हैं। गुरमीत को अपराधी सिद्ध घोषित करने के निर्णय के बाद डिप्टी एडवोकेट जनरल (जो गुरमीत के भतीजे हैं) को बर्खास्त करने की घटना भी असाधारण हैं। 
सामाजिक मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों के लिये यह घटना शोध का विषय हैं जहां इंसान अच्छाई-बुराई में परख किये बिना ही हिन्दू धर्म में ईश्वर के कई अवतार होने के बावजूद अपनी अंधी धार्मिक आस्था एक बलात्कारी व हत्यारे अपराधी के प्रति इस सीमा तक समर्पित करता हैं कि हजारो की संख्या में इकठ्ठा होकर मरने मारने के लिये उतारू होकर हिंसक हो उठे। यही से नैतिकता की शिक्षा का पाठ पढाने की आवश्यकता, वक्त की पुकार हैं। 
   जय हिंद! 



शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

‘‘बहुमत’’ का निर्णय ‘नैतिक’ रूप से कितना ‘‘बलशाली’’?

एक साथ ‘‘तीन तलाक’’ के संदर्भ में माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा दो के विरूद्ध तीन के बहुमत से ऐतहासिक फ़ैसला देकर लम्बे समय से चली आ रही बहस को विराम देते हुए ‘‘त्वरित तीन तलाक’’ को असंवैधानिक करार देने के साथ साथ तुरन्त ही एक अन्य बहस को भी अवसर प्रदान कर दिया हैं। वह इसलिए कि ऐसे महत्वपूर्ण संवेदनशील मुद्दे पर तीन दो के बहुमत का निर्णय संविधान के तहत तो बंधनकारी हैं, जिसने (सिवाए पुर्नावलोकन की स्थिति को छोड़कर) मुद्दे को अंतिम रूप से निर्णीत कर दिया हैं। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में नैतिक बल के आधार पर क्या यह निर्णय उतना ही प्रभावी माना जायेगा? यह निर्णय ऐसा प्रश्न पैदा करने का एक अवसर आलोचको को देता हैं। उच्चतम् न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर उक्त मामले की सुनवाई प्रारंभ कर मुस्लिम महिलाओं के बराबरी (समानता) से जीने के संवैधानिक अधिकार पर ‘‘तीन तलाक’’ द्वारा जो अतिक्रमण किया जा रहा था, उस बाधा को समाप्त कर, मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी राहत प्रदान की हैं। उनके असहय जीवन में तनाव को समाप्त कर उनमें नव जीवन का संचार किया हैं। इस ऐतहासिक निर्णय ने एक और विवाद समान सिविल संहिता के संबंध में कानून बनाने का रास्ता भी साफ कर दिया हैं। वैसे भी जब आपराधिक न्यायशास्त्र, मुस्लिम सहित समस्त भारतीयो पर लागू हैं, तब सिविल सहिंता के मामले में मुस्लिम समाज अलग क्यों रखा जाना चाहिए?
लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया निश्चित रूप से बहुमत के आधार पर संचारित होती हैं। वह बहुमत भी पूर्ण बहुमत न होकर उस प्रक्रिया में भाग लेने वाले व्यक्तियों के बीच का ही होता हैं। अर्थात् ऐसी प्रक्रिया में भाग लेने के लिये अधिकृत रूप से भागीदार होने वाले समस्त पात्र व्यक्तियांे की संख्या का बहुमत गिनने की व्यवस्था हमारी वर्तमान लोकतंात्रिक प्रक्रिया में नहीं हैं। मतलब साफ हैं कि कुल मतो का 50 प्रतिशत से अधिक की संख्या के मत से होने वाले निर्णय को ही बहुमत मानने की व्यवस्था हमारी लोकतंात्रिक प्रक्रिया में नहीं हैं। माननीय उच्चतम् न्यायालय के ऐसे कुछ, बहुत ही संवेदनशील प्रकरणों में भी ऐसी ही प्रक्रिया का लागू होना क्या एक श्रेष्ठ न्यायिक प्रक्रिया/प्रणाली मानी जानी चाहिए? 
कानूनी रूप से संवैधानिक एवं बंधनकारी इस कानूनी व्याख्या को छोड़कर निम्न तीन बिन्दु इस निर्णय को अन्यथा व नैतिक रूप से कमजोर बनाते हैं। एक, ऐसा निर्णय जो समाज विशेष या धर्म विशेष अर्थात् अल्पसंख्यक मुसलमानों के इस्लाम धर्म केे व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को अक्षुण्ण मानते हुये मात्र आधे अंक से ज्यादा वाले बहुमत के निर्णय के कारण दिया गया हैं। वह नैतिकता के बल के साथ उक्त विवाद को तार्किक रूप से पूर्ण स्पष्टता के साथ अंतिम रूप से निर्णीत कैसे कर पायेगा। आप को मालूम ही है, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में कोई भी निर्णय सर्व सम्मति से ही लागू होता हैं। पांच सदस्यों में से किसी भी एक सदस्य के वीटो के कारण बहुमत के निर्णय को भी लागू नहीं किया जा सकता हैं। क्या ऐसे ही निर्णय की परिस्थिति इस प्रकार के अल्प लेकिन अतिसंवेदनशील विषयों में उच्चतम् न्यायालय की निर्णय प्रणाली पर भी लागू नहीं किया जाना चाहिए? दूसरा उच्चतम् न्यायालय के उक्त निर्णय में जब स्वयं माननीय न्यायालय ने यह ध्यान रखा कि उक्त मुद्दे की सुनवाई पांच विभिन्न धर्मो के न्यायमूर्तियॉं द्वारा (जिसमें कोई महिला जज शामिल नहीं थी) करें ताकि किसी भी प्रकार की अल्प शंका का भी वातावरण न बन सके। इन बरती गई सावधानियों के बावजूद मुस्लिम धर्मावलम्बी माननीय न्यायमूर्ति ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) से संबंधित प्रकरण में, ही बहुमत के निर्णय से अपने को अलग रखा, तब क्या यह स्थिति इस निर्णय को और भी कमजोर नहीं कर देती हैें? तीसरा मुख्य न्यायाधीश जो इस बंेच के भी प्रमुख थे, ने भी अपने को बहुमत के निर्णय से अलग रखा हैं। इसी कारण से मैंने इसे ‘‘आधे अंक के बहुमत का निर्णय’’ ऊपर पेरा में लिखा हैं। यह भी पहली बार देखने को मिला व क्या यह उचित हैं कि किसी विशेष धर्म पर्सनल लॉ से जुड़े मामले में उच्चतम् न्यायालय ने विभिन्न धर्मावलम्बीयों के न्यायमूर्तियों की (धर्म के आधार पर?) बेंच बनाई। पूर्व में शाहबानो प्रकरण में भी जिसमें मुस्लिम महिला के गुजारे के अधिकार का मामला था उसमे भी ऐसा नहीं हुआ था जहॉ समस्त न्यायमूर्ति जो विभिन्न धर्मो के नहीं थे और मुस्लिम धर्म के कोई भी न्यायमूर्ति नहीं थे। तब सर्वसम्मति से शाहबानो के पक्ष में निर्णय दिया गया था जिसे बाद में संसद ने कानून बनाकर निष्प्रभावी कर दिया था। 
न्याय का मूल सिद्धांत यह भी हैं कि न केवल न्याय मिलना चाहिए बल्कि न्याय मिलता हुआ महसूस भी होना चाहिए। अर्थात परसेप्शन (अनुभूति) का ‘‘न्याय क्षेत्र’’ में बहुत महत्वपूर्ण स्थान हैं जिसका वर्त्तमान निर्णय में अभाव सा महसूस होता हैं। उपरोक्त सब कारणों से यहॉं यह प्रश्न पैदा होता हैं कि नैतिकता के धरातल पर भी यह निर्णय क्या उतना ही बलशाली माना जायेगा जितना कानूनी आधार पर? ऐसी स्थिति के कारण यह निर्णय मुस्लिम समाज के एक वर्ग को क्या यह अवसर प्रदान नहीं कर देता हैं कि आगे किसी बड़ी बेंच में मामला रेफर किया जाय, जहॉं कम से कम दो तिहाई बहुमत से स्पष्ट निर्णय हो। जब हमारे संविधान में संसद में सामान्य बहुमत न होने पर सरकार गिर जाती हैं लेकिन वह सामान्य बहुमत वाली सरकार जब कोई संविधान संशोधन बिल लाती हैं तो उसे दो तिहाई बहुमत से पारित करना होता हैं। ठीक इसी प्रकार की दो तरह के बहुमत की व्यवस्था न्यायपालिका की उपरोक्त स्थिति में भी क्यो नहीं होनी चाहिए? ऐसी व्यवस्था होने पर ही ऐसे संवेदनशील मुद्दे के निर्णय पर से धुंध की छाया हटकर यर्थाथ स्थिति स्पष्ट हो सकेगी और एक स्पष्ट निर्णय पूरे मुस्लिम कौम को कानून के साथ-साथ पूरे नैतिक बल के साथ मानने के लिये बाध्य होना पडे़गा। अभी अभी आया माननीय उच्चतम् न्यायालय की सात सदस्यीय बेंच का निजता का अधिकार के मामले में आम सहमति का निर्णय उक्त मत की पुष्टि ही करता हैं।
इस निर्णय के बाद माननीय मुख्य न्यायाधीश ने सिंगल बेंच के रूप में अभी तक जो निर्णय दिये हैं वे कितने सही होगंे, यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ सकता हैं, क्योंकि उनके विचार (ओपिनियन) को अन्य तीन न्यायमूर्तियों ने उक्त एक मामले में ही स्वीकार नहीं किया हैं। 
   

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

न्यायपालिका की ‘‘अवमानना’’के लिये क्या कुछ सीमा तक न्यायपालिका ही दोषी नहीं?


विगत पखवाड़ा भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे.एस.खेहर ने भवन के व्यावसायिक उपयोग से संबंधित एक मामले में पीड़ा के साथ यह टिप्पणी की कि इस देश के लोग न्यायालयों के निर्णयो का पालन नहीं कर रहे हैं। कानून तोड़ने तथा कोर्ट के आदेशांे की धज्जिया उड़ाने में वे अपनी शान समझते हैं। बिना शक, माननीय मुख्य न्यायधीश की उक्त पीड़ा व चिंता सही हैं। लेकिन सिर्फ नागरिको को इसके लिये जिम्मेदार ठहराने का उनका यह कथन पूर्णतः सही नहीं कहा जा सकता। मुख्य न्यायाधीश के उक्त कथन को दो भागों में बांटा जा सकता हैं। एक तो ‘‘कानून को तोड़ना’’ व दूसरा कोर्ट के आदेशों की अवहेलना कर उनकी अवमानना करना। आगे सिर्फ न्यायालय की अवमानना का ही विश्लेषण किया जा रहा हैं। 
अवमानना का अर्थ न्यायापालिका के निर्णयों की अवहेलना करना, उनका पालन न करना और निर्णय में दी गई समय (मूल अथवा बढाई गई) सीमा में उनको लागू न करना हैं। यथार्थ में न्यायालय का यह भी दायित्व हैं कि वह अपने निर्णयों को पारित करने के साथ-साथ उन्हे समय-बद्ध सीमा में पूरी दृढ़ता के साथ लागू भी करे/करवाये। इसेे लागू करने में यदि कोई भी पक्ष उदासीनता दर्शाता हैं, अपेक्षित कर्त्तव्यों का पालन नहीं करता हैं, तो वह अवमानना का दोषी हैं, और उसे कानून के प्रावधान के अनुसार सजा दी ही जानी चाहिए। वास्तव में न्यायालय की अवमाननाओं के लिये मुख्य रूप से स्वतः न्यायालय ही जिम्मेदार होते हैं। अगले कुछ उदाहरणों से यह तथ्य आपके समझ में आ जॉंएगा। 
माननीय उच्चतम् न्यायालय के उस निर्णय को याद कीजिए जहॉं न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने हथकड़ी पहनाने को अमानवीय व अपमान जनक बतलाया था। (देखिये सुनील बतरा विरूद्ध दिल्ली प्रशासन ए.आई.आर.1978 पेज 1678) माननीय उच्चतम् न्यायालय ने अन्यत्र कई प्रकरणों में  भी यह आदेश दिया गया था कि अभियोगियों को न्यायालय में हथकड़ी लगाये बिना प्रस्तुत किया जाना चाहिऐ। सुरक्षा की दृष्टि से यदि हथकड़ी लगाया जाना आवश्यक ही हैं, तो न्यायिक अधिकारी के आदेश के अधीन गिरफ्तारी वारंट जारी किये जाने पर ही हथकड़ी लगायी जानी चाहिए। (देखिये सुनील गुप्ता विरूद्ध म.प्र. शासन 1990 एस.सी.सी. पेज 441 एवं ए.आई.आर.1980 एस.सी पेज 540)। लेकिन आये दिन हम देखते हैं कि प्रायः सभी न्यायालयों में अधिकांश आरोपियों को (प्रभावशालियों को छोड़कर) न्यायालय के ठीक आंख के सामने हथकड़ी लगाकर पेश किया जाता हैं। अतः जब अधीनस्थ न्यायालय ही अपने उच्चतम् न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करवाती हैं और न ही चूक करने वाले संबंधित के खिलाफ कोई कार्यवाही करती हैं, तब फिर न्यायालय की आंख के सामने हो रही ऐसी अवमानना के लिये स्वयं न्यायालय ही सबसे बड़े दोषी नहीं तो अन्य कौन?
इसी प्रकार उच्चतम् व उच न्यायालय ने बहुत से निर्णय ऐसे पारित किये हैं जिनका सामान्यतः अक्षरशः  पालन किया जाना संभव नहीं होता हैं। न ही उतनी सक्षम व्यवस्था (सिस्टम) सरकार या न्यायालय के पास हैं कि वह अपने ऐसे निर्णयों को पूरी भावना के साथ दृढ़ता पूर्वक लागू/पालन करवा सके। अतः ऐसेेे मामलो में भी न्यायालय ही अवमानना के लिये जिम्मेदार माने जायेगे। उदाहरणस्वरूप माननीय उच्चतम् न्यायालय केे न्यायमूर्ति आर.सी.लाहोटी ने नाईज पालुशन विरूद्ध अज्ञात (आई.आर. 2005 पेज 3136) में दिये गये निर्णय में निर्देश दिया था कि रात्रि 10 बजे तक ही फटाके, डीजे बजाया जाना चाहिये (कुछ अपवाद को छोड़कर)। आज इस निर्णय का कितना पालन हो पा रहा हैं, और पालन न होने पर अवमानना के लिए न्यायालयों ने कितनी कार्यवाही की हैं? न्यायालय ने उक्त निर्णय देते समय यह नहीं सोचा कि हमारे समाज में शादी व त्यौहारों के वक्त देर रात्री तक संगीत मय कार्यक्रम गाजे बाजे, फटाको के साथ चलते रहते हैं, जिस कारण बिना दुराशय के मासूमियत (इनोसंेसली) के साथ आदेश का उल्लघंन हो रहा हैं। जब किसी कार्यक्रम के लिये प्रशासन से अनुमति मांगी जाती हैं, तब प्रशासन अनुमति देते समय उक्त निर्णय के तहत रात्री 10 बजे तक ही अनुमति देता हैं। इस तरह केवल कागजी कार्यवाही में ही उक्त निर्णय का पालन हो पा रहा हैं। यद्यपि उक्त आदेश के पीछे न्यायालय की मंशा ध्वनि बाधा व प्रदूषण के कारण नागरिको को होने वाली तकलीफ को रोकने की कोशिश हैं। लेकिन न्यायालय ने अपने निर्णय में शादी, धार्मिक आयोजन जैसे कार्यक्रमों के लिये कोई सामान्य अपवाद भी नहीं छोड़ा हैं।   
उच्च न्यायालय का एक और निर्णय जिसमें मध्यप्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग की चेकपोस्ट पर नियुक्त हम्मालो की ‘‘सेवा की समाप्ति के आदेश’’ को अवैध घोषित करके उन्हे नियमित करने के आदेश दिये गए थे। लेकिन मध्यप्रदेश शासन ने वित्तीय स्थिति का हवाला देकर उन्हे अभी तक नियमित नहीं किया हैं। इसी प्रकार संविदा शिक्षक वर्ग, दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी आदि अनेक ऐेसे मामले हैं जो धरातल पर निर्णय के परिणाम की वास्तविकता की राह जोह रहे हैं लेकिन न्यायालय ने न तो अपने संबंधित आदेशों में कोई संशोधन ही किया और शायद ही अवमानना की कोई कार्यवाही की हो। 
इसी प्रकार उच्चतम् न्यायालय ने ‘‘राष्ट्रीय राजमार्ग व राज्य मार्ग (स्टेट हाइवे) की 500 मीटर निकट परिधि में शराब की दुकान को बंद करने’’ के आदेश दिये थे। जिसेे निष्प्रभावी बनाने के लिये उत्तर प्रदेश जैसी कुछ सरकारों ने राष्ट्रीय राजमार्ग की परिभाषा ही बदल दी व अधिसूचना द्वारा प्रभावित कुछ राजमार्गो के कुछ खंड़ो को राजमार्ग से ही हटा दिया। इक्कीसवी सदी में विकास का दम भरने वाली ऐसी सरकारो से उच्चतम् न्यायालय ने यह नहीं पूछा कि प्रगति के इस दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग को अंतर्राष्ट्रीय मार्ग घोषित किया जाना चाहिए? या राष्ट्रीय मार्ग की 6 लेन को 8 लेन में परिवर्तित किया जाना चाहिए? अथवा उसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंर्तगत ग्रामीण मार्ग घोषित करके न्यायालयीन आदेश को अंगूठा दिखाना चाहिए? इस प्रकार सरकारे न्यायिक निर्णयों को प्रभावहीन करने के लिये वैधानिक लेकिन अनैतिक प्रयास करने लगी हैं जिस पर शायद ही न्यायालयों ने अपने निर्णय को इस तरह से प्रभावहीन करने के कारण सरकार के विरूद्ध कोई कार्यवाही की हो।
यहॉ पर ‘‘कानून का पालन न करने’’ व ‘‘न्यायालय के आदेश का पालन न करने’’ के अंतर को भी समझना आवश्यक हैं। हमारे देश में अनगिनत बहुत पुराने कानून हैं। हाल में ही बहुत से पुराने कानून जो अप्रासंगिक हो चुके हैं, उनको संसद ने समाप्त कर दिया हैं। इसके बावजूद कानून व उनके प्रावधान इतने ज्यादा व क्लिष्ट हैं कि एक सामान्य नागरिक के लिये उन सबका पूर्णतः पालन करना लगभग असंभव सा हैं। सड़क चलते थूकना, ध्रूम्रपान करना एक अपराध हैं। लेकिन इसका कितना पालन नागरिकों द्वारा किया जाता हैं या सरकार द्वारा कराया जाता हैं? इस प्रकार के कानूनो के होने से नागरिको में कानून के उल्ल्घंन की प्रवृत्ति बढते जा रही हैं जिसका प्रभाव बंधनकारी न्यायालीन आदेशो के पालन पर भी पड़ रहा हैं। इसके लिये न केवल नागरिकों को उनके नैतिक दायित्व का लगातार बारम्बार बोध कराये जाने हेतु अनवरत पाठशाला लगाई जानी चाहिए बल्कि सरकार को भी ऐसी प्रणाली (सिस्टम) विकसित करना चाहिए जो कानून का पालन करा सके व ऐसे कानून बनाने से बचना चाहिये जिनका अधिकांशतः दिन प्रतिदिन उल्लघंन होता हैं और उन उल्लघंनों के विरूद्ध कोई कार्यवाही भी नहीं होती हैं।
लेकिन समस्या का दूसरा व महत्वपूर्ण पहलू हैं न्यायालय द्वारा ऐसे अव्यावहारिक आदेश पारित कर देना जो ‘‘विधायिका द्वारा पारित कानून न होने के बावजूद उनके समान ही हैं, के पर्यायावाची भाषित होने के कारण वैसा ही न्यायिक प्रभाव रखतेे हैं। इस वजह से ऐसे आदेश के  उल्लघंन के परिणाम स्वरूप न्यायालय की अवमानना होती हैं। ‘‘कानून का उल्लघंन अवमानना नहीं लेकिन न्यायालय के आदेश का उल्लघंन अवमानना’’ हैं। इसलिये माननीय उच्चतम्/उच्च न्यायालय को ऐसे आदेश पारित नहीं करना चाहिए जिन्हे पूर्णतः लागू नहीं करवाया जा सकता हैं। यद्यपि ऐसे आदेश जनहित में हो सकते हैं। इसके लिये सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि ऐसे जनहित के मामलो में न्यायालय सीधे आदेश पारित करने के बजाय केन्द्रीय/राज्य सरकारों को यथोचित कानून/नियम बनाने के लिये निर्देश दे, ताकि ऐसे निर्देशों के आधार पर सरकारों द्वारा बनाए गए कानून/नियम का पालन न हो पाने की स्थिति में ‘‘न्यायालय की अवमानना नहीं होगी वरण् कानून का उल्लघंन होगा’’ जिसके लिये कानून में सजा का प्रावधान हैं।  
यह संवैधानिक व्यवस्था हैं कि उच्चतम् न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिंद्धान्त देश का कानून  होता हैं जो पूरे देश पर बंधनकारी रूप से लागू होता हैं। इसका वही प्रभाव होता हैं जो देश के संसद द्वारा पारित कानून का होता हैं। यही स्थिति उच्च न्यायालयों व राज्यो पर भी लागू होती हैं। अवमानना की घटनाओं के बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारण न्यायिक सक्रियता के रहते आज कल न्यायालय द्वारा कानून की व्याख्या करने के साथ-साथ कानून बनाने के आदेश दिये जा रहे हैं जो कार्य विधायिका वह कार्यपालिका का हैं। इस सबके बावजूद यदि अभी भी न्यायालय कीे अवमाननाओं की घटनाओं को रोका नहीं  गया तो न्यायपालिका का सबसे मजबूत आधार कि ‘‘उसका निर्णय बंधनकारी हैं,’’ असफल हो जावेगा और अंततः न्यायपालिका कमजोर होते जायेगी। 
   
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