सोमवार, 4 जून 2018

आरएसएस के आमंत्रण की ‘‘प्रणब दा’’ द्वारा स्वीकारिता पर इतना हंगामा क्यों?

‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’’ मुख्यालय नागपुर में प्रत्येक वर्ष संघ तृतीय वर्ष शिक्षा वर्ग के समापन (दीक्षांत समारोह) का आयोजन करता है। इसके अतिरिक्त संघ प्रत्येक वर्ष विजया-दशमी (दशहरा) के शुभ अवसर पर मुख्यालय नागपुर में ही वार्षिकोत्सव का आयोजन भी करता है। इन अवसरो पर संघ देश की विभिन्न प्रमुख हस्तियों को अतिथियों (मुख्य वक्ता) के रूप में बुलाता रहा है। इसी कड़ी में इस वर्ष भारत के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम प्रणब मुखर्जी को संघ द्वारा संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समापन पर प्रमुख अतिथि (वक्ता) के स्वरूप आमंत्रण भेजा गया जिसे प्रणब दा द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। जब मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी! ऐसे मामलों  में निमंत्रण देने व उसे स्वीकार करनेे का अधिकारिक क्षेत्र दोनो पक्षों के अलावा अन्य तीसरे किसी भी पक्ष को टोका टोकी, करने या उनपर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने का अधिकार नहीं है। फिर भी हमेशा की तरह बयानवीरो के इस विषय पर बयान क्यों? यही प्रश्न है।  
राष्ट्रपति बनने के पूर्व प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं में से एक संकटमोचक नेता के रूप में जाने जाते रहे है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम प्रमुखता से लिया गया था। कांग्रेस के वे उन कुछ बिरले नेताओं में से रहे है, जो कट्टर कांग्रेसी होने के बावजूद निष्पक्ष व्यक्ति माने जाते रहे है। वर्ष 1997 में वे उत्कृष्ट सांसद भी चुने गये थे। कांग्रेसी संसदीय दल एवं लोकसभा सदन के नेता के साथ-साथ लम्बे समय तक वरिष्ठ केबिनेट मंत्री होने के कारण भी विरोधी दलो के नेताओं से उनके काफी अच्छे व्यक्तिगत संबंध रहे है। राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार होने के बावजूद उन्हे इसका फायदा भी मिला था। यद्यपि  उन्होने कांग्रेस छोड़कर कुछ समय के लिए एक नई प्रादेशिक पार्टी राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के नाम से बनाई थी, जिसका बाद में वर्ष 1989 में पुनः कांग्रेस में विलीनीकरण हो गया था। अर्थात् एक सुदृढ़ कांग्रेसी नेता होने के नाते कांग्रेस की सत्ता की नाव को ‘‘दादा’’ ने अपने मजबूत कंधों पर नाविक के रूप में अपने ‘‘नेता’’ को काफी लम्बे समय तक हवा की विपरीत दिशा में भी अपने कौशल व अनुभव से पूर्ण निष्ठा पूर्वक निभाया और सफलता दिलाई थी।
ऐसे दृढ़ निष्ठा वाले समर्पित पूर्व कांग्रेसी नेता प्रणब दा के द्वारा आरएसएस के निमंत्रण को स्वीकार कर लिए जाने पर कुछ कांग्रेसी नेताओं की ओर से जैसे अवमानना पूर्ण और अशोभनीय बयान आ रहे है, वे अत्यन्त खेद जनक है। यद्यपि कांग्रेस पार्टी की अधिकारिक प्रतिक्रिया ‘‘कोई टिप्पणी नहीं’’ ‘‘(नो कमेंटस’’) थी, जो स्वागत योग्य है। आलोचक कांग्रेसी सदस्य आलोचना करते समय इस बात को भी भूल गये कि प्रणब दा ने मुखर्जी फाउडेशन के शुरू होने के अवसर पर संघ के शीर्ष नेताओं को बुलाने के अलावा अपने राष्ट्रपति पद के कार्यकाल के अंतिम समय में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में दोपहर भोज के लिये भी आमंत्रित किया था। प्रथम दृष्ट्या तो किसी भी कांग्रेसी को यह समझना आवश्यक है कि जब पार्टी का कोई सदस्य राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पहंुच जाता है तो उसके बाद न केवल पद पर विराजमान रहने तक वह पार्टी का सदस्य नहीं रहता है बल्कि संवैधानिक पद से विमुक्त होने के बाद भी उसकी स्थिति वैसी ही बनी रहती है। यह एक स्थापित मापदंड है कि नैतिक रूप से सर्वोच्च संवैधानिक पदों जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल के पदो से पदमुक्त होने के बाद भी वह (पदविमुक्त) व्यक्ति पार्टी का मूल सदस्य न रहकर (संवैधानिक पद की गरिमा को बनाये रखने के उद्देश्य से) वह राष्ट्र का गैर राजनैतिक नागरिक हो जाता है। नैतिक रूप से राजनैतिक पार्टी का सदस्य न होने के बावजूद उसकी स्वयं की राजनैतिक विचार धारा हो सकती है। लेकिन वह सक्र्रिय राजनीति में भाग नहीं ले सकता। इस दृष्टि से पूर्व राष्ट्रपति, कांग्रेस पार्टी की नहीं राष्ट्र की एक धरोहर है। 
राजनैतिक दृष्टि से किसी विशिष्ट विचार धारा को मानने के बावजूद, अन्य किसी विपरीत विचार धारा द्वारा दिये ऐसे आमंत्रण को स्वीकार कर लिए जाने पर कोई आलोचना नहीं होनी चाहिये। इसके विपरीत बयानों द्वारा विवेचना हो रही है जिसका एक ही अर्थ निकलता है, कि अब कांग्रेस को अपने नेता प्रणब दा पर शायद यह विश्वास नहीं रह गया है कि वे कांग्रेस विरोधी विचार धारा आरएसएस के कार्यक्रम में जाकर अपनी कांग्रेसी विचार धारा को बनाये रख पायेगें। अर्थात ‘‘दा’’ कहीं अपनी पहचान तो नहीं खोने जा रहे हैं? लेकिन प्रणव दा इतने हल्के है नहीं।  विचार धाराओं की टकराहट के बावजूद यदि संघ ने दा को अपने मंच पर बुलाकर विचार प्रकट करने का मौका दिया है, तो यह संघ की व्यापक सोच व बड़प्पन का ही परिचायक है। साथ ही प्रणब दा भी बधाई के पात्र है जिन्होने उक्त सम्मानीय निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। लेकिन कुछ कांग्रेसियों की मनोदशा का निम्नस्तर उनके बयानो से समझा जा सकता है।
कांग्रेसियों को एक बात को और समझना होगा। संघ द्वारा एक ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठित कांग्रेसी व्यक्तित्व को बुलाने में कोई परहेज न करने के बावजूद संघ में अंदर खाने यदि कोई संकट खंडा नहीं हुआ है, तो कांग्रेस महात्मा गांधी की 150 जयंती के अवसर पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित करके संघ प्रमुख को मुख्य वक्ता के रूप में बुलाने (दुः) साहस का परिचय देकर माकूल जवाब क्यों नहीं देती? संघ की विचार धारा से उनका विरोध तो हो सकता है। वे उससे सहमत भी नहीं हो सकते है, और यह उनका पूर्ण अधिकार है। लेकिन उन्हे इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आज भाजपा का 21 राज्यों पर पूर्ण या गठबंधन के माध्यम से शासन है। अर्थात् अपरोक्ष रूप से संघ का ही शासन है, क्योकि कांग्रेसियो ने ही खूब पानी पी पीकर लम्बे समय से यही कथन किया है कि संघ सांस्कृतिक संगठन नहीं है बल्कि उसका एक राजनैतिक संगठन है व संघ ‘‘रेशमबाग’’नागपुर से ही भाजपा को निर्देशित करते हुए देश में भाजपा का शासन संचालित करता है। ये जुमले सुनते-सुनते हमारे कान पक गये थे। अब देश के दो तिहाई से अधिक भाग पर शासन करने वाली भाजपा को निर्देशित करने वाले संघ के निमंत्रण को स्वीकार करके प्रणब दा ने देश के बहुमत को ही मान दिया है, जिसके लिये निश्चित रूप से वे साधुवाद के पात्र है। 
कांग्रेसियो को एक सलाह और है कि वे अपने नेता प्रणव दा की योग्यता, ज्ञान, वाकपटुता, विचार मंथन, राजनैतिक व सार्वजनिक जीवन के दीर्घ अनुभवों व तीव्र बुद्धि पर पूर्ण विश्वास रखे कि ‘‘रेशमबाग’’ में उद्बोधन के बाद वे संघी होकर नहीं निकेलेगें। हाँ शायद दोनो विचारधाराओं में जो फरक 36 के आकड़े का है, उसमें देश हित में कुछ अंतर, व दूरी अवश्य कम होगे, क्योकि ऐसे आयोजन का अंततः उद्ेश्य भी यही होता है।
मुझे याद आता है जब डॉ. सुनीलम समाजवादी विचार धारा वाले पूर्व विधायक के मंच पर जाने का मुझे निमत्रंण मिला था। तब कई साथी मेरे वहां जाने को पचा नहीं पा रहे थे। तत्समय  मैने अपने साथियों से यही कहा था कि वहां जाकर मैं दृढ़ता से अपनी बात को रखकर उन्हे संदेश देने का प्रयास करूगाँ। विश्वास रखिये, सुनीलम का रंग मेरे ऊपर नहीं चढेगा, और शायद मेरे उद्बोधन को सुनने के बाद सुनीलम दुबारा मुझे नहीं बुलाएगें। आज यही विश्वास प्रत्येक कांग्रेसी को डॉ. प्रणब मुखर्जी के प्रति रखना चाहिए। 

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