बुधवार, 14 जून 2017

राज(नीति)!आंदोलन से उपवास तक!

पिछली एक तारीख से महाराष्ट्र व मध्यप्र्रदेश के कुछ भागो में विभिन्न मांगो को लेकर किसानों एवं भिन्न -भिन्न किसान संगठनों द्वारा आंदोलन चलाया जा रहा हैं जो दिन प्रति दिन तीव्र होकर फैलता जा रहा हैं। देश के मध्य स्थित प्रदेश हमारे मध्य प्रदेश मंे भी आंदोलन इतना तीव्र हो गया हैं कि उसके हिंसक रूप धारण कर लेने के कारण हुई गोली चालन व मारपीट के कारण 6 किसानो की दुखदः मृत्यु हो गई। अकेला मध्यप्रदेश ही वह प्रदेश हैं जिसे लगातार पिछले पांच वर्षो से कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता व किसानो के हित में कार्य प्रणाली के कारण पुरष्कार स्वरूप केन्द्र सरकार द्वारा ‘‘कृषि कर्मण’’ पुरस्कार दिया जाता रहा हैं। प्रदेश के कृषि मंत्री 5-5 बार पुरष्कार प्राप्त कर फूले नहीं समा रहे हैं। लेकिन कृषि क्षेत्र में लगातार अवार्ड़ प्राप्त करने वाले प्रदेश में किसानो का आंदोलन होना व उस आंदोलन का उग्र व हिंसक हो जाना और उक्त हिंसक आंदोलन के दमन हेतु गोली चालन होना (जिससे 5 किसानो की मृत्यु हो गई हैं,) अपने आप में एक बड़ी संजीदगी विहीन विरोधाभाषी स्थिति को प्रकट करता हैं।
प्रदेश सरकार का रवैया तो बहुत ही अक्षोभनीय व निर्लजता लिये हुये मूर्खता पूर्ण रहा हैं। एक तरफ मुख्यमंत्री किसानांे की मृत्यु पर क्षति राशि की घोषणा करते रहे, तो दूसरी ओर उनके गृहमंत्री पुलिस द्वारा गोली चालन से न केवल लगातार साफ इंकार करते रहे बल्कि कुछ असामाजिक अज्ञात तत्वों को इस गोलीकांड के लिये जिम्मेदार भी ठहराते रहे। लेकिन अंततः उन्हे वस्तुस्थिति को स्वीकार कर पुलिस गोली चालन से 5 किसानों की मृत्यु को स्वीकार करना पडा़। गृहमंत्री का यह रवैया न केवल उनकी गैर संवेदनशीलता व अकुशलता को दर्शाता हैं बल्कि मुख्यमंत्री के स्टेंड़ के विरूद्ध भी रहा जिन्होेंने किसानो की गोली चालन में मृत्यु के पश्चात् तुरंत  प्रांरभ में मुआवाजा राशि 5 लाख की घोषणा कर दी थी, जिसे 5 लाख से बढ़ाकर 10 लाख किया गया और अंततः1 करोड़ करके संवेदनशील होने का अहसास (असफल) प्रयास किया गया। यदि सरकार की नजर में घटित नुकसान की पूर्ति मुआवजा राशि से हो जाती हैं तो पहले मात्र 5 लाख की घोषणा क्यांे की गई? यदि वह राशि सही थी तो फिर बढ़ाकर 10 लाख व दो दिन बाद 1 करोड़ क्यों कर दी गई? क्या 5 लाख की राशि की घोषणा के बाद आंदोलन में नरमी न आने के कारण आंदोलन को कमजोर करने के लिये 1 करोड़ रू. की राशि का दॉंव फेंका गया? प्रथम बार ही 1 करोड़ रू. की घोषणा क्यों नहीं की गई? आखिर कब तक इस तरह आंदोलनो में गई जाने व मृत्यु की एवज में मुआवजे की घोषणा कर मरहम लगाने का प्रयास किया जाता रहेगा? क्या जीवन के क्षतिपुर्ति का विकल्प सिर्फ पैसा (मुआवजा राशी) ही हो सकता हैं? आंदोलन से निपटने में विफल होने के लिये शासन, उपस्थित जनप्रतिनिधि प्रशासनिक मशीनरी व अराजक तत्वों को निश्चित सीमित समय में कड़क सजा मिलने का प्रावधान क्यों नहीं बनाया जाता हैं?, ताकि जान माल की हानि न हो सके। ऐसी स्थिति पैदा करने के लिये जो सामूहिक रूप से जिम्मेदार होते हैं उन पर कार्यवाही होकर उन्हे कड़क सजा़ क्यों नहीं दी जाती हैं? एक तरफ ‘‘सरकार की मुआवजा की घोषणा करते जाना’’ व दूसरी ओर आंदोलन में ‘‘असामाजिक तत्वों द्वारा गोली चालन किये जाने का कथन करना’’ क्या यह सब सरकार के मुखिया व गृहमंत्री के बीच संवादहीनता को नहीं दर्शाता है? क्या यही संवादहीनता की खाई प्रशासक, शासक, आंदोलित किसान एवं प्रबुद्ध नागरिकांे के बीच इतनी तो नहीं बढ़ गई जिसका दुष्परिणाम ही 6 लोगो की मौत का कारण बना? 
देश की सुरक्षा के लिये सीमा पर मरने वाले प्रदेश के जवानो के लिये कभी 1 करोड़ का मुआवजा मध्यप्रदेश सरकार द्वारा दिया गया? हर पक्ष यही कहता हैं कि ऐसे समय राजनीति नहीं की जानी चाहिए। लेकिन दूसरे ही पल परस्पर एक दूसरे पर राजनीति करने का आरोप जड़ दिया जाता हैं। प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री मुआवजा की राजनीति में ही मशगूल हो गये। हाल में ही कुछ दिन पूर्व प्रदेश के मुख्यमंत्री जब बैतूल जिले के दौरे पर आये थे तब बैतूल शहर में रहने वाले एक जवान जिसकीे सीमा पर मृत्यु हो गई थी उसकेे घर वे (दो मिनट शोक व्यक्त करने) शायद ‘राजनीति’ न करने के कारण ही नहीं पंहुचे। जबकि उसके एक दिन पहले ही वे भोपाल से रीवा जाकर एक शहीद को श्रृद्धाजंली देकर आए थे। 
कश्मीर में सुरक्षा बल पर पत्थर फेकने वाले ‘व्यक्ति’ पर रबर बुलेट चलाने के मामले में तो उच्चतम् न्यायालय से लेकर मानवाधिकारी प्रश्न उठा देते हैं। लेकिन देश की पेट पूजा करने वाले किसानो की जब पुलिस/अर्द्धसैनिक बल द्वारा गोली चालन में हत्या हो जाती हैं तब न तो न्यायालय सामने आता हैं न ही तथाकथित बुद्धिजीवी मानवाधिकार के रखवाले लोग बस किसी न किसी रूप में एक जांच के आदेश की नियुक्ति की घोषणा हो जाती हैं।.
बात कुछ राहुल गांधी के दौरे की भी कर ले। राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि ‘‘वे प्रभावित किसान परिवारो से मिलने मंदसौर जा रहे हैं’’। यह आंदोलन जिसने हिंसक रूप ले लिया (किसके कारण/द्वारा, यह न्यायिक जांच का विषय हो सकता हैं) जिस कारण करोड़ो रू. की आम नागरिकों व सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान हुआ। एक बस जिसमें बच्चे व महिलाएॅं सवारी थी उस पर लगातार पत्थर फेके गए उन्हे उतार कर बाद में बस जला दी गई। ऐसे आंदोलन के बीच ऐसी अमानवीय हरकतो से प्रभावित व डरे हुये लोगो के ऑंसू पोछने के लिए राहुल गांधी से लेकर अन्य कोई नेता ने पहंुचने की इच्छा व्यक्त नहीं की। क्यों? तब वह राजनीति कहलाती और वे ऐसी जनहितैषी राजनीति नहीं करना चाहते हैं। वाह री राजनीति! 
शिवराज सिंह चौहान द्वारा उपवास पर बैठना कौन सी नीति हैं जिसमें राज-नीति बिलकुल  नहीं हैं? यदि 24 घंटे के उपवास से शांति आ सकती हैं, तो मुख्यमंत्री 3-4 दिन पूर्व ही, हिंसा प्रारंभ होते ही क्यों नहीं अनशन पर बैठ गये? उपवास पर बैठने को एक जुमले में ‘‘गंाधी गिरी’’ कहा जा सकता हैं। लेकिन यदि यह गांधी-गिरी हैं तो उसका हिंसा से क्या लेना देना हैं। लेकिन यहॉं पर दोनो पक्षों द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाया गया। मुख्यमंत्री द्वारा हिंसा की उच्चस्तरीय जांच कराने का भी निर्णय उपवास पर बैठने के बाद किया गया। जब एक न्यायिक जांच की घोषणा पहिले ही कर दी थी तब दूसरी उच्चस्तरीय जांच का क्या औचित्य? इससे तो यही मतलब निकलता हैं कि जंाच की घोषणा कर मामले को ठंडे बस्ते में डालना जो कमोवेश प्रत्येक सरकार किसी भी घटना को घटित होने पर अपने बचाव में (सफलतापूर्वक) करती चली आ रही हैं।

मंगलवार, 2 मई 2017

’आप’ का ‘आप’ (जनता) से ‘विश्वास’ क्यों खत्म होते जा रहा है?

दिल्ली नगर निगम के चुनाव में बुरी तरह से हारी आप पार्टी और उनके नेता पूरी तरह से बौंखलाये हुये हैं। आजकल मीड़िया से लेकर हर जगह ‘आप’ के ‘‘विश्वास’’ की चर्चा हो रही हैं। आखिर ‘‘आप’’ को हो क्या गया हैं? नगर निगम के चुनाव परिणाम किसी राजनैतिक दल के लिये बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। लेकिन दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम को जिस तरह राष्ट्रीय मीड़िया ने महत्व दिया और लगातार सुबह से शाम तक टी.वी. चेनलों पर लाईव परिणाम दिखाएॅ गये वैसी अहमियत मुम्बई या कोलकत्ता को कभी भी नहीं मिली। जबकि मुम्बई महानगर पालिका का बजट तो कुछ राज्यों के बजट से भी बड़ा हैं। यह ठीक वैसी ही घटना हैं जैसे कि पूर्व में दिल्ली विधानसभा के चुनावों व परिणाम को राष्ट्रीय कवरेज मिला था जबकि वह पूर्ण राज्य भी नहीं हैं, और बहुत ही छोटी सी विधानसभा हैं। तब ‘‘आप’’ के द्वारा ‘‘आप’’ को 70 में से 67 सीटो पर विजय मिली थी। जीत तब सही मानी गई थी। चुनाव आयोग, ईवीएम मशीन, मतदाता तब सब ‘‘आप’’ की नजर में सही थे। उस वक्त सिर्फ गलत और गलत थे तो मात्र विरोधी पार्टियॉं कांग्रेस व भाजपा जिन्हे दिल्ली के मतदाताओं ने लगभग पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया था। दो साल बाद अब दिल्ली की जनता ने नगर निगम के चुनाव के जो परिणाम दिये हैं क्या उसे मोदी सरकार के कार्यो के प्रति सकारात्मक अनुमोदन कहा जाय या केजरीवाल सरकार के प्रति नकारात्मक भाव या दस सालो से नगर निगम पर आरूढ़ भाजपा के कार्यो पर मुहर व जनादेश कहे। यह सब व्याख्या राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से, अपनी सुविधानुसार करने के लिये स्वतंत्र हैं। लेकिन प्रांरभिक प्रतिक्रिया में ‘‘आप’’ द्वारा उक्त परिणाम को अस्वीकार करके बवाल मचाकर ‘‘ईवीएम द्वारा जीता हुआ चुनाव’’ कहना, निश्चित रूप से निंदनीय, अनैतिक व अलोकतांत्रिक हैं।
ईवीएम मशीन पर अविश्वास जताकर चुनाव परिणाम को अस्वीकार कर देने का क्या यह मतलब नहीं हैं कि ‘आप’ उस जनता पर अविश्वास कर रहे हैं जिस जनता ने पहले दिल्ली विधानसभा में उसी ईवीएम मशीन का प्रयोग करके ‘‘आप’’ को लगभग पूर्ण रूप से (95% 70 में से 67को) चुना था। तब ‘‘आप’’ को इसी ईवीएम ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रतिक्रिया देने का अधिकार प्रदान किया था जिसे न तो ‘आप’ ने अस्वीकार किया था, और न ही कोई प्रश्नवाचक चिन्ह  लगाया था? यह 95 प्रतिशत बहुमत भी आप को उस परिस्थितियों के बाद मिला जब इसके पूर्व हुये लोकसभा के चुनाव में दिल्ली की सातो सीट पर उन्हे हार खानी पड़ी। इसके पूर्व केे विधानसभा चुनाव में भी आप को बहुमत नहीं मिला था एकतरफा कांग्रेस के बिना शर्त समर्थन से सरकार बनानी पड़ी थी। 1984 के लोकसभा चुनाव में आई सहानुमति की लहर में भी कांग्रेस को इतना प्रचंड बहुमत नहीं मिला जितना विधानसभा चुनाव में आजादी के बाद किसी भी विधानसभा चुनाव में शायद प्रथम बार किसी पार्टी को 95 प्रतिशत बहुमत प्राप्त हुआ हैं। न ही एग्जिेट पोल व न ही एग्जिट पोल में आप की इतनी प्रचंड़ जीत की संभावना व्यक्त की गई थी। खुद आप को भी लगभग इस पूर्ण जीत का ‘‘विश्वास’’ कदापि नहीं था। तब इस आश्चर्य चकित परिणाम पर ईवीएम पर उंगली न तो ‘‘आप’’ ने उठाई नहीं और ने ही ‘आप’ के विरोधियों ने, बल्कि इसे जनता जर्नादन का निर्णय मान कर हंसते हुये स्वीकारा गया। आप के नेताओं का लगातार यह कहना हैं कि लालकृष्ण आड़वानी के जमाने से व सुब्रम्हण्यम स्वामी के द्वारा ईवीएम मशीन पर आपत्ति जताई जा रही थी और इसी बीच भाजपा के द्वारा इस संबंध में शोध कर ईवीएम मशीन में छेड़खानी करके चालाकी से अपने अनुकूल परिणाम ला रही हैं। इसी कारण भाजपा लगातार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड़, दिल्ली इत्यादि चुनाव जीत रही हैं। यह सरासर जनादेश का घोर अपमान ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास भी हैं।
यदि यह भी मान लिया जाय कि भाजपा ईवीएम मशीन पर लगातार शोध करते करते उसमें गड़बडी करके अपने अनुकूल परिणाम ले आने में विशेषज्ञ हो गई हैं, जैसा कि ‘आप’ अब आरोपित कर रही हैं। तब ‘‘आप’’ को दो साल पूर्व हुये दिल्ली के चुनाव में कैसे भारी एक तरफा विजय मिल गई थी जो सही थी? ‘‘आप’’ के नेता ईवीएम मशीन पर गड़बडी का आरोप मढ़ते समय राजनैतिक वास्तविकता को भूल रहे हैं व अपने गिरेबान में झाक कर देखने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। जीते तो ईवीएम मशीन सही, हारे तो ईवीएम मशीन गड़बड। यह वही कहावत हैं कि मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कडवा थू। जबकि एक सामान्य व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिये भी मीठा व कड़वा दोनो ही जरूरी हैं। राजनीति में तो स्वाद राजनेता के हाथो में नहीं बल्कि उस जनता के हाथों में हैं जिसे जनता जर्नादन कहा जाता हैं, तो राजनैतिक पार्टी जनता से वोट लेने के दिन तक तो जनता को अपना भगवान मानती हैं, उनका सेवक कहलाना पंसद करती हैं, लेकिन जीतने पर खुद मालिक और भगवान बन जाती हैं।
इस चुनाव के पहले से ही ’’आप’’ ईवीएम मशीन में धांधली का आरोप लगा रही हैं। यदि ‘‘आप’’ को यह विश्वास था (बात फिर ‘‘विश्वास’’ के संकट की है) कि यह धांधली नहीं रूकेगी तथा ‘आप’ उस धांधली को रोकने में असमर्थ हैं तब ‘आप’ के द्वारा इस चुनाव में भाग लेने का क्या औचित्य था। आप ने इस मुद्दे को लेकर शुरू में ही चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं किया व जनता को आंदोलित क्यों नहीं किया। पानी पी पी कर हर मुद्दे पर सोशल मीड़िया के माध्यम से जनमत जानने का दावा करने वाली ‘‘आप’’ ने सोशल मीड़िया के द्वारा इस मुद्दे पर जनता की राय अभी तक क्यो नहीं ली?
आखिर ‘आप’ का (कुमार) ‘‘विश्वास’’ पर ‘‘अविश्वास’’ का संकट क्यों गहराता जा रहा हैं? उसका यह ‘‘अविश्वास’’ उसे कहॉं ले जायेगा? या ‘आप’ इस ‘‘अविश्वास’’ को कहॉं तक लेकर जाकर छोडते हैं? ‘आप’ आखिर ईवीएम मशीन पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हैं? उसका ‘‘विश्वास’’ ही जब खुद पर अविश्वास करने लग जाये तो उनके ‘‘अविश्वास’’ पर कौन ‘‘विश्वास’’ करेगा? यदि ‘आप’ को जीत की ओर लौटना हैं तो उन्हें जन-(के)-तंत्र के सामने खड़ा होना पडेगा व उसका सामना करना पडेगा। इसके लिये उन्हें अपने को शुरूवात की स्थिति में लौंटना पड़ेगा जहां से वे जनतंत्र कीे ऑंधी के कारण लोकतंत्र का भाग बन सकें थे। अन्यथा उनका आगे का राजनैतिक सफर सिफर हो जायेगा और ‘‘आप’’ इतिहास के पन्ने में गुम हो  जायेगे। आप की जगह मैं, तुम, हम, ही चलायमान होगें।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

उच्चतम् न्यायालय के ‘‘निर्णय की मूल भावना’’ का ऑटो कम्पनियों द्वारा घोर उल्लघंन!



     
उच्चतम् न्यायालय ने विगत दिवस 29 मार्च को दिये गये अपने आदेश के द्वारा बीएस-3 (भारत स्टेज- 3 उत्सर्जन मानक) जिसकी शुरूआत केन्द्रीय सरकार ने वर्ष 2000 में की थी, वाले वाहनों के विक्रय व रजिस्ट्रेशन पर 1 अप्रैल 2017 से रोक लगा दी हैं। केन्द्रीय सरकार ने वर्ष 2014 में इस संबंध में एक अधिसूचना भी जारी की थी कि जिसके द्वारा बीएस-3 वाहनों के विक्रय पर 1 अप्रैल 2017 से रोक लगाने के निर्देश भी किये गये थे। इन वाहनों के बेचने पर लगी इस रोक को आटोमोबाईल उत्पादको (सियाम) के साथ कुछ अन्य डीलरो द्वारा उच्चतम् न्यायालय के समक्ष लम्बित याचिका में एक अंतरिम आवेदन दायर की गई थी जिसमें याचिका कर्ताओं द्वारा यह दलील व प्रार्थना की गई कि, इस समय देश में लगभग 8 लाख 24 हजार बीएस-3 वाहन हैं, जिनकी कीमत करीब 12 हजार करोड की हैं़। उनका यह स्टॉक फैक्ट्री से लेकर शोरूम तक में हैं, जिसे 01 अप्रैल 2017 से उक्त वाहनो को बेचने पर लगी रोक को 7-8 महीने के लिये आगे बढा दिया जावे अन्यथा 12 हजार करोड़ का नुकसान होगा। इसेे उच्चतम् न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।  तू डाल-डाल मैं पात-पात के तर्ज पर पूरे देश में ऑटोमोबाईल डीलर्स ने उनके पास बीएस-3 वाहनों का जो स्टॉेक था, उसको कीमत में भारी डिस्काउंट देकर लगभग पूरा स्टाक एक दिन में ही बेच दिया। इस प्रकार देशव्यापी आटोमोबाईल डीलर्स (सियाम) ने उच्चतम् न्यायालय के निर्णय को धत्ता बताते हुये निर्णय के प्रभावी रूप से क्रियान्वयन होने के पूर्व ही उसे प्रभावी रूप से अप्रभावी कर दिया हैं। इस प्रकार उक्त समस्त बीएस-3 वाहनो को विक्रय करके तथा स्टाक 31 मार्च के पूर्व ही समाप्त कर सरकार व उच्चतम् न्यायालय द्वारा सामने लाये गये मुद्दे को लगभग दफन ही कर दिया गया। उच्चतम् न्यायालय ने निर्माताओं के वाणिज्यिक हित की तुलना में देश के नागरिको के स्वास्थ को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हुये व तरहीज देते हुये ‘‘सियाम’’ के बीएस-3 वाहन 1 अप्रैल के बाद बेचने के लिये अनुमति देने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया। अतः क्या यह उच्चतम् न्यायालय के बंधनकारी निर्णय की अवमानना नहीं हैं? उनके आदेश की व्यवहारिक रूप से अवहेलना नहीं हैं तो क्या हैं? यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। 
इस घटना से यह तथ्य भी सामने आता हैं कि चूंकि उच्चतम् न्यायालय ने अपने आदेश के पालन की तिथि 1 अप्रैल 2017 से निधारित की हैं इस लिए 30 व 31 मार्च को किये गये वाहनों का विक्रय व तकनीकि रूप से कानूनन सही होने के कारण न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में नहीं आता हैं। लेकिन जो न्यायिक सिंद्धान्त उक्त आदेश में उच्चतम् न्यायालय के द्वारा प्रतिपादित किया गया, उसका यथार्थ मन्तव्य यह हैं कि बीएस-3 वाहन जिनके कारण पर्यावरण में प्रदूषण फैलता हैं, जिस बढते प्रदूषण के कारण एनजीटी व इपीसीए ने उनके चलन पर रोक लगाई थी।   बल्कि उनका परिचालन पर्यावरण में प्रदूषण बढाने का कारक भी होगा जिसे रोकने के लिये ही यह निर्णय लिया गया था।  
न्याय का यह सिंद्धान्त स्वयं उच्चतम् न्यायालय ने प्रतिपादित किया हैं कि न्याय न केवल  मिलना चाहिए, बल्कि न्याय मिल रहा हैं, ऐसा दिखना भी चाहिए। ठीक इसी प्रकार एक नागरिक या उपभोक्ता का भी यह दायित्व हैं कि वह न केवल कानून व उच्चतम् न्यायालय के बंधनकारी निर्णय का पालन करे, बल्कि वह कानून, आदेश का पालन कर रहा हैं यह दिखता हुआ भी प्रतीत होना चाहिए। उपरोक्त प्रकरण में इस भावना का सम्मपूर्ण रूप से क्षरण होकर उपभोक्ता व सेवा प्रदाता दोनो पक्षकारांे द्वारा निश्चित रूप से अंतिम सीमा तक उल्लंघन किया गया हैं। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि दोनो पक्ष के पास 31 मार्च तक विक्रय-क्रय की समय सीमा थी जिसके अंदर ही उन्होने विक्रय-क्रय किया। यदि यह बात कानून के साथ तथ्यात्मक रूप से सही होती तो वे उच्चतम् न्यायालय के समक्ष क्यो याचिकाकर्ता बनते ?
यह कहना कोई अतिश्यिोक्ति नहीं होगी कि हम भारतीयों का एक विशेष गुण यह भी हैं, कि जब भी कोई कानून विधायिका के द्वारा बनाया जाता हैं या न्यायालय के द्वारा लागू कराया जाता हैं तब हम उसमें ‘‘छिद्र’’ खोज लेते हैं। बल्कि कानून बनने के पहले ही छिद्र खोज लेते हैं यह कहना भी अतिशेयक्ति नहीं होगी। तू डाल-डाल मैं पात-पात वाला यह मुहावरा विश्व के अन्य देशों की तुलना में हम सब भारतीयों पर ही सबसे ज्यादा लागू होता हैं।
एक भारतीय नागरिक होने के नाते प्रत्येक नागरिक व्यक्ति का यह कर्तव्य हैं कि वह कानून का पूर्ण निष्ठा व श्रद्धा पूर्ण भावना के साथ पालन करंे। इस मामले में सिर्फ आटोमोबाईल कम्पनिया ही देाषी नहीं हैं बल्कि वे समस्त नागरिक (जनता) भी हैं, जिन्होने उक्त वाहनों की खरीदी की हैं। सर्व विदित हैं कि चोरी के मामले मंे चुराई गई वस्तुओं को जो खरीदता हैं, वह भी एक अपराधी होता हैं। अमूूमन वस्तु के वास्तविक कीमत से काफी सस्ती होने के कारण ही वह चोरी की वस्तुओं को खरीदता हैं। ठीक इसी प्रकार आटोमोबाईल डीलर के द्वारा दिये गये भारी डिस्काउट के चलते ही वे सभी नागरिक भी जिन्होंने उक्त गाडीयों की खरीदी की हैं, चोरी के माल को खरीदने वाले नागरिकों के समान क्या अपराधी नहीं हैं? चंूकि उक्त माल को बेचने का प्रतिबंध 1 अप्रैल 2017 से लागू करने का आदेश दिया गया था जिसको यर्थार्थ में शून्य कर दिया गया। इस तरह तकनीकि रूप से वे अपना बचाव अवश्य कर सकते हैं। लेकिन एक नागरिक के नागरिक अधिकारेा के समान ही नागरिक कर्त्तव्य भी होते हैं। अतः अपने नागरिक कर्त्तव्यों का पालन न करने के कारण वे भी उतने ही दोषी हैं।
इस पूरे प्रकरण में सरकार भी सुस्त रही व सोती रही। सरकार की ऑंख के ठीक नीचे खुले आम सरकार की नीति को पलीता लगा दिया गया और सरकार उसको रोकने के लिये कोई हरकत में नहीं आई। याद कीजिये नोटबंदी की रात्री जब रात भर 500-1000 नोटों को बदलवाने के लिये सराफा बाजार खुले रहे, तो सरकार ने त्वरित हरकत में आकर तुरन्त आयकर के छापे की कार्यवाही की थी। यदि यहां भी सरकार तुरंत जाग जाती व शोरूमों को सील कर दिया जाता तो भले ही वह उस क्षण अवैधानिक होता, लेकिन पर्यावरण को नुकसान होने से बच जाता जिस लक्ष्य साधन के लिये सरकार ने यह नीति बनाई हैं। 
तथाकथित उपरोक्त कानूनी विक्रय-क्रय को आप इस तरह से भी समझ सकते हैं। संसद को संविधान में संशोधन करने का पूर्ण अधिकार हैं। इस तरह अभी तक संविधान में 100 से अधिक संशोधन भी हमारे मूल संविधान में हो चुके हैं। लेकिन केशवानंद भारतीय के मामले में उच्चतम् न्यायालय ने यह निर्णय दिया हैं कि ऐसा कोई भी संशोधन संसद नहीं कर सकती हैं जो संविधान की मूल भावना के विपरीत हो। ठीेक इसी प्रकार बीएस-3 वाहनो का कानूनी विक्रय का अधिकार होने के बावजूद 30 व 31 मार्च 2017 को किये गये विक्रय से उच्चतम् न्यायालय के आदेश की उसी मूल अवधारणा को खोखला करते हुये धक्का पंहुचा हैं, इसलिये मेरे मत में वह अवैध हैं व उच्चतम् न्यायालय .को स्व प्रेरणा से उक्त विक्रयों का संज्ञान लेकर शीघ्रातिशीघ्र न्यायिक आदेश पारित करना चाहिए। 
जब पाचं वर्ष के लिये चुनी गई सरकार आम चुनाव में हार जाती हैं, तो आई नई सरकार  पिछली सरकार के द्वारा (कुछ दिवस, हफ्ते या महीने पहले) लिये गये निर्णेयों को जो कि संविधान व कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार के अतंर्गत ही लिये गये थे, की समीक्षा करके उन्हे पलट देती हैं। तब ऐसी ही भावना के तहत क्या सरकार इन बेचे गये बीएस-3 वाहनो के विक्रय की समीक्षा कर कोई ऐसा कानून बनायेगी जिससे 30 व 31 मार्च 2017 को विक्रय किये गये सभी वाहन परिचालन में सड़क पर नहीं आ सकें, ताकि ऐसी कार्यवाही से हतोत्साहित हो कानून की अवहेलना, मजाक बनाने का उल्लघंन करने वाले लोग जन सुरक्षा एवं कानून के यर्थाथ पालनार्थ सरकार कितनी उद्घृत हैं यह भविष्य के गर्भ मेें ही हैं। (शाहबानांे प्रकरण में तो सरकार ने उच्चतम् न्यायालय के निर्णय को ही संसद द्वारा ‘‘जनहित’’ के नाम पर पलट दिया था।)

मंगलवार, 28 मार्च 2017

गोवा में सरकार बनाने में कांग्रेस की ‘‘असफलता’’ या संविधान की हत्या?

पांच राज्यांे में साथ-साथ हुये गोवा विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन सरकार बनाने में असफल रही। भाजपा ने न केवल बहुमत होने का दावा पेश किया बल्कि विधानसभा में विश्वास मत जीतने में भी सफल रही। गोवा के मुद्दे पर न केवल राजनैतिक मत, बल्कि वैधानिक मत भी बंटा हुआ हैं। इसके चलते कांग्रेस ने न केवल वरिष्ठ वकील एफ.एस.नरीमन के विचारो को प्रचारित कर आधार मानकर राज्यपाल के निर्णय की न केवल कड़ी आलोचना की बल्कि लोकसभा में भी हंगामा मचाया। मनोहर पर्रिकर बहुमत के प्रति न केवल स्वयं आश्वस्त थे बल्कि उन्होंने आशानुरूप सदन के पटल पर उसे सिद्ध भी कर दिया। गोवा के मामले में माननीय उच्चतम् न्यायालय के द्वारा पूर्व में एस.आर.बोम्मई के प्रकरण में दिये गये प्रतिपादित सिद्धान्त का बार-बार हवाला देकर कांग्रेस का यह कहते और मानते रहना कि ‘‘राज्यपाल महोदय को सबसे बडे़ राजनैतिक दल होने के कारण कंाग्रेस को सरकार बनाने के लिये निमंत्रण देना ही चाहिये था और बहुमत का निर्णय सदन के पटल पर ही किया जाना चाहिए था’’ व्यर्थ ही साबित हुआ। निश्चित रूप से एस.आर. बोम्मई व अन्य कई निर्णयों में माननीय उच्चतम् न्यायालय ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं कि बहुमत का निर्णय सदन के इतर राज्यपाल भवन अथवा अन्य स्थान में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए। लेकिन एस. आर. बाम्ेमई के निर्णय के बावजूद, (जिसमें बहुमत के निर्णय के बिन्दु के अलावा 16 अन्य बिन्दु भी थे) सबसे बड़ी पार्टी द्वारा सरकार बनाने के लिए दावा पेश करने में असमर्थ रहने पर व इसी बीच दूसरी पार्टी द्वारा (अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन बनाकर) बहुमत दर्शाते हुए दावा प्रस्तुत कर दिए जाने की स्थिति विशेष में राज्यपाल के पास उक्त गठबंधन के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिये निमंत्रण देने के अलावा अन्य कोई विकल्प ही नहीं बचा रह गया था। 
एस.आर.बेाम्मई का प्रकरण व गोवा के प्रकरण में तथ्यों में मूलभूत अंतर हैं। एस.आर.बोम्मई के मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री जनता दल के एस.आर.बोम्मई के द्वारा मंत्रिमडंल का विस्तार करने के दो दिन पश्चात् ही जनता दल के विधायक मंलाकेरी ने 19 विधायको के पत्र के साथ राज्यपाल को बोम्मई सरकार से समर्थन वापसी का पत्र लिखा जिसके पश्चात् राज्यपाल ने सरकार को भंग करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी व तदानुसार कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लागु कर दिया गया था जिसे उच्चतम् न्यायालय गलत करार कर यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि बहुमत का निर्णय सदन के पटल पर ही होना चाहिए। परन्तु गोवा में राजनैतिक परिस्थितियों को भॉंपते (शायद पार्टी में विभाजन की स्थिति के मद्वेनजर) हुये कांग्रेस कोई दावा प्रस्तुत करने में न केवल अनिश्चित देरी लगा रही थी बल्कि (राज्यपाल द्वारा भाजपा को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित करने तक) विधायक दल का नेता भी नहीं चुन पा रही थी। इन परिस्थितियों में राज्यपाल के पास क्या विकल्प रह गया था? जब एक पार्टी सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करे तब दूसरे विरोधी पक्ष को उसकी सूचना देने का राज्यपाल का दायित्व क्या संविधान में लिखा हैं? अथवा एक पार्टी द्वारा सरकार बनाने के लिये बहुमत का दावा प्रस्तुत कर देने के पश्चात् तक दूसरी पार्टी द्वारा कोई विरोध अथवा दावा प्रस्तुत नहीं कर पाने की स्थिति में उससे चर्चा करने का क्या कोई संवैधानिक व नैतिक बाध्यता हैं? इस सबका उत्तर नहीं में हैं। यहां यह भी उल्लेख करना सामयिक होगा कि उत्तर प्रदेश में क्रमशः मायावती व आम आदमी पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि बहुमत न मिलने कि दशा में वे विपक्ष में बैंठना पसंद करेगें। न किसी को समर्थन देंगे, न किसी का समर्थन लेगे। यद्यपि गोवा में कांग्रेस ने इस प्रकार की कोई घोषणा नहीं की थी। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद नई सरकार बन जाने तक उसके कृत्य लगभग ऐसे ही थे। कांग्रेस के द्वारा सरकार बनाने का  प्रयास, दावे या इच्छाशक्ति कुछ भी राज्यपाल के सामने प्रस्तुत नहीं किए गये। अतः राज्यपाल के पास सिवाय मनोहर पर्रिकर को निमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था।
कंाग्रेस के द्वारा कहा गया कि सरकार बनाने के लिये नेता चुनने व दावा करने की कोई समय सीमा नहीं होती हैं व उसे सरकार बनाने के लिये उचित समय नहीं दिया गया। जबकि उत्तर प्रदेश में भाजपा को नेता चुनने व सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिये तुलनात्मक रूप से (11 से 19 मार्च) तक  काफी समय दिया गया था। राज्यपाल पर एक तरफा जल्दबाजी के आरोप लगाये गये। सरकार बनाने की कोई समय सीमा संविधान में निर्धारित नहीं हैं, इससे इंकार नहीं हैं। न ही कोई न्यूनतम सीमा, न ही कोई अधिकतम सीमा। जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल हैं वहां पर भाजपा द्वारा नेता चुनने में की जा रही देरी के बावजूद राज्यपाल के पास दूसरी पार्टी, पक्ष या गठबंधन का सरकार बनाने का कोई दावा सामने नहीं आया था और न ही कोई अन्य सरकार बनाने की स्थिति में था। स्पष्ट रूप से भाजपा के पास वहां तीन चौथाई बहुमत था। जबकि गोवा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कंाग्रेस ने दावा पेश ही नहीं किया और जो पार्टी चुनाव में हार गयी थी व जिसका मुख्यमंत्री भी हार गया था, उसने अन्य पार्टीयों से गठबंधन कर बहुमत का दावा पेश किया था दिया एवं सरकार बनाकर बहुमत भी सिद्ध कर दिया। कंाग्रेस पार्टी के द्वारा राज्यपाल के उक्त निर्णय को उच्चतम् न्यायालय में चुनौती दी गई। 
माननीय उच्चतम् न्यायालय में भी कांग्रेस पार्टी ‘‘बहुमत का दावा या, आंकड़ा या शपथ पत्र पेश करने में असफल रही जैसा कि न्यायालय ने अपने आदेश में कहां भी हैं। वास्तव में कांग्रेस पार्टी को अपने नेता के चुनाव करने में पसीना आ रहा था। गोवा में उनकी पार्टी के चार-चार भूतपूर्व मुख्यमंत्री जीत कर आये थे जिसके कारण नेता के चुनाव में हुई देरी के लिये उनके आंतरिक राजनैतिक अडं़गे थे। इसी परिस्थिति विशेष का खामियाजा कांग्रेस पार्टी को भुगतना पड़ा। माननीय उच्चतम् न्यायालय ने भी कंाग्रेस की अपील को खारिज कर दिया। उच्चतम् न्यायालय के पूर्व निर्णय एस.आर. बोम्मई बंधनकारी हैं लेकिन वर्तमान प्रकरण एवं पूर्व प्रकरण में तथ्य साम्यता नहीं हैं। ‘‘पूर्ण बंेच’’ का निर्णय ही ‘‘युगल पीठ’’ पर बंधनकारी होता हैं। उच्चतम् न्यायालय को अपने पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार करने का भी अधिकार हैं। अतः यह स्पष्ट हैं कि कांग्रेस गोवा में एक और राजनैतिक लड़ाई हार चुकी हैं।

शनिवार, 25 मार्च 2017

पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के मायने?

     11 मार्च को आये पांच राज्यों के चुनाव परिणाम विपक्ष के लिये आंधी और तूफान से ज्यादा एक ऐसीे सुनामी लेकर आये जिस तरह 11 मार्च को जापान के सेंडाड़ में अब तक का सबसे विध्वंशकारी व विनाशकारी भूकंप आया था। परिणाम पर गहरी नजर रखने वाले चुनाव विश्लेषकों व जीतने व हारने वाली पार्टियों सभी की नजर में उक्त परिणाम पूर्णतः अप्रत्याशित व अद्धभुत रहे। यद्यपि उत्तर प्रदेश में भाजपा का नारा था ‘‘अबकी बार 300 के पार’’। लेकिन यह नारा कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करने व विपक्ष को हतोत्साहित करने भर के लिये था। उत्तर प्रदेश में समस्त राजनैतिक पंडितों का स्वस्थ्य आकलन भाजपा के पक्ष में अधिकतम 250-280 सीटों के आस पास था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं सार्वजनिक रूप से उत्तर प्रदेश विधानसभा के उक्त परिणामों का अप्रत्याशित होना स्वीकार किया हैं। यही बात निश्चित रूप से मोदी जी द्वारा भाजपा केन्द्रीय कार्यालय में दिये गए स्वागत भाषण में भी परिलक्षित होती हैं। लेकिन इस तथ्य के बावजूद भी (मात्र पंजाब को छोड़कर) इतना प्रचड़ बहुमत मिलना क्या मोदी सरकार की 3 साल की नीतियों पर जनता की स्वीकार्यता नहीं दर्शाता हैं? 
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार भाजपा को लोकसभा चुनाव 2014 में प्रचंड़ बहुमत प्राप्त हुआ था। परन्तु विधानसभा के चुनाव के मध्य केन्द्रीय सरकार की रीति-नीति कार्यप्रणाली व कार्य सम्पादन की प्रगति के संबंध में पक्ष-विपक्ष के बीच जिस तरह की नोक-झोंक हुई, उसके बावजूद ऐसा परिणाम निश्चित रूप से दर्शाता हैं कि पांचों राज्यों के परिणाम एक तरह से केन्द्र सरकार की नीतियों पर मोहर हैं। पांचों विधानसभाओं के इन परिणामों की एक विशेषता यह भी रही हैं कि समस्त (पाचों) राज्यों में जनता ने स्थापित सरकार के विरूद्ध निर्णय दिया। (यह बात और हैं कि गोवा में भाजपा ने कांग्रेस की अक्रर्मण्यता के कारण पुनः सरकार बना ली)। पंजाब के चुनाव में अकालियों का साथ भाजपाइयों को ले डूबा। महाराष्ट्र में चुनाव के पूर्व भाजपा ने शिवसेना का साथ छोड़ने का जो साहसिक कदम उठाया और उसे सफलता मिली। ठीक उसी तरह की स्थिति यदि पंजाब में भी हो जाती तो शायद इन चुनावों में इस तरह के परिणाम नहीं आते। स्मरण कीजिये 2014 के लोकसभा चुनाव, जब देश भर में भाजपा को प्रथम बार पूर्ण बहुमत के साथ अप्रत्याशित जीत मिली थी। पांच विधानसभा चुनाव परिणामों पर मोदी जी की प्रतिक्रिया से सिद्ध होता हैं कि उनके लिये विधानसभा चुनाव के ये परिणाम लोकसभा चुनाव के परिणामों से ज्यादा महत्वपूर्ण सिद्ध हुये हैं। क्यांेकि इन परिणामों ने न केवल वर्ष 2019 के चुनाव हेतु उनका रास्ता  साफ कर दिया बल्कि 2024 तक पार्टी द्वारा प्रस्तावित सरकारी कार्य योजनाआंे के क्रियान्वयन की तैयारी पर भी मुहर लगा दी। जैसा कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी स्वीकार किया हैं। मोदी ने अपने भाषणों में उनकी कुछ योजनाआंें के जो लक्ष्य 2024-26 के लिये तय किया जाना बताया हैं उनसे भी यही परिलक्षित होता हैं कि वे वर्ष 2019 के चुनाव में पार्टी की जीत को लेकर आश्वस्त हैं। 
़उत्तर प्रदेश चुनाव की एक प्रमुख विशेषता मुख्तार अंसारी का महु सदर विधानसभा से विजयी होना है। मुख्तार अंसारी के खिलाफ राजनैतिक पार्टियॉं, राजनैतिक विश्लेषकगण व मीडिया एक दागी होने का आरोप लगा कर लगातार निंदा करते रहे हैं। अखिलेश यादव ने भी अपनी पार्टी को स्वच्छ दिखाने के लिये न केवल समाजवादी पार्टी में मुख्तार अंसारी की पार्टी एकता आवाम दल के विलय का विरोध किया, बल्कि उसे टिकिट भी नहीं दिया। तत्पशाच् मुख्तार अंसारी ने बसपा पार्टी से टिकिट प्राप्त कर विजय प्राप्त की। जनता के द्वारा दागी व्यक्ति को चुनने पर न तो मीड़िया ने इस पर कोई आवाज उठायी, और न ही कोई हाय तौबा मचाई। इस प्रकार किसी व्यक्ति विशेष के दागी होने के कारण जब कोई व्यक्ति या पार्टी उसे टिकट न देने का साहस दिखाती हैं, परन्तु दूसरे दल द्वारा टिकिट दिये जाने पर जनता जब उसी को चुनकर भेजती हैं तब उस जीत से क्या यह सिद्ध नहीं हो जाता हैं कि जन मानस के मन में केवल दबंग व दागी होना ही अयोग्यता की  निशानी नहीं हैं? वरण् यदि दागी व्यक्ति के चरित्र का दूसरा पक्ष उज्जवल हैं, वह जनसेवी हैं तो जनता उसके दागी व्यक्तित्व वाले एक पक्ष को नजर अंदाज करके उसके जनसेवी उज्जवल चरित्र को स्वीकार कर उसे चुन लेती हैं। क्या जनता के इस प्रकार के विचित्र विवेक पर प्रश्न चिन्ह नहीं उठाया जाना चाहिए? जो मीड़िया किसी नेता के खंॉंसे जाने की प्रवृत्ति पर भी बहस करा लेता हैं। क्या उसे जनता के ऐसे विवेक पर भी बहस नहीं कराना चाहिए। आखिर राजनीति में अपराधीकरण पर रोक कैसे लगेगी? मुख्तार अंसारी यदि स्वयं में पूर्णतः सक्षम होते तो उसे किसी पार्टी (समाजवादी, बाद में बसपा) के सहारे की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन पूर्णतः सक्षम न होने के बावजूद उसने अपनी उतनी क्षमता अवश्य प्रदर्शित की हैं जो एक लोकतांत्रिक राजनीति में आवश्यक होती हैं। समाजवादी पार्टी छोड़कर बसपा (जो चुनाव में बुरी तरह से हार गई हैं) की टिकिट पर चुनाव जीतकर आना जनता के बीच उसकी मजबूत राजनैतिक पकड़ को ही प्रदर्शित करता हैं। लेकिन वह पकड़ इतनी मजबूत भी नहीं हैं कि वह अपने भाई व बेटा को जितवा पाता (जो हार गये हैं)।
जीत व्यक्ति को कई बार घमंड़ से भर देती हैं तो कई बार उसे और नम्र बना देता हैं। मोदी के व्यक्तित्व पर जीत के दोनो प्रभाव पाए गये हैं। वर्ष 2014 कीे जीत से सीएम से पीएम तक पहुॅचने के कारण उनके व्यक्तित्व में कुछ ज्यादा गरूऱ-घंमड़ दिखता हैं जो उनके व्यक्तित्व से झलकता रहा हैं, तो इन पांच प्रदेशों (जो कि देश का अल्पांश मात्र हैं) की जीत ने मोदी के व्यक्तित्व में अब गरूऱ-घंमड़ की जगह नम्रता भर दी हैं। यह नम्रता विजय के बाद केन्द्रीय भाजपा कार्यालय में आयोजित सम्मान स्वागत समारोह में उनके द्वारा दिए गये भाषण में भी झलकी हैं।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

एक नागरिक की ‘देशभक्ति’ पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाये जाने का कितना औचित्य ?

रामजश कॉलेज दिल्ली में हुई घटना के संबंध में वर्ष 1999 में हुये शहीद केप्टन मनदीप सिंह की बेटी गुरमेहर के द्वारा किये गये ट्वीट पर कुछ लोगों द्वारा उसकी देशभक्ति पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाना कितना जायज व उचित हैं? जेएनयू दिल्ली में पिछले वर्ष हुई घटना (वर्तमान घटना से कुछ हटकर) के बाद यह प्रश्न एक बार पुनः उत्पन्न हुआ हैं। आखिर गुरमेहर ने क्या ट्वीट किया? यदि उन शब्दों व उसके पीछे छुपे भाव को देखा जाए (जैसा कि उसकी मां ने बाद में स्पष्ट किया हैं) तो उसने वही कहां हैं जो हमेशा से भारत सरकार की पाकिस्तान के प्रति यथा संभव शांति, सद्भाव व अस्तित्व की नीति रही हैं। युद्ध मात्र एक अंतिम अस्त्र हैं। भारत सरकार ने हमेशा अपनी आत्मरक्षार्थ पाकिस्तान के आक्रमण का मुहतोड़ जवाब दिया हैं। आगे बढ़कर उसने कमी भी पाकिस्तान पर आक्रमण नहीं किया हैं। इसके विपरीत अमेरिका सहित विश्व के कई देशों ने अपने हितो के पालन में स्वतः आक्रमण की नीति अपनाई हैं। 
हमारे देश काश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेकता में एकता समाविष्ट हैं। राजनीति में भी अम्मा से चिनम्मा (तमिलनाडू) तक सफर करने के बावजूद हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता हैं। भिन्न-भिन्न प्रथाओं, रीति-रिवाजों, पूजा पद्धतियांें विश्वास एवं अंघ-विश्वासों के बावजूद हमारा देश एक शांति प्रिय, आध्यात्मिक देश माना जाता हैं जो सदियों से आधुनिकता के साथ-साथ अपनी संस्कृति की पहचान की धरोहर व विशिष्टताएॅ संजोए हुये हैं। इस तरह जब हमारी संस्कृति, लोकतंत्र व आध्यात्म के विभिन्न प्रारूप मौजूद हैं, तब हमारे देश में मात्र एक कथन (जिसका कुछ भाग निश्चित रूप से अनुचित व अवॉंछनीय हैं) को सीधे देशभक्ति से बॉंधना और उसपर एकतरफा देशभक्ति का प्रश्न पैदा कर देना क्या अपने आप में स्वयं पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता हैं? आखिर देशभक्ति हैं क्या? क्या यह दो शब्दों देश-भक्ति की सन्धि मात्र हैं? लोगों को किसी भी घटना (फिर वह चाहे कितनी ही असंगत क्यों न हो) पर सीधे देशभक्ति का प्रश्न उठाने के पहिले यह तो समझ लेना चाहिए कि देशभक्ति वास्तव में किसे कहते हैं तथा देशभक्ति के साथ कैसे जिया जाता हैं? 
जिस किसी भी व्यक्ति ने इस देश में जन्म लिया अथवा इस देश की नागरिकता प्राप्त कर ली हैं, ऐसा प्रत्येक नागरिक देशभक्त हैं, और कम से कम तब तक देशभक्त हैं जब तक कि (सजा की बात छोड़ भी दे तो) उस पर किसी देशद्रोह के आरेाप की प्रथम सूचना पत्र दर्ज नहीं हो जाता है।ं देशप्रेम एक कथन मात्र नहीं हैंं जिसे एक जुमले के द्वारा खंड़ित कर दिया जाए! मैं रामजश कॉलेज दिल्ली में हुई घटना के संबंध में देशभक्ति का प्रश्न उठाने वालांे सेे यह जानना चाहता हूं कि क्या उन्होंने आरोपित व्यक्ति के खिलाफ देशद्रोह के अपराध की प्रथम सूचना पत्र देश के किसी भी थाने में दर्ज कराई हैं? देश के एक जागरूक देशभक्त नागरिक होने के कारण क्या देश के प्रति उनसे यह अपेक्षित कर्त्तव्य नहीं हैं। अतः उक्त दायित्व न निभा पाने के कारण क्या वे स्वयं देशद्रोही की श्रेणी में नहीं आ जाते हैं? 
आखिर देशप्रेम हैं क्या? क्या आंतरिक सुरक्षा में लगे हुई संस्था (सिस्टम) के कार्य कलाप देशप्रेम की सीमा में नहीं आते हैं? क्या देश के सुद्रढ़़, मजबूत खुशहाल व विकास की ओर ले जाने के लिये अपने नागरिक कर्त्तव्यों के पालनार्थ स्वयं की आहुति देने का कार्य प्रत्येक नागरिक का नहीं हैं? क्या इसे देशप्रेम में नहीं गिनना चाहिए? और यदि यह सब देशप्रेम हैं तो एक नागरिक की कोई चूक/असावधानी, कर्त्तव्य हीनता या देश के ‘‘स्वास्थ्य’’ पर किसी भी प्रकार का चूना लगाने वाला कलाप क्या उसे देशद्रोह की अंतिम परिणिति  तक ले जाना उचित होगा। क्या प्रत्येक वह कार्य जो देशप्रेम की परिभाषा में नहीं वे देशद्रोह कहलायेगे प्रश्न यह हैं। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि जिस प्रकार न्याय अंधा होता हैं उसी प्रकार देशप्रेम भी अंधा होता हैं। निश्चित रूप से न्याय अंधा कहलाने के बावजूद, आज भी नागरिको का इस न्याय व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास हैं। वे न्याय पाने के लिये इसी न्याय व्यवस्था के पास जाते हैं। उसी प्रकार देशप्रेम भी अंधा होता हैं और अंधा होना भी चाहिये। जो मात्र एक कथन/कार्य कलाप/एकमात्र घटना से खंड़ित नहीं हो जाता हैं। मातृप्रेम व देशप्रेम में कोई अंतर नहीं हैं। जितना प्रखर मातृत्व प्रेम होता हैं उतना ही देशप्रेम भी। मॉं का अपने बच्चें के प्रति प्रेम प्राकृत हैं वह बच्चे के कार्य/उश्रंृखलता के अनुसार कम या ज्यादा नहीं होता हैं। उसी प्रकार एक नागरिक का देशप्रेम भी प्राकृतिक व स्वाभाविक हैं। अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं। अतः हर वह व्यक्ति जो देश की अखंडता व अस्मिता के साथ खिलवाड़ करता हैं वह देशद्रोही हैं और उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर उसे सजा दिलाना देशप्रेम हैं। सिर्फ बयान बाजी से यह कर्त्तव्य पूरा नहीं हो जाता। क्या देशभक्ति को हल्के फुलके ढंग से लेकर उस पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाना आजकल एक फैशन नहीं बन गया हैं?
हमारे समाज में ही कुछ नागरिक विभिन्न अपराध में लिप्त पाये जाते हैं जिन पर भारतीय दंड़ संहिता, अपराध दंड़ प्रक्रिया व विभिन्न कानूनों के अंतर्गत अभियोजन चलाये जाते हैं न्यायालय द्वारा उन्हें सजा दिलाने का प्रयास किया जाता हैं। यद्यपि ऐसे सभी अभियोगी/अपराधियों के ऐसे कार्य एक भारतीय नागरिक होने नाते देश के विधान व संविधान के विरूद्ध हैं, परन्तु क्या वे सब.देशद्रोही हो गये हैं? श्रीमान जी, देशप्रेम की परिभाषा को उसी लचीले पन के साथ लीजिये जिस लचीले पन के साथ आज देश में लोकतंत्र, स्वतंत्रता, सहमति-असहमति की संस्कृति विद्यमान व पल पूल रही हैं। 
जय हिंद!      

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

तमिलनाडु की घटना देश में ‘‘लोकतंत्र’’ की नई परिभाषा गठित करने जा रही हैं ?


 तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता (अम्मा) की लंबी बीमारी के बाद स्वर्गवासी हो जाने के पश्चात् उत्पन्न हुई स्थिति का सामना महामहिम राज्यपाल तथा जिम्मेदार राजनैतिक पार्टियों व व्यक्तियों द्वारा जिस तरह से किया जा रहा हैं उससे एक नई राजनैतिक कल्पना की उत्पत्ति हुई हैं जिस कारण क्या लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुनः परिभाषित करने का समय तो नहीं आ गया हैं? यह यक्ष प्रश्न तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति से उत्पन्न हुआ हैं। सुश्री जयललिता की मृत्यु के बाद से आज तक तमिलनाडु में इतना कुछ घटित हो गया हैं जो न केवल अकल्पनीय हैं, बल्कि भारतीय संविधान की व्याख्या, अर्थ, भावना व आत्मा के बिल्कुल विपरीत हैं। अपनी बीमारी के चलते जयललिता द्वारा तीसरी बार नियुक्त किए गये ओ.पन्नीरसेल्वम ने उनकी मृत्यु होने के बाद जयललिता की अंतरंग सखा (दोस्त) शशिकला नटराजन (चिन्नम्मा) के दबाव के चलते इस्तीफा दे दिया। यद्य्पि इस्तीफा देते समय ऐसा कोई दबाव का कथन पन्नीरसेल्वम् द्वारा नहीं कहा गया था। यह भारतीय लोकतंत्र में ही संभव हैं कि एक ऐसा व्यक्तित्व जो राजनीति में कभी सक्रिय न रहा हो और जिसने पार्टी के किसी पद रह कर सार्वजनिक, राजनैतिक जीवन व्यतीत न किया हो, सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री की मात्र अंतरंग सखा होने की योग्यता के रहते पार्टी का पूरा का पूरा नेतृत्व और कॉड़र (?) ‘‘अम्मा से चिन्नम्मा’’ बनी शशिकला के सामने समर्पण करके उन्हे अपना नेतृत्व सौप देता हैं। यह सब भारतीय लोकतंत्र में ही संभव हैं जहॉ राजशाही प्रणाली को भी लोकतांत्रिक प्रकिया का रूप में ढालकर लोकतंत्र की नई परिभाषा गठित की गई हैं। इसके पूर्व जानकी रामचंदन, चन्द्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव जैसे राजनैतिक व्यक्ति(?) परिवारवाद की राजशाही के रहते स्वीकार किये जाते रहे हैं। राजीव गांधी शायद पहिले ऐसे व्यक्ति थे जिनका राजनैतिक अनुभव शून्य होने के बावजूद ‘युवराज’ के कारण सिंहासनारूढ हुये। लेकिन परिवार के बाहर जाकर गैर परिवारवाद और गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के लिये नेतृत्व सौपने का देश के लोकतंत्र में यह पहला मामला हैं। वह ‘देश’ जो विश्व के लोकतंत्र का सबसे बड़ा ‘देश’ का दावा करता हैं। क्या यह लोकतंत्र पर तमाचा नहीं हैं?
देश के लोकतंत्र पर दूसरा तमाचा तमिलनाड़ु के गर्वनर के अभी तक का व्यवहार (नीति) हैं। सामान्यतः जब मुख्यमंत्री ने अपने पद से स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था और राज्यपाल द्वारा उसे स्वीकार कर ने के पश्चात् और दूसरा नेता सर्व-सम्मति से पार्टी (एआईडीएमके) ने चुन लिया था जिसे बहुमत प्राप्त हैंे। तब उस व्यक्ति को उच्चतम् न्यायालय के निर्णय आने के पूर्व तक (जब शशिकला दोषी ठहराने जाने के निर्णय के कारण अयोग्य हो गई) मुख्यमंत्री पद की शपथ न दिलाने में संविधान के किस अनुच्छेद का सहारा ‘‘लाट साहब’’ ले रहे थे। जितनी तत्परता उन्होंने इस्तीफा स्वीकार करने में दिखाई, उतनी ही तत्परता शशिकला के नेता चुने जाने के बाद उन्हे शपथ दिलाने में क्यों नहीं की? राज्यपाल को संविधान यह अधिकार नहीं देता हैं कि वह शशिकला पर चल रहे मुकदमा के उच्चतम् न्यायालय के निर्णय आने की संभावना को देखते हुये व शशिकला का कोई राजनैतिक जीवन न होने के आधार पर (जैसा की मीड़िया के कुछ भाग में दिखाया जा रहा था) उन्हे शपथ दिलाने में देरी करेे। तीन दिन तक राज्यपाल का तमिलनाडु वापस न लौटना क्या किसी साजिश का ही हिस्सा हैं? इसके पूर्व जब भी किसी राज्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न हुई हैं, राज्यपाल स्थिति का जायजा लेने, सामना करने व तदानुसार निर्णय लेने के लिये तुरंत राजधानी लौटते हैं। 
यहॉं तथ्य भी उल्लेखनीय हैं कि हमारे देश में यह पहली बार यह हुआ हैं कि मुख्यमंत्री के इस्तीफा को राज्यपाल द्वारा स्वीकार करने की कार्यवाही के पश्चात् मुख्यमंत्री का यह कथन की वे लोगो के कहने पर अपना इस्तीफा वापस ले सकते हैं जो न केवल असंवैधानिक हैं बल्कि अनैतिक भी हैं। इस्तीफा स्वीकार करने के बाद वापसी का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता हैं। यदि एक मुख्यमंत्री को इतनी सी भी समझ नहीं है तो उसे मुख्यमंत्री पद पर एक पल भी नहीं रहना चाहिए। य़द्यपि वे मुख्यमंत्री पद पर बहुमत के आधार पर पुनः दावा कर सकते हैं लेकिन इस्तीफा स्वीकृत होने के बाद इस्तीफा वापस लेने का अधिकार शून्य हैं।
वास्तव में राज्यपाल ने एक बहुमत प्राप्त व्यक्ति के मुख्यमंत्री बनने के अधिकार को अपनी अक्रमण्यता से मान्यता न देने का ही प्रयास किया हैं व दूसरे पक्ष को अपना दावा मजबूत करने केे लिये अप्रत्यक्ष रूप से अवांछित समय देने का प्रयास किया हैं। गर्वनर द्वारा एटॉर्नी जनरल से कानूनी राय  मांगना शायद इसी नीति का भाग मात्र रहा हैं। एटॉर्नी जनरल से राय तब मांगी जाती हैं जब किसी प्रकार का संवैधानिक संकट खड़ा हो गया हो। यहां तो राज्यपाल स्वयं संवैधानिक संकट पैदा करते हुये दिख रहे थे। 
अब उच्चतम् न्यायालय के निर्णय आने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि शशिकला मुख्यमंत्री नहीं बन पायेगी। लेकिन प्रश्न अभी भी यही हैं कि गर्वनर बहुमत प्राप्त चुने गये नये नेता को मुख्यमंत्री बनने के लिए रास्ते में कब तक अवरोध पैदा करेगे और अपनी आहुति उस यज्ञ में देते रहेगंे। लेकिन इसका पटाछेप करते हुये अंत में आज ही उन्होंने ई पलनीसामी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाकर लोकतंत्र को और गिरने से अतंतः रोक दिया हैं, जो कार्य उन्हे पहिले ही कर लेना चाहिये था। 
भारतीय लोकतंत्र की राजनीति का एक और गिरा हुआ उदाहरण यह भी है जो माननीय उच्चतम् न्यायालय के जयललिता के मामले में आये निर्णय की प्रतिक्रिया को देखकर अनुमान लगाया जा सकता हैं। माननीय उच्चतम् न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा शशिकला व चार अन्य को दी गई सजा को (जिसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था) को सही मानते हुये उच्च न्यायालय के दोष मुक्ति के आदेश को निरस्त कर दिया और अतः जयललिता, शशिकला व अन्य दोेेेेेेे को दी गई सजा को बहाल कर दिया। जयललिता स्वर्गवासी हो गई, लेकिन अन्य के विरूद्ध सजा प्रांरभ हो गई। लेकिन अम्मा के उत्तराधिकारी के रूप मे पन्नीरसेल्वम का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ होते देख उच्चतम् न्यायालय के निर्णय की प्रतिक्रिया में उनके व समर्थको द्वारा खुशी का जिस तरह से इज़हार किया गया कि वे यह भूल गये कि उच्चतम् न्यायालय ने उनकी ‘नेत्री’ को दोषी माना हैं, न कि दोष मुक्त। लेकिन राजनीति में आगे बढ़ने की मंशा के आगे अनायास अनजाने में ही उक्त घटना से राजनीति का स्तर और गिर गया। तो क्या पन्नीरसेल्वम अपनी ‘नेत्री’ को दी गई सजा के विरूद्ध पुर्नविचार याचिका उच्चतम् न्यायालय में दाखिल करेंगे?
कुछ लोग तमिलनाडु़ की उपरोक्त घटना के संबंध में जरूर यह कह सकते हैं कि ‘‘लोकतंत्र’’ से ‘‘व्यक्तिवाद’’(तानाशाही) व ‘‘व्यक्तिवाद’’ से वापिस ‘‘लोकतंत्र’’ (‘अम्मा’ से चिन्नमा व चिन्नमा से ई पलनीसामी) की सफल वापसी यात्रा केवल भारतीय लोकतंत्र में ही संभव हैं। शायद यही ‘‘लोचा’’ ही भारतीय लोकतंत्र की ‘‘विशिष्टता’’ हैं।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

क्या कांग्रेस को मनमोहन सिंह की ईमानदारी पसंद नहीं ?

विगत दिवस राज्यसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री की तुलना रेनकोट पहनकर नहाने की कला से की हैं। कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा में उक्त बयान की प्रतिक्रिया में न केवल बयानो की झड़ी लगा दी, बल्कि राज्यसभा का बहिष्कार करने की प्रतिक्रिया देकर अचभित भी किया हैं। आखिर नरेन्द्र मोदी द्वारा क्या कहा गया हैं, जिसकी इतनी तीव्र प्रतिक्रिया कांग्र्रेस पार्टी द्वारा की जा रही हैं। पिछले सत्र में मनमोहन सिंह ने कुछ कहा था, करीब 35 साल वे देश के आर्थिक परिदृश्यों के केन्द्र में रहे। डॉ. साहब पूर्व प्रधानमंत्री हैं और वे आदरणीय हैं। हिन्दूस्तान में पिछले 30-35 वर्षो के आर्थिक परिदृश्य में उनका दबदबा रहा हैं। मोदी ने कहा कि आजादी के बाद 70 साल में हिन्दूस्तान में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हैं जिसका आर्थिक परिदृश्य में इतना दबदबा रहा हैं। हम राजनीतिको को इनसे काफी कुछ सीखने की जरूरत हैं इनके समय इतना सब कुछ हुआ, घोटाले हुए, लेकिन उनपर कभी कोई दाग नहीं लगा। ‘‘बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला डॉं साहब ही जानते हैं और कोई नहीं जानता’’। यह कह कर मोदी जी ने मनमोहन सिंह की ईमानदारी की पीठ ही थपथपाई हैं। इस पर कंाग्रेस को क्यो ऐतराज हैं यह समझ से परे हैं। कांग्रेस की मोदी से उक्त टिप्पणी पर माफी की मांग तो हास्यपद हैं।
मोदी के इस बयान पर मनमोहन सिंह का यह कथन कि मैं कुछ नहीं कहना चाहता हूूं स्थिति को और स्पष्ट करता हैं। हॉं यदि कांग्रेस को मोदी के कंाग्रेस की भ्रष्टाचार की बात पर कोई ऐतराज हैं तो यह उदाहरण प्रथम बार नहीं हैं वह इन घोटालांे की बात अनेकोनेक बार कई राजनैतिक पार्टीयॉं, विशिष्ट नागरिकों संस्थाओं द्वारा समय-समय पर कांग्रेस पर घोटाले के आरोप लगाते रहे हैं। हां यदि मनमोहन सिंह की ईमानदारी को मोदी द्वारा दिये गये प्रमाण पत्र पर कांग्रेस को आपत्ति हेैें तो यह समझ में आता हैं क्योंकि उन्हांेने मनमोहन सिंह को ईमानदार कहकर कंाग्रेस के शीर्षस्थ नेतृत्व से लेकर बाकी नेताओं भ्रष्टाचार की लाइन में खड़ा कर दिया। इस बात पर उनकी खुजलाहट समझ में आती हैं। मोदी जी के भाषणो में नये नये शब्दो का प्रयोग पहले भी हुआ हैं। वास्तव में वर्तमान मोदी जी नई वाक शैली व वाकपटूता के लिये जाने व पसंद किये जाने लगे हैं। यद्यपि उनके तंज के नये रूप से विरोधी परेशान हैं क्योंकि उनके तंज का जवाब देने के लिए विरोधियों के पास शायद उतना बुद्धि कौशल नहीं हैं।   

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

आम बजट को प्रस्तुत करने के विरोध का कोई संवैधानिक, कानून या नैतिक बल नहीं!

                                                     
स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रारंभ से ही बजट पेश करने की परम्परा 28-29 फरवरी की रही हैं। पिछले वर्ष बजट पेश करने के बाद जी.एस.टी को यथा संभव 1 अप्रेल 2017 से लागू करने  के प्रयास (आज ही 1 जुलाई से लागू करने की आम सहमति बनी हैं) के तहत यह बात ध्यान में लाई गई कि बजट थोड़ा पहले पेश होना चाहिए ताकि उसके प्रस्ताव समय के पूर्व पारित होकर अविलंब नया आर्थिक साल शुरू होते ही 1 अप्रेल से प्रभावशाली ढंग से लागू हो सकंे। इस कारण जब इस वर्ष बजट प्रस्तुत करने की तारीख 1 फरवरी निश्चित की गई तब उसका किसी ने किंचित भी विरोध नहीं किया था। लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश व चार अन्य प्रदेशो की चुनाव तारीख घोषित की गई तब विभिन्न राजनैतिक दलो ने उक्त प्रस्तावित 1 फरवरी केे बजट प्रस्तुतीकरण का इस आधार पर विरोध किया हैं कि उससे पांच प्रदेशों में होने वाले चुनावो में केन्द्रीय सरकार द्वारा बजट के माध्यम से संभावित विभिन्न लाभदायी योजनाओं की घोषणा के द्वारा अपने (सत्ताधारी) दल के पक्ष में वोटरो को प्रभावित व आकर्षित करके चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का अनैतिक प्रयास किया जावेगा, जो न केवल अनुचित होगा बल्कि उससे सत्ताधारी पार्टी को एक पक्षीय फायदा भी पहंुचेगा। वास्तव में राजनैतिक पार्टियो का उपरोक्त विरोध पूर्णतः बेमानी हैं एवं केवल राजनैतिक हैं। जिस प्रकार चुनाव एक संवैधानिक व्यवस्था हैं उसी प्राकर बजट प्रस्तुतीकरण भी एक संवैधानिक व्यवस्था हैं। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार केन्द्रीय चुनाव आयोग देश एवं प्रदेशों में समय-समय पर चुनाव कराते रहता हैं। स्थानीय निकाय संस्थाओं के चुनाव एवं सहकारी संस्थाओं के चुनाव भी देश के विभिन्न भागो में निरंतर चलते रहते हैं। अतः यदि उपरोक्त तर्क मान लिया जाये तो कोई भी चुनी हुई सरकार उसमें निहित पूर्ण संवैधानिक अधिकारों के साथ उसके सम्पूर्ण कार्यकाल में अपेक्षित विकास कार्यो के सम्पादन हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकती हैं। 
एक समय था जब देश एवं प्रदेशों में पांच वर्ष की एक निश्चित अवधि के लिये लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव पूरे देश में एक साथ होते थे। लेकिन समय के साथ अब पानी काफी बह चुका हैं व स्थिति बदल चुकी हैं। अब यदि पूरे देश की राजनैतिक स्थिति का आकलन किया जाय तो देश में लोकसभा से लेकर विधानसभा व विभिन्न निकाय व सहकारी संस्थाओं के चुनाव की प्रक्रिया लगभग पूरे पंाच वर्ष तक कही न कही सतत् चलती रहती हैं। फिर चाहे वह केन्द्रीय चुनाव आयोग, या राज्य चुनाव आयोग, अथवा स्थानीय चुनाव निकायों के मातहम ही क्यों न हो। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चुनाव के एक दम पहले वोटर को प्रभावित/आकर्षित करने की दृष्टि से विभिन्न लाभकारी योजनाओं की घोषणा से वोटर प्रभावित हो सकता हैं, और इस तरह चुनाव परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं। यह तर्क कानूनी व संवैधानिक दृष्टि से निश्चित रूप से सही नहीं हैं। शायद इसी सोच के अंतर्गत चुनाव आयोग भी 45 दिन पूर्व ही आचार संहिता लागू कर देता हैं जिसके तहत वह सरकारों को नई घोषणा व आफिसरों के स्थानांतरण करने से रोक देता हैं। हमारे देश में सर्व प्रथम आचार संहिता संभवतः 1962 के केरल विधानसभा के चुनाव में लागू हुई थी।  
एक चुनी हुई सरकार जो पांच वर्ष के लिये चुनी जाती हैं, का उक्त तर्क के आधार पर विरोध करने वाले राजनैतिक दल इस तथ्य से मॅंुह मोड़ लेते हैं कि जब तक सरकार को 45 दिनों पूर्व ही अपने पूर्ण अधिकारो का उपयोेग करने से रोक लगा कर (मतदाताओं को घोषणाओं से प्रभावित करे बिना) चुनाव में धन-बल, जाति व धर्म के उपयोग को सम्पूर्ण रूप से रोका नहीं जाता हैं, तब तक पूर्णतः निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। वास्तव में यह धारणा ही संविधान की मूल भावना के विरूद्ध हैंे। ’’कोई भी सरकार अपने घोषणा पत्र एवं नीतियो के क्रियान्वयन के आधार पर ही जनता के बीच जाकर वोट व पुनः जनादेश मांगती हैं’’ जो उसका संवैधानिक अधिकार हैं। आने वालेे कार्यकाल की पंचवर्षीय योजना के साथ ही वह जनता के बीच जाती हैं। मतदाताओं को यह राजनैतिक दलों द्वारा यह आश्वासन नहीं दिया जाता कि घोषणा पत्र की पूर्ति 4 वर्ष 320 दिवस में ही पूर्ण हो जायेगी और न ही जनता उसेे केवल 4 वर्ष 320 दिन के शासन करने के लिये वोट देती हैं। यहॉं यह भी विचारणीय हैं कि कोई सरकार यदि 4 वर्ष में अपने घोषणा पत्र को लागू नहीं कर पाई हैं तो क्या वह चुनाव के तुरंत पहले 45 दिनों में विभिन्न योजनाओं की घोषणा मतदाताओं के बीच विश्वास बनाने में सफल होगाी। क्या यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न को जन्म नहीं देती हैं? क्या हमे हमारे मतदाताओं के विवेक व नैतिकता पर भरेासा नहीं हैं? क्या हमारे मतदाता लालच में आ जाते हैं? और यदि यह मान भी लिया जाये तो 45 दिन के पहले लालच देने की घोषणा के इस भाग को चुनाव आयोग की आचार संहिता के तहत अप्रभावी किया जा सकता हैं? 
जनता को निश्चित ही इस बात के लिये शिक्षित करने की आवश्यकता हैं कि वोट आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार हैं। इसके द्वारा आप यह तय करते हैं कि आप किस तरह से शासित होना चाहेंगे व आप पर किस तरह का शासन हो जो आपके जीवन को श्रेष्ठ एवं प्रभावकारी बना सके।.इसीलिए बजट का चुनाव के समय प्रस्तुतीकरण का विरोध बेमानी एवं अप्रंासगिक हैं। आवश्यकता तो सिर्फ मतदाता को एक सही व्यक्ति/दल के पक्ष में बेइमानी परिस्थियों से प्रभावित हुये बिना मतदान करने के लिये जागरूक करने की हैं। 
शायद इसी विवाद को खत्म करने के लिये प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की वकालत की हैं। उच्चतम् न्यायालय ने भी अभी तक उक्त मुद्दे पर कोर्इ्र स्थगन (स्टे) जारी न करके यह इंगित किया हैं कि ‘बजट’ का चुनाव से कोई सीधा संबंध नहीं हैं। यहॉं अमेरिका के प्रेसीडेंट के चुनाव का उल्लेख करना प्रासांगिक होगा कि वहॉ पर प्रेसीडेंट के चुनाव परिणाम घोषित हो जाने के बावजूद लगभग 3 माह (20 जनवरी तक) पूर्ण अधिकार के साथ प्रेसीडेंट पद पर कार्य करते रहेगे। भले ही वे या उनकी पार्टी की चुनाव में हार भी हो गई हो जैसा कि वर्तमान में प्रेसीडंे़ट बराक ओबामा की स्थिति अमेरिका में चार वर्ष की पूर्व निश्चित अवधि के लिये चुनाव होता हैं शतथ की तारीख भी निश्चित 20 जनवरी रहती हैं। लेकिन भारत में चुनी हुई सरकार के कार्य काल की अवधि कार्यकाल के पूर्व ही आचाार संहिता के माध्यम से चुनाव अवधि (कार्यकाल) के पूर्ण (समाप्ति) के 45 दिन पूर्व ही निर्णय पर प्रतिबंध लगाया जाकर चुनाव कराया जाता हैं। इस प्रकार वास्तविकता में चुनी हुई सरकार का 45 दिन का कार्यकाल प्रभावी रूप से कम हो जाता हैं। यहॉं यह तथ्य रेखांकित करना आवश्यक हैं।  
  
 धन्यवाद्।   
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