शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

‘‘माननीयों’’ से ये उम्मीद तो ना थी?

‘‘शुक्रवार’’ को जब सुबह उच्चतम न्यायालय के चार सबसे वरिष्ठतम् न्यायाधिपतियों (जिनमें एक वर्तमान मुख्य न्यायाधीश के इस वर्ष के मध्यांतर में रिटायर्ड होने के पश्चात वरिष्ठता के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के क्रम में रंजन गगोई भी शामिल हैं) ने प्रेस कान्फ्रेस करके न केवल इस देश के न्यायिक इतिहास में न केवल एक अनचाहा इतिहास रच दिया, बल्कि यह विश्व की शायद एकलौती व अनोखी घटना भी साबित हुई हैं। इस घटना की किसी भी क्षेत्र ने अपेक्षा नहीं की थी। न ही ऐसी आशंका या शंका किसी भी नागरिक या न्याय क्षेत्र से जुडे़ व्यक्तियों, न्यायाधीशगण, वकीलगण, सायल (मुवक्किल) किसी के भी मन में नहीं रही थी। अमेरिका में जहां स्थानीय जज जनता द्वारा चुने जाते हैं, वहां पर भी ऐसे जजो की ऐसी सार्वजनिक उपस्थित शायद ही हुई हो।
उक्त प्रेस कान्फ्रेस में चारो वरिष्ठ न्यायाधीशो ने दो मुद्दो का जिक्र किया था। एक रोस्टर निर्माण संबंधित प्रचलित दो नियमों का न मानना जिसे बेंच हंटिंग कहा जा सकता हैं (जिसे इशारो ही इशारो में कुछ मामले की ओर इंगित किया था) दूसरा मेमोंरेडम ऑफ प्रोसीजर। इन दो विषयांे को उठाते हुये उन्होने कहा था कि उच्चतम न्यायालय का न्यायिक प्रशासन ठीक तरह से कार्य नहीं कर रहा हैं और यदि इसे फौरन सही नहीं किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा। उच्चतम न्यायालय के उक्त (आंतरिक) मामले को प्रेस कान्फ्रेस के जरिये सामने लाने के उक्त कदम के बाबत चारो वरिष्ठतम जजो की ओर से बोलते हुये जस्टिस जे चेलमेश्वर ने इस आधार पर इसे उचित बतलाया था कि मुख्य न्यायाधीश को सहमत न करा पाने के बाद उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था कि हम देश को बताएँ कि न्यायपालिका की देखभाल करें। वरिष्ठतम न्यायाधीश जे चेलमेश्वर ने आगे कहा था कि हम नहीं चाहते कि 20 साल बाद देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति यह कहे कि हम चारो ने अपनी आत्मा बेच दी।
24 घंटे भी नहीं बीते होगें जब उक्त चारो न्यायाधिपति में से एक जस्टिस रंजन गगोई ने यह कहा कि कोई संकट नहीं हैं। वही दूसरे न्यायामूर्ति जोसेफ कुरियन ने कहा कि समस्या का समाधान के लिये बाहरी हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं हैैं। उन्होने जो मुद्दे उठाये हैं, उसका समाधान होगा। उक्त मुद्दे उच्चतम न्यायालय का आंतरिक मामला हैं, जैसा कि लगभग सभी लोग इस मामले में एक मत हैं। मुद्दे की मैरिटस (योग्यता) पर भी कोई प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं हैं, इससे अधिकॉंश लोग सहमत हैं। लेकिन अंततः उच्चतम न्यायालय का यह जब आंतरिक मामला हैं, तब इसे प्रेस कान्फ्रेस के माध्यम से इन जजो ने बाहर क्यो लाया सार्वजनिक (पब्लिक डोमेन) क्यो किया जिससे अनावश्यक रूप से उच्चतम न्यायालय की गरिमा और विश्वसनीयता पर एक दरार क्यों पड़ने दी गई। हो सकता हैं, उच्चतम न्यायालय के इन दो जजो के प्रेस कान्फ्रेस के बाद के कथन से पड़़़ी हुई दरार भर गई हो। लेकिन उस दरार के (अमिट) निशान के लिए अतंतः कौन जिम्मेदार होगा? 24 घंटे में ऐसा क्या हो गया जिसे पब्लिक डोमेन में तो नहीं रखा गया, लेकिन लोकतंत्र खतरे में हैं वह ‘‘भ्रांति’’ दूर हो गई तथा आत्मा बेचने का आरोप का खतरा भी समाप्त हो गया, यह समझ से परे हैं। 
प्रेस कान्फ्रेस के बाद आये दो न्यायमूर्ति के उक्त कथन को क्या उस श्रेणी में लिया जा सकता हैं कि जिस प्रकार आज कोई भी सार्वजनिक व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कोई भी (अ)विवादित बयान देकर बाद में इंकार कर देेता हैं? लेकिन माननीयों से इस आचरण व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती हैं। अंततः जो कुछ हुआ था, वह बिलकुल अप्रत्याशित था, जो अभी हुआ हैं यह भी अप्रत्याशित ही हैं, और भविष्य में इसी आशा के साथ ऐसा अप्रत्याशित न हो। तभी हमारी न्याय व्यवस्था जो लोकतंत्र की रीढ की हड्डी हैं, देश के नागरिको को संविधान द्वारा प्रदत्त संवैधानिक अधिकारो की रक्षा करने वाली हैं, कार्यपालिका विधायिका पर संविधान के बाहर जाने पर रोक लगाने की यह एक मात्र प्रभावी संस्था हैं, जो संविधान की रक्षक हैं। इस न्याय व्यवस्था को चलाने वाली सर्वोच्च संस्था उच्चतम न्यायालय ही हैं जिसका स्वरूप अक्षुण रहेगा तभी वह उक्त समस्त उत्तरदायित्वो को निभाने में सफल होगा। 

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