बुधवार, 8 जनवरी 2014

‘‘आम‘‘ की ऐतिहासिक जीत! भाजपा की ऐतिहासिक हार! ‘मन‘ का ऐतिहासिक ‘गुड बाय’

राजीव खण्डेलवाल:
 लगभग तीन वर्ष पूर्व ‘रालेगण’ के ‘‘अन्ना’’ का जन लोकपाल कानून लाने के लिए ‘‘जंतर मंतर’’ पर चला आंदोलन जो पूर्णतः इतना गैर राजनैतिक था कि ‘‘जंतर मंतर’’ पर अन्ना को समर्थन देने आयी साध्वी उमा भारती को भी मंच पर जाने नही दिया गया था।उक्त आंदोलन को दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन का नाम देकर ऐतिहसिक आंदोलन बतलाया गया था। ऐसे ऐतिहासिक गैर राजनैतिक आंदोलन से उत्पन्न राजनैतिक पार्टी ’’आप’’ का गठन होना स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना है। ऐतिहासिक इसलिए क्योकि इसके पूर्व जब भी नई पार्टी का गठन हुआ तो या तो वह पार्टी का विभाजन करते हुए या  राजनैतिक आंदोलन से निकली है जैसे जनता पार्टी,असम गण परिषद,बोडो पार्टी इत्यादि।सार्वजनिक जीवन में लगभग पूर्ण ‘‘सुचिता’’ के सिद्धांत को अंगीकृत करने की बात को स्वीकार करते हुए तेरह महिने पूर्व आप पार्टी का गठन अराजनैतिक स्वेच्छा से सेवानिवृत,नौकरशाह अरविंद केजरीवाल द्वारा अन्ना आंदोलन के अन्य सहयोगीयो के साथ किया गया। 2013 के नई दिल्ली विधानसभा चुनाव मे आप का समस्त आकलन संभावनाओ व चुनावी सर्वेक्षणो को नकारते हुए 28 सीटो पर विजय प्राप्त करना राजनैतिक क्षेत्रो में ऐतिहासिक सफलता  माना गया। 
  कांग्रेस ने बिना मांगे बिना शर्त लिखित समर्थन की चिट्ठी जो उपराज्यपाल को भेजी थी। उसके आधार पर उपराज्यपाल द्वारा भेजे गये निमंत्रण को ‘आप’ द्वारा स्वीकार कर (आप के द्वारा सरकार गठन करने का कोई दावा पेश न करने के बावजूद,) अल्पमत सरकार का गठन करना भी एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ। ऐतिहासिक इसलिए कि केजरीवाल द्वारा लगातार ‘‘न समर्थन देगें न समर्थन लेगें’’ की घोषणा करके सरकार बनाने की अनिच्छा व्यक्त करने के साथ सबसे बडी पार्टी न होने के कारण उसका सरकार बनाने का प्राथमिक दायित्व न होने के बावजूद भाजपा व कांग्रेस के लगातार सरकार बनाने के प्राथमिक स्तर पर आये समर्थन के कथनो के तहत, बिना बहुमत का दावा किये तथा बगैर औपचारिक दावा प्रस्तुत किए, आप की सरकार का बनना आज की पूर्णतः स्वार्थ, पैसा, लालच, लोभ की राजनीति मे एक ऐतिहासिक घटना ही मानी जायेगी। या यह ‘आप’ की उस सफलता का ही प्रभाव है कि विभिन्न पार्टीया तोडफोड व ब्लेकमेल की राजनीति से बचती रही ? 
अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा में जिस तरह से विश्वास मत प्राप्त किया वह भी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सर्वाधिक ऐतिहासिक घटना साबित हुई है।पहले भी भाजपा अल्पमत में रहते हुए सरकार बनाकर उसे बहुमत मे बदल चुकी है। अतः इस बार 32 सीटे प्राप्त कर भाजपा द्वारा सबसे बड़ी पार्टी व गठबंधन होने के बावजूद सरकार बनाने से इन्कार करना ऐतिहासिक न होकर परिस्थितिजन वश उत्पन्न राजनैतिक वास्तविकता व मजबूरी है या जिम्मेदारी से भागना है?भाजपा जिसने दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होते ही आप को सरकार बनाने के लिए यह कहते हुए समर्थन दिया था कि वह विधान सभा में कन्सट्रेक्टिव समर्थन करेगी अर्थात मुददो पर आधारित समर्थन का लगातार कथन किया गया। बार बार सबसे बडी पार्टी होने के बावजूद खुद सरकार न बनाने का दावा कर दूसरी सबसे बडी पार्टी आप को सरकार बनाने के लिए कहा। लेकिन विश्वास मत में अपने किये वादे से पलट कर विश्वास मत के विरोध मे मतदान कर एक ऐतिहासिक भूल की है।अरंविद केजरीवाल की सरकार को गठित हुए मात्र पॉच दिन ही हुए थे और अरविंद केजरीवाल ने अठठारह मुददो पर सदन का विश्वास मत मांगा था जिन मुददेा से न तो भाजपा की असहमति थी बल्कि डां   हर्षवधर््ान द्वारा यह कहा गया कि हम इन मुददो के साथ साथ सौ और मुददो पर भी सदन के बाहर और भीतर कार्य करते आ रहे है।इसके बावजूद सिर्फ ‘विश्वास‘ के प्रस्ताव पर भाजपा जिसने ‘आप‘ के समान न समर्थन देगे न समर्थन लेगे की घोषणा नही की थी बल्कि पूर्व मंे समर्थन का वादा किया था,      विरोध करना ऐतिहासिक राजनैतिक भूल है। यद्वपि डां. हर्षवर्धन का विधानसभा मे भाषण इन परिस्थितियो में भी बहुत प्रभावशाली रहा और उन्होने अपनी गरिमा के अनुरूप भाषण दिया था। 
भाजपा का यह आरोप कि ‘आप’ ने सरकार बनाकर भ्रष्ट कांग्रेस से गठबंधन किया पूर्णतः गलत प्रचार व आरोप है। केजरीवाल का यह लगातार स्टेंड रहा है कि उन्होने न तो किसी से समर्थन मांगा  है न ही दिया है। सदन मे दिल्ली के विकास के मुददे पर समस्त विधायको से  समर्थन मांगा था। न कि पार्टी या सरकार के लिये।इसके बावजूद यदि कांग्रेस ने जनता के मूड को देखकर ‘आप’ को सरकार के बाहर से, बिना शर्त, बिना मांगे समर्थन दिया है तो वह गठंबधन की सरकार कैसे हो गई ?क्या लोकपाल बिल का संसद में समर्थन देने से भाजपा न्च्। का भाग बन गई थी ?यदि नही तो एकतरफ ‘जनादेश’ न मिलने के कारण डां. हर्षवर्धन का सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने से इन्कार करना व दूसरी ओर विश्वास मत के दौरान भाषण में इस बात का दावा कि ईमानदारी के मुददे पर दिल्ली की जनता ने सर्वाधिक मत और सीटे उन्हे दी है तो फिर इस तरह का देाहरा आचरण क्यो ?
 यह ‘‘विश्वास मत’’ इस बात के लिए भी ऐतिहासिक माना जायेगा जहां मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार को बचाने के लिए विश्वास मत के लिए सदन के सदस्यो से सहयेाग नही मांगा बल्कि दिल्ली की जनता के हितो के लिए उनके द्वारा प्रस्तुत किये गये अठठारह मुददे जो उनकी नजर में दिल्ली की जनता के हित मे है के लिए विश्वास मत मांगा जिसका समर्थन कर कांग्रेस ने इस मायने में ऐतिहासिक कदम उठाया क्योकि जिस व्यक्ति को उसने मुददो के आधार पर समर्थन दिया वह उसे लगातार आलोचनाओ द्वारा उत्तेजित कर अपमानित कर रहा था और न ही विश्वास मत के पहले या बाद में उसने उसे धन्यवाद तक दिया। अर्थात केजरीवाल ने असामान्य दिखने वाले कई वास्तविक सत्य (कटु) कार्य संपादित कर इतिहास रचा है।
‘ऐतिहासिक’ होने का एक कारण यह भी है कि रामलीला मैदान में हुआ शपथग्रहण समारोह (यद्धपि इस तरह का यह पहिला आयोजन  नही है)में नामांकित मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री व अन्य सम्मानीयो के शपथ समारोह मंे आने का औपचारिक निमंत्रण न देना, भारी जम्मूहरित की उपस्थित के साथ शपथ ग्रहण के बाद राजनैतिक उदबोधन देने से शपथ ग्रहण समारोह कार्यक्रम भी ऐतिहासिक बन गया। 
 इसी प्रकार ‘मनमोहन सिंह’ ने अगले दिन 2014 मे होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए अपने को दावेदार न बनाकर रिटायरमेंट ‘गुड बाय’ की घोषणा की जो कि भारतीय लोकतंत्र के संसदीय राजनीति में अपूर्व ऐतिहासिक कदम माना जायेगा। क्योकि आज तक देश के किसी भी प्रधानमंत्री ने पद पर रहते हुए भविष्य मे अपने पदत्याग की घोषणा नही की है।
अंत में केजरीवाल व उनके साथियो के बंगले, सुरक्षा व कार पर इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा लगातार दिन भर से जो ऊंगली उठाई जा रही थी, वहा उसी समय भाजपा में कर्नाटक में दागी पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा की वापसी व दो दागी मंत्रीयो का कांग्रेस पार्टी द्वारा सरकार में वापसी का मीडिया द्वारा ‘ट्रायल’ न करना क्या ऐतिहासिक भूल नही है? क्या लाखो करोड़ो के भष्ट्राचार में डूबी राष्ट्रीय पार्टीयो के लिये शायद केजरीवाल का चार कमरो से पांच कमरो के एक डूप्लेक्स मे आने (दूसरा डूप्लेक्स आफिस के लिये)  पर आपत्ति जताने का नैतिक अधिकार भी इन लोगो को है?लेकिन इसके बावजूद केजरीवाल के डूप्लेक्स का सफलतापूर्वक मीडिया ट्रायल हो गया मीडिया क्या अपनी इस ऐतिहासिक भूल को भविष्य मे बार-बार दोहरायेगा! प्रतिक्षा कीजियेे .................................
लेख समाप्त करते करते एक ओर ऐतिहासिक तथ्य सामने आया वह यह कि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में राहुल गंाधी व नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ अचानक अरविंद केजरीवाल का नाम भी प्रधानमंत्री पद की दौड में मीडिया मंे लगातार आ रहा है। केजरीवाल जिनकी पार्टी ‘आप‘ का लोकसभा में एक भी सदस्य अभी नही है व जिनकी प्रदेश दिल्ली जो कि एक पूर्ण प्रदेश भी नही है, में एक मात्र सरकार है, के बावजूद केजरीवाल का नाम आना क्या भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना नही मानी जायेगी ?
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

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