शनिवार, 9 मई 2015

‘‘अपराध’’ की नई ‘‘परिभाषा’’! ‘कुमार’ ‘विश्वास’ के ‘‘कुमार’’ पर ‘‘पूर्ण‘‘विश्वास’’...! लेकिन..... ?

राजीव खण्डेलवाल:
Domo picture: theguardian.com
हमारे देश भारत में हर कुछ सम्भव है। मीडिया भी किसी भी तथ्य को वास्तविक घटना का रूप देने में पूर्णतः सक्षम है फिर चाहे वह घटना भले ही वास्तविक रूप में घटित ही न हुई हो। पिछले दो दिनो से एक महिला द्वारा कुमार विश्वास के संबध में लिखा गया पत्र (शिकायत ?) जो किसी भी रूप में कुमार विश्वास के विरूद्ध अपराध तो दूर कोई आरोप भी नहीं जड़ता है। पर   इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पुलिस ट्रायल के पूर्व ही मीडिया ट्रायल कर विश्वास को अपराधी घोषित कर सजा तक दे डाली और अब शायद मीडिया का अगला कदम विश्वास द्वारा तथाकथित सजा न भुगतने कि स्थिति पर केन्द्रित होगा?

आखिर उक्त महिला द्वारा पुलिस को दिये गये आवदेन पर प्राथमिक स्ूाचना तक दर्ज कर डाली गई जिसमें यह कथन किया गया है कि कुमार विश्वास आगे आकर कहे कि उक्त महिला से उनका कोई अवैध संबंध नहीं है। इस तरह से सोशल मीडिया में इस तथाकथित अवैध संबंध कोे लेकर झूठी अफवाह फैल रही है जिसे कुमार विश्वास खारिज नहीं कर रहे है। उक्त झूठी अफवाह के कारण उनका दाम्पत्य जीवन टूट गया है और उनके पति ने उन्हें घर के बाहर कर दिया है। महिला का कहीं भी यह आरोप नहीं है कि यह झूठी अफवाह कुमार विश्वास ने फैलायी है। उन्हे व उनके पति का कुमार विश्वास पर इतना गहरा विश्वास है कि उनके कथन (खंडन) मात्र से उनके पति उस (झूठी) अफवाह को झूठी मान लेगें और वह फिर से अपने पति के साथ रहने लग जायेगी। उनके पति का उनकी पत्नी पर ‘‘विश्वास’’ नहीं है जिसे वह स्वयं एक झूठी अफवाह कह रही है बल्कि उसके पति को ‘‘कुमार विश्वास’’ के खंडन पर जरूर ‘‘विश्वास’’ है शायद इसलिए क्योकि उनका नाम ‘‘कुमार’’ ‘‘विश्वास’’ है। पत्नी को भी ‘‘विश्वास’’ पर ‘‘विश्वास’’ है कि उनके खंडन मात्र से पति को अफवाह के संबंध में ‘‘अविश्वास’’ हो जायेगा।  

आपराधिक दंड प्रक्रिया में आरोपित हुये बगैर स्वयं को ही आरोप - हीन सिद्ध करने का यह नया फंडा आखिर पूरी मीडिया को खूब भाया है। इसी कारण से कुमार विश्वास का उसी तरह से चरित्र हनन हो रहा है जिस तरह से उक्त महिला का झूठी अफवाह फैलने के कारण हुआ है। जब महिला खुद मात्र खंडन का विश्वास से अनुरोध कर रही है तब मीडिया स्वयं कुमार विश्वास से सूचक (लीडिग) प्रश्न पूछकर कर उनके चऱित्र हनन का ‘‘ताल ठोक के’’ ‘‘हल्ला बोल’’ कर (मीडिया चेनल के प्रोग्राम) प्रयास क्यों किया जा रहा है। यद्यपि कुमार विश्वास को महिला की इच्छा अनुसार एक सामान्य खण्डन जारी करने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए था। जब महिला खुद अरविन्द केजरीवाल के पास उस अफवाह के संबंध में मिली और अरविन्द केजरीवाल ने इस संबंध में स्वयं तुरन्त खंडन कर दिया तब उसे ही युक्तियुक्त खंडन क्यो नहीं मान लिया जाता है। मीडिया ने सीधे उस महिला के पति से भी सम्पर्क क्यो नहीं किया कि क्या आपने अपनी पत्नी को अपने से अलग कर  दिया है जिसका आधार मात्र वह अफवाह है जो आपकी पत्नी आरोपित कर रही है। पुलिस  भी एफआईआर दर्ज करने के बाद महिला के पति और कुमार विश्वास से इस संबंध में सीधा प्रश्न क्यों नहीं कर रही है। इसका जवाब तुरन्त मिल जाता तो महिला को समाधान मिल जाता, एफआईआर फाईल हो जाती व प्रकरण समाप्त हो जाता तथा मीडिया ट्रायल को भी अपना आयना दिख जाता। 

यहॉ फिर यही प्रश्न पैदा होता है जो प्रश्न अरविन्द केजरीवाल ने उठाया कि मीडिया का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए। जब मीडिया इस तरह से एक नागरिक के व्यक्तिगत प्राइवेसी का   अधिकार व नागरिक अधिकार का हनन कर सकता है तब मीडिया की जवाबदेही व जिम्मेदारी क्यों नहीं निश्चित कीे जानी चाहिए ? जब इस देश के संविधान में विधायिका, कार्यपालिका,न्यायपालिका और मीडिया को लोकंतत्र के चार स्वतंत्र स्तम्भ व एक दूसरे के पूरक मानकर प्रत्येक की जवाबदारी व जवाबदेही निश्चित की गई है तब मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर मीडिया को उच्छ्रंखल नहीं होने दिया जा सकता है। लोकंतात्रिक देश होने के कारण न्यायपालिका और विधायिका के साथ मीडिया की जिम्मेदारी अंततः जनता के प्रति ही होती है। जनता का मतलब भीडतंत्र नहीं हो सकता है। बल्कि प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत स्वंतत्रता व नागरिक अधिकारो की सुरक्षा का दायित्व मीडिया पर भी है, और मीडिया अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता है।

यह आपराधिक दंड सहिंता का अनोखा उदाहरण होगा जहॉ कोई आवेदिका किसी व्यक्ति के विरूद्ध भारतीय दंड सहिता या अन्य किसी अधिनियम के अन्तर्गत आरोप लगाये बिना अनावेदक के साथ मीडिया सहित राजनैतिक पार्टियॉं राजनीति का गंदा खेल खेलकर कुमार विश्वास पर    वे सब आरोप  मढ़ने का प्रयास कर रहे है जो स्वयं आवेदिका नहीं लगा रही है तथा आरोपित हुये बिना व्यक्ति को अपनी सफाई देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। महिला आयोग की अभी तक की गई सम्पूर्ण कार्यवाही के तरीके को भी देखा जाय तो उसमें भी राजनीति की बू ही आती है। जब 21 वी सदी में हर क्षेत्र में विकास हो रहा हो, तब न्याय के विकास की शायद यह एक नई परिभाषा है।       

                               (लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष हैं)   

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