गुरुवार, 28 जुलाई 2022

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का ‘‘साहसिक’’ कथन!

 ‘‘कंगारू कोर्ट चला रहा है मीडिया’’

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश माननीय एनवी रमना ने रांची में ‘‘एस बी सिन्हा मेमोरियल लेक्चर’’ के उद्घाटन अवसर पर बोलते हुए यह कहा कि देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ‘‘गैर-जिम्मेदार’’ होकर ‘‘कंगारू अदालते’’ चला रहे है, जिस कारण से अनुभवी जजों को भी फैसला करने में दिक्कत हो रही है। न्याय से जुड़े मुद्दों पर गलत एजेंडा चलाना/एजेंडा आधारित बहसे, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं। मीडिया से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्ष कामकाज प्रभावित होती है। तथापि ‘‘प्रिंट मीडिया काफी हद तक जिम्मेदारी’’ निभा रहा है। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने उक्त एक कथन में ही चार महत्वपूर्ण बातें एक साथ कह दी हैं। आइये! क्रमशः इनका आगे विश्लेषण करते हैं। 

लोकतंत्र के चार खंभों में से दो प्रमुख खंभे न्यायपालिका और मीडिया है। यहां पर एक खंभा लोकतंत्र के दूसरे खंभे पर सिर्फ आरोप/आक्षेप ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि चिंताजनक वस्तु स्थिति का वर्णन भी कर रहे है। निश्चित रूप से इससेे देश के लोकतंत्र का संतुलन कहीं न कहीं अवश्य गड़बड़ा जाएगा और लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। हां मीडिया के कुछ लोग अवश्य उक्त कथन के लिये माननीय मुख्य न्यायाधीपति पर यह आरोप जड़ सकते है कि जिस तरीके से उन्होंने ‘‘मीडिया ट्रायल’’ की आलोचना की है, वह स्वयं न्यायालय द्वारा प्रतिपादित न्याय के उस सिंद्धान्त के प्रतिकूल है, जहां आरोपी या दोषी कहे जाने के पूर्व न्याय के मूल सिंद्धान्त के अनुसार आरोपी को सफाई का पर्याप्त व उचित अवसर दिया जाना चाहिए। इस न्याय सिंद्धान्त का पालन स्वयं मुख्य न्यायाधीश महोदय ने वर्तमान में नहीं किया है।  

75 साल के स्वतंत्र भारत के इतिहास में व इसके पूर्व भी मीडिया, जिसे ‘‘मधुमक्खी का छत्ता’’ कहा जा सकता है, पर इसी कारण कोई सामान्य रूप से हाथ नहीं डाल पाता है। तब ऐसी स्थिति में एक ऐसे प्रमुख व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश है, की उक्त टिप्पणी साहसिक होकर चिंता में ड़ालने वाली है। सामान्यतः मुख्य न्यायाधीश या न्यायालय को इस तरह की टिप्पणी से बचना चाहिए, खासकर जब वे किसी मामले के निपटारे के समय (प्रांसगिक उक्ति) न कहकर सार्वजनिक कार्यक्रम में कह रहे हों। वास्तव में यह कार्य तो कार्यपालिका व विधायिका का है, क्योंकि सुधार लाने का कार्य अंततः विधायिका और कार्यपालिका का ही है। यदि ऐसी स्थिति में मुख्य न्यायाधीश आगे होकर टिप्पणी कर रहे है, तो यह ज्यादा चिंता का विषय है।

मैं पूर्व में कई बार लिख चुका हूं, यदि देश को सुधारना है, नैतिक मूल्यों के स्तर को गिरते हुए रोकना है, तो इस ‘‘अफलातून के नाती’’ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ‘‘जहां मुर्गा नहीं बोलता वहां क्या सवेरा नहीं होता’’? अब तो मीडिया की स्थिति ‘‘मीडिया ट्रायल’’ से होकर कंगारू कोर्ट तक पहुंच गई। "हाथ कंगन को आरसी क्या", न्यायाधिपति अब जब स्वयं कह रहे है, तो लोकतंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए इसके चैथे खंभे मीडिया को इस पर  गंभीरता से आत्मावलोकन करना ही होगा। आदर्श स्थिति यही होगी, मीडिया स्वयं अपने ‘‘व्यामिचार’’ पर प्रतिबंध लगाये, बजाए सरकार आगे आकर प्रतिबंध लगाये। मीडिया हाउस यदि ऐसा नहीं करते है, तो न केवल लोकतंत्र को बचाने के लिए, बल्कि मीडिया द्वारा पैदा की जा रही अराजकता को समाप्त करने के लिए सरकार को कुछ न कुछ युक्तियुक्त प्रतिबंध मीडिया पर इस तरह से लगाने होंगे, जहां अवश्य मीडिया की स्वतंत्रता भी बनी रहे, और वे जिम्मेदार मीडिया के रूप में देश व समाज के प्रति अपना दायित्व व रोल अदा कर योगदान कर ‘‘जीवट लोकतंत्र’’ को जीवित रख सके। वैसे भी मीडिया को सीख देने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि मीडिया तो दूसरो को सीख देता है। मीडिया को सीख देना तो ‘‘नानी के आगे ननिहाल की बातें करने’’ जैसा है। परन्तु जिस प्रकार एक अच्छे शिक्षक को विद्यार्थी को अच्छी शिक्षा देने के के पूर्व खुद की भी पूरी तैयारी करनी होती है, ठीक उसी प्रकार मीडिया का भी दायित्व होता है।

सार्वजनिक जीवन के लिए ‘कंगारू कोर्ट’ एक नये शब्द की उत्पत्ति है। जो ‘मीडिया’ की अवस्था (अव्यवस्था?) का बयान (बखान?) कर देती है। असंवैधानिक गैर कानूनी तरीके से, कानून को नजरअंदाज करने वाली कार्रवाई ‘कंगारू कोर्ट’ है। 

जहां तक कंगारू कोर्ट के कारण अनुभवी जजों को फैसले लेने की दिक्कत का सवाल है, यह कथन माननीय मुख्य न्यायाधीश की ‘‘सूरदास खल कारी कमरी चढ़े न दूजो रंग’’ वाली छवि के अलावा न्यायाधिपतियों की योग्यता, सक्षमता, विद्धवता, कार्य कुशलता पर एक हल्का सा प्रश्न चिन्ह अवश्य लगाता है। अभी तक यह मात्र ‘गासिप’ के रूप में चर्चा का विषय रही है कि न्यायाधीश भी कानून व तथ्यों से परे उनके साथ या सामने गुजर रही परिस्थितियों से प्रभावित हो जाते है। अब इस बात पर स्वयं मुख्य न्यायाधीश ने एक मुहर सी लगाकर उसे ‘‘गोसिप’’ से बाहर कर सत्य के धरातल पर ला दिया है।  

जहां तक बात लोकतंत्र पर खतरे की घंटी बजने की है, वहीं लोकतंत्र तो मीडिया को उतनी आजादी या आवारागर्दी करने का अवसर दे रहा है, जो उसी (लोकतंत्र) को ही खा जा रहा है। अर्थात भस्मासुर बन गया है। याद कर लीजिए! आपातकाल के वे दिन जब लोकतंत्र के निलंबित (समाप्त नहीं) होने के कारण मीडिया की हालत क्या हो गई थी।

अंत में प्रिंट मीडिया कोे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से ऊपर रख कर प्रिंट मीडिया की जो तुलनात्मक प्रंशसा माननीय न्यायाधिपति ने की है, निश्चित रूप से वह तथ्यात्मक रूप से सही है। पुनः माननीय मुख्य न्यायाधीश को इस बात के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने दोनों मीडिया के बीच खिंची बारीक रेखा को सही गुणात्मक रूप से उभारा है।शायद इसका ही यह परिणाम रहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस विषय पर मुख्य न्यायाधीश को ट्रोल नहीं किया गया व इस पर ज्यादा आलोचनात्मक बहस नहीं हुई। 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना उच्चतम न्यायालय के उन 4 वरिष्ठ न्यायाधीशों सर्व श्री जस्टिस चेलमेश्वर, मदन लोकुर, कुरियन जोसेफ एवं जस्टिस रंजन गोगोई से एक कदम आगे बढ़ गये है, जिन्होंने भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार 12 जनवरी 2018 को बाकायदा पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपने विचार रखते हुए अदालत के प्रशासन में अनियमितताओं पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे। मजे की बात तो यह है कि जिस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग कर उक्त उन चारों माननीय न्यायाधीशों ने अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखी, उसी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की धज्जियां उड़ाते हुए शायद आंखें तरेरते हुए आईना दिखाते हुए उन्हें अपनी सीमा में रहने की अप्रत्यक्ष चेतावनी माननीय मुख्य न्यायाधीश ने दी है।  

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

(सामान्य) ’’अनारक्षण’’ में भी आरक्षण?

देश की ’’विलक्षण’’ राजनीति ’’आरक्षण’’ के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई है, चाहे फिर कोई भी राजनीतिक दल क्यों न हो। बल्कि यह कहा जाए कि भारत का लोकतंत्र तो ‘‘विश्यस सर्किल ऑफ इन्कॉम्पीटेंसी’’ अर्थात वोटों की राजनीति के दुष्चक्र में आरक्षण से केंद्रित होकर घूमता हुआ चारों तरफ से घिरा हुआ है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने अवश्य यह प्रतिबंध लगाया है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी स्थिति में, कहीं भी नहीं होना चाहिए। बावजूद इसके ‘‘क्षते क्षारप्रक्षेपः’’विभिन्न राज्य सरकारें समय-समय पर इस 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन कर आरक्षण की सीमा बढ़ाती रही हैं। और तब उच्चतम न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करना पड़ता है।
मध्य प्रदेश में अभी 52 जिलों की 23012 ग्राम पंचायतें, 52 जिला पंचायत,  313 जनपद पंचायते, 362754 पंच, 298 नगर परिषद 76 नगर पालिकाएं और 16 नगर निगमों के चुनाव संपन्न हुए हैं। प्रदेश में अनेक अनेक जगहों में यह देखने में आया कि अनारक्षित सामान्य वर्गो में भी आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधियों को राजनीतिक पार्टियों ने चुनावों में उतारा है। एक अनुमान के अनुसार अधिकतर जिलों में उक्त स्थिति पायी गई है। जहां 18 नगर निगमों में लगभग 20 से 25 प्रतिशत उम्मीदवार सामान्य अनारक्षित वार्डों से आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों ने चुनाव लडे़। परिणाम स्वरूप सम्पन्न हुए स्थानीय शासन के सम्पूर्ण चुनावों में कुल 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षित व्यक्ति चुनाव लड़े है। यानी ‘‘ज्यादा जोगी मठ उजाड़’’ जैसी स्थिति पैदा हो गयी है। यद्यपि यह संविधान या किसी कानून का उल्लंघन अवश्य नहीं है, परन्तु उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित आरक्षण के संबंध में खीची गई लक्ष्मण रेखा की भावना का खुल्लम-खुल्ला ‘‘वैधानिक’’ तरीके से उल्लंघन जरूर है। निश्चित रूप से यह परिस्थिति सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के हकों पर कुठाराघात है। इसलिए आरक्षित वर्ग को ‘‘अपनी ही खाल में मस्त रहने का सुख’’ प्रदान करने वाले इस वैधानिक कवच व आवरण को हटाये जाने की महती आवश्यकता है।
अतः यह कानून बनाये जाने की तुरंत आवश्यकता है कि सामान्य वर्ग से आरक्षित वर्ग का व्यक्ति चुनाव ही नहीं लड़ सके, ऐसा प्रावधान पंचायत अधिनियम व जनप्रतिनिधित्व कानून में किये जाने की नितांत आवश्यकता है। मेरे बैतूल जिले में भी स्थानीय शासन के चुनावों में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगेे। यह कोई पढ़ाई की कक्षा नहीं है, जहां आरक्षित वर्ग के व्यक्ति अनारक्षित वर्ग को चुनकर अपनी योग्यता को प्रमाणित कर चयनित होता है। शायद वह ऐसा इसलिए करता है कि यह चयन उसके व्यक्तित्व के विकास को और गति व संबल प्रदान करती है।  
अब जनपद, जिला पंचायत, नगर पंचायत और नगरपालिका व नगर निगमों के अध्यक्षों के चुनाव संपन्न होना शेष है, जिसकी प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ होने वाली है। ऐसा लगता है कि इन संस्थाओं के अध्यक्षों के चुनाव में भी ‘‘अंधे की रेवड़ी समान’’ कई जगह सामान्य वर्ग में भी आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों की उम्मीदवारों का चयन राजनीतिक दल करेंगे। मेरे जिले बैतूल में जिला पंचायत पहली बार व नगरपालिका परिषद सालो-साल बाद सामान्य वर्ग की होने के बावजूद आरक्षित वर्ग के सदस्यों को अध्यक्षीय उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा जोरों पर है। यही स्थिति इंदौर व अन्य कई जगहों में भी बन रही है। निश्चित रूप से यह स्थिति कहीं न कहीं सामान्य वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात होगी।  
बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता है की जातिगत आरक्षण की व्यवस्था संविधान में अस्थायी रूप से की गई है। अर्थात जिस उद्देश्य (समग्र विकास व उत्थान) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है, उसकी पूर्ति हो जाने पर यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, ऐसा संविधान निर्माताओं ने आरक्षण का प्रावधान करते समय सोचा था। परन्तु वर्तमान में क्या स्थिति हुई है, आप हम सब जानते है। यदि आरक्षण के बनाये रखने के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि कमजोर वर्ग का उत्थान अभी तक नहीं हुआ है, इसलिए ‘‘घी (आरक्षण) खाया बाप ने सूंघो मेरा हाथ’’ की तर्ज पर आरक्षण की व्यवस्था आज भी चलते रहना चाहिए। तो फिर आपको यह सोचना होगा कि 75 साल के लगातार आरक्षण के कवच व सुविधा के बावजूद, ‘‘नाच का आंगन अभी टेढ़ा’’ ही है अर्थात यदि विकास व उत्थान नहीं हुआ तो इसका मतलब साफ है कि सिर्फ आरक्षण से इन वर्गों का विकास व उत्थान संभव नहीं हो पायेगा। और यह नीति कहीं न कहीं गलत या अपूर्ण है। अतः इसके विकल्प पर विचार करना होगा। अनुसूचित जाति के रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बावजूद ‘‘ऊंना कांड’’ से लेकर दलित उत्पीड़न की अनेक घटनाएं उनके कार्यकालों में घटी। स्वयं महामहिम की उनकी पत्नि के साथ ‘पुरी’ में पंडाओं द्वारा दुर्व्यवहार किया गया था।
दूसरी स्थिति में अर्थात् विभिन्न विकास हो जाने का दावा किये जाने की स्थिति में भी आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो जाने से भी उसे समाप्त करना होगा। परंतु चुनावी वोट की राजनीति के चलते वर्तमान में स्थिति बद से बदतर हो रही है। आरक्षण समाप्त होने के बजाय जो शेष अनारक्षित क्षेत्र रह गया है, वहां भी आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों को तरजीह (प्रिफरेंस) दी जा रही है, जो किसी भी रूप में उचित नहीं कही जा सकता है। सामान्य वर्ग, पिछड़े, कुचले, गरीब, अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के लिए आरक्षण के खिलाफ नहीं है। तथापि वह जातिगत आरक्षण के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण चाहता है, जिसमें आर्थिक रूप से पिछड़ा सामान्य वर्ग भी शामिल हो। सामान्य रूप से आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने से वह मात्र ‘‘ऊंट के मुंह में जीरा’’ समान है, जिससे सामान्य वर्ग की संतुष्टि नहीं होती है।
वस्तुतः सामान्य वर्ग अपनी आवाज को आरक्षित वर्ग के समान वोट के रूप में एक मजबूत धागे में पिरोकर एक-जाए रूप से मजबूत न कर वर्तमान राजनीति में वह एकमात्र उपेक्षित वर्ग हो गया है, और इस वर्ग की स्थिति ‘‘अपना लाल गंवाय के दर दर मांगे भीख’ जैसी रह गया है, इनका उपयोग प्रत्येक राजनीतिक दल समय आने पर अपने हित में तो बरगला-कर कर लेता है। परन्तु उस वर्ग के हितों की बात ‘‘नक्कारखाने में तूती की आवाज’’ बनकर रह जाती है, और कोई राजनीतिक दल अन्य वर्गो के विपरीत सामान्य वर्ग के थोक वोटों में कमजोर होने के चक्कर में उनकी चिंता नहीं करता। मध्यप्रदेश में सपाक्स पार्टी का जन्म ही सामान्य वर्ग के कर्मचारियों व आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ था। परंतु दुर्भाग्यवश सक्षम नेतृत्व विहीन सपाक्स पार्टी इस दिशा में आगे कुछ नहीं कर पायी, और ‘‘दूर के ढोल सुहावने’’ हो कर रह गयी।
अतः यदि समाज में वर्ग विभेद-जाति विभेद को समाप्त करना है और समरसता लानी है, तब आपको अनारक्षित वर्ग को और आगे व्यवधान डाले बिना धीरे-धीरे उनका क्षेत्र बढ़ाना होगा और आरक्षित वर्ग के क्षेत्र को कम करना होगा। और एक स्थिति ऐसी लानी होगी, जब देश में समाज में आरक्षित और अनारक्षित वर्ग का विभाजन प्रायः समाप्त हो जाए। तभी देश में पूर्व समरसता आ जाएगी जो देश के विकास को ज्यादा गति प्रदान करेगी। अंततः तभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मूल मंत्र ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ को धरातल पर उतारकर उसे सार्थक कर सकेंगे।

रविवार, 24 जुलाई 2022

भारत का ’’जन’’ व ’’तंत्र’’! (जनतंत्र) कब ’स्वस्थ’ होकर मजबूत होगा।

कहने को तो भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक (जनतांत्रिक) देश है। लेकिन 75 साल का ’’लोकतांत्रिक जीवन’’ जीने के बाद भी ’’लोकतंत्र’’ जो कि भारत की पहचान है, क्या भारत का लोकतंत्र विश्व में सबसे बड़ा व उच्च कोटि का लोकंतत्र है? यह बात क्या निश्चिंतता से कही जा सकती है? भारतीय लोकतंत्र पर प्रश्नवाचक चिन्ह विभिन्न घटनाओं के  कारण लगता रहता है और लगाया भी जाता रहा है, जो कि ‘‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’’ की उक्ति को चरितार्थ करता लगता है। इसके लिए दोषी कौन है! यक्ष प्रश्न यही है?      लोकतंत्र ’जन’ व ’तंत्र’ दो महत्वपूर्ण तत्वों से मिलकर बना है। परन्तु क्या दोनों तत्व ’जन’ व ’तंत्र’ प्रायः विकसित हैं, यह एक प्रश्नवाचक चिन्ह कुछ क्षेत्रों में पूर्व से लगाया जाता रहा है। वर्तमान के संदर्भ में इसका कारण अभी दो प्रमुख घटनाओं से है। इस कारण से उक्त प्रश्न पुनः उत्पन्न हुआ हैं, जिसकी ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहा हूं। प्रथम - राष्ट्रपति चुनाव में 15 सांसदों के मतों को अवैध घोषित होना। दूसरा - भोपाल दैनिक भास्कर की एक न्यूज है, जिसमें प्रमुखता से बतलाया गया है कि, हाल में चुने गये जिला पंचायत व जनपद सदस्यों की धार्मिक स्थलों में बाड़ाबंदी व सैर सपाटे के लिए उन्हें अपने शहर/गांवों से दूर भेजा गया, ताकि उनके वोट सुरक्षित रहकर विपक्षी दल हथिया न लें। यह स्थिति प्रदेश के अधिकांश भागों की ही नहीं है, बल्कि पूर्व में हमने कई प्रदेशों में (हाल में ही महाराष्ट्र में) ऐसी स्थिति को देखा है। मेरे शहर बैतूल भी अछूता नहीं रहा और वह भी इस बंधक बनाये जाने की प्रक्रिया के दौड़ में शामिल होकर यहां पर दूसरे जिले के कुछ सदस्य शहर के बाहर की एक हाॅटल में रुके हुये हैं। ‘‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’’। हमने यह भी देखा है कि इस बंधक बनाये जाने की प्रक्रिया में जनप्रतिनिधियांे की स्वतंत्रता कुछ समय के लिए अवरूद्ध हो जाती है। मोबाइल फोन तक ले लिये जाते है। घरों के बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं होती है। हाँ इन सबके प्रतिफल में शाही स्वागत भोजन व आराम जरूर मिलता है। 

उक्त दोनों महत्वपूर्ण घटनाएं क्या देश के स्वस्थ लोकतंत्र के सीने को 56 इंच समान चैड़ा करती हैं, या उस पर कलंक लगाती हैं? इस पर आम जनता, जिसकी स्थिति उस ‘‘अंधे के जैसी है जिसने बसंत की बहार नहीं देखी’’, ने कभी गंभीरता से सोचा है? या सोचने का प्रयास भी किया है? निश्चित रूप से ये घटनाएं हमारे देश के लोकतंत्र के माथे पर एक कलंक समान हैं। यह उन चुने हुये जनप्रतिनिधियों, जो लोकतंत्र का आभामंडल हैं, के लिए भी अत्यन्त शर्मसार करने वाला है। वह इसलिए कि आज 75 साल का लम्बा समय बीतने के अनुभव के बावजूद भी हमारा लोकतंत्र इतना परिपक्व नहीं हो पाया है, जहां चुने गये जनप्रतिनिधियों जो हजारों-लाखों वोटों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और जो जनता के आईकाॅन हैं, ये ‘‘बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम’’ वाले आईकाॅन स्वयं अपना ही वोट डालने में सक्षम नहीं है, अनपढ़ हैं, तब हम उस जनता जिसकी नियति ही ‘‘उस भेड़ के जैसी हो ‘‘जो जहां जायेगी वहीं मुंडेगी’’, से क्या उम्मीद करें, कि जिनको पढ़ाने लिखाने व समाज तथा देश के प्रति जिम्मेदार बनाने और अच्छे उच्च स्तर के जीवन की ओर ले जाने का दायित्व व कर्तव्य संविधान ने इन जन-प्रतिनिधियों को ही दिया है। 

दूसरा स्वस्थ लोकतंत्र में भय और बंधन नहीं होता है, प्रेम व प्रीति होती हैै, वही अच्छा सफल लोकतंत्र कहा जाता है। ‘‘सहज पके सो मीठा होय’’। लेकिन जब चुने हुये प्रतिनिधियों के प्रति अपनी ही पार्टी का विश्वास चुनते ही कमजोर हो जाये, ‘‘स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती’’ की स्थिति पैदा हो जाये, जिस कारण से पार्टी को अपने ही चुने हुये प्रतिनिधियों के वोटों को सुरक्षित रखने के लिए अज्ञातवास में भेजना पड़े, जो आजकल समस्त पार्टियों की एक प्रथा-परिपाटी बन गई है। तब निश्चित रूप से लोकतंत्र पर उंगली उठना स्वाभाविक है। तथापि आलोचक इन उंगली उठाने वालों को यह कहकर चुप करा सकते हैं कि अज्ञातवास की यह नीति आज की नहीं हैै, बल्कि महाभारत काल से चली आ रही है। परन्तु तब के अज्ञातवास और आज के अज्ञातवास में भेजने/जाने के कारण में जमीन आसमान का अंतर है। 

आखिर यह व्यवस्था सुधरेगी कैसे? इसके दो ही रास्ते हैं। और दोनों ही रास्तों को एक साथ अपनाना होगा, तभी सुधार की गुंजाइश है। प्रथम ‘‘भय बिनु प्रीति न होई’’ के सिद्धांत को अपनाते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किये जाने की नितांत आवश्यकता है जहां चुने हुए जनप्रतिनिधी का किसी भी चुनाव में डाला गया मत अवैध घोषित होने पर स्वयमेव उसकी सदस्यता तुरंत प्रभाव से समाप्त हो जानी चाहिए। 

दूसरा जो पार्टी चुने हुए प्रतिनिधियों को चाहे व पार्षद पंचायत सदस्य हो या विधायक-सांसद हो, यदि किसी भी मामले में जहां बहुमत के टेस्ट के लिये मताधिकार का उपयोग होने वाला हो और उस कारण से उनको बंधक किया जाकर अन्य सुरक्षित स्थानों पर भेजा जाता है। और, तब यदि ऐसी रिपोर्ट मीडिया में आती हैं, या बंधक सदस्य के परिवार का कोई सदस्य शिकायत करता है। तब संबंधित उच्च न्यायालय को जनता के हित में तुरंत स्व-संज्ञान लेकर पुलिस अधिकारियों को छापा मारने की कार्रवाई करने के आदेश देने चाहिए, ताकि ‘‘न बासी बचे न कुत्ता खाय’’। उच्च व उच्चतम न्यायालय के लिए यह कोई नई बात नहीं है। क्योंकि हमने देखा है कि सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में असफलता/अकर्मण्यता के कारण न्यायालयों ने स्वयं संज्ञान में लेकर समय-समय पर उचित कार्यवाही कर आवश्यक आदेश पारित कर आम जनता को राहत प्रदान की है। इन दोनों उपायों को यदि हम सख्ती से लागू कर पालन करेंगे, तो निश्चित रूप से देश का लोकतंत्र मजबूत होगा। क्योंकि वर्तमान कानून ‘‘ओस चाटने के समान हैं जिनसे प्यास कभी नहीं बुझ सकती’’। कहा जाता है कि ‘‘लोहा लोहे को काटता है’’, अतः लोकतंत्र की मजबूती के लिये आवश्यक सुधार किये जाने से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता यदि कुछ समय के लिए बाधित भी होती है तो वह गौण है।

बुधवार, 20 जुलाई 2022

उपराष्ट्रपति के पद पर जगदीप धनखड़ का चयन! मोदी का मास्टर स्ट्रोक।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली की यह विशेषता रही है कि वे हमेशा देश के सामने ऐसा कुछ कर जाते है, निर्णय ले लेते है, जो प्रायः ‘‘भूतो न भविष्यति’’ मीडिया और राजनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के विपरीत, ‘‘अचानक’’ व कुछ अलग हटकर होता है। उपराष्ट्रपति का चयन भी इसी शैली का परिणाम है। याद कीजिए! जब मुख्तार अब्बास नकवी का केंद्रीय मंत्रिमंडल से संवैधानिक बाध्यता के कारण इस्तीफा हुआ था, तब राजनीतिक क्षेत्रों में यह कयास लगाये जा रहे थे कि वे देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। इस बात के कयास लगने में भी देश का पिछला इतिहास रहा है। खासकर कांग्रेस का जहां मुस्लिम तुष्टिकरण की ‘‘अंधा बांटे रेवड़ी’’ नीति के तहत राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति समय-समय पर बनाये जाते रहे है। अटलजी के समय डॉ. कलाम राष्ट्रपति चयनित किये गये थे। तथापि राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है, और न ही उनका चयन इस दृष्टि से हुआ था। 

अभी हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश में रामपुर, आजमगढ़ के उपचुनाव में भाजपा की जीत और उससे भी महत्वपूर्ण विपक्षी मुस्लिम उम्मीदवार की हार ने भाजपा पार्टी को एक अवसर प्रदान किया। वे मुसलमान जिन्होेंने पार्टी पक्ष में मतदान किया, (‘‘घी का लड्डू टेढ़ा ही भला’’) विश्वास किया है, उसे बनाये रखने के लिए उन्हे कहीं न कहीं इनाम दिया जाये और यह इनाम निश्चित रूप से उपराष्ट्रपति पद के रूप में मुख्तार अब्बास नकवी के रूप में संभव थी, जो शायद होनी भी थी। परन्तु अचानक इस राजनीतिक परिदृश्य (सिरानियों), परसेप्शन को नरेन्द्र मोदी ने पलट दिया, ‘‘अंधों के सामने हाथी’’ जो उनकी कार्य करने की पद्धति की पहचान बन चुकी है। ममता जैसी तेज तर्रार और मोदी जैसे व्यक्तिव को चुनौती देने वाली मुख्यमंत्री को समय-समय पर जगदीप धनखड़ ने जिस तरह से कार्नर करने का लगातार प्रयास किया, उस कारण से वे निश्चित रूप से मोदी की नजर में चढ़े हुए थे। दूसरा कारण राजस्थान व हरियाणा में होने वाले चुनावों में (किसान आंदोलन) व जाटों के धावों को सहलाने के लिए भी उनका चयन करने में भी यह प्रमुख मुद्दा रहा है। ‘‘यत्नम् विना रत्नम् न लभ्यते’’। तीसरी शायद यह बात भी हो सकती हैं कि आदिवासी राष्ट्रपति के चयन में आदिवासी वोटों की राजनीति करने का  आरोप लगने के बाद मुस्लिम राजनीति करने के आरोप से बचने के लिए शायद नकवी का अंततः चयन नहीं किया गया। इससे स्पष्ट होता है, यदि मोदी को परिस्थितिवश किसी एक मुद्दे से पीछे हटना होता भी है, तो वह उससे बड़े मुद्दे को लपक कर अपने पीछे हटने वाले कदम का एहसास तक नहीं होने देते है। यह मोदी जी के कार्य करने की शैली भी है। 

वैसे भी देश में इस समय मोदी की नीति को सफल राजनीति में बदलने में महारत हासिल होने की शैली को चुनौती देने वाले नेता दूर-दूर तक नजर नहीं आते है। ‘‘यह सन्नाटा क्यों है भई’’। यह स्थिति वैसी ही हो गई जैसे इंदिरा गांधी के समय लगभग ऐसी ही स्थिति थी। परंतु तत्समय परिस्थितियों में एक बड़ा महत्वपूर्ण अंतर यह था कि इंदिरा गांधी के समय एक से बढ़कर एक धाकड़, साहसी, निडर, अनुभवी और विद्वान राजनीतिक विरोधी रहे, और इंदिरा गांधी को ‘‘ज्य़ादा जोगी मठ उजाड़’’ की स्थिति से निपटने में ज्यादा कौशलपूर्ण ताकत लगानी पड़ती थी। परंतु मोदी के लिए बड़ी राहत की बात यह है कि राहुल गांधी जैसे ‘‘अधजल गगरीनुमा’’ अधिकांश नेता ‘‘छलक छलक कर’’ इनसे लोहा लेने के लिए खड़े होने का मात्र आभास प्रदान करते हुए दिखते है। शरद पवार जैसे अनुभवी नेता अब उम्र की ढलान पर होने पर ‘‘ज्यों ज्यों भीगे कामरी, त्यों त्यों भारी होय’’ का प्रतीक बन गये हैं, ऐसे में उनका आभामंडल भी कम होते जा रहा है। 

अतः जब दबंग और मजबूत विपक्ष न हो, तब लोकतंत्र को जीवित रहने के लिए पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र इतना मजबूत होना चाहिए कि पार्टी के अंदर ही एक प्रेशर ग्रुप बन कर वह सार्थक विपक्ष की भूमिका भी अदा करे। अर्थात सत्तारूढ़ पार्टी के सत्ताधीशो पर लगाम लगाने का काम करे! दुर्भाग्य से इस मामले में भाजपा, कांग्रेस से भी ज्यादा बदतर स्थिति में हैं, जहां आवाज ही नहीं है तो दबाने का प्रश्न ही कहा होता है। आखि़र ‘‘अरहर की टटिया में अलीगढ़ी ताले’’ कांग्रेस में किसी समय आवाज जरूर थी। इंदिरा गांधी के जमाने में चंद्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकांत जैसे आवाज उठाने वाले धुरंधर युवा तुर्क नेता थे। उसके बाद वर्तमान में जी-23 का ग्रुप बना। परंतु उसकी आवाज को दबा दिया जाता या अनसुना कर दिया जाता है। लोकतंत्र में एक तंत्र को स्थापित करने की परिस्थितियां दिन प्रतिदिन भाजपा में बन रही है जो पार्टी के स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होगी। इतिहास इस बात को सिद्ध भी करता है। भविष्य क्या होगा? यह समय ही बतलायेगा। ‘‘दिल्ली भले ही दूर सही’’ फिर भी अच्छे भविष्य की कामना करते हुए।

सोमवार, 18 जुलाई 2022

माननीया‘‘ द्रौपदी मुर्मू’’ क्या भारतीयों की राष्ट्रपति बन रही है या सिर्फ ‘‘आदिवासियों’’ की?


महामहिम ’’द्रौपदी मुर्मू’’ के औपचारिक रूप से भारत की अगली राष्ट्रपति चुने जाने की स्थिति को देखते हुए हार्दिक अग्रिम बधाइयां। चूंकि वे देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद ‘राष्ट्रपति’ के लिये चुनी जा रही है। अतः एक नागरिक का यह अधिकार व कर्तव्य है कि वे बधाई दे, शुभकामनाएं दे, व उनके उज्जवल भविष्य की कामना करें। ‘‘राष्ट्रपति’’ के रूप में अगले पांच सालों में वे देश का सफल नेतृत्व कर विश्व धरातल पर देश का नाम रोशन कर और ऊंचाइयों पर ले जाएं। इन्ही सब शुभकामनाओं के साथ पुनः बधाइयां।  

देश का एक नागरिक होने के नाते मैं भी उन्हें अग्रिम बधाई देता हूं। इसलिए नहीं कि वे देश की ‘‘प्रथम आदिवासी राज्यपाल’’ होकर, अब देश की ‘‘प्रथम आदिवासी’’ राष्ट्रपति होने जा रही है। बल्कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समान साधारण पृष्ठभूमि से निकल कर शायद सबसे कम उम्र की होकर देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचेगी, जिसके लिए वे एक मूल भारतीय होने के नाते बधाई की पात्र है। ‘‘लाल गुदड़ी में नहीं छुपते’’ आज ही ब्रिटेन में भारत मूल के ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाओं के समाचार आ रहे हैं। इससे महामहिम मुर्मू की सफलता और महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमारे तंत्र (जो देश को आगे गति दे रहा है।) खासकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मूल मंत्र अंत्योदय अर्थात आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी सर्वोच्च पद पर पहुंच सकता है, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा अवश्य की जानी चाहिए। परन्तु पता नहीं, क्यों मेरी जागरूकता में कहां? कोई? कमी रह गई है। जिसे शायद मैं देख ही नहीं पा रहा हूं, समझ नहीं पा रहा हूं कि महामहिम द्रौपदी मुर्मू को उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने पर बधाई दी जा रही है अथवा आदिवासी होने के कारण बधाई दी जा रही है, ‘‘भई गति सांप छछूंदति केरी’’ के शिकार विरोधी उन पर ‘अनावश्यक’ तंज कसे जा रहे हैं या ‘‘कुएं में ही भांग पड़ी हुई है’’। हम बात समरसता की करते हैं, सर्व समाज की बात करते है, और जात-पात की निंदा भी करते है। अर्थात ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास’’ प्रधानमंत्री के बहुप्रचारित मंत्र की उक्त मूल बाते हैं। ये सब बातें सार्वजनिक व राजनीतिक जीवन की किताबों में न केवल लिखी है, बल्कि लगभग देश का प्रत्येक नागरिक या राजनीतिक पार्टी या नेता उसे शब्दशः सही मान कर पालन करने की घोषणा भी करता हैं। परंतु वास्तविकता क्या है? व्यवहार व धरातल पर वस्तुस्थिति क्या है? हम ‘‘दो नावों पर सवार हैं’’, यह हम सब से छिपी नहीं है! यही तो दोहरी मानसिकता का प्रर्दशन है।
अतः इसी कड़ी के रूप में शायद इस वास्तविकता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से द्रौपदी मुर्मू को देश का प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति बनाये जाने पर न केवल बधाई देने का सिलसिला चल रहा है, बल्कि उनके पद ग्रहण करने के बाद ‘‘हिलोरें मारते आदिवासी प्रेम’’ के कारण  देश की सत्ताधारी व विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने पूरे देश में लगभग 1.30 लाख आदिवासियों गांवों में जश्न बनाने की घोषणा भी कर दी है। क्या इन आदिवासी गांवों में गैर आदिवासी लोग नहीं रहते हैं? क्या महामहिम मुर्मू देश के शेष गांवों के निवासियों की राष्ट्रपति नहीं होगी? जहां जश्न मनाने की नीति की आवश्यकता पार्टी ने महसूस नहीं की? एकता, अखंडता व राष्ट्रीयता की बात करने वाली व पहचान बनाने वाली देश की एकमात्र राजनीतिक पार्टी भाजपा का यह अचंभित कर देने वाला यह निर्णय एक गंभीर चिंता का विषय हो गया है, क्योंकि यह नई प्रथा (कस्टम/परिपाटी) का निर्माण कर भविष्य में जब कोई अन्य जाति जैसे उदाहरणार्थ मुस्लिम व्यक्ति राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर बैठेगा, तो काउंटर (पटल) में उस समाज के लोग भी यदि इस नई परिपाटी की आड लेकर इसी तरह का निर्णय लेंगे, तब क्या होगा? (संतोष की बात यह है कि पूर्व में ऐसा करने का प्रयास नहीं हुआ) अतः देशहित में इस निर्णय पर पुनर्विचार किये जाने की महती आवश्यकता है। भविष्य के गहराते बादलों में छुपी इस चिंता पर भी विचार करना होगा।
वैसे भाजपा के अंदरखाने की बात की जाये तो भाजपा ने मुर्मू का चुनाव आदिवासियों और देश की आधी जनसंख्या महिलाओं के बीच पेठ तथा पूर्वी भारत में पार्टी के विस्तार के लिए किया हैं। परन्तु वास्तविक रूप से जब तक आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति) का व्यापक सम्पूर्ण समाज में विलीन होकर अस्तित्व हीन होकर समाज का अभिन्न (इंटरगल) हिस्सा नहीं बनेंगे और इस दिशा में कोई ठोस सार्थक कदम नहीं उठाएंगे तथा पिछड़ेपन के आधार पर आदिवासियों की अलग पहचान (वोटों की राजनीति के कारण) बनाये रखेंगे, तब तक उनकी समाज में समरसता व समग्र विकास संभव नहीं हो पायेगा। उनके लिए तो ‘‘को नृप होऊ हमहिं का पानी’’ वाली स्थिति ही रहेगी। यदि वास्तव में ऐसा होता तो डॉ. भीमराव अंबेडकर संविधान बनाते समय प्रारंभ में उनके विकास के लिए मात्र 10 वर्ष का आरक्षण का प्रावधान नहीं रखते। जो भी सरकार रही है, ने ‘‘अटका बनिया देय उधार’’ की तर्ज़ पर वोट की राजनीति के लिए प्रत्येक 10 वर्ष बाद आरक्षण को बढ़ाया और आगे भी कब तक? बढ़ेगा, इसकी अंतिम समय सीमा आज का कोई भी राजनीतिज्ञ बताने की स्थिति में नहीं है।
आखिरकार देश की लगभग 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या में विभिन्न वर्गों के लोग शामिल है, चाहे वह अगड़ा, पिछड़ा या अति पिछड़ा वर्ग, कुलीन वर्ग निर्धन मध्यम या अमीर सब शामिल है। ’एक आम सामान्य परिस्थिति से भारत के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के कारण महामहिम मुर्मू’ की जीत के जश्न में हम प्रत्येक भारतीय क्यों नहीं शामिल हो सकते हैं? जिस प्रकार भारत के प्रधानमंत्री चाय वाले से जीवन प्रारंभ कर देश के कार्यपालिका के सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं। ठीक इसी प्रकार द्रौपदी मुर्मू का जीवन भी प्रधानमंत्री के समान ही संघर्षशील रहा और वे भी ‘‘कांटों पर चल कर’’ संघर्ष करते हुए आज सर्वोच्च पद पर पहुंच रही हैं। टीचर की नौकरी के बाद क्लर्क की नौकरी करती हुई पार्षद बनकर उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ किया।
देश 75वां स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस अमृत महोत्सव पर हम सब का यह प्राथमिक, संवैधानिक और सामाजिक दायित्व बनता है कि समाज की समरसता बनी रही, कोई वर्ण-वर्ग-विभेद न हो स्वाधीनता के अमृत वर्ष में ‘अमृत’ सब पर बरसे और हम जात-पात, क्षेत्रवाद (उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम) से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ सच्चे अर्थों में एक वर्ग-विभेद हीन भारतीय बने। 75 साल में यदि हम एक सम्पूर्ण समरसता युक्त भारतीय नहीं बन पाये हैं और न बना ही पाए हैं, तो हम देश के किस विकास? की बात करना चाह रहे है। जो कुछ विकास हुआ है, वह भारत देश का है या भारतीयों का है अथवा समाज के विभिन्न नामों व वर्गों से जाने वाले लोगों का है? यह तो ‘‘आधा तीतर आधा बटेर’’ वाली पहेली है। यदि एक पिछड़े समाज के व्यक्ति के उच्चतम पद पर पहुंच जाने पर उस समाज का अवरूद्ध विकास ‘विकासशील’ या ‘विकसित’ हो जाता तब तो यह तर्क उचित लगता। परन्तु क्या धरातल पर वास्तव में ऐसा हुआ है? वास्तविक सत्ता का सर्वोच्च पद अर्थात ‘‘प्रधानमंत्री’’ पर उक्त तर्क कभी लागू कर धरातल पर उतारा जायेगा? क्योंकि राष्ट्रपति व राज्यपाल के संवैधानिक होकर व वास्तविक अर्थो के व्यवहार में मात्र शोभा का पद है, जिन पर ही वर्ग विशेष का महत्ता बताकर निर्वाचित नियुक्ति पूर्व से लेकर आज तक की जाती रही हैं।
अभी अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद निवर्तमान हो रहे है। पूर्व में भी हमारे देश में मुस्लिम समाज के राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम आजाद हुए तथा हामिद अंसारी उपराष्ट्रपति हुए। क्या सरकार या किसी एजेंसी के पास ऐसा कोई आंकड़ा है कि इन पांच सालों से अनुसूचित जाति से राष्ट्रपति होने के कारण पिछले पांच सालों की तुलना में ‘‘दलितों की काया पलट गयी’’ या किसी भी क्षेत्र में उक्त समाज का ज्यादा विकास हुआ है? सरकार को इन आंकड़ों को जनता के बीच में लाना चाहिए। अन्यथा ये कथन/बयान/नारे ‘‘बालू की भीत’’ के समान सिर्फ वोटों की राजनीति के तहत ही माने जायेगें। कोई भी पार्टी ‘‘दूध की धुली’’ नहीं है। इस ‘‘राजनीतिक हमाम में सब नंगे’’ है। यह एक तथ्य जनता के बीच में स्वीकृति के साथ सर्वानुमति से मान्य है। परंतु देशहित में कभी-कभी सर्वसम्मति नुकसानदायक होती है। इसलिए जिस दिन इस मुद्दे पर असहमति के बीज पैदा हो जायेगें, उस दिन से वोट की यह राजनीति भी कमजोर पड़ती जाएगी, तब शायद देश स्वस्थ होकर मजबूती की ओर बढ़ेगा।
अंत में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के आज के बयान की भी चर्चा कर ले! उन्होंने महामहिम के ‘‘जनजाति’’ वर्ग से होने के कारण सिर्फ वोटरों में ही नहीं बल्कि व्यापक रूप से खुशी जाहिर होने की बात कही है। इन आदिवासियों के लिए बनी योजनाओं में 31 परियोजना 2015-16 से लगभग बंद की स्थिति में है। वर्ष 2015 से अभी तक अजजा के विकास के लिए मिले 5 हजार करोड़ रू. का बजट लैप्स हो चुका है। जनजाति के शासकीय विभाग के लगभग 30 हजार बैकलाॅग खाली पदों को यदि भर दिया जाता व केन्द्र सरकार के आदिवासियों के हितों के लिए आये 500 करोड़ रू. खर्च कर दिये जाते तो यह ‘‘खुशी’’ दोगुनी होकर ‘‘सोने पे सुहागा’’ हो जाती और चार चांद लग जाते। शायद उक्त तथ्य उनके ध्यान में नहीं आया।
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शनिवार, 2 जुलाई 2022

अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, साहसिक, एवं अचंभित करने व दूरगामी परिणाम देने वाला भाजपा का ‘‘दार्शनिक’’ निर्णय।

भाजपा हाईकमान मतलब सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी और अमित शाह (बाकी तो?) के एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री पद पर बैठालने और देवेंद्र फडणवीस को मजबूर कर उपमुख्यमंत्री पद को स्वीकार करने के निर्णय ने राजनीति के इस मिथक को पुनः शत शत सिद्ध किया है, कि जो कुछ होता है, वह दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह होता नहीं है।
महाराष्ट्र की राजनीति में धूमकेतु के समान तेजी से उभरते चाणक्य, राजनीतिज्ञ देवेंद्र फडणवीस के साथ एक दिलचस्प योग जुड़ा है कि जब वह शपथ विषम समय (आड टाइम) लेते हैं, तो राजनीति में भूचाल सा आ जाता है। याद कीजिए! पिछली बार जब उन्हें भोर सुबह 7.30 बजे शपथ ली थी, तब 3 दिन में ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से चलते होना पड़ा था। और आज मुख्यमंत्री के बजाय उपमुख्यमंत्री पद की शपथ मन मसोस कर, मजबूरी में वह भी शाम को 7.30 बजे लेना पड़ गयी। इसके पहले जब वह वर्ष 2014 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब उनका शपथ ग्रहण का समय सायं 4.27 बजे था। तब उनका कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरे पांच साल चला।
बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या यह निर्णय अचानक लिया गया? वस्तुतः इसकी पटकथा तो गुजरात के वडोदरा में गहन रात्री में हुई अमित शाह के साथ एकनाथ शिंदे की तथाकथित मुलाकात में ही शायद यह लिखी जा चुकी थी। तथापि निर्णय जब भी लिया गया हो, ऐसा लगता है कि उक्त निर्णय में देवेंद्र फडणवीस को पूरी तरह से विश्वास में नहीं लिया गया। राज्यपाल के समक्ष फडणवीस ने दावा प्रस्तुत कर पत्रकार वार्ता की थी। तब उनका महाराष्ट्र भाजपा ने एक ट्वीटस के जरिए फडणवीस का वीडियो क्लिक जारी किया था, तब वे मराठी में यह कहते हुए दिख रहे है कि मैं नये महाराष्ट्र के निर्माण के लिए पुनः आउंगा। तबके उनके मुस्कुराते चेहरे के भाव की तुलना में, बाद में हुई उस पत्रकार वार्ता में जहां उन्होंने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा की थी, तब माथे पर उभरी सलवटे के कारण चेहरे के तनाव वाले भाव से स्पष्ट हो जाता है कि,फडणवीस को उच्चतम स्तर पर हुए निर्णय में भागीदारी या विश्वास में नहीं लिया गया। फडणवीस के मुस्कुराते चेहरे के साथ दावा करते समय यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री वे ही बनेंगे। क्योंकि सरकार बनाने का दावा स्वयं एकनाथ शिंदे ने किया हो ऐसा करते या ऐसा उनका कथन मीडिया में दिखा नहीं। यद्यपि फडणवीस ने शपथ ग्रहण के पूर्व हुई पत्रकार वार्ता में यह घोषणा की थी कि शिंदे ने सरकार बनाने का दावा किया है व हमने (भाजपा) उन्हे समर्थन का पत्र राज्यपाल को दिया है। संवैधानिक स्थिति भी यही है कि यदि भाजपा शिवसेना घट की साझी सरकार (गठबंधन की) हो तो उसके नेता को ही सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाता है। और यदि सबसे बड़े दल का नेता सरकार बनाने का दावा करता है, तो उन्हे अपने बहुमत समर्थकों की सूची राज्यपाल को देनी होती है, जो देवेंद्र फडणवीस ने पूर्व में दी थी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि शिंदे के समर्थन में पत्र राज्यपाल को कब दिया? क्या यह सब चुपचाप राजनीति की अंधेरी गली में हो गया?
राजनीतिक घटनाक्रम जिस तेजी से, बदला उससे स्पष्ट होता है कि देवेंद्र फडणवीस को शायद अंतिम समय में ही यह सूचना दी गई थी कि उन्हे मुख्यमंत्री नहीं बनाया जा रहा है। तब उनके आंखों से आंसू निकले, जैसा कि उनके एक समर्थक विधायक ने मीडिया में आकर दावा भी किया है। आंसू सुख व दुख दोनों के होते हैं। फडणवीस की एक आंख के आंसू खुशी के थे क्योंकि भाजपा की सरकार बन रही है और उस उद्धव की विदाई हो रही है जिस उद्धव ने वर्ष 2019 में फडणवीस के पास सेे सत्ता आते-आते छीन ली थी। तो दूसरी आंख के आंसू दुख व संकट के है। उनके मुह में पका हुआ निवाला हाथ डालकर खींच कर आश्चर्यचकित कर दिया गया। ऐसा लगता है, जब मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को बनाने का निर्णय हाईकमान ने सुनाया/बताया तब शायद फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनना होगा, यह स्पष्ट नहीं किया होगा। तभी तो उन्होंने पत्रकार वार्ता करते समय सरकार से बाहर रहने की घोषणा की। उनकी इतनी हिम्मत तो नहीं हो सकती थी कि हाईकमान का निर्णय हो जाने के बावजूद वे उसकी अवहेलना कर विपरीत मंत्रिमंडल से बाहर रहने के कथन की बात प्रेस से करते। प्रेस में उक्त कथन की घोषणा जब प्रधानमंत्री, अमित शाह व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के हमेशा खुले कानों में पड़ी, तब हाईकमान की अनुशासन की घुट्टी मिलने पर देवेंद्र फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। जेपी नड्डा का यह कथन कि फडणवीस से उपमुख्यमंत्री बनने का आग्रह व केन्द्रीय नेतृत्व का निर्देश दिया था। साथ-साथ "आग्रह" व "निर्देश" से अपने आप में यह स्पष्ट संदेश देता है। यह बात इससे और स्पष्ट हो जाती है कि शपथग्रहण समारोह में मंच पर पहले दो ही कुर्सियां लगी थी, जो बाद में बढ़ाकर तीन की गई।
बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में एक तरह से सिद्धांतों व तर्को की बलि दी जाकर नये सिद्धांत व तर्क की सुविधा अनुसार गढ़ना आज की राजनीति की सामान्य, सार्वजनिक, स्वीकृत प्रक्रिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र का घटा घटनाक्रम है। याद कीजिए 2019 के चुनाव परिणाम आने के बाद जब उद्धव ठाकरे ने 56 विधायकों के रहते हुए मुख्यमंत्री पद की मांग भाजपा से की थी, तब भाजपा ने उनको मुख्यमंत्री बनाने से इंकार कर दिया था। तब भाजपा ने यह नहीं कहा था कि उद्धव जो बाल ठाकरे के पुत्र है, का हिन्दुत्व बाला साहेब से अलग है। क्योंकि चुनाव साथ में लड़े और वोट साथ में मांगे गये थे। परन्तु आज सिर्फ 40 विधायकों के उन शिंदे नेता को बाबासाहेब के हिन्दुत्व के नाम पर मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिन्होंने ढाई साल तक उद्धव के उस हिन्दुत्व को झेला व साथ दिया जिसकी शिंदे ने अब आलोचना करके न केवल उद्धव का साथ छोड़ा, बल्कि भाजपा ने उन्हे भी हाथों हाथ लिया। कांग्रेस व एनसीपी के साथ गठजोड़ करने पर उद्धव उस हिन्दुत्व के उत्तराधिकारी नहीं रहे, जिस हिन्दुत्व को कांग्रेस विरोध के आधार पर बालासाहेब ठाकरे ने मजबूत किया था, ऐसा कथन भाजपा व शिंदे इस समय लगातार कह रहे हैं।
शिंदे उक्त आरोप लगाते समय दो तथ्यों को भूल गये। प्रथम बाला साहेब ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई आपातकाल जो स्वाधीन भारत का अभी तक का सबसे बड़ा लोकतंत्र विरोधी ‘‘काला’’ अध्याय रहा है, का समर्थन किया था। दूसरा उस भाजपा जिसके हिंदुत्व को बेहतर मानकर मजबूत करने के लिए उनसे हाथ मिलाया, वही भाजपा का पीडीपी के साथ जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने पर हिंदुत्व कमजोर नहीं होता है, लेकिन उद्धव का हिंदुत्व कांग्रेस के साथ पर कमजोर हो जाता है। यही तो राजनीति का असली दोहरा चेहरा है। हिन्दुत्व की बात करने वाली भाजपा क्या आज हमारी हिंदू संस्कृति को भूल गई है। आज भी कमोवेश प्रचलित हमारी हिन्दू परिवार के मुखिया की राजनीतिक सामाजिक प्रसिद्ध व साख का उत्तराधिकारी प्रायः एक सीमा तक उनकी औलाद होती है। यह एक सामान्य आम जनों के बीच स्वीकृत तथ्य है। इसीलिए तो परिवारवाद की स्थिति बनती है, जिसका राजनीतिक हथियार (ताकत व कमजोरी) के रूप में उपयोग किया जाता रहता है। इस परिवारवाद की वृत्ति के कारण उद्धव ठाकरे को ‘‘ठाकरे’’ नाम की सहानुभूति मिलना स्वाभाविक है।
हिन्दुत्व बाला साहेब ठाकरे के नाम के साथ उनके पुत्र उद्धव के साथ ‘ठाकरे’ होने के कारण रहेगा या ठाकरे द्वारा फर्श से अर्श बनाये गये नेता एकनाथ शिंदे के साथ है। एक बड़ा प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है। क्या बालासाहेब ठाकरे का हिंदुत्व उस भाजपा से अलग है, जो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होकर जिसकी पहचान ही हिंदुत्व है। फिर भाजपा को हिन्दुत्व बचाने या विस्तारित मजबूत करने के लिए शिवसैनिकों की जरूरत क्यों है? मतलब साफ है। 2019 के चुनाव में पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा अधिकतम 106 सीटों तक ही पहुंच पाई थी। तब भाजपा को यह एहसास हो गया था कि उसके पूर्ण बहुमत के आड़े वस्तुतः न तो एनसीपी है और न ही कांग्रेस, बल्कि हिन्दुत्व का नारा उठाने वाली शिवसेना ही है। और इसलिए यदि महाराष्ट्र में भाजपा को अपने दम पर सत्ता में बैठना है, तो शिवसेना को कमजोर करना ही होगा। उस कमजोरी (कमी) की भरपाई करके ही भाजपा मजबूत होगी। अदृश्य (छिपे हुए) उद्देश्य को लेकर ही दूरगामी परिणामों की आशा में यह पूरी राजनीति की पटकथा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच ही तय हुई है। शायद जेपी नड्डा भी इसमें भागीदार नहीं रहे होगें। और इसको अंजाम देना का तरीका निश्चित रूप से अमित शाह का ही रहा होगा। वैसे इसका एक दूसरा कारण दल बदल की कानूनी पेचीदगी के कारण अनिर्णय की स्थिति के रहते पिछली शर्मिंदगी करने वाली गलती से सबक लेकर भाजपा हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद फिलहाल छोड़ दिया है, यह भी संभव है।
इसलिए तात्कालिक रूप से सामान्य राजनीतिक दृष्टिकोण से उपरोक्त शीर्षक मे लिखे गये शब्दों के मोती जरूर लगा सकते हैं। परन्तु वास्तव में यह हड़बड़ाहट में नहीं बल्कि बहुत ही सोची समझी दूर दृष्टि से लिया हुआ निर्णय है। सही या गलत, यह भविष्य के परिणाम तय करेंगे। और तब तक देवेंद्र फडणवीस के आंसू बहते रहेंगे उसमें खुशी व गम दोनों शामिल रहेगें। आज की राजनीति की यही नियति है। कम से कम भाजपा की यह स्पष्ट नीति अवश्य रही है कि पार्टी सर्वोच्च है और व्यक्ति छोटा होता है। अतः यदि व्यक्ति की बलि देने में से पार्टी मजबूत होती है, तो वह एक सेकंड की देरी लगाये बिना, बेहिचक पार्टी बलि ले लेती है। किसी का बलिदान ही तो किसी के लिए फलीदान होता है। आडवाणी से लेकर अनेकोंनेक उदाहरण आपके सामने है।

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