मंगलवार, 21 जनवरी 2014

क्या ’’आम’’ और ‘‘खास‘‘ के बीच अंतर कम हो रहा है ?


आम आदमी पार्टी ‘‘(आप)’‘ जबसे अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन के सहयोगियो के साथ मिलकर बनाई है तब से ‘‘आम‘‘ और ‘‘खास‘‘ की चर्चा देश के राजनैतिक और सार्वजनिक गलियारों मंे चल पडी है। देश में इस समय एक बडी बहस का मुद्दा यही है कि क्या ‘‘आम’’ आदमी ‘‘खास‘‘ बनने की ओर अग्रसर हो रहा है या ‘‘खास’’ को ‘‘आम‘‘ बनाये जाने का प्रयास किया जा रहा है। वैसे बहस का यह मुद्दा व्यर्थ है। जिस ‘‘आम‘‘ आदमी को लेकर अरविंद केजरीवाल के सहयोगियो, ने ‘‘आम‘‘ पार्टी का गठन किया था और अरविंद केजरीवाल उसके संयोजक बने तो किसी भी रूप में वे भारत देश के ‘‘आम‘‘ के प्रतीक नही थे जिसके लिये पार्टी का गठन किया गया था। एक स्वेच्छा से सेवानिवृत आईएएएस, इंजीनियर, आयकर कमिशनर यदि इस देश का ‘‘आम‘‘ आदमी का प्रतीक है तो निश्चित रूप से यह अरविंद केजरीवाल के उस उच्चतम नैतिक स्तर को दिखाता है उसकी कल्पना वे ‘‘आम‘‘ आदमी की भविष्य मे करते है। वास्तव मे वैसे भी उन्होने ‘‘आम‘‘ का गठन ‘‘आम‘‘ आदमी की मूलभूत समस्या स्वच्छ पानी, पर्याप्त भोजन, रहने के लिए एक मकान, अच्छी शिक्षा, सम न्याय इत्यादि जीवन स्तर को ऊंचा उठाने वाली आवश्यकताओ की पूर्ति के साथ लगभग पूर्णतः भष्ट्राचार मुक्त समाज (जिसके कारण ही ‘‘आम‘‘ आदमी का जीवन स्तर ऊंचा नही उठ रहा है) बनाने का संकल्प लिया है। 
लेकिन पिछले कुछ समय से ‘‘आप‘‘ पर जिस तरह का आक्रमण देश की दोनो बड़ी राजनैतिक पार्टिया सत्ता एवं विपक्ष के साथ प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा हो रहा है, वह क्या हमारी इस प्रवृति को प्रकट नही करता है कि न तो हम खुद कुछ करेगे और न ही दूसरो को कुछ अच्छा करते देखना चाहंेगे। पंद्रह साल के शासन और विपक्ष पर बैठे हुए कांग्रेस और भाजपा से उब कर जब जनता ने ‘‘आप‘‘ के रूप मे एक तीसरा रास्ता अपनाने का प्रयास किया और अनिच्छापूर्वक, अरविंद केजरीवाल ने बिना किसी राजनैतिक साम-दंड-भेद अपनाये एक अल्पमत सरकार का अठठारह मुद्दो पर गठन कर उक्त मुद्दो के क्रियान्वयन के लिए तुरंत कार्यवाही करना भी प्रारंभ कर दिया। इसके बावजूद भाजपा और कांग्रेस द्वारा पंद्रह वर्ष से राजनीति मे अपने उत्तरदायित्व के प्रति जवाबदेही न निभा कर पंद्रह महिने तो छोड मात्र पंद्रह दिनो मे ही ‘‘आप‘‘ से उनके अठठारह सूत्री मुद्दो के क्रियान्वयन पर प्रश्न करना और प्रश्न उठाना न केवल घोर रूप से अनैतिक है बल्कि वास्तविकता के विपरीत भी है। 
बिजली-पानी के मुददे पर केजरीवाल द्वारा बिना समय बेकार किये कुछ कदम उठाकर क्या कुछ समय ‘आप‘ को उन मुददो के पूर्ण क्रियांवन के लिये दिया जाना उचित नही होगा ?खासकर वे पार्टीयॉ जिन्होने पिछले 15 सालो तक उन मुद्दो को सुलझाने के लिए कुछ नही किया हो ?उन्हे तो कम से कम उक्त आलोचना करने का अधिकार नही है ? शीला दीक्षित के भष्ट्राचार के मुद्दे पर भी परिणाम जनक प्रभावी कार्यवाही करने के लिये भी क्या सरकार को रोडमेप बनाने के लिये कुछ समय की आवश्यकता नही होगी ? पन्द्रह वर्ष से तहस नहस हो चुका सरकारी तंत्र मात्र केजरीवाल के शपथ ग्रहण करने से स्वयं से तो ठीक नही हो जायेगा ? निश्चित रूप से इस ‘तंत्र’ को मुद्दो के क्रियान्वयन के लिये प्रभावी व क्रियाशील होने के लियेे पांच वर्षो के लिये चुनी गई सरकार को कम से कम पॉच महीने तो दीजिये? पॉच महीने मे कुछ न कर पाने की स्थिति में जनता स्वयं लोकसभा चुनाव में उन्हे आईना दिखा देगी। लेकिन, प्लीज, भविष्य में एक स्थायी बेहतर परिवर्तन के लिये हमे अभी कुछ समय तक शांत रहकर स्थितियो का मात्र आकलन करना होगा। यदि सहयोग नही तो विरोध भी नही का रास्ता अपनाना होगा।
एक बात और बिना मांग,े दिये गये समर्थन के बावजूद, कांग्रेस की नजर में यदि अभी तक सब कुछ गलत हो रहा है तो वह विरोध का आडम्बर दिखाने के बजाय जनहित में सरकार से समर्थन वापसी की चिट्ठी उपराज्यपाल को क्यो नही लिख देती? कांग्रेस का यह दोहरा राजनैतिक चरित्र न तो अप्रत्याशित है और न ही अस्वाभाविक। इसलिये केजरीवाल ने हमेशा यही कहा कि हमने किसी से समर्थन नही मांगा है। दिल्ली की जनता के हितो के लिये मुद्दो पर आधारित इस सरकार का गठन परिस्थितीजन वश हुआ है जिसे समर्थन तब तक समस्त पक्षो द्वारा दिया जाना चाहिये जब तक वह मुद्दो पर डटी हुई है।
अंत मे नैतिक आधार पर केजरीवाल की आलोचना इस बात के लिये जरूर की जानी चाहिए कि कानून मंत्री सोमनाथ भारती का नैतिक आधार पर इस्तीफा मांगने के बजाय उनके द्वारा न्यायालय के आदेश में कमी बतलाकर भारती का समर्थन किया। यह तथ्य जनता के बीच मीडिया के द्वारा लाया गया कि दिल्ली की पटियाला कोर्ट ने सोमनाथ भारती को एक वकील की हैसियत से गवाह सेे बातचीत को सबूत में छेड छाड करने का नैतिक रूप से दोषी पाया था जिस मुददे पर सोमनाथ भारती द्वारा उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय मे दायर की गई अपील भी अस्वीकार हो गई थी। अर्थात अंतिम रूप से न्यायालय द्वारा उन्हे नैतिक आचरण का दोषी पाये जाने के बाद साहसिक केजरीवाल ने सोमनाथ भारती से इस्तीफा ना मांग कर वह साहस व नैतिक बल का परिचय नही दिया जो उनकी एक बड़ी पहचान थी।मात्र आरोपो के आधार पर इस देश में इस्तीफो के मांग की बाढ़ आ जाती है। लेकिन केजरीवाल ने यह एक भारी नैतिक चूक की है जिसे समय रहते उन्हे उसमें तुरंत सुधार कर लेना चाहिए जैसा की उन्होने ‘बंगले‘ के मामले में एक कदम पीछे हटाकर किया था। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.

Popular Posts