मंगलवार, 27 जून 2023

मीसाबंदी’’ ‘‘परिवार’’ का ‘‘आभासी सम्मान’’! अथवा ‘‘कोरी राजनीति’’?

उक्त शीर्षक कड़वा और अप्रिय लग सकता है, लेकिन  वास्तविकता तो बेशक यही है। "अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:"। देश का काला अध्याय, काल, 25 जून का रहा, जब संविधान व लोकतंत्र को कानूनी अमला पहन कर निलंबित कर पहली बार (उम्मीद करनी चाहिए यह प्रथम और आखिरी अवसर ही होगा) आपातकाल लागू कर देश को अचंभित कर दिया गया था। ‘‘मीसाबंदियों’’ की उत्पत्ति की जनक रही यही ‘‘आपातकाल’’ था। जिनके अविरत संघर्ष, त्याग, तपस्या और बलिदान से वस्तुतः मीसाबंदी भाजपा की नींव के महत्वपूर्ण व मजबूत पत्थर है, जिस पर जनसंघ से जनता पार्टी के रास्ते होते हुए भाजपा, खड़ी होकर आज इस मुकाम पर पहुंची है कि विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई है। यद्यपि इस यात्रा में वर्ष 1984 के आम चुनाव में  संसद में मात्र दो सीटों तक सिमट जाने की भारी असफलता भी जुड़ी हुई है। तथापि उसका कारण पार्टी की विफलता न होकर ‘‘इंदिरा गांधी की शहादत’’ थी।       
आपातकाल का पर्यायवाची बन चुका ‘‘दिन 25 जून’’ को भाजपा के एक पदाधिकारी का फोन आया कि भाजपा कार्यालय पर मीसाबंदी एवं उनके परिवारों का सम्मान कार्यक्रम रखा गया है। लगभग 25 वर्षों बाद अचानक एकाएक उक्त फोन आने पर सुखद आश्चर्य हुआ। "अतिस्नेह: पापशंकी अत्यादर: शंकनीय"।  क्योंकि इसके पूर्व मुझे पार्टी कार्यालय में नहीं बुलाया गया था। मैंने उनसे कहा कि मीसाबंदी का कार्यक्रम तो कई बार हुआ है, परंतु आपने आज पहली बार बुलाया है। तब उनका यह जवाब था कि प्रदेश कार्यालय से निर्देश हैं कि प्रधानमंत्री मोदी सरकार के 9 वर्ष की उपलब्धियां के उपलक्ष में मीसा बंदियों व उनके परिवारों को भी सम्मानित किया जावे। उक्त ‘‘नीतिगत आमंत्रण’’ के लिए धन्यवाद।
परंतु प्रश्न फिर यह पैदा होता है कि क्या यह वास्तव में ‘‘सम्मान’’ है? कुछ समय पूर्व ही मैंने ‘‘विश्व रक्तदान दिवस’’ पर बैतूल में आयोजित रक्त क्रांति ‘‘सम्मान कार्यक्रम’’ के संबंध में एक बहुत ही विस्तृत लेख लिखा था। तकनीकी रूप से वह प्रशासनिक कार्यक्रम होने के बावजूद अप्रत्यक्ष रूप से भाजपाई लोगों ने ही लीड ली थी, जिस कारण से मंच पर कांग्रेसी प्रतिनिधि दिखाई नहीं दिए थे। उक्त लेख को समाज के हर वर्ग ने तथ्यात्मक रूप से सही पाते हुए समर्थन भी किया था। मुझे लगता है पार्टी के पदाधिकारियों ने शायद या तो उस लेख को पढ़ा नहीं या गरिमामय पूर्ण सम्मान कार्यक्रम करने की जो न्यूनतम आवश्यकता है, उसकी आज भी पूर्ति करने की जरूरत नहीं समझी गई। स्थानीय पार्टी नेताओं ने इसे पार्टी का एक एजेंडा मानकर उसकी पूर्ति करने की मात्र औपचारिकता कर दायित्व से इतिश्री कर ली, जैसे कि "आंख फेरे तोते की सी बातें करे मैना की सी", इसलिए मैंने उक्त कार्यक्रम में शरीक होकर अपमानित होना उचित नहीं समझा। 
मुझे जो जानकारी प्राप्त हुई, तदनुसार सम्मान कार्यक्रम के लिए प्रदेश कार्यालय ने किसी भी नेता को भोपाल से या अन्य कहीं से नहीं भेजा गया है। निश्चित रूप से भाजपा कार्यालय में जिले के नेता गण, पदाधिकारी मीसाबंदियों व परिवारों को सम्मानित करने के लिए मंचासीन थे, जिन्हें उस कुर्सी में पहुंचाने का एक बड़ा योगदान स्वयं इन्हीं मीसाबंदियों को है। इसमें शक-ओ-शुबहा की कोई गुंजाइश नहीं होना चाहिए।  
     वर्ष 1971 में ‘‘गरीबी हटाओ नारे’’ की आंधी में कांग्रेस की बड़ी जीत के बाद वर्ष 1974 में जेपी की (समग्र) संपूर्ण क्रांति आंदोलन के कारण लौह महिला इंदिरा गांधी की कुर्सी डगमगाने के कारण आपातकाल लागू किया गया था। तब देश भर में हजारों लोग मीसा कानून (आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम) में ‘‘निरोधक’’ (बंदी) रखे गए। हजारों परिवार बर्बाद हो गए थे। ऐसे मीसा बंदियों के समर्पण, तप, त्याग, बलिदान व कड़ी मेहनत के फलस्वरूप ही जिले के पदाधिकारी गण विभिन्न पदों पर आज विराजमान है। तब फिर उनके हाथों ही उन्हे पदों पर बैठालने वाले मीसाबंदियों का सम्मान कैसे? यह कुछ अटपटा सा नहीं लगता है, कि "अंडे सेवे कोई बच्चे लेवे कोई"! निश्चित रूप से इन मीसा बंदियों की आहुतियांे के फलस्वरूप सामान्य कार्यकर्ता भी जिले से लेकर प्रदेश व देश के नेता बने हैं। परन्तु बुद्धि-विवेक को थोड़ा सा तो घुमाइए। "अक़्ल का घर क्या इतनी दूर है"?
एक गुरु-शिष्य अथवा एक शिक्षक-विद्यार्थी के बीच जो संबंध होते है, लगभग उसी तरह के वे ही संबंध मीसाबंदी, परिवार व पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच हैं व होने चाहिये। जब गुरु अथवा शिक्षक के प्रयास से शिष्य या शिक्षार्थी उच्च स्थान जैसे आचार्य या बड़ा नेता, उद्योगपति या किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट स्थिति प्राप्त कर सम्मान का हकदार हो जाता है या बना दिया जाता है। तब उस गुरु व शिक्षक को असीम, आत्मीय सुख, शांति मिलना लाजमी है। और वह गुरु-शिक्षक भी शिष्य-विद्यार्थी की प्रगति से अपने को सम्मानित, गौरवान्वित महसूस करते हैं, समाज में सिर ऊंचा कर चलते है। इसी प्रकार चेला (शिष्य) विद्यार्थी गुरूओं व शिक्षकों के प्रति सम्मान जताते हुए अपने गुरु शिक्षकों को गौरवान्वित महसूस करते देख संतोष महसूस करते है। पर आपने कभी देखा ऐसा कि शिष्य या विद्यार्थी का अपने गुरु-शिक्षक का सम्मान करने का अवसर? कोई भी शिष्य या विद्यार्थी यही चाहेगा कि उसके गुरु या शिक्षक का सम्मान उनसे भी बड़ी सम्माननीय सम्मानित व्यक्तियों द्वारा हो, तभी तो वह वास्तविक सम्मान कहलायेगा? यही स्थिति व भावना मीसाबंदियों को सम्मान करने की होनी चाहिए थी, जो नहीं थी। "कमर का मोल होता है, तलवार का नहीं"। अर्थात ताक़त तलवार में नहीं बल्कि उसे बांधने वाले में होती है।
प्रश्न यह भी पैदा होता है, जब अपनों की बीच जाया जाता है, तो वहां सम्मान कैसे? ‘‘घर की मुर्गी दाल बराबर होती है’’, यह मुहावरा क्या सम्मानित करने वालों को नहीं मालूम है? मीसाबंदी परिवार और पार्टी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ता पारिवारिक सदस्य समान है। "उंगलियों से नाखून कभी अलग नहीं होते", क्योंकि जनसंघ से भाजपा बनी पार्टी वृहत पारिवारिक माहौल के कारण पारिवारिक पार्टी कहलाती रही। याद कीजिए! ‘‘पितृ पुरुष’’ कुशाभाऊ ठाकरे, ‘‘दृढ़ पुरुष’’ सुंदरलाल पटवा, संगठन के ताने-बाने गढ़ने वाले ‘‘पुरोधा’’ प्यारेलाल खंडेलवाल व कोष की व्यवस्था करने वाले ‘‘सौम्य’’ नारायण प्रसाद गुप्ता। इन सबके बीच समन्वय के रूप में काम करने वाले ‘‘हंसमुख’’ कैलाश नारायण सारंग की कार्यप्रणाली और सोमवारा स्थित तंग सीढ़ी से ऊपर जाकर कार्यालय में रहने वाले ‘‘बापू’’ को याद कर लीजिए। "गुणियों की कमी नहीं है पारखियों की कमी है"।निश्चित रूप से आप एक्शन की बजाय परसेप्शन, नरेशन और ब्रांडिंग लिए ऐसे सम्मान को भूल जाएंगे। यदि ऐसे सम्मान समारोह की जगह मीसा बंदी, परिवार, पदाधिकारीगण और कार्यकर्ताओं का मिलन समारोह आयोजित किया जाता तो यह तथाकथित सम्मान से ज्यादा अच्छा होता। क्योंकि तब मीसाबंदियों को यह महसूस होता कि वे अपने उस ‘‘पौधे’’ के ‘‘वट-वृक्ष’’बनते परिवार के बीच में आए हैं, जिनको उन्होंने सींचा है, पाला है और बड़ा किया है। "औरों को नसीहत और ख़ुद मियां फज़ीहत" उक्ति को साकार करने वाले सम्मान करने वाले नेता कम प्रदेश के मंत्री कमल पटेल से ही यह सीख ले लेते कि वे इस अवसर पर इटारसी में मीसाबंदी परिवार स्व. हरि वल्लभ सोनी के घर पहुंचे व उन्हे श्रद्धांजलि अर्पित की। यह सम्मान कार्यक्रम से भी ज्यादा सम्मान उस परिवार के लिए है। अतः वास्तविक रूप से यह सम्मान समारोह न होकर मात्र पेपर पर ही पार्टी के एक प्रोग्राम (कार्यक्रम) की बिना भावना व भाव भंगिमा के खानापूर्ति ही कहलाएगी? जैसे कि "आकाश बिना खंभों के खड़ा है"। वैसे भी आजकल पार्टी ‘‘प्रोग्रामिंग, ब्रांडिंग, परसेप्शन’’ में ही ज्यादा विश्वास करती है। 
क्योंकि यह चुनावी वर्ष है और 19 सालों में पहली बार भाजपा किसी आम चुनाव में कठिन परिस्थिति से गुजर रही है। "एक तिनके से हवा का रुख़ मालूम हो जाता है" तो लगातार विभिन्न सर्वेक्षण की विपरीत परिणाम की रिपोर्ट की आशंका के मद्दे-नज़र शायद ‘‘आटे दाल के भाव’’ याद आ जाने से अंत्योदय के सिद्धांत अनुसार अंतिम कोने में खड़ा व्यक्ति को भी पार्टी की मुख्यधारा में लाने के प्रयास के परिणाम स्वरूप ही अंतिम छोर में खड़े व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि घर बैठाल दिए गए मीसाबंदी एवं परिवारों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास के तहत शायद उक्त योजना बनाई गई होगी? पार्टी कार्यालय में हुए कार्यक्रम में शायद किसी व्यक्ति ने यह कहा भी कि ‘‘काश’’ हर साल चुनाव होते, तो कम से कम हमें हर साल बुलाया तो जाता है? प्रदेश भाजपा जब पार्टी के अन्य कार्यक्रमों के लिए जिले के बाहर के व्यक्तियों को प्रत्येक जिले में प्रमुख अतिथि के रूप में भेजने का कार्यक्रम सामान्यतया बनाती है। अच्छा होता तब वही व्यवस्था वह इस कार्यक्रम के लिए क्यों नहीं की गई? अभी मुख्यमंत्री ने मीसा बंदी की सम्मान निधि में जो बढ़ोतरी की घोषणा की है। शिवराज जी मीसाबंदियों की ‘‘मान’’‘‘देय’’ (सम्मान निधि) बढ़ाने की नहीं बल्कि उनके ‘‘मान’’, ‘‘सम्मान’’, ‘‘स्वाभिमान’’ और अभिमान की चिंता कीजिए? आपकी चिंताएं खत्म हो जाएगी? मीसाबंदी जिन्हें लोकतंत्र का प्रहरी कहा गया अथवा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शायद सम्मान निधि से ज्यादा सम्मान पाने की बजाए उनके योगदान को स्वीकार करने की इच्छा रखते हैं। इसका अभाव पार्टी में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। सम्मान को सम्मानित तरीके से भावनाओं से परिपूर्ण दीजिए! एक मैकेनिज्म (तंत्र) सामान नहीं।
मुख्यमंत्री ने मध्य-प्रदेश के मीसा बंदियों के हुए 26 तारीख के सम्मेलन में मीसा बंदियों को कुछ सुविधाएं देने की घोषणा की। जैसे सरकारी ऑफिसों को सम्मानजनक व्यवहार करने के लिए निर्देश जारी करना, परिचय पत्र, मुफ्त इलाज, विश्राम गृह व नई दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन में रूकने की सुविधा आदि। आपातकाल के लगभग 45 साल बाद स्वयं मीसाबंदी रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह द्वारा लगभग 17 साल बाद उक्त बुनियादी सुविधाओं की घोषणा पूर्व में न कर अभी चुनावी वर्ष में ही क्यों की गई है। यह सवाल आपकी जेहन में क्यों नहीं आता है? धन्यवाद!

सोमवार, 26 जून 2023

"आचार्य दादा धर्माधिकारी की 125 वीं जयंती कार्यक्रम"

आजादी के अमृत महोत्सव काल में 18 जून 2023 को ‘‘दादा’’ जिनका पूरा नाम शंकर त्र्यंबक धर्माधिकारी है, की 125 वीं जयंती ‘‘दादा’’ के आचार विचार के अनुरूप अत्यंत ही सादगी पूर्ण तरीके से लेकिन बहुत ही गरिमामय पूर्ण खांटी गांधी वादी गांधी, पीस फाउंडेशन के पूर्व उपाध्यक्ष और एकता परिषद के अध्यक्ष तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य राजगोपाल पीवी के मुख्य आतिथ्य में गणमान्य लोगों की उपस्थिति में भावपूर्ण वातावरण में मुलताई में मनाई गई, जो "दादा" की "जन्मभूमि है। यद्यपि  "कर्मभूमि" मुलताई "दादा" की कभी नहीं रही, क्योंकि एक तो बचपन में पिताजी टीडी धर्माधिकारी, ब्रिटिश शासन में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे, के जगह-जगह स्थानांतरण होने के कारण विभिन्न विभिन्न जगहो मे रहने से ; दूसरा उनका व्यक्तित्व बदलते गुजरते समय के साथ इतना विशाल हो गया था कि, उनकी कर्मभूमि मुख्य रूप से वर्धा होकर बाद में धीरे-धीरे आगे जाकर देश की स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के चलते राष्ट्रव्यापी हो गई। वर्तमान परिदृश्य में मानवता के हित में जहां स्वतंत्र और सार्थक चिंतन जैसे "गूलर का फूल" हो गया है, दादा जैसे उदारमना व्यक्तित्व जाति धर्म, यहां तक कि राष्ट्र की सीमाओं से परे जाकर सत्य को देखते थे और‌ अपने विचार, वाणी एवं कर्म द्वारा जगत को उस सत्य से साक्षात्कार कराते थे। "परोपकाराय सतां विभूतय:"। वस्तुत: उनका दर्शन मानव विकास पर ही पूर्णत: केंद्रित था।

‘दादा’ की जयंती मनाने का विचार मुलताई के कुछ संभ्रांत नागरिकों के मन में आया, तब जयंती मनाने के पूर्व ही उनके बताए पथ पर चलने वाले गांधीवादी, विनोबा भावे के अनुयायियों और परिवार के गणमान्य सदस्यों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘‘दादा’’ इस बात के कभी पक्षधर नहीं रहे हैं कि उनकी जयंती मनाई जाए अथवा उनके निधन पर शोक सभा हो या कोई स्मारक बने। अर्थात वे महिमा मंडित होने के सख्त खिलाफ थे। "ख़ुशबू को इत्रफ़रोश की सिफ़ारिश की ज़रूरत नहीं होती"। मतलब साफ था! दादा स्वयं के व्यक्तित्व या व्यक्ति के प्रति अंतर्मुखी होकर परंतु ‘‘कार्य’’ ‘‘कर्म’’ के प्रति बह्यमुखी होकर अपने स्वयं के अस्तित्व को अपनी सेवा कार्य आचार-विचार के माध्यम से जनता में समाहित कर स्वयं की पहचान को समाप्त कर देश की पहचान को आत्मसात कर लिया। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि वे अपने "मूल" नाम से न जाने जाकर लोगों के प्यार से उनको दी गई ‘‘दादा’’ की उपाधि से ही वे अपने प्रशंसकों व आम लोगों के बीच जाने जाते हैं। शायद यही कारण रहा होगा, उनकी सोच का, जयंती न मनाने का। 

बावजूद दादा के परिवार वालों व कई स्थानीय प्रशंसकों के मन मे यह विचार आया कि दादा की जन्मस्थली सलल पवित्र नदी मां ताप्ती के उद्गम स्थल मुलतापी (मुलताई) है, जो बैतूल की एक तहसील है। जहां उनके परिवार के अन्य सदस्य पढ़े लिखे और देश में उच्चतम न्यायालय के उच्चतम पद न्यायाधिपति से लेकर विभिन्न उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पदों पर पहुंचे। इस कारण यदि धर्माधिकारी परिवार को ‘न्याय’ का पर्यायवाची "राजहंस" कहा जाय तो गलत नहीं होगा। "राजहंस बिन को करै नीर क्षीर बिलगाव"।  किसी भी व्यक्ति का जीवन‌ एक पीढ़ी भर का होता है, लेकिन‌ उसके आचार विचार का प्रकाश पीढ़ी दर पीढ़ियों के पथ को आलोकित करता है। परंतु वर्तमान पीढ़ी खासकर नवयुवक ‘‘दादा’’ की जीवनी से प्रायः अनजान ही रही है। प्रश्न दादा की जीवनी का नहीं बल्कि उनके आचार विचार और तदनुसार ‘‘कर्म कांड’’ का है ! क्योंकि "व्यक्ति की पहचान हमेशा उसके द्वारा छोड़ी गयी उपलब्धियों से होती है"। जो कुछ उन्होंने देश को दिया उसको जानने का अधिकार नव पीढ़ी को भी है।

उनके आचार-विचार को प्रचारित-प्रसारित करने का एक तरीका दादा द्वारा लिखी और उन पर लिखे साहित्य की परिणीती से हुई है। परन्तु इस तरीके से दादा के विचार प्रबुद्ध वर्ग के बीच ही पहुंच पाए, जिस कारण से उनके विचारों को पढ़कर आत्मसात करने का एक अवसर उक्त वर्ग को मिला। तथापि आम जनता, खासकर युवा वर्ग सो कमोवेश उनके विचारों से वंचित रहा को सबसे आसान तरीके से दादा के विचारों की ओर मोड़ा जा सकता है, तो वह एक तरीका जयंती मनाने विचारों में आया। यह अवसर आया, तब यह सोचा गया कि 125 वीं जयंती न तो मध्य प्रदेश प्रदेश की राजधानी भोपाल में, न ही देश की राजधानी दिल्ली में बल्कि उनकी जन्मस्थली मुलतापी (मुलताई) में बिना किसी सरकारी सहयोग के मनाई जाकर कम से कम मुलताई की जनता को युवा जनता को इस बाबत जानकारी दे सके। यदि परिवार चाहता तो इस जयंती को सरकारी स्तर पर भी मनाया जा सकता था, जैसा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने 125 वीं जयंती के अवसर पर ट्वीट कर शुभ कामना संदेश दिया। अंततः इन उद्देश्यों को लेकर भावपूर्ण, सादगीपूर्ण उपरोक्त तरीके से महान गांधीवादी विचारक चिंतक राजगोपाल पीवी के मुख्य आतिथ्य वह अन्य "शिष्ट" अतिथियों की उपस्थिति में जयंती मनाई, जो अपने लक्षित उद्देश्यों को पाने में प्रायः सफल रही। इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के सेवा निवृत्त जस्टिस देवदत्त धर्माधिकारी का यह कथन सबसे महत्वपूर्ण रहा कि गांधी जी की विचारधारा सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, बल्कि विश्व के लिए आज भी प्रासंगिक है। और इस गांधीवाद के "अग्रदूत" ही तो "दादा" थे।

वास्तव में यदि "दादा" को 100 वीं जयंती पर मुलतापी में (देश में कुछ जगह मनाई गई थी) ही याद किया जाता तो वर्तमान प्रौढ़ पीढ़ी को युवा अवस्था में ही उनके बाबत जानकारी मिल जाती। तब वे भी अपने जीवन में भी उन सिद्धांतों को अपनाने का तत्समय प्रयास कर पाते। कहा जाता है: "अविवेक: परमापदाम् पद्म" और ‘‘जब जागो तब सबेरा’।"दादा" के सजीव विचारों को जानते हुए जयंती न मनाने के विचारों की उस हिचक को पार करना इतना आसान भी नहीं था। चूंकि "विचार कभी मरते नहीं है", दादा जैसी विभूतियों के विचार, सिद्धांत आज भी देश की वर्तमान परिस्थिति के लिए उतने ही प्रासंगिक है। ज़रूरत वर्तमान पीढ़ी को दादा के समीप जाने की है क्योंकि "प्यासा ही कुएं के पास जाता है"। अंततः विचारों को जीवंत बनाये रखने के लिए जयंती समारोह, विचारों तथा महिमा मंडित न होने के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित कर समस्त भावनाओं का आदर व सम्मान करते हुए बेहद सादगीपूर्ण रूप से समारोह सम्पन्न हुआ। साथ ही उनके नाम से निज निवास तक जाने वाले मार्ग स्थल तथा कॉलेज के हाल का नामकरण किया गया जो छोटी सी बात है। 

आचार्य दादा धर्माधिकारी एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कुशल लेखक, गहन विचारक, चिंतक, दार्शनिक और शिक्षक व इन सबसे ऊपर "सिद्धांत जीवी" मानस व्यक्ति थे। "वक्तव्य कौशल" के कारण उन्हें विश्व नागरिक की तरह बोलने वाला भी कहा गया। विनोबा भावे ने उन्हें "ऋजुता योगी" के उपनाम से सराहा। तथापि यदि दादा के आचार- विचार और तदनुसार कर्म को ध्यान में रखा जाए तो दादा को "जोगी" और "योगी" से ज्यादा "कर्म योगी"  कहना ज्यादा उचित होगा। यद्यपि दादा के जीवन व विचार के बाबत पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है। परन्तु उन सबका पूरा उल्लेख जगह की कमी के कारण संभव नहीं है। परन्तु उनके जीवन की प्रमुख घटनाएं, आचार-विचार और वे जिस कारण से ‘‘दादा’’ कहलाए,  ‘‘आचार्य’’ कहलाये, उस पर कुछ प्रकाश अवश्य डालना चाहता हूं। आचार्य का मतलब होता है शिक्षक। "यथा नाम तथा गुण" "शिक्षक ही जीवन की पाठशाला के द्वार खोलते हैं"। "दादा" हमारी संस्कृति में या तो बड़े भाई को बोला जाता है या पिताजी को बोला जाता है या वृद्ध व्यक्ति को बोला जाता है। इसके अतिरिक्त सार्वजनिक जीवन में सम्मानित व्यक्तियों को संबोधित करने का प्रेम आदर व सम्मान सूचक शब्द "दादा" ही होता है। मुझे लगता है कि दादा शब्द  इस बात को देखकर स्वयं को ही निहार रहा होगा कि आचार्य धर्माधिकारी जैसे व्यक्तियों ने दादा शब्द स्वीकार कर इसका एक अनर्थ ऋणात्मक होकर  (जिसका  उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है) को प्रभावहीन कर दिया, ऐसे हमारे आचार्य दादा धर्माधिकारी का व्यक्तित्व रहा है। 

 दादा का व्यक्तित्व इतना विशाल व बहुआयामी है कि इसे कुछ पन्नों में उकेरना, उभारना, लिखना संभव नहीं हैं। फिर भी दादा के संपूर्ण जीवन को संक्षिप्त में 41 सूक्तियों में समेटने का प्रयास लेखिका डॉ. पुष्पिता ने किया है ये सूक्तियां दादा की शाला के पाठ हैं, जो निम्नानुसार हैं :- 1. सर्वोदय, 2. साम्ययोग, 3. सत्याग्रह, 4. साध्य और साधन 5. सत्य-अहिंसा, 6. विरोध और परिवार, 7. मन, 8. व्यक्ति और समष्टि, 9. सहजीवन, 10. सामाजिक प्रेरणा और सामाजिकता, 11. अभिव्यक्ति और प्रेरणा, 12. क्रांति-चिंतन, 13. नये समाज की अवधारणा, 14. यंत्र और विज्ञान, 15. जीवन और शिक्षण, 16. मानवीय निष्ठा, 17. विचार-निष्ठा-बुद्धि-निष्ठा, 18 स्त्री, 19. मैत्री, 20. ब्रह्मचर्य, 21. धर्म और संस्कृति, 22. मार्क्स और गांधी, 23. गांधी, जे. कृष्णमूर्ति, रमण महर्षि, श्री अरविन्द, 24. पूंजीवाद, 25. समाजवाद-साम्यवाद, 26. वर्ग-संघर्ष, 27. न्याय, 28. हिंसा, 29. साम्प्रदायिकता-जातीयता, 30. लोकतंत्र-लोकसत्ता, 31. वर्ण-व्यवस्था, 32. उत्पादन-प्रक्रिया, 33. अर्थ चिंतन, 34. ट्रस्टीशिप, 35. युद्ध और शांति, 36. निःशस्त्रीकरण, 37. भाषावाद, 38. भगवान और शैतान, 39. जीवन-मृत्यु, 40. आस्तिकता-नास्तिकता, 41. अध्यात्म-विज्ञान।

इस जयंती कार्यक्रम को आयोजित करने वालों में परिवार के प्रमुख सदस्य सहित अन्य व्यक्तियों के नाम का उल्लेख यहां इसलिए नहीं किया है कि कार्यक्रम तय करते समय जो "लक्ष्मण" रेखा खींची गई थी, उसका पालन करना जरूरी था। जयंती समारोह कार्यक्रम आयोजन करने की जो प्रारंभिक हिचक थी, चूंकि अब वह दूर हो गई है। अतः भविष्य में प्रत्येक वर्ष उनकी जयंती अथवा गांधी, विनोबा भावे जिनका "दादा" के जीवन पर पूरा प्रभाव पड़ा था, किन्ही अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित कर "दादा" को इसी प्रकार के सादगीपूर्ण कार्यक्रम के माध्यम से विचारों को तरोताजा रखा जा सकता है। हां एक सुझाव जरूर देना चाहता हूं। आजकल राष्ट्रीय पाठ्यक्रमों में कई आमूलचूल परिवर्तन किया जा रहे हैं। तब पाठ्यक्रम में "दादा" के विचारों को शामिल किया जाए, ताकि स्कूल स्तर से ही विद्यार्थियों को दादा के जीवन व आचार- विचारों के संबंध में जानकारी होने पर उनसे प्रेरणा ले सकें।

दादा एक "दृष्टि पुरुष" थे। शायद इसलिए नागपुर के मॉरिस कालेज में प्रथम वर्ष में पढ़ते समय ‘‘दादा’’ गांधी जी के आह्यान पर ‘‘असहयोग आंदोलन’’ में शामिल होने के लिए पढ़ाई छोड़ कर आंदोलन में कूद पड़े । फिर कभी वापस पढ़ाई करने नहीं गए। समय-समय पर विभिन्न आंदोलनों में भाग लेते हुए कई बार जेल भी गये। जेपी के "संपूर्ण क्रांति आंदोलन" में भी सक्रिय सहयोग दिया। साथ ही जीवन में कोई भी पद, मानद, उपाधि, मान्यता, सम्मान, अलंकरण, पद्म विभूषण  आदि या राजनैतिक पद जैसे मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल आदि को सविनय स्वीकार नहीं किया। यहां तक उन्होंने अपनी संपत्ति तक को त्याग दिया था। यद्यपि वह कांग्रेस के माध्यम से राजनीति में सक्रिय रहे। परंतु राजनीति उनकी स्वभावगत प्रकृति थी ही नहीं। अतः कुछ समय पश्चात वे राजनीति से भी हट गये। गांधी सेवा संस्थान से सम्बद्ध होकर गांधी वाद  व विनोबा भावे के भूदान आंदोलन, विचारों को मजबूती प्रदान करने हेतु बीच में पढ़ाई छोड़ने के बावजूद कोई डिग्री न होते हुए भी कई महत्वपूर्ण गद्य (लगभग दो दर्जन) हिन्दी, मराठी, अंग्रेजी, गुजराती, मलयालम आदि भाषाओं में दादा के प्रकाशित हुए। मासिक ‘‘सर्वोदय’’ एवं ‘‘साप्ताहिक’’ भूदान पत्रिका का संपादन भी "दादा" ने किया। वे संस्कृत, मराठी, बंग्ला, गुजराती आदि भाषाओं के भी अच्छे ज्ञानकार थे। उनकी मृत्यु के 9 वर्ष पश्चात वर्ष 1994 में उनकी "आत्मकथा" "मनीषी की स्नेहगाथा" के रूप में प्रकाशित हुई। यह बैतूल जिले की माटी के लिये सौभाग्य की बात है कि गांधी जी के बाद विनोबा भावे के साथ व उनके बाद गांधीवादी चिंतन धारा को प्रस्फुटित एवं पल्लवित करने वाले शख्सियतों में दादा का नाम सर्वोच्च स्तर पर रहा है। 

अंत में संजय पठाड़े "शेष" का उल्लेख करना आवश्यक है। संजय (महाभारत के संजय को याद कर लीजिए) "पठाड़े" जिनके माध्यम से  मुलतापी ताप्ती नदी और दादा के संबंध में महत्वपूर्ण साहित्य मुलताई की जनता को समय-समय पर उपलब्ध होते रहे हैं। इस प्रकार उन्होंने अपने नाम को सार्थक किया। संजय पठाडे "शेष" का यहां तात्कालिक अर्थ भी सार्थक होता है। जब  इस कार्यक्रम से जुड़े रहे समस्त लोगों का आभार प्रर्दशन किया गया, तब संजय पठाड़े का नाम "शेष"शायद इसलिए रह गया कि उनके "उप नाम"  को सार्थक होना था।

 हां लेख समाप्ति पर याद आया कि आज 25 जून है। इस दिन देश में आपातकाल लगा था, जो देश का काला अध्याय था। इसे विनोबा भावे द्वारा अनुशासन पर्व कहकर प्रचारित किया गया था। जिस पर "दादा" ने विनोबा भावे को चिट्ठी लिखकर "अनुशासन पर्व" कहने पर घोर आपत्ति करते हुए या लिखा था, "यह अनुशासन पर्व नहीं आंतंक व दमन पर्व है"।  तथापि बाद में दादा को यह ज्ञात होने पर कि  मौन अवस्था में विनोबा भावे लिखे गए एक शब्द का संदर्भ बदलकर दुष्प्रचारित किया गया। इसके साथ ही आज एक अत्यंत सुखद संयोग भी है, दादा की जन्मभूमि मुल्तापी की उद्गम नदी मां ताप्ती का जन्म दिवस है 

ऐसे मुलतापी (बैतूल) की माटी के राष्ट्र के कर्म योद्धा "दादा' को कोटिश: नमन।

शुक्रवार, 23 जून 2023

‘सम्मान’’?

कब, क्यों, किसका, कैसे और किसके द्वारा ?

मानव ही इस सृष्टि में एकमात्र ऐसा जीव है, जो अन्य समस्त प्राणियों की तुलना में सम्मान से जीने की राह, इच्छा रखते हुए जीने का यथा संभव प्रयास करता है। यदि व्यक्ति के जीवन में सम्मान नहीं है, तो उस मानव की तुलना जानवर से तक कर ली जाती है। जैसा कि कहा जाता है कि ‘‘अपमान का अमृत पीने से सम्मान का विष पीना अच्छा है’’। आखिर ‘‘सम्मान’’ है क्या? ‘‘मान’’, ‘‘स्वाभिमान’’, ‘‘अभिमान’’ सम्मान से जुड़े विभिन्न शब्द सब में ‘‘मान’’ तो है ही। परन्तु उन सबकी परिभाषा की ‘‘डिग्री’’ (परिमाण) और मंशा (आशय) अलग-अलग है। जिसकी अंतिम सीमा प्राय: ‘‘अहंकार’’ तक में बदल जाती है। ‘‘अहंभाव बड़ा मायावी होता है’’ यह व्यक्ति में किसी न किसी रूप में मौजूद होता ही है। आज यहां ‘‘सम्मान’’ की बात इसलिए की जा रही है कि ‘‘विश्व रक्तदाता दिवस’’ पर बैतूल में आयोजित काफी सफल रही ‘‘रक्त क्रांति रैली’’ का समापन रक्त क्रांति सम्मान समारोह संपन्न कर जिस तरीके से हुआ, उससे उत्पन्न हुआ उक्त प्रश्न है। जो समस्त सम्मान समारोह में कमोबेश लागू होता है। ‘‘सम्मान’’ ‘‘किसका’’, ‘‘किसने’’ व ‘‘कैसे’’ होना चाहिए? ये सब प्रश्न तीेनों पक्षों को अर्थात एक सम्मान देने वाला, दूसरा जिनके हाथों से सम्मान दिलाया जाना है तथा तीसरा सम्मान पाने वाले को एक साथ चिंतन करने के लिए एक गंभीर अवसर प्रदान करता है।

वास्तव में तो ‘‘सम्मान’’ के योग्य वे लोग होते हैं, जिन्हें उसकी जरूरत ही नहीं है’’, क्यों कि ‘‘रूप को अलंकार की जरूरत नहीं होती’’, लेकिन यह भी सच है कि सम्मान  की भूख न केवल ‘‘मानवीय कमजोरी’’ भी है, बल्कि एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास की आवश्यकता की कड़ी में एक महत्वपूर्ण जुड़ाव भी है। ‘‘किसी को सम्मान के दो बोल बोल कर आप जीवन भर के लिये उसके दिल में जगह बना सकते हैं’’। सम्मान का यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। जीवन के बहुआयामी या किसी भी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति या विभिन्न व्यक्तियों के विभिन्न दिशाओं में विकास, सफलता की ओर अग्रसर होने में ‘‘सम्मान’’ एक बड़ा ‘‘सहायक तत्व’’ होता है। इसलिए व्यक्ति अपने जीवन में जिस भी क्षेत्र में सम्मान प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखता है, तब वह उस हेतु लक्ष्य बनाकर कार्य करता है। जब वह लक्ष्य प्राप्त कर सफल हो जाता है, तो वह सम्मान का हकदार हो जाता है और समाज में भी उसके प्रति सम्मान की स्वीकृति हो जाती है। व्यक्ति को भी आत्म संतोष हो जाता है। फिर वह अगले और उच्चतर पड़ाव तथा लक्ष्य को निर्धारित कर और उच्चतम सम्मान की प्राप्ति हेतु कार्य करने की ओर अग्रसर हो जाता है। ‘‘ज्यों ज्यों भीगे कामरी त्यों त्यों भारी होय’’। जैसे कि सेना में परमवीर चक्र से लेकर अशोक चक्र, पद्मश्री से लेकर भारत रत्न राष्ट्रीय सम्मान, ओलंपिक खेलों में कांस्य से लेकर गोल्ड और अन्य खेलों में विजेता, उपविजेता आदि सम्मानों की विभिन्न श्रेणियां, सीढ़ियां होती हैं। 

प्रश्न यह है कि आज ‘‘सम्मान’’ की पूरी प्रक्रिया का जो रूप स्थापित हो गया है, यदि बारीकी से उसे देखा जाय तो शायद ‘‘सम्मान’’ से ज्यादा ‘‘असम्मान’’ ही हो रहा है। प्रथम प्रश्न तो यही है कि किस व्यक्ति का सम्मान होना किया जाना चाहिए,  इसे किसी सीमा में परिभाषित करना बहुत दुष्कर कार्य है। फिर भी सम्मान किये जाने व्यक्ति का चुनाव सही तभी कहलायेगा, जब उसके सम्मान पर सामान्यतया उंगली न उठे। कुछ उंगलियां उठना तो लाजमी है, क्योंकि वैसे भी सर्वानुमति तो इस देश में "कल्पना लोक" में जा चुकी है। तब प्रश्न फिर यह उत्पन्न होता है कि जिस व्यक्ति का सम्मान किया जा रहा है, उसका सम्मान कैसे करना चाहिए? याद रहे कि ‘‘सम्मान व्यक्ति के लिये है, व्यक्ति सम्मान के लिये नहीं’’। जिन हाथों से सम्मान दिलाया जा रहा है, वह उस क्षेत्र में सम्मान प्राप्त करने वाले प्रतिभागी से ज्यादा गुण वाला हो। अर्थात यदि किसी क्रिकेटर का सम्मान किया जा रहा है, तो उसका सम्मान सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर जैसे क्रिकेट की आइकॉन व्यक्ति ही कर सकते है, खेल मंत्री अनुराग ठाकुर नहीं। तभी सम्मानित व्यक्ति को यह एहसास होता है कि उस क्षेत्र के ‘‘आईकॉन’’ के हाथों से उसे यथोचित सम्मान मिला है। तब वह गर्व से फूला नहीं समाता और सम्मान करने वाला भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है क्योंकि "जब आप किसी का सम्मान कर रहे होते हैं तब आप स्वयं को भी सम्मानित कर रहे होते हैं"। किसी नेता का सम्मान हो तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या पदों पर बैठे राजनेताओं द्वारा किया जाना उचित है। क्या यह हंसी की बात नहीं होगी कि स्वर कोकिला लता मंगेशकर या क्रिकेट सम्राट सचिन तेंदुलकर का सम्मान कोई मंत्री-संतरी करे? ‘‘ओस चाटे प्यास नहीं बुझती’’। परन्तु आज की राजनीति व सार्वजनिक जीवन में जो प्रचलन में है, समाज के किसी भी क्षेत्र के व्यक्ति का सम्मान अमूमन आज कल राजनेताओं द्वारा ही किये जाने की परम्परा सी बन गई है। इसे ‘‘आपद् काले मर्यादा नास्ति’’ कह कर टाला नहीं जा सकता।

आज की राजनीति नीतिगत न रहकर राजनेताओं के कारण विशुद्ध दल-दल की राजनीति हो गई है। इस कारण किसी पद पर बैठे राजनेताओं, मंत्रियों इत्यादि द्वारा ही सामान्यतया ‘‘प्रतिभाओं’’ का सम्मान किया जाता है, यह एक कटु सत्य है। वर्तमान राजनीति के आकर्षण को देखते हुए वे सम्मान समारोह की शोभा अवश्य बढ़ाये, उनकी ‘‘ठकुर सुहाती’’ भी हो जायेगी। परन्तु जिस व्यक्ति, कलाकार, प्रतिभा का सम्मान हो रहा है, उस क्षेत्र में काम करने वाले जो सम्मानित होकर आईकॉन बने हैं, के हाथों से ही सम्मान होने पर वास्तविक रूप से वह प्रतिभा न केवल सम्मानित होगी बल्कि स्वयं को भी गौरवान्वित महसूस करेगी। इसका एक फायदा यह होगा कि उसी सम्मानित प्रतिभा का आत्मबल व आत्मविश्वास बढ़ता हुआ होगा और व उस क्षेत्र में कड़ी मेहनत, लगन से तेजी से विकास कर उस स्थिति में पहुंचेगी, जहां से वह न केवल सर्वोच्च सम्मान ले पाने की स्थिति में हो सकेगा, बल्कि बार-बार सम्मान ले पायेगा। जिस प्रकार ‘‘पत्थर भी घिसते-घिसते महादेव बन जाता है’’, उसी प्रकार ऐसी प्रतिभा भी सर्वोच्च सम्मान का हकदार बन जायेगी। जैसे कि खेल में राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड, अर्जुन अवार्ड, साहित्य में ज्ञानपीठ पुरस्कार, फिल्म में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, चिकित्सा क्षेत्र में धनवंतरी पुरस्कार, विज्ञान के क्षेत्र में भटनागर पुरस्कार आदि आदि। 

सम्मान के "प्रतीक चिन्ह" और प्रमाण पत्र का सावधानी पूर्वक चुनाव भी कार्यक्रम को भव्य बनाने में एक महत्वपूर्ण कारक सिद्ध हो सकता है। आज तो 21वीं सदी में ‘‘सम्मान’’ डिजिटल सिस्टम द्वारा मालाएं एवं प्रमाण पत्र डिलेवर कर दिए जाते हैं। जहां सम्मान व्यक्ति की भावनाओं का होना चाहिए, वहां ऐसा ‘‘भावहीन’’ ‘‘आभासी’’ सम्मान देख कर ऐसा लगता है कि व्यक्ति का सम्मान न होकर डिजिटल सिस्टम का सम्मान किया जा रहा है।

मेरे बैतूल में हुए अंतरराष्ट्रीय रक्तदान दिवस पर आम नागरिकों को जागृत करने के उद्देश्य और उनकी भागीदारी से रक्त क्रांति रैली निकाली जो आयोजक, भागीदारगणों की सहभागिता से सफल रही। परंतु रैली के समापन पर आयोजित सम्मान समारोह में जिस तरह से ब्लेंक (खाली) बिना नाम लिखे सम्मान के प्रमाण पत्र ताबड़तोड़ देे दिये गये, सम्मान की बजाय वस्तुतः असम्मान में परिवर्तित हो गए। जब प्रमाण पत्र पर नाम ही नहीं लिखा तो सम्मान किसका? यह तो वही बात हुई जैसा की दीवानी मामलों में कहा जाता है ‘‘जो कब्जा वो सच्चा’’। इस तरह के सम्मान प्रमाण चलायमान होकर जिसके कब्जे में ऐसा प्रमाण पत्र होगा वह सम्मानित होने के अहसास को तो जरूर महसूस कर सकेगा। शायद इसी कारण से गैर सम्मानित व्यक्ति के पास यह प्रमाण पत्र पहुंचने पर उनका भी सम्मान प्राप्त करने की प्रेरणा मिलेगी। ब्लैंक प्रमाण पत्र देने का उद्देश्य शायद यही होगा?। भले ही लगभग 700 से अधिक व्यक्तियों व 200 से अधिक संस्थाओं का सम्मान कार्यक्रम 2 घंटे में करना संभव नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को मंच पर बुलाकर सम्मान करना भी संभव नहीं है, लेकिन सम्मान पत्रों पर सम्मानित व्यक्ति का नाम तो पहले से अंकित किया जा सकता था, जब सूची पहले से ही वॉट्सअप ग्रुप में जारी कर दी गई थी। शायद इसीलिए बुलेट ट्रेन की स्पीड से मंच से नाम पढ़ दिये गये और सम्मान दे दिये गये और पा लिए गए ऐसा मान लिया गया। तकनीकी रूप से प्रशासन द्वारा आयोजित कार्यक्रम को पार्टी का कार्यकम बना दिया गया। चुने हुए जनप्रतिनिधियों की उपस्थित की बजाए हारे हुए जन प्रतिनिधि को तरजीह दी गई। ऐसे सम्मान के तरीकों से बचा जाना चाहिए। वस्तुतः यह सम्मान का मखौल है। 

आज कल सम्मानों के साथ एक और चीज जुड़ गई है वह है ‘‘प्रायोजित सम्मान’’। जिस प्रकार ‘‘पेड न्यूज’’ का जमाना चल रहा है, उसी प्रकार प्रायोजित सम्मान समारोह हो रहे है। जहां पहले से सम्मानित व्यक्ति का सम्मान करने के नाम पर धन वसूली कर सम्मानित किया जा रहा है। ऐसा सम्मान ‘‘पत्थर पर दूब जमाने की नाकामयाब कोशिश करना है’’, क्योंकि जो लोग कार्य के आधार पर सम्मान प्राप्त करने की स्थिति में नहीं होते है, वे पैसे के बल पर सम्मान प्राप्त कर लेते है। इस प्रकार तीनों पक्षों की सहमति से बनी सम्मान की सहमति। धन्य हो सम्मान की ऐसी सर्वानुमति से।

बुधवार, 7 जून 2023

‘‘इलेक्ट्रानिक मीडिया’’ द्वारा महिला पहलवानों की ‘‘अस्मिता’’ को तार-तार करने का प्रयास!

क्या यह कानून का मजाक नहीं है अथवा कानून का खौफ व डर खत्म हो गया है बृजभूषण शरण सिंह ‘‘पीडि़ताओं के शिकन भरे चेहरों’’ की तुलना में एक ‘‘सिर झुकाये’’ अपराधी का चेहरा की बजाए जिस ‘‘बॉडी लेंगवेज’’(शरीर की भाषा) के साथ मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मस् पर दभींय गॅर्वान्मुक्त मुस्कराहट के साथ महिलाओं पर तंज पूर्वक हंसते हुए धूम रहा है। जिस कानून, उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत एवं सब नागरिक बराबर है के संवैधानिक सिद्धांत के अनुसार एक सामान्य नागरिक की हैसियत से झेल रहे यौन शोषण के आरोपों के तहत कभी का गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाना चाहिए था। परन्तु मीडिया तो उसे ‘‘हाथों-हाथ’’ झेल रहा है। क्या यह सभ्य समाज पर एक ‘तमाचा’ नहीं है? अमित शाह से अचानक हुई रात्रि में मुलाकात के बाद कई मीडिया हाउसेस ने खुद को ‘‘सुरक्षित कर’’ सूत्रों के हवाले से ‘‘प्लांट न्यूज’’ ब्रेकिंग न्यूज के रूप में यह समाचार बार-बार प्रसारित किया कि पहलवानों द्वारा आंदोलन समाप्त कर दिया गया है। नाबालिग ने शिकायत वापस ले ली है। धारा 164 के अंतर्गत मजिस्टेड के समक्ष पुनः बयान हो गये है। उक्त समाचार शाम आते-आते तक पहलवानों द्वारा किये गए ट्वीटों से ‘‘सफेद नहीं काला झूठ’’ सिद्ध हो गया। परन्तु बेशरम मीडिया ने तथाकथित सूत्र के हवाले से दिये गये गलत समाचारों के लिए पहलवानों से लेकर देश से माफी तक नहीं मांगी, न खेद व्यक्त किया। शायद इसलिए कि वे समाचार प्रसारित न कर एजेंडा चला रहे थे, जो चल गया। एक बार बंदूक से निकली गोली वापस नहीं आती है।

‘‘एजेंडा मीडिया’’ के बीच अपना दायित्व संजीदगी से निपटने के लिए निश्चित रूप से ‘‘द इंडियन एक्सप्रेस’’ बधाई का पात्र है। पेपर शुरू से लेकर आज तक महिलाओं की आन, बान व सुरक्षा के लिए दिन-प्रतिदिन घट रही संबंधित घटनाओं को प्रमुखता से छापा है। अंततः परिणाम स्वरूप कुछ मीडिया हाउसेस, राजनेताओं व सत्ताधारी दल की कुछ महिला नेत्रियों को भी इन महिला पहलवानों का पक्ष लेना पड़ रहा है। आपको याद होना चाहिए, यह वही इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप है, जिसका हिन्दी संस्करण जनसत्ता तथा द स्टेट्समैन आपातकाल में देश के नागरिकों को सही न्यूज मिलने का एक बड़ा माध्यम बना था। जहां जनसत्ता ने विरोध स्वरूप अपना संपादकीय पेज खाली छोड़कर काला पेज छापा था। दिल्ली में घटी वीभत्स साक्षी हत्या कांड को लेकर नारी शक्ति को लेकर मीडिया ने टीआरपी के चलते बहुत बवाल किया। परंतु देश को विश्व में सम्मान दिलाने वाली मेडल लाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवानों के साथ हुए यौन शोषण की आवाज उठाने की जरूरत नहीं समझी, सिर्फ इसलिए कि अपराधी सत्ताधारी पार्टी का महत्वपूर्ण सांसद (जिसे सरकार का समर्थन प्राप्त है) होकर सरकार से करोड़ों रुपये का विज्ञापन पाने वाले न्यूज चैनल कैसे हिम्मत कर सकते है?

घटना का दूसरा चिंताजनक पहलू ‘‘मीडिया’’ से लेकर सोशल मीडिया व समस्त राजनीतिक दल एक ही बात कह रहे है कि बृजभूषण शरण सिंह छः बार का चुना हुआ सांसद ‘‘माननीय’’ है। उत्तर प्रदेश के लगभग छः लोकसभा क्षेत्रों में वह दबदबा व प्रभाव रखता है। राजनीतिक हितों के कारण उसके विरुद्ध ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। कुछ राजनीतिक पंडितों की नजर में सरकार की ‘‘सेहत’’ विगत कुछ समय से शायद ठीक नहीं लग रही हैं। इसलिए एक-एक सांसद की कीमत (महत्व) होने के कारण सरकार उनको किसी भी तरह ‘‘टच’’ नहीं करना चाहती है, भले ही सांसद को ‘‘टच’’ करने का ‘‘पूरा अधिकार’’ दे दिया गया हो। सरकार निश्चित रूप से छुआछूत पर विश्वास नहीं करती है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को छुआछूत दूर करने के लिए ‘टच करने का अधिकार’ होना चाहिए? फिर चाहे वह बृजभूषण का ‘‘बैड टच’’ ही क्यों न हो? इससे एक बड़ा गंभीर निष्कर्ष शायद यह निकलता है, जो बहुत ही चिंताजनक है कि, क्या जनता की नजर में एक नागरिक जो प्रभावी होकर रसूखदार राजनेता बन जाता है, का चरित्र व नैतिक मूल्यों से ज्यादा उसकी, दादागिरी, डॉनगिरी, बाहुबली, ‘जाति’ अथवा अकूट धन ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है? ‘‘प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं’’। इस तरह का कोई ‘‘परसेप्शन या नोशन’’ बन जाता है। जैसा कि कहा जाता है, ‘‘परसेप्शन्स आर मोर इंपॉर्टेंट देन द ट्रुथ’’।

इस कारण से चुनावी राजनीति में वोटरों पर उसकी तथाकथित मजबूत पकड़ बने रहने के कारण राजनैतिक दलों की ‘‘मजबूरी’’ उन्हें हर हालत में अपने साथ बनाए रखने की होती है। यह मजबूरी राजनैतिक दलों से ज्यादा क्या उस जनता की लाचारी, कमजोरी व ‘‘अनैतिकता’’ को नहीं दर्शाती है? जिसके चलते ऐसा रसूखदार व्यक्ति अपनी दोनों जेबों में हजारों की संख्या में ‘जनता’ को रखने का दंभ, उसी जनता के ‘‘विश्वास’’ के आधार पर भरता हैं। जनता चुनाव में ऐसे व्यक्ति की जमानत क्यों नहीं जब्त करा देती है? चाहे उसका कद कितना ही बड़ा क्यों न हो? क्योंकि ‘‘पहाड़ से छाया तो वैसे भी नहीं मिलती है’’। ऐसा ‘‘परसेप्सन व नरेशन’’ वहां की जनता कब देगी? जब एक्शन होगा? कब होगा? क्या चुनाव से पहले इसका कुछ आभास सा होगा? जनता के नैतिक बल व नैतिकता को बढ़ाने के लिए स्वयं को शिष्यों द्वारा भगवान मनवाने, कहलाने वाले वे समस्त आध्यात्मिक धर्मगुरु, संत, महात्मा, महाराज, पंडित, स्वामी, समाज के ठेकेदार व स्वयं जनता का सेवक कहलाने वाले नेता कहां हैं? तब ऐसी जनता का ‘‘नैतिक स्तर’’ को गिरने से कौन रोकेगा? ये आध्यात्मिक गुरू देश में धूमधाम से अपने भक्तों, शिष्यों, अनुयायियों को धार्मिक ग्रंथों को सुनाते है, पढ़ाते है और आचार-विचार को सीखने के लिए प्रेरित करते है, वे सब ‘‘नैतिकता का एक पाठ’’ साथ में क्यों नहीं पढ़ाते हैं? जो बढ़ती अनैतिकता ही देश की विभिन्न समस्याओं का मूलभूत कारण है। क्या समाज सुधारक का दावा करने वाले ऐसे संतों का यह दायित्व नहीं है? विपरीत इसके पास्को एक्ट के विरूद्ध उसमें संशोधन के लिए व बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में अयोध्या में पांच जून को होने वाली संतो की ‘जन चेतना महारैली’ को इंडियन एक्सप्रेस में दर्ज दोनों प्राथमिकी में दिये गये के आधार पर यौन शोषण को विस्तृत जानकारी छपने के बाद बढ़ते राजनैतिक, सामाजिक व मीडिया के दबाव के चलते कुछ दिनों के लिए स्थगित करना पड़ गया। क्या ऐसी कार्रवाई उन संतों की भी बृजभूषण की श्रेणी में लाकर खडा नहीं कर देते हैं? ऐसे संत समाज पर शर्म आती है। अन्य आध्यात्मिक गुरुओं, संतों की उक्त संतों की इस तरह की हरकत पर ‘‘चुप्पी’’ भी क्या देश के प्रबुद्ध जागरूक नागरिक को भी ‘‘चुप्प’’ रहने का संकेत तो नहीं दे रही है?

यौन शोषण के अपराधों में लिप्त राजनेताओं व संतों के मामले में एक बात बड़ी कामन (सामान्य) है वह यह कि दोनों जगह वे माननीय, पूज्यनीय, श्रेष्ठ लोग जनता के बीच अपनी पैठ बनाने या बनाये रखने के लिए जनता के हितों के लिए कुछ कार्य जैसे स्कूल, अनाथालय, गौशाला, हास्पिटल तथा व्यक्ति रूप से गाहे-बगाहे समय-समय पर सहायता देते रहते है। इससे उनकी एक जनसेवक की छवि बनकर उस छवि की आड़ में उन्हें ‘‘महिलाओं की अस्मिता’’ से खेलने का ‘‘सुरक्षित अवसर’’ मिल जाता है। फिर चाहे वे बृजभूषण शरण सिंह हो या आसाराम बापू जैसे नामों की फेहरिस्त गुजरते समय के साथ बढ़ती ही जा रही है। संतों सहित सभ्य समाज के लिए यह भी चिंतनीय स्थिति है।  

अब देश की सेलिब्रिटीज की भी बात कर लेते हैं। खासकर खेलों के सेलिब्रिटीजों की। किसी भी खेल में जहां महिला खिलाड़ी है, और उस खेल संगठन के पदाधिकारी पुरुष होते है, वहां पर जैसा कि कुछ समय पूर्व फिल्म इंडस्ट्रीज में कार्य पाने के लिए ‘मीटू’ पर पूरे देश में बहस व चर्चा हुई थी, ठीक उसी तरह खेलों में भी आगे बढ़ने के लिए खेल संगठन के कुछ पदाधिकारियों की ‘‘गैर जायज मांगों’’ को मानना कई महिला खिलाड़ियों की अपने खेल जीवन को आगे बढ़ाने के लिए मजबूरी हो जाती है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यह मजबूरी उनके लिए ‘‘अंगारों पर लोटने के समान’’ होती है। इसलिए खेल जीवन में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाना है, तो इन खेल संगठनों के पदाधिकारियों को नाराज करके अपवाद स्वरूप छोड़ कर खिलाडी आगे बढ़ नहीं पाते है, जिसका उल्लेख महिला खिलाड़ियों ने अपनी ‘‘प्राथमिकी’’ में भी किया है। इस कटु सत्य की आड़ में उन्हें कई बार जहर पीना पड़ता है। इसलिए हर कोई खिलाडी ऐसे पदाधिकारियों की काली करतूतों के विरूद्ध आवाज तुरंत अथवा सालों-साल तक नहीं उठा पाते हैं। जब इन महिला पहलवान के साथ अति हो गई और उन्होंने यह सोच लिया कि अति शक्तिशाली अध्यक्ष का विरोध करने के लिए अब खिलाडी जीवन को दांव पर लगाने के अलावा अब कोई चारा नहीं बचा है, तब उनकी हिम्मत बढ़ाने का कार्य अन्य खिलाड़ी सेलिब्रिटीज को क्यों नहीं करना चाहिए? जो आमतौर पर नहीं कर रहे हैं। यह इस बात को सिद्ध करता है कि हमारे खिलाड़ियों की नैतिकता खेल के चकाचौंध व आकर्षण के तले दब गई है। वक्त आ गया है, खेल, फिल्म व कला क्षेत्र के अन्य सेलिब्रिटीज अपने अंदर गिरेबान में झांके और इन महिलाओं की ‘‘सशक्त आवाज’’ बने। ताकि खेल संगठनों के पुरुष पदाधिकारी व कला फिल्मी क्षेत्रों के ‘रहनुमा’ भविष्य में अन्य लोगों के साथ इस तरह का दुराचार करने का कोई भी प्रयास करने की हिम्मत न कर सके, जो अंततः एक नजीर बन सकें।

सोमवार, 5 जून 2023

क्या देश की ‘‘आत्मा’’, ‘‘जमीर’’, ‘‘नैतिकता’’ ‘सुस्त’ ‘सृप्त’ होकर ‘‘विलोपित’’ तो नहीं हो रही है?

देश को स्वाधीन हुए 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अमृतकाल मना रहे देश में ‘‘अमृत’’ की ‘‘घनघोर’’ वर्षा हो रही है? या कराई जा रही है, ऐसा एहसास देश का मीडिया जनता को करने का प्रयास कर रही है। इन 75 वर्षो में देश की पहचान क्या सिर्फ 21वीं सदी की ओर तेजी से बढ़ते हुए ‘‘विकास के पंखे’’ के साथ होना चाहिए? प्रश्न अटपटा सा लग सकता है, ‘अप्रगतिशील’ लग सकता है, प्रतिगामी लग सकता है। परन्तु प्रश्न उत्पन्न तो होता है। वह इसलिए कि जिस देश की ‘संस्कृति’, ‘सभ्यता’ अति प्राचीन होकर जहां सर्वकालीन ‘सर्व समय’ महिलाओं का मान-सम्मान और उनकी ‘‘शुचिता’’ बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का एक कर्तव्य बोध होकर जिम्मेदारी होती रही है और आमतौर पर वह सहर्ष स्वीकार भी की जाती रही है। वहां किन्हीं नागरिकों द्वारा गाहे-बगाहे (यद्यपि हाल के वर्षो में यौन अपराधों की घटनाएं बढ़ी हैं) उक्त जिम्मेदारी का उल्ल्घंन किये जाने पर जिम्मेदार शासन में स्थापित कानून के तहत बल्कि आवश्यकता होने पर नये कानून भी बनाये जाकर (जैसे निर्भया कांड के बाद) महिलाओं की ‘‘आन बान और शान’’ की रक्षा के लिए निश्चित रूप से आवश्यक कार्रवाई होती रही है। फिर चाहे सरकार किसी भी विचारधारा की रही हो, पार्टी की रही हो, गठबंधनों की रही हो अथवा अल्पमत की रही हो।

यौन शोषण की घटनाएं न तो देश में पहली बार हो रही है और न ही अंतिम बार। बल्कि प्राचीन काल से होती चली आ रही हैं। निश्चित रूप से ऐसी घटनाएं न हो, यह दायित्व ‘परिवार’, ‘समाज’ व तत्पश्चात लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का होता है। इस दायित्व को मजबूत ‘‘तंत्र’’ के माध्यम से पूर्ण इच्छाशक्ति से निभाने के बावजूद यौन शोषण की घटनाएं को अंजाम दिया जाता रहा है। लेकिन ऐसी घटनाएं घटित होने पर अभी तक का अनुभव ‘अपराधी’ को ‘सरकार’ और ‘तंत्र’ द्वारा कानूनी प्रक्रिया द्वारा कानून की सूली पर लटका दिया जाने का रहा है। यह सरकार का मूलभूत संवैधानिक व सामाजिक दायित्व व कर्तव्य है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। क्योंकि ‘‘कड़े गोश्त के लिये पैने दांतों की जरूरत होती है’’। यौन अपराधियों से निपटने का उक्त ‘'आपराधिक न्यायशास्त्र’’ को आज देश की उन गौरव अंतर्राष्ट्रीय मेडल दिलवाने वाली महिला पहलवानों के साथ हुए यौन शोषण के मामले के परिपेक्ष में बृजभूषण सिंह जैसा दरिंदों को सामने रख कर विचार करें, घोर निराशा, कौफ्त, क्रोध से ग्रसित शमशाद होकर सर झुक जाता है। क्या देश की आन बान शान की प्रतीक महिला पहलवानों के साथ हुए यौन शोषण के अपराधों से हुए "घावों" का ऐसा तथाकथित "उपचार" देश को स्वीकार है?
वर्तमान प्रकरण में राजनीतिक रसूख के कारण हो रही वर्तमान धीमी कार्रवाई व अभियुक्त की अभी तक गिरफ्तारी न होने के बावजूद यौन शोषण के उक्त अपराधों की श्रंखला का उंगलियों पर गिने जाने वाले विरोध को देखते हुए लगता नहीं है कि यह वही देश है, जहां ‘‘जेसिका लाल हत्याकांड’’ से लेकर ‘‘निर्भया कांड’’ जिसने देश की अंतरात्मा तक को झकझोर दिया था। परिणाम स्वरूप भारतीय दंड संहिता की बलात्कार की धारा में संशोधन किए जाने के साथ नाबालिग के साथ किए गए यौन शोषण के अपराध के लिए नया पॉक्सो कानून तक बनाया गया था। शायद एक सिरे पर ‘‘अनाम निर्भया’’ की तुलना में नामी-गिरामी देश का नाम ओलंपिक विश्व खेलों में ऊंचा करने वाली महिला पहलवान है, तो वहीं दूसरा छोर निर्भया कांड के अनाम अपराधियों की तुलना में जनता का आशीर्वाद लेकर देश के लिए कानून बनाने वाली संसद का माननीय सदस्य होकर ब्रजभूषण सिंह शरण लोकतंत्र के मंदिर के अंदर बैठे 543 भगवानों में से एक भगवान है? वह इसलिए कि जब संसद को लोकतंत्र का मंदिर बतलाया गया है, तब मंदिर में तो भगवान ही बैठ सकते हैं?
यौन अपराधों से संबंधित कानूनों में संशोधन किए जाने के बाद ‘‘शायद बिल्कुल नहीं बल्कि निश्चित रूप’’ से देश की यह पहली अलौकिक, अविश्वसनीय घटना है, जहां यौन शोषण के अपराधी जिस पर पास्को कानून के तहत भी प्राथमिकी दर्ज है, गिरफ्तार कर तुरंत जेल भेजने की बजाय तथा उससे पूछताछ करने की बजाय उल्टे 3 महीनों से पीड़िताओं से ही पूछताछ की जाकर उन्हें मानसिक पीड़ा व तनाव से गुजरना पड़ रहा है। प्राथमिकी दर्ज होने के 40 दिन बीत जाने के बावजूद, गिरफ्तारी न होना सरे आम कानून की धज्जियां उड़ाना है। सरकार कहती है कि ‘‘पंचों का कहना सर माथे लेकिन परनाला तो यहीं गिरेगा’’। ‘‘अंधी गली के मुहाने पर खड़ी’’ सरकार; कानून अपना काम कर रहा है, जांच चल रही है, यह कहकर आत्ममुग्ध होकर ‘‘सिर झुकाए नहीं’’, बल्कि सिर ऊंचा कर सीना चाहे ‘‘कितने ही इंच का हो ताने’’ अपने साथी सांसद बृजभूषण सिंह का प्रत्यक्ष रूप से ‘‘मौन बचाव’’ व परदे की पीछे ‘‘सक्रिय बचाव’’ कर रही है। शायद इसलिए की वह अपराधी चुना हुआ उस संसद का सांसद है, जिसे ‘‘लोकतंत्र’’ में जनता चुनती है। अतः उसी लोकतंत्र से चुनी हुई निकली सरकार से आप उसी संसद के चुने हुए सदस्य के खिलाफ ‘‘नाउम्मीद कार्रवाई की उम्मीद’’ का विपरीत आचरण क्यों कर रहे है? यह तो ‘‘अंधे से रास्ता पूछने जैसा है’’। यह हास्यास्पद नहीं है की सरकार के खेल मंत्री और गृह मंत्री कह रहे हैं कि कानून को अपना काम करने दीजिए? आखिर कानून को काम कौन नहीं करने दे रहा है, खिलाड़ी अथवा उनके साथ सहानुभूति रखने वाले 140 करोड़ की जनसंख्या में से कुछ हजारों लोग या कानून का पालन करने और करवाने वाली "समस्त तंत्र"? क्या सरकार को यह बताने की जरूरत है कि ‘‘विकास रूपी पंखे से महिलाओं की अस्मत पर छाया हुआ कोहरा नहीं छंटता है’’?
अंत में न्यायपालिका जिसे ‘‘आपातकाल’’ में कमिटेड ज्यूडिशरी तक कहा गया था, ने  ‘‘न्यायिक सक्रियता’’ के चलते कई बार देश के नागरिक के हितार्थ आगे आकर संज्ञान लेकर कार्रवाई की है। परन्तु दुर्भाग्यवश प्रस्तुत यौन शोषण का मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लाया जाने के बावजूद उच्चतम न्यायालय ने अपने न्यायिक कार्य को आंशिक पूर्ति ही की है। 40 दिन बीत जाने के बावजूद पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज होने के बावजूद गिरफ्तारी नहीं हुई। यह स्वयं उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित कानून का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है। यौन संज्ञेय अपराध के मामले में प्राथमिक जांच किए बिना ही तुरंत प्राथमिकी दर्ज न किए जाने पर भादस की धारा 166ए के अंतर्गत ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया जाना चाहिए था। छः महिलाओं की एक ही प्राथमिकी दर्ज करना तथा इंडियन एक्सप्रेस में एफआईआर के आधार पर छपे समाचार जिसमें विभिन्न जगहों पर 15 बार यौन अपराध घटित होना बतलाया गया है तब पृथक-पृथक 15 प्राथमिकी दर्ज न करना कानूनन गलत है। जब उक्त खामियां मामले में सुनवाई के समय जब न्यायालय के समक्ष थी, तब उच्चतम न्यायालय द्वारा इन कानूनी खामियों का कोई संज्ञान न लेना न्याय देने की दिशा की ओर बढ़ने का सूचक तो नहीं है? साथ ही यह बात भी समझ से परे है महिलाओं के वकील जब उच्चतम न्यायालय तक गये थे, तब न्यायालय ने मांगी गई प्रार्थना पूरी हो जाने के कारण प्रकरण की समाप्ति करते हुए यह निर्देश दिया था कि आवश्यक होने पर वे उच्च न्यायालय अथवा निम्न अदालत में किसी भी सहायता के लिए जा सकते है। तब उन वकीलों का अभी तक ब्रजभूषण सिंह की गिरफ्तारी न होने पर उच्च न्यायालय के पास न जाना समझ से परे है। मेरे एक पाठक ने उक्त अपराध की प्रतिक्रिया में जो लिखा है, रूबरू आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं-
‘‘चूंकि एफआईआर न्यायालय के निर्देश पर दर्ज की गई है, अतः महिला पहलवान का कथन सत्य है। बृजभूषण कह रहे हैं, उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। अतः वे इसे सही मानते हैं। चूंकि दोनों सही है तथा सरकार ने बृजभूषण से इस्तीफा नहीं लिया है। यानी सरकार भी सही मान रहीं हैं। फिर समस्या क्या है?’’
‘‘अमित शाह चाणक्य ऐसे ही नहीं कहलाते है।’’
लेख पूर्ण करते हुए यह समाचार मिला है कि विगत दिवस देर रात्रि अमित शाह की पहलवानों से मुलाकात हुई है। किसकी पहल या माध्यम से, ज्ञात नहीं? परिणाम स्वरूप तीनों खिलाडियों ने रेलवे की नौकरी ज्वाइन कर ली है। अपुष्ट समाचारों के अनुसार चार्जशीट जल्दी पेश होगी। शायद बिना गिरफ्तारी के? आंदोलन वापस हुआ है या नहीं अस्पष्ट है। आंदोलन का आगे का स्वरूप कैसा होगा स्पष्ट नहीं। नाबालिग द्वारा आरोप वापस लिए जाने के समाचार भी मीडिया, सूत्रों के हवाले से दे रहा है। मतलब साफ है! जहां 40 दिन में अभियुक्त बृजभूषण का कम से कम पॉक्सो एक्ट के अंतर्गत चालान पेश होकर सजा होकर जेल में होना चाहिए था, जैसा कि राजस्थान में हुआ। वहां पीड़िताओं के मनोबल को तोड़ने के लिए उच्चतम न्यायालय व गृहमंत्री के ठीक आंख के नीचे "तंत्र" को पूरा अवसर प्रदान किया गया है, जिसमें वे अंततः सफल होते दिख रहे हैं।  गृहमंत्रीअमित शाह की "चाणक्य नीति" के साथ न्यायालय की "अनदेखी" का यह "गजब संयोग" कभी-कभी ही होता है। क्योंकि हर यौन अपराधी ब्रजभूषण सिंह शरण समान रसूख रखता भी नहीं है।
ऐसा लगता है कि 140 करोड़ जनता में कुछ गिनती के चुनिंदा लोग ही रह गये है, जिनका जमीर शायद मरा नहीं है। तब आप भी अपना जमीर बचाकर "बहुमत" के साथ रहने की "आदत" बना लीजिए?

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