मंगलवार, 22 मई 2018

‘‘बयान वीरो’’ के ‘‘बिगड़े बोल’’ पर ‘‘प्रतिबंध’’ के लिए ‘‘कानून’’ कब तक?

 आज कल ‘‘मीडिया’’ में ‘‘शर्मनाक’’ ‘‘विवादित’’ ‘‘बिगड़े बोल’’ की बहार आई हुई है। यह लगभग एक फैशन सा बन गया है और जो भी इस ‘‘फैशन’’ में भागीदार नहीं हो पाते है, उन्हे अपने ‘‘पिछड़े हुए’’ या ‘जड़ या रूढिवादी’ होने की ‘‘पदवी’’ मिलने की आशंका बनी रहती है।
यूँ तो पिछले काफी समय से यह देखा जा सकता है कि नेतागण ‘‘बिगड़े बोल’’ बोलकर और मीडिया को अपने ऊपर केन्द्रित करके उसे हथिया लेने में सफल हो जाते है। मीडिया भी जाने अनजाने में उनकी ऐसी धूर्ततापूर्ण करतूतों का शिकार बनते जा रहा है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में बयान वीरों द्वारा मीडिया को अगवा किये जाने की घटनाएँ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। या यूँ कहा जाय की यह मर्यादा की सीमा का उल्लघंन होते जा रहा हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
स्वतंत्रता को न केवल स्वच्छन्दता की सीमा तक वरण संवैधानिक सीमा से परे तो कतई हीं नहीं पहुँचाया जाना चाहिए। हर चीज की सीमा के समान ही व्यक्ति की स्वतंत्रता की अधिकतम सीमा भी बिगड़े बोल की प्रारंभिक सीमा तक ही सीमित है। आज जब साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाले, शांति भंग करने वाले, देशद्रोह की सीमा में आने वाले समस्त कथन ‘अपराध’ की श्रेणी में आते है तब ऐसे वक्तव्य जिन्हे समस्त जन मानस अनावश्यक व अनर्गल मानकर उसकी आलोचना कर रहा होता हैं, तभी ऐसे बयान वीर उक्त वक्तव्यों से या तो मुकर जाते है या यह दर्शाने लगता है कि उनके कथनो को मीडिया द्वारा गलत ढंग से पेश किया जा रहा है या उनकेे कहने का यह मतलब नहीं था, या उनके कथन का गलत अर्थ निकाला जा रहा है, या उसने ऐसा नहीं कहा, या प्रस्तुत कथन उस व्यक्ति का व्यक्तिगत वक्तव्य है, तथा वह कथन पार्टी या संगठन का मत नहीं है। असहनीय हो जाने की स्थिति में या अंत में ज्यादातर मुददों में प्रायः वह वक्ता माफी का रास्ता अपना लेता है तब ऐसे विवादित, गैर-जिम्मेदाराना बयानों के लिये व्यक्तिगत अथवा संस्थागत (यदि वह प्रतिनिधी रूप में देता है) कानून में कड़क सजा का प्रावधान क्या आज के समय की सभ्य समाज की आवश्यकता नहीं है। सजा भी ऐसी कड़क हो, ताकि बयानवीर लोगों को ऐसे बयान देने में पसीना छूटने लगे ताकि कि वेे हृदयघात के ड़र से भयभीत होकर ऐसे बयान देने से पीछे हटने लगें। कठोर सजा का प्रावधान कई कानूनों में आज कल किया जा रहा है। जैसे ‘‘पास्को कानून’’ में अभी हाल में ही दंड का प्रावधान किया गया हैं व अन्य क्षेत्रो में भी ऐसी ही कड़क सजा के प्रावधान किए जाने की मांग उठती जा रही है। 
ऐसे बयान जो देश को गुमराह करते हो, ऐसे बयान जो युवा पीढ़ी का अंधेरे में डाल देते हो, ऐसे बयान जो सामाजिक सौहार्द को खत्म कर देते हो, ऐसे बयान जिनसे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती हो, ऐसे बयान जो धार्मिक भाईचारे की कब्र खोद देते हो, ऐसे बयान जो देश में अविश्वास की खाई पैदा कर देते हो, ऐसे बयान जो जीवन की सहज, सरल, स्वाभाविक व्यवस्था को समाप्त कर देते है, तब ऐसे अनर्गल बयानों को भी दंड प्रक्रिया संहिता, भारतीय दंड प्रक्रिया के अधीन लाकर दंडनीय अपराध बनाना समयाचीन व सर्वथा उपयुक्त होगा। 
क्या आज उपयुक्त समय नहीं है, जब ऐसे शर्मनाक बिगड़े बोल का संज्ञान योग्य अपराध की श्रेणी में लाकर उपयुक्त कानून बनाया जाये? विशेषकर ऐसी स्थिति में जब विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हमारे भारत में विश्व के अन्य देशों की तुलना में एक नागरिक के जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन को सुव्यवस्थित, मर्यादित, सामाजिक, व संवैधानिक बनाने के साथ-साथ स्वतंत्रता के मूल सिंद्धान्त के लिए भी कानून बने हुए है। हमारे जीवन का हर पल व प्रत्येक संास (विभिन्न कानूनों द्वारा) निर्धारित सीमा से बंधी हुई है, जैसे की ‘‘दाये चलिये’’, ‘‘थूकना मना है’’, ‘‘धूम्रपान वर्जित है’’, ‘‘निधारित शांति क्षेत्र है’’, ‘‘हेलमेट पहनना आवश्यक है’’, ‘‘कार बेल्ट बाधना आवश्यक है’’, रात्रि 11 बजे के बाद डीजे बजाना वर्जित है’’ इत्यादि- इत्यादि। अतः इक्कीसवीं सदी में उत्पन्न ऐसे नये अपराध के लिए भी एक विशेष कानून बनाने की अत्यन्त आवश्यकता है, यह एक गंभीर सोच का विषय है। कुछ क्षेत्र के तथाकथित नगण्य मानवाधिकारियों के द्वारा यह कहा जा सकता है कि ‘‘यह तो स्वतंत्रता पर चोट होगी’’ या यह मूलभूत अधिकारो का हनन होगा। यहां पर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता व स्वच्छन्दता में भारी अंतर है।
प्रत्येक नागरिक को संवैधानिक सीमा में रहकर बोलने व अपने विचारो को व्यक्त करने की स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है। लेकिन किसी भी मूल अधिकार के समान बोलने की स्वतंत्रता का मूल अधिकार भी संवैधानिक कर्तव्यों व नीति निर्देशक सिद्धान्तों के साथ-साथ उन समस्त सीमाओं में बधा हुआ है, जो देश के सामाजिक ताना बाना व देश की गरिमा को बनाये रखती है। इसलिए इन सबकी गरीमा को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए एक विशेष कानून की अत्यावश्यकता है, जो बयानों की सीमा तय करे और उसके लांघने वालो के लिए उसे संज्ञेय अपराध बनाएगा।  यद्यपि हमारा यह भी अनुभव है कि सर्वसम्मति होने के बावजूद महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में अभी तक लम्बित है व आज तक संसद से पारित होकर कानून नहीं बन पाया है। इसी तरह इस मुद्दे पर भी समस्त राजनैतिक दल शायद ही एक मत हो पाएँ। क्योकि यहाँ हमाम में सब नंगे हैं। इसलिये वे स्वयं के ऊपर प्रतिबंध लगाना-क्यों कर पसंद करेेंगे। इसके लिये तो जनता जर्नादन को ही आगे आना होगा। 

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