गुरुवार, 28 सितंबर 2023

मध्यप्रदेश की ‘‘राजनैतिक पिच’’ पर भाजपा का दुक्का, तिक्का, छक्का नहीं सत्ते!(सात)

‘‘सत्ता के लिए सात’’

लेख का सार 

अंत में हिंदुत्व की सबसे बड़ी चेहरा रही फायर ब्रांड साध्वी नेत्री पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमाश्री भारती जिन्होंने वर्ष 2003 में दिग्विजय सिंह की ‘‘बंटाधार सरकार’’ को सफलतापूर्वक हटा कर भाजपा के जीत के10 साल के सूखे को  समाप्त किया था, को चुनावी मैदान में न उतार कर भाजपा ने कहीं एक बड़ी गलती तो नहीं कर दी है? महिला आरक्षण व महिला सशक्तिकरण पर जोर-शोर से कार्य करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति के बावजूद उनके पुरानी मंत्रिमंडल सहयोगी को चुनाव दंगल में न उतारना भी भाजपा के आश्चर्यचकित करने वाला निर्णयों की श्रृंखला का ही भाग हो सकता है। क्या भाजपा नेतृत्व आगे इस गलती को  सुधारेगा? यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा। क्योंकि एक छोटी सी गलती भी पूरी कार्य योजना को असफल कर सकती है। फिर यह तो एक बड़ी गलती है।

सत्ता के लिए सात! गुगली या आत्मघाती गोल? 

चुनाव नजदीक आते-आते मध्यप्रदेश की राजनीति में दिन प्रतिदिन नये-नये नाटकीय और अचंभित करने वाली घटनाएं मोड़ लेते जा रही हैं। मध्यप्रदेश में भाजपा व कांग्रेस के बीच चुनावी मैदान पूर्णतः क्रिकेट के उस मैदान में परिवर्तित हो चुका है, जहां दोनों पार्टियों द्वारा ‘‘बैटिंग और बॉलिंग’’ के द्वारा परस्पर एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास किया जा रहा है। क्रिकेट में टीम जब कभी संकट में होती है, समय कम होता है, तब ‘‘लक्ष्य’’ की प्राप्ति के लिए चौके, छक्के मारना बल्लेबाजों की ‘‘मजबूरी’’ हो जाती है। यदि बल्ला चल जाता है, तो वह मैच जीत जाता है। विपरीत इसके चौके, छक्के मारने में यदि खिलाड़ी आउट हो जाते हैं, तो टीम हार जाती है। मध्यप्रदेश में दोनों पार्टियों की स्थिति कुछ इसी तरह की है कि "क्या पता ऊंट किस करवट बैठता है"। फिलहाल भाजपा ‘‘बैटिंग पिच’’ पर है और सत्ता विरोधी कारक की बॉलिंग जिसमें ‘‘समस्त तीर गुगली’’ सहित शामिल है, से निपटने के लिए भाजपा के चौके (जन आशीर्वाद यात्राएं) तथा छक्के (प्रधानमंत्री मोदी की प्रदेश के लगातार दौरे) के बावजूद भाजपा को जीत के लिए सत्ता (सात) लगाना पड़ गया है। यह भाजपा के लिये "कड़वी गोली" के समान है, कहा भी है कि "कड़वी भेषज बिन पिये, मिटे न तन का ताप"। भाजपा की परिस्थितिवश यह मजबूरी भी होकर विपक्ष से लेकर मीडिया तक ने भाजपा की इस मजबूरी को उसकी ‘‘कमजोर पहचान’’ तक बता दिया है, जिससे सफलतापूर्वक निपटना भाजपा के लिए एक चुनौती है। जबकि भाजपा के बाबत यह बात प्रसिद्ध होकर सिद्ध है कि वह हमेशा बैहिचक चुनौतियां को गंभीरतापूर्वक स्वीकार कर सफलता को प्राप्त करती है। कांग्रेस की स्थिति इसके ‘‘उलट’’ होती है। 

 "पार्टी" को नहीं "चेहरे"  को बदलने का विकल्प! 

शिवराज सिंह की विभिन्न लोक लुभावनी योजनाओं की चुनावी वर्ष में लगातार घोषणाएं होने के बावजूद व्यक्तिगत शिवराज सिंह के चेहरे की सत्ता विरोधी कारक (एंटी इनकंबेंसी) रिपोर्ट आने से हाईकमान को स्थिति में "चक्की में से साबुत निकल आने लायक़" अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा है। वैसे इसे ‘‘सत्ता विरोधी लहर’’ की बजाए शिवराज सिंह का ‘‘थका हुआ चेहरा’’ (थकान, फटीग) कहना ज्यादा उचित होगा। वहीं जनता भी उक्त चेहरे को लगातार देख कर थक सी चुकी है। अतः जनता चेहरे का बदलाव चाहती है, पार्टी का नहीं। जिस प्रकार क्रिकेट में टीम पर देश की इज्जत लगी होती है, इसी प्रकार देश में मोदी के वर्ष 2024 के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के अवसर को सुगमित व सुनिश्चित करने के लिए इस ‘‘सेमीफायनल’’ को जीतने का भार मध्यप्रदेश भाजपा जो भाजपा की प्रयोगशाला (मॉडल स्टेट) रही है, के मजबूत कंधों पर है। इसी कड़ी में एक-एक सीट का महत्व समझते हुए लोकसभा के सात सांसदों जिसमें से चार महत्वपूर्ण कद्दावर नेता, तीन केन्द्रीय मंत्री और एक राष्ट्रीय महासचिव को विधानसभा चुनाव में उतार कर हाईकमान ने छक्का नहीं ‘‘सत्ता (सात)’’ मारा है। ‘‘सत्ता के खेल’’ में ‘‘छक्के की बजाए सात’’ मारना पार्टी की नई ईजाद होकर मजबूरी (शायद) सी बन गई है। यह नया प्रयोग तो मानो पार्टी को "कंकर बीनते हीरा हाथ लगा है",जो पार्टी को सफलता के निकट पहुंचा देगा, ऐसी उम्मीद पार्टी कर रही है और करनी भी चाहिए। क्योंकि पहली बार भाजपा ने क्षेत्रवार क्षत्रप नेताओं को उभारने का गंभीर प्रयास कर जीत के हवन कुंड में उनकी आहुति से हवन की ज्वाला को जलाये रखने का प्रयास किया गया है।

क्षत्रपों को पहली बार महत्व 

ग्वालियर व चंबल क्षेत्र से नरेन्द्र सिंह तोमर, महाकौशल में प्रहलाद सिंह पटेल, मालवा क्षेत्र से कैलाश विजयवर्गीय, और ‘‘आदिवासी वोट बैंक’’ को साधने के लिए फग्गन सिंह कुलस्ते, इन चारों क्षत्रपों को हाईकमान ने बिना कहे यह संदेश देने का प्रयास किया है कि आप न केवल स्वयं की सीट जीते, बल्कि अपने-अपने प्रभाव के क्षेत्रों में अधिकतम सीटें जिताकर लाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी के दावेदारों में स्वयं को शामिल कर ले। कांग्रेस में क्षत्रपों की यह राजनीति पुरानी है। कांग्रेस में नेतृत्व चाहे किसी का भी हो, विभिन्न क्षत्रपों को उनके प्रभाव क्षेत्र में टिकट देने की अलिखित परिपाटी, चली आ रही है। परन्तु भाजपा में टिकट का वैसा अधिकार क्षत्रपों को नहीं दिया गया है। हां पहली बार, मुख्यमंत्री का दावा करने का अप्रत्यक्ष अधिकार ज्यादा सीटें जीत कर लाने पर देने का संकेत अवश्य दिया गया है। वैसे यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि कांग्रेस द्वारा हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में (राष्ट्रीय अध्यक्ष के वहां से होने के बावजूद) स्थानीय क्षत्रपों को महत्व (विपरीत इसके भाजपा ने उतना महत्व येदुरप्पा को नहीं दिया) और चुनाव लडा़ने की सफल नीति को भाजपा ने मध्य प्रदेश में उतारने का निर्णय लिया और शायद यह निर्णय राजस्थान में भी दोहराया जाए। 

 शिवराज सिंह रिटायर हर्ट 

देश के किसी राज्य व प्रमुख राजनैतिक पार्टियों के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है, जब तीन केंद्रीय मंत्री और विश्व की सबसे बडी पार्टी के केंद्रीय महामंत्री को एक साथ चुनावी दंगल में उतारा गया है। इससे इस बात का आकलन किया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोडी मध्य प्रदेश को जीतने के बारे में कितनी चिंतित, सतर्क और सक्रिय रूप से निरंतर लगी है। "कछुए का काटा कठौती से डरने लगता है"। इन प्रभावशाली मुख्यमंत्री के दावेदारो, परिणाम देने वाले सिद्ध क्षत्रपों को चुनाव में उतार कर, साथ ही इनकी टिकट की घोषणा के कुछ समय पूर्व संपन्न हुई ‘‘महारैली’’ में प्रधानमंत्री द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का एक बार भी नाम न लेना, जबकि अन्य दिवंगत नेताओं के नामों का उल्लेख करना, महिला सशक्तिकरण की बात करते हुए भी  शिवराज सिंह की महिलाओं के सशक्तिकरण करने की विभिन्न योजनाएं खासकर ‘‘लाडली बहना योजना’’ का उल्लेख न करना इन सब बातों का स्पष्ट संकेत यह है कि शिवराज सिंह की ‘‘पारी’’ रिटायर्ड हर्ट हुए बिना उन्हें रिटायर कर दिया जाएगा। वैसे हाईकमान ने एक अन्य प्रमुख ग्वालियर चंबल क्षेत्र के ‘‘आयातित’’ क्षत्रप केंद्रीय मंत्री महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया को चारों क्षत्रपों के साथ विधानसभा चुनाव में न उतारकर तीन तरह के संदेश दिए हैं।

 ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनावी मैदान में न उतारने के मायने? 

प्रथमः एक क्षेत्र में एक ही क्षत्रप का नेतृत्व होगा। अर्थात ग्वालियर चंबल संभाग में नरेंद्र सिंह तोमर अकेले (सिंधिया के साथ नहीं) नेता बने रहेंगे। दूसरा संदेश कम, सोच ज्यादा यह रही है कि सिंधिया को चुनावी पिच पर उतारने पर अंतर्कलह व नेतृत्व के मुद्दे पर खींचतान बढ़ जाने से फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा। तीसरा महत्वपूर्ण संदेश यह भी हो सकता है कि महाराजा को पार्टी (जनसंघ-संघ-भाजपा) की नियमावली अनुसार उन्हें उनकी उस सीमा के भीतर ही रखा जावे, ताकि वह भविष्य के एक व्यावहारिक भाजपाई रंग में पूर्णतः ढलकर पार्टी के लिए उपयोगी नेता बन सके। ठीक भी है, "कोतवाल को कोतवाली ही सिखाती है"। यद्यपि उनकी परवरिश तो राजमाता सिंधिया के कारण जनसंघ की ही रही है।

 गुजरात मॉडल की पुनरावृत्ति? 

तीन महीने पहले ही मै अपने लेख में लिख चुका हूं कि ‘‘गुजरात माडल’’ मध्य प्रदेश में दोहराया जायेगा। यद्यपि भाजपा हाईकमान चुनाव की घोषणा होने पर "तकल्लुफ में है तकलीफ सरासर" की उक्ति को ध्यान में रखते हुए स्वप्रेरणा व स्वविवेक से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सहित कुछ प्रमुख मंत्रियों और वरिष्ठ विधायकों से यह घोषणा करवायेगें कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे, संगठन का काम करेंगे, तभी पार्टी को सफलता की उम्मीद हो सकती है। क्योंकि पार्टी अब जनता के समक्ष ‘‘नेता बदलने के लिए पार्टी बदलने की जरूरत नहीं है,’’ की नीति पर आगे बढकर जनता को दूसरे भाजपाई नेताओं का विकल्प देने का प्रयास कर रही है। पार्टी ने अपनी चाल चल दी है और शतरंज की बिछायत पर पार्टी द्वारा फेंके गये इन मोहरों में कौन ‘‘किंग’’ बनकर अंततः उभरेगा, निकलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। यह बात सही है कि पार्टी ने "ब्रह्मास्त्र 2023" हथियार निकालकर उपयोग कर लिया है। अब इस ब्रह्मास्त्र के उपयोग/प्रयोग की सफलता पर टिप्पणी तो समय ही कर सकेगा। जनता तो अब राजनीति के खेल के मैदान के चारों तरफ बैठकर वोट देने की बारी आने की प्रतिक्षा भर कर रही है। मन शायद बना चुकी है। 

 सुश्री उमा श्री भारती की उपेक्षा कहीं भारी न पड़ जाए? 

अंत में भाजपा की चार तोपों को चुनावी मैदान में उतारने की कार्य योजना में सिर्फ बुंदेलखंड या लोधी समाज तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मध्यप्रदेश की हिंदुत्व की सबसे बड़ी चेहरा रही फायर ब्रांड साध्वी नेत्री पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमाश्री भारती जिन्होंने वर्ष 2003 में दिग्विजय सिंह की ‘‘बंटाधार सरकार’’ को सफलतापूर्वक हटा हटाकर जीत के 10 साल के सूखे को समाप्त किया था, को चुनावी मैदान में न उतार कर पार्टी ने कहीं एक बड़ी गलती तो नहीं कर दी है? महिला आरक्षण व महिला सशक्तिकरण पर जोर-शोर से कार्य करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति के बावजूद उनके पुरानी मंत्रिमंडल सहयोगी को चुनाव दंगल में न उतारना भी भाजपा के आश्चर्यचकित करने वाला निर्णयों की श्रृंखला का ही भाग हो सकता है। भाजपा नेतृत्व आगे इस गलती को क्या सुधारेगा? यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा। क्योंकि एक छोटी सी गलती भी पूरी कार्य योजना को असफल कर सकती है। फिर यह तो एक बड़ी गलती है।

रविवार, 17 सितंबर 2023

कांग्रेस क्या ‘‘आत्मघाती गोल’’ मारने की ‘‘विशेषज्ञ’’ होती जा रही है?

14 पत्रकारों के साथ असहयोग/बहिष्कार 

‘‘असावधानी’’ बरतने पर क्रिकेट में ‘‘हिट विकेट’’ और फुटबॉल, हॉकी के खेल में ‘‘गलत पास’’ दे देने से ‘‘आत्मघाती गोल’’ कभी कभार हो ही जाते हैं। परन्तु कांग्रेस की ‘‘राजनीतिक पिच’’ पर पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है कि ‘‘आत्मघाती गोल’’ मारने का अभ्यास कर कांग्रेस पार्टी उसकी विशेषज्ञ होकर शायद भाजपा की ‘‘चिंता व भार’’ को ‘‘हल्का’’ करने का प्रयास कर रही है? ‘‘औरों को नसीहत और खुद मियां फजीहत’’ उक्ति की प्रतीक कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला का बयान भाजपा का जो समर्थन करता है या जो भी उन्हें वोट देता है, वह, ‘‘राक्षस प्रवृत्ति’’ का हैं। विदेशी धरती पर देश की आर्थिक, राजनीतिक और विदेश नीति पर तथ्य परक न होकर तथ्यों से दूर राहुल गांधी के कथन, टिप्पणियां चाहे-अनचाहे अथवा जाने-अनजाने में कहीं न कहीं देश के सम्मान को विश्व पटल पर कमजोर करती हुई दिखती है। भगवान राम के जन्म, जन्म स्थल और अपमान, रामसेतु, सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्न, अनुच्छेद 370 हटाए जाने को मुस्लिम बहुल होने के कारण हिंदू-मुस्लिम कार्ड तथा कश्मीर को ‘‘फिलिस्तीन’’ ठहराए जाने का बयान, समान नागरिक संहिता,  चाय वाला, नीच इंसान, मौत का सौदागर, मोदी तेरी कब्र खुदेगी, आदि से लेकर नवीन एक राष्ट्र-एक चुनाव, सफल ऐतिहासिक जी-20 के आयोजन पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी, सनातन पर और ‘‘इंडिया गठबंधन’’ के एक महत्वपूर्ण घटक डीएमके के नेता मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के पुत्र उदय निधि स्टालिन के बयान का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन करने (कांग्रेस द्वारा उक्त बयान की आलोचना नहीं की गई) जैसे कि ‘‘एक कील ठोंके दूसरा उस पर टोपी टांगे’’ जैसे उदाहरण कांग्रेस के आत्मघाती गोल नहीं है, तो क्या आम जनों को उद्वेलित कर उनके (कांग्रेस के) पक्ष में करने वाले बयान है? नवीनतम उदाहरण तथाकथित ‘‘गोदी मीडिया’’ हालांकि इस ‘‘शब्द’’ का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन अंदाजे बयान तो वही है, चैदह पत्रकारों व चैनल के बहिष्कार का इंडिया गठबंधन जिसमें कांग्रेस प्रमुख भागीदार है, का निर्णय ‘‘जैसी रातों के ऐसे ही सबेरे होते हैं’’ भी इन्हीं आत्मघाती गोलो की कड़ी की एक और कड़ी है। सनातन पर जारी संग्राम अभी ठंडा भी नहीं हुआ है कि उक्त नये मुद्दे को इंडिया गठबंधन ने देवर ‘‘एंचन छोड़ घसीटन में पड़ कर’’ एनडीए को आलोचना करने का पुनः एक मौका अवश्य दे दिया है।

प्रेस की निष्पक्षता व स्वतंत्रता पर कहीं प्रहार तो नहीं?
मजबूत परिपक्व लोकतंत्र जिसका चैथा स्तम्भ ‘‘प्रेस’’ है, ऐसा समस्त पक्षों द्वारा कहा ही नहीं गया है, बल्कि माना भी जाता है। परंतु उलट इसके कांग्रेस द्वारा मीडिया के एंकरों पत्रकारों पर उक्त प्रतिबंध, बहिष्कार या अभी कांग्रेस जिसे असहयोग कह रही है, से प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर खतरा है, जिस पर दोनों पक्ष समय-समय पर अपनी चिंता व्यक्त करते रहे हैं। एक पक्ष प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरे के कारण बहिष्कार कर रहा है, तो दूसरा पक्ष उक्त प्रतिबंध लगाए जाने को प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता पर खतरा बता रहा है। इस प्रकार प्रेस के स्वास्थ्य को लेकर दोनों पक्ष की चिंता के बावजूद क्या प्रेस स्वयं भी स्वयं की स्वतंत्रता के बाबत चिंतित भी है, बड़ा प्रश्न यह है? यदि प्रेस वास्तव में धरातल पर ‘‘निष्पक्ष’ व शाब्दिक नहीं वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र होती तो, किसी भी पक्ष को उसकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता बनाए रखने पर चिंता करने की जरूरत ही नहीं होती। कहते हैं न कि ‘‘औघट चले न चैपट गिरे’’ इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि इंडिया गठबंधन के उक्त निर्णय से देश की प्रेस की स्वतंत्रता अच्छुण रह सकती है या खतरे में पड़ सकती है। प्रश्न यह है कि क्या यह कदम संविधान में विचारों के व्यक्त करने के संवैधानिक अधिकार जिस पर ही प्रेस की स्वतंत्रता टिकी हुई है, को देखते हुए क्या उक्त असहयोग का निर्णय उचित है? अथवा ‘‘ओछी नार के समान उधार गिनाने से’’ से बचा जा सकता था? अथवा बैगर किसी शोर-शराबे से इस तरह के निर्णय को व्यवहार में लागू किया जा सकता था, प्रश्न यह हैं? वैसे कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बहिष्कार की जगह गांधी जी के ऐतिहासिक ‘‘असहयोग आंदोलन’’ के असहयोग शब्द का प्रयोग कर असहयोग आंदोलन पर एक मालिन ही पोता है।
‘‘बहिष्कार’’ मतलब अपनी बात को जनता के सामने रखने का एक ‘‘अवसर खोना’’ है।
इसमें कोई शक नहीं है देश में अधिकांश मीडिया लगभग 90 प्रतिशत अंबानी, अडानी और भाजपा समर्थकों (जैसे कि डॉ. सुभाष चन्द्रा का ‘‘जी न्यूज’’) का मालिकाना हक है। इस कारण से उन मीडिया हाउसेस में काम करने वाले निष्पक्षता व स्वतंत्रता से काम नहीं करते है बल्कि चाह कर भी नहीं कर पाते है और अपनी ‘‘पत्रकारिता धर्म’’ नहीं निभा पाते हैं, जो उनकी पहचान के लिए आवश्यक है। इसलिए ऐसे मीडिया हाउसेस की डिबेटों में या उनको साक्षात्कार देने पर कहीं न कहीं विपक्ष के लोगों को असुविधा या असहज स्थिति हो जाती है। परन्तु बड़ा प्रश्न यह है कि घेरे में लिए गए उक्त मीडिया के प्रश्न ‘‘निष्पक्ष’’ न होकर ‘‘गाइडेड’’ प्रश्न होते है, जिसे कानून की भाषा में ‘‘लीडिंग प्रश्न’’ भी कह सकते है। परन्तु उत्तर तो आपके (विपक्ष के) ‘जबान’ बुद्धि, क्षमता पर निर्भर करता है। यद्यपि एंकरों गाइडेड उत्तरों को आपकी जुबान पर ठूंसने का प्रयास अवश्य करते है, परन्तु यहीं तो आपके व्यक्तित्व की परीक्षा होती है। इसलिए आपको तो इस बात की खुशी होना चाहिए, किन्ही मुद्दे बिन्दु पर हो रही बहस में आपको बुलाये बिना वे आपके खिलाफ अपने मीडिया पटल पर किसी अवधारणा को प्रसारित नहीं करते हैं। विपरीत इसके निश्चित की गई अवधारणा में आपको बुलाकर एक अवसर उसी प्रकार प्रदान अवश्य करते है, जिस प्रकार कानून का यह मूल सिद्धांत होता है कि कोई भी अपराधी या डिफॉल्टर को सुनवाई का अवसर दिये बिना उसे सजा नहीं दी जा सकती। इसलिए इंडिया गठबंधन को दिए जाने वाले अवसरों को चूकने के बजाय भुनाने का करतब दिखाने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा विपक्ष का हाल ‘‘औसर चुकी डोमनी गावे ताल बेताल’’, जैसा हो सकता है। इसलिए इंडिया गठबंधन को पत्रकारिता के हित में नहीं स्वयं के हित में इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए और जहां जिस भी चैनल में नहीं बुलाया जाता है, वहां भी उनको बुलाये जाने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि वह अपनी बात वजनदारी से जनता व श्रोता के सामने रख सके। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। वर्ष 2014 में एनडीटीवी का भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा बहिष्कार किया गया था। बीच-बीच में भी कई व्यक्तियों द्वारा घोषित/अघोषित रूप से बायकाट किया जाता रहा है। परंतु लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने जिसका महत्वपूर्ण खंभा मीडिया है, को भी स्वस्थ बनाये रखने के लिए तीनों पक्ष, पक्ष-विपक्ष तथा स्वयं मीडिया इस पर गहराई से आत्मचिंतन करे, मनन करे, आरोप-प्रत्यारोप अथवा ‘‘टूल’’ बनने की बजाए जिस उद्देश्य के लिए मीडिया की अवधारणा की गई है, की पूर्ति में समस्त लोग अपनी ‘‘आहुति दे’’। देश के स्वस्थ लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के इन्ही आशाओं के साथ

सोमवार, 11 सितंबर 2023

देश के "संसदीय इतिहास" में ‘‘विशेष सत्र’’ का आव्हान ‘‘विशेष तरीके’’ से।

 बिना एजेंडा के ‘‘सत्र’’ क्या ‘‘नये तरीका का एजेंडा’’ फिक्स करने का प्रयास तो नहीं है?

विशेष सत्र की संवैधानिक स्थिति। 

मुंबई में ‘‘इंडिया’’ गठबंधन की बैठक के ठीक पहले संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी ने पत्रकार वार्ता के माध्यम से देश के सामने आकर नहीं, बल्कि सर्वप्रथम पहले एक ट्वीट (सोशल मीडिया) के माध्यम से 18 से 22 सितंबर के बीच पांच दिवसीय ‘‘संसद का विशेष सत्र’’ बुलाने की जानकारी देश को दी। यह 17 वीं लोकसभा का 13 वां और राज्यसभा का 261 वां सत्र होगा। देश की संसदीय परम्परानुसार नियम नहीं संसद की तीन सामान्य बैठक मानसून, शीतकालीन व बजट सत्र के अतिरिक्त यदि कोई सत्र बुलाया जाता है, तो वह ‘‘विशेष सत्र’’ कहलाता है। तथापि यह नियम या कानून में परिभाषित नहीं है। यह सरकार का विशेषाधिकार है कि वह विशेष सत्र "कब, कैसे और कारण-अकारण" बुलाए। अनुच्छेद 85 के अनुसार संसद की वर्ष में कम से कम दो बैठके होनी चाहिए, तथा दो सत्रों के बीच छः महीने से अधिक का अंतर नही होना चाहिए। न्यूनतम 10 प्रतिशत से अधिक सांसदों की मांग पर भी विशेष सत्र बुलाया जा सकता है। यही संवैधानिक, वैधानिक स्थिति है।

अभी तक देश में कुल सात बार:- जून 2017 (आधी रात को जीएसटी के लिए), नवम्बर 2015 (125वीं आंबेडकर जयंती), अगस्त 1997 (स्वतंत्रता के 50 साल पूरे होने पर मध्य रात्रि में) अगस्त 1992 (भारत छोड़ो आंदोलन के 50 वर्ष पूरे होने पर) अगस्त 1972 (आजादी के 25 वर्ष) एवं 1962 (अटलजी के अनुरोध पर चीन युद्ध को लेकर) 14-15 अगस्त1947 को रात्रि को देश की आजादी के औपचारिक ऐलान के लिए पहला विशेष सत्र बुलाये जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति शासन लागू करने व विस्तार करने के लिए भी विशेष सत्र बुलाये गये हैं। परंतु "प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं" को चरित्र करती हुई वर्तमान में सीजीपीए (संसदीय कार्यों के लिए कैबिनेट मंत्रियों की कमेटी) द्वारा विपक्षी दलों को विश्वास में लिए बिना (हालांकि ऐसा न तो कोई नियम है और न ही परंपरा) केंद्रीय सरकार ने उक्त निर्णय लेकर विपक्ष को ‘‘अनावश्यक रूप’’ से आलोचना करने का एक अवसर अवश्य दे दिया है। 

‘‘विशेष सत्र’’ फिलहाल बिना ‘‘विषय’’ के। 

प्रश्न यही नहीं रुकता है, बल्कि ‘‘विशेष सत्र’’ बुलाए जाने की सूचना के तुरंत बाद ‘‘सूत्रों’’ के हवाले से समस्त मीडिया में यह समाचार ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चलने लग जाता हैं कि इस विशिष्ट सत्र में ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ लागू करने के लिए कानून में संशोधन करने के लिए एक विधेयक लाया जाएगा। सूत्र यही नहीं रूकते हैं, बल्कि आगे यह भी कहते हैं कि ‘‘सत्र’’ में 10 से ज्यादा महत्वपूर्ण बिल पेश किये जा सकते है, जिसमें जम्मू-कश्मीर में चुनाव, यूसीसी, नये दो आपराधिक कानून विधेयक, महिला आरक्षण बिल आदि शामिल हो सकते हैं। ‘‘सूत्रों’’ की उक्त ब्रेकिंग न्यूज को ‘‘सही’’ ठहराने के लिए ही अगले दिन पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जाने की घोषणा कर दी जाती है, जो ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ के संबंध में अपनी रिपोर्ट/सुझाव देगी।  तत्पश्चात अभी एक और ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लग गई है कि उक्त विशेष सत्र में इंडिया का नाम भारत किए जाने का विधेयक लाया जाएगा। जबकि सरकार की ओर से यह कहा गया कि ‘‘अमृतकाल में सार्थक चर्चा’’ के लिए यह विशेष सत्र बुलाया गया है। इन सब से हटकर केन्द्रीय सरकार के प्रवक्ता केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने इन सब अटकलों का खंडन करते हुए स्पष्ट रूप से यह कहा कि आम चुनाव ‘‘समय से पहले या बाद में’’ कराने का सरकार का कोई ‘‘इरादा नहीं’’ है। शायद अरुण जेटली के ‘‘शाइनिंग इंडिया’’ के दुष्परिणाम को देखकर तो नहीं? कहीं ऐसा न हो की "कच्ची सरसों पेर की खली होय न तेल"।

समिति की ‘‘निष्पक्षता की गुणक्ता’’। 

देश के इतिहास में यह भी शायद पहली बार हुआ है, जब पूर्व राष्ट्रपति को किसी ‘‘कमेटी का अध्यक्ष’’ बनाया गया हो, जो ‘‘राजनैतिक सक्रियता’’ का एक भाग है। इसके साथ नहीं, बल्कि 24 घंटे के भीतर इस कमेटी में 7 सदस्य जोड़कर उनका गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया। पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में बनी समिति को एक ‘‘नोटंकी’’ बताने वाले कांग्रेस ने कमेटी में शामिल किये गये लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने समिति की "शुचिता", वैधता पर प्रश्नचिन्ह न लगाकर इस्तीफा नहीं दिया? बल्कि राज्यसभा में विपक्ष के नेता व कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को समिति में शामिल न करने के विरोध में दिया। अब स्पष्ट है कि कमेटी की वैधता, शुचिता, आवश्यकता, गुण व  बिना एजेंडा या कहें कोई गुप्त एजेंडा लिए अस्पष्ट कार्यकाल के साथ यह विशेष सत्र बुलाया गया है। यानी कि "प्रारब्ध बन गया है, शरीर रचना भर शेष है"।

वर्ष 2022 में भी चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह एक साथ चुनाव कराने के लिए तैयार है, परंतु इसके पहले संविधान में आवश्यक संशोधन करना होगा। केंद्र सरकार ने भी पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में गठित कमेटी के नोट में अपने कदम के समर्थन में वर्ष 1999 की जस्टिस पी जीवन रेड्डी के लॉ कमीशन की 170 वीं रिपोर्ट का उल्लेख किया है। अतः उक्त कारणों से इस मुद्दे पर सिद्धांत रूप से समस्त लोगों की सहमति होने के बावजूद यह ‘‘राजनीति’’ ही है, जो ‘‘श्रेय लेने-देने’’ की राजनीति के चक्कर में "विरोध के स्वर" उठाए जा रहे हैं।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

एक राष्ट्र एक चुनाव पर अनावश्यक बहस’’ क्यों?

 ‘‘सही नीति’’ होने के बावजूद पूर्णतः धरातल पर ‘स्थायी’ रूप से लागू करना संभव नहीं!

एक राष्ट्र एक चुनाव फिलहाल ‘‘यूसीसी’’ समान एक ‘‘शिगूफा’’ तो नहीं

प्रश्न क्या ‘‘एक राष्ट्र एक चुनाव नीति’’ अभी लागू की जाना जरूरी है, उससे पहले यह प्रश्न यक्ष उत्पन्न होता है कि क्या सरकार वास्तव में इस संबंध में गंभीर भी है? यदि सरकार वास्तव में कोई संशोधन बिल लाना ही चाहती होती तो, उक्त उद्देश्य को इस विशेष सत्र बुलाने की घोषणा में समावेश कर लेती। जैसा कि पूर्व में जब-जब विशेष सत्र बुलाए गए हैं, तो उनके उद्देश्य घोषित किए गए थे। तदनुसार संसद में उन विषयों पर कार्यवाही भी हुई। चूंकि वर्तमान में कोई उद्देश्य (एजेंडा) घोषित किये बिना बुलाए इस विशेष सत्र में सरकार इस संबंध में कोई विधेयक लाएगी, इसकी संभावनाएं इसलिए भी नगण्य सी लगती हैं कि, एक तरफ सरकार ने इस संबंध में एक कमेटी ही बना दी है, तब उसकी रिपोर्ट/सिफारिश आने तक तो इंतजार करना ही होगा। यह रिपोर्ट 15 दिन के अंदर आ जाए, ऐसा संभव लगता नहीं है। क्योंकि इस कमेटी का कार्यकाल का समय स्पष्ट रूप से ‘‘निश्चित’’ नहीं किया गया है। दूसरी ओर, संसदीय मंत्री का यह कथन कि कमेटी की रिपोर्ट आयेगी, जिस पर चर्चा होगी। परन्तु उन्होंने भी यह नहीं कहा कि इसी ‘‘विशेष सत्र में ही’’ चर्चा होगी। इसलिए मीडिया या विपक्ष का इस संबंध में हंगामा खड़ा करना उचित नहीं है। वैसे भी जिस प्रकार ‘‘यूनीफार्म सिविल कोड’’ को लेकर सरकार ने विस्तृत जन चर्चा कराई और मीडिया ने खूब सुर्खियां भी बटोरी। परन्तु आज वह ‘‘कोड’’ संसद में किस कोने पर है? कहने की आवश्यकता नहीं है। जोर खरोश से ‘‘सीएबी’’ पारित होने के बावजूद आजतक नियम न बनाये जाने के कारण धरातल पर लागू नहीं किया जा सका। क्यों? 

विपक्ष की प्रतिक्रियाएं। 

‘‘हर शख्स बुद्धिमान है, जब तक वह बोलता नहीं’’, इस सिद्धांत के धुर विरोधी राहुल गांधी के इस संबंध में दिए गए बयान की बात कर लेते हैं। देश की विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस जो ‘‘इंडिया’’ को लीड करती हुई दिख रही है, के सर्वोच्च प्रभावशाली नेता राहुल गांधी का यह कथन की ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ ‘‘संघवाद पर चोट है’’ न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि यह उनकी समझ पर भी ‘‘प्रश्न वाचक चिन्ह’’ फिर लगाता है, जैसा की उनकी भारत यात्रा के पूर्व कई अवसरों पर लगाया जाता रहा है। प्रश्न यह है कि क्या केंद्रीय सरकार ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ के द्वारा कोई नई चीज ला रही है, नई बात कह रही है? बिल्कुल भी नहीं। राहुल गांधी आलोचना में कभी इतने अंधे हो जाते हैं कि जब वे इस मुद्दे पर आलोचना करते हुए यह कह जाते हैं कि यह ‘‘संघवाद पर आघात’’ है, तो वे यह भूल जाते हैं कि वर्ष 1952 से लेकर 1967 तक हुए चुनाव ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ के तहत ही हुए थे। तब समस्त समय कांग्रेस की सरकारे ही थी। क्या तब भी वह संघवाद पर आघात था? ‘‘हंसुआ के ब्याह में खुरपी के गीत गाने वाले’’ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने विरोध करते हुए कहा कि मोदी सरकार चाहती है कि लोकतांत्रिक भारत धीरे-धीरे तानाशाही में तब्दील हो जाए. एक राष्ट्र, एक चुनाव पर समिति बनाने की ये नौटंकी भारत के संघीय ढांचे को खत्म करने का एक हथकंडा है। ‘‘हमारे घर आओगे क्या लाओगे, तुम्हारे घर आएंगे क्या खिलाओगे’’ के आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि देश के लिए क्या जरूरी है, वन नेशन वन इलेक्शन या वन नेशन वन एजुकेशन (अमीर हो या गरीब, सबको एक जैसी अच्छी शिक्षा), वन नेशन वन इलाज (अमीर हो या गरीब, सबको एक जैसा अच्छा इलाज), आम आदमी को वन नेशन वन इलेक्शन से क्या मिलेगा।

यह कोई नई नीति नहीं, पूर्व प्रचलित प्रणाली ही है। 

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि ‘‘वन नेशन वन इलेक्शन’’ कोई ‘‘नया सिद्धांत’’ ‘‘नीति’’ या ‘‘प्रणाली’’ नहीं है। बल्कि वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 1967 तक वर्तमान (समय-समय पर संशोधित) जनप्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत ही इस देश में इसी नीति के तहत सफलतापूर्वक चुनाव होते रहे हैं। इसलिए इस नीति के ‘गुण’ (मेरिट्स) पर सिद्धांत न तो कोई आपत्ति की जा सकती है और नहीं कोई विवाद हो सकता है। इस नीति को पुनः धरातल पर उतारने से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि भारी धन अपव्यय होने से भी बचेगा। क्योंकि जब स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा, लोकसभा के चुनाव होते हैं, तब दो-ढाई महीने पूर्व से चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू कर दी जाती है और सरकार को नीतिगत निर्णय लेने से चुनाव आयोग द्वारा रोक दिया जाता है। वैसे समय-समय पर विभिन्न राजनेता गण इसकी वकालत करते रहे हैं। चुनाव आयोग ने वर्ष 82-83 में एक साथ चुनाव कराने के संबंध में सुझाव दिए थे। दिसम्बर 2015 में संसद की स्थायी समिति ने अपनी 79वीं रिपोर्ट में 1999 की बीपी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता वाले ला कमीशन की 170 वीं रिपोर्ट के आधार पर दो चरणों में चुनाव करवाने की सिफारिश की थी? वर्ष 2017 में नीति आयोग ने भी एक साथ चुनाव का विश्लेषण ‘‘क्या, क्यों और कैसे’’ नाम से वर्किंग पेपर में किया था। वर्ष 2018 में जस्टिस बी एस चैहान की अध्यक्षता में गठित विधि आयोग ने भी संबंध में एक रिपोर्ट दी थी, जिसमें राजनैतिक दलों से विचार-विमर्श के साथ पांच संवैधानिक संशोधन करने की जरूरत बतलाई थी।

आम सहमति प्रथम प्राथमिकता। 

सरकार ने कमेटी की घोषणा जिस समय की है, उसकी ‘‘टाइमिंग’’ को लेकर जरूर सरकार को कटघरे में खड़ा करने का एक मौका अवश्य विपक्ष को दे दिया है। प्रश्न फिर वही है कि वास्तव में क्या सरकार इस मुद्दे पर संजीद है? क्योंकि यदि वास्तव में इसको धरातल पर उतारना है, तो कानून में संशोधन करने के पहले केंद्रीय सरकार का यह महत्वपूर्ण दायित्व बनता है कि वह ‘‘हंडिया चढ़ा कर नोन ढूंढने न निकले’’ बल्कि पहले समस्त राज्य सरकारों से इस संबंध में बात कर ‘‘सहमति बनाने का प्रयास अवश्य करें’’ और यदि सहमति बन जाती है, तब फिर कानून में कोई संशोधन करने की आवश्यकता ही उत्पन्न नहीं होगी। जैसा कि कहा जाता है कि ‘‘वक्र चंद्रमहि ग्रसहुं न राहु’’। इसी वर्ष जुलाई 2023 में संसद में सांसद किरोड़ी लाल मीणा द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल का एक साथ चुनाव कराने के संबंध में यह जवाब था कि राजनीतिक दलों की आम सहमति के साथ देश का ‘‘संघीय ढांचा’’ होने के कारण राज्यों के साथ ‘‘सहमति’’ बनाए जाने की आवश्यकता है। साथ ही ऐसा किये जाने पर कई हजार करोड़ का खर्चा ‘‘ईवीएम’’ का बढ़ जाएगा। जबकि ‘‘एक साथ चुनाव’’ के पीछे का मुख्य उद्देश्य समय-धन कम करना ही बताया जा रहा है। वर्ष 1967 के बाद जब यह स्थिति उत्पन्न हुई है, जहां अधिकतर जगह केंद्र राज्यों के चुनाव अलग-अलग समय में होने लगे हैं, तो वह कानून में कोई परिवर्तन होने के कारण नहीं हुए हैं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों के घटने के कारण वैधानिक रूप से उत्पन्न हुए हैं।

एक साथ चुनाव क्या ‘‘स्थाई’’ ‘‘रूप-स्वरूप’’ ले सकेगा?

आम सहमति न होने के की स्थिति में संवैधानिक संशोधन किए जा कर एक साथ लोकसभा विधानसभा के चुनाव एक या दो चरण में करने के बावजूद क्या भविष्य में भी यही स्थिति हमेशा रह पाएगी? देश की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। भविष्य में केंद्र या राज्यों की सरकारें किसी भी कारण से गिरने से या भंग किये जाने की स्थिति में यह चक्र टूटना लाजिमी है। क्योंकि यह कानून नहीं बनाया सकता कि एक बार चुनी गई सरकार 5 साल की पूर्ण अवधि पूरा करेगी। चाहे संसद या विधानसभा में बहुमत हो अथवा नहीं। अथवा उनकी संसद या विधानसभा भंग करने की सिफारिश नहीं मानी जाएगी? हमारे देश में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली है। अमेरिका के समान राष्ट्रपति प्रणाली नहीं है, जहां राष्ट्रपति प्रतिनिधि सभा या सीनेट के प्रति जिम्मेदार नहीं होता है। वैसे यह राज्य सरकार की नहीं बल्कि केन्द्र सरकार की समस्या ज्यादा है। तब फिर इस तरह की कवायद करने का अर्थ क्या है?

वैसे चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह चुनाव को निर्धारित समय के साथ छः महीने पहले या छह महीने बाद तक कर सकती है। यदि चुनाव आयोग के इस अधिकार क्षेत्र को छः महीने की जगह 1 साल का अधिकार दे दिया जाये तो वह समस्त समस्या का व्यवहारिक हल यथा संभव उक्त ‘‘गोल’’ के निकट तक निकाल सकता है।

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

‘‘गैस सिलेंडर में ₹200 की छूट का ‘‘अर्थ’’, ‘‘अर्थशास्त्र’’ और ‘‘राजनीति शास्त्र’’! तथा पक्ष-विपक्ष के बीच ‘‘शास्त्रार्थ’’!

भूमिका

चुनावी वर्ष में हिंदू रीति रिवाज और त्योहारों का ख्याल हर राजनीतिक पार्टी बड़ी ‘‘चिंता’’ से ‘‘चिंता जनक स्थिति’’ को दूर करते हुए करती रही है। सर्व-धर्म, सर्वभाव की सिर्फ कल्पना ही नहीं, बल्कि दावा करने वाले समस्त राजनीतिक दल होते हैं। परंतु अन्य धर्मों के प्रति चुनावी वर्ष में भी वे उतने उदार होते हुए दिखते नहीं हैं, जितने हिंदू धर्म के प्रति। कारण! देश की लगभग 80% जनसंख्या हिंदू धर्म को मानने वाली है। आईये, प्रधानमंत्री की इस घोषणा के अर्थ और उसके पीछे छुपे समस्त ‘‘अर्थ’’ और ‘‘अनर्थ’’ का कुछ बारीकी से अध्ययन कर लें।
प्रधानमंत्री का "रक्षाबंधन" पर "सत्ता बंधन" को मजबूत करने का प्रयास।
शायद इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गैस उपभोक्ताओं को रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में ₹200 की राहत की घोषणा की है, जिसमें 33 करोड़ एलपीजी उपभोक्ताओं को फायदा मिलेगा। ‘‘उज्ज्वला योजना’’ के अंतर्गत ₹200 सब्सिडी देने की घोषणा की है। इस प्रकार उक्त योजना में कुल ₹400 का फायदा एक गृहिणी को होगा। साथ ही 75 लाख नए गैस कनेक्शन ‘‘उज्जवला योजना’’ में जारी होने की घोषणा भी की गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजनीति से परे शुद्ध नीतिगत, जनोन्मुखी, कल्याणकारी योजना ‘‘उज्ज्वला योजना’’ वर्ष 1 मई 2016 में प्रारंभ की थी, जो वोट पाने की ‘‘लालच’’ से नहीं थी, क्योंकि तब न तो कोई चुनाव थे, और न ही चुनावी घोषणा पत्र में इस योजना का कोई उल्लेख किया गया था। अब रक्षाबंधन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने ‘‘सत्ता विखंडन’’ से बचाने के लिए देश की बहनों को ₹200 का रक्षाबंधन का उपहार देकर ‘‘सत्ताबंधन’’ को मजबूत करने का प्रयास ही किया है। सफल कितना होगा? यह तो आगे समय ही बतलाएगा। प्रधानमंत्री ने रक्षाबंधन के अवसर पर ‘‘बहनों’’ का उल्लेख किया है, जैसा की समाचार पत्रों में पूरे पेज के विज्ञापनों से भी सिद्ध होता है। परंतु साथ ही रक्षाबंधन के साथ ‘‘मलयाली ओणम त्योहार’’ जो किसानों का एक बड़ा त्योहार होता है, का उल्लेख नहीं किया है। शायद इसलिए कि ओणम हिंदुओं का त्योहार होने के बावजूद वह सिर्फ मुख्य रूप से केरल प्रदेश तक ही सीमित है, जहां ‘‘लेफ्ट की सरकार’’ है।
सिलेंडर की कीमत का आधार एवं गणित।
देश में घरेलू एलपीजी की कीमत का निर्धारण मुख्यतः दो बातों पर निर्भर करता है। एक इंपोर्ट पैरिटी प्राइस (आईपीपी) के फार्मूले से तय होते हैं। भारत में आईपीपी का बेंचमार्क सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी ‘‘सऊदी अरामको’’ एलपीजी की कीमत तय करती है। नवंबर 2020 की तुलना में गैस के दाम में 104 फीसद की बढ़ोतरी की गई। उस वक्त एलपीजी की दर 376.3 प्रति मीट्रिक टन थी, जो अभी 769.1 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पर पहुंच गई है। वर्ष 2014 में यूपीए सरकार के समय सऊदी अरामको एलपीजी की कीमत 1010 डॉलर प्रति मीट्रिक टन थी, जो जनवरी 2023 में घटकर 590 डॉलर मीट्रिक टन हो गई। कच्चे तेल का भी यही हाल है। नवंबर 2020 में कच्चे तेल की दर 41 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मार्च 2022 में 115.4 डॉलर पर पहुंच गई। यूपीए सरकार के समय वर्ष 2014 में सिलेंडर के दाम ₹410 थे, जब कच्चे तेल की कीमत 106.85 डॉलर प्रति बैरल के उच्च अंक पर थी, जिस पर जनता को सहूलियत देने के लिए 827 रुपए की सब्सिडी दी जाती थी। यूपीए सरकार की विदाई के बाद एनडीए सरकार में पहली बार 1 मार्च 2015 को गैस सिलेंडर की कीमत बढ़कर 610 रुपए हुई, जो बढ़कर 1 मार्च 2018 में 689 रू. हुई और 1 मार्च 2020 में 805.50 रू. होकर वर्तमान में 1103 रु. हो गई। इसका मुख्य कारण लगातार सब्सिडी को घटाना भी रहा है। वर्ष 17-18 में 23464, 18-19 में 37209 करोड़, 19-20 में 24172 करोड़, 20-21  में 11896 करोड़, 21-22 में मात्र 242 करोड़ सब्सिडी घटकर रह गई है।  
कीमत तय करने का दूसरा आधार डॉलर और रुपए का कन्वर्जन मूल्य है, जहां रुपये की कीमत लगातार गिरती जा रही है। स्पष्ट है कि 2020 में अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एलपीजी के दामों में तेजी से बढ़ने से व देश में सब्सिडी लगातार कम किये जाने के कारण गैस की कीमत वर्तमान में 1103 रू. तक पहुंच गई। इसमें ही ₹ 200 की छूट प्रदान की गई है।
कीमत घटाने के पीछे की राजनीति।
अब इस रसोई गैस की कीमत कम करने के पीछे की न ‘‘नीति’’ न ‘‘अर्थनीति’’ बल्कि ‘‘राजनीति’’ को भी समझ लीजिए। रसोई के ईंधन के अन्य साधन लकड़ी, कोयला, कोक, मिट्टी का तेल इत्यादि को महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक विश्व स्वास्थ्य संगठन का हवाला देते हुए तब बतलाया जाता है, जब धरेलू गैस की कीमतें सरकारें चाहे केंद्र की हो अथवा राज्यों की हों, कम करती है। परंतु आश्चर्य की बात तब होती है, जब ये ही सरकारें इनकी कीमत बढ़ाई जाती हैं, तब उन्हे महिलाओं के ‘‘स्वास्थ्य’’ का ध्यान बिल्कुल भी नहीं रहता है। यही ‘‘राजनीति’’ है, ‘‘नीति’’ नहीं। महंगाई की दौर में गैस कीमतों में की गई कमी को इस तरह से भी देखिये कि जिस प्रकार यूपीए-1 की तुलना में यूपीए-2 के असफल होने से उन्हें सत्ता से वंचित होना पड़ा था। ठीक लगभग कुछ वैसी ही स्थिति एनडीए-1 की तुलना में एनडीए-2 की वर्तमान में हो गई हैं। एनडीए के प्रथम कार्यकाल में मात्र 135 रू. गैस की कीमत में बढ़ोतरी हुई, जबकि वर्तमान द्वितीय कार्यकाल में कुल 645 रू. की की गई। इस कारण से प्रधानमंत्री कहीं न कहीं सत्ता जाने की आशंका से ग्रस्त हो गए लगते हैं। इस कारण चुनावी वर्ष में कुछ न कुछ राहत देते हुए कार्रवाई करते दिखते जाना राजनैतिक मजबूरी भी बन गई थी।
छोटे व्यावसायिक उपयोग की एलपीजी पर राहत क्यों नहीं?
कांग्रेस प्रवक्ता सांसद रणदीप सुरजेवाला का यह कहना है कि इन साढ़े 9 सालों में मोदी सरकार ने लगातार गैस के दाम बढ़ाकर 8 लाख 33 हजार करोड़ (यूपीए-एनडीए के समय गैस की कीमत के अंतर के आधार पर की गई गणना) से ज्यादा की वसूली जनता से की है। यद्यपि यह आकड़ा सत्यापित नहीं है और अतिरंजित भी हो सकता है, क्योंकि उक्त गणना में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में हुए उतार चढ़ाव के प्रभाव को शामिल नहीं किया गया लगता है। वास्तव में कीमतों में कमी का निर्णय यदि नीतिगत होता तो, जिस प्रकार घरेलू उपयोग की एलपीजी के लिए ‘‘उज्जवला योजना’’ बनाई गई, तब क्या व्यावसायिक उपयोग में आने वाली एलपीजी गैस के लिए भी कोई योजना नहीं बनाई जा सकती थी? एक खोमचे वाला, ढाबे, ‘‘चाय’’ की गुमठियों, छोटी होटलें जो जीएसटी की पंजीयन की सीमा में नहीं आती है और बड़ी होटलें तथा 3-5-7 स्टार होटलों में उपयोग में आने वाली सिलेंडर के दाम एक समान नहीं रखे जाते? साथ ही शादी-ब्याह, भंडारा में सिलेंडर का उपयोग व्यावसायिक नहीं माना जाता। स्पष्ट है, इस पर कभी भी विचार ही नहीं किया गया, क्योंकि इस संबंध में ‘‘नीतिगत’’ निर्णय लेने से परहेज किया गया। प्रधानमंत्री के इस निर्णय से चूक भी प्रदर्शित होती लगती है। जिस प्रकार सिक्के के दो पहलू होते हैं, तलवार द्विधारी होती है, उसी प्रकार प्रधानमंत्री के गैस सिलेंडर की कीमत कम करने के निर्णय का दूसरा पहलू का एक मैसेज स्पष्ट संकेत यह भी जाता है कि प्रधानमंत्री ने एक तरह से यह स्वीकार कर लिया है कि देश की जनता महंगाई से पीड़ित है। तब इसके लिए जिम्मेदार कौन? महिलाएं जो इस कमर तोड़ महंगाई का सामना अपनी रसोई घर में ज्यादा महसूस करती हैं, वहां कुछ राहत प्रदान कर महिलाओं को अपनी और झुकाया जा सके। प्रधानमंत्री का उक्त घोषणा या कहें उद्घोषणा का उद्देश्य भी शायद यही है।
देश की आधी जनसंख्या (महिलाएं) का सिर्फ ‘‘वोट’’ के रूप में उपयोग। परन्तु ‘‘अपेक्षा के बदले उपेक्षा’’।
देश की लगभग कुल 95.50 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 46 करोड़ से अधिक मतदाता महिलाएं है, जिन पर सावन का तथाकथित उपहार (जो वस्तुतः उपहार न होकर यह  उनका हक है) के ‘‘भार का दबाव’’ बनाकर संतुष्ट कर सत्ता फतेह की जा सके। परंतु समस्त राजनीतिक पार्टियों कुल मतदाताओं का लगभग आधा भाग महिलाओं के मतों (वोट) की ‘‘आशा’’ की टकटकी लगाये समानांतर जब लोकतंत्र में चुनावों में जनता के बीच जाने के लिए टिकट देने की बात आती है, तब समस्त राजनीतिक दल महिलाओं की लगभग 50% की भागीदारी को बहुत आसानी से सुविधाजनक रूप से भूल जाते हैं। दुखद विषय तो यह भी है कि महिलाएं भी इस ‘‘भूल’’ की सजा उन राजनीतिक पार्टियों को चुनाव में नहीं देती है। शायद इसी कारण से जब सत्ता में भागीदारी की बात उठती है, तब समस्त नेतागण महिलाओं की एकजुटता न रहने के कारण अपेक्षा के बदले उनकी ‘‘उपेक्षा’’ जब तब करते रहते हैं। इसलिए सिद्धांत रूप से समस्त राजनीतिक दलों में सहमति होने के बावजूद आज भी संसद में लोकसभा-विधानसभा की 33% सीटों पर आरक्षण का कानून पारित नहीं हो पाया है। यह सिर्फ महिलाओं का ही नहीं, देश का भी दुर्भाग्य है।
तथापि जहां तक मध्य प्रदेश का सवाल है, शिवराज सिंह की सरकार ने महिला के जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक संपूर्ण समृद्ध जीवन के लिए 147 सरकारी योजनाएं लागू की है, जिस कारण आधी जनसंख्या को फायदा शिवराज सिंह को निश्चित रूप से मिलेगा। प्रश्न यह जरूर है कि यह फायदा निर्णयात्मक होगा अथवा नहीं?

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