गुरुवार, 9 जुलाई 2015

‘‘व्यापमं’’कांड कितना व्यापक!

(सी.बी.आई की जॉच का निर्णय प्रदेश शासन के अधिकार क्षेत्र में?) 
                  
                पिछले दिनो ''आज तक'' न्यूज चेनल के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की मौत व जबलपुर के मेडीकल कॅालेज के डीन डॉ अरूण शर्मा की मौत के बाद व्यापमं प्रकरण अखिल भारतीय मुद्दा बनते जा रहा है। वर्ष 2007 में प्रथम बार व्यापमं के घोटाले की जानकारी सामने आयी। यद्यपि यह कहा गया है कि वर्ष 2004 के बाद से ही यह घोटाला चला आ रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति से अभी तक देश के इतिहास के पन्नो में हजारो घोटाले कांड दर्ज हुए जिनमें लाखो करोडो रूपये का लेन देन हो चुका जिसमें कुछ कांडो में जनहानि भी हुई है। लेकिन व्यापमं घोटाला इस मामले में अपनी तरह का ऐसा अलग मामला है जो न केवल मध्य प्रदेश व भारत में बल्कि विदेश में भी अभी तक ऐसा भीषण कांड नहीं हुआ है। इसमें हजारो करोडां़े रूपये से लेकर 47 से अधिक संदेहास्पाद मृत्यु हो चुकी हैं। मध्य प्रदेश का व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) प्रदेश के अंदर विभिन्न प्रवेश परीक्षा के आयोजन के साथ साथ विभिन्न पदो पर नौकरियों की भर्ती के लिए भी परीक्षा आयोजित करते चला आ रहा है। जिस तरह से व्यापमं कांड की परतंे दिन प्रतिदिन ख्ुालते जा रही है और अभी तक भी जितनी जॉच हुई हैं (जबकि अभी तक मात्र 20 प्रतिशत से कम जॉच हो पाई है ) उनसे व्यापमं की सभी परीक्षाओ पर प्रश्न चिन्ह लगे हैं। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि व्यापमं के इतने व्यापक कांड में अभी तक दो हजार से अधिक आरोपियो के विरूद्ध चालान प्रस्तुत किए जा चुके है तथा अन्य 500 से अधिक के विरूद्ध जॉच विचाराधीन हैं। बहुत से आरोपी फरार हैं। यदि जंॉच का दायरा बढाया गया तो इस दृष्टि से यह देश का सबसे अनोखा और अकेला कांड है जो पैसो की दृष्टि से नहीं बल्कि आरापियो की संख्या की दृष्टि से भी सबसे बडा कांड कहा जा सकता है। 
दूसरे इस कांड में देश के इतिहास में पहली बार राज्य के पदासीन गवर्नर पर एफ आई आर तक दर्ज हो चुकी है। इस कारण भी यह अनोखा कांड बन गया है जिसमें प्रथम सूचना पत्र दर्ज होने के बावजूद भी महामहिम राज्यपाल को इस्तीफा नहीं देना पड़ा और न ही उन्होनें जरूरत समझी। यू पी ए सरकार द्वारा नियुक्त पूर्व  गवर्नर से न तो भाजपा नेताओं ने इस्तीफा लेने की जरूरत समझी, न ही मांग की, और न ही केन्द्र की भाजपा सरकार ने उन्हे पद से हटाया। वह भी इस तथ्य के बावजूद कि राजनैतिक रूप से अन्य कांग्रेसी गर्वनरों को पद से हटने के लिये या तो उन्हे मजबूर किया या उन्हे स्थानांतरित कर हटाया गया। तीसरे इस कांड का महत्वपूर्ण व दर्दनाक पहलू यह है कि वे दो हजार परीक्षार्थी जो व्यापमं की परीक्षा में बैठे थे वे अबोध (इनोसेन्स) अपराधी है जिन्हें आदतन अपराधी के समान जेल में बंद किया गया तथा अधिकांश मामले में उच्च न्यायालय द्वारा जमानत नहीं दी जा रही है। इसके विपरीत व्यापमं को आधार बनाकर बदले में आर्थिक लाभ पाने के उद्ेदश्य से जो लोग काम कर रहे हैं, वे व्यापमं के संक्षम अधिकारी हैं तथा उनको संरक्षण और बढावा देने वाले उनसे फायदा लेने वाले अन्य कई सरकारी आई ए एस अफसर ,उनके बडे अधिकरी एवं प्रदेश के मंत्री, व नेताओं के नाम आने के बावजूद ,उन सब पर वैसी आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा रही है। (मात्र कुछ को छोड़कर) अपना जीवन प्रारंभ करने वाले विद्यार्थीगण जो अपने भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए शार्ट कट रास्ता अपनाने की मनसा के कारण उक्त कांड के भागीदार आरोपी बन गये है। इस कांड में सबसे बडा खेल जॉच एजेंसिया कर रही है जो दलालो के फोन रिकार्ड कर उन सब विद्याथियों से भी धन वसूली कर रही है जो न तो परीक्षा में बैठे है और न जिन्होने कोई लाभ ही प्राप्त किया।
              अब तक की घटना से यह बात सिद्ध होती है कि उक्त कांड में जो प्रभावशाली व्यक्तिगण हैं ,चाहे वे अफसर या राजनेता हो या न्याय क्षेत्र से जुडे व्यक्ति हो जिन पर भी उगलियॉं उठी है उनकी जॉच म.प्र.शासन द्वारा गठित एस टी एफ या एस आई टी से किया जाना मुनासिब व सफलता पूर्वक संभव नहीं है। यद्यपि उक्त जॉच की निगरानी उच्च न्यायालय द्वारा की जा रही है। वास्तव में यह इतना बडा कांड है जिसकी जॉच सी बी आई से भी हो पायेगी यह भी संदेहास्पद है। मुख्यमंत्री का यह कथन कि यदि माननीय उच्च न्यायालय म.प्र.शासन के विरूद्ध कोई भी जॉच सी बी आई से कराना चाहते है तो वे तैयार है। इसके लिये वे यदि उच्च न्यायालय से कहेंगे तो वह भी उच्च न्यायालय की अवमानना के समान होगा। उनका यह कथन बिलकुल गलत है। इसके लिए उच्च न्यायालय के आदेश की आवश्यकता या अनुमति बिलकुल जरूरी नहीं है। जॉच का अधिकार प्रदेश शासन को है तदनुसार मुख्यमंत्री स्वयं यह जॉच करा सकते है। इसके पूर्व कितनी सी बी आई जॉच के लिए उच्च न्यायालय से अनुमति ली गई? अभी तक हाई कोर्ट ने सी बी आई जॉच के मध्यप्रदेश शासन के अधिकार पर किसी प्रकार की रोक अपने पूर्व आदेशो में जिसमें अन्य आवेदको के सी बी आई की जॉच की मांग को निरस्त करते समय नहीं लगाई है। वास्तव में इसकी तभी सही जॉच हो पायेगी जब उच्चतम् न्यायालय के न्यायधीश के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग का गठन किया जाकर जॉच करेगी तभी इस व्यापमं गेट कांड की गठाने खुल पायेगी। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इस केस में मीडिया द्वारा अभी तक अपेक्षित तवज्जों नहीं दी गई। जब उनके एक साथी की असामयिक मृत्यु हुई तभी मीडिया कार्यशील हुआ। अक्षय सिंह की मृत्यु के पूर्व 44 मौते होने के बावजूद भी मीडिया ने अपेक्षित संज्ञान नहीं लिया। क्या मीडिया अपनी इस गैर जिम्मेदारी सेे इंकार कर सकता है?

                        (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)  


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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

‘‘आचार संहिता‘‘ का विदेश मंत्री द्वारा कितना उल्लघन! कितना सच?


     पिछले लगभग बीस दिनो से आई पी एल के पूर्व कमिश्नर ,खेल प्रशासक ,उधोगपति ललित मोदी के संबध में ललित गेट स्केडल (कांड) की भागवत कथा लगातार न्यूज चेनल्स व समाचार पत्रों में आ रही है। खासकर ‘‘टाईम्स नाऊ’’ न्यूज चेनल्स ने ललित गेट काड़ में कुछ अनछुये पहलुओं को सामने लाने का प्रयास किया है। लेकिन कई बार अति उत्साह में जो गलती व्यक्ति से हो जाती है ,अर्नब गोस्वामी ‘‘मुख्य संपादक टाईम्स नाऊ’’ भी वही गलती कर रहे है। जिस प्रकार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अति उत्साह में ललित मोदी (भगोड़ा) की सहायता को मानवीय संवेदनाओं का रूप देने का प्रयास किया, वही गलती अर्नब गोस्वामी ने ललित गेट कांड में सुषमा स्वराज पर आचार संहिता (कोड़ ऑफ कंडक्ट) के उल्ल्घन का आरोप लगा कर किया। 
    कल दोपहर से ललित मोदी के पिता के के मोदी जो कि इंडोफिल कंपनी के सी एम डी है से ‘‘टाईम्स नाऊ‘‘ के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी की टेलीफोन पर हुई बातचीत में जैसे ही के के मोदी ने यह कहा कि सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल को वकील की हैसियत से कंपनी द्वारा भुगतान किया गया है, वे कंपनी के रिटेनर की हैसियत से वकील हो सकते है। वैसे ही अर्नब गोस्वामी द्वारा ‘‘टाईम्स नाऊ’’ में ब्रेकिग न्यूज के रूप में यह न्यूज चलाई जाने लगी कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पति स्वराज कौशल को मोदी की कंपनी के द्वारा फीस का भुगतान होने के कारण कंपनी के पे रोल पर होने से इस तथ्य की जानकारी क्या सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को दी गई थी। यदि हांॅ तो प्रधानमंत्री इसका जवाब दंे। यदि नहीं तो सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को यह जानकारी न देना क्या उनके द्वारा कोड ऑफ कंडक्ट के नियम का घोर उल्लघंन नहीं है? यह प्रश्न  अर्नब गोस्वामी की कार्यशैली पर ही प्रश्न उत्पन्न करता है। विवेचना के इसी बिंदु पर आगे चर्चा की जा रही है। 
     ललित गेट के सुषमा स्वराज से लेकर वसंुधरा राजे तक के विभिन्न पहलुओं व मुद्देा की विवेचना पर न जाकर ,अभी मै मात्र अर्नब गोस्वामी के उक्त स्टेण्ड पर सबका ध्यान आकर्षित  करना चाहता हूॅ। वास्तव में स्वराज कौशल को मिली फीस की राशी की जानकारी उनके पति विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा प्रधानमंत्री को न देना आचार संहिता (कोड ऑफ कंडक्ट) का बिलकुल उल्लंघन नहीं है। ‘संघ’ ‘राज्य’ व केन्द्र प्रशासित राज्यो के मंत्रियों के लिए कोड़ ऑफ कंडक्ट का कोई कानून या लिखित नियम नहीं है। बल्कि यह केन्द्रीय सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी एक परिपत्र है जो भारतीय संविधान व जन प्रतिनिधत्व अधिनियम 1951 के अलावा मंत्रियों 
के आचरण के संबंध मे जारी किया गया मात्र दिशा निर्देश भर है जो नैतिक बल तो रखता है परन्तु कानून नहीं। उक्त परिपत्र के अनुछेद 3(2) केा यदि सावधानी पूर्वक पढ़ा जाय तो उसके अनुसार केन्द्रीय मंत्री ,राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री  एवं अन्य मंत्री या उन पर ‘‘निर्भर व्यक्ति’’(डिपेन्डेंट) भारत में या विदेश में कोई विदेशी सरकार के संगठन में रोजगार को प्रधानमंत्री की पूर्व अनुमति के बिना स्वीकार नहीं कर सकते है। ़(जहॉ) वे पत्नी या मंत्री पर निर्भर व्यक्ति पूर्व से ही रोजगार में है वहॉ पर उक्त रोजगार से संबधित मामले को प्रधानमंत्री केा (रोजगार चालू रखा जाय या नहीं के लिये) रिपोर्ट किया जाना चाहिए। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि स्वराज कौशल को यदि ललित मोदी की कंपनी में रोजगार पर मान भी लिया जाये तो भी चूॅकि वे मंत्री की पत्नी नहीं है बल्कि वे मंत्री के पति हैै तथा मंत्री पर निर्भर व्यक्ति नहीं है व इडोफिल कंपनी विदेशी कंपनी नहीं है इसलिए उन पर यह आचार संहिता का नियम लागू नहीं होता है। इस प्रकार उक्त तथ्य के उजागर होने के बावजूद भी प्रस्तुत मामले में किसी भी तरह का कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लघंन नहीं होता है।  इस विषय में अर्नब गोस्वामी द्वारा उक्त कोड ऑफ कंडक्ट को पढे बिना जो ब्रेकिग न्यूज चलाई गई वह सत्य से परे होने के कारण विदेश मंत्री की इमेज को अनावश्यक रूप से बदनाम करने वाली है। इससे क्या यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता है कि इसी तरह से गलत विवेचना कही ललित गेट के अन्य मुद्दो पर भी तो नहीं की गई है?   
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