शनिवार, 21 जून 2014

क्या केम्पाकोला कम्पाउंड के रहवासियो के मानवाधिकार नही है ?


         क्या केम्पाकोला कम्पाउंड के रहवासियो के मानवाधिकार नही है ?
                                                                         
            आज "उच्चतम न्यायालय" के आदेश के पालनार्थ  मुम्बई महानगर पालिका द्वारा केम्पाकोला कम्पाउंड में  "एकता अपार्टमेन्ट सहकारी हाउसिंग सोयाईटी लिमिटेड" द्वारा नियम विरूद्ध निर्मित 102 अवैध फ्लेटों कोे तोडे जाने की कार्यवाही प्रारंभ किये जाने के रूप में प्रारंभिक कदम बिजली पानी व गैस कनेक्शन काटे जाने की कार्यवाही प्रारंभ की जा रही है। पिछले कुछ समय से यह मुद्दा मीडिया की सुर्खिया भी बना। लेकिन मात्र "सुर्खिया" ही रह गई।  मीडिया ट्रायल में परिणीत नही हो पाया।उक्त कम्पाउंड के रहवासियों द्वारा पिछले कई सालो से लडी जा रही न्यायिक लड़ाई अन्ततः वे देश के सर्वोच्च न्यायालय मंे हार गए। यह हार मात्र उनकी सम्पत्ति की हार नही थी बल्कि उन लोगो के दिलो पर एक ऐसा झटका था कि उन्होने अपने मन ही मन व दिल में यह महसूस किया  कि वे वह शायद जिन्दगी की यह आखरी लडाई भी हार गए है। प्रश्न यह है इस स्थिति के लिए वे कितने दोषी है ? क्या यह आत्महत्या का मामला नही है ? या हत्या के प्रयास का मामला है ? या आकस्मिक दुर्घटना मे हुई मृत्यु का मामला है ? या हत्या को प्रेरित करने का प्रयास है ? या "गैर इरादतन मानव हत्या" की बात है ? ये सारे प्रश्न सोसाईटी द्वारा निर्मित अवैध फ्लैट एवं बी एम सी की कार्यवाही व तत्समय पर हुई अकर्मणयता व अनदेखी से उत्पन्न होते है। यदि जानबूझकर 102  अवैघ निर्मित फ्लैटो की खरीदी की गई है तो वे सब निश्चित रूप से  आत्महत्या के दोषी है। लेकिन यदि उन्होने बिना बदनियति के  एवं निष्कपट  बिना किसी अवैध निर्माण की जानकारी के क्रय किया गया है तो निश्चित रूप से उपरोक्त  शेष चारों परिस्थितियां मे से एक अवश्य निर्मित होती  है। जिसके लिए संबंधित व्यक्तियो एव संस्थानो  के विरूद्ध सिविल व अपराधिक प्रकरण दर्ज क्यो नही किया गया है, प्रश्न यह है।
            इस देश में बुद्धिजीवीयो  की बडी भारी संख्या है जो अपने आपको प्रगतिशील मानते है। वे मानवाधिकार के संरक्षण के बडे समर्थक माने जाते है। फिर चाहे देश में आतंकवादी घटनाए हुई हो, या देश के दो दो प्रधानमंत्री की पद पर रहते हुए हत्या हुई हो। मामला चाहे संसद पर हमले का हो या मुंबई बम कांड का या नक्सलवादियो का मामला हो। देश की सुरक्षा व  सम्मान को तहस नहस करने वाले लोग आरोपित  सिद्ध पाये गये इसके बावजूद  कही न कही प्रगतिशीलता के नाम पर तथाकथित मानवाधिकार के उल्लंघन के विरूद्ध  आवाज समय समय पर  उठाई गई है जिसे मीडिया हाउस ने प्रमुखता देकर उस आवाज को मजबूती प्रदान की है। यह देश का बडा दुर्भाग्य है कि उन 102 फ्लेटों मे रहने वाले मानव के अधिकार के संरक्षण के लिए कोई नेता ,संस्था, राजनैतिक पार्टिया वास्तविक रूप में सामने नही आई। क्या ये रहवासी मानव नही है ? क्या उनका कोई अधिकार नही है ? इनका दोष क्या है? इनमे से अधिकांश लोग ऐसे है जिन्हे  फ्लेट के अवैध निर्माण की  कोई जानकारी ही नही थी। उन्होने  अपने जीवनकाल की समस्त अर्जित पूंजी को लगाकर उक्त फ्लैट, सुख शांती व अच्छे दिन के लिए खरीदे थे । क्या उनका यह कदम वे लोग जो  गोलबंद होकर जानबूझकर देश की स्वाभिमान को हथियारो की गोली चलाकर तार तार करते है, उनसे भी खराब है ? इसके बावजूद मानवाधिकार के नाम पर राजनीति के चलते उन्हे संरक्षण प्राप्त हो जाता है। यदि वास्तव में वे मानव होकर उनके मानवाधिकार  नही है, तो उन्हे सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? क्या यह उच्चतम न्यायालय का कर्त्तव्य नही था कि अवैध रूप से निर्मित फ्लैटो को कानूनी रूप से गिराये जाने के निर्णय को सही ठहराने के बावजूद,  इन सोसाईटी के रहवासियो के मानव अधिकारो को सुरक्षा प्रदान करती ? क्या सोसाईटी का निर्माण करने वाले मालिक का कोई दोष नही है। बी एम सी के वे अधिकारी जिनके कार्यकाल के दौरान में उक्त फ्लैटो का अवैध निर्माण हुआ, क्या वे दोषी नही है? माननीय उच्चतम न्यायालय ने इन समस्त दोषी लोगो के विरूद्ध कोई कार्यवाही क्यो नही की ? क्यो नही इनके विरूद्ध सिविल और फौजदारी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गये ? वे निष्कपट खरीददार जिन्हे अवैध निर्माण की जानकारी नही थी, उन्हे उनके पैसे  ब्याज सहित से लौटाने के आदेश उच्चतम न्यायालय ने क्यो नही दिये ? अधिकारियो के विरूद्ध और सोसाईटी के विरूद्ध अवैधानिक कार्य करने व उन्हे सहयोग करने के लिये आर्थिक दंड क्येा नही  आरोपित किया गया।पूर्व मे सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को एक प्रकरण में उनके  द्वारा जारी  गलत आदेश के कारण जुर्माना जमा करने के आदेश दिए थे। अन्य कई प्रकरणो मे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकार  क्षेत्र के बाहर जाकर भी (ऐसा तत्समय महसूस किया गया) पीडित पक्ष को राहत प्रदान की गई। कम से कम इस प्रकरण में मानवाधिकार के नाम पर ही सही, उच्चतम न्यायालय ने इन रहवासियो को सुरक्षा प्रदान करना चाहिए था ताकि ये लोग अपना शेष जीवन शांति पूर्वक व्यतीत कर सकते।
          जहां तक राजनीतिज्ञो का प्रश्न है, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मात्र शब्दो का कथन किया। कोई कार्यवाही अभी तक नही की।  हम जानते है चुनावो के समय कई सरकारो ने कई अवैध कालोनीयो को वैध करने के आदेश  पूर्व मे भी जारी किये  थे। चाहे वह दिल्ली सरकार का मामला हो या अर्जुनसिंह के मामले में म.प्र. का मामला हो। जब कई अवैध कालोनिया एक साथ वैध की जा सकती है तो तब कुछ फ्लैट क्यो नही वैद्य किये जा सकते है, प्रश्न यह है ? यहां यह उल्लेखनीय है कि उक्त सोसाईटी  द्वारा निर्मित पूरा  निर्माण अवैध नही था, बल्कि बिल्डिंग  की उपर की कुछ स्टोरी की निर्माण की अनुमति नही थी। इसे नियमित करने मे कोई बहुत बडे नियमेां का उल्लंघन नही होता। इसे नियमित करने मे  कुछ शर्त व आर्थिक दंड लगाया जा सकता था । महाराष्ट्र सरकार चाहे तो एक अध्यादेश भी इसे नियमित करने के लिये ला सकती है।लेकिन बात जब एक सामान्य आम मानव अधिकार की है। चंूकि उससे राजनीति नही होती है। अतः वह संबंधितो का ध्यान आकर्षित नही करती है।लेकिन जहां राजनीति की गुंजाईश रहती है, वहां ही मानवाधिकार की बात होती हैैैैै। ये ही इस देश की दुर्भाग्य की बात है। 

 





क्या राजनैतिक आंदोलन के सिद्धांत बदल गये है?

                           क्या राजनैतिक आंदोलन के सिद्धांत बदल गये है?
                                                                                                              
        दिल्ली में बिजली  पानी व अन्य मुददे को लेकर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अरविंद लवली के नेतृत्व मंे कांग्रेस ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन करना कोई नही बात नही है न ही गैर कानूनी है। लेकिन अभी केन्द्रीय सरकार को आये एक महीना भी नही हुआ है और उसके खिलाफ मंहगाई जैसे मुददा जो स्वतंत्रता के बाद से चला आ रहा न खत्म होने वाला मुददा है व केन्द्रीय सरकार (क्योकि राज्य में राष्ट्रपति शासन होने के बाद केन्द्रीय सरकार ही जिम्मेदार मानी जायेगी ) के विरूद्ध आंदोलन करना क्या राजनैतिक रूप से नैतिक माना जायेगा प्रश्न यह है? उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि उक्त आंदोलन न केवल भाजपा के विरूद्ध था बल्कि आप पार्टी के भी विरूद्ध था और आप पार्टी के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी की गई। "आप" पार्टी न तो केन्द्र में सत्ता में है न ही दिल्ली राज्य में। इसलिए उसके विरूद्ध आंदोलन क्या कोई आंदोलन की कोई नयी नीति सिद्धांत केा व्यक्त करता है प्रश्न यह है? बिजली पानी व अन्य किसी मुददे पर अब आप पार्टी के खिलाफ आंदोलन करने का क्या औचित्य है जबकि जनता ने उसे नकार दिया। इससे तो यही लगता है अब भी "आप" पार्टी का डर  दिल्ली के राजनीति में अन्य दूसरी राजनैतिक पार्टी को है।
        जहां तक भाजपा के विरूद्ध आंदोलन का प्रश्न है ? दस साल तक केन्द्र में और पन्द्रह साल तक दिंल्ली मे कांग्र्रेस पार्टी की सरकार रहने के बावजूद अभी भाजपा की सरकार बने तीस दिन भी नही हुए है, कांग्रेस पार्टी को कोई भी राजनैतिक आंदोलन भाजपा के विरूद्ध करने का नैतिक अधिकार नही है क्योकि कोई त्वरित घटना नही घटी है जिसका संबंध पूर्व से न हो। बिजली की समस्या यदि कोई है तेा वह पूर्व से चली आ रही है जिसके लिए दिल्ली शासन की विद्युत व औद्योगिक नीति है। नई सरकार से तीस दिन में जबकि दिल्ली में राष्ट्रपति शासन है कोई त्वरित निर्णय व उस निर्णय से उत्पन्न त्वरित लाभ की उम्मीद नही की जा सकती है। इसलिए कांग्रेस पार्टी को धैर्य व संयम बरतना चाहिए। उन्हे इस बात का तो अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि आप  पार्टी को न तो दिल्ली विधानसभा मे जनादेश सरकार बनाने के लिए दिया गया था और न ही  आप को बिना शर्त समर्थन के बनी "आप" सरकार को  आप ने चलने दिया। इसलिए आप के खिलाफ आंदालन करना नितांत गैर जिम्मेदाराना है।
        आशा है कांग्रेस स्वच्छ विरोध का अपना रोल जो उसे दिया गया है व अदा करेगी ताकि सरकार पर प्रभावी अंकुश बना रहे।
       
                        

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