मंगलवार, 30 जनवरी 2018

उच्चतम न्यायालय के निर्णय की भावना का उल्लघंन क्या ‘‘अवमानना’’ की सीमा में नहीं आता हैं?

इस समय पूरे देश में पद्मावती-पद्मावत, राजपूत समाज व करणी सेना की ही चर्चा हैं। फिर चाहे वह पिं्रट मीडिया हो, इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या सोशल मीडिया हो। फिल्म ‘‘पद्मावती’’ को कई संशोधन व कट के पश्चात ‘पद्मावत’ के नाम से संेसर बोर्ड द्वारा फिल्म प्रदर्शन हेतु यू.ए. प्रमाण पत्र मिल जाने के बावजूद उक्त फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने के लिए मामला उच्चतम न्यायालय तक गया।मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा एवं राजस्थान की सरकारो ने अधिसूचना जारी कर इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाया। उच्चतम न्यायालय ने मध्यप्रदेश एवं राजस्थान  सरकारे द्वारा दायर पुर्नविचार याचिका सहित अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के बाद नागरिको की ‘‘रचनात्मक अभिव्यक्ति’’ की आजादी के मूलभूत अधिकार के सरक्षण के आधार पर अंतिम रूप से बंधनकारी आदेश पारित कर इन सरकारो द्वारा फिल्म प्रदर्शन पर लगे इस प्रतिबंध की ‘‘अधिसूचनाओं’’ को निरस्त कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उक्त फिल्म का प्रदर्शन पूरे देश में बिना रूकावट के किया जाय एवं इस हेतु आवश्यक समस्त सुरक्षा प्रदान करना राज्य सरकार का संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य हैं। वास्तविक धरातल पर नहीं केवल तकनीकि रूप से ‘‘पेपर’’ पर प्रत्येक नागरिक चाहे वह फिल्म का विरोध करने वाला ही क्यो न हो व राजपूत समाज तथा करणी सेना से जुड़े लोग उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय को (अंतिम व बंधनकारी होने के कारण) मजबूरी में ही सही, पालन करने के लिए सत्य कथन ठीक उसी प्रकार कर रहे हैं, जिस प्रकार कोई व्यक्ति, विधायक अथवा मंत्री विभिन्न संवैधानिक पदो पर चुने जाने/नियुक्ति के समय शपथ लेते समय करते हैं। साथ-साथ वह यह भी कह रहे हैं कि फिल्म का विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार हैं, जो वास्तव में सही भी हैं। 
फिल्म प्रदर्शन पर ‘‘राज्य सरकारो के रोक लगाने के आदेश’’ को उच्चतम न्यायालय द्वारा हटा देने तथा फिल्म सेंसर बोर्ड़ द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर दिये जाने के बावजूद फिल्म की स्टोरी, फिल्माकंन, दृश्य-घटना इत्यादि विषय को लेकर आलोचकों का यह मानना कि आलोचना का सर्वाधिकार सुरक्षित हैं, ठीक वैसे ही हैं, जैसा कि न्यायालयो के आदेशो की विवेचना सभं्रात नागरिकगण एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति मीडिया से लेकर विभिन्न फोरम पर क्रिया-प्रतिक्रिया देते समय समझते हैं। मध्यप्रदेश एवं राजस्थान की राज्य सरकार तो और एक कदम आगे निकल गई। उन्होने उच्चतम न्यायालय में पुर्नविचार याचिका भी दायर की। जबकि उनके गृहमंत्री ने कहा कि हम उच्चतम न्यायालय के आदेश का पूर्णतः पालन करेगंे व मांगने पर पीड़ितो को सुरक्षा भी प्रदान की जावेगी। लेकिन साथ-साथ ही वे लोगो से यह अपील भी करते हैं कि वे फिल्म देखने ही न जायंे। 
निश्चित रूप से कानून व्यवस्था बनाये रखना राज्य सरकारो का संवैधानिक दायित्व हैं, जैसा कि माननीय न्यायालयो ने बार-बार रेखांकित किया हैं। फिर भी, उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद करणी सेना व राजपूत समाज ने इस फिल्म को लेकर कानून व्यवस्था बनाये रखने के ‘‘हितार्थ’’ जनता कर्फ्यू लगाकर जनता से फिल्म न देखने की अपील की हैं। इस तरह कानून  व्यवस्था बनाये रखने में अपने सहयोग देने के कानूनी दायित्व का भले ही वे शब्दशः पालन कर रहे हो। परन्तु कानून का पालन करने का यर्थाथ मतलब न केवल उसमें लिखे गये प्रत्येक शब्द का अक्षरसः पालन करना हैं, बल्कि उसमें अन्तर्निहित ‘‘भावना’’ का भी उतनी ही दृढ़ता एवं सिद्धत से पालन करना होता हैं। तभी कानून का राज सही अर्थो में लागू हैं, ऐसा माना जा सकता हैं। उच्चतम न्यायालय ने समस्त पक्षो को सुनने के बाद यह आदेश पारित किया कि पूरे देश में बे रोक टोक फिल्म पद्मावत प्रदर्शित की जावे। इसका मतलब साफ यह हैं कि राज्य सरकारो को सिनेमाग्रहो व फिल्म वितरको को आवश्यक सुरक्षा प्रदान करना और साथ ही प्रतिबंधात्मक कदम सहित कानून व शांति की हर हालत में व्यवस्था बनाये रखने के लिये जरूरी सभी उपाय करना आवश्यक है।ं लेकिन राज्य सरकारो ने न तो ऐसा कोई सार्थक कदम ही उठाया और न ही कोई ऐसी कार्यवाही ही की जिससे तात्कालिक पैदा होने वाले डर व तनाव के वातावरण से उन्मुक्त हुआ जा सके। 
फिल्म प्रदर्शन के विरोध में प्रदर्शन के दौरान शांति व्यवस्था को भंग करना, तोड़फोड़ कर  हिंसा करना, अनर्गल, भड़कीले, उत्तेजित शब्दो का उद्घोष इत्यादि किया जाता रहा हैं। गुरूग्राम में स्कूल बस पर पथराव एक उदाहरण मात्र हैं। इस पर करणी सेना, राजपूत समाज का यह कथन कि उनकी आड़ में असामाजिक तत्वों के द्वारा हिंसा व शांति भंग की जा रही हैं। करणी सेना वास्तव में कानून में निहित उक्त मूल भावना को ही चूना लगा कर आंशिक रूप से अपने उद्श्यो में सफल सिद्ध होते दिख रही हैं। वह भी आंशिक नैतिकता के साथ, क्योकि संविधान द्वारा प्रदत्त उनके उस मौलिक अधिकार (जो उनकी भावना व आस्था की रक्षा करता हैं) पर चोट पहुंच रही हैं, जिसकी सुरक्षा की आड़/ऐवज में वे अपने उक्त कृत्यों को सही ठहराने का अर्धसफल प्रयास कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर देश के कुछ भागो में गणांे के बीच करणी सेना तंत्र के द्वारा जो ड़र का माहोल पैदा किया गया हैं, वह संवैधानिक भारत के 69 वे वर्ष में निश्चित रूप से तंत्र से सुशोभित गण के लिये अच्छा संकेत नहीं हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस फिल्म के प्रति क्रिया-प्रतिक्रिया भी राजनीति की भेट चढ़ गई हैं। इस फिल्म के बहाने समस्त पक्ष राजनीति करना चाहते हैं। 69 वे गणतंत्र की बेला में इस देश के नागरिको (चूँकि चुप रहना भी शांत भागीदारी मानी जाती हैं) राजपूतो व न्यायालय के एक के बाद एक उठाये गये कदमो को नमन? न्यायालयो से यह उम्मीद की जाती हैं कि वे न केवल आदेश पारित करे, बल्कि पूर्णरूप से आदेश को पूर्ण भावनाओं के साथ ही शीघ्र उन्हे उसी प्रकार लागू भी करवाये, जिस प्रकार टीएन शेसन ने पूर्व से ही लागू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधान को कठोर रूप से अंर्तनिहित मूल भावनाओं के साथ लागू करके लोगो को प्रथम बार यह एहसास करवाया कि चुनाव कम खर्चीले व निष्पक्ष हो सकते हैं। अन्यथा ‘‘पारित आदेश ‘‘न्यायालय की अवमानना’’ के समान ही होगा।   
अब बात फिल्म निर्माता व फिल्म की भी कर ले। जब फिल्म पद्मावती बनी तो निर्माता ने फिल्म प्रदर्शन के लिये प्रमाण पत्र हेतु सेंसर बोर्ड़ के पास भेजी। नियमानुसार फिल्म प्रदर्शन तारीख के निश्चित समयापूर्व सेंसर बोर्ड को नहीं दी गई। फिर फिल्म निर्माता द्वारा वह कालम को रिक्त छोड़ दिया था जिसमें यह स्पष्टीकरण होता कि फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर आधारित हैं अथवा काल्पनिक हैं। तत्पश्चात निर्माता द्वारा यह कहा गया कि यह फिल्म ऐतहासिक तथ्यों पर नहीं हैं, बल्कि यह फिल्म मोहम्मद जायशी कृत पद्मावत नाम के महाकाव्य पर आधारित हैं। इसके बावजूद अधिकांश इतिहास कार इसे सिर्फ कोरी कल्पना मानने को तैयार नहीं हैं। इस प्रकार स्थिति को और भी जटिल बनाने में फिल्म निर्माता के महायोगदान को नहीं नकारा जा सकता हैं। इसी कारण निर्माता द्वारा ऐतहासिक तथ्यों के साथ उक्त विवाद को तूल व बल देने में परिस्थिति जन्य अवसर मिल गया। फिल्म निर्माण के दौरान ही निर्माता द्वारा गंभीरता न बरतने के फलस्वरूप आपत्ति करने वाले व्यक्तियों व संगठनो के साथ चर्चा भी नहीं की गई। उसी समय फिल्म का प्रोमो उन्हे क्यों नहीं दिखाया गया? ये सब परिस्थितियाँ कहीं न कहीं फिल्म निर्माता को भी शक के घेरे में लाती हैं। 
फिल्म में चित्तौड़ के राजा राणा रतन सिंह की पत्नी व मेवाड़ की रानी पद्मावती (पद्मिनी) के जौहर व घूमर नृत्य पर राजपूत समाज को कड़ा ऐतराज हैं। निश्चित रूप से तत्समय 1600 से अधिक स्त्रियों के साथ रानी पद्मावती के जौहर व्रत ने राजपूतो के बीच आन-बान व गौरव रक्षा के लिये हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने के कारण उन्हे पूज्यमाता का दर्जा प्राप्त हुआ। लेकिन आज की परिस्थिति में क्या जौहर व्रत (सती प्रथा) को उचित ठहराया जा सकता हैं? सोशल मीडिया में कुछ लोगो का यह भी कथन हैं कि रानी पद्मावती को ‘‘जौहर व्रत’’करने के बजाय वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के समान रणक्षेत्र में जौहर करते हुये अपने प्राणो का त्याग कर वीरागना बनना चाहिये था।  
इन समस्त परिस्थितियो के बावजूद राजपूतो का इस सीमा तक के विरोध का तरीका उचित हैं क्या? ऐतहासिक तथ्यों के साथ फिल्मों द्वारा किये जा रहे खिलवाड़ की उक्त घटना पहली नहीं हैं। इसलिए अपना विरोध शांतिपूर्ण रूप से व्यक्त कर राजपूत समाज के कर्णधारो को अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेनी चाहिए थी। खासकर उस स्थिति में जब दो तीन राजपूतो को छोड़कर अन्य किसी ने भी फिल्म के प्रदर्शित होने के पूर्व फिल्म नहीं देखी थी। इस प्रकार का अंधा विरोध ‘‘अंधा’’ ही कहलायेगा। 69 वें गणतंत्र की पूर्व बेला पर पद्मावती-पद्मावत तक देश को सीमित कर देना क्या उचित हैं? इसका जवाब समस्त पक्ष को देश हित में देना जरूरी होगा।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

’’वैधानिकता’’ व ’’नैतिकता’’ के बीच उलझे ‘‘आप’’ के अयोग्य 20 विधायक!

अंततः महामहिम राष्ट्रपति ने आप के 20 विधायको को लाभ के पद पर होने के कारण उत्पन्न हुई कानूनी अयोग्यता की चुनाव आयोग की सिफारिश को स्वीकार कर लिया। अतः उच्च न्यायालय में सोमवार को सुनवाई होने वाली आप के विधायको की याचिका भी शून्य हो गई। इसीलिये उनके द्वारा उक्त याचिका को दिल्ली उच्च न्यायालय से वापस ले ली गई। युवा वकील प्रशांत पटेल द्वारा वर्ष 2015 में राष्ट्रपति के समक्ष 21 विधायको के विरूद्ध संसदीय सचिव के पद पर नियुक्ति के कारण लाभ के पद पर होने के कारण उन्हे अयोग्य घोषित करने के लिए याचिका लगाई गई थी, जिसे उन्होने चुनाव आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेज दिया था। मामला लगभग दो वर्षो से लम्बित था। लेकिन अचानक रिटायरमेंट के पांच दिन पूर्व आयोग ने उक्त याचिका पर निर्णय कर, अयोग्य घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी जो केजरीवाल की नैतिकता एवं वैधानिकता के बीच झूल गई। 
‘आप’ के दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा इन विधायको को संसदीय सचिव के लाभ के पद पर नियुक्त किया गया था तब उनके इस कृत्य को गैर कानूनी माना जाकर इसकी उपरोक्तानुसार शिकायत की गई थी। तभी अरविंद केजरीवाल को यह लगा था कि संभवतः संसदीय सचिव लाभ का पद होने के कारण ये नियुक्तियाँ अवैधानिक हो सकती हैं। अतः उनके द्वारा संसदीय सचिव के पद को लाभ की श्रेणी से हटाकर छूट की सीमा में लाने हेतु विधेयक विधानसभा में पारित किया गया (जैसे कि मध्यप्रदेश सहित अन्य कई विधानसभाओं में प्रस्ताव लाकर कानून बनाया गया था।) लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उस विधेयक को वापिस कर दिये जाने के कारण वह कानून का रूप नहीं ले सका। यद्यपि कानूनन् केजरीवाल को एक संसदीय सचिव नियुक्त करने का अधिकार हैं। लेकिन यह अपने में एक तथ्य हैं कि कई राज्यो की विधानसभा में संसदीय सचिव के लाभ के पद की अयोग्यता को कानून बना कर हटा दिया गया हैं। 
केन्द्रीय सरकार ने भी इस तरह के कई लाभ के पदो को अयोग्यता की सीमा से बाहर लाकर संसद सदस्यों की सदस्यता को अछ्ण बनाये रखा। इसी कारण से सोनिया गांधी संसद सदस्य के साथ लाभ के पद भी धारण किये हुई थी, निर्णय के पूर्व ही संसद सदस्ता से इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़कर जीती। जया बच्चन को भी इसी कारण से इस्तीफा देना पड़ा था। यहां पर जो लोग अरविंद की नैतिकता की बात कर रहे हैं व उनसे नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रहे हैं वे लोग यह भूल जा रहे हैं कि वे स्वयं गैर नैतिक रहते हुये विधायिका के बहुमत का दुरूपयोग कर कानूनी अयोग्यता को छूट की सीमा में कानून बनाकर लाकर उन्होने उसे वैधानिक बनाया। अतः क्या राजनैतिक लाभ व सत्ता बनाये रखने के लिये अयोग्यता को वैधानिक बनाने के तौर तरीको को नैतिक कहा जा सकता हैं, एक बड़ा प्रश्न यह भी हैं? लेकिन इससे भी बड़़ा प्रश्न केजरीवाल की नैतिकता की वह लक्ष्मण रेखा हैं जो उन्होनेे स्वयं उस अन्ना आंदोलन के दौरान आगे बढ़ कर खींची थी, और वह बड़ी नैतिकता किसी मजबूरी में स्वीकारी हुई नहीं थी, बल्कि वैकल्पिक राजनीति की तलाश में सही जन-जन-नेता बनने के प्रयास में, अन्ना के पेड़ की छाया तले अरविंद केजरीवाल ने खुले दिल से उक्त महती नैतिकता स्वीकार कर नई राजनैतिक पार्टी को जन्म देकर, नई वैकल्पिक व्यवस्था को आगे बढाने का प्रयास पूर्ण नैतिकता के साथ किया था। तभी तो उन्होने दो वर्षो के भीतर ही दिल्ली में 70 सीट में से 67 सीट जीत कर अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त कर ऐेतहासिक रूप से सत्ता प्राप्त की थी। आज वही केजरीवाल नैतिकता से परे कानून की दुहाई देकर चुनाव आयोग के सिफारिश पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं? कानून एवं प्राकृतिक न्याय के आधार पर उनकीे आपत्ति व आरोप सही हो सकते हैं, लेकिन उनके द्वारा नैतिकता की गड़ी गई परिभाषा के आगे वह दूर-दूर तक कहीं नहीं ठहरती हैं।
ठीक इसी प्रकार जब उच्च न्यायालय में मामला सोमवार को सुनवाई हेतु लगा हुआ था, तब चुनाव आयोग की सिफारिश पर महामहिम द्वारा सुनवाई के पूर्व ही हस्ताक्षर करना कितना ‘‘नैतिक’’ हैं, यह प्रश्न भी स्वभाविक रूप से उठेगा ही। जब आप के विधायको ने महामहिम राष्ट्रपति से इस संबंध में मुलाकात का समय माँगा था, तब वे यह जानते हुये भी कि वे लोग चुनाव आयोग की इस अयोग्यता की सिफारिश के संबंध में ही मिलना चाहते हैं, उनसे मिलने के पूर्व ही महामहिम द्वारा सिफारिश को स्वीकार कर लेना भी कितना नैतिक कहा जा सकता हैं? चुनाव आयोग के वकील का उच्च न्यायालय के समझ यह कथन कि आयोग ने राष्ट्रपति को सिफारिश भेज दी हैं अथवा नहीं, यह जानकारी वे आयोग से नहीं ले सके हैं, क्योंकि कार्यालय बंद हो गया था, यह भी कितना नैतिक हैं, जबकि सार्वजनिक रूप से (पब्लिक डोमेन में) यह बात आ चुकी थी की चुनाव आयोग द्वारा अयोग्यता की सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी जा चुकी हैं। मगर मुख्य चुनाव आयुक्त जो कि 5 दिन बाद रिटायर्ड होने वाले हैं के द्वारा लम्बित याचिका पर अचानक निर्णय दे देना भी कितना नैतिक हैं, प्रश्न यह भी हैं?
कांग्रेस व भाजपा का इस मुद्दे पर केजरीवाल से इस्तीफा मांगना कितना नैतिक हैं? जबकि कई प्रदेशों में उनकी स्वयं की सरकारो ने इन पदो को लाभ के पद से मुक्त करने के लिये कानून बना दिया था। इसलिये यह बात नैतिकता की नहीं, बल्कि कानूनी मुद्दा हैं। कम से कम भाजपा व कांग्रेस के लिये भी यह कानूनी मुद्दा होना चाहिये। निश्चित रूप से केजरीवाल के लिये भी  अपनी नैतिक गलती को नैतिकता पूर्व स्वीकार करके आत्मावलोकन करने का एक बड़ा अवसर हैं, क्योकि नैतिकता की यह सीमा उन्होने स्वयं ही आगे आकर लिखी थी, ओढी थी। कानूनी रूप से वे उक्त पद को कानूनी लाभ दिलाने में असफल हो गये थे। लेकिन यह हमारा ही देश हैं जहां नैतिकता लिये हुये कानून का राज सिर्फ दूसरो पर ही लागू किया जाता हैं स्वयं पर नहीं लेकिन ‘‘लाभ’’ स्वयं पर लागू किया जाता हैं दूसरो पर नहीं किया जाता हैं।  

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

‘‘माननीयों’’ से ये उम्मीद तो ना थी?

‘‘शुक्रवार’’ को जब सुबह उच्चतम न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठतम् न्यायाधिपतियों (जिनमें एक वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के इस वर्ष के मध्यांतर में रिटायर्ड होने के पश्चात वरिष्ठता के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के क्रम में रंजन गगोई भी शामिल हैं) ने प्रेस कान्फ्रेस करके न केवल इस देश के न्यायिक इतिहास में न केवल एक अनचाहा इतिहास रच दिया, बल्कि यह विश्व की शायद एकलौती व अनोखी घटना भी साबित हुई हैं। इस घटना की किसी भी क्षेत्र ने अपेक्षा नहीं की थी। न ही ऐसी आशंका या शंका किसी भी नागरिक या न्याय क्षेत्र से जुडे़ व्यक्तियों, न्यायाधीशगण, वकीलगण, सायल (मुवक्किल) किसी के भी मन में नहीं रही थी। अमेरिका में जहां स्थानीय जज जनता द्वारा चुने जाते हैं, वहां पर भी ऐसे जजो की ऐसी सार्वजनिक उपस्थित शायद ही हुई हो।
उक्त प्रेस कान्फ्रेस में चारो वरिष्ठ न्यायाधीशो ने दो मुद्दो का जिक्र किया था। एक रोस्टर निर्माण संबंधित प्रचलित दो नियमों का न मानना जिसे बेंच हंटिंग कहा जा सकता हैं (जिसे इशारो ही इशारो में कुछ मामले की ओर इंगित किया था) दूसरा मेमोंरेडम ऑफ प्रोसीजर। इन दो विषयांे को उठाते हुये उन्होने कहा था कि उच्चतम न्यायालय का न्यायिक प्रशासन ठीक तरह से कार्य नहीं कर रहा हैं और यदि इसे फौरन सही नहीं किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। उच्चतम न्यायालय के उक्त (आंतरिक) मामले को प्रेस कान्फ्रेस के जरिये सामने लाने के उक्त कदम के बाबत चारो वरिष्ठतम जजो की ओर से बोलते हुये जस्टिस जे चेलमेश्वर ने इस आधार पर इसे उचित बतलाया था कि मुख्य न्यायाधीश को सहमत न करा पाने के बाद उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था कि हम देश को बताएँ कि न्यायपालिका की देखभाल करें। वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने आगे कहा था कि हम नहीं चाहते कि 20 साल बाद देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति यह कहे कि हम चारो ने अपनी आत्मा बेच दी।
24 घंटे भी नहीं बीते होगें जब उक्त चारो न्यायाधिपति में से एक जस्टिस रंजन गगोई ने यह कहा कि कोई संकट नहीं हैं। वही दूसरे न्यायामूर्ति जोसेफ कुरियन ने कहा कि समस्या का समाधान के लिये बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं हैैं। उन्होने जो मुद्दे उठाये हैं, उसका समाधान होगा। उक्त मुद्दे उच्चतम न्यायालय का आंतरिक मामला हैं, जैसा कि लगभग सभी लोग इस मामले में एक मत हैं। मुद्दे की मैरिटस (योग्यता) पर भी कोई प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं हैं, इससे अधिकॉंश लोग सहमत हैं। लेकिन अंततः उच्चतम न्यायालय का यह जब आंतरिक मामला हैं, तब इसे प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से इन जजो ने बाहर क्यो लाया सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) क्यो किया जिससे अनावश्यक रूप से उच्चतम न्यायालय की गरिमा और विश्वसनीयता पर एक दरार क्यों पड़ने दी गई। हो सकता हैं, उच्चतम न्यायालय के इन दो जजो के प्रेस कान्फ्रेस के बाद के कथन से पड़़़ी हुई दरार भर गई हो। लेकिन उस दरार के (अमिट) निशान के लिए अतंतः कौन जिम्मेदार होगा? 24 घंटे में ऐसा क्या हो गया जिसे पब्लिक डोमेन में तो नहीं रखा गया, लेकिन लोकतंत्र खतरे में हैं वह ‘‘भ्रांति’’ दूर हो गई तथा आत्मा बेचने का आरोप का खतरा भी समाप्त हो गया, यह समझ से परे हैं। 
प्रेस कान्फ्रेस के बाद आये दो न्यायमूर्ति के उक्त कथन को क्या उस श्रेणी में लिया जा सकता हैं कि जिस प्रकार आज कोई भी सार्वजनिक व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कोई भी (अ)विवादित बयान देकर बाद में इंकार कर देेता हैं? लेकिन माननीयों से इस आचरण व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती हैं। अंततः जो कुछ हुआ था, वह बिलकुल अप्रत्याशित था, जो अभी हुआ हैं यह भी अप्रत्याशित ही हैं, और भविष्य में इसी आशा के साथ ऐसा अप्रत्याशित न हो। तभी हमारी न्याय व्यवस्था जो लोकतंत्र की रीढ की हड्डी हैं, देश के नागरिको को संविधान द्वारा प्रदत्त संवैधानिक अधिकारो की रक्षा करने वाली हैं, कार्यपालिका विधायिका पर संविधान के बाहर जाने पर रोक लगाने की यह एक मात्र प्रभावी संस्था हैं, जो संविधान की रक्षक हैं। इस न्याय व्यवस्था को चलाने वाली सर्वोच्च संस्था उच्चतम न्यायालय ही हैं जिसका स्वरूप अक्षुण रहेगा तभी वह उक्त समस्त उत्तरदायित्वो को निभाने में सफल होगा। 

-- 

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

‘‘न्यायिक सक्रियता’’ ‘‘न्यायिक संकट’’ (क्राइसेस) में तो नहीं ?

बहुत पहले आपातकाल के समय स्वर्गीय जस्टिस पी.एन. भगवती ने एक नारा दिया था ‘‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’’ (कमिटेड़ ज्यूडिशियरी)। उसके बाद पिछले कुछ समय से जनहित याचिकाओं (पी.आई.एल.) के माध्यम व स्व-प्रेरणा से उच्च न्यायालयांे एवं उच्चतम् न्यायालय ने ऐेसे कई ऐतहासिक निर्णय जन हित में दिये हैं जिन्हे कुछ क्षेत्रों में कार्यपालिका एवं विधायिका के अधिकारो का उल्लघंन माना गया हैं। इन्हे न्यायिक सक्रियता कहा गया। आज निष्पक्ष न्याय के साथ-साथ न्यायिक सक्रियता भी स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास के (अब तक के सबसे बड़े) गहरे न्यायिक संकट में फंस गई हैं, जिसका (दुश्ः) परिणाम फिलहाल गर्भ में हैं। 
हमारा देश चार स्वतंत्र स्तम्भों (पैरो) पर खड़ा हैं। संविधान द्वारा प्रदत्त न्यायपालिका,  कार्यपालिका व विधायिका के तीन स्वतंत्र खम्भों के साथ चौथे स्वंतत्र स्तम्भ प्रेस के मजबूत कंधो पर हमारे देश की सम्पूर्ण व्यवस्था टिकी हुई हैं। तीनो संवैधानिक स्तम्भ स्वतंत्र होने के बावजूद परस्पर सहयोग के द्वारा ही देश को चलाने व आगे बढ़ाने का कार्य कमोवेश सफलतापूर्वक करते चले आ रहे हैं। इन चारो स्तम्भों में सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संविधान ने न्यायपालिका को दी  हैं, जिसे यह अधिकार दिया गया हैं कि संविधान के किसी भी एक अंग का दूसरे अंगो (संस्थाओं) के साथ विवाद की स्थिति निर्मित होने पर उच्चतम् न्यायालय का निर्णय अंतिम व बंधनकारी (अन्य किसी भी मामलो की तरह) होता हैं। इसके साथ ही संविधान ने विधायिका को भी यह अधिकार दिया हैं कि यदि उच्चतम न्यायालय के किसी निर्णय से कार्यपालिका सहमत नहीं हैं, वह संसद में बिल लाकर उस निर्णय को पलट सकती हैं (जैसा कि राजीव गांधी के कार्यकाल में शाहबानो प्रकरण में हुआ था) बशर्ते वह संविधान की सीमा के भीतर हो व संविधान की भावना के विरूद्ध न हो। जैसा कि केशवानंद भारतीय के प्रकरण में भी माननीय उच्चतम न्यायालय ने सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं कि संविधान के बुनियादी ढ़ाँचा (बेसिक स्ट्रक्चर) से छेड़ छाड़ नहीं की जा सकती हैं। इस प्रकार अंततः वास्तविकता में अभी तक उच्चतम न्यायालय को ही सर्वोच्च मानने की व्यवस्था ही कार्यरत रही हैं। संविधान का सरक्ष्ंाक एवं लोकतंत्र का प्रहरी भी न्यायपालिका को ही माना गया हैं।
आज उसी उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम में व्यवस्था परस्पर आपसी (मुख्य न्यायाधीश विरूद्ध चार वरिष्ठ न्यायाधीश) विवाद उत्पन्न होकर प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से प्रकट हुआ हैं जो अत्यंत खेद जनक और एक ऐतहासिक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हैैं। आखिर यह कोलेजियम व्यवस्था क्या हैं। कोलेजियम उच्चतम न्यायालय की एक प्रशासनिक व्यवस्था हैं, जो मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 5 वरिष्ठ जजो का एक समूह हैं, जिसका प्रमुख न्यायाधिपति (प्रथम होने के नाते) मुख्य न्यायाधीश होता हैं। कोलेजियम की एक जिम्मेदारी जजो की नियुक्ति के मामले में सरकार को सिफारिश भेजना भी होता हैं जो सामान्यतः सरकार स्वीकार कर लेती हैं। तबादलों के फैसले भी कोलेजियम करता हैं। यद्यपि विषयानुसार रॉस्टर अर्थात कार्यतालिका बनाने का विशेषाधिकार मुख्य न्यायाधीश के पास होता हैं, परन्तु चली आ रही परम्परा नुसार सामान्यतः मुख्य न्यायाधीश कोलेजियम के अन्य वरिष्ठ जजो की सहमति से ही कार्यो का बँटवारा करते रहे हैं। उक्त परम्परा का पालन नहीं हो पाने के कारण ही दो माह पूर्व चारो वरिष्ठ जजों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर वेदना पूर्वक अपनी बात व्यक्त की थी। इसीलिए यह विवाद उत्पन्न हुआ हैं। चारो वरिष्ठ जजो ने इसी रॉस्टर प्रणाली को संाकेतिक रूप से कुछ विशिष्ट केसो के साथ जोड़कर विवाद को और गहरा कर दिया हैं। यद्यपि इस व्यवस्था के एक भाग ‘‘जिसके अंतर्गत जजो की नियुक्ति की सिफारिश की जाती हैं’’ को संसद में कानून पारित कर न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाकर समाप्त कर दिया गया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त कानून को असंवैधानिक घोषित करके कोलेजियम व्यवस्था को पुनः बहाल किया। इसके बावजूद भी उच्चतम न्यायालय इस कोलेजियम व्यवस्था में सुधार चाहता हैं जिसके लिये सुझाव मागें गये हैं। 
किस न्यायाधीश को या न्यायाधीशों की किस बंेच को कौन सा प्रकरण दिया जाए (‘‘बेंच हंटिंग’’), इससे देश का लोकतंत्र कैसे खतरे में पड़ सकता हैं, जैसा कि चार वरिष्ठ जजों ने आरोप लगाया हैं, यह एक बडा प्रश्न हैं। जब तक यह तथ्य सामने नहीं आता हैं कि निर्णय देने वाली बेंच ‘‘न्यायपूर्वक निर्णय न देकर किसी प्रभाव मेें आकर निर्णय दे रही हैं’’ तब तक उनकी मंशा पर सांकेतिक रूप से निशाना लगाना/उठाना उचित नहीं होगा। वरिष्ठ न्यायाधीशो के उक्त कथन का (बिना कहे) साथ में यह अर्थ भी निकलता हैं कि वे मुख्य न्यायाधीश के साथ उन बेंचो के न्यायाधीशों के विवेक पूर्ण निर्णयों (न्याय) पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगा रहे हैं जिन्हे मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई हेतु रॉस्टर से हटकर केस दिये हैं।  
सुप्रीम कोर्ट के चारो न्यायाधिपतियांे द्वारा विवाद के मुद्दो को प्रेस कांफ्रेस का सहारा लेकर सामने लाने की बात पर मत तीव्र विभाजित हो सकते हैं। इस प्रेस वार्ता से एक तरफ उच्चतम न्यायालय की गरिमा, प्रतिष्ठा, निष्ठा व निष्पक्षता की लगभग 70 सालो से खीची गई मजबूत दीवार पर ही एक दरार उत्पन्न हो गई हैं, जो कैसे दूर होगी, कैसे भरेगी, यह एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह उत्पन्न करती हैं? इन्ही वरिष्ठ न्यायाधीशों की नजर में उच्चतम न्यायालय में ‘‘सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है’’ं जिसको ध्यान में लाने के लिये उन्होने मुख्य न्यायाधीश को चिठ्ठी लिखी, व्यक्तिगत मुलाकात की, लेकिन उसके बावजूद न तो कोई सुधार हुआ और न ही इन न्यायाधीशो के मन में कोई सुधार की आशा की किरण ही जगी। शायद तभी मजबूरी में उन्होंने सब कुछ ठीक नहीं चल रहा हैं, की बात को सार्वजनिक किया हैं। लेकिन यह चरम कदम उठाने के पूर्व उनके पास तीन रास्ते और थे। एक महामहिम राष्ट्रपति से मिलकर अपनी व्यथा व्यक्त करते। दूसरा उच्चतम न्यायालय के अन्य समस्त (24) जजो के साथ बैठकर चर्चा कर अपनी बात समझाते और फिर  उनकी बात यदि सही मानी जाती तो उन समस्त न्यायाधीशो के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश से मिलते। तीसरा अपने पद से इस्तीफा देकर प्रेस कान्फ्रेस करते व उसमें यह घोषणा करते कि वे स्वयं उच्चतम न्यायालय में उक्त मुद्दो (रॉस्टर व विशिष्ट केसो को) लेकर याचिका दायर करेगें। तब शायद उन पर न्यायपालिका को सेन्सेशन  (सनसनी) बनाने का आरोप नहीं लग पाता। बल्कि लाचारी में बेबश होकर सुधार लाने के लिये ‘‘अंतिम’’ हथियार को उठाकर न्यायालय के प्रति ‘‘धारणा’’ की रक्षा करने के लिये उक्त अप्रिय लेकिन साहसिक कदम उठाने के लिये वे सही ठहराये जाते। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों और आम नागरिक के बीच उक्त मुद्दे को लाने का क्या यही एकमात्र सही तरीका था? प्रश्न ये भी है?ं जिस तरीके को अपनाया गया हैं, निश्चित रूप से उसने उच्चतम न्यायालय की न्याय व्यवस्था पर नागरिको की आस्था को डिगाने का ही प्रयास किया हैं। इससे भी बड़ा प्रश्न यह हैं कि क्या उक्त मुद्दे जो कि उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम का आंतरिक मामला था, को इस तरह से सार्वजनिक रूप से लाना निहायत जरूरी व उचित था? विशिष्ट रूप से, क्या न्यायपालिका पर देश के नागरिको के भरोसे पर भी कहीं न कहीं दरार पैदा कर देना देश की न्याय व्यवस्था के लिये एक खतरनाक बात नहीं होगी? सब कुछ ठीक न होने की बात को लेकर न्यायपालिका के कोलेजियम को सुधारने के लिये चार वरिष्ठ जजों ने पद पर रहते हुये जो जज्बा दिखाया हैं उससे भी खतरनाक स्थिति (उनकी न्याय व्यवस्था के ठीक न होने की कल्पना से परे) संविधान के इस महत्वपूर्ण खंभे को ही कहीं चौथा खम्बा (मीडिया) हिला न दे, प्रश्न यह हैं?
अभी तक इस मामले में केन्द्रीय सरकार ने यह कहकर अपने को फिलहाल अलग थलग कर लिया हैं कि यह उच्चतम न्यायालय का अन्दरूनी मामला हैं। जब उच्चतम न्यायालय न्याय हित में देश हित में, नागरिको के हित में, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार एवं कर्त्यव्यो के तहत शासन की अंदरूनी स्थिति (कमियों) पर स्वयं या विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा जांच करवाता रहता हैं, निर्देश देता रहता हैं, तब ठीक वैसी ही स्थिति सर्वोच्य न्यायालय के भीतर उत्पन्न होने पर, सरकार भी मुख्य न्यायाधीश की सहमति से एक स्पेशल सीबाीआई जांच टीम का गठन करने के लिये एक कदम आगे क्यों नहीं बढाती हैं। ताकि वस्तु स्थिति दोनो पक्षों के सामने स्पष्ट हो जाए। चार वरिष्ठ  जजों के द्वारा गंभीर रूप से भ्रष्ट्राचार की स्थिति की ओर इंगित करने का प्रयास किया गया हैं जैसा कि मीडिया के कुछ क्षेत्रो में रिपोर्टिग हो रही हैं। चूकि यह एक अभूतपूर्व स्थिति हैं और ऐसी  स्थिति का हल भी एक अभूतपूर्व कदम उठा कर ही किया जा सकता हैं। शायद इसके लिये कुछ समय का इंतजार करना होगा? साथ ही प्रंधानमत्री को स्वयं आगे आकर कानून मंत्री को साथ में लेकर मुख्य न्यायाधीश के साथ कोलेजियम की मींटिग बुलाकर समस्त निहित मुद्दो पर चर्चा करने पर कुछ न कुछ हल अवश्य निकलेगा, और उच्चतम न्यायालय की छबि भी अक्षुण्ण रह पायेगी। न्यायालय की स्थिति न केवल न्यायपूर्वक होनी चाहिए बल्कि न्यायपूर्ण होते हुये दिखना भी चाहिए। वैसे ही, जैसे कि न्याय के लिए कहा गया हैं कि न्याय न केवल मिलना चाहिये बल्कि मिलते हुये दिखना भी चाहिए। अंत में इस मामले में किसी भी एक पक्ष को पूर्णतः स्वीकार करना व दूसरे पक्ष को अस्वीकार कर किसी भी पक्ष को बयान बाजी से आगे बचना चाहिए ताकि स्थिति और खराब न हो। 
कुछ मीडिया चैनलों ने जहां चार ‘‘न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेस करने को’’ सनसनी फैलाकर जजों को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया हैं, वहीं वे स्वयं इस मुद्दे पर लम्बी चौड़ी बहस कराकर मामले में स्थिति को और खराब कर रहे हैं। न्यायपालिका की गरिमा को बचाये रखने के लिये फिलहाल मीडिया को भी इससे बचना चाहिए।

रविवार, 14 जनवरी 2018

माननीय उच्चतम् न्यायालय द्वारा केन्द्रीय विद्यालयों में की जा रही प्रार्थना पर केन्द्र सरकार को जारी नोटिस! कितना औचित्य पूर्ण!

मध्यप्रदेश के निवासी विनायक शाह ने देश के 1125 केन्द्रीय विद्यालयों में 50 वर्षो से लगातार हिन्दी-संस्कृत में की जा रही प्रार्थना पर रोक लगाने के लिये दायर याचिका पर केन्द्रीय विद्यालय संगठनों एवं केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं हैं कि 50 वर्षो से अधिक जारी उक्त ‘‘प्रार्थना’’ प्रक्रिया पर किसी भी भागीदार (विद्यार्थी) ने स्वयं या अपने अभिभावक के माध्यम से आज तक कोई आपत्ति नहीं की। दूसरी बात आज तक इतने सालो में पढ़ चुके विद्यार्थियों या वर्तमान में पढ़ रहे विद्यार्थियों मे से किसी ने भी कोई आपत्ति दर्ज करके रोक लगाने की मांग ही नहीं की। उच्चतम न्यायालय पहुँचे याचिकाकर्ता विनायक शाह का भी यह दावा नहीं हैं कि वे स्वयं केन्द्रीय विद्यालय में पढ़े हैं या उनके बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पढ़े या फिलहाल पढ़ रहे हैं। तब सबसे बड़ा प्रश्न तो यही हैं कि विनायक शाह की इस विषय में अधिकृत स्थिति (लोकश स्टेंडी) कितनी औचित्य पूर्ण हैं? दूसरी बात उच्चतम न्यायालय के पास वैसे ही लम्बित याचिकाओं की लम्बी फेहरिस्त हैं जो समयाभाव के कारण शीघ्र सुनवाई पर नहीं आ पा रही हैं इनमे कई महत्वपूर्ण याचिकाएं भी होगी जिनकी सुनवाई शीघ्र आवश्यक हैं। तब इस तरह की बेतुकी याचिका की सुनवाई करके समय खपाने का कितना औचित्य हैं, यह भी एक बड़ा प्रश्न हैं? 
भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी हैं और संस्कृत भाषा हमारी ‘‘संस्कृति’’ में समायी हुई मूल हैं, तो प्रार्थना हिन्दी-संस्कृत में नहीं होगी, तो क्या इंग्लिश, उर्दू, अरबी, यहूदी इत्यादि अन्य किसी विदेशी भाषा में होगी? क्या अन्य किसी देश का ऐसा उदाहरण हैं जहां राष्ट्र भाषा को छोड़कर दूसरी विदेशी भाषा में सरकारी शिक्षा संस्थाओं में प्रार्थना होती हैं? तो फिर हमारे देश में ही ऐसी उम्मीद क्यों की जाती हैं? शायद इसलिये कि सहष्णुता का असहिष्णु आवरण ओढ़ाने का अनर्गल प्रयास केवल हमारे देश में ही किया जा सकता हैं।
क्या प्रार्थना करने मात्र से बच्चे की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म हो जाती है या खत्म हो गई?ं क्या प्रार्थना करने मात्र से नास्तिक बच्चा आस्तिक बन सकता हैं ? क्या प्रार्थना का इतना गहरा प्रभाव हो रहा हैं कि उसके तथाकथित शाब्दिक अर्थो का पालन विद्यार्थी अपने जीवन में कर लेते हैं अथवा उतार लेते हैं? ये सभी मुद्दे याचिकाकर्ता ने उठाये हैं। क्या प्रथम दृष्ट्या उच्चतम न्यायालय को सब समझ नहीं पड़ रहा हैं। कि पी.आई.एल. फाईल करना आज कल क्या एक शगूफा एवं प्रसिद्धी पाने तथा कई बार ब्लैकमैलिंग करने का माध्यम नहीं बनते जा रहा हैं? ऐसे बेतुके उद्देश्यों को लेकर फाईल की जाने वाली याचिका पर अविलम्ब रोक लगाने की आवश्यकता हैं, न कि उसे बढावा देने की। माननीय उच्चतम न्यायालय को इस तरह की पी.एल.आई. को स्वीकार करने के पूर्व इस तथ्य को ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक हैं कि (कम से कम) पीड़ित व्यक्ति या व्यक्ति वर्ग से ही तथाकथित संवैधानिक अधिकारो की सुरक्षा को लागू करवाने  के लिए अपनी याचिका लेकर न्यायालय की शरण में आये। यदि नागरिक अपने मूल अधिकारो तथा कर्तव्यों के प्रति जाग्रत नहीं हैं तो न्यायालय का काम उसे जाग्रत करने का नहीं हैं? यह कार्य शासन तथा उससे भी ज्यादा सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं एवं सामाजिक व राजनैतिक दलों का हैं। इसके बावजूद भी यदि वे नागरिक जो उन्हे संविधान द्वारा दिये गये अधिकारो के प्रति जाग्रत नहीं हैं उन्हे तो अपने हाल पर छोड़ देना ही उचित होगा। कहा गया हैं जब तक बच्चा रोयेगा नहीं मां अपने प्राण से भी ज्यादा प्यारे बच्चे को दूध नहीं पिलाती हैं। मुद्दे की बात यह है कि ऐसे विषय पर  अविलम्ब एक संयत नीति बनाने की है न कि किसी एक घटना मात्र पर तुरंत कार्यवाही करने की हैं। 

शनिवार, 6 जनवरी 2018

‘‘आम आदमी पार्टी’’ (आप) वास्तव में क्या ‘‘आम आदमियों की पार्टी’’ (आम) बन गई हैं?

5 तारीख को दिल्ली प्रदेश के लिए होने वाले राज्यसभा चुनाव हेतु आप पार्टी ने निश्चित विजय प्राप्त करने वाले अपने तीनों उम्मीदवारो की घोषणा कर दी हैं। पार्टी के संस्थापक सदस्य संजय सिंह के अलावा पार्टी ने दो बाहरी ख्याति प्राप्त व्यक्तियों एन.डी. गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट तथा भूतपूर्व अध्यक्ष चार्टर्ड एकाउंटेंट संघ और दिल्ली के बड़े व्यवसाई हाल तक कांग्रेस के बड़े नेता रहे व दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके, वैश्य समाज के सुशील गुप्ता को टिकट दी गई हैं। संजय सिंह का नाम तो काफी पहले से तय था जिनके नाम पर पार्टी के अंदर या बाहर विवाद की कोई स्थिति थी ही नहीं। 
पार्टी ने शुरू में विभिन्न क्षेत्रो में काम करने वाले देश के भिन्न-भिन्न स्थानो के ख्याति प्राप्त व्यक्तियों जैसे रघुराम राजन भूतपूर्व गवर्नर रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, उच्चतम् न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश सहित, कला, फिल्म, शिक्षा, न्यायिक इत्यादि क्षेत्रो से जुड़े नामी गिरामी विभूतियों सहित एक के बाद एक कुल 18 लोगो के नामों का प्रस्ताव राज्यसभा की टिकिट हेतु आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल के द्वारा किया गया था। इन सब महानुभावों ने देश के विभिन्न क्षेत्रो में सर्वागीण विकास हेतु उच्चतर कार्य कर विशिष्ट स्थान बनाया/पाया हैं। इन सभी ने केजरीवाल के इन प्रस्तावो को अस्वीकार करके धन्यवाद सहित नम्रता पूर्वक अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। अंततः ये 18 व्यक्ति जो अपने- अपने क्षेत्रों में विशिष्टता लिये हुये ख्याति प्राप्त रहे हैं, उन्होने केजरीवाल के अनुरोध को अस्वीकार कर स्वंय को आम आदमी पार्टी के लिये सक्षम व योग्य नहीं समझा और न ही स्वयं को ‘आप’ पार्टी के ‘‘आम’’ व्यक्ति हो सकने लायक समझा। येे सभी व्यक्ति यद्यपि अपने आम के मीठे रस को े (सर्वत्र) बिखेरते रहे लेकिन स्वयं को ‘आम’ की गुठली के रूप में आम आदमी पार्टी के द्वारा स्वयं के चूसे जाने की (राजनैतिक) स्थिति से बचने के प्रयास में ही शायद इन्होने यह इंकार कर दिया।  बात जो भी हो, इंकार कर उन्होने सबसे बड़ा अहसान तो आम आदमी पार्टी को विशिष्ट पार्टी नहीं बनने देकर केजरीवाल पर किया हैं और आप को मूलरूप आम ही रहने दिया हैं। यद्यपि ये सब तो समाज के विशिष्ट व्यक्ति होने के कारण ही ‘आप’ के लाड़ले हो गये थे। उन सबके इस अहसान के लिये केजरीवाल को तो उन सब को अवश्य धन्यवाद देना चाहिए।
आम आदमी पार्टी का विस्तार निर्धन, गरीब, कुचला या ज्यादा से ज्यादा निम्न मध्यम वर्ग तक सीमित हैं। शायद आरोप लगाने वाले लोग इस बात को भूल जाते हैं कि आम आदमी पार्टी जब बनी थी, तो उसका उद्देश्य सामान्य आम भारतीयों के जीवन स्तर को इतना ऊँचा उठाना था कि वे उच्च व धनी वर्ग के बराबर हो जाये, न कि धनी वर्ग को गरीबी रेखा तक नीचे लाकर उन्हे निर्धन वर्ग के बराबर ‘आम’ बनाना था। शायद पार्टी स्थापना के सात सालो के भीतर ही आम आदमी पार्टी के द्वारा दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 जीतकर लगभग तीन वर्ष से सत्ता में रहने के बाद उन्हे यह लगा होगा कि दिल्ली के आम नागरिको के रहने का जीवन स्तर उन्होने इतना ऊँचा ऊपर उठा दिया हैं कि वह धनी वर्ग गुप्ताओं (जिन्हे राज्यसभा की टिकिट दी गई हैं) के बराबर हो गया हैं। इसीलिए वे अब ‘आप’ पार्टी के ‘आम’ हो गये हैं, अतः उन्हे टिकट देकर ‘आप’ के विकास की हुई प्रगति पर मुहर लगा सकंे। केजरीवाल को ‘आप’ की इस (ग्रोथ) विकास व विस्तार के लिये बधाइयाँ? 
‘‘कुमार विश्वास’’ शायद अभी तक कुमार ही हैं। आम आदमी पार्टी के संस्थापक होने से लेकर आज तक के इन सात सालो के बाद भले ही ‘‘विश्वास’’ स्वयं को कुमार से परिपक्व होकर पूर्ण व्यक्ति बन जाना मान रहे हो, लेकिन शायद वे अभी भी केजरीवाल को यही भरोसा नहीं दिला पाये है। इसीलिए केजरीवाल के लिये ‘‘विश्वास’’ अविश्वासी हो गये। अब उन्हे और कड़ी मेहनत करने की जरूरत हैं, ताकि वह एक पूर्ण परिपक्व ‘कुमार’ बन सके। तभी भविष्य में दो साल बाद होने वाले राज्यसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी ‘‘विश्वास’’ पर विश्वास कर पायेगी?
‘‘विश्वास’’ (गोपाल राय की नजर में) अब इतने विश्वासघाती हो गये हैं कि वे यद्यपि राज्यसभा की टिकिट के पात्र नहीं रह गये हैं लेकिन पार्टी की समस्त समितियों व पदों पर रहते हुये वे अभी भी  पार्टी के ‘‘माननीय’’ हैं। सरकार गिराने के असफल प्रयास द्वारा विश्वासघात के लिये पार्टी ने उन्हे पार्टी से निकालने की बात तो दूर, इस गंभीर आरोप हेतु कारण बताओं सूचना पत्र भी नहीं दिया हैं। लेकिन लगातार केजरीवाल के विरूद्ध पोस्टर बाजी से लेकर बयान देते रहने वाले व्यवसाई सुशील गुप्ता को उनके उक्त कृत्य के बदले इनाम में राज्यसभा सीट देकर नवाजा गया हैं। दागी सांसदो से इस्तीफा मांगने को लेकर चले ‘‘अन्ना आंदोलन’’ से उपजी आप ने दागी सुरेन्द्र गुप्ता को राज्यसभा टिकिट देकर शायद अपनी उत्पत्ति के मूल आधार को चमकाने की दिशा में ही एक और कदम आगे बढाया हैं। क्योकि 15 से अधिक विधायक जो पहले से दागी थे या विधायक बनने के बाद दागी हुये (एकाध को छोड़कर) उनमें से किसी से भी अभी तक इस्तीफा नहीं मांगा गया हैं और न ही बाहर का रास्ता दिखाया गया हैं, जैसा कि ‘‘कुमार’’ को राज्य से बाहर का रास्ता तो दिखा दिया गया हैं। लेकिन सभा (पार्टी प्लेटफार्म) (राज्य़सभा) रहने दिया हैं।   
‘आप’ ने गुप्ताज का चयन कर एक बात का संदेश और दिया हैं कि पार्टी देश हित में निष्ठा से आगे जाकर ‘‘राष्ट्रीय व्यक्तित्व’’ को समर्थन देती हैं। शायद उनका यही रवैया आगे जाकर संवैधानिक पद जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, स्पीकर इत्यादि के चयन के समय  भी जारी रह सकता हैं? जो देश के राजनैतिक स्वास्थ्य के लिये अच्छी बात होगी।

गुरुवार, 4 जनवरी 2018

‘‘शहादत का बदला’’ या ‘‘शहादत पर रोक’’ का पुख्ता इंतजाम! वर्ष 2018?

सृष्टि की सामान्य परिपाटी और प्रक्रियानुसार प्रतिवर्षानुसार की भाँति इस वर्ष भी वर्ष 2017 का समापन हुआ व वर्ष 2018 का आगाज हुआ। विश्व के विभिन्न अनेकानेेक नागरिको के समान ही राष्ट्र के विभिन्न भागो में हम भारतीयो ने भी विभिन्न तरीको से हुये जश्नों में शामिल होकर नये साल का आगाज किया। लेकिन एक देशभक्त भारतीय के लिये क्या वास्तव में वर्ष 2017 का अंतिम दिन और वर्ष 2018 का सूरज वास्तव में वैसी ही खुशी लेकर आया हैं? यह बात न केवल सोचने की हैं, बल्कि यह हमारी आम मानसिक स्थिति के प्रति चिंता भी पैदा करती हैं।
मैं हमेशा से ही यह लिखता आया हूँ कोई व्यक्ति, संस्था, नियम-कानून कभी भी पूर्ण नहीं होते हैं।  उनमे हमेशा सुधार की गुंजाईश रहती हैं। ठीक उसी प्रकार वर्ष 2017 देश में बहुत सारी उपलब्धियाँ देता हुआ गुजरा, और वर्ष 2018 ने भविष्य में होने वाली अनेकानेक उपलब्धियों की आशा संजोए नये साल में प्रवेश किया हैं। लेकिन वर्ष के अंतिम दिन व नये वर्ष का सूरज जम्मू कश्मीर के पुलवामा ट्रेनिंग कैंप के लेथपोरा इलाके में स्थित केन्द्रीय रिर्जव पुलिस बल के कमाण्ड़ो टेªनिग सेन्टर पर फिदायीन हमले की दुःखद घटना से हुआ हैं, जिसने पाँच जवानो के शहीद होने का संदेश दिया। निश्चित रूप से यह मन को बहुत व्यथित व विचलित करने वाली घटना हैं। ऐसी स्थिति में क्या नागरिकगण उसी उल्लास पूर्वक व उमंग के साथ नये वर्ष की खुशियाँ मना सकते हैं? यह ठीक वैसी ही स्थिति हैं, जब किसी नागरिक के घर में दीपावली पर किसी सदस्य का स्वर्गवास हो जाये, तब वह क्या करेगा? पाँच रक्षकों की शहादत की जिम्मेदारी प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने स्वयं आगे आकर ली हैं। तब देश के मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने क्षणिक ब्रेकिंग न्यूज देकर अपने दायित्व की इतिश्री समझ ली और मध्य रात्रि तक नये वर्ष के संगीतमय नृत्य के शोर शराबे में सीमाओं पर सीमा की रक्षा करने वाले वीर बहादुर सैनिको के सीनो पर चली गोलियों की आवाज हमारे दिल से न टकरा कर उक्त शोर शराबे में डूब गई। यह निश्चित रूप से हमारे अकिंचन मन को दुखित कर देने वाली स्थिति हैं।
वर्ष 2014 में हुये लोकसभा चुनाव में दो ‘जुमले’ बहुत चले थे। प्रथम गर्दन जमीन पर कटकर पड़ी है, व हम बिरयानी टेबल पर खा रहे हैं। द्वितीय, एक के बदले 10 सिर काट कर लायेगंे। इन जुमलो को जनता ने हाथांे हाथ लिया व अन्य अनेक मुद्दो के साथ ऐतहासिक दो तिहाई बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनाई। साढे तीन वर्षो से ज्यादा समय व्यतीत हो जाने के बाद भी 56 इंच के सीने के रहते कितनी गर्दने कट गई, और बदले में कितनी गर्दन लाई गई? यह प्रश्न अभी भी वहीं का वहीं खड़ा हैं? शहीद परिवारो के इस भावुक लेकिन साहसिक प्रश्न का अभी भी उत्तर जनता अवश्य जानना चाहती हैं।
प्रत्येक नागरिक के मन में एक प्रश्न अवश्य उठता हैं। इन 43 महीनांे में नरेन्द्र मोदी ने देश की आंतरिक स्थिति में कई उपलब्धियाँ जोड़ी हैं। विदेशो में भी भारत को पहिले से कहीं अधिक मजबूत स्थान दिलाया हैं। वैसा शायद आयरन लेडी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के जमाने में भी नहीं मिल पाया था। नरेन्द्र मोदी के पूर्व इंदिरा गांधी ने वह अदम्य अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक साहस दिखा कर पाकिस्तान के दो टुकड़े करके नया राष्ट्र बांग्लादेश बना दिया था जिस कारण पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी ने भी इंदिरा को दुर्गा का रूप कहा था। परन्तु इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश बनाने की किसी भी प्रकार की पूर्व घोषणा नहीं करके बड़ बोले पन का परिचय नहीं दिया था जैसा कि आज के ज्यादातर नेताओं में पाया जाता हैं। इसके बावजूद भी उस समय के विश्व के दोनो श्रेष्ठ राष्ट्र (अमेरिका व रूस) के साथ हमारे एक साथ दोस्ताना संबंध नहीं बन सके थे। रूस ने तो बांग्लादेश के युद्ध में पूर्णतः भारत का साथ दिया था जबकि अमेरिका ने (भारत के) विरोध स्वरूप पाकिस्तान के समर्थन में हिन्द महासागर में अपना सातवाँ बेड़ा ही भेज दिया था। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ रूस व अमेरिका से, बल्कि जर्मनी, इंग्लैड़, फ्रंास इत्यादि बड़े यूरोपियन देशों तथा अरब देश व इज़राईल जैसे दो विपरीत ध्रुवो वाले देशो के साथ भी ‘‘पाकिस्तान व चीन’’ के विरूद्ध अपने देश के हितार्थ एक साथ दोस्ती कर राजनैयिक संबंधो को अभी तक की अधिकतम ऊँचाई तक सफलतापूर्वक पहँुचा कर संबंधो को मजबूत बनाने की पराकाष्ठा की हैं। इसी कारण विश्व के राजनैतिक पटल पर सबसे मजबूत अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड़ ट्रम्प के साथ बगल में खड़े दिख कर मोदी अपना राजनैतिक लोहा मनवा रहे हैं। देश हित में ही (यरूशलम को राजधानी मानने के अमेरिकी फैसले के मामले में) संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की विश्व देशो को दी गई धमकी के बावजूद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी पूर्व प्रतिष्ठत निर्गुट विदेश नीति को बनाए रख कर देश के स्वाभिमान को अक्षुण्य रखा हैं।  
आज जबकि भाजपा (एनडीए) को अटल जी की तुलना में भी श्रेष्ठतर दो तिहाई बहुमत प्राप्त हैं। वहीं मुख्य विपक्षी दल देश के राजनैतिक इतिहास में पहली बार तीन अंको के आकडे़ से घटकर 50 से भी कम पर सिमट गई। यह सब कहने का मतलब यही हैं कि आज जब देश का राजनैतिक नेतृत्व सबसे मजबूत स्थिति मेें हैं जिसने देश के आंतरिक विकास एवं बेहतरी के लिए जीएसटी, नोटबंदी जैसे कई कड़क फैसले लिये हैं, तब देश की सीमा रक्षा व सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों की जिदंगी की सुरक्षा के लिए नरेन्द्र मोदी 56 इंच का सीना अब तक क्यों नहीं दिखा पा रहे हैं, जिसकी डौण्ड़ी बार-बार पीटी जा रही थी।ं ‘‘56 इंच का सीना’’ भी कहीं ‘‘15 लाख का काला धन’’ हर व्यक्ति के बैंक खातो में जमा होगंे वाले जुमले के समान ही दूसरा जुमला मात्र तो नहीं हैं?
वर्ष 2017 का पुनर्रावलोकन करे या कथित प्रथम सर्जिकल स्ट्राईक के बाद से आज तक की देश की सुरक्षा का आकलन करे तो हम पायेगें कि न केवल पिछले वर्ष की तुलना में पाकिस्तान एवं उसके द्वारा निर्देशित आंतकियों द्वारा सीमाओं पर व देश के अंदर आतंकी घटनाओं के उल्लघंन की संख्या अधिक बढी हैं, वरण हमारे सैनिको की शहादत की संख्या भी बढी हैं। यद्यपि दुश्मन देश के मारे जाने वाले सैनिको की संख्या में भी वृद्धि हुई हैं, लेकिन आतंकी घटनाओं की बढ़ी हुई संख्या की तुलना में मरने के अनुपात में कमी आयी हैं। यह बात समझ से बिलकुल परे हैं कि कोई भी घटना के बाद सरकार या मीडिया यह कहते हैं कि बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा, इस शहादत का बदला अवश्य लिया जायेगा। लेकिन कब कैसे व किस सीमा तक? कुछ समय पूर्व ही हमारे एक मेजर व तीन सिपाही शहीद हो गये थे तब भी हमारी मीडिया ने चार दुश्मनो को मारकर बदला लेने की बात की। द्वितीय सर्जिकल स्ट्राइक कही गई व अब तृतीय सर्जिकल स्ट्राइक की बात की जा रही हैं। क्या एक शहीद मेजर की तुलना एक दुश्मन देश के एक दो सामान्य सिपाही को मारने से की जा सकती हैं? मीडिया अति उत्साह में गंभीर घटनाओं का इतने उथले रूप में क्यो लेता हैं। क्या उन्हे अपनी जिम्मेदारी का अंदाजा व अहसास नहीं हैं।        
भारतीय सेना सीमा के उल्लघंन व आतंकवादी गतिविधियों के घटित होने के तत्पश्चात ही रक्षात्मक कार्यवाही करती रही हैं। भारत दुश्मन देश की तरह ही स्वतः भी आक्रमण की कार्यवाही (जवाबी कार्यवाही नहीं) क्यो नहीं करता हैं। यह प्रश्न समझ से परे हैं। खासकर जब लम्बे समय से हमारे विरूद्ध लगातार कार्यवाही हो रही हैं। आत्मरक्षा के लिये आक्रमण ही सर्वोच्च सुरक्षा मानी जाती हैं। अरब, इज़राइल या अफगानिस्तान का मामला ले, जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका न जाने कितने देश हैं जिन्होनें अपने अपने देश की सुरक्षा व सम्मान की खातिर दुश्मन देश के भीतर घुसकर आतंकवादी व दुश्मन सेना को नेस्तनाबूद कर वापिस लौट आई। किसी भी देश ने दूसरे देश के भीतर घुसने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ से पूर्व स्वीकृति नहीं ली या घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने ऐसे देशो पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया। तो क्या अब समय नहीं आ गया हैं जब हमारे राजनैतिक नेतृत्व को भी देश की सम्प्रभुता सुरक्षा व एकता के लिए नई नीति बनाने की तत्काल जरूरत हैं? न कि वर्ष 2022-24 तक इंतजार करने की जैसा कि मोदी सरकार ने कुछ मामलो में टारगेट बनाया रखा हुआ हैं। समय रहते (जो कि वास्तव में गुजरता जा रहा हैं) देश के आत्म सम्मान, गौरव, व सीमा सुरक्षा के लिए एक ऐसा सबक पाकिस्तान को सिखाना निहायत जरूरी हैं ताकि उस पार से होने वाली आतंकी गतिविधियाँ पूर्णतः नष्ट हो जावे और अपने सैनिको की शहादत बंद हो तथा देश व सैनिकों को सुरक्षित निर्भीक जीवन मिल सके। देश के वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व का यह दायित्व हैं कि वे अपने इन कर्तव्यों को शीघ्रता से अमली जामा पहनावे। तभी वे भाजपा के ‘‘अखंड भारत की कल्पना के मूल सिद्धान्त’’ को फलितार्थ करने में एक कदम आगे बढ़ पायेगें। अन्यथा देश की और इस जननी माँ की माटी व सीमा का सम्मान करने वाला दल भाजपा भी यदि इस प्रमुख कार्य को नहीं कर पाएगा तो अन्य किसी दल (जो तुष्टीकरण की नीति पर ज्यादा विश्वास करते हैं) से ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। मीडिया पर सीमा उल्लघंन के द्वारा हुई शहादत के बाद आये समस्त बयान वीरो की एक साथ बाईट दिखलाकर राजनैतिक नेतृत्व को अपना चेहरा आईने में देखने के लिये मजबूर क्यों नहीं करता हैं? या भारत सरकार कम से कम अपने नागरिको को यह विश्वास दिला पाए कि वह दुश्मन राष्ट्र के विरूद्ध सक्षम कार्यवाही कर रही हैं, और मात्र कथन से नहीं वरण सबसे कम निश्चित सीमा में परिणाम जनता के सामने आयेगें, तभी जनता आश्वस्त होगी। 

Popular Posts