शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

निर्मल भारत !स्वतंत्र भारत! स्वच्छ भारत!‘‘नरेन्द्र‘‘ का आव्हान....

   प्रधानमंत्री ने 2 अक्टूबर को गांधी जयन्ती व शास्त्री जयन्ती के अवसर पर‘‘झाडू‘‘लगाकर स्वच्छता महाअभियान की शुरूआत कर और 3 अक्टूबर को आकाशवाणी के द्वारा देश की 95 प्रतिशत से अधिक जनता को अपने मन की बात कहकर ‘‘नरेन्द्र‘‘ (विवेकानन्द) बनने की ओर एक और सकारात्मक दृढ कदम उठाया हैं। देश का दुर्भाग्य ही यह है कि ‘‘मन‘‘‘मोहने‘‘ वाले कभी भी अपने नाम को सार्थक नहीं कर पाये व 10 वर्षं के लम्बे कार्यकाल मे ‘‘ंमन‘‘की बात ‘‘मन-मोहन‘‘नही कर सके जबकि‘‘नरेन्द्र‘‘ ने 100 दिनों से थोडा अधिक की   अवधि में ही अपने मन की बात ‘आकाश‘‘-‘वाणी के रूप में जनता के मन में उतार दी।
    स्वाधीनता आन्दोलन के अतिरिक्त गांधी जी की पहचान मुख्य रूप से दो कार्यो से होती रही है। एक‘‘अहिंसा‘‘ और दूसरा ‘‘स्वच्छता के प्रति दृढ कार्य विश्वास‘‘ व उसे सर्वप्रथम स्वंय पर लागू करना। इसी प्रकार लालबहादुर शास्त्री की पहचान भी मुख्यतः दो रूपों मे होती है।एक उनका नारा जय जवान जय किसान (जो बहुत प्रसिघ्द भी हुआ )और दूसरा देश में अनाज की बचत के लिये सप्ताह में एक दिवस का उपवास का आव्हान।इस उपवास के पीछे भी शरीर एवं आत्मा की शुध्द़ता व स्वच्छता का भाव स्वयंमेव ही जुडा हुआ है। देश की बहुसंख्यक जनता भी ‘‘जय जवान से जय किसान‘‘ के बीच मे लगमग शामिल हो जाती है। इस प्रकार 2 अक्टूबर को नरेन्द्र मोदी ने देश के नागरिको को देश की स्वच्छता अभियान मे सक्रिय रूप से शामिल होने का आव्हान कर दोनो महापुरूषो को समाहित कर लिया है।मोदी की एक खूबी यह भी रही है कि वे जब भी जनता के बीच किसी भी मुददे को लेकर प्रस्तुत होते है तो वे उसे जनता के मन मे इतना गहरा उतारने का प्रयास करते है कि वे जन-मुददे बनकर व वजनदार होकर उनके(मोदी के) स्वंय के मुददे (एजेन्डा)न रहकर वे सम्भावित राजनैतिक आलोचनाओ से बच जाते हैं। 
स्वच्छता अभियान केे प्रारम्भ मे ही मोदी ने उन आशंकाओ को भी व्यक्त कर दिया कि इस मुददे पर कोई‘‘राजनीति‘‘नहीं की जानी चाहियें। इसे राजनीति से दूर ही रखें। लेकिन यह देश राजनितिज्ञों का है, मोदी खुद राजनैतिक है,और हमारे राजनितिज्ञो के कण-कण, तन मन मे राजनीति समाहित है।ं आलोचना करना हमारा जन्म सिघ्द-राजनैतिक-मूलभूत-अधिकार है।ऐसी मान्यता के रहते राजनीति तो होनी ही है, चाहे वह देश को आगे ले जाने वाले अच्छे कार्य के लिये ही क्यों न होे। आलोचक तो आलोचना करेंगें ही और उस पर राजनीति भी करेंगें, जो दिख भी रही है।इसीलिये शायद किसी ने सत्य ही कहा है कि आलोचको का कभी स्मारक नहीं बनता है। शायद इसी सत्य को भॉपकर मोदी ने पूर्व मंें ही चेतावनी दे दी थी।
         वास्तव मे यदि देश को स्वच्छ करना है और बनाये रखना है तो हमे रोग का इलाज करने के बजाय रोग उत्पन्न ही न हो इस दृष्टि से कार्य करना होगा।अर्थात् स्वच्छता बनाये रखने के बजाय गंदगी ही न हो ,न पैदा करे, इसको प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिये भौतिक साधन सेे ज्यादा आवश्यकता हमे अपने चरित्र,स्वभाव आौर आदतों को सुधारने की होगी । हम मे से प्रत्येक नागरिक यदि यह दृढ संकल्प ले लेता हे कि वह स्वंय न ही अपने घर मे और न सार्वजनिक स्थल पर कोई गंदगी करेगा और न ही फैलायेगा तो निश्चित रूप से स्वच्छता अभियान का 70-80 प्रतिशत कार्य बगैर किसी खर्च के सफल हो सकता है।ं तब फिर स्थानीय स्वायत संस्थाओं को सिर्फ इस बात का प्रबंध करना होगा कि दैेनिक व्यक्तिगत जीवन में व सार्वजनिक जीवन में जो कचरा पैदा होता हैं उसको एकत्रित करने से लेकर वर्गीकृत कर नष्ट करने का प्रबंध किस प्रकार से सुचारू रूप से हो सकता हैं ताकि वे नागरिक जो गंदगी न फैलाने की प्रतिज्ञा ले चुके है, उन्हे दिनचर्या से उत्पन्न प्राकृतिक गंदगी को नष्ट करने मे सहायता मिल सके।

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