सोमवार, 13 दिसंबर 2021

अंतिम समय तक ‘‘टिककर’’ टिकैत ने नाम को ‘‘सार्थक’’कर ‘‘गोल’’ प्राप्त किया।

 

संयुक्त किसान मोर्चा (एस.के.एम) का सबसे प्रमुख चेहरा और अखिल भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत इस पूरे 1 साल से अधिक समय (378 दिन) 26 नवंबर 2020) से चले आ रहे किसान आंदोलन में एक नये लुक व व्यक्तित्व के रूप में उभरकर सामने आये हैं। जो आजकल प्रायः सामान्यतः आंदोलनकारियों नेताओं या राजनेताओं में "दुर्लभ में से दुर्लभतम" में भी देखने को नहीं मिलता है। पूर्णतः ग्रामीण परिवेश से भरपूर, सिर्फ पहनावे में ही नहीं, बल्कि बातचीत का लहजा और शब्दों व वाक्यों का चुनाव और प्रश्नों के उत्तर में सामने वाले को अचभिंत करने वाले प्रति प्रश्नों से भरपूर राकेश टिकैत जैसा व्यक्तित्व अभी तक के किसी भी आंदोलन में शायद ही देखने को मिला हो। राकेश टिकैत का यह व्यक्तित्व उनके पिता स्व. श्री महेन्द्र सिंह टिकैत से भी थोड़ा हट कर है। महेन्द्र सिंह टिकैत निर्विवादित खाँटी ग्रामीण किसान नेता रहे। लेकिन जैसा कि कहते हैं न कि "आदमी से बड़ी उसकी परछाईं होती है", राकेश टिकैत ने पिताजी के व्यक्तित्व के साथ एक राजनेता के भी गुण भी अपने में विकसित किये। इसी कारण वे पिताजी की प्रवृत्ति व प्रकृति के विपरीत चुनाव भी लड़ चुके है। इसलिये वे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे धुरंधर, मजबूत, चाण्क्य कहे जाने वाले नेताओं को शांतिपूर्वक, बिना बड़बोलापन दिखाये, अपनी उंगली पर नाच नचाते दिखते हुये दिख रहे है और आभास करवा रहे है। उनके व्यक्तित्व की एक छोटी सी बानगी को आगे उद्हरण से आप अच्छी तरह से समझ सकते है।

पत्रों के द्वारा संवाद और टेबिल पर बैठकर संवाद के बीच के बारीक व महत्वपूर्ण अंतर को जितना बढ़िया रेखांकित राकेश टिकैत ने किया है, वह उनकी एक आंदोलनकारियों नेताओं के रूप में ही नहीं, बल्कि उनकी छवि एक मजे हुये राजनेताओं के रूप में उनके व्यक्तित्व को प्रर्दशित करती है, जो यह दिखाती है कि "लाल गुदड़ियों में नहीं छुपते"। 11 वें दौर की आखरी बातचीत 22 जनवरी के बाद, लम्बा समय व्यतीत होने के बाद,‘‘एस.के.एम'. द्वारा दिये गये 6 सूत्रीय मांगों के पत्र के जवाब में सरकार से जवाबी पत्र प्राप्त होने के बाद उस पर संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में चर्चा उपरांत किसान आंदोलन के समाप्ति के शुभ संकेत दिखने लगे। बावजूद मामला अगले दिन 24 घंटे के लिये टल गया। यानी "हाथी निकल गया लेकिन पूंछ अभी नहीं छोड़ी" है। पत्रकारों द्वारा राकेश टिकैत से यह पूछने पर कि क्या आंदोलन अगले दिन बैठक होने के बाद समाप्त हो जायेगा? तब राकेश टिकैत का यह नपा-तुला जवाब उसके व्यक्तित्व को निखारता है कि सरकार टेबिल पर अभी हमारी पांच  सदस्ययी कमेटी को बुलाकर बैठाल ले, बातचीत के दौरान जो कुछ शंका है या होगी,  वह दूर हो जायेगी, आंदोलन समाप्त हो जायेगा। सरकार सिर्फ पत्राचार के द्वारा ही संवाद क्यों करना चाहती है? सरकार यदि तुरंत आंदोलन समाप्त करना चाहती तो, विचार करने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी को अभी ही बुला लेती? बार-बार पत्रों का आदान-प्रदान कर समय जाया नहीं करती। परन्तु अभी भी सरकार ने एस.के.एम. द्वारा मांगे गये स्पष्टीकरण का मात्र जवाब भेजा है, लेकिन बुलावा अभी भी नहीं भेजा है। यही सबसे बड़ी चूक भाजपा, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व कृषि मंत्री के स्तर पर परिलक्षित हो रही है। कारण स्पष्ट दिखता है! सरकार टेबिल पर बैठकर पूरी तरह सरेंड़र होते हुए  न दिखने (मोड) के कारण तथा पूरा श्रेय संयुक्त किसान मोर्चा को न मिल जाए, उस कारण से इस मामले में एक ओर जहां लगातार 11 दौर की टेबिल पर हुयी बातचीत के  पश्चात आश्चर्यजनक रूप से विपरीत आचरण कर सरकार ने "अंगारे सिर पर धरे होने के" बावजूद भी सीधे बैठकर संवाद करने से अभी तक परहेज रखा, शायद उसका ही यह दुष्परिणाम सरकार के खाते में आ रहा है। सब कुछ देकर, लूटकर भी हम बेगाने हो गये। "न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम"।

सबसे बड़ा अनपेक्षित महत्वपूर्ण कदम तीनों कृषि कानून की वापसी उठाये जाने के बावजूद, चूंकि वह कदम एकतरफा आकाशवाणी के माध्यम से घोषित किया गया था, उसका वह सकारात्मक परिणाम व फायदा सरकार को नहीं मिला, जो टेबिल पर बातचीत के दौरान मांगों के संबंध में लेन-देन कर संयुक्त घोषणा किये जाने कि स्थिति में निश्चित रूप से मिलता। उक्त गलतियां होने के बाजवूद अभी भी सरकार संवाद का पत्राचार का माध्यम चुनने की वही गलती बार-बार दोहरा रही है। यह सरकार का ही तो कमिटमेंट (प्रतिबद्धता) था कि वह एक फोन दूर पर संवाद के लिए तैयार बैठी है। लेकिन दुर्भाग्यवश राकेश टिकैत के पास शायद वह फोन नम्बर नहीं था या अन्यथा कहीं न कही विश्वास की कमी जरूर रही, जो सरकार की तरफ से आयी चिट्टी पर टिकैत का यह दुर्भाग्यपूर्ण कथन कि उसका ग्यारंटर कौंन? प्रश्न पूछने से उभर कर सामने आती है। मुद्दे की बात यह है कि राकेश टिकैत ने सरकार को हर बार टेबिल पर चर्चा हेतु बुलाने के लिए न्योता देने को कहा, लेकिन सरकार ने इससे दूरी बनाये रखी, यह समझ से परे है।

इस किसान आंदोलन ने कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों, मूल्यों को स्थापित किया। सर्वप्रथम यह शायद देश का ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे लम्बा सफल किसान आंदोलन रहा। सामान्यतः किसी भी आंदोलन से निपटने का मूल मंत्र "दीर्घ सूत्री विनश्यति" अर्थात आंदोलन को लम्बा खिचाने की प्रकिया/परिस्थितियां पैदा करो। समय की मार से आंदोलन स्वतः मर जायेगा। याद कीजिये यहां पर राकेश टिकैत ने आंदोलन के प्रारंभिक दौर में ही कुछ समय बाद ही उन्होंने यह कहना प्रारंभ कर दिया था कि हम अपनी मांग पूरी लेकर मनवाकर ही जायेंगे, चाहे आंदोलन एक साल क्यों न चले। यहां उनकी दूरदर्शिता, "अंगद के पांव की तरह" की दृढ़ता व भविष्य के खाके (योजना) का आभास होता है। इस आंदोलन की दूसरी विशेषता यह रही कि इतना लम्बा और 700 से ज्यादा लोगो को अकाल मृत्यु के काल में जाने के बावजूद आंदोलन में 26 जनवरी को हुई तथाकथित हिंसा व अन्य कुछ छुट-पुट घटनाओं को छोड़कर (समस्त हिंसक घटनाओं से एस.के.एम.ने अपनी जिम्मेदारी से हाथ खडे़ कर दिये थें) 700 लोगों की मृत्यु से आंदोलन में कही भी उत्तेजना फैली नहीं, यह एक बड़ी गंभीर व दिल को शांति देने वाली बात रही। जबकि कहा यह जाता है कि "क्राउड नोज़ नो लाॅ"। किसान नेताओं को इसका श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिये। साथ ही सरकार को भी इस शांति बनाये रखने का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए, क्योंकि सरकार भी बिना उत्तेजित अत्याधिक धैर्य धारण करते हुये आंदोलनकारियों के विरूद्ध कोई हिंसा या बल प्रयोग नहीं किया। (लखमीपुर की घटना मूलतः व्यक्तिगत थीं।)

तीसरी महत्वपूर्ण बात आंदोलन प्रारंभिक चढ़ाव के बाद खासकर 26 जनवरी की हिंसक घटना के बाद जब उतार पर रहा अर्थात दिल्ली की तीनों बॉडर तक ही सीमित रहा जैसा कि सरकार व कई अनेक क्षेत्रों मेें बताया जाने लगा। इसे राष्ट्रीय आंदोलन मानने से इंकार तक कर दिया गया। तब भी उतार के अंतिम दौर में भी "संघे शक्ति: कलौयुगे" की उक्ति को चरितार्थ करते हुए किसान अंततः अपनी बात मनवा कर ही रहे। मतलब या तो सरकार का आंदोलन के बावत आंकलन गलत था या संख्या भले ही आंदोलनकारियों की कम रही हो, लेकिन एक ऐसा परसेप्शन देशव्यापी, जरूर उत्पन्न हो रहा था जिसकी गरमी भले ही सरकार ने देर से महसूस की (शायद आगामी चुनाव आने के कारण) जिस कारण, से सरकार को आंदोलन के उतरते दौर में भी "अटका बनिया देय उधार" की तर्ज़ पर मांगे लगभग संपूर्ण माननी पड़ी। इस प्रकार सरकार की पूरे आंदोलन के दौरान विफलता का मुख्य कारक राकेश टिकैत की बे-लगाम लेकिन अर्थ पूर्ण और सरकार के दिल में ड़र-कम्पन्न पैदा करने वाले कथन रहे। जिसके कारण ही सरकार ने "सौ कोड़े भी खाये और सौ प्याज़ भी", और राकेश टिकैत आंदेालन को अपने अंतिम उद्देश्यों की पूर्ण पूर्ति की ओर ले जाने में सफल रहे। इसलिये समस्त आंदोलनकारियों नेताओं में यदि किसी एक व्यक्ति को इस आंदोलन की सफलता का श्रेय दिया जा सकता है, तो वह आंदोलन के दौरान रोता हुआ आंखो से आंसुओं से टपकता हुआ भीगा राकेश टिकैत का चेहरा ही था। इस आंदोलन की एक विशेषता यह भी रही कि कमोवेश विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के द्वारा उसे हथियाने, हथियार बनाने व अपना ही राजनैतिक हित साधने के लिए अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने के प्रयास को आंदोलनकाररियों नेताओं ने प्रायः असफल कर दिया। 

इस आंदोलन का एक और महत्वपूर्ण व मजबूत उल्लेखनीय बात यह भी रही है कि वे अकेले राकेश टिकैत ही थे, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक आकाशवाणी से तीनों कृषि कानून की वापसी की घोषणा किए जाने पर अनेक किसान नेताओं सहित अनेक क्षेत्रों में आंदोलन समाप्ति की अटकले तेजी से लगनी शुरू हो गई थी, तब भी राकेश अड़िग रहे, अटल रहे और आंदोलन समाप्ति पर उनका अपने चिर-परिचित शैली में यही जवाब रहा, जब हमारी शेष मांगों का संतुष्टि पूर्ण समाधान हो जाएगा, तभी घर वापसी होगी। और अंततः यह भी हो भी गया। देर आये दुरूस्त आये की तर्ज पर अंत में समस्त पक्षों को समझदारी दिखाने के लिए बधाई। "अंत भला तो सब भला"।

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