बुधवार, 11 दिसंबर 2013

दिल्ली में सरकार गठन का संकट!

क्या वास्तव में दिया गया जनादेश द्वारा उत्पन्न हुआ है?
हाल ही में चार राज्यो में हुए चुनाव में से तीन राज्यो मे ‘‘भाजपा’’ को अप्रत्याशित सफलता (छत्तीसगढ को छोड़कर) प्राप्त हुई है। केंद्रीय राज्य दिल्ली मंे ‘‘आम आदमी पार्टी’’ (आप) की उपस्थिति के कारण भाजपा बहुमत नही पा सही, क्योकि शेष तीनो प्रदेशो में तीसरी शक्तियों नही थी, जैसा कि दिल्ली में थी जिस कारण कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटो का ध्रुवीकरण हुआ। हॉलाकि राजस्थान में किशोरीलाल मीणा की ‘‘राष्ट्रीय प्रजा पार्टी’’ ने तीसरी शक्ति बनने का प्रयास किया लेकिन वह बुरी तरह से असफल हुई। दिल्ली में अगर आकड़ो के दृष्टि से देखे तो किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नही मिला, इस कारण से कोई भी पार्टी सिर्फ अपने बलबूते पर सरकार बनाने में असफल है। आश्चर्यजनक रूप से समस्त राजनैतिक पार्टियो ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर नैतिकता की दुहाई देते हुये न केवल सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया बल्कि सरकार बनाने के लिये बिना मांगे एक दूसरे को सहयोग करने की इच्छा को भी इंकार कर दिया।
इतिहास की बानगी देखिये पूर्व मे दोनो राष्ट्रीय पार्टीयो ने चुनाव में बहुमत प्राप्त न होने की दशा में भी सरकार बनाने का दावा कर सरकार चलाई है। चलती सरकारो को जोड़-तोड़कर, दल बदलकर, या पार्टी में विभाजन करके न केवल गिराया है बल्कि इसी तरीके से सरकारे भी बनाई है व अल्पमत सरकार भी काफी समय (बहुमत में बदलने) तक चलाई है। फिर चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या फिर कोई क्षेत्रीय दल। कल्याण सिंह और जगदम्बिका पाल का उत्तर प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है। जगदम्बिका पाल मात्र एक दिन के लिए मुख्यमंत्री पद की शपथ ले पाये जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने शून्य घोषित कर दिया था। झारखंड में मधुकोडा का उदाहरण भी सामने है जो अकेले निर्दलीय चुनाव जीतकर आने के बाद भी मुख्यमंत्री बन बैठे थे।
केजरीवाल का यह तर्क कि उन्हे सरकार बनाने के लिए जनादेश नही मिला है इसलिए वे सरकार नहीं बनायेगे। आवश्यक संख्या (बहुमत) नहीं मिला लेकिन आवश्यक जनादेश नहीं मिला यह कहना राजनैतिक पटल पर उभर रही परिस्थितियों के विपरित होगा। क्या यह एक राजनैतिक तर्क है, जो भविष्य की राजनीति को देख कर दिया गया  है, या जनादेश का अर्थ अपनी सुविधानुसार निकालने का तरीका है। जैसा की सामान्यतः राजनैतिक पार्टिया करती रही है। वास्तव मे दिल्ली की जनता ने आप पार्टी के विधायक 28 भाजपा के विधायक 31 और 8 विधायक कांग्रेस के लिये चुने है। 8 कांग्रेसी विधायक यदि किसी बात को कह रहे है तो वह उस क्षेत्र की जनता की भावना को ही प्रकट कर रहे है क्योंकि वे जनता के चुने हुये प्रतिनिधि है। जिस प्रकार की 28 विधायक की बात केजरीवाल कह रहे है। जब कांग्रेस ने अरविंद केजरीवाल के समर्थन मांगे बिना किसी शर्त के ‘‘आप’’ को समर्थन देने की घोषणा कर दी है व भाजपा भी इस का स्वागत कर रही है तब सरकार बनाने के लिए उसको स्वीकार न करने का केजरीवाल का तर्क बेमानी सिद्ध हो जाता है। क्योकि आप अपने ऐजेन्डे पर सरकार बनाने जा रही है। ऐसे में यदि कांग्रेस बिना किसी शर्त के समर्थन दे रही है, इसके बावजूद निकट-दूरस्थ भविष्य में यदि किसी मुददे पर कांग्रेस के विधायक ‘‘आप’’ सरकार से समर्थन वापस लेते है तो या तो भाजपा समर्थन देकर या अनुपस्थित रहकर उक्त मुद्दे पर सरकार को बचा सकती है। यदि यह मुददा जनहित मे है या ‘‘आप’’ के ऐजेन्डे में शामिल है। इसके विपरीत भी यदि सरकार राजनैतिक चालबाजी के कारण गिरती है तो गिराने वाला दल को मध्यवर्ती चुनाव में जनता को न केवल कड़ा सबक सिखायेगी बल्कि ‘‘आप’’ को पूर्ण बहुमत देकर अपनी विवेक का परिचय भी देगी।
इसलिए अरविंद केजरीवाल दिये गये जनादेश केा विभाजित करके उसका राजनेतिक अर्थ न निकाले और यदि कांग्रेस जनादेश को देखते हुए बिना किसी शर्त के और बिना आपके मांगे यदि ‘‘आप’’ को समर्थन दे रही है तो केजरीवाल को उन्हे धन्यवाद देकर सरकार बनाकर अपने ऐजेन्डा पर तुरंत कार्य प्रारंभ करना चाहिए क्योकि तब केजरीवाल पर कोई भी व्यक्ति यह आरोप नही लगा सकता है कि उन्हे सत्ता के लिए बेमेल गठजोड़ किया है। 
 वैसे भी संविधान मे यह व्यवस्था है कि सरकार चलाने के लिये विधानसभा में उपस्थित सदस्यों का बहुमत ही सदन में होना चाहिए न कि कल चुने हुए सदस्यो का। इसलिए कांग्रेस और भाजपा दोनो सीधे समर्थन न देकर विधानसभा मे किसी भी मुददे पर परिस्थितिवश अनुपस्थित रह कर या पक्ष में वोटिंग कर अपना दायित्व पूर्ण कर सकते है। जैसा कि मुलायम सिंह यूपीए सरकार के साथ कर रहे है। लेकिन यहां अंतर स्पष्ट है। यूपीए सरकार की सत्ता की मजबूरी है इसलिए उन्हे मुलायम सिंह की कई बार गलत सही बातो को स्वीकार करना पड़ता है। लेकिन अरविंद केजरीवाल चुंकि सत्ता के भूखे नहीं है, जो अभी तक उन्होने सिद्ध भी किया है। भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा होने पर वे जनता के बीच सीधे जाकर  पूर्ण बहुमत के साथ लौट सकते है। तब जनता अपनी गलती स्वीकार कर लेगी। लेकिन जनता को यह अवसर प्रदान तो कीजिए की वास्तव में उसके द्वारा भारी गलती हुई है और कोई परिस्थिति शेष नहीं बची है। यह तभी संभंव होगा जब केजरीवाल जनता से किये वादों को पूरा करने के लिए उक्त बहुमत न होने के बावजूद परिस्थितिजन्य उत्पन्न बहुमत को स्वीकार कर सरकार बनाकर सरकार चलाने का सफल प्रयास करे। इसके बावजूद दोनों राजनैतिक पार्टियों द्वारा भविष्य में उन्हे असफल करने के प्रयास करने पर वे जनता के बीच पुनः चुनाव के लिए जा सकते है।
अंत में जनादेश के बाबद केजरीवाल की व्याख्या को बारीकी से देखा जाय तो केजरीवाल ने जनता के निर्णय को हमेशा सर्वांेपरी माना है। एबीपी न्यूज चैनल द्वारा किए गये सर्वे व अन्य लोगो के विचारो को देखा जाय तो आम जनता भी यही चाहती है कि केजरीवाल सरकार बनाये। इसके बावजूद यदि वे वास्तविक जनादेश न मिलने के नाम पर अड़े रहते है तो उन्हे यह नहीं भूलना नहीं चाहिये कि उन्हे कुल वैध मतो का 50 प्रतिशत मत नहीं मिला है जो ही एक वास्तविक लोकतंत्र है जिसकी लड़ाई वह हमेशा से लड़ते चले आ रहे है। तो उन्हे क्या यह घोषणा नहीं करना चाहिये कि वे 50 प्रतिशत से अधिक वैध मतदाताओं का समर्थन मिलने पर ही सरकार बनायेंगे? केजरीवाल का एक तरफ यह आव्हाहन कि अच्छे लोग अपनी पार्टी छोड़कर हमारा समर्थन देवे लेकिन पार्टियों के समर्थन से परेज भी विरोधाभाषी कदम है जिसका भी जवाब उन्हे जनता को देना होगा। 

(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

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