सोमवार, 23 दिसंबर 2013

क्या केन्द्रीय सरकार की नजर मे ‘उच्च न्यायालय‘ ‘उच्चतम न्यायालय’ या विधायिका के ऊपर है ?

 धारा 377 के संदर्भ में कुछ समय पूर्व उच्चतम न्यायालय द्वारा उसे संवैधानिक करार कर अप्राकृतिक यौन संबंध एवं समलैगिकता को अपराध मानने का निर्णय दिया गया था। इस संबंध में आज केन्द्रीय सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में पुर्नःविचार याचिका दाखिल करना न केवल हास्यापद है बल्कि उससे भी ज्यादा हास्यासपद है वे आधार जो केन्द्रीय सरकार ने अपनी उक्त याचिका मे दिये है।
            भारतीय दंड संहिता एक केन्द्रीय कानून है जो 1860 में तत्कालीन विधायिका द्वारा पारित किया गया था। यह सर्वविदित है कि केन्द्रीय कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संसद (विधायिका)को है। कानून की किसी भी धारा को समाप्त करने या उसमें संशोधन का अधिकार भी संसद को ही है। धारा 377 को उच्चतम न्यायालय द्वारा कानूनन् सही और संवैधानिक घोषित करने के बाद यदि केन्द्रीय सरकार की नजर में उक्त धारा जनहित मे नही है, नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है जैसा केन्द्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने उक्त पुर्नःविचार याचिका प्रस्तुत करने के संबंध मे कहा है। तब केन्द्रीय सरकार ने हाई कोर्ट मे दािखल की गई याचिका के पूर्व ही उसे समाप्त करने के लिए संसद मे कोई बिल क्यो नही लाया ? क्या दिल्ली उच्च न्यायालय मे केन्द्रीय सरकार ने धारा 377 को अवैध घोषित करने के लिये याचिका दायर की थी जिस कारण उसे उच्चतम न्यायालय में उसके विरूद्ध निर्णय आने के कारण पुर्नःविचार याचिका दायर करनी पडी ?उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद भी केन्द्रीय सरकार अपने वोटरो के हित मे यह पाती है कि यह धारा नागरिको के हित मे नही है तब भी उसे समाप्त करने के लिए कानून में संशाोधन के जरिये संसद मे बिल ला सकती थी। बजाय इसके उच्चतम न्यायालय के माध्यम से पुर्नःविचार याचिका दाखिल करके उसे अवैध घोषित करने की मंशा न केवल संसद की अवमानना है बल्कि उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को त्यागना या बौना करने जैसे है। 76 बिंदुओ के आधार पर दायर की गई पुर्नःविचार याचिका मे समलैंगिक लोगो को गंभीर अन्याय से बचाने के लिये व कई त्रूटियो के आधार पर टिकाउ निर्णय न होने का मुख्य आधार बतलाया है। यह कृत्य केन्द्रीय सरकार का खुद के सिर पर जूते मारने जैसा कार्य है। क्योकि कानून बनाने का कार्य संसद के माध्यम से सरकार ही करती है उसी प्रकार उसे संशोधन या समाप्त करने का अधिकर भी सरकार के माध्यम से संसद का ही है, उच्चतम न्यायालय का नही।इसलिए अपने द्वारा बनाये गये कानून को सरकार स्वयं जाकर उच्चतम न्यायालय मे यह कहकर की वह सही नही पूर्णतः नैतिकता के खिलाफ है व उसके संवैधानिक उत्तरदायित्व के विरूद्ध भी है। इतना स्पष्ट रूख तो केन्द्रीय सरकार ने उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान दाखिल किये गये शपथ पत्र मे भी नही लिया था।
            उच्चतम न्यायालय में दाखिल की की गई पुर्नविचार याचिका में केन्दीय सरकार का यह तर्क की हाईकोर्ट (उच्च न्यायालय) के निणर्य के बाद वह कानून बन गया था और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से समलैगिक वर्ग को आहत पहुचेगा बहुत ही खतरनाक तर्क है। क्या केन्द्रीय सरकार उक्त कुतर्क देते समय यह भूल गई की इस देश का कानून उच्चतम न्यायालय का निर्णय होता है न कि हाई कोर्ट का निर्णय। यदि हाई कोर्ट के निर्णय के आधार पर कानून का पालन करने की बात की जाय तब बडी अराजकता की स्थिती पैदा हो जोयगी और उच्चतम न्यायालय के अस्तित्व का कोई औचित्य ही नही रहेगा। ऐसा लगता है केन्द्रीय सरकार अपना होश हवास खेा बैठी है और उसका विवेक समाप्त हो गया है। अन्यथा इस तरह की बचकानी हरकत उच्चतम न्यायालय मे पुर्नविचार याचिका दाखिल करके नही करती। अप्राकृतिक यौन (धारा 377) के मामले में केन्द्रीय सरकार का उक्त कार्य उसकी नपुसंकता को ही दर्शाता है। उसमे इतना साहस नही है कि वह उक्त धारा को समाप्त करने के लिए संशोधन बिल या अध्यादेश लाये जैसा कि उसके कई केन्द्रीय नेता उक्त निणर्य के बाद चर्चा कर रहे थेे।

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